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भारतीय सांस्कृतिक विरासत की पहचान रहीं 9 बार वित्त मंत्री के तौर पर बजट के दिन पहनी गई निर्मला सीतारमण की साड़ियाँ: जानिए किस साल कहाँ की साड़ी पहनी और क्या थी उसकी खासियत

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 9वीं बार आम बजट पेश किया। पिछले 9 सालों में उन्होंने अलग-अलग राज्यों की संस्कृति को दर्शाती अलग-अलग खासियत वाली हैंडलूम की साड़ियों को पहन कर देश का बजट पेश किया है। उनकी साड़ियों के अलग अलग रंग के अलग-अलग मायने भी हैं। ये साड़ियाँ भारतीय कारीगरों और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान भी है।

इन साड़ियों के माध्यम से उन्होंने न केवल अपने प्रोफेशनल लुक को दर्शाया, बल्कि भारतीय शिल्प और स्थानीय कारीगरों की कला को भी सम्मानित करने का संदेश दिया।

वित्त मंत्री की साड़ियों पर चर्चा करने से पहले जानते हैं कि आखिर भारत की संस्कृति में साड़ी कितनी पुरानी है। साड़ी शब्द संस्कृत के ‘सट्टिका’ शब्द से बनी है। इसका मतलब होता है कपड़े की पट्टी। पहले पुरुष और महिलाएँ शरीर के निचले हिस्से में कपड़ा लपेटा करते थे, जिससे धोती पहनने के तरीके का विकास हुआ। महिलाओं ने थोड़ा लंबा कपड़ा लपेटना शुरू किया और इससे साड़ी की शुरुआत हुई।

ऋग्वेद में यज्ञ के वक्त पत्नी को साड़ी पहनकर साथ में बैठने का नियम था। माना जाता है कि यजुर्वेद में सबसे पहले साड़ी शब्द का उल्लेख हुआ। हड़प्पा संस्कृति में भी एक महिला की प्रतिमा मिली है, जो लंबे कपड़े को लपेट कर साड़ी की तरह पहनी हुई है यानी साड़ी पहनने की शुरुआत कब हुई, ये ठीक तरह से नहीं बताया जा सकता। इसकी चर्चा महाभारत काल में भी आती है, जब द्रौपदी के चीरहरण के वक्त भगवान श्रीकृष्ण ने उनके कपड़े की लंबाई बढ़ा कर उनकी मर्यादा की रक्षा की थी। इसे साड़ी ही कहा जाता है। ये तो हुई साड़ी की गौरवशाली इतिहास की बात, आज भी भारतीय परंपरा में महिलाओं के पोशाक के रूप में साड़ी सर्वमान्य और सर्वोपरि है।

2026 में वित्त मंत्री ने पहनी कट्टम कांजीवरम साड़ी

वित्त मंत्री सीतारमण जब 9वां बजट पेश करने लोकसभा में पहुँची तो खास कट्टम कांजीवरम साड़ी पहनी हुई थीं। मजेंटा रंग की साड़ी पर सुनहरे धागों से बेहतरीन स्क्वायर पैटर्न बना हुआ था। बॉर्डर को कॉफी ब्राउन शेड में रखते हुए सुनहरे जरी वर्क से हाइलाइट किया गया था। तमिलनाडु की इस साड़ी का इतिहास 400-500 साल पुराना है। इसे कांचीपुरम में बनाया जाता है।

2026 बजट के दिन वित्त मंत्री (साभार- @nsitharamanoffc)

2025 में मधुबनी पेंटिंग की साड़ी

2025 के बजट को पेश करने के लिए निर्मला सीतारमण बिहार की ऑफ-व्हाइट हैंडलूम सिल्क साड़ी सबसे ज्यादा चर्चा में रही थी। इस साड़ी पर मछली थीम वाली मधुबनी पेंटिंग थी, जिसे पद्मश्री सम्मानित दुलारी देवी ने तैयार किया था।

मधुबनी पेंटिंग की साड़ी (साभार- @nsitharamanoffc)

फरवरी 2024 में अंतरिम बजट पेश करते हुए पहनीं कांथा साड़ी

पश्चिम बंगाल की प्रसिद्ध ‘कांथा कढ़ाई’ वाली नीली तुसर सिल्क साड़ी में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2024 में चुनाव से पहले का अंतरिम बजट पेश किया। ये बंगाल के शिल्पकारों के कौशल को दर्शाता है। इन साड़ियों की छपाई काफी लोकप्रिय है।

जुलाई 2024 में अपना पूर्ण बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऑफ व्हाइट हथकरघा मंगलगिरी सिल्क साड़ी पहनी। आंध्र प्रदेश की ये साड़ी काफी सिंपल थी, जिसका बॉर्डर मजैंटा रंग का था।

पूर्ण बजट के दिन वित्त मंत्री का लुक (साभार- @nsitharamanoffc)

2023 में पहनी इल्कल साड़ी

वित्त मंत्री सीतारमण ने 2023 में कर्नाटक की इल्कल साड़ी पहन कर बजट पेश किया। लाल और काले रंग की टेम्पल बॉर्डर वाली साड़ी पर कसुती धागे का काम था। ये साड़ी भारतीय मंदिर वास्तुकला से प्रेरित मानी जाती है।

2023 वित्त मंत्री बजट लुक (साभार- @nsitharamanoffc)

2022 में पहनी बोंमकाई साड़ी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2022 में बजट पेश करते हुए ओडिशा की पारंपरिक बोंमकाई साड़ी पहनी थी। रस्ट ब्राउन कलर की साड़ी का बॉर्डर ऑफ व्हाइट था। ये ओडिशा की बुनाई कला को प्रदर्शित करता है।

2020 में वित्त मंत्री का बजट लुक (साभार- @nsitharamanoffc)

2021 में पहनी पोचमपल्ली साड़ी

तेलंगाना की पहचान पोचमपल्ली साड़ी पहनकर वित्त मंत्री ने 2021 का बजट पेश किया था। ऑफ व्हाइट और लाल रंग की इस सिल्क साड़ी के बॉर्डर पर हरे रंग का इकत डिजाइन किया गया था। पोचमपल्ली की महीन सिल्क बुनाई और पारंपरिक डिजाइन इसे भारतीय हथकरघा कला का उत्कृष्ट उदाहरण बनाती थी।

2021 में वित्त मंत्री का लुक (साभार- @nsitharamanoffc)

2020 में पहनी तमिलनाडु की साड़ी

2020 में वित्त मंत्री ने तमिलनाडु की पीले रंग की सिल्क साड़ी पहनी थी, जिसका बॉर्डर हरे रंग का था। साड़ी का हल्का पीला रंग उनके शांत और गंभीर व्यक्तित्व को दर्शा रहा था, जबकि हरे रंग का बॉर्डर इसे पारंपरिक और सुरुचिपूर्ण टच दे रहा था। ये ऊर्जा और खुशी का प्रतीक था।

2020 बजट के दिन का लुक (साभार- @nsitharamanoffc)

2019 में पहनी मंगलगिरी साड़ी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने पहले बजट 2019 को पेश करते वक्त आंध्रप्रदेश की मंगलगिरी साड़ी पहनी थी। गुलाबी रंग और सुनहरे बॉर्डर वाली यह साड़ी स्थिरता और गंभीरता का प्रतीक था।

2019 में बजट के दिन (साभार- @nsitharamanoffc)

वित्त मंत्री ने आज तक बजट पेश करते वक्त जितनी भी साड़ियाँ पहनी हैं, वे सभी हैंडलूम की खास राज्यों की संस्कृति को दर्शाती हुई थी। चाहे वह 2019 में आंध्रपर्देश की मंगलगिरी साड़ी हो या 2026 की तमिलनाडु की कट्टम कांजीवरम सिल्क साड़ी। उनका हर साल का साड़ियों का सलेक्शन उनके व्यक्तित्व को चार चाँद लगाने वाला रहा है।

हाई स्पीड रेल, टूरिज्म बूस्ट, टेक्सटाइल पार्क… लेकिन इनकम टैक्स में बदलाव नहीं: मोदी सरकार के बजट 2026 का पूरा विश्लेषण, जानें फायदे और नुकसान

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रविवार (1 फरवरी 2026) को लोकसभा में वर्ष 2026-27 का केंद्रीय बजट पेश किया। यह बजट मोदी सरकार का पहला ऐसा बजट है जो ‘कर्तव्य भवन’ में तैयार हुआ और तीन मुख्य कर्तव्यों से प्रेरित है: आर्थिक विकास को तेज और स्थिर रखना, लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना तथा हर परिवार, समुदाय और क्षेत्र तक संसाधनों की पहुँच सुनिश्चित करना। बजट में कुल व्यय 53.5 लाख करोड़ रुपए और पूंजीगत व्यय 12.2 लाख करोड़ रुपए का रिकॉर्ड स्तर रखते हुए सरकार ने राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.3 प्रतिशत पर नियंत्रित रखने का संकल्प दिखाया है।

यह बजट स्पष्ट रूप से ‘विकसित भारत’ के विजन को आगे बढ़ाने वाला है। जहाँ एक तरफ इंफ्रास्ट्रक्चर, एमएसएमई, बायोफार्मा और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश की घोषणा हुई है, वहीं टूरिज्म, खेल और दुर्लभ खनिजों जैसे उभरते सेक्टरों को नई गति देने का प्रयास किया गया है। इनकम टैक्स स्लैब में कोई बदलाव न होने से निरंतरता बनी रहेगी, लेकिन एसटीटी में बढ़ोतरी और कुछ अन्य कर परिवर्तनों ने बाजार को थोड़ा झटका भी दिया।

इस लेख में हमने बजट 2026 का सटीक और निष्पक्ष विश्लेषण किया है। इसमें हम जानेंगे कि कैपेक्स में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी से इंफ्रास्ट्रक्चर को कितनी मजबूती मिलेगी, एमएसएमई और बायोफार्मा के लिए 10-10 हजार करोड़ के फंड का क्या असर होगा, सात हाई स्पीड रेल कॉरिडोर और टूरिज्म बूस्ट से रोजगार कैसे बढ़ेगा तथा मध्यम वर्ग, किसान और युवाओं को वास्तव में क्या मिला। साथ ही यह विश्लेषण आपको बताएगा कि यह बजट अर्थव्यवस्था को कितना आगे ले जाएगा और आम आदमी की जेब पर इसका कितना असर पड़ेगा।

1: टैक्स में बड़े बदलाव नहीं, मध्यम वर्ग को बड़ी राहत

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए 2026-27 के केंद्रीय बजट में सबसे ज्यादा चर्चा व्यक्तिगत आयकर यानी पर्सनल इनकम टैक्स में हुए बदलावों की हुई है। यह बदलाव मुख्य रूप से नई टैक्स व्यवस्था (न्यू रिजीम) को और अधिक आकर्षक बनाने के लिए किए गए हैं। पुरानी व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन नई व्यवस्था को इतना सरल और फायदेमंद बनाया गया है कि ज्यादातर लोग अब इसी को चुनेंगे।

इसका उद्देश्य मध्यम वर्ग के लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा छोड़ना है, ताकि उनकी क्रय शक्ति बढ़े और अर्थव्यवस्था में खपत को बल मिले। यह बदलाव लाखों वेतनभोगी और मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है।

12 लाख तक की आय पर कोई टैक्स नहीं

बजट का सबसे बड़ा ऐलान यह है कि नई टैक्स व्यवस्था में अब 12 लाख रुपए तक की सामान्य आय (सैलरी, ब्याज आदि) पर कोई इनकम टैक्स नहीं देना पड़ेगा। यह छूट केवल सामान्य आय पर लागू है, कैपिटल गेन जैसी विशेष आय को छोड़कर। पहले यह सीमा 7 लाख रुपए थी, जिसे अब लगभग दोगुना कर दिया गया है।

इसका मतलब है कि अगर आपकी सालाना आय 12 लाख रुपए है, तो आपको एक भी रुपया टैक्स नहीं देना पड़ेगा। यह बदलाव उन लाखों लोगों के लिए खुशखबरी है जो मध्यम वर्ग में आते हैं और महँगाई के दौर में टैक्स का बोझ महसूस करते थे।

वेतनभोगियों के लिए अतिरिक्त लाभ, स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ा

वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए एक और खास सुविधा दी गई है। स्टैंडर्ड डिडक्शन की राशि को 75,000 रुपए कर दिया गया है। पहले यह 50,000 रुपए थी। इस डिडक्शन के कारण प्रभावी टैक्स-फ्री आय की सीमा 12 लाख से बढ़कर 12.75 लाख रुपए हो जाती है। यानी अगर आप नौकरीपेशा हैं और आपकी सैलरी 12.75 लाख रुपए तक है, तो भी आपको कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। यह बदलाव विशेष रूप से उन लोगों के लिए फायदेमंद है जो सैलरी से आय कमाते हैं और पहले डिडक्शन का ज्यादा लाभ नहीं उठा पाते थे।

नए टैक्स स्लैब को बनाया गया सरल

नई टैक्स व्यवस्था में स्लैब को पूरी तरह से बदल दिया गया है, जिससे यह अधिक क्रमिक और न्यायपूर्ण हो गया है। नए स्लैब इस प्रकार हैं: 0 से 4 लाख रुपए तक शून्य प्रतिशत, 4 से 8 लाख तक 5 प्रतिशत, 8 से 12 लाख तक 10 प्रतिशत, 12 से 16 लाख तक 15 प्रतिशत, 16 से 20 लाख तक 20 प्रतिशत, 20 से 24 लाख तक 25 प्रतिशत और 24 लाख से ऊपर 30 प्रतिशत।

पहले स्लैब ज्यादा जटिल थे और ऊपरी आय वालों पर भी कम बोझ पड़ता था। अब यह संरचना इस तरह बनाई गई है कि जैसे-जैसे आय बढ़ती है, टैक्स का बोझ धीरे-धीरे बढ़ता है, जिससे मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा फायदा होता है।

रिबेट की व्यवस्था, यानी 12 लाख तक पूरी तरह टैक्स-फ्री

रिबेट की मौजूदा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है। सेक्शन 87A के तहत रिबेट का लाभ अब इस तरह दिया गया है कि 12 लाख तक की आय पर कोई टैक्स नहीं बचेगा। पहले रिबेट केवल 7 लाख तक की आय पर पूरी छूट देता था।

अब स्लैब में कमी और रिबेट के संयोजन से 12 लाख तक की आय पूरी तरह टैक्स-फ्री हो गई है। यह व्यवस्था उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जिनकी आय इस सीमा के आसपास है और पहले उन्हें थोड़ा-बहुत टैक्स देना पड़ता था।

व्यावहारिक उदाहरण से समझें, कितनी बचत होगी?

बजट में कुछ उदाहरण दिए गए हैं जो बदलाव का असर स्पष्ट करते हैं। अगर किसी व्यक्ति की आय 12 लाख रुपए है, तो उसे पहले के मुकाबले 80,000 रुपए की बचत होगी, यानी पूरा टैक्स माफ। 18 लाख आय वाले को 70,000 रुपए और 25 लाख आय वाले को 1.1 लाख रुपए की राहत मिलेगी। ये आँकड़े दिखाते हैं कि मध्यम और ऊपरी मध्यम वर्ग दोनों को ही अच्छा खासा लाभ होगा। इन पैसों से लोग खर्च, बचत या निवेश कर सकेंगे, जिससे बाजार में माँग बढ़ेगी।

मध्यम वर्ग पर सकारात्मक प्रभाव, उनके हाथ में ज्यादा पैसा

ये सारे बदलाव मध्यम वर्ग के लिए सबसे बड़ी राहत हैं। मध्यम वर्ग भारत की अर्थव्यवस्था का मुख्य इंजन है। वे सबसे ज्यादा खर्च करते हैं, बचत करते हैं और निवेश करते हैं। अब उनके हाथ में ज्यादा पैसा आने से घरेलू खपत बढ़ेगी, जो अर्थव्यवस्था को गति देगी।

महँगाई और जीवन यापन की बढ़ती लागत के बीच यह राहत लोगों को आर्थिक सुरक्षा का एहसास कराएगी। सरकार ने इसे ‘ट्रस्ट बेस्ड’ टैक्स सिस्टम का हिस्सा बताया है, जहां ईमानदार करदाता को फायदा दिया जा रहा है।

सरकार को राजस्व का नुकसान, लेकिन लंबे फायदे

इन बदलावों से सरकार को प्रत्यक्ष करों में करीब 1 लाख करोड़ रुपए का राजस्व नुकसान होगा। अप्रत्यक्ष करों में भी कुछ छूट से 2,600 करोड़ का नुकसान अनुमानित है। लेकिन सरकार का मानना है कि इससे उपभोग बढ़ेगा, अर्थव्यवस्था तेज चलेगी और अंततः टैक्स बेस बढ़ेगा। यह एक तरह का ‘स्टिमुलस’ है जो बिना ज्यादा खर्च के अर्थव्यवस्था को बूस्ट देगा। लंबे समय में इससे निवेश और रोजगार भी बढ़ेंगे।

अन्य प्रत्यक्ष टैक्स बदलाव से सरलीकरण पर जोर

प्रत्यक्ष करों में कई अन्य सरलीकरण भी किए गए हैं। टीडीएस और टीसीएस की दरें कम की गई हैं और थ्रेशोल्ड बढ़ाए गए हैं, जैसे सीनियर सिटीजन के ब्याज पर टीडीएस की सीमा 50,000 से 1 लाख रुपए। अपडेटेड रिटर्न दाखिल करने की समयसीमा 2 साल से बढ़ाकर 4 साल की गई। छोटे चैरिटेबल ट्रस्टों की रजिस्ट्रेशन अवधि 5 से 10 साल की गई। सेल्फ-ऑक्यूपाइड प्रॉपर्टी पर दो घरों तक बिना शर्त के छूट।

सबसे महत्वपूर्ण नया इनकम टैक्स बिल अगले हफ्ते पेश होगा, जो मौजूदा कानून से आधा छोटा और सरल होगा। ये कदम टैक्स सिस्टम को और पारदर्शी व करदाता-अनुकूल बनाएँगे।

अप्रत्यक्ष करों में बदलाव से स्वास्थ्य और विनिर्माण को प्रोत्साहन

अप्रत्यक्ष करों यानी कस्टम्स ड्यूटी में भी बड़े बदलाव हैं। कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों की 36 दवाओं पर पूरी छूट और 6 दवाओं पर केवल 5 प्रतिशत ड्यूटी लगेगी। क्रिटिकल मिनरल्स, लिथियम-आयन बैटरी, टेक्सटाइल मशीनरी और अन्य इनपुट पर ड्यूटी कम की गई है।

इन छूटों का उद्देश्य एमएसएमई, निर्यात और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना है। कुल मिलाकर अप्रत्यक्ष करों में भी घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता दी गई है, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ को बल मिलेगा और आम लोगों को सस्ती दवाएँ व उत्पाद मिलेंगे।

2: विकास में खर्च- इंफ्रास्ट्रक्चर और पूँजीगत व्यय पर सरकार का जोर

केंद्रीय बजट 2026 में विकास को गति देने के लिए पूँजीगत व्यय यानी कैपिटल एक्सपेंडिचर पर विशेष जोर दिया गया है। सरकार का मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनाता है। यह निवेश सड़क, रेल, बंदरगाह, ऊर्जा और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करता है, जिससे लंबे समय में रोजगार बढ़ता है, उत्पादकता बढ़ती है और अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ती है।

बजट में पूँजीगत व्यय को बढ़ाने का फोकस इसलिए है क्योंकि निजी निवेश अभी पूरी तरह रफ्तार नहीं पकड़ पाया है। सरकार खुद आगे बढ़कर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाएगी, जिससे निजी क्षेत्र को भी प्रोत्साहन मिलेगा। यह कदम ‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

राज्यों को 1.5 लाख करोड़ रुपए का ब्याज-मुक्त लोन

बजट में राज्यों को इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए 1.5 लाख करोड़ रुपए का ब्याज-मुक्त लोन देने का प्रावधान किया गया है। यह लोन 50 साल की अवधि का है और राज्यों को अपनी पूंजीगत परियोजनाओं पर खर्च करने की छूट है। इसका उद्देश्य राज्यों को अपनी जरूरत के हिसाब से सड़क, स्कूल, अस्पताल या अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करना है। साथ ही सुधार करने वाले राज्यों को अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दिया जाएगा।

यह व्यवस्था केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग को मजबूत करती है और देश के हर क्षेत्र में समान विकास सुनिश्चित करती है। पिछली योजनाओं में यह राशि प्रभावी साबित हुई थी, इसलिए इसे जारी रखा गया है। इससे ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में भी विकास की गति बढ़ेगी।

जल जीवन मिशन को 2028 तक बढ़ाया गया

साल 2019 में शुरू हुआ जल जीवन मिशन अब 2028 तक बढ़ा दिया गया है। इस मिशन का लक्ष्य हर ग्रामीण घर में नल से साफ पानी पहुँचाना है। अब तक 15 करोड़ घरों यानी 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को पानी के कनेक्शन मिल चुके हैं। अब बाकी 20 प्रतिशत को कवर करने के लिए मिशन को तीन साल और बढ़ाया गया है।

बजट में इसकी कुल राशि बढ़ाई गई है और अब फोकस पानी की गुणवत्ता, रखरखाव और जन भागीदारी पर है। राज्यों के साथ अलग-अलग समझौते (MoU) किए जाएँगे ताकि पानी की सप्लाई स्थाई और नागरिक-केंद्रित हो। यह योजना न सिर्फ स्वास्थ्य सुधारती है बल्कि महिलाओं और बच्चों का समय बचाती है जो पहले पानी लाने में लगता था। यह ग्रामीण भारत की जीवन गुणवत्ता को बेहतर बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

शहरी सुधारों के लिए अर्बन चैलेंज फंड में ₹1 लाख करोड़

शहरों को विकास का केंद्र बनाने के लिए अर्बन चैलेंज फंड की घोषणा की गई है, जिसमें 1 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान है। यह फंड जुलाई 2024 के बजट में घोषित ‘सिटीज ऐज ग्रोथ हब्स’, ‘क्रिएटिव रीडेवलपमेंट ऑफ सिटीज’ और ‘वाटर एंड सैनिटेशन’ जैसी योजनाओं को लागू करने में मदद करेगा। फंड का 25 प्रतिशत तक केंद्र देगा, बाकी बैंक लोन, बॉन्ड या पीपीपी से आएगा।

साल 2026 में इसके लिए 10,000 करोड़ रुपए अलग रखे गए हैं। साथ ही शहरी सुधारों जैसे शहरी शासन, नगर सेवाएँ, भूमि उपयोग और प्लानिंग को प्रोत्साहित किया जाएगा। यह फंड शहरों को आर्थिक केंद्र बनाने में मदद करेगा, जहाँ रोजगार, उद्योग और सेवाएँ तेजी से बढ़ सकें। इससे शहरीकरण की समस्याओं का समाधान भी होगा।

परमाणु ऊर्जा मिशन में 2047 तक 100 GW बिजली का लक्ष्य, SMR के लिए 20,000 करोड़

ऊर्जा सुरक्षा और क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिए न्यूक्लियर एनर्जी मिशन शुरू किया गया है। लक्ष्य है कि 2047 तक कम से कम 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन हो। इसके लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जाएगी और एटॉमिक एनर्जी एक्ट व सिविल लायबिलिटी एक्ट में संशोधन किए जाएँगे।

इसके साथ ही छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) के लिए अलग मिशन है, जिसमें 20,000 करोड़ रुपए का प्रावधान है। कम से कम 5 स्वदेशी SMR 2033 तक चालू होंगे। यह कदम ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण है क्योंकि परमाणु ऊर्जा साफ और स्थिर स्रोत है। इससे बिजली की बढ़ती माँग पूरी होगी और कार्बन उत्सर्जन कम होगा। यह भारत को ग्लोबल क्लीन एनर्जी लीडर बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड में ₹25000 करोड़

समुद्री क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड बनाया गया है, जिसमें 25,000 करोड़ रुपए का कोष होगा। सरकार इसमें 49 प्रतिशत तक योगदान देगी, बाकी बंदरगाह और निजी क्षेत्र से आएगा। फंड का उद्देश्य जहाज निर्माण, बंदरगाह और समुद्री उद्योग को लंबी अवधि का वित्त उपलब्ध कराना है।

इसके साथ ही जहाज निर्माण की वित्तीय सहायता नीति को रिवाइज किया जाएगा और बड़े जहाजों को इंफ्रास्ट्रक्चर लिस्ट में शामिल किया जाएगा। जहाज निर्माण क्लस्टर बनाए जाएँगे और स्किलिंग-टेक्नोलॉजी पर जोर होगा। यह कदम भारत को ग्लोबल शिपबिल्डिंग हब बनाने में मदद करेगा, निर्यात बढ़ाएगा और रोजगार सृजन करेगा। समुद्री व्यापार भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए यह निवेश जरूरी था।

UDAN स्कीम को बढ़ाकर 120 नए डेस्टिनेशन

क्षेत्रीय हवाई संपर्क को मजबूत बनाने के लिए UDAN स्कीम को नया रूप दिया गया है। अब अगले 10 साल में 120 नए डेस्टिनेशन जोड़े जाएँगे और 4 करोड़ यात्रियों को लाभ होगा। स्कीम में हेलीपैड और छोटे एयरपोर्ट भी शामिल किए गए हैं, खासकर पहाड़ी, पिछड़े और पूर्वोत्तर इलाकों में। अब तक UDAN से 88 एयरपोर्ट जुड़े और 619 रूट चालू हुए, जिससे 1.5 करोड़ मध्यम वर्ग के लोगों को सस्ती हवाई यात्रा मिली।

यह नया संस्करण क्षेत्रीय असंतुलन दूर करेगा, पर्यटन बढ़ाएगा और दूरदराज के इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ेगा। इससे छोटे शहरों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

बिहार में ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट और कोसी कैनाल प्रोजेक्ट

बिहार के विकास पर विशेष ध्यान देते हुए बजट में कई घोषणाएँ की गई हैं। राज्य में नए ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बनाए जाएँगे, जो पटना एयरपोर्ट की क्षमता बढ़ाने और बिहटा में ब्राउनफील्ड एयरपोर्ट के अलावा होंगे। इससे बिहार की हवाई कनेक्टिविटी बेहतर होगी और पर्यटन-व्यापार को बढ़ावा मिलेगा।

इसके साथ ही मिथिलांचल क्षेत्र में पश्चिमी कोसी नहर परियोजना के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी, जिससे 50,000 हेक्टेयर से ज्यादा भूमि की सिंचाई होगी और लाखों किसानों को फायदा होगा। ये दोनों प्रोजेक्ट बिहार को ‘पूर्वोदय’ की दिशा में आगे बढ़ाएँगे और क्षेत्रीय असंतुलन को कम करेंगे।

मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर से रोजगार और दीर्घकालिक विकास का लक्ष्य

ये सारे कदम मिलकर इंफ्रास्ट्रक्चर को अभूतपूर्व मजबूती देंगे। पानी, बिजली, सड़क, हवाई और समुद्री संपर्क बेहतर होगा। इससे लाखों रोजगार पैदा होंगे, खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों में। लंबे समय में यह निवेश अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत करेगा, निजी निवेश को आकर्षित करेगा और भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में मदद करेगा। सरकार का यह दृष्टिकोण संतुलित है- जहाँ जरूरत है वहाँ केंद्र खुद निवेश कर रहा है और राज्यों-निजी क्षेत्र को साथ लेकर चल रहा है।

3: मोदी सरकार का विकास के चार इंजनों पर खास फोकस

केंद्रीय बजट 2026 में कई नई योजनाएँ और पहल शुरू की गई हैं, जो अर्थव्यवस्था के चार मुख्य इंजनों पर केंद्रित हैं। ये इंजन हैं- कृषि, एमएसएमई, निवेश और निर्यात। सरकार ने इनको इंजन इसलिए कहा है क्योंकि ये विकास की गति प्रदान करेंगे। इनके लिए ईंधन के रूप में सुधारों को रखा गया है।

बजट का उद्देश्य इन क्षेत्रों को मजबूत करके समावेशी विकास सुनिश्चित करना है। नई योजनाएँ उत्पादकता बढ़ाने, रोजगार सृजन करने और आत्मनिर्भरता की दिशा में हैं। ये पहल गरीब, युवा, किसान और महिलाओं पर विशेष फोकस रखती हैं। अब हम इन चार इंजनों और संबंधित योजनाओं को विस्तार से देखते हैं।

पहला इंजन: कृषि और उसकी नई योजनाएँ

बजट में कृषि को पहला इंजन बनाया गया है, क्योंकि यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और करोड़ों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है। सरकार का लक्ष्य कृषि को उत्पादक, विविधतापूर्ण और स्थाई बनाना है। इसके लिए कई नई योजनाएँ शुरू की गई हैं, जो कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों पर फोकस करती हैं।

  • प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना एक महत्वपूर्ण पहल है। यह एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट्स प्रोग्राम की सफलता से प्रेरित है। इसमें राज्यों के साथ साझेदारी में 100 कम उत्पादकता वाले जिलों को चुना गया है। योजना का लक्ष्य कृषि उत्पादकता बढ़ाना, फसल विविधीकरण अपनाना, पंचायत और ब्लॉक स्तर पर भंडारण सुविधा बनाना, सिंचाई बेहतर करना और क्रेडिट उपलब्धता सुनिश्चित करना है। इससे करीब 1.7 करोड़ किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। यह योजना मौजूदा स्कीमों के कन्वर्जेंस से चलेगी और विशेष उपाय भी शामिल होंगे।
  • ग्रामीण समृद्धि और लचीलापन कार्यक्रम भी नया है। यह बहु-क्षेत्रीय कार्यक्रम है, जो राज्यों के साथ मिलकर शुरू होगा। इसका फोकस कृषि में अंडर-एम्प्लॉयमेंट दूर करना है। स्किलिंग, निवेश, टेक्नोलॉजी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करके नए अवसर पैदा किए जाएंगे। ताकि ग्रामीण युवा और महिलाओं के लिए शहरों की ओर पलायन जरूरी न रहे। पहली फेज में 100 विकासशील कृषि जिलों को कवर किया जाएगा। इसमें ग्रामीण महिलाएँ, युवा किसान, छोटे किसान और भूमिहीन परिवार मुख्य लाभार्थी होंगे।
  • दालों में आत्मनिर्भरता मिशन 6 साल का है, जिसमें तुअर, उड़द और मसूर पर विशेष फोकस है। पहले दालों में आत्मनिर्भरता हासिल की गई थी, अब उपभोग बढ़ने से फिर जरूरत है। केंद्र एजेंसियां (NAFED और NCCF) रजिस्टर्ड किसानों से पूरी खरीद करेंगी। यह मिशन उत्पादकता, प्रोटीन कंटेंट और भंडारण पर जोर देगा।
  • सब्जियाँ और फल कार्यक्रम भी नया है। लोगों की पोषण जागरूकता बढ़ने से इनकी खपत बढ़ी है। राज्य सरकारों के साथ मिलकर उत्पादन, सप्लाई चेन, प्रोसेसिंग और किसानों को अच्छे दाम सुनिश्चित किए जाएँगे। इसमें एफपीओ और कोऑपरेटिव की भूमिका होगी।
  • बिहार में मखाना बोर्ड स्थापित किया जाएगा। मखाना बिहार की विशेष फसल है। बोर्ड उत्पादन, प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन और मार्केटिंग सुधारने में मदद करेगा। किसानों को एफपीओ में संगठित किया जाएगा और सरकारी स्कीमों का लाभ दिलाया जाएगा।
  • उच्च उपज बीज मिशन शुरू होगा, जिसमें रिसर्च मजबूत होगी और जलवायु प्रतिरोधी बीज विकसित किए जाएंगे। 100 से ज्यादा नई वैरायटी उपलब्ध कराई जाएँगी।
  • मत्स्य पालन के लिए नया फ्रेमवर्क आएगा, जो ईईजेड और हाई सीज से सस्टेनेबल फिशिंग पर फोकस करेगा। अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप पर विशेष ध्यान।
  • कपास उत्पादकता मिशन 5 साल का है, जो एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल कपास को बढ़ावा देगा। इससे किसानों की आय और टेक्सटाइल सेक्टर को कच्चा माल मिलेगा।
  • किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) की लोन लिमिट 3 लाख से बढ़ाकर 5 लाख रुपए की गई। इससे 7.7 करोड़ किसान, मछुआरे और डेयरी किसान लाभान्वित होंगे।
  • असम में नमरूप में 12.7 लाख टन क्षमता वाला यूरिया प्लांट बनेगा, जो आत्मनिर्भरता बढ़ाएगा।

ये सारी कृषि योजनाएँ मिलकर 1.7 करोड़ किसानों तक पहुँचेंगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगी।

दूसरा इंजन: MSME और उससे जुड़ी पहल

एमएसएमई को दूसरा इंजन कहा गया है, क्योंकि ये 5.7 करोड़ इकाइयाँ हैं जो रोजगार और निर्यात का बड़ा हिस्सा देती हैं। बजट में इनको स्केल देने पर जोर है।

  • एमएसएमई क्लासिफिकेशन की निवेश और टर्नओवर सीमा को क्रमशः 2.5 गुना और दोगुना किया गया। इससे छोटी इकाइयाँ बड़ी हो सकेंगी और रोजगार बढ़ेगा।
  • क्रेडिट गारंटी कवर माइक्रो-स्मॉल के लिए 5 से 10 करोड़ किया गया, जिससे 5 साल में 1.5 लाख करोड़ अतिरिक्त क्रेडिट मिलेगा। स्टार्टअप्स के लिए 20 करोड़ तक और एक्सपोर्टर एमएसएमई के लिए टर्म लोन पर गारंटी।
  • माइक्रो इंटरप्राइजेज के लिए उद्यम पोर्टल पर रजिस्टर्ड को 5 लाख लिमिट का क्रेडिट कार्ड मिलेगा। पहले साल 10 लाख कार्ड जारी होंगे।
  • स्टार्टअप्स के लिए नया फंड ऑफ फंड्स 10,000 करोड़ का बनेगा।
  • 5 लाख महिला, एससी-एसटी पहली बार उद्यमियों के लिए 2 करोड़ तक टर्म लोन स्कीम। स्टैंड-अप इंडिया से सीख लेकर।
  • फुटवियर-लेदर सेक्टर के लिए फोकस प्रोडक्ट स्कीम, जो 22 लाख रोजगार और बड़े निर्यात का लक्ष्य रखती है। टॉय सेक्टर को ग्लोबल हब बनाने की स्कीम।
  • बिहार में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजी बनेगा, जो पूर्वी क्षेत्र में फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देगा।
  • नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन सभी इंडस्ट्रीज के लिए पॉलिसी, रोडमैप और मॉनिटरिंग फ्रेमवर्क देगा। क्लीन टेक मैन्युफैक्चरिंग पर भी फोकस।

ये कदम एमएसएमई को चैंपियन बनाएँगे और लाखों रोजगार पैदा करेंगे।

तीसरा इंजन: निवेश

तीसरा इंजन निवेश है, जिसमें लोगों, अर्थव्यवस्था और इनोवेशन में निवेश शामिल है।

  • सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 में पोषण मानक बढ़ाए गए, जो 8 करोड़ बच्चों और महिलाओं को कवर करता है।
  • 50,000 अटल टिंकरिंग लैब स्कूलों में बनेंगी, जो बच्चों में इनोवेशन जगाएंगी।
  • सभी सरकारी सेकंडरी स्कूल और पीएचसी में ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी।
  • भारतीय भाषा पुस्तक स्कीम से डिजिटल किताबें उपलब्ध होंगी।
  • स्किलिंग के 5 नेशनल सेंटर्स ग्लोबल पार्टनरशिप से बनेंगे।
  • आईआईटी में 6,500 अतिरिक्त सीटें और पटना आईआईटी में विस्तार।
  • एआई में एजुकेशन के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (500 करोड़)।
  • मेडिकल सीटें 5 साल में 75,000 बढ़ाने का लक्ष्य, अगले साल 10,000 सीटें।
  • सभी जिला अस्पतालों में 3 साल में डे-केयर कैंसर सेंटर।
  • पीएम स्वनिधि को रिवैंप करके स्ट्रीट वेंडर्स को ज्यादा लोन और क्रेडिट कार्ड।
  • गिग वर्कर्स (1 करोड़) को आईडी, हेल्थकेयर और ई-श्रम रजिस्ट्रेशन।

ये पहल युवाओं को स्किल्ड बनाएँगी और स्वास्थ्य-शिक्षा सुधारेंगी।

चौथा इंजन: निर्यात

निर्यात चौथा इंजन है। एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन शुरू होगा, जिसमें सेक्टोरल टारगेट होंगे। भारत ट्रेड नेट डिजिटल प्लेटफॉर्म ट्रेड डॉक्यूमेंटेशन और फाइनेंसिंग आसान करेगा। ग्लोबल सप्लाई चेन में एकीकरण के लिए सपोर्ट और इंडस्ट्री 4.0 पर फोकस। ये कदम निर्यात बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगे।

सुधारों को ईंधन कहा गया है। छह डोमेन में ट्रांसफॉर्मेटिव रिफॉर्म्स होंगे, जिसमें टैक्सेशन, पावर सेक्टर, अर्बन डेवलपमेंट, माइनिंग, फाइनेंशियल सेक्टर और रेगुलेटरी शामिल है। हाई लेवल कमिटी रेगुलेटरी रिफॉर्म्स की सिफारिश करेगी। स्टेट्स के लिए इनवेस्टमेंट फ्रेंडलीनेस इंडेक्स। ये सुधार अगले 5 साल में ग्रोथ पोटेंशियल बढ़ाएँगे।

विशेष फोकस एरिया: किसान, महिला, युवा और मध्यम वर्ग

केंद्रीय बजट 2026 में सरकार ने चार विशेष समूहों किसान (अन्नदाता), महिला (नारी), युवा और मध्यम वर्ग पर विशेष ध्यान दिया है। बजट की थीम ‘सबका विकास’ है और ये समूह विकसित भारत की नींव हैं। कृषि को पहला इंजन बनाकर किसानों को प्राथमिकता दी गई है।

महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने, युवाओं को स्किल और रोजगार देने तथा मध्यम वर्ग को टैक्स राहत देकर उनकी क्रय शक्ति मजबूत करने पर जोर है। ये फोकस क्षेत्र बजट को समावेशी बनाते हैं और हर वर्ग तक विकास पहुँचाने का प्रयास करते हैं। अब हम इनकी विस्तार से चर्चा करते हैं-

किसानों (अन्नदाता) के लिए कृषि को बनाया गया पहला इंजन

बजट में कृषि को अर्थव्यवस्था का पहला इंजन घोषित किया गया है, क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और करोड़ों परिवार इससे जुड़े हैं। सरकार का लक्ष्य शून्य गरीबी, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय दोगुनी करना है। इसके लिए कई नई योजनाएँ शुरू की गई हैं, जो उत्पादकता, फसल विविधीकरण, भंडारण, सिंचाई और क्रेडिट पर फोकस करती हैं।

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना और ग्रामीण समृद्धि कार्यक्रम जैसे उपाय कम उत्पादक जिलों में बदलाव लाएँगे। दालों में आत्मनिर्भरता मिशन से तुअर, उड़द और मसूर की खेती बढ़ेगी। सब्जियाँ-फल कार्यक्रम पोषण और आय दोनों बढ़ाएगा। बिहार में मखाना बोर्ड और कपास मिशन क्षेत्रीय फसलों को मजबूत करेंगे। मत्स्य पालन का नया फ्रेमवर्क समुद्री संसाधनों का सस्टेनेबल उपयोग करेगा।

किसान क्रेडिट कार्ड की लिमिट बढ़ाकर 5 लाख रुपए करने से छोटे किसानों को आसानी से लोन मिलेगा। यूरिया प्लांट और उच्च उपज बीज मिशन से इनपुट सस्ते और बेहतर होंगे। इन योजनाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ेगा और पलायन कम होगा। कुल मिलाकर 1.7 करोड़ किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। यह फोकस किसानों को सशक्त बनाकर खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा।

महिलाओं (नारी) के लिए आर्थिक भागीदारी और सशक्तिकरण पर जोर

बजट में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने का लक्ष्य 70 प्रतिशत रखा गया है। महिलाएँ घर और समाज की रीढ़ हैं, इसलिए उनकी सशक्तिकरण पर कई योजनाएं केंद्रित हैं।

सबसे बड़ी पहल 5 लाख महिला और एससी-एसटी पहली बार उद्यमियों के लिए टर्म लोन स्कीम है। यह स्टैंड-अप इंडिया की सफलता पर आधारित है और 2 करोड़ तक लोन देगी। इससे महिलाएं अपना बिजनेस शुरू कर सकेंगी। ग्रामीण समृद्धि कार्यक्रम में ग्रामीण महिलाओं पर विशेष फोकस है, जहां स्किलिंग और उद्यमिता से उन्हें स्वावलंबी बनाया जाएगा।

ग्रामीण महिलाओं को एफपीओ और कोऑपरेटिव में संगठित किया जाएगा। शिक्षा में हर जिले में गर्ल्स हॉस्टल बनेंगे, जो लड़कियों की हायर एजुकेशन को आसान बनाएंगे। ये कदम महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करेंगे, घरेलू निर्णयों में उनकी भूमिका बढ़ाएंगे और लिंग समानता को बढ़ावा देंगे। सरकार का मानना है कि महिलाओं की भागीदारी से ही विकसित भारत संभव है।

युवाओं के लिए स्किलिंग, शिक्षा और रोजगार पर विशेष ध्यान

युवा भारत की सबसे बड़ी ताकत हैं और बजट में उन्हें भविष्य का निर्माणकर्ता माना गया है। युवाओं के लिए स्किलिंग, शिक्षा और रोजगार पर कई योजनाएं हैं, ताकि वे ‘मेक फॉर इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड’ में योगदान दे सकें।

50,000 अटल टिंकरिंग लैब से स्कूलों में इनोवेशन और साइंटिफिक टेम्पर जगाया जाएगा। स्किलिंग के 5 नेशनल सेंटर्स ग्लोबल पार्टनरशिप से बनेंगे, जो इंडस्ट्री 4.0 के लिए तैयार करेंगे। आईआईटी में 6,500 अतिरिक्त सीटें और मेडिकल में 75,000 सीटें बढ़ाने का लक्ष्य युवाओं को हायर एजुकेशन देगा।

एमएसएमई और स्टार्टअप स्कीम से लाखों रोजगार पैदा होंगे। गिग वर्कर्स (लगभग 1 करोड़) को आईडी, हेल्थकेयर और ई-श्रम पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन मिलेगा। टूरिज्म में 50 टॉप डेस्टिनेशन डेवलपमेंट और हॉस्पिटैलिटी स्किलिंग से युवाओं को नए अवसर मिलेंगे। ये पहल युवाओं को स्किल्ड, रोजगारयुक्त और इनोवेटिव बनाएंगी, जिससे भारत ग्लोबल टैलेंट हब बनेगा।

मध्यम वर्ग के लिए टैक्स राहत और जीवन सुगमता

मध्यम वर्ग बजट का सबसे बड़ा लाभार्थी है, क्योंकि यह वर्ग उपभोग, बचत और निवेश का मुख्य आधार है। सबसे बड़ा तोहफा इनकम टैक्स में राहत है – 12 लाख तक आय टैक्स-फ्री, जिससे लाखों लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा आएगा।

कैंसर और गंभीर बीमारियों की दवाओं पर ड्यूटी छूट से इलाज सस्ता होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश से बेहतर सड़क, पानी, बिजली और हेल्थ सुविधाएँ मिलेंगी। उपभोग बढ़ाने की नीति से जीवन आसान होगा। ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी और डिजिटल शिक्षा से मध्यम वर्ग के बच्चे लाभान्वित होंगे। यह राहत मध्यम वर्ग को आर्थिक सुरक्षा देगी और उनकी क्रय शक्ति बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को बूस्ट देगी।

बजट 2026 में सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) पर बदलाव

केंद्रीय बजट 2026-27 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) में महत्वपूर्ण संशोधन प्रस्तावित किए, जो मुख्य रूप से फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट पर केंद्रित हैं। फ्यूचर्स पर STT दर को मौजूदा 0.02% से बढ़ाकर 0.05% कर दिया गया है, जबकि ऑप्शंस प्रीमियम और एक्सरसाइज दोनों पर इसे 0.15% किया गया है (पहले क्रमशः 0.1% और 0.125% के आसपास)।

हालाँकि आयकर विभाग ने स्पष्ट किया कि यह बढ़ोतरी केवल F&O पर लागू है, अन्य STT दरें अपरिवर्तित हैं। विभाग के अनुसार, ऑप्शंस और फ्यूचर्स का ट्रांजेक्शन वॉल्यूम भारतीय जीडीपी (लगभग 300 लाख करोड़ रुपए) का 500 गुना से अधिक (1.5 लाख लाख करोड़ रुपये) है। इस अत्यधिक सट्टेबाजी को नियंत्रित करने और सरकारी राजस्व बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया गया है।

इस घोषणा के बाद शेयर बाजार में भारी गिरावट देखी गई- सेंसेक्स 1500 अंक से अधिक टूटा। ट्रेडर्स और निवेशकों में निराशा है, क्योंकि F&O ट्रेडिंग महंगी हो जाएगी। सरकार का तर्क है कि यह छोटे निवेशकों को सट्टेबाजी से होने वाले नुकसान से बचाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बाजार की अस्थिरता कम कर सकता है, लेकिन अल्पकाल में लिक्विडिटी प्रभावित होगी। कुल मिलाकर, यह बदलाव पूँजी बाजार में संतुलन की दिशा में एक सुधारात्मक प्रयास है।

एक संतुलित और दूरदर्शी बजट

यह बजट विकास और समावेश का बेहतरीन संतुलन बनाता है। टैक्स राहत से मध्यम वर्ग खुश है, कृषि और एमएसएमई पर फोकस से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और सुधार लंबी अवधि का विकास सुनिश्चित करेंगे। महिलाओं और युवाओं की सशक्तिकरण योजनाएँ सामाजिक बदलाव लाएँगी। कुछ आलोचनाएँ भी हैं, जैसे पुरानी टैक्स व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं और कुछ क्षेत्रों में ज्यादा राशि की उम्मीद थी, लेकिन कुल मिलाकर यह बजट व्यावहारिक और दूरदर्शी है।

यह आत्मविश्वास जगाता है कि भारत तेजी से विकसित राष्ट्र बनेगा। किसान, महिला, युवा और मध्यम वर्ग सभी को शामिल करके यह ‘सबका विकास’ का सच्चा उदाहरण है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में यह बजट भारत को 21वीं सदी की महाशक्ति बनाने की दिशा में मजबूत कदम है।

3 दिन में 150000 नीचे आई चाँदी, बजट के दिन भी सोना गिरा: जानिए ऑल टाइम हाई के बाद क्यों जारी है ऐतिहासिक लुढ़कन?

सोने और चाँदी के ऑल टाइम हाई के बाद अचानक जोरदार गिरावट दर्ज की गई। जनवरी 2026 में लगभग 32 परसेंट की तेजी आई थी। पिछले तीन दिनों में सोने में भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जिसमें 24-कैरेट सोने की कीमतें 18,000 रुपये प्रति 10 ग्राम से ज्यादा गिर गईं, जबकि चाँदी 1.50 लाख रुपए से ज्यादा सस्ती हुई। पिछले 48 घंटों में जो हुआ वह कोई आम गिरावट नहीं है, बल्कि एक जबरदस्त बदलाव था, जिसने महीनों की सट्टेबाजी को खत्म कर दिया।

चाँदी ने बढ़ते हुए सोने को भी पीछे छोड़ दिया था। जब गिरी तो फिर सोने को पीछे छोड़ा। ऑल टाइम हाई से पिछले 3 दिन में 1.50 लाख रुपए से ज्यादा सस्ती हो गई। यहाँ तक कि रविवार को बजट वाले दिन भी 27000 रुपए की गिरावट चाँदी में देखी गई, जबकि गोल्ट रेट में 9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। जनवरी 2026 में लगभग 71 परसेंट की तेजी के बाद आई इस गिरावट की कई वजह है।

दुनिया भर में सोने और चाँदी में तेजी क्यों आई

आम तौर पर माना जाता है कि युद्ध और वैश्विक अशांति की वजह से सोना-चाँदी की माँग बढ़ती है और इसके विपरीत शांति होने पर इसके दाम कम होते हैं। लेकिन इस बार वैश्विक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। रूस- यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया में तनाव का माहौल बना हुआ है। अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध की स्थिति है यानी जियोपॉलिटिकल बैकग्राउंड वैसा ही है। जो बदला है, वह है मार्केट की पोजिशनिंग, निवेशकों का व्यवहार और जल्दी पैसे कमाने की उम्मीद। एक बार जब भारी बिकवाली शुरू हुई, तो गिरावट तो आनी ही थी।

ब्लूमबर्ग के डेटा से पता चलता है कि भारी बिकवाली से पहले अकेले जनवरी में सोने की कीमतें 17 परसेंट से ज़्यादा बढ़ गई थीं, जिससे ऐसा लगा कि ये साल सोना-चाँदी के अच्छे दिनों का है, लेकिन तेजी से स्थिति बदली है।

ब्लूमबर्ग के मुताबिक, सोना-चाँदी में चार दशकों में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। दोनों मेटल पहले ऑल-टाइम हाई पर थे। इसके बाद सोने 12 परसेंट से ज्यादा गिरा और $5,000 प्रति औंस के निशान से नीचे चला गया। यह 1980 के दशक की शुरुआत के बाद की सबसे बड़ी गिरावट है।

डॉलर में आई मजबूती से फिसला सोना

इसकी अहम वजह डॉलर में आई वैश्विक मजबूती है। सोने-चाँदी की भारी बिकवाली का भी US डॉलर को फायदा मिला। इस बीच खबरें आई कि ट्रंप प्रशासन ने केविन वार्श को अगले फेडरल रिजर्व चेयरमैन के तौर पर नॉमिनेट करने की तैयारी कर रहा है। माना गया कि वॉर्श ज्‍यादा आक्रामक रुख अपना सकते हैं, जिससे अमेरिकी डॉलर मजबूत होगा और कीमती धातुओं पर दबाव पड़ेगा।

दरअसल निवेशक ये मान कर कीमती मेटल्स में पैसा लगा रहे थे कि अमेरिका डॉलर की गिर रही कीमतों को लेकर संजीदा नहीं है और उसे बर्दाश्त कर रहा है। लेकिन अमेरिका के मजबूत आर्थिक आँकड़ों ने इस पर पानी फेर दिया। सोने-चाँदी जैसे मेट्ल्स पर ऊँची व्याज दरें नेगेटिव असर डालती हैं। ऐसा माहौल बना कि कुछ निवेशक सोना-चाँदी से पैसा निकाल कर बांड और इक्विटी जैसे यील्ड वाले एसेट्स में पैसे लगाने लगे।

ब्लूमबर्ग रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी निवेशक काफी तेजी से कीमती मेटल खरीद रहे थे। इससे शंघाई फ्यूचर्स एक्सचेंज को सोने-चाँदी समेत कई धातुओं में आई बेतहाशा तेजी को कम करने के लिए जल्दबाजी में कदम उठाने पड़े। जैसे ही ग्लोबल कीमतें बदलीं, इसके शेयरों में गिरावट और तेज हो गई।

भारी बिकवाली का असर

कुछ दिनों में जबरदस्त उछाल को लेकर निवेशक मुनाफावसूली के लिए बेचना शुरू किया और जबरदस्त पैसा कमाया। घरेलू बाजारों में सोने और चाँदी के एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) में 20 फीसदी तक की गिरावट आई है। दिल्ली में सोना एक ही दिन में 14,000 रुपये प्रति 10 ग्राम गिर गया, जबकि 29 जनवरी 2026 को यह 1,83,000 रुपए के ऑल-टाइम हाई पर पहुँचा था। चाँदी भी इसके बाद 20,000 रुपये प्रति kg गिरी, जबकि यह भी 29 जनवरी 2026 को 4,04,500 रुपये के रिकॉर्ड पर पहुँच गई थी। लेकिन तीन दिनों में इसकी कीमत में जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई। हालाँकि बजट के बाद 24 कैरेट सोना ₹1,62,240 प्रति 10 ग्राम हो गया और चाँदी 2.78 प्रति किलो पहुँच गया।

ये भी माना जा रहा है कि अचानक आई तेजी के बाद बाजार में करेक्शन का दौर शुरू हुआ। जानकार बताते हैं कि ऐसे करेक्शन लगभग तय थे। खास कर चाँदी में, जिसका बाजार अपेक्षाकृत छोटा और अस्थिर होता है। ऐसे में अगर तेजी ज्यादा आई है तो करेक्शन भी तेजी से ही होता है। यही वजह है कि चाँदी जबरदस्त तरीके से लुढ़का है।

तांबा भी ऑल टाइम हाई से औंधे मुँह गिरा

तांबा की कीमतों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। साल 2026 में तांबा निवेशकों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रहा था। 30 जनवरी को इसमें भारी गिरावट दर्ज की गई । तांबे की कीमत पहले ऑल टाइम हाई पर थी और 1411 प्रति किलो था, जो घट कर 1284 रुपए हो गया। यानी एक ही झटके में तांबे में 126.5 रुपए प्रति किलो सस्ता हो गया।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी तांबे की कीमत $6.21 से गिरकर $5.96 प्रति औंस पर आ गया। इसकी वजह निवेशकों की भारी बिकवाली और सोने-चाँदी की कीमतों में आ रही गिरावट का दबाव माना जा रहा है। हालाँकि जानकार मानते हैं कि तांबे के उत्पादन में कमी और इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ रहे प्रोमोशन से तांबे का महत्व बना रहेगा इसलिए बाजार में इसकी कीमत अब नहीं घटेगी।

औद्योगिक माँग का कमजोर पड़ना

गिरावट की एक अहम वजह इंडस्ट्रियल मेटल्स की माँग का कमजोर पड़ना भी बताया जा रहा है। चाँदी का व्यापक इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल और मैन्युफैक्चरिंग जैसी इंडस्ट्री में होता है। ग्लोबल ग्रोथ की रफ्तार धीमी पड़ने की वजह चीन और यूरोप से इसकी माँग कम हो गई है। इसका दबाव पड़ा है और चाँदी की कीमतों पर इसका असर दिख रहा है।

यह अकेला ही उस रैली को अस्थिर करने के लिए काफी था जो लगभग पूरी तरह से डॉलर के कमजोर होने और गिरते रियल यील्ड पर बनी थी। एक मज़बूत डॉलर और बढ़ती बॉन्ड यील्ड सोने और चाँदी जैसे नॉन-यील्डिंग एसेट्स को मूल रूप से कम आकर्षक बनाती हैं और एक बार जब यह समीकरण फिर से बन गया, तो कीमतें डगमगाने लगीं।

रविदास जयंती पर पंजाब के डेरा सचखंड बल्लाँ जाएँगे PM मोदी: जानें- कौन हैं इससे जुड़े रविदासिया समुदाय के लोग जो खुद को मानते हैं सिख धर्म से अलग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार (1 फरवरी 2026) को पंजाब का दौरा करेंगे। यह दौरा 15वीं सदी के भक्ति संत गुरु रविदास की 649वीं जयंती के अवसर पर हो रहा है। गुरु रविदास के समानता और मानव गरिमा से जुड़े विचार आज भी पंजाब के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करते हैं।

PM मोदी जालंधर जिले में स्थित डेरा सचखंड बल्लाँ भी जाएँगे। यह स्थान रविदासिया समुदाय के लिए आस्था का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। इसके अलावा इस दौरे के दौरान कई महत्वपूर्ण इन्फ्रा परियोजनाओं से जुड़े ऐलान भी किए जाएँगे। इनमें आदमपुर एयरपोर्ट का नाम बदलकर श्री गुरु रविदास जी एयरपोर्ट रखने की घोषणा भी शामिल है।

प्रधानमंत्री मोदी का बल्लाँ दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब पंजाब में विधानसभा चुनावों में एक साल से भी कम समय बचा है। इस दौरे से रविदासिया समुदाय की उस पुरानी माँग पर भी फिर से ध्यान गया है, जिसमें वे सिख धर्म की मुख्यधारा से अलग अपनी धार्मिक पहचान को लेकर दावा करते रहे हैं।

PM का पंजाब दौरा और इन्फ्रा से जुड़ी घोषणाएँ

केंद्र सरकार की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, PM मोदी लगभग दोपहर 3:45 बजे आदमपुर एयरपोर्ट पहुँचेंगे। वहाँ वे एयरपोर्ट का नया नाम औपचारिक रूप से घोषित करेंगे, जिसे ‘श्री गुरु रविदास जी एयरपोर्ट, आदमपुर’ रखा जाएगा। यह नामकरण श्रद्धेय संत गुरु रविदास के सम्मान में किया जा रहा है। एयरपोर्ट का नाम बदलने की माँग समुदाय की ओर से लंबे समय से की जा रही थी।

क्या है डेरा सचखंड बल्लाँ का महत्व?

डेरा सचखंड बल्लाँ जालंधर के पास बल्लाँ गाँव में स्थित है। इसे दुनियाभर के रविदासिया समुदाय का सबसे प्रभावशाली धार्मिक केंद्र माना जाता है। इसकी स्थापना 20वीं सदी की शुरुआत में हुई थी और धीरे-धीरे यह दलित समाज के आत्मसम्मान और सामाजिक चेतना का प्रमुख केंद्र बन गया, खासकर चमार समुदाय के बीच, जो परंपरागत रूप से चमड़े के काम से जुड़ा रहा है और जिसे ऐतिहासिक रूप से अस्पृश्यता का सामना करना पड़ा।

पंजाब के दोआबा क्षेत्र में इस डेरा का प्रभाव सबसे अधिक देखा जाता है। इस क्षेत्र में दलित आबादी लगभग 45% है, जो राज्य के औसत 32% से काफी अधिक है। पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 23 सीटें दोआबा क्षेत्र में आती हैं। माना जाता है कि बल्लाँ डेरा कम से कम 19 विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं को प्रभावित करता है।

प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब कुछ दिन पहले ही डेरा के प्रमुख संत निरंजन दास को पद्म श्री सम्मान दिया गया है। इससे यह धारणा और मजबूत हुई है कि केंद्र सरकार की ओर से इस संस्था को उच्च स्तर पर मान्यता मिल रही है।

रविदासिया समुदाय कौन है?

रविदासिया समुदाय अपनी आध्यात्मिक परंपरा गुरु रविदास से जोड़ता है। गुरु रविदास भक्ति आंदोलन के संत थे, जिनका जन्म बनारस में हुआ था। उनकी रचनाओं ने जाति व्यवस्था को चुनौती दी और कर्मकांड की बजाय भक्ति और समानता पर जोर दिया। कई दशकों तक बड़ी संख्या में रविदासिया लोग खुद को सिख मानते रहे क्योंकि गुरु रविदास के भजन गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं और सिख गुरुद्वारों में पढ़े जाते हैं।

हालाँकि, समय के साथ सिख समाज के भीतर जातिगत भेदभाव को लेकर असंतोष बढ़ता गया। समुदाय का कहना है कि खास तौर पर प्रभावशाली जाट सिख समूहों की ओर से भेदभाव की प्रवृत्ति बनी रही। यह तनाव मई 2009 में उस समय चरम पर पहुँच गया जब ऑस्ट्रिया के विएना में डेरा बल्लाँ से जुड़े वरिष्ठ संत रमनंद की हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद पंजाब में हिंसक झड़पें हुईं और धार्मिक पहचान को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई।

2010 में डेरा सचखंड बल्लाँ ने गुरु रविदास की जयंती के अवसर पर एक अलग धर्म ‘रविदासिया धर्म‘ की घोषणा की। डेरा ने अपना अलग पवित्र ग्रंथ ‘अमृत बाणी गुरु रविदास’ स्थापित किया और इसे कई रविदासिया धार्मिक स्थलों में गुरु ग्रंथ साहिब की जगह रखा गया। इससे सिख धर्म और हिंदू धर्म दोनों से औपचारिक रूप से अलग होने की प्रक्रिया सामने आई।

रविदासिया खुद को सिख धर्म से अलग क्यों मानते हैं?

रविदासिया समुदाय की अलग पहचान की माँग उनके जातिगत भेदभाव के अनुभवों से जुड़ी है। सिख धर्म समानता की शिक्षा देता है लेकिन समुदाय का कहना है कि सामाजिक व्यवहार अक्सर इन सिद्धांतों पर खरा नहीं उतरता। यह भावना विदेशों में बसे पंजाबी समुदायों में और मजबूत हुई जहाँ पंजाब की जातिगत विभाजन की प्रवृत्ति दिखती है।

अध्ययनों में बताया गया है कि ब्रिटेन, कनाडा, स्पेन और अन्य देशों में रविदासिया समुदाय ने मुख्यधारा के सिख गुरुद्वारों में भेदभाव का सामना करने के बाद अपने अलग पूजा स्थल स्थापित किए। ब्रिटेन में रविदासिया संगठनों ने अलग पहचान के लिए अभियान चलाया, जिसके बाद 2011 की जनगणना में ब्रिटेन के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने ‘रविदासिया’ को एक अलग धर्म के रूप में दर्ज किया। उस जनगणना में 11,000 से अधिक लोगों ने खुद को सिख या हिंदू से अलग रविदासिया बताया।

विदेशों में बसे रविदासिया समुदाय ने आर्थिक और संगठनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने डेरा की संरचनाओं, विदेशों में मंदिरों, धर्मार्थ अस्पतालों और स्कूलों के निर्माण के साथ-साथ डेरा बल्लाँ से जुड़े अंतरराष्ट्रीय ट्रस्टों के लिए भी वित्तीय सहयोग किया है।

पंजाब में राजनीतिक असर

BJP के लिए PM मोदी का यह दौरा पंजाब में अपनी पकड़ मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। 2020 में शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने के बाद BJP नए वोट का आधार बनाने की कोशिश कर रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर लगभग 6.6% था जो 2024 के लोकसभा चुनाव में बढ़कर 18.56% हो गया।

रविदासिया समुदाय से संपर्क बढ़ाकर भाजपा दलित समाज की आकांक्षाओं को साधना चाहती है और कॉन्ग्रेस व AAP के पारंपरिक समर्थन आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। केंद्रीय मंत्रियों ने इस दौरे को गैर-राजनीतिक बताते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य संत रविदास और उनके विचारों के प्रति सम्मान व्यक्त करना है।

विवादित पहचान को मान्यता

रविदासिया समुदाय के लिए PM मोदी का यह दौरा उनकी लंबे समय से चली आ रही पहचान और सम्मान की माँग को मान्यता मिलने के रूप में देखा जा रहा है। 2010 से यह समुदाय रविदासिया धर्म को अलग धर्म के रूप में आधिकारिक मान्यता देने की माँग कर रहा है, जिसमें जनगणना में अलग श्रेणी शामिल करने की माँग भी है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

1973 का ‘ब्लैक बजट’: जब इंदिरा गाँधी के काल में भुखमरी और आर्थिक संकट की कगार पर पहुँच गया था देश

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार (1 फरवरी) को जब अपना 9वाँ बजट पेश कर रही हैं, तो पूरा देश ‘विकसित भारत’ की चमक और 50 लाख नौकरियों के वादे के साथ भविष्य की ओर देख रहा है। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक दौर वह भी था जब साल 1973 में इंदिरा गाँधी के शासनकाल के दौरान ‘ब्लैक बजट’ पेश किया गया था। यह वह काला समय था जब सरकार की गलत आर्थिक नीतियों और अदूरदर्शिता ने देश को भुखमरी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था। आज के आत्मनिर्भर भारत और उस दौर की बेबसी के बीच जमीन-आसमान का फर्क है।

इंदिरा गाँधी का ‘ब्लैक बजट’: जब सरकारी तिजोरी में बचा था सिर्फ ‘अंधेरा’

साल 1973 का बजट भारतीय इतिहास में किसी डरावने सपने जैसा था। तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंतराव बी चव्हाण ने जब यह बजट पढ़ा, तो इसमें विकास की नहीं बल्कि बर्बादी की इबारत लिखी थी। उस समय सरकार को 550 करोड़ रुपए का भारी-भरकम घाटा हुआ था, जिसे आज हम राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) कहते हैं। उस दौर के हिसाब से यह आँकड़ा इतना बड़ा था कि इसने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी।

राजकोषीय घाटा दरअसल सरकार की नाकामी का रिपोर्ट कार्ड होता है, जो बताता है कि आपकी कमाई से कहीं ज्यादा आपके खर्चे हैं। इंदिरा गाँधी के दौर में यह घाटा इसलिए बढ़ा क्योंकि सरकार ने आर्थिक अनुशासन को ताक पर रख दिया था। आम बोलचाल में कहें तो यह ‘कमाई अठन्नी और खर्चा रुपैया’ वाला हाल था। खजाना खाली था, लेकिन सरकार के पास फिजूलखर्ची और संकट को संभालने की कोई ठोस योजना नहीं थी। इसी वित्तीय अंधकार की वजह से इसे ‘ब्लैक बजट’ कहा गया, जिसने आने वाले सालों के लिए महँगाई और कंगाली का रास्ता खोल दिया।

आसान शब्दों में उदाहरण के सहित समझाते हैं कि फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) या राजकोषीय घाटा क्या होता है। दरअसल, राजकोषीय घाटा सरकार की आर्थिक सेहत का रिपोर्ट कार्ड होता है। यह बताता है कि सरकार अपनी कुल कमाई (जैसे टैक्स और अन्य स्रोतों से होने वाली आय) के मुकाबले कितना ज्यादा खर्च कर रही है। मान लीजिए, सरकार की जेब में टैक्स और अन्य रास्तों से ₹100 आए, लेकिन उसने देश के विकास, सैलरी और पुरानी योजनाओं पर ₹120 खर्च कर दिए। अब यह जो ₹20 का अंतर है, वही ‘फिस्कल डेफिसिट’ कहलाता है। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को बाजार या अन्य संस्थाओं से कर्ज लेना पड़ता है।

अहंकार और गलत फैसलों की तिहरी मार: युद्ध, सूखा और सरकारी बेबसी

इंदिरा गाँधी की सरकार अपनी हर नाकामी का ठीकरा 1971 के युद्ध पर फोड़ती रही, लेकिन असल सच उनकी नीतियों की विफलता थी। युद्ध के बाद करीब 1 करोड़ शरणार्थियों का बोझ भारत पर पड़ा, लेकिन सरकार ने इसके लिए कोई इमरजेंसी फंड या आर्थिक बैकअप तैयार नहीं किया था। रक्षा बजट अचानक बढ़ाकर 1600 करोड़ रुपए कर दिया गया, जबकि आम जनता की थाली से रोटी गायब हो रही थी।

मुसीबत तब और बढ़ गई जब 1972-73 में भीषण सूखा पड़ा। इंदिरा गाँधी की सरकार के पास कृषि को लेकर कोई दूरदर्शी सोच नहीं थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं। गाँवों में लोग भूख से मरने लगे और भुखमरी का वो काल पैदा हुआ जिसने लाखों परिवारों को उजाड़ दिया। देश के पास अपना पेट भरने के लिए अनाज तक नहीं था। मजबूरन, भारत को विदेशों के सामने हाथ फैलाने पड़े और 20 लाख टन अनाज मँगाना पड़ा। इस आयात पर 160 करोड़ रुपए खर्च हुए, जिससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी लगभग खत्म हो गया। यह एक ऐसे नेतृत्व की कहानी थी जिसने देश को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय दूसरों पर निर्भर बना दिया।

राष्ट्रीयकरण का ढोंग और बेपटरी होती अर्थव्यवस्था

अपनी विफलताओं को छिपाने और सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के लिए इंदिरा गाँधी की सरकार ने ‘राष्ट्रीयकरण’ का सहारा लिया। कोयला खदानों, तांबा कंपनियों और बीमा कंपनियों को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। सरकार ने कोयला खदानों पर कब्जे के लिए 56 करोड़ रुपए फूँक दिए, लेकिन इसका लाभ जनता को मिलने के बजाय सरकारी तंत्र और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। बिजली संकट कम होने के बजाय और गहरा गया क्योंकि सरकारी नियंत्रण में आते ही इन उद्योगों में सुस्ती छा गई।

इसके अलावा, सरकार ने सूखा राहत के नाम पर 220 करोड़ रुपए बाँटने का दावा किया, लेकिन धरातल पर लोग दाने-दाने को तरसते रहे। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ीं, तो सरकार ने हाथ खड़े कर दिए और महँगाई को बेलगाम होने दिया। 1973 का यह बजट दरअसल एक ऐसी सरकार की स्वीकारोक्ति थी जिसने आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह घुटने टेक दिए थे।

बेबसी के ‘ब्लैक बजट’ से आत्मनिर्भर भारत का उदय

आज जब हम निर्मला सीतारमण के बजट को देखते हैं, तो हमें स्पष्ट रूप से मोदी सरकार के ‘आत्मनिर्भर भारत’ की मजबूत नींव दिखाई देती है। 1973 का वह काला दौर और आज का स्वर्ण काल एक-दूसरे के विपरीत ध्रुव हैं। जहाँ इंदिरा गाँधी के समय भारत विदेशों से मिलने वाले अनाज और कर्ज पर निर्भर था और पलता था, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज भारत दुनिया को अनाज, तकनीक और वैक्सीन निर्यात कर रहा है।

मोदी सरकार के बजट ने यह साबित कर दिया है कि असली विकास वह है जहाँ देश अपनी क्षमताओं पर भरोसा करे। आज बजट का पैसा राजमार्गों, बंदरगाहों और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हो रहा है, न कि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। 1973 के ब्लैक बजट ने देश को भुखमरी की छवि दी थी, लेकिन आज का बजट मध्यम वर्ग को टैक्स में राहत देता है और छोटे व्यापारियों को पंख देता है। यह सफर बेबसी से ‘बॉस’ बनने का है। 1973 की उन डरावनी यादों से निकलकर आज भारत एक ऐसी आर्थिक महाशक्ति बन गया है, जो अब किसी के सामने झुकता नहीं, बल्कि दुनिया को रास्ता दिखाता है। इंदिरा गाँधी का वह दौर एक चेतावनी थी और मोदी का यह दौर एक नई आशा का सूर्योदय है।

ब्रिटिश काल से मोदी सरकार तक… रेल बजट की कहानी, जिसने भारत की वित्तीय व्यवस्था को करीब एक सदी तक अलग राह पर चलाया

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज (1 फरवरी 2026) को लगातार नौंवी बार बजट पेश करने जा रही हैं। आम बजट में देश की अर्थव्यवस्था, विकास योजनाओं और नीतियों की दिशा तय होगी, इस बजट में रेलवे को लेकर भी कई बड़े ऐलान किए जाने की संभावना है। हालाँकि, हमेशा ऐसा नहीं था और लंबे वक्त तक रेलवे का बजट आम बजट से अलग पेश किया जाता रहा था। यह परंपरा करीब नौ दशकों तक चली लेकिन 2017 में इसे समाप्त कर रेल बजट को आम बजट में शामिल कर दिया गया। इस फैसले के पीछे ऐतिहासिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण रहे।

रेल बजट की शुरुआत कैसे हुई

रेल बजट को अलग से पेश करने की परंपरा 1924 में ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुई थी। उस समय भारतीय रेलवे का आकार और महत्व इतना बड़ा था कि इसे आम बजट के तहत समायोजित करना कठिन माना गया। ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के चेयरमैन सर विलियम एक्वर्थ ने रेलवे के प्रशासन और वित्तीय व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई सुधार सुझाए। उनकी सिफारिशों के आधार पर यह तय किया गया कि रेलवे का बजट आम बजट से अलग पेश किया जाएगा ताकि इसके खर्च, आय और योजनाओं पर विशेष ध्यान दिया जा सके।

स्वतंत्रता के बाद भी जारी रही परंपरा

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद भी रेल बजट को अलग पेश करने की परंपरा जारी रखी गई। स्वतंत्र भारत का पहला रेल बजट देश के पहले रेल मंत्री जॉन मथाई ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में दो आम बजट भी पेश किए। उस समय रेलवे देश की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार था और इसकी आय का योगदान इतना बड़ा था कि इसे अलग बजट के रूप में बनाए रखना जरूरी समझा गया।

रेलवे की आय और अलग बजट का औचित्य

आजादी के समय रेलवे से होने वाली राजस्व प्राप्ति आम बजट की आय से लगभग 6% अधिक थी। इस वजह से सर गोपालस्वामी आयंगर समिति ने सिफारिश की थी कि रेलवे बजट को अलग ही पेश किया जाना चाहिए। 21 दिसंबर 1949 को संविधान सभा ने भी इस संबंध में एक प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। हालांकि यह व्यवस्था प्रारंभ में केवल पांच वर्षों के लिए तय की गई थी, लेकिन यह परंपरा लगातार आगे बढ़ती रही और 2016 तक कायम रही।

समय के साथ रेलवे के राजस्व में बदलाव

देश की अर्थव्यवस्था और परिवहन व्यवस्था में बदलाव के साथ रेलवे के राजस्व का अनुपात धीरे-धीरे कम होता गया। 1970 के दशक तक रेलवे का योगदान कुल राजस्व का लगभग 30% रह गया। 2015-16 तक यह घटकर करीब 11.5% तक पहुँच गया। इस गिरावट ने विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर किया कि क्या अलग रेल बजट की परंपरा अब भी जरूरी है।

रेल बजट के विलय की प्रक्रिया

नवंबर 2016 में रेल मंत्रालय ने घोषणा की कि रेल बजट को केंद्रीय बजट में शामिल किया जाएगा। यह फैसला नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों और बिबेक देबरॉय तथा किशोर देसाई द्वारा लिखे गए एक पेपर पर आधारित था। समिति का तर्क था कि आधुनिक सार्वजनिक वित्त प्रणाली में अलग रेल बजट का कोई व्यावहारिक उद्देश्य नहीं रह गया है और भारत दुनिया का लगभग अकेला देश था, जहाँ यह परंपरा अभी भी जारी थी।

सरकार के भीतर इस प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा हुई। तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इसका समर्थन किया और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसे संसद में प्रस्तुत किया। आखिरकार 2017-18 के बजट से पहली बार रेल बजट और आम बजट को एकीकृत कर दिया गया, जिससे दशकों पुरानी परंपरा खत्म हो गई।

वित्तीय व्यवस्था में हुए बदलाव

रेल बजट के आम बजट में विलय के साथ कई महत्वपूर्ण वित्तीय बदलाव भी किए गए। वित्त मंत्रालय ने रेलवे के अनुमानों के साथ एक विनियोग विधेयक तैयार करने और संसद में प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी संभाली। रेलवे को सरकार को लाभांश देने की बाध्यता से मुक्त कर दिया गया, जिससे उस पर वित्तीय दबाव कम हुआ। पहले रेलवे के लिए अलग पूंजी प्रवाह (कैपिटल फ्लो) की व्यवस्था थी, जिसे समाप्त कर दिया गया और इसके स्थान पर वित्त मंत्रालय से सकल बजटीय सहायता प्रदान करने की व्यवस्था की गई। इसके साथ ही रेलवे को बाजार से अतिरिक्त संसाधन जुटाने की स्वतंत्रता भी दी गई ताकि वह अपने पूंजीगत व्यय को पूरा कर सके।

रेल बजट के विलय के पीछे उद्देश्य

रेल बजट को आम बजट में शामिल करने का मकसद यह था कि सरकार देश की आमदनी और खर्च को एक साथ और साफ तरीके से देख सके। इससे रेलवे, सड़क और जलमार्ग जैसे परिवहन क्षेत्रों की योजनाओं को मिलाकर बेहतर तरीके से बनाया जा सका। इसके साथ ही वित्त मंत्रालय को पैसों के बंटवारे में ज्यादा सुविधा और लचीलापन मिला, ताकि जरूरत के अनुसार बीच साल में भी संसाधनों में बदलाव किया जा सके।

इस फैसले से कैसे आई पारदर्शिता

रेल बजट को आम बजट में मिलाने से बजट बनाने और पेश करने की प्रक्रिया आसान और साफ हो गई। पहले रेल बजट और आम बजट अलग-अलग होने के कारण संसद में तैयारी और चर्चा में ज्यादा समय लगता था लेकिन अब यह समय बचने लगा। अब सरकार की कमाई और खर्च एक ही दस्तावेज में दिखाए जाते हैं, जिससे संसद, निवेशकों और आम लोगों के लिए देश की आर्थिक स्थिति को समझना ज्यादा सरल हो गया।

रेल बजट को आम बजट में शामिल करना सिर्फ एक सरकारी फैसला नहीं था बल्कि बदलती अर्थव्यवस्था और नई वित्तीय सोच का नतीजा था। पहले रेलवे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता था लेकिन समय के साथ उसकी भूमिका बदलती गई। अलग रेल बजट की परंपरा लंबे समय तक भारतीय इतिहास का अहम हिस्सा रही लेकिन आधुनिक व्यवस्था में इसे खत्म कर एक ही बजट प्रणाली अपनाई गई। इस बदलाव से देश की वित्तीय व्यवस्था ज्यादा व्यावहारिक, साफ और बेहतर तालमेल वाली बन गई।

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण लगातार नौंवी बार बजट पेश कर रचेंगी इतिहास: जानें- भारत के वित्तीय विवरण को बनाने की प्रक्रिया, क्या हैं मध्य वर्ग की उम्मीदें और चुनौतियाँ

भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार (1 फरवरी 2026) को संसद में संघीय बजट 2026-27 पेश करेंगी। यह उनका लगातार नौवाँ बजट होगा, जो एक रिकॉर्ड है। पहली बार बजट रविवार को पेश हो रहा है, जो ऐतिहासिक है।

इस बजट पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं, खासकर मध्य वर्ग की, जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। मध्य वर्ग महँगाई, टैक्स बोझ और जीवन यापन की बढ़ती लागत से जूझ रहा है। इस लेख में हम बजट बनाने की पूरी प्रक्रिया, मध्य वर्ग की प्रमुख चुनौतियों और इस बजट से उनकी उम्मीदों पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं।

बजट बनाने की प्रक्रिया को समझें

भारत में संघीय बजट बनाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 112 के तहत होती है। यह छह महीने पहले शुरू हो जाती है और अत्यंत गोपनीय रहती है, जिसके मुख्य चरण निम्नलिखित हैं-

बजट सर्कुलर जारी करना: वित्त मंत्रालय का आर्थिक मामलों का विभाग सितंबर-अक्टूबर में सभी मंत्रालयों और विभागों को बजट सर्कुलर जारी करता है। इसमें अगले वित्त वर्ष के लिए राजस्व और व्यय के अनुमान माँगे जाते हैं।

प्री-बजट मीटिंग्स: नवंबर-दिसंबर में वित्त मंत्री स्टेकहोल्डर्स जिसमें उद्योग जगत, किसान संगठन, अर्थशास्त्री, राज्य सरकारें आदि होने हैं, उनके साथ बैठके करते हैं। ये मीटिंग्स नीतिगत सुझाव देने में मदद करती हैं।

अनुमान तैयार करना: सभी मंत्रालय अपने व्यय और राजस्व के अनुमान भेजते हैं। वित्त मंत्रालय इनका मिलान करता है, घाटे का आकलन करता है और राजकोषीय नीति निर्धारित करता है।

हलवा सेरेमनी और लॉक-इन: बजट प्रिंटिंग की अंतिम कड़ी में पारंपरिक ‘हलवा सेरेमनी’ होती है। इस बार यह 27 जनवरी 2026 को हुई। इसमें वित्त मंत्री हलवा बनाती और बाँटती हैं, जो बजट टीम के लिए शुभ मानी जाती है।

इसके बाद बजट से जुड़े अधिकारी नॉर्थ ब्लॉक के बेसमेंट में ‘लॉक-इन’ हो जाते हैं। वो बाहरी दुनिया से संपर्क काटकर बजट दस्तावेज तैयार करते हैं। यह गोपनीयता सुनिश्चित करता है

अंतिम स्वीकृति और पेशकश: कैबिनेट की मंजूरी के बाद बजट लोकसभा में पेश होता है। इसके बाद चर्चा, मांगें अनुदान और वित्त विधेयक पारित होते हैं। यह प्रक्रिया न केवल आर्थिक योजना है, बल्कि सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाती है। 2026 बजट में ग्लोबल चुनौतियाँ जैसे अमेरिकी टैरिफ्स का भी असर दिख सकता है।

बजट 2026 से मध्य वर्ग की उम्मीदें

1 फरवरी को पेश होने वाले बजट से मध्य वर्ग को बड़ी राहत की उम्मीद है। प्रमुख अपेक्षाएँ:

हाउसिंग और शिक्षा-स्वास्थ्य: होम लोन ब्याज पर छूट बढ़ाना, मेडिकल खर्च पर डिडक्शन।

महंगाई नियंत्रण और रोजगार: GST में सुधार, आवश्यक वस्तुएँ सस्ती करना। स्किल डेवलपमेंट और जॉब क्रिएशन पर फोकस।

अन्य: कैपिटल गेंस टैक्स सरलीकरण, पेंशन और सेविंग स्कीम में राहत। विशेषज्ञ मानते हैं कि मध्य वर्ग को राहत से खपत बढ़ेगी, जो अर्थव्यवस्था को बूस्ट देगी।

उम्मीद और वास्तविकता का संतुलन

बजट 2026 विकसित भारत-2047 के सपने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। मध्य वर्ग की चुनौतियाँ गंभीर हैं, लेकिन अगर सरकार टैक्स राहत और खपत बढ़ाने पर फोकस करती है, तो यह वर्ग फिर मजबूत हो सकता है।

निर्मला सीतारमण का यह नौवाँ बजट न केवल आर्थिक दस्तावेज है, बल्कि करोड़ों मध्य वर्ग परिवारों की उम्मीदों का आईना भी। उम्मीद है कि यह बजट संतुलित और समावेशी होगा, जो सभी वर्गों की जरूरतों को ध्यान में रखेगा।

शैक्षणिक परिसर को ‘सामाजिक न्याय उद्योग’ का अखाड़ा न बनाएँ- UGC नियमावली पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के संदेश

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के ‘इक्विटी प्रमोशन रेगुलेशंस 2026’ पर सुप्रीम कोर्ट की रोक किसी तकनीकी खामी पर लगाया गया विराम नहीं है, बल्कि एक खतरनाक वैचारिक ढाँचे पर खींची गई आपात रेखा है। यह सरकार और यूजीसी- दोनों के लिए अंतिम चेतावनी सरीखी है कि सामाजिक न्याय का अर्थ ऐसा तंत्र खड़ा कर देना नहीं होता, जिसमें एक वर्ग को जन्म से पीड़ित और दूसरे को जन्म से अभियुक्त मान लिया जाए। न्याय का यह मॉडल सुधार नहीं करता, वह पहले ही दिन कैंपस को संदेह और भय में बाँट देता है।

शिक्षा के परिसर सर्वसमावेशी हों, उन्मुक्त हों, भेदभाव से मुक्त हों- यह आकांक्षा सर्वमान्य है। शायद यूजीसी की भी। लेकिन 2012 के पुराने फ्रेमवर्क को हटाकर जो नए रेगुलेशंस लाए गए, उनमें सामान्य जाति के अस्तित्व को ही लगभग नकार दिया गया। जैसे यह पहले से तय कर लिया गया हो कि वे भेदभाव के शिकार हो ही नहीं सकते, और उनके विरुद्ध झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतें हो ही नहीं सकतीं।

यह सुधार नहीं है। वैचारिक दमन है।

इसीलिए इसका मुखर विरोध हुआ और सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। शीर्ष अदालत ने वस्तुतः यह संदेश दिया है कि अस्पष्ट परिभाषाओं, एकतरफा समितियों और बिना जवाबदेही वाले अधिकारों के सहारे चलने वाला ‘न्याय’ शिक्षा को बचा नहीं सकता। वह केवल समाज में नई दरारें पैदा करेगा।

अब सवाल केवल नियमों का भी नहीं रह गया है। सवाल उस राजनीतिक और बौद्धिक अहंकार का है, जो यह मान बैठा था कि कैंपस को भय के सहारे नियंत्रित किया जा सकता है। संभवतः वे यह भूल गए कि ‘सामाजिक न्याय उद्योग’ जब शैक्षणिक परिसर में उतरता है, तो न्याय नहीं, भय सबसे पहले संगठित होता है। शिक्षा का स्पेस संवाद से खिसककर संदेह में बदल जाता है।

सुप्रीम कोर्ट का संकेत साफ है- सामाजिक न्याय भावना से नहीं, संतुलित प्रक्रिया से चलता है। जो ढाँचा भरोसा तोड़े, वह सुधार नहीं, विभाजन पैदा करता है। यूजीसी के रेगुलेशंस से यह आशंका भी गहराई कि ये नियम अकादमिक सुधार से अधिक राजनीतिक संतुलन साधने का उपकरण बन सकते हैं। कैंपस को संवाद का क्षेत्र बनाने के बजाय शिकायत आधारित संघर्ष का मैदान बना सकते हैं।

भारतीय कैंपस के अतीत को मोटे तौर पर तीन चरणों में देखा जा सकता है;

  • 1970–80 के दशक के छात्र आंदोलन
  • मंडल काल के कैंपस तनाव
  • हालिया वर्षों का वैचारिक ध्रुवीकरण

हर चरण ने एक ही बात साबित की है- कैंपस में शांति, भय और निगरानी से नहीं आती। शांति आती है निष्पक्ष संवाद, पारदर्शी प्रक्रिया और भरोसे से। यूजीसी के नए नियम इस संतुलन को तोड़ते दिख रहे थे।

यह पूरा विवाद सत्तारूढ़ राजनीति के लिए भी कसौटी है। सामाजिक न्याय का प्रश्न यदि इस रूप में उभरे कि एक वर्ग स्वयं को स्थायी आरोपित और दूसरा स्वयं को स्थायी पीड़ित मानने लगे, तो परिणाम न्याय नहीं, स्थायी सामाजिक तनाव होता है।

कुछ इसे भाजपा की कथित कास्ट बैलेंसिंग राजनीति की परीक्षा मानते हैं, तो कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुतले जलाने और उग्र नारों में राजनीतिक अवसर खोज रहे हैं। पर सच यह है कि यह परीक्षा केवल भाजपा की नहीं, पूरे नीति निर्माण तंत्र की है।

आदर्श शैक्षणिक कैंपस की कसौटी बिल्कुल स्पष्ट है- वह संवाद प्रधान हो। शिकायत से पहले संवाद हो। मेडिएशन सेल हों, जो प्रशासनिक विस्तार नहीं, बल्कि विश्वसनीय शिक्षकों और छात्रों पर आधारित हों। जहाँ शिकायतकर्ता और आरोपित- दोनों की गरिमा सुरक्षित रहे, जाँच समयबद्ध हो और झूठे आरोपों पर स्पष्ट दंड का प्रावधान हो, क्योंकि न्याय का अर्थ केवल संरक्षण नहीं, निष्पक्षता भी है।

कैंपस में असहमति को अपराध न बनाया जाए। छात्रों को सिखाया जाए कि विचारों का संघर्ष लोकतंत्र की ताकत है, उसकी कमजोरी नहीं। भावनात्मक उन्माद के बजाय तथ्यात्मक जाँच पर आधारित व्यवस्था ही स्वस्थ शिक्षा की शर्त है।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि कैंपस वैचारिक प्रयोगशाला नहीं हैं। वे राष्ट्र की बौद्धिक नर्सरी हैं। शिक्षक और छात्र भय में जीते हुए न पढ़ सकते हैं, न पढ़ा सकते हैं। शिक्षा स्वतंत्रता में ही फलती है।

इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की रोक को टकराव नहीं, संशोधन का अवसर समझा जाना चाहिए। UGC के लिए भी और उनके लिए भी, जो अदालत के निर्देश के बाद सड़कों पर उतर आए हैं। यूजीसी को चाहिए कि वह नियमों को स्पष्ट करे, परिभाषाओं को सर्वसमावेशी बनाए और प्रक्रिया को दोतरफा न्याय पर आधारित करे।

कैंपस का उद्देश्य किसी वर्ग को स्थायी विजेता या स्थायी पीड़ित बनाना नहीं है। कैंपस का उद्देश्य सोचने वाला नागरिक गढ़ना है। सुप्रीम कोर्ट की रोक यही याद दिलाती है कि शैक्षणिक परिसर न वैचारिक प्रयोगशाला हैं, न राजनीतिक अखाड़े। वह सोचने वाला नागरिक गढ़ने की जगह है।

स्मरण रहे जो नीति विवेक नहीं, डर बोती है, वह शिक्षा नहीं रचती; वह समाज में वही दरार और गहरी करती है, जिसके नाम पर उसे बेचा जाता है।

50+ देश, 800+ कलाकार, 1200+ स्टॉल: 39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला की हुई शूरूआत, लोकल से ग्लोबल होने पर रहेगा जोर

हरियाणा के फरीदाबाद में शनिवार (31 जनवरी 2026) से विश्व प्रसिद्ध 39वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प मेले की शानदार शुरुआत हो गई है। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने इस भव्य महोत्सव का उद्घाटन किया, जिसमें हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और केंद्रीय पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी शरीक हुए।

15 फरवरी 2026 तक चलने वाले इस मेले की इस बार की थीम ‘Local to Global’ रखी गई है, जिसका उद्देश्य हमारे स्थानीय कारीगरों की कला को पूरी दुनिया के सामने पेश करना है। उत्तर प्रदेश और मेघालय इस साल के ‘थीम स्टेट’ हैं, जबकि मिस्र ‘पार्टनर नेशन’ के तौर पर अपनी प्राचीन संस्कृति का जादू बिखेरेगा।

लोकल से ग्लोबल की ओर बढ़ते कदम और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी

इस बार सूरजकुंड मेला अपने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ने के लिए तैयार है। पिछले सालों के मुकाबले इस बार 50 से अधिक देशों के करीब 800 कलाकार और शिल्पकार हिस्सा ले रहे हैं। उत्तर प्रदेश और मेघालय के स्टॉल्स पर आपको वहाँ की पारंपरिक लोक कला और हथकरघा का बेहतरीन काम देखने को मिलेगा।

वहीं, मिस्र अपनी वास्तुकला और प्राचीन कलाकृतियों से पर्यटकों का मन मोहेगा। यह आयोजन न केवल मनोरंजन का केंद्र है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर मजबूती से खड़ा करने का एक बड़ा जरिया भी बन गया है।

हस्तशिल्प, लजीज व्यंजन और ‘मेला साथी’ ऐप की सुविधा

मेला परिसर में 1200 से अधिक स्टॉल लगाए गए हैं, जहाँ लकड़ी, मिट्टी, धातु और पत्थर से बनी खूबसूरत कलाकृतियाँ बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। स्वाद के शौकीनों के लिए इस बार यूनिसेफ (UNICEF) की मदद से उत्तर प्रदेश के खास लजीज व्यंजनों के स्टॉल लगाए गए हैं।

पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए ‘मेला साथी’ (Mela Sathi) नाम का एक मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया गया है, जिसकी मदद से आप किसी भी स्टॉल की लोकेशन आसानी से खोज सकते हैं और मेले का पूरा आनंद उठा सकते हैं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम और सितारों से सजी सांस्कृतिक शामें

मनोरंजन के लिए इस बार कैलाश खेर, गुरदास मान और सलमान अली जैसे दिग्गज कलाकार अपनी सुरीली आवाज से समाँ बांधेंगे। हरियाणा की मिट्टी से जुड़े पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूँज भी हर शाम सुनाई देगी।

मेले के लिए करीब 7 करोड़ रुपए की लागत से बुनियादी ढाँचे को और मजबूत किया गया है, जिसमें नए हाट और मनोरंजन क्षेत्र शामिल हैं। सुरक्षा के लिहाज से पूरे परिसर में चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं और ट्रैफिक को सुचारू रखने के लिए खास पार्किंग व्यवस्था व रूट डायवर्जन भी किया गया है।

सुरक्षा और ट्रैफिक के पुख्ता इंतजाम

मेले के सफल आयोजन के लिए बुनियादी ढाँचे पर करीब 7 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं, जिसमें 127 नए हाट और मनोरंजन क्षेत्र का निर्माण शामिल है। सुरक्षा के लिए पूरे परिसर में भारी संख्या में CCTV कैमरे लगाए गए हैं। ट्रैफिक को सुचारू रखने के लिए फरीदाबाद में 31 जनवरी से 15 फरवरी तक भारी वाहनों की ‘नो-एंट्री’ रहेगी। पर्यटकों के लिए ईरोज सिटी, हेलीपैड और लेकवुड सिटी में पार्किंग की विशेष व्यवस्था की गई है।

सुनेत्रा पवार बनीं महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी CM, अजित पवार की विरासत बढ़ाएँगी आगे: क्या शरद पवार ग्रुप करने वाला था NCP पर कब्जा?

महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार (31 जनवरी 2026) को एक ऐतिहासिक पल आया, जब राज्यसभा सांसद सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। वह महाराष्ट्र की पहली महिला डिप्टी सीएम बन गई हैं। शपथ ग्रहण के दौरान समर्थकों ने ‘अजित दादा अमर रहे’ के नारे भी लगाए।

यह शपथ ग्रहण समारोह मुंबई में हुआ, जिसमें मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उप मुख्यमंत्री एकनाश शिंदे और महायुति के अन्य नेता मौजूद रहे। दिवंगत अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार ने शाम 5.05 बजे इस पद पर अपने पति की जगह ली, जिनकी 28 जनवरी 2026 को बारामती में प्लेन क्रैश में दुखद मौत हो गई थी।

सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम बनाने के इस फैसले ने एनसीपी (अजित गुट) को मजबूती दी, लेकिन शरद पवार गुट में हैरानी और नाराजगी पैदा की। सूत्रों के मुताबिक, यह कदम सिर्फ पद भरने का नहीं, बल्कि पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।

शपथ से पहले विधायक दल की बैठक में बनी सर्वसम्मति

मुंबई में शनिवार (31 जनवरी 2026) को दोपहर 2 बजे एनसीपी (अजित गुट) के विधायकों की बैठक विधान भवन में हुई। इसमें सुनेत्रा पवार को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुना गया। पार्टी नेता दिलीप वलसे पाटिल ने उनका नाम प्रस्तावित किया, जिसे सभी ने समर्थन दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर सुनेत्रा को डिप्टी सीएम बनाने की सिफारिश की गई।

प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने यह प्रक्रिया तेजी से पूरी की। विधायक सना मलिक ने कहा, “पिछले दो दिनों से कार्यकर्ता और नेता यही माँग कर रहे थे कि सुनेत्रा को दादा (अजित पवार) की जगह लाया जाए।”

बहरहाल, सुनेत्रा पवार ने अब डिप्टी सीएम पद की शपथ ले ली है। उन्होंने शपथ ग्रहण से पहले राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। हालाँकि सुनेत्रा अभी विधानसभा या विधान परिषद की सदस्य नहीं हैं, इसलिए उन्हें 6 महीने में चुनाव लड़ना होगा।

NCP को शरद पवार गुट के कब्जे से बचाना मुख्य वजह

सूत्र बताते हैं कि सुनेत्रा को इतनी जल्दी सत्ता के केंद्र में लाने का बड़ा कारण एनसीपी (अजित गुट) को बचाना है। अजित पवार के निधन से पहले दोनों गुटों के विलय की बातें जोरों पर थीं। शरद पवार गुट के नेता जयंत पाटिल, एकनाथ खड़से और अनिल देशमुख ने दावा किया कि विलय लगभग तय था। अजित पवार खुद 12 फरवरी को घोषणा करने वाले थे।

अजित पवार के विमान हादसे में निधन के बाद महाराष्ट्र की राजनीति शोक में थी, लेकिन सियासी गलियारों में एक और चर्चा तेज हो चुकी थी। एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की। एनसीपी (शरद पवार) गुट के वरिष्ठ नेताओं ने दावा किया कि यह सिर्फ चर्चा नहीं थी, बल्कि तीन-चार महीनों से बातचीत चल रही थी। यहाँ तक कहा गया कि अजित पवार की आखिरी इच्छा भी यही थी कि पार्टी एक हो और शरद पवार के जन्मदिन तक यह ‘तोहफा’ दिया जाए। सवाल ये है कि अजित पवार की मौत के तुरंत बाद उनकी आखिरी इच्छा को क्यों सामने रखा गया?

ऐसे में अजित गुट को डर था कि विलय हुआ तो पार्टी पर शरद पवार की पकड़ मजबूत हो जाएगी और उनका गुट हाशिए पर चला जाएगा। प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे जैसे नेता नहीं चाहते थे कि पार्टी फिर शरद पवार के हाथ में जाए। इसलिए सुनेत्रा को डिप्टी सीएम बनाकर गुट को मजबूत केंद्र दिया गया। यह महायुति की सोची-समझी रणनीति है, ताकि एनसीपी पर संतुलन बना रहे।

शरद पवार का हैरानी भरा बयान- मुझे कोई जानकारी नहीं

शरद पवार ने शपथ ग्रहण पर हैरानी जताई। उन्होंने कहा, “मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। यह उनकी पार्टी का आंतरिक फैसला होगा। प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे ने शायद तय किया हो।” उन्होंने विलय पर कहा, “पिछले चार महीने से बात चल रही थी। अजित और जयंत पाटिल नेतृत्व कर रहे थे। अजित की इच्छा थी कि दोनों दल साथ आएँ, लेकिन अब कुछ कहा नहीं जा सकता।”

शरद पवार ने इशारा किया कि जल्दबाजी हुई है। उन्होंने कहा, “अजित के प्लेन क्रैश ने विलय की बात रोक दी।” शरद पवार और सुप्रिया सुले शपथ समारोह में नहीं गए। इससे परिवार में नाराजगी साफ दिखी। शरद पवार ने यह भी कहा कि परिवार की नई पीढ़ी विरासत आगे बढ़ाएगी, लेकिन सत्ता की मौजूदा संरचना में वे खुद हाशिए पर महसूस कर रहे हैं।

सिर्फ विलय रोकना ही नहीं, कई अन्य कारण भी हैं। सुनेत्रा पवार के डिप्टी सीएम बनने से 4 अहम संदेश NCP समर्थकों में गया है-

अजित पवार की राजनीतिक विरासत को परिवार में रखना। सुनेत्रा बारामती से जुड़ी हैं और 2024 लोकसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। कार्यकर्ता उन्हें ‘वहिनी’ कहते हैं और उनकी माँग थी कि विरासत जारी रहे।

महायुति गठबंधन में स्थिरता। अजित के निधन से एनसीपी कमजोर हो सकती थी, जिसका फायदा विपक्ष को मिलता। सुनेत्रा को लाकर गठबंधन मजबूत हुआ।

महिला नेतृत्व को बढ़ावा। महाराष्ट्र में पहली महिला डिप्टी सीएम बनना बड़ा संदेश है।

  1. कार्यकर्ताओं का मनोबल मजबूत हुआ। शोक में डूबे कार्यकर्ताओं को नया चेहरा मिला।

सुनेत्रा पवार के बारे में 10 अहम बातें

  1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि: सुनेत्रा पवार का जन्म 18 अक्टूबर 1963 को महाराष्ट्र के धाराशिव (पूर्व ओसमानाबाद) में एक राजनीतिक परिवार में हुआ था। उनके पिता और भाई पद्मसिंह पाटिल भी सक्रिय राजनेता रहे, जिससे बचपन से ही सार्वजनिक जीवन का माहौल मिला।

शिक्षा और शुरुआती जीवन: सुनेत्रा ने औरंगाबाद से कॉमर्स में स्नातक की डिग्री हासिल की। 1985 में अजित पवार से शादी के बाद वे बारामती में बस गईं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हुईं।

स्वच्छता और ग्रामीण विकास की शुरुआत: उन्होंने पवार परिवार के पैतृक गाँव काठेवाडी में स्वच्छता अभियान चलाया, जहाँ खुले में शौच की समस्या दूर की। बाद में निर्मल ग्राम अभियान के तहत 86 गांवों में सेल्फ हेल्प ग्रुप्स के जरिए स्वच्छता को बढ़ावा दिया।

पर्यावरण संरक्षण में योगदान: 2010 में एनवायरमेंटल फोरम ऑफ इंडिया एनजीओ की स्थापना की और इको-विलेज कॉन्सेप्ट को भारत में लोकप्रिय बनाया। पर्यावरण जागरूकता और सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर उनका फोकस ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ा बदलाव लाया।

टेक्सटाइल उद्योग में नेतृत्व: सुनेत्रा पवार बारामती हाई टेक टेक्सटाइल पार्क (2008) की चेयरपर्सन हैं, जहाँ 15,000 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला, ज्यादातर महिलाओं को। यह प्रोजेक्ट केंद्र सरकार की स्कीम से जुड़ा और महिलाओं के सशक्तिकरण का बड़ा उदाहरण बना।

शिक्षा क्षेत्र में भूमिका: सुनेत्रा पवार विद्या प्रतिष्ठान की ट्रस्टी हैं, जो शरद पवार द्वारा स्थापित संस्था है और हजारों छात्रों को शिक्षा देती है। साल 2017 से सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी की सीनेट मेंबर के रूप में शिक्षा सुधारों में योगदान दे रही हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रियता: सुनेत्रा पवार साल 2011 से फ्रांस के वर्ल्ड एंटरप्रेन्योरशिप फोरम की थिंक टैंक मेंबर हैं। वो सस्टेनेबल डेवलपमेंट और उद्यमिता पर वैश्विक चर्चाओं में भारत का प्रतिनिधित्व करती रही हैं।

राजनीति में प्रवेश: लंबे समय तक बैकग्राउंड में रहने के बाद 2024 में सक्रिय राजनीति में आईं। बारामती से लोकसभा चुनाव लड़ा, हालाँकि हार गईं, लेकिन पवार परिवार की विरासत को आगे बढ़ाया।

राज्यसभा सांसद के रूप में भूमिका: एनसीपी से राज्यसभा सांसद चुनी गईं और संसद में महाराष्ट्र के मुद्दों पर आवाज उठाती हैं। सामाजिक और पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर उनकी सक्रियता संसदीय चर्चाओं में दिखती है।

वर्तमान में डिप्टी सीएम की जिम्मेदारी: अजित पवार के निधन के बाद महाराष्ट्र की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनीं। पार्टी और परिवार की विरासत को संभालते हुए ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण पर फोकस जारी रख रही हैं।

विलय की बात अब ठंडे बस्ते में, अब आगे क्या?

शपथ के बाद विलय की अटकलें थम गई हैं। अजित गुट चुप है, जबकि शरद गुट कह रहा है कि बात रुक गई। यह घटना महाराष्ट्र की राजनीति में नया मोड़ है। एक तरफ परिवार की विरासत सुनेत्रा पवार ने बचा ली है, तो दूसरी तरफ NCP के दोनों गुटों की दूरी और बढ़ गई है। वहीं, माना जा रहा है कि शरद पवार अब अपनी रणनीति के अगले पड़ाव को लेकर विचार कर रहे हैं।