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ध्रुव राठी के एआई ऐप ‘AI Fiesta’ पर डेटा चोरी को यूट्यूबर ने किया एक्सपोज तो उन्हें जर्मनी के नंबर से आया कॉल: वीडियो डिलीट करने की दी धमकी, जानिए पूरा मामला

यूट्यूबर अनुभव गुप्ता ने 7 जनवरी को X (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट के जरिए खुलासा किया कि उन्हें एक धमकी भरा कॉल आया है, जिसमें उनसे ध्रुव राठी और उनके AI ऐप ‘AI Fiesta’ के खिलाफ बनाया गया ‘एक्स्पोज वीडियो’ हटाने को कहा गया। 22 दिसंबर को पब्लिश किए गए इस वीडियो में गुप्ता ने गंभीर आरोप लगाए थे कि राठी बड़े पैमाने पर डेटा प्राइवेसी का उल्लंघन कर रहे हैं। साथ ही, उन्होंने इस ऐप से जुड़ी मार्केटिंग और बिजनेस करने के तरीकों को भी भ्रामक और संदिग्ध बताया था।

गुप्ता के अनुसार, उन्हें यह कॉल तब आई जब उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगा। अनुभव गुप्ता ने बताया कि फोन करने वाले ने उनसे वीडियो हटाने की माँग की। गुप्ता ने उस फोन नंबर का भी ज़िक्र किया जिससे उन्हें कॉल आया था, जिसमें जर्मनी का कंट्री कोड (+49) लगा हुआ था। X पर उस नंबर को शेयर करते हुए उन्होंने दावा किया कि इस कॉल का मकसद उन्हें डरा-धमकाकर वीडियो डिलीट करवाना था, जबकि उनका कहना है कि वीडियो में दी गई जानकारी पूरी तरह से ऐप से जुड़ी पब्लिक पॉलिसी और डॉक्यूमेंट्स पर आधारित है।

अपनी पोस्ट में अनुभव गुप्ता ने लिखा, “मेरा वीडियो हटाने के लिए मुझे एक धमकी भरा कॉल आया है, जिसमें मैंने बताया था कि कैसे ध्रुव राठी आपका डेटा चुरा रहे हैं। मैं इसे नहीं हटाऊँगा ‘जर्मन शेफर्ड’।” उनके इस बयान को उनके फॉलोअर्स ने काफी सपोर्ट किया और सिर्फ X पर ही इसे 450 से ज्यादा बार रीपोस्ट और 2,000 से अधिक लाइक्स मिले।

अनुभव गुप्ता ने AI Fiesta के बारे में क्या बताया?

22 दिसंबर के अपने वीडियो में अनुभव गुप्ता ने बताया कि ‘AI Fiesta’ न केवल यूजर्स के प्रॉम्प्ट्स (सवालों) को स्टोर करता है, बल्कि AI के जरिए दिए गए जवाबों को भी सेव करता है। उनका कहना था कि इस तरीके से यूज़र्स द्वारा डाली गई बेहद निजी, राजनीतिक और संवेदनशील जानकारी कंपनी के पास सुरक्षित रह सकती है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आमतौर पर लोग वेबसाइट्स या ऐप्स का इस्तेमाल करते समय उनकी प्राइवेसी पॉलिसी और टर्म्स एंड कंडीशंस नहीं पढ़ते। यूज़र्स अक्सर बिना सोचे-समझे इन शर्तों पर सहमति दे देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं, उन्हें इसके संभावित नतीजों का अंदाजा भी नहीं होता।

अनुभव गुप्ता ने कहा कि डेटा को स्टोर करने की यह बात ऐप की प्राइवेसी पॉलिसी में साफ तौर पर लिखी गई है, जो यूजर्स की सुरक्षा और उनकी मर्जी (इंफॉर्म्ड कंसेंट) पर गंभीर सवाल खड़े करती है। इस मामले में ऑपइंडिया ने जब खुद जाँच की, तो उन्होंने पुष्टि की कि AI Fiesta की प्राइवेसी पॉलिसी में बिल्कुल वही बातें लिखी हैं जिनका दावा अनुभव गुप्ता ने अपने वीडियो में किया है।

स्रोत: AI Fiesta

अनुभव गुप्ता ने आगे बताया कि यह ऐप यूजर्स के IP एड्रेस और ‘डिवाइस इंफॉर्मेशन’ जैसी जानकारी इकट्ठा करता है। उनका तर्क है कि ‘डिवाइस इंफॉर्मेशन’ एक बहुत ही धुंधला और गोल-मोल शब्द है, जिसका इस्तेमाल जानबूझकर किया गया है ताकि यूजर्स की हरकतों (बिहेवियरल ट्रैकिंग) और उनकी लोकेशन पर बारीकी से नजर रखी जा सके।

अनुभव गुप्ता ने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर ऐसा डेटा लीक होता है या गलत हाथों में पड़ता है, तो यूजर्स फिशिंग, प्रोफाइलिंग या टारगेटेड मैनिपुलेशन (सोच-समझकर की जाने वाली हेरफेर) का शिकार हो सकते हैं।

गुमराह करने वाले प्रचार और नकली भरोसे के आरोप

अनुभव गुप्ता ने वीडियो में एक और बड़ा आरोप AI Fiesta की मार्केटिंग और इसके झूठे दावों को लेकर लगाया है। उनका कहना है कि ऐप ने ’36 घंटों में 3 मिलियन ARR’ (Annual Recurring Revenue) का आँकड़ा प्रचारित किया ताकि मार्केट में एक आर्टिफीसियल हाइप बनाई जा सके और लोगों को लगे कि यह ऐप बहुत बड़ी कमर्शियल सक्सेस है। अनुभव गुप्ता का तर्क है कि यह दावा पूरी तरह से भ्रामक है और इसका मकसद सिर्फ उन यूजर्स को अपनी ओर खींचना है जो पैसे देकर सर्विस लें, जबकि मार्केट में पहले से ही कई AI टूल्स बिल्कुल फ्री में उपलब्ध हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि AI Fiesta ने गूगल प्ले स्टोर पर ‘बॉट-जनरेटेड’ या खरीदे गए रिव्यूज का सहारा लिया है। गुप्ता ने सबूत के तौर पर कई 5-स्टार रिव्यूज की ओर इशारा किया, जिनमें एक जैसे शब्द, एक जैसा सेंटेंस स्ट्रक्चर और कॉमन कीवर्ड्स बार-बार दोहराए गए थे, जो यह साफ दिखाते हैं कि ये फीडबैक असली नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि ऐसे नकली रिव्यूज सिर्फ इसलिए खरीदे जाते हैं ताकि ऐप को इस्तेमाल करने की सोच रहे संभावित ग्राहकों को गुमराह किया जा सके।

स्रोत: गूगल प्ले स्टोर

ऑपइंडिया ने अनुभव गुप्ता द्वारा किए गए इन दावों की क्रॉस-चेकिंग की और उन्हें सही पाया, जैसा कि यहाँ दिए गए स्क्रीनशॉट्स से भी साफ होता है। इन दोनों स्क्रीनशॉट सेट्स में तीन ऐसे 5-स्टार रिव्यूज देखे जा सकते हैं, जिनमें लगभग एक जैसी भाषा और शब्दों का इस्तेमाल किया गया है।

स्रोत: गूगल प्ले स्टोर

गोपनीयता समर्थक बनाम डेटा संग्रहकर्ता

इस पूरे खुलासे के केंद्र में वह बात थी जिसे गुप्ता ने ध्रुव राठी का ‘दोगुलापन’ (हिपोक्रेसी) बताया। गुप्ता ने इस बात पर जोर दिया कि राठी ने अपनी पब्लिक इमेज एक ऐसे इंसान की बनाई है जो लोगों को डेटा के गलत इस्तेमाल, निगरानी (सर्वेलांस) और प्राइवेसी के खतरों के बारे में चेतावनी देता है। लेकिन इसके ठीक उलट, उनके अपने ऐप ‘AI Fiesta’ की नीतियांँ यूजर डेटा स्टोर करने, IP एड्रेस इकट्ठा करने और डिवाइस की तमाम जानकारियाँ लेने की अनुमति देती हैं।

स्रोत: AI Fiesta

अनुभव गुप्ता ने आगे यह भी आरोप लगाया कि ऐप की शर्तों (Terms) में ऐसे डिस्क्लेमर दिए गए हैं जो कहते हैं कि कोई भी सिस्टम पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है। गुप्ता का तर्क है कि ऐसा करके कंपनी ने खुद को एक सुरक्षा कवच दे दिया है, ताकि भविष्य में अगर कोई डेटा लीक या ‘डेटा ब्रीच’ होता है, तो वे अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह बच सकें।

जवाबदेही और अधिकार क्षेत्र पर सवाल

अनुभव गुप्ता ने ऐप के कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बताया कि ‘AI Fiesta’ अमेरिका के डेलावेयर (Delaware) में रजिस्टर्ड है, और उनका तर्क है कि इसे ‘देश का सबसे बड़ा AI प्लेटफॉर्म’ बताकर प्रमोट करना भ्रामक है। गुप्ता का कहना है कि जब इस ऐप का रजिस्ट्रेशन, डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर और लीडरशिप भारत में स्थित ही नहीं है, तो इसे भारतीय पहचान के साथ ब्रांड करना गलत है।

स्रोत: Ai Fiesta

यह पहली बार नहीं है जब ध्रुव राठी पर किसी को डराने-धमकाने का आरोप लगा हो। इससे पहले सितंबर 2023 में, यूट्यूबर कैरोलिना गोस्वामी और उनके पति ने भी आरोप लगाया था कि ध्रुव राठी के ‘सपोर्टर्स‘ ने यूरोप में उन पर हमला किया था, क्योंकि उन्होंने राठी के वीडियो का फैक्ट-चेक किया था।

इस बीच, ऑपइंडिया ने अनुभव गुप्ता से संपर्क कर धमकी वाले कॉल और ध्रुव राठी पर किए गए उनके खुलासे के बारे में और जानकारी माँगी है। अगर उनकी ओर से कोई जवाब आता है, तो इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

आए दिन राजनीतिक हत्याएँ और गैंगवार, नशे के अड्डे से लेकर खालिस्तानी आंतकवाद तक: जानें कैसे AAP सरकार में पंजाब में बढ़ रहा अपराध?

अमृतसर के मैरीगोल्ड मैरिज पैलेस में रविवार (4 जनवरी 2026) को उस समय सनसनी फैल गई, जब आम आदमी पार्टी (AAP) के सरपंच जरमैल सिंह की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। CCTV फुटेज में दिखा कि थ्री-पीस सूट पहने दो हमलावर शादी समारोह में बेखौफ अंदर घुसे, 50 वर्षीय ग्रामप्रधान के पास पहुँचे और बेहद करीब से सिर में गोली मार दी।

गोली चलने के बाद शादी में मौजूद लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे, जबकि हमलावर मौके से फरार हो गए। घटना के कुछ ही घंटों बाद सोशल मीडिया पर सामने आए एक पोस्ट में गैंगस्टर प्रभ ने इस हत्या की जिम्मेदारी ली। वैसे तो पंजाब में हिंसा की घटनाएँ नई नहीं हैं, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के एक स्थानीय नेता की इस तरह खुलेआम हत्या ने पूरे राज्य में कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में पुलिस व्यवस्था पूरी तरह विफल होने का आरोप लगाया। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री मान के पास ही राज्य का गृह मंत्रालय भी है।

एक्स पर एक अन्य पोस्ट में सुखबीर सिंह बादल ने बताया कि साल 2026 के पहले छह दिनों में ही पंजाब में चार हत्याएँ हो चुकी हैं। उन्होंने लिखा कि शुक्रवार (2 जनवरी 2026) को कपूरथला में एक महिला की हत्या हुई, मोगा के भिंडर कलाँ इलाके में एक व्यक्ति को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया, जगराओं के मनुके गाँव में कबड्डी खिलाड़ी गगनदीप की हत्या कर दी गई और इसके अलावा अमृतसर में आम आदमी पार्टी के सरपंच की दिनदहाड़े हत्या हुई।

एक्स पर एक पोस्ट में, भारतीय जनता पार्टी (पंजाब) ने कहा कि राज्य में कोई ‘कानून और व्यवस्था’ नहीं है। पार्टी ने कहा, ‘यह गुंडाराज का शासन है’।

दिनदहाड़े राजनीतिक हत्याएँ

सरपंच की हत्या कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि यह पिछले कुछ महीनों में पंजाब को झकझोर देने वाली राजनीतिक हत्याओं की एक कड़ी का हिस्सा है। सरपंच की हत्या से ठीक 48 घंटे पहले मोगा में कॉन्ग्रेस नेता उमरसीर सिंह को गोलियों से भून दिया गया। बताया गया कि इस हमले के पीछे स्थानीय रंजिश थी, जिसमें आम आदमी पार्टी के एक पदाधिकारी का नाम भी सामने आया, जो चिंता का विषय है।

लगातार हुई इन राजनीतिक हत्याओं से एक सत्तारूढ़ दल के नेता और दूसरी विपक्षी पार्टी के नेता की एक कड़वी सच्चाई सामने ला दी है कि पंजाब में अब न तो सत्ता पक्ष और न ही विपक्ष का कोई नेता खुद को सुरक्षित महसूस कर सकता है।

इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री परगट सिंह ने राज्य में हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा, “हाल के वर्षों में पंजाब ने ऐसी अराजकता कभी नहीं देखी।” परगट सिंह समेत कई विपक्षी नेताओं ने हालात को सरकार के नियंत्रण से बाहर बताते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की माँग की।

गौर करने वाली बात यह है कि ये सभी राजनीतिक हत्याएँ दिनदहाड़े, सार्वजनिक जगहों पर की गईं। सरपंच की हत्या के CCTV फुटेज से साफ दिखता है कि हमलावरों को पुलिस की कोई चिंता नहीं थी। इसी तरह उमरसीर सिंह की हत्या के बाद भी आरोपित आसानी से फरार हो गए।

कॉन्ग्रेस विधायक गुरजीत औजला ने आम आदमी पार्टी सरकार पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पूरी तरह नाकाम रहने का आरोप लगाया और कहा कि अब छोटे-छोटे स्थानीय विवाद भी खुलेआम जानलेवा हिंसा में बदल रहे हैं।

यह पहली बार नहीं है जब आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान पंजाब में इतनी बड़ी और चर्चित हत्याएँ हुई हों। साल 2022 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लेकिन विवादित गायक और कॉन्ग्रेस नेता सिद्धू मूसेवाला की दिनदहाड़े, आधुनिक हथियारों से की गई हत्या ने राज्य में गैंगवार और संगठित अपराध के बढ़ते खतरे की चेतावनी दी थी।

बाद में यह हत्या गैंग आपसी रंजिश से जुड़ी पाई गई, जिसने राजनीति और संगठित अपराध के खतरनाक गठजोड़ को उजागर किया। इसके बाद हिंसक घटनाओं की संख्या और दुस्साहस लगातार बढ़ता चला गया।

जबरन वसूली, गिरोह और खेल के मैदान में जंग

राजनीति से आगे बढ़कर अब संगठित अपराध गिरोहों ने पंजाब को अपना खेल और जंग का मैदान बना लिया है। नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने कहा कि राज्य में गैंगस्टरों से फिरौती की कॉल आना अब आम बात हो गई है और इस डर के माहौल में आम लोग खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।

बाजवा ने आरोप लगाया कि गैंग सरगना खुलेआम घूम रहे हैं और प्रशासन ने ग्रामीण इलाकों में लगभग अपना नियंत्रण खो दिया है। वहीं शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने मौजूदा हालात को जंगल राज बताते हुए कहा कि व्यापारी, डॉक्टर, कलाकार और खिलाड़ी सभी फिरौती माँगने वालों के गंभीर खतरों का सामना कर रहे हैं और हिंसक बदला लेना अब सामान्य होता जा रहा है।

कानून-व्यवस्था की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जुलाई 2025 में फाजिल्का जिले के अबोहर में प्रसिद्ध कारोबारी संजय वर्मा की उनकी दुकान के बाहर दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। संजय वर्मा मशहूर कपड़ा ब्रांड वियर वेल के सह-संस्थापक थे और उन्हें कुर्ता-पायजामा किंग के नाम से जाना जाता था। इस हत्या के बाद व्यापारियों ने विरोध में हड़ताल भी भी किया था।

राज्य की कुख्यात गैंगवार अब खेल के मैदान तक पहुँच चुकी है। पंजाब के लोकप्रिय ग्रामीण खेल कबड्डी में भी हाल के वर्षों में खून-खराबा देखने को मिला है, क्योंकि अपराधी गिरोह इसके बड़े और मुनाफे वाले टूर्नामेंटों को प्रभावित करने की कोशिश करते रहे हैं।

दिसंबर 2025 में मोहाली के एक खचाखच भरे स्टेडियम में कबड्डी प्रमोटर कंवर दिग्विजय उर्फ राणा बलाचौरिया की खुद को प्रशंसक बताने वाले हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। यह वारदात अपराध और खेल के खतरनाक गठजोड़ की मिसाल बन गई। करीब 100 करोड़ रुपए के कारोबार वाली कबड्डी अब सट्टेबाजी, गैंग रंजिश और हिसाब-किताब चुकाने का जरिया बनती जा रही है।

अक्टूबर 2025 में जगराओं में मैदान पर हुए विवाद के दौरान 25 वर्षीय खिलाड़ी तेजपाल सिंह को गोली मार दी गई थी। एक महीने बाद समराला में एक अन्य खिलाड़ी गुरविंदर सिंह की हत्या कर दी गई, जिसकी जिम्मेदारी सोशल मीडिया पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने ली थी।

इससे पहले 2022 में जालंधर में एक टूर्नामेंट के दौरान अंतरराष्ट्रीय कबड्डी स्टार संदीप नंगल अंबियाँ की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जाँच में सामने आया कि यह हत्या खेल प्रमोटरों के बीच रंजिश का नतीजा थी।

हर हत्या के साथ मुनाफे वाली कबड्डी दुनिया में अंडरवर्ल्ड का संतुलन बदलता रहा, जहाँ गिरोह टूर्नामेंटों पर कब्जा, सट्टेबाजी और खिलाड़ियों के कॉन्ट्रैक्ट्स पर असर डालने की कोशिश करते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक जाँच अधिकारी ने बताया कि गैंगों की पकड़ इतनी गहरी हो चुकी है कि कई खिलाड़ी चुपचाप मैच हारने के दबाव और गैंग से जुड़े सट्टेबाजों की धमकियों की बात करते हैं।

राज्य में गैंगस्टर कानून के डर के बिना अपनी गतिविधियाँ चला रहे हैं। हालाँकि मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार गैंगवार पर लगाम लगाने के प्रयास भी कर रही है। साल 2022 में राज्य सरकार ने एंटी-गैंगस्टर टास्क फोर्स (AGTF) का गठन किया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नवंबर 2025 तक टास्क फोर्स ने 2,209 गैंगस्टरों को गिरफ्तार किया, 21 को ढेर किया, 825 नेटवर्क तोड़े और बड़ी मात्रा में हथियार, वाहन और नशा बरामद किया। बावजूद इसके, आरोप लगते रहे हैं कि बीते कुछ वर्षों में सरकारी चूक के कारण गैंगों को फलने-फूलने का मौका मिला।

प्रताप सिंह बाजवा ने यहाँ तक आरोप लगाया है कि सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और पुलिस के कुछ लोग चुपचाप गैंगस्टरों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। उनका दावा है कि जो पीड़ित फिरौती की शिकायत लेकर पुलिस के पास जाते हैं, उन्हें सख्त कार्रवाई का भरोसा देने के बजाय अपराधियों से ही आपस में समझौता कर लेने की सलाह दी जाती है।

बाजवा के ये आरोप बेहद गंभीर हैं, क्योंकि ये जनता की सोच और भरोसे की हकीकत को सामने लाते हैं। आम लोगों के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि पुलिस या तो प्रभावशाली गैंग सरगनाओं से निपटने में सक्षम नहीं है या फिर ऐसा करना ही नहीं चाहती।

इसी हालात पर चिंता जताते हुए पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने राज्य को गैंगलैंड बताया। उन्होंने कहा कि पंजाब में आम लोग डर और खौफ के साए में जी रहे हैं, जबकि गैंगस्टर खुलेआम घूम रहे हैं और कानून उन्हें छू भी नहीं पा रहा है।

नार्को-टेरर स्टेट, ड्रग्स और आतंकी हमले

एक तरफ जहाँ पंजाब में घरेलू अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नशे की गंभीर समस्या का एक और खतरनाक पहलू सामने आता है, जो नर्को-आतंकवाद से जुड़ता है। ओपइंडिया पहले भी पंजाब के संदर्भ में नर्को-आतंकवाद पर विस्तार से रिपोर्ट कर चुका है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक साल 2023 में पंजाब में NDPS एक्ट के तहत 11,589 मामले दर्ज किए गए। यह केरल और महाराष्ट्र के बाद देश में तीसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। खास बात यह है कि इन मामलों में से 7,785 केस नशे की तस्करी से जुड़े थे, न कि सिर्फ व्यक्तिगत सेवन से।

ये आंकड़े साफ बताते हैं कि पंजाब केवल नशे का बाजार नहीं है, बल्कि संगठित ड्रग तस्करी का एक बड़ा ट्रांजिट रूट भी बन चुका है। पाकिस्तान से लगी लंबी सीमा के कारण पंजाब तस्करों के लिए पसंदीदा रास्ता बन गया है। सीमा पार बैठे नेटवर्क ड्रोन, सुरंगों और कूरियर सिस्टम के जरिए न सिर्फ नशा, बल्कि हथियार भी पंजाब में भेज रहे हैं।

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने एक बयान में आम आदमी पार्टी सरकार की उदासीनता को नर्को-आतंकवाद के दोबारा सिर उठाने के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने दिसंबर 2022 में तरनतारन में हुए रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड (RPG) हमलों को सीधे तौर पर बढ़ते नशे के कारोबार और कमजोर सीमा सुरक्षा से जोड़ा। वहीं कॉन्ग्रेस नेता राजा वड़िंग ने सोशल मीडिया पर हालात को बेहद गंभीर बताते हुए राज्य और केंद्र सरकार से मिलकर नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि पंजाब में इस तरह के हमले पहले भी होते रहे हैं। मई 2022 में एक पुलिस इमारत पर RPG हमला हुआ था, जबकि 2021 में लुधियाना जिला कोर्ट में विस्फोट हुआ। सितंबर 2024 में भी चंडीगढ़ के सेक्टर-10 में धमाका हुआ, जो पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी है। इन घटनाओं से साफ है कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी की रही हो, राज्य समय-समय पर ऐसे हमलों से दहलता रहा है।

इन दुस्साहसी हमलों ने न सिर्फ पड़ोसी राज्यों को चिंता में डाला है, बल्कि केंद्रीय एजेंसियों की भी नींद उड़ाई है। आम पंजाबियों के लिए ये धमाके 1980 और 1990 के दशक के उस दौर की डरावनी याद दिलाते हैं, जब उग्रवाद के दौरान बम धमाके और गोलीबारी आम बात थी।

इसी बीच राज्य में खालिस्तानी अलगाववादी प्रचार भी ज्यादा खुलकर सामने आने लगा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्वयंभू उपदेशक अमृतपाल सिंह का उभार रहा। फरवरी 2023 में उसका कट्टर खालिस्तानी अभियान हिंसा में तब बदल गया, जब उसके समर्थकों ने तलवारों, बंदूकों और श्री गुरु ग्रंथ साहिब को ढाल बनाकर अमृतसर के पास अजनाला थाने पर धावा बोल दिया। वे उसके एक गिरफ्तार साथी की रिहाई की माँग कर रहे थे।

थाने पर हुए इस हमले के दृश्य पूरे देश में दिखाए गए। सैकड़ों लोगों ने बैरिकेड तोड़कर थाने को घेर लिया, कई पुलिसकर्मी घायल हुए और यह राज्य प्रशासन के लिए बड़ी बेइज्जती साबित हुई। सबसे खतरनाक बात यह रही कि भीड़ अपने मकसद में कामयाब रही और अमृतपाल के साथी को छुड़ा ले गई। इससे यह संदेश गया कि कट्टरपंथी पुलिस को खुली चुनौती दे सकते हैं।

इसके बाद कई हफ्तों तक अमृतपाल सिंह पुलिस से बचता रहा, जब तक कि देशव्यापी तलाशी अभियान के बाद उसे गिरफ्तार नहीं कर लिया गया। अजनाला कांड और उसके बाद की खालिस्तान समर्थक गतिविधियों ने यह उजागर कर दिया कि राज्य की आतंक-रोधी व्यवस्था कितनी कमजोर हो चुकी है।

जाँच के दौरान जब अमृतपाल से जुड़े ठिकानों पर छापे मारे गए, तो अधिकारियों ने बताया कि वह एक निजी मिलिशिया खड़ी कर रहा था। वहाँ से हथियार, बुलेटप्रूफ जैकेट और अन्य आपत्तिजनक सामान बरामद हुआ। बाद में उसे गिरफ्तार कर असम की जेल में भेज दिया गया और ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया गया।

हैरानी की बात यह रही कि गंभीर आरोपों में जेल में बंद होने के बावजूद उसे 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई, जिसे उसने जीत भी लिया। हालाँकि सांसद बनने के बावजूद वह जेल में ही रहा और संसद की एक भी बैठक में शामिल नहीं हो सका।

पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए भेजे जा रहे हथियार, विदेश बैठे खालिस्तानी नेताओं के प्रचार वीडियो और पंजाब की धरती पर होने वाले रहस्यमय धमाके ये सभी पिछले दो दशकों में कागजों पर बनी शांति को धीरे-धीरे कमजोर करते जा रहे हैं।

AAP सरकार में पंजाब का हाल

जब 2022 में भगवंत मान ने पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली, तो उनकी सरकार ने नई शुरुआत का वादा किया था। गैंगवार और नशे पर काबू पाने के लिए कुछ फैसले भी किए गए, लेकिन उनके नतीजे सीमित ही नजर आए।

सरकार की ओर से ड्रग माफिया के घरों पर बुलडोजर चलाने, पंजाब पुलिस की विशेष इकाइयों द्वारा नशे की बरामदगी करने और सीमा पर BSF के साथ मिलकर ड्रोन पकड़ने की कार्रवाई की गई। आम आदमी पार्टी ने एक प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया कि 2024 में 283 ड्रोन, जिनमें हेरोइन, हथियार और गोला-बारूद थे उनको जब्त किया गया। अगस्त 2025 तक 137 ड्रोन और बरामद किए गए। इसके बावजूद राज्य से नशे की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है।

इसी तरह, हत्या, चोरी और अन्य अपराधों में बढ़ोतरी ने राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। हालात ऐसे हो गए कि जज तक चोरी से नहीं बचे। मार्च 2023 में अतिरिक्त सत्र जज रवदीप हुंदल के सरकारी आवास में चोरी हुई, जहाँ चोर नल और गीजर तक उखाड़ ले गए। अक्टूबर 2024 में अमृतसर का एक CCTV वीडियो सामने आया, जिसमें दिनदहाड़े एक महिला ने बहादुरी दिखाते हुए तीन चोरों को अपने घर में घुसने से रोक दिया।

कॉन्ग्रेस के नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की माँग करते हुए कहा कि वह गृह विभाग और पंजाब पुलिस को प्रभावी ढंग से संभालने में विफल रहे हैं। बाजवा ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री में जरा भी आत्मसम्मान है, तो उन्हें पद छोड़ देना चाहिए।

पिछले साल जुलाई में अबोहर के व्यापारी की दिनदहाड़े हत्या के बाद बाजवा ने विधानसभा में कहा था कि आज कोई भी पंजाबी सुरक्षित नहीं है और गैंगस्टर इसलिए बेखौफ हैं क्योंकि प्रशासन सोया हुआ है।

हालाँकि हाल के महीनों में पंजाब पुलिस ने राइफलें, RDX विस्फोटक और हेरोइन की बड़ी खेपें बरामद की हैं, जो यह दिखाती हैं कि अपराध और आतंक का नेटवर्क कितना हथियारबंद और मजबूत है।

लेकिन इन सफलताओं पर लगातार हो रहे हमलों की बेखौफ घटनाएँ भारी पड़ जाती हैं। भाजपा नेता सुनील जाखड़ ने कहा कि हर हत्या के बाद आम आदमी पार्टी सरकार की कान फोड़ने वाली चुप्पी गैंगस्टरों का हौसला और बढ़ा देती है और नियंत्रण में देरी का मतलब है कि हालात हाथ से निकलते जा रहे हैं।

शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता दलजीत चीमा ने भी मुख्यमंत्री पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहने का आरोप लगाया और कहा कि अगर वह हालात नहीं संभाल सकते, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।

आँकड़े भी इन चिंताओं की पुष्टि करते हैं। NCRB के 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, आम आदमी पार्टी सरकार के शुरुआती साल में पंजाब में संज्ञेय अपराधों (IPC + विशेष कानून) में हल्की बढ़ोतरी हुई थी, हालाँकि 2023 में इसमें थोड़ी गिरावट दर्ज की गई। 2023 में राज्य में कुल 69,944 मामले दर्ज हुए, जिनमें 44,872 IPC अपराध और 25,072 विशेष या स्थानीय कानूनों के तहत मामले थे।

हालाँकि प्रति लाख आबादी पर अपराध दर करीब 228 है, जो कई बड़े राज्यों से कम है, लेकिन अपराधों की प्रकृति लोगों को ज्यादा डरा रही है। हिंसक अपराधों की संख्या और उनका असर साफ दिख रहा है।

2023 में पंजाब में 681 हत्याएँ दर्ज हुईं, यानी हर एक लाख आबादी पर करीब 2.2 हत्याएँ। यह 2022 के 718 मामलों से बस मामूली कम है। दूसरे शब्दों में, राज्य में औसतन रोज दो लोगों की हत्या अब भी हो रही है, जिनमें से कई आपसी रंजिश और गैंगवार से जुड़ी हैं।

संपत्ति से जुड़े अपराध, जैसे चोरी और सेंधमारी, हर साल IPC मामलों का बड़ा हिस्सा बने रहते हैं। पंजाब में चोरी के हजारों मामले दर्ज हुए, जिससे संपत्ति अपराध दर करीब 146 प्रति लाख तक पहुँच गई।

इन आंकड़ों के पीछे नशे का कारक भी अहम है। 2023 में NDPS एक्ट के तहत मामले बढ़कर 11,589 हो गए, यानी 37.6 प्रति लाख आबादी और नशीले पदार्थों की बरामदगी में पंजाब देश के अग्रणी राज्यों में रहा।

NCRB की ताजा रिपोर्ट से साफ तस्वीर उभरती है कि पंजाब में अपराध न सिर्फ संख्या में ज्यादा हैं, बल्कि उनका स्वरूप भी लगातार ज्यादा खौफनाक होता जा रहा है। कुल मिलाकर, पंजाब एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा है। जिस राज्य ने उग्रवाद के भयावह दौर से निकलने के लिए भारी कीमत चुकाई थी, वह अब नए लेकिन जाने-पहचाने खतरों का सामना कर रहा है।

अब जिम्मेदारी सरकार पर है कि वह सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि काम करके साबित करे कि वह अपराध और आतंक के इस जाल को तोड़ सकती है। अगर सरकार इसमें नाकाम रही, तो जनता का फैसला सख्त होगा और वह पूरी तरह जायज भी होगा।

(मूलरूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

संस्कारों से ही बचेगी संस्कृति, पाश्चात्य अंधानुकरण छोड़ना जरूरी

आज जब पूरा विश्व सनातन संस्कृति की चर्चा कर रहा है, तब यह समझना आवश्यक है कि व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व मानवता के लिए इससे अधिक शुभ और कल्याणकारी कुछ नहीं हो सकता। जब हम सच्चे अर्थ में सनातनी बन जाएँ, तभी हम इस संस्कृति की महत्ता को समझ पाएँगे।

वैश्विक समस्याओं का समाधान

वास्तविकता यह है कि विनाश के मुहाने पर खड़ी वैश्विक समस्याओं का समाधान और विश्व मानवता का कल्याण केवल सनातन संस्कृति के आधार पर ही संभव है। यह वह संस्कृति है जो ‘जियो और जीने दो’ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्’ की अवधारणा को जीने और आत्मसात करने के मूल्यों में निहित है।

सनातन धर्म या संस्कृति केवल शब्दोच्चार या नारा मात्र नहीं है। यह सनातन संस्कृति के जीवन मूल्यों को धारण करने से ही संभव है। हमारे यहाँ मूल्य केवल शब्दों में ही वर्णित नहीं किए गए हैं, बल्कि उन शब्दों को व्यावहारिक जीवन में कसौटी पर परखा भी गया है।

जीवन मूल्यों की कसौटी

सतयुग काल में राजा हरिश्चंद्र को सत्य बोलने की कितनी बड़ी, कठिन, दुःसह, मृत्यु से भी अधिक पीड़ा देने वाली परीक्षा देनी पड़ी, यह जगविदित है। शासकों की संतानें भी उन्हीं ऋषि आश्रमों में शिक्षा प्राप्त करने जाती थीं, जहाँ सभी बालक शिक्षा ग्रहण करते थे। सभी को एक समान नियम और अनुशासन का पालन करना होता था।

आज की तरह नहीं, जब शिक्षा के अलग स्तर, पाठ्यक्रम, सुविधाएँ और वर्ग-भेदित शिक्षा व्यवस्था है। संस्कार, अनुशासन और संयम शिक्षा से दूर हो गए हैं।

प्रयागराज: सनातन मूल्यों का जीवंत प्रतीक

3 जनवरी, पौष मास की पूर्णिमा से सनातन संस्कृति की अवधारणा ऋषि भरद्वाज की तपस्थली तीर्थराज प्रयागराज में त्रिवेणी के तट पर साकार होती है। इस कड़कड़ाती ठंड के बीच हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौन व्रत धारण कर नित्य त्रिवेणी में प्रातःकालीन स्नान, जप, तप, दान और ईश्वर चिंतन करते हुए ‘सिया राम मय सब जग जानी’ की अवधारणा को आत्मसात करने का अभ्यास करते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण का उद्घोष ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ और आचार्य शंकर के अद्वैत दर्शन की अवधारणा का सजीव वर्णन यहाँ देखने को मिलता है।

सनातन संस्कृति की व्यापकता

गुरु नानकदेव, संत कबीर साहब जैसे सनातन संस्कृति के अनेक महान संतों और महात्माओं ने अपनी तपस्या और साधना के माध्यम से परम सत्य को अपने-अपने तरीके से जाना। किसी ने वैष्णव मार्ग, किसी ने शाक्त, किसी ने तंत्र, किसी ने शक्ति उपासना, योग मार्ग, हठयोग, किसी ने भक्ति भाव, किसी ने प्रेम और सेवा, सद्गुरु भक्ति, तो किसी ने प्रकृति की उपासना-नदी, समुद्र, जलाशय, जंगल, जीव-जड़ प्रकृति- सब में उसी एक परम तत्त्व को विभिन्न साधना मार्गों से जानकर मानवता के विकास का मार्ग दिखाया।

उन्होंने मानव के कष्टों से निवारण के उपाय दिए, साथ ही समाज व्यवस्था, राज्य व्यवस्था, न्याय व्यवस्था तथा अर्थ व्यवस्था का मार्गदर्शन किया है।

सनातन संस्कृति असीम और निस्सीम है। यह किसी सीमा में बँधी नहीं है। यह दुनिया की सबसे उदात्त, उदार संस्कृति है और अंतरिक्ष की तरह व्यापक है। इसे जाति, पंथ, संप्रदाय या पूजा पद्धति में आबद्ध नहीं किया जा सकता।

आत्ममंथन का समय

यदि हम अपने को सनातनी मानते हैं, तो हमें सनातन धर्म के मूल्यों को पहले अपने में आत्मसात करना होगा। जाति-पाति की संकीर्ण सोच और अहंकार से ऊपर उठकर सोचना होगा।

राजनीतिक निर्णय व नीतियाँ, राजनीतिक पद-प्रतिष्ठा, प्रशासनिक व्यवस्था, पद-प्रतिष्ठा और भरोसे का आधार यदि कार्य-कुशलता, कार्य-दक्षता, अनुशासन, ईमानदारी, निष्ठा और लोक कल्याण की भावना के बजाय जाति है, तो हम जनता-जनार्दन या राष्ट्र, किसी का भी भला नहीं कर सकते। न ही हम सनातन संस्कृति को सच्चे अर्थ में मानते हैं।

वर्तमान चुनौतियाँ

आज हम सभी की दोहरी जीवन शैली, कार्य प्रणाली और दोहरे जीवन मूल्य जगजाहिर हैं। इससे न हम अपना हित कर सकते हैं, न समाज का। आज जहाँ हम खड़े हैं- हमसे तात्पर्य हमारे पूरे विश्व परिवार से है- हमें बहुत सूक्ष्मता से, बिना जाति-पाति के पूर्वाग्रह के, समाज के नीति-नियंताओं, बुद्धिजीवी समाज, विचार जगत के लोगों, न्याय और प्रशासनिक व्यवस्था के लोगों की सोच, व्यवस्था और कार्यशैली का मूल्यांकन करना होगा। हमें यह देखना होगा कि हम कहाँ जा रहे हैं। क्या यही सनातन संस्कृति के मूल्य हैं?

समाज में बढ़ती विकृतियाँ

आज जिस प्रकार की घटनाएँ सामने आ रही हैं, यदि सनातन संस्कृति के मूल्यों के अनुरूप सोचें, तो सहज ही हम निर्णय कर सकते हैं।

धन के लोभ की अराजक मानसिकता: समाचार माध्यमों से समाज में नित्य घटने वाली क्रूरतम हिंसक घटनाएँ और हत्याएँ सामने आ रही हैं। माँ-पिता, भाई-बहन की हत्याओं की घटनाएँ, नित्य निरंतर बढ़ती महिलाओं और बच्चों के साथ घटित होने वाली घटनाएँ चिंताजनक हैं।

राजनीतिक जीवन के मूल्य: आज हम कहाँ खड़े हैं? किस तरह के लोग और किन उद्देश्यों को लेकर आ रहे हैं? विभिन्न राजनीतिक दलों का नेतृत्व किन लोगों को संरक्षण दे रहा है, किन्हें आगे बढ़ा रहा है? यह सब सनातन मूल्यों के कितना अनुरूप है, यह विचारणीय विषय है।

शिक्षा और स्वास्थ्य: व्यवसायीकरण की त्रासदी

लोक कल्याणकारी सेवाएँ: स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल- उद्योग बन गए हैं। केजी से लेकर हजारों रुपए तक का शुल्क है। आउटसोर्सिंग की नौकरी करके 12, 15, 18, 20–22 हजार रुपए प्रतिमाह पर जीवन यापन करने वाले लोग क्या अपने बच्चों को शिक्षा दिला सकते हैं? किसी ने विचार किया?

गुणवत्ता के नाम पर जो संस्कार युवा पीढ़ी में सामने आ रहे हैं, वे मूल्यांकन के लिए पर्याप्त हैं। वे माता-पिता बहुत भाग्यशाली हैं, जिनके बच्चे माता-पिता और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अन्यथा, ओल्ड एज होम हैं। यहाँ तक कि माता-पिता के अंतिम संस्कार में भी अब लोग ऑनलाइन भाग लेने लगे हैं।

चिकित्सा व्यवस्था में तो व्यक्ति वस्तु बनकर रह गया है। मनुष्यता गौण है। केवल मनुष्य शोषण की वस्तु है। व्यापार का धर्म केवल लाभ और हानि है। कोई मानवता और संवेदना नहीं होती। यही अंतर भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति में है।

पुनर्विचार की आवश्यकता

हमने पश्चिमी देशों- अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस आदि से प्रभावित होकर जो मॉडल अपनाया, उसके व्यापक परिणाम सामने आ रहे हैं। हरिद्वार की हर की पौड़ी में, काशी में भगवती गंगा जी की आरती, अयोध्या में सरयू मैया सहित विभिन्न तीर्थों में स्नान, आरती और पूजन मन को अत्यंत आह्लादित करने वाला है। परंतु केवल बाह्य आडंबर से सनातन संस्कृति की रक्षा नहीं हो सकती।

हम सभी को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए कि हमारी सनातन संस्कृति के मूल्य क्या यही हैं? क्या हम सच्चे अर्थ में सनातनी जीवन जी रहे हैं? यदि नहीं, तो अब समय आ गया है कि हम अपने मूल्यों की ओर लौटें, उन्हें अपने जीवन में उतारें और विश्व मानवता के लिए एक मार्गदर्शक बनें।

सनातन संस्कृति केवल एक विचारधारा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है। आइए, हम इसे अपने आचरण में उतारें और भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने का संकल्प लें।

पाकिस्तान अब खत्म: मुस्लिम Gen Z ने खोली पोल, फौज-सरकार ने लेख डिलीट करवा खुद के पैर पर मारी कुल्हाड़ी

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख अमेरिका को ‘खुश’ करने में लगे हैं। वहाँ जोरदार लॉबिंग की जा रही है ताकि छवि सुधारी जा सके। ऑपरेशन सिंदूर के बाद हर महीने $50,000 यानी 45 लाख रुपए खर्च किए जा रहे हैं। छवि सुधारने में अब तक 9 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। लेकिन Gen Z हुक्मरानों को ये बता रहे हैं कि ‘तुमसे ना हो पाएगा’।

तंगहाली के बीच लॉबिंग में खर्च किए करोड़ों

FARA के दस्तावेज बता रहे हैं कि पाकिस्तान सरकार और उसके थिंक टैंक अमेरिका में अपनी छवि सुधारने में लगे हुए हैं। इस्लामाबाद पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने यूनाइटेड स्टेट्स में लॉबिंग और पब्लिक पॉलिसी आउटरीच पर $900,000 यानी ₹80864097.30 खर्च किए। इस दौरान पाकिस्तानी दूतावास ने अमेरिकी फर्म एर्विन ग्रेव्स स्ट्रैटजी ग्रुप LLC के साथ समझौता किया, ताकि हर अमेरिकी सांसद, अधिकारियों और नीति बनाने वालों तक पहुँच बन सके। मीडिया में नैरेटिव बदलने के लिए एक अमेरिकी कंपनी, कॉर्विस होल्डिंग इंक को लगाया गया ताकि पाकिस्तान के पक्ष में माहौल बनाया जा सके।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को खुश करने के लिए अमेरिकी दौरे के दौरान आर्मी चीफ आसीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने रेयर अर्थ मिनरल्स भी गिफ्ट किए। इसका नतीजा ये रहा कि रेयर अर्थ मिनरल्स और मेटल्स पर पाकिस्तान और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच करार हुआ। दस्तावेज में खोज, माइनिंग, प्रोसेसिंग और ग्लोबल सप्लाई चेन को लेकर सहयोग के बारे में बताया गया है, जिसकी $1 ट्रिलियन यानी करीब 8.9 लाख करोड़ रुपए तक इंडिकेटिव कमर्शियल वैल्यू होगी।

बुजुर्गों की इतनी ‘कोशिश’ के बावजूद Gen Z इन्हें देश के लिए ‘बेकार’ बता रहे हैं।

बगावत के लिए तैयार पाकिस्तान के Gen Z

पाकिस्तान के Gen Z का गुस्सा भड़क रहा है। ये लोग सत्ता पर काबिज नेताओं और सेना के अधिकारियों को चुनौती दे रहे हैं। सेना ने एक वायरल लेख को हटवा दिया है, जिसमें उनकी पोल पट्टी खोली कर रख दी गई थी।

देश के हर हिस्से में हो रहे विरोध को कुचलने वाली असीम मुनीर की सेना को एक लेख ने विचलित कर दिया। कैसे पाकिस्तान के सोशल मीडिया यूजर इस मुद्दे पर अपनी सरकार-सेना को घेर रहे हैं, ट्विटर पर इस ट्रेंड को देख कर समझा जा सकता है।

इसमें कहा गया है कि ‘जितना चाहें, आप लोगों को लड़वाएँ’, जेन जी इस पर मीम बनाएगा। दरअसल अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ अर्कांसस में PhD स्टूडेंट जोरैन निजमानी के एक लेख को डिलीट कर दिया गया। इसमें उसने पाकिस्तान के हुक्मरानों को साफ-साफ बताया था कि Gen Z अब उनकी बातों में आने वाला नहीं है और न ही उनके झूठे दावों को मानने वाला है।

इसमें बताया गया है कि नौजवान और जेन जी अब पुराने नेताओं की बातों में नहीं आने वाले हैं। पाकिस्तान की मौजूदा व्यवस्था से यह बगावत की शुरुआत है। लेख देखते ही देखते वायरल हो गया। इससे घबराकर लेख को डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया।

पाकिस्तान में अब Gen Z बगावत करने जा रहे हैं। इस बगावत में हिंसा नहीं बल्कि विचार है। विचारों को रोकने के लिए पाकिस्तानी शासन के प्रयास को भी ये लेख बता रहा है। जबरदस्ती चुप करने की कोशिश की जा रही है। बगावत की शुरुआत एक युवा पाकिस्तानी छात्र के विचार से शुरू हुआ है। उसने बताया है कि कैसे देश की युवा पीढ़ी पुराने नेताओं के आदेश मानना ​छोड़ चुकी है।

लेख में साफ कहा गया है कि “आप जितना चाहे उतना लड़ाइयाँ करवा सकते हैं, Gen Z उससे मीम बनाएगा। सभी मेनस्ट्रीम मीडिया को सेंसर कर दो, Gen Z अपनी राय बताने के लिए रंबल, यूट्यूब और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म पर चला जाएगा। बूमर्स, अब आप विचारों को सेंसर नहीं कर सकते। वे दिन गए जब आप लोगों को बेवकूफ बना सकते थे। अब किसी को बेवकूफ नहीं बनाया सकता है।”

यह लेख एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल एडिशन पर था, जो अब मौजूद नहीं है यानी जैसा लेखक जोरैन निजमानी ने कहा, ठीक वैसा ही हुआ है। यहाँ सच बताने के लिए यूट्यूब से लेकर दूसरे सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है। चैनल पर सेना प्रमुख असीम मुनीर और शहबाज सरकार के खिलाफ खबरें आनी बंद हो गई हैं। इस पर ही Gen Z कह रहा है कि इस तरह की घटिया तरीकों से हुक्मरान नहीं बच सकते। सच को ज्यादा देर तक दबाया नहीं जा सकता।

पाकिस्तानी सेना के हुक्म से हटाया गया लेख

अमेरिका में रहने वाले पाकिस्तानी PhD स्टूडेंट जोरैन निजमानी का ‘इट इज ओवर’ टाइटल वाला यह लेख असल में 1 जनवरी को एक जाने-माने पाकिस्तानी अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर था। हालाँकि कुछ घंटों बाद ही इसे हटा दिया गया। इसके पीछे पाकिस्तान की आर्मी का दबाव था।

दरअसल निजमानी जेन जी के बीच इस लेख की वजह से ‘हीरो’ बन गया। लेख पर रोक के बाद इसका स्क्रीन शॉट जेन जी शेयर कर रहे हैं। जेन जी का गुस्सा आसीम मुनीर की पाकिस्तानी आर्मी पर दिख रहा है। इसे सेंसरशिप कहा जा रहा है और बेबाक लेखन के लिए एक्टर फाजिला काजी और कैसर खान निजमानी के बेटे जोरैन निजमानी की तारीफ की जा रही है।

देशभक्ति जबरन पढ़ाई-सिखाई नहीं जाती- जोरैन निजमानी

लेख में बताया गया है कि पाकिस्तान के सत्ताधारी वर्ग का अब युवा पीढ़ी पर अपना असर खत्म हो गया है। देश के हुक्मरान देशभक्ति को बढ़ाने के लिए स्पॉन्सर लेक्चर, सेमिनार और कैंपेन चला रहे हैं, इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है। सरकार के ये सारे प्रयास बेकार हैं।

उन्होंने लिखा, “सत्ता में बैठे बड़े-बूढ़ों पर से युवा पीढ़ी यकीन नहीं कर रही है। ये लोग समझ रहे हैं कि सत्ताधारी बस आम जनता को बरगला रहे हैं। ये लोग स्कूलों और कॉलेजों में देशभक्ति को बढ़ावा देने के लिए चाहे कितने भी वाद-विवाद और सेमिनार कर लें, यह काम नहीं कर रहा है।”

सेना का नाम लिए बिना सारी बातें कही गई है। पीएचडी छात्र निजमानी कहते हैं कि देशभक्ति भाषणों या नारों से नहीं सिखाई जा सकती, बल्कि यह अपने आप बढ़ती है, जब नागरिकों को समान अवसर, भरोसेमंद इंफ्रास्ट्रक्चर, काम करने वाले सिस्टम और गारंटी वाले अधिकार दिए जाते हैं।

उन्होंने कहा, “जब बराबर मौके, अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर और अच्छे सिस्टम हों तो देशभक्ति अपने आप आती ​​है। जब आप आम जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरी करते हैं। उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि उनके अधिकार सुरक्षित हैं, तब आपको स्कूलों या कॉलेजों में जाकर देशभक्ति सिखाने की जरुरत नहीं होती। लोग खुद ही अपने देश को पसंद करते हैं।”

पाकिस्तानी सच्चाई को बता रहा ये लेख हुक्मरानों को इतना कड़वा लगा कि उन्होंने इसे हटवा दिया, क्योंकि जनता असलियत को समझ रही है। हालाँकि लेख Gen Z और Gen Alpha को सेंटर में रख कर लिखा गया है।

इसमें कहा गया है, “युवा दिमाग, Gen Z, Alphas अच्छी तरह जानते हैं कि क्या हो रहा है। देशभक्ति के विचार को ‘बेचने’ की कोशिशों को वे अच्छी तरह समझ रहे हैं। इंटरनेट की वजह से, हमारे पास जो भी थोड़ी बहुत एजुकेशन बची है, उसकी वजह से लोगों तक बातें पहुँच रही हैं। वरना लोगों को अनपढ़ रखने की सत्ता पर बैठे लोगों ने पूरी कोशिश की, लेकिन फेल हो गए। हालाँकि जनता अपनी बात डर की वजह से नहीं कह पा रही है, क्योंकि उसे साँस लेना ज्यादा पसंद है।”

इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दुनिया की जानकारी लोगों तक पहुँचाना आसान बना दिया है, इसलिए लोगों की सोच को कंट्रोल नहीं किया जा सकता। युवाओं में काफी बेचैनी है, जो लगातार बढ़ रही है।

उन्होंने आगे कहा, “युवा समझ रहे हैं कि वे सत्ता में बैठे लोगों को चैलेंज नहीं कर सकते, इसलिए देश छोड़ रहे हैं। वे चुपचाप निकल जाना पसंद करेंगे। पीछे मुड़कर भी नहीं देखेंगे क्योंकि उनके दोस्तों ने आवाज उठाई तो उन्हें चुप करा दिया गया।”

पाकिस्तान में लेख हटाने का हो रहा विरोध

डिजिटल प्लेटफॉर्म से लेख हटाने का पाकिस्तान में काफी विरोध हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की कनाडाई विंग ने दावा किया कि आर्टिकल हटाने से यह पक्का हो गया है कि जबरदस्ती की देशभक्ति अब काम नहीं करती।

पार्टी ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “ज़ोरेन निज़ामानी का आर्टिकल ‘इट इज ओवर’ को हटाया जाना, ये बताता है कि पाकिस्तान का सच क्या है। जबरदस्ती की देशभक्ति अब काम नहीं करती। Gen Z करप्शन, गैर-बराबरी और दोहरे चरित्र को समझती है। इंसाफ़, नौकरी और इज्जत के बिना प्रोपेगैंडा फेल हो जाता है। पुराने कंट्रोल के तरीके खत्म हो गए हैं, युवा आगे बढ़ गए हैं।”

पाकिस्तानी एक्टिविस्ट मेहलका समदानी ने लिखा, “हैरानी की बात नहीं है कि यह लेख अब एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल एडिशन से एक्सेस नहीं हो रहा है – ठीक वैसी ही सेंसरशिप जिसके बारे में ज़ोरेन बात करते हैं।”

वकील अब्दुल मोइज़ जाफ़री ने कहा, “यह बहुत बढ़िया लेख है। पाकिस्तान में अपनी नौकरी में फेल हो रहे हर जवान से लेकर हर बूढ़े आदमी के दिल से लिखा गया है।” पाकिस्तान की मानवाधिकार आयोग ने भी लेख हटाने की आलोचना की है और कहा है कि एक्सप्रेस ट्रिब्यून से जोरीन निजमानी का लेख हटाना पाकिस्तान में बोलने की आजादी पर बढ़ती पाबंदियों का उदाहरण है।

पाकिस्तान की ये हालत है कि बलूचिस्तान, पीओके समेत कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन चल रहा है। खाने-पीने के लाले पड़े हैं। आम जनता को दो जून की रोटी नसीब नहीं हो रही। सबकुछ काफी महँगा हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है। इस बीच जेन जी का गुस्सा भड़कने लगा है। हुक्मरानों के ऐशो आराम जेन जी को दिख रहे हैं। ऐसे में भारत का एक और पड़ोसी देश जेन जी के गुस्से का शिकार होने के लिए तैयार है।

‘माजिद फ्रीमैन के लिए हो जाओ एकजुट’: लेस्टर हिंदू-विरोधी हिंसा को भड़काने वाले के समर्थन में उतरा कट्टरपंथी संगठन Cage International, भीड़ को कोर्ट के बाहर इकट्ठा होने के लिए उकसाया

सितंबर 2024 में मुस्लिम ‘एक्टिविस्ट’ माजिद फ्रीमैन को 2022 में लेस्टर में हुई हिंदू-विरोधी हिंसा के दौरान भड़काऊ गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में 22 हफ्ते की जेल की सजा सुनाई गई थी। उस पर आरोप था कि उसने उस हिंसा के दौरान हिंदुओं की भूमिका को लेकर झूठी और भ्रामक बातें फैलाई थीं। उस समय माजिद फ्रीमैन ने अदालत में अपने बचाव में कोई दलील भी नहीं दी क्योंकि उसके पास अपने कुकृत्यों को सही ठहराने का कोई आधार नहीं था।

अब ब्रिटेन का NGO कैज इंटरनेशनल (CAGE International) उसकी इन्हीं गतिविधियों को नजरअंदाज करते हुए इस्लामी कट्टरपंथी को निर्दोष साबित करने की कोशिश में एक अभियान चला रहा है और उसकी हिंदू-विरोधी और आपराधिक भूमिका को छिपाने का प्रयास कर रहा है।

CAGE International को पहले CagePrisoners Project के नाम से जाना जाता था। 9 जनवरी को लेस्टर मामले में होने वाले माजिद फ्रीमैन के दोबारा ट्रायल से पहले उसके समर्थन में लोगों को जुटा रहा है। इस संगठन ने एक पर्चे में फ्रीमैन को ‘मानवतावादी’ और ‘एंटी-जेनोसाइड एक्टिविस्ट’ बताया है। इसमें दावा किया गया है कि उसे ‘2022 में हिंदुत्व से प्रेरित दंगों के दौरान लेस्टर समुदाय का बचाव करने के अपराध में एक राजनीतिक रूप से प्रेरित मुकदमे में दोषी ठहराया गया’।

CAGE International ने X पर लिखा, “माजिद फ्रीमैन के लिए एकजुट हों। मानवतावादी और प्रो-फिलिस्तीन एक्टिविस्ट माजिद फ्रीमैन ने 2022 में हिंदुत्व से प्रेरित दंगों के दौरान, लेस्टरशायर पुलिस की कई नाकामियों के बाद लेस्टर के लोगों के लिए आवाज उठाई थी। उसे पिछले साल एक राजनीतिक मुकदमे में दोषी ठहराया गया। उसके दोबारा ट्रायल में उसके साथ एकजुटता दिखाएँ। हम माजिद के साथ खड़े हैं।”

हिंदू अधिकारों की वकालत करने वाले INSIGHT UK समूह ने इसे लेकर CAGE International पर सवाल उठाए हैं। INSIGHT UK ने संगठन पर ‘विक्टिम-फ्लिपिंग’ का आरोप लगाया है ताकि उसके हिंदू विरोधी कृत्यों को कम करके दिखाया जा सके।

INSIGHT UK ने लिखा, “माजिद फ्रीमैन को दोषी ठहराया गया है। इसके बावजूद CAGE ‘पीड़ित को ही अपराधी’ बता रहा है और एक ऐसा अभियान चला रहा है जो उसे एक सताए गए समुदाय के रक्षक के रूप में पेश कर रहा है और उसके उन कामों को कम करके दिखा रहा है। इसने पहले से ही तनावग्रस्त और हिंसा झेल रहे शहर में हिंदू विरोधी भावनाओं को भड़काया था। CAGE का चरमपंथियों का बचाव करने का लंबा इतिहास है और अब ऐसे व्यक्ति के लिए समर्थन क्यों जुटा रहा है जिसके कामों ने लीसेस्टर में हिंदुओं के लिए नफरत और डर को और बढ़ा दिया?”

माजिद फ्रीमैन की सजा और पूरा मामला

9 सितंबर 2024 को माजिद फ्रीमैन को 22 हफ्ते की जेल की सजा सुनाई गई। उस पर आरोप था कि उसने 2022 में ब्रिटेन के लीसेस्टर शहर में हुए हिंदू-विरोधी दंगों के दौरान हिंसा भड़काने की कोशिश की और सोशल मीडिया के जरिए झूठ और भ्रामक जानकारी फैलाई। नॉर्थ हैम्पटन मजिस्ट्रेट्स कोर्ट में डिस्ट्रिक्ट जज अमर मेहता ने उसे पब्लिक ऑर्डर ऑफेंस की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने कहा कि फ्रीमैन का इरादा हिंसा करवाने का था और उसने ऐसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जिनका मकसद लोगों को हिंसा के लिए उकसाना था।

जुलाई 2023 में माजिद फ्रीमैन एक और गंभीर मामले में भी घिर चुका था। उस पर आतंकवाद भड़काने और प्रतिबंधित आतंकी संगठन हमास का समर्थन करने के आरोप लगे थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, माजिद फ्रीमैन का असली नाम माजिद नोवसार्का है। उसे 9 जुलाई 2023 को काउंटर टेररिज्म से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। अदालत को बताया गया कि 26 दिसंबर 2022 से 20 जून 2023 के बीच फ्रीमैन ने कई बार ऐसे बयान दिए जो हमास जैसे प्रतिबंधित आतंकी संगठन के पक्ष में थे।

सरकारी वकील बिर्गिटे हागेम ने कोर्ट में कहा था कि माजिद फ्रीमैन 11 मार्च 2015 को सोशल मीडिया के जरिए लोगों को आतंकी गतिविधियाँ करने, उनकी योजना बनाने या दूसरों को इसके लिए उकसाने की कोशिश कर रहा था। इसका संबंध फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ पर हुए 2015 के आतंकी हमले से था।

माजिद फ्रीमैन ने लीसेस्टर में हिंदू विरोधी हिंसा भड़काई

भारत-पाकिस्तान टी20 मैच में 28 अगस्त 2022 को भारत की जीत के बाद लीसेस्टर में तनाव फैल गया। इस दौरान हुई एक झड़प में भारतीय ध्वज का अपमान किया गया। हालात बिगड़ने के बावजूद स्थानीय हिंदू समुदाय ने शांति बनाए रखने की कोशिश की और यहाँ तक कि झंडे का अपमान करने वाले व्यक्ति की मदद भी की।

इसके बावजूद माजिद फ्रीमैन ने हिंदुओं के खिलाफ झूठा प्रचार शुरू किया, जिससे हिंसा और भड़क गई। 30 अगस्त 2022 को उन्होंने यह झूठा दावा किया कि लीसेस्टर में हिंदुओं ने मुसलमानों की मौत जैसे नारे लगाए। बाद में पुलिस जाँच में यह आरोप पूरी तरह गलत पाया गया।

इसी दिन माजिद फ्रीमैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह अफवाह भी फैलाई कि लीसेस्टर में कुरान का अपमान किया गया है और इसके लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराया। जाँच में यह दावा भी पूरी तरह झूठा साबित हुआ। हालाँकि, इन झूठी खबरों और भ्रामक दावों के कारण पहले ही माहौल बिगड़ चुका था और तनाव बढ़ गया था।

इसके अलावा माजिद फ्रीमैन ने एक और झूठा आरोप लगाकर माहौल को और भड़काया। उन्होंने दावा किया कि हिंदू युवकों के एक समूह ने एक मुस्लिम किशोर का पीछा कर उस पर हमला किया, जबकि यह आरोप भी गलत पाया गया। 4 सितंबर 2022 को, जब लीसेस्टर में मुस्लिम भीड़ हिंदुओं पर हमला कर रही थी, उसी दौरान माजिद फ्रीमैन ने सोशल मीडिया के जरिए अपने समुदाय के लोगों को हिंदुओं के खिलाफ और उकसाया। उनके भड़काऊ पोस्टों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया और हिंसा को बढ़ावा मिला।

लीसेस्टर में हिंदुओं पर 4 से 7 सितंबर के बीच मुस्लिमों ने हमले किए। स्थानीय गणेश चतुर्थी समारोह को भीड़ ने बाधित किया और हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर अंडे फेंके। एक हिंदू पुरुष पर हमला भी हुआ। एक अन्य मामले में, जब माजिद फ्रीमैन ने झूठा दावा किया कि कुछ हिंदू पुरुषों ने एक मुस्लिम लड़की का अपहरण करने की कोशिश की, तो एक हिंदू पुरुष को सोशल मीडिया पर निशाना बनाया गया। पुलिस ने बाद में खुलासा किया कि यह पूरी कहानी झूठी थी।

सोशल मीडिया पर माजिद फ्रीमैन की टीम, ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) और अमेरिका स्थित ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) जैसे कट्टरपंथी संगठन लंबे समय से एक खास कहानी को हवा दे रहे हैं। उनका दावा है कि लीसेस्टर हिंसा के दौरान फ्रीमैन ने एक हिंदू व्यक्ति की जान बचाई थी। इस नैरेटिव के जरिए वे फ्रीमैन को हिंसा भड़काने वाले अपराधी के बजाय एक ‘रक्षक’ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

हालाँकि, यह कहानी बिल्कुल वैसी ही लगती है जैसा शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में देखने को मिला था। उस समय भी ‘इस्लामो-लेफ्टिस्ट’ गुटों ने यह नैरेटिव फैलाया था कि ‘मुस्लिम हिंदू मंदिरों की रक्षा के लिए मानव श्रृंखला बना रहे हैं’। यहाँ बड़ा सवाल यह उठता है कि वे आखिर हिंदुओं की रक्षा किससे कर रहे थे?

ठीक यही बात माजिद फ्रीमैन पर भी लागू होती है। फ्रीमैन ने बुनियादी तौर पर अपने ही समुदाय के लोगों को हिंदुओं पर हमला करने के लिए उकसाया था। ऐसे में, जिस भीड़ को उसने खुद भड़काया, उसी भीड़ से कथित तौर पर एक हिंदू को बचा लेने भर से उसके दंगा भड़काने के गुनाह कम नहीं हो जाते। यह दलील देना कि वह रक्षक है, उतना ही बेतुका है जितना आग लगाने वाले का यह कहना कि उसने एक व्यक्ति को जलने से बचा लिया था।

केज इंटरनेशनल की ‘माजिद फ्रीमैन को रिहा करो’ की वकालत

वर्ष 2003 में ‘केजप्रिज़नर्स प्रोजेक्ट’ (CagePrisoners Project) के रूप में शुरू हुआ यह संगठन 2013 में ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) बन गया। अपनी वेबसाइट के अनुसार, यह संस्था उन कैदियों की स्थिति और उनके ठिकाने के बारे में जानकारी देने का काम करती है, जिन्हें ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के तहत पकड़ा गया है। यह डेटा उनके परिवारों, वकीलों, मीडिया और शिक्षाविदों के लिए जुटाया जाता है।

हालाँकि, इस एनजीओ (NGO) का इतिहास विवादों से भरा रहा है। ‘आतंकवाद विरोधी कानूनों’ के दुरुपयोग का विरोध करने के नाम पर यह संस्था कई बार इस्लामी कट्टरपंथियों और यहाँ तक कि खूंखार आतंकवादियों का बचाव करती नजर आई है। इसका एक बड़ा उदाहरण सितंबर 2022 में देखने को मिला, जब ‘केज इंटरनेशनल’ ने मोहम्मद रहीम अल-अफगानी की रिहाई की वकालत की थी। गौरतलब है कि अल-अफगानी खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन का बेहद करीबी सहयोगी रहा है।

इसके अलावा, केज इंटरनेशनल (CAGE International) ‘लेडी अल-कायदा’ के नाम से कुख्यात आफिया सिद्दीकी की रिहाई के लिए भी वकालत कर चुका है। सिद्दीकी फिलहाल अफगानिस्तान में अमेरिकी अधिकारियों पर हमले के जुर्म में दोषी करार दिए जाने के बाद 86 साल की जेल की सजा काट रही है। ऑपइंडिया की एक पिछली रिपोर्ट के अनुसार, 2008 में अमेरिकी न्याय विभाग ने उसके पास से कई संदिग्ध चीजें बरामद की थीं। इनमें उसके हाथ से लिखे कुछ नोट्स भी शामिल थे, जिनमें बड़े पैमाने पर जनहानि करने वाले हमलों का जिक्र किया गया था।

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) फिलिस्तीनी इस्लामिक आतंकी संगठन हमास का भी कट्टर समर्थक है। अगर फिर से माजिद फ्रीमैन की बात करें, तो इसी ‘इस्लामिस्ट एनजीओ’ ने जुलाई 2025 में फ्रीमैन के समर्थन में एक एकजुटता कार्यक्रम आयोजित किया था। इस संस्था ने दावा किया कि फ्रीमैन पर आतंकवाद के आरोप सिर्फ इसलिए लगाए गए हैं क्योंकि उन्होंने फिलिस्तीन के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए कुछ शब्द साझा किए थे।

लीसेस्टर में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा के मामले में माजिद फ्रीमैन को दोषी करार दिए जाने के तुरंत बाद, ‘केज इंटरनेशनल’ने एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की। इस कट्टरपंथी संगठन ने दावा किया कि फ्रीमैन को एक ‘राजनीति से प्रेरित हिंदुत्व दंगा ट्रायल’ के तहत जेल भेजा गया है।

हैरानी की बात यह है कि इस संगठन ने लीसेस्टर के पीड़ित हिंदुओं को ही ‘हिंदुत्ववादी आंदोलनकारी’ बता दिया और उन्हें 2022 की उस हिंसा का गुनहगार ठहराने की कोशिश की, जो असल में कट्टरपंथियों द्वारा सुनियोजित थी। जबकि सच यह है कि उस समय हिंदू समाज ही इन हमलों का शिकार हुआ था और इस पूरी हिंसा की आग को माजिद फ्रीमैन द्वारा फैलाई गई झूठी खबरों (डिसइन्फॉर्मेशन) ने ही हवा दी थी।

लीसेस्टर में हुई हिंसा को लेकर ‘केज इंटरनेशनल’ ने बेहद गंभीर और भ्रामक दावा किया है। इस संगठन का कहना है कि ‘2022 में लीसेस्टर में ‘हिंदुत्व’ से प्रेरित जो दंगे हुए, उनमें लीसेस्टरशायर पुलिस और विशेष रूप से चीफ कांस्टेबल रॉब निक्सन स्थिति को संभालने में पूरी तरह नाकाम रहे। पुलिस ने मुस्लिम मोहल्लों में हिंदुत्ववादी आंदोलनकारियों को अर्धसैनिक शैली (paramilitary-style) में मार्च करने की इजाजत दी, जिससे सीधे तौर पर सामुदायिक तनाव पैदा हुआ।’

हालाँकि, सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। भले ही माजिद फ्रीमैन, मोहम्मद हिजाब (एक अन्य कट्टरपंथी और हिंसा का मुख्य उकसाने वाला) और उनके समर्थक लगातार ‘हिंदुत्व’ और हिंदुओं को इस हिंसा का दोषी ठहराने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन ब्रिटेन की अदालत ने उनके इस प्रोपेगेंडा की धज्जियाँ पहले ही उड़ा दी हैं। कोर्ट की जाँच में यह साफ हो चुका है कि हिंदुओं के खिलाफ हिंसा सुनियोजित थी।

अब, 9 जनवरी को होने वाले माजिद फ्रीमैन के दोबारा ट्रायल से पहले, ‘केज इंटरनेशनल’ (मुख्य रूप से पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश मुस्लिम चलाते हैं) कट्टरपंथियों को लीसेस्टर क्राउन कोर्ट के बाहर जुटने के लिए उकसा रहा है। इसे ‘एकजुटता’ दिखाने का नाम दिया जा रहा है, लेकिन जानकारों के बीच यह चिंता बढ़ गई है कि यह एकजुटता नहीं, बल्कि अदालती कार्यवाही को प्रभावित करने के लिए ‘शक्ति प्रदर्शन’ की एक सोची-समझी कोशिश है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

सोमनाथ मंदिर के पुननिर्माण में अड़ंगा डाल नेहरू ने की शुरुआत, वही लीगेसी आगे बढ़ाता रहा गाँधी परिवार: प्रवेश के बाद राहुल गाँधी ने खुद को बताया ‘गैर-हिंदू’

सोमनाथ का नाम आते ही इतिहास अपनेआप बोलने लगता है। वह मंदिर, जिसे बार-बार तोड़ा गया, बार-बार लूटा गया, पर हर बार हिंदू समाज ने उसे फिर खड़ा किया। मंदिर के इसी संघर्ष को 1000 साल पूरे होने जा रहे हैं, जब 1026 ईस्वी में मुस्लिम शासक महमूद गजनवी ने मंदिर पर आक्रमण किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी बताया और कहा कि यह संदेश देता है कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं।

इसी बीच राहुल गाँधी का नाम भी सोमनाथ मंदिर से चर्चा में आया है। राहुल गाँधी का वह पुराना किस्सा, जिसपर कॉन्ग्रेसियों ने खूब पाखंड फैलाया। जब साल 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गाँधी सोमनाथ मंदिर गए थे। उस वक्त मंदिर के विजिटर रजिस्टर की एक एंट्री को लेकर विवाद हुआ।

मंदिर के रजिस्टर में धर्म के कॉलम में राहुल गाँधी का धर्म ‘ईसाई’ दर्ज बताया गया। बाद में इस पर तर्क भी दिए गए, लेकिन सवाल वहीं का वहीं रहा। कॉन्ग्रेस के पास स्पष्टीकरण के लिए कुछ नहीं था, बल्कि लोगों को और ज्यादा भ्रम में डाल दिया गया। बात यहाँ आकर टिकी कि राहुल गाँधी का गैर-हिंदू रजिस्टर में नाम लिखा गया। लेकिन आज भी राहुल गाँधी के ‘ईसाई’ होने का लोगों का सवाल ज्यों की त्यों ही है।

यह राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस की वही सोच है, जो बार-बार हिंदू आस्था के सवाल पर असहज दिखाई देती है। यह कोई एक घटना या बयान की बात नहीं है, बल्कि एक लंबी राजनीतिक और वैचारिक परंपरा का हिस्सा है। राहुल गाँधी खुद को हिंदू बताते हैं, मंदिर-मंदिर दर्शन करते हैं, लेकिन जब बात धार्मिक पहचान की आती है तो तस्वीर धुँधली हो जाती है।

सोमनाथ सिर्फ राहुल गाँधी की एक यात्रा का मुद्दा नहीं है। यह उस विरासत का हिस्सा है, जिसे उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस दशकों से लेकर चल रही है। आजादी के बाद जब देश ने तय किया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण होगा, तब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके पक्ष में थे। सरदार पटेल ने इसे हिंदू समाज के आत्मसम्मान से जोड़ा।

लेकिन उस समय राहुल गाँधी के परनाना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस पुनर्निमाण से असहज थे। उन्होंने खुलकर कहा था कि देश को धार्मिक पुनर्निमाण से दूर रहना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रपति के उद्घाटन में जाने पर भी आपत्ति जताई। यह तथ्य इतिहास का हिस्सा है।

क्यों राहुल गाँधी का साल 2017 के उस किस्से से लेकर नेहरू के सोमनाथ विरोध तक एक ही धागे में जुड़े दिखते हैं। क्यों यह कॉन्ग्रेस पार्टी की वही हिंदू-विरोधी लीगेसी है। यह कोई अचानक पैदा हुई सोच नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही वह असहजता है। जो हिंदू आस्था के सवाल पर बार-बार सामने आती रही है। राहुल गाँधी का सोमनाथ जाना और फिर विजिटर रजिस्टर में धर्म को लेकर उठा विवाद नेहरू की सोमनाथ मंदिर पर असहजता का आधुनिक रूप लगता है, जैसे इतिहास खुद वर्तमान को आईना दिखा रहा हो।

समय बदला, पीढ़ियाँ बदलीं लेकिन यह असहजता बनी रही। कभी राम मंदिर आंदोलन को कट्टरता कहकर खारिज किया गया। कभी काँवड़ यात्रा पर सवाल उठाए गए कि सड़कें क्यों रोकी जाती हैं। कभी दीपावली पर पटाखों को लेकर नैतिकता का पाठ पढ़ाया गया।

कॉन्ग्रेस की राजनीति में यह पैटर्न बार-बार उभरता है। हिंदू आस्था को या तो संदेह की नजर से देखा जाता है या फिर उसे राजनीतिक रूप देकर असहज मान लिया जाता है। राहुल गाँधी का साल 2017 वाला सोमनाथ मंदिर का किस्सा इसी लंबे सिलसिले की एक कड़ी बन जाता है। यह किस्सा छोटा हो सकता है, लेकिन यह उस बड़ी कहानी को मजबूती देता है जिसमें कॉन्ग्रेस और हिंदू आस्था के बीच दूरी साफ दिखाई देती है।

यही वजह है कि जब आज सोमनाथ पर हुए आक्रमण के 1000 साल पूरे होने की बात होती है, तो सिर्फ महमूद गजनवी की बात नहीं होनी चाहिए। बल्कि यह भी जरूरी है कि आज की राजनीति उस इतिहास से क्या सीख लेती है।

एक तरफ प्रधानमंत्री खुलकर सोमनाथ को भारत की अटूट आस्था का प्रतीक बताते हैं और दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस की वही पुरानी असहजता बार-बार सामने आती है। यही कारण है कि समस्या सिर्फ घटना या बयान की नहीं, बल्कि उस लीगेसी की है, जो हिंदू आस्था को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाते।

सोमनाथ आज भी खड़ा है, वो भी पहले से अधिक मजबूत। शायद यही इस देश की सबसे बड़ी सच्चाई है।

सपा के गुंडाराज में डर से नहीं आती थी इंडस्ट्रियाँ, CM योगी के राज में UP बना पसंदीदा: 16 महीनों में तैयार हुआ अशोक लेलैंड का EV प्लांट

उत्तर प्रदेश के लखनऊ के सरोजिनी नगर में जहाँ कभी पहले लैंब्रेटा बनाने वाला स्कूटर इंडिया की फैक्टरी हुआ करती थी, वहाँ अब लोगों को उनके गंतव्य तक पहुँचाने वाले इलेक्ट्रिक व्हीकल बसें बनाई जा रही हैं। यह कर रहा है- अशोक लेलैंड। 9 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अशोक लेलैंड के स्मार्ट इलेक्ट्रिक बसों के प्लांट का उद्घाटन करने वाले हैं।

अशोक लेलैंड का यह प्लांट महज 16 महीनों में ही बनकर तैयार हो गया है और यह अपने आप में ही एक उपलब्धि है। अशोक लीलैंड के लखनऊ के ईवी प्लांट के बारे में हिंदूजा ग्रुप के कॉरपोरेट और सेल्स के अध्यक्ष एस के चढ्ढा बताते हैं कि आमतौर पर इस तरह के प्लांट को बनाने में 38 से 40 महीने लग जाते हैं लेकिन इसे 16 महीना में पूरा करने का पूरा श्रेय सीएम योगी की सरकार की सहायता और उनके दृढ़ निश्चय को जाता है।

लगभग 2 साल पहले हमने उत्तर प्रदेश में इस प्लांट का सपना देखा था और अब वह सच हुआ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों का ही सबसे बड़ा योगदान रहा है।

योगी सरकार के इंडस्ट्रियल पॉलिसी के कारण ही अशोक लेलैंड ने उत्तर प्रदेश में इंडस्ट्री लगाने पर विचार किया। 2023 में योगी सरकार के साथ समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद अशोक लेलैंड को योगी सरकार ने सरोजिनी नगर में 70 एकड़ की जमीन आवंटित की।

यह जमीन इससे पहले स्कूटर इंडिया के पास थी। वह फैक्ट्री बंद हुई तो जमीन खाली हो गई और योगी सरकार ने 75% लैंड सब्सिडी के साथ इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल का प्लांट लगाने के लिए यह जमीन अशोक लेलैंड को दे दी।

अशोक लेलैंड का लखनऊ स्थित प्लांट

चड्ढा बताते हैं कि कई जगहों को देखने के बाद ईवी प्लांट के लिए इस जगह को सुनिश्चित किया गया। चड्ढा कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दृढ़ इच्छा शक्ति और उनकी कमिटमेंट के चलते ही हिंदूजा ग्रुप नाम अशोक लीलैंड को यहाँ पर शुरू करने को लेकर सकारात्मकता मिली।

15 सितंबर 2023 में अशोक लेलैंड का उत्तर प्रदेश सरकार के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया। इसके बाद फरवरी 2024 में भूमि पूजन के साथ ही प्लांट का निर्माण शुरू हो गया। 16 महीने में इस परियोजना को पूरा कर अशोक लेलैंड ने एक नया इतिहास रचा है कि हमारे समूह के लिए यह एक ऐतिहासिक मौका है।

गुंडा राज में लगता था डर

एसके चढ्ढा बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में यह हमारा पहला प्लांट है। इससे पहले यहाँ प्लांट बनाने की बात से काफी डर लगता था। इसके पीछे असुरक्षा, निर्माण कार्य को रोकने, काम में बढ़ा डालने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता था।

योगी सरकार के आने के बाद यहाँ की विकास योजनाएँ, प्रयागराज का कुंभ मेला का प्रबंधन और अन्य विकास के काम को देखा और इसके बाद ही लखनऊ में प्लांट लगाने का निर्णय शुरू किया गया। इस प्लांट के पहले चरण में 2500 बसों का निर्माण किया जाएगा। इसके बाद इसकी संख्या को बढ़ाकर 5000 और फिर 10000 तक की जाएगी।

EV बस की असेंबली करते कामगार

इसके चढ्ढा बताते हैं कि इस प्लांट में महिलाओं के प्रशिक्षण के लिए स्किल डेवलपमेंट सेंटर ‘नालंदा’ तैयार किया गया है। यह सीएम योगी आदित्यनाथ का महिला सशक्तिकरण को लेकर किया गया प्रण है कि देश की बेटियों को भी प्रशिक्षण मिले और वह भविष्य की टेक्नोक्रेट बनकर सामने आएँ।

₹1000 करोड़ का होगा निवेश

अशोक लेलैंड ने लखनऊ के इस प्लांट में 1000 करोड़ रुपए का निवेश करने की योजना बनाई है। हर साल इस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट से पहले 2500 बसें तैयार होंगी। चड्ढा का कहना है कि इस ईवी प्लांट को आगे और भी विस्तार दिया जाएगा और इससे लगभग 10,000 लोगों को रोजगार मिलने की भी संभावना जताई है।

अशोक लेलैंड के लखनऊ के प्लांट हेड शक्ति सिंह यादव ने बताया कि उत्तर प्रदेश में देश की 30% से अधिक जनसंख्या रहती है। सरकार का भी यही विजन है कि प्रदेश और देश में प्रदूषण रहित वाहनों की संख्या बढ़ाई जाए।

इसी विजन को धरातल पर लाने के लिए अशोक लेलैंड ने लखनऊ में प्लांट बनाया है जिसमें इलेक्ट्रिक व्हीकल को वरीयता दी जाएगी। इस प्लांट में ईवी वाहनों के साथ अल्टरनेट फ्यूल्स और हाइड्रोजन बेस्ड वाहनों को भी निर्मित किए जाने पर योजना बनाई गई है।

शक्ति सिंह का कहना है कि योगी सरकार की योजना में सिंगल विंडो पोर्टल में सिंगल विंडो पोर्टल प्रणाली ‘निवेश मित्रा’ बनाई है। उसे प्रदेश में काम करना काफी आसान हो गया है। इसके तहत योजना के लिए हर तरह की मंजूरी ऑनलाइन ही मिल जाती है। इस तरह का प्रावधान अन्य किसी भी राज्य में नहीं है।

इस पोर्टल की वजह से ही सरकार की अलग-अलग विभागों की मंजूरी आसानी से मिलना संभव हुई है। पहले लगभग इन 45 विभागों में लगभग 500 पत्रों की मंजूरी लेनी पड़ती थी जिसमें पहले काफी समय लगता था। निवेश मित्रा ने इसे आसान बनाया है।

प्लांट को लेकर शक्ति सिंह कहते हैं कि यह उत्तर प्रदेश के अर्थव्यवस्था में मील का पत्थर साबित होगा क्योंकि प्रदेश की कई डीजल बसों को इलेक्ट्रिक बसों में बदल जाएगा।इसके अलावा उत्तर प्रदेश में रहने वाले श्रमिकों और कामगारों को भी दक्षता के प्रति प्रशिक्षण के साथ रोजगार के अवसर मिलेंगे।

शक्ति सिंह के अनुसार 2500 बसों के निर्माण के लिए लगभग 1000 कामगार लोगों की आवश्यकता पड़ेगी। इसके अलावा सब्सिडियरी श्रमिकों और सप्लायर को भी फायदा मिलेगा।फरवरी 2024 में प्लांट लगाने के बाद इसका उद्घाटन नवंबर 2025 में ही होना था लेकिन कुछ निजी करणों के चलते अशोक लीलैंड को यह समझ जनवरी तक स्थगित करना पड़ा।

टाटा ने भी योगी सरकार में की शुरुआत

अशोक लीलैंड से पहले वर्ष 2019 में टाटा मोटर्स ने भी लखनऊ में ही इलेक्ट्रिक व्हीकल बनाने का काम शुरू किया है। इसी कड़ी में अशोक लीलैंड भी अब शामिल हो गया है। इससे उत्तर प्रदेश ईवी ट्रांसपोर्टेशन का हब भी बनने की ओर अग्रसर हो गया है, जहां से पूरे देश में स्मार्ट स्विच इलेक्ट्रिक व्हीकल जाएगी और लोगों का जीवन आसान बनाएंगी।

यह बात तो साफ है कि योगी सरकार की इंडस्ट्रियल पॉलिसी के चलते ही महज 2 वर्षों में एक ऐसे प्रोजेक्ट को फाइलों से जमीन पर उतार दिया जो न केवल आम जनमानस को सुविधा देगी पर साथ ही रोजगार सृजन का भी मौका मिलेगा।

जहाँ अखिलेश की सरकार में गुंडाराज के चलते उद्यमी उत्तर प्रदेश में आना भी जरूरी नहीं समझते थे, वहीं अशोक लेलैंड के इस प्रोजेक्ट के धरातल पर आने से अब और भी इंडस्ट्री उत्तर प्रदेश में अपनी जगह तलाश रही हैं।

सिर्फ एक तीर का निशान और 10000 km दूर अंटार्कटिका के भूगोल की सारी जानकारी: जानिए सोमनाथ मंदिर में स्थापित ‘बाण स्तंभ’ का रहस्य

भारत की पश्चिमी तटरेखा पर अरब सागर के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर प्राचीन हिंदू सभ्यता की गौरवशाली विरासत, अदम्य साहस और पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है।

सदियों से यह केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टि और सनातन परंपरा की अविचल शक्ति का साक्षी रहा है। इसी मंदिर परिसर में स्थित एक रहस्यमयी स्तंभ, बाण स्तंभ आज भी श्रद्धालुओं और इतिहासकारों के लिए जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है।

बाण स्तंभ: जहाँ आध्यात्म और विज्ञान का अद्भुत संगम

सोमनाथ मंदिर के दक्षिण दिशा में, समुद्र की ओर मुख किए खड़ा बाण स्तंभ प्राचीन भारत के वैज्ञानिक और भौगोलिक ज्ञान का अनोखा प्रमाण है। इस स्तंभ के शीर्ष पर एक गोलाकार संरचना है, जिसके आर-पार एक बाण (तीर) अंकित है, जो ठीक दक्षिण दिशा की ओर संकेत करता है।

‘भारत की समुद्री विरासत’ नामक पुस्तक का भाग

स्तंभ के निचले भाग पर संस्कृत में अंकित एक शिलालेख लिखा है, “आसमुद्रान्त दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग” यानी  इस स्थान से लेकर दक्षिण ध्रुव (अंटार्कटिका) तक कोई पर्वत या अवरोधक नहीं है। यह कथन एक भौगोलिक सत्य है।

सोमनाथ तट से लेकर लगभग 10,000 किलोमीटर दूर अंटार्कटिका तक वास्तव में कोई बड़ा स्थलखंड या पर्वत नहीं आता। यह शिलालेख इस बात का प्रमाण है कि छठी शताब्दी के आसपास के भारतवासियों को पृथ्वी की दिशा, समुद्री मार्ग और भूगोल का गहरा ज्ञान था, वह भी उस युग में जब आधुनिक नेविगेशन उपकरणों का अस्तित्व नहीं था।

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में वेरावल के समीप प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर का उल्लेख शिव पुराण के 14वें अध्याय में मिलता है। यह स्थान कपिला, हिरण और पौराणिक सरस्वती नदियों के संगम के कारण त्रिवेणी संगम के नाम से भी प्रसिद्ध है।

सोमनाथ केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि सनातन धर्म की निरंतरता, विश्वास और सांस्कृतिक आत्मा का केंद्र है। समुद्र की लहरों के बीच खड़ा यह मंदिर सदियों से भारत की आध्यात्मिक चेतना का मार्गदर्शन करता आया है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 वर्षों की संघर्षगाथा

जनवरी 2026 सोमनाथ मंदिर के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस वर्ष आक्रांता महमूद गजनवी द्वारा वर्ष 1026 में किए गए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसके बाद मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए, इस्लामी आक्रांताओं द्वारा इसे ध्वस्त किया गया, लेकिन हर बार सोमनाथ अपने खंडहरों पर फिर से उठ खड़ा हुआ।

आजादी के बाद भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल, प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और केएम मुंशी जैसे दूरदर्शी नेताओं के प्रयासों से मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ और 11 मई 1951 को इसे वर्तमान स्वरूप में राष्ट्र को समर्पित किया गया।

सोमनाथ की इसी हजार वर्षीय संघर्ष और पुनरुत्थान की यात्रा को स्मरण करते हुए सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया जा रहा है। 5 जनवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर एक विस्तृत लेख साझा किया, जिसमें उन्होंने सोमनाथ को भारत की आत्मा, स्वाभिमान और सनातन परंपरा की अमर पहचान बताया।

सोमनाथ मंदिर आज भी यह संदेश देता है कि आक्रमण हो सकते हैं, संरचनाएँ गिर सकती हैं, लेकिन भारत की आस्था, संस्कृति और चेतना को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।

पहले तोड़े हिंदू-जैन मंदिर, तब भरूच में खड़ी हुई जामा मस्जिद: जानिए क्या बताता है इतिहास, दस्तावेजों में सब दर्ज

भरूच शहर की जामा मस्जिद एक बार फिर विवादों के घेरे में है। दो दिन पहले, अखिल भारतीय संत समिति के संतों ने आरोप लगाया कि मस्जिद ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) से सुरक्षित होने के बावजूद वहाँ अवैध निर्माण किया गया है और पुरातत्व विभाग के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। संतों ने इन आरोपों के साथ धरना प्रदर्शन किया। आखिरकार पुलिस प्रशासन को बीच-बचाव करना पड़ा और कार्रवाई का भरोसा देते हुए दो महीने का समय माँगा। संतों ने भी पुलिस पर भरोसा जताते हुए धरना खत्म कर दिया है और अब गेंद पुलिस के पाले में है।

धरने और संतों की माँगों के बीच अब एक पुराना मुद्दा फिर से चर्चा में है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भरूच की यह जामा मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई थी? क्या यहाँ अतीत में हिंदू और जैन मंदिर थे? इतिहास और उस दौर की किताबें इस बारे में क्या कहती हैं, आइए जानते हैं।

इसका सबसे हालिया जिक्र सीताराम गोयल की एडिट की हुई किताब ‘हिंदू टेंपल्स: व्हॉट हैपन्ड टू देम’ (Hindu Temples: What Happened to Them) में मिलता है। वैसे तो यह किताब मुख्य रूप से राम जन्मभूमि विवाद पर केंद्रित थी, लेकिन इसमें एक अलग हिस्सा उन मस्जिदों और धार्मिक ढाँचों का भी है, जिन्हें भारत में मंदिरों को नष्ट करके बनाया गया था। इस किताब में राज्य और जिले के हिसाब से ऐसी मस्जिदों की पूरी सूची दी गई है।

सीताराम गोयल की किताब की क्रमवार सूची में अगर हम गुजरात वाला हिस्सा खोलें और भरूच जिले को देखें, तो सबसे पहला नाम ‘जामा मस्जिद’ का ही आता है। इसमें उल्लेख है कि इस मस्जिद का निर्माण साल 1321 में किया गया था। साथ ही यह भी साफ लिखा गया है कि मस्जिद को बनाने में हिंदू और जैन मंदिरों की सामग्री (स्तंभ और अवशेष) का इस्तेमाल किया गया था।

इसी पुस्तक का दूसरा भाग है- ‘द इस्लामिक एविडेंस’ (The Islamic Evidence)। यहाँ भी भरूच की इस मस्जिद का जिक्र मिलता है। मुगल काल के दस्तावेजों का हवाला देते हुए लिखा गया है कि भरूच की जामा मस्जिद में हिंदू और जैन मंदिरों के खंभों का उपयोग हुआ है।

कई ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात पर एकमत हैं कि भरूच की यह जामा मस्जिद अलाउद्दीन खिलजी के समय में बनी थी। खिलजी एक आक्रामक हमलावर था, जिसने भारत में हिंदुओं की आस्था पर चोट करते हुए कई मंदिरों को तोड़ा था। सोमनाथ मंदिर भी उन्हीं मंदिरों में से एक था।

प्रसिद्ध इतिहासकार अमीर खुसरो लिखते हैं कि साल 1300 में खिलजी ने गुजरात के मंदिरों को निशाना बनाया और इस काम के लिए उलुघ खान को गुजरात भेजा। उलुघ खान सबसे पहले सोमनाथ आया, यहाँ उसने मंदिर तोड़ा और जमकर लूटपाट की। इसके बाद वह खंभात की ओर बढ़ा। अमीर खुसरो के अनुसार, खंभात के बाद उसने तटीय इलाकों के कई शहरों में तबाही मचाई और मंदिर ध्वस्त किए। भरूच भी इन्हीं तटीय शहरों में से एक था।

1832 में UK में जन्में पुरातत्वविद (Archaeologist) जेम्स बर्गेस ने भारत में काफी काम किया। वे 1886 से 1889 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक (DG) भी रहे। उससे पहले वे पश्चिमी भारत के पुरातत्व विभाग के निदेशक थे। उन्होंने पश्चिमी भारत के ऐसे कई ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया और जो कुछ देखा, उसे अपनी डायरी और किताबों में दर्ज किया।

जेम्स बर्गेस ने अपनी किताब ‘ऑन द मुहम्मडन आर्किटेक्चर ऑफ भरूच, खंभात, धोलका, चंपानेर एंड महमूदबाद इन गुजरात’ में भरूच की इस मस्जिद का विशेष उल्लेख किया है।

इस जगह का परिचय देते हुए जेम्स बर्गेस लिखते हैं कि लगभग 1297 के आसपास खिलजी के आदेश पर भरूच में हमले शुरू हुए थे। इन हमलों के दौरान हिंदू मंदिर निशाने पर थे। जैसा कि अन्य जगहों पर हुआ, भरूच में भी हिंदू और जैन मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया और उन्हीं मंदिरों की सामग्री (खंभों और पत्थरों) का उपयोग करके ‘जामा मस्जिद’ खड़ी की गई।

बर्गेस ने अपनी किताब में मस्जिद के नक्शे और तस्वीरों के साथ पूरी जानकारी दी है, जिससे यह बात और स्पष्ट होती है। निर्माण की बारीकियों बताते हुए बर्गेस कहते हैं कि मस्जिद के खंभों के बीच की दूरी एक समान नहीं है। कहीं यह दूरी 8 फीट है, कहीं 13 फीट, तो कहीं 10 फीट। माप में इस अंतर की वजह से मस्जिद के गुंबदों के आकार में भी कमियाँ रह गई थीं।

बर्गेस की किताब से आभार

बर्गेस लिखते हैं कि निर्माण में यह ऊँच-नीच इसलिए है क्योंकि इसमें हिंदू मंदिरों की सामग्री का इस्तेमाल किया गया था। मस्जिद की छत का कुछ हिस्सा पुराने जैन और हिंदू मंदिरों के छोटे गुंबदों से लिया गया है। वहीं, कुछ खंभों पर जानवरों की कलाकृतियाँ बनी हुई हैं, जो साफ तौर पर दर्शाती हैं कि ये स्तंभ हिंदू मंदिरों के थे।

मस्जिद की पिछली दीवार पर बनी ‘मेहराब’ (दीवार में अर्धगोलाकार जगह) का जिक्र करते हुए बर्गेस लिखते हैं कि इसकी बनावट गुजरात की सामान्य मस्जिदों जैसी नहीं है। यहाँ तक कि तीनों मेहराबों की निर्माण शैली भी एक-दूसरे से काफी अलग दिखाई देती है।

आगे वे आंगन (कोर्टयार्ड) के बारे में लिखते हुए बताते हैं कि प्रवेश द्वार पर लगा संगमरमर का दरवाजा स्पष्ट रूप से किसी जैन मंदिर का लगता है। इस पर जैन धर्म से जुड़ी आकृतियाँ भी दिखाई देती हैं। बर्गेस ने यह भी नोट किया है कि इनमें से ज्यादातर आकृतियों को जानबूझकर नष्ट कर दिया गया था।

बर्गेस की किताब से आभार

‘भरूच जिला डायरेक्टरी की रिपोर्ट’ नाम के एक दस्तावेज में लिखा है कि खिलजी के समय में प्राचीन शहर पर आक्रमण हुआ था और उसी दौरान जैन देरासर (मंदिर) पर कब्जा करके वहाँ मस्जिद बनाई गई थी।

इसी रिपोर्ट में मंदिरों की लिस्ट में ‘शामलिया विहार’ नाम के एक देरासर (मंदिर) का उल्लेख मिलता है, जिसके बारे में यह नोट किया गया है कि बाद में मुस्लिम शासकों के समय इसे भी तोड़कर मस्जिद बना दिया गया था।

भरूच जिला कलेक्टर की आधिकारिक वेबसाइट पर भी यह दर्ज है कि जामा मस्जिद का निर्माण प्राचीन जैन मंदिरों के अवशेषों से किया गया था। इसके अलावा, इसमें बताया गया है कि मस्जिद का अधिकांश हिस्सा मंदिर की सामग्री से बना है। वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि इसके पत्थर मंदिरों से लिए गए थे और इसकी ‘मेहराब’ में हिंदू मंदिर के चिह्न (निशान) मौजूद हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन तमाम दस्तावेजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों में कहीं भी कोई विरोधाभास नहीं दिखता है। सभी की जानकारी एक-दूसरे से पूरी तरह मेल खाती है। यहाँ तक कि सरकारी वेबसाइट भी इन सभी तथ्यों की पुष्टि करती है।

यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती भाषा में लिखी गई है। मेघल सिंह परमार की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

आज तेल के लिए हो रहे युद्ध, कभी ‘पक्षियों की बीट’ के लिए बौराई थी दुनिया: पढ़िए जब स्पेन ने Bird Poop के लिए लड़ी जंग, अमेरिका कानून ही ले आया

संयुक्त राज्य अमेरिका ने 3 जनवरी 2026 को वेनेज़ुएला पर एक बड़ा सैन्य हमला किया, जिसे ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व’ नाम दिया गया। इस अभियान में अमेरिकी सेना ने 150 से अधिक विमानों, डेल्टा फ़ोर्स और अन्य विशेष सशस्त्र इकाइयों की मदद से वेनेज़ुएला की राजधानी काराकास में हवाई और जमीनी हमले किए। इसके बाद राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिसिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लेकर अमेरिका भेज दिया गया। कई देशों ने इस कार्रवाई को राष्ट्रपति के अपहरण के समान बताया।

अमेरिकी सरकार का कहना है कि उसकी नाराज़गी मादुरो सरकार से इसलिए है क्योंकि वेनेज़ुएला में ड्रग्स और नार्को-आतंकवाद को बढ़ावा दिया गया। लेकिन दुनिया के बड़े हिस्से की राय है कि इस टकराव की असली वजह वेनेज़ुएला का विशाल तेल भंडार और उससे अमेरिकी कंपनियों को होने वाला आर्थिक लाभ है।

वैश्विक तेल भंडार

पिछले कई दशकों में दुनिया के अनेक युद्ध तेल के लिए लड़े गए हैं। हालांकि इतिहास बताता है कि संसाधनों को लेकर संघर्ष हमेशा तेल तक सीमित नहीं रहे हैं। आज जब वैश्विक ध्यान दक्षिण अमेरिका पर है, तो यह जानना रोचक है कि कभी इसी क्षेत्र में एक युद्ध तेल के लिए नहीं, बल्कि पक्षियों की बीट—जिसे गुआनो कहा जाता है—जैसे संसाधन के लिए लड़ा गया था।

यदि कोई यह मानता है कि अमेरिका का ऐसा आक्रामक रवैया हाल की घटना है, तो इतिहास इससे अलग तस्वीर पेश करता है। अन्य औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी शक्तियों की तरह अमेरिका भी लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों पर गहरी नजर रखता रहा है। कई बार उसने नैतिकता को पीछे छोड़कर अपने हितों को प्राथमिकता दी। इसी कारण एक समय में अमेरिका ने न केवल सोना और चाँदी, बल्कि पक्षियों और चमगादड़ों की बीट तक को भी ‘राष्ट्रीय हित’ का विषय माना।

पक्षियों के मल क्यों आते थे काम

यह दिलचस्प ऐतिहासिक कहानी 19वीं सदी के मध्य के अमेरिका से जुड़ी है। उस समय अमेरिका में खेती तेजी से फैल रही थी। किसान अब सिर्फ अपने खाने भर की खेती नहीं कर रहे थे, बल्कि बाजार और मुनाफे पर आधारित खेती हर जगह शुरू हो चुकी थी। बड़े-बड़े प्लांटेशन अभी भी मौजूद थे, जहाँ ग़ुलामों से काम लिया जाता था, और यह व्यवस्था अटलांटिक दास व्यापार से जुड़ी हुई थी। खेती का पूरा औद्योगीकरण और उसका वैज्ञानिक ज्ञान अभी आने में कई दशक बाकी थे।

इस मुनाफा-केंद्रित खेती के साथ एक गंभीर समस्या सामने आने लगी। हरके बाद पैदावार घटने लगी। 1850 तक अमेरिका के चौथे-पाँचवें खेतों की जमीन अपनी उपजाऊ शक्ति खोने लगी थी। ऐसा लगने लगा कि लगातार ज्यादा मुनाफा कमाने की लालच किसानों से उनकी मिट्टी की ताकत छीन रही है।

साम्राज्यों का तर्क सीधा और कठोर होता है, मुनाफा लगातार बढ़ना चाहिए। लेकिन बढ़ते मुनाफे के लिए ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है और कई बार ये संसाधन देश की सीमाओं के बाहर होते हैं। जब किसी चीज की कमी होने लगती है, तो वही चीज रणनीतिक संसाधन बन जाती है।

इसी दौर में एक ऐसी चीज अचानक बेहद कीमती बन गई, जिससे आज ज्यादातर लोग दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। जो चीज आज हमारी बालकनियों को गंदा कर देती है, वही 19वीं सदी में दुनिया भर की चाहत बन गई। यह चीज अंतरराष्ट्रीय कानून, नौसेना की तैनाती और यहाँ तक कि युद्धों का कारण बनी।

यह पदार्थ था गुआनो समुद्री पक्षियों और चमगादड़ों की सूखी बीट, जिसे पीसकर खेतों में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। गुआनो मुख्य रूप से गरम और सूखे, बिना आबादी वाले द्वीपों से मिलता था, जो मध्य अमेरिका और प्रशांत महासागर में स्थित थे।

दिलचस्प बात यह थी कि बाजार और मुनाफे की खेती से पैदा हुई समस्या का समाधान भी उसी बाजार में मौजूद था। अमेरिकी किसानों के लिए मिट्टी की उर्वरता लौटाने का जवाब गुआनो बना और इसी ने आगे चलकर पूरी दुनिया की राजनीति और युद्धों को प्रभावित किया।

गुआनो: दुनिया का सबसे असंभावित चमत्कारी पदार्थ

आज सुनने में गुआनो किसी साम्राज्य की नींव जैसा नहीं लगता, लेकिन 19वीं सदी में यह बेहद कीमती संसाधन था। गुआनो में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटैशियम भरपूर मात्रा में होते हैं। यही तीन तत्व आज भी NPK खाद के मुख्य घटक हैं। इस वजह से गुआनो एक चमत्कारी जैविक खाद माना जाता था, जो बंजर मिट्टी को फिर से उपजाऊ खेत में बदल देता था।

गुआनो का असर इतना जबरदस्त था कि कई जगहों पर फसल की पैदावार कई गुना बढ़ गई। उस दौर में जब कृषि पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी और बारूद बनाने के लिए नाइट्रेट्स (खासकर पोटैशियम) की जरूरत होती थी, तब गुआनो दोहरा फायदा देने वाला रणनीतिक संसाधन बन गया खेती के लिए भी और सैन्य ताकत के लिए भी।

इसी कारण औपनिवेशिक शक्तियाँ, जो ज्यादा उत्पादन और सैन्य बढ़त चाहती थीं, गुआनो पर कब्जा जमाने के लिए आपस में होड़ करने लगीं। लेकिन गुआनो हर जगह नहीं मिलता था। इसके भंडार बहुत दुर्लभ थे और दुनिया के कुछ गिने-चुने, दूरदराज़ और निर्जन द्वीपों तक सीमित थे।

ये द्वीप सैकड़ों, बल्कि हजारों वर्षों तक इंसानों की पहुँच से बाहर रहे। इसी वजह से वहाँ समुद्री पक्षियों की बीट की परतें एक के ऊपर एक जमा होती गईं। समय के साथ ये परतें सख़्त होकर चट्टानों जैसी बन गईं और इन्हीं से विशाल गुआनो भंडार तैयार हुए।

इन द्वीपों की जलवायु भी गुआनो को ताक़तवर बनाने में मददगार थी। गर्म और सूखा मौसम, और बहुत कम बारिश, इसके पोषक तत्वों को बहने से बचाता था। इसी कारण इनमें मौजूद तत्व लंबे समय तक सुरक्षित रहते थे।

आज के नज़रिए से यह बात अजीब लग सकती है कि देश कभी पक्षियों की बीट के लिए युद्ध करें। लेकिन उन्नीसवीं सदी के रणनीतिकारों के लिए यह हँसने की नहीं, बल्कि बेहद गंभीर और ज़रूरी बात थी।

सदियों से पक्षियों के मल से ढके द्वीप

वो चट्टानें जिसकी कीमत पहले किसी ने नहीं समझी, बाद में युद्ध हुआ

पेरू के तट के पास स्थित द्वीपों पर उच्च गुणवत्ता का गुआनो बनने के लिए बिल्कुल अनुकूल परिस्थितियाँ थीं। इसी वजह से पेरू का गुआनो दुनिया में सबसे ज्यादा कीमती माना जाता था, क्योंकि उसमें पोषक तत्वों की मात्रा सबसे अधिक थी। औपनिवेशिक ताकतें इन गुआनो द्वीपों को सोने की खान की तरह देखती थीं। इनमें सबसे प्रसिद्ध थे चिंचा द्वीप (Chincha Islands), जो पेरू के समुद्र तट से कुछ दूरी पर स्थित हैं।

ये द्वीप बंजर, तेज हवाओं से घिरे और पूरी तरह निर्जन थे। पहली नजर में ये चट्टानी टापू बिल्कुल बेकार लगते थे। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों की वजह से यहाँ बेहद बड़ी मात्रा में सबसे शुद्ध और ताकतवर गुआनो जमा हो पाया था। यह गुआनो सालों तक खेती की उत्पादकता बनाए रखने और उससे मिलने वाली आय के लिए काफी था, इतना कि इसने साम्राज्यों को ईर्ष्या में डाल दिया।

स्पेन, जिसकी अमेरिका पर पकड़ 19वीं सदी की शुरुआत से ही कमजोर पड़ रही थी, उसने इसमें अपना मौका देखा। 14 अप्रैल 1864 को स्पेन ने चिंचा द्वीपों पर कब्जा कर लिया और वहाँ से गुआनो निकालना शुरू कर दिया, ताकि अपनी खराब होती आर्थिक हालत को संभाला जा सके। लेकिन पेरू और उसके पड़ोसी देश गुआनो की कीमत को अच्छी तरह समझते थे और वे स्पेन को यह खजाना बिना विरोध के देने को तैयार नहीं थे।

नतीजा यह हुआ कि पेरू, चिली, इक्वाडोर और बोलीविया की संयुक्त सेनाओं ने स्पेन को चिंचा द्वीपों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। सुनने में अजीब जरूर लग सकता है कि इतिहास में कैसे ये अनोखा संघर्ष हुआ जहाँ पक्षियों की बीट को लेकर लड़ाई हुई। लेकिन उस समय इस युद्ध में शामिल देशों के लिए मामला बेहद गंभीर था। गुआनो की बिक्री से सेनाओं को पैसा मिलता था, व्यापार चलता था और कई देशों की आर्थिक हालत इसी पर टिकी हुई थी।

पेरू के तट के पास स्थित चिनचा द्वीप

USA ने उठाया फायदा

इन युद्धों को देखते हुए, अमेरिका ने इसका पहले ही हल निकाला। 1856 में अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने गुआनो आइलैंड्स एक्ट नाम का एक कानून पास किया, जो आज भी लागू है। आज यह कानून अजीब लग सकता है, लेकिन उस समय अमेरिकी नेताओं को यह पूरी तरह व्यावहारिक लगा।

इस कानून के तहत किसी भी अमेरिकी नागरिक को यह अधिकार मिल गया कि वह गुआनो से भरपूर किसी निर्जन द्वीप पर अमेरिका की ओर से दावा कर सके। इसके बाद अमेरिकी नागरिक समुद्र यात्राओं पर निकले, गुआनो वाले द्वीप खोजे और उन्हें अमेरिकी क्षेत्र घोषित किया।

1857 में अमेरिका ने 22 तोपों से लैस एक युद्धपोत भेजा, ताकि इन नए दावा किए गए द्वीपों से गुआनो इकट्ठा किया जा सके और उसकी जाँच की जा सके। इसी तरीके से कैरेबियन सागर और प्रशांत महासागर में दर्जनों द्वीपों पर अमेरिका ने दावा किया। वहाँ अमेरिकी झंडे लगाए गए और प्राकृतिक संसाधन निकाले गए।

इन द्वीपों पर बसावट आमतौर पर स्थायी नहीं होती थी। उद्देश्य साफ था गुआनो को अमेरिका भेजो, मुनाफा कमाओ और फिर अगला द्वीप खोजो। अमेरिकी रवैया बेहद व्यावहारिक और सरल था, जहाँ गुआनो है, वहाँ अमेरिका का हित है। गुआनो आइलैंड्स एक्ट के तहत अमेरिका ने सौ से भी ज्यादा द्वीपों पर दावा किया। लेकिन जैसे ही गुआनो खत्म हुआ, ज्यादातर द्वीपों को छोड़ दिया गया।

अमेरिकी गुआनो द्वीप

जिस तरह गुआनो का महत्व अचानक बढ़ा था, उसी तरह वह जल्दी ही खत्म भी हो गया। वैज्ञानिक प्रगति के साथ यह समझ में आ गया कि गुआनो फसलों की पैदावार क्यों बढ़ाता है। इसके पीछे नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की भूमिका साफ हो गई।

इसके बाद कृत्रिम (सिंथेटिक) उर्वरकों का उत्पादन शुरू हुआ, जिनसे बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस मिलने लगे। अब कुछ टन पक्षियों की बीट के लिए युद्धपोत भेजने, कूटनीतिक तनाव पैदा करने या तोपें चलाने की जरूरत नहीं रही।

शुरुआत में गुआनो की जगह बोन मील, पिसा हुआ फॉस्फेट पत्थर जैसे विकल्प इस्तेमाल होने लगे। फिर 1910 के दशक में हैबर प्रक्रिया आने के बाद यूरिया खाद आम हो गई।

इतिहासकारों के लिए इसमें एक रोचक सबक है, जिस संसाधनके लिए कभी युद्धों और कानूनों को सही ठहराता था, वह कुछ ही दशकों में बेकार हो गया। बड़े-बड़े साम्राज्यों ने खुद को बदला, नई दिशा अपनाई और आगे बढ़ गए। पीछे रह गए खाली पड़े द्वीप, जिन पर अब भी सफेद, चॉक जैसी परतें जमी हैं, जो इतिहास की अजीब विडंबनाओं की याद दिलाती हैं।

पूरी बात को समझने के लिए गुआनो युग की एक छोटी समय रेखा पर नजर डालना जरूरी है। 1840 के दशक के आसपास यूरोप में मिट्टी की उर्वरता कम होने लगी थी। 1840 से 1860 के बीच पेरू के गुआनो से भरे द्वीपों को बड़े पैमाने पर खोदकर खाली किया गया।

1856 में अमेरिका ने गुआनो आइलैंड्स एक्ट लागू किया। 1864 से 1866 के बीच स्पेनिश साम्राज्य और उसकी पूर्व उपनिवेशों के बीच चिनचा द्वीपों को लेकर युद्ध हुआ। फिर 1800 के दशक के अंत तक दुनिया ने पक्षियों की बीट यानी गुआनो को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया और कृत्रिम उर्वरकों की ओर बढ़ गई।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रारब्ध राय ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)