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ममता बनर्जी का ‘शराब घोटाला’: 55 होलसेलर बाहर, चुनिंदा बिचौलियों की एंट्री; पढ़ें- WBSBCL मॉडल ने पैदा किया ‘शराब सिंडिकेट’

पश्चिम बंगाल की आबकारी नीति में 2017 में किए गए बदलाव के चलते, मुक्त बाजार प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई और पूरी सप्लाई चेन पर कुछ लोगों का एकाधिकार हो गया। शराब कंपनियों और व्होलसेलर्स को मजबूरन भारी लेवी चुकाने पर मजबूर होना पड़ा।

दिल्ली की पूर्व केजरीवाल सरकार की शराब नीति के बाद अब पश्चिम बंगाल की 2017 में लागू नई आबकारी नीति को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बवाल मचा हुआ है। राज्य की तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने वेस्ट बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (WBSBCL) का गठन किया गया।

एजेंसी ने राज्य के सभी 55 प्राइवेट शराब होलसेलर्स की जगह लेकर शराब वितरण पर सीधा राज्य का नियंत्रण स्थापित कर दिया। इसने वितरण और थोक विक्रेता दोनों के रूप में काम करने की कोशिश की, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हुआ। खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं से ज्यादा पैसे वसूले गए।

दरअसल टीएमसी सरकार के कार्यकाल में हुए राज्य में शराब व्यापार से जुड़ी एक रिपोर्टें सामने आई है। इसमें उत्पाद शुल्क विभाग के एक गोपनीय दस्तावेज से पता चलता है कि शराब वितरण नेटवर्क का इस तरह से पुनर्गठन किया गया था, जिससे कुछ खास प्राइवेट शराब विक्रेताओं को लाभ हुआ और इस तरह सिस्टम काम कर रहा था, जिससे उनका एकाधिकार स्थापित हुआ।

रिपोर्ट से पता चलता है कि 2017 में शराब वितरण नीति में टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के इशारे पर ये बदलाव किए गए।

ऑपइंडिया को एक रिपोर्ट की कॉपी मिली है, जिसमें दावा किया गया है कि नए सिस्टम में धीरे-धीरे थोक वितरण के पुराने मॉडल को खत्म कर दिया गया। उसकी जगह ऐसी व्यवस्था की गई जिससे चुनिंदा बिचौलियों की शराब वितरण के सिस्टम में एकाधिकार हो गया।


इससे पता चलता है कि जिसे आधिकारिक तौर पर शराब वितरण को सुव्यवस्थित करने के लिए एक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया गया था, वह वास्तव में निजी बोतलबंद शराब विक्रेताओं और शराब निर्माताओं से पैसा वसूलने का एक सिस्टम बन गया।

आबकारी विभाग ने जो रिपोर्ट तैयार की उसमें इन बदलावों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में लागू हुए राज्य की नई आबकारी नीति के बाद शराब निर्माताओं से उपभोक्ताओं तक पहुँचने के तरीका बदल गया। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि मुक्त प्रतिस्पर्धा और विकेंद्रीकृत वितरण के पारंपरिक सिद्धांतों को एक कड़े नियंत्रण वाले नेटवर्क से बदल दिया गया, जिसने कुछ चुनिंदा वितरकों के हाथों में पूरा सिस्टम आ गया।

टीएमसी ने शराब वितरण की पूरी प्रक्रिया को सेंट्रलाइज कर दिया

रिपोर्ट में एक चार्ट दिखाया गया है, जो बताता है कि शराब उत्पाद पारंपरिक रूप से बाजार में कैसे पहुँचते थे और पिछली ममता सरकार के तहत पश्चिम बंगाल में यह प्रणाली कैसे विकसित हुई।

(रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट)

यह चार्ट निर्माता के गोदाम यानी ‘मदर गोदाम’ से शुरू होता है, जहाँ से उत्पाद कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग एजेंसी (C&FA) को भेजे जाते हैं। C&FA माल को सिस्टम में आगे बढ़ने से पहले भंडारण और लॉजिस्टिक्स केंद्र के रूप में कार्य करती है।

वहाँ से उत्पाद आमतौर पर वितरकों या सुपर स्टॉकिस्टों को आपूर्ति किए जाते हैं। ये वितरक कंपनी के अधिकृत व्यावसायिक भागीदार होते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद विभिन्न क्षेत्रों में खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं तक कैसे पहुँचे।

यह चार्ट दर्शाता है कि वितरक, निर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। वे बिक्री टीमों का प्रबंधन करते हैं, बाजार से ऑर्डर प्राप्त करते हैं, स्टॉक की आवाजाही को संभालते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि उत्पाद सभी खुदरा दुकानों पर उपलब्ध हों। कई उद्योगों में, वितरक खुदरा विक्रेताओं और थोक विक्रेताओं को लोन भी मुहैया कराते हैं, जिससे बाजार में नकदी की कमी नहीं होती है।

थोक विक्रेता इस सिस्टम में एक और अहम कड़ी हैं। वे वितरकों से थोक में उत्पाद खरीदते हैं और फिर उनको खुदरा विक्रेताओं तक छोटी-छोटी खेप में पहुँचाते हैं। छोटे विक्रेताओं का लाभ खरीद मूल्य और उपभोक्ताओं को बेचने के मूल्य में अंतर से मिलता है।

एक बाजार के निर्माण में निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता और खुदरा विक्रेता सबकी अलग-अलग भूमिकाएँ होती हैं। कई बार वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा का फायदा भी बाजार को मिलता है।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में किए गए बदलावों ने वितरण व्यवस्था पर एक छोटे- से ग्रुप का कब्जा हो गया। प्रतिस्पर्धा कम हो गया और उनका एकाधिकार होने से ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने का उन्हें अवसर मिला। इसकी वजह से पारंपरिक बाजार सिद्धांतों को काफी नुकसान हुआ।

वितरक और थोक विक्रेता क्यों महत्वपूर्ण हैं?

रिपोर्ट में वितरकों और थोक विक्रेताओं के बीच अंतर को विस्तार से बताया गया है। वितरक आम तौर पर निर्माताओं के साथ समझौते करते हैं और आधिकारिक चैनल पार्टनर के रूप में कार्य करते हैं। वितरक न केवल उत्पादों की बिक्री के लिए बल्कि उनकी मार्केटिंग, आपूर्ति नेटवर्क के रखरखाव और बाजार तक पहुँच के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। वे आमतौर पर बड़े क्षेत्रों में काम करते हैं और खुदरा विक्रेताओं, थोक विक्रेताओं और कभी-कभी सीधे उपभोक्ताओं से भी संपर्क करते हैं।

दूसरी ओर, थोक विक्रेता मुख्य रूप से बड़ी मात्रा में उत्पाद खरीदते हैं और उन्हें खुदरा विक्रेताओं को बेचते हैं। वे मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं ,जिनका उद्देश्य भंडारण, प्रबंधन और थोक खरीद के माध्यम से लाभ कमाना होता है। वितरक आमतौर पर वितरण से जुड़े व्यावसायिक जोखिमों को वहन करते हैं, जबकि थोक विक्रेता माल की आवाजाही पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में लागू किए गए शराब वितरण सुधारों ने इन भेदों को धुंधला कर दिया और एक ऐसा मॉडल तैयार किया, जो स्थापित व्यावसायिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।

2017 में सरकार द्वारा नियंत्रित वितरण संरचना में बदलाव

2017 को पश्चिम बंगाल स्टेट बेवरेजेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (डब्ल्यूबीएसबीसीएल) का गठन हुआ, जो एक सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी थी और जिसने राज्य में पैकेटबंद शराब के थोक वितरण का कार्यभार संभाला। डब्ल्यूबीएसबीसीएल के माध्यम से ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी सरकार ने शराब के कारोबार में कदम रखा।

(रिपोर्ट से लिया गया स्क्रीनशॉर्ट)

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अस्तित्व में आने से पहले, थोक वितरण का काम बड़े पैमाने पर 1909 के बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम के तहत संचालित निजी लाइसेंस धारकों द्वारा किया जाता था। ये निजी थोक विक्रेता निर्माताओं से उत्पाद खरीदते थे और उन्हें पूरे राज्य में खुदरा विक्रेताओं को आपूर्ति करते थे।

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन के बाद निगम शराब खरीदने वाला और वितरण करने वाला दोनों बन गया। इसने पंजीकृत आपूर्तिकर्ताओं से शराब खरीदना शुरू किया और इसे पूरे पश्चिम बंगाल में लगभग 5200 खुदरा दुकानों को बेचना शुरू किया।

बंगाल उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 20 के तहत शराब की बिक्री के लिए लाइसेंस अनिवार्य है, लेकिन विदेशी शराब क्षेत्र के कई आपूर्तिकर्ता कथित तौर पर लाइसेंस प्राप्त विक्रेताओं के बजाय केवल पंजीकृत ब्रांड मालिक या आयातक के रूप में काम कर रहे थे। इसके बावजूद उन्हें निगम को उत्पाद बेचने और बिल जारी करने की अनुमति दी गई थी। रिपोर्ट के अनुसार, इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई, जो अधिनियम की भावना के विपरीत थी।

खुदरा विक्रेताओं और निर्माताओं ने शिकायत क्यों की?

रिपोर्ट में नए मॉडल से उत्पन्न होने वाले कई परिचालन और वित्तीय गड़बड़ियों के बारे में बताया गया है।

एक अहम शिकायत ऋण सुविधाओं के अभाव से संबंधित थी। पूर्व की निजी थोक प्रणाली के तहत खुदरा विक्रेताओं को अक्सर उधार पर उत्पाद प्राप्त होते थे। इससे उन्हें बड़ी अग्रिम राशि का भुगतान किए बिना स्टॉक बनाए रखने की सुविधा मिलती थी।

डब्ल्यूबीएसबीसीएल के अधिग्रहण के बाद खुदरा विक्रेताओं को कथित तौर पर खरीद की पूरी लागत अग्रिम रूप से चुकानी पड़ी। चूँकि शराब के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) का लगभग 70-80% हिस्सा करों और शुल्कों का होता है, इसलिए इससे खुदरा विक्रेताओं पर वित्तीय बोझ काफी बढ़ गया।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इस बदलाव के कारण सप्लाई चेन में पूँजी की कमी हुई। छोटे खुदरा विक्रेता विशेष रूप से प्रभावित हुए, क्योंकि उन्हें अब लोन से मदद नहीं मिल रही थी, बल्कि ज्यादा निवेश करना पड़ रहा था। इसकी वजह से बाजार में कथित तौर पर गिरावट आई और राजस्व प्रभावित हुआ।

भंडारण से जुड़ी समस्या

रिपोर्ट में निगम के भंडारण और लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढाँचे को लेकर सवाल किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, WBSBCL राज्य भर में दर्जनों डिपो संचालित करता था, जिनमें देसी शराब, विदेशी शराब और बीयर के डिपो शामिल थे। हालाँकि इनमें से कई डिपो अस्थायी थे और उनमें अग्नि सुरक्षा सहित दूसरी सुविधाएँ नहीं थी।

माल लादने और उतारने का काम अक्सर स्थानीय मजदूर करते थे, जिससे लागत में अंतर और परिचालन में दिक्कत होती थीं। रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया है कि स्थानीय गिरोह इन गतिविधियों पर ‘नजर’ रखते थे।

इन्वेंट्री प्रबंधन भी एक प्रमुख मुद्दा बन गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि निगम अक्सर ‘फर्स्ट इन, फर्स्ट आउट’ (एफआईएफओ) सिद्धांत का पालन करने में विफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप स्टॉक पुराना हो गया और भंडारण संबंधी जटिलताएँ पैदा हुईं।

गोदामों में जगह की कमी के कारण आपूर्ति की मंजूरी पर प्रतिबंध लग गए, खासकर त्योहारों और ऐसे वक्त पर जब शराब की खपत आमतौर पर बढ़ जाती है।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि प्रतिस्पर्धी निजी वितरण नेटवर्क के दौरान ऐसी दिक्कत पैदा नहीं होती थी। डब्ल्यूबीएसबीसीएल ने एक साथ वितरक और थोक विक्रेता दोनों के रूप में कार्य करने का प्रयास किया। रिपोर्ट के अंत में कहा गया है कि सरकारी निगम की संरचना व्यावसायिक नहीं थी।

जाँच के निष्कर्ष में ये बताया गया है कि डब्ल्यूबीएसबीसीएल ने वितरक और थोक विक्रेता दोनों के रूप में एक साथ काम करने का प्रयास किया, जबकि उसने इन दोनों भूमिकाओं से जुड़े व्यावसायिक जोखिमों को नहीं उठाया।

रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि चूँकि निगम निजी वितरक की तरह शराब को बढ़ावा नहीं दे सकता था, इसलिए निर्माताओं को अलग-अलग प्रचार एजेंटों को नियुक्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इसी प्रकार, उन्हें माल के लिए स्वतंत्र ट्रांसपोर्ट एजेंटों पर निर्भर रहना पड़ता था। इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई, जिसमें निर्माता कई ऐसी संस्थाओं पर निर्भर थे, जो न तो वितरण चैनल से जुड़ी हुई थी और न ही पारंपरिक शराब व्यापार ढाँचे के तहत सीधे तौर पर जवाबदेह थीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सप्लाई चेन को आसान बनाने के बजाय इस सिस्टम ने और इसे जटिल बना दिया।

मोनोपॉली की शुरुआत

रिपोर्ट के अनुसार, डब्ल्यूबीएसबीसीएल के आने से हालात बदल गए। नई नीति के माध्यम से टीएमसी सरकार ने शराब निर्माताओं और बॉटलर्स को बाध्य किया कि वे केवल WBSBCL के नियुक्त वितरकों के माध्यम से ही व्यापार करें। व्होलसेलर्स की जगह आए नए वितरकों पर आरोप लगे कि वे बॉटलर्स से अनुचित दरें वसूलते थे। प्रत्येक क्रेट पर गोडाउन रेंटल (₹4) और ट्रांसपोर्ट कॉस्ट (₹3) के नाम पर भारी रकम वसूली गई।

रिपोर्ट्स के अनुसार, वितरकों को मिलने वाले मुनाफे का एक हिस्सा राज्य के राजस्व खाते में जाने के बजाय कथित तौर पर टीएमसी नेताओं को जाता था। रिपोर्ट के हवाले से आरोप लगाए गए कि यह पूरी अवैध वसूली सिंडिकेट के जरिए सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी के करीबी परिसरों, जैसे- 9, कैमक स्ट्रीट, कोलकाता तक पहुँचाई जाती थी।

रिपोर्ट के अनुसार, “विकेंद्रीकृत व्यवसाय, निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और बहु-आपूर्ति बिंदुओं की अवधारणा ने एकाधिकारवादी व्यवसाय मॉडल को जन्म दिया।”

बोतल बनाने वाली कंपनियों पर सिस्टम में शामिल होने का दबाव

रिपोर्ट और संबंधित विवरणों में यह भी दावा किया गया है कि नई व्यवस्था का विरोध करने वाले बोतल निर्माताओं को काफी दबाव का सामना करना पड़ा। इसका उदाहरण अक्सर आईएफबी एग्रो इंडस्ट्रीज लिमिटेड के रूप में दिया जाता है। कंपनी ने उत्पाद शुल्क विभाग के अधिकारियों को कई पत्र लिखकर गैरकानूनी हस्तक्षेप और दबाव को लेकर चिंता व्यक्त की।

एक पत्र में, कंपनी ने कहा कि उसने ‘कुछ उत्पाद शुल्क अधिकारियों द्वारा अवैध हस्तक्षेप’ के संबंध में बार-बार चिंता व्यक्त की थी, जो उनसे गैरकानूनी माँग पूरा नहीं करने पर परेशान कर रहे थे।

कंपनी ने आगे अनुरोध किया कि इस तरह की गतिविधियों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ जाँच की जाए और कार्रवाई की जाए।

कंपनी ने लिखा, हमें पूरा विश्वास है कि आपने उठाए गए मुद्दों पर आवश्यक जाँच की होगी। हम आपसे अनुरोध करते हैं कि कृपया जाँच में मिले तथ्यों और इस तरह की गतिविधियों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई को हमारे साथ साझा करें।

पत्र में लिखा था, “इसके अतिरिक्त, हम आपके ध्यान में लाना चाहेंगे कि हमारे पूर्व पत्रों में उठाए गए मुद्दों और जैसा कि पहले ही सूचित किया जा चुका है, यह व्यवस्था पूरी तरह से आपके निर्देशों के आधार पर की गई है, और जिसके तहत हमें इस संबंध में आपके द्वारा की गई गतिविधियों के बारे में नई सरकार को सूचित करने के लिए कदम उठाने पड़े हैं,”

रिपोर्ट में उन 5 अधिकारियों के नाम बताए गए हैं जो डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन की दिशा में नीतिगत ढाँचे को तैयार करने में शामिल थे। इनमें पूर्व विशेष आयुक्त (राजस्व) और महाप्रबंधक (संचालन) गौतम घोष, वरिष्ठ संयुक्त आयुक्त शांतनु आचार्य, उपायुक्त संचयन गांगुली, अतिरिक्त आयुक्त राजर्षि चक्रवर्ती और विशेष आयुक्त कुनास बिस्वास शामिल थे।

इन अधिकारियों ने नई नीति संरचना को तैयार करने और उसे मंजूरी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रिपोर्ट में सबसे गंभीर आलोचना दो स्तरीय उत्पाद शुल्क संग्रह प्रणाली की शुरुआत से जुड़ा है।

पहले, शुल्क का संग्रह मुख्य रूप से विनिर्माण चरण में होता था, जिसे आम तौर पर राजस्व संग्रह का सबसे सुरक्षित और सबसे कुशल तरीका माना जाता है। नए मॉडल में शुल्क संग्रह को विनिर्माण चरण और वितरक चरण के बीच विभाजित किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, इसके परिणामस्वरूप राजस्व प्राप्ति में देरी हुई और वितरण नेटवर्क में व्यवधान उत्पन्न हुआ, क्योंकि वितरक अक्सर अतिरिक्त शुल्क वक्त पर जमा करने में विफल रहते थे। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इससे न केवल प्रणाली जटिल हो गई बल्कि राजस्व दक्षता भी कमजोर हो गई।

दरअसल आबकारी विभाग की गोपनीय रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में शराब वितरण नेटवर्क के विकास का विस्तृत और विवादास्पद विवरण प्रस्तुत किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे 2017 के बाद पूर्व टीएमसी सरकार के शासनकाल में प्रतिस्पर्धी थोक मॉडल से यह एक कड़े नियंत्रण वाली प्रणाली में परिवर्तित हो गया।

रिपोर्ट के निष्कर्षों के केंद्र में एकाधिकार, अत्यधिक नियंत्रण, परिचालन संबंधी अक्षमता और निर्माताओं और बोतलबंद विक्रेताओं से जबरन वसूली करने वाली वसूली शामिल है। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि डब्ल्यूबीएसबीसीएल के गठन ने पारंपरिक वितरण चेन को बदल दिया गया, जिससे विकेंद्रीकृत प्रतिस्पर्धा की जगह एक ऐसी संरचना बन गई, जिसने शक्ति को कुछ बिचौलियों के हाथों में केंद्रित कर दिया।

इसमें आगे कहा गया है कि इस मॉडल ने न केवल व्यवसायों और खुदरा विक्रेताओं के लिए लागत बढ़ाई, बल्कि शराब व्यापार पर राजनीतिक और नौकरशाही हस्तक्षेप के अवसर भी पैदा किए।

(यह मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Shriti Sagar
Shriti Sagar
Journalist

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