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राहुल, बरखा, परमबीर… 26/11 के बाद दुनिया ने जानी इनकी करनी: कोई पार्टी में बिजी तो ​कोई आतंकियों से लड़ने को नहीं था तैयार

हमले के दौरान देश ने कपड़े बदल-बदल कर मीडिया के सामने आने वाले एक गृह मंत्री को देखा था। उस मीडिया को देखा था जिसने अपनी टीआरपी के फेर में जाने-अनजाने पाकिस्तान में बैठे आतंकियों तक पल-पल की सूचना पहुँचाने में मदद की।

2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले को 13 साल हो गए हैं। 26/11 की यह बरसी बलिदानियों के प्रति कृतज्ञता जताने का दिन होने के साथ-साथ उस समय पर्दे के पीछे क्या सब चल रहा था उसको भी जानने का है। हमले के वक्त देश में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार थी। हमले के दौरान देश ने कपड़े बदल-बदल कर मीडिया के सामने आने वाले एक गृह मंत्री को देखा था। उस मीडिया को देखा था जिसने अपनी टीआरपी के फेर में जाने-अनजाने पाकिस्तान में बैठे आतंकियों तक पल-पल की सूचना पहुँचाने में मदद की। बाद में यह बात भी सामने आई कि इस हमले के तुरंत बाद राहुल गाँधी पार्टी में मशगूल थे। बरखा दत्त ने कबूल किया कि उनकी और उनके साथियों की रिपोर्टिंग ने सैकड़ों जिंदगी को खतरे में डाला। फिलहाल विवादों में घिरे मुंबई पुलिस के ​कमिश्नर रहे परमबीर सिंह पर तो आतंकियों का मुकाबला करने से इनकार करने तक के आरोप लगे।

मुंबई हमले के बाद रात भर चली थी राहुल गाँधी की पार्टी

26 नवंबर 2008 को पाकिस्तान से आए 10 आतंकियों ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में समुंद्र के रास्ते घुसकर गोलीबारी और बमबारी करते हुए खून की नदियाँ बहा दी थी। इन इस्लामी आतंकियों ने चार दिनों तक मुंबई को बंधक बनाकर रखा हुआ। इस हमले में 174 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। उस समय राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस महासचिव थे। मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। सोनिया गाँधी कॉन्ग्रेस की सर्वेसर्वा और पार्टी की अध्यक्ष थीं। लेकिन उस दौरान इन लोगों की संवेदना मर गई थीं। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि मुंबई हमले के तुरंत बाद राहुल गाँधी दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित एक फार्महाउस में पूरी रात पार्टी में मशगूल थे। उस समय बलिदानी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की माँ की आँखों के आँसू भी नहीं सूखे थे। 174 मृत लोगों के परिजनों का गम ताजा ही था। 300 घायलों के परिचित अस्पतालों के चक्कर काट रहे थे।

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया था कि उस समय दिल्ली के बाहरी इलाके में राहुल गाँधी अपने बचपन के दोस्त समीर शर्मा की संगीत रस्म में पहुँचे थे। वह राधे मोहन चौक पर स्थित फार्म हाउस में थे। इंडिया टुडे में इस संगीत रस्म को लेकर लिखा गया था, “शनिवार की रात का संगीत ‘दिलकश’ था। इसे दुल्हन की बहन लीना मुसाफिर और उसके पति इंद्र द्वारा होस्ट किया गया था। पार्टी में 800 से अधिक मेहमानों ने भाग लिया।”

उद्धव ठाकरे ने कॉन्ग्रेस नेता से सवाल पूछते हुए कहा था, “राहुल गाँधी ने 26/11 मुंबई हमलों में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों का तिरस्कार किया है। उन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर देने वाले हेमंत करकरे, अशोक कामटे, तुकाराम अम्बोले और विजय सालस्कर जैसे मराठा पुलिसकर्मियों की बहादुरी का अपमान किया है। उन्होंने एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को अपमानित किया है। जब मुंबई में हमला हुआ, तब राहुल कहाँ थे?”

बरखा दत्त का कबूलनामा

मुंबई हमले के दौरान मीडिया की भूमिका भी काफी विवादास्पद रही थी। बरखा दत्त जैसे पत्रकारों की रिपोर्टिंग ने सैकड़ों लोगों की जान खतरे में डाल दी थी। अगस्त 2012 में प्रोपगेंडा पोर्टल न्यूज़लॉन्ड्री को दिए इंटरव्यू में बरखा दत्त ने स्वीकार किया था कि मुंबई हमले के दौरान टीवी चैनलों और उनके पत्रकारों ने जिस तरह की रिपोर्टिंग की, उससे सैकड़ों लोगों की जान ख़तरे में आ गई थी। विवादित पत्रकार बरखा दत्त ने यह भी कहा था कि टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग ऐसी थी कि कई सुरक्षा बलों के जवानों की जान भी ख़तरे में पड़ गई थी। उस दौरान बरखा दत्त वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपों में फॅंसी एनडीटीवी के लिए कार्य करती थीं और उनकी रिपोर्टिंग पर काफ़ी सवाल उठे थे। न्यूज़लॉन्ड्री के मधु त्रेहान ने इंटरव्यू के दौरान बरखा से इन्हीं चीजों को लेकर सवाल भी पूछे थे।

परमबीर सिंह पर कर्तव्य में कोताही का आरोप

26/11 आतंकी हमलों के दौरान मुंबई के पुलिस कमिश्नर हसन गफूर थे। उन्होंने परमबीर सिंह सहित अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर आरोप लगाया था कि इन लोगों ने आतंकवादियों से मुकाबला करने से इनकार कर दिया था। गफूर ने कहा था कि कानून-व्यवस्था के संयुक्त आयुक्त केएल प्रसाद, अपराध शाखा के अतिरिक्त आयुक्त देवेन भारती, दक्षिणी क्षेत्र के अतिरिक्त आयुक्त के वेंकटेशम और आतंकरोधी दस्ते के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह मुंबई आतंकी हमले के दौरान अपनी ड्यूटी निभाने में विफल रहे थे। 26/11 मुंबई आतंकी हमले के तुरंत बाद अपने कर्तव्यों की लापरवाही के आरोप में परमबीर सिंह और तीन अन्य अतिरिक्त पुलिस कमिश्नरों के खिलाफ साल 2009 में याचिका दायर की गई थी। एक जनहित याचिका (PIL) में इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि परमबीर सिंह जैसे अधिकारी तत्कालीन पुलिस कमिश्नर के आदेशों का पालन करने में विफल रहे थे।

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