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हिंदू अस्मिता, घुसैपठिए, भ्रष्टाचार और TMC की निकम्मी सरकार: अमित शाह ने बताई ‘बंगाल विजय’ की रणनीति, जानें- कैसे ममता का किला ढहाने की तैयारी कर रही BJP?

बंगाल में आगामी 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी की रणनीति साफ है। पार्टी ने घुसपैठ और उसकी वजह से हो रहे डेमोग्राफी बदलने के मुद्दे को जोरशोर से उठा रही है। राज्य में फैले भ्रष्टाचार और घोटालों की फेहरिस्त भी जनता के सामने गिना रही है। गरीबी, बेरोजगारी और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे भी पार्टी के लिए अहम है।

घुसपैठ का मुद्दा अहम

राज्य में ममता सरकार को पटखनी देने के लिए अहम मुद्दा घुसपैठिया है। बीजेपी जनता से वादा कर रही है कि अगर उनकी सरकार बनेगी तो घुसपैठियों को बाहर निकाला जाएगा। दो दिवसीय दौरे पर बंगाल गए केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार बनने के बाद एक मजबूत नेशनल ग्रिड बनाया जाएगा ताकि राज्य में परिंदा भी पर नहीं मार सके। उन्होंने ममता सरकार पर ये भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार सीमा पर बाड़ लगाने के लिए जमीन नहीं दे रही है इसलिए सीमा सील करने में दिक्कतें पेश आ रही हैं।

बंगाल के बाहर असम, त्रिपुरा से लेकर पंजाब, कश्मीर, गुजरात जैसे सीमावर्ती राज्यों में घुसपैठ अब करीब करीब बंद है। हालाँकि कश्मीर में आतंकी सीमा पार कर आते हैं, लेकिन ये आम लोग नहीं हैं। इसे घुसपैठ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

राज्य में करीब 30 फीसदी मुस्लिम हैं। लेकिन मुर्शिदाबाद जैसे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ की वजह से डेमोग्राफी बदल गई है। यहाँ करीब 70 फीसदी मुस्लिम हैं। यही वजह है कि पूर्व टीएमसी नेता हुमायूँ कबीर यहाँ बाबरी मस्जिद बनाने जा रहा है। इसके लिए करोड़ो रुपए जुटा भी चुका है। बीजेपी इस मुद्दे को भी उठा रही है और जनता को बता रही है कि आखिर ममता बनर्जी की शह के बिना बाबरी मस्जिद बनाना कैसे संभव है।

बीजेपी ने पूरे पश्चिम बंगाल में, खासकर बांग्लादेश की सीमा से सटे जिलों में, 1,000 से अधिक सीएए सहायता शिविर बना चुकी है। इन शिविरों का उद्देश्य हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में मदद करना, कागजात जुटाने में सहायता करना और प्रक्रिया को लेकर सही जानकारी देना है।

ममता कर रही मुस्लिमों का तुष्टिकरण

बीजेपी लगातार ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही है। बीजेपी मानती है कि राज्य में लाखों ‘फर्जी’ मतदाता हैं जो घुसपैठ कर आए हैं। इन घुसपैठिए को पहचानने के लिए राज्य में एसआईआर हो रहा है। लेकिन ममता बनर्जी शुरू से एसआईआर का विरोध कर रही है।

पार्टी टीएमसी पर ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का आरोप लगा रही है और हिंदुओं के एकीकरण को अपनी रणनीति का हिस्सा बना रही है। मतुआ और अन्य शरणार्थी समुदायों के बीच नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए के कार्यान्वयन को एक बड़े वादे के रूप में रखा जा रहा है। ममता बनर्जी सीएए का विरोध करती हैं। भाजपा का तर्क है कि मतुआ समुदाय को नागरिकता और सुरक्षा दिलाना उनकी प्राथमिकता है।

भ्रष्टाचार और कुशासन

बीजेपी लगातार तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार को ‘भ्रष्टाचार, डर और कुशासन’ के मुद्दों पर घेर रही है। पार्टी ममता बनर्जी के 14 साल के शासनकाल में हुए घोटालों का जिक्र कर रही है। शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, कोयला घोटाला, रेत तस्करी, नगर पालिका भर्ती घोटाला, मनरेगा घोटाला, आवास घोटाला समेत कई घोटालों की चर्चा की जाती है। इस दौरान उन मंत्रियों और पार्टी नेताओं का नाम बताना नहीं भूलती, जो भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जा चुके हैं या जिन पर मामले चल रहे हैं।

बंगाल के मंत्री रह चुके पार्थो चटर्जी, ज्योतिप्रिय मल्लिक, मलय घटक से लेकर अनुव्रत मंडल, माणिक भट्टाचार्या, नरेश पाल, फिरहाद हकीम, सोवन चटर्जी, कुणाल घोष का नाम बीजेपी गिनाती है। इनलोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और इनमें से ज्यादातर सलाखों के पीछे भी गए। ऐसे नेताओं के बारे में बताकर पार्टी मानती है कि बंगाल की जनता जरूर इस बार चुनाव में टीएमसी को ‘सजा’ देगी।

गृहमंत्री शाह ने बंगाल में घोटालों और नेताओं का जिक्र करते हुए कहा कि इनके घर से 25 करोड़,20 करोड़,27 करोड़ निकलते हैं और इनकी काली कमाई गिनते गिनते मशीनें भी बंद हो जाती हैं।

महिला सुरक्षा का मुद्दा

संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए बीजेपी महिला सुरक्षा में राज्य सरकार की विफलता के रूप में पेश कर रही है। बीजेपी ममता बनर्जी के दुर्गापुर गैंगरेप मामले पर की गई टिप्पणी का भी उल्लेख करती है। ममता बनर्जी ने कहा था कि महिलाओं को अपनी सुरक्षा खुद करनी चाहिए। महिलाओं के रात में बाहर निकलने पर भी सवाल खड़े किए थे।

इसका राजनीति दलों और महिला अधिकार संगठनों ने भी विरोध करते हुए कहा था कि ये ‘पीड़िता को दोषी ठहराने’ जैसा बयान है। बीजेपी का कहना है कि बंगाल जैसे राज्य में जहाँ महिलाएँ काफी आगे हैं, वहाँ मुगल शासन की तरह के ‘फरमान’ जारी होते हैं। उन्हें शाम 7 बजे तक घर पहुँच जाने की सलाह दी जाती है।

गृहमंत्री अमित शाह ने ममता बनर्जी पर हमला करते हुए कहा, “ऑफिशियली कहा गया है कि महिलाओं को शाम 7 बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। हम किस ज़माने में जी रहे हैं? क्या हम मुगल काल में जी रहे हैं? ममता जी, यह एक आजाद भारत है। यह पक्का करना कि महिलाएं जब चाहें सुरक्षित रूप से बाहर निकल सकें, उनका संवैधानिक अधिकार है। आपकी सरकार यह बेसिक सुरक्षा देने में नाकाम रही है।”

बीजेपी ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना के जवाब में महिलाओं के लिए अधिक वित्तीय सहायता और सरकारी नौकरियों में 33% आरक्षण जैसे वादे करने की तैयारी कर रही है। बिहार मॉडल को अपनाते हुए महिलाओं के खातों में कुछ रकम डाले जा सकते हैं।

बंगाल की ‘विरासत’ की चर्चा

बीजेपी ‘बंगाल की विरासत’ को पुनर्जीवित करने का वादा जनता से कर रही है। बंग गौरव, बंग संस्कृति की बात कर रही है। टीएमसी ने संसद में वंदे मातरम गाने का विरोध किया। बीजेपी इसे मुद्दा बना रही है और बंकिम चंद्र चटर्जी के अपमान से इसे जोड़ रही है। स्वामी विवेकानंद, गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों का बंगाल बनाने की बात भी पार्टी कर रही है।

गरीबी और बेरोजगारी के लिए ममता बनर्जी सरकार की नीतियों पर करारा प्रहार करते हुए बीजेपी उद्योगों की कमी के कारण हो रहे पलायन को रोकने का वादा कर रही है। ममता सरकार में आर्थिक स्थिति कमजोर होने और गरीबी बढ़ने का मुद्दा भी जोर शोर से उठाया जा रहा है। बीजेपी का कहना है कि एक समय था जब देश का नागरिक 100 रुपए कमाता था तो बंगाल का नागरिक 127 रुपए कमाता था, लेकिन अब देश का नागरिक 100 रुपए कमाता है और बंगाल का नागरिक सिर्फ 73 रुपए कमा पाता है। एक समय था जब भारत की GDP में योगदान के मामले में बंगाल तीसरे नंबर पर था। आज यह 22वें नंबर पर आ गया है।

राज्य में हिंसा और राजनीतिक मर्डर भी बड़ा मुद्दा है। अमित शाह के मुताबिक, माना जा रहा था कि कम्युनिस्टों के हारने के बाद हिंसा और बदले की राजनीति खत्म हो जाएगी, लेकिन वे कम्युनिस्टों से भी आगे निकल गए हैं।

दरअसल राज्य में अब तक 300 से ज्यादा बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। बंगाल के गाँवों से 3000 से ज्यादा कार्यकर्ता विस्थापित हो चुके हैं। टीएमसी से जुड़े नहीं होने पर बंगाल के गाँवों में छोटा- मोटा काम भी नहीं मिल पाता है। लोगों को राशन लेने और ब्लॉक स्तर के काम के लिए भी टीएमसी के ‘कैडर’ का सहारा लेना पड़ता है। राज्य में डर का माहौल है। अगर कोई टीएमसी कार्यकर्ताओं का विरोध करे, तो ये घर में घुस कर पीटते हैं। कई बार तो जान से भी मार डालते हैं।

बंगाल में राजनीतिक हत्या, भ्रष्टाचार और घुसपैठ से जनता त्रस्त है। हिन्दू अस्मिता का सवाल उठाकर बीजेपी अपनी रणनीति को धार दे रही है। बंगाल के लिए ये सारे मुद्दे अहम हैं क्योंकि जनता इनसे त्रस्त है। आरजी कर और दुर्गापुर रेप कांड को लेकर सड़क पर उतरी जनता इस बार टीएमसी को मजा चखाना चाहती है। बीजेपी को इसका फायदा मिल सकता है।

पार्टी इस बार बंगाल में सत्ता परिवर्तन की उम्मीद कर रही है। बीजेपी का लक्ष्य 2026 के चुनावों में राज्य की 294 सीटों में से 200 सीटें जीतने का है। मार्च-अप्रैल 2026 में चुनाव होने की संभावना है।

क्रिसमस के विरोध पर कहा- ‘शर्म करें हिंदू’, लाल किला ब्लास्ट वाले आतंकी उमर पर सवाल को बताया ‘Funny’: आरफा खानम ने बताया कितना दोगला है उनका इकोसिस्टम

भारत के लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम का सबसे असरदार हथियार न तो सिर्फ आँकड़ों से खेलना है, न ही चुनिंदा मुद्दों पर गुस्सा दिखाना। उनका असली हथियार है ‘बौद्धिक बेईमानी’ है, जिसे नैतिक श्रेष्ठता का जामा पहनाकर पेश किया जाता है।

यह एक सोची-समझी रणनीति है, जिसमें समर्थकों को गुमराह किया जाता है, मनचाहे नैरेटिव को साफ-सुथरा बनाकर फैलाया जाता है और असहज सच्चाइयों को दबा दिया जाता है। यह सब करते हुए ये लोग खुद को ‘संवैधानिक मूल्यों’ और ‘मानवाधिकारों’ का सबसे बड़ा रक्षक बताने लगते हैं।

असल में इस बौद्धिक बेईमानी का एक मकसद होता है- इस्लामी कट्टरपंथ से जुड़ी आपराधिक घटनाओं को हल्की और साफ दिखाना। हिंसा को सीधे अपराध मानने के बजाए उसे परिस्थिति, नाराजगी या गलतफहमी बताकर पेश किया जाता है।

हाल ही में पद्मजा जोशी के The Buck Stops Here के एपिसोड में इसका साफ उदाहरण देखने को मिला। जब ‘द वायर‘ से जुड़ी ‘पत्रकार’ आरफा खानम शेरवानी से ऐसा सवाल पूछा गया, जिसने लेफ्ट-लिबरल नैरेटिव की मामूली सोच को चुनौती दी, तो यह पूरी मानसिकता उजागर हो गई।

बहस तो सिर्फ एक मंच थी। असली मुद्दा यह था कि कैसे तथाकथित लिबरल लोग अपराधी की पहचान और राजनीतिक मुद्दे और राजनीतिक फायदे के हिसाब से नैतिकता के पैमाने बदलते हैं और उसी आधार पर जनता की सोच को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।

क्रिसमस की सजावट को नुकसान पहुँचाने की कुछ घटनाओं को यह कहकर पेश किया गया कि ‘मोदी के भारत में ईसाइयों पर हमला’ हो रहा है। यह तरीका भारत के खुद को नैतिकता का ठेकेदार मानने वालों के लिए नया नहीं है।

कुछ गुमनाम और हाशिये के लोगों की हरकतों को जानबूझकर किसी विचारधारा से जुड़ा हुआ बताया जाता है, फिर उसे बढ़ा-चढ़ाकर पूरे समाज पर आरोप लगाने का आधार बना दिया जाता है। इसके बाद पूरे हिंदू समाज को सामूहिक नैतिक दोषी ठहराने की कोशिश होती है और फिर वही जाने पहचाने चेहरे आगे आकर घोषणा कर देते हैं कि देश में धर्मनिरपेक्षता खत्म हो चुकी है।

राजनीति करने के लिए नैतिकता का चयनित पाठ

लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम एक सख्त दोहरे खाँचे पर चलता है, जहाँ हिंदुओं को हमेशा ताकतवर जालिम दिखाया जाता है और मुस्लिमों को हर हाल में पीड़ित। किसी भी छोटी से बड़ी घटना को इसी नजरिए से देखा जाता है। यहाँ तथ्य पीछे रह जाते हैं और विचारधारा सबसे ऊपर होती है।

इसी वजह से क्रिसमस की सजावट को नुकसान पहुँचाने जैसी घटनाएँ तुरंत ‘बहुसंख्यक फासीवाद’ और यहाँ तक कि ‘नरसंहार’ का सबूत बना दी जाती हैं। न जाँच का इंतजार किया जाता है, न ही संतुलन रखा जाता है। सीधे पूरे हिंदू समाज को सामूहिक रूप से दोषी ठहरा दिया जाता है, जैसे यह कोई तय नैतिक सोच हो।

लेकिन जब बात इस्लामी आतंकवाद की आती है। खासकर जब उसमें पढ़े-लिखें पेशेवर लोग और साफ वैचारिक सोच शामिल हो, तो यही इकोसिस्टम अचानक बारीकियाँ, कानूनी सावधानी और प्रक्रियागत संयम की दुहाई देने लगता है।

यह विरोधाभास कोई संयोग नहीं है। यह पूरी तरह जानबूझकर किया जाता है। यही बात तब सामने आई, जब आरफा से साफ और सीधे शब्दों में यह सवाल पूछा गया कि क्या वह हालिया नवंबर 2025 में दिल्ली के लाल किले के पास हुए हमले में शामिल पढ़े-लिखे मुस्लिम पेशेवरों की भूमिका निंदा करेंगी या नहीं।

लाल किला के पास हुए आंतकी हमले को लेकर सवाल आरफा को लगा ‘मजेदार’

वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सुबुही खान ने एक ऐसा सवाल पूछकर इस पाखंड को उजागर कर दिया, जिसने लेफ्ट-लिबरल सोच की असलियत सामने रख दी। दिल्ली के लाल किला के पास हुए आतंकी हमले में मुस्लिम डॉक्टरों की भूमिका का जिक्र करते हुए सुबुही खान ने पूछा कि क्या आरफा खानम को इस जिहादी हिंसा के लिए भी शर्मिंदगी महसूस होती है, जैसे कि उन्हें हिंदुओं से क्रिसमस की सजावट तोड़े जाने वाली घटनाओं पर हो रही है।

अपने तीखे सवाल में सुबुही खान ने इस बात पर भी जोर दिया कि एक पढ़े-लिखे डॉक्टर ने फिदायीन (आत्मघाती) हमला किया और उसे ‘शहादत’ बताया गया। इसके बाद उन्होंने आरफा से सीधा और बेहद असरदार सवाल पूछा- क्या एक भारतीय मुस्लिम होने के नाते इस आंतकी घटना पर उनका भी सिर शर्म से झुकता है, जैसे वह बहुसंख्यक समाज से उम्मीद करती हैं कि वे क्रिसमस की सजावट तोड़ने जाने वाली घटनाओं पर शर्म महसूस करें?

इस सवाल पर आरफा खान ने न तो निंदनीय, न ही आत्ममंथन की प्रतिक्रिया दी। बल्कि उन्होंने सवाल को ही खारिज कर दिया। आरफा ‘यह बहुत मजेदार सवाल है’ कहकर मुस्कुराने लगीं और यही बात उन्होंने कई बार दोहराई।

यह कोई जबान फिसलने वाली प्रतिक्रिया नहीं थी। यह विचारों की ट्रेनिंग का खुला प्रदर्शन था।

लेफ्ट-लिबरल सोच के लिए इस्लामी आतंकवाद कोई नैतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक असुविधा है। यह पीड़ित होने की बनाई गई कहानी को बिगाड़ देता है और समर्थकों को सुनाए जा रहे नैरेटिव में उलझन पैदा करता है। इसीलिए इसे या तो छोटा दिखाया जाता है या कानूनी प्रक्रियाओं में उलझा दिया जाता है, या फिर मजाक बनाकर टाल दिया जाता है।

कुछ मामले विचाराधीन, कुछ में संक्षिप्त निर्णय

जब दबाव बढ़ा, तो आरफा खान ने वही जाना-पहचाना बहाना पकड़ते हुए कहा, “मामला अभी जाँच में हैं।” कानून और प्रक्रिया यह अचानक दिखने वाला सम्मान तब अच्छा लगता, अगर यह चुनिंदा न होता।

जब किसी हिंदू कार्यकर्ता पर आरोप लगते हैं, तो यही लोग तुरंत नैतिक फैसला सुना देते हैं। तब न अदालत मायने रखती है, न जाँच की जरूरत समझी जाती है। अपराध पहले मान लिया जाता है, फिर उसे बढ़ा-चढ़ाकर पूरे समाज पर थोप दिया जाता है। लेकिन जैसे ही बातचीत में जिहाद आता है, तब नैतिक फैसला अनिश्चित समय के लिए टाल दिया जाता है। यह कानून की सावधानी नहीं है। यह नैरेटिव को संभालने की कोशिश है।

लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम हिंसा का विरोध नहीं करता, वह उसे वर्गों में बाँट देता है। गलत पक्ष की हिंसा को विचारधारा से जोड़ा जाता है, जबकि सही पक्ष की हिंसा को परिस्थिति, गलती या मजाक बताकर हल्का कर दिया जाता है।

बांग्लादेश पर उतर गया मुखौटा

अगर आरफा खान की बांग्लादेश पर की गई टिप्पणियों को देखा जाए, तो यहाँ उनकी बौद्धिक बेईमानी और भद्दी हो जाती है। जब इस्लामी भीड़ ने शेख हसीना को सत्ता से हटाया, तो शेरवानी ने इस उथल पुथल को ‘लोकतांत्रिक बदलाव’ बताकर सराहा।

इसके बाद जो हुआ, वह बिल्कुल अनुमान के मुताबिक था- हिंदुओं के घर जलाए गए, मंदिरों को नुकसान पहुँचाया गया और इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं की हत्या की। सबसे डरावना मामला हाल ही में सामने आया, जब दीपू चंद्र दास को कथित ईशनिंदा के आरोप में इस्लामी भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला।

इसके बावजूद अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले रक्षक पूरी तरह चुप रहे। न कोई गुस्सा दिखा, न कोई अंतरराष्ट्रीय अभियान चला, न ही अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर बड़े-बड़े भाषण दिए गए। क्योंकि इस मानसिकता में हिंदू पीडित माने ही नहीं जाते। उनका दर्द तय की गई कहानी में फिट नहीं बैठता, इसीलिए उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है, जैसा कुछ हुआ ही न हो।

देश को गुमराह और जनमत को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश

इसी तरह लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम खुद को जिंदा रखता है और अपने समर्थकों के साथ-साथ आम जनता को गुमराह करता है। यह काम सिर्फ खुली झूठी बातों से नहीं होता, बल्कि लोगों की नैतिक सोच को धीरे-धीरे खास दिशा में ढालकर किया जाता है।

नैतिकता अब कर्म या उसके नतीजों पर नहीं टिकी रहती, बल्कि पहचान के आधार पर तय की जाती है। हिंसा की निंदा या उसका बचाव उसकी क्रूरता के आधार पर नहीं, बल्कि इस बात पर होता है कि उसे करने वाला कौन है। अपराध खुद दूसरी प्राथमकिता हो जाता है, अपराधी की राजनीतिक पहचान सबसे अहम बन जाती है।

सामूहिक दोष भी चुनिंदा तौर पर थोपा जाता है। कुछ गिने-चुने लोगों की हरकतों के लिए पूरे हिंदू समाज से शर्म महसूस करने की उम्मीद की जाती है। लेकिन जब इस्लामी हिंसा की बात आती है, तो सामूहिक आत्ममंथन की माँग को सख्ती से खारिज कर दिया जाता है।

इतना ही नहीं, जो लोग सवाल उठाते हैं, उन्हें ‘इस्लामाफोबिया’, ‘धार्मिक नफरत बढ़ाने’ जैसे आरोप लगाकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। सिर्फ इसीलिए क्योंकि उन्होंने आतंकवादियों पर सवाल उठाए, जिन्होंने धर्म का इस्तेमाल हिंसा फैलाने के लिए की। जो लोग हर समय ‘समाज की जिम्मेदारी’ पर उपदेश देते हैं, वही लोग जैसे ही जवाबदेही अपनी पसंदीदा जमात तक पहुँचती है तो अचानक व्यक्तिगत सोच की आड़ ले लेते हैं और सामूहिक जिम्मेदारी से पीछे हट जाते हैं।

जब उग्रवाद असुविधाजनक हो जाता है, तो उसे कानूनी बहानों के पीछे छिपा दिया जाता है। ‘मामला अदालत में है’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कानूनी सिद्धांत नहीं, बल्कि नैतिक बहस को चुप कराने, निंदा को अनिश्चित समय तक टालने और जनता का ध्यान भटकाकर खत्म करने के लिए किया जाता है। यहाँ कानूनी प्रक्रिया न्याय का साधन नहीं, टालने का तरीका बन जाती है।

असहज सवालों के जवाब नहीं दिए जाते हैं, उनका मजाक उड़ाया जाता है। जिहाद, कट्टरपंथ और आतंकवाद से जुड़ी जायज चिंताओं को ‘मजाकिया’ बताकर अपने समर्थकों को खतरों का सामना करने के बजाए उन्हें हँसी में उड़ाने की आदत डालता है। यह मजाक कोई संयोग नहीं है, यह एक सोची-समझी ट्रेनिंग है। इससे यह संकेत दिया जाता है कि किन सवालों की इजाजत है और किन पर चुप रहना जरूरी है।

सबसे अहम बात यह है कि यहाँ संवेदना को भी हथियार बना दिया जाता है। पीड़ित होने का दर्जा सोच-समझकर बाँटा जाता है, सिर्फ वहीं जहाँ उससे वैचारिक फायदा हो। जो पीड़ा तय कहानी को मजबूत करती है, उसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है और अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाता है।

लेकिन जो दर्द उस कहानी को बिगाड़ देता है, उसे या तो छोटा दिखाया जाता है या संदर्भों में उलझा दिया जाता है या पूरी तरह मिटा दिया जाता है। इस सोच में करुणा इंसानी नहीं, बल्कि लेन-देन का सौदा बन जाती है।

चुनिंदा आक्रोश से उजागर होता पैटर्न

यह चुनिंदा नैतिकता का पाठ कोई अलग-अलग मौके की बात नहीं है, बल्कि लगातार दिखाई देता है और आरफा खानम शेरवानी का रिकॉर्ड भी इसे साफ दर्शाता है। जहाँ वह ‘आई लव मोहम्मद’ जैसे नारे को मजहब का शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति बताकर जोर-शोर से बचाती हैं, वहीं ‘आई लव महादेव’ कहने के कारण हिंदुओं पर हुए हिंसक हमलों पर वह खामोश रही हैं।

सितंबर 2025 में गुजरात के गाँधीनगर जिले के बहियाल गाँव में एक हिंदू युवक के सोशल मीडिया पोस्ट ने भयंकर और एकतरफा सांप्रदायिक हिंसा भड़काई, जिसमें उसने भगवान शिव के प्रति भक्ति जताई थी। उसकी दुकान को तोड़कर आग लगा दी गई। हिंदुओं की गाड़ियों में आगजनी, गरबा समारोह पर हमला किया गया। पुलिसकर्मी भी मारे गए और लगभग 80 घरों वाले हिंदू मोहल्ले में हजारों की भीड़ ने उत्पात मचाया।

सीसीटीवी फुटेज में मुस्लिम भीड़ पत्थर फेंकते, लाठियाँ चलाते और हिंदू संपत्ति को चुन-चुनकर तोड़ते दिखी, जबकि गवाहों के वीडियों में एक हिंदू माँ अपने लापता बेटे के लिए दहशत में रोती भी दिखाई दी।

इतना सब होने के बावजूद शरेवानी की तरफ से कोई गुस्सा या नारजगी नहीं दिखाई दी। न अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर कोई उपदेश, न संविधानिक मूल्यों पर कोई लेक्चर। उनकी खामोशी जोरदार थी।

यह चुप्पी और भी ज्यादा सप्ष्ट हो जाती है, जब इसकी तुलना उनके इस्लामी नारे बचाने के रुख से की जाए। ये नारे अक्सर दंगों, आगजनी, पत्थरबाजी, पुलिस पर हमलों और ‘सर तन से जुदा’ जैसी खुली धमकियों के साथ जुड़े रहे हैं।

शेरवानी लगातार कहती हैं कि ये नारे केवल धर्म की अभिव्यक्ति हैं, लेकिन उन्होंने कभी सवाल नहीं उठाया कि ये नारे इतनी बार हिंसा के साथ क्यों जुड़े होते हैं या धर्म के नाम पर ‘युद्ध’ जैसी पोस्टर की भाषा क्यों PFI जैसे समूहों की पुराने बाते दोहराती हैं, जिन्होंने खुले तौर पर हिंदुओं के नाश की कल्पना की थी।

हिंदू धर्म का मजाक उड़ाने से लेकर लव जिहाद जैसे दर्ज मामलों को नजरअंदाज करना और जबरन इस्लामी धर्मांतरण के अपराधियों की सुरक्षा करने वाली खबरों बचाव करना। यही है आरफा खान शेरवानी की पत्रकारिता।

इन घटनाओं को मिलाकर देखा जाए तो एक साफ पैटर्न सामने आता है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। यह सोच बताती है कि हिंदू अभिव्यक्ति को हमेशा उकसावे के रूप में देखा जाता है, जबकि इस्लामी हिंसा को परिस्थिति के अनुसार और जवाबदेही को इच्छानुसार माना जाता है। वो भी बस तब तक जब तक यह पसंदीदा कहानी को चुनौती न दे।

बौद्धिक बेईमानी कोई कमजोरी नहीं, इस्लामी-लेफ्ट इकोसिस्टम की नींव

टीवी की बहस में जो हुआ, वह शब्दों की कमी नहीं थी। बल्कि ईमानदारी की कमी थी। आतंक पर पूछे गए सवाल पर हँसी कोई घमंड नहीं था, बल्कि असलियत का खुलासा था।

आज भारत में लेफ्ट-लिबरल सोच समान सिद्धांतों पर नहीं चलती है। यह छूट और अपवादों पर चलती है। इसका मकसद न्याय नहीं, बल्कि नैरेटिव पर कब्जा करना है और बौद्धिक बेईमानी इस सिस्टम की कोई खामी नहीं, बल्कि उसकी बुनियाद है।

जब नैतिकता शर्तों पर तय होने लगे, तो भरोसा टूट जाता है। जब आतंक को हल्का बताया जाए, तो पत्रकारिता मर जाती है। और जब समर्थकों को बार-बार गुमराह किया जाए, तो एक दिन विश्वास भी खत्म हो जाता है।

यह नकाब किसी गलती से नहीं उतरा है। यह इसीलिए उतरा क्योंकि सच में यह ताकत होती है कि वह खुद को सामने ले आए, चाहे यह इकोसिस्टम उसे पसंद करे या नहीं।

(यह रिपोर्ट मूलरूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

बांग्लादेश में ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ का दौर खत्म: जिसने भारत से निभाई दुश्मनी, इस्लामी कट्टरपंथियों के हवाले किया मुल्क… नहीं रहीं वो खालिदा जिया

बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष बेगम खालिदा जिया का मंगलवार (30 दिसंबर 2025) सुबह निधन हो गया। वे 80 वर्ष की थीं। लंबी बीमारी से जूझ रही खालिदा जिया ढाका के एवरकेयर अस्पताल में भर्ती थीं, जहाँ उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी पार्टी बीएनपी ने सोशल मीडिया पर इस दुखद खबर की पुष्टि की।

खालिदा जिया की मौत से बांग्लादेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत हो गया है। वे दशकों तक देश की सियासत की धुरी रहीं और अपनी कट्टर प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना के साथ उनकी दुश्मनी ने पूरे देश को प्रभावित किया।

अविभाजित भारत में जन्म, परिवार ने चुना पाकिस्तान

खालिदा जिया का जन्म 15 अगस्त 1945 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसिडेंसी के जलपाईगुड़ी जिले में हुआ था, जो आज पश्चिम बंगाल का हिस्सा है। उनका बचपन का नाम खालिदा खानम ‘पुतुल’ था। उनका परिवार एक साधारण व्यापारी परिवार से था। 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनका परिवार पूर्वी बंगाल (आज का बांग्लादेश) के दिनाजपुर जिले में आकर बस गया। खालिदा जिया ने दिनाजपुर की मिशनरी स्कूल और गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई की। वे खुद को ‘सेल्फ-एजुकेटेड’ बताती थीं और हाई स्कूल की डिग्री के कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं हैं।

15 साल की उम्र में फौजी अफसर से निकाह, आगे चल कर बनी फर्स्ट लेडी

साल 1960 में मात्र 15 साल की उम्र में खालिदा की शादी पाकिस्तानी आर्मी के कैप्टन जियाउर रहमान से हो गई। जियाउर रहमान बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के प्रमुख नायक थे। उन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने। शादी के बाद खालिदा जिया एक साधारण गृहिणी बनकर रह गईं। वे दो बेटों तारेक रहमान और आरफ रहमान की परवरिश में व्यस्त रहीं। उस समय उन्हें एक शर्मीली और घरेलू महिला के रूप में जाना जाता था, जो राजनीति से दूर रहती थीं।

शौहर और राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या के बाद संभाली पार्टी

जियाउर रहमान ने 1978 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की स्थापना की। वे 1977 से राष्ट्रपति थे और देश को सैन्य शासन से लोकतंत्र की ओर ले जा रहे थे। लेकिन 30 मई 1981 को चटगाँव में एक असफल सैन्य तख्तापलट में जियाउर रहमान की हत्या कर दी गई। इस घटना ने खालिदा जिया की जिंदगी बदल दी। शौहर की मौत के बाद बीएनपी संकट में पड़ गई। कई नेता पार्टी छोड़कर चले गए। ऐसे में खालिदा जिया ने 1982 में पार्टी की सदस्यता ली और 1984 में बीएनपी की चेयरपर्सन बन गईं। एक गृहिणी से राजनीतिक नेता बनने की उनकी यात्रा प्रेरणादायक थी।

शेख हसीना के साथ मिलकर खालिदा जिया ने किया तानाशाही का विरोध

1980 के दशक में बांग्लादेश पर जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद का सैन्य शासन था। खालिदा जिया ने इरशाद के खिलाफ लोकतंत्र बहाली की लड़ाई का नेतृत्व किया। वे सात दलों के गठबंधन की प्रमुख बनीं और हड़तालों, प्रदर्शनों के जरिए सैन्य तानाशाही का विरोध किया। इस दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और घर में नजरबंद रखा गया। लेकिन वे डटी रहीं। 1990 में जन आंदोलन के दबाव से इरशाद को सत्ता छोड़नी पड़ी।

लोकतंत्र की बहाली के लिए हुई लंबी लड़ाई में शेख हसीना ने भी मोर्चा थामे रखा। ये वही समय था, जब बांग्लादेश के लिए दोनों बेगमों ने एक पक्ष की तरफ से लड़ाई लड़ी, हालाँकि राजनीतिक वजहों से दोनों हमेशा अलग-अलग खेमों की अगुवाई करती रही।

साल 1991 में बांग्लादेश में पहली बार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हुए। बीएनपी ने भारी जीत हासिल की और खालिदा जिया देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। वे मुस्लिम बहुल देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गईं दूसरी महिला नेता थीं (पहली पाकिस्तान की बेनजीर भुट्टो थीं)। उनके पहले कार्यकाल (1991-1996) में कई महत्वपूर्ण सुधार हुए। उन्होंने संसदीय व्यवस्था बहाल की, विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया, प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त और अनिवार्य बनाया। लड़कियों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया। अर्थव्यवस्था में सुधार आए और बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत हुआ।

साल 1996 में वे चुनाव हार गईं और शेख हसीना की अवामी लीग सत्ता में आई। लेकिन 2001 में बीएनपी की वापसी हुई और खालिदा जिया दूसरी बार प्रधानमंत्री बनीं। इस कार्यकाल में भी कई उपलब्धियाँ रहीं, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप और इस्लामी कट्टरपंथी और आतंकवादियों के उभार ने उनकी सरकार को विवादास्पद बना दिया।

साल 2006 में सैन्य समर्थित अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली और खालिदा जिया पर भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज किए गए। उन्हें जेल भेजा गया और लंबे समय तक नजरबंद रखा गया। वे हमेशा कहती रहीं कि ये मामले राजनीतिक बदले की कार्रवाई हैं। 2025 में बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य भ्रष्टाचार मामले में उन्हें बरी कर दिया।

साल 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद खालिदा जिया को नजरबंदी से रिहा किया गया। वे फिर से सक्रिय राजनीति में लौटने की तैयारी कर रही थीं, लेकिन स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया। अंतिम वर्षों में वे लीवर सिरोसिस, डायबिटीज, गठिया, हृदय और फेफड़ों की बीमारियों से पीड़ित रहीं। 2025 की शुरुआत में लंदन में इलाज के बाद वे वापस ढाका लौटीं, लेकिन हालत बिगड़ती गई और अब उनका निधन हो गया।

शेख हसीना और खालिदा जिया की प्रतिद्वंद्विता: जानें- ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ के बारे में

बांग्लादेश की राजनीति को दशकों तक परिभाषित करने वाली शेख हसीना (अवामी लीग) और खालिदा जिया (बीएनपी) की दुश्मनी को दुनिया ‘बैटल ऑफ द बेगम्स‘ कहती है। यह प्रतिद्वंद्विता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और वैचारिक भी थी, जो बांग्लादेश को बार-बार अस्थिरता में धकेलती रही। दोनों महिलाओं ने मिलकर 1991 से 2024 तक बांग्लादेश पर बारी-बारी से शासन किया, लेकिन उनकी लड़ाई ने हड़तालें, हिंसा और राजनीतिक संकट पैदा किए।

प्रतिद्वंद्विता की जड़ें 1970 के दशक में हैं। शेख हसीना बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं, जिनकी 1975 में हत्या हुई। खालिदा जिया राष्ट्रपति जियाउर रहमान की बीवी थीं, जिनकी 1981 में हत्या हो गई। दोनों एक-दूसरे पर अप्रत्यक्ष रूप से हत्या की साजिश का आरोप लगाती रहीं। हसीना कहती थीं कि जियाउर रहमान मुजीब हत्याकांड से जुड़े थे, जबकि खालिदा अवामी लीग को अपने शौहर की हत्या का जिम्मेदार ठहराती थीं।

लोकतंत्र की बहाली के लिए 1980 के दशक में दोनों महिलाएँ एक साथ दिखीं। उस समय जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद का सैन्य शासन था। खालिदा जिया ने 1984 में बीएनपी की कमान संभाली, जबकि शेख हसीना 1981 में अवामी लीग की नेता बनीं। दोनों ने इरशाद के खिलाफ लोकतंत्र बहाली का आंदोलन चलाया। 1990 में हड़तालों और प्रदर्शनों से इरशाद को सत्ता छोड़नी पड़ी। यह दोनों का एकमात्र साथ था। उसके बाद दुश्मनी शुरू हो गई।

खालिदा जिया ने जीतकर पहली महिला प्रधानमंत्री बनकर हसीना को हराया। इसके बाद दोनों बारी-बारी सत्ता में आईं, जिसमें खालिदा जिया (1991-96 और 2001-06), शेख हसीना (1996-2001 और 2009-2024) तक सत्ता में रहीं।

खालिदा जिया और शेख हसीना में खूनी संघर्ष

साल 1991 में पहला निष्पक्ष चुनाव हुआ। खालिदा जिया की बीएनपी ने जीत हासिल की और वे देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामी दलों का समर्थन मिला। हसीना विपक्ष में रहीं। 1996 में हसीना की अवामी लीग सत्ता में आई। खालिदा ने धांधली का आरोप लगाया। फिर 2001 में खालिदा की बड़ी जीत हुई। इस दौरान दोनों पार्टियाँ एक-दूसरे पर हिंसा और भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रहीं।

2004 में हसीना पर ग्रेनेड हमला हुआ, जिसमें कई लोग मारे गए। हसीना ने इसके लिए खालिदा की सरकार को जिम्मेदार ठहराया। खालिदा के बेटे तारेक रहमान पर भी आरोप लगे।

दोनों के बीच वैचारिक मतभेद भी गहरे थे। हसीना सेक्युलरिज्म और भारत के साथ अच्छे रिश्तों की पक्षधर रहीं, जबकि खालिदा इस्लामिक पहचान और बांग्लादेशी राष्ट्रवाद पर जोर देती थीं। उनकी लड़ाई केरटेकर गवर्नमेंट सिस्टम, भ्रष्टाचार आरोप और चुनावी धाँधली के मुद्दों पर केंद्रित रही। 2007 में सैन्य हस्तक्षेप और 2018 में खालिदा को भ्रष्टाचार केस में जेल भी इसी दुश्मनी का नतीजा थी।

साल 2024 में इस्लामी कट्टरपंथियों के समर्थन से हुए कथित छात्र आंदोलन की वजह से शेख हसीना सत्ता से बाहर हो गईं और वो भारत आ गई, जबकि खालिदा जिया अपनी रिहाई के बाद और सक्रिय हो गई। हालाँकि वो बीमार रहीं।

बहरहाल, शेख हसीना और खालिदा जिया की यह प्रतिद्वंदिता बांग्लादेश की राजनीति को दो हिस्सों में बाँटती रही। हड़तालें, ब्लॉकेड और हिंसा आम हो गई। अब खालिदा जिया के जाने से यह दुश्मनी खत्म लगती है। हसीना निर्वासन में हैं, जबकि बीएनपी के तारेक रहमान आगे आ रहे हैं। बांग्लादेश की राजनीति नया मोड़ ले रही है, ऐसे में ‘बैटलिंग बेगम्स’ का अध्याय इतिहास बन गया।

भारत से क्यों नफरत करती थी खालिदा जिया, जड़ में था इस्लाम

खालिदा जिया की भारत विरोधी छवि बांग्लादेश की राजनीति में गहराई से जुड़ी हुई है। कई विश्लेषक उन्हें ‘एंटी-इंडिया’ नेता मानते हैं। लेकिन इसकी जड़ें उनके शौहर जियाउर रहमान की विदेश नीति में हैं। जियाउर रहमान ने बांग्लादेश की विदेश नीति को ‘भारत और पाकिस्तान से समान दूरी’ की नीति पर आधारित किया था।

1971 के मुक्ति युद्ध में भारत ने बांग्लादेश की आजादी में बड़ी भूमिका निभाई थी। शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग भारत की करीबी थी। लेकिन 1975 में मुजीब की हत्या के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ। जियाउर रहमान ने सत्ता संभाली और नीति बदली। वे नहीं चाहते थे कि बांग्लादेश भारत का ‘जूनियर पार्टनर’ बन जाए। उन्होंने भारत की 1971 की मदद को स्वीकार किया, लेकिन देश की संप्रभुता को प्राथमिकता दी। जियाउर रहमान ने पाकिस्तान से संबंध सुधारने शुरू किए, हालाँकि पाकिस्तान ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था। उन्होंने चीन, सऊदी अरब, अमेरिका और इस्लामी देशों से नजदीकियाँ बढ़ाईं।

इस ‘समदूरी’ नीति का मतलब था- भारत से अच्छे संबंध, लेकिन अत्यधिक निर्भरता नहीं। जियाउर रहमान ने दक्षेस (SAARC) की स्थापना की कल्पना की, ताकि दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग हो और भारत का वर्चस्व कम हो। वे भारत के साथ गंगा जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाते थे। 1977 में जब भारत ने एकतरफा गंगा का पानी रोक लिया, तो जियाउर रहमान ने संयुक्त राष्ट्र और नॉन-अलाइंड मूवमेंट में मामला उठाया, जिससे अंतरराष्ट्रीय दबाव बना और समझौता हुआ।

खालिदा जिया ने अपने शौहर की इसी नीति को आगे बढ़ाया। बीएनपी की विचारधारा में भारत विरोध एक आधारभूत हिस्सा बन गया। विपक्ष में रहते हुए खालिदा जिया ने भारत विरोधी बयानबाजी की। वे अवामी लीग की भारत समर्थक नीतियों की आलोचना करती थीं। उनके शासन में उत्तर-पूर्वी भारत के उग्रवादी समूहों को बांग्लादेश में पनाह मिलने के आरोप लगे। 2001-2006 के कार्यकाल में पाकिस्तान से नजदीकियाँ बढ़ीं और जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामी दलों से गठबंधन किया।

कई घटनाएँ उनकी भारत विरोधी छवि को मजबूत करती हैं। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में विरोध हुआ, लेकिन बीएनपी ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया। 2013 में भारतीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के ढाका दौरे पर खालिदा जिया ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया, जो एक बड़ा कूटनीतिक संकेत था। उनके दौर में सीमा विवाद, पानी बँटवारा और प्रवासियों के मुद्दे पर तनाव रहा।

जानिए- कौन है तारिक रहमान, जो संभालेगा खालिदा जिया की विरासत

हालाँकि, कुछ मौकों पर वे भारत से संवाद करने को तैयार दिखीं। 2012 में उन्होंने भारत का दौरा किया और मनमोहन सिंह से मिलकर उग्रवाद के खिलाफ सहयोग की बात की। लेकिन कुल मिलाकर, बीएनपी की राष्ट्रवादी नीति में भारत को ‘बड़ा पड़ोसी’ के रूप में सतर्कता से देखा जाता था। विश्लेषकों के अनुसार, यह नफरत नहीं, बल्कि मौके की पॉलिटिक्स थी। अवामी लीग भारत को करीबी मानती है, जबकि बीएनपी पाकिस्तान और चीन की ओर झुकाव रखती है।

‘ब्रीफकेस में अखिलेश यादव को भेजा गया मेरे भाई का सिर’: ऑपइंडिया से बोले नीरज मिश्रा के भाई, 2004 में सपाइयों से विवाद के बाद BJP बूथ एजेंट का मिला था शव

ब्राह्मण हितैषी होने की छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का असली चरित्र समय-समय पर सामने आता रहा है। इस कथित ब्राह्मण प्रेम का इतिहास खूनी रहा है। कन्नौज के नीरज मिश्रा का नाम शायद बहुत से लोग नहीं जानते हों लेकिन नीरज वो शख्स थे जिन्होंने कभी अखिलेश यादव से टक्कर ली और 24 घंटों के भीतर उनकी सिर कटी लाश मिली थी। नीरज के भाई मुनीष मिश्रा ने ऑपइंडिया से बातचीत में अपने भाई की हत्या का सीधा आरोप अखिलेश यादव पर लगाया है।

आज तक नहीं मिला नीरज का कटा हुआ सिर

मामले की शुरुआत 5 मई 2004 से होती है, जब उत्तर प्रदेश के कन्नौज लोकसभा क्षेत्र में आम चुनाव के लिए मतदान हो रहा था। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी की ओर से उम्मीदवार थे तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव जबकि उनके मुकाबले में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार रामानंद यादव मैदान में थे। ऑस्ट्रेलिया से पढ़ाई कर लौटे अखिलेश यादव के लिए यह पहला लोकसभा चुनाव था।

मतदान के दौरान कन्नौज के छिबरामऊ क्षेत्र के कसावां गाँव में स्थित बाबा हरिपुरी इंटर कॉलेज के बूथ पर स्थिति अचानक तनावपूर्ण हो गई। बूथ लूटने को लेकर भाजपा और सपा कार्यकर्ताओं के बीच तीखी बहस शुरू हुई जो जल्द ही हिंसा में बदल गई। इसी दौरान भाजपा के बूथ प्रमुख नीरज मिश्रा अचानक लापता हो गए।

अगले दिन यानी 6 मई 2004 को नीरज मिश्रा का धड़ ईशन नदी से बरामद किया गया जबकि उनका सिर कभी नहीं मिल सका। नीरज मिश्रा कसावां गाँव के ही निवासी थे और मतदान के दिन उसी बूथ पर तैनात थे, जहाँ विवाद हुआ था। इस हत्याकांड में आरोपियों के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई चली। बाद में अदालत ने दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई लेकिन समय के साथ सभी आरोपी जमानत पर रिहा हो गए।

नीरज मिश्रा के परिजनों का आरोप था कि तत्कालीन सांसद से जुड़े लोग बूथ पर कब्जा करने के इरादे से वहाँ पहुँचे थे। जब नीरज मिश्रा ने पोलिंग बूथ पर कब्जा करने का विरोध किया, तो दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई। आरोप है कि इसी दौरान नीरज ने एक नेता को धक्का दे दिया जिसके बाद उनके साथ मौजूद लोगों ने नीरज मिश्रा को जबरन उठा लिया। अगले दिन उनकी बिना सिर की लाश मिली।

अखिलेश यादव ने कराई मनीष की हत्या: ऑपइंडिया से बोले मुनीष मिश्रा

मुनीष मिश्रा ने अपनी भाई की भयावह हत्या को लेकर ऑपइंडिया के अर्पित त्रिपाठी से बातचीत की है। मुनीष ने बातचीत में ही कहा, “अखिलेश ने भाई का सर कटवा दिया था।” मुनीष बताते हैं “कसावा गाँव में बूथ था और नीरज मिश्रा भाजपा के बूथ एजेंट थे। पहले वहाँ आसपास के यादव गाँवों के लोग भी वोट डालने आते थे लेकिन अब वो बूथ हटा दिया गया है।”

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर मुनीष मिश्रा ने विस्तार से बताया, “अखिलेश जी ने बटेला, जाफराबाद आसपास की पोलिंग लूटते हुए कसावा में 25-30 गाड़ियों के काफिले से साथ एंट्री ली। एक पीठासीन अधिकारी से बदतमीजी की गई जिस पर उन्होंने रिएक्ट कर दिया। (अखिलेश यादव ने) रुतबे में एक आदमी को हाथ मार दिया। मेरे भाई ने उसका विरोध किया और उनकी अखिलेश यादव से धक्का मुक्की हो गई।”

‘जिंदा या मुर्दा- नीरज मिश्रा मुझे चाहिए’

मुनीष ने आगे कहा, “धक्का-मुक्की ज्यादा हुई तो युवराज को ये नागवार गुजरा कि किसी ने मेरे हाथ क्यों लगा दिया। पुलिस बल, सीईओ, उमाशंकर यादव इंस्पेक्टर इनके साथ चल रहा था। यह इतना बौखला गया कि अखिलेश यादव ने वहीं से अपने पिताजी को फोन किया और चिल्ला कर कहा कि नीरज मिश्रा मुझे जिंदा या मुर्दा चाहिए।”

भाई की हत्या को लेकर मुनीष बताते हैं, “शाम को जैसे ही पोलिंग खत्म हुई तो इन्होंने (सपा कार्यकर्ताओं) तांडव शुरू किया। हमारा खेती-बाड़ी देखने वाले एक बसपा कार्यकर्ता के घर तोड़-फोड़ कर दी। उसकी माताजी मौके पर थी, महिलाओं के सामने अभद्रता की। इन कार्यकर्ताओं ने उनकी योनि में पंखे की डंडी डाल दी।” उन्होंने कहा, “इसके बाद फायरिंग में एक सपा कार्यकर्ता मारा गया। जिसमें नीरज का कहीं कोई इन्वॉल्वमेंट नहीं था।”

सपा कार्यकर्ताओं ने नीरज की बेरहमी से क्रूरतम हत्या कर दी: मुनीष

मुनीष ने आगे कहा, “इसके बाद फिर इन्होंने हमारे घर पर चढ़ाई की। नीरज ट्यूबवेल की तरफ निकल गया। वो अकेला था, निहत्था था और सिपाही ने उसकी घेराबंदी कर दी। नीरज मिश्रा को पुलिसवालों ने पकड़ा और बाद में सपा के कार्यकर्ताओं को दे दिया। फिर वो अपने गाँव की तरफ मारते-पीटते, बाद में घसीटते हुए ले गए। और बेरहमी से सपा के कार्यकर्ताओं ने क्रूरतम, निर्मम तरीके से उसकी मारते-मारते हत्या कर दी।”

मुनीष ने अपनी बातचीत में हत्या करने वालों में मुख्य तौर पर अशोक यादव, अवनीश यादव, राम शरण उर्फ मुन्नू सिंह, पप्पू सिंह, सुनील यादव और राम विलास यादव का नाम लिया। उन्होंने कहा, “ये अखिलेश के बिल्कुल राइट आर्म थे। अखिलेश से फोन से बात हो रही थी। आसपास लोगों की हिम्मत नहीं पड़ी किसी की भी उनसे बोलने की। क्योंकि पूरे जनपद की फोर्स चल रही थी। मारने के बाद सीओ ने इंस्पेक्टर से कहा कि इसको अब तुम लाश गायब कर दो और फिर हम देख लेंगे।”

मुनीष ने आगे कहा, “इन लोगों ने उसका सिर काट दिया और अखिलेश को खुश करने के लिए सिर को अपने पास रख लिया। सिर कटे शव को नदी में डाल दिया। जब शव मिला तो सपा के कार्यकर्ता लाश छीनने के लिए आगे बढ़े क्योंकि ये लाश गायब करना चाहते थे ताकि केस खत्म हो जाए। सिर आज तक नहीं मिला वो ब्रीफकेस में रख के अखिलेश यादव के पास लखनऊ भेजा गया था। 10 साल तक केस लड़ते रहे और 2014 में अशोक, अवनीश और मुन्नू, पप्पू-विलास को आजीवन कारावास हुआ।”

कोर्ट केस लड़ते वक्त भी मुनीष को धमकियाँ मिलती रहीं, उन्हें झूठे मुकदमे तक में फँसाया गया। मुनीष ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालने के बाद उन्हें बुलाया और सुरक्षा के लिए उन्होंने गनर दिया है।

‘किसी ने नहीं सुना क्योंकि हमारा सच असुविधाजनक था’: क्या है उन्नाव रेप केस जिसमें कुलदीप सेंगर की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, क्यों एक बेटी ने लिखा- थकी हूँ, डरी हूँ

सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के उन्नाव रेप केस में उत्तर प्रदेश के पूर्व MLA कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत देने के दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी। 29 दिसंबर 2025 को सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील पर सुनवाई करते हुए यह रोक लगाई।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि इस मामले में कई सवाल उठ रहे हैं। कोर्ट ने देखा कि प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ़्रॉम सेक्सुअल ऑफ़ेंस (POCSO) एक्ट के सेक्शन 5 के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ शब्द का दिल्ली हाई कोर्ट का मतलब गलत हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मतलब से लेजिस्लेटर गंभीर सेक्सुअल असॉल्ट के नियमों के तहत जिम्मेदारी से बच सकते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट के बेल ऑर्डर पर रोक लगाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर को नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि उसे जेल से रिहा न किया जाए। बेंच ने कहा, “हमें पता है कि जब किसी दोषी को रिहा किया जाता है, तो ऐसे ऑर्डर पर आमतौर पर रोक नहीं लगाई जाती है। लेकिन खास बातों के मद्देनजर हम 23 दिसंबर के हाई कोर्ट के ऑर्डर पर रोक लगाते हैं।” खास बात यह है कि सेंगर को बेल तो मिल गई, लेकिन दूसरे मामलों में शामिल होने की वजह से वह जेल में ही रहा।

CBI की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती की कि POCSO एक्ट के सेक्शन 5(c) के तहत अपराध नहीं बनता, क्योंकि सेंगर पब्लिक सर्वेंट नहीं था। उन्होंने बताया कि सेंगर MLA के तौर पर पब्लिक ट्रस्ट की पोजीशन पर था और उसे पीड़िता के पिता की मौत के लिए पहले ही दोषी ठहराया जा चुका था। SG मेहता ने POCSO एक्ट के सेक्शन 42A का भी जिक्र किया।

सेंगर की तरफ से सीनियर वकील सिद्धार्थ दवे और एन हरिहरन ने हाई कोर्ट के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि सजा सिर्फ इसलिए दी गई क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने उन्हें पब्लिक सर्वेंट के तौर पर वर्गीकृत किया था। और ऐसा वर्णीकरण कानूनी तौर पर शक के दायरे में आता है।

सेंगर के परिवार ने कोर्ट के आदेश पर निराशा जताई

मीडिया से बात करते हुए, सेंगर की बेटी ऐश्वर्या सेंगर ने कहा कि वे “केस के मेरिट पर बहस भी शुरू नहीं कर सकते”। उन्होंने बताया कि केस में विक्टिम ने कई बार अपना बयान बदला था और तीन मौकों पर कहे गए क्राइम का समय बदला था।

उन्होंने कहा, “आज हम केस के मेरिट पर बहस भी शुरू नहीं कर पाए, कि उसने कई बार अपना बयान बदला है, तीन बार टाइम बदला है, दोपहर 2 बजे से शुरू करके, शाम 6 बजे और फिर आखिर में रात 8 बजे। AIIMS मेडिकल बोर्ड ने कहा है कि वह 18 साल से ज्यादा की थी… मैं पिछले 8 सालों से इंसाफ़ के लिए लड़ रही हूँ, लेकिन शायद मेरे और मेरे परिवार के दुखों का कोई मतलब नहीं है। हमसे हमारी इज्जत, हमारी शांति और यहाँ तक कि सुने जाने का हमारा बुनियादी हक भी छीन लिया गया है। अभी भी इंसाफ की उम्मीद है। मैं मीडिया से आग्रह करती हूँ कि कोई गलत जानकारी न फैलाए।”

सेंगर की दूसरी बेटी, इशिता ने भी एक पब्लिक स्टेटमेंट जारी करके पिछले आठ सालों में केस पर कोर्ट और पब्लिक के रिस्पॉन्स से अपनी परेशानी और निराशा जाहिर की। उन्होंने कहा कि उनका परिवार चुप रहा, इंस्टीट्यूशन और सही प्रोसेस पर भरोसा किया, लेकिन उसे लगातार धमकियाँ मिली। सोशल मीडिया पर मौत और रेप तक की धमकियाँ दी गई।

उन्होंने अपने परिवार पर पड़े आर्थिक, सामाजिक और इमोशनल असर के बारे में बताया। उसके मुताबिक पब्लिक प्रेशर में सबूतों और कानूनी प्रक्रिया को दबा दिया गया। उन्होंने अधिकारियों से बगैर किसी दबाव के कानून के मुताबिक काम करने की अपील करते हुए अपनी बात खत्म की। साथ ही कोर्ट पर अपना भरोसा जताया।

हाई कोर्ट ने गंभीर अपराध न होने का हवाला देते हुए जमानत दी

इससे पहले 23 दिसंबर 2025 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद की सजा सस्पेंड कर दी थी और अपील पेंडिंग रहने तक उन्हें सशर्त जमानत दे दी थी। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि सेंगर POCSO एक्ट के सेक्शन 5(c) के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ की परिभाषा में नहीं आते, जो पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट के अपराध को बढ़ाता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि POCSO एक्ट के सेक्शन 2(2) के अनुसार, डेफिनिशन इंडियन पीनल कोड (IPC), CrPC, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट या IT एक्ट से ली जानी चाहिए और IPC के सेक्शन 21 के तहत, एक MLA को पब्लिक सर्वेंट नहीं माना जाता है।

इस आधार पर कोर्ट ने माना कि सेक्शन 5 के तहत गंभीर अपराध लागू नहीं होता है। इसके अलावा, कुलदीप सिंह सेंगर पहले ही 7 साल और 5 महीने से ज़्यादा कस्टडी में बिता चुका है, जो सेक्शन 4 POCSO के तहत बेस अपराध के लिए कम से कम 7 साल की सज़ा से ज़्यादा है, इसलिए अपील पेंडिंग रहने तक बेल दिया जा सकता है।

गौरतलब है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने उसे बेल तो दे दी, लेकिन किसी भी अपराध से बरी नहीं किया। उसे केस की टेक्निकैलिटी के आधार पर बेल दी गई थी, मेरिट के आधार पर नहीं।

सोशल मीडिया पर आरोप और गड़बड़ियों के दावे

कई सोशल मीडिया यूजर्स और कमेंट करने वालों ने उन्नाव रेप केस में कथित गड़बड़ियों को लेकर चिंता जताई है, और दावा किया है कि कुलदीप सिंह सेंगर को शायद गलत तरीके से फँसाया गया है। इन दावों में कोर्ट के रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्ट्स से लिए गए कई पॉइंट्स का हवाला दिया गया है।

एक बात जो उठाई गई है, वह है घटना के कथित समय में अंतर। कोर्ट के डॉक्यूमेंट्स में बताई गई समरी के अनुसार, पीड़िता ने घटना के तीन अलग-अलग समय बताए हैं, 17 अगस्त 2017 को मुख्यमंत्री को लिखे लेटर में दोपहर 2:00 बजे, 12 सितंबर 2017 को मीडिया इंटरव्यू में शाम 6:00 बजे, और प्रॉसिक्यूशन की थ्योरी में रात 8:00 बजे से 8:30 बजे के बीच।

एक और मुद्दा पीड़िता की उम्र को लेकर है। स्कूल एडमिशन रजिस्टर और मेडिकल राय सहित अलग-अलग सोर्स से जमा किए गए डॉक्यूमेंट्स में उसकी जन्मतिथि 17 अगस्त 2001, 5 जुलाई 1998 और अगस्त 2002 दर्ज है। RML हॉस्पिटल, CMO उन्नाव और AIIMS के मेडिकल असेसमेंट से पता चलता है कि कथित अपराध के समय उसकी उम्र 18 साल से ज़्यादा थी, जबकि स्कूल रिकॉर्ड और कोर्ट की गवाही से पता चलता है कि वह नाबालिग थी।

यूज़र्स ने सर्वाइवर की रिपोर्टिंग की टाइमलाइन के आधार पर आरोपों की क्रेडिबिलिटी पर भी सवाल उठाए हैं। यह देखा गया है कि उसने कथित घटना की तुरंत रिपोर्ट नहीं की और बाद में अपनी कंप्लेंट में नए नाम जोड़े, जिनमें से कुछ को बाद में यह कहकर हटा दिया गया कि उसे वकीलों ने ‘गुमराह’ किया था।

एक अलग वायरल दावे से पता चलता है कि एक महिला आरोपी का नाम बाद में बयान में डाला गया था, जिसमें कैरेट मार्क का इस्तेमाल करके ‘बराबर’ शब्द शामिल किया गया था। इसका मतलब है कि मुख्य आरोपी से मेल खाने के लिए उसकी भूमिका को बदला गया था। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह की एडिटिंग से आरोप तय करने के तरीके पर सवाल उठते हैं।

जमानत आदेश के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

23 दिसंबर 2025 को कुलदीप सेंगर को जमानत देने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बाद नई दिल्ली में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। उन्नाव पीड़िता की माँ और ऑल-इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन (AIDWA) के सदस्यों सहित लगभग 30 कार्यकर्ताओं ने हाई कोर्ट के बाहर 26 दिसंबर को प्रदर्शन किया। उनके हाथों में तख्तियां थीं और वे ‘बलात्कारियों को बचाना बंद करो’ जैसे नारे लगा रहे थे।

इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस (IYC) ने जमानत आदेश की निंदा करते हुए एक कैंडललाइट मार्च निकाला। 27 दिसंबर को एक्टिविस्ट योगिता भयाना और कांग्रेस लीडर मुमताज पटेल ने पार्लियामेंट के पास एक धरना दिया। उन्हें पुलिस हिरासत में भी लिया गया। अधिकारियों ने उस इलाके को नॉन-परमिटेड प्रोटेस्ट जोन घोषित कर दिया है।

सेंटर फॉर स्ट्रगलिंग वीमेन, प्रगतिशील महिला संगठन, और ऑल इंडिया महिला सांस्कृतिक संगठन समेत कई महिला अधिकार संगठनों ने 28 दिसंबर को स्टूडेंट ग्रुप्स के साथ जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया। उन्नाव पीड़िता और उसकी माँ भी इसमें शामिल हुईं।

उन्नाव केस टाइम लाइन

2017 – शुरुआती आरोप और FIR

4 जून 2017 को, माखी गाँव की एक 17 साल की लड़की ने दावा किया कि सेंगर ने नौकरी दिलाने के बहाने उसे अपने घर पर बुलाकर उसके साथ रेप किया। उसने दावा किया कि सेंगर ने उसे मुंह न खोलने की धमकी दी। 11 से 20 जून 2017 के बीच, कथित तौर पर पीड़िता को अगवा कर लिया गया और स्थानीय लोगों ने उसके साथ गैंगरेप किया। 20 जून को IPC की धारा 363, 366 और 376 के तहत आरोपितों पर FIR दर्ज की गई। FIR में सेंगर का नाम नहीं था।

अगस्त 2017 में पीड़िता ने सेंगर के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की कोशिश की। पुलिस ने कथित तौर पर उसका नाम शामिल करने से इनकार कर दिया। फरवरी 2018 में उसने सेंगर का नाम आरोपित के तौर पर शामिल करने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

2018 – कस्टोडियल डेथ और CBI जांच

3 अप्रैल 2018 को, पीड़िता के पिता को सेंगर के भाई अतुल और दूसरों ने पीटा। 5 अप्रैल को, पिता को आर्म्स एक्ट के झूठे आरोपों में जेल भेज दिया गया। जाँच के दौरान पता चला कि पीड़िता के पिता के पास मिली देसी पिस्तौल प्लांट की हुई थी। 8 अप्रैल को पीड़िता ने विरोध में मुख्यमंत्री के घर के बाहर खुद को आग लगाने की कोशिश की।

9 अप्रैल को, उसके पिता की ज्यूडिशियल कस्टडी में मौत हो गई। पोस्टमॉर्टम में चोट के 14 निशान मिले। 10 अप्रैल को, अतुल सेंगर को गिरफ्तार किया गया और इस मामले ने पूरे देश का ध्यान खींचा। 12 अप्रैल को ये मामला CBI को सौंप दिया गया, जिसने कुलदीप सेंगर के खिलाफ FIR दर्ज की।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देरी की आलोचना की और उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया। 13 अप्रैल को सेंगर को CBI ने गिरफ्तार कर लिया। 15 अप्रैल को लड़की को सेंगर के घर ले जाने के आरोप में शशि सिंह को गिरफ्तार किया गया। 18 अप्रैल को, पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज कराया; पीड़िता की उम्र विवाद का मुद्दा बन गई।

2018 – चार्जशीट और ट्रायल

11 जुलाई 2018 को CBI ने सेंगर और शशि सिंह के खिलाफ रेप और किडनैपिंग के लिए चार्जशीट फाइल की। ​​13 जुलाई को पीड़िता के पिता की कस्टोडियल डेथ के मामले में दूसरी चार्जशीट फाइल की गई। इसमें अतुल सेंगर और दूसरों का नाम भी था।

2019 – सुप्रीम कोर्ट का दखल और सजा

28 जुलाई 2019 को पीड़िता और उसके परिजन कार दुर्घटना में बुरी तरह घायल हुए। दो रिश्तेदारों की मौत भी इस दुर्घटना में हो गई। पीड़िता और उसका वकील गंभीर रूप से घायल हो गए। 29 जुलाई को, सेंगर और दूसरों के खिलाफ मर्डर और साज़िश के लिए FIR दर्ज की गई।

31 जुलाई को, सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित केस दिल्ली ट्रांसफर कर दिए और पीड़िता और उसके परिवार के लिए CRPF प्रोटेक्शन का ऑर्डर दिया। 5 अगस्त 2019 को, दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में रेप का ट्रायल शुरू हुआ। 11 सितंबर को, पीड़िता ने AIIMS हॉस्पिटल में एक स्पेशल इन-कैमरा हियरिंग में गवाही दी।

16 दिसंबर 2019 को, सेंगर को IPC और POCSO के तहत नाबालिग से रेप का दोषी ठहराया गया। 20 दिसंबर 2019 को सैंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई गई और 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।

2020 – हिरासत में डेथ का दोषी

4 मार्च 2020 को सेंगर और दूसरों को कस्टोडियल डेथ केस में गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया गया। 13 मार्च 2020 को इस मामले में भी 10 साल जेल की सज़ा सुनाई गई।

2021-2024 – अपील और सुरक्षा

सेंगर इस दौरान जेल में ही रहा। कई जमानत अर्जी खारिज कर दी गईं। पीड़िता अपने परिवार के साथ CRPF प्रोटेक्शन में रहती रही। 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के रिश्तेदारों की सिक्योरिटी कम करने की इजाजत दी, लेकिन निर्देश दिया कि पीड़ित की प्रोटेक्शन जारी रहनी चाहिए।

2025 – हाई कोर्ट बेल और सुप्रीम कोर्ट स्टे

23 दिसंबर 2025 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद की सजा सस्पेंड कर दी और उसे बेल दे दी। कोर्ट ने कहा कि वह POCSO एक्ट के तहत पब्लिक सर्वेंट नहीं है और उसने काफी समय जेल में काटा है। कोर्ट ने तर्क दिया कि गंभीर जुर्म के प्रोविज़न उस पर लागू नहीं होते, और चूंकि वह पहले ही सात साल से ज़्यादा कस्टडी में बिता चुका था, जो एक्ट के सेक्शन 4 के तहत मिनिमम सज़ा से ज़्यादा था, इसलिए अपील पेंडिंग रहने तक बेल सही थी।

29 दिसंबर 2025 को, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के ऑर्डर पर स्टे लगा दिया और जेल से उसकी रिहाई पर रोक लगा दी। बेंच ने POCSO के तहत लेजिस्लेटर को ‘पब्लिक सर्वेंट’ स्टेटस से बाहर रखने के कानूनी असर पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मतलब से लेजिस्लेटर को एग्रेवेटेड असॉल्ट के प्रोविज़न से छूट मिल सकती है और वह मामले की डिटेल में जाँच करने के लिए तैयार हो गया।

उन्नाव केस पर पूरे देश की नजर है। इसमें कानूनी कार्रवाई अभी भी चल रही है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को बेल दे दी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऑर्डर पर रोक लगा दी है और मामले की डिटेल में सुनवाई करेगा। बेल ऑर्डर के बाद कई शहरों में प्रोटेस्ट हुए हैं। इस केस ने कानूनी और प्रोसेस से जुड़े सवाल खड़े किए हैं जो आगे कोर्ट के सामने आएँगे।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

कोडिन कांड का सपा कनेक्शन: सिपाही आलोक के बाद अखिलेश यादव के पूर्व MLA का भी आया नाम, जानें- मास्टरमाइंड शुभम जायसवाल और उसके बाप ने कैसे खड़ा किया रैकेट

उत्तर प्रदेश के कोडिन युक्त कफ सिरप विवाद में बीते दिनों वाराणसी में पुलिस ने नई गिरफ्तारियाँ की हैं। वाराणसी पुलिस ने खुलासा किया कि गिरफ्तार किए गए 5 अभियुक्तों के जरिए 23 करोड़ रुपए का अवैध कारोबार किया गया है।

इस मामले में भी सेल कंपनियों के जरिए इस अवैध कारोबार को अंजाम दिया जा रहा था। ये सभी आरोपित अपने सरगना शुभम जायसवाल के इशारे पर फर्जी कंपनियाँ बनाकर पैसे और सिरप को रूट करते थे। कफ सिरप की तस्करी बांग्लादेश की जाती थी और पैसे को सोने और हवाला के माध्यम से बनारस लाया जाता था।

इसके अलावा मिर्जापुर पुलिस के द्वारा 25,000 रुपए के एक इनामी को गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्त में आए आरोपी का नाम कृष्ण कुमार यादव है। इसकी मेसर्स सिटी मेडिसेल्स के जरिए दिल्ली की फर्मों से 4.5 लाख से ज्यादा 100ML वाला कोडिन युक्त कफ सिरप खरीदा गया। इसके अन्य साथियों को पुलिस पहले ही पकड़ चुकी है। कंपनियों के खातों की जाँच करने पर सामने आया कि इनसे 15 करोड़ रुपए का व्यापार किया जा चुका है।

मुख्यमंत्री का जीरो टॉलरेंस का आदेश

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के पुलिस-प्रशासन को सीधा आदेश दिया हुआ है कि इस कोडिन युक्त कफ सिरप के कारोबार में शामिल किसी भी आरोपित को बख्शा नहीं जाना चाहिए। इसीलिए पुलिस के द्वारा पहले मुख्य आरोपितों पर नकेल कसी गई। अब पुलिस जिला स्तर पर ऑपरेट करने वाले गुनहगारों को भी पकड़ रही है। तेजी के साथ इस पूरे नेटवर्क पर नकेल कसी जा रही है।

कफ सिरप मामले का सपा कनेक्शन

इस मामले की जाँच करते हुए पुलिस के सामने समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक का जिक्र भी बार बार उठ रहा है। News18 की रिपोर्ट के अनुसार, STF अभी तक उस विधायक का नाम नहीं बता रही है लेकिन बताया जा रहा है कि वो पूर्व विधायक पूर्वांचल में समाजवादी पार्टी का बड़ा चेहरा है। सूत्रों के अनुसार, ED अभी उस विधायक के बैंक खातों और संपर्कों की जाँच कर रही है।

आपको याद होगा कि विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान जब समाजवादी पार्टी के नेताओं की तरफ से सदन में हंगामा किया गया तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरफ से कफ सिरप कांड के एक मुख्य आरोपित आलोक सिंह (पूर्व सिपाही) का जिक्र किया गया था। मुख्यमंत्री ने कहा था कि आलोक सिपाही है, पक्का सपाई। सपा मुखिया अखिलेश यादव के साथ आलोक सिंह की एक तस्वीर सामने आने के बाद प्रदेश में मामला पहले से ही गरम था।

इसके बाद जब आलोक सिंह के पूर्व अपराधों की फाइल खुली तो 2006 में हुए 3 किलो सोने के लूटकांड का मामला भी उछल गया। 2006 में राज्य में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी और आलोक सिंह की तैनाती लखनऊ क्राइम ब्रांच में थी। 19 सितंबर 2006 को प्रयागराज के एक व्यापारी ने उत्तर प्रदेश पुलिस के कई कर्मचारियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने उसका 3 किलो सोना लूट लिया है। इसके बाद 2019 में लखनऊ में माफिया मुख्तार अंसारी के एक करीबी पर गोली चली तो आलोक सिंह का नाम भी सामने आया। इस मामले में तत्कालीन SSP कला निधि नैथानी ने आलोक सिंह को बर्खास्त कर दिया था।

अब STF की जाँच में एक और समाजवादी पार्टी के नेता का नाम उठने के बाद फिर से बहस शुरू हो गई है कि आखिर इस हजारों करोड़ के अवैध कारोबार के पीछे का असली मास्टरमाइंड कौन है? फिलहाल जाँच में सीधे तौर पर जो नाम सामने आ रहा है वो है शुभम जायसवाल का।

कौन है कोडिन युक्त सिरप मामले का मास्टरमाइंड शुभम जायसवाल?

शुभम जायसवाल वाराणसी का रहने वाला है और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट करने के बाद अपने परिवार के कथित फार्मास्यूटिकल बिजनेस में उतरा था। ज्यादा पैसे कमाने के लालच में कोडिन युक्त कफ सिरप का नेटवर्क बनाया। 2018 के आसपास उसने पिता भोला प्रसाद के साथ दवा कारोबार को तेजी से फैलाया और 2022–23 में रांची की मेसर्स शैली ट्रेडर्स व वाराणसी की न्यू वृद्धि फार्मा जैसी 93 फर्मों के जरिए भारी मात्रा में कफ सिरप खरीदना शुरू किया। इसे कागजों पर उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में दिखाकर असल में बांग्लादेश, नेपाल व पूर्वी भारत के इलाकों में सप्लाई करने के आरोप हैं।

जाँच एजेंसियाँ के मुताबिक, शुभम ने फर्जी ड्रग लाइसेंस, शेल कंपनियाँ और फर्जी ई‑बिल बनवाकर करीब 100 करोड़ रुपए से ज्यादा कीमत की लाखों बोतलें रूट कराईं जिनसे कमाया गया पैसा हवाला और सोने के जरिए वापस बनारस लाया जाता था। इस मामले में शुभम के पिता भोला जायसवाल को भी STF के द्वारा गिरफ्तार किया गया है।

भोला जायसवाल खुद को सिर्फ साइनिंग अथॉरिटी बताकर सारी जिम्मेदारी बेटे और चार्टर्ड अकाउंटेंट पर डाल रहा है। इस पूरे मामले में शुभम पर कई जिलों में NDPS और आर्थिक धाराओं में केस दर्ज हैं, वह अभी फरार है और पुलिस, STF व ED उसे इस अवैध धंधे का मास्टरमाइंड बता रही हैं।

कौन है भोला प्रसाद जिसने 7000 की नौकरी की आड़ में बनाया हजारों करोड़ का कारोबार?

कोडिन कफ सिरप तस्करी के इस बड़े रैकेट में शुभम जायसवाल के पिता भोला प्रसाद ने फर्जी बिल और ड्रग लाइसेंसों के जरिए शेल कंपनियाँ बनाने का जाल बिछाकर मुख्य भूमिका निभाई है। भोला ने झारखंड में शैली ट्रेडर्स का गोदाम 3 लाख रुपए मासिक किराए पर लिया। इसके साथ-साथ ड्रग विभाग से लाइसेंस प्राप्त करने के लिए एक मेडिकल फर्म में मात्र 7000 रुपए प्रति माह की नौकरी का अपना एक नकली अनुभव प्रमाण-पत्र भी हासिल कर लिया।

इसी शैली ट्रेडर्स के जरिए अमित टाटा, आलोक सिंह सिपाही और अन्य आरोपितों ने फर्जी फर्में खड़ी कर उत्तर प्रदेश की 100 से ज्यादा फार्मों के माध्यम से कफ सिरप की फर्जी बिक्री दिखाकर तस्करी के अवैध कारोबार को चलता रहा। फिलहाल झारखंड में भोला प्रसाद के नाम पर दो FIR दर्ज हैं जिनमें फर्जी दस्तावेजों से गोदाम शुरू करने का खुलासा हुआ है।

दरअसल, भोला प्रसाद ने उस गोदाम को किराए पर हासिल कर लिया था जिसे रांची इंडस्ट्रियल अथॉरिटी ने भिलाई केमिकल्स के जगन्नाथ साहू को लीज पर दिया था। उसे अवैध रूप से किराए पर हासिल करके सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग किया। राँची के दुर्गा हटिया थाने में ड्रग इंस्पेक्टर ने NDPS के तहत शुभम-भोला के खिलाफ FIR दर्ज कराई, जिसमें अमित सिंह, टाटा आलोक प्रताप सिंह की फर्मों समेत आठ अन्य फार्मों का जिक्र है। सोनभद्र SIT जांच में सामने आया कि शैली ट्रेडर्स के ज़रिए सिलीगुड़ी-दार्जिलिंग तक कोडिन सिरप की तस्करी हुई।

हालाँकि, मामला खुलने के बाद भोला प्रसाद खुद को केवल साइनिंग अथॉरिटी बताकर बचाना चाह रहा है। विदेश में छुपकर बैठे अपने बेटे शुभम जायसवाल के ऊपर सारे आरोपों को डाल देना चाह रहा है। लेकिन पुलिस की मंशा है कि सिरप को नशे का मध्यम बना देने वाले अपराधियों के पूरे नेक्सस को ही खत्म कर दिया जाए। ED की तरफ़ से फ़िलहाल जायसवाल परिवार की 30 करोड़ की संपत्ति को कुर्क करने की तैयारी की जा रही है।

शाहदरा में मुस्लिम शोहदों ने किया नाबालिग हिंदू लड़कियों से छेड़छाड़, विरोध करने पर बहनों-भाइयों को दौड़ा कर पीटा: जमकर किया पथराव, पढ़ें- FIR की अहम बातें

दिल्ली के शाहदरा जिले के फर्श बाजार इलाके में 27 दिसंबर 2025 की शाम एक दर्दनाक घटना हुई। बिहारी कॉलोनी के पास दो नाबालिग बहनें (एक 16 साल की और दूसरी 14 साल की) घर जा रही थीं। तभी एक 17 साल का नाबालिग मुस्लिम लड़का जुबैर (परिवर्तित नाम) उनके पास आया और अभद्र टिप्पणी करने लगा। लड़कियों ने इसका विरोध किया तो वह आक्रामक हो गया और उनके साथ धक्का-मुक्की शुरू कर दी। FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसमें सभी घटनाक्रम विस्तार से दर्ज हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शोर सुनकर लड़कियों के दो चचेरे भाई (दोनों नाबालिग) मौके पर पहुँचे और बीच-बचाव करने की कोशिश की। लेकिन आरोपित ने फोन करके अपने दोस्तों को बुला लिया। देखते ही देखते आधा दर्जन लड़के वहाँ जमा हो गए। उन्होंने लाठी-डंडों और पत्थरों से बहनों के भाइयों पर हमला कर दिया। मारपीट इतनी जबरदस्त थी कि दोनों भाई घायल हो गए। हमलावरों ने गली में खड़ी एक स्कूटी और बाइक को भी तोड़ डाला। जब एक भाई जान बचाने के लिए पड़ोसी के घर में घुसा, तो बदमाशों ने उस घर पर भी पत्थरबाजी की।

स्थानीय लोग बताते हैं कि हमलावरों ने हत्या की धमकी भी दी और डंडे लहराते हुए भाग गए। सबसे दुखद बात यह कि इतनी बड़ी मारपीट हो रही थी, लेकिन आसपास के लोग डर के मारे आगे नहीं आए। कोई हिंदू युवकों को बचाने के लिए सामने नहीं आया। इलाके में डर का माहौल है।

लोग कहते हैं कि शाम होते ही कुछ लड़के गलियों में घूमते हैं और लड़कियों पर फब्तियाँ कसते हैं। विरोध करने पर मारपीट कर देते हैं। फर्श बाजार और बिहारी कॉलोनी जैसे इलाकों में मुस्लिम बहुल आबादी होने की वजह से कुछ लोग विशेष समुदाय के लड़कों का आतंक बताते हैं। लड़कियाँ अकेले निकलने से डरती हैं।

घटना की सूचना मिलते ही फर्श बाजार पुलिस मौके पर पहुँची। पीड़ित ने शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज देखकर तीन नाबालिग आरोपितों को पकड़ लिया। इनमें मुख्य आरोपित जुबैर (परिवर्तित नाम) भी शामिल है। उसके खिलाफ पहले से भी शिकायतें थीं। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि सीसीटीवी में छह से ज्यादा लड़के दिख रहे हैं, जो लाठी-डंडे लेकर आए थे। पुलिस सिर्फ तीन नाबालिगों को पकड़कर मामले को निपटाने की कोशिश कर रही है। बड़े आरोपितों की तलाश अभी तक नहीं हुई।

एफआईआर नंबर 0645/2025 में भारतीय न्याय संहिता की कई धाराएँ लगाई गई हैं, जिनमें छेड़खानी, यौन शोषण, मारपीट, संपत्ति को नुकसान और आपराधिक धमकी शामिल है। घायल भाइयों को हेडगेवार अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है।

पुलिस उपायुक्त प्रशांत गौतम ने कहा कि सभी आरोपित नाबालिग हैं और कड़ी कार्रवाई की जा रही है। लेकिन इलाके के लोग असंतुष्ट हैं। वे कहते हैं कि नाबालिग बताकर ऐसे मामलों को हल्का कर दिया जाता है, जिससे बदमाशों का हौसला बढ़ता है।

यह घटना दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा पर बड़ा सवाल उठाती है। फर्श बाजार जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में शाम के समय लड़कियाँ सुरक्षित नहीं महसूस करतीं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि विशेष समुदाय के कुछ युवक अक्सर उत्पात मचाते हैं, लेकिन पुलिस कार्रवाई में ढिलाई बरतती है। सीसीटीवी फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें हमलावरों की दबंगई साफ दिख रही है।

पाकिस्तान वाले साबरी ने नहीं, बॉलीवुड वाले साहिर लुधियानवी की लिखी है ‘न तो कारवाँ की तलाश है’, ‘धुरंधर’ से पहले ‘बरसात की रात’ में भी थी यह कव्वाली

बॉलावुड की ब्लॉक बस्टर फिल्म धुरंधर में जिस कव्वाली ‘न तो कारवाँ की तलाश है, न तो हमसफर की तलाश है’ का इस्तेमाल हुआ है, वह 1960 की हिंदी फ़िल्म ‘बरसात की रात’ में फिल्माई गई कव्वाली से मिलती है।

ऐपल म्यूजिक स्टोर के स्क्रीन शॉट से भी इसकी जानकारी मिलती है। फिल्मी दस्तावेजों और आधिकारिक क्रेडिट के अनुसार, ये गीत साहिर लुधियानवी ने लिखे थे और इसका संगीत रौशन ने दिया था। इस कव्वाली में कई गायक-गायिकाओं की आवाज हैं। इसे एक समूह-प्रस्तुति के रूप में रिकॉर्ड की गई थी। मन्ना डे, मोहम्मद रफी, आशा भोंसले, सुधा मल्होत्रा और एसडी बातिश शामिल थे। रिकॉर्ड्स के मुताबिक, यही इसका पहला प्रकाशित और व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त फिल्मी वर्जन है।

इसी आधार पर कहा जाता है कि इस कव्वाली का आधिकारिक फिल्मी origin भारतीय सिनेमा और बॉलीवुड से जुड़ा है। संगीत कंपनियों, फ़िल्म आर्काइव्स में लेखक, संगीतकार और गायकों के नाम स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। इसलिए जब ‘क्रेडिट किसे जाता है’ जैसे सवाल उठते हैं, तो ये 1960 की फिल्म ‘बरसात की रात’ को याद कर रहे हैं।

हालाँकि कव्वाली एक शास्त्रीय या निजी विधा नहीं है। यह सूफी परंपरा से निकली एक साझा और मौखिक संगीत परंपरा है। इसकी जड़ें पंजाब क्षेत्र में फैली हुई हैं। यही वजह है कि कुछ संगीत प्रेमी और इतिहासकार यह तर्क देते हैं कि ‘बरसात की रात’ की कव्वाली की धुन और भाव लाहौर-केंद्रित सूफी कव्वाली परंपरा से प्रेरित लगते हैं। अक्सर इस संदर्भ में मुबारक अली खान और फतह अली खान द्वारा 1950 के दशक में गाई गई कव्वाली ‘न तो बुतकदे की तलब मुझे’ का जिक्र किया जाता है। इस गाने को आमिर सावरी ने लिखा था।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण फर्क समझना ज़रूरी है। प्रेरणा या सांस्कृतिक समानता का दावा ऐतिहासिक चर्चा का विषय हो सकता है। हालाँकि अब तक ऐसा कोई ठोस, प्रकाशित ऑडियो या दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, जो यह सिद्ध करे कि ‘न तो कारवाँ की तलाश है’ के पूरे बोल उसी रूप में 1960 से पहले रिकॉर्ड होकर जारी किए गए थे। इसलिए समानता को प्रमाण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में देखा जाता है। मौखिक परंपराओं में ऐसे प्रभाव आम होते हैं, लेकिन क्रेडिट तय करने के लिए दस्तावेजी साक्ष्य जरूरी हैं।

‘बरसात की रात’ का ये गाना सिर्फ कव्वाली भी नहीं है। लगभग 13 मिनट लंबा यह गीत सूफी और निर्गुण परंपरा से शुरू होकर भक्ति आंदोलन की ओर बढ़ता है। इसमें राधा-कृष्ण और मीरा की झलक मिलती है, फिर बुद्ध के बोधि वृक्ष तक पहुँचता है और आगे मसीह की करुणा का प्रतीक बनता है। और यही वजह है कि इसे गंगा-जमुनी तहजीब और भारत की बहुधार्मिक सांस्कृतिक चेतना का एक सिनेमाई दस्तावेज भी माना जाता है।

यद्यपि यह कव्वाली पाकिस्तान और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत प्रेमियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है, लेकिन इसका निर्माण और मूल भारत से ही है।

सार यही है कि यह कव्वाली सांस्कृतिक रूप से साझा विरासत का हिस्सा हो सकती है, क्योंकि सूफी संगीत की जड़ें आधुनिक भारत-पाकिस्तान की सीमाओं से पहले की हैं। लेकिन जब सवाल गीत की पैदाइश, लेखक और क्रेडिट का आता है, तो उपलब्ध ऐतिहासिक और फिल्मी रिकॉर्ड यह स्पष्ट करते हैं कि इसका प्रामाणिक, प्रकाशित और मान्यता प्राप्त 1960 में भारत में बनी फ़िल्म ‘बरसात की एक रात’ से ही सामने आता है। यही वजह है कि मौजूदा बहस में सांस्कृतिक साझेदारी को स्वीकार करते हुए भी आधिकारिक क्रेडिट भारतीय सिनेमा को दिया जाता है।

भारत को ब्लू इकोनॉमी का पावर हाउस बनाने की दिशा में मोदी सरकार का बड़ा कदम, ₹44000 करोड़+ से शिपबिल्डिंग पर फोकस: जानें- देश को मिलेगा क्या फायदा

भारत एक ऐसा देश है जिसकी 7,517 किलोमीटर लंबी तटरेखा है और तीन तरफ से समुद्र घिरा हुआ है। यहाँ की अर्थव्यवस्था में समुद्री व्यापार की बड़ी भूमिका है। लगभग 95 प्रतिशत विदेशी व्यापार समुद्र के रास्ते होता है। लेकिन अब तक भारत जहाज निर्माण में बहुत पीछे रहा है। इसे बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने ₹44700 करोड़ खर्च करने की तैयारी कर ली है।

वैश्विक स्तर पर जहाज निर्माण में चीन, दक्षिण कोरिया और जापान का दबदबा है और ये तीन देश मिलकर 95 प्रतिशत से ज्यादा जहाज बनाते हैं। भारत का हिस्सा सिर्फ 0.1 प्रतिशत से भी कम है और वैश्विक रैंकिंग में 20वें स्थान के आसपास है।

मोदी सरकार इसे बदलना चाहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में सरकार ब्लू इकोनॉमी को मजबूत बनाने पर जोर दे रही है। ब्लू इकोनॉमी का मतलब है समुद्र के संसाधनों का टिकाऊ इस्तेमाल। जैसे मछली पकड़ना, बंदरगाह, जहाजरानी, समुद्री ऊर्जा, पर्यटन और जहाज निर्माण। इससे अर्थव्यवस्था बढ़ेगी, रोजगार बनेगा और पर्यावरण सुरक्षित रहेगा।

सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक भारत जहाज निर्माण में विश्व के टॉप-5 देशों में शामिल हो जाए। इसके लिए हाल ही में दो बड़ी योजनाओं के दिशानिर्देश जारी किए गए हैं, 1- शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम (SBFAS) और दूसरा – शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम (SbDS)। इन पर कुल 44,700 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अगुवाई में जहाज निर्माण क्षेत्र को नई नीति मिली है। ये दिशानिर्देश पारदर्शी और स्थिर ढाँचा बनाएँगे, जिससे घरेलू जहाज निर्माण फिर से जीवित होगा। इससे मेक इन इंडिया को बल मिलेगा, बड़े निवेश आएँगे और विश्व स्तरीय क्षमता बनेगी। भारत विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत की राह पर एक बड़ी समुद्री राष्ट्र बनेगा।”

मोदी सरकार की दोनों योजनाओं की खास बातें

मोदी सरकार की SBFAS और SbDS योजनाएँ सितंबर 2025 में कैबिनेट से मंजूर 69,725 करोड़ रुपए के पैकेज का हिस्सा हैं। दिसंबर 2025 में इनके ऑपरेशनल गाइडलाइंस जारी हुए। दोनों योजनाएँ 31 मार्च 2036 तक चलेंगी और 2047 तक बढ़ाई जा सकती हैं।

शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम (SBFAS): इसका बजट 24,736 करोड़ रुपये है। इसमें भारतीय जहाज निर्माण कंपनियों को हर जहाज पर 15 से 25 प्रतिशत तक वित्तीय मदद मिलेगी। यह मदद जहाज के प्रकार पर निर्भर करेगी, जिसमें छोटे सामान्य जहाज, बड़े सामान्य या विशेष जहाज होंगे। सरकार की ओर से मदद चरणबद्ध तरीके से मिलेगी, स्टेप-दर-स्टेप काम पूरा होने के आधार पर। इसके साथ ही सीरीज ऑर्डर पर अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दिया जाएगा।

  • एक नई सुविधा है शिपब्रेकिंग क्रेडिट नोट। अगर कोई पुराना जहाज भारतीय यार्ड में तोड़ा जाता है, तो मालिक को स्क्रैप वैल्यू का 40 प्रतिशत क्रेडिट मिलेगा। इसे नए जहाज बनाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा और पुराने जहाज से नए बनेंगे।
  • अगले दशक में यह योजना 96,000 करोड़ रुपए के जहाज निर्माण प्रोजेक्ट सपोर्ट करेगी। इससे घरेलू विनिर्माण बढ़ेगा और लाखों रोजगार बनेगे।

शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम (SbDS): मोदी सरकार की इस योजना का बजट 19,989 करोड़ रुपये है। यह लंबे समय की क्षमता बनाने पर फोकस करती है। इसमें नए ग्रीनफील्ड जहाज निर्माण क्लस्टर बनेंगे। केंद्र और राज्य मिलकर 50:50 स्पेशल पर्पज व्हीकल बनाएँगे, जो सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर पर 100 प्रतिशत पूँजी मदद देगा।

  • पुराने ब्राउनफील्ड यार्ड्स को आधुनिकीकरण के लिए 25 प्रतिशत मदद मिलेगी, जैसे ड्राई डॉक, शिपलिफ्ट, फैब्रिकेशन सुविधाएँ और ऑटोमेशन अपनाने पर।
  • इंडियन मैरीटाइम यूनिवर्सिटी के तहत इंडिया शिप टेक्नोलॉजी सेंटर बनेगा, जो रिसर्च, डिजाइन, इनोवेशन और स्किल डेवलपमेंट करेगा।
  • क्रेडिट रिस्क कवरेज फ्रेमवर्क से प्री-शिपमेंट, पोस्ट-शिपमेंट और वेंडर डिफॉल्ट रिस्क पर सरकारी इंश्योरेंस मिलेगा। इससे प्रोजेक्ट आसानी से फाइनेंस हो सकेंगे।

इन योजनाओं से 2047 तक भारत की व्यावसायिक जहाज निर्माण क्षमता 4.5 मिलियन ग्रॉस टनेज प्रति वर्ष हो जाएगी। इससे रोजगार बढ़ेगा, स्वदेशी तकनीक विकसित होगी और समुद्री सुरक्षा मजबूत होगी।

ब्लू इकोनॉमी और जहाज निर्माण का महत्व

ब्लू इकोनॉमी भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिलहाल यह जीडीपी में 4 प्रतिशत योगदान देती है, लेकिन संभावना बहुत ज्यादा है। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक यह 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचे। सागरमाला प्रोजेक्ट इसके केंद्र में है। सागरमाला से बंदरगाह आधुनिक हो रहे हैं, तटीय आर्थिक जोन बन रहे हैं और लॉजिस्टिक्स लागत कम हो रही है। अब तक 839 प्रोजेक्ट्स की पहचान हुई है, जिनकी लागत 5.8 लाख करोड़ रुपए है।

मैरिटाइम इंडिया विजन 2030 और अमृत काल विजन 2047 में जहाज निर्माण को प्रमुख स्थान दिया गया है। विजन 2030 में 150 से ज्यादा पहल हैं, जिन पर 3-3.5 लाख करोड़ निवेश होगा। अमृत काल विजन 2047 में 80 लाख करोड़ निवेश का प्लान है। इससे भारत टॉप-10 से टॉप-5 जहाज निर्माण देश बनेगा।

जहाज निर्माण के फायदे कई

आर्थिक विकास: जहाज निर्माण भारी इंजीनियरिंग की माँ (Mother of Heavy Engineering) कहलाता है। इससे स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग जैसी सहायक इंडस्ट्रीज बढ़ती हैं। विदेशी जहाज खरीदने पर हर साल अरबों डॉलर खर्च होते हैं, इसे बचाया जा सकता है। निर्यात बढ़ेगा और व्यापार घाटा कम होगा।

रोजगार सृजन: ये योजनाएँ लाखों नौकरियाँ बनाएँगी, खासकर जहाज यार्ड में, सहायक उद्योगों में और स्किल डेवलपमेंट से। तटीय इलाकों में लोग लाभान्वित होंगे।

समुद्री सुरक्षा: स्वदेशी जहाज से नौसेना और कोस्ट गार्ड मजबूत होंगे। विदेशी निर्भरता कम होगी। भारतीय झंडे वाले जहाज बढ़ेंगे, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है।

पर्यावरण और टिकाऊ विकास: योजनाओं में ग्रीन शिपिंग पर जोर है। हाइब्रिड, इलेक्ट्रिक या ग्रीन फ्यूल वाले जहाजों को ज्यादा मदद मिलेगी। इससे कार्बन उत्सर्जन कम होगा।

वैश्विक संदर्भ में भारत की स्थिति

विश्व में जहाज निर्माण तेजी से बढ़ रहा है। 2025 में ग्लोबल मार्केट 155 अरब डॉलर का है। चीन अकेला 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा रखता है, उसके बाद दक्षिण कोरिया और जापान। ये देश सब्सिडी, आधुनिक तकनीक और बड़े क्लस्टर से आगे हैं। भारत अब उसी रास्ते पर है- क्लस्टर बनाकर, फाइनेंशियल मदद देकर और रिस्क कवर देकर।

पहले भारत की क्षमता बहुत कम थी, सिर्फ 0.1 मिलियन ग्रॉस टनेज प्रति वर्ष। कोचिन शिपयार्ड और हिंदुस्तान शिपयार्ड जैसे सार्वजनिक यार्ड मुख्य थे, लेकिन व्यावसायिक जहाज कम बनते थे। अब निजी क्षेत्र भी सक्रिय हो रहा है।

शिप-बिल्डिंग के क्षेत्र में चुनौतियाँ

भारत के लिए इस राह में आगे बढ़ने को लेकर काफी चुनौतियाँ हैं, जिसमें लागत ज्यादा होना, पुरानी तकनीकी, स्किल की कमी और महँगा फाइनेंस, लेकिन मोदी सरकार की योजनाएँ इन समस्याओं को दूर करेंगी। इस काम में नेशनल शिपबिल्डिंग मिशन समन्वय करेगा। स्वतंत्र मूल्यांकन और मीलस्टोन बेस्ड पेमेंट से पारदर्शिता आएगी।

सरकार का विजन स्पष्ट है कि आत्मनिर्भर भारत में समुद्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सागरमाला, डीप ओशन मिशन और पीएम मत्स्य संपदा योजना से ब्लू इकोनॉमी मजबूत हो रही है। जहाज निर्माण इसमें केंद्र है। अंत में ये योजनाएं सिर्फ जहाज बनाने की नहीं, बल्कि भारत को समुद्री महाशक्ति बनाने की हैं। इससे अर्थव्यवस्था बुलंद होगी, युवाओं को रोजगार मिलेगा और देश सुरक्षित रहेगा। 2047 तक विकसित भारत का सपना समुद्र से भी पूरा होगा।

हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर ब्रेनवॉश, विरोध करने पर पैसे देकर चुप कराने की कोशिश: फतेहपुर में ईसाई धर्मांतरण का रैकेट ध्वस्त, पादरी डेविड ग्लेडविन समेत 8 पर FIR

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में पुलिस ने 28 दिसंबर को एक पादरी डेविड ग्लेडविन और उनके बेटे अभिषेक ग्लेडविन को गिरफ्तार किया। आरोप है कि दोनों बाप-बेटे गरीब हिंदुओं को लालच और धमकी देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर कर रहे थे।

यह गिरफ्तारी बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन के बाद हुई। संगठनों ने आरोप लगाया कि पादरी और उनके साथियों द्वारा जबरन धर्मांतरण कराया जा रहा था। बताया गया है कि ये धर्मांतरण गतिविधियाँ फतेहपुर के राधानगर थाना क्षेत्र के देविगंज इलाके में स्थित इंडिया प्रेस्बिटेरियन चर्च में हो रही थीं। इस मामले में पुलिस ने FIR दर्ज की है, जिसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास है।

FIR में क्या लिखा है?

इस मामले में FIR देवप्रकाश पासवान की शिकायत पर दर्ज की गई है। पुलिस ने यह FIR भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 299 और 351(3) के तहत दर्ज की है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5(1) भी लगाई गई हैं।

FIR में पादरी डेविड ग्लेडविन, उनके बेटे अभिषेक ग्लेडविन और जोहान विश्वास उर्फ केके बंगाली को आरोपी बनाया गया है। इनके अलावा 5-6 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया है।

फोटो साभार: यूपी पुलिस

अपनी शिकायत में देवप्रकाश ने बताया कि 28 दिसंबर को सुबह करीब 10 बजे उन्हें और उनके साथियों नीरज पासवान तथा सुशील रैदास को देवीगंज स्थित चर्च में बुलाया गया था। जब वे लोग चर्च के अंदर पहुँचे तो वहाँ प्रार्थना सभा चल रही थी। इस दौरान ईसा मसीह की प्रेयर की जा रही थी।

फोटो साभार: यूपी पुलिस

शिकायत में आगे कहा गया है कि प्रार्थना सभा के दौरान हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गईं। चर्च में मौजूद लोगों पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया जा रहा था। देवप्रकाश के अनुसार, वहाँ यह भरोसा दिलाया जा रहा था कि जो भी व्यक्ति ईसाई धर्म स्वीकार करेगा उसे पैसे, घरेलू सामान, रोजगार और बच्चों की मुफ्त शिक्षा की सुविधा दी जाएगी।

फोटो साभार: यूपी पुलिस

जब देवप्रकाश और उनके साथियों ने इन गतिविधियों का विरोध किया तो उन्हें 1,100 रुपए देकर चुप रहने को कहा गया। आरोप है कि पादरी और उसके साथियों ने चुप रहने के बदले और ज्यादा पैसे देने की पेशकश भी की।

शिकायत के अनुसार, आरोपी लगातार उनके गाँव में आ-जा रहे थे और ग्रामीणों पर अपने घरों में ईसा मसीह की तस्वीर लगाने तथा हर रविवार चर्च आने का दबाव बना रहे थे। पादरी और उसके साथी यह भी कहते थे कि जो व्यक्ति किसी नए व्यक्ति को चर्च लेकर आएगा, उसे आर्थिक इनाम दिया जाएगा। वहीं, इनकार करने वालों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी जाती थी।

पासवान ने कहा कि इन गतिविधियों के कारण ग्रामीण इलाकों में डर का माहौल बन गया है। लोगों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है, कुछ लोग घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं और कई लोग अत्यधिक मानसिक तनाव में आकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने की स्थिति तक पहुँच गए हैं।

चर्च के बाहर विरोध प्रदर्शन

चर्च में धर्मांतरण कार्यक्रम होने की सूचना मिलते ही हिंदू संगठनों में आक्रोश फैल गया। इसके बाद बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकर्ता चर्च परिसर पहुँचे और विरोध प्रदर्शन शुरू किया।

मीडिया से बातचीत में कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि चर्च के अंदर बड़ी संख्या में हिंदू महिलाएँ मौजूद थीं और उन्हें रोजगार, आस्था के नाम पर इलाज, पैसे तथा बच्चों की शिक्षा का लालच देकर निशाना बनाया जा रहा था।

कार्यकर्ताओं ने चर्च के बाहर निकलने के रास्तों को रोक दिया और पुलिस कार्रवाई की माँग की। उन्होंने पुलिस से माँग करते हुए कि चर्च के अंदर मौजूद सभी लोगों से पूछताछ की जाए और उसके बाद ही उन्हें बाहर जाने दिया जाए।

आरोपितों की गिरफ्तारी

इस मामले की शिकायत मिलने के बाद थरियांव के DSP वीर सिंह कई थानों की पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुँचे। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित किया और प्रदर्शन कर रहे लोगों को भरोसा दिलाया कि सबूतों के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस दौरान पुलिस ने पादरी डेविड ग्लेडविन को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया।

बाद में पुलिस ने पुष्टि की कि पादरी सहित दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं, FIR में नामजद और अज्ञात बताए गए अन्य आरोपितों की तलाश के लिए पुलिस की कार्रवाई जारी है।

पुलिस और हिंदू संगठनों ने क्या कहा?

मीडिया से बातचीत में DSP वीर सिंह ने बताया कि कुछ हिंदू महिलाएँ चर्च में गई थीं। उन्होंने कहा कि महिलाएँ किन परिस्थितियों में वहाँ पहुँचीं इसकी जाँच की जा रही है। DSP के अनुसार, पादरी से पूछताछ की जा रही है और जाँच में जो सामने आएगा उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

राधानगर थाने के इंस्पेक्टर विनोद मौर्य ने बताया कि चर्च के अंदर मौजूद महिलाओं के बयान दर्ज किए जा रहे हैं। जाँच का मुख्य फोकस इस बात पर है कि कहीं धर्मांतरण के लिए लालच या दबाव तो नहीं बनाया गया।

वहीं, हिंदू संगठनों के नेताओं ने कहा कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। उनका आरोप है कि गरीब और हाशिए पर रहने वाले हिंदुओं को बार-बार निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ‘चंगाई सभा’ के नाम पर प्रार्थना सभाओं की आड़ में धर्मांतरण की गतिविधियाँ चल रही हैं और यहाँ लोगों को लालच और धमकियों के जरिए धर्म बदलने के लिए मजबूर किया जाता है। फिलहाल, इस पूरे मामले में पुलिस की आगे की जाँच जारी है।