राजनीति में दूसरों पर कीचड़ उछालना बहुत आसान काम है। लेकिन जब वही कीचड़ खुद के दामन पर गिरता है, तो चेहरे का रंग उड़ जाता है। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ है। 10 दिन पहले राहुल गाँधी ने पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारी की नियुक्ति पर बड़ा हंगामा खड़ा किया था। उन्होंने देश की सबसे बड़ी संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग और बीजेपी पर बेहद गंभीर आरोप लगाए थे।
लेकिन अब केरल से एक ऐसी खबर आई है जिसने राहुल गाँधी के दावों की धज्जियाँ उड़ा दी हैं। केरल में कॉन्ग्रेस की सरकार है। वहाँ के कॉन्ग्रेस मुख्यमंत्री ने ठीक वही काम किया है, जिसे राहुल गाँधी 10 दिन पहले ‘चोरी’ और ‘इनाम’ बता रहे थे। अब जब उनकी खुद की पार्टी ने वही कदम उठाया है, तो राहुल गाँधी और उनकी पूरी टीम ने चुप्पी साध ली है।
राहुल गाँधी का वह पोस्ट: ‘जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम’
सबसे पहले बात करते हैं कि 10 दिन पहले ऐसा क्या हुआ था जिस पर राहुल गाँधी ने आसमान सिर पर उठा लिया था। दरअसल, पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल को वहाँ का मुख्य सचिव बनाया गया था। इसके साथ ही एक और चुनाव अधिकारी सुब्रत गुप्ता भी शुभेंदु अधिकारी की टीम का हिस्सा बने थे।
इस खबर के सामने आते ही राहुल गाँधी ने बिना सोचे-समझे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पोस्ट कर लिखा, “BJP-EC के ‘चोर बाजार’ में – जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम।” राहुल गाँधी का सीधा आरोप था कि इन चुनाव अधिकारियों ने चुनाव के दौरान BJP की मदद की यानी ‘वोटों की चोरी’ की। इसलिए BJP सरकार ने उन्हें मुख्य सचिव जैसा बड़ा पद देकर इसका ‘इनाम’ दिया है। राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्था को भी ‘चोर बाजार’ कह दिया था।
BJP-EC के “चोर बाज़ार” में – जितनी बड़ी चोरी, उतना बड़ा इनाम। https://t.co/2lNC1oATW1
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) May 12, 2026
अब केरल में कॉन्ग्रेस सरकार ने क्या खेल किया?
अब कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट आता है। राहुल गाँधी के इस बयान को अभी 10 दिन भी नहीं बीते थे कि केरल से एक बड़ी सरकारी नियुक्ति की खबर सामने आई। केरल में इस समय कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन की सरकार है। केरल सरकार ने एक आदेश जारी किया। इस आदेश के मुताबिक, डॉ रतन यू केलकर को मुख्यमंत्री का सचिव नियुक्त कर दिया गया है।
Rahul Gandhi’s selective outrage stands exposed yet again.
— Amit Malviya (@amitmalviya) May 23, 2026
He chose to criticise West Bengal Chief Minister Suvendu Adhikari for appointing Shri Manoj Agarwal as Chief Secretary. But unlike Mamata Banerjee, who repeatedly subverted the bureaucracy by superseding dozens of IAS… pic.twitter.com/Hpf7DTvU4b
अब चौंकने वाली बात यह है कि डॉ रतन यू केलकर कोई साधारण अधिकारी नहीं हैं। वे केरल के ‘मुख्य चुनाव अधिकारी’ के पद पर तैनात थे। यानी जिस समय केरल में चुनाव हो रहे थे, उस समय पूरी चुनावी व्यवस्था की कमान इन्हीं के हाथों में थी। अब कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्री ने चुनाव खत्म होते ही उन्हें अपना सबसे खास और करीबी सचिव बना लिया है।
खुद की बारी में ‘मजबूरी’ और दूसरों की बारी में ‘चोरी’?
अब यहाँ सबसे बड़ा सवाल राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी के इस दोगले रवैये पर खड़ा होता है। लोग यह पूछ रहे है कि अगर BJP या कोई गैर-कॉन्ग्रेसी सरकार किसी पूर्व चुनाव अधिकारी को उसकी योग्यता के आधार पर कोई पद दे, तो वह ‘चोर बाजार’ और ‘वोट चोरी का इनाम’ कैसे हो जाता है?
जब केरल में कॉन्ग्रेस की अपनी सरकार ठीक वही काम करती है, एक सिटिंग चुनाव अधिकारी को सीधे मुख्यमंत्री का सचिव बना देती है, तो वह ‘ईमानदार नियुक्ति’ कैसे बन जाती है? क्या राहुल गाँधी अब केरल के मुख्यमंत्री को भी पत्र लिखेंगे?
क्या वे अपनी ही सरकार के इस फैसले को ‘चोर बाजार’ का हिस्सा मानेंगे? जाहिर है कि वे ऐसा कभी नहीं करेंगे। यही राजनीति का वह दोहरा चेहरा है जिसे देश की जनता अब अच्छे से समझने लगी है।
बिना सबूत के रोना: विपक्ष और कॉन्ग्रेस का पुराना पैंतरा
इस पूरे विवाद के पीछे एक और बहुत बड़ी सच्चाई छिपी है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। कॉन्ग्रेस पार्टी और पूरा विपक्ष पिछले कई सालों से लगातार एक ही राग अलाप रहा है। जब भी वे कोई चुनाव हारते हैं, तो अपनी कमियों को सुधारने के बजाय सीधे चुनाव आयोग पर ठीकरा फोड़ देते हैं। वे हर बार चिल्लाते हैं कि चुनाव में धांधली हुई है, वोट चोरी हुए हैं, ईवीएम (EVM) में गड़बड़ी की गई है और चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं है।
लेकिन देश गवाह है कि आज तक कॉन्ग्रेस या किसी भी विपक्षी दल ने अदालत या जनता के सामने अपनी इन बातों का एक भी पुख्ता सबूत पेश नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट तक ने कई बार इनके दावों को खारिज किया है और फटकार लगाई है। सच्चाई यह है कि जब ये चुनाव जीत जाते हैं (जैसे केरल या अन्य राज्यों में), तब चुनाव आयोग बिल्कुल सही काम कर रहा होता है। लेकिन जब ये हार जाते हैं, तो उसी चुनाव आयोग को बदनाम करने की साजिश शुरू कर देते हैं।


