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EC के SIR अभियान पर SC की मुहर: निष्पक्ष चुनाव, नागरिकता जाँच और संवैधानिक पावर पर ‘सुप्रीम’ फैसला, जानें कोर्ट ने क्या कुछ कहा

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत ऐसा संशोधन करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई 2026) को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (SIR) कराने के फैसले को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि इस कवायद का मकसद देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को मजबूत करना है। यह फैसला चुनाव आयोग द्वारा पिछले साल बिहार में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया शुरू करने के निर्णय को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर आया है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि चुनाव आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 के साथ-साथ लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और इसके तहत बने नियमों के तहत ऐसा संशोधन करने का संवैधानिक अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विशेष गहन संशोधन सीधे तौर पर मतदाता सूचियों की ‘अखंडता, सटीकता और शुद्धता’ सुनिश्चित करने से जुड़ा है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद है।

सुप्रीम कोर्ट ने चार मुख्य सवाल तय किए

अदालत ने SIR अभ्यास की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर अपना फैसला सुनाते हुए (pdf), विचार के लिए चार प्रमुख प्रश्नों को चिन्हित किया।

  1. क्या चुनाव आयोग के पास विवादित (Impugned) विशेष गहन पुनरीक्षण कराने की शक्ति है?
  2. क्या यह SIR अभ्यास किसी वैध उद्देश्य पर आधारित है, और यदि हां, तो क्या चुनाव आयोग द्वारा अपनाए गए उपाय उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए उचित और अनुपातिक हैं?
  3. क्या चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960  के प्रावधानों के विपरीत या उनके उल्लंघन में है?
  4. क्या अपने संवैधानिक दायित्व मतदाता सूची के निर्माण और रखरखाव के तहत और संबंधित वैधानिक शर्तों के पालन में, चुनाव आयोग को उन व्यक्तियों की नागरिकता स्थिति की जाँच करने का अधिकार है जो मतदाता सूची में शामिल होने या बने रहने के इच्छुक हैं?

कोर्ट ने कहा कि ECI के पास SIR कराने का संवैधानिक अधिकार है

पहले मुद्दे पर विचार करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि चुनाव आयोग के पास (SIR) कराने का पूर्ण अधिकार है। कोर्ट ने माना कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत विधिवत रूप से अधिकृत है। साथ ही, अदालत ने उन दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि यह अभ्यास मौजूदा चुनाव कानूनों का उल्लंघन करता है।

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, “विवादित SIR न तो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम और न ही 1960 के नियमों को निष्प्रभावी करता है, बल्कि यह अनुच्छेद 324 के संवैधानिक जनादेश को और अधिक प्रभावी बनाता है।”

फैसले का एक अंश

पीठ ने आगे स्पष्ट किया कि यदि परिस्थितियाँ ऐसी हों कि आवश्यकता महसूस हो, तो चुनाव आयोग  को सामान्य मतदाता सूची पुनरीक्षण से अलग प्रक्रिया अपनाने की अनुमति है।

अदालत के अनुसार, आयोग अपने संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों के तहत स्थिति के अनुसार अधिक सख्त या विशेष प्रक्रिया लागू कर सकता है, बशर्ते उसका उद्देश्य मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना हो।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब तक चुनाव आयोग कानून के दायरे में काम करता है, विशेष शक्ति के प्रयोग के लिए कारण दर्ज करता है, और अधिनियम या नियमों में किसी स्पष्ट निषेध का उल्लंघन नहीं करता, तब तक केवल इस आधार पर कि उसने सामान्य पुनरीक्षण से अलग प्रक्रिया अपनाई है, उस निर्णय को रद्द नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने यह भी कहा कि SIR को सीधे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक आवश्यकता से जोड़ा जाना चाहिए। पीठ ने टिप्पणी की कि “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते, बल्कि वे मतदाता सूची की शुद्धता, सटीकता और शुचिता पर भी आधारित होते हैं।”

जजों ने यह भी उल्लेख किया कि पिछली बार व्यापक पुनरीक्षण को दो दशकों से अधिक समय बीत चुका है और इस दौरान तेज़ शहरीकरण, जनसंख्या प्रवास तथा मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर नामों के जुड़ने और हटने जैसी परिस्थितियों ने एक नए सत्यापन अभ्यास को उचित ठहराया है।

कोर्ट ने कहा कि SIR का एक जायज मकसद है

दूसरे प्रश्न पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि SIR अभ्यास के पीछे का उद्देश्य न केवल वैध है, बल्कि संवैधानिक रूप से आवश्यक भी है।

कोर्ट ने कहा कि आयोग द्वारा जिस उद्देश्य को प्राप्त करने की कोशिश की जा रही है, मतदाता सूची की सटीकता, पूर्णता और शुद्धता को बहाल करना वह न केवल वैध है, बल्कि चुनाव आयोग को दिए गए संवैधानिक दायित्व का अभिन्न हिस्सा है।

अदालत ने यह भी कहा कि SIR को लेकर यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि इसका कोई उचित उद्देश्य नहीं है या यह राजनीतिक रूप से प्रेरित है। पीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा दिए गए कारणों का एक ‘प्रत्यक्ष और तार्किक संबंध’ एक विश्वसनीय और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया को बनाए रखने से है।

फैसले का एक अंश

तीसरे पहलू पर विचार करते हुए, पीठ ने यह भी जांचा कि SIR के दौरान अपनाए गए तरीके उद्देश्य के अनुपात में हैं या नहीं। अदालत ने पाया कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाए गए उपाय जैसे घर-घर जाकर सत्यापन और अद्यतन फॉर्मों का संग्रह उचित और तर्कसंगत हैं।

कोर्ट ने कहा कि “ये उपाय न केवल निर्धारित उद्देश्य से तार्किक रूप से जुड़े हुए हैं, बल्कि वास्तव में उसी को प्राप्त करने के लिए स्वाभाविक रूप से तैयार किए गए हैं।”

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि फिजिकल वेरिफिकटीओन से पुराने या डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान करने में मदद मिलती है, जबकि मानकीकृत फॉर्मों से पूरे निर्वाचन क्षेत्रों में एक समान और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित होती है।

फैसले में यह भी कहा गया कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, जैसे अधिकारियों द्वारा जांच, संदिग्ध मामलों में नोटिस जारी करना, सुनवाई का अवसर और अपील की व्यवस्था।

कोर्ट ने कहा कि “ये सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय अपनाए गए साधनों और प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्य के बीच तर्कसंगत संबंध को और मजबूत करते हैं।”

अंत में इस मुद्दे को समाप्त करते हुए अदालत ने कहा, “हम संतुष्ट हैं कि विवादित SIR का मतदाता सूची की शुद्धता और सटीकता सुनिश्चित करने से प्रत्यक्ष और निकट संबंध है।”

कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की

तीसरे मुद्दे की जाँच करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उन दावों को खारिज कर दिया कि SIR प्रक्रिया मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 21A (Rule 21A) का उल्लंघन करती है।

याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया था कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना नामों को मतदाता सूची से हटाया जा सकता है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि SIR ढांचे के भीतर भी नोटिस जारी करना, जाँच, सुनवाई का अवसर और कारण सहित निर्णय जैसे सभी आवश्यक प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय उपलब्ध हैं।

इस आधार पर कोर्ट ने माना कि प्रक्रिया कानून के अनुरूप है और इसमें मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त मौजूद हैं।

फैसले का एक अंश

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये सुरक्षा उपाय प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में फैले हुए हैं, जिनमें गणना, प्रारूप मतदाता सूची का प्रकाशन और दावा-आपत्ति की प्रक्रिया शामिल हैं।

पीठ ने कहा कि “कानूनी ढाँचा किसी कठोर या एकल प्रक्रिया प्रारूप की माँग नहीं करता, बल्कि कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित करने की अपेक्षा करता है।”

अदालत ने चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई दस्तावेज सत्यापन प्रणाली को भी सही ठहराया। पीठ के अनुसार, दस्तावेज़ों की आवश्यकता का उद्देश्य ‘प्रशासनिक एकरूपता और साक्ष्यगत विश्वसनीयता’ सुनिश्चित करना है।

याचिकाकर्ताओं ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि राशन कार्ड और वोटर ID कार्ड जैसे दस्तावेजों को स्वीकार्य सूची से बाहर रखा गया है। हालाँकि, कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग के विवेकाधिकार में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने टिप्पणी की कि “मतदाता सूची के सत्यापन के लिए किन दस्तावेजों को स्वीकार किया जाएगा और उनके साक्ष्य मानक क्या होंगे, यह निर्णय स्वाभाविक रूप से आयोग के विवेकाधिकार के दायरे में आता है।”

अंत में कोर्ट ने कहा कि दस्तावेज़ी ढाँचा न तो मनमाना है और न ही अवैध। पीठ ने निष्कर्ष देते हुए कहा, “हम मानते हैं कि आयोग द्वारा निर्धारित दस्तावेज व्यवस्था उसके संवैधानिक जनादेश के अनुरूप एक सुविचारित प्रशासनिक विवेक का प्रयोग है।”

फैसले का एक अंश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ECI वोटर रोल के लिए कर सकता है नागरिकता की जाँच

चौथे मुद्दे पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची तैयार करने के दौरान चुनाव आयोग के पास सीमित उद्देश्य के लिए नागरिकता से जुड़े प्रश्नों की जाँच करने का अधिकार है, ताकि यह तय किया जा सके कि किसी व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल किया जाए या नहीं।

हालाँकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा की गई ऐसी जाँच या निष्कर्ष किसी व्यक्ति की नागरिकता के अंतिम निर्धारण के बराबर नहीं होंगे। पीठ ने कहा, “यह केवल आयोग की शक्तियों के दायरे से संबंधित मामला नहीं है, बल्कि यह इस बात से जुड़ा है कि इन शक्तियों का प्रयोग उस क्षेत्र में किस प्रकार किया जाए जो सीधे नागरिकता की स्थिति को प्रभावित करता है।”

फैसले का एक अंश

कोर्ट ने चुनाव आयोग की इस दलील को स्वीकार किया कि संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 के साथ-साथ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 के तहत आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह यह सत्यापित कर सके कि कोई व्यक्ति मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित शर्तों को पूरा करता है या नहीं।

साथ ही पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि नागरिकता एक गंभीर संवैधानिक विषय है और इसका अंतिम और निर्णायक निर्धारण केवल चुनाव आयोग द्वारा नहीं किया जा सकता।

न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि यदि चुनाव आयोग को किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर संदेह होता है, तो उसे इस मामले को नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकरण के पास अंतिम निर्णय के लिए भेजना अनिवार्य होगा।

न्यायालय के अंतिम निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कई सवालों पर स्पष्टता देते हुए संदिग्ध नागरिकता और अफवाहों पर आधारित दावों से जुड़े मामलों के लिए स्पष्ट सुरक्षा उपाय निर्धारित किए।

कोर्ट ने कहा, “जिन मामलों में आयोग संतुष्ट नहीं है कि कोई व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल होने की वैधानिक शर्तें पूरी करता है, तो उसका यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे व्यक्ति को कानून के अनुसार निर्णय के लिए केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकरण को भेजे।”

पीठ ने यह भी जोड़ा कि चुनाव आयोग के निष्कर्ष केवल चुनावी उद्देश्यों तक सीमित रहेंगे और उनसे किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम निर्धारण नहीं होगा।

कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह भी निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर उन सभी मामलों को सक्षम प्राधिकरण के पास भेजे, जिनमें 2003 की मतदाता सूची से नाम नागरिकता संबंधी आधार पर हटाए गए थे।

साथ ही नागरिकता अधिनियम के तहत सक्षम प्राधिकरण को निर्देश दिया गया कि वह प्रभावित व्यक्तियों को उचित नोटिस और सुनवाई का अवसर देकर इन मामलों का निर्णय करे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बाद में यह पाया जाता है कि जिन लोगों के नाम हटाए गए थे वे वास्तव में भारतीय नागरिक हैं, तो उनके नाम मतदाता सूची में पुनः बहाल किए जाने चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की शुरुआत पिछले वर्ष तब हुई जब चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूचियों के SIR का आदेश दिया। इस प्रक्रिया को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल फेडरेशन फॉर इंडियन विमेन (NFIW) सहित कई संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि SIR प्रक्रिया से मतदाताओं के नाम मनमाने तरीके से हटाए जा सकते हैं और इससे लाखों वास्तविक नागरिकों का मताधिकार छिन सकता है।

वहीं चुनाव आयोग ने इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह संशोधन मतदाता सूची से डुप्लीकेट, गलत और अयोग्य प्रविष्टियों को हटाने के लिए आवश्यक था।

शुरुआत में 1 अगस्त को प्रकाशित बिहार की ड्राफ्ट मतदाता सूची से लगभग 65 लाख नाम हटाए गए थे। बाद में अपील और सुधार प्रक्रिया के बाद यह संख्या घटकर लगभग 47 लाख रह गई।

लंबे समय तक चली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बीच में संतुलित सुरक्षा उपाय भी जोड़े। अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह एक औपचारिक नोटिस जारी करे, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा जाए कि SIR प्रक्रिया के तहत तैयार की जा रही संशोधित मतदाता सूचियों में आधार को पहचान प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाएगा।

बिहार में SIR प्रक्रिया 30 सितंबर को पूरी कर ली गई। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, संशोधन से पहले बिहार में 7.89 करोड़ मतदाता थे, जबकि प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह संख्या घटकर 7.42 करोड़ रह गई।

बाद में चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया का विस्तार अन्य राज्यों में भी किया और 27 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में इसे लागू करने की अधिसूचना जारी की। इसी के बाद नए कानूनी विवाद खड़े हुए और अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में इस अभ्यास को बरकरार रखा।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Shriti Sagar
Shriti Sagar
Journalist

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