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PFI के ‘मिशन 2047’ में भारत सरकार को उखाड़ फेंकने का लक्ष्य, MP ATS की जाँच में चौंकाने वाले खुलासे: जानें- पाकिस्तानी हैंडलर कैसे आतंकी स्लीपर सेल्स को दे रहे टारगेट किलिंग का टास्क

फराज और अन्य आरोपितों ने ऑनलाइन ग्रुप्स के जरिए PFI के 'मिशन 2047' को आगे बढ़ाने का काम किया। अब ATS पाकिस्तान से जुड़े संपर्कों, युवाओं की भर्ती की कोशिशों, विदेश में प्रशिक्षण की योजनाओं और भारत के अलग-अलग राज्यों में संदिग्ध फंडिंग नेटवर्क की जाँच कर रही है।

मध्य प्रदेश एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) ने 12 जून 2026 को आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप में मोहम्मद फराज को गिरफ्तार किया था। उसकी गिरफ्तारी के बाद जाँच में एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ, जो पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की उस योजना को आगे बढ़ाने में जुटा था, जिसका उद्देश्य भारत सरकार को गिराकर देश में इस्लामिक राज स्थापित करना है।

इस योजना को ‘मिशन 2047’ नाम दिया गया था। इस योजना का पहली बार साल 2022 में खुलासा हुआ था, जिसके कुछ महीने बाद केंद्र सरकार ने PFI पर प्रतिबंध लगा दिया था। पूछताछ के दौरान आरोपितों ने बताया कि युवाओं को कट्टरपंथ की ओर प्रेरित करने का काम कैसे किया जा रहा था।

जाँच एजेंसियों के अनुसार, इस मॉड्यूल से जुड़े लोगों को व्हाट्सएप, टेलीग्राम और अन्य मैसेजिंग ऐप्स के जरिए कट्टरपंथी विचारों से प्रभावित किया जा रहा था। बताया गया कि इनमें से कुछ समूहों का संचालन पाकिस्तान में बैठे हैंडलर कर रहे थे, जो नए लोगों को अलग-अलग काम सौंपते थे और उन्हें ‘सच्चा जिहादी’ बनने के लिए प्रेरित करते थे।

जाँच में यह भी सामने आया कि उन्हें तय किए गए लक्ष्यों की हत्या करने और जिहाद के नाम पर जान देने के लिए तैयार रहने की बात कही जाती थी।

जाँच में जिन चार आरोपितों की पहचान सामने आई है, उनमें मोहम्मद फराज उर्फ खालिद सैफुल्लाह, नईम अब्दुल्ला, शाकिर मेव और इजहार-उल-हक शामिल हैं। ATS फिलहाल इन सभी की व्यक्तिगत भूमिका, पाकिस्तान से जुड़े संपर्कों, डिजिटल नेटवर्क, संभावित फंडिंग चैनलों और अलग-अलग राज्यों में युवाओं की भर्ती के प्रयासों की जाँच कर रही है।

‘मिशन 2047’ और सरकार को गिराने की योजना

बिहार के मधुबनी से गिरफ्तार किए गए इजहार-उल-हक ने जाँच एजेंसियों को बताया कि वह और पाकिस्तान से जुड़े इस नेटवर्क के अन्य लोग ‘मिशन 2047’ पर काम कर रहे थे। इस मिशन का उद्देश्य साल 2047 तक पूरे भारत में PFI के एजेंडे को लागू करना था।

ATS के अनुसार, इस योजना के तहत मौजूदा शासन व्यवस्था की जगह कट्टर इस्लामिक व्यवस्था स्थापित करने की योजना बनाई गई थी। इजहार ने एजेंसी को बताया कि देशभर में ‘मुजाहिदीन’ के रूप में तैयार किए जा रहे लोग निर्देश मिलने पर एक साथ सामने आएँगे और सरकार को गिराने की कोशिश करेंगे।

बताया गया कि पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों ने नेटवर्क से जुड़े लोगों को भरोसा दिलाया था कि इस उद्देश्य के लिए एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। भर्ती किए गए लोगों से कसम भी दिलाई जाती थी कि समय आने पर वे टारगेट किलिंग को अंजाम देंगे और देशभर में डर का माहौल बनाएँगे।

अब जाँच एजेंसियाँ इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान करने और यह पता लगाने पर ध्यान दे रही हैं कि इसकी गतिविधियाँ कितनी दूर तक फैली थीं। ATS ने संगठन की संरचना और उसके सदस्यों द्वारा अपनाए गए तरीकों के बारे में पूछताछ के लिए इजहार को 22 जून तक रिमांड पर लिया था।

पाकिस्तानी हैंडलर भर्ती किए गए लोगों को जिहाद और शहादत के लिए कर रहे थे प्रेरित

मोहम्मद फराज से पूछताछ के दौरान सामने आया कि इस मॉड्यूल के सदस्य पाकिस्तान से संचालित व्हाट्सएप समूहों के संपर्क में थे। फराज ने जाँच एजेंसियों को बताया कि हैंडलर जिहादी वीडियो, मजहबी सामग्री और वीडियो कॉल के जरिए भर्ती किए गए लोगों को प्रभावित करते थे।

उन्होंने उससे कहा कि वह एक ‘सच्चा जिहादी’ बने, उसे दिए गए हर निर्देश का पालन करे और मिशन को पूरा करते समय अपनी जान कुर्बान करने के लिए तैयार रहे। बताया गया कि हैंडलरों ने उससे कहा था कि जिहाद के रास्ते पर चलते हुए मौत होने पर उसे शहादत मिलेगी।

उन्होंने ऐसे काम भी सौंपे जिनका उद्देश्य डर का माहौल बनाना था और निर्देश दिया गया था कि आदेश मिलने पर तय किए गए लक्ष्यों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। फराज को पासपोर्ट बनवाने के लिए भी कहा गया था। उसे बताया गया था कि किसी दूसरे देश के रास्ते उसे पाकिस्तान ले जाया जाएगा और वहाँ उसे मुजाहिदीन के रूप में प्रशिक्षण दिया जाएगा।

ATS जिन अन्य सूचनाओं की जाँच कर रही है, उनमें अफगानिस्तान में विशेष प्रशिक्षण की योजनाओं का भी उल्लेख है। तलाशी के दौरान ATS ने फराज के मोबाइल फोन से जिहादी दस्तावेज और PDF फाइलें बरामद कीं। जाँच एजेंसियों का मानना है कि इनमें से कुछ सामग्री पाकिस्तान से भेजी गई थी।

फराज को गरीब और कुँवारे युवाओं की भर्ती का सौंपा गया था काम

भोपाल में एक डॉक्टर के क्लिनिक में काम करने वाले फराज को मध्य प्रदेश में नेटवर्क तैयार करने का काम सौंपा गया था। पाकिस्तानी हैंडलर चाहते थे कि वह ऐसे गरीब, अविवाहित और अपेक्षाकृत कम उम्र के युवाओं की पहचान करे, जिन्हें परिवार के प्रभाव से अलग किया जा सके और धीरे-धीरे कट्टरपंथ की ओर ले जाया जा सके।

इस मॉड्यूल ने विशेष रूप से अविवाहित युवाओं को निशाना बनाया था ताकि माता-पिता, पत्नी या बच्चों की चिंता उन्हें खतरनाक कामों को अंजाम देने से न रोक सके। भर्ती किए जाने वाले लोगों से सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए संपर्क किया जाता था।

फराज ने समूह बनाए, कट्टरपंथी गतिविधियों से जुड़े वीडियो साझा किए और नए सदस्यों को बड़े नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश की। जाँच के दौरान जुटाई गई सामग्री से संकेत मिले हैं कि युवा भर्ती किए गए लोगों को 40 हजार रुपए तक वेतन दिया जाता था।

उपयुक्त लोगों की पहचान करने और उन्हें नेटवर्क से जोड़ने के तरीकों पर चर्चा के लिए बैठकें आयोजित की जाती थीं। इसके बाद उन्हें इस्लामिक शरीयत और ब्लासफेमी कानून लागू करने के नाम पर उकसाया जाता था। बताया गया कि कट्टरपंथ की ओर ले जाने की प्रक्रिया चरणों में की जाती थी।

किसी भर्ती किए व्यक्ति को पहले सीमित समय के भीतर पूरा करने के लिए एक काम दिया जाता था। अगला काम तभी सौंपा जाता था जब वह पहले दिए गए काम को पूरा कर लेता था।

व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए संचालित हो रहा था नेटवर्क

चारों आरोपितों ने पूछताछ के दौरान स्वीकार किया कि वे टेलीग्राम और व्हाट्सएप समूहों के जरिए भारत और पाकिस्तान में मौजूद लोगों के संपर्क में थे। फराज करीब चार साल से ऐसे प्लेटफॉर्म पर सक्रिय था। समूहों में उसे ‘खालिद सैफुल्लाह’ के नाम से जाना जाता था और डिजिटल नेटवर्क को बढ़ाने में मदद के लिए उसे ‘लश्कर कमांडर’ की पहचान भी दी गई थी।

जाँच एजेंसियों के अनुसार, इन ऑनलाइन समूहों का इस्तेमाल जिहादी सामग्री फैलाने, बैठकें आयोजित करने, काम सौंपने और भर्ती किए गए लोगों पर नजर रखने के लिए किया जाता था। पाकिस्तानी हैंडलर तय करते थे कि कौन-सा काम दिया जाएगा और उसे कब तक पूरा करना होगा।

इस पूरी प्रक्रिया को इस तरह तैयार किया गया था कि हर चरण में सदस्यों को केवल सीमित जानकारी मिले। एक काम पूरा होने के बाद ही हैंडलर अगला निर्देश जारी करते थे। ATS फराज के मोबाइल फोन, चैट रिकॉर्ड, सोशल मीडिया अकाउंट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल गतिविधियों की जाँच कर रही है ताकि उससे जुड़े लोगों की पहचान की जा सके।

मॉड्यूल के भीतर तय की गई थीं अलग-अलग भूमिकाएँ

जाँच एजेंसियों ने आरोपियों को सौंपी गई अलग-अलग जिम्मेदारियों की पहचान की है। फराज सोशल मीडिया के जरिए नए लोगों को जोड़ने और मध्य प्रदेश में नेटवर्क को बढ़ाने का काम कर रहा था। नईम अब्दुल्ला नेटवर्क के भीतर संपर्क मजबूत करने में मदद करता था और उसने फराज को सीधे पाकिस्तानी जिहादी हैंडलरों से मिलवाया था।

फराज ने ATS को बताया कि वह देवबंद निवासी नईम को करीब पाँच या छह साल से जानता था। बताया गया कि नईम ने फराज और बिहार के एक अन्य संदिग्ध को विदेशी हैंडलरों से मिलवाया था। बाद में ATS ने फराज से पूछताछ के दौरान मिली जानकारी के आधार पर उसे गिरफ्तार किया।

इजहार-उल-हक और शाकिर मेव बंद कमरों में बैठकें आयोजित करने और युवाओं को कट्टरपंथ की ओर प्रेरित करने के लिए भाषण देने में शामिल थे। शाकिर को दूसरे स्तर का कमांडर बताया गया, जिसकी इस मॉड्यूल में महत्वपूर्ण भूमिका थी।

नेटवर्क की संरचना ऐसी बनाई गई थी कि अलग-अलग सदस्य भर्ती, संपर्क, वैचारिक प्रशिक्षण और विदेशी हैंडलरों से जुड़े कामों को संभाल सकें।

ATS की गिरफ्तारी और जाँच की समयरेखा

ATS ने अपनी पहली गिरफ्तारी 12 जून 2026 को की, जब मोहम्मद फराज को भोपाल के काजी कैंप इलाके से हिरासत में लिया गया। 13 जून को पूछताछ के दौरान जाँच एजेंसियों ने उसके पुराने संपर्कों और सोशल मीडिया समूहों की जाँच की। इससे उन्हें नईम अब्दुल्ला तक पहुँचने में मदद मिली।

नईम को 13 और 14 जून के बीच उत्तर प्रदेश के सहारनपुर क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। ATS ने फराज और नईम से अलग-अलग पूछताछ की और दोनों के बयानों का आमना-सामना भी कराया। शाकिर मेव को 14 जून को राजस्थान के अलवर जिले के टपूकड़ा थाना क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया।

उसे कोर्ट में पेश किया गया और पूछताछ के लिए रिमांड पर लिया गया। लगातार चल रही जाँच के दौरान इजहार-उल-हक से जुड़ी जानकारी सामने आई। उसे 18 जून को गिरफ्तार किया गया और 20 जून को भोपाल की कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने उसे 22 जून तक रिमांड पर भेज दिया।

अब एजेंसी अन्य सदस्यों, स्थानीय मददगारों और उन लोगों की पहचान करने की कोशिश कर रही है, जो कट्टरपंथ से जुड़ी बैठकों में शामिल हुए हो सकते हैं।

विदेशी संपर्क और फंडिंग के रास्तों की जाँच जारी

मामले से जुड़ी सामग्री में संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कतर, तुर्की, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में PFI से जुड़ी गतिविधियों का उल्लेख किया गया है। जाँच एजेंसियाँ यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या भारत में धन पहुँचाने के लिए बांग्लादेश और नेपाल का इस्तेमाल रास्तों के रूप में किया गया था।

सामग्री में हाथरस गैंगरेप मामले के बाद मॉरीशस से उत्तर प्रदेश में PFI से जुड़े चैनलों तक पैसा भेजे जाने का भी उल्लेख किया गया है। ATS फराज और अन्य आरोपितों के बैंकिंग रिकॉर्ड की जाँच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उन्हें विदेश से या भारत के भीतर काम कर रहे माध्यमों के जरिए कोई धन मिला था या नहीं।

फराज ने जाँच एजेंसियों को बताया कि उसके अब्बू बैटरी मरम्मत का काम करते थे और वह अपने परिवार का इकलौता बेटा था। एजेंसी उसकी आर्थिक पृष्ठभूमि की तुलना उसकी डिजिटल गतिविधियों और नेटवर्क से जुड़े संभावित लेन-देन के साथ कर रही है।

क्लिनिक की नौकरी के पीछे छिपी हुई थीं फराज की गतिविधियाँ

फराज करीब 15 साल तक खुशबू क्लिनिक में कंपाउंडर का काम करता था। अपने इलाके में वह एक मजहबी व्यक्ति के रूप में जाना जाता था। वह और उसकी बीवी घर पर बच्चों को पढ़ाते थे और हर मंगलवार सुबह कुरान की कक्षाएँ भी आयोजित करते थे। घर के बाहर लगे एक बोर्ड पर सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक कक्षाओं का समय लिखा हुआ था।

ATS ने उसके घर पर कार्रवाई गोपनीय तरीके से की। करीब 12 अधिकारियों की टीम, जिसमें तीन महिला कर्मी भी शामिल थीं, घर को चारों ओर से घेरने के बाद छत के रास्ते अंदर दाखिल हुई और उसे हिरासत में लिया। बाद में उसका घर और जिस क्लिनिक में वह काम करता था, दोनों बंद पाए गए।

जाँच एजेंसियाँ अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि उसके पेशेवर, मजहबी या आसपास के संपर्कों में से किसी को भर्ती के लिए संपर्क किया गया था या नहीं। ATS उसकी मार्शल आर्ट्स ट्रेनिंग, कम चर्चित एप्लिकेशन के इस्तेमाल, सोशल मीडिया पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों और विदेश जाने की संभावित तैयारियों की भी जाँच कर रही है।

डिजिटल सबूतों, आरोपितों के बयानों और पाकिस्तानी हैंडलरों से उनके संपर्कों की जाँच की जा रही है ताकि नेटवर्क के पूरे दायरे का पता लगाया जा सके और यह जाना जा सके कि क्या देश के अन्य हिस्सों में पहले से स्लीपर सेल तैयार किए जा चुके थे।

क्या है PFI का ‘मिशन 2047’?

साल 2022 में OpIndia को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़ा एक आठ पन्नों का आंतरिक दस्तावेज मिला था, जिसका शीर्षक India Vision 2047 था। ‘Towards Rule of Islam in India’ टैगलाइन वाले इस दस्तावेज में साल 2047 तक, यानी भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने तक, देश में इस्लामिक सरकार स्थापित करने के लिए चरणबद्ध योजना का उल्लेख किया गया था।

दस्तावेज में दावा किया गया था कि राजनीतिक सत्ता ब्रिटिश शासन के दौरान मुसलमानों से ‘अन्यायपूर्ण तरीके से छीन ली गई’ थी और इसे फिर से मुस्लिम समुदाय के पास लौटना चाहिए। इसमें यह भी कहा गया था कि अपने उद्देश्य को हासिल करने के लिए PFI को मुस्लिम बहुमत के समर्थन की आवश्यकता नहीं है।

दस्तावेज के अनुसार, संगठन का मानना ​​था कि भारत की मुस्लिम आबादी के 10% लोगों का समर्थन भी हिंदू बहुमत को ‘घुटने टेकने’ पर मजबूर करने और इस्लाम की ‘शान’ को बहाल करने के लिए पर्याप्त होगा। इस योजना को चार चरणों में विभाजित किया गया था। 

पहले चरण में अलग-अलग मुस्लिम संप्रदायों को PFI के बैनर के तहत एकजुट करने, भर्ती बढ़ाने और ऐसी इस्लामिक पहचान तैयार करने पर जोर दिया गया था जो भारतीय पहचान से ऊपर हो। कार्यकर्ताओं को आक्रामक और रक्षात्मक तरीकों का प्रशिक्षण देने की बात कही गई थी, जिसमें रॉड, तलवार और अन्य हथियारों के उपयोग का भी उल्लेख था।

दस्तावेज में यह भी कहा गया था कि मुस्लिमों को वास्तविक या निर्मित शिकायतों की बार-बार याद दिलाई जाए ताकि भारतीय राज्य और हिंदुओं के प्रति असंतोष बनाए रखा जा सके।दूसरे चरण में विरोधियों के बीच डर पैदा करने और सामूहिक ताकत दिखाने के लिए चुनिंदा हिंसा के इस्तेमाल का प्रस्ताव रखा गया था।

जिन कार्यकर्ताओं में क्षमता दिखाई दे, उन्हें आग्नेयास्त्रों (Firearms) और विस्फोटकों का उन्नत प्रशिक्षण देने की बात कही गई थी। साथ ही संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और बीआर आंबेडकर जैसे शब्दों का इस्तेमाल अंतिम उद्देश्य को छिपाने के लिए किए जाने का उल्लेख भी था।

दस्तावेज में कार्यपालिका और न्यायपालिका में प्रभाव बढ़ाने, अनुकूल परिणाम हासिल करने और फंडिंग व सहायता के लिए इस्लामिक देशों से संबंध बनाने की बात भी कही गई थी।

तीसरे चरण में PFI ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ राजनीतिक गठबंधन बनाने और इन समुदायों तथा RSS के बीच दूरी पैदा करने की योजना का उल्लेख किया था। संगठन चुनाव लड़ना, धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता कम करना और खुद को मुसलमानों तथा वंचित समुदायों का प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करना चाहता था।

इस चरण में हथियार और विस्फोटक जमा करने तथा प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के जरिए उन लोगों पर हमला करने की बात भी कही गई थी जिन्हें संगठन अपने हितों के खिलाफ मानता था।

चौथे चरण में PFI के मुसलमानों के निर्विवाद नेता के रूप में उभरने और राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता हासिल करने लायक राजनीतिक समर्थन जुटाने की कल्पना की गई थी। सत्ता में आने के बाद वफादार कार्यकर्ताओं को कार्यपालिका, न्यायपालिका, पुलिस और सशस्त्र बलों में नियुक्त करने की बात कही गई थी।

संगठन का विरोध करने वालों को हटाने और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था की जगह इस्लामिक संविधान लागू करने का भी उल्लेख था। दस्तावेज में हर मुस्लिम परिवार से कम से कम एक व्यक्ति की भर्ती, गुप्त प्रशिक्षण केंद्र बनाने, हथियार और विस्फोटक रखने के लिए भंडार तैयार करने और एक समर्पित सशस्त्र बल बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया था।

कार्यकर्ताओं को ‘अंतिम संघर्ष’ से पहले हिंदू और RSS नेताओं की व्यक्तिगत जानकारी इकट्ठा करने के निर्देश दिए गए थे। PFI ने भारतीय राज्य के साथ टकराव की स्थिति में विदेशी इस्लामिक देशों से सहायता लेने की संभावना का भी उल्लेख किया था। इसमें विशेष रूप से तुर्की के साथ संबंधों का जिक्र किया गया था और अन्य इस्लामिक देशों के साथ भी ऐसे संबंध विकसित करने की बात कही गई थी।

इस तरह मिशन 2047 को केवल वैचारिक अभियान के रूप में नहीं, बल्कि कट्टरपंथ, भर्ती, राजनीतिक प्रभाव, सशस्त्र प्रशिक्षण, विदेशी समर्थन और संगठित हिंसा के जरिए भारत की संवैधानिक व्यवस्था को बदलने के लिए एक दीर्घकालिक कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

PFI क्या है और इस पर प्रतिबंध क्यों लगाया गया था?

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) एक इस्लामवादी संगठन था, जो कई भारतीय राज्यों में अपने सदस्यों, सहयोगी संगठनों और राजनीतिक इकाइयों के व्यापक नेटवर्क के जरिए काम करता था। संगठन खुद को मुसलमानों और अन्य वंचित समुदायों के अधिकारों और सशक्तिकरण के लिए काम करने वाला समूह बताता था।

हालाँकि केंद्रीय और राज्य एजेंसियों की जाँच में संगठन को कट्टरपंथ, हिंसक गतिविधियों के लिए लोगों को संगठित करने, आतंक वित्तपोषण, हथियारों के प्रशिक्षण और भारतीय राज्य को चुनौती देने में सक्षम एक गुप्त नेटवर्क तैयार करने के प्रयासों से जोड़ा गया।

यह संगठन लंबे समय से जाँच एजेंसियों की नजर में था और ‘India Vision 2047’ दस्तावेज PFI के खिलाफ कार्रवाई की दिशा में महत्वपूर्ण आधारों में से एक बना। प्रतिबंध तक पहुँचने वाली घटनाओं की शुरुआत 2022 में हुई, जब पुलिस ने फुलवारी शरीफ में एक संदिग्ध नेटवर्क का खुलासा किया।

जाँच एजेंसियों ने अथर परवेज और मोहम्मद जलालुद्दीन को गिरफ्तार किया और ऐसे दस्तावेज बरामद किए, जिनमें मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथ की ओर ले जाने, हथियारों का प्रशिक्षण देने और भारत को इस्लामिक राज्य में बदलने की दिशा में काम करने की योजनाओं का उल्लेख था।

जलालुद्दीन की पहचान प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) के पूर्व सदस्य के रूप में भी हुई थी, जो बाद में PFI से जुड़ गया था। आगे की गिरफ्तारियों और तलाशी में व्हाट्सएप समूह, विदेशी संपर्क, डिजिटल सामग्री और ‘गजवा-ए-हिंद’ नेटवर्क से जुड़े संबंधों की जानकारी सामने आई।

जाँच एजेंसियों ने BJP युवा नेता प्रवीण नेट्टारू की हत्या और पटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली पर हमले की साजिश सहित कई हिंसक घटनाओं में PFI की संभावित भूमिका की भी जाँच की। सरकार का मामला मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर आधारित था- संगठन का देशव्यापी नेटवर्क, उसके फंडिंग चैनल और हिंसक व आतंकवादी गतिविधियों में उसकी संलिप्तता।

सितंबर 2022 में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA), प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राज्य पुलिस ने कई राज्यों में छापेमारी की। इस दौरान PFI के सैकड़ों सदस्यों और पदाधिकारियों को हिरासत में लिया गया, जबकि डिजिटल उपकरण, दस्तावेज और वित्तीय रिकॉर्ड जब्त किए गए।

गृह मंत्रालय के अनुसार, PFI और उससे जुड़े संगठनों को भारत और विदेश से बैंकिंग चैनलों, हवाला और दान के जरिए धन प्राप्त हुआ। बताया गया कि इस धन को कई खातों के जरिए घुमाया गया ताकि उसके वास्तविक उद्देश्य को छिपाया जा सके और बाद में उसका इस्तेमाल गैरकानूनी तथा आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया गया।

सरकार ने PFI सदस्यों के ISIS सहित आतंकवादी संगठनों से संबंधों और RSS जैसे संगठनों में घुसपैठ तथा संवेदनशील जानकारी जुटाने के प्रयासों का भी उल्लेख किया। 28 सितंबर 2022 को केंद्र सरकार ने गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत PFI पर पाँच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया।

इसके साथ उससे जुड़े आठ अन्य संगठनों पर भी प्रतिबंध लगाया गया। सरकार ने निष्कर्ष निकाला कि PFI की गतिविधियाँ भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं। इस तरह प्रतिबंध केवल उसकी विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि कट्टरपंथ, विदेशी फंडिंग, हिंसक साजिशों, आतंक संबंधों और भारत की संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने की कथित संगठित योजना से जुड़े एकत्रित सबूतों के आधार पर लगाया गया।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Anurag
Anuraghttps://lekhakanurag.com
Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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