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कांसमंडी किले को लेकर पासी समाज और मुस्लिम आमने-सामने: जानें इस्लामी आक्रांता सालार मसूद गाजी से कनेक्शन, जिसे महाराजा सुहैल देव ने गाजर-मूली की तरह काटा

राजा कंस पासी ने छापामार युद्ध नीति से उसका डटकर मुकाबला किया और मसूद के दो प्रमुख सेनापतियों सैय्यद हातिम और सैय्यद खातिम को इसी कांसमंडी के मैदान में मार गिराया। पासी समाज का आरोप है कि आज उन्हीं आक्रांतों की कथित मजारों के नाम पर राजा कंस के किले पर अवैध कब्जा किया जा रहा है।

विश्वप्रसिद्ध और रसीले दशहरी आमों के लिए खास पहचान रखने वाला लखनऊ का मलिहाबाद क्षेत्र आज एक अत्यंत संवेदनशील ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक विवाद का मुख्य केंद्र बन चुका है। अयोध्या, काशी, मथुरा, संभल और धार की भोजशाला के बाद अब लखनऊ का ‘कांसमंडी’ इलाका देश और प्रदेश की सांस्कृतिक व राजनीतिक बहसों के केंद्र में आ गया है। इस पूरे विवाद के केंद्र में एक ऐसा ऐतिहासिक नाम है, जिसे लेकर एक बार फिर इतिहास के पन्नों को पलटा जा रहा है और वह नाम है सैय्यद सालार मसूद गाजी का।

कांसमंडी में स्थित एक विशाल, प्राचीन और ऊँचे टीलेनुमा परिसर को लेकर पासी समाज और मुस्लिम समुदाय आमने-सामने हैं। लाखन आर्मी, पासी समाज और विभिन्न हिंदू संगठनों का दृढ़ दावा है कि वर्तमान समय में जिस परिसर को मुस्लिम पक्ष द्वारा मस्जिद, मजार या पारंपरिक कब्रिस्तान बताया जा रहा है, वह वास्तव में 11वीं शताब्दी के महान चक्रवर्ती राजपासी शासक राजा कंस का ऐतिहासिक अजेय किला है।

पासी समाज का आरोप है कि इस किले के भीतर स्थित प्राचीन महादेव (शिव) मंदिर को दबाकर इसका इस्लामीकरण किया गया है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे वक्फ रिकॉर्ड में दर्ज सदियों पुरानी मस्जिद और मकबरा घोषित कर रहा है। लेकिन इस पूरे विवाद की सुलगती आग के पीछे सालार मसूद गाजी का वह क्रूर इतिहास है, जिसने 11वीं शताब्दी में भारत की धरती को लहूलुहान किया था।

कौन था सालार मसूद गाजी? जानें उसकी क्रूरता का इतिहास

सैय्यद सालार मसूद गाजी को स्थानीय लोककथाओं और कुछ धार्मिक परंपराओं में ‘गाजी मियाँ’ के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन इतिहास की किताबों और ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उसका परिचय एक अत्यंत क्रूर और बर्बर विदेशी आक्रांता के रूप में होता है। वह भारत के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़ने और अपार धन-दौलत लूटने वाले अफगान हमलावर महमूद गजनवी का सगा भाँजा था। सालार मसूद के पिता सालार साहू, महमूद गजनवी की सेना के प्रमुख सेनापति थे। मसूद बचपन से ही अपने मामा गजनवी की छत्रछाया में पला-बढ़ा था, इसलिए उसके भीतर भी भारत की धन-संपदा को लूटने और तलवार के बल पर इस्लाम का प्रचार करने का वही क्रूर जनून सवार था जो गजनवी में था।

17वीं शताब्दी में जहाँगीर के शासनकाल के दौरान अब्दुर रहमान चिश्ती द्वारा फारसी भाषा में लिखी गई किताब ‘मिरात-ए-मसूदी’ में सालार मसूद के जीवन और उसके सैन्य अभियानों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इस किताब के तथ्य बताते हैं कि सालार मसूद ने भारत में कई बड़े सैन्य अभियान चलाए। उसका एकमात्र उद्देश्य भारत के समृद्ध हिंदू राज्यों को नष्ट करना, उनके पवित्र मंदिरों को लूटना और यहाँ की आबादी का जबरन धर्म परिवर्तन कराना था।

अपने इस एजेंडे को पूरा करने के लिए उसने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। उसने दिल्ली, मेरठ और कन्नौज जैसे बड़े क्षेत्रों को लूटा और वहाँ के हिंदुओं का बड़े पैमाने पर कत्लेआम किया। कन्नौज को तबाह करने के बाद उसने अवध (वर्तमान लखनऊ और आसपास के क्षेत्र) की तरफ अपने कदम बढ़ाए, जहाँ उसका सामना इस मिट्टी के वीर योद्धाओं से हुआ।

सोमनाथ मंदिर की लूट से मसूद का संबंध

सालार मसूद गाजी का नाम भारत के सबसे पवित्र और समृद्ध मंदिरों में से एक गुजरात के सोमनाथ मंदिर की लूट से भी गहराता से जुड़ा हुआ है। हालाँकि इस बात को लेकर इतिहासकारों में कुछ मतभेद जरूर हैं कि क्या वह सीधे तौर पर उस मुख्य सेना का हिस्सा था, लेकिन कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य और दस्तावेज यह प्रमाणित करते हैं कि उसने अपने मामा महमूद गजनवी के साथ भारत के मंदिरों पर हुए भीषण हमलों में सक्रिय रूप से भाग लिया था।

गजनवी की सेना जब सोमनाथ के शिवलिंग को खंडित कर रही थी और मंदिर के सोने-चाँदी को लूट रही थी, तब सालार मसूद उस जेहादी सेना को वैचारिक और सैन्य नेतृत्व दे रहा था। भारत के सांस्कृतिक प्रतीकों को नष्ट करना और हिंदुओं की आस्था पर चोट करना सालार मसूद की युद्ध नीति का एक मुख्य हिस्सा था। यही कारण है कि भारतीय जनमानस और हिंदू संगठनों में सालार मसूद गाजी की छवि एक धर्मरक्षक की नहीं, बल्कि एक क्रूर मंदिर लुटेरे और हत्यारे की रही है।

11वीं शताब्दी के अवध में महाराजा कंस पासी की हुंकार

जब सालार मसूद गाजी अपनी विशाल और उन्मादी सेना लेकर दिल्ली और कन्नौज को मटियामेट करता हुआ अवध के क्षेत्र में दाखिल हुआ, तो उसे लगा था कि आगे का रास्ता भी उतना ही आसान होगा। लेकिन उसे यह अंदाजा नहीं था कि अवध की पावन धरती पर उसका सामना राजपासी समाज के उन वीर योद्धाओं से होने वाला है जो अपनी मातृभूमि और धर्म की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने से कभी पीछे नहीं हटते थे।

लखनऊ गजेटियर के आधिकारिक और ऐतिहासिक रिकॉर्ड में यह स्पष्ट रूप से दर्ज है कि 11वीं शताब्दी के अंतिम दौर में काकोरी, मलिहाबाद और उसके आसपास का पूरा क्षेत्र राजा कंस पासी के मजबूत राजनीतिक, सामाजिक और सैन्य प्रभाव में था। महाराजा कंस पासी एक बेहद स्वाभिमानी और रणनीतिक रूप से कुशल शासक थे। जब सालार मसूद की सेना मलिहाबाद और काकोरी की सीमाओं पर पहुँचकर गांवों को जलाने और मंदिरों को तोड़ने लगी, तब राजा कंस ने विदेशी दासता स्वीकार करने या आत्मसमर्पण करने के बजाय युद्ध का बिगुल फूँक दिया। उन्होंने अपने सभी सामंतों और सैनिकों को इकट्ठा किया और इस विदेशी आक्रांता को अपनी धरती से खदेड़ने की प्रतिज्ञा ली।

कांसमंडी के रक्तरंजित युद्ध में सालार के सेनापतियों का वध

अंग्रेजी हुकूमत के दौरान तैयार किए गए लखनऊ गजेटियर के अनुसार, कांसमंडी और काकोरी का यह संपूर्ण क्षेत्र सालार मसूद गाजी की विदेशी आक्रमणकारी सेना और स्थानीय हिंदू पासी राजाओं के बीच हुए अत्यंत भीषण और रक्तरंजित संघर्ष का मुख्य रणक्षेत्र बन गया। सालार मसूद के पास घुड़सवारों और आधुनिक हथियारों से लैस एक बड़ी सेना थी, लेकिन राजा कंस पासी ने अपनी भौगोलिक स्थिति और छापामार युद्ध नीति (गोरिल्ला वॉरफेयर) का शानदार उपयोग किया। उन्होंने कांसमंडी के अपने ऊँचे और अजेय किले को अपनी रक्षा और हमले का मुख्य केंद्र बनाया।

इस युद्ध के दौरान एक ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी जिसने सालार मसूद की सेना की रीढ़ तोड़ दी। गजेटियर में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख है कि युद्ध के मैदान में राजपासी राजा कंस और उनके वीर सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सालार मसूद गाजी के दो सबसे प्रमुख, भरोसेमंद और खूंखार सेनापतियों सैय्यद हातिम और सैय्यद खातिम को इसी कांसमंडी के मैदान में मार गिराया था।

इन दोनों सेनापतियों की मृत्यु कोई साधारण घटना नहीं थी; वे मसूद के अभियान के दो मुख्य स्तंभ थे। उनकी मौत से विदेशी सेना में हड़कंप मच गया और मसूद का जो अभियान अब तक अजेय लग रहा था, वह अवध की इस धरती पर आकर बेहद कमजोर और पस्त पड़ गया। राजा कंस पासी की इस बहादुरी ने सालार मसूद के विजयी रथ को ऐसा झटका दिया कि वह मलिहाबाद और लखनऊ के क्षेत्र में पूरी तरह पैर नहीं जमा सका।

बहराइच की ऐतिहासिक लड़ाई में सालार मसूद का अंत

मलिहाबाद और कांसमंडी में राजा कंस पासी से लोहा लेने के बाद सालार मसूद गाजी की सेना काफी कमजोर हो चुकी थी और उसके आधे से ज्यादा सैनिक मारे जा चुके थे। लेकिन अपने बचे-खुचे सैनिकों के साथ वह आगे बढ़ता रहा। इस कहानी का सबसे निर्णायक और अंतिम अध्याय बहराइच की ऐतिहासिक लड़ाई से जुड़ा है। साल 1034 ईस्वी में जब मसूद बहराइच के क्षेत्र में पहुँचा, तो वहाँ के महान शासक महाराजा सुहेलदेव के नेतृत्व में स्थानीय हिंदू राजाओं ने एक बड़ा गठबंधन तैयार कर लिया था।

महाराजा सुहेलदेव और राजा कंस पासी एक ही कालखंड के समकालीन योद्धा थे। बहराइच की प्रसिद्ध चित्तौरा झील के आसपास दोनों सेनाओं के बीच वह अंतिम और ऐतिहासिक महायुद्ध लड़ा गया। महाराजा सुहेलदेव की सेना ने सालार मसूद की फौज को चारों तरफ से घेर लिया। पासी समाज और स्थानीय राजाओं के संयुक्त पराक्रम के सामने विदेशी सेना टिक नहीं सकी।

महाराजा सुहेलदेव ने युद्ध के मैदान में सालार मसूद गाजी को गाजर-मूली की तरह काट डाला और उसे मिट्टी में मिला दिया। मसूद की पूरी सेना का समूल नाश कर दिया गया। मौत के बाद सालार मसूद को उसी बहराइच की धरती पर दफनाया गया, जहाँ बाद में फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल के दौरान उसकी मजार को एक बड़ी दरगाह का रूप दे दिया गया, जिसे आज गाजी मियाँ की दरगाह कहा जाता है।

वर्तमान विवाद की जमीनी हकीकत, किला बनाम मस्जिद

अब सवाल यह उठता है कि सदियों पुराने इस इतिहास की गूँज आज मलिहाबाद के कांसमंडी में दोबारा क्यों सुनाई दे रही है? दरअसल, विवाद की जड़ें उसी प्राचीन ऊँचे टीलेनुमा परिसर से जुड़ी हैं। पासी समाज का यह दृढ़ तर्क है कि जिस स्थान पर आज मुस्लिम पक्ष दावा कर रहा है, वह असल में महाराजा कंस पासी का मूल किला है। पासी समाज का आरोप है कि इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन विदेशी आक्रांताओं और उनके सेनापतियों (हातिम और खातिम) को राजा कंस ने इसी मैदान में मारकर अपनी धरती को गौरवान्वित किया था, आज उन्हीं की कथित मजारों और कब्रों के नाम पर राजा कंस के अपने ही किले पर अवैध कब्जा कर लिया गया है।

स्थानीय हिंदू संगठनों और पासी समाज के नेताओं का कहना है कि इस किले के मूल ऐतिहासिक स्वरूप को ‘जमीन जिहाद’ के माध्यम से धीरे-धीरे नष्ट किया गया है। उनके अनुसार, परिसर के भीतर एक अत्यंत प्राचीन महादेव (शिव) मंदिर स्थापित था, जिसे दबा दिया गया और अब वहाँ नमाज पढ़ी जा रही है।

इसके साथ ही परिसर के भीतर जानबूझकर नई कब्रें और उर्दू के शिलापट लगाकर इस पूरी सनातनी विरासत का इस्लामीकरण करने का प्रयास किया जा रहा है। पासी समाज इस बात से बेहद आक्रोशित है कि उनके गौरवशाली पूर्वजों के इतिहास को मिटाकर वहाँ एक आक्रांता के सहयोगियों का महिमामंडन किया जा रहा है।

पासी समाज के प्रमुख नेता सूरज पासी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “हम किसी भी समुदाय की वैध या कानूनी धार्मिक संपत्ति के खिलाफ बिल्कुल नहीं हैं, लेकिन हमारे पूर्वज महाराजा कंस पासी की महान विरासत को मिटाने की किसी भी साजिश को हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। लखनऊ गजेटियर इस बात का चश्मदीद गवाह है कि यह स्थान राजा कंस का किला था और यहीं उन्होंने विदेशी आक्रांताओं के सेनापतियों को धूल चटाई थी। हमारे आराध्य भगवान शिव के प्राचीन मंदिर को इस कब्जे से मुक्त कराना हमारी आस्था, हमारी संस्कृति और हमारे आत्मसम्मान का विषय है और हम इसके लिए कानूनी और सामाजिक रूप से अंतिम सांस तक लड़ेंगे।”

पासी समाज का यह भी कहना है कि राजपासी राजा कंस के बाद इस क्षेत्र में महाराजा बिजली पासी जैसे महान शासक रहे, जिनके नियंत्रण में उस समय 12 विशाल किले थे। इस समाज का भारत के रक्षा इतिहास में एक गौरवशाली स्थान रहा है, जिसे जानबूझकर इतिहास की मुख्यधारा की किताबों से गायब कर दिया गया।

मलिहाबाद के कांसमंडी में उपजा यह विवाद केवल एक जमीन के टुकड़े की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह इतिहास के उन दबे हुए, धूल धूसरित पन्नों को दोबारा पलटने जैसा है, जहाँ 11वीं शताब्दी के स्थानीय राजाओं का शौर्य, विदेशी आक्रांताओं का क्रूर और रक्तरंजित इतिहास और आज के दौर की धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिता आपस में सीधे टकरा रही हैं।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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