देश में हर बड़े विकास प्रोजेक्ट के शुरू होने से पहले ही विरोध की आवाजें उठने लगती हैं। मध्य प्रदेश में परमाणु ऊर्जा परियोजना, अरुणाचल प्रदेश में सियांग अपर बांध, ओडिशा में खनन और केरल में बंदरगाह निर्माण के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं। सवाल यह है कि जब देश को बिजली, पानी, रोजगार और आधुनिक सुविधाओं की जरूरत है, तो विकास के हर रास्ते में विरोध की दीवार क्यों खड़ी की जा रही है?
बढ़ती आबादी को चाहिए बेहतर सुविधाएँ
देश की आबादी तेजी से बढ़ रही है। रोटी, कपड़ा और मकान के साथ अब लोगों को बिजली, पानी, बेहतर परिवहन, रोजगार और आधुनिक सुविधाओं की भी जरूरत है। इन जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाए जाते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि किसी भी बड़ी परियोजना के आने से पहले ही विरोध शुरू हो जाता है।
कभी जल, जंगल और जमीन के नाम पर आंदोलन होता है, कभी पर्यावरण के नाम पर परियोजना रोकने की मांग उठती है और कभी स्थानीय लोगों की आजीविका को लेकर सवाल खड़े किए जाते हैं।
स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है। पर्यावरण की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। लेकिन क्या हर परियोजना को बिना उसके फायदे और नुकसान का आकलन किए रोक देना ही समाधान है?
यह विरोध किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। उत्तर-पूर्व से लेकर मध्य प्रदेश तक, ओडिशा से लेकर तमिलनाडु तक और केरल से लेकर उत्तर प्रदेश तक विकास परियोजनाओं को लेकर संघर्ष देखने को मिल रहे हैं।
मध्य प्रदेश के टाटा पावर परमाणु परियोजना का विरोध
मध्य प्रदेश के रीवा जिले के रोजहौई गांव में प्रस्तावित टाटा पावर की परमाणु ऊर्जा परियोजना इसका एक उदाहरण है। अक्टूबर 2026 में इस परियोजना के लिए जमीन का सर्वे शुरू करने की कोशिश हुई। लेकिन परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया।
कंपनी की योजना 220 मेगावाट क्षमता के दो संयंत्र स्थापित करने की है। यानी कुल 440 मेगावाट बिजली उत्पादन की परियोजना प्रस्तावित है। अभी जमीन आवंटन और परियोजना की शुरुआती प्रक्रिया ही आगे बढ़नी है, लेकिन विरोध का माहौल बन चुका है।
सवाल यह है कि जब किसी परियोजना की शुरुआती जांच और सर्वे की प्रक्रिया चल रही हो, तब उसके फायदे और नुकसान का आकलन किए बिना विरोध क्यों शुरू हो जाता है?
परमाणु ऊर्जा भारत के लिए कोई नई तकनीक नहीं है। देश के कई राज्यों में पहले से ही परमाणु ऊर्जा संयंत्र काम कर रहे हैं। इनसे पैदा होने वाली बिजली देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में योगदान देती है।
ऐसे में मध्य प्रदेश में प्रस्तावित परियोजना को लेकर भी वैज्ञानिक आकलन, पर्यावरणीय अध्ययन और स्थानीय लोगों की चिंताओं के आधार पर फैसला होना चाहिए, लेकिन अगर सर्वे की शुरुआत में ही विरोध इतना तेज हो जाए कि परियोजना आगे बढ़ ही न सके, तो देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का रास्ता कैसे निकलेगा?
अरुणाचल प्रदेश के सियांग अपर बांध का विरोध
अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट को लेकर भी विवाद गहराता जा रहा है। यह परियोजना सिर्फ बिजली उत्पादन का मामला नहीं है। इसके साथ भारत की जल सुरक्षा, चीन की गतिविधियों और पूर्वोत्तर में बाढ़ की समस्या जैसे कई महत्वपूर्ण सवाल जुड़े हुए हैं।
चीन तिब्बत के मेडोग क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक पर काम कर रहा है। इस परियोजना की प्रस्तावित क्षमता करीब 60,000 मेगावाट बताई जा रही है। यह क्षेत्र ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी प्रवाह के पास स्थित है। ब्रह्मपुत्र भारत में अरुणाचल प्रदेश से प्रवेश करती है और असम के लिए जीवनरेखा है यानी दोनों राज्यों के लिए खतरे की घंटी है।
भारत और चीन के बीच नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कोई व्यापक बाध्यकारी जल-बंटवारा संधि नहीं है। ऐसे में चीन की ऊपरी धारा पर बनने वाली विशाल परियोजना को लेकर भारत की चिंताएं स्वाभाविक हैं। अगर चीन अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ता है, तो निचले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। वहीं पानी के प्रवाह में बड़े बदलाव से भी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
इसी रणनीतिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए भारत में सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट प्रस्तावित है। इस परियोजना की प्रस्तावित क्षमता करीब 11,200 मेगावाट है और इसकी अनुमानित लागत लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। प्रस्तावित बांध में करीब 9.2 अरब घन मीटर पानी संग्रहित करने की क्षमता होगी।
यह परियोजना बिजली उत्पादन के साथ-साथ पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने और बाढ़ के प्रभाव को कम करने में भी मदद कर सकती है। अगर चीन की ओर से अचानक पानी छोड़ा जाता है, तो भारत के पास पानी के प्रवाह को संभालने और संभावित नुकसान को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण जलाशय उपलब्ध हो सकता है।
इसके अलावा ब्रह्मपुत्र और सियांग में हर साल आने वाली भीषण बाढ़ से पूर्वोत्तर को राहत देने की संभावना भी इस परियोजना से जुड़ी है, लेकिन सितंबर-अक्टूबर 2026 में परियोजना के सर्वे और ड्रिलिंग को लेकर विरोध तेज हो गया।
30 सितंबर 2026 को हिंसा की घटनाएं सामने आईं। बीजेपी नेता के घर पर हमले और वाहनों को आग लगाने की घटनाओं की खबरें आईं। बाद में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया और प्रशासन ने जमावड़े पर प्रतिबंध लगाया।
अरुणाचल बांध का विरोध और विदेशी फंडिंग कनेक्शन
इस मामले में विदेशी फंडिंग का मुद्दा भी सामने आया है। सीबीआई ने आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता भानु टाटक के खिलाफ विदेशी फंडिंग और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए के कथित उल्लंघन को लेकर मामला दर्ज किया है।
यहां सवाल उठता है कि क्या किसी आंदोलन के पीछे विदेशी फंडिंग की भूमिका है? अगर है, तो उसका उद्देश्य क्या है? क्या भारत की रणनीतिक और ऊर्जा परियोजनाओं को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है?
इन सवालों की जांच जरूरी है। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि स्थानीय लोगों की आशंकाओं, पर्यावरणीय प्रभाव और पुनर्वास जैसे मुद्दों को गंभीरता से सुना जाए, क्योंकि सियांग अपर प्रोजेक्ट सिर्फ एक बांध नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा और जल सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
ओडिशा में खनन का विरोध
ओडिशा भारत के खनिज संपदा से समृद्ध राज्यों में शामिल है। यहां बॉक्साइट, लौह अयस्क और दूसरे खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं, लेकिन खनन परियोजनाओं को लेकर राज्य में लगातार विरोध देखने को मिलता है।
सिजिमाली बॉक्साइट ब्लॉक इसका एक उदाहरण है। 2023 में वेदांता को सिजिमाली बॉक्साइट ब्लॉक के खनन अधिकार मिले। इस परियोजना के लिए करीब 1,549 हेक्टेयर जमीन का क्षेत्र प्रस्तावित है, जिसमें लगभग 699 से 708 हेक्टेयर वन भूमि शामिल बताई गई है। इस ब्लॉक में करीब 311 मिलियन टन उच्च गुणवत्ता वाले बॉक्साइट भंडार होने का अनुमान है।
बॉक्साइट एल्युमिनियम उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल है। एल्युमिनियम का इस्तेमाल परिवहन, निर्माण, बिजली और कई आधुनिक उद्योगों में होता है।
लेकिन इस परियोजना को लेकर स्थानीय स्तर पर जमीन, जंगल, आजीविका और विस्थापन से जुड़े सवाल उठे हैं।
आदिवासी समुदायों की जमीन और उनके पारंपरिक अधिकारों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। वन अधिकार कानून और पर्यावरणीय नियमों का पालन भी जरूरी है।
लेकिन सवाल यह भी है कि अगर खनिज संपदा से समृद्ध इलाकों में हर परियोजना लंबे समय तक अटकी रहेगी, तो वहां उद्योग, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं का विकास कैसे होगा? ओडिशा में खनन विरोधी आंदोलनों के दौरान कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी विवाद सामने आए हैं।
सिजिमाली परियोजना से जुड़े आंदोलन में डॉ. रान्डेल सेक्वेरा और लक्ष्मण नाइक की गिरफ्तारी हुईं। दोनों पर आरोप लगे हैं कि स्थानीय लोगों को सुरक्षाकर्मियों पर हमले के लिए इन्होंने उकसाया था।
इन आरोपों की जाँच और न्यायिक प्रक्रिया अपनी जगह है। लेकिन मूल सवाल वही है—क्या प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल किए बिना खनिज प्रधान राज्यों का आर्थिक विकास संभव है?
अगर खनन होगा, तो पर्यावरणीय सुरक्षा, स्थानीय अधिकारों और उचित मुआवजे का ध्यान रखना होगा। लेकिन अगर खनन ही नहीं होगा, तो खनिज संपदा का इस्तेमाल कैसे होगा?
केरल में विझिंजम पोर्ट के खिलाफ आंदोलन
विकास परियोजनाओं का विरोध सिर्फ ऊर्जा और खनन तक सीमित नहीं है। आधुनिक बंदरगाहों के निर्माण को लेकर भी आंदोलन हुए हैं। केरल के विझिंजम में अडानी समूह के बंदरगाह के खिलाफ 2022 में बड़ा आंदोलन हुआ।
इस आंदोलन में मछुआरा समुदाय शामिल था, जिन्होंने तटीय कटाव, घरों पर असर, आजीविका और समुद्री पर्यावरण को लेकर सवाल उठाए। लेकिन आंदोलन में लैटिन कैथोलिक चर्च की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। प्रदर्शन का नेतृत्व लैटिन आर्चडायस से जुड़े पादरियों ने किया। आंदोलन के दौरान हिंसा और पुलिस थाने में तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आईं।
स्थानीय मछुआरों की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। समुद्र के किनारे रहने वाले समुदायों के लिए तट और समुद्र उनकी आजीविका का आधार हैं, लेकिन विझिंजम बंदरगाह जैसे आधुनिक पोर्ट का महत्व भी समझना होगा।
आधुनिक बंदरगाह से अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा मिलता है। जहाजों की आवाजाही, माल ढुलाई और समुद्री परिवहन की क्षमता बढ़ती है। इससे रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
भारत को वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी है, तो आधुनिक बंदरगाहों की जरूरत होगी। ऐसे में सवाल यह है कि स्थानीय लोगों की चिंताओं का समाधान करते हुए क्या इस तरह की परियोजनाओं को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता?
तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के खिलाफ लंबा आंदोलन
तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ भी बड़ा आंदोलन हुआ था। यह आंदोलन परमाणु सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर था। स्थानीय लोगों ने परमाणु संयंत्र से जुड़े संभावित जोखिमों पर सवाल उठाए।
कुडनकुलम का विरोध किसी शुरुआती सर्वे तक सीमित नहीं था। यह संयंत्र के निर्माण और सुरक्षा को लेकर लंबे समय तक चला। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के मामले में सुरक्षा के उच्चतम मानकों का पालन जरूरी है। लोगों को सुरक्षा संबंधी जानकारी देना और उनकी आशंकाओं का जवाब देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
लेकिन, परमाणु ऊर्जा को पूरी तरह खारिज कर देने से भारत की ऊर्जा जरूरतों का समाधान कैसे होगा?
भारत को आने वाले वर्षों में लगातार बढ़ती बिजली की माँग पूरी करनी है। इसके लिए ऊर्जा के अलग-अलग स्रोतों का इस्तेमाल करना होगा।
केन-बेतवा परियोजना का विरोध
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की समस्या किसी से छिपी नहीं है। सूखा, कम बारिश और सिंचाई की सीमित सुविधाओं के कारण यहां किसानों को लंबे समय से परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी समस्या के समाधान के लिए केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना प्रस्तावित है।
लेकिन इस परियोजना का भी विरोध हुआ है। जुलाई 2026 में छतरपुर और पन्ना क्षेत्र में प्रभावित परिवारों ने मुआवजे, पुनर्वास और जमीन से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन किया।
सरकार का कहना है कि पात्र परिवारों में अधिकांश को मुआवजा दिया जा चुका है। लेकिन प्रभावित लोगों की ओर से असंतोष जताया गया है।
दूसरी ओर पर्यावरणविदों ने पन्ना टाइगर रिजर्व पर संभावित प्रभाव और बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र के नुकसान को लेकर चिंता जताई है। यहाँ भी विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल है, लेकिन इस परियोजना के संभावित लाभों को भी समझना होगा।
केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से बुंदेलखंड के झांसी, बांदा, महोबा और ललितपुर जैसे जिलों में करीब 2.51 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र विकसित होने की संभावना है। करीब 3 लाख किसानों को सिंचाई के लिए पानी और लगभग 21 लाख आबादी को पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।
इससे बुंदेलखंड के किसानों को राहत मिल सकती है। खेती की उत्पादकता बढ़ सकती है और पानी की कमी से जूझ रहे इलाकों में जीवन आसान हो सकता है।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या परियोजना के पर्यावरणीय और पुनर्वास संबंधी मुद्दों का समाधान करते हुए इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता? क्या हर समस्या का समाधान परियोजना को रोक देना ही है?
नर्मदा घाटी: विरोध के बावजूद बदली पानी की तस्वीर
नर्मदा घाटी का उदाहरण भी हमारे सामने है। मेधा पाटकर के नेतृत्व में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सरदार सरोवर बांध से प्रभावित लोगों के विस्थापन, पुनर्वास और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को उठाया।
इस आंदोलन ने बड़े बांधों के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव पर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया, लेकिन सरदार सरोवर परियोजना के लाभों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस परियोजना से गुजरात के हजारों गांवों और लाखों किसानों को सिंचाई और पेयजल की सुविधाएं मिली हैं। राजस्थान के बाड़मेर और जालोर जैसे रेगिस्तानी इलाकों तक भी नर्मदा का पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई है।
मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र को भी इस परियोजना से बिजली और पानी के लाभ मिलते हैं यानी एक बड़ी जल परियोजना का प्रभाव सिर्फ उस जगह तक सीमित नहीं रहता, जहां बांध बनाया जाता है। उसका लाभ दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच सकता है।
इसलिए किसी परियोजना का आकलन करते समय उसके स्थानीय प्रभाव के साथ-साथ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय लाभों को भी समझना जरूरी है।
विकास का विरोध या विकास की शर्तों पर बहस?
देश के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। स्थानीय लोगों की जमीन और आजीविका की रक्षा होनी चाहिए। पर्यावरणीय नियमों का पालन होना चाहिए।
प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा और पुनर्वास मिलना चाहिए, लेकिन इन सबके साथ देश की जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बिजली की मांग बढ़ रही है। सिंचाई के लिए पानी चाहिए। उद्योगों को खनिज चाहिए। व्यापार के लिए आधुनिक बंदरगाह चाहिए। शहरों और गांवों को बेहतर सुविधाएँ चाहिए।
अगर हर बाँध, हर बिजली परियोजना, हर पोर्ट और हर खनन परियोजना का विरोध इसी तरह होता रहा और परियोजनाएँ अनिश्चितकाल तक अटकी रहीं, तो देश की ऊर्जा, सिंचाई, परिवहन और औद्योगिक जरूरतें कैसे पूरी होंगी?
सरकार का काम है कि वह स्थानीय लोगों की आशंकाओं को सुने, नुकसान का आकलन करे, उचित मुआवजा दे और पर्यावरणीय नियमों का पालन सुनिश्चित करे।
वहीं स्थानीय लोगों को भी यह समझना होगा कि विकास परियोजनाओं का लाभ व्यापक समाज तक पहुंचता है। बंदरगाह से व्यापार बढ़ता है। परमाणु ऊर्जा से बिजली पैदा होती है। खनन से उद्योगों को कच्चा माल मिलता है।
इन सबका लाभ देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों तक पहुंच सकता है, लेकिन जब विकास परियोजनाओं का विरोध होता है, तो यह देखना भी जरूरी है कि विरोध के पीछे वास्तविक स्थानीय चिंताएं हैं या किसी राजनीतिक अथवा अन्य हित की भूमिका है।
किसी आंदोलन में विदेशी फंडिंग की भूमिका इस मामले को और भी गंभीर बनाता है। आखिर देश की परियोजनाओं को विदेशी शक्तियाँ क्यों रोकना चाहती हैं? इसकी जाँच होनी चाहिए। भारत को विकास के रास्ते में आने वाली वास्तविक बाधाओं की पहचान करनी होगी और उसका समाधान करना होगा।
चीन तिब्बत के संवेदनशील इलाके में सबसे ऊँचा बांध बना रहा है। उसकी परियोजनाओं से भारत की जल सुरक्षा पर असर पड़ने की आशंका है। भारत अपनी नदी के प्रवाह को संभालने और बाढ़ से बचने के लिए परियोजना बनाना चाहता है, तो उसे विरोध का सामना करना पड़ता है। यह विरोध क्यों?
क्या भारत को अपनी ऊर्जा और जल सुरक्षा मजबूत करने का अधिकार नहीं है? क्या देश की बढ़ती आबादी को बिजली और पानी उपलब्ध कराने की जरूरत नहीं है? क्या बुंदेलखंड के किसानों को सिंचाई का पानी नहीं चाहिए? क्या ओडिशा की खनिज संपदा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए? क्या भारत को आधुनिक बंदरगाहों और वैश्विक व्यापार की क्षमता नहीं बढ़ानी चाहिए? विकास परियोजनाओं का विरोध करने से पहले इन सवालों पर भी विचार करना होगा।
भारत को विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास जो स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करे, पर्यावरण को ध्यान में रखे और देश की जरूरतों को पूरा करे। विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। दोनों के बीच संतुलन बनाना ही असली चुनौती है। लेकिन अगर हर परियोजना को शुरुआत में ही रोक दिया जाएगा, तो भारत अपनी ऊर्जा, जल और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने में कैसे सक्षम होगा?


