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जंतर-मंतर पर ‘बेटी चुप कराओ’, झारखंड में बेटियों का जिक्र तक नहीं: दो प्रदर्शनों में ‘द वायर’ का दो एजेंडा, केंद्र पर सवाल तो सोरेन सरकार पर सूख गई स्याही?

जब मामला केंद्र सरकार या भाजपा शासित राज्यों से जुड़ा होता है, तो 'द वायर' महिलाओं, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर सरकार को घेरने की पूरी कोशिश करते हैं। लेकिन जब विपक्षी दलों या उनकी पसंद की सरकारों द्वारा जनता और छात्रों पर अत्याचार किए जाते हैं, तो वे सारी बातें छुपा लेते हैं और सरकार के हित में खबरें परोसते हैं।

‘द वायर’ (The Wire) की पत्रकारिता हमेशा से उसके खास राजनीतिक एजेंडे और पक्षपातपूर्ण रवैये के लिए जानी जाती रही है। हाल ही में ‘द वायर’ ने देश के दो अलग-अलग राज्यों (दिल्ली और झारखंड) के प्रदर्शनों पर दो अलग-अलग लेख (Article) छापे है, जिसमें दोहरा चरित्र पूरी तरह उजागर होता दिखाई दे रहा है। जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का विरोध प्रदर्शन 20 जुलाई को शुरु हुआ था और 1 हफ्ते में प्रदर्शन बंद हो गया। 2 हफ्ते बाद ‘द वायर’ (The Wire) ने केंद्र सरकार और महिलाओं की स्थिति पर लंबा-चौड़ा ज्ञान परोस दिया है।

वहीं, दूसरी तरफ झारखंड में भी पेपर लीक मामले को लेकर छात्रों का विरोध प्रदर्शन अभी जारी है और इस पर ‘द वायर’ (The Wire) ने हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ हुए प्रदर्शनों में पुलिसिया बर्बरता और महिलाओं के अपमान पर कोई ऐसी बात नहीं छापी, जिससे उनकी गलत छवि लोगों में जाए और बर्बरता पर पूरी तरह चुप्पी साध ली। यह साफ तौर पर दिखाता है कि ‘द वायर’ निष्पक्ष पत्रकारिता करने के बजाय चुनिंदा मुद्दों पर प्रोपेगेंडा फैलाने का काम कर रहा है।

जंतर-मंतर के मामले में ‘महिलाओं’ का सहारा लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा

‘द वायर’ ने 10 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को लेकर एक लेख छापा, जिसे बंद हुए लगभग 15 दिन हो चुके है। इस लेख का शीर्षक, “बेटी पढ़ाओ, बेटी चुप कराओ: जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन के बाद महिलाओं को कैसे निशाना बनाया गया” (Beti Padhao, Beti Chup Karao: How Women Were Targeted After the Jantar Mantar Protests) था। इस लेख में दावा किया गया कि प्रदर्शन खत्म होने के बाद महिलाओं और लड़कियों को सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जा रहा है।

‘द वायर’ ने लेख में लिखा कि महिलाओं को डॉक्सिंग, धमकियों और पुलिस मामलों का सामना करना पड़ रहा है। ‘द वायर’ ने इसमें केंद्र सरकार को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराया और कहा कि राज्य सरकार और सोशल मीडिया नेटवर्क मिलकर महिलाओं को चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं। पोर्टल ने यह साबित करने की कोशिश की कि इस पूरी प्रक्रिया में केवल महिलाओं और लड़कियों को ही निशाना बनाया जा रहा है ताकि वे भविष्य में कभी आवाज न उठाएँ।

झारखंड के प्रदर्शन में महिलाओं और लड़कियों के जिक्र से पूरी तरह परहेज

इसके विपरीत, 10 अगस्त को ही ‘द वायर’ ने झारखंड विधानसभा के बाहर हुए प्रदर्शन पर एक दूसरा लेख छापा जिसका शीर्षक, “झारखंड विधानसभा के बाहर छात्रों का धरना-प्रदर्शन, कांग्रेस ने पुलिस की कार्रवाई की निंदा की, ‘Students Hold Sit-in Protest Outside Jharkhand Assembly, Congress Condemns Police Action’ था।

इस लेख में झारखंड के छात्रों और युवाओं के प्रदर्शन का जिक्र तो किया गया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसमें एक बार भी महिलाओं या लड़कियों के शामिल होने का कोई जिक्र नहीं किया गया। जबकि इस आंदोलन में भी भारी संख्या में छात्राएँ और महिलाएँ शामिल थीं। ‘द वायर’ (The Wire) ने इस बात को पूरी तरह से छुपा लिया ताकि वहाँ की राज्य सरकार (कॉन्ग्रेस) पर कोई आंच न आ सके और महिलाओं के नाम पर सहानुभूति बटोरने वाला उनका एजेंडा एक्सपोज न हो जाए।

दो हफ्ते बाद भी ‘जंतर-मंतर’ मुद्दे पर अटकी सुई, जानें लेख में क्या-क्या लिखा

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को खत्म हुए दो हफ्ते से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन ‘द वायर’ की सुई अभी भी वहीं अटकी हुई है। इस लेख के जरिए उन्होंने यह साबित करने की पूरी कोशिश की कि केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म मिलकर महिलाओं और लड़कियों को जानबूझकर निशाना बना रहे हैं। ‘द वायर’ इस पूरे घटनाक्रम को इस तरह पेश कर रहा है जिससे आम जनता के मन में सरकार और कानून व्यवस्था के प्रति संदेह पैदा हो और एक झूठा डर का माहौल दिखाया जा सके।

‘द वायर’ ने अपने लेख में यह दावा किया है कि जंतर-मंतर का प्रदर्शन 25 जुलाई को खत्म होने के बाद भी महिलाओं के खिलाफ कार्रवाई रुकी नहीं, बल्कि उसका दूसरा चरण शुरू हुआ। लेख में आरोप लगाया गया कि सोशल मीडिया के जरिए महिलाओं और लड़कियों की क्रॉप की गई या एआई (AI) से बनाई गई तस्वीरें शेयर की गईं। इसमें ‘द जयपुर डायलॉग्स’ (The Jaipur Dialogues) जैसे सोशल मीडिया हैंडल्स का नाम घसीटते हुए यह प्रोपेगेंडा फैलाया गया कि वे महिलाओं के घर का पता और कॉलेज सार्वजनिक करने की माँग कर रहे थे।

‘द वायर’ ने महाराष्ट्र साइबर अथॉरिटी के आँकड़ों का हवाला देकर यह दिखाने की कोशिश की कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर महिलाओं को डराने के लिए एक बहुत बड़ा सुनियोजित षड्यंत्र चल रहा है, ताकि महिलाएँ भविष्य में कभी अपनी आवाज न उठा सकें। लेख में आगे दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को बेहद नकारात्मक तरीके से पेश किया गया है। ‘द वायर’ ने इस बात का जिक्र किया कि दिल्ली पुलिस ने आपत्तिजनक और भड़काऊ कंटेंट को लेकर एफआईआर दर्ज की और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) से उन पोस्ट्स को हटाने की माँग की। लेकिन ‘द वायर’ इसे कानून का पालन करने की बजाय महिलाओं को चुप कराने का हथियार बता रहा है। वे यह नैरेटिव गढ़ रहे हैं कि सरकार और पुलिस मिलकर काम कर रहे हैं ताकि सार्वजनिक जीवन में सवाल पूछने वाले हर व्यक्ति को दबाया जा सके। इस तरह की बातें लिखकर वे लोगों के मन में यह भ्रम पैदा कर रहे हैं कि देश में न्याय व्यवस्था और पुलिस केवल सरकार के इशारे पर काम कर रही है।

15 साल की लड़की के मामले को आधार बनाकर सहानुभूति बटोरने का हथकंडा

‘द वायर’ ने अपने लेख में एक 15 साल की नाबालिग लड़की के मामले को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है। लेख में बताया गया कि जंतर-मंतर के वायरल वीडियो के बाद उस लड़की के खिलाफ बीएनएस (BNS) की धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ था, जिसे बाद में वापस भी ले लिया गया। लड़की का हाथ जोड़कर माफी माँगने वाला वीडियो सामने आने के बाद ‘द वायर’ ने इसे सामाजिक शर्मिंदगी और ऑनलाइन दबाव का नतीजा बताया।

इसके बहाने उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान को भी बीच में घसीटा जिसमें उन्होंने बेटियों द्वारा अपशब्द कहे जाने को ‘कल्चर शॉक’ कहा था। ‘द वायर’ ने इसमें भी लिंगभेद का मुद्दा उठाकर यह सवाल खड़ा किया कि बेटों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। लेख में यह तर्क दिया गया है कि अगर कोई पुरुष सार्वजनिक रूप से अपशब्द बोलता है तो उस पर कोई सामाजिक कार्रवाई नहीं होती, लेकिन महिला के ऐसा करने पर पूरा समाज और परिवार उसके खिलाफ हो जाता है।

वे यह भ्रम फैला रहे हैं कि इस तरह की घटनाओं से देश की हर लड़की और महिला के मन में डर पैदा हो रहा है ताकि परिवार उन्हें प्रदर्शनों में जाने से रोक सके। इस तरह वे पूरे मामले को ‘महिलाओं की अभिव्यक्ति की आजादी’ का नाम देकर एकतरफा सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहे हैं।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना को घसीटकर राजनीतिक वार करना

‘द वायर’ का यह लेख केवल प्रदर्शन या पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह केंद्र सरकार की लोकप्रिय योजना ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ पर भी बेबुनियाद सवाल उठाता है। लेख में पुराने संसदीय आँकड़ों का हवाला देकर यह दिखाने की कोशिश की गई है कि योजना का ज्यादातर हिस्सा केवल प्रचार पर खर्च हुआ है।

इसके बाद उन्होंने NEET-UG 2026 में महिलाओं की हिस्सेदारी के आँकड़ों को बीच में लाकर एक अजीबोगरीब वैचारिक सवाल खड़ा किया। लेख में लिखा, “NEET-UG 2026 के लिए रजिस्ट्रेशन कराने वालों में लगभग 58% और क्वालिफ़ाई करने वाले उम्मीदवारों में करीब 59% महिलाएँ थीं, यानी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के क्वालिफ़ाई करने की दर ज़्यादा रही। जब उनमें से कुछ लोग परीक्षा प्रणाली की माँग करने के लिए सड़कों पर उतरे तो उनकी माँग पर ध्यान देने के बजाय उनके तौर-तरीकों पर सवाल उठाए गए। द वायर ने पूरे लेख में ये कहीं जिक्र नहीं किया है कि महिलाओं-लड़कियों ने किस तरह की भाषा का इस्तेमाल प्रदर्शन में किया था और PM मोदी को अभद्र गाली दी गई थी। ये भी जिक्र नहीं किया कि जो लोग प्रदर्शन के नाम पर हल्ला करने और उत्पात मचाने के लिए आए थे, उन्होंने एक बार में अपना मुद्दा साफ तरह से नहीं रखा, वहाँ का फोकस केवल पुलिस के साथ झड़प करना, फ्री में बर्गर-पिज्जा ठूँसना था।

अब झारखंड वाले लेख को उसी नजर से देखना जरूरी है

दूसरा लेख भी प्रदर्शन पर है। यहाँ छात्र करीब दो सप्ताह से आंदोलन कर रहे थे। 10 अगस्त को वे झारखंड विधानसभा की ओर बढ़े। सरकार ने कड़ी सुरक्षा लगाई थी। निगरानी के लिए ड्रोन लगाए गए थे। छात्र कई बैरिकेड पार करके विधानसभा तक पहुँचे। रिपोर्ट में पानी की बौछार, आँसू गैस और लाठी के इस्तेमाल का जिक्र है। एक प्रदर्शनकारी के घायल होने और अस्पताल पहुँचाए जाने की बात भी है। एक अन्य युवक के सिर में चोट लगने की सूचना दी गई है।

रिपोर्ट में पत्थरबाजी और कई लोगों के घायल होने की खबर भी है। यहाँ पुलिस और छात्रों के बीच पूरे दिन टकराव की बात लिखी गई है। आंदोलन के नेता देवेंद्र नाथ महतो दस दिन से भूख हड़ताल पर थे। विधानसभा की ओर मार्च के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। इतनी बातें होने के बावजूद रिपोर्ट का शीर्षक मुख्य रूप से छात्रों के धरने और कॉन्ग्रेस की पुलिस कार्रवाई की निंदा पर केंद्रित है।

झारखंड में पुलिस की कार्रवाई का जिक्र है, लेकिन भाषा का फर्क साफ है

झारखंड वाली रिपोर्ट में पुलिस के बल प्रयोग का जिक्र जरूर है। लेकिन रिपोर्ट में पुलिस का पक्ष भी साथ रखा गया है। राँची पुलिस ने ‘द हिंदू’ से कहा कि भीड़ को हटाने के लिए बल प्रयोग हुआ था। हालाँकि पुलिस ने इसे लाठीचार्ज कहने से इनकार किया। पुलिस अधिकारी ने इसे ‘reactionary’ यानि प्रतिक्रियावादी बताया।

कुछ पुलिस अधिकारियों के हवाले से यह भी बताया गया कि उन्हें प्रदर्शनकारी युवाओं के खिलाफ बल इस्तेमाल नहीं करने के सख्त निर्देश दिए गए थे। यानी यहाँ रिपोर्ट ने पुलिस की सफाई को विस्तार दिया। यह पत्रकारिता के लिहाज से जरूरी भी है। लेकिन सवाल यह है कि दिल्ली वाले लेख में इसी तरह केंद्र या दिल्ली पुलिस का पक्ष कितनी प्रमुखता से रखा गया?

दोनों लेखों को साथ पढ़ने पर यही अंतर दिखाई देता है। दिल्ली वाले लेख में सरकारी कार्रवाई को व्यापक दमन के फ्रेम में रखा गया। झारखंड वाले लेख में पुलिस कार्रवाई के साथ पुलिस का स्पष्टीकरण भी प्रमुखता से आया।

झारखंड में महिलाएँ और लड़कियाँ कहाँ गायब हो गईं?

यह दोनों लेखों के बीच सबसे दिलचस्प अंतर है। पहले लेख की पूरी संरचना महिलाओं और लड़कियों पर आधारित है। शीर्षक में ही ‘Women Were Targeted’ लिखा गया है। लड़की की उम्र, उसके खिलाफ हुई कार्रवाई, सोशल मीडिया पर महिलाओं की तस्वीरें और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे लेख के केंद्र में हैं।

लेकिन झारखंड वाले प्रदर्शन में भी छात्र आंदोलन कर रहे थे। दिए गए कंटेंट में हजारों छात्रों के प्रदर्शन, पुलिस कार्रवाई, पानी की बौछार, आँसू गैस और लाठीचार्ज की चर्चा है। ऐसे बड़े छात्र आंदोलन में महिलाओं और लड़कियों की मौजूदगी अगर थी, तो उस पहलू को रिपोर्ट में प्रमुखता नहीं मिली।

यही तुलना सवाल खड़ा करती है। अगर महिला प्रदर्शनकारी होना अपने आप में एक महत्वपूर्ण पत्रकारिता का मुद्दा है, तो यह महत्व केवल उस आंदोलन में क्यों दिखाई देता है, जहाँ निशाना केंद्र सरकार पर बनता है?

झारखंड वाले लेख में सरकार का पक्ष ज्यादा जगह पाता है

झारखंड की रिपोर्ट में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का बयान विस्तार से दिया गया है। सोरेन ने छात्रों को भरोसा दिया कि सरकार उनकी चिंताओं पर कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में छात्रों को अपनी बात रखने का अधिकार है। साथ ही उन्होंने अपनी प्रशासन और पुलिस की तारीफ करते हुए कहा कि स्थिति को संयम और जिम्मेदारी से संभाला गया।

उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष के कुछ लोग राजनीतिक लाभ के लिए माहौल खराब करने और छात्रों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके बाद सरकार की ओर से परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, तकनीक आधारित, सुरक्षित और जवाबदेह बनाने की बात भी रिपोर्ट में रखी गई है। इस तरह पाठक को सरकार का बचाव और सरकार की ओर से किए गए प्रस्ताव दोनों मिलते हैं।

दिल्ली वाले लेख में ऐसा संतुलन उतनी प्रमुखता से नहीं दिखाई देता। वहाँ सरकार की भूमिका मुख्य रूप से कार्रवाई करने वाले पक्ष के रूप में सामने आती है।

झारखंड में कॉन्ग्रेस और विपक्ष की प्रतिक्रिया भी विस्तार से आई

झारखंड वाले लेख में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी का बयान भी दिया गया है। उन्होंने छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग को गलत बताया और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की बात कही। कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे के बयान का भी जिक्र है। उन्होंने छात्रों के आंदोलन को युवाओं में असंतोष का संकेत बताया और बातचीत की जरूरत पर जोर दिया।

झारखंड की मंत्री दीपिका सिंह का बयान भी शामिल है। उन्होंने कहा कि प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठा रहा है और लाठीचार्ज, आँसू गैस या पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं होगा। यानी दूसरे लेख में सरकार, विपक्ष, पुलिस और आंदोलनकारी सभी पक्षों को जगह दी गई है।

निष्पक्षता का ढोंग करने वाले ‘द वायर’ का असली एजेंडा

यह साफ तौर पर दिखाई देता है कि ‘द वायर’ की पत्रकारिता में दोहरे मापदंड साफ तौर पर काम कर रहे हैं। जब मामला केंद्र सरकार या भाजपा शासित राज्यों से जुड़ा होता है, तो वे महिलाओं, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर सरकार को घेरने की पूरी कोशिश करते हैं।

लेकिन जब विपक्षी दलों या उनकी पसंद की सरकारों द्वारा जनता और छात्रों पर अत्याचार किए जाते हैं, तो वे सारी बातें छुपा लेते हैं और सरकार के हित में खबरें परोसते हैं। झारखंड के मामले में पुलिस की कमियों को छिपाना और महिलाओं के संघर्ष का जिक्र तक न करना इस बात का पक्का सबूत है कि ‘द वायर’ सिर्फ और सिर्फ एक खास राजनीतिक एजेंडे के तहत काम कर रहा है।

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