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Exclusive: ‘मैंने PCR को कॉल किया था..’ ताहिर हुसैन की इस दलील को अदालत ने क्यों नहीं माना अंकित शर्मा की हत्या में बेगुनाही का सबूत, फैसले से समझिए पूरी कहानी

2020 के दिल्ली दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी अंकित शर्मा की निर्मम हत्या के छह साल बाद दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और 5 अन्य को दोषी ठहराया है। फैसले में हुसैन को न केवल हत्या और दंगा करने का दोषी पाया गया है, बल्कि उनके लंबे समय से चले आ रहे पीसीआर कॉल के बचाव को भी खारिज कर दिया।

26 फरवरी 2020 को एक क्षत-विक्षत शव चांद बाग के नाले से बरामद किया गया। शरीर पर चाकू के कई घाव थे। चेहरे पर तेजाब से हमला किया गया था और हड्डियाँ टूटी हुई थी। सिर, चेहरे, छाती, पीठ और कमर पर चोट के निशान थे। ये शव 26 साल के इंटेलिजेंस अधिकारी अंकित शर्मा का था, जिनकी दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में ताहिर हुसैन के अगुवाई वाली मुस्लिम भीड़ ने बेरहमी से कत्ल कर दिया था।

भारत में हुए उस बर्बरता के 6 साल बाद 13 जुलाई 2026 को आम आदमी पार्टी का पार्षद रहा ताहिर हुसैन समेत 5 आरोपितों को विभिन्न धाराओं 188, 153ए, 147,148, 365 और 302 के तहत अंकित शर्मा की हत्या का दोषी ठहराया गया।

मृतक अंकित शर्मा के पिता रविंदर कुमार की शिकायत पर यह मामला 26 फरवरी 2020 को दर्ज किया गया था। शिकायत में पिता ने कहा था कि मेन करावल नगर रोड पर चांद बाग पुलिया के पास सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान पत्थरबाजी, आगजनी, गोलीबारी और तोड़फोड़ की घटनाएँ हुई थीं। उन्होंने यह भी बताया कि इस इलाके में आम आदमी पार्टी के नेता ताहिर हुसैन का कार्यालय है और उनके कार्यालय में कई गुंडे मौजूद थे।

मुस्लिम भीड़ ने ताहिर हुसैन के दफ्तर की छत से पत्थर और पेट्रोल बम फेंके और गोलियाँ चलाईं, जिससे जनता में दहशत का माहौल बन गया। 25 फरवरी को अंकित शर्मा घर नहीं लौटे। अगले दिन पिता रविंदर कुमार ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। कुछ देर बाद उन्हें पता चला कि चांद बाग पुलिया की मस्जिद में एक व्यक्ति की हत्या करके उसे खजूरी खास नाले में फेंक दिया गया था। सूचना के आधार पर अंकित शर्मा का शव खजूरी खास नाले से बुरी हालत में बरामद किया गया। उनके शरीर पर अंडरवियर के अलावा कोई और कपड़े नहीं थे।

हिंदुओं के प्रति ताहिर हुसैन की दुर्भावना को लेकर कोर्ट का बयान

ताहिर हुसैन को दोषी ठहराते हुए अपने फैसले में कोर्ट ने कहा, “अभियोजन पक्ष ने अभियुक्त के खिलाफ धारा 188 आईपीसी, धारा 153ए ( 149 आईपीसी के साथ), धारा 147 ( 149 आईपीसी के साथ), धारा 148 ( 149 आईपीसी के साथ), धारा 365 ( 149 आईपीसी के साथ) और धारा 302 (149 आईपीसी के साथ) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए उचित संदेहों से परे यह साबित कर दिया है कि ताहिर हुसैन गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा था।”

इस फैसले के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से उन बातों की पुष्टि करते हैं, जो OpIndia पिछले 6 वर्षों से रिपोर्ट करता आ रहा है। इससे यह भी साबित होता है कि 2020 में जो कुछ हुआ वह वास्तव में हिंदू विरोधी हिंसा थी।

(कोर्ट के फैसले का अंश)

अदालत ने घोषणा की कि अभियोजन पक्ष ने संदेह से परे यह साबित कर दिया है कि ताहिर हुसैन वास्तव में चांद बाग में हिंदुओं से नफरत करने वाली भीड़ का हिस्सा था। अदालत ने आगे कहा कि ताहिर हुसैन और अन्य मुस्लिम ‘चांद बाग पुलिया में दंगा, लूटपाट, आगजनी करने और हिंदुओं की जान -माल को नुकसान पहुँचाने के मकसद से इकट्ठा हुए थे और इस भीड़ को पता था कि अपने मकसद को पूरा करने के दौरान उनकी मौत भी हो सकती है।

कोर्ट ने आगे कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि हथियारों से लैस और जबरदस्त हिंसा को अंजाम देने वाली मुस्लिम भीड़ ने अंकित शर्मा को घसीटा और उसका अपहरण किया। उसे बेरहमी से पीटा गया और फिर उसकी हत्या कर दी। अदालत ने इस मामले में ताहिर हुसैन के खिलाफ सबूत मिले, जो उस भीड़ का हिस्सा था। इसलिए वह हत्या का दोषी है।

ताहिर हुसैन के ‘पीसीआर कॉल’ को द वायर, ऑल्टन्यूज और दूसरे प्रोपेगेंडा फैलाने वाले मीडिया संस्थान ने भले ही बचाने के लिए इस्तेमाल किया हो, लेकिन इस फैसले ने मुस्लिम भीड़ और ताहिर हुसैन की हिंदुओं के प्रति दुर्भावना को उजागर किया है। इस फैसले का एक और दिलचस्प पहलू था प्रोपेगेंडा लिबरल गैंग के संपादकीय लेख, जो सालों तक दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में ताहिर हुसैन और अन्य लोगों की भूमिका को छिपाने की कोशिश करते रहे।

चांद बाग नाले से अंकित शर्मा के शव की बरामदगी और ताहिर हुसैन की उसमें संलिप्तता के खुलासे के बाद पूरा वामपंथी-उदारवादी तंत्र उसे बचने का रास्ता ढूँढने लगा। इस मकसद से इस तंत्र ने मिलजुल कर एक मनगढ़ंत वीडियो फैलाना शुरू कर दिया। वीडियो में ताहिर हुसैन गिड़गिड़ाते हुए दावा कर रहा था कि वह हिंसा का असली शिकार है। उसने दावा किया कि पीसीआर (पुलिस नियंत्रण कक्ष) में उसने कई बार फोन करके मदद माँगी थी, क्योंकि दंगाई उसे नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहे थे।

यह वीडियो विशेष रूप से ‘द वायर’ ने साझा किया, जिसे अरफा खानम शेरवानी अपना घर मानती हैं। इसके बाद इस वीडियो को पूरा लिबरल वामपंथी ग्रुप ने फैलाया। वीडियो के आधार पर ताहिर की भूमिका को छिपाने की कोशिश की गई।

राजदीप सरदेसाई जैसे लोगों ने ताहिर हुसैन को ‘पीड़ित’ माना। उन्होंने अपने एक वीडियो में दावा किया कि ताहिर हुसैन और उसके साथी अपनी इमारत का दरवाजा बंद रखने की कोशिश कर रहे थे। राजदीप ने कहा कि ताहिर और उसके ग्रुप के लोग शायद हिंदू भीड़ को अंदर आने से रोकने की कोशिश कर रहे थे।

राजदीप सरदेसाई के ट्वीट से साफ पता चलता है कि ताहिर हुसैन ने ही इंडिया टुडे जैसी मुख्यधारा वाली मीडिया के साथ-साथ द वायर और ऑल्टन्यूज जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से ‘खुद को बचाने वाली’ कहानी को फैलाया था।

लेकिन तथ्यों की पुष्टि और पूरी कहानी की सच्चाई जानने की इन मीडिया संस्थान ने जहमत नहीं उठाई। ताहिर हुसैन के खिलाफ मौजूद अनेक सबूतों को नजरअंदाज कर दिया। छह साल बाद कोर्ट ने सबूतों के आधार पर ताहिर हुसैन की तमाम कानूनी दांव-पेचों के बावजूद उसे दोषी ठहराया।

ताहिर हुसैन की ‘पीसीआर कॉल’ वाली कहानी को कोर्ट ने कैसे खारिज किया

कोर्ट ने अपने फैसले में ताहिर हुसैन के उस दलील पर भी बात की जिसमें उसने खुद को अपराधी न मान कर हिंसा का पीड़ित बता रहा था और मदद के लिए पुलिस की पीसीआर को कई बार फोन करने का दावा कर रहा था।

गौरतलब है कि आरोपपत्र में ही यह दर्ज है कि ताहिर हुसैन ने पीसीआर को कई बार फोन किया था। कोर्ट के मुताबिक, “आरोपपत्र से यह भी स्पष्ट है कि 25/02/2020 को दोपहर 3:55 से 4:31 बजे के बीच ताहिर हुसैन ने पीसीआर को लगभग छह बार फोन किया था। इससे पहले 24/02/2020 को दोपहर लगभग 3:53 बजे ताहिर हुसैन ने पीसीआर को फोन करके कहा था, ‘कॉलर के घर की छत पर लोग चढ़ गए हैं और पथराव कर रहे हैं।’

शाम 5:57 बजे उसने फिर से पीसीआर को यही जानकारी दी। यह भी तर्क दिया गया है कि अभियोजन पक्ष ने ताहिर हुसैन के मोबाइल फोन की सीडीआर पर भरोसा किया है। इस रिकॉर्ड से पता चलता है कि 25/02/2020 को दोपहर 2:36 से शाम 5:30 बजे तक ताहिर हुसैन लगातार दिल्ली पुलिस के केपी सिंह, आम आदमी पार्टी के कई नेताओं, इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाताओं, करावल नगर के निगम परिषद और अन्य व्यक्तियों को फोन कर रहा था।

अगर पुलिस और अदालत ने माना कि ताहिर हुसैन ने वास्तव में पीसीआर को फोन किया था, तो फिर इस तर्क को कोर्ट ने क्यों खारिज किया? दरअसल कोर्ट में कई जगह झूठ का पर्दाफाश हो गया।

अदालत ने गौर किया कि ताहिर हुसैन ने जिन लोगों से संपर्क करने की कोशिश की थी, उन सभी के नाम सीडीआर में दर्ज थे। हालाँकि उनमें से किसी को भी बचाव पक्ष द्वारा पूछताछ के लिए पेश नहीं किया गया। ताहिर हुसैन ने जिन लोगों को कोर्ट में गवाह के तौर पर बुलाया था, उनमें से किसी से भी बचाव पक्ष ने पूछताछ नहीं की।

अब सवाल उठता है कि क्या ताहिर हुसैन ने दंगों के दौरान जिन लोगों को फोन किया था, क्या ये कॉल वास्तव में मदद माँगने के लिए किए गए थे? या फिर ये कॉल जानबूझ कर खुद को बचाने के लिए सबूत के तौर पर पेश करने के लिए किया गया था। क्योंकि ताहिर हुसैन की छत पर दंगाइयों के होने की खबरें पहले ही फैलनी शुरू हो चुकी थीं।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बचाव पक्ष द्वारा उनमें से किसी की भी जाँच न किए जाने या उन्हें गवाह के रूप में पेश न किए जाने के कारण अदालत यह अनुमान लगाने की स्थिति में नहीं है कि पीसीआर कॉल गंभीरता से किए गए थे।

इसके अलावा कोर्ट ने एक चौंकाने वाला खुलासा भी किया। ताहिर हुसैन ने खुद अपने पीसीआर कॉल के बारे में स्पष्टीकरण देने के लिए गवाही नहीं दी। अगर ताहिर हुसैन गवाही देते तो उन कॉलों का मकसद भी वे कोर्ट को बताते। उन्होंने ऐसा नहीं किया। गवाही के बगैर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि ताहिर ने मदद माँगने के लिए ही कॉल किए थे या ये उनकी चाल थी।

(फैसले का हिस्सा)

पीसीआर कॉल और दंगे में अपनी भूमिका के बारे में ताहिर हुसैन ने क्या कहा था?

आम आदमी पार्टी के पार्षद ने अपने बयान में स्वीकार किया है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान उन्हें यह जानकारी मिली थी कि सीएए के समर्थन में भी कुछ रैलियाँ होने वाली हैं। यह जानकारी मिलने के बाद उन्होंने कई लोगों से मुलाकात की और सरकार को सबक सिखाने की साजिश रची।

ताहिर हुसैन ने अपने बयान में माना है कि उसने दंगों के लिए अपने ही घर को लॉन्चपैड के रूप में चुना, क्योंकि वह इलाके की एक ऊँची इमारत थी। ताहिर हुसैन का कहना है कि उसने अपने घर को लॉन्चपैड के रूप में इसलिए भी चुना क्योंकि उसके घर में पहले से ही निर्माण कार्य चल रहा था और इसलिए दंगों के लिए पत्थर और ईंटें इकट्ठा करने से किसी को शक नहीं होगा।

वह कबूल करता है कि उसने और उसके साथियों ने सीएए का समर्थन करने वालों को सबक सिखाने के लिए काफी पहले से ही पत्थर, ईंटें और गोला-बारूद इकट्ठा करना शुरू कर दिया था। उसने दंगे भड़कने से 2-3 दिन पहले पुलिस स्टेशन से अपनी लाइसेंसी पिस्तौल भी ले आया था। दंगों की तैयारी और हिंदुओं को सबक सिखाने के लिए गोला-बारूद इकट्ठा करते समय ताहिर हुसैन का कहना है कि उसने अपने समर्थकों को ‘हर तरह से और हर परिस्थिति के लिए तैयार रहने’ का निर्देश दिया था।

उसने यह भी सुनिश्चित करने को कहा था कि इलाके में लगे सभी सीसीटीवी कैमरे, चाहे निजी हों या सरकारी, तोड़ दिए जाएँ, ताकि दंगों का कोई सबूत न मिल सके। गौरतलब है कि यह सब दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगे भड़कने से काफी पहले किया गया था।

ताहिर हुसैन ने स्वीकार किया कि वह अपने भाई शाह आलम, अरशद, आबिद, शाहिद, इरशाद और कई अन्य लोगों के साथ अपने आवास पर मौजूद थे। उनका कार्यालय भी उसी इमारत में है जहाँ से दंगे शुरू हुए थे। ताहिर हुसैन ने आगे बताया कि 24 तारीख की दोपहर को उनके अपने लोगों से ‘अल्लाह हू अकबर’ और ‘मारो मारो काफिरों को मारो’ के नारे लगाने शुरू कर दिए।

ताहिर ने आगे बताया कि उसके निर्देश पर उसके समर्थक उसके घर की छत पर पहुँच गए और हिंदुओं और उनकी संपत्तियों को निशाना बनाते हुए पत्थर फेंकने, गोली चलाने और पेट्रोल बम फेंकने लगे। हुसैन ने अपने समर्थकों से कहा था कि चूँकि उसकी इमारत इलाके की एक ऊँची इमारत है, इसलिए हिंदुओं की किसी भी जवाबी कार्रवाई से उन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। उसने यह भी बताया कि उसका भाई शाह आलम, गुलफाम और अन्य लोग भी हिंदुओं पर पिस्तौल से गोलियाँ चला रहे थे।

फिर आता है सबसे निर्णायक हिस्सा, जिसका इस्तेमाल द वायर जैसे कई वामपंथी पोर्टलों ने ताहिर हुसैन को बचाने की कोशिश में किया है। एनडीटीवी और द वायर जैसी संस्थान ताहिर हुसैन का बचाव करने में सबसे आगे थी। दोनों पोर्टलों ने दावा किया था कि ताहिर हुसैन के खिलाफ आरोपों पर गंभीर सवाल उठते हैं क्योंकि उन्होंने खुद पीसीआर को कई बार फोन किया था और वे खुद हिंसा के शिकार थे।

‘द वायर’ ने हुसैन का एक ‘एक्सक्लूसिव’ इंटरव्यू प्रसारित किया था, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि वे पीड़ित हैं और उन्हें इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वे मुसलमान हैं। एनडीटीवी ने पीसीआर को किए गए फोन कॉल्स को सामने रखते हुए दावा किया था कि इन कॉल्स से हुसैन के खिलाफ आरोपों पर सवालिया निशान लग गया है।

जबकि पूरे गिरोह ने ताहिर हुसैन द्वारा फैलाए गए झूठ का इस्तेमाल आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या और उसके द्वारा भड़काए गए दंगों से उसे बरी करने के लिए किया। ताहिर हुसैन ने अपने बयान में पीसीआर को किए गए अपने फोन के पीछे का कारण बताया।

अपने हस्ताक्षरित बयान में ताहिर हुसैन ने कहा है कि अपनी योजना के अनुसार, उसने अपने मोबाइल फोन से पीसीआर और पुलिस अधिकारियों को कई कॉल किए थे ताकि वह दंगों का कसूरवार ठहराए जाने से बच सके। उसके पास खुद को पाक साफ दिखाने का पुख्ता सबूत हो। उसने कहा कि वह जानता था कि पुलिस बल कितना भी बड़ा क्यों न हो, वे पुलिया पार नहीं कर पाएँगे, क्योंकि वहाँ हजारों मुसलमान जमा थे। इसके अलावा, मुस्लिम भीड़ पुलिस बल पर पत्थर और ईंटें फेंक रही थी ताकि उन्हें खदेड़ दिया जाए। उसने यह भी कहा कि भीड़ पुल के दोनों ओर हिंदू घरों को जला रही थी।

ताहिर हुसैन ने पीसीआर कॉल को लेकर गवाही क्यों नहीं दी?

अदालत के फैसले से यह स्पष्ट है कि ताहिर हुसैन ने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए केवल पीसीआर कॉल का जिक्र किया। हालाँकि ताहिर के बचाव पक्ष ने उन लोगों से पूछताछ नहीं की, जिन्हें उन्होंने कॉल किया था और न ही गवाही देने के लिए अदालत में पेश किया। अदालत ने सही ही कहा कि यह मानने का कोई सबूत नहीं था कि कॉल गंभीरता से किए गए थे।

अब सवाल यह है कि ताहिर हुसैन ने गवाही देने से इनकार क्यों किया? इसका जवाब सीधा सा है। अगर वह गवाही देते, तो अभियोजन पक्ष उनसे उनके बयान और अन्य सभी सबूतों के बारे में सवाल करता, जिनसे साफ पता चलता है कि पीसीआर कॉल तो सिर्फ एक बहाना था, ताकि बाद में वह खुद को पीड़ित साबित कर सकें। इससे अपराधी के रूप में पहचान उनकी नहीं हो पाएगी।

जिरह से बचने के लिए ताहिर ने गवाही नहीं दी और उम्मीद की कि जज उसकी कानूनी दाँव-पेंच को मान लेंगे। न्यायाधीश ने सही ही इस साजिश को भाँप लिया और पीसीआर कॉल को सीधे तौर पर स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिससे बचाव पक्ष का वह तर्क पूरी तरह खारिज हो गया।

ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया जा चुका है, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह फैसला निचली अदालत ने सुनाया है। अपील की प्रक्रिया लंबी और जटिल होने की संभावना है, क्योंकि ताहिर हुसैन पहले उच्च न्यायालय और फिर संभवतः सर्वोच्च न्यायालय में इस फैसले को चुनौती देगा। यह भी उल्लेखनीय है कि ताहिर हुसैन दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के साजिशकर्ताओं में से एक हैं। साजिश के आरोप पत्र संख्या 59/2020 में उनका नाम शरजील इमाम, उमर खालिद और अन्य आरोपियों के साथ शामिल है। इस मामले की सुनवाई अभी जारी है।

(नोट: यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में नुपुर जे शर्मा ने लिखी है। इसका हिन्दी अनुवाद रुपम ने किया है।)

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