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हेकड़ी गुम, अब ‘भिखमंगा पाकिस्तान’ को चाहिए पैसा: भारत के साथ T20 विश्व कप मैच को लेकर PAK में बवाल

T20 वर्ल्ड कप में भारत पाकिस्तान के बीच 15 फरवरी को मुकाबला होना है, लेकिन पाकिस्तान ने इसके बहिष्कार का ऐलान किया है। इस मुद्दे पर आईसीसी के दो प्रतिनिधि इमरान ख्वाजा और मुबाशिर उस्मानी लाहौर गए हुए हैं और उनकी पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के साथ बैठक हुई है। पीसीबी चेयरमैन नकवी ने अब प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से बात कर आईसीसी को जानकारी देने की बात कही है।

उम्मीद की जा रही है कि पाकिस्तान अपना फैसला बदलेगा और भारत के साथ मैच खेलने के लिए तैयार हो जाएगा। दरअसल भारत-पाकिस्तान का मैच आईसीसी के लिए काफी अहम है और इसे सबसे बड़ा कॉमर्शियल मैच माना जाता है।

मेजबान श्रीलंका ने भी पाकिस्तान को लिखा खत

पाकिस्तान के सारे मैच श्रीलंका में हो रहे हैं और भारत के साथ प्रस्तावित मैच भी कोलंबो के प्रेमदासा स्टेडियम में खेला जाना है। मेजबान श्रीलंका ने पीसीबी को कहा है कि बड़े मुकाबले रद्द होने से उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा, इसलिए फैसले पर पुनर्विचार करें।

आईसीसी और पीसीबी की बैठक

आईसीसी के साथ पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की बैठक हुई है। इसके बाद पीसीबी चेयरमैन मोहसीन नकवी ने कहा है कि वह शहबाज शरीफ को सारी बातें बताएँगे, फिर फैसला लिया जाएगा यानी ये फैसला राजनीतिक होगा।

इस बीच खबर यह भी है कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने आईसीसी के सामने खेलने के लिए शर्तें रखी हैं। इनमें ICC रेवेन्यू में ज़्यादा हिस्सेदारी और द्विपक्षीय क्रिकेट की बहाली से लेकर मुआवजे से जुड़ी माँगें शामिल हैं यानी भारत के साथ खेल के बहिष्कार का मुद्दा आईसीसी को बारगेन कर पैसा वसूली भी हो गया है। ये पीसीबी का आत्मविश्वास नहीं, बल्कि कमजोरी को दिखाता है।

बांग्लादेश को लेकर भी रखी शर्तें

बांग्लादेश की क्रिकेट में योगदान का हवाला देते हुए आईसीसी से ज्यादा फंडिंग की डिमांड की गई है। पीसीबी का तर्क है कि बांग्लादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर, नए खिलाड़ियों और नेशनल टीम को स्टंडर्ड बनाए रखने के लिए आर्थिक सहायता ज्यादा दिया जाए।

टी20 से बाहर होने के बावजूद बांग्लादेश की पार्टिसिपेशन फीस न काटी जाए। इसके अलावा, बांग्लादेश में क्रिकेट को बढ़ावा देने और ग्लोबल पहचान बनाने के लिए आईसीसी टूर्नामेंट की मेजबानी का मौका दिया जाए। बोर्ड का दावा है कि इसके लिए बांग्लादेश के पास जरूरी सुविधाएँ मौजूद हैं। हालाँकि बांग्लादेश के मुद्दे को लेकर आईसीसी ने साफ कर दिया है कि उसके पास मुआवजा के तौर पर बांग्लादेश को देने के लिए कुछ नहीं है, सिर्फ आईसीसी की कमाई का हिस्सा मिल सकता है।

पाकिस्तान पर खेलने का दबाव

भारत-पाकिस्तान T20 वर्ल्ड कप मैच को लेकर फैसला राजनीतिक रूप से लेने को क्रिकेट के प्रति संवेदनशीलता कम और राजनीतिक दखलंदाजी ज्यादा माना जा रहा है। भारत के साथ न खेलने का ऐलान भी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ही किया था।

अब एक T20 मैच खेलने के लिए पाकिस्तान के कैबिनेट की रजामंदी चाहिए। यह दिखाता है कि पाकिस्तान में राजनीति ने खेलों पर कितना कब्जा कर लिया है। पीसीबी संवैधानिक तौर पर इतना कमजोर है कि क्रिकेट की सेहत को मजबूत करने की उसमें ताकत ही नहीं है। वह राजनीति को क्रिकेट से अलग नहीं रख पा रहा। ये बात भी उतनी ही सही है कि जब पीसीबी का चेयरमैन मोहसिन नकवी खुद पाकिस्तान का एक मंत्री है, तो क्रिकेट और राजनीति अलग कैसे रह सकते हैं।

मोहसिन नकवी पाकिस्तान के लॉ एंड ऑर्डर के लिए ज़िम्मेदार मंत्री हैं। PCB चीफ के तौर पर क्रिकेट से जुड़े फैसले लेने की उन पर जिम्मेदारी है। ऐसे में क्रिकेट पर फैसला स्वतंत्र रूप से कैसे लिया जा सकता है।

दूसरी तरह क्रिकेट के प्रशंसकों को इस बात पर गुस्सा आ रहा है कि राजनीति की वजह से शहबाज सरकार भारत से क्रिकेट खेलने को लेकर आईसीसी से सौदेबाजी कर रही है। लोगों के गुस्से को सरकार भी महसूस कर रही है।

एक सीनियर पाकिस्तानी सरकारी सूत्र के हवाले से सीएनएन न्यूज18 ने कहा, “कैबिनेट में चर्चा क्रिकेट के बारे में नहीं है। यह एक ऐसी सरकार की बैठक है, जो जनता के गुस्से को झेलने से बचने के लिए बहाने सोच रही है।” ये गुस्सा सिर्फ क्रिकेट को लेकर नहीं है। पाकिस्तानी सरकार अपने देश में ही घिर गई है। देश में महँगाई और बेरोजगारी चरम पर है। सेना सरकार पर हावी है और हर तरफ फौज के खिलाफ जनता सड़कों पर दिखाई दे रही है। बलुचिस्तान से लेकर खैबर पख्तूनख्वाँ में जनता विद्रोह कर चुकी है और पाकिस्तानी फौजियों को पीट रही है।

ऐसे में जनता का ध्यान भटकाने के लिए क्रिकेट का मुद्दा सरकार के हाथ में आया है। भारत के साथ मैच अब पाकिस्तानियों के सेंटिमेंट से जुड़ा मुद्दा है। भारत के साथ मैच को मुद्दा बना कर शहबाज शरीफ सरकार राजनीतिक फायदा उठाने में लगी है और पीसीबी आर्थिक हालत को सुधारने में। इसलिए पाकिस्तान मैच खेलने को लेकर बारगेन कर रहा है, ताकि अधिक से अधिक वसूली की जा सके।

कैसे शुरू हुआ था ड्रामा

ICC T20 वर्ल्ड कप में ग्रुप A का मैच 15 फरवरी को कोलंबो में भारत बनाम पाकिस्तान है। टूर्नामेंट का सबसे बड़ा माना जाने वाला ये मैच पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB), इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) और पाकिस्तान की सियासत के बीच फँस गई है।

पाकिस्तान ने सबसे पहले क्रिकेट की दुनिया को यह ऐलान करके चौंका दिया कि वह भारत के मैच का बॉयकॉट करेगा, जबकि उसकी टीम टूर्नामेंट में बनी हुई है। सोशल मीडिया पर पाकिस्तान सरकार का रुख सामने आया, इसमें कहा गया कि टीम भारत के खिलाफ पाकिस्तान की टीम ‘मैदान में नहीं उतरेगी।’ यह कदम बांग्लादेश के साथ ‘एकजुटता’ दिखाने के लिए किया गया था, क्योंकि बांग्लादेश की टीम को आईसीसी ने टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था। दरअसल बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने भारत में मैच नहीं खेलने की बात कही थी और इसके लिए सुरक्षा का हवाला दिया था, जिसे आईसीसी ने रिजेक्ट कर दिया।

अंबाजी में ‘शक्ति कॉरिडोर परियोजना’: शक्तिपथ से लेकर विश्व स्तरीय सुविधाओं तक, कैसे होगा देवी धाम का कायाकल्प?

गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित आद्यशक्ति धाम अंबाजी भारत के 51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखता है। माँ अम्बा के दर्शन के लिए हर वर्ष लाखों श्रद्धालु इस पवित्र स्थल पर पहुँचते हैं खासकर भादरवी पूर्णिमा महा मेले के दौरान यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा और मार्गदर्शन से गुजरात सरकार इस स्थान को विश्वस्तरीय आधुनिक और आदर्श तीर्थ स्थल बनाने के उद्देश्य से महत्वाकांक्षी शक्ति कॉरिडोर (अंबाजी-गब्बर कॉरिडोर) प्रोजेक्ट शुरू कर रही है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इस परियोजना का शिलान्यास किया है।

इस परियोजना की कुल अनुमानित लागत 1,632 करोड़ रुपए है जिसमें से विकास कार्यों के पहले चरण के लिए 950 करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा। यह दूरदर्शी मास्टर प्लान अगले 25 वर्षों तक श्रद्धालुओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इस परियोजना को गुजरात पवित्र यात्रा धाम विकास बोर्ड और अरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट के सहयोग से किया जा रहा है।

अंबाजी शक्ति कॉरिडोर प्रोजेक्ट के पहले फेज की रखी गई नींव

अंबाजी शक्ति कॉरिडोर परियोजना के प्रथम चरण का शिलान्यास 7 फरवरी 2026 को ऐतिहासिक समारोह में किया गया। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने आद्यशक्ति धाम अंबाजी पहुँचने के बाद सबसे पहले माता अम्बा के दर्शन किए। इसके बाद उन्होंने औपचारिक रूप से 950 करोड़ रुपए की लागत से होने वाले विभिन्न विकास कार्यों का शिलान्यास किया। यह समारोह अंबाजी के मुख्य मंदिर परिसर में आयोजित हुआ जिसमें श्रद्धालुओं, स्थानीय लोगों, अधिकारियों और राजनीतिक प्रतिनिधियों की भी उपस्थिति रही।

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल हेलीकॉप्टर से अंबाजी के निकट चिखला हेलीपैड पर उतरे और वहाँ से सीधे मंदिर परिसर पहुँचे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि यह परियोजना PM मोदी की प्रेरणा और मार्गदर्शन में ‘विकास भी विरासत भी’ के मंत्र को अपनाते हुए लागू की जा रही है। उन्होंने बताया कि अगले 25 वर्षों तक श्रद्धालुओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया यह दूरदर्शी मास्टर प्लान अंबाजी को विश्वस्तरीय तीर्थ स्थल के रूप में विकसित करेगा।

प्रथम चरण में पूरे किए जाने वाले काम

प्रथम चरण में 950 करोड़ रुपए की लागत से होने वाले ये कार्य कुल 1,632 करोड़ रुपए की मेगा परियोजना का हिस्सा हैं, जिसे दो चरणों में लागू किया जाएगा। इस चरण का मुख्य उद्देश्य श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और आध्यात्मिक अनुभव को और बेहतर बनाना है। इसके तहत मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण किया जाएगा, जिससे वाहनों की आवाजाही और यातायात जाम को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकेगा।

इसके अलावा अंडरपास सड़कें और पैदल मार्ग बनाए जाएँगे जिससे श्रद्धालुओं को सड़क पार करने में सुरक्षित और सहज सुविधा मिलेगी। परियोजना के अंतर्गत आधुनिक तीर्थयात्री आवास का निर्माण किया जाएगा जिसमें आरामदायक ठहरने की व्यवस्था, स्वच्छता और अन्य बुनियादी सुविधाएँ शामिल होंगी। दिव्य दर्शन चौक का निर्माण किया जाएगा जहाँ श्रद्धालुओं को विशेष दर्शन और आध्यात्मिक माहौल मिलेगा।

शक्तिपथ का निर्माण भी किया जाएगा जो लगभग 2.5 किलोमीटर लंबा भव्य मार्ग होगा और मुख्य मंदिर को गब्बर पर्वत तथा मानसरोवर से जोड़ेगा। परियोजना के अंतर्गत एक एम्फीथिएटर का निर्माण किया जाएगा जहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम, गरबा, मेले और अन्य आयोजनों का आयोजन किया जा सकेगा। इसके अलावा लाइट एंड साउंड शो को उन्नत और विस्तारित किया जाएगा जो गब्बर पर्वत पर देश का सबसे बड़ा शो बनेगा और इसमें पौराणिक कथाओं तथा माता जी की महिमा दिखाई जाएगी।

इसके अतिरिक्त, इवेंट प्लाजा, सांस्कृतिक ग्राम और चाचर चौक का तीन गुना विस्तार किया जाएगा जिसके जरिए मेलों और परिक्रमा के लिए अधिक स्थान उपलब्ध हो सके। आध्यात्मिक गैलरी, पौराणिक भित्तिचित्रों और गब्बर पर्वत के लिए केबल कार यानी रोपवे को भी उन्नत किया जाएगा।

इस समारोह में राज्य मंत्री प्रवीनभाई माली, डॉ. जयरामभाई गामित, कमलेशभाई पटेल, स्वरूपजी ठाकोर, बनासकांठा जिले के विधायक, पदाधिकारी, पर्यटन सचिव कुलदीप आर्य, जिला कलेक्टर मिहिर पटेल सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। समारोह के दौरान 16 फीट ऊँचे अखंड शक्ति त्रिशूल का भी अनावरण किया गया जो हिमालय की 1,500 वर्ष पुरानी पौराणिक ऊर्जा का प्रतीक है।

‘PM मोदी की लीडरशिप में ऐतिहासिक धार्मिक काम हुए’

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने अपने संबोधन में कहा कि आद्यशक्ति पीठ अंबाजी का समग्र और दूरदर्शी विकास आद्यशक्ति के परम उपासक पीएम मोदी की प्रेरणा और मार्गदर्शन में किया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि पीएम मोदी ने ‘विकास भी विरासत भी’ के मंत्र के साथ देश के तीर्थ स्थलों के पुनरोद्धार और आद्यशक्ति की उपासना का ऐतिहासिक कार्य किया है।

अन्य विकास कार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक, केदारनाथ और बैजनाथ धाम जैसे पवित्र स्थलों के विकास ने उन्हें एक नई पहचान दिलाई है। राम मंदिर का संदर्भ देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण और पावागढ़ में 500 वर्षों के बाद ध्वजारोहण जैसी ऐतिहासिक उपलब्धियाँ भी उनकी लीडरशिप में संभव हुई हैं।

मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि 51 शक्तिपीठों में प्रथम स्थान पर स्थित अंबाजी धाम के विकास के लिए प्रधानमंत्री की परिकल्पना अब साकार हो रही है। हर वर्ष 51 शक्तिपीठ परिक्रमा महोत्सव का सफल आयोजन किया जाता है जिसमें लाखों श्रद्धालु माता जी के दर्शन का लाभ लेते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि हाल ही में आयोजित परिक्रमा महोत्सव में 5 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

प्रधानमंत्री मोदी की परिकल्पना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि तीर्थ स्थलों के विकास को पर्यटन से जोड़ने की प्रधानमंत्री की सोच के अनुरूप अंबाजी के गब्बर पर्वत पर देश का सबसे बड़ा लाइट एंड साउंड शो शुरू किया गया है और परिक्रमा पथ तथा सांस्कृतिक ग्राम जैसी परियोजनाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं को नई सुविधाएँ प्रदान की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अंबाजी-तरंगा रेल परियोजना से इस क्षेत्र की कनेक्टिविटी मजबूत होगी जिससे श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ेगी और स्थानीय आर्थिक विकास को गति मिलेगी।

अंबाजी शक्ति कॉरिडोर परियोजना का महत्व

अंबाजी शक्ति कॉरिडोर परियोजना का उद्देश्य अंबाजी को विश्वस्तरीय तीर्थ स्थल के रूप में विकसित करना है। इस परियोजना से श्रद्धालुओं, स्थानीय लोगों, अर्थव्यवस्था और पर्यटन क्षेत्र को कई बड़े लाभ मिलने वाले हैं।

श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों के लिए लाभ

इस परियोजना का सबसे बड़ा लाभ श्रद्धालुओं को मिलेगा क्योंकि इसमें उनकी सुविधा और आध्यात्मिक अनुभव को प्राथमिकता दी गई है। पहले चरण में मल्टी-लेवल पार्किंग, अंडरपास सड़क, पैदल मार्ग, आधुनिक तीर्थयात्री निवास, दिव्य दर्शन चौक और एम्फीथिएटर जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी, जिससे वाहनों की भीड़, असुविधा और सुरक्षा संबंधी समस्याएं कम होंगी। शक्ति कॉरिडोर श्रद्धालुओं के लिए यात्रा को अधिक सहज और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाएगा।

गब्बर पर्वत पर देश के सबसे बड़े लाइट एंड साउंड शो, आध्यात्मिक गैलरी, पौराणिक चित्रों और सांस्कृतिक ग्राम जैसी सुविधाएँ श्रद्धालुओं के आध्यात्मिक अनुभव को और भी विशेष और भावनात्मक बनाएँगी।

स्थानीय लोगों और बनासकांठा को आर्थिक लाभ

इस परियोजना के निर्माण और बाद के चरणों में हजारों रोजगार के अवसर पैदा होंगे। CM पटेल और मंत्रियों ने स्पष्ट किया है कि इन विकास कार्यों से स्थानीय स्तर पर बड़ी संख्या में नई नौकरियाँ सृजित होंगी। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने से होटल, धर्मशाला, रेस्तरां, दुकानें, हस्तशिल्प, प्रसाद और स्थानीय उत्पादों के कारोबार में तेजी आएगी।

इससे स्थानीय व्यापारियों, युवाओं और पूरे उत्तर गुजरात के आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी। अंबाजी-तरंगा रेल परियोजना से जुड़ाव के कारण कनेक्टिविटी मजबूत होगी जिससे दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यात्रा आसान होगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को और मजबूती मिलेगी।

पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को लाभ

यह परियोजना अंबाजी को गुजरात का प्रमुख तीर्थ स्थल और विश्वस्तरीय पर्यटन केंद्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे देश-विदेश से अधिक पर्यटक यहाँ आएँगे। इवेंट प्लाजा, एम्फीथिएटर और गरबा-मेले के लिए विस्तारित स्थान गुजराती संस्कृति, परंपराओं और लोक कला को नई पहचान देंगे।

यह परियोजना काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और महाकाल लोक जैसी विकास और विरासत के समन्वय वाली योजनाओं पर आधारित है जिससे आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी।

क्या होंगे दीर्घकालिक लाभ?

यह परियोजना आने वाले दशकों में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए भविष्य की जरूरतों के अनुरूप विकसित की जा रही है। इसके साथ ही इसमें स्वच्छता, पर्यावरण और सतत विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिससे आध्यात्मिक अनुभव के साथ पर्यावरणीय संतुलन भी मजबूत होगा।

यह योजना अंबाजी को एक आदर्श तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित करेगी जहाँ भक्ति, संस्कृति और आधुनिक विकास का अनूठा संगम दिखाई देगा। मुख्यमंत्री और सरकारी अधिकारियों ने कई बार कहा है कि यह विकास न केवल श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ाएगा बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को भी मजबूत करेगा।

नेहरू की किस मानसिकता के कारण भारत को चीन से मिली पराजय, कॉन्ग्रेस शासन की विफलता की साहित्यिक समीक्षा

विश्व इतिहास साक्षी है कि भारत ने अपने शौर्य और शक्ति प्रदर्शन के लिए किसी भी देश की सांस्कृतिक, धार्मिक अस्मिता और इतिहास को ध्वस्त करने का प्रयास नहीं किया। क्योंकि किसी पर अधिपत्य रखना हमारा का स्वभाव नहीं है। हमारे देश में आक्रमणकारी शक्तियाँ आईं, भारत ने अपने सामर्थ्य से उन्हें अपने में ही विलीन कर लिया। किसी देश ने जब तक हमारी सामाजिक समरसता और सद्भावना को भंग करने का प्रयास नहीं किया, हमने युद्ध नहीं किया क्योंकि हम युद्ध नहीं बुद्ध के समर्थक है।

अगर कभी युद्ध की स्थिति बनी तो हमारे जवानों ने बिना हार–जीत की चिंता किए पूरी ताकत से युद्ध किया। राजनीति रूप से या राष्ट्रवादी भाव रखने के कारण मैं कई बार कॉन्ग्रेस की नाकामियों को सामने लाने का प्रयास करता हूँ। इस बार चीन से हार की साहित्यिक समीक्षा आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ।

स्वतंत्रता के बाद जो भारत हमें मिला, वह हमारे सपनों का भारत नहीं था। संघ और राष्ट्रवादी विचारकों ने हमेशा अखंड भारत का स्वप्न देखा और उसे बचाए रखने के लिए अपने प्राणों की बाजी तक लगा दी। भारत ने अब तक जितने भी युद्ध किए उसमें सबसे अधिक अपमानजनक हार 1962 के चीन युद्ध में हुई। यह हार हमारी सेना के माथे पर ऐसा कलंक है, जिसे आज तक नहीं धोया जा सका।

इस पराजय का कारण हमारी सेना नहीं बल्कि तत्कालीन सत्ता थी। नेहरू ऊपर से भारतीय लेकिन रहन-सहन, खान-पान और विचारों से पूरी तरह विदेशी थे। वह किसी भी शर्त पर भारत में केवल अपनी सत्ता बनाए रखने की कोशिश में थे, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि कौन सा देश कब भारत में घुसकर उसका कुछ हिस्सा कब्जा करके भारत भूमि को खंडित कर रहा है। 1962 का युद्ध इसी का प्रमाण है। इसी युद्ध को केंद्रित करके विख्यात कवि रामधारी सिंह दिनकर ने ’परशुराम की प्रतीक्षा’ नामक खंडकाव्य लिखा, जो चीन युद्ध में उनकी उदासीनता को सामने लाती है। यह खंडकाव्य तत्कालीन सत्ता की नाकामियों के साथ उसकी राष्ट्रविरोधी नीति के खिलाफ भी खुलकर चर्चा करता है।

चीन से पराजय आम जनता के लिए मात्र एक सूचना थी लेकिन सत्ता में बैठे लोग यह भली–भांति समझ रहे थे कि यह हार नहीं राष्ट्र से नेहरू का विश्वासघात था। चीन के युद्ध में सेना को सही समय पर और आवश्यक युद्ध सामग्री नहीं भेजी गई जो पराजय का सबसे बड़ा कारण बनी। साथ भी सेना प्रमुख पर युद्ध से वापसी के लिए दबाव बनाया गया। नेहरू की देवताओं वाली जो छवि राजनीतिज्ञ और साहित्यकार बनाने का प्रयास कर रहे थे उसे ध्वस्त करते हुए दिनकर ने लिखा–

घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।
(परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड दो, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली।)

दिनकर ने जिस समय यह खंडकाव्य लिखा उस समय वह नेहरू सरकार में ही राज्यसभा सदस्य थे। दिनकर राष्ट्रवादी विचारों के साहित्यकार थे उनके लिए राष्ट्र सर्वप्रथम था। जब चीन से भारत को अपनों के कारण साजिशन हार मिली तब दिनकर ने सत्ता के विरोध लिखना अपनी जिम्मेदारी समझा। सब जानते थे कि इस हार के असली कारण नेहरू ही थे लेकिन चुप्पी साधे हुए थे। दिनकर ने लिखा–

जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।
(परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड दो, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली)

यह अपमानजनक हार केवल सेना की नहीं बल्कि भारत के शौर्य और पौरुष का भी था, जिससे दिनकर आहत हुए। सरकार, सत्ता और साहित्यकार कोई बोलने को तैयार नहीं। नेहरू अपने अनुयायियों के साथ मिलकर अपनी समन्वयवादी और देवताओं की छवि गढ़ने का प्रयास कर रहे थे। सभी की चुप्पी में नेहरू का डर था लेकिन दिनकर नहीं डरे उन्होंने लिखा–

नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में।
यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।
(परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड दो, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली)

नेहरू गाँधीनीति से भारत की जनता को बरगला कर सत्ता बनाए रखना चाहते थे जबकि इस युद्ध में गाँधी नहीं भगत सिंह और बोस के विचारों की जरूरत थी। दिनकर गाँधीवाद का प्रतीकों में विरोध करते हैं–

गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं,
तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं;
शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का,
शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का।
परशुराम की प्रतीक्षा, रामधारी सिंह दिनकर, खंड एक, लोकभारती प्रकाशन, दिल्ली)

नेहरू भारत में लोकतंत्र नहीं राजतंत्र चाहते थे। उनकी सत्ता पर काबिज रहने की भूख बहुत गहरी थी। साथ ही विदेशी नेताओं और राजाओं से उन्हें विशेष लगाव था। विदेशियों के प्रति उनकी यह आस्था कई बार अपमान का कारण बन जाती थी। जब अंग्रेजी सत्ता को हमारे देशवासियों ने जड़ से उखाड़कर फेंक दिया, और हम आजाद हुए तो नेहरू केवल इस बात से खुश थे कि उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बैठने का अवसर मिलेगा।

जिन अग्रेजों ने वर्षों तक हमें गुलाम बनाकर रख उसी इंग्लैड की महारानी एलिजाबेथ 14 वर्षों बाद जब भारत आई तो नेहरू ने बड़ी भव्यता से उसका स्वागत किया बल्कि इससे कई साहित्यकार बेहद क्रोधित हुए क्योंकि वह इस घटना को औपनिवेशिक गुलामी के रूप में देख रहे थे। कवि नागार्जुन ने इसके विरोध में “आओ रानी” कविता लिखकर अपना प्रतिरोध दर्ज किया–

आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
यही हुई है राय जवाहरलाल की
भूखी भारत-माता के सूखे हाथों को चूम लो
प्रेसिडेन्ट की लंच-डिनर में स्वाद बदल लो, झूम लो
पद्म-भूषणों, भारत-रत्नों से उनके उद्गार लो
पार्लमेण्ट के प्रतिनिधियों से आदर लो, सत्कार लो
मिनिस्टरों से शेकहैण्ड लो, जनता से जयकार लो।
यह तो नयी-नयी दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोडी-सी लाज उधार लो
बापू को मत छेड़ो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी!
राय हुई है यही जवाहर लाल की।

यह समझना बहुत आवश्यक है कि आरंभिक समय में भारत को जिस तरह के राजनीतिज्ञों की आवश्यकता थी उसके विपरीत लोग मिले। हमें ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए था जो भारत को भारतबोध की दृष्टि से देखने की हिम्मत रखता था। वर्तमान सरकार कॉन्ग्रेस की नाकामियों से मिले अपमान की भरपाई करने का निरंतर प्रयास कर रही है। हमें उसके साथ मिलकर इस देश की वास्तविक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक विरासत को संभालना होगा तभी हम भारत से विकसित भारत बनेंगे।

गुजरात में गौमांस बेचने के दोषी महेबुब और फरहान को 10-10 साल की सजा, तीसरा आरोपित सलीम बरी: जानें कोर्ट ने फैसले में क्या क्या कहा

गोधरा की सेशंस कोर्ट ने 2024 के एक गौहत्या और गौमांस हेराफेरी के केस में दो लोगों को 10 साल की जेल की सजा सुनाई है। दोषियों की पहचान महेबुब अब्दुल्ला सबुरिया और फरहान महेबुब सबुरिया के रूप में हुई है। दोनों बाप-बेटे हैं। जबकि एक अन्य आरोपित सलीम सिद्दीक को शक का फायदा देकर बरी कर दिया गया है।

मामला 9 जुलाई 2024 का है, जिसमें 2 फरवरी 2026 को फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने आरोपितों को गुजरात पशु संरक्षण सुधार अधिनियम की धारा 5(A), 6(B), 8(4) और 10 के तहत दोषी ठहराते हुए 10-10 साल की सजा और 2 लाख रुपये जुर्माना लगाया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 9 जुलाई 2024 को गोधरा बी डिविजन पुलिस स्टेशन के अधिकारी रूटीन पेट्रोलिंग पर थे, तभी गोधरा-हमीपुर रोड पर अली मस्जिद के पास एक संदिग्ध गाड़ी दिखी। उसे रोककर पूछताछ करने की कोशिश की तो कुछ लोग भाग गए। उनमें से दो लोगों को पकड़ लिया गया।

दोनों को पकड़कर कार चेक की तो उसमें से मांस मिला। साथ में कुछ हथियार भी मिले। दोनों की पूछताछ में उन्होंने अपनी पहचान महेबुब अब्दुल्ला सबुरिया और फरहान महेबुब सबुरिया बताई। पुलिस को उन्होंने कहा कि सलीम सिद्दीक और फैसल मकसूद नाम के लोगों ने उन्हें हमीरपुर बुलाया था और वहाँ से यह मांस का जथ्था भरकर दिया था और उसे घर पर बेचने के लिए ले जा रहे थे।

फिर पुलिस ने वेटरनरी डॉक्टर को मौके पर बुलाकर चेक करवाया तो मांस का वजन 53 किलो निकला। फिर सैंपल सूरत FSL में जाँच के लिए भेजे गए, रिपोर्ट आने पर मांस गौमांस निकला। इसके बाद आरोपितोंके खिलाफ गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम के तहत केस दर्ज करके गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस ने कुल तीन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की थी। जिसमें महेबुब और फरहान गौमांस के साथ मौके से पकड़े गए थे, जबकि तीसरे सलीम पर इन दोनों को गौमांस सप्लाई करने का आरोप था। फिर केस सेशंस कोर्ट में चला गया, जहाँ 19 नवंबर 2024 को चार्जशीट दाखिल की गई। कोर्ट ने 20 फरवरी 2025 को चार्ज फ्रेम किए और आगे ट्रायल चलाया। एक साल बाद 2 फरवरी को फैसला सुनाया गया।

ट्रायल के दौरान कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों, पंच गवाहों, वेटरनरी डॉक्टर, अधिकारियों सहित कई गवाहों की गवाही नोट की। इसके अलावा प्रोसिक्यूशन की तरफ से पंचनामा, वेटरनरी डॉक्टर की रिपोर्ट, फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट वगैरह भी सबूत के तौर पर पेश किए गए।

कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?

कोर्ट ने फैसले में नोट किया कि वेटरनरी और FSL दोनों रिपोर्ट साफ-साफ साबित करती हैं कि जब्त किया गया मांस गाय का मांस था। गुजरात में गौहत्या, गाय के मांस का संग्रह, हेराफेरी और बिक्री पर पूरी तरह बैन है।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों आरोपित गौमांस के साथ मौके से ही पकड़े गए थे। दूसरी तरफ ट्रायल के दौरान वे यह साबित करने में नाकाम रहे कि उनके पास कत्ल या मांस ट्रांसफर की कोई आधिकारिक परमिशन थी या नहीं। इसके अलावा आरोपियों ने ट्रायल में दलील दी कि पुलिस ने उन्हें गलत तरीके से फंसाया है, लेकिन कोर्ट ने जब्ती, सैंपल की जाँच वगैरह की प्रक्रिया सही तरीके से हुई होने का उल्लेख करके इन दलीलों को खारिज कर दिया और दोनों को दोषी ठहराया।

हालाँकि कोर्ट ने तीसरे आरोपित को यह कहकर छोड़ दिया कि उसके पास से गौमांस नहीं पकड़ा गया और प्रोसिक्यूशन का केस सिर्फ सह-आरोपियों के बयानों पर आधारित है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे बयान, बिना स्वतंत्र पुष्टि के, ठोस नहीं माने जा सकते और उनके आधार पर किसी व्यक्ति को क्रिमिनल ट्रायल में दोषी नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए तीसरे आरोपित को शक का फायदा देकर कोर्ट ने बरी कर दिया।

सजा सुनाते समय कोर्ट ने कहा कि गुजरात में गौहत्या पर बैन वाला कानून होने के बावजूद दोषी बाप-बेटे ने इतने बड़े जथ्थे में घर पर छुट्टा बिक्री के इरादे से गौमांस खरीदकर हेराफेरी की थी। साल 2017 में सरकार ने कानून में किए संशोधन को ध्यान में रखकर सजा सुनाई जाए तो कानून का मूल उद्देश्य भी कायम रहेगा और समाज में ऐसे अपराधों पर काबू भी आएगा और इस तरह के अपराध करने वालों पर कानूनी लगाम भी लगेगी।

आखिर में कोर्ट ने दोनों दोषियों को गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम की धारा 5(A), 6(B), 8(4) और 10 के तहत दस साल की जेल की सजा और दो लाख का जुर्माना ठोका। अगर जुर्माना नहीं भरा तो दोनों की सजा 2 साल और बढ़ाने का आदेश दिया गया है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

ओम बिरला को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा विपक्ष: जानिए क्या है लोकसभा स्पीकर को हटाने का नियम और कब-कब लाया गया प्रस्ताव

लोकसभा में विपक्ष लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी को संसद में बोलने नहीं देने का आरोप विपक्ष लगा रहा है। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान राहुल गाँधी पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे के अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए सरकार पर आरोप लगा रहे थे। उस वक्त स्पीकर ओम बिरला ने नियमों का हवाला देते हुए राहुल गाँधी को रोका। इस मुद्दे पर कई दिनों तक विपक्ष ने सदन को नहीं चलने दिया।

कॉन्ग्रेस इस बात से भी नाराज है कि जब महिला सांसदों ने पीएम की सीट को सदन में घेरा, तो स्पीकर ओम बिरला ने कहा था कि कोई अप्रत्याशित घटना घट सकती थी, इसलिए प्रधानमंत्री को सदन आने से उन्होंने रोका। लेकिन ऐसी घटनाएँ सदन में पहली बार हुई कि महिला सांसद राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान लोकसभा को संबोधित नहीं कर पाए। इसकी वजह महिला सांसदों का इस तरह से पीएम की सीट को घेरना था।

विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी सांसद निशिकांत दूबे ने पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी और दूसरे प्रधानमंत्रियों पर आरोप लगाया। संसद में हंगामे के दौरान 8 विपक्षी सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। सासंदों के निलंबन और महिला सांसदों द्वारा पीएम की सीट घेरने को लेकर कॉन्ग्रेस पर आरोप लगे थे। इस पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी बोलना चाहते हैं, लेकिन बोलने की अनुमति नहीं मिली।

स्पीकर के खिलाफ ‘हटाने का प्रस्ताव’ लाया जाता है

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया सरकार के खिलाफ जो अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, उससे थोड़ा अलग होता है। इसमें लोकसभा स्पीकर को ‘हटाने का प्रस्ताव’ यानी मोशन ऑफ रिमूवल ऑफ स्पीकर लाया जाता है। यह संविधान की अनुच्छेद 94 सी के तहत लाया जाता है। इस अनुच्छेद में लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है।

लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव पेश करने के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना होता है। ये नोटिस लिखित होना चाहिए। इस प्रस्ताव पर कम से कम 50 सांसदों का हस्ताक्षर होना जरूरी है यानी कोई भी सांसद लोकसभा में खड़े होकर अपने दम पर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव नहीं ला सकता। स्पीकर पर स्पष्ट और ठोस आरोप लगे हों। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद इस पर सदन में चर्चा होती है और फिर सांसद वोटिंग करते हैं। इस दौरान स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं करते हैं, बल्कि डिप्टी स्पीकर या सदन का वरिष्ठ सदस्य सदन की अध्यक्षता करते हैं।

हटाने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत

लोकसभा में प्रस्ताव सदन में उपस्थित सांसदों द्वारा बहुमत से पास होना जरूरी है, कोई दो-तिहाई बहुमत की जरूरत नहीं होती। स्पीकर को हटाने के लिए सिर्फ बहुमत की जरूरत होती है। जितने सांसद वोट दे रहे हों, उनका 50 फीसदी से एक ज्यादा जरूरी है।

अगर प्रस्ताव पास हो जाता है तो तुरंत ही स्पीकर पद से हट जाता है। वह सांसद बना रहता है, लेकिन स्पीकर नहीं और फिर सदन को दूसरा स्पीकर चुनना होता है।

स्पीकर को हटाने के लिए आज तक कभी वोटिंग नहीं हुई

सदन में स्पीकर को हटाने के लिए कई बार नोटिस दिया गया है। सदन में प्रस्ताव पर बहस भी हुई है, लेकिन वोटिंग नहीं हुई है।

पहली बार 1954 में तत्कालीन स्पीकर जीवी मावलंकर के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था। इस पर सदन में बहस हुई। विपक्ष ने उनपर कॉन्ग्रेस का पक्ष लेने का आरोप लगाया था। सदन ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया और वोटिंग हुई नहीं।

दूसरी बार लोकसभा स्पीकर डॉक्टर नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ 1967 में हटाने का प्रस्ताव पेश किया। इन पर कॉन्ग्रेस का पक्ष लेने का विपक्ष ने आरोप लगाया। विपक्ष का कहना था कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा है। इस वक्त भी मतदान नहीं हुआ।

तीसरी बार 8वीं लोकसभा स्पीकर बलराम जाखड के खिलाफ विपक्ष ने 1987 में अविश्वास प्रस्ताव रखा। उस वक्त बोफोर्स को लेकर कॉन्ग्रेस सरकार पर विपक्ष हमलावर था। विपक्ष का आरोप था कि जाखड नियमों का हवाला देकर विपक्ष को बोलने से रोकते हैं और सरकार को बचाते हैं। इस प्रस्ताव पर भी वोटिंग की नौबत नहीं आई।

13वीं लोकसभा स्पीकर जीएमसी बालयोगी को हटाने के लिए विपक्ष ने नोटिस दिया। उस वक्त एनडीए की सरकार थी। 2001 में नोटिस दिया गया, लेकिन प्रस्ताव खारिज हो गई। उनपर आरोप था कि सरकार के पक्ष में स्थगन प्रस्ताव को वह खारिज कर देते हैं।

2011 में 15वीं लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि उन्हें 2जी, सीडब्लूजी घोटालों को लेकर बहस में बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा। स्पीकर सरकार का बचाव कर रही हैं। इस नोटिस को भी खारिज कर दिया गया और वोटिंग तक बात नहीं पहुँची।

17वीं लोकसभा में 2020 में वर्तमान स्पीकर ओम बिरला ने कृषि कानूनों को लेकर विपक्ष के जबरदस्त हंगामे पर विपक्षी सांसदों को निलंबित किया था। इसके विरोध में विपक्ष ने स्पीकर को हटाने का नोटिस देने की बात सार्वजनिक रूप से की. लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने पर प्रस्ताव सदन में लाया ही नहीं जा सका।

संपत्ति का सिर्फ 1/3 हिस्सा ही वसीयत कर सकता है मुस्लिम व्यक्ति: छत्तीसगढ़ HC, वक्फ की आड़ में जमीनों पर कब्जा करना भी मुश्किल

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (मोहम्मदन लॉ) के तहत संपत्ति की वसीयत को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी कुल संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही वसीयत के जरिए किसी को दे सकता है। इससे ज्यादा हिस्सा देने के लिए बाकी कानूनी वारिसों की मृत्यु के बाद स्पष्ट और स्वतंत्र सहमति जरूरी है। बिना सहमति के पूरी संपत्ति की वसीयत अवैध मानी जाएगी। यह फैसला इस्लामी कानून के उस मूल सिद्धांत को मजबूत करता है, जिसका उद्देश्य वारिसों के अधिकारों की रक्षा करना है।

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने 2 फरवरी 2026 को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कोरबा जिले की एक विधवा जैबुन निशा की अपील को मंजूर करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने गंभीर कानूनी गलती की थी, जब उन्होंने विधवा को उसके वैधानिक हिस्से से पूरी तरह वंचित कर दिया। कोर्ट ने वसीयत के फायदार्थी को संपत्ति का एक-तिहाई से ज्यादा हिस्सा देने से इनकार कर दिया।

संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़ा पूरा मामला क्या था?

यह विवाद कोरबा जिले की रहने वाली 64 वर्षीय जैबुन निशा से जुड़ा है। वह दिवंगत अब्दुल सत्तार लोधिया की पत्नी हैं। अब्दुल सत्तार का निधन 19 मई 2004 को हुआ था। उनके नाम पर कोरबा शहर में खसरा नंबर 1045/3 की 0.004 एकड़ (लगभग आठ डिसमिल) जमीन और उस पर बना मकान था। यह उनकी निजी संपत्ति थी।

अब्दुल सत्तार की कोई संतान नहीं थी। उनकी मृत्यु के बाद उनके भतीजे मोहम्मद सिकंदर (उम्र करीब 27 साल) ने दावा किया कि वह अब्दुल सत्तार का गोद लिया हुआ बेटा है और पूरी संपत्ति उसकी है। सिकंदर ने 27 अप्रैल 2004 की एक वसीयत पेश की, जिसमें कथित तौर पर अब्दुल सत्तार ने पूरी संपत्ति उसके नाम कर दी थी।

सिकंदर ने तहसीलदार के सामने आवेदन देकर राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम जैबुन निशा के साथ संयुक्त रूप से दर्ज करवा लिया। तहसीलदार ने 7 दिसंबर 2004 को दोनों के नाम दर्ज करने का आदेश दिया। जैबुन निशा ने दावा किया कि उन्हें इसकी जानकारी नवंबर 2007 में हुई और उन्होंने वसीयत को फर्जी व अवैध बताया। उनका कहना था कि वसीयत उनकी सहमति के बिना बनाई गई और मुस्लिम कानून के खिलाफ है।

जैबुन निशा ने 2014 में सिविल जज कोरबा के सामने मुकदमा दायर किया। उन्होंने मांगा कि संपत्ति पर उनका अकेला मालिकाना हक घोषित किया जाए और सिकंदर का नाम हटाया जाए। लेकिन ट्रायल कोर्ट ने 7 फरवरी 2015 को उनका दावा खारिज कर दिया। अपील में दूसरी अतिरिक्त जिला जज कोरबा ने 28 जनवरी 2016 को ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद जैबुन निशा हाईकोर्ट पहुंचीं। हाईकोर्ट ने 17 अगस्त 2023 को अपील को स्वीकार करते हुए दो महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर सुनवाई की।

दोनों पक्षों की तरफ से पेश की गई दलीलें

जैबुन निशा की ओर से अधिवक्ता पराग कोटेचा ने दलील दी कि मुस्लिम कानून में गोद लेने की कोई मान्यता नहीं है। सिकंदर ने खुद लिखित बयान में स्वीकार किया कि वह अब्दुल सत्तार का सगा बेटा नहीं है। फिर भी उसने राजस्व रिकॉर्ड में खुद को बेटा बताया। वसीयत पूरी संपत्ति की है, जबकि मुस्लिम कानून में बिना वारिसों की सहमति के एक-तिहाई से ज्यादा नहीं दिया जा सकता। जैबुन निशा ने कभी सहमति नहीं दी।

सिकंदर की ओर से अधिवक्ता मीरा अंसारी और अमन अंसारी ने कहा कि अब्दुल सत्तार ने सिकंदर को बचपन से बेटे की तरह पाला था। समाज में भी उसे बेटा माना जाता था। वसीयत स्वेच्छा से बनाई गई थी और दो गवाहों ने इसकी पुष्टि की। जैबुन निशा ने खुद वसीयत सिकंदर को सौंपी थी और कई साल तक चुप रही, जो सहमति मानना चाहिए।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने विस्तार से दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और रिकॉर्ड का गहन अध्ययन किया। कोर्ट ने कहा कि भले ही वसीयत की लिखत और गवाहों से साबित हो जाए, लेकिन उसका कानूनी प्रभाव मोहम्मदन लॉ की धारा 117 और 118 के आधार पर जांचना जरूरी है।

कोर्ट ने धारा 117 और 118 का उल्लेख करते हुए कहा-

  • धारा 117: वारिस को वसीयत तभी वैध है, जब बाकी वारिस मृत्यु के बाद सहमति दें। एक भी वारिस की सहमति से उसका अपना हिस्सा बंध जाता है।
  • धारा 118: मुस्लिम व्यक्ति अंत्येष्टि और कर्ज चुकाने के बाद बची संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही वसीयत कर सकता है। इससे ज्यादा के लिए वारिसों की मृत्यु के बाद सहमति जरूरी है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सहमति स्पष्ट, स्वतंत्र और मृत्यु के बाद की होनी चाहिए। केवल चुप रहना या मुकदमा देर से दायर करना सहमति नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सिकंदर ने कोई ठोस सबूत नहीं दिया कि जैबुन निशा ने मृत्यु के बाद स्पष्ट सहमति दी थी। गवाहों के बयान भी केवल वसीयत सौंपने तक सीमित थे, सहमति तक नहीं।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले की मुख्य बात

कोर्ट ने निचली अदालतों की गलती गिनाते हुए तीन मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला-

  • सबूत का बोझ गलत तरीके से जैबुन निशा पर डाला गया, जबकि सिकंदर पर था कि वह सहमति साबित करे।
  • भले ही वसीयत वैध मान लें, तो भी सिकंदर को केवल एक-तिहाई हिस्सा ही मिल सकता था। फिर भी निचली अदालतों ने जैबुन निशा का दावा पूरी तरह खारिज कर दिया, जो कानूनी रूप से गलत था।
  • मुकदमे में ज्यादा राहत माँगने से वैध हिस्सा नहीं छीना जा सकता।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दिया पुराने फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण पुराने निर्णयों का जिक्र किया-

  • नूरुल इस्सा बनाम रहमान बी (2001) 3 एमएलजे 141 (मद्रास हाईकोर्ट): कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम व्यक्ति केवल एक-तिहाई संपत्ति ही वसीयत कर सकता है। इससे ज्यादा के लिए वारिसों की सहमति जरूरी है। वारिस को वसीयत बिना सहमति के पूरी तरह अवैध है।
  • बयाबाई बनाम बयाहाई (एआईआर 1942 बॉम्बे 328): बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि सुन्नी मुस्लिम कानून में दो प्रतिबंध हैं – एक-तिहाई से ज्यादा नहीं और वारिस को बिना सहमति नहीं।
  • यासिम इमामभाई शेख बनाम हजराबी (एआईआर 1986 बॉम्बे 357): बॉम्बे हाईकोर्ट ने फिर दोहराया कि एक-तिहाई से ज्यादा की वसीयत बिना सहमति के अमान्य है।
  • वलशियिल कुन्ही अवुल्ला बनाम ईंगायिल पीटिकायिल कुन्ही अवुल्ला (एआईआर 1964 केरल 200): केरल हाईकोर्ट ने कहा कि बिना सहमति के वारिसों को ज्यादा हिस्सा देने वाली वसीयत अवैध है।
  • रहुमथ अम्माल बनाम मोहम्मद माइदीन रोउदर (1978) 2 एमएलजे 499 (मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच): कोर्ट ने कहा कि वारिस और गैर-वारिस दोनों को वसीयत में हिस्सा देने पर भी एक-तिहाई की सीमा लागू होती है। वारिस को दिया हिस्सा बिना सहमति के अमान्य रहेगा।
  • मोहम्मद अशरफ बनाम तबस्सुम (आईएलआर 2014 कर्नाटक 6861): कर्नाटक हाईकोर्ट ने धारा 117 को अनिवार्य बताते हुए कहा कि बिना सहमति के केवल एक-तिहाई ही वैध है।
  • सुलक्सनी बनाम सत्तार अली (2022 एससीसी ऑनलाइन छत्तीसगढ़ 803): छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की ही समन्वय पीठ ने कहा कि बिना सहमति के पूरी संपत्ति की वसीयत अमान्य है।

इन सभी फैसलों से हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस्लामी कानून का मूल उद्देश्य वारिसों के अधिकारों की रक्षा करना है। ज्यादा वसीयत से वारिसों का नुकसान नहीं होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने दोनों महत्वपूर्ण सवालों का जवाब जैबुन निशा के पक्ष में दिया। अपील मंजूर कर ली गई। ट्रायल कोर्ट और अपील कोर्ट के फैसले रद्द कर दिए गए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जैबुन निशा वैधानिक वारिस होने के नाते संपत्ति में अपना हिस्सा पाने की हकदार हैं।

वसीयत के नाम वक्फ बनाने वाले दावों पर कितना असर?

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला मुख्य रूप से वसीयत (विल) पर केंद्रित है, न कि वक्फ पर। मुस्लिम पर्सनल लॉ में वसीयत और वक्फ दो अलग-अलग कॉन्सेप्ट हैं, इसलिए यह फैसला उन मामलों पर सीधे लागू नहीं होगा जहाँ मृत्यु के बाद संपत्ति को ‘वक्फ’ बताकर कब्जा किया जाता है।

वसीयत और वक्फ में मुख्य अंतर

वसीयत मृत्यु के बाद प्रभावी होती है और व्यक्ति अपनी संपत्ति का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही बिना वारिसों की सहमति के दे सकता है (मोहम्मदन लॉ की धारा 117-118)। वहीं वक्फ जीवित व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला स्थायी दान है, जो अल्लाह के नाम पर धार्मिक या चैरिटेबल कामों के लिए होता है। सुन्नी मुस्लिम लॉ (जो भारत में ज्यादा लागू है) में वक्फ वसीयत से नहीं बन सकता, यह जीवित रहते ही वैध होता है। शिया लॉ में कुछ छूट है, लेकिन सामान्यतः वक्फ मृत्यु के बाद प्रभावी नहीं माना जाता। भारत में वक्फ एक्ट 1995 से यह अलग कानून से नियंत्रित होता है।

फर्जी वक्फ क्लेम के कई मामले सामने आए हैं जहाँ वक्फ बोर्ड या लोग फर्जी दस्तावेज बनाकर संपत्ति पर कब्जा करते हैं, जैसे-

इसके साथ ही अहमदाबाद में किराया घोटाला या गुजरात में करोड़ों के फ्रॉड जैसे कई उदाहरण हैं। लेकिन ये ज्यादातर जीवित लोगों या बोर्ड की गलत कार्रवाई से जुड़े हैं, न कि मृत्यु के बाद ‘वसीयत के नाम पर वक्फ’ से।

फर्जी वक्फ जैसे मामलों में मदद करेगा ये फैसला?

अगर कोई मृत्यु के बाद फर्जी वसीयत बनाकर संपत्ति को वक्फ बताता है, तो हाईकोर्ट का यह सिद्धांत (एक-तिहाई सीमा और सहमति जरूरी) चुनौती देने में मदद कर सकता है। कोर्ट इसे वसीयत मानकर अवैध घोषित कर सकती है। लेकिन अगर क्लेम शुद्ध वक्फ एक्ट के तहत है (भले फर्जी हो), तो अलग कानून लागू होगा और वक्फ बोर्ड की जाँच या सिविल सूट से लड़ना पड़ेगा। ऐसे फ्रॉड रोकने के लिए वक्फ संशोधन कानून भी चर्चा में हैं। कुल मिलाकर यह फैसला वसीयत वाले विवादों में मजबूत हथियार है, लेकिन शुद्ध वक्फ फ्रॉड के लिए अलग रणनीति चाहिए।

वसीयत की सीमा सख्ती से लागू करने की जरूरत

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला मुस्लिम संपत्ति विवादों में एक मिसाल बनेगा। कई मामलों में लोग पूरी संपत्ति वसीयत कर देते हैं, जिससे विधवाएँ या अन्य वारिस परेशान होते हैं। यह फैसला स्पष्ट करता है कि वसीयत की सीमा सख्ती से लागू होगी और सहमति के बिना एक-तिहाई से ज्यादा नहीं मिलेगा।

बेंगलुरु मेट्रो का किराया बढ़ाने के पीछे क्या है सिद्दारमैया सरकार की मंशा? कर्नाटक की वित्तीय स्थिति बदहाल: जानें- क्यों BJP सांसद तेजस्वी सूर्या ने दिखाई ‘खाली डिग्गी’?

बेंगलुरु की नम्मा मेट्रो (Namma Metro) से सफर करने वालों के लिए राहत की खबर यह है कि फिलहाल मेट्रो का किराया नहीं बढ़ेगा। दरअसल, कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार की 09 फरवरी 2026 से नम्मा मेट्रो के किराए में करीब 5 फीसदी तक बढ़ोतरी करने की तैयारी थी। लेकिन बीजेपी के आरोपों और यात्रियों के विरोध के बाद इस फैसले पर रोक लगा दी गई है।

वहीं बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या लगातार किराया बढ़ोतरी के विरोध में मोर्चा खोले बैठे हैं। सोमवार (09 फरवरी 2026) को बेंगलुरु की आरवी मेट्रो पर तेजस्वी ने ‘खाली डिग्गी’ दिखाकर प्रदर्शन किया, तो पुलिस ने उन्हें हिरासत ले लिया। अब सवाल उठता है कि आखिर इस खाली डिग्गी के मायने क्या हैं? क्यों कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार किराया बढ़ाना चाहती है और BJP इस फैसले को गलत क्यों बता रही है? इन सवालों के जवाब जानना बेहद जरूरी है।

BMRCL का किराया बढ़ाने का प्रस्ताव

दरअसल, बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (BMRCL) ने प्रस्ताव रखा था कि हर टिकट पर 1 से 5 रुपए तक ज्यादा वसूले जाएँगे। अगर यह लागू होता तो न्यूनतम किराया 10 रुपए से बढ़कर 11 रुपए और अधिकतम किराया 90 रुपए से बढ़कर 95 रुपए हो जाता। यह बढ़ोतरी पूरे मेट्रो नेटवर्क पर लागू होने वाली थी।

BMRCL का कहना था कि यह सालाना किराया संशोधन है, जिससे बढ़ते ऑपरेशन खर्च, बिजली, कर्मचारियों के वेतन और रखरखाव की लागत को पूरा किया जा सके। लेकिन जैसे ही किराया बढ़ने की बात सामने आई, लोगों में नाराजगी बढ़ गई।

पहले से ही बेंगलुरु मेट्रो देश की सबसे महँगी मेट्रो मानी जाती है। रोजाना मेट्रो से ऑफिस जाने वाले कर्मचारी, छात्र और आम यात्री बोले कि अगर हर दिन 2-3 बार मेट्रो ली जाए तो महीने के आखिर में 60 से 100 रुपए तक अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जो हर किसी के लिए आसान नहीं है।

BJP सांसद तेजस्वी सूर्या का सिद्दारमैया सरकार पर आरोप

इस बीच बीजेपी ने सीधे तौर पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार पर हमला बोला। बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष और बेंगलुरु दक्षिण से सांसद तेजस्वी सूर्या ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि बेंगलुरु पहले ही महँगाई से जूझ रहा है और मेट्रो किराया बढ़ाना आम लोगों पर सीधा हमा है। तेजस्वी सूर्या ने मेट्रो से आवाजाही करने वाले यात्रियों से बातचीत कर उनकी प्रतिक्रिया जानी।

बाद में तेजस्वी सूर्या ने पत्रकारों को बताया कि यात्री बार-बार किराया बढ़ने से नाखुश हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर केंद्र सरकार को किराया बढ़ोतरी के लिए दोषी ठहराकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। तेजस्वी सूर्या ने यह भी कहा कि घाटे की भरपाई का बोझ सीधे यात्रियों पर डालना गलत है और सिद्दारमैया सरकार को पहले अपने खर्च और सिस्टम को सुधारना चाहिए।

तेजस्वी सूर्या ने मौजूदा समिति की गणनाओं में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए किराया निर्धारण समिति के गठन की भी माँग की। इसके अलावा उन्होंने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार में आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल खट्टर से भी बात की और किराया बढ़ोतरी को तुरंत रोकने की माँग की।

इस पर मनोहर लाल खट्टर ने अधिकारियों को मेट्रो के किराए में प्रस्तावित बढ़ोतरी को अस्थायी रूप से रोक देने का निर्देश दिया और समिति के निष्कर्षों की व्यक्तिगत समीक्षा का आश्वासन दिया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सिद्दारमैया सरकार औपचारिक अनुरोध करती है तो एक नई समिति पर विचार किया जा सकता है।

सिद्दारमैया सरकार की पुलिस ने तेजस्वी सूर्या को हिरासत में लिया

इतना ही नहीं सोमवार (09 फरवरी 2026) को बेंगलुरु के आरवी रोड मेट्रो स्टेशन के बाहर किराया बढ़ोतरी के खिलाफ खाली डिग्गी लेकर प्रदर्शन करते हुए तेजस्वी सूर्या को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इस पर तेजस्वी सूर्या ने एक्स पर लिखा, “मुझे गिरफ्तार करने से मेरी आवाज नहीं दबेगी! यह शर्मनाक है कि कॉन्ग्रेस सरकार ने मुझे सच उजागर करने के लिए गिरफ्तार किया। यह एक ‘खाली डिग्गी’ सरकार है।”

उन्होंने आगे कहा, “कर्नाटक की आर्थिक स्थिति खराब है, और किराए और बढ़ती लागत के रूप में इसकी कीमत चुका रहे हैं। अब कोई बहाना नहीं चलेगा। मुख्यमंत्री को बजट में ‘व्हाइट पेपर’ प्रश्तुत करना होगा और एक सवाल का जवाब देना होगा- राज्य की वित्तीय स्थिति इतनी कमजोर क्यों है, जैसा कि आपने FFC के समक्ष स्वीकार किया था?”

तेजस्वी ने सवाल पूछा, “कर्नाटक में महँगाई क्यों बढ़ती जा रही है? राज्य में कीमतें प्रतिदिन क्यों बढ़ रही हैं?” उन्होंने आगे कहा, “वित्तीय स्थिति सुधारें, मेट्रो को दी जाने वाली अप्रत्यक्ष वित्तीय सहायता बहाल करें और मेट्रो का किराया अपने आप कम हो जाएगा। इसके अलावा कुछ भी कहना छल है।”

कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार का पक्ष

वहीं कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार ने मेट्रो किराया बढ़ाने के फैसले को केंद्र सरकार पर थोपने की कोशिश की। सरकार का कहना है कि यह फैसला सीधे राज्य सरकार का नहीं है। कॉन्ग्रेस सरकार के मुताबिक, बेंगलुरु मेट्रो का किराया एक तय नियम और प्रक्रिया के तहत फेयर फिक्सेशन कमेटी (Fare Fixation Committee) की सिफारिशों से तय होता है। इसमें राज्य सरकार की सीधी भूमिका नहीं होती।

सरकार का कहना है कि मेट्रो के संचालन और किराया निर्धारण की जिम्मेदारी BMRCL और केंद्र सरकार से जुड़े नियमों के दायरे में आती है। इसीलिए कॉन्ग्रेस सरकार पर किराया बढ़ाने का आरोप लगाना गलत है। कर्नाटक सरकार ने यह भी कहा कि बीजेपी इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रही है और जनता में भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है।

TMC का विरोध पड़ा महँगा? पार्टी की गुंडागर्दी पर रील बनाने वाले इन्फ्लुएंसर की गिरफ्तारी पर विवाद: समझें- क्यों लोग बता रहे इसे राजनीतिक बदला

कोलकाता पुलिस ने 25 साल के सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर शमिक अधिकारी को यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया है। शमिक को ऑनलाइन ‘नॉनसेन’ के नाम से जाना जाता है। उन्हें गुरुवार (5 फरवरी 2026) को दमदम से पकड़ा गया। पहले उन्हें गलत तरीके से कैद करने, हमला करने और महिला की इज्जत से खिलवाड़ करने के आरोप में पकड़ा किया गया था, लेकिन बाद में 22 साल की पीड़िता के बयान के आधार पर पुलिस ने रेप का केस भी जोड़ दिया।

शमिक को शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को कोर्ट में पेश किया गया और अब उन्हें 16 फरवरी 2026 तक पुलिस कस्टडी में रखा गया है। पुलिस के मुताबिक, महिला ने शिकायत की थी कि शमिक ने उसे 2 फरवरी 2026 की रात करीब साढ़े नौ बजे से अगले दिन शाम 5 बजे तक अपने बेहाला वाले घर में जबरन रोका रखा।

इस दौरान महिला का आरोप है कि उसे मारा-पीटा गया, धमकाया गया। उसने कहा कि शमिक ने उसे गलत तरीके से छुआ, कपड़े खींचे और फिर जबरन यौन हमला किया।

पुलिस ने कोर्ट को बताया कि पीड़िता का मेडिको-लीगल टेस्ट एमआर बांगुर अस्पताल में हुआ। एक महिला पुलिस अधिकारी ने उसका बयान दर्ज किया और इसके बाद भारतीय न्याय संहिता की रेप वाली धारा FIR में जोड़ी गई। पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान मिले और वह काफी आघात में थी, इसलिए शिकायत करने में देरी हुई।

पुलिस ने आगे कहा कि शमिक ने पीड़िता को अश्लील फोटो भेजकर धमकाया था। जाँचकर्ताओं के मुताबिक टावर लोकेशन से पता चला कि शिकायत में बताए समय पर दोनों आरोपित और पीड़िता अपराध वाली जगह पर मौजूद थे।

शमिक की तरफ से कहा गया कि दोनों पुराने दोस्त हैं और लंबे समय से जानते हैं। उस रात गलतफहमी हुई थी, लेकिन कोई जबरदस्ती नहीं की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर जाँच में कुछ बचा ही नहीं है तो पुलिस कस्टडी की क्या जरूरत है।

वायरल रील जिसने छेड़ दी राजनीतिक बहस

शमिक कोई आम इंफ्लुएंसर नहीं हैं। इंस्टाग्राम पर उनके करीब 4.20 लाख और फेसबुक पर 4 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। लेकिन राजनीतिक सुर्खियों में तब आए जब उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट ‘@yournonsane’ पर 21 जनवरी को एक रील पोस्ट की। पश्चिम बंगाल में आने वाले चुनाव से सिर्फ दो महीने पहले की बात है।

यह रील वायरल हो गई, 30 लाख से ज्यादा व्यूज और 3.5 लाख से ज्यादा लाइक्स आए। इसमें शमिक ने टीएमसी सरकार पर तीखा हमला किया था। वीडियो में वे खुद को आम वोटर दिखाते हैं जो वोट डालने जा रहा है। वहाँ एक लोकल टीएमसी गुंडा वोटरों को सिर्फ सत्ताधारी पार्टी को वोट देने का दबाव डालता है और नहीं मानने पर धमकी देता है।

वीडियो में आगे राज्य की स्थिति दिखाने वाले फ्लैशबैक थे। इसमें 26 हजार सरकारी टीचर्स की नौकरी जाने और उसका भावनात्मक असर दिखाया गया। रात में अकेली चलती महिला को कुछ लोग पीछे चल रहे हैं।

रील में आरजी कर रेप-मर्डर केस का भी जिक्र था। उस केस में कोलकाता कोर्ट ने दोषी संजय रॉय को उम्रकैद की सजा सुनाई और राज्य सरकार को पीड़िता के माता-पिता को 17 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया, हालाँकि पीड़िता के माता-पिता ने कहा कि उन्हें न्याय चाहिए, मुआवजा नहीं।

वीडियो ने सीधे सत्ताधारी सरकार को निशाना बनाया और चुनाव से ठीक पहले आया, इसलिए कई लोगों ने इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना। वायरल होने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आने लगीं।

TMC ने BJP से लिंक का किया दावा

रील वायरल होने के बाद कई टीएमसी लीडर्स और सपोर्टर्स ने दावा किया कि शमिक का बीजेपी से लिंक है। उनका कहना था कि वह सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं, राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं।

TMC प्रवक्ता रिजू दत्ता ने सोशल मीडिया पर कड़ा बयान दिया और शमिक को ‘बीजेपी यूट्यूबर’ कहा। पोस्ट में उन्होंने कहा कि वही शख्स जो पश्चिम बंगाल सरकार पर महिलाओं की सुरक्षा में नाकाम होने का आरोप लगा रहा था, अब खुद महिला की इज्जत से खिलवाड़ और मारपीट के केस में फंसा है।

दत्ता ने केस में दर्ज धाराओं का जिक्र किया और बताया कि पीड़िता ने करीब 12 घंटे कैद रखने, मारपीट और धमकी देने का आरोप लगाया है। एक विवादास्पद टिप्पणी में उन्होंने शमिक को बीजेपी आईटी सेल चीफ अमित मालवीय से जोड़ा और कहा कि महिलाओं का गलत इस्तेमाल करने वाले बीजेपी में शामिल हो जाते हैं।

अब टीएमसी की बात है कि यह सीधा-सादा क्रिमिनल मामला है और विपक्ष अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग दे रहा है।

गिरफ्तारी पर उठे सवाल, झूठे मामले में फँसाने का शक

दूसरी तरफ बीजेपी सपोर्टर्स और कई इंफ्लुएंसर्स ने गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाए हैं। कई लोगों ने इशारा किया कि यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई हो सकती है, खासकर क्योंकि शमिक की रील ने राज्य सरकार की कड़ी आलोचना की थी।

कुछ सोशल मीडिया यूजर्स तो यहाँ तक कह रहे हैं कि यौन उत्पीड़न की शिकायत झूठी बनाई गई है ताकि उन्हें चुप कराया जाए। उनका तर्क है कि वायरल वीडियो के ठीक बाद और चुनाव से पहले गिरफ्तारी हुई, जिससे शक पैदा होता है।

बीजेपी आईटी सेल चीफ अमित मालवीय ने ममता बनर्जी की सरकार पर कड़ा हमला बोला। सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल ‘तानाशाही शासन’ बन गया है जहाँ आलोचकों को झूठे और दुर्भावनापूर्ण FIR से निशाना बनाया जाता है।

मालवीय ने लिखा, “यह टीएमसी का शासन मॉडल है: अभिव्यक्ति की आजादी को दबाओ, आलोचकों को डराओ, पुलिस का इस्तेमाल करो और सत्ता में बने रहने के लिए प्रतिष्ठा बर्बाद करो। लेकिन बंगाल देख रहा है। और बंगाल चुप नहीं रहेगा। बीजेपी हर उस शख्स के साथ खड़ी है जो ममता बनर्जी के शासन का शिकार बना है।”

उन्होंने आगे कहा, “पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ मिलकर हम डर को हराएँगे, सत्ता के दुरुपयोग को बेनकाब करेंगे और लोकतंत्र बहाल करेंगे। यह न्याय नहीं है। यह राजनीतिक उत्पीड़न है। और इसका अंत होगा।”

साथी इंफ्लुएंसर्स ने किया शमिक का समर्थन

शमिक को कुछ साथी कंटेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया यूजर्स का भी समर्थन मिला है। एक एक्स यूजर ने सवाल उठाया कि पश्चिम बंगाल में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बोलने वाले इंफ्लुएंसर्स के खिलाफ क्यों केस हो रहे हैं। उन्होंने पूछा कि ऐसे मामलों में सार्वजनिक आक्रोश क्यों नहीं होता।

समर्थकों का कहना है कि शासन और महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है और इसके लिए कानूनी परेशानी नहीं होनी चाहिए। हालाँकि दूसरे लोग कहते हैं कि क्रिमिनल आरोपों को गंभीरता से लेना चाहिए और राजनीतिक बहस से अलग जाँच होनी चाहिए।

फिलहाल शमिक अधिकारी ने कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। आने वाले दिनों में कोर्ट की कार्यवाही और जाँच के नतीजे इस मुद्दे में बड़ी भूमिका निभाएँगे।

केस एक अपराध की शिकायत से शुरू हुआ था, लेकिन अब यह राजनीतिक बहस बन गया है जो आरोपी पर लगे आरोपों के साथ-साथ अभिव्यक्ति की आजादी, राजनीतिक दुश्मनी और चुनाव के समय सोशल मीडिया की भूमिका पर सवाल उठा रहा है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

भारत में काम करते हुए भी पाकिस्तानी बॉस को रिपोर्ट कर रही थी गौरव गोगोई की पत्नी, भेजी कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट: जानिए- असम पुलिस की SIT ने क्या-क्या बताया

कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई के पाकिस्तानी लिंक की जाँच असम स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम यानी एसआटी ने पूरी कर ली है। रिपोर्ट को 8 फरवरी 2026 को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सार्वजनिक कर दी। इसमें लोकसभा में विपक्ष के डिप्टी लीडर और उनकी पत्नी पर गंभीर आरोप लगाए गए।

CM सरमा ने कहा कि राज्य सरकार ने पूरा केस केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दिए हैं, क्योंकि असम पुलिस के पास सीमित अधिकार हैं। उन्होंने कहा कि ये लिंक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है और इनकी विस्तृत जाँच की जरूरत है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि एसआईटी जाँच में जो खुलासे हुए हैं वे बेहद संवेदनशील हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक मौजूदा सांसद का शामिल होना, मामले को ज्यादा ‘गंभीर’ बनाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि गोगोई ने 2015 में नई दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन में एक युवक के साथ जाकर हाई कमिश्नर अब्दुल बासित से मुलाकात की थी।

सीएम के मुताबिक, मैं सिंगापुर में था जब मुझे यह तस्वीर मिली कि हमारे असम के सांसद एक युवक के साथ पाकिस्तानी दूतावास गए थे। उन्होंने कहा कि आज तक कॉन्ग्रेस का भी कोई नेता गोगोई की तरह किसी प्रतिनिधिमंडल के साथ पाकिस्तानी दूतावास नहीं गया।

CM के मुताबिक, एलिजाबेथ पहले US के पूर्व सीनेटर टॉम उडाल की सहयोगी थीं, जो भारत विरोधी अरबपति जॉर्ज सोरोस से जुड़े हैं। ये लोग मोदी सरकार समेत दुनिया भर में राष्ट्रवादी सरकारों को गिराना चाहते हैं।

सरमा ने इस मीटिंग की एक वायरल तस्वीर भी दिखाई। उन्होंने कहा कि शुरुआत में लगा कि तस्वीर फोटोशॉप की हुई हैं, लेकिन बाद में पता चला कि यह तस्वीर असली थी। बताया जाता है कि इसके बाद अब्दुल बासित ने असम का दौरा किया, जो कोई इत्तेफाक नहीं था।

उन्होंने कहा कि एलिज़ाबेथ कोलबर्न गोगोई और पाकिस्तानी नागरिक अली तौकीर शेख के ‘संबंधों’ का भी उन्हें पता चला। जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, एलिजाबेथ ने 18 मार्च, 2011 से 17 मार्च, 2012 तक पाकिस्तान में LEAD पाकिस्तान नाम के एक पाकिस्तानी संगठन के लिए काम किया। इस दौरान, कथित तौर पर उनके अली तौकीर शेख के साथ करीबी रिश्ते बन गए, जिन्हें CM सरमा ने पाकिस्तानी आर्मी, इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) और देश के प्लानिंग कमीशन से कनेक्शन रखने वाला ‘पाकिस्तानी एजेंट’ बताया।

सरमा के मुताबिक, शेख सिर्फ पर्यावरणविद नहीं था, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति था जिसने ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर ‘भारत विरोध’ को बढ़ावा दिया। खासकर सिंधु जल संधि और दूसरे भारत-पाकिस्तान के झगड़ों को लेकर भारत की छवि धुमिल करने की कोशिश की। शेख ने 2010 और 2013 के बीच कम से कम 13 बार भारत का दौरा किया, जिससे भारत विरोधी गतिविधियों में उनकी भूमिका का शक जताया गया। सीएम सरमा ने कहा कि UPA सरकार ने उन्हें भारत आने से नहीं रोका, जबकि उनके भारत विरोधी कमेंट्स के बारे में सबको पता था।

सरमा ने SIT रिपोर्ट से कई चौंकाने वाली बातें बताईं, जिसमें दावा किया गया कि एलिज़ाबेथ का भारत ट्रांसफर हो गया था, लेकिन उनके ट्रांसफर के बाद भी उन्हें पाकिस्तानी फर्म से सैलरी मिलती रही। इतना ही नहीं, ट्रांसफर से एक साल पहले उन्हें भारत आने का अपॉइंटमेंट लेटर जारी किया गया था।

SIT जाँच के मुताबिक, LEAD इंडिया को LEAD पाकिस्तान के तहत लाया गया, ताकि एलिजाबेथ की सैलरी पाकिस्तान से भारत ट्रांसफर की जा सके।

CM ने कहा कि LEAD पाकिस्तान सीधे एलिजाबेथ को सैलरी नहीं भेज सकता था, क्योंकि FCRA के तहत फंड ट्रांसफर सिर्फ भारतीयों को की जा सकती है और वह भारतीय नागरिक नहीं हैं। इसलिए उनकी सैलरी देने के लिए एक भारतीय संस्था LEAD इंडिया को फंड भेजा जाता था।

एलिज़ाबेथ कोलबर्न गोगोई, लीड इंडिया में भावना लूथरा के अंडर काम करती थीं, जिनसे SIT ने इस केस के सिलसिले में पूछताछ की थी। लीड इंडिया के फाइनेंशियल रिकॉर्ड की जाँच से पता चला कि LEAD इंडिया को ऑर्गनाइज़ेशनल काम के नाम पर LEAD पाकिस्तान से फंड मिला था। असल में यह पैसा गोगोई की सैलरी के लिए था।

सरमा ने कहा कि एलिजाबेथ के पाकिस्तान में एक्टिव बैंक अकाउंट थे, लेकिन उसने SIT को अकाउंट की डिटेल्स बताने से मना कर दिया। एक और चौंकाने वाली बात यह थी कि उसकी सैलरी भारत में उसके सीनियर से बहुत ज़्यादा थी। जहाँ उसे ₹2,50,000 मिलते थे, वहीं भावना लूथरा की सैलरी ₹50,000 थी।

जाँच के अनुसार, गोगोई को FCRA के ज़रिए पाकिस्तान से कुल ₹82.41 लाख मिले। LEAD इंडिया को LEAD पाकिस्तान से ₹63.48 लाख मिले, जबकि सितंबर 2012 से नवंबर 2014 तक कुल ₹91.27 लाख मिले। इसमें से 90% रकम अकेले गौरव गोगोई की पत्नी को मिली।

इससे यह साफ हो जाता है कि LEAD इंडिया पूरी तरह से LEAD पाकिस्तान के अंडर था, यह एक अजीब अरेंजमेंट है क्योंकि आम तौर पर, इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन की कंट्री यूनिट्स का रैंक और स्टेटस बराबर होता है, और उन्हें रीजनल/ग्लोबल हेड्स चलाते हैं। लेकिन इस मामले में, एक लोकसभा MP की पत्नी पाकिस्तान के सीधे कंट्रोल वाले ऑर्गनाइज़ेशन के अंडर काम करती थी। सीएम ने इसे गंभीर मामला बताया।

जाँच के दौरान SIT ने यह एग्रीमेंट हाथ लगी। CM सरमा के मुताबिक, जब एलिजाबेथ पाकिस्तान से इंडिया ट्रांसफर हुई, तो वह इंडिया में काम करने वाली LEAD पाकिस्तान की ‘शैडो एम्प्लॉई’ बनी रही। उन्होंने कहा कि SIT ने LEAD इंडिया ऑफिस से पाकिस्तान से इंडिया में पैसे के फ्लो को दिखाने वाले डॉक्यूमेंट्स ज़ब्त किए हैं, और भावना लूथरा ने भी इसकी पुष्टि की है।

CM सरमा ने एक और सनसनीखेज आरोप लगाया कि एलिजाबेथ ने भारत से जुड़ी संवेदनशील जानकारी पाकिस्तान को दी। इसमें शेख को भेजा गया 50 पेज का एक कॉन्फिडेंशियल डॉक्यूमेंट भी शामिल है। इसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के सोर्स का जिक्र था। रिपोर्ट को कॉन्फिडेंशियल मार्क किया गया था। यह ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 के सेक्शन 2 का सीधा उल्लंघन है।

पूछताछ के दौरान एलिजाबेथ ने माना कि उसने रिपोर्ट लिखी थी। CM के मुताबिक रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वह है जिसमें एलिजाबेथ पर लो रिस्क, लो विजिबिलिटी रणनीति को बढ़ावा देने का आरोप है। इस रणनीति के तहत पाकिस्तानी एजेंटों को सलाह दी गई थी कि वे केंद्र सरकार के बजाय राज्य सरकारों और क्षेत्रीय राजनीतिक तनावों का फायदा उठाएँ। उन्होंने लिखा था कि PM मोदी के राज में केंद्र और राज्यों के बीच तनाव बढ़ेगा।

जब वह LEAD इंडिया में काम कर रही थीं, तो 6 बार इस्लामाबाद गईं। LEAD इंडिया छोड़ने और ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट में जुड़ने के बाद तीन बार फिर पाकिस्तान गईं। CM सरमा के मुताबिक, हर बार उन्होंने फ्लाइट के बजाय अटारी बॉर्डर के रास्ते का इस्तेमाल किया। SIT के मुताबिक, LEAD इंडिया की हेड भावना लूथरा ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि एलिजाबेथ पाकिस्तान क्यों गईं।

SIT का एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई का खुलासा

  • सीनेटर टॉम उडाल के जरिए जॉर्ज सोरोस से लिंक
  • अली तौकीर शेख के अंडर LEAD पाकिस्तान में नौकरी
  • पाकिस्तानी बैंक अकाउंट की जानकारी देने से मना कर दिया
  • LEAD इंडिया के साथ पहले से तय नौकरी का कॉन्ट्रैक्ट (जॉइन करने से 18 महीने पहले जारी किया गया)
  • भारत में एंट्री आसान बनाने के लिए ‘शैडो नौकरी’ का इंतजाम
  • रिपोर्टिंग मैनेजर से 500% ज्यादा सैलरी और FCRA का उल्लंघन
  • पाकिस्तान से फंडिंग का सोर्स छिपाया
  • LEAD इंडिया मैनेजमेंट की तरफ से कोई निगरानी नहीं, सीधे पाकिस्तान को रिपोर्ट की गई
  • पाकिस्तान को कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट भेजना (5 अगस्त, 2014)
  • रिपोर्ट में सीक्रेट IB कम्युनिकेशन का जिक्र था
  • पाकिस्तानी एक्टर्स के लिए ‘लो रिस्क लो विज़िबिलिटी’ स्ट्रैटेजी की वकालत की गई
  • राज्य-लेवल पर बातचीत करने और केंद्र सरकार को बायपास करने की सलाह दी गई
  • खुफिया रिपोर्ट में केंद्र-राज्य के राजनीतिक तनाव का फायदा उठाया गया
  • अली तौकीर शेख के साथ नौकरी से पहले एक साथ 3 बार यात्रा
  • LEAD इंडिया में रहते हुए पाकिस्तान की 6 बार बिना इजाजत दौरा
  • ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट जॉइन करने के बाद पाकिस्तान के 3 और दौरे

मुख्यमंत्री ने गौरव गोगोई के बारे में भी बात की और कहा कि 2013 में अपने पहले लोकसभा चुनाव जीतने से 5 महीने पहले, गोगोई इजरायल की यात्रा के दौरान अपना पासपोर्ट खो जाने के बाद ज़मीनी बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान गए थे। CM सरमा ने पाकिस्तान पहुँचने पर गोगोई के सिंगल एंट्री वीजा को मल्टीपल-एंट्री में अपग्रेड करने और बॉर्डर पर झड़पों के बीच पाकिस्तानी शहरों में ISI के आकाओं से मुलाकात का आरोप लगाया।

CM के मुताबिक, गोगोई का वीजा सिर्फ लाहौर के लिए था, लेकिन पाकिस्तान पहुँचने के बाद, उनके वीजा को इस्लामाबाद और कराची तक के लिए बढ़ा दिया गया। यह एक्सटेंशन पाकिस्तान के गृह मंत्रालय द्वारा लिखे गए एक लेटर के आधार पर किया गया था। CM सरमा ने कहा कि SIT ने वीजा लोकेशन बढ़ाने के लिए मंजूरी दिखाने वाला पासपोर्ट हासिल कर लिया है।

CM के मुताबिक, पाकिस्तान जाने के बाद गोगोई की पर्सनैलिटी पूरी तरह बदल गई और उन्होंने दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन में न्यूक्लियर पावर प्लांट, यूरेनियम रिज़र्व, बॉर्डर सिक्योरिटी, डिफेंस हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर, एयर पावर, घरेलू हथियार बनाने, जासूसी जैसे कॉन्फिडेंशियल मामलों से जुड़े पार्लियामेंट्री सवाल उठाए। उन्होंने नेशनल वॉटर मिशन स्ट्रेटेजी पर भी सवाल पूछे, जो एलिजाबेथ के काम के एरिया से जुड़ा मामला था।

CM ने एक इंटरव्यू का वीडियो क्लिप भी दिखाया, जिसमें गौरव गोगोई ने कहा था कि वह पाकिस्तान इसलिए गए थे क्योंकि उनकी पत्नी वहाँ काम कर रही थीं, लेकिन CM सरमा ने बताया कि उनकी पत्नी का उनके दौरे से एक साल पहले LEAD इंडिया में ट्रांसफर हो गया था।

हालाँकि गौरव गोगोई की बेटी ब्रिटिश नागरिक है, क्योंकि उसका जन्म लंदन में हुआ था। CM सरमा के मुताबिक उन्होंने अपने भारत में जन्मे बेटे का इंडियन पासपोर्ट सरेंडर कर दिया। उन्होंने दिल्ली में रीजनल पासपोर्ट द्वारा जारी किया गया सरेंडर सर्टिफिकेट दिखाया, जिसमें कहा गया था कि पासपोर्ट 12 मई 2022 को सरेंडर किया गया था। CM सरमा ने इसे बहुत अफसोस की बात बताया कि असम के पूर्व CM तरुण गोगोई के बेटे ने अपने बेटे का इंडियन पासपोर्ट सरेंडर कर दिया।

CM ने एक और गंभीर आरोप लगाया कि जब बेटे कबीर गोगोई के पास इंडियन पासपोर्ट था, तो उसका धर्म हिंदू लिखा था, लेकिन उसके ब्रिटिश पासपोर्ट में किसी धर्म का जिक्र नहीं है। दूसरी तरफ बेटी माया गोगोई के ब्रिटिश पासपोर्ट में उसका धर्म क्रिश्चियन लिखा है।

CM सरमा ने कहा कि उनके बेटे का ईसाई में धर्मांतरण हो रहा है और गौरव गोगोई अब अपने ही परिवार में धार्मिक अल्पसंख्यक हैं।

हिमंता सरमा ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा, “SIT ने सबूत दिया है कि तीन लोगों का पाकिस्तान से सीधा लिंक है— अली तौकीर शेख, एलिजाबेथ गोगोई और गौरव गोगोई। SIT रिपोर्ट देखने के बाद हमारे कैबिनेट मंत्री भी हैरान रह गए।”

उन्होंने आगे कहा कि शुरू में असम पुलिस की CID जाँच कर रही थी। उसमें जब गंभीरता का अंदाजा लगा तो इंटरपोल की मदद की जरूरत पड़ी और असम पुलिस के अधिकार क्षेत्र से बाहर के क्लासिफाइड डेटा तक पहुँच की जरूरत थी। कैबिनेट ने 7 फरवरी को रिपोर्ट पर चर्चा की। कैबिनेट ने कॉन्फिडेंशियल बातों को छोड़कर इसके कुछ हिस्से को बताने की मंजूरी दी। कैबिनेट ने आगे की जाँच के लिए रिपोर्ट को केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजने का फैसला किया है।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने यह भी सवाल उठाया है कि गौरव गोगोई से शादी के इतने साल बाद भी एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई ने अपना UK वीजा क्यों रखा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि उनके बच्चे भी ब्रिटिश नागरिक क्यों हैं और भारतीय नागरिकता के लिए कोई आवेदन क्यों नहीं किया गया है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

गरीब-पिछड़े छात्रों का ‘अभ्युदय’: CM योगी के ड्रीम प्रोजेक्ट से PCS-NEET-JEE की राह आसान, जानिए कैसे फ्री कोचिंग से UP सरकार प्रतिभाओं को रही तराश

शिक्षा हमेशा से केवल ज्ञान का माध्यम नहीं रही बल्कि सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा हथियार भी रही है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और सामाजिक रूप से विविध राज्य में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना और उसके बाद समाज में बदलाव लाना कई छात्रों का सपना रहता है लेकिन हकीकत यह है कि लाखों गरीब और गाँव के छात्र, चाहे उनमें कितनी भी प्रतिभा क्यों न हो सिर्फ इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि वे महँगी कोचिंग नहीं ले पाते।

दिल्ली, कोटा जैसे शहरों में UPSC, PCS, NEET या JEE की तैयारी के लिए लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं जो एक सामान्य किसान, मजदूर या निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के लिए लगभग असंभव होता है। इसी सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया और मुफ्त कोचिंग के लिए ‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना‘ की शुरुआत की। यह योजना केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए उम्मीद की नई शुरुआत बन गई जिनके पास सपने तो थे लेकिन साधन नहीं थे।

क्या है यह योजना?

‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ की शुरुआत 16 फरवरी 2021 को बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से की गई थी। इसका मकसद ऐसे प्रतिभाशाली छात्रों को मुफ्त कोचिंग देना है, जो आर्थिक कमजोरी या संसाधनों की कमी के कारण निजी कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। सरकार प्रदेश में युवाओं के लिए 8 नि:शुल्क आवासीय और 150 मुख्यमंत्री अभ्युदय कोचिंग चला रही है। कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस कोचिंग बनने से जुड़ा एक किस्सा भी सुनाया था।

मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के तहत कई बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है। इसमें संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाओं के साथ साक्षात्कार की तैयारी शामिल है। इसके अलावा JEE और NEET जैसी इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाता है। वहीं, NDA और CDS जैसी रक्षा सेवाओं से जुड़ी परीक्षाओं की तैयारी की सुविधा भी इस योजना में उपलब्ध है।

योजना के अंतर्गत छात्रों को पढ़ाई की कई सुविधाएँ मुफ्त में दी जाती हैं। छात्रों के लिए ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों तरह की कक्षाएँ चलाई जाती हैं ताकि वे अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ सकें। इसके साथ ही ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म की सुविधा दी गई है। सरकारी अधिकारी और विषय विशेषज्ञ छात्रों को मार्गदर्शन देते हैं और उनकी शंकाओं का समाधान करते हैं। छात्रों को करियर काउंसलिंग, पुस्तकालय की सुविधा और इंस्पिरेशनल क्लासेज भी उपलब्ध कराई जाती हैं।

इस योजना के तहत देश के अनुभवी अधिकारी और विशेषज्ञ छात्रों की मदद करते हैं। इसमें 500 से अधिक IAS अधिकारी, 450 से ज्यादा PCS अधिकारी, 300 से अधिक IFS अधिकारी और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ इस टीम में शामिल हैं। ये सभी अधिकारी और विशेषज्ञ छात्रों के लिए पढ़ाई की सामग्री तैयार करते हैं और ऑफलाइन कक्षाओं के साथ-साथ ऑनलाइन सेशन के जरिए मार्गदर्शन देते हैं ताकि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों को सही दिशा और बेहतर शिक्षा मिल सके।

इतना ही नहीं, छात्रों को इंटरव्यू की तैयारी के लिए ‘मॉक इंटरव्यू’ की सुविधा भी दी जाती है, जिससे वे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा में शामिल हो सकें। सरकार का कहना है कि इस योजना के जरिए कमजोर वर्ग के प्रतिभाशाली छात्रों को आगे बढ़ने का अवसर मिल रहे हैं और उन्हें प्रशासनिक सेवाओं सहित विभिन्न क्षेत्रों में सफलता हासिल करने में भी यह योजना मदद कर रही है।

कैसे कर सकते हैं रजिस्ट्रेशन?

‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ के तहत अब प्रदेश के सभी 75 जिलों में मुफ्त कोचिंग की सुविधा उपलब्ध है। इस योजना के जरिए गरीब और ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभाशाली छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जा रही है। योजना में प्रवेश के इच्छुक छात्र ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से पंजीकरण कर सकते हैं। छात्र abhyuday.up.gov.in, abhyudayup.in और yuvasathi.in वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। वहीं, ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन के लिए आम तौर पर जिले के विकास भवन स्थित समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में पंजीकरण की सुविधा दी जाती है। पंजीकरण के बाद छात्रों का एक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया जाता है, जिसके माध्यम से आगे की सभी जानकारियाँ साझा की जाती हैं।

‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ में रजिस्ट्रेशन के लिए कुछ जरूरी दस्तावेजों की आवश्यकता होती है। इसमें आधार कार्ड, उत्तर प्रदेश का निवास प्रमाण पत्र (डोमिसाइल), आय प्रमाण पत्र, शैक्षणिक प्रमाण पत्र जैसे 10वीं, 12वीं या ग्रेजुएशन की मार्कशीट और पासपोर्ट साइज फोटो शामिल हैं। इन दस्तावेजों के माध्यम से छात्रों की पहचान, निवास और आर्थिक स्थिति का सत्यापन किया जाता है।

पात्रता और चयन प्रक्रिया

योजना में प्रवेश के लिए पात्रता भी परीक्षा के अनुसार तय की गई है। JEE और NEET की तैयारी के लिए विज्ञान वर्ग के वे छात्र पात्र हैं, जो कक्षा 11 या 12 में पढ़ रहे हैं या परीक्षा पास कर चुके हैं। IAS और PCS जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं के प्रशिक्षण के लिए स्नातक अंतिम वर्ष के छात्र या स्नातक पास कर चुके छात्र आवेदन कर सकते हैं। वहीं, NDA और CDS जैसी रक्षा सेवाओं की परीक्षाओं के लिए पात्रता संबंधित परीक्षा के नियमों के अनुसार होती है।

छात्रों के चयन की प्रक्रिया भी तय की गई है। आम तौर पर कोचिंग का सत्र 1 जुलाई से 30 अप्रैल तक चलता है। हर वर्ष निर्धारित तिथियों के अनुसार संबंधित कोर्स के लिए चयन प्रक्रिया तय की जाती है। छात्रों का चयन प्रवेश परीक्षा, मेरिट सूची या साक्षात्कार के आधार पर किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया जिला स्तरीय समिति द्वारा निर्धारित की जाती है ताकि योग्य छात्रों को योजना का लाभ मिल सके।

गाजियाबाद जिले में इस योजना के कोर्स-को-ऑर्डिनेटर रहे अविनाश ने ‘ऑपइंडिया’ से बातचीत में इस योजना को आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर बताया है। उनके अनुसार, यह योजना उन प्रतिभाशाली छात्रों के लिए वरदान साबित हो रही है जो संसाधनों की कमी के कारण महँगी कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई नहीं कर पाते थे। उन्होंने कहा कि ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से कक्षाएँ संचालित होने के कारण दूर-दराज और ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र भी इस योजना से जुड़ पा रहे हैं। हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि यदि हर जिले में डिजिटल संसाधनों को और मजबूत किया जाए तो ज्यादा छात्रों को लाभ मिल सकता है।

सैकड़ों छात्रों ने लिखी सफलता की कहानी

यह योजना छात्रों के लिए एक प्रभावी मंच साबित हो रही है। इस योजना के तहत मिलने वाली मुफ्त कोचिंग और मार्गदर्शन से छात्रों ने बड़ी-बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल की है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की PCS मुख्य परीक्षा 2024 में अभ्युदय योजना से जुड़े कुल 75 छात्र सफल हुए हैं। इनमें सबसे अधिक 40 छात्र भागीदारी भवन, लखनऊ से चयनित हुए हैं। इसके अलावा लखनऊ के आदर्श पूर्व परीक्षा प्रशिक्षण केंद्र से 18 छात्र और हापुड़ के IAS/PCS कोचिंग सेंटर से 17 छात्रों ने मुख्य परीक्षा में सफलता प्राप्त की है।

इससे पहले भी अभ्युदय योजना के छात्र विभिन्न परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन कर चुके हैं। UPSC 2023 में इस योजना से जुड़े 23 छात्रों का चयन हुआ था। वहीं, UPPCS 2023 में 30 छात्रों ने सफलता हासिल की थी। इसी तरह JEE मेन्स 2024 में 35 छात्र सफल हुए हैं जो इस बात का प्रमाण है कि योजना न केवल सिविल सेवा बल्कि इंजीनियरिंग जैसी कठिन परीक्षाओं में भी छात्रों को आगे बढ़ने का मौका दे रही है।

सरकार के अनुसार, आगामी सत्र के लिए विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु लगभग 27,000 छात्रों ने पंजीकरण कराया है। इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का जुड़ना इस बात का संकेत है कि अभ्युदय योजना पर छात्रों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है। खास बात यह है कि इस योजना से सबसे ज्यादा लाभ ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को मिल रहा है, जिन्हें पहले अच्छे मार्गदर्शन और संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता था।

योगी सरकार का समाज बदलने वाला साहसिक कदम

पहले सिविल सेवा या डॉक्टर-इंजीनियर बनने का सपना केवल बड़े शहरों और संपन्न वर्ग के बच्चों तक सीमित था। अब गाँवों और गरीब परिवारों के बच्चे भी इस क्षेत्रों में पहुँच रहे हैं। जब किसी छोटे गाँव का छात्र IAS या PCS बनता है, तो वह केवल अपनी किस्मत नहीं बदलता, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।

योगी सरकार की इस योजना की तारीफ इसलिए जरूरी है क्योंकि इसने शिक्षा को केवल निजी संस्थानों के भरोसे छोड़ने के बजाय सरकारी जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया। आज देश में कोचिंग उद्योग अरबों रुपए का कारोबार बन चुका है, जहाँ गरीब छात्रों के लिए जगह बहुत सीमित है। ऐसे में राज्य सरकार द्वारा मुफ्त कोचिंग की व्यवस्था करना एक साहसिक फैसला है।

हालाँकि, किसी भी बड़ी योजना की तरह अभ्युदय कोचिंग के सामने भी चुनौतियाँ रही हैं। कुछ जगहों पर संसाधनों की कमी, शिक्षकों की गुणवत्ता या अन्य समस्याओं की शिकायतें आई हैं। इसके बावजूद यह तथ्य नहीं बदला जा सकता कि अभ्युदय योजना ने हजारों छात्रों को वह अवसर दिया जो पहले उनके लिए उपलब्ध नहीं था। योगी सरकार इस योजना को केवल एक सरकारी घोषणा नहीं बल्कि लंबे वक्त के लिए शैक्षिक सुधार के तौर में देख रही है।