वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल, युद्ध और समुद्री व्यापारिक मार्गों में तनाव के कारण बीते कुछ वर्षों में दुनिया भर की कृषि आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) चरमरा गई थी। जब रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में बढ़ते संघर्ष के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और उर्वरकों की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गईं, तब कई विकासशील और विकसित देशों में खाद्यान्न संकट गहराने लगा था। हालाँकि भारत ने अपनी मजबूत विदेश नीति, दीर्घकालिक समझौतों और सरकारी सहायता के जरिए इस संकट का डटकर मुकाबला किया। भारत की इस दूरदर्शी रणनीति को अब विशेषज्ञ ‘फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी’ (उर्वरक कूटनीति) का नाम दे रहे हैं।
भारत में कृषि उत्पादन काफी हद तक सही समय पर यूरिया, डीएपी (DAP) और एनपीके (NPK) जैसे जरूरी पोषक तत्वों की निर्बाध उपलब्धता पर निर्भर करता है। भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। जब वैश्विक बाजार में आपूर्ति बाधित हुई, तो भारत सरकार ने बहुस्तरीय रणनीति अपनाई। भारत ने रूस, ओमान, सऊदी अरब, मोरक्को और मिस्र जैसे देशों के साथ द्विपक्षीय बातचीत की।
आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक, भारत ने रणनीतिक करारों (global pacts) के जरिए लगभग 86 लाख टन से अधिक उर्वरक की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित की। इसके अलावा, अकेले वर्ष 2025 में भारत ने रूस से उर्वरक आयात में करीब 41% की बढ़ोतरी की, जिससे संकट के समय भी देश में यूरिया और डीएपी का स्टॉक बना रहा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जब डीएपी और यूरिया की कीमतें आसमान छू रही थीं, तब भारत सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रण में रखने की थी। यदि खाद के दाम बढ़ते, तो खेती की लागत बढ़ती और देश में खाद्य पदार्थों की महंगाई अनियंत्रित हो सकती थी।
इस स्थिति को संभालने के लिए केंद्र सरकार ने सब्सिडी का वित्तीय बोझ खुद उठाया। वर्ष 2014 में जहाँ भारत का उर्वरक सब्सिडी बजट करीब ₹71,000 करोड़ हुआ करता था, वहीं वैश्विक संकट के दौरान यह बढ़कर ₹2.4 लाख करोड़ से अधिक हो गया। हाल के वित्तीय वर्षों में भी सरकार ने लगातार ₹1.77 लाख करोड़ से ₹1.95 लाख करोड़ से अधिक का सब्सिडी आवंटन जारी रखकर किसानों पर अंतरराष्ट्रीय महँगाई का असर नहीं पड़ने दिया।
इस मजबूत कूटनीतिक और वित्तीय नीति का असर यह रहा कि देश में खरीफ और रबी सीजन के दौरान बुआई का काम समय पर हुआ और खाद्यान्न उत्पादन का पहिया रुकने नहीं पाया। देश में बफर स्टॉक सुरक्षित रहे और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत करोड़ों लोगों तक मुफ्त राशन की निर्बाध आपूर्ति बनी रही। साथ ही भारत ने घरेलू स्तर पर भी उत्पादन क्षमता को मजबूत किया, जिससे पीएंडके (P&K) उर्वरकों का घरेलू उत्पादन वर्ष 2014-15 के 159.54 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 211.22 लाख टन तक पहुँच गया।
Chapter1Mag की विश्लेषण रिपोर्ट यह साफ करती है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में खाद्य सुरक्षा केवल एक कृषि नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। भारत की यह ‘फर्टिलाइजर डिप्लोमेसी’ आने वाले समय में दुनिया के अन्य देशों के लिए भी एक बेहतरीन मिसाल साबित हो सकती है।
(मूल रिपोर्ट से ये रिपोर्ट चैप्टर1मैगजीन पर अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


