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प्रेस फ्रीडम का पीटता है ढोल, लेकिन जर्नलिस्ट की कब्रगाह बना पाकिस्तान: बलूचिस्तान में 42 पत्रकारों की मौत, POK में जुल्म दिखाने पर मीडिया पर पहरा

दुनिया के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत से ऊपर होने के बावजूद पाकिस्तान ने विदेशी पत्रकारों पर नई पाबंदियाँ लगाईं, जिससे बलूचिस्तान और POK की रिपोर्टिंग पर सवाल उठे।

दुनिया के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भले ही पाकिस्तान भारत से चार पायदान ऊपर दिखाई देता हो, लेकिन जमीन पर तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। बलूचिस्तान में पत्रकारों की हत्याएँ, जबरन गायब किए जाने के आरोप, POK में मीडिया पर कार्रवाई और अब विदेशी पत्रकारों के लिए सख्त एनओसी व्यवस्था ने पाकिस्तान की प्रेस की आजादी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इसी बीच बलूचिस्तान के जाफराबाद जिले में स्थानीय पत्रकार नजर मुहम्मद कनरानी की हालिया गोली मारकर हत्या कर दी, जिसके बाद बहस और तेज हो गई है कि पाकिस्तान में पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र रिपोर्टिंग कितनी गंभीर चुनौती बन चुकी है।

अब इस्लामाबाद, लाहौर और कराची को छोड़कर पाकिस्तान के किसी भी दूसरे हिस्से में रिपोर्टिंग करने से पहले विदेशी पत्रकारों को सरकार से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) लेना होगा।

ऐसे समय में यह फैसला आया है जब पाकिस्तान पहले से ही बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में मानवाधिकार उल्लंघन, इंटरनेट बंदी, प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई और पत्रकारों पर हमलों को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना झेल रहा है।

आलोचकों का कहना है कि यह कदम सुरक्षा के नाम पर नहीं, बल्कि उन इलाकों की सच्चाई दुनिया से छिपाने के लिए उठाया गया है।

विदेशी पत्रकारों के लिए क्या बदले नए नियम?

पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फॉरेन मीडिया फैसिलिटेशन गुइडेलीनेस 2026 जारी की हैं। इन नियमों के तहत अब विदेशी मीडिया संस्थानों, पत्रकारों, फ्रीलांसरों, डॉक्यूमेंट्री बनाने वालों, प्रोडक्शन हाउस, फिक्सर, अनुवादकों और विदेशी मीडिया के लिए काम करने वाले पाकिस्तानी नागरिकों तक को सरकारी पंजीकरण कराना होगा।

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि विदेशी पत्रकार अब केवल इस्लामाबाद, लाहौर और कराची में बिना अतिरिक्त अनुमति के काम कर सकेंगे। यदि उन्हें बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, सिंध के दूरदराज इलाकों या पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जाना है तो पहले सरकार से NOC लेना होगा।

यह नियम केवल न्यूज रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं है। किसी भी तरह की वीडियो शूटिंग, डॉक्यूमेंट्री, सोशल मीडिया कंटेंट या किसी विशेष इलाके में जाकर जानकारी जुटाने के लिए भी सरकारी मंजूरी जरूरी होगी। यहाँ तक कि विदेशी पत्रकार यदि एबटाबाद या मुरी घूमने भी जाना चाहें तो उन्हें पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ेगी।

नई व्यवस्था में दो तरह की मान्यताएँ भी तय की गई हैं। एक स्थायी वार्षिक मान्यता, जो पाकिस्तान में लगातार काम करने वाले विदेशी पत्रकारों के लिए होगी, जबकि दूसरी तीन महीने तक की अस्थायी मान्यता होगी, जो बाहर से आने वाले पत्रकारों को दी जाएगी।

सबसे विवादित बात यह है कि सरकार किसी भी समय किसी पत्रकार की मान्यता रद्द कर सकती है यदि उसे लगे कि उसकी रिपोर्टिंग पाकिस्तान की विचारधारा, संप्रभुता, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ है। इन शब्दों की स्पष्ट कानूनी परिभाषा भी नहीं दी गई है, जिससे अधिकारियों को व्यापक अधिकार मिल जाते हैं।

बलूचिस्तान में पत्रकारिता बन चुकी है जान जोखिम में डालने जैसा काम

पाकिस्तान का बलूचिस्तान लंबे समय से हिंसा, जबरन गायब किए जाने, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और अलगाववादी संगठनों की गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ पत्रकारों के लिए सच्चाई सामने लाना किसी युद्ध क्षेत्र में काम करने से कम नहीं माना जाता।

बलूचिस्तान यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (BUJ) के अनुसार साल 2008 से 2026 के बीच 42 पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन मामलों में किसी भी आरोपित को सजा नहीं मिली।

कई पत्रकारों ने अपनी पहचान छिपाकर बताया कि उन्हें लगातार धमकियाँ मिलती रहती हैं। एक पत्रकार ने बताया कि उसे फोन पर कहा गया, “अगर तुम पत्रकारिता में नए हो तो शायद तुम्हें ताबूत की जरूरत पड़ेगी। बता दो, हम पहले ही भेज देते हैं।”

ऐसी धमकियों के बाद कई पत्रकार पुलिस तक भी नहीं जाते क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं कि उनकी सुरक्षा होगी। कई मामलों में पत्रकारों की हत्या के बाद FIR तक दर्ज नहीं हुई।

पत्रकार अब्दुल लतीफ बलोच का मामला इसका बड़ा उदाहरण है। मई 2025 में कुछ हथियारबंद लोग आधी रात उनके घर पहुँचे। परिवार ने उन्हें बाहर जाने से रोका, लेकिन हमलावरों ने वहीं गोलियाँ चलाकर उनकी हत्या कर दी। एक साल से ज्यादा समय गुजरने के बाद भी इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

बलूचिस्तान के कई जिलों में पत्रकारों को केवल सुरक्षा बलों या सरकार से ही नहीं, बल्कि उग्रवादी संगठनों और स्थानीय प्रभावशाली लोगों से भी खतरा रहता है। ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग असंभव हो जाती है।

जबरन गायब करना, इंटरनेट बंदी और सेंसरशिप से दबाई जा रही आवाजें

बलूचिस्तान में लोगों को जबरन उठाकर गायब कर देना सालों से सबसे बड़ा मानवाधिकार मुद्दा रहा है। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि कई नागरिकों को सुरक्षा एजेंसियाँ हिरासत में ले जाती हैं और परिवारों को महीनों या वर्षों तक उनकी कोई जानकारी नहीं मिलती।

कुछ लोग लंबे समय बाद गंभीर शारीरिक यातना के निशानों के साथ वापस लौटते हैं, जबकि कई लोगों के शव सुनसान इलाकों में मिलते हैं। इन शवों पर गोली और यातना के निशान होने के आरोप भी बार-बार सामने आते रहे हैं।

इन्हीं मुद्दों को उठाने वाली डॉक्टर महरंग बलोच और उनकी संस्था बलोच यकजेहती कमेटी (BYC) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रही हैं। उन्होंने जबरन गायब किए गए लोगों और मानवाधिकार उल्लंघनों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किए।

उनके परिवार पर भी पहले हमला हुआ था और उनके पिता की मौत भी ऐसे ही एक मामले से जुड़ी बताई जाती है। अब उन्हें भी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है, जिसे लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं।

सेंसरशिप केवल धमकियों तक सीमित नहीं है। कई इलाकों में सालों से इंटरनेट सेवाएँ बंद हैं। पंजगुर में मोबाइल इंटरनेट लंबे समय से प्रभावित रहा, जबकि डेरा बुगती में भी 3जी और 4जी सेवाएँ लंबे समय तक बंद रहने की खबरें सामने आती रही हैं। इंटरनेट बंद होने का सबसे बड़ा असर पत्रकारों पर पड़ता है क्योंकि वे अपनी रिपोर्ट समय पर भेज ही नहीं पाते।

कई स्थानीय मीडिया संस्थान सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हैं। ऐसे में सरकार के खिलाफ खबरें प्रकाशित करना उनके लिए आर्थिक जोखिम भी बन जाता है। यही कारण है कि कई पत्रकार केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्तियाँ प्रकाशित करने तक सीमित रहने को मजबूर हो जाते हैं।

POK में विरोध प्रदर्शनों के बाद बढ़ी सख्ती, दुनिया उठा रही सवाल

विश्लेषकों का मानना है कि विदेशी मीडिया पर नई पाबंदियों का समय बेहद महत्वपूर्ण है। हाल के महीनों में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में चुनाव, प्रदर्शन और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने रिपोर्ट प्रकाशित की थीं।

मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया, कई जगह इंटरनेट सेवाएँ बंद की गईं और पत्रकारों की रिपोर्टिंग में बाधाएँ डाली गईं। इन्हीं घटनाओं के बाद पाकिस्तान ने विदेशी मीडिया की गतिविधियों पर और ज्यादा नियंत्रण स्थापित कर दिया।

कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कार्रवाई भी हुई। पाकिस्तान ने कुछ रिपोर्टों को एंटी-स्टेट प्रोपेगेंडा और येलो जर्नलिज्म बताते हुए उनके प्रसारण पर रोक लगाने जैसे कदम उठाए।

एमनेस्टी इंटरनेशनल, कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने बार-बार पाकिस्तान से प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने, पत्रकारों की सुरक्षा बढ़ाने और मानवाधिकार उल्लंघनों की निष्पक्ष जाँच कराने की माँग की है।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स का कहना है कि पाकिस्तान दुनिया के उन देशों में शामिल है जहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता करना सबसे अधिक जोखिम भरा है। संगठन के अनुसार जो पत्रकार सेना या सुरक्षा प्रतिष्ठान की आधिकारिक लाइन से अलग रिपोर्टिंग करते हैं, उन्हें निगरानी, हिरासत, धमकी और हमलों का सामना करना पड़ सकता है।

इसी वजह से विशेषज्ञ मानते हैं कि विदेशी पत्रकारों के लिए नई NOC व्यवस्था केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह उन इलाकों तक स्वतंत्र मीडिया की पहुँच सीमित करने वाला कदम भी साबित हो सकता है, जहाँ पहले से मानवाधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल उठते रहे हैं।

पाकिस्तान सरकार इन नियमों को प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है, लेकिन जिस समय इन्हें लागू किया गया है और जिस तरह विदेशी पत्रकारों की गतिविधियों को सरकारी अनुमति से जोड़ दिया गया है, उससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस तेज हो गई है कि क्या पाकिस्तान संवेदनशील क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति दुनिया से छिपाने की कोशिश कर रहा है।

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विवेकानंद मिश्र
विवेकानंद मिश्र
एक पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर। राजनीति, संस्कृति, समाज से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध।

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