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‘मुस्लिम होने के कारण फँसा ताहिर हुसैन’ : दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के बाद बचाव में उतर गया था पूरा वामपंथी गैंग, पूछ रहे थे- अंकित शर्मा की हत्या को क्यों दे रहे हो तवज्जो

ताहिर हुसैन को बचाने के प्रयासों केवल सोशल मीडिया के कट्टरपंथी या वामपंथी यूजर्स ही शामिल नहीं थे, बल्कि अमानतुल्लाह जैसे राजनेता, अनुराग कश्यप जैसे कलाकार, राणा अय्यूब-राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार और 'द लल्लनटॉप' जैसे नामी मीडिया संस्थान भी संगठित रूप से सक्रिय थे।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों को 6 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन कुछ परिवारों के जख्म आज भी हरे हैं। उन्हीं में से एक परिवार आईबी अधिकारी अंकित शर्मा का है। 25 फरवरी 2020 को जब पूरा इलाका हिंसा और आगजनी की चपेट में था, तब अंकित शायद यह सोचकर घर से निकले थे कि आसपास के सभी लोग परिचित हैं, तो भला उनके साथ क्या होगा। लेकिन वे इस बात से अनजान थे कि उस उन्मादी इस्लामी कट्टरपंथियों भीड़ के लिए वे कोई पड़ोसी या आईबी अधिकारी नहीं, बल्कि सिर्फ एक हिंदू थे।

घर से निकलने के बाद अंकित शर्मा लापता हुए और अगले दिन उनकी लाश सीधे मस्जिद के पास एक नाले से अत्यंत क्षत-विक्षत स्थिति में बरामद हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पूरी क्रूरता को उजागर कर दिया। मीडिया में छपी उनते हाथ की तस्वीर ने सबको दंग कर दिया। उनके शरीर पर 51 बार चाकुओं से वार किया गया था, उनके अंग छिन्न-भिन्न हो चुके थे और आंतें बाहर आ गई थीं। यह एक ऐसी बर्बरता थी जिसे याद कर आज भी रूह कांप जाती है।

13 जुलाई 2026 को दिल्ली की कड़कड़डूमा अदालत ने जब इस जघन्य हत्याकांड में शामिल आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया है, ये माना है कि उस वीभत्सता के पीछे ताहिर हुसैन का ही हाथ था, तो ऐसे में उन वामपंथी-कट्टरपंथी गिद्धों की करतूत को याद करना जरूरी हो जाता है जिन्होंने बर्बर हत्या पर अपना नैरेटिव गढ़ा था और ताहिर हुसैन को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, उसे मासूम-बेचारा दिखाया था।

ताहिर हुसैन को बचाने में एक्टिव था पूरा इकोसिस्टम

इस कुत्सित प्रयास में केवल सोशल मीडिया के कट्टरपंथी या वामपंथी यूजर्स ही शामिल नहीं थे, बल्कि राजनेता, कलाकार, पत्रकार और नामी मीडिया संस्थान भी संगठित रूप से सक्रिय थे।

अपने आपको पत्रकार कहने वाली राणा अय्यूब ने ताहिर हुसैन की गिरफ्तारी को सांप्रदायिक रंग देते हुए इस तरह पेश किया जैसे देश में मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा हो और हिंदुओं को छोड़ा जा रहा है।

वहीं वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने बेशर्मी दिखाते हुए इस बात पर आपत्ति जताई थी कि अंकित शर्मा की हत्या को इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है।

और, आरफा खानम शेरवानी ने तो दिल्ली पुलिस द्वारा वांछित ताहिर हुसैन का उस समय में इंटरव्यू लेकर उसे एक आरोपित के बजाय ‘पीड़ित’ के रूप में दिखाने का प्रयास किया था।

इसी तरह, AAP नेता अमानतुल्लाह खान जैसे राजनेताओं ने भी ‘मुस्लिम कार्ड’ खेलते हुए दावा किया कि ताहिर को सिर्फ उसके मजहब के कारण फँसाया जा रहा है। खुद ताहिर हुसैन ये बोलता हुआ मिला था कि अगर निष्पक्ष जाँच हुई तो वो निर्दोषी पाया जाएगा लेकिन अगर उसका ‘नाम’ देखा गया तो उसके साथ कुछ भी हो सकता है। ताहिर हुसैन को पीएफआई तक ने समर्थन दिया था।

साक्षी जोशी और विनोद कापरी जैसे लोगों ने तो ताहिर हुसैन द्वारा पुलिस को किए गए फोन कॉल्स को उसकी बेगुनाही का सबसे बड़ा प्रमाण बताया। जबकि पुलिस जाँच में यह तथ्य सामने आया कि वे कॉल्स खुद को कानूनी रूप से बचाने के लिए चली गई एक सोची-समझी चाल थे।

बॉलीवुड फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया। उन्होंने ताहिर हुसैन, उमर खालिद और खालिद सैफी के बचाव में तर्क दिया कि दंगों की साजिश की तारीखें और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा का समय मेल नहीं खाते।

जबकि, बाद में पुलिस जाँच में यह साफ हो गया कि यह साजिश बहुत पहले से और गहराई से रची गई थी।

इसी तरह जावेद अख्तर ने लिखा था, “कई मारे गए, कई सारे घायल हुए, कई घर जला दिए गए, कई दुकानें लूटी गईं। कई लोगों को नुक़सान हुआ लेकिन पुलिस ने केवल एक घर सील किया और उसके मालिक को ढूँढ रही है। संयोगवश उसका नाम ताहिर हुसैन है, दिल्ली पुलिस की कंसिस्टेंसी को सलाम है।”

बॉलीवुड गायक और म्यूजिक कंपोजर विशाल ददलानी ने भी ताहिर हुसैन को बेकसूर बताया। विशाल ने ट्विटर पर लिखा कि दंगो में शामिल कोई शख्स पुलिस को फोन क्यों करेगा।

इस पूरे मामले में डिजिटल और मुख्यधारा के मीडिया के एक वर्ग ने भी ताहिर को निर्दोष दिखाने में अपनी ओर से कसर नहीं छोड़ी थी। बढ़-चढ़कर ताहिर का पक्ष बताने की होड़ लगी थी।

द वायर जैसी प्रोपगेंडा साइट ने ने शुरुआत में ही ताहिर हुसैन के पक्ष को रखने के लिए एक पूरा शो समर्पित कर दिया था, जहाँ उसकी बातों को ही तवज्जो दी गई।

वहीं द लल्लनटॉप ने घटना के एक साल बाद एक- देहली नाम से वीडियो/डॉक्यूमेंट्री जारी की थी। इसमें नजर आई इंडिया टुडे की पत्रकार ने यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया गया कि अंकित शर्मा स्वयं भीड़ का हिस्सा थे और मुस्लिम इलाके की तरफ बढ़ रहे थे, जिससे पीड़ित को ही एक तरह से दोषी के रूप में कटघरे में खड़ा कर दिया गया था।

ताहिर को बचाने के लिए वामपंथियों ने नकारे सारे सबूत

गौरतलब हो कि दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के बाद सबसे हैरानी की बात यह है कि ‘लिबरल और इस्लामी गिरोह’ द्वारा यह पूरा प्रोपेगैंडा तब चलाया जा रहा था, जब ताहिर हुसैन के घर की छत से भारी मात्रा में पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब की बोतलें बरामद हुई थीं, सोशल मीडया पर हर जगह उसके खुद छत पर होने के वीडियो वायरल थे, अंकित के परिजन रो-रोकर ताहिर को मुख्य साजिशकर्ता बता रहे थे, एक के बाद एक इस्लामी कट्टरपंथी गिरफ्तार हो रहे थे, ताहिर अपने कुकर्म स्वीकार रहा था या अदालत ये कह रही थी उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदुओं पर हुए हमले एक सुनियोजित और गहरी साजिश का हिस्सा थे।

आज जब यह मामला न्याय की दहलीज पर है, ताहिर हुसैन को सजा मिलना शेष है, तब अपराधियों के साथ-साथ उनके इन पैरोकारों के चेहरों को भी याद रखना जरूरी है। यह इतिहास में दर्ज रहेगा कि कैसे एक निर्दोष युवक को 51 बार चाकुओं से गोदे जाने की क्रूरता को भुलाकर, इस वामपंथी गिरोह ने सिर्फ अपने राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे के लिए एक दंगाई और हत्यारे के बचाव में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।

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