हमारे देश में कुछ ऐसे पढ़े-लिखे लोग हैं जो खुद को बहुत उदारवादी (लिबरल) कहते हैं। लेकिन इनका एक तय एजेंडा बन चुका है। इनका काम सिर्फ दो हैं। पहला- इस्लामी कट्टरपंथ और पुरानी कुप्रथाओं का आँख मूँदकर समर्थन करना। दूसरा- हिंदू त्योहारों और रीतियों के खिलाफ बातें करना। इनकी सारी बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ और ज्ञान सिर्फ इसी एक काम में खर्च होते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद के एक लेख ने इस चेहरे को फिर से सबके सामने ला दिया है।
बकरीद से ठीक पहले प्रोफेसर अपूर्वानंद ने ‘द वायर‘ (The Wire) पर एक लेख लिखा। यह कोई निष्पक्ष लेख नहीं है, बल्कि एकतरफा रोना है। इस लेख की हर बात में देश के सिस्टम और हिंदुओं के प्रति साफ गुस्सा दिखता है। पूरे लेख में बस एक ही खेल खेला गया है। किसी भी तरह मुसलमानों को ‘बेचारा और पीड़ित’ साबित किया जाए। वहीं दूसरी तरफ, हिंदुओं और देश की चुनी हुई सरकार को ‘विलेन’ (दोषी) बना दिया जाए।
इस तरह की सोच को ‘अर्बन नक्सल’ मानसिकता कहा जाता है, जिसका सच सामने आना बहुत जरूरी है। इसलिए हम प्रोफेसर साहब के इस लेख का सीधा और बिंदुवार विश्लेषण कर रहे हैं। हम हवा में बात नहीं करेंगे, बल्कि तथ्यों और सबूतों के साथ बताएँगे कि सच क्या है और फैलाया जा रहा झूठ क्या है।
कानून के शासन से लिबरलों को इतनी चिढ़ क्यों?
अपूर्वानंद का तर्क- “बकरीद करीब आ रही है। हमें यह कैसे पता चलता है? यह किसी स्थानीय मौलवी की बात नहीं है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं, मंत्रियों और बीजेपी-नीत सरकारों के मुख्यमंत्रियों के बयान हैं, जो सभी मुसलमानों को चेतावनी और धमकियों से भरे होते हैं… पश्चिम बंगाल में, मंत्री दिलीप घोष ने हिंदी में चेतावनी दी कि सब कुछ ‘कानून के मुताबिक’ होना चाहिए और किसी को भी इसका उल्लंघन करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। लेकिन किस संदर्भ में और किसे वे यह बात कह रहे थे?”

जवाब- अपूर्वानंद के इस प्रोपेगेंडा को पढ़कर यह समझना मुश्किल नहीं है कि उन्हें असल में इस बात से चिढ़ है कि आखिर भारत का प्रशासनिक तंत्र मुस्लिम समुदाय से कानून का पालन करने को कह ही कैसे रहा है। दशकों तक मुस्लिम तुष्टिकरण की गंदी राजनीति देखने वाले इन अर्बन नक्सलियों को यह बात हजम नहीं हो रही है कि देश में सबके लिए एक कानून (Rule of Law) लागू हो रहा है। वे चाहते हैं कि अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार मिले रहें और उन्हें सड़कों पर मनमर्जी करने की खुली छूट हो। जब सरकारें कहती हैं कि त्योहार कानून के दायरे में रहकर मनाएँ, तो इन्हें इसमें ‘चेतावनी’ और ‘धमकी’ नजर आने लगती है।
सड़कों को बंधक बनाने की वकालत क्यों?
अपूर्वानंद का तर्क- हर कोई जानता है कि ये चेतावनियाँ बकरीद से पहले मुसलमानों को निशाना बनाकर दी गई थीं। इससे पहले भी, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने धमकी दी थी कि किसी को भी सड़कों पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी… उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को चेतावनी दी कि उन्हें सड़कों पर नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि अगर वे यह संदेश नहीं समझते हैं, तो उन्हें दूसरे तरीकों से ‘समझाया जाएगा’। हम सभी जानते हैं कि वे ‘दूसरे तरीके’ क्या हैं।

जवाब- सड़क घेरकर सामूहिक रूप से नमाज पढ़ने की जिद का समर्थन केवल एक अराजक मानसिकता का व्यक्ति ही कर सकता है। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने साफ किया है कि सड़कें आम जनता, एम्बुलेंस और यातायात के लिए हैं, न कि किसी मजहबी गतिविधि को रोककर सार्वजनिक व्यवस्था ठप करने के लिए। क्या अपूर्वानंद को लगता है कि राहगीरों का रास्ता रोकना कोई मजहबी अधिकार है? जब यूपी के मुख्यमंत्री कानून के उल्लंघन पर ‘प्रशासनिक कार्रवाई’ की बात करते हैं, तो उसे ‘दूसरे तरीके’ कहकर डराने का नैरेटिव गढ़ना बंद होना चाहिए। कानून का डंडा अपराधियों और उपद्रवियों पर चलता है, शांतिपूर्ण नागरिकों पर नहीं।
‘सनातन भावनाओं’ का सम्मान करने की सलाह से मिर्ची क्यों लगी?
अपूर्वानंद का तर्क- असम के मुख्यमंत्री ने मुसलमानों को सलाह दी कि वे कुर्बानी ‘ठीक ढंग से’ करें। उन्होंने उन मुस्लिम आवाजों की तारीफ की जिन्होंने गाय की कुर्बानी के खिलाफ अपील की थी। हिमंता बिस्वा सरमा तो यहाँ तक कह गए कि बकरीद को आखिरकार कुर्बानी से पूरी तरह मुक्त हो जाना चाहिए। उन्होंने ऐलान किया कि मुसलमान ‘सनातन भावनाओं’ का सम्मान कर रहे हैं, और उन्होंने कहा कि इससे समाज में शांति बनी रहेगी।

जवाब- भारत जैसे विविधता वाले देश में अगर कोई मुख्यमंत्री सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए बहुसंख्यक समाज की ‘सनातन भावनाओं’ और गोवंश के सम्मान की अपील करता है, तो वामपंथियों के पेट में मरोड़ क्यों उठने लगती है? असम के मुख्यमंत्री ने समाज में शांति और भाईचारे के लिए यह बात कही। लेकिन अपूर्वानंद जैसों को समाज में शांति नहीं, बल्कि तनाव पसंद है। वे चाहते हैं कि ऐसी बातें उठती रहें जिससे ध्रुवीकरण हो और उनका बुद्धिजीवी होने का धंधा चलता रहे।
गौ-तस्करी और अवैध गतिविधियों का खुला बचाव
अपूर्वानंद का तर्क- ऐसे Video घूम रहे हैं जिनमें हम देखते हैं कि गाड़ियों को रोका जा रहा है और उन पर हमला किया जा रहा है, इस शक पर कि गायों को कुर्बानी के लिए गैर-कानूनी तरीके से ले जाया जा रहा है। लेकिन अब यह मामला सिर्फ गायों तक ही सीमित नहीं रहा। बकरियों को भी जब्त किया जा रहा है। दिल्ली में, बकरीद से ठीक पहले, नेहरू हिल पार्क में लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई थी… ‘गौ रक्षक’ टोलियाँ बनाई जा रही हैं।”

जवाब- इस देश में गोवंश की हत्या और उसकी तस्करी पर कानूनी प्रतिबंध है। अपूर्वानंद बड़ी चालाकी से अवैध गौ-तस्करी को ‘कुर्बानी के लिए परिवहन’ का मासूम नाम दे रहे हैं। हकीकत यह है कि अवैध रूप से ले जाए जा रहे जानवरों को रोकना कानूनन सही है। यह वामपंथी प्रोफेसर इस बात से पूरी तरह अनजान बन जाते हैं कि कैसे अवैध गौ-तस्करी को रोकते वक्त इस्लामी भीड़ द्वारा पुलिस और आम नागरिकों पर जानलेवा हमले किए जाते हैं। नेहरू हिल पार्क जैसी सार्वजनिक जगहों पर अगर प्रशासन अवैध खरीद-बिक्री और गंदगी रोकने के लिए सुरक्षा बढ़ाता है, तो उसे ‘मुसलमानों पर पाबंदी’ के रूप में दिखाना इनकी कुंठा को दर्शाता है।
मक्का के सच और PETA के अभियान से चिढ़
अपूर्वानंद का तर्क- एक टेलीविजन चैनल तो यह जाँचने के लिए मक्का तक चला गया कि क्या वहाँ गायों और ऊँटों की कुर्बानी दी जा रही है… पीटा (PETA) ने एक अभियान शुरू किया, जिसमें एक बकरी लोगों से गुहार लगाती है कि वे उसकी कुर्बानी न दें… PETA के इस अभियान में बकरियों के प्रति करुणा कम है, और मुसलमानों के प्रति द्वेष ज्यादा है। क्या PETA कामाख्या मंदिर या देवघर में भी ऐसा ही कोई अभियान चला सकता है, जहाँ रस्मों के दौरान कई जानवरों की कुर्बानी दी जाती है? उसने ऐसा कभी नहीं किया।

जवाब – जब कोई मीडिया चैनल यह दिखाता है कि मूल इस्लामी देशों (जैसे सऊदी अरब या मक्का) में भी स्थानीय कानूनों और व्यवस्था के तहत ही चीजें होती हैं, तो भारतीय लिबरलों का झूठ बेनकाब हो जाता है। इसलिए वे मीडिया को कोसने लगते हैं। रही बात PETA की, तो जब होली पर पानी बचाने या दिवाली पर पटाखे न फोड़ने के ज्ञान भरे ज्ञान-पत्र PETA द्वारा जारी किए जाते हैं, तब अपूर्वानंद जैसों की आँखें क्यों नहीं खुलतीं? तब उन्हें वो पोस्ट कभी हिंदू-विरोधी नहीं लगते। और तो और होली पर तरुण हत्याकांड में क्यों चुप रहें, जिसमें एक हिंदू युवक की मुस्लिमों द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इसमें भी तो इस्लामी कट्टरपंथियों को पीड़ित दिखाते हुए अपूर्वानंद ने एक लेख छापा था।

बकरीद पर बकरे काटे जाने को सही ठहराने के लिए उन्होंने कामाख्या और देवघर जैसे पवित्र देवस्थानों को बदनाम करने की कोशिश की। वे यह भूल गए कि जहाँ भी हिंदू समाज में ऐसी कुछ प्राचीन परंपराएँ बची भी हैं, वहाँ सड़कों पर सरेआम खून नहीं बहाया जाता, न ही बीच सड़क पर जानवरों को काटा जाता है। इसके विपरीत, पशु क्रूरता के खिलाफ खुद हिंदू समाज के ही लोग सबसे पहले अदालतों और सुधार आंदोलनों में आगे आते हैं।
हिंदू त्योहारों पर कीचड़ उछालने का घिनौना प्रयास
अपूर्वानंद का तर्क- कई हिंदू भोलेपन से पूछते हैं कि सड़कों पर नमाज पढ़ी ही क्यों जानी चाहिए। वे नमाज पर लगी पाबंदियों को सही कदम मानते हैं… लेकिन वे कभी यह नहीं पूछते कि हर मंगलवार को हनुमान मंदिरों के बाहर सड़कें घंटों तक क्यों बंद रहती हैं। लगभग हर हिंदू त्योहार के दौरान, सड़कों पर मूर्तियाँ और जुलूस ही छाए रहते हैं… चाहे गणेश चतुर्थी हो, रथ यात्रा हो, राम नवमी हो, दुर्गा पूजा हो… सड़कें सिर्फ एक दिन के लिए ही नहीं, बल्कि अक्सर कई-कई दिनों तक लगातार बंद रहती हैं। और फिर एक महीने तक चलने वाली कांवड़ यात्रा भी है…

जवाब- एक बकरीद और सार्वजनिक स्थानों पर मनमानी को सही ठहराने के लिए अपूर्वानंद ने हिंदुओं के लगभग सभी प्रमुख त्योहारों- गणेश चतुर्थी, रथ यात्रा, राम नवमी, दुर्गा पूजा और काँवड़ यात्रा पर सवाल खड़े कर दिए। लेकिन इस वामपंथी प्रोफेसर ने यह छुपा लिया कि हिंदुओं के त्योहारों में सड़कों पर दिखने वाली भीड़ साल में केवल एक बार, एक निश्चित समय के लिए होती है, और वह भी पूरी तरह प्रशासन द्वारा तय किए गए रूट और अनुमति (Permission) के अनुसार होती है। हिंदू समाज सरकारी व्यवस्था का सम्मान करता है। DJ की आवाज से लेकर जुलूस के रास्ते तक, सब कुछ पुलिस तय करती है।
इसके उलट, सड़क घेरकर हर हफ्ते पढ़ी जाने वाली शुक्रवार की नमाज का कोई अंत नहीं होता। देश के किसी भी हिस्से में, किसी भी मुख्य मार्ग पर अचानक हजारों की इस्लामी भीड़ इकट्ठा होकर ट्रैफिक ठप कर देती है। मस्जिद से अचानक ईंट-पत्थर लेकर पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों पर हमला होने लगता है। यह नजारा उत्तर प्रदेश के बरेली और अन्य जिलों में बखूबी देखने को मिला था। मुस्लिम बहुल इलाकों से शुक्रवार को गुजरना आम नागरिकों के लिए कितना बड़ा सिरदर्द बन जाता है, यह वहाँ रहने वाले लोग ही इस वामपंथी को बेहतर समझा सकते हैं।
‘मुस्लिम संयम’ बनाम ‘मस्जिदों के बाहर पथराव’ का कड़वा सच
अपूर्वानंद तर्क- मुसलमान अपने त्योहारों के दौरान कोई हंगामा या उन्माद नहीं मचाते… वे कभी भी मंदिरों के सामने से जुलूस निकालते हुए बलि नहीं देते… सिर्फ हिंदू ही मस्जिदों के सामने जोर-जोर से संगीत बजाने, मस्जिद परिसर में घुसने और मुसलमानों के धार्मिक प्रतीकों का अपमान करने के अधिकार की माँग करते हैं… मुसलमानों में उनके त्योहारों के दौरान एक तरह का संयम देखने को मिलता है। लेकिन बदकिस्मती से, इन मौकों पर, हिंदू समाज के भीतर मुसलमानों के प्रति जो नफरत छिपी होती है…

जवाब – यह केवल एक अर्बन नक्सल का ही शुतुरमुर्गी विचार हो सकता है जो जमीनी हकीकत से आँखें मूँदकर यह दावा करे कि मुस्लिम त्योहारों पर ‘संयम’ दिखता है। क्या अपूर्वानंद को नहीं पता कि रामनवमी या दुर्गा पूजा विसर्जन के दौरान देश के दर्जनों राज्यों में हिंदू शोभायात्राओं पर मस्जिदों और मुस्लिम छतों से पत्थरों, पेट्रोल बमों और तलवारों से हमले किए जाते हैं? क्या हनुमान जयंती के जुलूसों पर होने वाली हिंसक घटनाओं में भी उन्हें हिंदुओं की ही गलती नजर आती है?
मोहर्रम के जुलूसों में लहराई जाने वाली नंगी तलवारों और हथियारों से क्या आम जनता को कोई असुविधा या डर महसूस नहीं होता? हिंदुओं को ‘मानसिक बीमार’ बताने वाले अपूर्वानंद ताजिया जुलूसों के दौरान होने वाली सरेआम हिंसा और आगजनी पर पूरी तरह मौन साध लेते हैं, क्योंकि वहाँ उनके एजेंडे को ‘पीड़ित कार्ड’ खेलने का मौका नहीं मिलता।
वैचारिक घृणा और दंगों की साजिश का पुराना इतिहास
इन खुद को ‘ज्ञानी’ समझने वाले झोलाछापों का दिमाग पूरी तरह खोखला हो चुका है। इनका दोहरा चरित्र देखना हो, तो सबरीमाला मंदिर वाले मामले को याद कर लीजिए। तब यही वामपंथी कोर्ट के फैसलों का पन्ना लेकर कूद पड़े थे। हिंदू परंपराओं को ‘पिछड़ा’ और ‘महिलाओं का विरोधी’ बताने के लिए इन्होंने अपनी पूरी एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। लेकिन जैसे ही बकरीद आती है, इनकी बोलती बंद हो जाती है। जब सड़कों को जाम किया जाता है और बीच राह पर खुलेआम पशुबलि दी जाती है, तब इन्हें अचानक ‘मजहबी आजादी’ याद आने लगती है। तब ये सारा ज्ञान भूलकर दुबक जाते हैं।
आज बकरीद पर हिंदुओं के त्योहारों को ज्ञान देने वाले इस प्रोफेसर अपूर्वानंद का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड भी देख लीजिए। यह कोई पहली बार नहीं है जब यह नफरत उगल रहा है। दिल्ली में जो हिंदू विरोधी दंगे हुए थे, उनकी चार्जशीट में भी इस प्रोफेसर का नाम आ चुका है। इन पर दंगों की साजिश रचने और भीड़ को भड़काने के बेहद गंभीर आरोप लगे थे।
ऐसे में ‘द वायर’ (The Wire) जैसी बदनाम वेबसाइट पर बैठकर इस प्रोफेसर का यह लेख लिखना कोई समाज सुधार की बात नहीं है। यह सीधे-सीधे भारत के कानून को ठेंगा दिखाना है। यह देश के बहुसंख्यक समाज को पूरी दुनिया में बदनाम करने की एक घटिया और सोची-समझी साजिश है।


