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चीन-जापान की राह पर भारत, रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जन्म दर: पढ़ें- क्या होता है TFR, क्यों घट रही है जन्म दर और आने वाले दशकों में कितना बड़ा होगा संकट

भारत में जन्म दर का रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाना केवल एक आँकड़ा नहीं बल्कि देश के सामाजिक और आर्थिक भविष्य से जुड़ा बड़ा बदलाव है, जिसके असर आने वाले दशकों में साफ दिखाई दे सकते हैं।

लंबे समय तक दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आबादी वाले देशों में गिना जाता रहा भारत अब एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Shift) के दौर में जा रहा है। दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के बावजूद भारत में अब जन्म दर उस स्तर से नीचे चली गई है जिसे किसी भी देश की जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है।

ताजा सरकारी आँकड़ों के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate-TFR) घटकर 1.9 पर पहुँच गई है। यह पहली बार है जब यह आँकड़ा ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ यानी 2.1 से नीचे गया है। इस मुद्दे ने केवल भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी आबाद से जुड़ी चर्चाओं को जन्म दिया है।

अमेरिकी अरबपति उद्योगपति और टेस्ला तथा स्पेसएक्स के प्रमुख एलन मस्क ने भी भारत की घटती जन्म दर को लेकर चिंता जताई है। भारत की आबादी को लेकर अब तक होने वाली बहस अब तक आमतौर पर जनसंख्या विस्फोट को लेकर होती रही हैं लेकिन नए आँकड़े संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दशकों में भारत के सामने चुनौती उल्टी भी हो सकती है यानी कम होती जन्म दर, वृद्ध होती आबादी और घटता कार्यबल।

मस्क ने क्या कहा?

एलन मस्क लंबे समय से दुनिया के कई देशों में गिरती जन्म दर को लेकर चिंता जताते रहे हैं। वे कई बार सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि घटती जनसंख्या मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। अब भारत को लेकर भी उन्होंने इसी चिंता को दोहराया।

AF Post द्वारा भारत की घटती प्रजनन दर से जुड़े आँकड़े साझा किए जाने के बाद मस्क ने X पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “भारत की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे गिर चुकी है। सबसे अधिक शिक्षित वर्गों के बीच यह गिरावट कई वर्ष पहले ही शुरू हो गई थी।”

मस्क का तर्क है कि जब किसी देश में लंबे समय तक जन्म दर कम रहती है, तो धीरे-धीरे वहाँ युवाओं की संख्या कम होने लगती है। इसका असर उद्योगों, अर्थव्यवस्था, श्रम शक्ति और पेंशन व्यवस्था पर पड़ता है। जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों को वे इसी संकट का उदाहरण बताते रहे हैं।

भारत के नए आँकड़े क्या बता रहे हैं?

भारत सरकार की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2024 रिपोर्ट के अनुसार देश की कुल प्रजनन दर यानी TFR अब 2.1 से घटकर 1.9 बच्चों प्रति महिला रह गई है। सरल भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि औसतन भारत में एक महिला अपने जीवनकाल में अब दो से भी कम बच्चों को जन्म दे रही है।

यह गिरावट अचानक नहीं हुई है बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार जारी है। लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया था कि भारत में वर्ष 1950 में कुल प्रजनन दर 6.18 थी। लेकिन भारत ने आजादी के बाद से ही जनसंख्या को नियंत्रित करने के उपाय शुरू कर दिए गए थे।

भारत 1950 के दशक में राज्य द्वारा प्रायोजित परिवार नियोजन कार्यक्रम अपनाने वाले पहले विकासशील देशों में से एक बन गया था। 1952 में जनसंख्या नीति समिति और 1956 में केंद्रीय परिवार नियोजन बोर्ड की स्थापना की गई थी। 1976 में भारत ने पहली राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की घोषणा की थी। इसका असर भी दिखा और 1980 में जन्म दर 4.60 पहुँच गई।

जनसंख्या नियंत्रण के लिए किए गय उपायों से भारत की TFR में लगातार कमी होती रही। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2015-16 के मुताबिक, भारत में TFR 2.2 हो गया था। अगले कुछ वर्षों में इसमें और भी कमी हुई और NFHS, 2019-21 के आँकड़ों के मुताबिक, भारत में TFR 2.0 पर पहुँच गया जो प्रतिस्थापन स्तर से भी कम था। अब यह पहली बार उस स्तर से नीचे पहुँच गई है जिसे किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए जरूरी माना जाता है।

अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक भारत की TFR 1.29 तक पहुँच जाएगा और 2100 तक इसके 1.04 तक पहुँचने का अनुमान है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव भारत में शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और परिवार नियोजन के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है।

2021 और 2100 में भारत की TFR का तुलनात्मक अध्ययन (फोटो साभार:लैंसेट)

क्या होता है ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

‘रिप्लेसमेंट लेवल’ या Replacement Fertility Rate का अर्थ समझना इस पूरी बहस को समझने के लिए बेहद जरूरी है। यह वह औसत संख्या होती है जितने बच्चे एक महिला को जन्म देने चाहिए ताकि एक पीढ़ी की जनसंख्या अगली पीढ़ी में बराबर बनी रहे।

आमतौर पर यह संख्या 2.1 मानी जाती है। यानी औसतन हर महिला को दो बच्चे पैदा करने होंगे ताकि माता-पिता की जगह अगली पीढ़ी ले सके। इसमें अतिरिक्त 0.1 इसलिए जोड़ा जाता है क्योंकि कुछ लोग बीमारी, दुर्घटना या अन्य कारणों से प्रजनन आयु तक नहीं पहुँच पाते।

यदि किसी देश की जन्म दर लंबे समय तक 2.1 से नीचे बनी रहती है तो धीरे-धीरे वहाँ जनसंख्या बढ़ने की रफ्तार धीमी पड़ जाती है। कुछ दशकों बाद कुल आबादी स्थिर होने लगती है और फिर घट भी सकती है। यही वजह है कि जनसंख्या विशेषज्ञ भारत के इस बदलाव को एक बड़े संकेत के रूप में देख रहे हैं।

दिल्ली की TFR फिनलैंड से भी कम लेकिन किन राज्यों में अब भी बच्चे पैदा हो रहे ज्यादा?

भारत का TFR (राष्ट्रीय औसत) अब 1.9 तक पहुँच गया है लेकिन पूरे देश की तस्वीर एक जैसी नहीं है। कुछ राज्यों में अब भी जन्म दर राष्ट्रीय औसत से अधिक बनी हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड ऐसे राज्य हैं जहाँ प्रजनन दर अभी भी रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से ऊपर है। इन राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक जन्म दर के कारण देश का औसत कुछ हद तक संतुलित बना हुआ है।

इन राज्यों में ग्रामीण आबादी अधिक है, कम उम्र में विवाह अपेक्षाकृत ज्यादा होते हैं और कई सामाजिक-आर्थिक कारणों से परिवारों में बच्चों की संख्या अधिक बनी रहती है। दूसरी ओर दक्षिण भारत, पश्चिम भारत और बड़े महानगरों वाले राज्यों में जन्म दर तेजी से घटी है। इन इलाकों में छोटे परिवार अब सामान्य बात बन चुके हैं।

रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले आँकड़ों में दिल्ली का नाम सामने आया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रजनन दर सिर्फ 1.2 दर्ज की गई है, जो देश में सबसे कम है। दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली की यह दर यूरोपीय देशों के बराबर या कई मामलों में उनसे भी कम है। दिल्ली की जन्म दर फिनलैंड से भी नीचे पहुँच गई है।

विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण गिनाते हैं। बड़े शहरों में जीवनयापन की बढ़ती लागत, छोटे घर, करियर का दबाव, देर से शादी, महिलाओं का नौकरियों में बढ़ता योगदान और बच्चों की परवरिश का महँगा होना प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

आज के शहरी परिवार पहले की तरह तीन या चार बच्चों की जगह एक या दो बच्चों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कई दंपति तो केवल एक बच्चा रखने या बिल्कुल बच्चा न पैदा करने का निर्णय भी ले रहे हैं।

आखिर भारत में जन्म दर इतनी तेजी से क्यों घट रही है?

भारत में जन्म दर कम होने के पीछे केवल एक कारण जिम्मेदार नहीं है बल्कि कई सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव एक साथ काम कर रहे हैं।

सबसे बड़ा कारण शिक्षा को माना जा रहा है। खासकर महिलाओं की शिक्षा बढ़ने के बाद शादी और माँ बनने की औसत उम्र बढ़ी है। पहले जहाँ कम उम्र में शादी होना आम बात थीं, वहीं अब महिलाएँ उच्च शिक्षा और नौकरी को प्राथमिकता देने लगी हैं।

इसके अलावा शहरीकरण ने भी परिवारों की सोच बदल दी है। शहरों में महँगी शिक्षा, स्वास्थ्य खर्च और सीमित संसाधनों के कारण परिवार छोटे रखने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

महिलाओं की नौकरी और आर्थिक स्वतंत्रता भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज बड़ी संख्या में महिलाएँ करियर और पेशेवर जीवन पर ध्यान दे रही हैं जिससे परिवार नियोजन के फैसले वो ले रही हैं। स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच और गर्भनिरोधक साधनों की उपलब्धता ने भी जन्म दर को नियंत्रित करने में मदद की है।

संयुक्त राष्ट्र ने भारत को लेकर क्या कहा है?

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) ने भी अपनी हालिया रिपोर्ट में माना है कि भारत की प्रजनन दर अब रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुँच चुकी है। UNFPA की 2025 की रिपोर्ट में भारत का TFR 1.9 माना गया। हालाँकि एजेंसी ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत की आबादी तुरंत कम होने लगेगी।

UNFPA के अनुमान के अनुसार, अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो साल 2100 तक भारत की कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 1.78 तक पहुँच सकती है। साथ ही देश की औसत जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) करीब 79 वर्ष होने का अनुमान जताया गया है। यह तस्वीर भारत के सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय भविष्य को लेकर कई बड़े सवाल खड़े करती है।

कम जन्म दर के कारण युवा आबादी का हिस्सा सिकुड़ता दिखाई देता है जबकि बुजुर्ग आबादी का अनुपात बढ़ने की संभावना है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत धीरे-धीरे ‘युवा देश’ से ‘एजिंग सोसाइटी’ की तरफ बढ़ सकता है।

2100 को लेकर UNFPA का अनुमान

हालाँकि, भारत की कुल आबादी अभी भी 140 करोड़ से अधिक है और बड़ी संख्या में लोग युवा आयु वर्ग में हैं। इसका मतलब यह है कि आने वाले कुछ दशकों तक जनसंख्या बढ़ सकती है लेकिन उसकी रफ्तार पहले जैसी नहीं रहेगी।

UNFPA का कहना है कि भारत में जनसंख्या का पैटर्न एक जैसा नहीं है। अलग-अलग राज्यों में सामाजिक परिस्थितियां, स्वास्थ्य सुविधाएं, महिलाओं की स्थिति और विवाह की औसत उम्र अलग-अलग होने के कारण जन्म दर में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है।

दुनिया भर में आने वाला है कम होती आबादी का संकट

आबादी का कम होने का संकट सिर्फ भारत के लिए ही चुनौती नहीं बनने वाला है बल्कि दुनिया के बहुत बड़े हिस्से के लिए यह संकट जल्द ही दिखना शुरू हो जाएगा। ‘द लैंसेट’ ने 204 देशों का अध्ययन किया और बताया कि 204 देशों और क्षेत्रों में से 103 देश (50.5%) ऐसे थे जहाँ 2018 तक TFR पहले ही ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ से नीचे पहुँच चुकी थी। यह अध्ययन 2024 में प्रकाशित हुआ था।

शोध के अनुसार, 2050 तक लगभग 100 देश (49%) ऐसे हो जाएँगे जहाँ प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि उन देशों में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या, मरने वाले लोगों की संख्या से कम हो जाएगी। शोध में यह भी अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक 155 देश और क्षेत्र (76%) रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे की प्रजनन दर पर पहुँच जाएँगे। वहीं, 2100 तक यह संख्या बढ़कर 198 देश (97.1%) हो सकती है। इनमें से 178 देश (87.3%) ऐसे होंगे जहाँ प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक होगी।

विभिन्न देशों में 2100 तक TFR का आँकड़ा (फोटो साभार:लैंसेट)

क्या भारत भी जापान और चीन जैसी स्थिति में पहुँच सकता है?

यह सवाल अब तेजी से पूछा जाने लगा है कि क्या भारत भी भविष्य में जापान, दक्षिण कोरिया या चीन जैसी स्थिति का सामना करेगा? जापान और दक्षिण कोरिया में जन्म दर कई वर्षों से बेहद कम बनी हुई है। वहाँ बड़ी समस्या यह हो गई कि काम करने वाली युवा आबादी घटती चली गई जबकि बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ी। इससे पेंशन व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया।

चीन को भी इसी समस्या के कारण अपनी ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ तक खत्म करनी पड़ी और अब वहाँ सरकार ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए लोगों को प्रोत्साहन दे रही है। दुनिया के कई देशों में जनसंख्या को बढ़ाने के लिए अलग-अलग उपाय किए जा रहे हैं।

भारत फिलहाल उस स्थिति से दूर है क्योंकि यहाँ अभी भी युवा आबादी बड़ी संख्या में मौजूद है। ‘पॉपुलेशन मोमेंटम’ (Population Momentum) के चलते अभी भारत को कोई दिक्कत नहीं होगी। पॉपुलेशन मोमेंटम का मतलब यह है कि किसी देश की जन्म दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाने के बाद भी उसकी आबादी कुछ समय तक बढ़ती रह सकती है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अगर किसी देश में युवा आबादी (खासतौर पर 15 साल से कम उम्र के लोग) बड़ी संख्या में मौजूद है, तो वे आगे चलकर प्रजनन आयु में पहुँचते हैं और बच्चे पैदा करते हैं। इसलिए जन्म दर कम होने के बावजूद जनसंख्या तुरंत घटनी शुरू नहीं होती।

अध्ययन बताते हैं कि जब किसी देश की TFR (कुल प्रजनन दर) 2.1 से नीचे जाती है, तब भी आबादी की प्राकृतिक वृद्धि दर के नकारात्मक होने में लगभग 30 साल का अंतर आ सकता है। यानी जन्म दर कम होने के बावजूद जनसंख्या कुछ दशकों तक बढ़ सकती है।

हालाँकि, अगर अगले कई दशकों तक जन्म दर लगातार कम बनी रही, तो भारत को भी भविष्य में श्रमिकों की कमी, वृद्ध आबादी और आर्थिक दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। और विभिन्न रिपोर्ट्स में यह अनुमान साफ-साफ नजर आ रहा है।

अब भारत के लिए चिंता ‘जनसंख्या विस्फोट’ नहीं बल्कि ‘घटती जनसंख्या’ होगी

एक समय भारत में सबसे बड़ी चिंता तेजी से बढ़ती आबादी को लेकर थी। सरकारें परिवार नियोजन अभियान चलाती थीं और जनसंख्या नियंत्रण को बड़ा मुद्दा माना जाता था। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होगी। बहुत ज्यादा आबादी भी चुनौती है और बहुत कम जन्म दर भी भविष्य में गंभीर समस्या बन सकती है।

भारत फिलहाल उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ जनसंख्या वृद्धि धीमी हो रही है लेकिन युवा आबादी अभी भी बड़ी ताकत बनी हुई है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि भारत अपनी जनसांख्यिकीय ताकत को आर्थिक अवसर में बदल पाता है या नहीं।

स्पष्ट है कि भारत में जन्म दर का रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाना केवल एक आँकड़ा नहीं बल्कि देश के सामाजिक और आर्थिक भविष्य से जुड़ा बड़ा बदलाव है, जिसके असर आने वाले दशकों में साफ दिखाई दे सकते हैं।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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