कर्नाटक के संगीतकार टीएम कृष्णा अपने राजनीतिक बयानों को लेकर अक्सर विवादों में रहते हैं। हाल ही में उन्होंने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ और हिंदुओं को लेकर विवादित बातें कही हैं। अपनी किताब का प्रचार करने के लिए यूट्यूब चैनल ‘द देशभक्त’ को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने वंदे मातरम्, आनंदमठ और हिंदू पहचान के लेकर अपनी नापसंदगी खुलकर जाहिर की।
बता दें कि ‘वंदे मातरम्’ प्रसिद्ध भारतीय लेखक और उपन्यासकार बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था। इसे उन्होंने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में प्रस्तुत किया था। यह उपन्यास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और बंगाल में पडे अकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
‘वंदे मातरम्’ शब्द स्वतंत्रता सेनानियों के बीच एक लोकप्रिय नारा बन गया था। ब्रिटिश शासन के समय, जब देश कठिन दौर से गुजर रहा था, तब इससे उन्हें प्रेरणा और शक्ति मिलती थी। यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के अपने देश के प्रते गहरे प्रेम को दर्शाता है, जिसे वे ‘माँ’ के रूप में पूजते थे और उसे गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के उनके संकल्प को भी व्यक्त करता है।
वंदे मातरम में भारत माता को हिंदू देवी के रूप में दर्शाया: टीएम कृष्णा
हालाँकि, टीएम कृष्णा इस गीत के भक्ति भाव को पूरी तरह समझने में असफल हैं और इसे ‘जटिल’ बताते हुए कहते हैं कि यह देश का राष्ट्रगान बनने के योग्य नहीं था। वे कहते हैं, “बहुत साफ शब्दों में कहूँ तो वंदे मातरम का राष्ट्रगान कभी हो ही नहीं सकता था, क्यों वंदे मातरम् एक जटिल गीत है…।”
इसके बाद वे अपनी आलोचात्मक राय को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। वे गीत की संरचना में कमी निकालते हैं और यह भी बताते हैं कि चटर्जी ने इस गीत को एक ही बार में नहीं, बल्कि अलग-अलग चरणों में लिखा था। मानो यही बात इस गीत को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किए जाने से अयोग्य ठहराने के लिए पर्याप्त हो।
वो नोबेल पुरस्कार विजेता रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिए गए भारतीय राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की तुलना ‘वंदे मातरम्’ से करते हैं। जहाँ दोनों गीत अलग-अलग दृष्टिकोण से भारत का गुणगान करते हैं, वहीं कृष्णा का दावा है कि ‘वंदे मातरम’ की तुलना में ‘जन गण मन’ के लिए अधिक उपयुक्त है। वे ‘वंदे मातरम्’ को हिंदू पहचान से जोड़कर देखते हैं और उसे उसी दायरे तक सीमित मानते हैं, जिससे उन्हें स्पष्ट रूप से घृणा करते हैं।
इसके अलावा, वे ‘वंदे मातरम्’ के अंतिम कुछ ‘स्वर’ या भाव में बदलाव की ओर ध्यान खींचते हैं। उनका कहना है कि इन अंतरों में भारत माता को एक ‘हिंदू देवी’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसे लेकर भी उन्हें इस गीत से आपत्ति है।
‘आनंदमठ’ एक मुस्लिम-विरोधी किताब है: टीएम कृष्णा
टीएम कृष्णा की हिंदू-घृणा यही नहीं रुकती, बल्कि वे किताब ‘आनंदमठ’ को लेकर भी झूठ और भ्रामक दावे करने लग जाते हैं। कृष्णा दावा करते हैं कि उन्होंने ‘आनंदमठ’ के दो अनुवाद पढ़े हैं, और उसे पढ़ने से पता लगा कि यह किताब केवल तत्कालीन सरकार की विरोधी ही नहीं, बल्कि मुस्लिम-विरोधी भी है।
कृष्णा का कहना है, “इस किताब में यह गीत हिंदू सन्यासियों द्वारा गाया जाता है, जब वे उन गाँवों पर हमला कर रहे होते हैं, जहाँ मुस्लिम रहते हैं। यह किताब हिंदू समुदाय की श्रेष्ठता स्थापित करती है और उनके नियंत्रण के फिर से लौटने की आवश्यकता को दिखाती है।”
क्या कोई कह सकता है कि एक ‘कलाकार’ होने के नाते कृष्णा को गीत की ‘संरचना’ या उसके ‘स्वर’ को लेकर अपनी राय रखने का अधिकार है। लेकिन गीत की संरचना की आलोचना से आगे बढ़ते हुए वे इस पर व्यापक और सामान्य आरोप लगाने लगते हैं। वे गीत की प्रशंसा और समर्थन करने वाले लोगों को एक तरह के समूह या पंथ के रूप में पेश करते हैं।
वे कहते हैं, और दिलचस्प बात यह है कि जो लोग आमतौर पर ‘वंदे मातरम्’ का समर्थन करते हैं, वही लोग ‘समान नागरिक संहिता’ की बात भी करते हैं, ‘एक भाषा’ की बात भी करते हैं। उनमें से कुछ यह भी कहते हैं कि संविधान की प्रस्तावना में भगवान का उल्लेख होना चाहिए और ‘धर्मांतरण विरोध’ की भी बात करते हैं।
टीएम कृष्ण और उनकी हिंदू-घृणा
जब टीएम कृष्ण लगातार गीत की आलोचना करते रहते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि उन्हें असल में गीत से नहीं, बल्कि उस बड़ी सोच से परेशानी है, जिसका प्रतीक वे इस गीत को मानते हैं। वे कहते हैं “तो अगर आप देखें, तो वंदे मातरम् उस पूरी सोच का प्रतीक है, जिसे वे भारत मानते हैं, एक हिंदू भारत, एक प्रभुत्व वाला हिंदू भारत, जिसमें दूसरों को तभी जगह दी जा सकती है, जब वे भावनात्मक रूप से अदीन रहें या यह मान लें कि हमारे पूर्व हिंदू थे।”
ऊपर कोट कृष्णा के बयानों से यह साफ हो जाता है कि उनके गुस्से और कटुता का असली निशाना न तो ‘आनंमठ’ है और न ही ‘वंदे मातरम्’, बल्कि वह हिंदू पहचान है, जिसे वे इन दोनों से जोड़ते हैं। कृष्णा अपनी हिंदू-विरोधी सोच को देश की ‘धर्मनिरपेक्ष’ भावना के प्रति चिंता के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं और यह संकेत देते हैं कि हिंदू पहचान अपने आप में एक समानता पर आधारित समाज के विपरीत है।
वे भारत की अपनी कल्पना को ऐसा देश बताते हैं, जहाँ सभी समुदायों के लोगों को जगह मिलती है और किसी के साथ धर्म या विचारधारा के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता। लेकिन ऐसा कहते हुए ही कृष्णा की दोहरी सोच और पाखंड सामने आता जाता है।
साल 2018 में टीएम कृष्णा ने खुले तौर पर यह स्वीकार किया था कि केरल जैसे राज्यों में जब कम्युनिस्टों या इस्लामी संगठनों द्वारा RSS के सदस्यों की हत्या होती है, तो उन्हें कोई सहानुभूति महसूस नहीं होती। इतनी ही नहीं, उन्होंने इसके लिए सीधे तौर पर BJP को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि उसी ने उन्हें इतना ‘असभ्य’ और ‘अमानवीय’ बना दिया है।
जो कृष्णा हर विचारधारा को जगह देने की बात करते हैं, वही खुद उन विचारधाराओं के प्रति असहिष्णुता दिखा चुके हैं जो उन्हें पसंद नहीं हैं, जिनमें हिंदू विचारधारा भी शामिल है।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
हैदराबाद के आर्कबिशप कार्डिनल पूला एंथनी को कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया है। CBCI भारत में कैथोलिक क्रिश्चियंस का ऐसा संगठन है, जो धार्मिक नियम कानून तय करता है।
पूला एंथनी को अध्यक्ष चुने जाने को मीडिया में ऐसे दिखाया गया कि एंथनी देश के पहले ऐसे दलित क्रिश्चियन हैं, जो देश के लगभग 2 करोड़ कैथोलिक को लीड करेंगे!
दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे?
अब सवाल ये उठता है कि आखिर कोई दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे हो सकता है? ईसाई तो कैथोलिक होते हैं, प्रोटेस्टेंट होते हैं और जाति व्यवस्था तो हिंदुओं में होती है।
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र…अगड़ा-पिछड़ा, दलित-OBC ये सब तो हिंदुओं के वर्गीकरण हैं? फिर भला कार्डिनल एंथनी दलित कैसे हुए और ‘दलित’ रहते हुए वो ईसाइयत के प्रति कितने समर्पित हो सकते हैं। इसके बावजूद मीडिया में ये कहा जा रहा है कि वो दलित हैं! ईसाइयों में जब सब बराबर होते हैं, तो फिर कोई दलित कैसे हो गया।
ईसाइयत की किताब बाइबिल तक कहती है कि सब बराबर हैं, सबको गॉड ने बनाया है। सब गॉड के लिए बराबर हैं। भारत में गाँव-गाँव धर्मांतरण करवाती मिशनरियाँ यही बताती घूमती हैं कि सनातन छोड़ोगे, तो जाति व्यवस्था में ऊपर बढ़ोगे? ईसाई बनोगे तो बराबर हो जाओगे। जाति व्यवस्था से मुक्ति मिलेगी।
बराबरी की बात कह बरगलाते हैं मिशनरी
जो एसटी- एससी समाज के लोग ईसाइयत को अपनाते हैं, उनके लिए यह दलील दी जाती हैं कि वे जाति व्यवस्था से तंग आकर ईसाइयत की तरफ आकर्षित हुए।
लेफ्ट लिबरल लॉबी भी इसी बात को लेकर सनातन को गालियाँ देती है कि यहाँ जाति-व्यवस्था हावी है। यहाँ कथित नीची जातियों को बराबर नहीं माना जाता, यहाँ कथित तौर पर लोगों को मंदिरों में घुसने की आजादी नहीं है, यहाँ उन्हें दलित और अगड़ा-पिछड़ा में बांटा जाता है, इसीलिए लोग सनातन छोड़ कर ईसाइयत अपना लेते हैं।
तो ये जाति सूचक शब्द आखिर ईसाई बनने के बाद भी पूला एंथनी के साथ कैसे चिपका रह गया? और अगर ईसाई बनने के बाद भी कोई दलित रह जाता है, तब तो ईसाइयत अपनाने और धर्मांतरण को लेकर जो भी प्रचार-प्रसार किया जाता है, वह सब गलत है। इसका कोई जवाब ना लेफ्ट लिबरल लॉबी के पास होगा और ना सनातन को डेंगू मलेरिया बताने वाले नेताओं के पास!
मीडिया ने भी दलित कार्डिनल एंथनी की बात कही
कार्डिनल एंथनी कैसे इतने दूर तक पहुँचे और कैसे ये ऐतिहासिक है! मीडिया यही बताने में लगा है। चाहे इंडियन एक्सप्रेस हो या टाइम्स ऑफ़ इंडिया। हर कोई इस बात को हाईलाइट कर रहा है कि देखिए दलित व्यक्ति अब 2 करोड़ लोगों के धार्मिक तौर तरीके मैनेज करेगा!
उनकी कहानी बताने वाली ईसाईयत से जुड़ी वेबसाइट्स भी कार्डिनल एंथनी में ‘दलित’ को ढूँढ रही है। बताती हैं कि दलित माता-पिता के घर पैदा हुए एंथनी युवावस्था में मिशनरी की हेल्प से गरीबी से बाहर आए। अब मिशनरी की सहायता से कैसे कोई गरीब आदमी ‘गरीबी’ से बाहर निकलता है, ये सबको पता है। पैसे का लालच, पढ़ाई और इलाज का लालच धर्मांतरण के लिए आम बात है। इसको लेकर आए दिन घटनाएँ देशभर में घटती रहती हैं।
देश का संविधान भी नहीं मानता कि ईसाईयत में कन्वर्ट होने वाला दलित रह सकता है। उन्हें माइनॉरिटी कह सकते हैं, लेकिन SC/ST नहीं कहा जाता है।
ऐसे धर्मांतरण के मामलों को लेकर साल 2004 में रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाई गई। इस आयोग ने सिफारिश दी थी कि अनुसूचित जाति का दर्जा पूरी तरह से धर्म से अलग होना चाहिए और ईसाई और मुस्लिम दलितों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
लेकिन UPA सरकार भी इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर पाई, क्योंकि ये आधार ही गलत है। ये सीधे तौर पर दशकों से हाशिये पर पड़े लोगों के साथ धोखा होगा। ईसाई-मुस्लिम बने लोग एससी-एसटी के अधिकारों पर डाका डालने लगेंगे।
कमेटी ने तो ये भी कहा था कि दलित क्रिश्चियन भी गैर बराबरी का शिकार है, लेकिन सवाल फिर वही है कि अगर ईसाईयत में सभी बराबर हैं तो गैर बराबरी कैसे और कोई पिछड़ा-दलित कैसे हो सकता है? सब तो चर्च जाने वाले और जीसस को मानने वाले हुए।
केरल में अगड़ा-पिछड़ा-दलित क्रिश्चियन
दरअसल ये ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल दिखाता है कि ईसाइयत अपनाने वाले लोगों को खुद मिशनरियाँ ही बराबर नहीं मानती। जो बराबरी की बात कर पिछड़ों-दलितों और जनजातीय समाज के लोगों को बरगलाते हैं और धर्मांतरण करवाते हैं, वो पहचान तब भी नहीं छूटती जब कोई ईसाइयत के ऊँचे स्थान पर पहुँच जाता है।
केरल जैसे राज्यों में तो आज भी ईसाइयों के भीतर भयानक जातिवाद है। यहाँ कुछ ईसाई अपने को ऊँची जाति का बताते हैं और दलित से ईसाइयत अपनाने वाले लोगों को हीन भावना से देखते हैं। मिशनरी यहाँ कुछ नहीं कर पातीं।
असल में बराबरी का फर्जीवाड़ा सिर्फ और सिर्फ उस सनातन को कमजोर करने के लिए है, जिसने ना सिर्फ समय आने पर अपने में बदलाव किए हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्थाएँ बनाई हैं कि पिछड़ों की भरपाई हो। आज राम मंदिर में पुजारी दलित समाज से हैं! किसी मंदिर में कोई नहीं पूछता कि आप किस जात से हो।
केरल हाई कोर्ट ने 30 जनवरी 2026 को कहा कि गैर-हिंदुओं के लिए हिंदू मंदिरों में प्रवेश पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने वाले नियम पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए ताकि यह संविधानिक सिद्धांतों के अनुरूप हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि धार्मिक स्थानों को नियंत्रित करने वाले कानून सामाजिक अशांति या विवाद का साधन नहीं बनना चाहिए।
यह फैसला डिवीजन बेंच ने सुनाया, जिसमें जस्टिस राजा विजयराघवन वी और जस्टिस के वी जयकुमार शामिल थे। कोर्ट ने उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें हिंदू त्योहार के दौरान मंदिर में ईसाई पुजारियों के प्रवेश को चुनौती दी गई थी।
याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि वह यह देखे कि केरल हिंदू पब्लिक प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप नियम, 1965 के नियम 3(ए) को वर्तमान रूप में बनाए रखना चाहिए या धार्मिक हितधारकों से सलाह लेकर इसमें संशोधन किया जाना चाहिए।
ऑपइंडिया ने इस फैसले का विश्लेषण किया।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला 7 सितंबर 2023 को अडूर श्री पार्थसारथी मंदिर, पथानमथिट्टा जिले में श्रीकृष्ण जयंती के समारोह के दौरान घटित घटनाओं से उत्पन्न हुआ। मंदिर प्रशासन ने समारोह के हिस्से के रूप में आयोजित सार्वजनिक कार्यक्रम में दो ईसाई पादरियों को आमंत्रित किया।
कार्यक्रम के बाद पादरियों को श्रीकोविल (अंदरूनी पूजा क्षेत्र) के पास ले जाया गया और उन्हें भेंट दी गई। चूँकि पादरी अपने पोशाक में थे, ऐसे में हिंदू भक्तों ने आपत्ति जताई और दावा किया कि केरल हिंदू पब्लिक प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप (एथोराइजेशन ऑफ एंट्री) एक्ट, 1965 और उसके तहत बने नियमों के अनुसार गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है।
मंदिर के भक्त सनील नारायणन नंपूतिथि ने केरल हाई कोर्ट का रुख किया और मंदिर प्रशासन पर आरोप लगाया कि उन्होंने ईसाई पादरियों को प्रवेश की अनुमति देकर कानून का उल्लंघन किया। उन्होंने मंदिर सलाहकार समिति के सदस्यों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई, जिसमें उनके पद से हटाना भी शामिल था, की माँग की। साथ ही उन्होंने सभी गैर-हिंदुओं के मंदिर परिसर में प्रवेश पर रोक लगाने और परिसर की पवित्रता बहाल करने के लिए उपचारात्मक अनुष्ठानों के प्रदर्शन का निर्देश देने की भी माँग की।
गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर स्पष्ट प्रतिबंध
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 1965 के नियमों का नियम 3(ए) स्पष्ट रूप से गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश करने से रोकता है। उन्होंने कहा कि ईसाई पादरियों का खासकर पादरी के कपड़ों में प्रवेश कानून का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता का कहना था कि चाहे तांत्री द्वारा अनुमति दी गई हो या नहीं, मंदिर प्रशासन के पास कानूनी प्रतिबंध को नजरअंदाज करने का कोई अधिकार नहीं है।
इसके अलावा यह भी कहा गया कि इस प्रकार का प्रवेश स्थापित रीति-रिवाज और धार्मिक प्रथाओं को कमजोर करता है, जिससे मंदिर की पवित्रता कम हो जाती है। याचिकाकर्ता ने जोर देकर कहा कि मामला आतिथ्य या शिष्टाचार का नहीं है, बल्कि हिंदू पूजा स्थलों को नियंत्रित करने वाले कानूनी और धार्मिक मानकों के कड़ाई से पालन का है।
देवस्वोम बोर्ड और मंदिर अधिकारियों का रुख
अपने जवाबी हलफनामे में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने माना कि मंदिर सलाहकार समिति ने श्री कृष्ण जयंती के मौके पर निकाली गई शोभा यात्रा का उद्घाटन करने के लिए एक ईसाई पादरी को बुलाया था।
कार्यक्रम के बाद पादरी और अन्य लोग मंदिर में प्रवेश करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने पुजारियों से अनुमति माँगी। इसके बाद मंदिर के तांत्रिक ने उन्हें मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत दे दी।
बोर्ड का कहना है कि यह प्रवेश केवल औपचारिक था और अनुमति के आधार पर हुआ था, इसे किसी का अधिकार नहीं माना जा सकता। बोर्ड ने यह भी दावा किया कि इससे मंदिर की परंपराओं, रीति-रिवाजों या धार्मिक नियमों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।
इसके अलावा, बोर्ड ने कहा कि अगर नियमों का कोई उल्लंघन हुआ भी होता, तो अधिकतम कार्रवाई सिर्फ उस व्यक्ति को मंदिर परिसर से बाहर निकालने तक ही सीमित होती, न कि मंदिर अधिकारियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कदम उठाने तक।
मंदिर सलाहकार समिति के सदस्यों ने भी बोर्ड की बात का समर्थन किया और कहा कि प्रवेश तांत्रिक की अनुमति से ही हुआ था। समिति ने यह भी बताया कि उस समय किसी भी श्रद्धालु ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। समिति का आरोप है कि यह याचिका कोर्ट की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल है और इसका मकसद बेवजह विवाद खड़ा करना है।
कोर्ट की टिप्पणियाँ
केरल हाई कोर्ट ने कहा कि केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) अधिनियम, 1965 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हिंदुओं के सभी वर्गों और समुदायों को मंदिरों में प्रवेश मिले और जाति के आधार पर भेदभाव खत्म किया जाए।
कोर्ट ने कहा कि 1965 के नियमों का नियम 3(क) भले ही गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश से रोकता हो, लेकिन मूल कानून (अधिनियम) में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कोई साफ और स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अधीनस्थ कानून (नियम) ऐसे प्रतिबंध नहीं लगा सकता, जो मूल अधिनियम में मौजूद ही नहीं हैं। कोर्ट ने दोहराया कि प्रत्यायोजित कानून का काम मूल कानून को पूरा करना है, न कि उसे बदलना या उसकी जगह लेना।
कोर्ट के निष्कर्ष और निर्णय
अपने फैसले में कोर्ट ने यह साफ किया कि किसी के अधिकार के रूप में मंदिर में प्रवेश करने और तांत्रिक द्वारा अतिथि या आमंत्रित व्यक्ति के रूप में अनुमति देने में फर्क है। कोर्ट ने माना कि मंदिर की धार्मिक और आध्यात्मिक व्यवस्था में तांत्रिक की महत्वपूर्ण और आधिकारिक भूमिका होती है। इसलिए, तांत्रिक द्वारा दी गई अनुमति को कानूनी उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का मकसद समाज में सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना है। कोर्ट के अनुसार, कानूनों को समय के साथ बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित होना चाहिए।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि अधीनस्थ नियमों की सख्त और कठोर व्याख्या से धार्मिक तनाव या असंतुलन पैदा नहीं होना चाहिए। हालाँकि, कोर्ट ने नियम को रद्द करने से इनकार कर दिया और यह फैसला सरकार पर छोड़ दिया कि देवस्वोम बोर्ड, तांत्रिकों, धार्मिक विद्वानों और अन्य संबंधित पक्षों से सलाह लेने के बाद नियम में बदलाव किया जाए या नहीं।
यह फैसला मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण और हिंदुओं के लिए अन्यायपूर्ण क्यों है?
इस फैसले को संविधानिक सद्भाव की रक्षा के रूप में दिखाया जा रहा है, लेकिन यह एक पुरानी और गंभीर समस्या को उजागर करता है, यानी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू धार्मिक स्थलों में बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप।
भारत और दुनिया के कई हिस्सों में धर्म के आधार पर पूजा स्थलों में प्रवेश की सीमाएँ सामान्य रूप से लागू हैं और इन्हें विवादास्पद नहीं माना जाता। उदाहरण के तौर पर, गैर-मुसलमानों को मक्का और मदीना में प्रवेश की अनुमति नहीं है।
वेटिकन में भी धार्मिक नियमों के अनुसार सख्त प्रवेश व्यवस्था है। कई चर्च और सिनेगॉग भी बड़े धार्मिक कार्यक्रमों में केवल अपने अनुयायियों को ही प्रवेश देते हैं। इन नियमों को न तो असंवैधानिक कहा जाता है और न ही समाज को बाँटने वाला।
लेकिन जब बात हिंदू मंदिरों की आती है, तो वे अक्सर अदालती जाँच, नए अर्थों और नैतिक दबाव के दायरे में आ जाते हैं। केरल हाई कोर्ट का यह संकेत कि गैर-हिंदुओं पर प्रतिबंध असंवैधानिक हो सकता है, इस बात को नजरअंदाज करता है कि धार्मिक संस्थानों को अपनी आध्यात्मिक पहचान बनाए रखने का अधिकार है। मंदिरों को पर्यटन स्थल नहीं बनाया जा सकता।
यह तर्क कि हिंदू धर्म सिर्फ एक जीवन शैली है और इसलिए सभी के लिए खुला होना चाहिए, बार-बार हिंदू धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल किया गया है।
यह भूल जाता है कि हिंदू मंदिर सार्वजनिक पार्क या सांस्कृतिक भवन नहीं हैं, बल्कि पवित्र स्थल हैं, जो आगम, परंपरा और सदियों पुराने धार्मिक नियमों से संचालित होते हैं और भी चिंता की बात यह है कि कोर्ट ने उस नियम पर सवाल उठाया, जो हिंदू मंदिरों की पवित्रता की रक्षा के लिए बनाया गया था, जबकि यह अधिनियम खुद हिंदू धार्मिक मामलों में सरकारी हस्तक्षेप का नतीजा है।
हिंदू मंदिर पहले से ही देवस्वोम बोर्डों के जरिए सरकारी नियंत्रण में हैं, जबकि मस्जिद और चर्च अधिक स्वतंत्र हैं। अब अगर हिंदुओं से यह भी छीन लिया जाए कि कौन उनके पवित्र स्थलों में प्रवेश कर सकता है, तो यह धर्मनिरपेक्षता का असमान और पक्षपाती प्रयोग होगा।
धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं है कि हिंदू हर चीज और हर किसी को बिना सवाल स्वीकार करें, खासकर जब अन्य धर्म अपनी विशिष्टता और सीमाओं को बिना किसी विवाद के लागू करते हैं। हिंदू अकेले धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार नहीं हैं और उनके मंदिर सामाजिक प्रयोगों की प्रयोगशाला नहीं होने चाहिए।
हरिनगर, बिहार के दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान थाना क्षेत्र का एक ब्राह्मण बहुल गाँव है। आज यह गाँव अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) के दुरुपयोग के कारण राष्ट्रीय चर्चा में है।
इस गाँव के 70 ब्राह्मणों को SC/ST एक्ट में नामजद किया गया है। साथ ही 100-150 अज्ञात भी एफआईआर में जोड़ दिए गए हैं। नतीजा यह है कि भय और गिरफ्तारी की आशंका से गाँव के अधिकांश पुरुष घर छोड़ चुके हैं। पीछे छूट गई हैं रोती-बिलखती महिलाएँ, बुजुर्ग और युवतियाँ। गाँव में पुलिस तैनात है, शांति समिति की बैठकें हो रही है, लेकिन न्याय कहीं दिखाई नहीं देता।
यह बात पुलिस भी स्वीकार कर चुकी है कि पूरा विवाद मजदूरी के पुराने झगड़े से शुरू हुआ। विवाद के दो पक्ष हैं- एक ब्राह्मण और दूसरा पासवान। लेकिन SC/ST एक्ट के प्रयोग ने इस विवाद को ऐसा रूप दे दिया कि एक पक्ष स्वतः अपराधी और दूसरा स्वतः पीड़ित घोषित कर दिया गया।
यह भी सामने आया है कि कई ऐसे ब्राह्मणों पर भी एफआईआर हुई है जो घटना के समय गाँव में थे ही नहीं। पहले मारपीट एक ब्राह्मण के साथ हुई थी। ब्राह्मणों को गाली-गलौच का सामना करना पड़ा। ब्राह्मण पक्ष की शिकायत पर भी पूर्व में एक एफआईआर दर्ज हुई थी, लेकिन उनके पास SC/ST एक्ट जैसा कोई ‘कवच’ नहीं था।
यही इस पूरे प्रकरण की केन्द्रीय विडंबना है।
पुलिस की विवशता या प्रणाली की विफलता?
स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब पुलिस जानती है कि मामला मजदूरी विवाद से जुड़ा है, तो क्या इसमें SC/ST एक्ट जैसे अत्यंत कठोर कानून का प्रयोग आवश्यक था? पुलिस ‘कानूनी बाध्यता’ की बात कर रही है, लेकिन यह बाध्यता चयनात्मक क्यों दिखती है?
यदि इसी तरह का हमला किसी ओबीसी या कथित सवर्ण जातियों पर होता या यदि ब्राह्मण टोले पर पासवानों के समूह ने हमला किया होता तो क्या तब भी इतने ही सख्त कानूनों में कार्रवाई होती?
उत्तर स्पष्ट है- नहीं। यही ‘नहीं’ बताता है कि संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और न्याय इस व्यवस्था में मिसिंग है।
जब कानून शाश्वत पीड़ित और शाश्वत शोषक तय कर दे
भारत का संविधान सामाजिक न्याय की भावना से जन्मा है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम भी उसी उद्देश्य से बना। उद्देश्य था- सदियों के उत्पीड़न से गुजरे समाज को सुरक्षा प्रदान करना।
लेकिन हरिनगर जैसे मामले बताते हैं कि यह कानून संरक्षण का नहीं, दुरुपयोग का औजार बन चुका है। यह ऐसा सत्य है जिसे अदालतें जानती हैं। पुलिस जानती है। आम नागरिक जानता है। तो क्या कानून बनाने वाले इससे अनजान हैं? नहीं। वे जानते हैं। लेकिन राजनीतिक नफा-नुकसान के कारण मौन हैं।
ध्यान रहे मौन रहने वाली राजनीति न तो मजबूत होती है, न न्यायपूर्ण।
कानून की सबसे बड़ी विशेषता ही सबसे बड़ी समस्या
SC/ST एक्ट की मूल विशेषताएँ हैं;
तुरंत गिरफ्तारी
जमानत पर कठोर रोक
शिकायत को प्रथम दृष्टया सत्य मानना
ये सब पीड़ित की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे। लेकिन व्यवहार में यह कानून व्यक्तिगत रंजिश, भूमि विवाद, नौकरी या ठेके की लड़ाई, राजनीतिक प्रतिशोध का हथियार बन चुका है।
बरी होना भी जीवन नहीं लौटा पाता
इस कानून का दुरुपयोग कोरी कल्पना नहीं है। विष्णु तिवारी को भूमि विवाद में SC/ST एक्ट के तहत फँसाया गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बरी किया, लेकिन 20 साल जेल में बीत चुके थे। माता-पिता, भाई सब चले गए। लेकिन वे अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हो सके।
लाल सिंह पर इसी कानून के तहत गेहूँ पिसाई के पैसों के विवाद को लेकर केस ठोक दिया गया। राजस्थान हाई कोर्ट से यह कलंक हटाने में उन्हें 32 साल लग गए।
इन मामलों पर सवाल उठाने को अक्सर ‘संवेदनहीनता’ या ‘सवर्ण वर्चस्व’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। ऐसा करने वाले यह भूल जाते हैं कि न्याय की बुनियाद सवालों पर ही टिकी होती है।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जब SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई और प्रारंभिक जाँच का सुझाव दिया तो विरोध में एक संगठित दबाव खड़ा किया गया। अदालत को ‘दलित विरोधी’ बताया गया। सरकार को मजबूरन संशोधन कर कोर्ट के निर्देशों को निष्प्रभावी करना पड़ा।
यही खतरनाक पैटर्न आज UGC इक्विटी रूल पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद भी दिखाई दे रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या सामाजिक न्याय तर्क और संतुलन से नहीं, बल्कि राजनीतिक शोर और भावनात्मक ब्लैकमेल से तय होगा?
ऐसा भी नहीं है कि स्ट्रीट पावर से न्याय और संतुलन के प्रयासों को बाधित करने का काम केवल SC/ST एक्ट या UGC इक्विटी रूल तक ही सीमित है। कृषि कानूनों के मामले में भी हम ऐसा ही देख चुके हैं। किसानों के व्यापक हित के इस कानून को केवल इस कारण से वापस लेना पड़ा, क्योंकि कुछ समूह तमाम प्रयासों के बावजूद सड़क से हटने को तैयार नहीं थे। आंतरिक सुरक्षा की स्थिति को देखते हुए मजबूत सरकारों को भी कई बार लचीला रवैया अपनाना पड़ता है। ऐसे में यह समाज का भी दायित्व है कि वह न्याय और संतुलन लाने के प्रयासों में बाधक न बने। इसके पक्ष में उठने वाली आवाजों को एक समूह का विरोधी या सवर्ण मानसिकता बताकर खारिज न करे।
न्याय का अर्थ संतुलन है, पक्षपात नहीं
SC/ST एक्ट में सुधार की बात करने वाले भी मानते हैं कि भेदभाव एक कटु सत्य है। वे भी मानते हैं कि इससे बचाने के लिए कठोर कानून आवश्यक हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भेदभाव का कारण केवल जाति ही नहीं है। आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक हैसियत भी कारक हैं। हर शिकायत सच्ची नहीं होती। हर आरोपित अपराधी नहीं होता।
यदि कानून निर्दोष को भी अपराधी की तरह ट्रीट करे, तो वह सामाजिक न्याय नहीं, कानूनी आतंक बन जाता है।
समाधान क्या है?
यह लेख SC/ST एक्ट को खत्म करने की माँग नहीं करता। लेकिन यह जरूर कहता है कि झूठी शिकायतों पर सख्त कार्रवाई हो। प्रारंभिक जाँच का प्रावधान लौटे। पुलिस को विवेकाधिकार मिले। यह सुनिश्चित किया जाए कि सामाजिक न्याय के लिए लाया गया कानून राजनीतिक हथियार न बने।
भारतीय परंपरा में न्याय को धर्म कहा गया है। न्याय अंधा नहीं, विवेकशील होता है। यदि कानून विवेक खो दे, तो वह धर्म नहीं, दंड बन जाता है।
अंतिम बात
यदि पासवान टोले पर ब्राह्मणों के हमले पर SC/ST एक्ट लगेगा, तो उससे पहले ब्राह्मण पर पासवानों के हमले पर भी उतना ही कठोर कानून लगना चाहिए था। यही समानता है। यही न्याय है।
यदि हम ऐसा समाज चाहते हैं जहाँ पीड़ित को न्याय मिले और निर्दोष को बिना दोषी ठहराए जीने का अधिकार तो SC/ST एक्ट पर सवाल उठाना अपराध नहीं, हमारी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।
ध्यान रहे न्याय का उद्देश्य बदला नहीं, संतुलन होता है। जो कानून निर्दोष को भी अपराधी बना दे, वह सामाजिक न्याय नहीं, कानूनी आतंक होता है।
छत्तीसगढ़ का बस्तर कभी वामपंथी आतंकवाद के लिए कुख्यात रहा है। आज यहाँ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की आवाज गूँज रही है और सुनने वालों में पूर्व नक्सली भी हैं। ‘बस्तर पंडुम’ के जरिए माँ दंतेश्वरी की इस पुण्यभूमि की समृद्ध जनजातीय संस्कृति-विरासत का संरक्षण एवं संवर्धन किया जा रहा है। बस्तर में इस बदलाव को ‘डबल इंजन’ सरकार ने मुमकिन किया है।
राष्ट्रपति ने शनिवार (7 फरवरी 2026) को छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में जनजातीय संस्कृति और परंपराओं के सबसे बड़े उत्सव ‘बस्तर पंडुम’ का आज जगदलपुर में उद्घाटन किया। समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि बस्तर के लोग जीवन को उत्सव की तरह जीते हैं और यह महोत्सव दुनिया को बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति की झलक देता है। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और अन्य मंत्री मौजूद रहे।
राष्ट्रपति ने किया भव्य प्रदर्शनी का अवलोकन
मुर्मु ने इस दौरान बस्तर की माटी की सुगंध और आदिम जनजातीय परंपराओं पर आधारित भव्य प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस दौरान वे कई स्टॉलों पर पहुँची और वहाँ मौजूद स्थानीय निवासियों और कारीगरों से कलाओं-उत्पादों के बारे में जानकारी ली। राष्ट्रपति ने ढोकरा हस्तशिल्प कला, टेराकोटा, वुड कार्विंग, सीसल कला, बाँस कला, लौह शिल्प, जनजातीय वेश-भूषा व आभूषण, तुम्बा कला, बस्तर की जनजातीय चित्रकला, स्थानीय व्यंजन और लोक चित्रों पर आधारित स्टॉल्स को देखा।
प्रदर्शनी का अवलोकन करतीं राष्ट्रपति मुर्मू
प्रदर्शनी में बस्तर की जनजातीय कला और संस्कृति की जीवंत झलक
बस्तर पंडुम के आयोजन स्थल पर लगी जनजातीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी में आदिवासी कला और संस्कृति की खूबसूरत झलक देखने को मिली। यहाँ अलग-अलग तरह की पारंपरिक कलाओं को बहुत ही सहज और आकर्षक तरीके से प्रस्तुत किया गया था।
सबसे खास आकर्षण ढोकरा कला से बनी धातु की वस्तुएँ रहीं। इस कला में एक खास तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें पहले मोम से आकृति बनाई जाती है और फिर धातु से उसे आकार दिया जाता है। ढोकरा कला भारत की बहुत पुरानी जनजातीय परंपरा है, जिसमें प्रकृति, देवी-देवताओं और गाँव के जीवन से जुड़े दृश्य साफ दिखाई देते हैं। ढोकरा की हर वस्तु पूरी तरह हाथ से बनाई जाती है। इसे बनाने में मिट्टी, मोम, तार, पीतल और भट्टी जैसी चीजों का इस्तेमाल होता है।
प्रदर्शनी में मिट्टी से बनी टेराकोटा मूर्तियाँ भी दिखाई गईं। ये मूर्तियाँ लोक आस्था, गाँव के जीवन और पुराने विश्वासों को जीवंत रूप में दिखाती हैं। इन्हें देखकर लगता है जैसे गाँव की संस्कृति सामने आ गई हो। लकड़ी की नक्काशी की कला भी लोगों का ध्यान खींच रही थी। सागौन, साल और दूसरी लकड़ियों से बनी मूर्तियों और आकृतियों में कारीगरों की मेहनत और कल्पना साफ नजर आई। पारंपरिक औजारों से बनाई गई ये कलाकृतियाँ सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को सुंदर तरीके से दर्शाती हैं।
प्रदर्शनी का अवलोकन करतीं राष्ट्रपति मुर्मू
इसके अलावा सीसल और जूट से बने कपड़े और हस्तशिल्प भी प्रदर्शनी का हिस्सा थे। ये वस्तुएँ देखने में सुंदर होने के साथ-साथ उपयोगी भी हैं। एक स्टॉल में बाँस से बनी रोजमर्रा की चीजें और सजावटी वस्तुएँ रखी गई थीं, जो आदिवासी जीवन की सरलता को दिखाती हैं।
वहीं, लोहे से बनी कलाकृतियां भी लोगों को खास तौर पर आकर्षित कर रही थीं। जनजातीय आभूषणों का स्टॉल भी बेहद खास था। यहाँ चाँदी, मोती, शंख और अलग-अलग धातुओं से हाथ से बने गहने प्रदर्शित किए गए थे। कुल मिलाकर यह प्रदर्शनी सिर्फ कला का प्रदर्शन नहीं थी बल्कि जनजातीय जीवन, सोच और संस्कृति को करीब से समझने का अवसर थी।
बस्तर पंडुम में क्या है खास?
‘पंडुम’ शब्द का अर्थ उत्सव होता है लेकिन बस्तर पंडुम केवल उत्सव भर नहीं है। यह बस्तर की सांस्कृतिक आत्मा, जनजातीय चेतना और सामूहिक जीवन परंपरा का जीवंत प्रतीक बन चुका है। यह आयोजन आज सिर्फ सांस्कृतिक मंच नहीं रहा बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जनजातीय विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने का एक मजबूत माध्यम बनकर उभरा है।
बस्तर पंडुम के तहत सोमवार (9 फरवरी 2026) तक संभाग स्तरीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएँगी, जिनमें 84 टीमों के 700 से अधिक कलाकार भाग ले रहे हैं। महोत्सव में आदिवासी नृत्य, लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा, हस्तशिल्प, जनजातीय खान-पान और स्वदेशी वाद्य यंत्रों का प्रदर्शन किया जा रहा है।
इस वर्ष ‘बस्तर पंडुम’ का आयोजन तीन चरणों में किया जा रहा है- पहला ग्राम पंचायत स्तर पर, दूसरा विकासखंड एवं जिला स्तर पर और तीसरा संभाग तथा राज्य स्तर पर होने वाले भव्य समापन समारोह के रूप में। इन तीनों चरणों के माध्यम से बस्तर संभाग के दूर-दराज और सुदूर अंचलों में रहने वाले आदिवासी कलाकारों, शिल्पकारों, लोक गायकों और नृत्य दलों को अपनी कला और प्रतिभा प्रदर्शित करने का व्यापक मंच मिलेगा।
बस्तर पंडुम के मंच पर माड़िया, मुरिया, गोंड, हल्बा, भतरा सहित विभिन्न जनजातियों के पारंपरिक लोकनृत्य प्रस्तुत किए जाएँगे, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता और जीवंत परंपराओं को दर्शाएँगे। वहीं, मांदर, ढोल, तिरिया और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज पूरे वातावरण को उत्सव और उल्लास के रंगों से भर देगी, जिससे बस्तर की सांस्कृतिक आत्मा सजीव होकर सामने आएगी।
राष्ट्रपति ने ‘बस्तर पंडुम’ के लिए छत्तीसगढ़ सरकार को सराहा
‘बस्तर पंडुम’ महोत्सव को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि उन्हें छत्तीसगढ़ आना, अपने घर आने जैसा लगता है। उन्होंने कहा, “बस्तर की सुंदरता को देखकर लगता है कि माँ दंतेश्वरी ने स्वयं इसे अपने हाथों से सजाया है।” राष्ट्रपति ने छत्तीसगढ़ सरकार की तारीफ करते हुए कहा, “इस वर्ष के पंडुम में पचास हजार से अधिक लोगों द्वारा जनजातीय संस्कृति तथा जीवन-शैली से जुड़े अनेक प्रदर्शन किए जाएँगे। बस्तर की जनजातीय संस्कृति से देशवासियों को अवगत कराने के इस महत्वपूर्ण प्रयास के लिए मैं छत्तीसगढ़ सरकार की सराहना करती हूं।”
बस्तर में विकास का नया सूर्योदय: मुर्मू
राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन के दौरान माओवाद से मुख्य धारा में लौट रहे बस्तर की सुंदरता की तारीफ की और कहा कि यहाँ विकास का नया सूर्योदय हो रहा है। उन्होंने कहा, “माओवाद के कारण यहाँ के निवासियों ने अनेक कष्ट झेले। सबसे ज्यादा नुकसान यहाँ के युवाओं, आदिवासियों और दलित भाई-बहनों को हुआ। भारत सरकार की माओवादी आतंक पर निर्णायक कार्रवाई के परिणामस्वरूप वर्षों से व्याप्त असुरक्षा, भय और अविश्वास का वातावरण अब समाप्त हो रहा है। माओवाद से जुड़े लोग हिंसा का रास्ता छोड़ रहे हैं जिससे नागरिकों के जीवन में शांति लौट रही है।”
उन्होंने कहा, “बड़ी संख्या में नक्सलियों ने हथियार छोड़े हैं। सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि जो लोग हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटे हैं, वो सामान्य जीवन जी सकें। उनके लिए अनेक विकास और कल्याणकारी योजनाएँ चलाई जा रही हैं। राज्य सरकार की ‘नियद नेल्लानार योजना’ ग्रामीणों के सशक्तीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सरकार के प्रयास और इस क्षेत्र के लोगों के सहयोग के बल पर आज बस्तर में विकास का नया सूर्योदय हो रहा है। गाँव-गाँव में बिजली, सड़क, पानी की सुविधा उपलब्ध हो रही है। वर्षों से बंद विद्यालय फिर से खुल रहे हैं और बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।”
राष्ट्रपति ने नक्सलवाद छोड़ मुख्यधारा में लौटे लोगों से देश के संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखने की अपील करते हुए कहा, “यह लोकतंत्र की ताकत ही है कि ओडिशा के एक छोटे से गाँव की यह बेटी, भारत की राष्ट्रपति के रूप में आपको संबोधित कर रही है।” उन्होंने कहा कि गरीब, वंचित और पिछड़े वर्गों का कल्याण करना सरकार की विशेष प्राथमिकता है। पीएम जनमन योजना और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सबसे पिछड़ी जनजातियों के गाँवों को विकास से जोड़ा जा रहा है।
सरेंडर कर चुके नक्सली भी पहुँचे राष्ट्रपति को सुनने
यहाँ बस्तर पंडुम कार्यक्रम में राष्ट्रपति के संबोधन को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुँचे, जिनमें सरेंडर कर चुके पूर्व नक्सली भी शामिल थे। कार्यक्रम स्थल पर मौजूद कुछ पूर्व नक्सलियों ने बताया कि वे राष्ट्रपति के विचारों को सुनने और भविष्य को लेकर उनके संदेश को समझने के उद्देश्य से यहाँ आए थे।
छत्तीसगढ़ में कभी करोड़ों रुपए के इनामी रहे सरेंडर नक्सली रूपेश ने कहा कि वे देश और समाज के भविष्य से जुड़े विचारों को जानना चाहते थे, इसलिए राष्ट्रपति का संबोधन सुनने पहुंचे।
2 दिवसीय ‘बस्तर पंडुम’ उत्सव में जनजातीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं का रंगारंग प्रदर्शन जारी है। विभिन्न जनजातियों द्वारा पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, वाद्ययंत्र, वेशभूषा और रीति-रिवाजों की मनमोहक प्रस्तुतियाँ दी जा रही हैं, जिसने पूरे आयोजन को सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया है।
CM विष्णुदेव साय ने क्या कहा?
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि ‘बस्तर पंडुम’ केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और समृद्ध विरासत को समर्पित एक व्यापक मंच है। उन्होंने बताया कि इस बार बस्तर पंडुम के तहत 12 विभिन्न विधाओं में 54000 से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीयन कराया, जो इस आयोजन की बढ़ती लोकप्रियता और जनभागीदारी को दर्शाता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जो बस्तर कभी नक्सल भय के लिए जाना जाता था, आज वहाँ विकास की नई तस्वीर उभर रही है। सरकार ने 31 मार्च 2026 तक पूरे बस्तर को नक्सलमुक्त करने का लक्ष्य तय किया है। उन्होंने यह भी कहा कि कई गांवों में पहली बार तिरंगा फहराया गया है, जो क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और विकास के नए दौर की शुरुआत का प्रतीक है।
भारत और अमेरिका के बीच फरवरी 2026 में जिस अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Agreement के ढाँचे पर सहमति बनी है, उसे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में एक बड़ा और निर्णायक कदम माना जा रहा है। यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता, सप्लाई चेन संकट और भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रही है।
भारत और अमेरिका, दोनों ही देश इस बात को समझते हैं कि आने वाले समय में व्यापार केवल मुनाफे का साधन नहीं रहेगा, बल्कि भरोसेमंद साझेदारी, तकनीकी सहयोग और रोजगार सृजन का मजबूत आधार बनेगा।
यही वजह है कि इस अंतरिम ट्रेड डील को जल्दबाजी में किया गया फैसला नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया एक संतुलित ढाँचा कहा जा रहा है।
इस समझौते की सबसे खास बात यह है कि जहाँ एक ओर भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का विशाल बाजार खुलने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर भारत ने अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण आजीविका से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा है।
पीएम मोदी ने बताया दोनों देशों के लिए अच्छी खबर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (7 फरवरी 2026) को X पर एक पोस्ट में इसे भारत-अमेरिका के लिए बहुत अच्छी खबर बताया है। PM मोदी ने कहा, “दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) के लिए एक ढाँचा तय हुआ है। मैं राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत बनाने में व्यक्तिगत रुचि दिखाई।”
Great news for India and USA!
We have agreed on a framework for an Interim Trade Agreement between our two great nations. I thank President Trump for his personal commitment to robust ties between our countries.
उन्होंने लिखा, “यह ढाँचा हमारे साझेदारी संबंधों में बढ़ती गहराई, भरोसे और ऊर्जा को दिखाता है। इससे ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती मिलेगी और भारत के मेहनती किसानों, उद्यमियों, MSMEs, स्टार्टअप इनोवेटर्स, मछुआरों और अन्य लोगों के लिए नए अवसर खुलेंगे। इससे महिलाओं और युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे। भारत और अमेरिका दोनों नवाचार (Innovation) को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह ढाँचा निवेश और तकनीकी सहयोग को और मजबूत करेगा।”
वहीं केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बताया है कि इससे भारतीय निर्यातकों के लिए 30 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी बाजार के दरवाजे खुलेंगे। उन्होंने कहा, “इसका सबसे ज्यादा फायदा छोटे उद्योगों (MSMEs), किसानों और मछुआरों को होगा। निर्यात बढ़ने से महिलाओं और युवाओं के लिए लाखों नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।”
अंतरिम ट्रेड डील का मतलब क्या है और यह क्यों जरूरी थी?
अंतरिम ट्रेड डील का सीधा मतलब है कि यह कोई अंतिम या पूर्ण व्यापार समझौता नहीं है, बल्कि भारत और अमेरिका के बीच होने वाले बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement- BTA) की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है।
फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने BTA की औपचारिक शुरुआत की थी, लेकिन ऐसे व्यापक समझौतों को अंतिम रूप देने में आमतौर पर कई साल लग जाते हैं। इसी देरी को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों ने तय किया कि पहले एक ऐसा ढाँचा बनाया जाए, जिससे व्यापारिक रिश्तों को तुरंत गति मिल सके।
इस अंतरिम ढाँचे के जरिए दोनों देशों ने बाजार तक पहुँच बढ़ाने, टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने और सप्लाई चेन को ज्यादा मजबूत व भरोसेमंद बनाने पर सहमति जताई है।
यह समझौता इस बात का भी संकेत देता है कि भारत और अमेरिका लंबे समय तक आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और वे वैश्विक व्यापार में एक-दूसरे को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं।
अमेरिका का बाजार खुला: भारत को व्यापार और निर्यात में क्या मिला?
इस समझौते से भारत को जो सबसे बड़ा फायदा मिलने वाला है, वह है अमेरिका के 30 ट्रिलियन डॉलर के विशाल बाजार तक बेहतर और आसान पहुँच। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, इससे भारतीय निर्यातकों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा होंगे।
खास बात यह है कि अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगने वाले रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18% करने पर सहमति जताई है, जिससे भारतीय सामान वहाँ पहले के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकेगा। कपड़ा और परिधान, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर उत्पाद, ऑर्गेनिक केमिकल्स, होम डेकोर, हस्तशिल्प और कुछ चुनिंदा मशीनरी जैसे सेक्टरों को इस फैसले से सीधा फायदा मिलेगा।
The India-US Trade Deal will not only provide greater access to the US market for Indian products but also support our labour intensive sectors. Additionally, it will give a big boost to our digital infrastructure.#IndiaUSJointStatementpic.twitter.com/AAUB8x9MGM
ये वही क्षेत्र हैं, जिनमें भारत में बड़ी संख्या में छोटे उद्योग, कारीगर और श्रमिक काम करते हैं। इसके अलावा जेनेरिक दवाओं, रत्न और आभूषण, हीरे और विमान के पुर्जों जैसे उत्पादों पर अमेरिका ने टैरिफ पूरी तरह खत्म करने का फैसला किया है, जिससे भारत की निर्यात क्षमता और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई मजबूती मिलेगी।
इसके अलावा दोनों दोनों देश टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स, जिसमें ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) और डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले दूसरे इक्विपमेंट शामिल हैं, इनमें ट्रेड बढ़ाने और उभरते टेक्नोलॉजी सेक्टर में जॉइंट कोऑपरेशन को बढ़ाने पर भी सहमत हुए हैं।
किन सेक्टरों में रोजगार और MSMEs को होगा सबसे ज्यादा फायदा?
यह अंतरिम ट्रेड डील केवल बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए नहीं, बल्कि छोटे उद्योगों के लिए भी अहम मानी जा रही है। कपड़ा, परिधान, चमड़ा, हस्तशिल्प और होम डेकोर जैसे क्षेत्रों में MSMEs की बड़ी भागीदारी है। अमेरिकी बाजार में इन उत्पादों की माँग पहले से मौजूद है और अब टैरिफ कम होने से भारतीय उत्पाद वहां और तेजी से पहुंच सकेंगे।
सरकार का दावा है कि निर्यात बढ़ने से उत्पादन बढ़ेगा और इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा। महिलाओं और युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ श्रम की जरूरत ज्यादा होती है। मछुआरों और फिशरी सेक्टर को भी अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुँच मिलने की उम्मीद है, जिससे तटीय इलाकों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी।
अनाज, मसाले और सब्जियाँ: किसानों को कैसे मिला पूरा संरक्षण?
इस समझौते का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पहलू कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। यही वजह है कि गेहूँ, चावल, मक्का और सोयाबीन जैसे प्रमुख अनाजों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।
(फोटो साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
इसका मतलब यह है कि अमेरिकी अनाज भारतीय बाजार में सस्ते दामों पर नहीं आ सकेंगे और घरेलू किसानों को कीमतों में गिरावट का डर नहीं रहेगा।
गौरतलब है कि इस ट्रेड डील को लेकर विपक्ष ने भी अफवाहें फैला कर किसानों और छोटे उद्यमियों के भड़काने की कम कोशिश नहीं की थी। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे केंद्र सरकार को भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के खिलाफ किसानों के बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की भी चेतावनी दी थी।
उस दौरान भी केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयान का हवाला देते हुए खरगे के तमाम आरोपों का खंडन करते हुए बताया था कि यह समझौता समाज के सभी वर्गों को लाभ पहुँचाएगा। भाषण में खरगे ने कहा था कि व्यापार समझौता किसानों को बर्बाद कर देगा।
इसी तरह कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था, “मोदी सरकार ने अमेरिका के सभी कृषि उत्पादों पर जीरो शुल्क लगाने का जो निर्णय किया है उससे एक बात साफ है कि अमेरिका से आने वाला कपास, गेहूँ, सब्जियाँ और दूसरे कृषि उत्पाद भारतीय किसानों की फसलों पर संकट होगा।”
जबकि आँकड़े साफ कहते हैं कि यह समझौता सिर्फ किसानों के हितों को ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र के तमाम कारीगरों को भी पूरी तरह से ध्यान में रखकर लिया गया है। मसालों के मामले में भी भारत ने पूरी सख्ती दिखाई है। काली मिर्च, लौंग, सूखी हरी मिर्च, दालचीनी, धनिया, जीरा, हींग, अदरक, हल्दी, अजवाइन, मेथी, चक्रफूल, कसिया, सरसों, राई और अन्य पाउडर मसालों को पूरा संरक्षण दिया गया है।
(फोटो साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
भारत की पहचान ही मसालों से जुड़ी हुई है और इनसे लाखों किसानों की रोजी-रोटी चलती है। इस समझौते में यह सुनिश्चित किया गया है कि अमेरिकी मसाले या उनके विकल्प भारतीय बाजार में आकर घरेलू उत्पादन को नुकसान न पहुँचा सकें।
सब्जियों के मामले में भी आलू, मटर, बीन्स और अन्य दलहनी सब्जियों के साथ-साथ फ्रोजन, डिब्बाबंद और अस्थायी रूप से संरक्षित सब्जियों पर कड़ा नियंत्रण रखा गया है, ताकि सब्जियों के मामले में भी भारतीय किसानों की आमदनी सुरक्षित रहे।
(फोटो साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
डेयरी सेक्टर क्यों रहा सरकार की ‘रेड लाइन’?
डेयरी सेक्टर को लेकर भारत ने इस समझौते में सबसे कड़ा रुख अपनाया है। दूध, क्रीम, बटर, घी, चीज, योगर्ट, बटर मिल्क, व्हे प्रोडक्ट्स और अन्य डेयरी उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। अमेरिका जैसे देश की बड़ी डेयरी कंपनियों को भारतीय बाजार में सीधी एंट्री नहीं दी गई है।
(फोटो साभार:एक्स @ Piyushgoyal)
इसका सीधा फायदा भारत के करोड़ों छोटे पशुपालकों को मिलेगा, जिनकी आजीविका दूध उत्पादन पर निर्भर है। भारत का डेयरी सेक्टर सहकारी मॉडल पर आधारित है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इस समझौते ने यह सुनिश्चित किया है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के नाम पर इस सेक्टर को कमजोर न किया जाए।
मेक इन इंडिया, तकनीक और भविष्य की साझेदारी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को भारत और अमेरिका दोनों के लिए अच्छी खबर बताते हुए कहा है कि यह ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती देगा और निवेश और तकनीकी सहयोग को बढ़ाएगा। दोनों देश इनोवेशन, डेटा सेंटर्स, जीपीयू, ऊर्जा और उन्नत तकनीकी उत्पादों के क्षेत्र में मिलकर काम करने पर सहमत हुए हैं।
भारत ने अगले पाँच साल में अमेरिका से बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पाद, विमान और तकनीक खरीदने का इरादा भी जताया है, जिससे व्यापार संतुलन बना रहेगा और सप्लाई चेन मजबूत होगी। भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील का यह ढाँचा केवल व्यापार बढ़ाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक संतुलित समझौता है, जिसमें भारत ने अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।
एक तरफ जहाँ भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का विशाल बाजार खुल रहा है, वहीं दूसरी तरफ संवेदनशील कृषि और खाद्य उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। यही संतुलन इस समझौते को खास बनाता है और यही कारण है कि इसे भारत के दीर्घकालिक आर्थिक हितों के लिए एक मजबूत कदम माना जा रहा है।
भारत और मलेशिया के रिश्तों को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (7 फरवरी 2026) को दो दिवसीय दौरे पर कुआलालंपुर पहुँचेंगे। यह PM मोदी की करीब 8 साल बाद मलेशिया की यात्रा है और इस दौरान व्यापार और अर्थव्यवस्थ से लेकर तकनीक, ऊर्जा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में समझौते होने की उम्मीद है। चर्चा है कि इस यात्रा के दौरान मलेशिया में रह रहे भगौड़े इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक को लेकर भी दोनों देशों के बीच चर्चा हो सकती है।
PM मोदी के इस दौरे से पहले जाकिर नाइक का शागिर्द और हिंदू विरोधी इस्लामी कट्टरंपथी मोहम्मद जमरी विनोद बिलबिला रहा है। मोहम्मद जमरी ने आज (7 फरवरी) रात 8 बजे कुआलालंपुर के सोगो इलाके में ‘मंदिरों’ के खिलाफ रैली करने की चेतावनी दी है। इन मंदिरों को जमरी अवैध बताता है। जमरी ने फेसबुक पोस्ट के जरिए अपने समर्थकों को खुला आह्वान करते हुए कहा, “सरकार के प्रचार और चालों में मत आओ। हम घुसपैठियों के खिलाफ लड़ेंगे।” हर कट्टरपंथी की तरह इस कट्टरपंथी जमरी का भी दावा है कि यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण होगा।
PM मोदी का दौरा और प्रदर्शन
यह रैली में करीब 141 गैर-सरकारी संगठनों के शामिल होने का दावा किया जा रहा है। इसका मकसद सरकार पर दबाव डालना है ताकि वह कथित तौर पर अवैध बताए जा रहे इन धार्मिक स्थलों के खिलाफ कार्रवाई करे।
यह बयान ऐसे समय आया है, जब मलेशिया के गृह मंत्रालय ने घोषणा की थी कि पुलिस प्रदर्शन के आयोजकों से मुलाकात कर उन्हें रैली रद्द करने के लिए मनाने की कोशिश करेगी। मंत्रालय ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मलेशिया दौरे के कारण स्थिति संवेदनशील है।
गृह मंत्रालय ने जनता से अपील की है, “PM मोदी के दौरे की अवधि के दौरान किसी भी सार्वजनिक सभा या प्रदर्शन में हिस्सा न लें।” सरकार को आशंका है कि इस तरह की रैली देश की सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द को खतरे में डाल सकती है।
मलेशिया सरकार के प्रवक्ता फहमी फजिल ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम किसी भी कीमत पर राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे, खासकर ऐसे समय में जब एक महत्वपूर्ण विदेशी नेता (PM मोदी) मलेशिया के दौरे पर आ रहे हैं।
कौन है जाकिर नाइक का कट्टरपंथी शागिर्द जमरी?
जमरी खुद कन्वर्टेड मुस्लिम है और उसकी जड़े तमिल संस्कृति से जुड़ी रही है। 41 वर्षीय जमरी मलेशियाई तमिल मूल का है और उसका जन्म मूल रूप से एक हिंदू परिवार में हुआ था। पहले उसका नाम विनोथ कालिमुथु था। हालाँकि, इस्लाम अपनाने के बाद वो कट्टरपंथी बन गया और तब से ही हिंदू धर्म के खिलाफ जहरीले बयान दे रहा है।
जाकिर नाइक का शागिर्द और कट्टर समर्थक जमरी हिंदू समुदाय के साथ विवाद में उलझा हुआ है। वह उन कट्टरपंथी मुस्लिम समूहों के साथ खड़ा है, जो दावा करते हैं कि मलेशिया में कई हिंदू मंदिर और धार्मिक स्थल ‘अवैध भूमि’ पर बने हुए हैं।
कुछ दिनों पहले Thaipusam पर्व के अवसर पर 31 जनवरी रात 12 बजे से 2 फरवरी सुबह 3 बजे तक मुफ्त फेरी सेवा की घोषणा के बाद भी उसने हिंदू धर्म को लेकिन विवादित टिप्पणियाँ की थीं। इसके बाद डेमोक्रेटिक एक्शन पार्टी सोशलिस्ट यूथ (DAPSY) के सेपुतेह अध्यक्ष डिक्कैम लूर्डेस ने उसे आड़े हाथों लिया था। डिक्कैम लूर्डेस ने कहा था, “तुम्हारा इस्लाम में धर्मांतरण तुम्हारा निजी फैसला हो सकता है लेकिन उस धर्मांतरण को हिंदू त्योहारों का मजाक उड़ाने और हिंदू आस्था का अपमान करने का लाइसेंस समझना घिनौना है।”
अक्सर हिंदुओं के खिलाफ भड़काऊ बयान देने वाले जमरी के खिलाफ 890 से अधिक पुलिस शिकायतें दर्ज हैं। डेमोक्रेटिक एक्शन पार्टी (DAP) के सांसद आरएसएन रायर ने गृह मंत्री सैफुद्दीन नास्यूशन इस्माइल से इस मामले में कुछ दिनों पहले जवाब देने को भी कहा था। रायर ने दावा किया कि आदतन अपराधी के खिलाफ अब तक 890 से ज्यादा पुलिस शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं लेकिन इसके बावजूद उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने पूछा, “जब उसके बयान बार-बार समाज में तनाव पैदा कर रहे हैं, तो अब तक उस पर मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया?”
पिछले साल मार्च 2025 में जमरी को फेसबुक पर मंदिर से जुड़ी एक पोस्ट के कारण गिरफ्तार किया गया था। यह पोस्ट कुआलालंपुर में एक मंदिर को हटाकर उसकी जगह मस्जिद बनाने से जुड़ी हुई थी। उसी महीने की शुरुआत में जमरी ने फेसबुक पर हिंदू श्रद्धालुओं के कवाड़ी अनुष्ठान को लेकर विवादित टिप्पणी की थी।
जमरी ने फेसबुक पोस्ट में कहा था कि कवाड़ी अनुष्ठान करने वाले हिंदू भक्त ‘वेल वेल’ कहते हुए ऐसे दिखाई देते हैं, जैसे वे किसी नशे में हों या उन पर किसी तरह का असर हो गया हो। इसे अलावा उसने टिकटॉक पर वीडियो बनाकर भगवान शिव का भी अपमान किया था।
इससे पहले 2019 में भी मोहम्मद जमरी को पुलिस ने हिंदुओं के खिलाफ विवादित टिप्पणी करने के मामले में गिरफ्तार किया था। उसने अपने भाषण के दौरान हिंदू धर्म को लेकर आपत्तिजनक शब्द कहे थे जिससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ने का खतरा बन गया था। पुलिस के मुताबिक, सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए 70 सेकंड के वीडियो में जमरी ने हिंदू धर्म के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक बयान दिए थे। इस मामले में उसके खिलाफ कई शिकायतें दर्ज की गईं।
जाकिर के लिए मलेशियाई नागरिकता छोड़ने को था तैयार
जाकिर का यह शार्गिद इस्लामी कट्टरपंथी के पीछे इस हद तक पागल था कि उसने मलेशियाई नागरिकता तक छोड़ने की बात कह दी थी। जमरी ने कहा था कि अगर जाकिर नाइक को भारत प्रत्यर्पित (सौंपा) किया जाता है, तो वह अपनी मलेशियाई नागरिकता छोड़ने के लिए तैयार है। उसने कहा था, “अगर सरकार ज़ाकिर नाइक को वापस भेजना चाहती है या उसका प्रत्यर्पण करती है, तो मैं बिना किसी हिचकिचाहट के अपना पहचान पत्र (आईसी) सौंप दूँगा।” अब जब एक बार फिर जाकिर नाइक को लेकर चर्चा होने की संभावना है तो यह कट्टरपंथी बिलबिला रहा है।
जाकिर नाइक के समर्थन में नागरिकता छोड़ने तक की घोषणा करने वाला जमरी दरअसल एक व्यक्ति नहीं बल्कि उस वैचारिक नेटवर्क का प्रतिनिधि है, जो धार्मिक उन्माद के जरिए राजनीतिक दबाव बनाना चाहता है। उसका आक्रोश इस बात का प्रमाण है कि भारत और मलेशिया के रिश्तों में मजबूती कट्टरपंथी ताकतों के लिए असहज होती जा रही है।
हालाँकि, कई सवाल भी हैं। जमरी के खिलाफ 890 से अधिक पुलिस शिकायतें दर्ज हैं, वह पहले भी हिंदू विरोधी बयान और सोशल मीडिया पोस्ट के कारण गिरफ्तार हो चुका है और उसने भगवान शिव से लेकर हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों तक का सार्वजनिक रूप से अपमान किया है। इसके बावजूद उसके खिलाफ निर्णायक कानूनी कार्रवाई का अभाव यह सवाल खड़ा करता है कि क्या कट्टरपंथियों के लिए मलेशिया में कानून अलग है?
नेटफ्लिक्स की आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ नाम को लेकर विवाद तेज हो गया है। आपत्ति इस बात पर है कि फिल्म के टाइटल में ‘पंडत’ शब्द के साथ ‘घूसखोर’ जैसे क्राइम शब्द को जोड़ा गया, जो ब्राह्मण और पंडितों की छवि को बदनाम करने के लिहाज से रखा गया है। यहाँ अभी फिल्म रिलीज भी नहीं हुई, लेकिन टाइटल ने ही खेल कर दिया। बॉलीवुड में ‘जातिवाद’ का वही खेल, जो पहले भी फिल्म और गानों के ऐसे टाइटल देकर किया जा चुका है।
इससे पहले भी बॉलीवुड में जाति और पेशों से जुड़े शब्दों से सामाजिक भेदभाव पैदा करने की साजिश रची गई है। ऐसा ही मामला साल 2007 में माधुरी दीक्षित की फिल्म ‘आजा नचले‘ के साथ भी सामने आया था। फिल्म के टाइटल गीत में ‘बोले मोची भी खुद को सुनार’ पंक्ति जोड़कर मोची और दलित समुदायों के लोगों को नीचा दिखाया गया। विवाद हुआ, यूपी, पंजाब और हरियाणा में फिल्म पर बैन लगा।
विवाद बढ़ा, तो गाने के बोल बदलकर ‘मेरे दर पे दीवानों की बहार है’ कर दिए गए। दुनियाभर में प्रेम का चोला डालकर घूमने वाले ‘यश राज फिल्म’ ने सार्वजनिक तौर पर माफी तक माँगनी पढ़ी। यह सब बस मामला शांत कराने के लिए हुआ।
क्योंकि इसके बाद 2009 में ‘बिल्लू बार्बर‘ आई। यहाँ भी वही विवाद, सीधे फिल्म के नाम पर था। नाई समुदाय ने ‘बार्बर’ शब्द को अपमानजनक तौर पर देखा गया। यहाँ भी फिल्म रिलीज से पहले सबकुछ हुआ। विवाद बढ़ा, तो फिल्म निर्माता शाहरुख खान ने फिल्म के नाम से ‘बार्बर’ शब्द को हटा लिया। यहाँ भी मामला जल्दबाजी में सुलझा लिया गया।
लेकिन साल 2012 में एक और ऐसी फिल्म बनी- शूद्र। इस बार सीधा हमला हुआ। पूरी फिल्म सवर्ण समाज को बाँटने पर आधारित थी, खासकर ब्राह्मण और ठाकुर। फिल्म के ट्रेलर में ही विचलित करने वाले दृश्य थे, जैसे कि मंत्रोच्चारण करने पर एक बच्चे की जीभ काट देना या पैरों में घुंघरू बाँधकर चलना। फिल्म को लेकर कई राज्यों में विरोध हुआ, रिलीज तक रोक दी गई।
लेकिन फिल्म के मेकर्स ने सेंसर बोर्ड की मंजूरी का हवाला देते हुए कुछ नहीं किया। बल्कि जातिवाद फैलाने वाली इस फिल्म के निर्देशक संजीव जायसवाल ने इसमें समाज की गलती निकाली और कहा– जातिवाद समाज में ‘जहर’ है और उनकी फिल्म जातिवाद के खिलाफ आवाज है। मतलब खुद की गलती, पर खुद ही सीनाजोरी। फिल्म आई भी… विवाद भी हुआ, पर नतीजा कुछ नहीं निकला।
विवाद सिर्फ जातिवाद तक नहीं सिमटा। बात धर्म तक भी पहुँची। चाहे वो साल 2017 में ‘फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के गाने में ‘राधा‘ शब्द के साथ ‘सेक्सी’ लगाकर किया गया हो, या इसी तरह साल 2022 में फिल्म ‘पठान’ में दीपिका पादुकोण ‘भगवा रंग’ की बिकीनी में ‘बेशरम रंग’ ही क्यों न गुनगुना रही हो। इन पर भी हल्ला मचा… FIR दर्ज की गईं… ये भी रिलीज से पहले ही चर्चा में बने। लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।
अब यहाँ फिल्मों को लेकर ये पुराने विवाद याद किया जाना जरूरी भी है। क्योंकि ये सभी विवाद आज के दौर की ‘घूसखोर पंडत‘ की ही परछाई है, जो फिल्मों के वही जातिवाद के पैटर्न को झलकाता है। जो लोग इस नाम पर उठे विवाद को अब भी हल्के में ले रहे हैं, उन्हें खासतौर पर समझना होगा कि फिल्मों और गानों में शब्दों के जरिए पहचान को निशाना बनाने का खेल बरसों से चलता आ रहा है।
बात यहाँ सिर्फ ब्राह्मण या पंडित तक सीमित नहीं रही है। यहाँ भोगी दलित समुदाय भी है, जो ऐसे टाइटल और कंटेंट का विरोध कर चुका है, जहाँ जाति और पेशा लिखकर पहचान बनाई जाती है। यही नहीं, फिल्मों में हिंदू देवी-देवताओं, धार्मिक प्रतीकों और सनातन परंपराओं से जुड़े नाम और शब्द चुनकर भी यह खेल खेला गया है।
हर बार फिल्म की कहानी से पहले नाम और शब्द चर्चा में आया और रिलीज से पहले ही विरोध शुरू हुआ। कुछ मामलों में माफी माँग ली गई, तो कुछ मे विवाद को कुछ समय के लिए शांत कराने के लिए टरका दिए गए। लेकिन खेल नहीं रुका, अब इस खेल में ‘घूसखोर पंडत‘ नया नाम है। जहाँ फिल्म आने से पहले ही ‘नाम’ से जातिवाद पर विवाद को तूल मिल गया है।
केंद्र सरकार, नागालैंड सरकार और ईस्टर्न नागालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ENPO) के बीच गुरुवार (5 फरवरी 2026) को नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौता (MoA) हुआ। ENPO राज्य के पूर्वी छह जिलों की आठ प्रमुख नागा जनजातियों का प्रतिनिधित्व करता है।
यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शांतिपूर्ण और समृद्ध पूर्वोत्तर के लक्ष्य की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इस करार पर नागालैंड के मुख्यमंत्री डॉ नेफ्यू रियो और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए गए।
समझौते के तहत फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) की स्थापना का रास्ता साफ हुआ है, जो तुएनसांग, मोन, किफिरे, लॉन्गलेंग, नोकलाक और शामाटोर जिलों को कवर करेगी। इसके माध्यम से 46 विषयों से जुड़े प्रशासनिक अधिकारों का हस्तांतरण किया जाएगा, जिससे क्षेत्रीय विकास और स्वशासन को मजबूती मिलेगी।
फोटो साभार via idsa.in
नई दिल्ली में हुए इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्रालय और नागालैंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, नागालैंड के उपमुख्यमंत्री यंथुंगो पैटन, उनके कैबिनेट सहयोगी और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी मौजूद रहे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस करार को एक ऐतिहासिक समझौता बताते हुए कहा कि इससे पूर्वी नागालैंड के विकास को नई गति मिलेगी और वहाँ के लोगों को नए अवसर और समृद्धि प्राप्त होगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता उत्तर-पूर्व में शांति, प्रगति और पूर्ण विकास के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
This is a historic agreement indeed, which will enhance the development trajectory of Eastern Nagaland in particular. I am sure it will open new avenues of opportunity and prosperity for the people. It reflects our unwavering commitment to peace, progress and inclusive growth in… https://t.co/bKsHl8rWOn
नागालैंड के मुख्यमंत्री ने भी अपनी सरकार, केंद्र और ENPO के बीच हुए ज़रूरी समझौते की खबर शेयर की।
I am happy to announce that today, 5th Feb 2026, the Govt. of Nagaland signed the Memorandum of Agreement (MoA) with the Govt. of India and the Eastern Nagaland Peoples’ Organisation for the formation of the ‘Frontier Nagaland Territorial Authority’ within the State of Nagaland.” pic.twitter.com/xbfVbluj31
नई दिल्ली में हुए इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्रालय और नागालैंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, नागालैंड के उपमुख्यमंत्री यंथुंगो पैटन, उनके कैबिनेट सहयोगी और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी मौजूद रहे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस करार को एक ऐतिहासिक समझौता बताते हुए कहा कि इससे पूर्वी नागालैंड के विकास को नई गति मिलेगी और वहाँ के लोगों को नए अवसर और समृद्धि प्राप्त होगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता उत्तर-पूर्व में शांति, प्रगति और पूर्ण विकास के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
फोटो साभार – Freepik
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि उन्होंने 2021–2022 में ENPO प्रतिनिधियों को भरोसा दिलाया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर-पूर्व में शांति के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और उनकी चिंताओं का समाधान किया जाएगा। उन्होंने ENPO से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भरोसा बनाए रखने और यह विश्वास रखने का आग्रह किया कि उन्हें न्याय और सम्मान अवश्य मिलेगा।
अमित शाह ने विवाद के समाधान पर प्रसन्नता जताई और कहा कि गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने लंबे समय तक ENPO और नागालैंड सरकार के बीच सेतु की भूमिका निभाई, जिससे बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद मिली।
उन्होंने ENPO क्षेत्र के रणनीतिक महत्व पर भी जोर दिया और नागालैंड सरकार, मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, उनके मंत्रिमंडल, राज्य के नागरिकों और नागालैंड के दोनों सांसदों को सफल वार्ता के लिए बधाई दी। शाह ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर पूर्वी नागालैंड के विकास को तेजी से आगे बढ़ाएँगी।
वहीं, मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने इस समझौते को नागा समाज की जीत करार देते हुए कहा, “आज का यह समझौता नागा समाज की जीत है। मुझे उम्मीद है कि सभी वर्गों के बीच आपसी विश्वास और मजबूत होगा। मैं भारत सरकार का धन्यवाद करता हूँ कि उसने इस मुद्दे को निर्णायक निष्कर्ष तक पहुँचाया, और आशा करता हूँ कि भविष्य में भी हमें केंद्र सरकार का सहयोग मिलता रहेगा।”
फोटो साभार -मोकोकचुंग टाइम्स
समझौते के अनुसार, फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) के तहत एक मिनी-सचिवालय स्थापित किया जाएगा, जिसका नेतृत्व अतिरिक्त मुख्य सचिव या प्रधान सचिव करेंगे। इसके तहत विकास से जुड़ा खर्च क्षेत्रफल और जनसंख्या के अनुपात में साझा किया जाएगा। हालाँकि, यह पूरी व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371(A) के प्रावधानों के पूरी तरह अनुरूप रहेगी।
यह विशेष प्रशासनिक ढाँचा पूर्वी नागालैंड के विकास को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया है, जिसका उद्देश्य बेहतर निर्णय-प्रक्रिया, वित्तीय स्वायत्तता, बुनियादी ढाँचे के तेज विकास, आर्थिक सशक्तिकरण और संसाधनों के प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करना है।
गृह सचिव गोविंद मोहन के अनुसार, यह समझौता (MoA) वर्षों से चली आ रही लंबी वार्ता को समाप्त करने में मदद करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि संस्थागत शासन और विकास तंत्र पूर्वी नागालैंड के लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरें।
अलगाव से समावेश तक: मोदी प्रशासन ने लंबे समय से चले आ रहे विवाद को कैसे सुलझाया
स्वतंत्रता के बाद से ही पूर्वी नागा जनजातियों को अलग प्रशासनिक पहचान देने की माँग लगातार उठती रही है। तुएनसांग मोन पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन, जिसे बाद में 2005 में ईस्टर्न नागा पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ENPO) नाम दिया गया, की शुरुआत 1994 में पूर्वी नागा जनजातियों के पिछड़ेपन और उपेक्षा के खिलाफ एक औपचारिक आंदोलन के रूप में हुई थी।
2010 में ENPO ने फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) के गठन का प्रस्ताव रखा, जिसमें किफिरे, लॉन्गलेंग, मोन, नोकलाक, शामाटोर और तुएनसांग जैसे छह पूर्वी जिले शामिल हों। संगठन ने विकास और शासन में असमानता दूर करने के लिए एक अलग राजनीतिक व्यवस्था की माँग की, साथ ही वित्तीय, विधायी और कार्यकारी स्वायत्तता पर जोर दिया। उन्होंने सरकार में पूर्वी नागा जनजातियों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को लेकर भी आपत्ति जताई।
इस मुद्दे को लेकर चुनाव बहिष्कार, हड़तालें, कई दौर की बैठकें, आश्वासन और टकराव होते रहे। कई बार समाधान की दिशा में प्रगति हुई, लेकिन बार-बार अड़चनें भी आईं। इसके बावजूद, मोदी सरकार ने लगातार संवाद जारी रखा और ENPO की माँगों को गंभीरता से सुना, जिससे आखिरकार इस ऐतिहासिक समझौते का रास्ता साफ हुआ।
फोटो साभार – दृष्टि आईएएस
गृह मंत्रालय और ENPO के बीच 2022 में औपचारिक बातचीत की शुरुआत एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा की गई थी, ताकि सहमति पर पहुँचने का प्रयास किया जा सके। हालाँकि, ENPO की अलग राज्य बनाने की लगातार माँग के कारण प्रारंभिक वार्ता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाई। आखिरकार संगठन केंद्र के प्रस्ताव पर सहमत हुआ, जिसके तहत FNTA ढाँचे के तहत अधिक स्वायत्तता वाला क्षेत्रीय प्राधिकरण बनाया जाएगा।
दिसंबर 2024 में आयोजित उद्घाटन बैठक में ENPO ने अस्थायी रूप से मोदी सरकार के FNTA निर्माण योजना को अनुच्छेद 371(A) के तहत स्वीकार किया, जिससे पूर्वी नागाओं को कार्यकारी, विधायी और बजटीय अधिकार सौंपे गए। इसके बाद कई बैठकें हुईं और संगठन ने अपनी माँगों को घटा दिया।
अंततः स्वतंत्र राज्य बनाने की इच्छा को पिछले साल की अंतिम वार्ता में स्थगित किया गया और नागालैंड राज्य के भीतर विशेष स्वायत्त प्रशासनिक इकाई FNTA बनाने का प्रस्ताव मंजूर किया गया। यह दस साल बाद पुनः समीक्षा के लिए निर्धारित है और विवादित मुद्दों को लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सुलझाया जाएगा।
निष्कर्ष
उत्तर-पूर्व भारत भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के शासन में गंभीर उपेक्षा का शिकार रहा है। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने पूरे क्षेत्र को मुख्यधारा से जोड़ने और इसके सबसे दूरदराज इलाकों में विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यापक कदम उठाए हैं, जिससे क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव आए हैं।
इसके अलावा, विरोधी दलों द्वारा उठाए गए मुद्दों के समाधान के लिए कई बार सौहार्दपूर्ण प्रयास किए गए, जिससे लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा, राजनीतिक उथल-पुथल, हिंसा और अशांति कम हुई और क्षेत्र में स्थिरता और बेहतर भविष्य की राह बनी।
सरकार के अटल प्रयासों के कारण ENPO की अलग राज्य की माँग में भारी कमी आई, और उसने अनुच्छेद 371(A) के तहत सीमित स्वायत्तता वाली विशेष प्रशासनिक संरचना (FNTA) को स्वीकार किया। अब, इस क्षेत्र का एक बेहद विवादित इतिहास समाप्त हो गया है और नए सशक्त और आशापूर्ण युग की शुरुआत हुई है, जिसमें लंबे संघर्ष की जगह शांति और विकास ने ले ली है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
अमेरिका के प्रमुख अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने अपने कर्मचारियों की लगभग एक-तिहाई संख्या में कटौती करने का फैसला किया है। यह बड़े पैमाने पर छंटनी बुधवार (4 जनवरी 2026) को घोषित की गई, जो कंपनी के सभी विभागों को प्रभावित करेगी। इस फैसले से अखबार की अंतरराष्ट्रीय और खेल समाचारों की कवरेज में भारी कमी आने की आशंका है।
छंटनी के तहत स्पोर्ट्स सेक्शन को पूरी तरह बंद किया जा रहा है, जबकि कुछ खेल संवाददाताओं को फीचर्स सेक्शन में स्पोर्ट्स कल्चर कवर करने के लिए शिफ्ट किया जाएगा। इसके अलावा बुक्स, मेट्रो सेक्शन और प्रमुख न्यूज पॉडकास्ट ‘Post Reports’ को भी बंद करने की योजना है।
एग्जीक्यूटिव एडिटर मैट मरे ने इस कदम को कंपनी के लिए स्थिरता लाने वाला बताया, लेकिन कर्मचारियों और पत्रकारों ने इसे अखबार के इतिहास के सबसे अंधेरे दिनों में से एक और खून-खराबे जैसा फैसला करार दिया है। गौरतलब है कि वाशिंगटन पोस्ट के मालिक अमेजन के संस्थापक और अरबपति जेफ बेजोस हैं।
मैट मरे ने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और पाठकों तक पहुँचने में आ रही मुश्किलों के कारण यह फैसला लेना जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि कंपनी की ओवरसीज कवरेज भी कम की जाएगी, हालाँकि करीब 12 विदेशी ब्यूरो बनाए रखे जाएँगे, जिनका फोकस राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर होगा।
कर्मचारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने माना कि यह फैसला परेशान करने और चौंकाने वाला है। इससे पहले स्थानीय और विदेशी पत्रकारों ने जेफ बेज़ोस से अपनी नौकरियाँ बचाने की अपील भी की थी, लेकिन उनकी अपील सफल नहीं हो सकी।
वाशिंगटन पोस्ट की इस बड़ी छंटनी का असर भारत में काम करने वाले कर्मचारियों पर भी पड़ा है। 300 से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया, जिनमें कई जाने-माने नाम शामिल हैं। इनमें शशि थरूर के बेटे ईशान थरूर भी शामिल हैं।
इसके अलावा, नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा और यरुशलम ब्यूरो चीफ गैरी शिह (Gerry Shih) को भी हटाया गया है। दोनों पहले से ही अखबार की भारत-विरोधी रिपोर्टिंग और पश्चिमी मीडिया के पक्षपाती रवैये से जुड़े चर्चित चेहरे माने जाते रहे हैं।
छंटनी के बाद कई प्रभावित पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। प्रांशु वर्मा ने लिखा कि उन्हें यह बताते हुए दिल टूट गया है कि उन्हें वाशिंगटन पोस्ट से निकाल दिया गया। उन्होंने अपने चार साल के अनुभव को सम्मान की बात बताया और कहा कि वे अपने कई प्रतिभाशाली साथियों के लिए भी दुखी हैं, जिन्हें भी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।
वाशिंगटन पोस्ट से निकाले जाने के बाद यरुशलम ब्यूरो चीफ गैरी शिह ने अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए कहा कि अखबार के साथ उनका समय उनके लिए एक सम्मान और सौभाग्य जैसा रहा। उन्होंने बताया कि उन्होंने सात साल से अधिक समय तक दुनिया भर की यात्रा की, एक ऐसे अखबार के लिए, जिस पर उन्हें पूरा भरोसा था।
गैरी शिह ने कहा कि उन्हें मिडिल ईस्ट टीम के बाकी सदस्यों के साथ हटा दिया गया है और दिल्ली से लेकर बीजिंग, कीव और लैटिन अमेरिका तक के अधिकांश सहयोगियों की भी नौकरी चली गई है। उन्होंने इस दिन को दुखद बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि यह सफर मजेदार, यादगार और चुनौतीपूर्ण रहा और उनकी टीम ने अपने काम के दौरान खूब असरदार काम किया।
प्रांशु वर्मा से जिन्होंने अपनी नौकरी बचाने के लिए मोदी सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की
वाशिंगटन पोस्ट की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, प्रांशु वर्मा भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और भूटान से जुड़ी खबरों की कवरेज के जिम्मेदार थे। वे 2022 में द पोस्ट से जुड़े थे और इस दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) समेत कई अहम विषयों पर रिपोर्टिंग की। इससे पहले वे बोस्टन ग्लोब में टेक्नोलॉजी पर लिख चुके थे और न्यूयॉर्क टाइम्स में कूटनीति और परिवहन से जुड़ी रिपोर्टिंग कर चुके हैं।
उनका पत्रकारिता करियर फिलाडेल्फिया इन्क्वायरर से शुरू हुआ था, जहाँ उन्होंने न्यू जर्सी की राजनीति और जेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया। वे डेलावेयर विश्वविद्यालय और कोलंबिया विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से डिग्री हासिल कर चुके हैं। इसके बावजूद अब छंटनी की मार उनकी नौकरी पर भी पड़ी।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्मा ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से अपनी नौकरी बचाने की अपील भी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया कि उनका मीडिया संस्थान भारत में उन गिने-चुने प्लेटफॉर्म्स में से है, जो सरकार के डर के बिना अकाउंटेबिलिटी रिपोर्टिंग कर सकता है। हालाँकि, उनकी यह कोशिश काम नहीं आई।
बताया गया है कि वर्मा ने अपनी रिपोर्टिंग में मोदी सरकार के खिलाफ बार-बार आलोचनात्मक रुख अपनाया और कई लेखों में सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी और भारत की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले आरोप लगाए। उन्होंने गर्व के साथ उन रिपोर्ट्स का जिक्र किया, जिनमें भारतीय अरबपतियों को विशेष लाभ मिलने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में क्रोनी कैपिटलिज़्म, भारत की कंपनियों पर रूस-यूक्रेन युद्ध में भूमिका निभाने के आरोप और अवैध घुसपैठ रोकने की भारत की मुहिम को मुसलमानों के खिलाफ कठोर निर्वासन अभियान के रूप में दिखाया गया था।
इन उदाहरणों को वर्मा ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के तौर पर पेश किया, जो वाशिंगटन पोस्ट की भारत को लेकर आलोचनात्मक और पक्षपाती अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग की छवि से मेल खाती रही है। फिर भी, इन सबके बावजूद छंटनी से उनकी नौकरी नहीं बच पाई।
वाशिंगटन पोस्ट में जर्नलिस्ट बनने के लिए ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की अहम भूमिका
जानकारी के मुताबिक, प्रांशु वर्मा ने यह साफ कर दिया था कि वाशिंगटन पोस्ट में भारतीय संवाददाता बनने के लिए क्या अपेक्षित है। उनके मुताबिक, भारत जो वर्तमान में राइट-विंग सरकार के तहत है और जिसे उदार (लिबरल) नजरियों में आलोचना का सामना करना पड़ता है, उसे संदिग्ध और आलोचनात्मक रूप में पेश करना चाहिए। देश की कार्रवाइयों को संवैधानिक लोकतंत्र की चुनौती के बजाय तानाशाही, बहुसंख्यकवाद और नैतिक गिरावट के नजरिए से दिखाना जरूरी था।
उदाहरण के तौर पर, वर्मा ने अवैध रोहिंग्या प्रवास से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों को, जिसमें जाली दस्तावेज, सीमा में घुसपैठ और आपराधिक आरोप शामिल हैं, साम्प्रदायिक उत्पीड़न की कहानी के रूप में पेश किया। इसी तरह, अरबपतियों को सरकारी भ्रष्टाचार के साधन के रूप में दिखाया गया, जबकि वे फ्री मार्केट के व्यावसायिक खिलाड़ी हैं।
उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के तनाव का स्रोत भौगोलिक या रणनीतिक कारण नहीं, बल्कि भारत की कथित नैतिक असफलताओं में हैं। नई दिल्ली की संसदीय संप्रभुता और नागरिक कल्याण की रक्षा की कोशिशों को बार-बार नकारात्मक रूप में दिखाया गया।
वर्मा ने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए फैलाई गई नैरेटिव पर गर्व किया और इस पक्षपाती और गलतियों से भरी रिपोर्टिंग के भारत पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को अपने नौकरी बचाने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया। विडंबना यह है कि उन्होंने भारतीय अरबपतियों पर लगातार हमला किया और भारत में सेंसरशिप की चिंता जताई, लेकिन खुद एक अमेरिकी अरबपति के कंधों पर काम के लिए निर्भर रहे।
उनकी बातों में शक्ति से स्वतंत्रता की चर्चा थी, लेकिन यह अमीर मालिक की कृपा पर आश्रित अपीलों से विरोधाभासी दिखती है। वर्मा के मामले ने यह साबित किया कि लिबरलवाद कभी-कभी स्पष्ट पाखंड और डबल स्टैंडर्ड से जुड़ा हो सकता है।
गैरी शिह का प्रोफाइल और विवादास्पद रिपोर्टिंग
वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, गैरी शिह ने 2018 में अखबार में शामिल होकर यरुशलम ब्यूरो चीफ के रूप में इजराइल, फिलिस्तीनी इलाके और मध्य पूर्व से जुड़ी खबरों की कवरेज की। इससे पहले वे 2021-2025 तक नई दिल्ली ब्यूरो चीफ रहे और भारत सहित अन्य दक्षिण एशियाई देशों में राजनीति, विदेश नीति, खुफिया और टेक्नोलॉजी पर रिपोर्टिंग की।
शिह ने इससे पहले एसोसिएटेड प्रेस, रॉयटर्स और द न्यूयॉर्क टाइम्स में भी काम किया। उनकी भारत पर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग के लिए 2024 में पुलित्जर पुरस्कार के फाइनलिस्ट होने का गौरव हासिल हुआ और उन्हें 2020 ओसबोर्न इलियट पुरस्कार भी मिला। वह चीनी मूल के हैं।
मीडिया रंबल के अनुसार, शिह ने बीजिंग से AP के लिए रिपोर्टिंग की, जहाँ उन्होंने चीन में सरकार की कार्रवाई, घरेलू राजनीति और विदेश नीति को कवर किया। उन्होंने रॉयटर्स के लिए सिलिकॉन वैली की सोशल मीडिया कंपनियों और न्यू यौर्क टाइम्स के लिए नॉर्दर्न कैलिफ़ोर्निया की रिपोर्टिंग भी की।
विशेष रूप से यह कहा जा सकता है कि वाशिंगटन पोस्ट में भारत-विरोधी रुख रखना कोई अनोखी बात नहीं, बल्कि यह कर्मचारी बनने की प्रवृत्ति मानी जाती है। इसी परंपरा के अनुरूप, गैरी शिह ने अपने लेखन का इस्तेमाल खालिस्तान समर्थकों के पक्ष में और प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो की सरकार के साथ मिलकर भारत पर बिना ठोस प्रमाण आरोप लगाने के लिए भी किया।
इस मिलीभगत ने पत्रकारिता की ईमानदारी की काँच की दीवारों को तोड़ दिया
रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) और कनाडाई सरकार ने 14 अक्टूबर 2024 को भारत के खिलाफ गंभीर, लेकिन बिना आधार के आरोप लगाए। आरोप यह थे कि भारतीय एजेंट, अधिकारी और वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ, जिनमें उस समय भारत के उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा भी शामिल थे, उन्होंने कनाडाई धरती पर अपराधिक गतिविधियों में भाग लिया।
कनाडा के इन दावों पर वाशिंगटन पोस्ट ने घंटों के भीतर एक स्टोरी प्रकाशित की, जिसे गैरी शिह और ग्रेग मिलर ने लिखा। इस रिपोर्ट में अमित शाह को भी कथित अवैध आपराधिक ऑपरेशंस में शामिल बताया गया। लेख में सूत्र के रूप में कनाडा की नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर नतालि ड्रूइन और विदेश मंत्रालय के डिप्टी मिनिस्टर डेविड मॉरिसन को उद्धृत किया गया।
हालाँकि बाद में यह खुलासा हुआ कि अखबार को RCMP और कनाडाई अधिकारियों के आरोपों से पहले ही तैयार ब्रीफिंग मिल चुकी थी। रिपोर्ट वास्तव में प्रेस कॉन्फ़्रेंस का इंतजार कर रही थी। इसमें आतंकवादी हरेदीप सिंह निज्जर की हत्या और अन्य लक्षित हमलों को भारत पर आरोपित किया गया। कनाडा के NSA ने सभी आरोपों को मीडिया हाउस तक पहुँचाने का आदेश पहले ही दे दिया था, जबकि कोई औपचारिक निष्कर्ष या सबूत सार्वजनिक नहीं हुए थे।
इस खुलासे ने वाशिंगटन पोस्ट की स्वतंत्र पत्रकारिता और अखबार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। यह साबित हो गया कि इसके लेखक ओटावा के प्रभाव में आकर न्यू दिल्ली की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले औजार के रूप में काम कर रहे थे।
अगर आप चाहें, मैं अब तक के सभी घटनाक्रम और पत्रकारों के प्रोफाइल को मिलाकर एक संयुक्त हिंदी न्यूज आर्टिकल तैयार कर सकता हूँ, जो वाशिंगटन पोस्ट की छंटनी, विवादास्पद रिपोर्टिंग और भारत-विरोधी गतिविधियों को पूरी तरह कवर करे।
भारत पर लगातार हमले, कॉन्सपिरेसी थ्योरी को बढ़ावा
वाशिंगटन पोस्ट के माध्यम से गैरी शिह ने भारत पर कई तरह के आरोप लगाए है। उनके अनुसार भारत ने नेटफ्लिक्स और अमेजन से दर्दनाक कंटेंट हटवाया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक पर घृणा भाषण फैलाया और पाकिस्तान में आतंकवादियों की हत्या करवाई।
उनके लिए सुनहरा मौका तब आया जब अमेरिका ने कहा कि भारत ने 2023 में प्रतिबंधित संगठन सिख फॉर जस्टिस के प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नून को मारने का प्रयास किया।
इस पर गैरी शिह ने प्रचार चैनल द वायर पर करण थापर से बातचीत में दावा किया कि पूर्व R&AW प्रमुख समंत कुमार गोयल पूरी साजिश में शामिल थे। उन्होंने अपने लेख में लिखा, “अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने आकलन किया है कि पन्नून को निशाना बनाने वाले ऑपरेशन को उस समय के रॉ प्रमुख सामंत गोयल ने मंजूरी दी थी।” बाद में 2024 में अपने इंटरव्यू में उन्होंने इसे “अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ की समझ के अनुसार” के रूप में बचाव करने की कोशिश की। यह मामला भी दिखाता है कि शिह ने लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसे चुनौतीपूर्ण रूप में पेश करने का प्रयास किया।
गैरी शिह ने अपने बयान में कहा “यह कोई अकेली या अलग घटना नहीं थी, बल्कि इस पर एजेंसी के उच्च अधिकारियों, जिनमें सचिव समंत कुमार गोयल भी शामिल हैं की मंजूरी थी। यदि हम अपने स्रोतों से मिली जानकारी पर ध्यान दें, तो यह साफ है कि उन्हें इन खतरों को खत्म करने के लिए दबाव डाला गया था और यही हमारी समझ का आधार है कि यह एक ऑपरेशन था।”
हालाँकि, उनकी यह रिपोर्टिंग कई सवालों के घेरे में आई, खासकर कनाडाई सरकार के साथ उनकी साझेदारी और भारत पर बार-बार झूठे आरोप लगाने की प्रवृत्ति को देखते हुए। शिह ने 2022 में भारत की तुलना चीन से करने में भी कोई झिझक नहीं दिखाई, जो उनके बौद्धिक धोखे और पक्षपात को उजागर करता है।
मोदी सरकार ने स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई और रूस-यूक्रेन युद्ध में पश्चिमी दबाव के सामने झुकी नहीं, लेकिन शिह ने इसे भी आलोचना का विषय बनाया क्योंकि सरकार ने उनके पसंदीदा पश्चिमी दृष्टिकोण का समर्थन नहीं किया।
उन्होंने कहा “मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन, धार्मिक अल्पसंख्यकों का व्यवहार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों पर मोदी चीन के समान पृष्ठ पर हैं। पश्चिमी पाखंड की यह धारणा भारतीय कूटनीतिज्ञों की ओर से आ सकती है, लेकिन यह वास्तव में चीनी कूटनीतिज्ञों से आती हो सकती है।”
यह टिप्पणी उन्होंने कारवाँ के एक लेख पर प्रतिक्रिया में दी थी, जो लिबरल लेखक सुषांत सिंह द्वारा लिखा गया था। पूर्व भारतीय विदेश सचिव कन्वल सिब्बल ने शिह की इस तुलना को सटीक रूप से खारिज करते हुए कहा
“कोई भी व्यक्ति जो बौद्धिक ईमानदारी रखता है, भारत और चीन को इन मुद्दों पर बराबर नहीं मान सकता। शिह को चीन से निकाला गया और अब वह भारत की स्वतंत्रता का लाभ उठा रहा है।” यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि गैरी शिह लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में लगे रहे।
निष्कर्ष
वाशिंगटन पोस्ट की हालिया छंटनी और कर्मचारियों की बर्खास्तगी मीडिया हाउस में पिछले कुछ वर्षों में जारी बायआउट और स्टाफ कटौती का हिस्सा है। ये बदलाव उस समय की आलोचना और संपादकीय निर्णयों के कारण हुए, जब अखबार ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पहले किसी राष्ट्रपति उम्मीदवार का समर्थन न करने का निर्णय लिया। यह निर्णय अमेज़न के संस्थापक जेफ बेज़ोस ने लिया था। इसके बाद अखबार ने कई हजार सब्सक्राइबर खो दिए।
दिलचस्प बात यह है कि 1970 के दशक से अधिकांश राष्ट्रपति चुनावों में अखबार ने उम्मीदवार का समर्थन किया और सभी उम्मीदवार डेमोक्रेट्स रहे। इसके अलावा, बेज़ोस द्वारा पिछले साल अखबार के ओपिनियन सेक्शन को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मुक्त बाजार के दृष्टिकोण पर केंद्रित करने का निर्णय लेने के बाद, उस विभाग के संपादक ने इस्तीफा दे दिया था।
कंपनी को पक्षपाती और राजनीतिक रूप से प्रेरित रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है और इसमें भारत और मोदी सरकार के प्रति गहरी पूर्वाग्रह और नफरत रही है। प्रांशु वर्मा और गैरी शिह ने इस पक्षपाती नैरेटिव को आगे बढ़ाने में पूरी मेहनत की और इस अनैतिक परंपरा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हालाँकि, इस नए घटनाक्रम ने कंपनी की आंतरिक समस्याओं पर फिर से ध्यान आकर्षित किया। यह साबित हुआ कि विशेष रूप से भारत को निशाना बनाकर रिपोर्टिंग करने वाले आधुनिक पत्रकार (ब्राउन सेपियंस) भी लिबरल मीडिया में नौकरी की सुरक्षा की गारंटी नहीं रखते। चाहे उनका देश विरोधी दृष्टिकोण कितना भी स्पष्ट क्यों न हो, वे आखिरकार हटा दिए जाते हैं या आसानी से बदल दिए जाते हैं।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)