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‘सतलुज’ में जसवंत सिंह खालड़ा हैं, लेकिन पंजाब में बस से उतारकर मार डाले गए हिंदू यात्री कहाँ हैं? खालिस्तानी आतंकवाद के नैरेटिव से मिटा दिए गए 1800 पुलिसकर्मियों का कत्ल-पत्रकारों की निर्मम हत्या

ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही हिंदू यात्रियों को अलग करके गोली मार दी गई थी, शांति की माँग करने वाले सिख नेताओं की हत्या कर दी गई थी, और व्यापक स्तर पर आतंक का अभियान पहले से ही जड़ें जमा चुका था।

दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म Zee5 पर रिलीज करने और फिर हटाए जाने के बाद पंजाब में आतंकवाद (इंसर्जेंसी) के सबसे भयावह दौर पर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है। हमेशा की तरह इस बार भी दो तरह के नैरेटिव सामने आए हैं।

पहला वह, जिसमें पंजाब में आतंकवाद के दौरान मारे गए सभी पीड़ितों, चाहे वे सिख हों या हिंदू, की बात होती है। दूसरा वह, जिसमें खालिस्तान समर्थक संगठन और उनके समर्थक इस पूरे दौर को अपने अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि अब पहला पक्ष लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है।

फिल्म का मूल नाम ‘घल्लूघारा’ था, जिसका अर्थ नरसंहार या जनसंहार होता है। बाद में इसका नाम बदलकर ‘पंजाब 95’ रखा गया और अंततः इसे ‘सतलुज’ नाम से रिलीज किया गया। फिल्म जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों, लापता लोगों तथा गुप्त अंतिम संस्कारों की उनकी जाँच पर आधारित है।

भारत में फिल्म हटाए जाने के बाद सिख संगठनों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने गाँवों तथा गुरुद्वारों में इसके सामुदायिक प्रदर्शन शुरू कर दिए। इसे पुलिस की कथित बर्बरता और उस दौर में पीड़ित परिवारों की पीड़ा की दबाई गई कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। समाचार एजेंसी एसोसिएटिड प्रेस के अनुसार इन प्रदर्शनों ने बुजुर्गों की आँखें नम कर दीं, जबकि युवा पीढ़ी पहली बार उस दौर को समझने की कोशिश कर रही है, जिसके बारे में उन्होंने केवल बिखरी हुई कहानियाँ सुनी थीं।

गौरतलब हो कि अवैध हत्याओं की कहानियों के अगर कहीं सबूत हैं तो उन्हें बताना जरूरी है। खालड़ा का अपहरण और हत्या अपराध था और इस मामले में पुलिसकर्मी दोषी भी दहराया गया। कोई भी इस तरह की घटना को नजरअंदाज करने को नहीं कहता, लेकिन ‘सतलुज’ में ये दिखाया गया है कि कैसे इतिहास की कहानी पूरा सच नहीं बताती।

फिल्म की कहानी क्या छोड़ देती है?

फिल्म पंजाब आतंकवाद की कहानी को लगभग पूरी तरह पुलिस कार्रवाई से जोड़कर दिखाती है। इसमें ऐसा चित्रण किया गया है मानो पुलिस अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकवादियों और आम नागरिकों की हत्या की हो, जबकि खालिस्तानी आतंकवाद को बिना उसका नाम लिए प्रतिरोध आंदोलन जैसा रूप दिया गया है। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल थी।

यह वही दौर था जब खालिस्तानी आतंकवादी बसें और ट्रेनें रोकते थे, यात्रियों की पहचान पूछते थे और केवल हिंदू होने के कारण उन्हें गोली मार देते थे। जो सिख नेता शांति की बात करते थे, उनकी हत्या कर दी जाती थी। जो पत्रकार आतंकवादियों की भाषा बोलने से इनकार करते थे, उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता था। सुरक्षित सरकारी परिसरों के भीतर पुलिस अधिकारियों पर बम हमले होते थे। सड़कों पर घात लगाकर पुलिसकर्मियों की हत्या की जाती थी और यहाँ तक कि धार्मिक स्थलों के बाहर भी उन्हें निशाना बनाया जाता था।

इन पीड़ितों की कहानी किसी फिल्म का हिस्सा नहीं बनती। उनके लिए कहीं सामुदायिक प्रदर्शन नहीं होते। उनके अधूरे सपनों पर लंबी बहस नहीं चलती। वे केवल पुराने अखबारों के आँकड़ों में सिमटकर रह गए हैं। यदि आज भी उनका जिक्र होता है तो अखबार के किसी छोटे-से कोने में, जिसे अधिकांश लोग पढ़े बिना आगे बढ़ जाते हैं।

इसी खाली जगह को भरने की कोशिश OpIndia कर रहा है।

इतिहास का वह हिस्सा जो अक्सर छूट जाता है

पंजाब आतंकवाद पर लोकप्रिय चर्चाएँ प्रायः ऑपरेशन ब्लू स्टार से शुरू होती हैं। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों का जिक्र होता है और फिर पूरा ध्यान पुलिस की आतंकवाद विरोधी कार्रवाई पर केंद्रित हो जाता है।

इन तीनों विषयों की गंभीर समीक्षा होनी चाहिए। इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ हुई हिंसा भारतीय लोकतंत्र पर एक कलंक थी। इसी तरह यदि पुलिस द्वारा गैरकानूनी हत्याओं के आरोप लगे हैं तो केवल इसलिए उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पंजाब आतंकवाद से जूझ रहा था। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब पूरी कहानी यहीं से शुरू कर दी जाती है।

पंजाब में आतंकवाद की शुरुआत पुलिस कार्रवाई से नहीं हुई थी। जब तक सुरक्षा बलों ने व्यापक अभियान शुरू किया, तब तक खालिस्तानी आतंकवाद राज्य को गहरे जख्म दे चुका था।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ बसों और ट्रेनों में आतंकवादी यात्रियों की पहचान पूछकर तय करते थे कि कौन जिंदा रहेगा और कौन मारा जाएगा।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ बाजारों में हिंदू दुकानदारों को निशाना बनाकर गोलियाँ चलाई जाती थीं।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ शांति की कोशिश करने वाले सिख नेताओं को गद्दार घोषित कर मौत के घाट उतार दिया जाता था।

वह भी एक पंजाब था, जहाँ अखबारों के दफ्तर पुलिस सुरक्षा में चलते थे क्योंकि संपादक, संवाददाता, एजेंट, वितरक और यहाँ तक कि अखबार बेचने वाले हॉकर तक आतंकवादियों की हिट लिस्ट में शामिल थे।

और वह भी एक पंजाब था, जहाँ हर सुबह ड्यूटी पर निकलने वाले पुलिसकर्मी के परिवार को यह नहीं पता होता था कि वह शाम तक जीवित लौटेगा या नहीं।

आतंकवाद के शिकार कौन थे?

पंजाब आतंकवाद के पीड़ित केवल हिंदू नहीं थे और केवल सिख भी नहीं थे।

इनमें आम नागरिक थे, नेता थे, पत्रकार थे, पुलिस अधिकारी थे, सरकारी कर्मचारी थे और वे ग्रामीण भी थे जिन पर केवल इतना संदेह था कि उन्होंने सरकार की मदद की है।

इन सभी को जोड़ने वाली एक ही बात थी- या तो उन्हें उनकी पहचान के कारण चुना गया, या वे खालिस्तानी आतंकवाद की राह में बाधा बन गए।

ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही शुरू हो चुका था आतंक

आज भी बड़ी संख्या में लोग मानते हैं कि पंजाब में हिंसा की शुरुआत ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ (जिसे स्वर्ण मंदिर में भारतीय सैनिकों द्वारा चलाया गया था) के बाद हुई। जबकि तथ्य इसके बिल्कुल उलट हैं। अलगाववाद का विरोध करने वाले लाला जगत नारायण की 1981 में हत्या कर दी गई थी।

अक्टूबर 1983 में धिलवां के पास आतंकवादियों ने एक बस रोककर छह हिंदू यात्रियों को अलग किया और उन्हें गोली मार दी। अगले ही महीने कपूरथला में इसी तरह एक और बस पर हमला हुआ, जिसमें चार हिंदुओं की हत्या कर दी गई। अप्रैल 1983 में डीआईजी अवतार सिंह अटवाल की स्वर्ण मंदिर के बाहर हत्या कर दी गई। 1984 तक पुलिसकर्मियों और पत्रकारों पर लगातार हमले जारी रहे।

ये घटनाएँ स्पष्ट करती हैं कि ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही पंजाब में आतंकवाद पूरी तरह जड़ें जमा चुका था।

हालाँकि यह केवल एक संक्षिप्त झलक है। उस दौर में आतंकवाद जिस भयावह स्तर तक फैल चुका था, उसे कुछ घटनाओं में समेट पाना संभव नहीं।

जब पहचान पूछकर हिंदुओं को मौत के घाट उतारा गया

पंजाब में आतंकवाद के दौरान हुए नरसंहारों की सूची इतनी लंबी है कि उसका हर अध्याय इतिहास में अलग स्थान पाने का हकदार है।

30 नवंबर 1986 को होशियारपुर जिले के खूदा के पास हथियारबंद खालिस्तानी आतंकवादियों ने एक बस रोक दी। उन्होंने यात्रियों की पहचान पूछी और सभी हिंदू यात्रियों को नीचे उतरने का आदेश दिया। जैसे ही वे बस से नीचे उतरे, आतंकवादियों ने उन पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसा दीं।

इस हमले में 24 हिंदुओं की मौके पर ही हत्या कर दी गई, जबकि सात अन्य गंभीर रूप से घायल हुए।

Los Angeles Times की रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादियों ने पहले हिंदू यात्रियों को बाकी लोगों से अलग किया और फिर उन्हें निशाना बनाया। अखबार ने इसी वर्ष मुक्तसर के निकट हुई एक और घटना का भी उल्लेख किया, जिसमें पहले सिख यात्रियों को सुरक्षित जाने दिया गया और फिर बस में बचे यात्रियों का सामूहिक नरसंहार कर दिया गया।

ये वे लोग नहीं थे जो आतंकवादियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई मुठभेड़ में मारे गए हों। ये किसी गोलीबारी के बीच फंसे निर्दोष नागरिक भी नहीं थे। इन लोगों को केवल उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर चुना गया, अलग किया गया और योजनाबद्ध तरीके से मौत के घाट उतार दिया गया।

आरएसएस शाखा पर हमला और दहशत फैलाने की साजिश

जून 1989 में मोगा के नेहरू पार्क में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की प्रातः शाखा पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया। हथियारबंद हमलावरों ने स्वयंसेवकों पर गोलियाँ बरसाईं। इतना ही नहीं, उन्होंने घटनास्थल पर पहले से बम भी लगा रखे थे। जब पुलिस और राहत दल घायलों की मदद के लिए पहुँचे तो विस्फोट हुए और हताहतों की संख्या और बढ़ गई।

उस समय खालिस्तानी आतंकवादियों की यही कार्यप्रणाली बन चुकी थी। पहले गोलीबारी करना और फिर बचाव कार्य शुरू होने पर बम विस्फोट कर अधिक से अधिक लोगों को निशाना बनाना।

समकालीन रिपोर्टों के अनुसार इस हमले में कम से कम 24 लोगों की मौत हुई। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री ने इसे सांप्रदायिक तनाव भड़काने की सुनियोजित कोशिश बताया था। वास्तव में ऐसे अधिकांश हमलों का उद्देश्य यही था।

बसों, ट्रेनों, बाजारों और सार्वजनिक स्थलों पर हिंदुओं को निशाना बनाकर खालिस्तानी संगठन पंजाब के हिंदू समाज में भय पैदा करना चाहते थे। साथ ही वे यह भी चाहते थे कि पंजाब के बाहर सिखों के खिलाफ प्रतिशोधात्मक हिंसा भड़के, जिससे सांप्रदायिक विभाजन और गहरा हो तथा अलगाववादी राजनीति को नई ऊर्जा मिले।

इसलिए ये हत्याएँ केवल गुस्से या प्रतिशोध की घटनाएँ नहीं थीं। ये एक सुनियोजित राजनीतिक और जनसांख्यिकीय रणनीति का हिस्सा थीं।

यदि पंजाब में हुए बड़े आतंकी हमलों की सूची देखी जाए तो धिलवां, मुक्तसर, होशियारपुर, लालरू, फतेहाबाद, अबोहर, मोगा और पंजाब की ट्रेनों में हुए नरसंहार कोई अलग-अलग घटनाएँ नहीं थीं। इन सभी में एक समान पैटर्न दिखाई देता है- पहले हिंदू यात्रियों की पहचान करना, फिर उन्हें अलग करना और उसके बाद उनकी हत्या कर देना।

आज जब पंजाब उग्रवाद की कहानी दोबारा सुनाई जाती है तो बस या ट्रेन से नीचे उतारे गए उन हिंदू यात्रियों का जिक्र अक्सर गायब होता है। आतंकवादी को राजनीतिक संदर्भ मिल जाता है, पुलिस को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है, लेकिन निर्दोष यात्री केवल एक संख्या बनकर रह जाता है।

खालिस्तान का विरोध करने वाले सिख भी आतंकवादियों के निशाने पर थे

खालिस्तानी आतंकवाद कोई हिंदू और सिख के बीच हुआ संघर्ष नहीं था। इसे इस प्रकार प्रस्तुत करना इतिहास के साथ अन्याय होगा।

यदि ऐसा किया जाता है तो उन हजारों सिखों के साथ भी अन्याय होगा जिन्हें केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि उन्होंने अलगाववाद का विरोध किया, सरकार का साथ दिया या आतंकवादियों के आदेश मानने से इनकार कर दिया।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण संत हरचंद सिंह लोंगोवाल हैं। तत्कालीन शिरोमणि अकाली दल अध्यक्ष लोंगोवाल ने 24 जुलाई 1985 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ पंजाब समझौते (Punjab Accord) पर हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य राजनीतिक विवादों का समाधान निकालना और पंजाब को सामान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर वापस ले जाना था। लेकिन यह पहल खालिस्तानी आतंकवादियों को स्वीकार नहीं थी।

समझौते के एक महीने से भी कम समय बाद, 20 अगस्त 1985 को शेरपुर स्थित एक गुरुद्वारे में सभा को संबोधित करते समय लोंगोवाल की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

आज चार दशक बाद भी पंजाब की विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें शांति और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक नेता के रूप में याद करती हैं।

लोंगोवाल की हत्या ने स्पष्ट कर दिया कि सशस्त्र अलगाववादी आंदोलन किसी भी सिख नेता को नहीं बख्शेगा, चाहे वह सिख हितों की बात ही क्यों न करता हो। यदि उसने आतंकवाद का समर्थन नहीं किया या भारत के भीतर समाधान तलाशने की कोशिश की, तो उसकी हत्या तय थी।

यही खतरा आम सिखों पर भी मंडरा रहा था। जो ग्रामीण पुलिस को सूचना देते थे, उन्हें मार दिया जाता था।जिस परिवार का कोई सदस्य पुलिस में भर्ती हो जाता था, पूरा परिवार आतंकवादियों के निशाने पर आ जाता था। चुनाव लड़ने या लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी जाती थी।जो पत्रकार खालिस्तान का विरोध करते थे या आतंकवादियों के दावों पर सवाल उठाते थे, उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया जाता था।

इसलिए यह समझना बेहद आवश्यक है कि खालिस्तानी आतंकवाद की आलोचना करना सिख समुदाय की आलोचना नहीं है।

दरअसल जो लोग ‘सिख’ और ‘खालिस्तानी’ को एक ही मान लेते हैं, वे सबसे पहले उन्हीं सिखों के बलिदान को मिटा देते हैं जिन्हें खालिस्तानी आतंकवादियों ने मार डाला था।

आज भी जब अलग खालिस्तान की माँग उठती है, तब अधिकांश सिख स्वयं को उस विचारधारा का समर्थक नहीं मानते।

पत्रकारों को चुप कराने के लिए चलाई गई खूनी मुहिम

पंजाब में आतंकवाद केवल आम नागरिकों या पुलिस तक सीमित नहीं था। मीडिया भी आतंकवादियों के प्रमुख निशाने पर था। इसकी शुरुआत 1981 में हुई, जब हिंद समाचार समूह के संस्थापक और पंजाब केसरी के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई।

वे खालिस्तानी आतंकवाद के सबसे मुखर आलोचकों में थे और लगातार अलगाववाद के खिलाफ लिख रहे थे।उनकी हत्या के बाद भी आतंकवादियों का अभियान नहीं रुका। मई 1984 में उनके पुत्र और उत्तराधिकारी रोमेश चंद्र की भी हत्या कर दी गई। लेकिन यह केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं था।

संपादक, संवाददाता, समाचार एजेंट, अखबार वितरक, हॉकर- जो भी स्वतंत्र पत्रकारिता से जुड़ा था, वह आतंकवादियों की हिट लिस्ट में था।

उद्देश्य स्पष्ट था। यदि संपादक की हत्या से अखबार बंद नहीं होता, तो उसके पूरे वितरण तंत्र को आतंकित कर दिया जाए।

पत्रकारों की हत्या किसी एक अखबार या किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं थी। जो सिख लेखक, वामपंथी कार्यकर्ता या बुद्धिजीवी खालिस्तानी आतंकवाद का विरोध करते थे, वे भी आतंकवादियों के निशाने पर थे।

इसका सबसे भयावह उदाहरण ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन निदेशक एम.एल. मंचंदा का है। मई 1992 में उनका अपहरण कर लिया गया। आतंकवादी संगठन बब्बर खालसा ने मांग की कि ऑल इंडिया रेडियो अपने प्रसारणों की भाषा और शब्दावली आतंकवादियों की इच्छा के अनुसार बदले।

जब सरकार ने यह माँग अस्वीकार कर दी, तो मंचंदा का सिर धड़ से अलग कर दिया गया। बाद में उनका शव अलग-अलग हिस्सों में बरामद हुआ। Committee to Protect Journalists के अनुसार यह हत्या प्रसारकों पर आतंकवादियों द्वारा अपनी तथाकथित आचार संहिता थोपने की कोशिश का हिस्सा थी।

यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी। यह पूरे मीडिया जगत को संदेश था कि अब आतंकवादी तय करेंगे कि कौन-सी भाषा बोली जाएगी, समाचार कैसे लिखे जाएँगे और कौन-सा राजनीतिक शब्द स्वीकार्य होगा।

पत्रकारों की हत्या यह भी साबित करती है कि खालिस्तानी संगठन केवल राज्य के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष नहीं कर रहे थे। वे उन निहत्थे नागरिकों को भी मारने को तैयार थे जो उनकी विचारधारा और प्रचार का विरोध करते थे।

एक पत्रकार के हाथ में बंदूक होना जरूरी नहीं था। उसका एक लेख ही उसे आतंकवादियों का दुश्मन बना देने के लिए पर्याप्त था।

करीब 1,800 पुलिसकर्मियों ने भी दी थी जान

पंजाब उग्रवाद के अंतिम वर्षों में पंजाब पुलिस की कठोर कार्रवाई पर अक्सर लंबी बहस होती है। लेकिन जिन पुलिसकर्मियों ने इस आतंकवाद से लड़ते हुए अपनी जान गंवाई, उनकी कहानी शायद ही कभी उतनी प्रमुखता से सामने आती है।

पंजाब पुलिस के व्यापक रूप से उद्धृत आँकड़ों के अनुसार आतंकवाद के दौर में 1,784 पुलिस अधिकारी और जवान बलिगान हुए।

2016 में पंजाब पुलिस ने इन शहीदों का व्यक्तिगत रिकॉर्ड तैयार करने की पहल शुरू की। हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया था कि इतने बड़े बलिदान के बावजूद उनकी कहानियों का कोई व्यवस्थित दस्तावेज उपलब्ध नहीं था।

यह संख्या अपने आप में चौंकाने वाली है, लेकिन केवल आँकड़ा देखने से उस दौर की भयावहता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

स्वर्ण मंदिर के बाहर डीआईजी की हत्या

25 अप्रैल 1983 को पंजाब पुलिस के डीआईजी अवतार सिंह अटवाल स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने गए थे। जब वे दर्शन कर बाहर निकले, तभी आतंकवादियों ने उन्हें गोली मार दी

समकालीन रिपोर्टों के अनुसार उनका शव लंबे समय तक मंदिर परिसर के बाहर पड़ा रहा, क्योंकि मौजूद लोग भय के कारण उसके पास जाने का साहस नहीं जुटा सके।

उस समय इस घटना को केवल एक हत्या नहीं माना गया था। इसे इस रूप में देखा गया कि राज्य की सत्ता बढ़ते आतंकवाद के सामने असहाय दिखाई देने लगी थी। बाद के वर्षों में कई अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस घटना का पंजाब पुलिस के मनोबल पर गहरा असर पड़ा।

ध्यान देने वाली बात यह है कि अटवाल किसी अभियान का नेतृत्व नहीं कर रहे थे। वे किसी मुठभेड़ में भी शामिल नहीं थे। वे केवल गुरुद्वारे में मत्था टेककर बाहर निकले थे।

पुलिस मुख्यालय भी सुरक्षित नहीं था

जनवरी 1990 में जालंधर स्थित पंजाब आर्म्ड पुलिस (PAP) मुख्यालय में कमांडेंट गोबिंद राम के कार्यालय के भीतर बम विस्फोट हुआ। इस हमले में गोबिंद राम सहित चार पुलिसकर्मी मारे गए।

ऐसी घटनाएँ अपवाद नहीं थीं। कई अधिकारियों की उनके घरों के बाहर हत्या कर दी गई। कई रास्ते में घात लगाकर मारे गए। गश्त के दौरान पुलिस दलों पर हमले हुए। पुलिस चौकियों और थानों को निशाना बनाया गया। वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनके गार्ड और ड्राइवर भी मारे गए।

स्थानीय स्तर पर भर्ती किए गए स्पेशल पुलिस ऑफिसर (SPO) भी इसलिए मारे गए क्योंकि उन्होंने नियमित पुलिस बल की मदद की थी।

आतंकवादी केवल पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रहे। वे उनके परिवारों को भी धमकाते थे।

संदेश साफ था- यदि कोई पुलिस में शामिल होगा तो मौत केवल उसकी नहीं, उसके पूरे परिवार की भी हो सकती है।

ऐसे माहौल को समझे बिना पंजाब पुलिस की बाद की कार्यप्रणाली का निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

पुलिस की कार्रवाई इतनी कठोर क्यों हुई?

इन तथ्यों का अर्थ यह नहीं है कि पुलिस द्वारा किए गए हर कदम का बचाव किया जाए। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति की हत्या हुई, फर्जी मुठभेड़ हुई, गैरकानूनी हिरासत, यातना या गुप्त अंतिम संस्कार हुए, तो उनकी जाँच सबूतों के आधार पर होनी चाहिए।

जसवंत सिंह खालड़ा हत्याकांड में पुलिस अधिकारियों को सजा मिलना भी यही दिखाता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।

लेकिन एक दूसरी सच्चाई भी है। पुलिस ने कठोर कार्रवाई अचानक करनी नहीं शुरू की। 1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के दशक की शुरुआत तक पंजाब पुलिस सामान्य कानून-व्यवस्था की चुनौती का सामना नहीं कर रही थी।

उसके अधिकारी व्यवस्थित तरीके से मारे जा रहे थे। मुखबिरों और गवाहों को चुन-चुनकर खत्म किया जा रहा था। आतंकवादियों के पास आधुनिक हथियार, विस्फोटक, सुरक्षित ठिकाने और सीमा पार से समर्थन उपलब्ध था। सरकारी अधिकारियों पर सुरक्षित परिसरों के भीतर भी हमले हो रहे थे।

आतंकवादी यह भी जानते थे कि कुछ प्रतीकात्मक हत्याएँ पूरे राज्य के मनोबल को तोड़ सकती हैं। स्वर्ण मंदिर के बाहर एक डीआईजी की हत्या केवल एक अधिकारी की हत्या नहीं थी। यह हर पुलिसकर्मी के लिए संदेश था कि आतंकवादी वहाँ भी हमला कर सकते हैं, जहाँ राज्य जवाब देने से हिचकिचाता है।

एक पत्रकार की हत्या केवल एक आवाज़ को बंद करना नहीं था। यह पूरे मीडिया जगत को डराने का प्रयास था।

बस से हिंदू यात्रियों को अलग कर गोली मारना केवल कुछ लोगों की हत्या नहीं थी। यह पूरे समाज में भय और सांप्रदायिक तनाव फैलाने की रणनीति थी।

इन्हीं परिस्थितियों में पंजाब पुलिस ने आक्रामक आतंकवाद-रोधी रणनीति अपनाई- खुफिया नेटवर्क मजबूत किए गए, लगातार अभियान चलाए गए और आतंकवादी संगठनों का पीछा तब तक किया गया जब तक उनकी परिचालन क्षमता लगभग समाप्त नहीं हो गई।

इस अभियान ने आतंकवाद को तो तोड़ा, लेकिन इसके साथ-साथ पुलिस पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी लगे।

दोनों तथ्य एक साथ सही हो सकते हैं। पुलिस की कार्रवाई कठोर इसलिए हुई क्योंकि वह जिस हिंसा का सामना कर रही थी, लेकिन वह भी असाधारण रूप से क्रूर थी।

इस क्रम को समझाना पुलिस के हर कदम का समर्थन करना नहीं है। लेकिन यदि पहली सच्चाई को पूरी तरह हटा दिया जाए और केवल दूसरी को दोहराया जाए, तो वह इतिहास नहीं, बल्कि पक्षधरता बन जाती है।

कैसे ‘चुनिंदा स्मृति’ इतिहास बदल देती है

सबसे प्रभावी प्रचार हमेशा झूठ गढ़कर नहीं किया जाता। कई बार केवल कुछ घटनाओं को चुन लिया जाता है और बाकी को भुला दिया जाता है।

आतंकवादी को एक बेटे, भाई, श्रद्धालु या अन्याय के शिकार व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता है। उसकी शिकायतों को विस्तार से समझाया जाता है। उसके भाषण उद्धृत किए जाते हैं। उसकी तस्वीरें संरक्षित रहती हैं।

लेकिन पीड़ित? उसे केवल इतना कहा जाता है—”24 लोग मारे गए”, “38 लोगों की जान गई” या “15 लोग हताहत हुए।”

यह तरीका केवल खालिस्तानी प्रचार तक सीमित नहीं है। इस्लामी आतंकवाद के कई नैरेटिव में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। आतंकवादी के कट्टरपंथी बनने की प्रक्रिया पर लंबी चर्चा होती है। उसकी विचारधारा को ‘गुस्सा’, ‘हाशिए पर धकेले जाने’ या ‘प्रतिरोध’ जैसे शब्दों में प्रस्तुत किया जाता है।

सुरक्षा बलों की प्रतिक्रिया कहानी का केंद्र बन जाती है। जबकि बम धमाकों, गोलीबारी या सांप्रदायिक नरसंहारों में मारे गए निर्दोष लोग केवल शुरुआती पैराग्राफ तक सीमित रह जाते हैं। धीरे-धीरे आतंकवादी की पूरी जीवनी तैयार हो जाती है। लेकिन पीड़ित के हिस्से केवल एक संख्या बचती है।

चुनिंदा इतिहास का एक और तरीका है- राज्य की हर कार्रवाई को सामूहिक उत्पीड़न का प्रमाण मान लेना और आतंकवादी हिंसा को ऐसी प्रतिक्रिया बताना, जिसे ‘संदर्भ’ देकर समझाया जाना चाहिए।

इससे नैतिक क्रम उलट जाता है। आतंक समझने योग्य बन जाता है। जबकि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई ही सबसे बड़ा अपराध दिखाई देने लगती है।

पंजाब का इतिहास इस तरह की एकांगी व्याख्या से कहीं अधिक जटिल है। 1984 के सिख विरोधी दंगों को खालिस्तानी आतंकवाद के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। इसी प्रकार पुलिस ज्यादतियों का हवाला देकर खालिस्तानी नरसंहारों को भी नहीं भुलाया जा सकता।

जसवंत सिंह खालरा की हत्या इसलिए उचित नहीं हो जाती कि आतंकवादियों ने पुलिसवालों की हत्या की थी।और पुलिसकर्मियों की शहादत इसलिए महत्वहीन नहीं हो जाती कि कुछ अधिकारियों पर अपराध के आरोप लगे।

ईमानदारी से इतिहास में इन सभी सच्चाइयों के लिए जगह होनी चाहिए।

एक चुनिंदा फिल्म पूरा इतिहास नहीं हो सकती

‘सतलुज’ को अपने दृष्टिकोण से कहानी कहने की पूरी कलात्मक स्वतंत्रता है। यदि उसके निर्माता जसवंत सिंह खालरा, कथित पुलिस अत्याचारों और लापता लोगों के परिवारों पर केंद्रित रहना चाहते हैं, तो यह उनका अधिकार है।

लेकिन कलात्मक स्वतंत्रता किसी अधूरी कहानी को पूरा इतिहास नहीं बना देती। बस से नीचे उतारकर गोली मारा गया हिंदू यात्री भी पंजाब के इतिहास का हिस्सा है। शांति की कोशिश करने वाला वह सिख नेता भी उसी इतिहास का हिस्सा है जिसकी हत्या कर दी गई।

आतंकवाद का विरोध करने वाला वह संपादक भी पंजाब की स्मृति में दर्ज होना चाहिए जिसे इसलिए मार दिया गया क्योंकि उसने कलम नहीं झुकाई। और वह सिपाही भी, जिसका नाम आज केवल किसी पुलिस स्मारक पर दर्ज है।

फिल्म अपना पक्ष चुन सकती है। वह ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ और ‘कहानी कहने की आज़ादी’ का हवाला दे सकती है। लेकिन पत्रकारिता का दायित्व उन चेहरों को भी सामने लाना है, जो उस फ्रेम के बाहर छूट गए।

इसी उद्देश्य से OpIndia आने वाले दिनों में पंजाब आतंकवाद के उन भूले-बिसरे पीड़ितों की कहानियाँ आपके सामने लाएगा, जिनकी स्मृति धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से गायब होती जा रही है।

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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over 22 years of professional experience, including more than six years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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