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नया नहीं है विदेशी सेबों का आयात, मीडिया भारत-US ट्रेड डील पर भ्रम फैलाना बंद करे: केंद्रीय मंत्री ने बताया- कैसे अमेरिकी सेबों के आने से भी नहीं पड़ेगा किसानों पर असर

भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते के ढाँचे की घोषणा के बाद से आम लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि अंतिम समझौता कैसा होगा। राजनेता या तो इसका पूरी तरह समर्थन कर रहे हैं या फिर इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं, जबकि व्यापारी वर्ग इसे सतर्क होकर आशावाद के साथ देख-समझ रहा है।

भारत-अमेरिका समझौते के तहत भारत ने सेब समेत कुछ खास कृषि उत्पादों पर अमेरिका को कोटा आधारित रियायतें देने पर सहमति जताई है। हालाँकि भारतीय बाजार में अमेरिकी सेब की एंट्री की संभावना ने खासकर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब उत्पादकों की चिंता बढ़ा दी है।

अमेरिकी सेब के लिए कोटा, भारतीय उत्पादकों की चिंताएँ और केंद्र सरकार का आश्वासन

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारतीय सरकार ने अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क 50% से घटाकर 25% कर दिया है। इसके साथ ही न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) 75 से 80 रुपए प्रति किलो तय किया गया है। इसका मतलब यह है कि बहुत सस्ते सेब भारतीय बाजार में नहीं आ सकेंगे और स्थानीय किसानों के कारोबार को नुकसान नहीं पहुँचेगा।

मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग

इसका कारण यह है कि टैक्स जोड़ने के बाद इन सेबों की कीमत लगभग 100 रुपए प्रति किलो या उससे अधिक होगी। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर, खासकर कश्मीर घाटी, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब उत्पादकों ने चिंता जताई है।

उनका मानना है कि सीमित मात्रा में भी अमेरिकी सेब का आयात, जो आकार में एकसमान, उच्च गुणवत्ता वाले और प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध होते हैं, घरेलू सेब की कीमतों पर दबाव डाल सकता है, खासकर उन सेबों पर जो कोल्ड स्टोरेज से निकालकर ऑफ-सीजन में बेचे जाते हैं।

गौरतलब है कि कश्मीर भारत के कुल सेब उत्पादन का करीब 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा देता है। ऐसे में सेब वहाँ की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक स्थिरता के लिए बेहद अहम हैं। जम्मू-कश्मीर में सेब उद्योग की कीमत लगभग 12,000 करोड़ रुपए आँकी जाती है और इससे करीब 35 लाख लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है।

वर्ष 2024-25 के सीजन में करीब 21 लाख टन कश्मीरी सेब दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, अहमदाबाद, कोलकाता, मुंबई जैसे बड़े शहरों में बेचे गए। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के भी कई किसान अमेरिकी सेब के आयात को अपने अस्तित्व से जोड़कर देख रहे हैं।

उनका कहना है कि पहले से ही बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान, सीमित कोल्ड स्टोरेज सुविधाएँ और परिवहन की दिक्कतों ने उनके मुनाफे को कम कर दिया है। ऐसे में अगर पीक सीजन में अमेरिकी सेब आ गए तो कीमतें गिरेंगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।

मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग

कश्मीर वैली फ्रूट ग्रोअर्स कम डीलर्स यूनियन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर अमेरिका और यूरोप से आने वाले सेब पर 100% से अधिक आयात शुल्क लगाने की माँग की है। यूनियन ने चेतावनी दी कि विदेशी सेब का उदार आयात भारत के बागवानी क्षेत्र को ‘बीमार उद्योग’ में बदल सकता है।

हिमाचल प्रदेश में भी यह चिंता जताई गई है कि वहाँ के प्रीमियम सेब 100 से 150 रुपए प्रति किलो बिकते हैं और अगर अमेरिकी सेब भी इसी कीमत पर उपलब्ध होंगे तो उपभोक्ता आयातित सेब को प्राथमिकता देंगे। कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिकी सेब के लिए MIP 100 रुपए प्रति किलो होना चाहिए था।

वहीं कई किसान यह भी कहते हैं कि इस समझौते का घरेलू सेब उद्योग पर खास असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि स्थानीय सेब गुणवत्ता में किसी से कम नहीं हैं। उनके अनुसार, MIP बढ़ाने की माँग करने की बजाय किसानों को सब्सिडी, बेहतर पौध और आधुनिक तकनीक पर जोर देना चाहिए।

मीडिया में अमेरिकी सेबों को लेकर हो रही रिपोर्टिंग

इन तमाम चिंताओं के बीच केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बार-बार भरोसा दिलाया है कि घरेलू किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा कि भारत अब या भविष्य में ऐसा कोई भी व्यापार समझौता नहीं करेगा, जिससे कृषि और डेयरी क्षेत्र में उसकी ‘रेड लाइन’ पार हो।

मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारतीय किसानों और MSMEs सेक्टर के हित पूरी तरह संरक्षित हैं। सेब आयात के मुद्दे पर उन्होंने बताया कि देश में सेब की माँग 25-26 लाख टन से अधिक है, जबकि उत्पादन करीब 20-21 लाख टन है।

भारत पहले से ही हर साल करीब 5.5 लाख टन सेब आयात करता है, जिसमें अमेरिका बड़ा आपूर्तिकर्ता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सेब की अंतिम कीमत लगभग 100 रुपए प्रति किलो होगी, इसलिए स्थानीय किसानों को नुकसान की आशंका नहीं होनी चाहिए।

पीयूष गोयल ने कहा, “हम सेब के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हैं। हमारी माँग 25-26 लाख टन है, जबकि उत्पादन 20-21 लाख टन है। हम हर साल 5.5 लाख टन सेब आयात करते हैं, जिसमें बड़ी मात्रा अमेरिका से आती है। हमने सेब के बाजार को पूरी तरह नहीं खोला है, बल्कि कोटा दिया है, जो वर्तमान आयात से भी कम है।”

उन्होंने आगे कहा, “सेब पर न्यूनतम आयात मूल्य 50 रुपए है और 50 प्रतिशत शुल्क के बाद यह 75 रुपए हो जाता है। यानी इससे कम कीमत पर सेब देश में नहीं आ सकते। अमेरिकी सेब के लिए MIP 80 रुपए है और 25 प्रतिशत शुल्क के बाद कीमत करीब 100 रुपए हो जाती है। इससे किसानों को सुरक्षा मिलती है।”

मंत्री ने जोर देकर कहा कि सीमित मात्रा में आने वाले अमेरिकी सेब स्थानीय किसानों के लिए खतरा नहीं हैं और यह मौजूदा आयात से भी कम मात्रा में होंगे।

पीड़ित मानसिकता का चश्मा: हर सुधारात्मक कदम पर आक्रोश छोड़ना होगा

मोदी सरकार द्वारा सीमित और संतुलित रियायत देने के बावजूद कुछ स्थानीय हितधारक डर फैलाने और पीड़ित मानसिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। यह मुद्दा केवल सेब तक सीमित नहीं है। भारत में नीतिगत और सार्वजनिक विमर्श में वैश्विक प्रतिस्पर्धा को अक्सर ‘पीड़ित होने’ के रूप में देखा जाता है, जबकि इसे आत्म-सुधार का अवसर माना जाना चाहिए।

भारत एक मजबूत अर्थव्यवस्था और विशाल बाजार वाला देश है। वह विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में व्यापार और उद्योग को संरक्षणवाद की ढाल के पीछे छिपे रहने की आदत छोड़नी होगी। ऊँचे शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं ने लंबे समय तक स्थानीय उत्पादकों को कठिन सुधारों से बचाए रखा।

2020 के किसान आंदोलन ने दिखाया कि अच्छे सुधार भी आसानी से स्वीकार नहीं होते। भारतीय सेब स्वाद में अच्छे हैं, लेकिन गुणवत्ता में एकरूपता की कमी, कमजोर ग्रेडिंग-पैकेजिंग, ठंडी भंडारण व्यवस्था की कमी और आधुनिक तकनीक को अपनाने में सुस्ती जैसी समस्याएँ हैं।

अमेरिकी सेब बेहतर तकनीक, कीट नियंत्रण, नियंत्रित वातावरण भंडारण और गुणवत्ता मानकों के कारण आगे हैं। यदि चिली, तुर्की और अन्य देशों से आने वाले सेब हिमाचल और कश्मीर के किसानों को खत्म नहीं कर पाए, तो केवल अमेरिकी सेब से अचानक इतना डर समझ से परे है।

भारतीय सेबों की अपनी सांस्कृतिक पहचान है, कीमत अपेक्षाकृत कम है और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत है। असल मुकाबला उपभोक्ता की पसंद से तय होगा। यदि अमेरिकी सेब ज्यादा पसंद किए जाते हैं, तो इसका मतलब गुणवत्ता और मूल्य में अंतर है, जिसे घरेलू उत्पादकों को पाटना होगा। प्रतिस्पर्धा सुधार के लिए दबाव बनाती है।

1991 के बाद भारत के ऑटो, टेलीकॉम और उपभोक्ता वस्तु क्षेत्रों में यही देखने को मिला। संरक्षणवाद से उपभोक्ताओं को नुकसान और महंगे दाम चुकाने पड़ते हैं। इसलिए आत्मसंतोष की संस्कृति छोड़नी होगी।

मेनस्ट्रीम मीडिया कश्मीरी सेब उत्पादकों की चिंता को बढ़ा-चढ़ाकर कर रहा पेश

हर सुधारात्मक कदम पर आक्रोश देश के लिए ठीक नहीं है। हर व्यापार समझौते में कुछ को फायदा और कुछ को नुकसान होता है। भारत जैसी परिपक्व अर्थव्यवस्था को अल्पकालिक झटकों को सहने और खुद को बेहतर बनाने की क्षमता दिखानी चाहिए और यहाँ के लोगों को संरक्षित लाभ के नुकसान पर शोक मनाने के बजाय अनुकूलन, कौशल उन्नयन और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक मानकों को पूरा करने की क्षमता प्रदर्शित करनी चाहिए।

मेनस्ट्रीम मीडिया को भी कश्मीरी सेब उत्पादकों के सवालों के साथ संतुलित रिपोर्टिंग करनी चाहिए। अमेरिकी सेब का सीमित और सुरक्षित आयात कोई अस्तित्व का संकट नहीं है। मीडिया को इस पर प्रकाश डालना चाहिए था कि भारत पहले से कई देशों से सेब आयात करता है और इससे घरेलू उत्पादन खत्म नहीं हुआ है।

डर और आक्रोश के शोर में यह तथ्य दब रहा है कि अमेरिकी सेब मुख्य रूप से प्रीमियम शहरी बाजारों में प्रतिस्पर्धा करेंगे, न कि स्थानीय सेबों को पूरी तरह खत्म करेंगे। समय की माँग है कि उत्पादक गुणवत्ता, ब्रांडिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दें, सरकार से तकनीक और निवेश में सहयोग माँगें और वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को ढालें।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

भक्ति, तप, सेवा और सत्संग… ‘हर-हर महादेव’ के साथ हुई भावनाथ मेले की शुरुआत: जानिए क्यों कहा जाता है इसे गुजरात का ‘मिनी कुंभ’

योगियों की तपोभूमि, साधु-संतों के लिए माँ की गोद समान और श्रद्धालुओं को परम शांति व आध्यात्मिक सुख का अनुभव कराने वाले गुजरात के जूनागढ़ के पवित्र गिरनार पर्वत की तलहटी में सैकड़ों वर्षों से भावनाथ का मेला आयोजित होता आ रहा है। महा वद नौम से महाशिवरात्रि तक चलने वाले इस भाव, भक्ति और भव्यता के अद्भुत संगम में गुजरात भर से ही नहीं, बल्कि पूरे देश से साधु-संत, महंत और श्रद्धालु एकत्र होते हैं।

यहाँ सत्संग होता है, भगवान शिव की आराधना की जाती है और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत अनुभव होता है। इस वर्ष भावनाथ का मेला बुधवार (11 फरवरी 2026) को हर-हर महादेव की गूँज के साथ शुरू हुआ और पहले से कहीं अधिक भव्य रूप में आयोजित किया जा रहा है। इस साल की तैयारियों और विशालता को देखते हुए इसे ‘मिनी कुंभ’ भी कहा जा रहा है। इस बार भावनाथ मंदिर का संचालन सरकार के पास है, जिससे मेले की पवित्रता बनी रहे और इसे राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर पहचान मिले।

इसके लिए सरकार द्वारा भी व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं। व्यवस्थाओं से लेकर तैयारियों तक, हर स्तर पर अंतिम रूप दिया जा रहा है। गिरनार की तलहटी में सुवर्णरेखा नदी के तट पर स्थित अति पवित्र भावनाथ महादेव मंदिर में इस मेले का आयोजन होता है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है। ‘भावनाथ’ का अर्थ है ‘भाव’ अर्थात जो सृजित हुआ है, उसके नाथ यानी संसार के सृजनकर्ता भगवान शिव।

क्या हैं मंदिर से जुड़ी दंतकथाएँ?

मंदिर के पीछे एक प्राचीन कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि प्रलयकाल में संपूर्ण सृष्टि रुद्र में लीन हो गई और ब्रह्मा का एक दिन पूर्ण हुआ। प्रभात होते ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र क्रमशः सत्त्व, रज और तमस रूप में प्रकट हुए। प्रलय के समय भगवान शिव जल में समाधिस्थ थे।

तीनों देवों में यह विवाद हो गया कि सबसे महान कौन है। तब शिवजी ने बीच में हस्तक्षेप कर ब्रह्मा को सृष्टि रचना, विष्णु को पालन और रुद्र को संहार का कार्य सौंपकर विवाद का समाधान किया। इसके बाद ब्रह्मा ने शिवजी से आग्रह किया कि वे पृथ्वी पर रहकर मानवों के सुख-दुःख का निवारण करें।

शिवजी ने पृथ्वी पर दृष्टि डाली और वनराजि से सुशोभित उज्जयंत पर्वत (गिरनार) उन्हें प्रिय लगा। यहीं उन्होंने निवास किया। उधर कैलाश में महादेव को न पाकर माता पार्वती उन्हें खोजने निकलीं। देवताओं से जानकारी मिलने पर वे क्रोधित होकर गिरनार पहुँचीं। उसी दिन भगवान शिव भावनाथ रूप में प्रकट हुए, वह दिन वैशाख शुक्ल पूर्णिमा का था।

ऐसी लोकमान्यता है कि माता पार्वती ने अंबिका रूप में गिरनार पर वास किया, विष्णु ने दामोदर कुंड में दामोदर रूप धारण किया और अन्य देवता, यक्ष व गंधर्व भी गिरनार के विभिन्न स्थानों पर निवास करने लगे। भावनाथ मंदिर के पास स्थित मृगीकुंड की कथा भी अत्यंत रोचक है।

कहा जाता है कि कान्यकुब्ज (कन्नौज) के राजा भोज को उनके सेवक ने बताया कि रेवताचल (गिरनार) के जंगल में हिरणों के झुंड के बीच एक स्त्री घूम रही थी, उसका चेहरा हिरण जैसा और शरीर स्त्री जैसा था। राजा भोज बड़ी मशक्कत के बाद उसे अपने महल में लाए। विद्वान दोनों में अंतर नहीं समझ पाए तो राजा कुरुक्षेत्र में तपस्या कर रहे ऋषि ऊर्ध्वरेत के पास गए।

ऋषि ने मृगीमुखी को मनुष्य की वाणी प्रदान की। उन्होंने अपने पिछले जीवन के बारे में बताते हुए कहा कि पहले राजा भोज सिंह थे और वह हिरण थीं। शिकार करते समय हिरण का सिर एक बाँस की झाड़ी में फँस गया और उसका शरीर सुवर्णरेखा नदी में गिर गया। नदी के पवित्र जल से शरीर ने मनुष्य का रूप धारण कर लिया, लेकिन चेहरा हिरण का ही रहा।

ऋषि के आदेशानुसार, राजा ने हिरण की खोपड़ी को झाड़ी से निकाला और उसे सुवर्णरेखा के जल में विसर्जित कर दिया। जिसके बाद मृगीमुखी का संपूर्ण शरीर मनुष्य बन गया। राजा भोज ने उनसे विवाह किया और अपनी पत्नी के सुझाव पर गिरनार पर्वत की तलहटी में यह मृगीकुंड बनवाया। यह लोककथा है और आज भी शिवरात्रि के दिन साधु यहाँ स्नान करते हैं।

क्यों कहलाता है यह क्षेत्र ‘वस्त्रपूत क्षेत्र’?

इस क्षेत्र को ‘वस्त्रपूत क्षेत्र’ भी कहा जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती आकाश मार्ग से जा रहे थे, तभी माता का दिव्य वस्त्र यहाँ गिर पड़ा। उसी समय से यह स्थान ‘वस्त्रपूत क्षेत्र’ कहलाने लगा। गुजरात सरकार द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘गुजरात्न लोकोत्सव अना मेला’ में भी इस कथा का उल्लेख मिलता है।

साधुओं के मृगीकुंड स्नान का विशेष महत्व

इस मेले का मुख्य उद्देश्य सांसारिक लोगों पर नहीं, बल्कि संतों और भिक्षुओं पर केंद्रित है। व्रत के दिन, भावनाथ मंदिर में ध्वजारोहण के साथ मेले का औपचारिक उद्घाटन किया जाता है। यह पवित्र कार्य देश भर से आए भिक्षुओं की उपस्थिति में संपन्न होता है। प्रशासन इन सभी भिक्षुओं के लिए अखाड़ा और आवास की व्यवस्था करता है।

एक ओर साधुओं के डेरे लगते हैं, दूसरी ओर सेवाभावी संस्थाओं के तंबू सजते हैं। चार दिनों तक पूरी तलहटी शिवमय और भक्तिमय वातावरण से भर जाती है। यह मेला सैकड़ों वर्षों से आयोजित होता आ रहा है और समय के साथ कुछ परिवर्तन हुए हैं, लेकिन इसका मूल तत्व आज भी जीवंत है। जैसे कुंभ में शाही स्नान का महत्व है, वैसे ही यहाँ मृगीकुंड में स्नान का विशेष स्थान है।

शिवरात्रि की मध्यरात्रि में निकलने वाली साधुओं की शोभायात्रा मुख्य आकर्षण

इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण है महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में निकलने वाली साधुओं की भव्य शोभायात्रा। नागा साधु, अघोरी और विभिन्न अखाड़ों के साधु घोड़ा गाड़ी, बग्घी और हाथियों पर सवार होकर शंखनाद और बैंड-बाजों के साथ मृगीकुंड स्नान के लिए प्रस्थान करते हैं। रास्ते में वे अंग-प्रदर्शन, तलवारबाजी और लाठी-कला का प्रदर्शन भी करते हैं।

शाही स्नान का नेतृत्व पंचदशनाम जूना अखाड़ा करता है। इसके साथ अन्य अखाड़ों के महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर और हजारों साधु सम्मिलित होते हैं। स्नान के पश्चात भावनाथ मंदिर में महाआरती और महापूजा होती है और प्रातःकाल तक मेले का समापन होता है।

लोकमान्यता है कि गिरनार गुफा में रहने वाले नागा साधु भी इन जुलूसों में भाग लेते हैं और कुछ साधु स्नान के बाद अदृश्य हो जाते हैं और फिर कभी दिखाई नहीं देते। साधुओं और संतों के स्नान के बाद, भावनाथ मंदिर में भगवान शिव की आरती और महापूजा की जाती है। मेला सुबह तक समाप्त हो जाता है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए अंबिका आश्रम के महंत रामजुबापू कहते हैं, “यह मेला कुंभ मेले जितना ही पवित्र है। महाशिवरात्रि पर हजारों नागा साधु-अघोरी यहाँ के कुंड में शाही स्नान करते हैं, लेकिन स्नान के बाद बाहर नहीं आते। आज तक यह पता नहीं चल पाया है कि वे साधु कहाँ से आते हैं और दामोदर कुंड में डुबकी लगाने के बाद कहाँ गायब हो जाते हैं।”

सेवा कार्यों में जुटती हैं सामाजिक संस्थाएँ

सौराष्ट्र की पावन भूमि पर ऐसा धार्मिक आयोजन हो और सेवा कार्य न हों, यह संभव नहीं। भावनाथ मेले में देशभर से आने वाले साधु-संतों और श्रद्धालुओं की सेवा हेतु अनेक सामाजिक संस्थाएँ जुटती हैं। भोजन, विश्राम, सत्संग, भजन और चिकित्सा जैसी सेवाएँ निरंतर चलती रहती हैं।

दिन-रात भक्तों की सेवा में समर्पित यह संस्थाएँ इस मेले को सेवा और समर्पण का अनुपम उदाहरण बनाती हैं। मेले के लिए गुजरात और पूरे देश से साधु-संतों, सामाजिक संगठनों और दानदाताओं का समूह 5 मई से ही गिरनार की तलहटी में भक्तों की सेवा के लिए पहुँचना शुरू कर देता है। उनकी रातें या उतार पहले से तय होते हैं।

उदाहरण के लिए जेरामबापा की रात, तोरानिया की रात, परबन की रात, भूराभागत की रात, लक्ष्मण बरोट की रात, खोडियार रस मंडल की रात। यहाँ सुबह, दोपहर और शाम तीनों समय भोजन और ठहरने की व्यवस्था होती है। साथ ही भजन-सत्संग-सन्तवाणी निरंतर होती रहती है। इस दौरान कुछ प्रसिद्ध कलाकार भी उपस्थित होते हैं, जो संतवाणी में भाग लेंते हैं।

भावनाथ का यह मेला केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति, तप, सेवा और सत्संग का अद्वितीय संगम है, जहाँ मानव आत्मा को शिव से एकाकार होने का दिव्य अनुभव प्राप्त होता है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

भारत ने नहीं बदला अपना स्टैंड, ट्रेड डील में अमेरिका को करना पड़ा बदलाव: व्हाइट हाउस ने अपनी फैक्ट शीट में ‘दाल’ शब्द को हटाया, ‘वादे’ की जगह लिखा- इंडिया की इच्छा

अमेरिका ने हाल ही में किए गए इंडिया-US ट्रेड डील को लेकर जारी किए गए फैक्ट शीट में चुपके से बदलाव किया है। बदले हुए फैक्टशीट में दालों का जिक्र नहीं है, $500 बिलियन यानी ₹4194.5 करोड़ से ज्यादा की अमेरिकी सामान खरीदने की भारत की प्रतिबद्धता को अब इरादा कहा गया है और डिजिटल सर्विसेज़ टैक्स से जुड़े क्लेम हटा दिए गए हैं। ये बदलाव डॉक्यूमेंट्स के पब्लिश होने के कुछ ही घंटों के अंदर किए गए।

अमेरिकी दालों पर कोई छूट नहीं

अमेरिका ने भारत के साथ हुए ट्रेड डील की फैक्ट शीट में कुछ बदलाव किए हैं। भारत के हिसाब से ये काफी राहत देने वाली है। फैक्ट शीट से दालें हटा दी गई हैं। इसका मतलब है कि भारत को अब अमेरिका दालों पर टैरिफ घटाने की जरूरत नहीं है। इससे दाल उत्पादक किसानों को राहत मिलेगी। अगर अमेरिकी दालें भारत के बाजार में आती तो किसानों को नुकसान हो सकता था।

भारत में दालें राजनीतिक रूप से एक सेंसिटिव सेक्टर हैं। खास बात यह है कि भारत मसूर, छोले और सूखी फलियों का सबसे बड़ा प्रोड्यूसर और कंज्यूमर है। इन्हें हटाना दिखाता है कि नई दिल्ली ने उस भाषा के खिलाफ विरोध किया है जिस पर वह सहमत नहीं थी।

500 बिलियन डॉलर खरीद की ‘प्रतिबद्धता’ अब बना ‘इरादा’

भारत अमेरिका ट्रेड डील के साझा बयान में कहा गया था कि अगले 5 सालों में भारत ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर का आयात करने का वादा किया है। लेकिन बदलाव के बाद इसमें कहा गया है कि ‘प्रतिबद्धता’ नहीं बल्कि ये ‘इरादा’ है। यानी डील के हिसाब से इसमें बदलाव संभव है और भारत की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। अब इसमें लिखा है, ‘भारत ज्यादा अमेरिकी सामान खरीदने और $500 बिलियन यानी ₹4194.5 करोड़ से ज़्यादा की US एनर्जी, इन्फॉर्मेशन और कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी, कोयला और दूसरे प्रोडक्ट खरीदने का इरादा रखता है।’

साभार- WayBackMachine/White House

डिजिटल सर्विस टैक्स हटाने वाली बात भी हटाई

अमेरिका के फैक्टशीट में जो बदलाव हुए हैं उसमें भारत के अपने डिजिटल सर्विस टैक्स हटाने से जुड़ा टेक्स्ट भी हटा दिया गया है। पहले कहा गया था, ‘भारत अपने डिजिटल सर्विस टैक्स हटा देगा और डिजिटल ट्रेड में भेदभाव वाले या बोझिल तरीकों और दूसरी रुकावटों को दूर करने वाले मजबूत बाइलेटरल डिजिटल ट्रेड नियमों पर बातचीत करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर कस्टम ड्यूटी लगाने पर रोक वाले नियम भी शामिल हैं।

अमेरिका ने अब कहा है, ‘भारत ने डिजिटल ट्रेड के लिए भेदभाव वाले या बोझिल तरीकों और दूसरी रुकावटों को दूर करने वाले मजबूत बाइलेटरल डिजिटल ट्रेड नियमों पर बातचीत करने का वादा किया है।’ फिलहाल भारत को डिजिटल टैक्स पर कुछ करने की जरूरत नहीं है। आगे नियमों को लेकर बात हो सकती है।

फैक्ट शीट में बदलाव भारत के लिए फायदेमंद

दालों पर टैरिफ नहीं घटाने से तो भारत को फायदा होगा ही साथ ही भारत पर टैरिफ 18 फीसदी किए जाने का फर्क भी बाजार में दिखेगा। भारत पर लगा टैरिफ पड़ोसी देशों पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, चीन, वियतनाम और दूसरे देशों से कम है। अब रूस से तेल खरीदने को लेकर लगाया गया 25 फीसदी रेसिपोकल टैरिफ भी खत्म हो गया है, यानी 50 फीसदी टैरिफ की जगह अब भारत को 18 फीसदी टैरिफ देना होगा। साझा बयान में जिन बातों का मतलब भारत के हितों के खिलाफ लग रहा था, उनमें बदलाव किया गया है और अमेरिका ने फैक्टशीट में चुपके से कई बदलाव किए हैं।

एक साल से चल रही थी ट्रेड डील पर बातचीत

व्यापार समझौतों में शब्दों के अपने मायने होते हैं। इसमें बदलाव का असर पड़ता है। यूएस ट्रेड डील में प्रतिबद्धता को इरादा में बदला गया। इसका काफी डिप्लोमैटिक और इकोनॉमिक असर पड़ता है। व्हाइट हाउस ने US-इंडिया ट्रेड डील पर अपनी फैक्ट शीट में चुपके से किए गए खास बदलावों को वापस ले लिया, क्योंकि बदलाव आधिकारिक साझा बयान से थोड़े अलग थे।
फैक्ट शीट में 9 फरवरी को जो बदलाव किया गया था, जिसमें ऐसी भाषा जोड़ी गई थी जो इंडिया के ‘व्यापारिक वचनबद्धता’ को बढ़ाती हुई लग रही थी। दालों पर भारत द्वारा टैरिफ कम करने की बात थी। कुछ घंटों बाद बिना सार्वजनिक जानकारी दिए 10 फरवरी 2026 को इन बदलावों को हटा दिया गया। अब साझा बयान के साथ नए फैक्ट शीट को शामिल किया गया है।

भारत और अमेरिका फरवरी 2025 में शुरू हुई लगभग एक साल की बातचीत के बाद एक अंतरिम ट्रेड समझौते पर पहुँचे। भारत को टेक्सटाइल, गारमेंट्स, लेदर, फुटवियर, केमिकल्स, होम डेकोर और कुछ खास मशीनरी जैसे कई एक्सपोर्ट्स पर ड्यूटी 50 परसेंट से घटाकर 18 परसेंट करने का फायदा मिलेगा।

योगी सरकार ने बनाया विकास का रिकॉर्ड, 8 साल में 2x होकर ₹30.25 लाख करोड़ हुई UP की अर्थव्यवस्था: जानें- इकोनॉमिक सर्वे की बड़ी बातें

उत्तर प्रदेश विकास की पटरी पर दौड़ रहा जिसके चलते अर्थव्यवस्था पिछले 8 वर्षों में दोगुनी हो गई है। वर्ष 2016-17 में यह 13.30 लाख करोड़ रुपए थी जो 2024-25 में बढ़कर 30.25 लाख करोड़ रुपए हो गई है।

राज्य के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने 9 फरवरी 2026 को राज्य विधानसभा में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश करते हुए यह जानकारी दी है। राज्य सरकार ने इस दौरान निवेश योजना भी प्रस्तुत की जिसके तहत भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश को मध्यम अवधि में 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

2025-26 में अर्थव्यवस्था के ₹36 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान

सोमवार (9 फरवरी) को उत्तर प्रदेश की राज्य विधानसभा में पेश किया गया आर्थिक सर्वेक्षण राज्य सरकार का पहला ऐसा वार्षिक आर्थिक दस्तावेज है, जो केंद्र सरकार की परंपरा के समान है। उत्तर प्रदेश सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण राज्य के आर्थिक प्रदर्शन, विभिन्न क्षेत्रों की प्रगति और पूरी वित्तीय स्थिति का डेटा देता करता है।

सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 10.8% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ा है। यह 2016-17 में 13.30 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 2024-25 में 30.25 लाख करोड़ रुपए हो गया है। वित्त वर्ष 2025-26 में उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था के 36 लाख करोड़ रुपए तक विस्तार करने का अनुमान है।

बजट सत्र के पहले दिन उत्तर प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कहा, “आर्थिक सर्वेक्षण केवल आँकड़ों का संकलन नहीं है बल्कि यह राज्य की प्रगति, लोगों की आकांक्षाओं और भविष्य की संभावनाओं को दर्शाने वाला एक जीवंत दस्तावेज है।”

घरेलू और वैश्विक निवेशकों की बढ़ती रुचि का संकेत देते हुए खन्ना ने कहा कि राज्य में 50 लाख करोड़ रुपए से अधिक के औद्योगिक प्रस्ताव आने की संभावना है। प्रति व्यक्ति आय के बारे में मंत्री खन्ना ने बताया कि यह 2016-17 में 54,564 रुपए से बढ़कर 2024-25 में 1,09,844 रुपए हो गई है। वर्ष 2025-26 के लिए प्रति व्यक्ति आय के 1.20 लाख रुपए तक पहुँचने का अनुमान है। वहीं, GSDP प्रति व्यक्ति के आधार पर आय 2016-17 में 61,142 रुपए से बढ़कर 2024-25 में 1,26,304 रुपए हो गई है।

राज्य विधानसभा में अपने भाषण के दौरान खन्ना ने बताया कि भारत की आजादी के समय उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के बराबर थी लेकिन 2014-15 तक यह घटकर राष्ट्रीय औसत के 50.2 प्रतिशत पर पहुँच गई। हालाँकि, 2024-25 में यह अनुपात सुधरकर 53.5 प्रतिशत हो गया है। वहीं, उत्तर प्रदेश की अपनी कर आय 2.5 गुना बढ़कर 2.09 लाख करोड़ रुपए हो गई है। कर्ज-से-GSDP अनुपात 28 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है।

आर्थिक विकास का मुख्य आधार बनी कृषि

उत्तर प्रदेश के आर्थिक विकास का प्रमुख आधार कृषि और इससे जुड़े क्षेत्र रहे हैं जिनका राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान 25.8 प्रतिशत है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, उद्योग क्षेत्र की हिस्सेदारी 27.2 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 47 प्रतिशत रही है। उत्तर प्रदेश 2024-25 में 737.4 लाख मीट्रिक टन उत्पादन के साथ भारत का सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक राज्य बना हुआ है। वर्ष 2017-18 से 2024-25 के बीच राज्य के कुल खाद्यान्न उत्पादन में 28.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि उत्पादकता में 11.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे राष्ट्रीय खाद्यान्न उत्पादन में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 18.1 प्रतिशत से बढ़कर 20.6 प्रतिशत हो गई है।

वर्ष 2017-18 से 2024-25 के बीच प्रति हेक्टेयर फसलों का सकल मूल्य वर्धन 0.98 लाख रुपए से बढ़कर 1.73 लाख रुपए हो गया है। धान और गेहूँ राज्य की सबसे बड़ी कृषि उपज बने हुए हैं। रबी और खरीफ दोनों मौसमों में उत्पादकता और क्षेत्रफल में बढ़ोतरी दर्ज हुई है।

इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश का हब बनता UP

आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 में 2.94 लाख करोड़ रुपए के समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। सर्वेक्षण में उत्तर प्रदेश के बेहतर होते इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर भी बात की गई है। इसमें कहा गया है कि राज्य राष्ट्रीय स्तर पर एक्सप्रेसवे का केंद्र बनता जा रहा है, जहाँ कुल 22 एक्सप्रेसवे हैं जिनमें तीन निर्माणाधीन और सात चालू हैं।

इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के पास भारत का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है और राज्य अपने एविएशन सेक्टर का भी विस्तार कर रहा है। BJP सरकार ने 5 अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों सहित कुल 24 हवाई अड्डों का लक्ष्य तय किया है। सर्वेक्षण में जेवर अंतरराष्ट्रीय ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे का भी उल्लेख किया गया है, जिसे उत्तर भारत के लिए एक प्रमुख लॉजिस्टिक्स और कार्गो प्रवेश द्वार के रूप में विकसित किया जा रहा है।

हाल के वर्षों में रजिस्टर्ड फैक्ट्रियों की संख्या दोगुनी होकर 30,000 के पार पहुँच गई है। UP में औद्योगिक सकल मूल्य वर्धन में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। योगी सरकार ने रणनीतिक रूप से कुछ शहरों को विशेष औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए चुना है, जिसमें राज्य की राजधानी लखनऊ को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस केंद्र, कानपुर को ड्रोन निर्माण और परीक्षण केंद्र और नोएडा को सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण का प्रमुख आधार बनाया जा रहा है।

क्लीन एनर्जी को भविष्य बताते हुए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में कहा गया है कि स्थापित क्षमता में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी 23 प्रतिशत से बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई है। शहरी विकास को संभालने के लिए लगभग 100 नए टाउनशिप की योजना बनाई गई है। सर्वेक्षण के अनुसार, वर्ष 2046 तक राज्य की शहरी आबादी 35.8 प्रतिशत तक पहुँच जाएगी।

हेल्थ सेक्टर को योगी सरकार की प्राथमिकता, ₹46728 करोड़ हुआ बजट

आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, उत्तर प्रदेश में चिकित्सा ढाँचे और सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। राज्य के नवीनतम बजट में कुल बजट का लगभग 6.1 प्रतिशत स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंटित किया गया है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है। राज्य सरकार ने स्वास्थ्य बजट के लिए 46,728.48 करोड़ रुपए का आवंटन किया है। सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार, स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढ़ने से सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और वहन क्षमता में सुधार हुआ है।

मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बेहतर कवरेज के कारण संस्थागत प्रसव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2024-25 में 96.12 प्रतिशत प्रसव संस्थागत रहे जबकि गैर-संस्थागत प्रसव की संख्या घटकर 1.66 लाख रह गई है।

RSS शताब्दी समारोह से आरफा-सुप्रिया को आई मिचली, क्या ‘बॉलीवुड इकोसिस्टम’ ढहने से घबराया इस्लामी-लिबरल गैंग?

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के 100 साल पूरे होने पर देश के अलग-अलग कोनों में अलग तरह से उत्सव हो रहे हैं। इसी कड़ी में एक कार्यक्रम मुंबई में भी ऐसा हुआ, जहाँ बॉलीवुड की नामी हस्तियों ने शिरकत की और पूरे कार्यक्रम को देखने के बाद वो संघ की तारीफ किए बिना नहीं रह सके। किसी ने संघ के कार्यों को सराहा, कोई संघ प्रमुख के भाषण से अभिभूत होता दिखा।

बॉलीवुड एक्टर रणवीर सिंह ने वीडियो शेयर कर कहा, “RSS को 100 वर्ष पूरे करने पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ। पिछले 100 सालों से संघ ने देश की सेवा में जो योगदान दिया, उसके लिए दिल से धन्यवाद।”

वहीं, करण जौहर ने कहा कि RSS के शताब्दी समारोह में शामिल होकर उन्हें काफी अच्छा लगा और मोहन भागवत के विचार और आदर्श उन्हें बहुत प्रेरणादायक लगे। करण जौहर ने आगे कहा कि बॉलीवुड की हस्तियों को इतना समय देने के लिए वे मोहन भागवत का दिल से धन्यवाद करते हैं। करण ने ये भी जोड़ा कि मोहन भागवत का सेंस ऑफ ह्यूमर कमाल का है और बातचीत के दौरान वो खूब हँसे भी।

इसके अलावा, शिल्पा शेट्टी ने भी RSS को 100 वर्ष पूरे होने की शुभकामनाएँ दी और कहा कि वो मोहन भागवत की बहुत बड़ी फैन है और राष्ट्र के लिए उनके समर्पण और सोच की दिल से तारीफ करती हैं। शिल्पा शेट्टी ने बताया कि उनके विचार उन्हें प्रेरित करते हैं और इससे वो देश की सेवा से जुड़े काम और ज्यादा मन लगाकर कर पाएँगी।

दोगलई का ‘आरफा’ मॉडल

जैसे-जैसे ये लोग मीडिया में संघ को लेकर अपने बयान दे रहे थे वैसे-वैसे वामपंथी-कट्टरपंथी और कॉन्ग्रेसियों का एक वर्ग अपनी-अपनी जगहों पर बैठकर भीतर ही भीतर फुँक रहा था। आरफा खानम और सुप्रिया श्रीनेत उन्हीं में से एक हैं।

आरफा खानम का पोस्ट

आरफा ने कार्यक्रम देखने के बाद एक ट्वीट किया और कार्यक्रम में जाने वाली हस्तियों को बॉलीवुड में सबसे बड़ा डरपोक करार दिया। आरफा ने लिखा, “बॉलीवुड के सबसे बड़े डरपोक आरएसएस के कदमों में लोटे हुए हैं। क्यों? क्योंकि वो नैतिक रूप से मर चुके हैं और सत्ता को चुनौती नहीं देना चाहते। एक संस्था जिसने कभी भारतीय संविधान पर विश्वास नहीं किया। कभी मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा भड़काई, कभी महिलाओं का अपमान किया, उसकी पूजा देश के सबसे नामी और प्रभावशाली लोगों के द्वारा किया जा रहा है। मुझे उल्टी आने जैसा लग रहा है।” इसके अलावा आरफा ने वीडियो भी बनाया है।

आरफा के पोस्ट में दुख, दर्द, पीड़ा सब है। उन्हें एक्टर्स की पर्सनल चॉइस को लेकर ऐसी समस्या है कि उन्हें खुद नहीं पता कि लोग उनकी दोगलई पर भी सवाल खड़ा कर देंगे। अगर आप आरफा का पोस्ट देखेंगे तो ऐसे मामलों से सना पड़ा है जिसके दो पक्ष हैं, लेकिन आरफा उस पक्ष को ही साझा करती हैं जो उनके प्रोपेगेंडा और नैरेटिव पर सेट हो। जैसे बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार का मुद्दा चूँकि उनके नैरेटिव लायक नहीं है इसलिए वो इस पर नहीं बोलतीं, मगर कट्टरपंथियों के साथ अगर एक हिंदू जुड़ा दिख जाए तो ये दिखाने में आरफा जी जान झोंक देती हैं कि वहाँ हिंदू सुरक्षित हैं।

आरफा खानुम की दोगलई का न कोई अंत है और न होता दिख रहा है। अपने आपको पत्रकार कहने वाली ये महिला अपने पत्रकारिता करियर की आड़ में इस्लाम के बचाव में सरेआम हर तथ्यों को गलत बता देती है। उन लोगों को मासूम दिखाने का प्रयास करती है जो खुलेआम कहते हैं कि उनके लिए देश और संविधान से पहले उनका मजहब है… लेकिन अगर एक संगठन जो आपदा के समय में प्रभावित लोगों की मदद में सबसे आगे आकर हाथ बढ़ाता तो वो इसपर सिर्फ इसलिए सवाल उठाती हैं क्योंकि उसका जुड़ाव सनातन से है।

एजेंडा खत्म होने का डर?

आरफा खानम के बयान पर पत्रकार राजन कुमार झा ने तीखा पलटवार किया है। उन्होंने आरफा की ‘छटपटाहट’ की असली वजह बताते हुए लिखा कि बॉलीवुड अब उनके ‘प्रोपेगेंडा’ के चंगुल से आजाद हो रहा है। राजन झा ने आरफा की परेशानी के तीन मुख्य कारण गिनाए।

आतंकियों की पहचान: अब फिल्मों में आतंकियों को ‘भटका हुआ’ नहीं, बल्कि सीधे ‘आतंकी’ दिखाया जाएगा। आस्था का सम्मान: हिंदू प्रतीकों और सनातन का मजाक उड़ाने का खेल अब बंद होगा। इस्लामीकरण पर रोक: फिल्मों के जरिए नैरेटिव सेट कर देश के ‘इस्लामीकरण’ का जरिया खत्म हो जाएगा।

RSS की तारीफ करने के लिए निशाना बना रही- सुप्रिया श्रीनेत

इसी प्रकार कॉन्ग्रेस नेत्री सुप्रिया श्रीनेत ने खुद बताया है कि वैसे तो वो बॉलीवुड सेलेब्रिटीज को निशाना बनाने से परहेज करती हैं, लेकिन चूँकि अब ये लोग आरएसएस की तारीफ कर रहे हैं इसलिए वो इन्हें निशाना बना रही हैं। उन्होंने पूछा है कि आखिर बॉलीवुड वाले लिंचिंग, बलात्कार, हेट स्पीच, किसान हित, मणिपुर मुद्दे, महंगाई, प्रदूषण जैसे मुद्दे पर क्यों बात नहीं कर पाते।

निजी नफरत बनाम राष्ट्र सेवा

सच तो यह है कि संघ आज अपने मूल्यों और सेवा के कारण समाज के हर वर्ग में स्वीकार्य हो रहा है। करण जौहर जैसे फिल्मकार अगर मोहन भागवत के ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ और आदर्शों की बात कर रहे हैं, तो यह उनकी अपनी समझ है। लेकिन वामपंथी ईको-सिस्टम को डर है कि अगर बॉलीवुड ने संघ के राष्ट्रवाद को अपना लिया, तो उनकी बरसों की मेहनत से बनाई गई नफरत की दीवार ढह जाएगी।

सीधी बात है, जो लोग खुद संविधान को अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करते हैं, वे दूसरों को ‘डरपोक’ न कहें। संघ की 100 साल की यात्रा और उसकी सेवा को आज देश पहचान रहा है और यही पहचान इन प्रोपेगेंडा चलाने वालों की सबसे बड़ी तकलीफ है।

2046 तक देश में बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग होंगे: जानिए यह भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती, क्यों हाईकोर्ट ने की इसके लिए ‘सिस्टम’ की बात

राजस्थान हाईकोर्ट ने बुजुर्गों की हालत को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत का कहना है कि 2046 तक देश में बच्चों से ज्यादा बुजुर्ग होंगे लेकिन उनके लिए हमारा सिस्टम अभी तैयार नहीं है। इसी चिंता के बीच हाई कोर्ट की जयपुर बेंच ने राज्य के वृद्धाश्रमों की स्थिति की पड़ताल का आदेश दिया है ताकि यह पता चल सके कि वहाँ रहने वाले बुजुर्गों को वास्तव में कैसी सुविधाएँ मिल रही हैं और सिस्टम जमीनी स्तर पर कितना प्रभावी है। अदालत की यह टिप्पणी अहम है, जो भारत अभी सबसे युवा देश है, रफ्तार से दौड़ रहा है उसे अपने बुजुर्गों की भी चिंता करने की आवश्यकता है।

बुजुर्गों को भगवान का दर्जा लेकिन अब उपेक्षित: जानें HC ने क्या-क्या कहा?

राजस्थान हाई कोर्ट ने राज्य में चल रहे सभी 31 वृद्धाश्रमों (ओल्ड एज होम) की जाँच का निर्देश दिया है। राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण इसे लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें वृद्धाश्रमों में चिकित्सा की सुविधा, फूड क्वालिटी, भवनों की स्थिति, सफाई और सुरक्षा के इंतजामों के विषय में विस्तार से बताया जाएगा। राजस्थान सरकार ने बताया कि प्रदेश में 31 वृद्धाश्रम चल रहे हैं जिस पर कोर्ट ने कहा कि सिर्फ नंबर बताना काफी नहीं है बल्कि वहाँ बुजुर्गों के लिए कैसी व्यवस्था है यह देखना भी जरूरी है।

HC ने बुजुर्गों की सामाजिक स्थिति पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को हमेशा सम्मान और आदर का स्थान दिया गया है लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर होती जा रही है। कोर्ट के मुताबिक, संयुक्त परिवारों के टूटने, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने बुजुर्गों को समाज में धीरे-धीरे असहाय और उपेक्षित स्थिति में पहुँचा दिया है।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि समाज और व्यवस्था दोनों को बुजुर्गों की बदलती जरूरतों को समझते हुए अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार होना होगा।

2046 तक देश में कितने होंगे बुजुर्ग

सितंबर 2023 में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (IIPS) ने एक रिपोर्ट जारी की थी। यह रिपोर्ट देश और दुनिया के प्रमुख जनसंख्या और वृद्धावस्था संबंधी आँकड़ों के आधार पर किया गया है। इसमें IIPS द्वारा किए गए ‘लॉन्गिट्यूडिनल एजिंग सर्वे इन इंडिया (2017-18)’, भारत की जनगणना, भारत सरकार के जनसंख्या अनुमान (2011-2036) और संयुक्त राष्ट्र के विश्व जनसंख्या संभावनाएँ 2022 से प्राप्त आँकड़ों पर आधारित थी।

रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में साल 2022 में करीब 110 करोड़ लोग ऐसे थे, जिनकी उम्र 60 साल या उससे ज्यादा थी। यह दुनिया की कुल आबादी का लगभग 13.9 प्रतिशत था। अगले 30 सालों में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ने वाली है। अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या बढ़कर करीब 210 करोड़ हो जाएगी और तब दुनिया की कुल आबादी में बुजुर्गों का हिस्सा करीब 22 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा। यह बदलाव दुनिया के हर हिस्से में दिखाई देगा।

भारत में भी ऐसा ही होगा। साल 2022 में भारत में करीब 14.9 करोड़ बुजुर्ग थे, जिनकी उम्र 60 साल या उससे ज्यादा थी। यह देश की कुल आबादी का लगभग 10.5 प्रतिशत था। लेकिन 2050 तक बुजुर्गों की संख्या बढ़कर करीब 34.7 करोड़ हो जाएगी और तब देश की आबादी में उनका हिस्सा करीब 21 प्रतिशत तक पहुँच जाएगा।

फोटो साभार: इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 से 2022 के बीच भारत की कुल आबादी में करीब 34 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई लेकिन इसी दौरान 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 103 प्रतिशत तक बढ़ गई। यानी बुजुर्गों की संख्या देश की कुल आबादी से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी। इससे भी ज्यादा तेज बढ़ोतरी 80 साल से ऊपर उम्र के लोगों में हुई। इस उम्र वर्ग की आबादी में इस दौरान करीब 128 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

आगे के अनुमान और भी चौंकाने वाले हैं। साल 2022 से 2050 के बीच भारत की कुल आबादी में सिर्फ 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है जबकि बुजुर्गों की संख्या करीब 134 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इसी अवधि में 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या लगभग 279 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है।

खास बात यह है कि बहुत ज्यादा उम्र के बुजुर्गों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा होगी। इनमें बड़ी संख्या विधवा और दूसरों पर निर्भर रहने वाली महिलाओं की होगी। जैसे-जैसे उम्र 60 से 80 साल के बीच बढ़ेगी, बुजुर्ग महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में लगातार बढ़ती जाएगी।

कैसा रहा है वृद्ध आबादी में बढ़ोतरी का इतिहास (फोटो: इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023)

अनुमान है कि साल 2046 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या बच्चों (0 से 14 वर्ष) से ज्यादा हो जाएगी। वहीं, 2050 तक देश की कामकाजी उम्र की आबादी (15 से 59 वर्ष) में गिरावट आने लगेगी।

बूढ़े होते लोग, भारत के सामने कैसी चुनौती?

आँकड़ों से स्पष्ट है कि भारत तेजी से ‘एजिंग सोसाइटी’ की और बढ़ रहा है। जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार और जन्मदर में गिरावट ने मिलकर भारत के ‘एज स्ट्रक्चर’ को बदल दिया है। यह आँकड़ों का यह बदलाव लोगों और देश दोनों के लिए ही चुनौती लाने वाले है वो भी ऐसे वक्त में जब भारत को अपनी बूढ़ी होती आबादी की चिंता के लिए बहुत काम करना बाकी है। सामाजिक-आर्थिक तौर पर उम्र का यह बदलाव कई तरह के असर दिखाएगा जिससे निपटने भारत के लिए चुनौती होने वाला है।

‘फेमिनाइजेशन-रुरललाइजेशन ऑफ एजिंग’

भारत में वृद्धावस्था का एक प्रमुख पहलू ‘फेमिनाइजेशन ऑफ एजिंग’ है। भारत में 60 साल की उम्र के बाद औसतन लोग करीब 18.3 साल और जीवित रहते हैं। इसमें महिलाओं की उम्र पुरुषों से ज्यादा होती है। 60 साल की उम्र के बाद महिलाएँ औसतन लगभग 19 साल और पुरुष लगभग 17.5 साल तक जीवित रहते हैं। महिलाएँ पुरुषों की तुलना में अधिक समय तक जीवित रहती हैं, जिसके कारण वृद्ध महिलाओं की संख्या अधिक होती है। इनमें से बड़ी संख्या विधवाओं की होती है, जो अकेले रहती हैं और परिवार पर निर्भर होती हैं। सामाजिक सुरक्षा की सीमित व्यवस्था और सामाज के पितृसत्तात्मक ढाँचे के कारण वृद्ध महिलाएँ अधिक असुरक्षित स्थिति में होती हैं।

इसका एक अन्य पहलू रुरललाइजेशन यानी ग्रामीणीकरण है। भारत की 71 प्रतिशत वृद्ध आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, सीमित परिवहन सुविधाएँ, कम आय और सामाजिक अलगाव वृद्ध लोगों की समस्याओं को और बढ़ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में युवा आबादी का शहरों की ओर पलायन भी वृद्ध लोगों को अकेला छोड़ देता है, जिससे वे खुद भी भावनात्मक और सामाजिक रूप से अधिक कमजोर हो जाते हैं।

वृद्धों की कामकाजी आबादी

वृद्धों में भी बढ़ते वृद्ध

भारत में ‘एजिंग ऑफ द एज्ड’ की ट्रेंड भी दिख रहा है। इसका अर्थ है कि वृद्ध आबादी के भीतर 75 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। यह वर्ग स्वास्थ्य सेवाओं, देखभाल और सामाजिक सहायता पर अधिक निर्भर होता है। जैसे-जैसे इस आयु वर्ग की संख्या बढ़ेगी वैसे-वैसे हेल्थ सिस्टम, परिवार संरचना और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर दबाव भी बढ़ेगा। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, सुपर-एज्ड आबादी का बढ़ना विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों में से एक है।

सिल्वर इकोनॉमी की कमजोर स्थिति

वृद्ध आबादी के लिए आर्थिक अवसरों और सेवाओं के बाजार को ‘सिल्वर इकोनॉमी’ कहा जाता है। इसमें स्वास्थ्य सेवाएँ, बीमा, आवास, वित्तीय उत्पाद, तकनीकी समाधान और मनोरंजन सेवाएँ शामिल होती हैं। भारत की सिल्वर इकोनॉमी का मूल्य 2024 में लगभग 73,000 करोड़ रुपए आँका गया है और अनुमानों के अनुसार आने वाले वर्षों में इसमें कई गुना वृद्धि होगी। विकसित देशों में सिल्वर इकोनॉमी एक मजबूत आर्थिक क्षेत्र बन चुकी है लेकिन भारत में यह अभी भी अविकसित अवस्था में है। जिसके चलते वृद्ध लोगों की जरूरतों और उपलब्ध सेवाओं के बीच अंतर बना हुआ है।

आर्थिक निर्भरता और असुरक्षा

भारत में वृद्धों की आर्थिक स्थिति एक गंभीर चिंता का विषय है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, केवल 11 प्रतिशत वृद्ध पुरुषों को वर्क पेंशन मिलती है और 16.3 प्रतिशत को सामाजिक पेंशन प्राप्त होती है। वहीं, वृद्ध महिलाओं में 27.4 प्रतिशत केवल सामाजिक पेंशन पर निर्भर हैं और मात्र 1.7 प्रतिशत को कार्य पेंशन मिलती है। लगभग पाँचवां हिस्सा ऐसा है जिसके पास कोई स्थायी आय स्रोत नहीं है। यह स्थिति वृद्धावस्था को आर्थिक असुरक्षा और गरीबी से जोड़ देती है।

देश के सामने कम नहीं चुनौती

जब बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी और युवाओं की संख्या घटेगी तो काम करने वाले लोगों की संख्या कम होगी। इससे देश की उत्पादन क्षमता घटेगी। भारत की अर्थव्यवस्था अभी तक युवा लेबर पर निर्भर रही है। अगर कामकाजी आबादी घटेगी, तो उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र पर असर पड़ेगा। भारत में पेंशन और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली सीमित है। सरकारी कर्मचारियों को पेंशन मिलती है लेकिन असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के पास कोई पेंशन व्यवस्था नहीं है। जब बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी, तो सरकार पर पेंशन देने का दबाव बढ़ेगा। इससे सरकारी बजट पर भारी बोझ पड़ेगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए चुनौती

भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्ग गरीब हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों की स्थिति और खराब है। अगर सरकार ने पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा नहीं दी तो बुजुर्ग गरीबी और निर्भरता में फँस सकते हैं। इसके साथ ही बुजुर्गों की बढ़ती संख्या का सबसे बड़ा असर स्वास्थ्य क्षेत्र पर पड़ेगा। बुजुर्गों को लंबे समय तक इलाज की जरूरत होती है। उन्हें हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर, गठिया और मानसिक रोग जैसी समस्याएँ होती हैं। भारत में अभी बुजुर्गों के लिए विशेष स्वास्थ्य सेवाएँ बहुत कम हैं। अगर बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ी, तो अस्पतालों और डॉक्टरों पर भारी दबाव पड़ेगा। साथ ही, शहरों में पहले से ही भीड़, प्रदूषण और आवास की समस्या है। बुजुर्गों के लिए शहरों को अनुकूल बनाना एक बड़ी चुनौती होगी।

बुजुर्ग आबादी को सरकार का साथ

भारत में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है और वरिष्ठ नागरिकों के लिए कई योजनाएँ/कानून लागू किए गए हैं ताकि उन्हें आर्थिक सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान मिल सके।। 1999 में राष्ट्रीय वृद्धजन नीति शुरु की गई जिसका मुख्य उद्देश्य बुजुर्गों को आर्थिक सुरक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और सामाजिक सम्मान देना है। इसके तहत सरकार ने यह मान्यता दी कि बुजुर्गों को केवल सहायता नहीं बल्कि गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार मिलना चाहिए।

इसके बाद वर्ष 2007 में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और कल्याण अधिनियम लागू किया गया। इस कानून के तहत बच्चों और उत्तराधिकारियों को अपने माता-पिता और बुजुर्ग परिजनों की देखभाल और भरण-पोषण की जिम्मेदारी दी गई है। यदि बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करते तो बुजुर्ग कानूनी रूप से भरण-पोषण की माँग कर सकते हैं। सरकार ने राष्ट्रीय वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में बुजुर्गों के लिए विशेष चिकित्सा सुविधाएँ विकसित की गई हैं। इसमें जेरियाट्रिक यानी वृद्धावस्था से जुड़ी बीमारियों का इलाज, पुनर्वास सेवाएँ और कुछ क्षेत्रों में घरेलू देखभाल जैसी सुविधाएँ शामिल हैं।

इसके साथ ही, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (1995) के तहत गरीब बुजुर्गों को मासिक पेंशन दी जाती है जबकि अन्नपूर्णा योजना (2000) से पेंशन से वंचित पात्र बुजुर्गों को हर महीने 10 किलो खाद्यान्न मिलता है। राष्ट्रीय पेंशन योजना (2004) सरकारी कर्मचारियों के लिए योगदान आधारित पेंशन व्यवस्था है, जिसने पुरानी पेंशन योजना का स्थान लिया। माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम (2007) के तहत 60 वर्ष से अधिक उम्र के माता-पिता को बच्चों से भरण-पोषण का अधिकार मिला और राज्यों को वृद्धाश्रम स्थापित करने का निर्देश दिया गया।

इसके अलावा, अटल पेंशन योजना (2015) के तहत असंगठित क्षेत्र के लोग 18-40 वर्ष की उम्र में योगदान कर पेंशन प्राप्त करते हैं, जिसमें सरकार भी योगदान करती है। राष्ट्रीय वयोश्री योजना (2017) के तहत गरीब और दिव्यांग बुजुर्गों को व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र, चश्मा जैसे सहायक उपकरण दिए जाते हैं। प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना (2019) में असंगठित श्रमिकों को 60 वर्ष के बाद 3000 रुपए मासिक पेंशन मिलती है। SACRED योजना (2021) बुजुर्गों को रोजगार के अवसर देने के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराती है जबकि यूनिफाइड पेंशन योजना (2024) सरकारी कर्मचारियों को NPS का विकल्प देकर निश्चित पेंशन की व्यवस्था करती है।

क्या है आगे की राह

भारत में सरकारी और सामाजिक स्तर पर वृद्धों की जरूरतों के लिए कई अहम कदम उठाए गए हैं। हालाँकि, आबादी जिस तरह बढ़ रही है उसमें ये कदम नाकाफी साबित हो सकते हैं और साथ ही कई अन्य ऐसी चीजें हैं जिनमें सुधार की गुजाइंश नजर आती है। बढ़ती आबाद से साफ है कि अगर आज बुजुर्गों के लिए मजबूत व्यवस्था नहीं बनाई गई तो भविष्य में करोड़ों लोग आर्थिक, स्वास्थ्य और सामाजिक समस्याओं से जूझेंगे।

आर्थिक-स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए उठाए जाएँ कदम

भारत में बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ी समस्या आर्थिक सुरक्षा की है। बड़ी संख्या में बुजुर्गों के पास नियमित आय का कोई साधन नहीं है और वे अपने बच्चों या परिवार पर निर्भर हैं। सरकार की वृद्धावस्था पेंशन योजनाएँ मौजूद हैं लेकिन उनकी राशि लोगों के लिए कम पड़ रही है।

ऐसे में जरूरी हो जाता है कि बुजुर्गों के लिए न्यूनतम आय की गारंटी दी जाए और पेंशन की राशि बढ़ाई जाए।स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी बुजुर्गों के जीवन को कठिन बना देती है। भारत में अभी बुजुर्गों के लिए अलग से मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं है। जरूरी है कि हर जिले में बुजुर्गों के लिए विशेष अस्पताल और डॉक्टर हों, सस्ती दवाइयाँ उपलब्ध कराई जाएँ।

अकेलेपन से निपटने के लिए बने सामाजिक ढाँचा

आज के समय में बुजुर्गों की एक बड़ी समस्या अकेलापन और उपेक्षा भी है। संयुक्त परिवारों के टूटने, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण कई बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में बड़ी संख्या में बुजुर्ग खुद को सामाजिक रूप से अलग-थलग महसूस करते हैं। इसलिए जरूरी है कि समाज और सरकार मिलकर बुजुर्गों के लिए सामुदायिक केंद्र, सामाजिक गतिविधियाँ और सुरक्षित वृद्धाश्रम विकसित करें ताकि वे खुद को अकेला न महसूस करें और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।

बुजुर्गों के लिए सेल्फ हेल्प ग्रुप (SHG) बनाने की जरूरत है ताकि वे सामाजिक रूप से सक्रिय रह सकें और एक-दूसरे से जुड़ सकें। अलग-अलग पीढ़ियों के बीच संवाद और सहयोग बढ़ाने की भी जरूरत है ताकि बुजुर्गों का अनुभव और ज्ञान युवा पीढ़ी तक पहुँचे और समाज को उसका लाभ मिले। डिजिटल युग में बुजुर्गों को पीछे न छोड़ने के लिए उन्हें डिजिटल साक्षरता और तकनीकी कौशल सिखाने की जरूरत है, ताकि वे ऑनलाइन सेवाओं, ई-कॉमर्स और डिजिटल स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग कर सकें।

भारत में बुजुर्गों के कल्याण के लिए सरकारी योजनाएँ बहुत जरूरी हैं लेकिन केवल सरकार के प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। समाज को भी आगे बढ़कर बुजुर्गों के साथ जुड़ने की जरूरत है। बुजुर्ग हमारे समाज की धरोहर हैं। बदलती जीवनशैली और व्यस्तता के कारण कई बुजुर्ग अकेलेपन और उपेक्षा का शिकार हो जाते हैं।

ऐसे में परिवार, पड़ोस और समाज का दायित्व बनता है कि वे बुजुर्गों को सम्मान, प्यार और सहयोग दें। उनके साथ समय बिताना, उनकी समस्याओं को सुनना और जरूरत पड़ने पर मदद करना समाज की जिम्मेदारी है। जब सरकार और समाज मिलकर काम करेंगे तभी बुजुर्गों का जीवन सुरक्षित, सम्मानजनक और खुशहाल बन सकेगा।

बांग्लादेश चुनाव में केवल 4% महिला उम्मीदवार, उन्हें भी मिल रहीं रेप-हत्या की धमकियाँ: शेख हसीना- खालिदा जिया के देश में महिलाओं के नेतृत्व के खिलाफ कट्टरपंथी

बांग्लादेश में दो ताकतवर महिला नेताओं ने सफलतापूर्वक दशकों तक राज चलाया। अवामी लीग की शेख हसीना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की दिवंगत खालिदा जिया। कट्टरपंथी अब कहते हैं कि महिलाएँ कौम का नेतृत्व नहीं कर सकतीं इसलिए मात्र 4 फीसदी महिलाओं को पार्टियों ने उम्मीदवार बनाया है। इन महिलाओं को यौन उत्पीड़न, चरित्र हनन और ऑनलाइन ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है। शेख हसीना को पद से हटाने के बाद जिस तरह से कट्टरपंथियों का राज वहाँ आ गया है, निकट भविष्य में महिलाओं के दिन अच्छे नहीं आने वाले।

30 पार्टियों ने एक भी महिला को नहीं दिया टिकट

15 फरवरी को बांग्लादेश में आम चुनाव है। इसके लिए 51 पार्टियों ने 1981 उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं। इनमें सिर्फ 78 महिलाएँ हैं। करीब 30 पार्टियों ने एक भी महिला को टिकट नहीं दिया। शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग को चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। खालिदा जिया दुनिया छोड़ चुकी है। उनकी पार्टी बीएनपी ने 10 महिलाओं को टिकट दिया है।

द डेली स्टार के मुताबिक, जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश, बांग्लादेश खिलाफत मजलिस, खिलाफत मजलिस, बांग्लादेश इस्लामी फ्रंट, लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी, जोनोतार दल, बांग्लादेश सांस्कृतिक मुक्ति जोत, बांग्लादेश कांग्रेस, जातीय पार्टी , बांग्लादेश खिलाफत आंदोलन, बांग्लादेश नेशनलिस्ट फ्रंट और बांग्लादेश जसद समेत कम से कम 30 पार्टियों ने सिर्फ पुरुष उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा है।

जानकारी के मुताबिक, 78 महिलाओं में से एक तिहाई भी खुद राजनीतिज्ञ नहीं हैं, बल्कि असरदार राजनीति लोगों की रिश्तेदार हैं, पार्टी नेताओं की पत्नियाँ, बेटियाँ या परिवार की सदस्य हैं।

बांग्लादेश में आधी से ज्यादा आबादी औरतों की है। देश में पुरुषों और औरतों का अनुपात 97 : 100 है। इसके बावजूद देश में मात्र 3.93 परसेंट औरतों को उम्मीदवार बनाया गया है। 78 महिला उम्मीदवारों में से 61 को 21 राजनीतिक पार्टियों ने टिकट दिया है, जबकि 17 निर्दलीय हैं।

रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल ऑर्डर 1972 के तहत पॉलिटिकल पार्टियों को सेंट्रल लेवल सहित कमिटी में कम से कम 33 फीसदी पद महिलाओं के लिए आरक्षित करना जरूरी है, लेकिन कोई भी पार्टी ऐसा करने में नाकाम रही तो 2021 में चुनाव आयोग ने इसकी मियाद 2030 तक बढ़ा दी।

महिला नहीं कर सकती कौम का नेतृत्व- जमात

जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान जैसे नेता खुलेआम कहते हैं कि महिला पार्टी, समाज या देश का नेतृत्व नहीं कर सकतीं, इसलिए उनकी पार्टी ने किसी महिला को टिकट नहीं दिया।
कुछ ऐसा ही बयान हिफाजत ए इस्लाम जैसी इस्लामिक संगठन का भी है। इसके नेता अजीज उल हक का कहना है कि जिस कौम का लीडर महिला होता है, वह कौम तरक्की नहीं कर सकती। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका में आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई। उन्होंने यहाँ तक कहा कि बांग्लादेश में शरिया कानून लागू होना चाहिए।

जमात-ए-इस्लामी महिला विंग की सेक्रेटरी नूरुन्निसा सिद्दिका ने कहा, “कुरान के अनुसार, पुरुष महिलाओं के डायरेक्टर होते हैं, जिसे इस्लाम में एक आदेश और जिम्मेदारी माना जाता है।” सिद्दिका ने महिलाओं को टिकट नहीं दिए जाने को ‘संगठन का फैसला’ बताया।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे बयान पितृसत्तात्मक मानदंडों को मजबूत करते हैं। इससे महिलाएँ और भी राजनीति से दूर हो गई है। महिलाओं में जबरदस्त असुरक्षा की भावना है और ऐसे बयान उन्हें हतोत्साहित करते हैं। राजनीत जैसे क्षेत्र में आने के लिए विश्वास की काफी जरूरत है, मानवाधिकार कार्यकर्ता भी कट्टरपंथी बयानों से बेहद चिंतित हैं।

महिलाओं को मिल रही धमकियाँ

कई महिला उम्मीदवारों का कहना है कि उन्हें ऑनलाइन और जमीनी स्तर पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। साइबरबुलिंग, यौन उत्पीड़न की धमकी, चरित्र हनन करने की कोशिश की जा रही है। उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है, ताकि चुनाव मैदान छोड़ दें।

नेशनल सिटिजन पार्टी यानी एनसीपी की उम्मीदवार दिलशाना पारुल का कहना है कि उन्हें हेडस्कार्फ को लेकर ट्रोल किया जा रहा है। हिजाब पर छींटाकशी की जा रही है। ट्रोल करने वालों में तथाकथित प्रोग्रेसिव लोग भी शामिल हैं। उनका कहना है कि पुरुष नेताओं को उनकी कार्यशैली, भ्रष्टाचार जैसे वजहों से आलोचना की जाती है, लेकिन महिलाओं के चरित्र पर आसानी से वार कर देते हैं।

एनसीपी की एक और उम्मीदवार नबीला तस्नीद ढाका 20 से चुनाव मैदान में हैं। उनका कहना है कि उनके बैनर पोस्ट तक फाड़ दिए गए। अधिकारियों ने उन्हें मदद करने के बजाए किसने किया उसका वीडियो लाने को कह रहे हैं। उन्हें डराया धमकाया जा रहा है।

एक और उम्मीदवार तस्लीमा अख्तर का कहना है कि ऑनलाइन उन्हें धमकियाँ मिल रही हैं। ऑनलाइन टारगेट करना आसान होता है। उनका कहना है कि देश की कानून व्यवस्था काफी लचर है, महिलाओं को घर में रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है। इसलिए महिलाएँ वोट डालने कितनी निकलेंगी, ये भी बड़ा सवाल है।

जमीन पर संघर्ष कर राजनीति में आगे बढ़ने वाली महिलाएँ काफी कम है। इसके पीछे पारिवारिक माहौल है। कोई नहीं चाहता कि उनके घर की बेटी अनसेफ हो। इसलिए राजनीति में नहीं आने देते।

दो दशक बाद लाहौर में लौटा ‘बसंत’ लेकिन अपने गढ़े इतिहास के साथ, हिंदू संस्कृति को नकार खुसरो से जोड़ा नाता: जानिए क्यों लग रहे हैं पाकिस्तान पर ‘कल्चर चोरी’ के आरोप

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में दो दशक बाद आधिकारिक तौर पर बसंत उत्सव मनाया गया। लाहौर का आसमान एक बार फिर रंग-बिरंगी पतंगों से पट गया। 6 से 8 फरवरी 2026 तक शहर में जमकर पतंगबाजी हुई। पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज ने खुद इसे प्रमोट किया है। इस दौरान सोशल मीडिया पर भारतीयों ने सवाल किए कि पाकिस्तान बसंत पंचमी त्योहार के नाम पर केवल पतंगबाजी करके कल्चर चोरी करने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तान ने इसे ‘पंजाबी कल्चरल फेस्टिवल’ कहने की पूरी कोशिश की। इस दौरान निगरानी के लिए ड्रोन तैनात किए गए, QR-कोड वाली पतंगों की बिक्री हुई लेकिन पतंगों के आसमान में लौटने के बावजूद कई कमियाँ दिखी। सोशल मीडिया X पर कई यूजर्स ने कहा कि पाकिस्तान में मनाया जाने वाला बसंत भारत की बसंत पंचमी से बिल्कुल अलग है। यूजर्स ने दावा किया कि इसे लाहौर में अमीर खुसरो ने पतंग उड़ाने वाले बसंत के रिवाज के तौर पर शुरू किया था, जिसका हिंदू परंपरा या भारतीय सभ्यता से कोई लेना-देना नहीं है।

भारत में पतंग उड़ाने और बसंतोत्सव का इतिहास रहा है। लेकिन आमिर खुसरो की कहानी सदियों पुरानी सभ्यता की निरंतरता को एक सूफी कहानी तक सीमित कर देता है। जानबूझकर सांस्कृतिक भागीदारी और सांस्कृतिक शुरुआत के बीच की लाइन को धुँधला कर देता है। यह एक तरह से सांस्कृतिक चोरी है। त्योहार, उत्सव और उसकी परंपराएँ स्थानीय पहचान को बतलाती हैं।

इस्लाम और खुसरो से पहले बसंत की हुई शुरुआत

बसंत कोई ऐसा ‘मौसमी त्योहार’ नहीं है, जो पंजाब में मनाने की परंपरा हो। यह वसंत (बसंत) मनाने का एक आम तरीका है, जो भारतीय संस्कृति से जुड़ा है। यह इस्लाम के आने से पहले से ही मनाया जाता रहा है। परंपरागत संस्कृत साहित्य, मंदिर कैलेंडर और इलाके की लोक परंपराएँ, सभी बसंत को खेत और फसलों से जोड़ती है। बसंत का खास रंग पीला, कोई सजावटी इत्तेफाक नहीं है। यह पकते हुए सरसों के खेतों, बदलते खेती के चक्र और पूरे उत्तर भारत की उपजाऊ शक्ति को दिखाता है।

ये निशानियाँ लोकल संस्कृति में किसी भी सूफी जुड़ाव से सदियों पहले से मौजूद थीं। जब तक पंजाब और दिल्ली में मुस्लिम राज आया, बसंत पहले से ही एक सामाजिक सच्चाई बन चुका था। प्रकृति से जुड़ा यह पर्व खुद में एक परंपरा थी।

इसके बाद जो हुआ वह कोई नई खोज नहीं बल्कि बदलाव था। यह फर्क बहुत जरूरी है। जब मुस्लिम हमलावरों, अमीर लोगों या आम लोगों ने बसंत में हिस्सा लिया, तो वे पहले से ही बनी बनाई परंपरा का पालन कर रहे थे। इसलिए इनके आने से त्योहार में शुरुआत में कोई बदलाव नहीं आया। ये फसल चक्र से जुड़ा था इसलिए इसे कोई बदल भी नहीं सकता था।

अमीर खुसरो के साथ बसंत का संबंध अलग तरह का

बसंत के साथ अमीर खुसरो का रिश्ता समझ में आता है। ऐतिहासिक तौर पर खुसरो ने बसंत मनाने को शुरुआत लाहौर में नहीं बल्कि दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह में की थी। इसे किसी त्योहार से नहीं बल्कि एक घटना से जोड़ते हैं। कहा जाता है कि अपने जवान भतीजे की मौत के बाद हजरत निजामुद्दीन औलिया दुख में डूब गए थे। उस वक्त अमीर खुसरो भी थे, जिनकी शायरी में फारसी दरबारी कल्चर और लोकल बोलचाल दोनों था।

परंपरा के अनुसार, खुसरो को पीले कपड़े पहने और फूल लिए हिंदू महिलाओं का एक ग्रुप मिला, जो बसंत मनाने के लिए कालकाजी मंदिर जा रही थीं। खुसरो ने पीले रंग की पोशाक धारण की और दरगाह वापस आ आए। उन्हें देख कर उनके गुरु का दुख कुछ देर के लिए कम हो गया। इस घटना की याद में निजामुद्दीन दरगाह में बसंत का त्योहार आज भी रस्म के तौर पर मनाया जाता है।

दिल्ली में एक खास सूफी दरगाह पर बसंत मनाने की परंपरा का न तो बसंत के महत्व से कोई लेना देना है और न ही बसंतोत्व से। इससे ये दावा भी गलत साबित होता है कि खुसरो ने बसंत को एक मुस्लिम त्योहार के तौर पर ‘शुरू’ किया।

लाहौर में पतंग उड़ाने की परंपरा दिल्ली के बाद हुई। आज का कोई भी फारसी इतिहास या ऐतिहासिक ब्यौरा ऐसा दावा नहीं करता कि दिल्ली से पहले लाहौर में पतंगबाजी हुई। आज जो समझाने की कोशिश की जा रही है, वह इतिहास नहीं है, बल्कि मनगढ़ंत कहानियाँ है।

इस्लाम से पहले शुरू हुई बसंत पंचमी उत्सव

पाकिस्तान का इस्लाम से पहले के इतिहास के साथ रिश्ता हमेशा से अजीब रहा है। हिंदू मंदिरों को खत्म कर इतिहास बदलने की कोशिश की गई। किताबों में भारतीय इतिहास को नजरअंदाज किया गया। लेकिन बसंतोत्सव पंजाब के सामाजिक जीवन में इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है कि इसे पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता।

इसका एकमात्र उपाय यह रहा है कि त्योहार को बनाए रखा जाए और इसकी शुरुआत को अपने तरीके से बताया जाए। बसंत को भारतीय त्योहार के बजाय ‘पंजाबी’ त्योहार, हिंदू त्योहार के बजाय मुस्लिम कल्चरल रिवाज और इस्लाम से पहले की परंपरा के बजाय खुसरो की परंपरा बताना, इसे नए तरीके से परिभाषित करना ही है। बिना भारतीय सभ्यता की विरासत को अपनाए पाकिस्तान को इस त्योहार को मनाने का मौका मिलता रहा है।

यही कल्चरल चोरी का मतलब है, रिवाज को बनाए रखना, सोर्स को मिटा देना।

नहीं मिटा सकते विरासत को

पाकिस्तान में पंजाबियों का बसंत मनाना नकल नहीं है। आखिर, कल्चर बॉर्डर की सीमा से बाहर है। लेकिन किसी त्योहार को उसकी शुरुआत को नकारते हुए मनाना बेईमानी है। बसंत को इस्लामिक पहचान की जरूरत नहीं है। अमीर खुसरो को सभ्यता और परंपरा का निर्माता बनाने की जरूरत नहीं है। और पंजाबी कल्चर को मनाने के लिए इतिहास को भूलने की जरूरत भी नहीं है।

आप पतंग उड़ा सकते हैं। आप शहर को पीला रंग सकते हैं, लेकिन आप उस डोर को नहीं काट सकते जो बसंत को उसकी भारतीय, हिंदू, सभ्यता की जड़ों से जोड़ती है, चाहे कहानी कितनी भी बार लिखी जाए।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

ठाकुर हूँ ब@%$ मत करना… जिस वायरल वीडियो को देख सवर्णों पर उठाए गए सवाल, जानिए उस अधूरे क्लिप पर क्या बोलीं HDFC कर्मचारी: बताया- अब रेप तक की मिल रही धमकियाँ

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब चर्चा में है। वीडियो में HDFC बैंक की कर्मचारी आस्था सिंह गुस्से में कहती हैं- ठाकुर हूँ… ब@%$ मत करना। लोगों ने इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए आस्था सिंह पर जातिवाद के आरोप लगाने शुरू कर दिए। लेकिन आस्था सिंह ने पूरे मामले में सफाई देते हुए कहा कि अधूरी वीडियो पर उन्हें गालियाँ दी जा रही है, जबकि यह पूरा सच नहीं है। उन्होंने यह भी दोहराया कि वह ठाकुर हैं, और इस पर उन्हें गर्व है।

यह वीडियो ऐसे समय में वायरल हुई है, जब देशभर में UGC के नए नियमों को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। एक तरफ जहाँ UGC के नए नियमों को लेकर ब्राह्मण, ठाकुर और पूरे सवर्ण समाज को ताक पर रखा जा रहा है, वहीं समाज की निचली जाति इन सवर्ण समाज के लोगों पर सालों से भेदभाव और जातिवाद के आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में आस्था सिंह नाम की HDFC कर्मचारी का वीडियो सामने आया और लोगों ने इस अधूरी और एकतरफा जानकारी के साथ आस्था पर जातिवाद के आरोप लगाने शुरू कर दिए।

सोशल मीडिया पर लोगों ने आस्था को ‘जातिवाद’ पर घेरा

सोशल मीडिया पर आस्था सिंह की यह वीडियो खूब वायरल तो हुई, लेकिन लोगों को निशाना बनते हुए। लोगों ने उन पर जातिवाद करने के आरोप लगाए। इतना ही नहीं इस वीडियो के तहत पूरे सवर्ण समाज को भी घेरने की भी कोशिश की गई है।

एक ‘एक्स’ यूजर सूरज कुमार बौद्ध लिखते हैं, “HDFC की कर्मचारी आस्था सिंह ने बैंक परिसर में अपनी जाति का प्रदर्शन किया और बेशर्मी से एक ग्राहक को पीटने की कोशिश की। इस ‘मनु की नातिन’ से सिर्फ नफरत ही पैदा होती है। HDFC को इस जातिवादी मसखरे को तुरंत निकाल देना चाहिए।”

Nher_who नाम के एक्स यूजर कहते हैं, “उसने बैंक परिसर में अपनी जाति का प्रदर्शन किया और एक ग्राहक को पीटने की कोशिश की। यह जातिवादी लोगों का असली चेहरा है, जो एक बार फिर साबित करता है कि UGC की आवश्यकता क्यों है।”

वहीं एक अन्य विंगमैन नाम का यूजर कहता है, “पुराने जमाने में लोग शांति कायम करने के लिए उसे विदेशी आक्रमणकारियों को सौंप देते थे। लेकिन आज वे इसे जातिगत गौरव के रूप में दिखा रहे हैं। छी!”

एक सुमित नाम के यूजर ने तो यह तक कहा, “इसीलिए हमें निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की आवश्यकता है।”

यही नहीं, कई आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से भी वीडियो को शेयर कर आपत्तिजनक टिप्पणी की गई। यहाँ तक कि राजपूतों और उनके राजाओं को निशाना बनाते हुए इतिहास को बदनाम किया गया, ठाकुरों को निशाना बनाते हुए महिलाओं को बेइज्जत तक किया गया। वो भी सिर्फ 10 सेकेंड की वायरल वीडियो से, जो कि अधूरा सच है।

आस्था के सपोर्ट में उतरे नेटिजंस

वहीं सोशल मीडिया पर कुछ लोग आस्था सिंह के सपोर्ट में भी उतरे। उन्होंने वीडियो अधूरी क्लिप को देखकर जातिवाद की टिप्पणी करने का विरोध किया। साथ ही खुद का बचाव करने के लिए आस्था सिंह की तारीफ भी की।

एक्स यूजर ‘बींग पॉलिटिकल’ ने कहा, “एक 10 सेकंड के क्लिप पर लोग भड़क उठे और ‘जातिवाद’ का आरोप लगाने लगे, सिर्फ इसलिए कि उसने कहा ‘मैं ठाकुर हूँ’… लेकिन जब ग्राहक ने कथित तौर पर पहले उसे गाली दी थी, तब आक्रोश कहाँ था? बैंक कर्मचारी आस्था सिंह ने उकसाए जाने पर पलटवार किया, फिर भी हेडलाइन बन गई ‘बैंक में ठाकुरों का अहंकार’। क्या ये दोहरा मापदंड नहीं है? इसे एक और ‘उच्च जाति बुरी’ तमाशा बनाने से पहले पूरा संदर्भ देखें।”

एक यूजर ने लिखा, “मुझे अपनी जाति पर गर्व करने वाली महिलाओं के लिए सम्मान है। किसी भी जाति की हों। यह एक क्रॉप किया हुआ वीडियो है, इसलिए मैं कोई राय नहीं दूँगा। लगता है उसे उकसाया गया था। और हमारे देश में इस मामूली झगड़े से कहीं ज़्यादा गंभीर मुद्दे हैं।”

एडवोकेट आशुतोष जे दुबे नाम के यूजर ने कहा, “इस एक कटी हुई क्लिप का इस्तेमाल महिला को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। पूरा वीडियो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि पहले उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया था। उसने आत्मरक्षा में जवाब दिया, अपनी पहचान पर ज़ोर दिया और किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। तो फिर जाति आधारित भेदभाव कहाँ है? एडिटेड क्लिप नहीं, पूरा संदर्भ देखें।”

यदु सिंह नाम के एक्स यूजर ने लिखा, “जब आप किसी के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, उसे परेशान करते हैं और गाली देते हैं (इस मामले में, आस्था सिंह के साथ), तो वह व्यक्ति आपको मौखिक रूप से जवाब दे सकता है और आपको फटकार लगा सकता है। आत्मसम्मान एक वैध अवधारणा है, और ठाकुर या किसी अन्य जाति का होना अपराध नहीं है।”

उन्होंने आगे कहा, “भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) के किसी भी धारा का उल्लंघन नहीं किया गया है। अधूरा वीडियो साझा करना कायरता है। एजेंडा फैलाने वाले लोग अपना घिनौना खेल खेल रहे हैं।”

वायरल वीडियो पर आस्था का बयान

वायरल वीडियो पर आक्रोश के बाद खुद आस्था सिंह ने सामने आकर सफाई दी और लोगों को पूरा सच बताया है। उन्होंने घटनाक्रम के बारे में बताते हुए कहा कि वह अब भी अपने बयान पर टिकी हैं, वह ठाकुर होने पर गर्व महसूस करती हैं। आस्था सिंह की इस वीडियो के बाद जातिवाद करने वाले लोगों के मुँह बंद हो गए हैं।

वीडियो जारी कर आस्था सिंह ने बताया कि यह घटनाक्रम 06 जनवरी 2026 का है, जब बैंक में साथी कर्मचारी रितु त्रिपाठी के इस्तीफे से संबंधित कामकाज जारी था। आस्था बताती हैं कि रितु ने इस्तीफा देकर उसी दिन रिलीविंग की माँग की थी। इस दौरान रितु की ननद सुबह से ही बैंक ब्रांच में मौजूद थी, जिसमें हल्की बहस हो गई।

उन्होंने कहा कि बाद में रितु ने यह बात अपने पति ऋषि त्रिपाठी को बताई, जो बैंक बंद होने के वक्त ब्रांच में आए और अभ्रदता करने लगे। आस्था ने कहा कि रितु के पति ने उनकी डेस्क पर आकर उनकी जाति पूछी और धमकी दी- “मैं तुम्हारी हेकड़ी निकाल दूँगा। सारी की सारी गर्मी निकाल दूँगा।”

आस्था ने बताया जो वीडियो वायरल है, वो अधूरी क्लिप है। सिर्फ आस्था की प्रतिक्रिया की, जो उन्होंने खुद पर की गई अभद्र टिप्पणी के बाद जाहिर की। उन्होंने कहा कि वीडियो को जातिवाद का मुद्दा बनाकर पेश किया गया। आस्था ने कहा कि इसके बावजूद वह अपने बयान पर टिकी रहेंगी। वह कहती हैं, “कोई बदतमीजी से बात करेगा, तो बर्दाश्त नहीं करूँगी। मैं ठाकुर हैं और इस पर गर्व करती हूँ।”

आस्था ने कहा- रेप की धमकी मिली

इसके अलावा वायरल वीडियो पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया कि इस मामले में उन्हें रेप करने और बाल काटने तक की धमकी दी जा रही हैं। वे कहती हैं, “हर इंसान फेमस होना चाहता है, लेकिन गलत तरीके से नहीं। मैं गलत मायने में फेमस हो रही हूँ।”

कंपनी के रुख पर आस्था सिंह कहती हैं, “इस केस में इंटरनल मेल अपने सीनियर्स को फॉरवर्ड कर दिया है। सबको पता है कि मैं गलत नहीं हूँ, इसलिए हमें इसमें इतना एक्शन लेने की जरूरत नहीं थी। मगर जब इस तरीके की चीजें हो रही हैं, तो मैं बिल्कुल मानहानि का केस करना चाहूँगी।”

हेकड़ी गुम, अब ‘भिखमंगा पाकिस्तान’ को चाहिए पैसा: भारत के साथ T20 विश्व कप मैच को लेकर PAK में बवाल

T20 वर्ल्ड कप में भारत पाकिस्तान के बीच 15 फरवरी को मुकाबला होना है, लेकिन पाकिस्तान ने इसके बहिष्कार का ऐलान किया है। इस मुद्दे पर आईसीसी के दो प्रतिनिधि इमरान ख्वाजा और मुबाशिर उस्मानी लाहौर गए हुए हैं और उनकी पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के साथ बैठक हुई है। पीसीबी चेयरमैन नकवी ने अब प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से बात कर आईसीसी को जानकारी देने की बात कही है।

उम्मीद की जा रही है कि पाकिस्तान अपना फैसला बदलेगा और भारत के साथ मैच खेलने के लिए तैयार हो जाएगा। दरअसल भारत-पाकिस्तान का मैच आईसीसी के लिए काफी अहम है और इसे सबसे बड़ा कॉमर्शियल मैच माना जाता है।

मेजबान श्रीलंका ने भी पाकिस्तान को लिखा खत

पाकिस्तान के सारे मैच श्रीलंका में हो रहे हैं और भारत के साथ प्रस्तावित मैच भी कोलंबो के प्रेमदासा स्टेडियम में खेला जाना है। मेजबान श्रीलंका ने पीसीबी को कहा है कि बड़े मुकाबले रद्द होने से उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा, इसलिए फैसले पर पुनर्विचार करें।

आईसीसी और पीसीबी की बैठक

आईसीसी के साथ पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की बैठक हुई है। इसके बाद पीसीबी चेयरमैन मोहसीन नकवी ने कहा है कि वह शहबाज शरीफ को सारी बातें बताएँगे, फिर फैसला लिया जाएगा यानी ये फैसला राजनीतिक होगा।

इस बीच खबर यह भी है कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने आईसीसी के सामने खेलने के लिए शर्तें रखी हैं। इनमें ICC रेवेन्यू में ज़्यादा हिस्सेदारी और द्विपक्षीय क्रिकेट की बहाली से लेकर मुआवजे से जुड़ी माँगें शामिल हैं यानी भारत के साथ खेल के बहिष्कार का मुद्दा आईसीसी को बारगेन कर पैसा वसूली भी हो गया है। ये पीसीबी का आत्मविश्वास नहीं, बल्कि कमजोरी को दिखाता है।

बांग्लादेश को लेकर भी रखी शर्तें

बांग्लादेश की क्रिकेट में योगदान का हवाला देते हुए आईसीसी से ज्यादा फंडिंग की डिमांड की गई है। पीसीबी का तर्क है कि बांग्लादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर, नए खिलाड़ियों और नेशनल टीम को स्टंडर्ड बनाए रखने के लिए आर्थिक सहायता ज्यादा दिया जाए।

टी20 से बाहर होने के बावजूद बांग्लादेश की पार्टिसिपेशन फीस न काटी जाए। इसके अलावा, बांग्लादेश में क्रिकेट को बढ़ावा देने और ग्लोबल पहचान बनाने के लिए आईसीसी टूर्नामेंट की मेजबानी का मौका दिया जाए। बोर्ड का दावा है कि इसके लिए बांग्लादेश के पास जरूरी सुविधाएँ मौजूद हैं। हालाँकि बांग्लादेश के मुद्दे को लेकर आईसीसी ने साफ कर दिया है कि उसके पास मुआवजा के तौर पर बांग्लादेश को देने के लिए कुछ नहीं है, सिर्फ आईसीसी की कमाई का हिस्सा मिल सकता है।

पाकिस्तान पर खेलने का दबाव

भारत-पाकिस्तान T20 वर्ल्ड कप मैच को लेकर फैसला राजनीतिक रूप से लेने को क्रिकेट के प्रति संवेदनशीलता कम और राजनीतिक दखलंदाजी ज्यादा माना जा रहा है। भारत के साथ न खेलने का ऐलान भी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ही किया था।

अब एक T20 मैच खेलने के लिए पाकिस्तान के कैबिनेट की रजामंदी चाहिए। यह दिखाता है कि पाकिस्तान में राजनीति ने खेलों पर कितना कब्जा कर लिया है। पीसीबी संवैधानिक तौर पर इतना कमजोर है कि क्रिकेट की सेहत को मजबूत करने की उसमें ताकत ही नहीं है। वह राजनीति को क्रिकेट से अलग नहीं रख पा रहा। ये बात भी उतनी ही सही है कि जब पीसीबी का चेयरमैन मोहसिन नकवी खुद पाकिस्तान का एक मंत्री है, तो क्रिकेट और राजनीति अलग कैसे रह सकते हैं।

मोहसिन नकवी पाकिस्तान के लॉ एंड ऑर्डर के लिए ज़िम्मेदार मंत्री हैं। PCB चीफ के तौर पर क्रिकेट से जुड़े फैसले लेने की उन पर जिम्मेदारी है। ऐसे में क्रिकेट पर फैसला स्वतंत्र रूप से कैसे लिया जा सकता है।

दूसरी तरह क्रिकेट के प्रशंसकों को इस बात पर गुस्सा आ रहा है कि राजनीति की वजह से शहबाज सरकार भारत से क्रिकेट खेलने को लेकर आईसीसी से सौदेबाजी कर रही है। लोगों के गुस्से को सरकार भी महसूस कर रही है।

एक सीनियर पाकिस्तानी सरकारी सूत्र के हवाले से सीएनएन न्यूज18 ने कहा, “कैबिनेट में चर्चा क्रिकेट के बारे में नहीं है। यह एक ऐसी सरकार की बैठक है, जो जनता के गुस्से को झेलने से बचने के लिए बहाने सोच रही है।” ये गुस्सा सिर्फ क्रिकेट को लेकर नहीं है। पाकिस्तानी सरकार अपने देश में ही घिर गई है। देश में महँगाई और बेरोजगारी चरम पर है। सेना सरकार पर हावी है और हर तरफ फौज के खिलाफ जनता सड़कों पर दिखाई दे रही है। बलुचिस्तान से लेकर खैबर पख्तूनख्वाँ में जनता विद्रोह कर चुकी है और पाकिस्तानी फौजियों को पीट रही है।

ऐसे में जनता का ध्यान भटकाने के लिए क्रिकेट का मुद्दा सरकार के हाथ में आया है। भारत के साथ मैच अब पाकिस्तानियों के सेंटिमेंट से जुड़ा मुद्दा है। भारत के साथ मैच को मुद्दा बना कर शहबाज शरीफ सरकार राजनीतिक फायदा उठाने में लगी है और पीसीबी आर्थिक हालत को सुधारने में। इसलिए पाकिस्तान मैच खेलने को लेकर बारगेन कर रहा है, ताकि अधिक से अधिक वसूली की जा सके।

कैसे शुरू हुआ था ड्रामा

ICC T20 वर्ल्ड कप में ग्रुप A का मैच 15 फरवरी को कोलंबो में भारत बनाम पाकिस्तान है। टूर्नामेंट का सबसे बड़ा माना जाने वाला ये मैच पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB), इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) और पाकिस्तान की सियासत के बीच फँस गई है।

पाकिस्तान ने सबसे पहले क्रिकेट की दुनिया को यह ऐलान करके चौंका दिया कि वह भारत के मैच का बॉयकॉट करेगा, जबकि उसकी टीम टूर्नामेंट में बनी हुई है। सोशल मीडिया पर पाकिस्तान सरकार का रुख सामने आया, इसमें कहा गया कि टीम भारत के खिलाफ पाकिस्तान की टीम ‘मैदान में नहीं उतरेगी।’ यह कदम बांग्लादेश के साथ ‘एकजुटता’ दिखाने के लिए किया गया था, क्योंकि बांग्लादेश की टीम को आईसीसी ने टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था। दरअसल बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने भारत में मैच नहीं खेलने की बात कही थी और इसके लिए सुरक्षा का हवाला दिया था, जिसे आईसीसी ने रिजेक्ट कर दिया।