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‘क्या मर्द भी हो सकते हैं प्रेग्नेंट?’: US में छिड़ी ‘Woke’ बहस, जानिए क्या कहता है विज्ञान

अमेरिका की सीनेट में गर्भपात (Abortion) दवाओं की सुरक्षा पर चल रही एक सुनवाई अचानक उस वक्त सुर्खियों में आ गई, जब रिपब्लिकन सीनेटर जोश हॉली ने भारतीय मूल की प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनोकॉलोजिस्ट) डॉ निशा वर्मा से सीधा सवाल कर दिया, “क्या पुरुष प्रेग्नेंट हो सकते हैं?”। यह सवाल एक नहीं, बार-बार दोहराया गया। डॉक्टर ने सीधे ‘हाँ या ना’ में जवाब देने से इनकार किया और कहा कि वह अलग-अलग जेंडर पहचान वाले मरीजों का इलाज करती हैं।

इसी पल का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल है। कोई इसे वोक पॉलिटिक्स बता रहा है, तो कोई इसे बायोलॉजिकल सच्चाई की अनदेखी कह रहा है। सवाल सीधा था, लेकिन उसके पीछे राजनीति, जेंडर आइडेंटिटी और मेडिकल साइंस की एक जटिल बहस छिपी हुई है।

मामला क्या था और बहस क्यों भड़की?

यह सुनवाई अमेरिकी सीनेट की हेल्थ, एजुकेशन, लेबर एंड पेंशन (HELP) कमेटी में हो रही थी। विषय था ‘महिलाओं की सुरक्षा और केमिकल अबॉर्शन ड्रग्स के खतरे’। ऑब्स्टेट्रिशियन-गायनेकोलॉजिस्ट डॉ निशा वर्मा ने गर्भपात (Abortion) की दवाओं का बचाव करते हुए कहा कि इन पर 100 से ज्यादा पीयर-रिव्यू रिसर्च हो चुकी हैं और साल 2000 से अब तक अमेरिका में 75 लाख से ज्यादा लोग इनका सुरक्षित इस्तेमाल कर चुके हैं।

यहीं से सीनेटर हॉली ने बहस का रुख बदल दिया। उन्होंने डॉक्टर से बार-बार पूछा, “क्या पुरुष प्रेग्नेंट हो सकते हैं? यह हाँ या ना का सवाल है।” सीनेटर हॉली का तर्क था कि अगर डॉक्टर बुनियादी बायोलोजिक सच्चाई भी स्वीकार नहीं कर रहीं, तो उनकी मेडिकल गवाही पर भरोसा कैसे किया जाए। वहीं डॉ वर्मा ने कहा कि ऐसे सवाल असल मुद्दे से ध्यान भटकाने और मरीजों की जटिल वास्तविकताओं को नजरअंदाज करने का तरीका हैं।

बायोलॉजी और हार्मोन: महिलाएँ ही क्यों गर्भवती हो सकती हैं?

प्रकृति ने स्त्री और पुरुष के शरीर की बनावट अलग-अलग कामों के लिए की है। महिलाओं के शरीर में बच्चे दानी (गर्भाशय) और अंडाशय (Ovary) जैसे विशेष अंग होते हैं, जो पुरुषों के शरीर में नहीं पाए जाते। बच्चा पैदा करने के लिए इन अंगों का होना सबसे जरूरी है। इसके साथ ही, महिलाओं के शरीर में कुछ खास हार्मोन (जैसे एस्ट्रोजन) होते हैं, जो बच्चे को पेट में पालने और उसे सुरक्षित रखने का काम करते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पुरुषों के शरीर में बच्चे दानी नहीं होती, इसलिए वहाँ भ्रूण (बच्चा) के ठहरने और बढ़ने के लिए कोई जगह नहीं है। बच्चे को जीवित रहने के लिए माँ के शरीर के भीतर जिस पोषण और सुरक्षा की जरूरत होती है, वह केवल महिलाओं के बच्चे दानी (गर्भाशय) में ही मिल सकती है। पुरुषों के शरीर में वह जैविक सिस्टम ही नहीं है जो नौ महीने तक बच्चे का बोझ उठा सके या उसे विकसित कर सके।

गर्भधारण (Pregnancy) के लिए शरीर में अंडे (Eggs) का बनना जरूरी है, जो केवल महिलाओं के अंडाशय (Ovary) में ही बनते हैं। पुरुषों के शरीर में मुख्य रूप से ‘टेस्टोस्टेरोन’ हार्मोन होता है, जो दाढ़ी-मूँछ और शारीरिक मजबूती के लिए होता है। उनके शरीर में वह हार्मोनल चक्र नहीं चलता, जो एक अंडे को विकसित करने और फिर उसे एक बच्चे का रूप देने के लिए जरूरी होता है। इसी कारण से, एक जैविक पुरुष प्राकृतिक रूप से कभी प्रेग्नेंट नहीं हो सकता।

ट्रांस-प्रेग्नेंसी का सच: जेंडर पुरुष का, लेकिन अंग महिला के

अक्सर जब हम खबरों में पढ़ते हैं कि ‘एक पुरुष ने बच्चे को जन्म दिया’, तो यह सुनकर हैरानी होती है। लेकिन चिकित्सा और विज्ञान की भाषा में इसका मतलब उन लोगों से होता है जिन्हें हम ट्रांसजेंडर पुरुष कहते हैं। इसे समझना बहुत आसान है। ये वे लोग होते हैं जिनका जन्म तो एक लड़की के रूप में हुआ था और उनके शरीर में जन्म से ही महिलाओं वाले अंग (जैसे बच्चा दानी और अंडाशय) मौजूद थे, लेकिन बड़े होने पर उन्होंने खुद को पुरुष के रूप में पहचान दी और पुरुषों की तरह रहना शुरू किया।

ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी की रिपोर्ट बताती है कि वैज्ञानिक रूप से देखा जाए, तो सारा खेल शरीर के अंगों का है। बहुत से ट्रांसजेंडर पुरुष अपनी पहचान बदलने के लिए सर्जरी करवाते हैं या पुरुषों वाले हार्मोन (टेस्टोस्टेरोन) के इंजेक्शन लेते हैं, लेकिन वे अपने शरीर से बच्चा दानी (गर्भाशय) को बाहर नहीं निकलवाते। जब ऐसे लोग बच्चा पैदा करना चाहते हैं, तो वे कुछ समय के लिए हार्मोन लेना बंद कर देते हैं। ऐसा करने से उनका शरीर वापस उसी तरह काम करने लगता है जैसे एक महिला का शरीर करता है और वे प्राकृतिक रूप से गर्भवती हो सकते हैं। यानी भले ही वे दुनिया के सामने एक पुरुष की तरह रहते हों, लेकिन उनके शरीर के अंदर मौजूद ‘महिला अंग’ उन्हें माँ बनने (या तकनीकी रूप से पिता बनने) की शक्ति देते हैं।

इसका सबसे मशहूर उदाहरण थॉमस बीटी हैं, जिन्हें दुनिया का पहला ‘प्रेग्नेंट फादर’ कहा जाता है। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि थॉमस ने एक महिला के शरीर के साथ जन्म लिया था, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पहचान बदल ली और दाढ़ी-मूँछ वाले पुरुष बन गए। उनकी पत्नी बच्चा पैदा करने में असमर्थ थीं, इसलिए थॉमस ने फैसला किया कि वे खुद बच्चे को जन्म देंगे। चूँकि उन्होंने अपने बच्चे दानी को शरीर से अलग नहीं किया था, इसलिए वे गर्भवती हो सके और एक नहीं बल्कि तीन बच्चों को जन्म दिया। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि विज्ञान के हिसाब से थॉमस इसलिए प्रेग्नेंट हो सके क्योंकि उनके पास जन्मजात महिला अंग थे, किसी जैविक पुरुष (सिसजेंडर) के लिए ऐसा करना फिलहाल मुमकिन नहीं है।

द गार्जियन‘ की रिपोर्ट बताती है कि जेसन बार्कर एक ट्रांसजेंडर पुरुष हैं। इसका सरल मतलब यह है कि उनका जन्म एक लड़की के रूप में हुआ था, लेकिन बड़े होकर उन्होंने खुद को पुरुष के रूप में पहचाना और दाढ़ी-मूँछ वाले व्यक्ति बन गए। जेसन और उनकी पार्टनर ट्रेसी कई सालों से बच्चा चाहते थे, लेकिन ट्रेसी माँ नहीं बन पा रही थीं। तब जेसन ने एक साहसी फैसला लिया। चूंकि उन्होंने सर्जरी के बाद भी अपनी ‘बच्चा दानी’ (गर्भाशय) शरीर से नहीं हटवाई थी, इसलिए उन्होंने खुद बच्चे को जन्म देने का निर्णय किया।

जेसन ने पुरुषों वाले हार्मोन (टेस्टोस्टेरोन) लेना बंद कर दिया, जिससे उनका शरीर फिर से गर्भधारण के लिए तैयार हो गया। अपनी गर्भावस्था के दौरान, जेसन बाहर से एक दाढ़ी वाले ‘मोटे आदमी’ जैसे दिखते थे, इसलिए बस या दुकानों में किसी को अंदाजा ही नहीं होता था कि वे प्रेग्नेंट हैं। उन्होंने इस पूरे अनुभव पर एक फिल्म भी बनाई, जिसमें उन्होंने दिखाया कि कैसे एक पुरुष की पहचान रखते हुए भी उन्होंने माँ बनने का सुख पाया। आज उनका बेटा बड़ा हो चुका है और जेसन उसे एक पिता की तरह पाल रहे हैं।

यह उदाहरण साफ करता है कि ‘ट्रांस-प्रेग्नेंसी’ का मतलब किसी बायोलॉजिकल पुरुष का प्रेग्नेंट होना नहीं है, बल्कि उन लोगों का माँ बनना है जिनके पास जन्म से महिला अंग मौजूद थे। जेसन की कहानी दिखाती है कि भले ही समाज के लिए यह एक अजीब बात हो, लेकिन विज्ञान के लिए यह अंगों और हार्मोन का एक तालमेल है, जिसने एक पिता को अपनी संतान को जन्म देने की शक्ति दी।

कोख का ‘ट्रांसप्लांट’: क्या भविष्य में बायोलॉजिकल पुरुष भी दे पाएँगे बच्चे को जन्म?

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की रिपोर्ट बताती है कि विज्ञान आज इतनी तरक्की कर चुका है कि अब उन महिलाओं के लिए भी माँ बनना मुमकिन हो गया है, जिनके पास जन्म से गर्भाशय (बच्चा दानी) नहीं था या किसी बीमारी के कारण उसे हटाना पड़ा था। इसे ‘यूटरस ट्रांसप्लांट’ यानी गर्भाशय प्रत्यारोपण कहते हैं। इस तकनीक की सफलता के बाद अब दुनिया भर में यह चर्चा छिड़ गई है कि क्या भविष्य में यह तकनीक किसी बायोलॉजिकल पुरुष (सिसजेंडर पुरुष) के लिए भी काम कर सकती है? क्या सर्जरी के जरिए किसी पुरुष के शरीर में कोख लगाई जा सकती है? हालाँकि, सुनने में यह किसी चमत्कार जैसा लगता है, लेकिन विज्ञान के सामने इसके लिए बहुत बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हैं।

पहली और सबसे बड़ी मुश्किल शरीर की बनावट यानी ‘पेल्विस’ (कूल्हे की हड्डी) के ढाँचे को लेकर है। कुदरत ने महिलाओं के कूल्हे की हड्डियों को चौड़ा और लचीला बनाया है, ताकि गर्भ में बच्चा बढ़ सके और जन्म के समय आसानी से बाहर आ सके। इसके उलट, पुरुषों के कूल्हे का ढाँचा संकरा (Narrow) और सख्त होता है। पुरुष के शरीर में न तो बढ़ते हुए बच्चे के लिए पर्याप्त जगह होती है और न ही वहाँ वैसी नसें मौजूद होती हैं, जो गर्भाशय को भारी मात्रा में खून की सप्लाई दे सकें। सिर्फ सर्जरी से बच्चा दानी फिट कर देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरे शरीर के आंतरिक ढाँचे को बदलना पड़ेगा, जो फिलहाल नामुमकिन जैसा है।

दूसरी बड़ी चुनौती हार्मोनल सिस्टम की है। एक महिला का शरीर गर्भावस्था के दौरान प्राकृतिक रूप से ढेरों हार्मोन पैदा करता है, जो बच्चे को नौ महीने तक जिंदा रखने के लिए जरूरी होते हैं। पुरुषों के शरीर में ये हार्मोन नहीं होते। अगर किसी पुरुष को प्रेग्नेंट करने की कोशिश की जाती है, तो उसे बाहर से भारी मात्रा में दवाओं और हार्मोन के इंजेक्शन देने पड़ेंगे। इतने ज़्यादा हार्मोन पुरुष शरीर के अंगों (जैसे लीवर और दिल) पर बुरा असर डाल सकते हैं और इसके नतीजे बहुत खतरनाक हो सकते हैं। यही वजह है कि आज तक दुनिया में ऐसा कोई भी मामला सामने नहीं आया है जहाँ किसी जैविक पुरुष ने बच्चे को जन्म दिया हो। यह तकनीक फिलहाल केवल महिलाओं के लिए ही एक वरदान साबित हुई है।

विज्ञान और विचारधारा का टकराव

अमेरिकी सीनेट में हुई यह बहस सिर्फ एक डॉक्टर और एक नेता की नोकझोंक नहीं है, बल्कि यह इस दौर की एक बड़ी वैचारिक जंग है। एक तरफ वह लोग हैं जो मानते हैं कि विज्ञान और शरीर की बनावट कभी नहीं बदलती, और दूसरी तरफ वे हैं जो मानते हैं कि इंसान की अपनी पसंद और पहचान सबसे ऊपर है। सीनेटर जोश हॉली जैसे लोगों का मानना है कि जो सच है उसे वैसे ही कहना चाहिए। उनका कहना है कि अगर कोई डॉक्टर यह बुनियादी बात मानने से ही इनकार कर दे कि केवल महिलाएँ ही गर्भवती हो सकती हैं, तो फिर उनकी डॉक्टरी और उनके ज्ञान पर भरोसा कैसे किया जा सकता है? उनके लिए यह भावनाओं का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर विज्ञान का सवाल है।

दूसरी तरफ, डॉ निशा वर्मा और उनके जैसे विचार रखने वाले लोगों का तर्क अलग है। उनका कहना है कि आज के समय में इलाज करते वक्त हमें मरीज की भावनाओं और उसकी पसंद का ख्याल रखना चाहिए। वे ‘गर्भवती महिला’ की जगह ‘गर्भवती व्यक्ति’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना चाहते हैं, ताकि ट्रांसजेंडर लोगों को बुरा न लगे। लेकिन यहीं से विवाद शुरू होता है। आलोचकों का मानना है कि किसी को खुश करने या उनकी भावनाओं का सम्मान करने के चक्कर में हम उन वैज्ञानिक सच्चाइयों को नहीं झुठला सकते जिन्हें दुनिया सदियों से जानती है।

कुल मिलाकर, यह विवाद हमें एक बड़ी बात समझाता है। पुरुष और महिला के शरीर की अपनी-अपनी सीमाएँ और पहचान होती हैं, जो कुदरत ने तय की हैं। जब राजनीति और अलग-अलग विचारधाराएँ विज्ञान के काम में दखल देने लगती हैं, तो असली सच कहीं खो जाता है। यह बहस चेतावनी देती है कि समाज में सबको साथ लेकर चलना अच्छी बात है, लेकिन ऐसा करते समय हमें उन बुनियादी तथ्यों को नहीं भूलना चाहिए जो जीवन का आधार हैं। विज्ञान सबूतों पर चलता है, और सबूत यही कहते हैं कि कोख कुदरत ने सिर्फ महिला शरीर को ही दी है।

उस पंजाब केसरी को धमका रही AAP सरकार, जिसके 51+ पत्रकारों को मार डाला था खालिस्तानी आतंकियों ने, फिर भी लिखता रहा उनके खिलाफ

पंजाब केसरी ग्रुप को पंजाब सरकार द्वारा निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आ रही हैं। पंजाब केसरी समूह ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि अक्टूबर 2025 में प्रकाशित एक संतुलित खबर (जिसमें विपक्ष ने AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाए थे) के बाद से बदले की भावना से कार्रवाई हो रही है। इसमें नवंबर 2025 से सरकारी विज्ञापन बंद करना, जनवरी 2026 में FSSAI, GST, Excise, Pollution Control Board और Factories Department की एक साथ छापेमारी शामिल है।

यह घटना पंजाब केसरी के उस ऐतिहासिक संघर्ष को याद दिलाती है, जब 1980 के दशक में खालिस्तानी आतंकियों ने इस समूह को बार-बार निशाना बनाया था। आज भी यह समूह अपनी मजबूत रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है।

स्वतंत्रता सेनानी लाला जगत नारायण ने की थी पंजाब केसरी ग्रुप की शुरुआत

पंजाब केसरी की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानी और प्रमुख पत्रकार लाला जगत नारायण ने की थी। उन्होंने 1940-50 के दशक में हिंदी भाषा में समाचार पत्र शुरू किए, जो पंजाब में लोकप्रिय हुए। लाला जगत नारायण ने ‘हिंद समाचार’ और ‘पंजाब केसरी’ जैसे अखबारों के जरिए समाज में जागरूकता फैलाई। वे आर्य समाज से जुड़े थे और पंजाब की राजनीति में सक्रिय रहे, यहाँ तक कि विधायक और सांसद भी बने। लेकिन 1980 के दशक में खालिस्तान आंदोलन के उभार के साथ उनकी मुश्किलें शुरू हुईं।

खालिस्तान आंदोलन के विरोध में खड़ा रहा पंजाब केसरी ग्रुप

खालिस्तानी आतंकियों ने पंजाब केसरी को इसलिए निशाना बनाया क्योंकि लाला जगत नारायण और उनके अखबार खालिस्तान आंदोलन के कड़े आलोचक थे। सिख युवाओं में अलगाववाद फैला रहे खालिस्तानी आतंकी जर्नैल सिंह भिंडराँवाले के उभार के समय पंजाब केसरी ने उसकी हरकतों की खुलकर आलोचना की। अखबार ने निरंकारी संप्रदाय पर हमलों के लिए खालिस्तानी तत्वों को दोषी ठहराया और खालिस्तान को ‘राष्ट्र-विरोधी’ बताया।

लाला जगत नारायण ने पंजाबी हिंदुओं से अपील की कि वे जनगणना में हिंदी को अपनी मातृभाषा बताएँ, जिससे सिखों में नाराजगी बढ़ी। अखबार ने सिख आतंकियों और भिंडराँवाले की हिंसा को बिना किसी भेदभाव के उजागर किया। इससे खालिस्तानी उन्हें सिख-विरोधी मानने लगे। उनका मकसद था कि ऐसे मुखर आलोचकों को चुप कराकर डर फैलाया जाए, ताकि कोई भी खालिस्तान के खिलाफ बोले नहीं।

खालिस्तानी आतंकी ने की लाला जगत नारायण की हत्या

लुधियाना के पास 9 सितंबर 1981 को लाला जगत नारायण की हत्या कर दी गई। वे कार में जा रहे थे जब अज्ञात हमलावरों ने गोलीबारी की। यह हत्या भिंडराँवाले के चेले नछत्तर सिंह ने की, जिसने बाद में कबूल किया कि भिंडराँवाले के प्रभाव में यह किया। इस हत्या के बाद भिंडराँवाले को गिरफ्तार किया गया, लेकिन सबूतों के अभाव में छोड़ दिया गया। उनकी हत्या ने पंजाब में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया और हिंदुओं में डर पैदा किया।

सितंबर 1981 में उनकी हत्या ने पंजाब में बढ़ते उग्रवाद को ‘नई धार’ दे दी। HRW की रिपोर्ट में घटना का संदर्भ आते हुए बताया गया है कि 9 सितंबर 1981 को उनकी हत्या के बाद भिंडराँवाले के अनुयायियों पर संदेह गया, गिरफ्तारी हुई और उसके बाद हिंसा और तनाव का दौर बढ़ा।

बता दें कि भारत के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने लाल जगत नारायण की स्मृति में सन् 2013 में डाक टिकट जारी करके सम्मानित किया था। यहाँ ये बताना भी जरूरी है कि इमरजेंसी के समय लाला जगत नारायण ने इंदिरा सरकार का भी जमकर विरोध किया था। यहाँ तक कि इस बार जो काम भगवंत मान की आम आदमी पार्टी की सरकार कर रही है, वही काम कॉन्ग्रेसी सरकार ने भी किया था।

कॉन्ग्रेसी सरकार ने पंजाब केसरी ग्रुप के अखबारों का प्रकाशन रोकने के लिए बिजली सप्लाई काट दी थी, तब पंजाब केसरी ग्रुप ने ट्रैक्टरों की सहायता से प्रिंटिंग का काम किया था और 10 दिनों तक ये व्यवस्था कायम रखी थी, जबकि हाई कोर्ट के आदेश के बाद पंजाब केसरी ग्रुप के प्रिंटिंग प्रेस की बिजली बहाल नहीं हो गई।

रमेश चंदर ने भी पंजाब केसरी के तेवरों को नहीं होने दिया कम

इसके बाद भी पंजाब केसरी चुप नहीं हुआ। लाला जगत नारायण के बेटे रमेश चंदर ने अखबार की कमान संभाली और आलोचना जारी रखी। वे भी खालिस्तान आंदोलन के खिलाफ मजबूती से खड़े रहे। 12 मई 1984 को जालंधर में रमेश चंदर की हत्या कर दी गई। वे चंडीगढ़ से लौट रहे थे जब आतंकियों ने उनकी कार पर हमला किया और गोलीबारी की। दशमेश रेजिमेंट ने जिम्मेदारी ली। यह हत्या खालिस्तानी कमांडो फोर्स के सदस्यों से जुड़ी बताई जाती है। रमेश चंदर की हत्या के समय वे भारी सुरक्षा में थे, लेकिन हमलावरों ने उन्हें घेर लिया।

पमेश चंदर के शरीर को 64 गोलियाँ मारकर छलनी कर दिया और वह भी अपने पिता की भांति देश की एकता के लिए बलिदान हो गए। दुनिया में पत्रकारिता के इतिहास में शायद ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहाँ पिता और पुत्र दोनों को देश और जनता की आवाज उठाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी हो। वास्तव में पिता-पुत्र का बलिदान पत्रकारिता के इतिहास के साथ-साथ भारत के आधुनिक इतिहास का भी गौरवशाली अध्याय है।

पंजाब केसरी ग्रुप के 50+ लोगों की हत्या

पंजाब केसरी ग्रुप के पिता-पुत्र मालिकों की हत्याओं के बाद पंजाब केसरी ग्रुप पर लगातार हमले होते रहे। अखबार के कई कर्मचारी, हॉकर और वेंडर मारे गए। रिपोर्ट्स के अनुसार, लाला जगत नारायण की हत्या के बाद हिंद समाचार ग्रुप से जुड़े 51 से ज्यादा लोग मारे गए। अखबार को बंद करने की कोशिशें हुईं, लेकिन पंजाब केसरी परिवार ने हिम्मत नहीं हारी।

भारत सरकार और पंजाब सरकार ने सुरक्षा देने की कोशिश की, लेकिन 1980 के दशक में स्थिति बहुत खराब थी। इंदिरा गांधी सरकार ने ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984) किया, जिसमें भिंडराँवाले को खत्म किया गया, लेकिन इससे हिंसा और बढ़ गई।

पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगा और पुलिस-सेना को व्यापक अधिकार दिए गए। पंजाब केसरी के संपादकों को CRPF और पुलिस की सुरक्षा दी गई। बाद में संपादक बने अशविनी कुमार चोपड़ाको भी भारी सुरक्षा मिली। लेकिन शुरुआती दौर में सुरक्षा पर्याप्त नहीं थी, जिससे हमले जारी रहे। 1990 के दशक में कच्छ-ऑपरेशन के बाद आतंकवाद कम हुआ और सुरक्षा बेहतर हुई।

आज भी खालिस्तानी आंदोलन को आड़े हाथों लेता है पंजाब केसरी ग्रुप

आज भी पंजाब केसरी खालिस्तानी आतंकियों के खिलाफ वैसे ही तेवर रखता है। यह समूह राष्ट्रवादी और मजबूत रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है। आज का पंजाब 1980-90 के पंजाब जैसा नहीं है, लेकिन खालिस्तान-समर्थक उग्र नैरेटिव, विदेशों से चलने वाला प्रचार, और कुछ प्रतिबंधित संगठनों की गतिविधियाँ समय-समय पर चर्चा में रहती हैं।

जहाँ तक आज के समय में पंजाब केसरी की बात है, उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खालिस्तान आंदोलन की आलोचना/विरोध वाले लेख और रिपोर्टिंग दिखती रही है। वो खालिस्तानी गतिविधियों को उजागर करता रहा है। ऐसे में देखा जाए तो यह अखबार आज भी पंजाब अलगाववाद के विरोध और ‘राष्ट्रीय एकता’ के पक्ष में पूरी तरह से डटा हुआ है।

नई ‘स्वरा भास्कर’ मत बनो AR रहमान, विवादों में खुद घुसो फिर बोलो- नहीं मिल रहा काम: तुम्हारे घर में तिलक लगाकर एंट्री बैन और ‘कम्युनल’ फिल्म इंडस्ट्री है?

आज का जमाना बड़ा बेरहम है। यहाँ गाना अच्छा लगा तो रील बन गई, नहीं लगा तो दो सेकेंड में स्किप। और जब स्किप बटन ज्यादा दबने लगे, तब कुछ लोग सुर सुधारने की जगह बयान सुधारने लगते हैं। एक समय पर इंडस्ट्री के जाने-माने संगीतकार रहे एआर रहमान भी ऐसा ही करते दिखे। काम नहीं मिला तो बात सीधा देश की ‘पावर शिफ्ट‘ तक पहुँचा दी और उसमें ‘कम्युनल एंगल’ भी घुसेड़ दिया।

मतलब गाना नहीं चला तो वजह सुर नहीं, सिस्टम है। ये देश के आम लेफ्ट-लिबरल गैंग का वही पुराना रोना है- पहले खुद को विक्टिम दिखाओ, फिर माहौल को दोषी ठहराओ और आखिर में बात को कम्युनल रंग दे दो ताकि चर्चा पक्की हो जाए।

अब जरा आराम से सोचिए। एआर रहमान का करियर जिस दौर में फला-फूला, क्या उस समय देश में पावर शिफ्ट नहीं हुए थे? क्या तब सरकारें नहीं बदली थीं। क्या तब सिस्टम जस का तस था? बिल्कुल नहीं। उस दौर में भी सरकारें बदलीं, सोच बदली, देश बदला। लेकिन रहमान का नाम आते ही कैसेट बिक जाती थीं। हर गली-मोहल्ले में रहमान के गाने बजते थे। तब उन्हें खतरा नहीं दिखा, तब इंडस्ट्री उन्हें कम्युनल नहीं लगी। सवाल ये है कि अगर पावर शिफ्ट से ही इंडस्ट्री बदल जाती है, तो तब क्यों नहीं बदली? तब क्यों रहमान के गानों को ऑस्कर तक मिल रहे थे?

असल बात ये है कि समय बदल गया है और मार्केट भी। एक समय था जब एआर रहमान का नाम ही काफी होता था। फिल्म चाहे फ्लॉप हो, लेकिन रहमान के गाने सुपरहिट होते थे। आज लोग एक क्लिक में गाना स्किप कर देते हैं। इसमें न सरकार की गलती है, न इंडस्ट्री की। ये सब मार्केट का खेल है। जो पसंद आया, वो चल गया। जो नहीं पसंद आया, वो पीछे रह गया।

आज लोग गाना नहीं, पूरा कंटेंट देखते हैं। आज मार्केट में सिर्फ एआर रहमान नहीं है। आज सैंकड़ों सिंगर, म्यूजिक डायरेक्टर, इंडिपेंडेंट आर्टिस्ट हैं, जो कम बजट में भी लोगों के दिल तक पहुँच रहे हैं। ये कंपीटीशन का दौर है। लेकिन इस कंपीटीशन में उतरने की जगह अगर कोई ये कहे कि मुझे काम इसीलिए नहीं मिल रहा क्योंकि ‘पावर बिना टैलेंट वाले लोगों के हाथों में आ गई है।’

यह एक वरिष्ठ संगीतकार के मुँह से सुना गया बेहुदा बयान से कम कुछ नहीं है, जो खुद को सर्वश्रेष्ठ दिखाने के चक्कर में सिर्फ दूसरों को नीचा दिखाना जानता है। ये काम न मिलने का बहाना नहीं तो और क्या है? और यहीं से ‘कम्युनलिज्म’ वाला कार्ड निकाला जाता है। जब खुद को नए दौर में फिट करने में दिक्कत हो रही हो, तो बात घुमा दी जाती है। जबकि बात होनी चाहिए कि आज की ऑडियंस क्या सुनना चाहती है, बात होनी चाहिए कि म्यूजिक में क्या-क्या बदलाव आए हैं। पर सीधा कह दिया जाता है कि इंडस्ट्री बदल गई है।

ये वही विक्टिम नैरेटिव है, जो हम पहले भी देख चुके हैं। वही स्वरा भास्कर वाला। काम न मिले तो सिस्टम दोषी, सरकार दोषी, माहौल दोषी होते हैं। लेकिन जो लोग सचमुच काम करना चाहते हैं, उन्होंने हर दौर में कामयाबी देखी है। चाहे पहले की सरकार रही हो या आज की। आज भी अरिजीत सिंह, श्रेया घोषाल, विशाल ददलानी, प्रीतम चक्रबोर्ती जैसे संगीतकार 10-15 सालों से लोगों के दिलों पर राज कर रहे हैं।

और मजेदार बात ये है कि आज के दौर में तो मौके पहले से कहीं ज्यादा हैं। स्पॉटिफाई, यूट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म खुले पड़े हैं, जिससे करियर बनाना पहले जितना कठिन नहीं रहा। आज कोई भी अपनी कला सीधे जनता तक पहुँचा सकता है। नए सिंगर बिना किसी गॉडफादर के हिट हो रहे हैं। ऐसे में अगर एआर रहमान जैसे दिग्गज खुद को इस दौर में फिट नहीं कर पा रहे, तो इसमें सरकार की गलती कैसे हो गई?

सच ये है कि इंडस्ट्री कम्युनल नहीं, कमर्शियल है। जो बिकता है, वही चलता है। अच्छे गीत आज भी सुने जाते हैं, लेकिन अच्छे का मतलब बदल गया है। अब लोग लंबा-चौड़ा म्यूजिक नहीं, सीधा दिल को लगने वाला कंटेंट चाहते हैं। ओटीटी का जमाना आ गया है। लोग कहानियों पर फोकस कर रहे हैं, किरदारों पर ध्यान दे रहे हैं। जो चीज समझ नहीं आती, उसे स्किप कर देते हैं। ये बदलाव है, साजिश नहीं।

यहाँ बात अगर एआर रहमान की हो रही है, तो यह पहली बार नहीं है जब वो किसी विवाद की वजह से सुर्खियों में आए हों। फर्क बस इतना है कि पहले चर्चा संगीत से होती थी, अब हर बार अपमानजनक बयान और सफेद झूठ से होती है। उनकों सुरों से ज्यादा विवादों से जुड़ाव बढ़ रहा है। और यही बात लोगों को खटक रही है। क्योंकि जब आप खुद को ‘मोरल हाई ग्राउंड’ पर रखकर बोलेंगे, तो लोग तो आपकी हर पुरानी बात खँगालेंगे ही न।

लोगों को अभी भी वो चेन्नई वाला कॉन्सर्ट याद है, जहाँ भगदड़ में महिलाओं के साथ यौन शोषण की कहानियाँ वायरल हुईं। याद है एआर रहमान की अम्मी का वो बयान, जिसमें तमिल हिंदू गीतकार पिरईसूदन को रहमान के घर में तिलक हटाकर आने को कहा गया था। और इतना ही नहीं, कभी न भूलने वाला एआर रहमान का वो बयान, जब अब्बा की मौत के लिए हिंदू देवताओं को जिम्मेदार ठहराया गया था।

यही सब कम नहीं था, तो हाल ही में एक और विवाद फिर सामने आया, जब रहमान ने एक ‘पीडोफाइल’ कोरियोग्राफर के साथ काम किया, जिस पर यौन उत्पीड़न का आरोप है। आज का दौर कुछ भूलने नहीं देता, सोशल मीडिया सब याद दिलाता रहता है। अब इसी बैकग्राउंड के साथ जब एआर रहमान ये कहते हैं कि ‘पावर शिफ्ट’ के बाद इंडस्ट्री ‘कम्युनल’ हो गई है, तो यहाँ आपत्ति जताना वाजिब है।

आखिर में बात इतनी सी है। इंडस्ट्री बदली है, लेकिन खराब नहीं हुई है। मौके आज भी हैं, बल्कि पहले से ज्यादा हैं। टैलेंट आज भी चलता है। लेकिन अगर कोई अपने पुराने फॉर्मूले में ही अटका रह जाए और नए दौर को समझने से मना कर दे, तो फिर दोष बाहर ढूँढना आसान हो जाता है। कम्युनल, पावर शिफ्ट, सिस्टम- ये सब शब्दों से आप चर्चा में आ सकते हो, लेकिन लोगों की पसंद नहीं बदल सकते। हकीकत बहुत सीधी है, अगर आज की ऑडियंस एआर रहमान के गानों से ज्यादा किसी नए सिंगर के गाने सुन रही है, तो इसमें सरकार की गलती नहीं है। यह समय की चाल है। इसीलिए कमबैक करने के लिए खुद को समय के साथ ढालने की जरूरत है। बिल्कुल वैसे, जैसे रैपर हनी सिंह लगे पड़े है।

सर्विस सेक्टर से रोजगार देने वाले देश तक, 10 साल में ‘Startup India’ ने कैसे बदले हालात: 400 गुना बढ़े स्टार्टअप्स, महिलाएँ और छोटे शहर बन रहे ग्रोथ का इंजन

जब भारत आजाद हुआ तब देश के सामने सबसे चुनौती केवल राजनीतिक स्वतंत्रता संभालने की नहीं थी बल्कि हमें एक ऐसा आर्थिक ढाँचा खड़ा करना था जो करोड़ों लोगों को रोजगार दे सके। भारत की आबादी युवा थी, संसाधन सीमित थे और उद्योग का आधार कमजोर था। उत्पादन बढ़ाने की कोशिशें हुईं लेकिन शुरुआत से ही भारत की अर्थव्यवस्था सर्विस सेक्टर की ओर झुकती चली गई। नतीजा यह हुआ कि भारत ‘रोजगार देने वाला देश’ बनने के बजाय ‘रोजगार खोजने वाला देश’ बनता चला गया। देश के भीतर गाँव से शहर और फिर विदेशों तक काम की तलाश में बड़े पैमाने पर पलायन होता रहा।

वर्ष 2016 भारत के उद्योग जगत के लिए एक अहम मोड़ बनकर आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह स्पष्ट दृष्टि सामने रखी कि भारत को केवल टैलेंट सप्लायर नहीं बल्कि जॉब क्रिएटर बनना होगा। इसी सोच के साथ 16 जनवरी 2016 को स्टार्टअप इंडिया को एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में लॉन्च किया गया। इसका उद्देश्य केवल नए व्यवसाय खड़े करना नहीं था बल्कि एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना था जिसमें युवा अपने विचारों को व्यवसाय में बदलें, जोखिम उठा सकें और रोजगार पैदा करने वाले बनें। 16 जनवरी को भारत में ‘स्टार्टअप डे’ के रूप में मनाया जाता है।

पिछले लगभग एक दशक में इसका असर साफ दिखाई देता है। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में से एक बन चुका है। दिसंबर 2025 तक के आधिकारिक आँकड़ों की मानें तो, आज देश में सरकार की ओर से मान्यता प्राप्त 2 लाख से अधिक स्टार्टअप्स हैं यह संख्या 2016 में करीब 500 थी। इससे 21 लाख से अधिक रोजगार पैदा हुए हैं और हर दिन 50+ स्टार्टअप्स को मान्यता दी जा रही है।

स्टार्टअप इंडिया के लिए तैयार की गई शुरुआती जमीन

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के नेतृत्व वाली स्टार्टअप इंडिया पहल की शुरुआत 16 जनवरी 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली से की थी। उन्होंने कहा था कि ‘भारत के युवा नौकरी खोजने वाले के बजाय रोजगार पैदा करने वाले बनें और एक स्टार्ट-अप सिर्फ 5 लोगों को भी रोजगार दे, तो यह भी राष्ट्र की बड़ी सेवा होगी’।

स्टार्टअप इंडिया के तहत सरकार ने नीति, फाइनेंस और संस्थागत सहयोग तीनों स्तरों पर काम शुरू किया। सबसे पहले स्टार्टअप की परिभाषा को स्पष्ट किया गया ताकि नए उद्यमों को सरकारी मान्यता मिल सके। इसके साथ ही टैक्स से जुड़े कई बोझ कम किए गए जैसे शुरुआती वर्षों में आयकर में छूट और एंजेल टैक्स से राहत। इसका सीधा असर यह हुआ कि नए उद्यमियों के लिए शुरुआती संघर्ष कुछ हद तक आसान हुआ और निवेशकों का भरोसा भी बढ़ा।

FFS, CGSS और SISFS: ताकि ना पड़े स्टार्टअप्स को पैसे की कमी

पूँजी की उपलब्धता स्टार्टअप्स के लिए हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने ‘फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स’ (FFS) की शुरुआत की, जिसके तहत सेबी-रजिस्टर्ड अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) के माध्यम से स्टार्टअप्स में निवेश किया गया। इस पहल का उद्देश्य सीधे पैसा देना नहीं था बल्कि निजी निवेश को प्रोत्साहित करना था ताकि बाजार आधारित फंडिंग का एक मजबूत ढाँचा तैयार हो सके।

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, FFS के तहत ₹10,000 करोड़ का कॉर्पस 140 से ज्यादा AIFs को दिया गया है, जिन्होंने मिलकर 1,370 से ज्यादा स्टार्टअप्स में ₹25,500+ करोड़ का निवेश किया है।

स्टार्टअप्स को मदद देने के लिए सरकार ने ‘क्रेडिट गारंटी स्कीम फॉर स्टार्टअप्स’ (CGSS) शुरू की। इस योजना का मकसद स्टार्टअप्स को बिना किसी गारंटी के लोन उपलब्ध कराना है। इसे नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी (NCGTC) लिमिटेड के जरिए लागू किया जा रहा है। इस योजना के तहत अब तक 330 से अधिक स्टार्टअप्स को ₹800 करोड़ से ज्यादा के लोन की गारंटी दी जा चुकी है।

इसके साथ ही ‘स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम’ (SISFS) के जरिए शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स को मजबूत किया जा रहा है। ₹945 करोड़ के कोष वाली इस योजना से प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट, प्रोटोटाइप, प्रोडक्ट ट्रायल, मार्केट एंट्री और कमर्शियलाइजेशन जैसी गतिविधियों के लिए आर्थिक मदद दी जाती है। इस फंड के तहत 215 से अधिक इनक्यूबेटर्स को मंजूरी दी गई है।

रोजगार सृजन और वैल्यू क्रिएशन

पिछले करीब दस वर्षों में यह पहल केवल नीतियों तक सीमित नहीं रही है। इन स्टार्टअप्स ने रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां इन उद्यमों के जरिए पैदा हुई हैं। मैन्युफैक्चरिंग, फिनटेक, एग्रीटेक, हेल्थटेक, एजुटेक, लॉजिस्टिक्स और क्लीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भारतीय स्टार्टअप्स ने न केवल घरेलू समस्याओं के समाधान खोजे हैं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है। इससे घरेलू वैल्यू चेन मजबूत हुई है और भारत को ‘आत्मनिर्भर भारत’ बनने को भी बल मिला है।

इस पहल का असर भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम की तेज वृद्धि में साफ दिखाई देता है। वर्ष 2014 में जहाँ भारत में सिर्फ 4 ऐसी निजी कंपनियाँ थीं जिनका मूल्य 1 अरब डॉलर से अधिक था, वहीं आज यह संख्या 120 से ज्यादा हो चुकी है। इन स्टार्टअप्स का कुल मूल्यांकन 350 अरब डॉलर से अधिक है जो यह बताता है कि भारतीय स्टार्टअप न केवल बड़े पैमाने पर आगे बढ़ रहे हैं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी मजबूत पहचान बना चुके हैं।

महिलाएँ और छोटे शहर बन रहे तरक्की का नया आधार

भारत में स्टार्टअप क्रांति की अगुवाई अब सिर्फ बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है। बेंगलुरु, हैदराबाद, मुंबई और दिल्ली-NCR जैसे बड़े शहर इस बदलाव के प्रमुख केंद्र जरूर हैं लेकिन अब छोटे शहर भी तेजी से आगे आ रहे हैं। आज लगभग 53 प्रतिशत स्टार्टअप टियर-II और टियर-III शहरों से निकल रहे हैं जिससे साफ दिखता है कि उद्यमिता अब कुछ गिने-चुने शहरों तक सीमित नहीं रही। छोटे शहरों के युवा भी नए आइडिया के साथ आगे बढ़ रहे हैं और अपना कारोबार खड़ा कर रहे हैं।

ये स्टार्टअप खेती, टेलीमेडिसिन, माइक्रोफाइनेंस, टूरिज्म और एड-टेक जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जिससे गाँव और शहर के बीच की दूरी धीरे-धीरे कम हो रही है। इसी के साथ महिलाओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ी है। दिसंबर 2025 तक 48% से ज्यादा मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला डायरेक्टर या पार्टनर मौजूद है। यह साफ संकेत है कि स्टार्टअप इकोसिस्टम सिर्फ आर्थिक विकास का जरिया नहीं बन रहा बल्कि महिलाओं को नेतृत्व का मौका देकर सामाजिक समानता और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में संतुलित विकास को भी आगे बढ़ा रहा है।

आँकड़ों में स्टार्टअप इंडिया

  • स्टार्टअप इंडिया की वेबसाइट पर मौजूद आँकड़ों के मुताबिक, पहल के तहत अब तक 2,00,000 से अधिक स्टार्टअप्स को DPIIT द्वारा मान्यता दी जा चुकी है। यह दर्शाता है कि भारत में उद्यमिता को संस्थागत पहचान और सरकारी समर्थन बड़े स्तर पर प्राप्त हुआ है। DPIIT की मान्यता से स्टार्टअप्स को टैक्स छूट, अनुपालन में सहूलियत और विभिन्न सरकारी योजनाओं तक सीधी पहुँच मिलती है।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म BHASKAR (Bharat Startup Knowledge Access Registry) पर इस समय 6,68,516 से अधिक यूजर्स पंजीकृत हैं। भास्कर की परिकल्पना वन-स्टॉप डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में की गई है। यह प्लेटफॉर्म स्टार्टअप्स, निवेशकों, मेंटर्स और नीति निर्माताओं के बीच जानकारी, नेटवर्किंग और सहयोग का एक राष्ट्रीय माध्यम बन चुका है।
  • स्टार्टअप इकोसिस्टम को शुरुआती सहयोग देने के उद्देश्य से देश में 244 सीड फंडेड इनक्यूबेटर्स कार्यरत हैं। ये इनक्यूबेटर्स नए स्टार्टअप्स को फंडिंग, मार्गदर्शन, तकनीकी सहायता और बुनियादी ढाँचा उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाते हैं।
  • वित्तीय सहायता के मोर्चे पर स्टार्टअप इंडिया इनिशिएटिव के माध्यम से अब तक 27,000 करोड़ रुपए से अधिक की फंडिंग प्रदान की जा चुकी है। इस फंडिंग से नवाचार आधारित स्टार्टअप्स को शुरुआती और विकास के चरण में मजबूती मिली है।
  • स्टार्टअप इंडिया का प्रभाव केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं रहा है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार 53% स्टार्टअप्स टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्थित हैं, जो यह दर्शाता है कि उद्यमिता छोटे शहरों और उभरते क्षेत्रों तक तेज़ी से फैल रही है।
  • सरकारी ई-मार्केटप्लेस GeM के माध्यम से स्टार्टअप्स को अब तक 51,000 करोड़ रुपए से अधिक के वर्क ऑर्डर प्राप्त हुए हैं। इससे स्टार्टअप्स को सीधे सरकारी खरीद प्रणाली से जुड़ने और स्थायी व्यावसायिक अवसर हासिल करने में मदद मिली है।
  • नीतिगत और प्रशासनिक स्तर पर सरकार द्वारा 63 रेगुलेटरी सुधार लागू किए गए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य स्टार्टअप्स के लिए नियमों को सरल बनाना, अनुपालन की जटिलताओं को कम करना और कारोबार करने में आसानी को बढ़ावा देना है।
  • समावेशिता के संदर्भ में भी स्टार्टअप इंडिया ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। 48 प्रतिशत मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला निदेशक मौजूद है, जो स्टार्टअप इकोसिस्टम में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और नेतृत्व को दर्शाता है।
  • राज्य स्तर पर भी स्टार्टअप नीति को मजबूती मिली है। देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्टार्टअप नीति लागू की जा चुकी है। इससे स्थानीय नवाचार, निवेश और उद्यमिता को बढ़ावा मिल रहा है।

गौरवशाली इतिहास उगल रही बिहार की धरती, अलग-अलग स्थानों से मिलीं विष्णु-गणेश-सूर्य-बुद्ध की हजारों वर्ष पुरानी प्रतिमाएँ

भारत की मिट्टी सिर्फ फसलों के लिए ही उपजाऊ नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर हजारों सालों के इतिहास और अनगिनत कहानियों को दबाए हुए है। हाल के दिनों में बिहार से लेकर कर्नाटक और ओडिशा से लेकर गुजरात तक हुई पुरातात्विक खोजों ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। कहीं भगवान गणेश की 1,500 साल पुरानी अनोखी प्रतिमा मिली है, तो कहीं 10,000 साल पुराने शैल चित्र मिले हैं। ये खोजें यह साबित करती हैं कि जब दुनिया सभ्यता के शुरुआती चरण में थी, तब भारत के अलग-अलग हिस्सों में कला, धर्म और संस्कृति अपनी जड़ें जमा चुकी थीं।

बिहार: मूर्तिकला और आस्था का जीवंत केंद्र

बिहार ऐतिहासिक रूप से ज्ञान और धर्म की धरती रही है। हाल ही में खुदाई में नालंदा, गया, वैशाली और जमुई जैसे जिलों से जो पुरावशेष मिले हैं, वे राज्य की समृद्ध विरासत को फिर से जीवित कर रहे हैं।

नालंदा और गया से प्राप्त भगवान बुद्ध की मूर्तियाँ करीब 1,200 से 2,000 वर्ष पुरानी हैं। ये उस काल की याद दिलाती हैं जब मगध क्षेत्र बौद्ध धर्म का वैश्विक केंद्र था। इसके अलावा, लखीसराय और मधुबनी में पाल काल (8वीं से 10वीं शताब्दी) की भगवान विष्णु और सूर्य देव की सुंदर मूर्तियाँ मिली हैं।

पाल राजवंश के दौरान बिहार में कला और स्थापत्य का बहुत विकास हुआ था, जिसकी झलक इन मूर्तियों की बारीकियों में साफ दिखती है। वहीं, नवादा और गया में मिली 1,000 साल पुरानी जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि बिहार हमेशा से सर्व-धर्म समभाव की भूमि रहा है।

जमुई की गणेश प्रतिमा: ‘पेड़कीया’ और प्राचीन मोदक का रहस्य

जमुई की नागार्जुनी पहाड़ियों से मिली भगवान गणेश की 1,500 साल पुरानी प्रतिमा सबसे अधिक चर्चा का विषय बनी हुई है। इस मूर्ति की सबसे बड़ी खासियत गणेश जी के हाथ में मौजूद ‘पेड़कीया’ मिठाई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह आज के प्रसिद्ध मोदक का ही एक प्राचीन रूप है। पेड़कीया का आकार अर्धचंद्राकार होता है, जो भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है।

यह खोज दर्शाती है कि खान-पान और प्रसाद की परंपराएँ सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रही हैं। इसी जमुई क्षेत्र से सूर्य देव की भी एक अत्यंत प्राचीन और भव्य प्रतिमा प्राप्त हुई है, जो इस इलाके के धार्मिक महत्व को रेखांकित करती है।

ओडिशा: 10,000 साल पुराने इंसानी जीवन के निशान

बिहार के बाद ओडिशा के संबलपुर जिले में भी एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। रेडाखोल क्षेत्र की भीममंडली पहाड़ियों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को करीब 10,000 साल पुरानी सभ्यता के अवशेष मिले हैं।

साइट पर मिली पत्थर की नक्काशी की तस्वीर। (फोटो: देशकाल न्यूज)

यहाँ के संरक्षित वनों में 42 अलग-अलग स्थानों पर ‘शैल चित्र’ (Rock Paintings) मिले हैं। इन चित्रों में इंसानों ने जानवरों और पक्षियों की आकृतियाँ उकेरी हैं। ये चित्रकारी हमें बताती है कि आदिमानव किस तरह प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहते थे। यहाँ मिले पत्थर के औजार उस दौर की तकनीक और जीवनशैली की दुर्लभ झलक पेश करते हैं।

गुजरात: हड़प्पा से भी 5,000 साल पुरानी बस्ती

गुजरात के कच्छ क्षेत्र में शोधकर्ताओं ने इतिहास की किताबों को बदलने वाली खोज की। आईआईटी गाँधीनगर और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने ऐसे प्रमाण खोजे हैं जिनसे पता चलता है कि हड़प्पा सभ्यता (Indus Valley Civilization) के उभरने से भी 5,000 साल पहले वहाँ इंसान बसते थे।

सोर्स : PIB

कच्छ के मैंग्रोव इलाकों में बड़ी मात्रा में ‘शेल मिडन’ (सीपियों के ढेर) मिले। इससे यह साफ होता है कि हजारों साल पहले के लोग समुद्री भोजन, जैसे सीप और घोंघे पर निर्भर थे। यह खोज प्राचीन मानव के भोजन और उनके तटीय क्षेत्रों में बसने की आदतों पर नया प्रकाश डालती है।

कर्नाटक: रायचूर की प्राचीन और समृद्ध बस्ती

इतिहास की यह कड़ी दक्षिण भारत तक भी फैली हुई है। जुलाई 2025 में कर्नाटक के रायचूर (मस्की) में एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने मल्लिकार्जुन पहाड़ी के पास खुदाई की। यहाँ करीब 4,000 साल पुराने औजार और घर के अवशेष मिले थे। भारत, अमेरिका और कनाडा के वैज्ञानिकों की यह साझा खोज बताती है कि यह क्षेत्र कभी एक बहुत ही सक्रिय और विकसित आबादी का घर था।

केरल का पादरी कानपुर में चला रहा था ‘हाउस चर्च’, हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिए विदेश से आ रहा था पैसा

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की घाटमपुर पुलिस ने 13 जनवरी 2026 को केरल के रहने वाले एक पादरी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इस पादरी पर लालच देकर और डरा-धमकाकर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने का गंभीर आरोप है। यह पूरा खेल घाटमपुर के नौरंगा गाँव में एक ‘हाउस चर्च’ (घर में बने अवैध चर्च) के जरिए चलाया जा रहा था। पादरी यहाँ आर्थिक रूप से कमजोर हिंदुओं को निशाना बनाता था और उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसाता था।

पुलिस ने यह कार्रवाई फतेहपुर जिले के जहानाबाद निवासी मुकेश कुमार की लिखित शिकायत के बाद की है। मुकेश की शिकायत के आधार पर पादरी के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की गई, जिसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास उपलब्ध है। गिरफ्तारी के बाद आरोपित पादरी को कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है।

बीमारी ठीक करने के नाम पर धर्मांतरण का धंधा

यह घटना 13 जनवरी की है, जब पुलिस को सूचना मिली कि नौरंगा गाँव के एक घर के अंदर प्रार्थना सभा चल रही है। खबर मिलते ही बजरंग दल के कार्यकर्ता भी वहाँ पहुँच गए। उन्होंने देखा कि प्रार्थना और बीमारी ठीक करने के नाम पर असल में वहाँ लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। कार्यकर्ताओं ने तुरंत इसकी जानकारी पुलिस को दी। मौके पर पहुँची पुलिस ने वहाँ मौजूद सभी लोगों को हिरासत में लिया और पूछताछ के लिए थाने ले आई।

इस मामले में बजरंग दल के जिला संयोजक शुभम शौर्य अग्निहोत्री ने एसीपी कृष्णकांत यादव को एक लिखित शिकायत सौंपी। शिकायत में बताया गया कि नौरंगा के एक घर से ‘हाउस चर्च’ चलाया जा रहा था, जहाँ केरल का रहने वाला एल्विन और उसकी पत्नी हिंदुओं को लालच देकर उनका धर्म बदलवाने का काम कर रहे थे।

शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस ने अन्य सभी लोगों को तो छोड़ दिया, लेकिन आरोपित पादरी को हिरासत में ले लिया। इस मामले में मुकेश कुमार की शिकायत पर एफआईआर (FIR) दर्ज की गई, जिसमें पादरी पर लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने और डराने-धमकाने के आरोप लगाए गए हैं।

पुलिस की जाँच और दर्ज शिकायत के मुताबिक, आरोपित पादरी एल्विन ने अपने घर को ही एक ‘हाउस चर्च’ बना रखा था। यहाँ वह नियमित रूप से प्रार्थना सभाएँ और बीमारी ठीक करने (हीलिंग सेशन) के नाम पर कार्यक्रम आयोजित करता था। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इन सभाओं में गरीब और मजबूर हिंदुओं को बुलाया जाता था। उन्हें पैसों का लालच और कई तरह के वादे किए जाते थे ताकि उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए मनाया जा सके।

मीडिया से बातचीत में स्थानीय लोगों ने बताया कि पादरी खुद के पास चमत्कारी शक्तियाँ होने का दावा करता था। उसका कहना था कि उसके घर पर होने वाली प्रार्थना से बड़ी से बड़ी बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं। कई बार तो लोगों को यह तक डराया जाता था कि उनकी बीमारी बुरी ताकतों (प्रेत बाधा) की वजह से है और अगर वे धर्म परिवर्तन कर लेंगे, तभी उन्हें इन बीमारियों से छुटकारा मिलेगा।

जाँच के दौरान पुलिस ने इस तथाकथित हाउस चर्च से कई फाइलें, दस्तावेज और भारी मात्रा में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार की सामग्री बरामद की है। अब पुलिस इस बात की गहराई से जांच कर रही है कि क्या इन सामग्रियों का इस्तेमाल योजनाबद्ध तरीके से हिंदुओं को प्रभावित करने और उन्हें ईसाई धर्म अपनाने का लालच देने के लिए किया जा रहा था।

विदेशी फंडिंग का एंगल

पुलिस की पूछताछ में यह बात सामने आई है कि आरोपित मूल रूप से केरल का रहने वाला है और पिछले करीब दस सालों से नौरंगा इलाके में रह रहा था। शुरुआत में वह किराए के मकान में रहता था, लेकिन बाद में उसने खुद की जमीन खरीदी और 2022 में अपना घर बना लिया। इसी घर को उसने बिना किसी अनुमति के एक ‘हाउस चर्च’ में बदल दिया।

केरल का पादरी एल्विन (फोटो: शुभम शौर्य/फेसबुक)

हैरानी की बात यह है कि आरोपित का अपना कोई ज्ञात काम या कारोबार नहीं था, फिर भी वह काफी आराम की जिंदगी जी रहा था। इससे पुलिस को शक है कि उसे विदेश या कहीं और से भारी फंडिंग (पैसे) मिल रही थी। अब पुलिस इस बात की बारीकी से जांच कर रही है कि हाउस चर्च चलाने, प्रार्थना सभाएँ आयोजित करने और अन्य गतिविधियों के लिए पैसा कहाँ से आ रहा था।

अधिकारी इस बात की भी पड़ताल कर रहे हैं कि आरोपित अकेला ही यह सब कर रहा था या वह किसी ऐसे बड़े गिरोह का हिस्सा है जो अलग-अलग जिलों में धर्म परिवर्तन कराने के काम में लगा हुआ है।

एफआईआर में क्या लिखा है?

ऑपइंडिया के पास मौजूद एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, यह शिकायत 13 जनवरी को बजरंग दल के कार्यकर्ता मुकेश कुमार ने दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 352 और 351(3) के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया है।

मुकेश ने अपनी शिकायत में बताया कि उन्हें जानकारी मिली थी कि नौरंगा गाँव में एल्विन नाम के व्यक्ति ने अपने घर को चर्च बना लिया है। वह वहाँ गरीब लोगों को बुलाकर उन्हें तरह-तरह के लालच देता था और ईसाई धर्म अपनाने के लिए उनका ब्रेनवॉश कर रहा था।

शिकायत में आगे कहा गया है कि जब मुकेश अपने दोस्त मनीष सचान के साथ उस चर्च में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि आरोपित जबरन लोगों को घर के अंदर बिठाकर प्रार्थना करवा रहा था और उन्हें हिंदू धर्म छोड़ ईसाई बनने के लिए उकसा रहा था। जब मुकेश और उनके साथी ने इस पर आपत्ति जताई, तो आरोपित एल्विन ने उन्हें गालियाँ दीं और जान से मारने की धमकी दी, जिसके बाद वहाँ मौजूद लोग घर छोड़कर चले गए।

बजरंग दल के खिलाफ शिकायत

बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के खिलाफ शिकायत पादरी की गिरफ्तारी के बाद उसके परिवार और कुछ स्थानीय लोगों ने पुलिस को एक अलग शिकायत दी है। इसमें आरोप लगाया गया है कि बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उनके साथ बदसलूकी और मारपीट की। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इन आरोपों की अलग से जाँच की जा रही है और अगर सबूत मिलते हैं, तो उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

घाटमपुर इलाके में धर्मांतरण के पुराने विवादों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। इससे पहले भी यहाँ इस तरह की कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। पुलिस अधिकारी अब इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि क्या इस पादरी के तार पहले के मामलों से जुड़े हैं। साथ ही, यह भी देखा जा रहा है कि पादरी अकेला काम कर रहा था या वह किसी ऐसे संगठित गिरोह का हिस्सा है जो कई जिलों में सक्रिय है।

प्रशासन का कहना है कि जाँच के दौरान मिले दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और पैसों के लेनदेन (फंडिंग) के सबूतों के आधार पर आगे की सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

इस बार दिल्ली-गुरुग्राम में शिमला-देहरादून से भी ज्यादा सर्दी, जलवायु परिवर्तन या वजह कुछ और? पढ़ें- हर सवाल का जवाब

उत्तर भारत इस समय भीषण शीतलहर की चपेट में है, जिससे जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। दिल्ली, गुरुग्राम समेत पूरे NCR में मंगलवार (13 जनवरी 2026) को कड़ाके की ठंड ने लोगों को घरों में कैद रहने पर मजबूर कर दिया। हड्डियाँ जमा देने वाली ठंडी हवाओं और गिरते तापमान के कारण सड़कों पर आवाजाही बेहद कम देखी गई, जबकि सुबह और रात के समय ठंड का असर और ज्यादा तीखा रहा।

लगातार जारी इस ठंड ने आम लोगों की दिनचर्या, कामकाज और यातायात व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। स्कूल, दफ्तर और खुले बाजारों में भी सर्दी का साफ असर देखा जा रहा है।

गुरुग्राम में ऐतिहासिक गिरावट

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, सोमवार सुबह (12 जनवरी 2026) को गुरुग्राम में न्यूनतम तापमान मात्र 0.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। यह पिछले 50 वर्षों में जनवरी महीने की सबसे ठंडी सुबह रही।

हिंदुस्तान टाइम्स से छवि

यह तापमान 22 जनवरी 1977 को दर्ज न्यूनतम तापमान के बराबर है और ऐसा बहुत कम बार ही देखने को मिला है। इससे पहले 5 दिसंबर 1966 को तापमान शून्य से नीचे गिरकर माइनस 0.4 डिग्री सेल्सियस रहा था, 11 जनवरी 1970 को 0 डिग्री और 22 जनवरी 1979 को 0.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। वहीं दिल्ली भी ज्यादा पीछे नहीं रही, जहाँ सफदरजंग मौसम केंद्र पर न्यूनतम तापमान 3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।

हरियाणा और राजस्थान के आसपास के इलाकों में भी तापमान शून्य के आसपास या उससे नीचे दर्ज किया गया। हरियाणा के हिसार में न्यूनतम तापमान 2.6 डिग्री सेल्सियस, करनाल में 3.5 डिग्री सेल्सियस रहा, जबकि राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर में तापमान शून्य से नीचे चला गया। वहीं, पंजाब के अमृतसर और हरियाणा के गुरुग्राम में भी कड़ाके की ठंड देखने को मिली, जहाँ न्यूनतम तापमान मात्र 1.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।

दिल्ली शिमला से ज्यादा ठंडा है

इस बार सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मैदानी इलाकों में पहाड़ी क्षेत्रों से भी ज्यादा ठंड पड़ रही है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में तापमान, शिमला जैसे हिल स्टेशनों से भी नीचे चला गया है।

सोमवार (12 जनवरी 2026) को शिमला में अधिकतम तापमान करीब 16 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 9 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान था, जबकि दिल्ली में न्यूनतम तापमान 3 से 4.2 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम 18 से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच रहने की संभावना जताई गई थी।

तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहने के कारण हिमालयी राज्यों के कई हिल स्टेशनों पर इस साल बर्फबारी नहीं हुई या फिर पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम बर्फबारी दर्ज की गई।

ग्राफ वाया ईज वेदर

हिमाचल प्रदेश के शिमला और कुल्लू जैसे इलाकों में फिलहाल किसी तरह की मौसम को लेकर चेतावनी जारी नहीं की गई है। वहीं दिल्ली में हर दिन ‘कोल्ड डे’ जैसी स्थिति बने रहने की संभावना है और बाद के दिनों में आसमान आंशिक रूप से बादल छाए रहने का अनुमान है। हैरानी की बात यह है कि इस समय दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे मैदानी इलाके, शिमला जैसे पहाड़ी क्षेत्र से भी अधिक ठंडे बने हुए हैं।

मैदानी इलाके पहाड़ों से ज्यादा ठंडे क्यों होते हैं?

इस जनवरी में मैदानी इलाकों का पहाड़ों से ज्यादा ठंडा होना मौसम के कुछ खास कारणों का नतीजा है। सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) के कारण शिमला जैसे ऊँचे पहाड़ी इलाकों में बादल छाए रहे, जो रात के समय एक तरह से कंबल की तरह काम करते हैं और जमीन की गर्मी को बाहर निकलने से रोकते हैं।

IMD के महानिदेशक एम मोहापात्रा के अनुसार, बादल छाए रहने की वजह से शिमला में न्यूनतम तापमान अपेक्षाकृत अधिक, करीब 8.8 डिग्री सेल्सियस रहा। वहीं कांगड़ा और पालमपुर में 3 डिग्री, जम्मू में 3.4 डिग्री, उत्तराखंड के मुक्तेश्वर में करीब 4.1 डिग्री और मसूरी में 7.7 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान दर्ज किया गया।

इसके उलट दिल्ली-एनसीआर में आसमान साफ रहा, जिससे रात में जमीन की गर्मी तेजी से बाहर निकल गई। इसे रेडिएटिव कूलिंग कहा जाता है। बादल न होने के कारण तापमान तेजी से गिरा और दिल्ली में न्यूनतम तापमान 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया, जबकि आसपास के इलाकों में इससे भी कम रहा। ऊपर से उत्तर-पश्चिमी हवाएँ बर्फ से ढके पहाड़ों से बेहद ठंडी हवा सीधे मैदानी इलाकों में ले आईं, जिससे कड़ाके की ठंड पड़ गई।

NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, IMD के नरेश कुमार ने बताया कि फिलहाल उत्तर-पश्चिम भारत में कोई सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ नहीं है, बल्कि 5 से 6 किलोमीटर ऊँचाई तक फैली ठंडी हिमालयी हवाएँ मैदानी इलाकों में ठंडी हवा जमा कर रही हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में ऊँचाई, ढलान और बादलों के कारण तापमान संतुलित रहता है और जमीन की गर्मी फँस जाती है, जिससे शिमला अपेक्षाकृत गर्म बना रहता है।

दिल्ली में प्रदूषण और शुष्क हवा के कारण तापमान इनवर्जन भी बन रहा है, जिससे ठंड सतह के पास ही फँसी रहती है। अन्य मैदानी इलाकों में भी यही हाल रहा हिसार में 2.6 डिग्री, अमृतसर में 1.1 डिग्री, चूरू में 1.3 डिग्री, करनाल में 3.5 डिग्री और मेरठ में 4.5 डिग्री सेल्सियस न्यूनतम तापमान दर्ज किया गया। पंजाब के बठिंडा में गुरुग्राम के बराबर 0.6 डिग्री तापमान रहा, जबकि राजस्थान के फतेहपुर में पारा शून्य से नीचे माइनस 0.4 डिग्री तक गिर गया।

गुरुग्राम के बाहरी इलाकों और हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में पाला जम गया, गाड़ियों और फसलों पर बर्फ की सफेद परत दिखी, सरसों के खेत मानो चीनी से ढक गए हों। उत्तर प्रदेश के शहरों में दिन का तापमान 13 से 19 डिग्री के बीच रहा, जबकि जम्मू-कश्मीर में चिल्ला-ए-कला के दौरान डल झील के कुछ हिस्से जम गए, जो सर्दी की सबसे खराब स्थिति को दर्शाता है।

अन्य मैदानी इलाकों में भी कड़ाके की ठंड

ठंड सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है, यह उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में जोरदार असर डाल रही है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि साफ आसमान, तेज उत्तर-पश्चिमी हवाएँ, सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ का अभाव और हाड़ कंपाने वाली शुष्क सर्द हवाएँ इस रेडिएटिव कूलिंग की स्थिति को बढ़ावा दे रही हैं।

NCR के हर इलाके में पाले ने दस्तक दे दी है, फरीदाबाद से लेकर रेवाड़ी तक खेत, वाहन और खुला क्षेत्र जम गए हैं। कई जगहों पर यह इतनी घनी ठंड बनी कि दिखना लगभग बंद हो गया।

IMD ने जारी की चेतावनी

भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने दिल्ली-एनसीआर के लिए ऑरेंज अलर्ट जारी किया है, जिसमें अगले 48 घंटों तक ठंड लहर या गंभीर सर्दी बनी रहने की चेतावनी दी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि गुरुवार (15 जनवरी 2026) के बाद एक नया मौसम प्रणाली सक्रिय होने से न्यूनतम तापमान में थोड़ी बढ़ोतरी होगी और ठंड कुछ कम होगी। तब तक उत्तर भारत ऐतिहासिक कड़ाके की ठंड की चपेट में है।

अधिकारियों ने लोगों को खासकर बच्चों और बुजुर्गों, को सुबह जल्दी या रात देर तक बाहर न निकलने की सख्त हिदायत दी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कांपना शरीर का पहला संकेत है कि शरीर गर्मी खो रहा है और इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

(मूल रूप से यह खबर अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़नें के लिए यहाँ क्लिक करें।)


नेगेटिव मार्क्स से भी PG मेडिकल सीट पर क्वॉलिफाई? जानें PG-NEET की नई कट-ऑफ पर क्यों भड़के लोग

राष्ट्रीय चिकित्सा परीक्षा बोर्ड (NBEMS) ने मंगलवार (13 जनवरी 2026) को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के निर्देश पर NEET PG 2025–26 की क्वालिफाइंग कट-ऑफ में संशोधन किया।

कट-ऑफ प्रतिशत घटाए जाने के बाद SC, ST और OBC वर्ग के ऐसे अभ्यर्थी भी काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए हैं, जिनके अंक शून्य से कम (नेगेटिव मार्क्स) हैं। इस फैसले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर तीखी बहस शुरू हो गई है।

NBEMS की आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, NEET PG 2025–26 की तीसरी काउंसलिंग के लिए सभी श्रेणियों में न्यूनतम क्वालिफाइंग परसेंटाइल कम किए गए हैं, जो केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार है।

रिवाइज्ड क्वालिफाइंग क्राइटेरिया क्या कहता है

संशोधित मानदंडों के अनुसार, सामान्य (General) और EWS वर्ग के उम्मीदवारों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल को 50वें परसेंटाइल से घटाकर 7वाँ परसेंटाइल कर दिया गया है, जिसके तहत कट-ऑफ स्कोर 800 में से 103 अंक तय किया गया है।

वहीं, बेंचमार्क दिव्यांगता (PwBD) वाले सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल 45वें से घटाकर 5वाँ कर दिया गया है, जिसके बाद कट-ऑफ स्कोर 90 अंक तय किया गया है।

स्रोत: NBEMS

SC, ST और OBC वर्ग के उम्मीदवारों के लिए, जिनमें इन वर्गों के बेंचमार्क दिव्यांग (PwBD) अभ्यर्थी भी शामिल हैं, क्वालिफाइंग परसेंटाइल को 40वें से घटाकर 0वाँ परसेंटाइल कर दिया गया है। इसके तहत कट-ऑफ स्कोर 800 में से माइनस 40 अंक तय किया गया है, क्योंकि परीक्षा में नेगेटिव मार्किंग की व्यवस्था लागू है।

NBEMS ने यह भी स्पष्ट किया है कि 19 अगस्त 2025 को जारी की गई NEET PG 2025 की रैंक में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यह संशोधन केवल काउंसलिंग में भाग लेने की पात्रता तय करने के लिए है, रैंक या मेरिट सूची पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

अस्थाई व्यवस्था के तहत उठाया गया कदम, ये तय प्रक्रिया नहीं

नोटिस में आगे कहा गया है कि उम्मीदवारों की उम्मीदवारी पूरी तरह अस्थायी (प्रोविजनल) रहेगी और यह NEET PG 2025 सूचना पुस्तिका में तय सभी पात्रता शर्तों को पूरा करने पर निर्भर करेगी। आवेदन फॉर्म में अभ्यर्थियों द्वारा बताए गए MBBS प्रोफेशनल परीक्षाओं या विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट परीक्षा (FMGE) में प्राप्त कुल अंकों की जाँच प्रवेश के समय मूल दस्तावेजों से की जाएगी।

NBEMS ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि रैंक में टाई तोड़ने के लिए किसी उम्मीदवार ने गलत जानकारी दी होगी तो उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी जाएगी। इसके अलावा, परीक्षा के दौरान किसी भी तरह के अनुचित साधनों (अनफेयर मीन्स) के इस्तेमाल पर NBEMS, मेडिकल काउंसलिंग कमेटी या संबंधित प्रवेश प्राधिकरण द्वारा सख्त कार्रवाई की जाएगी।

कट-ऑफ क्यों कम किए गए?

सरकार ने पोस्टग्रेजुएट मेडिकल की बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने की आशंका को देखते हुए क्वालिफाइंग कट-ऑफ घटाने का फैसला लिया। अधिकारियों के मुताबिक, NEET PG 2025 में करीब 2.4 लाख उम्मीदवार शामिल हुए थे, लेकिन हाई कट-ऑफ के कारण काउंसलिंग के कई दौर पूरे होने के बाद भी हजारों सीटें खाली रह गई थीं।

भारत में करीब 65,000 से 70,000 पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटें हैं। अधिकारियों ने बताया कि अगर बड़ी संख्या में सीटें खाली रहती हैं, तो इसका सीधा असर टीचिंग हॉस्पिटल्स के कामकाज पर पड़ेगा, खासकर सरकारी अस्पतालों पर, जहाँ रेजिडेंट डॉक्टरों पर इलाज और शैक्षणिक जिम्मेदारियों का बड़ा भार होता है।

यह संशोधन ऐसे समय में किया गया जब इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने भी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर कट-ऑफ में तार्किक संशोधन की माँग की थी, ताकि मेडिकल प्रशिक्षण क्षमता की बड़े पैमाने पर बर्बादी को रोका जा सके।

सोशल मीडिया पर क्या कह रहे हैं लोग

संशोधित कट-ऑफ को लेकर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। कई यूजर्स इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या यह फैसला केवल एक प्रशासनिक कदम है या फिर इससे शैक्षणिक मानकों में ढील का संकेत मिलता है।

कुछ यूजर्स ने इस फैसले को संदर्भ के साथ समझने की कोशिश की है। उनका कहना है कि कट-ऑफ में बदलाव से केवल काउंसलिंग में भाग लेने की पात्रता बढ़ी है, इससे एडमिशन की गारंटी नहीं मिलती।

टेक पॉलिसी विश्लेषक हिमांशु जैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि यह बात सही है कि अब माइनस 40 अंक वाले उम्मीदवार भी काउंसलिंग में शामिल हो सकते हैं, लेकिन ऑनलाइन बहस में अक्सर इसका पूरा संदर्भ सामने नहीं रखा जा रहा है।

हिमांशु जैन ने बताया कि NBEMS ने यह फैसला मुख्य रूप से करीब 9,000 पीजी मेडिकल सीटें खाली रहने से बचाने के लिए लिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि काउंसलिंग की पात्रता को एडमिशन की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए। इतने कम कट-ऑफ पर क्वालिफाई करने वाले उम्मीदवारों को आमतौर पर नॉन-क्लिनिकल या कम माँग वाली ब्राँचें मिलती हैं, या फिर हाई फीस वाले प्राइवेट मेडिकल कॉलेज, जहाँ ऊँची रैंक वाले उम्मीदवार अक्सर सीटें छोड़ देते हैं।

हिमांशु के अनुसार, यह नीतिगत फैसला सीटों के बेहतर उपयोग (कैपेसिटी यूटिलाइजेशन) के लिए लिया गया है, न कि पासिंग स्टैंडर्ड बदलने के लिए। उन्होंने यह भी कहा कि NEET PG एक रैंकिंग परीक्षा है, जिसे वे उम्मीदवार देते हैं जो पहले ही MBBS पूरी कर चुके हैं और विश्वविद्यालय स्तर की परीक्षाएँ पास कर चुके हैं।

हालाँकि, कई अन्य यूजर्स ने नेगेटिव स्कोर वाले उम्मीदवारों को काउंसलिंग में शामिल करने के फैसले पर चिंता जताई है।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन-JDN के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ ध्रुव चौहान ने कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस पर कैसे प्रतिक्रिया दूँ, लेकिन अब माइनस 40 अंक लाने वाले उम्मीदवार भी NEET PG की सीट पाने के लिए पात्र हो गए हैं। आसान शब्दों में कहें तो अगर आपके पास पैसा है या आप किसी खास कैटेगरी से आते हैं, तो परीक्षा में सो जाने और नेगेटिव नंबर लाने के बावजूद आप उस उम्मीदवार के बराबर हो जाते हैं, जिसने टॉप किया या कड़ी मेहनत की।”

सोशल मीडिया टिप्पणीकार अमित किलहोर ने काउंसलिंग के लिए परसेंटाइल घटाने पर सवाल उठाए और मेडिकल दाखिलों के लिए न्यूनतम मानक तय करने की माँग की। उन्होंने यह बात केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को टैग करते हुए सोशल मीडिया पर उठाई।

पॉलिसी टिप्पणीकार अंशुल सक्सेना ने लिखा,”NEET PG 2025 में 800 में से माइनस 40 अंक लाने वाले उम्मीदवारों को भी पीजी काउंसलिंग में शामिल होने की अनुमति दी जा रही है। मेरिट कट-ऑफ इतना नीचे गिर गया है कि अब नेगेटिव स्कोर को भी क्वालिफाइंग माना जा रहा है। यह शैक्षणिक मानकों में एक गंभीर संकट है।”

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर DAMS-Alpha के संस्थापक डॉ सुमेर सेठी ने लिखा, “मेरिट का नेगेटिव मूल्य नहीं होना चाहिए। NEET PG का कट-ऑफ माइनस 40 कोई राहत नहीं, बल्कि मानकों में गिरावट है। सिर्फ सीटें भरना ही गुणवत्ता नहीं होता। नेगेटिव कट-ऑफ ‘क्वालिफाइंग’ शब्द को ही बेमानी बना देता है।”

NEET PG के संशोधित कट-ऑफ ने पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटों को भरने को लेकर चल रही बहस को और तेज कर दिया है। एक तरफ प्रशासन का कहना है कि यह फैसला सीटें खाली रहने से बचाने और खासकर सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त रेजिडेंट डॉक्टर सुनिश्चित करने के लिए लिया गया, ताकि अस्पतालों का कामकाज और पढ़ाई प्रभावित न हो।

वहीं दूसरी ओर, बहुत कम या नेगेटिव अंक लाने वाले उम्मीदवारों को तीसरे दौर की काउंसलिंग में शामिल करने की अनुमति ने डॉक्टरों और आम लोगों के बीच गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह मामला पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा में सीटों के बेहतर उपयोग और न्यूनतम शैक्षणिक मानकों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को सामने लाता है। काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू होने के साथ आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बहस जारी रहने की संभावना है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

काशी-तमिल संगमम का गहरा पड़ा प्रभाव, सांस्कृतिक चेतना से लेकर शैक्षिक विमर्श सब बढ़ा: पढ़ें PM मोदी के विचार, कहा- युवाओं को अपने साथ जुड़ता देख हुई प्रसन्नता

कुछ दिन पहले ही मुझे सोमनाथ की पवित्र भूमि पर ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ में हिस्सा लेने का सुअवसर मिला। इस पर्व को हम वर्ष 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार साल पूरे होने पर मना रहे हैं। इस क्षण का साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से लोग सोमनाथ पहुँचे। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतवर्ष के लोग जहाँ अपने इतिहास और संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं, वहीं कभी हार ना मानने वाला साहस भी उनके जीवन की एक बड़ी विशेषता है। यही भावना उन्हें एक साथ जोड़ती भी है।

इस कार्यक्रम के दौरान मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से भी हुई, जो इससे पहले सौराष्ट्र-तमिल संगमम के दौरान सोमनाथ आए थे और इससे पहले काशी-तमिल संगमम के समय काशी भी गए थे। ऐसे मंचों को लेकर उनकी सकारात्मक सोच ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसलिए मैंने तय किया कि क्यों ना इस विषय पर अपने कुछ विचार साझा करूँ।

‘मन की बात’ के एक एपिसोड के दौरान मैंने कहा था कि अपने जीवन में तमिल भाषा ना सीख पाने का मुझे बहुत दुख है। यह हमारा सौभाग्य है कि बीते कुछ वर्षों से हमारी सरकार तमिल संस्कृति को देश में और लोकप्रिय बनाने में निरंतर जुटी हुई है। यह ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को और सशक्त बनाने वाला है। हमारी संस्कृति में संगम का बहुत महत्त्व है। इस पहलू से भी काशी-तमिल संगमम एक अनूठा प्रयास है। इसमें जहाँ भारत की विविध परंपराओं के बीच अद्भुत सामंजस्य दिखता है, वहीं यह भी पता चलता है कि कैसे हम एक दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हैं।

काशी तमिल संगमम के आयोजन के लिए काशी सबसे उपयुक्त स्थान कहा जा सकता है। यह वही काशी है, जो अनादि काल से हमारी सभ्यता की धुरी बनी हुई है। यहाँ हजारों वर्षों से लोग ज्ञान, जीवन के अर्थ और मोक्ष की खोज में आते रहे हैं।

काशी का तमिल समाज और संस्कृति से अत्यंत गहरा नाता रहा है। काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है, तो तमिलनाडु में रामेश्वरम तीर्थ है। तमिलनाडु की तेनकासी को दक्षिण की काशी या दक्षिण काशी कहा जाता है। पूज्य कुमारगुरुपरर् स्वामिजि ने अपनी विद्वता और आध्यात्म परंपरा के माध्यम से काशी और तमिलनाडु के बीच एक सशक्त और स्थायी संबंध स्थापित किया था।

तमिलनाडु के महान सपूत महाकवि सुब्रमण्यम भारती जी को भी काशी में बौद्धिक विकास और आध्यात्मिक जागरण का अद्भुत अवसर दिखा। यहीं उनका राष्ट्रवाद और प्रबल हुआ, साथ ही उनकी कविताओं को एक नई धार मिली। यहीं पर स्वतंत्र और अखंड भारत की उनकी संकल्पना को एक स्पष्ट दिशा मिली। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो काशी औैर तमिलनाडु के बीच गहरे आत्मीय संबंध को दर्शाते हैं।

वर्ष 2022 में वाराणसी की धरती पर काशी-तमिल संगमम की शुरुआत हुई थी। मुझे इसके उद्घाटन समारोह में शामिल होने का सौभाग्य मिला था। तब तमिलनाडु से आए लेखकों, -विद्यार्थियों, कलाकारों, विद्वानों, किसानों और अतिथियों ने काशी के साथ-साथ प्रयागराज और अयोध्या के दर्शन भी किए थे। इसके बाद के आयोजनों में इस पहल को और विस्तार दिया गया।

इसका उद्देश्य यह था कि संगमम में समय-समय पर नए विषय जोड़े जाएँ, नए और रचनात्मक तरीके अपनाए जाएँ और इसमें लोगों की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा हो। प्रयास यह था कि ये आयोजन अपनी मूल भावना से जुड़े रहकर भी निरंतर आगे बढ़ता रहे। वर्ष 2023 के दूसरे आयोजन में टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया, ताकि यह सुनिश्चित हो कि भाषा इसमें बाधा ना बने। इसके तीसरे संस्करण में इंडियन नॉलेज सिस्टम पर विशेष फोकस रखा गया। इसके साथ ही शैक्षिक संवादों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, प्रदर्शनियों और संवाद सत्रों में लोगों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। हजारों लोग इनका हिस्सा बने।

काशी-तमिल संगमम का चौथा संस्करण 2 दिसंबर, 2025 को आरंभ हुआ। इस बार की थीम बहुत रोचक थी- तमिल करकलम् यानि तमिल सीखें….। इससे काशी और दूसरी जगहों के लोगों को खूबसूरत तमिल भाषा सीखने का एक अनूठा अवसर मिला। तमिलनाडु से आए शिक्षकों ने काशी के विद्यार्थियों के लिए इसे अविस्मरणीय बना दिया! इस बार कई और विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। प्राचीन तमिल साहित्य ग्रंथ तोलकाप्पियम का चार भारतीय और छह विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया।

तेनकासी से काशी तक पहुँची एक विशेष व्हीकल एक्सपेडिशन भी देखने को मिली। इसके अलावा काशी में स्वास्थ्य शिविरों और डिजिटल लिट्रेसी कैंप के आयोजन के साथ ही कई और सराहनीय प्रयास भी किए गए। इस अभियान में सांस्कृतिक एकता के संदेश का प्रसार करने वाले पांड्य वंश के महान राजा आदि वीर पराक्रम पांडियन जी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पूरे आयोजन के दौरान नमो घाट पर प्रदर्शनियाँ लगाई गईं, बीएचयू में शैक्षणिक सत्र का आयोजन हुआ, साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए।

काशी-तमिल संगमम में इस बार जिस चीज ने मुझे सबसे अधिक प्रसन्नता दी, वो हमारे युवा साथियों का उत्साह है। इससे अपनी जड़ों से और अधिक जुड़े रहने के उनके पैशन का पता चलता है। उनके लिए ये एक ऐसा अद्भुत मंच है, जहाँ वे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं।

संगमम के अलावा काशी की यात्रा भी यादगार बने, इसके लिए विशेष प्रयास किए गए। भारतीय रेल ने लोगों को तमिलनाडु से उत्तर प्रदेश ले जाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाईं। इस दौरान कई रेलवे स्टेशनों पर, विशेषकर तमिलनाडु में उनका खूब उत्साह बढ़ाया गया। सुंदर गीतों और आपसी चर्चाओं से ये सफर और आनंददायक बन गया।

यहाँ मैं काशी और उत्तर प्रदेश के अपने भाइयों और बहनों की सराहना करना चाहूँगा, जिन्होंने काशी-तमिल संगमम को विशेष बनाने में अपना अद्भुत योगदान दिया है। उन्होंने अपने अतिथियों के स्वागत और सत्कार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कई लोगों ने तमिलनाडु से आए अतिथियों के लिए अपने घरों के दरवाजे तक खोल दिए। स्थानीय प्रशासन भी चौबीसों घंटे जुटा रहा, ताकि मेहमानों को किसी प्रकार की दिक्कत ना हो। वाराणसी का सांसद होने के नाते मेरे लिए ये गर्व और संतोष दोनों का विषय है।

इस बार काशी-तमिल संगमम का समापन समारोह रामेश्वरम में आयोजित किया गया, जिसमें तमिलनाडु के सपूत उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन जी भी मौजूद रहे। उन्होंने इस कार्यक्रम को अपने विचारों से समृद्ध बनाया। भारतवर्ष की आध्यात्मिक समृद्धि पर बल देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे इस तरह के मंच राष्ट्रीय एकता को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।

काशी-तमिल संगमम का बहुत गहरा प्रभाव देखने को मिला है। इसके जरिए जहाँ सांस्कृतिक चेतना को मजबूती मिली है, वहीं शैक्षिक विमर्श और जनसंवाद को भी काफी बढ़ावा मिला है। इससे हमारी संस्कृतियों के बीच संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं। इस मंच ने ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को आगे बढ़ाया है, इसलिए आने वाले समय में हम इस आयोजन को और वाइब्रेंट बनाने वाले हैं। ये वो भावना है, जो शताब्दियों से हमारे पर्व-त्योहार, साहित्य, संगीत, कला, खान-पान, वास्तुकला और ज्ञान-पद्धतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

वर्ष का यह समय हर देशवासी के लिए बहुत ही पावन माना जाता है। लोग बड़े उत्साह के साथ संक्रांति, उत्तरायण, पोंगल, माघ बिहू जैसे अनेक त्योहार मना रहे हैं। ये सभी उत्सव मुख्य रूप से सूर्यदेव, प्रकृति और कृषि को समर्पित हैं। ये त्योहार लोगों को आपस में जोड़ते हैं, जिससे समाज में सद्भाव और एकजुटता की भावना और प्रगाढ़ होती है। इस अवसर पर मैं आप सभी को अपनी शुभकामनाएँ देता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि इन उत्सवों के साथ हमारी साझी विरासत और सामूहिक भागीदारी की भावना देशवासियों की एकता को और मजबूत करेगी।

बाढ़ हो या चक्रवात… हर राज्य को सबसे पहले भारतीय सेना की ही आती है याद: जानें आपदा के समय आर्मी कैसे निभाती है ‘संकटमोचक’ की भूमिका

भारत में जब भी कोई बड़ा संकट आता है चाहे पहाड़ धंस जाएँ, नदियाँ उफनाएँ, चक्रवात तांडव मचाएँ या जातीय हिंसा से पूरा क्षेत्र अशांत हो जाए, सबसे पहला फोन भारतीय सेना के पास जाता है। यह कोई संयोग नहीं है, न ही कोई पुरानी आदत। यह एक मजबूत, विश्वसनीय और तेज प्रतिक्रिया वाली संस्था की पहचान है। भारतीय सेना की गतिशीलता, इंजीनियरिंग कौशल, चिकित्सा सुविधाएँ, लॉजिस्टिक्स व्यवस्था और अनुशासित कमांड स्ट्रक्चर ने इसे देश का ‘फर्स्ट रिस्पॉन्डर’ बना दिया है।

पिछले कई दशकों से यह पैटर्न दोहराया जा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं से लेकर आंतरिक सुरक्षा के संकट तक, सेना हमेशा सबसे आगे खड़ी मिलती है। रक्षा मंत्रालय की रिपोर्टों से लेकर जमीनी हकीकत तक, हर जगह यही तस्वीर उभरती है कि जब सिविल प्रशासन की क्षमता कम पड़ जाती है, तो सेना ही वह मजबूत कंधा बनती है जिस पर पूरा राज्य टिकता है।

सेना की संकटमोचक भूमिका को समझना जरूरी

भारतीय सेना की ‘एड टू सिविल अथॉरिटी’ की भूमिका नई नहीं है। आजादी के बाद से ही सेना को आपात स्थितियों में सिविल प्रशासन की मदद के लिए बुलाया जाता रहा है। 2001 का गुजरात भूकंप इसका बड़ा उदाहरण है, जहाँ सेना ने हजारों लोगों को मलबे से निकाला और राहत सामग्री पहुँचाई। लेकिन पिछले दो दशकों में यह भूमिका और ज्यादा स्पष्ट और संस्थागत हो गई है।

साल 2004 के हिंद महासागर सुनामी के बाद भारत ने अपनी HADR (ह्यूमैनिटेरियन असिस्टेंस एंड डिसास्टर रिलीफ) क्षमताओं को मजबूत किया। फिर 2013 की उत्तराखंड आपदा ने इसे नया आयाम दिया। उसके बाद से हर साल सेना की यह भूमिका बढ़ती गई। आज सेना न सिर्फ देश के अंदर बल्कि पड़ोसी देशों में भी फर्स्ट रिस्पॉन्डर के रूप में उभर रही है नेपाल भूकंप, श्रीलंका चक्रवात, तुर्की भूकंप, थाईलैंड भूकंप जैसी घटनाओं में भारत की मदद सबसे पहले पहुँची।

यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि सेना की ट्रेनिंग और संरचना ही ऐसी है कि वह सबसे कठिन परिस्थितियों में भी काम कर सकती है। जहाँ सिविल एजेंसियाँ बुनियादी ढाँचे पर निर्भर रहती हैं, वहीं सेना अपने साथ सब कुछ लेकर आती है खाना, दवा, संचार, इंजीनियरिंग उपकरण और अनुशासन।

सेना की पहुँच को बताने वाले आँकड़े

रक्षा मंत्रालय की 2025 की सालाना समीक्षा के अनुसार, अकेले 2025 में भारतीय सेना ने 10 राज्यों के 80 से ज्यादा स्थानों पर 141 कॉलम तैनात किए। इनमें विशेष इंजीनियर टास्क फोर्स भी शामिल थीं। इन अभियानों में 28,000 से अधिक लोगों को बचाया गया, 7,000 से ज्यादा को चिकित्सा सहायता दी गई और हजारों प्रभावितों तक राहत सामग्री पहुँचाई गई।

साल 2024 में भी यही पैटर्न था। पूरे साल में 83 से ज्यादा डिसास्टर रिलीफ टीमें 14 राज्यों में तैनात की गईं, जिन्होंने 30,000 से अधिक नागरिकों को बचाया और लाखों को राहत दी। पिछले दस सालों में यह संख्या हर साल औसतन 100 कॉलम से ऊपर रही है। ये कॉलम बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन, चक्रवात और आंतरिक अशांति के लिए तैनात किए जाते हैं।

ये आँकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं। ये एक ऐसी व्यवस्था की कहानी कहते हैं जो पहले से तैयार रहती है। सेना की टुकड़ियाँ उन इलाकों में पहले से तैनात रहती हैं जहाँ आपदाएँ सबसे ज्यादा आती हैं- हिमालय, पूर्वोत्तर, तटीय क्षेत्र। जब राज्य सरकार रिक्विजिशन भेजती है, तो घंटों में कॉलम निकल पड़ते हैं।

वायनाड भूस्खलन 2024: सबसे ताजा और मार्मिक उदाहरण

30 जुलाई 2024 को केरल के वायनाड में आए भयानक भूस्खलन ने सैकड़ों जिंदगियाँ छीन लीं। गाँव मलबे में दफन हो गए, सड़कें-पुल बह गए, पूरा क्षेत्र अलग-थलग पड़ गया। राज्य सरकार ने तुरंत मदद माँगी और सेना सबसे पहले पहुँची

कुछ ही घंटों में दो फ्लड रिलीफ कॉलम कन्नूर से रवाना हो गए। फिर 6 बड़े HADR कॉलम तैनात किए गए, जिसमें लगभग 500 जवान, मेडिकल टीमें, स्निफर डॉग्स और भारी उपकरण शामिल थे। सेना ने करीब 1,000 लोगों को मलबे से जिंदा निकाला, प्राथमिक उपचार दिया और सुरक्षित जगहों पर पहुँचाया। दर्जनों शवों को सम्मान के साथ बरामद किया गया।

सबसे बड़ी चुनौती थी पहुँच। नदियाँ उफन रही थीं, पुल टूट चुके थे। मद्रास इंजीनियर ग्रुप ने 190 फीट लंबा क्लास-24 बेली ब्रिज बनाया, जो मुंडक्कई को बाहर की दुनिया से जोड़ता है। एक अस्थायी पैदल पुल तो रातोंरात तैयार हो गया। हेलिकॉप्टरों से भारी मशीनें नदियों के उस पार पहुँचाई गईं।

सेना ने कोझिकोड में कमांड-कंट्रोल सेंटर स्थापित किया। नौसेना, वायुसेना, कोस्ट गार्ड, एनडीआरएफ और राज्य पुलिस के साथ मिलकर 1,500 से ज्यादा रेस्क्यू वर्कर्स ने काम किया। लेकिन शुरुआती और सबसे महत्वपूर्ण घंटों में सेना ही थी जिसने स्थिति को संभाला।

सिक्किम फ्लैश फ्लड 2023, ऊँचाई पर चुनौतीपूर्ण अभियान

अक्टूबर 2023 में सिक्किम में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड ने तबाही मचाई। तीस्ता नदी उफनाई, पुल बह गए, 23 सैनिक लापता हो गए। सेना ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। एनडीआरएफ के साथ मिलकर हजारों पर्यटकों और स्थानीय लोगों को बचाया गया।

सेना के जवान खुद प्रभावित थे, फिर भी उन्होंने रिलीफ कैंप लगाए, राहत सामग्री पहुँचाई और सड़कें बहाल कीं। यह दिखाता है कि सेना कितनी कठिन परिस्थितियों में भी काम करती है।

उत्तराखंड आपदा 2013 में ऑपरेशन सूर्य होप

जून 2013 की उत्तराखंड बाढ़ को कौन भूल सकता है? केदारनाथ सहित पूरा क्षेत्र तबाह हो गया। हजारों तीर्थयात्री फँस गए। सेना ने ऑपरेशन सूर्य होप शुरू किया। 2,223 सॉर्टीज उड़ान भरीं, 1,700 टन राहत सामग्री पहुँचाई गई। 10,000 कंबल, दवाइयाँ, खाना… सब कुछ सेना ने पहुँचाया।

लाखों लोगों को बचाया गया। यह ऑपरेशन दुनिया भर में सराहा गया और इसने सेना की HADR भूमिका को नई ऊँचाई दी।

असम की बाढ़ में हर साल संघर्ष

असम में हर साल बाढ़ आती है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ लाखों लोगों को प्रभावित करती हैं। सेना हर साल दर्जनों कॉलम तैनात करती है। बोट्स, हेलिकॉप्टर, मेडिकल टीमें सब कुछ सेना तैनात करती है। साल 2025 में भी असम को बाढ़ राहत के लिए बड़ी राशि दी गई और सेना ने मुख्य भूमिका निभाई।

सेना की संस्थागत ताकत का कोई अन्य विकल्प नहीं

सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज के ADG मेजर जनरल RPS भदौरिया (VSM-रि) ने कहा कि सेना की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेल्फ-कंटेन्ड यूनिट्स हैं। हर कॉलम में कम्युनिकेशन, लॉजिस्टिक्स, इंजीनियर्स और मेडिकल टीम होती है। कॉम्बैट इंजीनियर्स बेली ब्रिज, अस्थायी रोड सब बना सकते हैं। मेडिकल टीमें फील्ड हॉस्पिटल लगा सकती हैं।

लॉजिस्टिक्स इतनी मजबूत है कि हवाई, सड़क, नदी हर रास्ते से सामग्री पहुँचाई जा सकती है। कमांड स्ट्रक्चर साफ है- मिशन टाइप ऑर्डर्स दिए जाते हैं और जवान बिना देरी के अमल करते हैं।

संकटमोचक भूमिका की हमेशा तैयारी करती रहती है सेना

सेना की यह क्षमता रिहर्सल से आती है। 2024 में गुजरात में संयुक्त विमोचन अभ्यास हुआ। चक्रवात की कल्पना की गई, सभी एजेंसियों ने मिलकर प्लान परखे। स्वदेशी तकनीक भी दिखाई गई। ऐसे अभ्यास से इंटर-एजेंसी फ्रिक्शन कम होता है।

सिविलियन क्षमता को बढ़ाना जरूरी

यह निर्भरता एक चेतावनी भी है। सेना की मुख्य जिम्मेदारी देश की रक्षा है। सेना को हर प्रशासनिक कमी या संरचनात्मक कमजोरी के लिए यूनिवर्सल फायर ब्रिगेड नहीं बनने दिया जा सकता। हर संकट में उसे बुलाना उसकी युद्ध तैयारी को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सिविलियन क्षमताएँ मजबूत करनी होंगी, जिसमें एनडीआरएफ को और बड़ा करना, राज्य फोर्स को बेहतर उपकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना शामिल है।

सेना का फर्स्ट रिस्पॉन्डर होना गर्व की बात

भारतीय सेना का फर्स्ट रिस्पॉन्डर बनना देश के लिए गर्व की बात है। यह नागरिकों को भरोसा देता है कि सबसे बुरे समय में भी कोई है जो आएगा। अब जरूरत है कि इस भरोसे को एक मजबूत सिविलियन इकोसिस्टम से पूरा किया जाए, ताकि सेना अपनी मुख्य जिम्मेदारी पर फोकस कर सके और जरूरत पड़ने पर फिर सबसे पहले पहुँचे।

सही तरीके से इस्तेमाल की जाए तो सेना की फर्स्ट रिस्पॉन्डर की भूमिका एक राष्ट्रीय संपत्ति है। यह नागरिकों को आश्वासन देती है कि जब आपदा आएगी, तो राज्य अपनी सबसे सक्षम संस्था को उनकी रक्षा के लिए सबसे पहले भेजेगा। अब चुनौती यह है कि इस आश्वासन के साथ एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया जाए जो उन वर्दीधारी जवानों के योग्य हो जो बार-बार सबसे पहला फोन उठाते हैं और सबसे पहले पहुँचते हैं।