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कैसी दोगलई है रवीश कुमार? CJP से लेकर ईरान-गाजा पर स्टूडियो में बैठकर चलाई जुबान, झारखंड पेपर लीक पर बोलना पड़ा तो कहा- हम कैसे कवर करेंगे

जब इस पूरे वीडियो को देखे और ध्यान से सुने, तो यह साफ हो जाता है कि झारखंड पेपर लीक केवल एक बहाना था, असली मकसद अपनी राजनीति चमकाना था… हेमंत सोरेन सरकार को बचाना और केंद्र की मोदी सरकार व बीजेपी पर निशाना साधना था। रवीश कुमार ने इस वीडियो के जरिए अपनी झेंप मिटाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनका यह प्रयास पूरी तरह से एकतरफा और प्रोपेगेंडा से भरा नजर आया।

देश की स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का दम भरने वाले यूट्यूबर रवीश कुमार एक बार फिर अपने पुराने और चुनिंदा एजेंडे के साथ कैमरे के सामने प्रकट हो गए है। मंगलवार (4 अगस्त) को ही ऑपइंडिया ने एक रवीश कुमार को लेकर आर्टिकल प्रकाशित किया था। इस लेख में ऑपइंडिया ने सीधे तौर पर सवाल उठाया था कि झारखंड में छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है, जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) पेपर लीक को लेकर युवा सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन खुद को निष्पक्ष कहने वाले रवीश कुमार झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार और कॉन्ग्रेस से सवाल पूछने से क्यों बच रहे हैं?

अपनी घिरती साख को बचाने और सफाई देने के लिए, रवीश कुमार यूट्यूब पर लगभग 30 मिनट का एक वीडियो अपलोड करते हैं। इस वीडियो का टाइटल रखा गया था ‘झारखंड JPSC: पेपर लीक, अनशन और गोदी मीडिया से सवाल’

लेकिन जब इस पूरे वीडियो को देखे और ध्यान से सुने, तो यह साफ हो जाता है कि झारखंड पेपर लीक केवल एक बहाना था, असली मकसद अपनी राजनीति चमकाना था… हेमंत सोरेन सरकार को बचाना और केंद्र की मोदी सरकार व बीजेपी पर निशाना साधना था। रवीश कुमार ने इस वीडियो के जरिए अपनी झेंप मिटाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनका यह प्रयास पूरी तरह से एकतरफा और प्रोपेगेंडा से भरा नजर आया।

रवीश कुमार की वीडियो में झारखंड का मुद्दा कम, मोदी से नफरत ज्यादा

रवीश कुमार ने अपने इस 30 मिनट के लंबे भाषण में झारखंड के छात्रों के दर्द को भुनाने की कोशिश तो की, लेकिन उनका पूरा जोर हेमंत सोरेन सरकार की खिंचाई करने के बजाय पुरानी बीजेपी सरकारों को घेरने पर रहा। जहाँ एक ओर झारखंड में जेएमएम (JMM) और कॉन्ग्रेस गठबंधन की सरकार है और उन्हीं के राज में पेपर लीक की घटनाएँ हो रही हैं, वहीं रवीश कुमार यह कहते नजर आए कि बीजेपी के पिछले शासनकाल से सबक लेना चाहिए था। यानी गलती चाहे मौजूदा सरकार की हो, लेकिन ज्ञान हमेशा बीजेपी के खिलाफ ही दिया जाएगा।

नीट (NEET) परीक्षा विवाद के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए ताबड़तोड़ वीडियो, रील और ट्वीट बनाने वाले रवीश कुमार झारखंड मामले में पूरी तरह से चुप्पी साध गए। झारखंड में जिस तरह से परीक्षाएँ बर्बाद हो रही हैं, वहाँ किसी मंत्री के इस्तीफे की माँग उनके मुँह से एक बार भी नहीं निकली। इसके बजाय वे यह ज्ञान बाँटते नजर आए कि सरकार को ‘कैसे काम करना चाहिए’।

इस पूरे मामले में रवीश कुमार का दोहरा रवैया साफ झलकता है। जब केंद्र में बीजेपी की सरकार होती है, तो वे हर छोटी-बड़ी बात पर इस्तीफे की माँग करते हैं, मंत्रियों के खिलाफ मुहिम चलाते हैं और युवाओं को भड़काने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन जब झारखंड में उनकी पसंद की INDI गठबंधन वाली सरकार है, तो वे मंत्रियों से सवाल पूछने की बजाय सिर्फ यह सलाह देते हैं कि ‘सिस्टम को कैसे सुधारा जाना चाहिए’। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उनके लिए छात्र और शिक्षा कभी मुद्दा नहीं रहे, बल्कि उनका एकमात्र लक्ष्य हर हाल में बीजेपी और केंद्र सरकार को घेरना है।

पुराना राग: पीके जोशी पर निशाना और कॉन्ग्रेस से दूरी

झारखंड के छात्रों के अनशन और प्रदर्शन पर बात करते-करते अचानक रवीश कुमार का रुख केंद्र सरकार की तरफ मुड़ जाता है। वे विषयांतर करते हुए पीके जोशी (PK Joshi) का जिक्र करने लगते हैं। रवीश कुमार ने बड़े विस्तार से बताया कि कैसे पीके जोशी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के चेयरमैन रहे और बाद में यूपीएससी (UPSC) और एनटीए (NTA) से जुड़े। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि इन नियुक्तियों के पीछे RSS या बीजेपी का हाथ था।

जब झारखंड में कॉन्ग्रेस और झामुमो (झारखंड मुक्ति मोर्चा) की सरकार है, तो रवीश कुमार ने अपनी Video में सीधे तौर पर हेमंत सोरेन या राहुल गाँधी से तीखे सवाल क्यों नहीं पूछे? वे यह कहते नजर आए कि राहुल गाँधी तो कोटा और देहरादून में रैलियाँ कर रहे हैं, लेकिन झारखंड के छात्रों को भी उनसे सवाल पूछना चाहिए। यानी उन्होंने खुद सीधे सवाल पूछने के बजाय गेंद दूसरों के पाले में डाल दी।

इसके अलावा, जब आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह से झारखंड पेपर लीक पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने झारखंड पर बात करने से बचते हुए मध्य प्रदेश और गुजरात की बात की। रवीश कुमार ने भी इस बात को ऐसे घुमाया कि जैसे केवल बीजेपी शासित राज्यों में ही सब कुछ गलत हो रहा है।

रवीश कुमार का यह अंदाज साबित करता है कि वे जानबूझकर कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगियों को बचाने का ठेका लेकर बैठे हैं। झारखंड में जब युवा सड़कों पर हैं, तो वहाँ की सरकार से जवाब माँगने के बजाय वे मध्य प्रदेश, गुजरात और संघ परिवार की पुरानी नियुक्तियों का कच्चा-चिट्ठा खोलने बैठ जाते हैं। संजय सिंह जैसे नेताओं के बयानों का बचाव करते हुए वे यह भूल जाते हैं कि जनता सब देख रही है कि कैसे एक सोची-समझी रणनीति के तहत अपने राजनीतिक आकाओं को बचाने के लिए मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है।

बार-बार… हर बार, ‘गोदी मीडिया’ का रोना रोकर खुद को बेबस बताते

रवीश कुमार हर बार की तरह इस वीडियो में भी अपनी पुरानी आदत से बाज नहीं आए और बार-बार ‘गोदी मीडिया’ का जाप करने लगे। एक तरफ वे कहते हैं कि वे हर राज्य के पेपर लीक और छात्र आंदोलन को कवर नहीं कर सकते, क्योंकि वे एक अकेले यूट्यूबर हैं और उनकी अपनी सीमाएँ हैं। लेकिन दूसरी तरफ, वे यह उपदेश देना नहीं भूलते कि मुख्यधारा की मीडिया को हर राज्य की खबर दिखानी चाहिए।

रवीश कुमार चाहे जितना भी कहें कि वे सभी मुद्दों को कवर नहीं कर सकते, लेकिन सच यह है कि सीजेपी (CJP) और तथाकथित छात्र प्रदर्शनों को उन्होंने अपने स्टूडियो में बैठकर बहुत शानदार और लंबी कवरेज दी है। सीजेपी का एक भी ऐसा मुद्दा नहीं होगा जिसे रवीश कुमार ने अपनी प्लेलिस्ट या वीडियो में छोड़ा हो। जब एजेंडे की बात आती है, तो संसाधन अपने-आप मिल जाते हैं, लेकिन जब विपक्ष की सरकारों से सवाल पूछने की बारी आती है, तो यूट्यूबर होने की लाचारी याद आ जाती है। इसके अलावा, रवीश कुमार ने गाजा-फिलिस्तीन वाले मुद्दे पर भी खूब रोटियाँ सेंकी थी, तब इनका ‘अकेले यूट्यूबर’ वाला बहाना नहीं चला था।

रवीश कुमार का यह रोना कि ‘हम अकेले यूट्यूबर हैं और सब कुछ कवर नहीं कर सकते’, पूरी तरह से एक बहानेबाजी है। जब देश में कहीं भी ऐसा मुद्दा मिल जाए जिसे घुमा-फिराकर केंद्र सरकार के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके, तब उनकी लाचारी गायब हो जाती है और वे लंबी-लंबी वीडियो बनाने लगते हैं। लेकिन जब झारखंड जैसी जगहों पर कॉन्ग्रेस समर्थित सरकार कटघरे में होती है, तो वे अपनी सीमाएँ गिनाने लगते हैं। यह दोहरी मानसिकता उनकी पत्रकारिता की पोल खोलने के लिए काफी है।

इसके अलावा, जब CJP का प्रदर्शन चल रहा था और प्रधानमंत्री ने इंस्टाग्राम पर युवाओं से वादा किया था, कि पेपर लीक से जुड़े अपराधियों और माफियाओं को सख्त सजा दी जाएगी और फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाएगा, जिससे इंसाफ जल्दी मिले। लेकिन… लेकिन… रवीश कुमार ने हेमंत सोरेन को इस बात के लिए सराहा कि उन्होंने कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। पीएम मोदी के लिए अगर ये एक शब्द अच्छे बोल देंगे तो शायद इनको मिलने वाली ‘मदद’ कही बंद ना हो जाए।

छात्र आंदोलन का फर्जी तुलना और धर्म का तड़का

प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार की जब आप वीडियो सुनते-सुनते आगे बढ़ेगे तब उनका विषय फिर झारखंड पेपर लीक से भटकर धर्म को टारगेट करने पर अटक जाएगा। रवीश कुमार ने अपनी वीडियो में यह तारीफ की कि झारखंड के छात्रों ने शांतिपूर्ण आंदोलन किया और हेमंत सोरेन सरकार ने उनके साथ ‘दिल्ली पुलिस जैसी बर्बरता’ नहीं की। लेकिन वे यह बताना भूल गए कि दिल्ली के जंतर-मंतर या अन्य जगहों पर जो तथाकथित प्रदर्शन हुए थे, उनमें वे लोग शामिल हुए थे, जिनका पढ़ाई-लिखाई से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता, केवल अपना चेहरा चमकाने के लिए और PM मोदी को गाली देने के लिए उस प्रदर्शन में आ खड़े होते हैं। CJP के प्रदर्शन में NEET छात्र कम, रीलबाज ज्यादा घूमते नजर आए थे। इसके अलावा, CJP प्रदर्शन में यदि किसी छात्र से पेपर लीक मुद्दे को लेकर या NEET की फुल-फॉर्म भी पूछ ली जाए, तो उनका मुँह नीला पड़ जाता था। जबकि झारखंड पेपर लीक मामले में असल पीड़ित और जेपीएससी/परीक्षा देने वाले छात्र मौजूद है, जो रीलबाजी करने नहीं आए है, अपने हक की लड़ाई लड़ने आए है और CJP के एजेंडे की तरह PM मोदी को गाली देने नहीं आए है।

बात जब झारखंड के प्रशासनिक सिस्टम और पेपर लीक की हो रही थी, तो अचानक बीच में रवीश कुमार ने धर्म और मुसलमानों की राजनीति का जिक्र छेड़ दिया। उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि हिंदी प्रदेशों के छात्र चुनाव के समय धर्म और मुसलमानों की नफरत में अपने असली मुद्दों (रोजगार और पेपर लीक) को भूल जाते हैं। सवाल यह उठता है कि झारखंड के पेपर लीक में अचानक धर्म और मजहब का यह तड़का लगाने की क्या जरूरत थी? साफ है कि प्रोपेगेंडा पत्रकारों को हर मुद्दे को अंततः सांप्रदायिक रंग देकर अपनी वैचारिक रोटी सेकनी होती है।

रवीश कुमार की यह आदत बन चुकी है कि वे हर गंभीर मुद्दे में जबरन धर्म और राजनीति का एंगल ले आते हैं। झारखंड के युवा न्याय माँग रहे हैं, लेकिन रवीश कुमार को उसमें भी हिंदी प्रदेशों के छात्रों को यह ताना मारने का मौका मिल जाता है कि वे चुनाव के दौरान धर्म के नाम पर वोट देते हैं। इस तरह की बयानबाजी से साफ जाहिर होता है कि वे छात्रों के हमदर्द कम और एक खास वैचारिक एजेंडे के प्रचारक ज्यादा हैं, जो हर बात को अपनी राजनीतिक चश्मे से ही देखते हैं।

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विशेषता
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मीडिया में 7+ वर्षों का सफर। ETV भारत, इंडिया न्यूज़, सुदर्शन न्यूज़, MH1 और दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य किया। डेस्क, ग्राउंड रिपोर्टिंग, एंकरिंग और सोशल मीडिया, हर प्लेटफॉर्म पर सक्रिय भूमिका निभाई। वर्तमान में ऑपइंडिया के साथ जुड़ी हूँ।

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