जनवरी की वो काली और ठंडी रात, जब हवाओं में नार-ए-तकबीर- अल्लाहू अकबर के नारे गूँज रहे थे और एक भीड़ भयानक गोलीबारी कर रही होती है। गोलीबारी करते करते लगभग आधी रात बीत जाती है और जब वो भीड़ गोलीबारी से बोर हो जाती है तो पहुँच जाती है पास के ही एक हिंदू मंदिर में और पहले मूर्तियाँ तोड़ती है और फिर वहाँ रखे हुए धर्मग्रंथों को जलाने लगती है। और फिर मंदिर पर आक्रमण कर देती है।
इसके बाद भीड़ मंदिर के पुजारी को घसीटकर ले आती है और उनके हाथ- पैर रस्सियों से बाँधकर एक पेड़ से उनको उल्टा लटका देती है। पुजारी की चीखें हवाओं में गूँजती रहती हैं साथ में गूँज रही होती है पिशाचों की डरावनी हंसी।
धर्मग्रंथ आग में जल रहे होते हैं और मंदिर के ठीक सामने पेड़ से टंगा हुआ पुजारी तिल-तिल तड़पता हुआ मरता जाता है। वो भीड़ शैतानों की तरह नाचती रहती है और हवा में गूँजता रहता है- अल्लाहू अकबर, अल्लाहू अकबर…
ये घटना भारत के उस इलाके की कोई अकेली घटना नहीं थी। लगभग 15 साल तक ये सबकुछ चला.. कई मंदिर तोड़े गए, कई पुजारियों का ऐसे ही कत्लेआम किया गया। यहाँ तक कि सरकारी कर्मचारियों और सैनिकों को भी बर्बरता से मौत के घाट उतारा गया।
साथ ही इस क़ौम पर अंधा विश्वास करने वाले उस इलाके के एक सेक्युलर हिंदू राजा को अपनी गद्दी तक छोड़नी पड़ी। हिंदू 15 साल तक सबकुछ सहते रहे लेकिन इस बार हिंदुओं ने ऐसा पलटवार किया जो जिहादियों की उम्मीदों से परे था।
क्या आप जानते हैं कि ये पैशाचिक कृत्य भारत के किस हिस्से में हो रहा था? आपको लग रहा होगा कि ये बात आज से 30 साल पहले के कश्मीर या आजादी के समय के हैदराबाद या जूनागढ़ की है? नहीं… ये सबकुछ दिल्ली से एकदम सटे हुए क्षेत्र मेवात में हो रहा था।
अभी हमने जो घटना बताई, वो घटना है अलवर के गोविन्दगढ़ गाँव की। पर गोविन्दगढ़ गाँव में उस रात जो कुछ भी हो रहा था वो तो बस एक ट्रेलर था। अब सवाल उठता है कि कौन थे ये पैशाचिक कृत्य को करने वाले और क्या था उनका मक़सद?
ये शुरुआत थी उस खौफनाक षड्यन्त्र की जिसके तहत मेवात के मेव मुसलमान एक स्वतंत्र देश मेविस्तान बनाने के लिए जिहाद छेड़ने जा रहे थे। और ये सब करीब 15 सालों तक चला क्योंकि मेवों को लगा कि जैसे हिंदुओं के नरसंहार के नाम पर काँग्रेस को ब्लेकमेल करके मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान छीन लिया ठीक वैसा ही करके वो भी अलग मेविस्तान बना लेंगे।
लेकिन काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। अपने इस दुस्साहस की मेव मुसलमानों को ऐसी कीमत चुकानी पड़ी जिसे वो आज तक नहीं भूल पाए हैं। जो मेव मुसलमान मेविस्तान का सपना लेकर रायफलों और तलवारों के साथ सड़कों पर कूदे थे उन्हें अपनी फटी हुई लुंगियों के साथ अलवर और भरतपुर से भागना पड़ा।
इस वीडियो में हम बात करेंगे मेविस्तान के षड्यन्त्र की और बात करेंगे जिहादियों को सिखाए गए उस सबक की जिसके बाद अलवर रियासत के प्रधानमंत्री नारायण भास्कर खरे ने कहा था कि “अलवर में अब शांति है क्योंकि यहां एक भी मेव मुसलमान नहीं बचा है।”
ये साल 1933 की बात है, यानी की स्वतंत्रता से लगभग 14-15 साल पहले की। उस समय अलवर में जयसिंघ राजा का शासन हुआ करता था। स्वाभाविक सी बात है की किसी भी राजा को अपने प्रदेश की इकॉनमी सुयोजित तरीके से चलाने के लिए और जनता की सुख सुविधा और सुरक्षा की पूर्ति करने के लिए धन चाहिए।
और ये धन का ज़्यादातर हिस्सा व्यापर और कुछ हिस्सा टैक्स से आता है। दूसरे राजाओं की तरह राजा जय सिंह ने भी अपने प्रदेश अलवर के लिए भी यही व्यवस्था सुयोजित करी थी। टैक्स कम था या अधिक यह एक अलग विषय है लेकिन इस्लामी आक्रांताओं की तरह अलवर के राजा का टैक्स कोई जज़िया नहीं था।
मुसलमानों को जितना टैक्स चुकाना था उतना ही हिंदुओं को भी चुकाना था। राज्य के सभी लोग अपने राज्य के नियम कानून के अनुसार टैक्स देते भी थे। पर जैसे ही कौमी उन्माद मेवात के मोमिनों में बढ़ने लगा वैसे ही, चीज़ें बदलने लगी। मेवात में मुसलमानों ने राज्य को टैक्स देना ही बंद कर दिया।
टैक्स का बहाना बनाकर वो लोग एक ऐसी साजिश रचने जा रहे थे जिसका किसी को भी आभास नहीं था। ये लोग जानते थे बकाया टैक्स वसूलने के लिए राजा जयसिंघ अपने अधिकारियों को ज़रूर भेजेंगे। और इसीलिए अलवर के 70 से भी अधिक गाँवों के हजारों मेव मुसलमान कुछ ऐसा करने जा रहे थे जो जल्दी ही राजा जय सिंह के साथ-साथ वहाँ के हिंदुओं के लिए सबसे बुरा सपना साबित होने जा रहा था।
1933 में 7 जनवरी को जय सिंह राज्य का बकाया टैक्स वसूलने के लिए अपने अधिकारियों को उस इलाके में भेजते हैं। वहीँ, राजा के टैक्स अधिकारियों और सैनिकों के स्वागत के लिए मेव मुसलमान पूरी तैयारी में जुटे हुए थे। गाँवों के आसपास आर्मी स्टाइल में ट्रेंचेस खोद दिए गए थे और निगरानी के लिए एक ऊँची पहाड़ी पर ढोल-नगाड़ों के साथ कुछ लोगों को रख दिया गया था।
रायफलें, बारूद, कुल्हाड़ी, तलवारें और बरछियाँ तैयार थी। मेव जानते थे कि वो आगे क्या करने जा रहे हैं और इसलिए वो लोग अपनी औरतों और बच्चों को पहले ही गुड़गाँव, दिल्ली और आगरा में अपने रिश्तेदारों के पास भेज देते हैं। उस दिन अलवर रियासत का एक मजिस्ट्रेट 100 सैनिकों के साथ गोविंदगढ़ गाँव पहुँचता है और रियासत के खिलाफ बगावत के जुर्म में 25 मेव मुसलमानों को गिरफ्तार करता है।
गिरफ़्तारी तो जैसे तैसे हो गई लेकिन अब बारी थी गाँव से बाहर निकलने की। मजिस्ट्रेट कैदियों को लेकर जैसे ही बाहर निकलने की कोशिश करता है ठीक उसी समय चारों ओर से भीषण गोलीबारी होने लगती है। सड़कों पर पेड़ और बोल्डर गिराकर ब्लॉक कर दिया जाता है।
सैनिकों ने गोलीबारी का जवाब देना शुरू किया और शुरुआत में मेवों पर भारी भी पड़े लेकिन जल्दी ही पासा पलट गया। पास की पहाड़ी से ढोल-नगाड़े बजने लगे और देखते ही देखते आसपास के गाँवों से निकलकर हजारों मेव मुसलमानों ने गोविंदगढ़ को घेर लिया।
मजिस्ट्रेट कैदियों को लेकर गाँव के रवेन्यू ऑफिस में शरण लेता है और सैनिक आड़ लेकर दंगाइयों से भिड़ने में लग जाते हैं। रात-भर दोनों तरफ से गोलीबारी होती रही जिसमें लगभग एक दर्जन सुरक्षाकर्मी मारे गए और कई घायल हुए।
आगे बढ़ने से पहले एक नजर मेवात की जियोग्राफी पर डाल लेते हैं।
मिनी पाकिस्तान
भारत में जब टूरिज़्म सेक्टर तेजी से बढ़ रहा था तब एक गोल्डन ट्रैंगल की कल्पना की गई। इसके एक छोर पर दिल्ली, दूसरे छोर पर मथुरा, वृंदावन, आगरा और तीसरे छोर पर मौजूद है जयपुर। सोने के इस त्रिभुज के ठीक बीच में पड़ता है मेवात क्षेत्र जो हरियाणा के नूंह से लेकर राजस्थान के अलवर, डीग और भरतपुर और उत्तर प्रदेश के मथुरा के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ है।
मिनी पाकिस्तान नाम से कुख्यात इस क्षेत्र से गुजरते हुए आपको सफेद कुर्ते और पगड़ी, लंबी दाढ़ी और नीली तहमत और लुंगी पहने हुए लंबे चौड़े मेव मुसलमान बड़ी-बड़ी आँखों से घूरते हुए नजर आ जाएँगे। हत्या, लुटपाट, चोरी-डकैती, अपहरण, बलात्कार और यहाँ तक कि आतंकवाद भी, शायद ही कोई अपराध होगा जिसका संबंध मेवात से ना निकलता हो।
याद कीजिए 31 जुलाई 2023 का वो काला दिन। मेवात के नूह जिले के मुंडका गाँव में मौजूद नालहर मंदिर में हिंदू जल चढ़ाने जा रहे थे। ठीक इसी समय मेवाती जिहादियों ने उनके ऊपर जानलेवा हमला कर दिया। चारों तरफ से पथराव होने लगा और गोलियाँ चलने लगी। इस गोलीबारी में दो होमगार्ड और शक्ति सैनी नाम का एक युवक मौके पर ही मार दिया गया।
इसके बाद जिहादियों ने अभिषेक राजपूत को गोली मारी। अभिषेक दर्द से तड़प रहा था, उसे गोली लगी थी लेकिन वो जिंदा था और मदद की गुहार लगा रहा था। सैकड़ों मेव मुसलमान उसे घेरकर खड़े थे और उसे तड़पता हुआ देखकर खुश हो रहे थे। इसके बाद भीड़ में से कुछ जिहादी अभिषेक के पास जाते हैं, उसके हाथ और गर्दन पकड़ते हैं और एक बड़े से चाकू से कलमा पढ़ते हुए उसकी गर्दन रेत देते हैं, इतने से भी मन नहीं भरा तो उन्होंने पत्थरों से अभिषेक का सिर बुरी तरह से कुचल डाला।
अभिषेक को जिस तरह से कत्ल किया गया वह हैवानियत और हिंदुओं के प्रति नफरत की पराकाष्ठा थी। लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि क्या मेव हमेशा से ऐसे ही थे? ऐसा बिल्कुल नहीं था। मेवों का इतिहास राजपूतों से जुड़ा हुआ है। ये लोग आज भी खुद को गर्व से सूर्यवंशी और चंद्रवंशी बताते हैं।
खिलजी से लेकर बलबन हो या बाबर और औरंगजेब जैसे मुस्लिम आक्रांता… मेवों ने हमेशा उनकी नाक में दम किए रखा। मुस्लिम आक्रान्ताओं ने बड़े पैमाने पर मेव राजपूतों, जाटों, गुर्जरों और मीणाओं का कत्लेआम किया लेकिन फिर भी उन्हें हरा नहीं पाए।
तो फिर सवाल उठता है कि वो मेव जिन्होंने खतरनाक से खतरनाक मुस्लिम आक्रान्ताओं को मजा चखाया वो इतने कट्टर मुसलमान और हिंदुओं के दुश्मन कैसे बने? इसके लिए हमें ग्यारहवीं शताब्दी के इतिहास पर एक नजर डालनी होगी।
मेव मुसलमानों का इतिहास
मेवों को मुसलमान बनाने का सिलसिला लगभग 11 वीं सदी में शुरू हुआ जब लुटेरे महमूद गजनवी के भतीजे सालार मसूद ने मेवात पर आक्रमण करके बड़ी संख्या में उन्हें मुसलमान बनाया। यही कारण है कि सालार मसूद गाजी से मेव आज भी सबसे ज्यादा कनेक्ट फ़ील करते हैं। सालार मसूद को बहराइच में राजा सुहेलदेव ने बुरी मौत मारा था।
लेकिन बाद में सूफियों ने बड़ी चालाकी से उसकी कब्र को एक दरगाह बना दिया और उसे एक सूफी संत घोषित कर दिया। सूफियों की इस चालाकी के पीछे का असली कारण मेवों को रिझाना था। 13 वीं शताब्दी में ख्वाजा मोइनूद्दीन चिश्ती, 14 वीं शताब्दी में निजामुद्दीन औलिया, 16 वीं शताब्दी में शाह चोखा और शाह मूसा जैसे अनेक सूफी मुसलमानों ने मेवों को मुसलमान बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
सूफी मेवों के उग्र स्वभाव को जानते थे, वे मेवों की बहदुरी से परिचित थे। उन्हें पता था कि मेव जिसकी तरफ से भी लड़ेंगे बहादुरी से लड़ेंगे इसलिए यदि वे मुसलमान बन जाते हैं तो इस्लाम के लिए एक बड़ी एसेट साबित होंगे। इसलिए उन्होंने सीधे इस्लामी नियम कायदों को उनके ऊपर थोपा नहीं।
यही कारण रहा कि मुस्लिम होते हुए भी मेव होली खेलते, जन्माष्टमी मनाते और खुद को राम और कृष्ण से जोड़ते थे। 1920 तक मेव बस नाम भर के लिए मुस्लिम थे क्योंकि उनके अधिकतर रीति रिवाज हिंदुओं से मिलते जुलते थे।
मेव मुसलमान हिंदू परंपराओं से इतने गहरे जुड़े हुए थे कि आर्य समाज के घर वापसी कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में मेव इस्लाम छोड़कर हिंदू बन गए थे।
कट्टरपंथी इस्लामी गिरोह आखिर ये कैसे सहन कर सकता था? इसलिए 1920 में दिल्ली के निजामुद्दीन से मुहम्मद इलियास कंधालवी नाम का एक देवबंदी मुसलमान मेवात पहुंचता है और यहाँ से तबलीगी जमात नाम के एक कट्टर इस्लामी मिशन को शुरू करता है।
जमात का मकसद था मेव मुसलमानों के भीतर हिंदुओं के प्रति नफरत और घृणा भरना और उन्हें कट्टरता की तरफ मोड़ना। इलियास को इस काम में जल्दी ही सफलता मिली और उसका मिशन मेवात से निकलकर पूरे देश में फैल गया।
आज इलियास तो जिंदा नहीं है लेकिन मेव मुसलमानों को कट्टर बनाने के लिए शुरू की गई तबलीगी जमात आज लगभग 150 देशों में मुसलमानों को कट्टर बनाने के मिशन पर जुटी हुई है और लगभग 8 करोड़ मुसलमानों का इससे जुड़े होने का अनुमान है।
सूफियों ने पहले मुसलमान बनाया और फिर कट्टर बनाने का काम तबलीगी जमात ने पूरा कर दिया। इसके बाद मेव मुसलमानों ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। साल था 1946, तारीख एक दिसंबर। भरतपुर में मेव मुसलमानों की एक बहुत बड़ी सभा हुई जिसमें एक मेविस्तान नाम का एक अलग देश बनाने के लिए रेजोल्यूशन पास किया गया।
इसके बाद 3 फरवरी 1947 को तिजारा में एक बहुत बड़ी मेव पंचायत बुलाई गई। इस पंचायत में तराना-ए-मेवात गाया गया और अलवर, भरतपुर, गुड़गाँव और मथुरा से लेकर दिल्ली तक के मेव मुसलमानों को मेवस्तान के लिए जिहाद छेड़ने और कुर्बानी देने को कहा गया।
इसके बाद जिहाद का उन्मादी खेल शुरू हो गया। मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ मिलकर गुड़गांव के मेव मुसलमानों ने दंगे शुरू कर दिए। गुड़गांव में बड़ी संख्या में हिंदुओं पर हमले के बाद ये लोग अलवर में घुस गए। देखते ही देखते अलवर के गाँव के गांव जल उठे। कितने हिंदू मारे गए इसका आँकड़ा आज तक भी सार्वजनिक नहीं है।
इसके बाद मेव मुसलमानों की इस भीड़ ने अलवर के सैनिकों पर हमले करके उनकी राइफल्स छीनना शुरू कर दिया। अलवर के प्रशासन और हिंदुओं ने अभी तक मेवों की देशद्रोही हरकतों का पलटवार करना शुरू नहीं किया था। सबको लगता था कि ये बस दो चार दिन चलेगा और फिर शांत हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
29 जुलाई का दिन था, एक हिंदू परिवार अपनी कार से अलवर की तरफ जा रहा था। मेवों ने इतनी गोलियाँ चलाई कि कार छलनी हो गई। पूरा परिवार निर्ममता से मार डाला गया। इसके बाद एक जैन मंदिर को लूटा गया और कई हिंदुओं को मुसलमान बनाया गया। हिंदुओं के जो भी गाँव सामने आए, जला दिए गए।
इसी दौरान पृथ्वीपुरा नाम के एक गाँव में मंदिर के अंदर एक गाय को काटा गया और जिहादियों ने वहीं पर मजे से गोमांस का भक्षण किया। हिंदुओं ने पहले तो ये अत्याचार सहन किया लेकिन जब पानी सिर से ऊपर निकल गया और अपने अस्तित्व के मिटने का ही खतरा पैदा हो गया तो उन्होंने जवाब देना शुरू कर दिया।
अलवर के प्रधानमंत्री एनबी खरे ने अपनी सेना और पुलिस को खुली छूट दे दी। इसके बाद हिंदुओं ने मेव जिहादियों को ऐसा सबक सिखाना शुरू किया जिसे उनकी आने वाली पीढ़ियाँ भी याद रखने वाली थी। ब्राह्मण, राजपूत, जाट, गुज्जर, मीणा और दलित समाज, हिंदुओं ने एकजुट होकर जिहादियों को खदेड़ना शुरू किया।
अलवर और भरतपुर के हिंदू जानते थे कि महामारी को खत्म करने के लिए वायरस को हटाना जरूरी है। इसलिए एक तरफ से सफाई अभियान शुरू किया गया। देखते ही देखते जो मेव मुसलमान एक अलग देश बनाने का सपना लेकर निकले थे, वो अपनी लुँगियाँ बचाकर भागने लगे। मेवों ने खुद ही अपने गाँव जला दिए और अलवर से भरतपुर की तरफ भागे।
भरतपुर के हिंदुओं ने अलवर से ज्यादा खातिरदारी की। इसके बाद मेविस्तान का सपना देखने वाले लाखों मेव मुसलमान गुड़गाँव, आगरा, दिल्ली और हैदराबाद मे जाकर छुपे। लगभग एक लाख से अधिक मेव मुसलमान पाकिस्तान भाग गए, वही पाकिस्तान जिसके साथ मिलकर वो अपना नया मेविस्तान बनाने का ख़्वाब सजा रहे थे।
अलवर और भरतपुर में अब चौतरफ़ा शांति थी। अलवर के प्रधानमंत्री एनबी खरे ने बताया कि अलवर में अब एक भी मुसलमान शेष नहीं बचा है और मेविस्तान की समस्या हमने समाप्त कर दी है। अलवर और भरतपुर के हिंदुओं ने एक बड़ी लड़ाई जीती थी। लेकिन यहाँ पर एंट्री होती है मुस्लिमों के प्रिय गाँधी जी और नेहरू जी की।
जो मेव मुसलमान कुछ समय पहले मेविस्तान बनाने के लिए हिंदुओं का सर्वनाश करने मैदान में उतरे थे उन्हें जब हिंदुओं ने उनकी ही भाषा में जवाब दिया तो जैसा कि हमेशा होता आया है, मेव मुसलमान अपना विक्टिम कार्ड लेकर गाँधी और नेहरू के पास पहुँचते हैं।
नेहरू-गाँधी ने पाकिस्तान से बुलाए मेव
गाँधी जी का मन इन देश तोड़ने वाले मेव मुसलमानों के लिए विचलित हो उठता है। गुड़गाँव से लगभग 80 हज़ार से अधिक मेव पाकिस्तान के लिए निकल चुके थे। गाँधी जी को जैसे ही इसकी खबर मिलती है तो वे रातभर सो नहीं पाते हैं। बेचैन और परेशान गांधी जी दौड़े-दौड़े गुड़गाँव से लगभग 45 किलोमीटर दूर घासेरा गाँव में मेवों के बीच पहुँचे।
उन्होंने यहाँ एक भाषण दिया जिसमें वे कहते हैं कि मेव मुसलमान भारत की रीढ़ की हड्डी हैं और उन्हें कोई भी ताकत पाकिस्तान नहीं भेज सकती है। गाँधी जी के दौरे के बाद अधिकतर मेवों ने पाकिस्तान जाने का प्लान ड्रॉप कर दिया। इसके बाद अपनी प्रार्थना सभा के दौरान गाँधी जी अपने गुड़गांव दौरे का जिक्र करते हैं।
जिन मेव मुसलमानों ने बस कुछ दिन पहले ही एक अलग देश मेवस्तान बनाने के लिए विद्रोह किया था और पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग का पूरा साथ दिया था उनके बारे में गाँधी जी क्या कहते हैं जरा एक नजर इस पर भी डालना जरूरी है।
गाँधी जी कहते हैं कि किसी ने मुझे बताया कि मेव मुस्लिम एक क्रिमिनल ट्राइब है और उन्होंने कुछ समय पहले विद्रोह किया है। तो मैं पूछता हूँ कि क्या केवल इस वजह से उनको पाकिस्तान भेज दिया जाएगा? मेवों को लेकर कोई भी नहीं कह सकता है कि वो क्रिमिनल हैं? कौन जानता है कि यहाँ कौन क्रिमिनल है और कौन नहीं? और अगर वो क्रिमिनल हैं भी तो क्या हम उनको मार दें? आखिर उन्हें सुधारने की जिम्मेदारी किसकी है?
गाँधी जी की जिद पर नेहरू सरकार ने ‘फिर बसाओ कमेटी’ बनाई और मेवों को बसाना शुरू किया। जो मेव पाकिस्तान जाने वाले थे वो तो रुके ही लेकिन जो वहाँ चले गए थे गाँधी जी के भाषण के बाद उनमें से बड़ी संख्या में वापस लौटे और नेहरू सरकार ने उनको जमीनें देकर फिर से मेवात में बसाया।
एक तरफ तो जिन मेवों ने भारत के टुकड़े करने के षड्यन्त्र किए उन्हें पाकिस्तान से भी वापस बुलाकर बसाया गया लेकिन पाकिस्तान से लुट पिटकर जो हिंदू भारत आना चाहते थे उनके लिए गांधी जी कहते हैं कि भारत आने की क्या जरूरत है? वहीं पाकिस्तान में मर जाओ।
जो हिंदू और सिख शरणार्थी दिल्ली पहुंचे उनके साथ नेहरू सरकार ने जानवरों से भी बुरा बर्ताव किया। पाकिस्तान में तो एक झटके में मौत मिल रही थी लेकिन दिल्ली की कॉन्ग्रेस सरकार उन्हें धीरे-धीरे मार रही थी। शरणार्थियों को जानवरों की तरह रिलीफ कैम्प्स में ठूँस दिया गया था। इन रिलीफ कैम्प्स की हालत ऐसी थी मानो कंसन्ट्रेशन कैम्प्स हों।
बदहाली से तंग आकर हिंदू और सिख शरणार्थी आए दिन कांग्रेस के बड़े नेताओं के घरों के आगे जमा हो जाते थे और नारेबाजी करते थे। शरणार्थियों के विरोध के बाद नेहरू सरकार ने उन्हें सीधी चेतावनी दी कि अगर जरा भी माहौल खराब करने की कोशिस की तो उनको कान्सन्ट्रैशन कैम्प्स में फेंक दिया जाएगा।
आर्मी को पूरी छूट दे दी गई कि जहाँ भी कोई शरणार्थी माहौल खराब करने की कोशिश करता हुआ दिखे तो उसे देखते ही गोली मार दी जाए। जिन मेवों ने देश तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी उनकी मेहमानों की तरह आवभगत की जा रही थी। दिल्ली के मुसलमान नेहरू की सरकार को पलटने के लिए गोला बारूद इकट्ठा कर रहे थे।
आजादी के ठीक बाद तख्तापलट की इस साजिश के बारे में हमने अपने पिछले वीडियो में विस्तार से बताया है, वीडियो का लिंक आपको कमेन्ट बॉक्स में मिल जाएगा।
हिंदुओं ने जब जिहादियों को उनकी ही भाषा में जवाब देना शुरू किया तो नेहरू-गाँधी की जुगलबंदी ने ऐसी हर कोशिश को विफल कर दिया। नेहरू की कॉन्ग्रेस सरकार ने हिंदुओं के हथियार छीन लिए और सिखों की कृपाण पर बैन लगाया गया। जिन मेव मुसलमानों के देश तोड़ने की साजिश रची उन्हें देश की रीढ़ बताकर फिर से उन्हीं जगहों पर बसा दिया गया।
यहाँ तक कि पाकिस्तान चले गए मेवों को भी नेहरू सरकार ने वापस लाकर मेवात में बसाया। मेवात जो आज मिनी पाकिस्तान बना है ये नेहरू-गाँधी की इसी मेहरबानी की देन है। वरना 1947 में अलवर और भरतपुर के हिंदुओं ने इस समस्या का समाधान हमेशा के लिए कर दिया था।
अलवर और भरतपुर के हिंदुओं ने उस समय जिहादी हिंसा का जिस प्रकार से प्रतिरोध किया था वह आज भी हिंदू समाज के लिए एक सीख है। अलवर और भरतपुर के हिंदुओं ने सिखाया कि भागने से बेहतर है संघर्ष करो। अत्याचारों के आगे झुको मत। और इस सबसे ऊपर ये बात कि देश और धर्म के ख़िलाफ़ हथियार उठाने वालों का ऐसा हश्र करो कि पाकिस्तान तक चेक वाली लुंगियाँ उठाकर भागना पड़े।


