22 मई 2026 को केन्द्र सरकार के लैंड एंड डेवलपमेंट विभाग ने क्लब सेक्रेटरी को खत भेजकर जगह 5 जून तक खाली करने का आदेश दिया है। आदेश के मुताबिक, राष्ट्रपति मुर्मू ने जमीन लीज खत्म करने पर हस्तक्षर कर दिए हैं। 5 जून को होने वाली इस ‘री-एंट्री’ प्रक्रिया के तहत जमीन के साथ-साथ वहाँ निर्मित सभी ऐतिहासिक इमारतें, खेल परिसर और दूसरे ढाँचे भारत के राष्ट्रपति के अधीन हो जाएँगे।
सरकार ने क्लब को शांतिपूर्ण तरीके से कब्जा देने के लिए कहा है, ऐसा नहीं होने पर कानूनी तरीके से बल प्रयोग किया जा सकता है। हालाँकि क्लब के सदस्य सिद्धार्थ ने कहा है कि सरकार के आदेश को कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। ये ऐतिहासिक भवन है। इसको बनाने की शुरुआत 1913 में हुई थी। मौजूदा भवन 1930 के दशक में बनी।
क्यों अहम है दिल्ली जिमखाना क्लब
यह ऐतिहासिक इमारत प्रधानमंत्री आवास से सटा हुआ है। लुटियंस दिल्ली में प्राइम लोकेशन और रसूखदारों के जमावड़े के कारण यह बेहद अहम है। राजनीतिक नेताओं, न्यायधीशों, नौकरशाहों और उद्योगपतियों का एक तरह से मिलन स्थल है। यहाँ बड़ी बड़ी बैठकें होती हैं और अनौपचारिक तौर पर कहा जा सकता है कि सत्ता का यह केन्द्र भी है।
इसकी सदस्यता पाना बेहद मुश्किल काम है। एक समय यहाँ की सदस्यता पाने के लिए 30-37 साल तक लोगों को इंतजार करना पड़ता था। एक तरह से औपनिवेशक धरोहर रहे इस इमारत को सत्ता की धूरी भी कहा जा सकता है।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने 80 के दशक में सुरक्षा कारणों और वीवीआईपी कल्चर का हवाला देते हुए इसे बंद करने या इसका स्वरूप बदलने की कोशिश की थी, लेकिन सफल नहीं हुए। दरअसल क्लब के सदस्यों के भारी विरोध और उनके रसूख के सामने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की नहीं चल पाई।
भारतीय रक्षा रहस्य विदेशों को बेचने का सबसे बड़ा जासूसी कांड दिल्ली के जिमखाना क्लब से चला. सरकारी अफसर और विदेशी एजेंट यहां शराब पीने के लिए मिलते थे.
— Dilip Mandal (@Profdilipmandal) May 23, 2026
दुनिया उसे "कुमर नारायण कांड" नाम से जानती है.
1985 में पर्दा खुला. तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी इस क्लब को तोड़ना चाहते… pic.twitter.com/SggWAacrgE
दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास
जुलाई 1913 में इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब के नाम से इसका निर्माण कार्य शुरू किया गया। 1928 में करीब 15 साल बाद यह पूरी तरह बन कर तैयार हुआ। अंग्रेजों के जमाने में सिर्फ अंग्रेजी अधिकारी और कुछ भारतीय रियासतों के महाराजाओं को इस क्लब की सदस्यता दी गई थी। शुरुआत से ही यह क्लब रसूखदारों का अड्डा माना जाता है। इसका सदस्य बनना शान की बात थी। इसके पहले अध्यक्ष अंग्रेजी अधिकारी हारकोर्ट बटलर थे।
इसके वास्तुकार रॉबर्ट टोर रसेल थे, जिन्होंने कनॉट प्लेस और तीन मूर्ति भवन डिजाइन किया था। यही वजह है कि इसकी बड़ी-बड़ी बालकनी, ऊँची छतें और हर तरफ से दिखता हरा-भरा लॉन तीन मूर्ति भवन और कनॉट प्लेस की तरह है। इसका भव्य डिजाइन ब्रिटिश स्थापत्य कला का सुंदर उदाहरण है।
1930 में तत्काली वायसराय विलिंगडन की पत्नी लेडी विलिंगडन जब इस क्लब में आईं, तो उन्हें स्वीमिंग पूल की कमी नजर आई। उन्होंने 1936 में स्वीमिंग पूल बनाने के लिए 21000 रुपए दान किए। इसके बाद यहाँ स्वीमिंग पूल के साथ साथ स्क्वैश कोर्ट बनी। इसके बाद यहाँ कई खेल की सुविधाएँ बढाई गई। अभी यहाँ कई खेलों की उच्चस्तरीय सुविधाएँ हैं।
वर्तमान में भारत में सबसे ज्यादा 26 घास वाले टेनिस कोर्ट यहाँ हैं। इसके अलावा 7 क्ले कोर्ट और सिंथेटिक टेनिस कोर्ट, स्क्वैश कोर्ट, बैडमिंटन कोर्ट, बिलियर्ड्स रूम, कवर स्विमिंग पूल के अलावा 3 बार और 43 ट्रांजिट कॉर्टेज हैं।
यहाँ हुआ था महात्मा गाँधी-इरविन समझौता
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1931 में महात्मा गाँधी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच यहाँ समझौता हुआ था। इससे पहले यहाँ दोनों के बीच कई बैठकें भी हुई। इस नजरिए से देखा जाए तो यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी भी रहा है।
1947 में जब देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना, तो पाकिस्तान जाने का फैसला ले चुके अपने साथियों के सम्मान में जनरल के.एम.करिअप्पा ने विदाई भोज का आयोजन किया था।
भारत की आजादी के बाद 1947 में ही इस क्लब के नाम से ‘इंपीरियल’ शब्द हटा दिया गया। इसके बाद आज तक इसे दिल्ली जिमखाना क्लब के नाम से जाना जाता है। आजादी के बाद देशी रिसासतों को मिलाने का सरदार पटेल का संकल्प भी इस इमारत से जुड़ा हुआ है। दरअसल इस क्लब में सरदार पटेल ने अपने सहयोगी वीपी मेनन के साथ कई गुप्त बैठकें की। इसके बाद करीब 500 देशी रियासतों के विलय को अमली जामा पहनाया गया। वीपी मेनन ने महाराजाओं को समझाने और मनाने के लिए इस क्लब में उनके साथ गुप्त बैठकें की और देशी रिसासतों का विलय कराया गया।
यहाँ की सदस्यता लेना उसी तरह मुश्किल रहा, जैसा अंग्रेजों के वक्त हुआ करता था। अब बस अंतर यह है कि बड़े बड़े राजनेताओं, उद्योगपतियों, न्यायधीशों और नौकरशाहों को यहाँ की सदस्यता मिलती थी। एक तरह से यह सत्ता का अनौपचारिक केन्द्र भी है।
इतना ही नहीं, दिल्ली जिमखाना क्लब में स्कवैश, बैडमिंटन, क्रिकेट के ग्राउंड के अलावा 26 घास के टेनिस कोर्ट हैं। स्क्वैश चैंपियन भुवनेश्वरी कुमारी ने यहाँ जमकर प्रैक्टिस की थी। माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल करने वाले कप्तान एमएस कोहली ने यहाँ जमकर पसीना बहाया। एक तरह से देखा जाए तो यह खेलों का भी अहम केन्द्र है।
इस क्लब की खासियत यहाँ का विशाल लाइब्रेरी भी है। इनमें कई ऐतिहासिक अखबार, पत्रिका भी शामिल हैं। 1843 की मशहूर व्यंग्य पत्रिका ‘पंच’ के अंक यहाँ मिलते हैं। लाइब्रेरी में 36000 से ज्यादा किताबें हैं। एक तरह से खेल, राजनीति के साथ-साथ यह ज्ञान का केन्द्र भी रहा है। यहाँ पहले कई तरह की साहित्यिक चर्चाएँ होती थी।
दिल्ली के अहम ऐतिहासिक इमारत, जिस पर सरकार ने कब्जा किया
शेख अली की गुमटी- दिल्ली के डिफेंस कॉलोनी इलाके में मौजूद शेख अली की गुमटी लोधी काल की करीब 600 साल पुरानी इमारत है। यहाँ स्थानीय RWA ने दशकों तक अपना कार्यालय बना रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में आदेश दिया कि इमारत खाली कर सरकार को सौंपी जाए और RWA पर 40 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया।
नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक- सरकार अब ‘राष्ट्रीय संग्रहालय’ की तरह इस्तेमाल करने का फैसला किया है। पहले मंत्रालयों द्वारा इसका इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन अब सरकार इनके उपयोग और नियंत्रण का स्वरूप बदल रही है।
उदयपुर हाउस- सिविल लाइंस स्थित यह ऐतिहासिक भवन लंबे कानूनी विवाद के बाद राजस्थान सरकार के कब्जे में वापस आया। इसकी कीमत लगभग 1500 करोड़ रुपये बताई गई थी।
महल ऑफ पठान- इसको लेकर विवाद उस समय सामने आया जब दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व अधिकारी ने इसके कुछ हिस्से पर कब्जा कर लिया। बाद में पुरातत्व विभाग ने संरक्षण और खाली कराने की कार्रवाई शुरू की।


