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उच्च विकास दर, नियंत्रित महँगाई, घटती बेरोजगारी और संतुलित अर्थव्यवस्था: जानें- कैसे भारत ने 2025 में लिखी विकास की नई परिभाषा

साल 2025 भारत की आर्थिक यात्रा का एक स्वर्णिम अध्याय साबित हुआ। वैश्विक स्तर पर व्यापारिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक मंदी की आशंकाओं के बावजूद भारत ने अपनी मजबूत घरेलू माँग, दूरदर्शी नीतियों और साहसिक सुधारों के बल पर न केवल स्थिरता बनाए रखी, बल्कि नई ऊँचाइयाँ हासिल कीं। बात चाहे सैन्य ताकत (ऑपरेशन सिंदूर) की हो या आर्थिक ताकत की… पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत अपनी ही रफ्तार में आगे बढ़ता रहा।

आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2025) में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत दर्ज की गई, जो पिछले छह तिमाहियों का उच्चतम स्तर है। यह पिछले वर्ष की इसी तिमाही के 5.6 प्रतिशत और पहली तिमाही के 7.8 प्रतिशत से काफी अधिक है।

इस मजबूत प्रदर्शन ने भारत को दुनिया की सबसे तेज बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शीर्ष पर बनाए रखा। भारत की जीडीपी अब 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच चुकी है, जिससे हम जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 2.5 से 3 वर्षों में भारत जर्मनी को पछाड़कर तीसरे स्थान पर पहुँच जाएगा और 2030 तक जीडीपी 7.3 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी।

इस विकास की मुख्य वजह मजबूत निजी खपत रही, जो घरेलू माँग का प्रमुख चालक है। साथ ही सरकारी पूंजीगत व्यय की प्राथमिकता, जीएसटी और आयकर सरलीकरण जैसे सुधारों ने उपभोक्ता विश्वास को बढ़ावा दिया।

प्रमुख क्षेत्रों में चौतरफा गति को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपने जीडीपी विकास अनुमान को 6.8 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.3 प्रतिशत कर दिया है।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भी इसी आशावाद को दोहराया है, जिसमें विश्व बैंक ने 2026 में 6.5 प्रतिशत विकास का अनुमान लगाया है। मूडीज को उम्मीद है कि भारत 2026 में 6.4 प्रतिशत और 2027 में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाली जी-20 अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

आईएमएफ ने 2025 के लिए अपने अनुमान बढ़ाकर 6.6 प्रतिशत और 2026 के लिए 6.2 प्रतिशत कर दिए हैं। ओईसीडी ने 2025 में 6.7 प्रतिशत और 2026 में 6.2 प्रतिशत विकास का पूर्वानुमान लगाया है, तो एसएंडपी ने जारी वित्त वर्ष में 6.5 प्रतिशत और अगले वर्ष 6.7 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया है।

एशियाई विकास बैंक ने अपने 2025 के पूर्वानुमान को बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत कर दिया है और फिच ने मजबूत उपभोक्ता माँग के कारण वित्त वर्ष 26 के अनुमान को बढ़ाकर 7.4 प्रतिशत कर दिया है। ये सभी आँकड़े जी-20 देशों में सबसे अधिक है।

विकास के इस सफर में तीन प्रमुख स्तंभ उभरकर सामने आए हैं, उच्च विकास, स्थिरता और आत्मविश्वास। वैश्विक व्यापार में अनिश्चितताओं के बीच भारत की घरेलू माँग ने अर्थव्यवस्था को संभाला। हाई-फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स जैसे क्रय प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई), क्रेडिट वृद्धि और शहरी खपत सभी सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। वाणिज्यिक क्षेत्र में मजबूत क्रेडिट प्रवाह और कॉर्पोरेट बैलेंस शीट की मजबूती ने निवेश को प्रोत्साहित किया।

आम जनता को घटती महँगाई से बड़ी राहत

महँगाई के मोर्चे पर 2025 भारत के लिए राहत भरा वर्ष रहा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महँगाई जनवरी 2025 में 4.26 प्रतिशत से शुरू होकर नवंबर तक घटकर 0.71 प्रतिशत पर आ गई, जो कई वर्षों का निचला स्तर है। यह आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य (सहिष्णुता बैंड +/-2 प्रतिशत) से काफी नीचे है। मुख्य कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों में गिरावट रहा, विशेषकर सब्जियाँ, दालें और अनाज में। इसकी वजह से खाद्य महंगाई नवंबर में -3.91 प्रतिशत तक नकारात्मक हो गई।

आरबीआई ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए महँगाई अनुमान को 2.6 प्रतिशत से घटाकर 2.0 प्रतिशत कर दिया। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) महँगाई भी नवंबर में -0.32 प्रतिशत पर रही। इस अनुकूल महँगाई परिदृश्य ने आरबीआई को नीतिगत रेपो दर को 25 आधार अंक घटाकर 5.25 प्रतिशत करने की गुंजाइश दी। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए एक दुर्लभ ‘गोल्डीलॉक्स पीरियड’ है, जहाँ विकास तेज है और महँगाई कम। कम महँगाई से घरेलू बचत बढ़ी, खपत मजबूत हुई और मौद्रिक नीति में लचीलापन आया।

बेरोजगारी में ऐतिहासिक गिरावट दिखी, रोजगार सृजन को नई गति मिली

बेरोजगारी और आर्थिक गतिविधि की गति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे-जैसे विकास की रफ्तार बढ़ती है, वस्तुओं और सेवाओं के अधिक उत्पादन से श्रम की माँग बढ़ती है, जिससे रोजगार के अधिक अवसर पैदा होते हैं और बेरोजगारी कम होती है। इस संदर्भ में भारत की घटती बेरोजगारी दर इसकी आर्थिक गति की मजबूती को दर्शाती है। विकास की निरंतरता को देखते हुए, भारत के बेहतर होते रोजगार परिणाम निरंतर विकास और रोजगार सृजन के बीच अच्छे तालमेल को दिखाते हैं।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार, नवंबर 2025 में 15 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लिए बेरोजगारी दर घटकर 4.8 प्रतिशत हो गई, जो कई महीनों का निचला स्तर है। महिलाओं की बेरोजगारी में भारी कमी आई, ग्रामीण महिलाओं में 4.0 प्रतिशत से 3.4 प्रतिशत और शहरी में 9.7 प्रतिशत से 9.3 प्रतिशत रही, तो ग्रामीण बेरोजगारी 3.9 प्रतिशत और शहरी 6.5 प्रतिशत पर रही।

श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) सात महीनों के उच्चतम स्तर 55.8 प्रतिशत पर पहुँची, जबकि श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) 53.2 प्रतिशत हो गया। ये आँकड़े बताते हैं कि अधिक लोग कार्यबल में शामिल हो रहे हैं और उन्हें रोजगार मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में कृषि और निर्माण तथा शहरी में सेवा क्षेत्र ने रोजगार बढ़ाए। महिलाओं की भागीदारी बढ़ना विशेष रूप से उत्साहजनक है।

भारत की युवा जनसंख्या (10-24 वर्ष आयु वर्ग में लगभग 26 प्रतिशत) एक बड़ा अवसर है। सुधारों से गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन हुआ, जो समावेशी विकास सुनिश्चित कर रहा है। विकास और रोजगार के बीच का चक्र मजबूत हुआ, तेज विकास से अधिक नौकरियां और अधिक नौकरियों से मजबूत खपत।

निर्यात में मजबूती, वैश्विक बाजारों में भारत की बढ़ती हिस्सेदारी

भारत ने व्यापार के बाहरी क्षेत्र ने भी मजबूती दिखाई। नवंबर 2025 में मर्चेंडाइज निर्यात बढ़कर 38.13 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 19 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है। प्रमुख वस्तुएँ जैसे इंजीनियरिंग गुड्स (23 प्रतिशत वृद्धि), इलेक्ट्रॉनिक गुड्स, फार्मास्यूटिकल्स और पेट्रोलियम उत्पादों ने योगदान दिया। सेवा निर्यात भी मजबूत रहा, अप्रैल-नवंबर में 8.65 प्रतिशत बढ़कर 270 बिलियन डॉलर के करीब।

विदेशी मुद्रा भंडार 686 बिलियन डॉलर पर पहुँचा, जो 11 महीनों से अधिक के आयात को कवर करता है। चालू खाता घाटा जीडीपी के 1.3 प्रतिशत पर सीमित रहा। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में भारी वृद्धि हुई, जिसमें अप्रैल-सितंबर में शुद्ध एफडीआई 127 प्रतिशत बढ़ा। व्यापार समझौतों से न्यूजीलैंड, ओमान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और ईएफटीए देशों के साथ संबंध मजबूत हुए।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में नेक्स्ट-जेनरेशन रिफॉर्म्स से बही सुधारों की बयार

ये उपलब्धियाँ बिना ठोस आधार के हासिल नहीं हुईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लेख में 2025 को ‘सुधारों का वर्ष’ कहा, जहाँ भारत ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ पर सवार हुआ। सुधारों का इंजन भारत की जनसांख्यिकी, युवा ऊर्जा और लोगों का जज्बा है।

जीएसटी सुधारों में दो मुख्य स्लैब (5% और 18%) लागू किए गए। घरों, MSMEs, किसानों और ज्यादा लेबर वाले सेक्टर्स पर टैक्स का बोझ कम किया गया है। इसका मकसद विवादों को कम करना और बेहतर कंप्लायंस सुनिश्चित करना है। इस सुधार से कंज्यूमर सेंटिमेंट और डिमांड को बढ़ावा मिला है। सुधार लागू होने के बाद फेस्टिव सीजन में बिक्री बढ़ी है।

इस साल आयकर में अभूतपूर्व राहत मिली है। पहली बार सालाना 12 लाख रुपए तक कमाने वाले लोगों को कोई इनकम टैक्स नहीं देना पड़ा। साल 1961 के पुराने इनकम-टैक्स एक्ट को आधुनिक और सरल इनकम टैक्स एक्ट, 2025 से बदल दिया गया है। ये सभी सुधार मिलकर भारत को एक पारदर्शी, टेक्नोलॉजी-आधारित टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन की ओर ले जा रहे हैं।

इसके अलावा सरकार ने एमएसएमई के लिए ‘छोटी कंपनियों’ की परिभाषा बढ़ाकर टर्नओवर 100 करोड़ तक कर दिया है। इससे हजारों कंपनियों के लिए कंप्लायंस का बोझ और उससे जुड़ी लागत कम होगी। भारत सरकार ने भारतीय बीमा कंपनियों में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी है। इससे बीमा कवरेज और नागरिकों की सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा। प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ-साथ, लोगों को बेहतर बीमा विकल्प मिलेंगे।

भारत सरकार ने लेबर सुधारों में 29 पुराने कानूनों को चार नए कोड में समाहित किया। भारत ने एक ऐसा लेबर फ्रेमवर्क बनाया है जो कर्मचारियों के हितों की रक्षा करता है और साथ ही बिजनेस इकोसिस्टम को भी बढ़ावा देता है। ये सुधार सही वेतन, समय पर वेतन भुगतान, बेहतर औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थलों पर केंद्रित हैं। ये वर्कफोर्स में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित करते हैं। संविदा श्रमिकों सहित असंगठित श्रमिकों को ESIC और EPFO के अंतर्गत लाया गया है, जिससे औपचारिक वर्कफोर्स का दायरा बढ़ा है।

इस साल सबसे महत्वपूर्ण कदम रहा न्यूक्लियर एनर्जी में SHANTI एक्ट से प्राइवेट भागीदारी को खोलने का। SHANTI एक्ट भारत की क्लीन-एनर्जी और टेक्नोलॉजी के सफर में एक बड़ा बदलाव लाने वाला कदम है। न्यूक्लियर साइंस और टेक्नोलॉजी के सुरक्षित, पक्के और जवाबदेह विस्तार के लिए एक मजबूत ढाँचा सुनिश्चित करता है। भारत को AI युग की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है, जैसे डेटा सेंटर, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, ग्रीन हाइड्रोजन और हाई-टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज को पावर देना। इन सबसे ज्यादा रोजगार और ग्रोथ होगी।

मोदी सरकार ने विकसित भारत- G RAM G एक्ट, 2025 रोजगार गारंटी फ्रेमवर्क रोजगार गारंटी को 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया है। इससे गाँव के इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका को मजबूत करने की दिशा में खर्च बढ़ेगा। इसका मकसद ग्रामीण काम को ज्यादा इनकम और बेहतर एसेट्स सुनिश्चित करने का जरिया बनाना है।

शिक्षा के क्षेत्र में देखें तो इस साल मोदी सरकार ने शिक्षा में सिंगल रेगुलेटर का प्रस्ताव रखा है। इसके तरह UGC, AICTE, NCTE जैसी कई ओवरलैपिंग बॉडीज को ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ (Viksit Bharat Shiksha Adhishthan) से बदल दिया जाएगा। इस कदम से देश में इंस्टीट्यूशनल ऑटोनॉमी को मजबूत किया जाएगा, साथ ही इनोवेशन और रिसर्च को बढ़ावा दिया जाएगा।

विकसित भारत की ओर बढ़ती राष्ट्र की यात्रा

साल 2025 ने साबित किया कि भारत वैश्विक चुनौतियों के बीच भी अपनी राह खुद बनाने में सक्षम है। उच्च विकास, कम महँगाई, घटती बेरोजगारी और मजबूत निर्यात ने अर्थव्यवस्था को नई ताकत दी। सुधारों ने नींव मजबूत की। 2047 के विकसित भारत के सपने को साकार करने की दिशा में यह वर्ष मील का पत्थर है। आने वाले वर्षों में सुधारों की यह गति जारी रहेगी, क्योंकि भारत की उड़ान अब रुकने वाली नहीं।

काशी, मथुरा, मदुरै… साल 2025 में हिंदुओं की लड़ाई जारी, अदालतों में न्याय मिलने की जगह मिला सिर्फ स्टे ऑर्डर: जानें- किस तरह की कानूनी लड़ाई लड़ रहे सनातनी

2025 में धार्मिक झगड़े एक बार फिर भारत के न्याय सिस्टम में सबसे आगे रहे। मंदिर-मस्जिद झगड़ों से लेकर प्रशासन और राज्य के दखल के सवाल भी कोर्ट के चौखट तक गए। देश भर की अदालतों को बार-बार उन मामलों पर फैसला सुनाने के लिए कहा गया, जहाँ आस्था, कानून, इतिहास और पब्लिक ऑर्डर एक-दूसरे से जुड़े थे। हालाँकि इस साल इन मामलों में न्याय की सक्रियता के बावजूद बहुत कम फैसले सामने आए।

ज्यादातर हाई-प्रोफाइल झगड़ों पर अंतरिम रोक, यथास्थिति बनाए रखने के आदेश, कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटियों और प्रक्रिया में देरी की वजह से होल्डिंग पैटर्न में डाल दिया गया। अंतिम फैसला न देकर अदालतों ने अशांति को रोकने को प्राथमिकता दी। इसकी वजह से समाधान असल में टल गया।

साल 2025 न्यायिक बंद होने से नहीं बल्कि न्यायिक सावधानी से तय हुआ, जैसा कि वाराणसी में ज्ञानवापी कॉम्प्लेक्स, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि विवाद, मदुरै के कार्तिगई दीपम विवाद और मध्य प्रदेश में भोजशाला विवाद से पता चलता है। ये मामले धार्मिक झगड़ों को कानूनी तौर पर आखिरी फैसला देने के बजाय अंतरिम कंट्रोल के जरिए मैनेज करने के एक जैसे पैटर्न को दिखाते हैं।

आखिर धार्मिक विवाद के मामले कैसे और क्यों अनसुलझे रह गए? 2025 के आखिर में हर विवाद की क्या स्थिति थी और यह लंबी कानूनी उलझन भारत में धार्मिक मुकदमों के भविष्य के लिए क्या संकेत देती है।

अंतरिम आदेशों का साल, फैसलों का नहीं

2025 में धार्मिक झगड़ों में एक बात आम थी कि आखिरी फैसले के बजाय अंतरिम तरीकों पर लगातार भरोसा किया गया। मालिकाना हक, पूजा के अधिकार या ऐतिहासिक दावों के सवालों को सुलझाने के बजाय, अदालतों ने बार-बार कुछ समय के लिए कानूनी तरीकों से कार्रवाई रोकने का विकल्प चुना।

कोर्ट ने कई मामलों में सर्वे, निरीक्षण या निर्माण से जुड़े कामों को रोकने के लिए कुछ समय के लिए रोक लगाई । यथास्थिति बनाए रखने का आदेश आम तरीका बन गया। कुछ मामलों- जैसे बांके बिहारी मंदिर विवाद में, अदालतों ने रोजमर्रा के कामों को मैनेज करने के लिए कमेटियाँ बनाईं, जिससे असल में जरूरी फैसले टाल दिए गए।

इस तरह के न्यायिक तरीके की वजह हिंसा और तनाव पैदा होने का खतरा था। कई झगड़ों में सांप्रदायिक तनाव पैदा होने की बात सामने आई। इसको देखते हुए अदालतें ऐसे फैसले देने से सतर्क दिखीं, जो स्थिति को खराब कर सकते हैं। इसके अलावा ये झगड़े राजनीतिक रूप से बहुत ज्यादा संवेदनशील थे। मंदिर-मस्जिद विवाद हो या उसके प्रशासन से जुड़ा कोई मसला, इसके फैसले से राजनीतिक लामबंदी, धरना प्रदर्शन और फैसले पर सवाल उठने का खतरा बना रहता है।

अदालतों को पता है कि वे राजनीतिक रूप से संवेदनशील माहौल में काम कर रहे थे। आखिरकार, जज संवैधानिक रूप से मुश्किल रास्ते पर चल रहे थे। पूजा की जगहें (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट, 1991 में धार्मिक आजादी, सेक्युलरिज़्म और ऐतिहासिक दावों से जुड़े सवाल संवैधानिक तौर पर मुश्किलें पेश करते हैं। अदालतें मिसाल कायम करने के बजाए, फैसला देने में सावधान दिखीं।

पूरे साल लगातार न्यायालय की सुनवाई के बावजूद, 2025 में कोई भी बड़ा धार्मिक विवाद पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ। हर केस अलग-अलग प्रक्रिया के स्टेज पर लटका हुआ है।

ज्ञानवापी–काशी विश्वनाथ मंदिर विवाद, वाराणसी

2025 में ज्ञानवापी विवाद में कानूनी कार्यवाही जारी रही, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों पर रोक लगाई, जबकि वाराणसी कोर्ट ने 1991 के मूल मुकदमे को ट्रांसफर करने की याचिका खारिज की और ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) सर्वेक्षण पर सुनवाई जारी रही। इसमें व्यास जी के तहखाने की छत की मरम्मत और सुरक्षित रखने की माँग पर बहस हुई, साथ ही अवैध धन उगाही और धार्मिक स्थलों पर नमाजियों की संख्या जैसे विवाद भी सामने आए, लेकिन कोई बड़ा अंतिम फैसला नहीं आया, मामला कोर्ट में अटका रहा।

इससे पहले जनवरी 2024 में कोर्ट ने आदेश दिया कि ज्ञानवापी कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट में पूजा की इजाजत देने के लिए इंतजाम किए जाएँ। 1991 के असली मुकदमे की मेंटेनेबिलिटी को पहले 2022 में बरकरार रखा गया था।

यह मामला 1991 में देवता आदि विश्वेश्वर की ओर से दायर एक मुकदमे से शुरू हुआ था, जिसमें दावा किया गया था कि मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर की जगह पर बनाई गई थी।

2021 में, पाँच हिंदू महिलाओं ने वाराणसी सिविल कोर्ट में एक अलग मुकदमा दायर करके मस्जिद कॉम्प्लेक्स के अंदर मौजूद मूर्तियों की पूजा करने की इजाजत माँगी थी।

शाही जामा मस्जिद-हरिहर मंदिर, संभल

यह विवाद तब शुरू हुआ जब संभल के एक सिविल कोर्ट ने नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद की जगह के सर्वे की इजाज़त दी। हिंदुओं का दावा था कि मस्जिद कल्कि को समर्पित हरिहर मंदिर की जगह पर है। मस्जिद की मैनेजमेंट कमिटी सर्वे के ऑर्डर को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँची। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के पास एक कुएं से जुड़े म्युनिसिपल नोटिस पर रोक लगा दी और स्टेटस रिपोर्ट माँगी।

अगस्त 2025 में कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया और हिंदू याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किया। यथास्थिति के ऑर्डर को बाद में फिर बढ़ा दिया गया। साइट पर किसी भी सर्वे या बदलाव पर रोक लगा दी गई। यह पूरा मामला अदालती कार्यवाही और तनावपूर्ण माहौल के बीच फँसा रहा, जिसमें कई नई याचिकाएं दायर हुईं और कोर्ट में मामला लंबित है।

मदुरै कार्तिगई दीपम लैंप विवाद (तमिलनाडु)

यह विवाद इस बात पर है कि क्या हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर पारंपरिक कार्तिगई दीपम जला सकते हैं, जहाँ भगवान मुरुगन मंदिर और दरगाह दोनों हैं। हिंदू भक्तों का कहना है कि पहाड़ी की चोटी पर दीया जलाना एक जरूरी और लंबे समय से चली आ रही धार्मिक प्रथा है, और राज्य और HR&CE डिपार्टमेंट ने कानून और व्यवस्था का हवाला देते हुए इसे बार-बार रोका है। दिसंबर 2025 में मद्रास हाई कोर्ट ने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर पुराने दीपाथून खंभे पर कार्तिगई दीपम जलाने की इजाजत माँगने वाली याचिका को मंजूरी दे दी।

जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर मैनेजमेंट को 3 दिसंबर को त्योहार के दिन पुराने दीपाथून खंभे पर कार्तिगई दीपम दीया जलाने का इंतजाम करने की इजाजत दी और निर्देश दिया। तमिलनाडु सरकार ने परंपरा और कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए आदेश का विरोध किया।

त्योहार के दिन विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया और झड़पें हुई। इसके बाद सेंट्रल सिक्योरिटी फोर्स को पूरे इलाके में तैनात कर दिया गया। हाई कोर्ट ने बाद में अपने निर्देशों को लागू करने में कथित नाकामी के लिए राज्य के अधिकारियों को नोटिस जारी किया। तमिलनाडु सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और मामला अभी भी पेंडिंग है।

बांके बिहारी मंदिर मैनेजमेंट विवाद (वृंदावन)

यह विवाद ऐतिहासिक बांके बिहारी मंदिर के कंट्रोल और एडमिनिस्ट्रेशन को लेकर है, जिसे पारंपरिक रूप से सेवायत परिवार मैनेज करते आए हैं। अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने रोजमर्रा के कामकाज और श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए एक ताकतवर मंदिर मैनेजमेंट कमेटी बनाई थी।

यह कमेटी उत्तर प्रदेश के एक ऑर्डिनेंस की संवैधानिक वैधता पर फैसला आने तक बनाई गई थी, जिसने मंदिर एडमिनिस्ट्रेशन को एक कानूनी ट्रस्ट के तहत ला दिया था। दिसंबर 2025 में मंदिर की मैनेजमेंट कमेटी और एक सेवायत ने कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी के दायरे और अधिकार पर सवाल उठाते हुए एक नई याचिका दायर की। फिलहाल यह मामला 2026 की शुरुआत में आगे की सुनवाई के लिए लिस्टेड है।

अजमेर शरीफ दरगाह गिराने का मामला

दिसंबर 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रभावित पक्षों को सुनवाई का मौका दिए बिना अजमेर शरीफ दरगाह कॉम्प्लेक्स के अंदर के स्ट्रक्चर गिराने से केंद्र सरकार को रोक दिया था। यह अंतरिम आदेश दरगाह के एक खादिम की अर्जी पर दिया गया था, जिसमें मिनिस्ट्री ऑफ़ माइनॉरिटी अफेयर्स के कथित अतिक्रमण हटाने के नोटिस को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने नेचुरल जस्टिस के सिद्धांतों का पालन करने पर ज़ोर दिया और केंद्र को दरगाह ख्वाजा साहिब एक्ट, 1955 के तहत दरगाह कमेटी बनाने में तेजी लाने का भी निर्देश दिया। मामला अभी भी पेंडिंग है।

2026 का स्वागत ऐसे ही बड़े धार्मिक झगड़ों के अनसुलझे सवालों से होगा। 2025 में ज्यादातर मामलों में अंतिम फैसले को टाला गया और अंतरिम फैसले से काम चलाया गया। हालाँकि इस सावधानी भरे तरीके से शायद तुरंत अशांति को रोका जा सका हो, लेकिन इसने यह भी पक्का किया कि इतिहास, अधिकारों और संवैधानिक व्याख्या के बुनियादी सवालों को टाल दिया गया। जैसे-जैसे ये झगड़े 2026 में आगे बढ़ेंगे, न्यायपालिका के सामने चुनौती यह होगी कि क्या लगातार रोक संवैधानिक स्पष्टता की जगह ले सकती है या निर्णायक समाधान आखिरकार जरूरी हो जाएगा।

(यह मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

$1=14 लाख रियाल, 42% महँगाई दर और सड़कों पर हजारों Gen Z: मुल्लाओं को हटाने तक पहुँचा ईरान का ‘आर्थिक आंदोलन’, जानें- क्यों प्रदर्शनकारियों के समर्थन में खड़ा है अमेरिका

ईरान में आर्थिक संकट के चलते बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन जारी है। तेहरान से शुरू हुए ये प्रदर्शन कई शहरों में फैल चुके हैं। लोगों के बीच ईरानी मुद्रा ‘रियाल’ का डॉलर के मुकाबले में रिकॉर्ड गिरावट और 42 प्रतिशत पहुँची महँगाई को लेकर गुस्सा है। लोग सड़कों पर उतरकर ईरान के इस्लामी रिजीम का विरोध कर रहे हैं, इनमें बड़ी संख्या में Gen Z छात्र-छात्राएँ भी शामिल हैं।

सबसे पहले 28 दिसंबर 2025 को तेहरान के ग्रैंड बाजार के दुकानदारों और व्यापारियों ने विरोध शुरू किया। विरोध में दुकानें बंद रखी गईं। इसके बाद विरोध तेहरान, इस्फहान, शिराज, मशहद, हमेदान और तमाम शहरों तक फैल गया। तीन दिन से जारी प्रदर्शन के कुछ वीडियो सामने आ रहे हैं, जिसमें लोग सड़कों पर उतरकर नारे लगा रहे हैं- ‘मुल्लाओं को ईरान छोड़ना होगा’, ‘आजादी-ए-आजादी’ और ‘तानाशाही का अंत हो।’

प्रदर्शनों पर ईरान की सरकार ने कहा कि वह बातचीत के लिए तैयार है। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने गृह मंत्री को प्रतिनिधियों से बातचीत करने का निर्देश दिया। साथ ही राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर मोहम्मदरेजा फरजिन का इस्तीफा भी स्वीकार कर लिया और उनकी जगह पूर्व अर्थव्यवस्था एवं वित्त मंत्री अब्दोलनासेर हेम्मती को नियुक्त किया गया है।

विरोध प्रदर्शन में Gen Z छात्रों की भागीदारी

इन प्रदर्शनों में जेन जी छात्र देशभर के 10 प्रमुख विश्वविद्यालयों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिनमें तेहरान की 7 सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी शामिल हैं। इल्ना और सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के मुताबिक, मध्य शहर इस्फहान के टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी के साथ ही यज्द और जंजन जैसे शहरों के संस्थानों में भी विरोध प्रदर्शन हुए।

तेहरान के अमीरकबीर यूनिवर्सिटी, ख्वाजे नसीर और बाकी कैंपसों में छात्रों ने हड़ताल, भूख हड़ताल और कैंटीन के घटिया भोजन को सड़क पर फेंककर विरोध जताया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में पुलिस की आँसू गैस, फायरिंग और गिरफ्तारियों की कार्रवाई भी सामने आई हैं, फिर भी छात्र डटकर प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं।

अमीरकबीर यूनिवर्सिटी के पास IRGC के बसिज बलों ने छात्रों पर हमला किया, जिसमें एक छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया और कई को गिरफ्तार किया गया। जेन जी की यह भागीदारी साल 2022 के महसा अमीनी प्रदर्शनों की याद दिलाती है और आंदोलन को नई ताकत दे रही है।

ईरान में आर्थिक उथल-पुथल

ईरान में ये प्रदर्शन देश में जारी आर्थिक संकट को लेकर हो रहे हैं। यह संकट ईरानी मुद्रा ‘रियाल’ की भारी गिरावट से शुरू हुआ, जो आम लोगों की जिंदगी को मुश्किल बना रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों, खराब सरकारी नीतियों और वैश्विक दबाव से अर्थव्यवस्था चरमरा गई, जिससे महँगाई आसमान छूने लगी और लोग सड़कों पर उतर आए।

यूँ तो ईरान की मुद्रा रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहले ही कमजोर थी, लेकिन दिसंबर 2025 में यह ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गई- एक अमेरिकी डॉलर के बदले 14 लाख रियाल। पहले जहाँ एक डॉलर से 50-60 हजार रियाल मिलते थे, अब लाखों रियाल चाहिए। इससे आयात होने वाले सामान जैसे तेल, दवा, अनाज महँगे हो गए। ईरान वैसे भी तेल बेचकर कमाई करता है, लेकिन प्रतिबंध से डॉलर नहीं मिल पाते इसीलिए रिजर्व खत्म हो गए।

देश में महँगाई दर 42 प्रतिशत तक बढ़ गई, यानी पिछले साल की तुलना में चीजें औसतन 42 प्रतिशत महँगी हो गईं। उदाहरण के लिए रोटी, दूध, सब्जी की कीमतें 72 प्रतिशत तक उछल गईं। एक आम परिवार जो पहले एक लाख में गुजारा कर लेता था, अब 2 से 3 लाख भी कम पड़ जाते हैं। इतना सब होने के बाद केंद्रीय बैंक प्रमुख ने इस्तीफा दे दिया क्योंकि वे मुद्रा स्थिर नहीं कर पाए।

इस्लामी शासन से परेशान ईरान

ईरान में जारी प्रदर्शनों में शामिल लोग इस्लामिक रिजीम यानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली इस्लामी सरकार के खिलाफ हैं, जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से चली आ रही है। शुरू में आर्थिक गुस्सा था, लेकिन अब लोग तानाशाही शासन के खिलाफ विद्रोह बना चुके हैं, जहाँ ‘मुल्लाओं को ईरान छोड़ना होगा’ जैसे नारे गूँज रहे हैं।

प्रदर्शनकारी इन्हें ‘मुल्ला तानाशाह’ कहकर कोस रहे हैं, क्योंकि देश का पैसा सैन्य हथियारों, प्रॉक्सी युद्दों (जैसे हिजबुल्लाह, हूती) पर खर्च किया जा रहा है, बजाए जनता की भलाई पर। देश में खासकर महिलाओं के हिजाब कानून और सख्त इस्लामी नियमों से तंग आ चुके हैं।

तेहरान के विश्वविद्यालयों में छात्र ‘इस्लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद’ चिल्ला रहे हैं और धार्मिक प्रतीकों को निशाना बना रहे हैं। व्यापारी भी कह रहे हैं कि रिजीम की नीतियों से अर्थव्यवस्था बर्बाद हुई, न कि अमेरिकी सैंक्शंस से। यह 1979 क्रांति के खिलाफ पहला बड़ा विद्रोह लगता है, जहाँ लोग धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की माँग कर रहे हैं।

ईरान में प्रदर्शन पर अमेरिका का बयान और भूमिका

ईरान में इस्लामी शासन के विरोध में जारी प्रदर्शनों पर अमेरिका ने खुलकर समर्थन जताया है। खासकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों को प्रोत्साहित किया और इस्लामी शासन की आलोचना की। ट्रंप ने ईरान की अर्थव्यवस्था को ‘टूट चुकी’ बताया और कहा कि सरकार हर विरोध को दबाने के लिए लोगों पर गोली चलाती है।

29 दिसंबर 2025 को मार-ए-लागो में इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “ईरान में जब भी दंगे होते हैं या कोई समूह बनता है। वे लोगों पर गोली चला देते हैं। वे लोगों को मार देते हैं।” उन्होंने इस्लामी रिजीम को ‘क्रूर’ करार दिया और कहा कि देश में सालों से असंतोष है, लेकिन रिग चेंज की सीधी माँग नहीं की। ट्रंप ने मुद्रा ‘रियाल’ की गिरावट और महँगाई पर फोकस किया।

UN राजदूत माइक वॉल्टज ने एक्स पर लिखा, “ईरान के लोग आजादी चाहते हैं। हम तेहरान और पूरे देश में प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े हैं।” वहीं अमेरिकी सरकार के फारसी अकाउंट ने कहा कि वाशिंगटन ईरानी लोगों की आवाज को सुनने का समर्थन करता है और रिजीम से भी मौलिक अधिकारों का सम्मान करने को कहा। साथ ही इस्लामी शासन की प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की भी निंदा की। ये बयान प्रदर्शन के तेज करने में सहायक साबित हुए।

बता दें कि ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर सैंक्शंस बढ़ाए हैं, जो आर्थिक संकट की जड़ हैं। लेकिन प्रदर्शनों पर अप्रत्यक्ष समर्थन देकर दबाव बनाया। ईरानी की इस्लामी सरकार ने इन बयानों को हस्तक्षेप बताया है, जबकि राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने बातचीत का संकेत दिया है।

रक्षा मंत्रालय की ₹4666 करोड़ की मेगा डिफेंस डील: 4 लाख स्वदेशी CQB कार्बाइन और ‘ब्लैक शार्क’ टॉरपीडो से लैस होगी सेना, जानें कैसे बढ़ेगी भारत की ताकत

भारतीय रक्षा मंत्रालय ने साल 2025 के जाते-जाते देश की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। मंगलवार (30 दिसंबर 2025) को सरकार ने कुल 4,666 करोड़ रुपए के दो बड़े रक्षा समझौतों पर मुहर लगाई। इस डील के तहत सेना और नौसेना को 4.25 लाख से ज्यादा नई ‘कार्बाइन’ बंदूकें और समंदर की गहराई में तबाही मचाने वाले 48 ‘हैवी वेट टॉरपीडो’ मिलेंगे।

यह कदम न केवल हमारी सैन्य ताकत को कई गुना बढ़ा देगा, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को भी हकीकत में बदलेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि अब हमारे जवान पुराने हथियारों को छोड़, आधुनिक स्वदेशी तकनीक से लैस होकर सरहदों की रक्षा करेंगे।

क्या हैं ये हथियार और कैसे करते हैं काम?

जब हम सेना की ताकत की बात करते हैं, तो ये दोनों हथियार युद्ध के मैदान में पासा पलटने का दम रखते हैं। सबसे पहले बात करते हैं CQB कार्बाइन की, जो असल में एक छोटी और बहुत हल्की ऑटोमेटिक बंदूक है। इसे खास तौर पर उन मौकों के लिए बनाया गया है जब दुश्मन बहुत करीब हो, जैसे कि किसी घर के अंदर छिपे आतंकियों से मुकाबला करना हो या घने जंगलों में आमने-सामने की मुठभेड़ हो।

इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह बहुत छोटी होने के कारण तंग जगहों पर आसानी से घुमाई जा सकती है और पलक झपकते ही ढेर सारी गोलियाँ बरसा देती है, जिससे दुश्मन को संभलने या छिपने का मौका ही नहीं मिलता।

वहीं दूसरी ओर, हैवी वेट टॉरपीडो को आप आसान शब्दों में ‘पानी के नीचे चलने वाली मिसाइल’ कह सकते हैं। ये आकार में बहुत बड़े और बेहद शक्तिशाली होते हैं, जिन्हें हमारी पनडुब्बियों (Submarines) के जरिए समंदर की गहराई से छोड़ा जाता है।

इनका मुख्य काम पानी की सतह पर तैर रहे दुश्मन के बड़े युद्धपोतों या पानी के नीचे छिपी उनकी पनडुब्बियों को ढूँढ निकालना और उन्हें सीधा निशाना बनाकर तबाह करना है। इनके आने से समंदर के अंदर हमारी मारक क्षमता और भी ज्यादा घातक हो जाएगी।

स्वदेशी गन से लैस होंगे जवान, ‘मेक इन इंडिया’ को मिलेगा बढ़ावा

भारतीय थल सेना और नौसेना को और भी आधुनिक बनाने के लिए सरकार 2,770 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। इस भारी-भरकम बजट से 4.25 लाख से भी ज्यादा नई कार्बाइन बंदूकें खरीदी जाएँगी।

सबसे अच्छी बात यह है कि यह पूरा सौदा विदेशी कंपनियों के बजाय भारत की अपनी कंपनियों, जैसे भारत फोर्ज और PLR सिस्टम्स (अडानी डिफेंस और इजरायल की कंपनी का साझा प्रयास) के साथ हुआ है। इससे देश का पैसा देश में ही रहेगा और हमारी सेना को बेहतरीन हथियार मिलेंगे।

इन नई बंदूकों के आने से हमारे जवानों को बहुत बड़ा फायदा होगा। दरअसल, अभी तक हमारे सैनिक पुराने समय के भारी-भरकम हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे, जिन्हें ढोना और इस्तेमाल करना थोड़ा मुश्किल होता था। लेकिन ये नई कार्बाइन वजन में काफी हल्की हैं और चलाने में भी बहुत आसान हैं, जिससे युद्ध या मुठभेड़ के समय जवान और भी फुर्ती से दुश्मन का मुकाबला कर सकेंगे।

यह पूरी डील ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। इन बंदूकों का लगभग 60% हिस्सा भारत फोर्ज कंपनी खुद बनाएगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अब हमें हथियारों के लिए दूसरे देशों का मुँह नहीं ताकना पड़ेगा।

साथ ही, भारत में इनका निर्माण होने से हजारों लोगों के लिए नौकरी के नए रास्ते भी खुलेंगे। अगले 5 सालों के भीतर ये आधुनिक बंदूकें हमारे जांबाज सिपाहियों के हाथों में पहुँच जाएँगी, जिससे उनकी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।

दुश्मन के लिए काल बनेंगे ‘ब्लैक शार्क’

भारतीय नौसेना की मारक क्षमता को और भी घातक बनाने के लिए सरकार ने इटली की कंपनी (WASS) के साथ 1,896 करोड़ रुपए का एक बड़ा समझौता किया है। इस डील के जरिए भारत को 48 ‘ब्लैक शार्क’ टॉरपीडो मिलेंगे, जो अपनी रफ्तार और अचूक निशाने के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। ये टॉरपीडो हमारी नौसेना की उन 6 आधुनिक ‘कलवरी क्लास’ (स्कॉर्पीन) पनडुब्बियों में लगाए जाएँगे, जिन्हें पूरी शान से मुंबई के मझगाँव डॉक में तैयार किया गया है।

इन टॉरपीडो की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनमें दुनिया के सबसे आधुनिक सेंसर लगे हुए हैं, जो दुश्मन की लोकेशन को तुरंत पकड़ लेते हैं। इनकी रफ्तार इतनी तेज है कि एक बार दागे जाने के बाद दुश्मन को बचने या भागने का मौका भी नहीं मिलता।

इन टॉरपीडो की डिलीवरी साल 2028 से शुरू होगी और 2030 तक सभी 48 टॉरपीडो भारत पहुँच जाएँगे। इनके आने के बाद हिंद महासागर में भारत की पकड़ और भी मजबूत हो जाएगी और दुश्मन की कोई भी पनडुब्बी हमारी सीमा में घुसने की हिम्मत नहीं कर पाएगी।

क्यों खास है यह समझौता और भारत को क्या फायदे होंगे?

इस रक्षा सौदे से भारत को तीन बड़े और सीधे फायदे होने वाले हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि अब सेना से पुरानी तकनीक की छुट्टी हो जाएगी। हमारे जवान काफी समय से उन हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे जो अब पुराने पड़ चुके थे। इस डील के बाद हमारे सैनिकों के पास दुनिया के सबसे आधुनिक और खतरनाक हथियार होंगे, जिससे युद्ध के मैदान में उनकी ताकत और सुरक्षा दोनों बढ़ जाएगी।

दूसरा बड़ा फायदा यह है कि इससे देश की प्राइवेट कंपनियों को बहुत मजबूती मिलेगी। यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में हथियार बनाने का काम भारत की निजी कंपनियों को सौंपा गया है। इसका असर सिर्फ बड़ी कंपनियों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की छोटी-छोटी कंपनियों (MSMEs) को भी हथियारों के कल-पुर्जे बनाने का ऑर्डर मिलेगा। इससे न केवल स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि देश के युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण फायदा देश की आर्थिक मजबूती से जुड़ा है। रक्षा मंत्रालय ने इस साल (2025-26) में अब तक 1.82 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के हथियारों का सौदा किया है। इस भारी-भरकम रकम का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों के पास जाने के बजाय भारत की अपनी कंपनियों की जेब में जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश का पैसा देश के अंदर ही रहेगा, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था और भी मजबूत होगी और हम रक्षा के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ेंगे।

‘देश बचाना है तो बंगाल को बचाना होगा’: BJP नेता बीएल संतोष के बयान के मायने, क्या वाकई राजनीतिक से बढ़कर सभ्यतागत है पश्चिम बंगाल की लड़ाई?

बंगाल से लगातार हो रहे घुसपैठ और उसकी वजह से हो रहा डेमोग्राफी बदलाव देश के लिए खतरनाक है। बंगाल की संस्कृति और उसकी पहचान को इससे खतरा पैदा हो गया है। राजनीतिक संरक्षण में हो रहा ये घुसपैठ बंगाल चुनाव के लिए ही अहम नहीं है, बल्कि इससे देश की सुरक्षा, संप्रभुत्ता जुड़ी हुई है। इसलिए बीजेपी नेता बीएल संतोष ने देश को बचाने के लिए बंगाल चुनाव को जीतने पर बल दिया है।

क्या कहा बीजेपी नेता बीएल संतोष ने?

बीजेपी नेता बीएल संतोष ने कहा है कि हमारे लिए बंगाल सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि एक सभ्यता को बचाने की लड़ाई है। उनका मानना है कि भारत को बचाने के लिए बंगाल को बचाना जरूरी है। उन्होंने आगे कहा कि बंगाल में डेमोग्राफी बदलावों को रोकना और हर हाल में सरकार बनाना उनका लक्ष्य है, जिसे वे भारत के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।

सभ्यता बचाने की लड़ाई है बंगाल चुनाव

बीजेपी नेता बीएल संतोष बंगाल चुनाव को सियासी लड़ाई से बढ़कर बंगाल की संस्कृति और पहचान को बचाने की लड़ाई से जोडकर देखते हैं। बंगाल में लगातार हिन्दुओं का पलायन हो रहा है। यहाँ कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दु त्यौहारों का कई बार विरोध किया गया। कई बार दुर्गापूजा विसर्जन और मुहर्रम के जुलूस एक दिन होने पर विसर्जन की तारीख बदल दी गई।

प्रशासन ने दुर्गापूजा उत्सव को कैंसिल कर दिया। यही हाल राम नवमी जुलूस पर भी रहा। कई जगहों पर हिंसा और झड़पें हुई। होली- दिवाली जैसे पर्व मनाने के दौरान भी कई बार विवाद हुए। मार्च 2025 में बसंत उत्सव के दौरान शांतिनिकेतन के सोनाझुरी हाट में पर्यावरण संरक्षण का हवाला देते हुए होली समारोह पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस पर काफी बवाल भी हुआ।

राज्य में बढ़ रहे घुसपैठिए और डेमोग्राफी बदल रहा है

बंगाल में 2011 की जनगणना के मुताबिक, पूरे देश में हिन्दू आबादी घटी है। ये करीब 0.7 फीसदी कम हुई है जबकि पश्चिम बंगाल में हिन्दू आबादी 1.94 फीसदी घटी है। यहाँ मुस्लिम आबादी में 0.8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ये तो 2011 के आंकड़े हैं। इससे पता चलता है कि राज्य में मुस्लिम की तुलना में हिन्दुओं की संख्या तेजी से घट रही है। इस बीच लगातार घुसपैठ बढ़ी है।

ये घुसपैठिए बंगाल के गाँव में घुस कर अपनी पैठ जमा लेते हैं। धीरे धीरे टीएमसी के संरक्षण में पहचान पत्र प्राप्त कर लेते हैं और भारत का नागरिक बन जाते हैं। यही वजह है कि बंगाल में 2001 में मुस्लिम आबादी 25 फीसदी थी, जो 2011 में बढ़कर 27 फीसदी के पार जा चुकी थी। बंगाल की 9.5 करोड़ की आबादी में करीब 2.5 करोड़ मुस्लिम हैं। ये दर्शाता है कि घुसपैठ कितना बड़ा सिरदर्द है।

दरअसल पश्चिम बंगाल में एक घुसपैठिए एक वोटर की तरह है। बांग्ला भाषी होने की वजह से गाँव गाँव में फैले होते हैं। ये लोग पूरे बंगाल में मौजूद हैं, लेकिन बांग्लादेश से सटे मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर जैसे इलाकों में इनकी संख्या 50 फीसदी तक पहुँच चुकी है। इसके अलावा उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना क्षेत्र में इसकी संख्या और ज्यादा है।

मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का शिलान्यास कर चुके पूर्व टीएमसी विधायक हुमायूँ कबीर के मुताबिक मुर्शिदाबाद में 70 फीसदी मुस्लिम आबादी है। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि बंगाल में डेमोग्राफी में कितना बदलाव आया है।

यह कोई इत्तफाक से नहीं है, बल्कि राजनीतिक संरक्षण में किया गया एक सुनियोजित और व्यवस्थित बदलाव है। बीजेपी के मुताबिक, 46 विधानसभा क्षेत्रों में, केवल एक दशक के भीतर मतदाताओं की जनसंख्या में 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। इनमें से ज्यादातर वे जिले हैं, जो बांग्लादेश से सटे हुए हैं। इससे पता चलता है कि डेमोग्राफी में कितना बदलाव आया है।

डेमोग्राफी बदलावों की वजह से सामाजिक तनाव और ध्रुवीकरण बढ़ा है। हिन्दू परिवारों को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा है। हिन्दुओं पर हमले बढ़े हैं।

बंगाल की पहचान और संस्कृति को खतरा

बंगाल में हिंदू परिवारों का लगातार पलायन हो रहा है और पारंपरिक त्योहारों व सांस्कृतिक रीति रिवाजों पर इसका असर पड़ रहा है। बंगाल की मूल पहचान को खतरा पैदा हो रहा है। हाल ही में मुर्शिदाबाद में पूर्व टीएमसी विधायक ने बाबरी मस्जिद बनाने के लिए शिलान्यास किया है। यहाँ बड़ी संख्या में मुस्लिम पहुँच रहे हैं।

अब सवाल ये उठता है कि बाबर जैसे आक्रांताओं के नाम पर मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने का क्या औचित्य है। जब राम जन्मभूमि के निर्माण के साथ ही बाबरी मस्जिद का नामोनिशान मिट गया तो फिर बाबर के नाम पर बंगाल में मस्जिद बनाना सामाजिक समरसता को कमजोर ही करता है। मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से ममता सरकार इसे रोक भी नहीं रही है। बल्कि खुद हुमायूँ कबीर ने बताया है कि बंगाल पुलिस उनकी मदद कर रही है।

माना जाता है कि राज्य की 294 सीटों में से 80-100 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक माने जाते हैं। ऐसे में ममता सरकार लगातार घुसपैठिए को संरक्षण देकर अपना वोट बैंक पुख्ता करने में लगी है। कहा ये भी जाता है कि 2011 और 2016 के चुनाव में ममता बनर्जी की सरकार इस घुसपैठियों के बदौलत सत्ता तक पहुँची। इससे पहले 2006 तक ये वोट बैंक लेफ्ट के साथ था।

बंगाल के घुसपैठ का असर असम, त्रिपुरा से लेकर बाकी पूर्वोत्तर राज्यों में भी पड़ा है। इसलिए असम के सीएम हेमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि घुसपैठियों के बंगाल द्वार को बंद करना देश के लिए बेहद जरूरी है। असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, “यही असली बात है। असम और त्रिपुरा घुसपैठ के खिलाफ लड़ रहे हैं, वहीं बंगाल घुसपैठियों के लिए अपने दरवाज़े खोल रहा है। हमें पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश बॉर्डर पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। होम मिनिस्टर ने एक नेशनल ग्रिड का प्रस्ताव दिया है; हम इसका स्वागत करते हैं।”

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा

बंगाल में घुसपैठ देश की सुरक्षा के लिए भी खतरनाक है। अक्सर घुसपैठिए अवैध कारोबार में संलिप्त होते हैं। अवैध हथियार से लेकर नशे के कारोबार में इनकी भूमिका पाई जाती है। आतंकवाद से लेकर स्थानीय अपराध तक में घुसपैठिए संलिप्त पाए गए। ऐसे में बीजेपी नेता बीएल संतोष ने ठीक ही कहा है कि देश के लिए बंगाल से ममता सरकार का जाना जरूरी है। ये बंगाल की पहचान और संस्कृति के लिए भी जरूरी है।

RSS पर न्यूयॉर्क टाइम्स की ‘फैंटेसी कहानी’, भारत को चलाने वाली ‘सीक्रेट सोसायटी’ बताया: बौद्धिक दिवालियापन है नाजी टैग से डर फैलाने की वामपंथी मीडिया की कोशिश

न्यूयॉर्क टाइम्स ने 26 दिसंबर को ‘From the Shadows to Power: How the Hindu Right Reshaped India’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख को मुजीब मशाल और हरि कुमार ने लिखा है। यह लेख सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की आलोचना भर नहीं है बल्कि समाज के लिए काम कर रहे देश के सबसे बड़े हिंदू संगठन को बदनाम करने की साजिश है।

लेख में एक तरह की वैचारिक कहानी गढ़ी गई है जिसमें RSS को एक रहस्यमय, बेहद ताकतवर और तथाकथित ‘फार-राइट’ गुप्त संगठन के रूप में दिखाया गया है। लेख का पूरा चित्रण ऐसा है मानो RSS भारत का कोई गुप्त ‘इल्यूमिनाटी’ हो, जो पर्दे के पीछे से सब कुछ नियंत्रित कर रहा हो। अगर इस लेख या फिर न्यूयॉर्क टाइम्स और अन्य लेफ्ट-लिबरल मीडिया संस्थानों में छपने वाले ऐसे ही दूसरे लेखों पर भरोसा किया जाए, तो ऐसा बताया जाता है कि RSS ने भारत की संस्थाओं में ‘घुसपैठ’ कर ली है और चुपचाप देश के पंथनिरपेक्ष गणराज्य को कमजोर किया जा रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

मसला यह नहीं है कि न्यूयॉर्क टाइम्स या कोई अन्य मीडिया संस्थान RSS की आलोचना करता है। भारत में काम करने वाले और देश की राजनीति को प्रभावित करने वाले संगठनों पर सवाल उठाना उनका अधिकार है। असली समस्या यह है कि यह आलोचना किस तरह की जा रही है।

इन लेखों में इस्तेमाल की गई भाषा बेहद पूर्वाग्रह से भरी हुई है। इतिहास को चुनिंदा तरीके से पेश किया गया है और ठोस सबूतों की जगह इशारों और आरोपों ने ले ली है। इन लेखों की सामग्री एक जानी-पहचानी लेफ्ट-लिबरल सोच को सामने लाती है।

यह वही सोच है, जिसमें हिंदुओं के संगठित होने को ही अपने आप में खतरनाक बताया जाता है। ऐसा दिखाने की कोशिश की जाती है मानो धार्मिक नारे लगाते हुए हिंदू ही खुद को और देश की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को नुकसान पहुँचा रहे हों।

‘फार-राइट’ शब्द का इस्तेमाल, समझाने के लिए नहीं बल्कि ठप्पा लगाने के लिए

न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लेख में बार-बार RSS को ‘फार-राइट हिंदू राष्ट्रवादी संगठन’ बताया गया है। यह शब्द सीधे तौर पर पश्चिमी राजनीति की शब्दावली से लिया गया है और बिना किसी भारतीय संदर्भ के इस्तेमाल किया गया है। भारत और पश्चिमी देशों में ‘फार-राइट’ की अवधारणा पूरी तरह अलग है।

भारत में RSS न तो कोई राजनीतिक पार्टी है और न ही कोई गुप्त या हिंसक संगठन। यह एक स्वयंसेवक आधारित सांस्कृतिक संगठन है, जो बीते 100 वर्षों से सामाजिक जीवन में काम कर रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

इसके बावजूद लेख में ‘फार-राइट’ शब्द को किसी विश्लेषण की श्रेणी के रूप में नहीं बल्कि पहले से तय निष्कर्ष या एजेंडे की तरह इस्तेमाल किया गया है। जैसे ही पश्चिमी संदर्भ वाला ‘फार-राइट’ का ठप्पा किसी भारतीय संगठन पर लगाया जाता है, लेखक भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं को समझने और उनसे जुड़ने की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। इसके बाद जन-आंदोलन से लेकर वैचारिक प्रभाव तक हर चीज को अपने आप ‘उग्रवाद’ के रूप में पेश किया जाने लगता है।

‘नाजी’ शब्द बोले बिना नाजी जैसा चित्रण

न्यूयॉर्क टाइम्स के इस लेख में सीधे तौर पर ‘नाजी’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। न ही RSS की तुलना खुलकर हिटलर या थर्ड राइख से की गई है। यह जानबूझकर किया गया है। इसकी जगह लेख इशारों और जोड़-तोड़ के सहारे पाठकों को एक तय नतीजे तक पहुँचाने की कोशिश करता है। इसके लिए बार-बार फासीवादी दौर की तस्वीरों और संदर्भों का इस्तेमाल किया गया है।

लेख में कहा गया है कि RSS के शुरुआती नेताओं ने 1930 और 1940 के दशक में यूरोप की फासीवादी पार्टियों के राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरणा ली थी। साथ ही एमएस गोलवलकर के लेखन का जिक्र करते हुए उसे हिटलर द्वारा यहूदियों के साथ किए गए व्यवहार से जोड़ा गया है। इन ऐतिहासिक संदर्भों की पड़ताल नहीं की गई बल्कि इन्हें इस तरह इस्तेमाल किया गया है कि आज के RSS को यूरोपीय फासीवाद के नैतिक बोझ से जोड़ दिया जाए।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

पूरे लेख में इस्तेमाल की गई भाषा भी इसी धारणा को मजबूत करती है। ‘शैडोई कबाल’ (गुप्त साजिश करने वाला गुट), ‘गुप्त संगठन’, ‘अर्धसैनिक अनुशासन’, ‘सुप्रीमेसी’ (श्रेष्ठता), ‘संस्थाओं में घुसपैठ’ जैसे शब्द वही हैं जिन्हें पश्चिमी मीडिया आमतौर पर तानाशाही आंदोलनों के लिए इस्तेमाल करता है।

सीधे आरोप लगाए बिना लेकिन फासीवादी संकेतों से पूरी कहानी भरकर लेख एक तरह का शक पैदा करता है। इस तरीके से लेख लिखने वालों को यह कहने की गुंजाइश मिल जाती है कि उन्होंने कोई सीधा आरोप नहीं लगाया जबकि असल उद्देश्य पूरा हो जाता है। नतीजतन, हिंदुओं के सामाजिक संगठन को ही अपने आप में खतरनाक दिखाने की कोशिश की जाती है।

राजनीतिक संगठन से ‘गुप्त संस्था’ तक का गढ़ा गया सफर

RSS से जुड़े नेता जब राजनीति में आते हैं, तो वे सार्वजनिक मंचों से भाषण देते हैं और अपनी पहचान छिपाते नहीं हैं। RSS से जुड़े लोग खुले तौर पर स्थानीय बैठकों का आयोजन करते हैं और मोहल्लों के पार्कों में रोज शाखाएँ लगाते हैं। यह कोई छुपी हुई गतिविधि नहीं है। इन शाखाओं में कोई भी व्यक्ति आ सकता है, चाहे वह संगठन का सदस्य हो या नहीं।

इसके बावजूद न्यूयॉर्क टाइम्स RSS को बार-बार ‘शेडो’ और ‘सीक्रेट’ संगठन बताता है। लेख में संगठन को निष्पक्ष रूप से देखने या कोई अलग नजरिया रखने की कोशिश नहीं की गई। लेख में दिखाई गई तस्वीर और RSS की वास्तविक स्थिति के बीच का फर्क कहीं भी साफ नहीं किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी अपने RSS से जुड़ाव को नहीं छिपाया। वे खुद को संगठन का ‘कार्यकर्ता’ कहते रहे हैं। केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, न्यायाधीश, अधिकारी और अन्य पेशेवर लोग भी खुले तौर पर संघ से अपने संबंध स्वीकार करते रहे हैं।

फिर भी RSS को भारत की राजनीति और समाज का कोई गुप्त ‘इल्यूमिनाटी’ दिखाया जाता है। जबकि असल में गुप्त संगठन ऐसे नहीं होते, जहाँ सदस्य खुलेआम अपनी पहचान बताते फिरें और सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लें। दरअसल, न्यूयॉर्क टाइम्स की असहजता गोपनीयता से नहीं बल्कि संगठन के बड़े आकार से जुड़ी दिखती है।

सबूत के बिना ‘घुसपैठ’ का आरोप

लेख में दावा किया गया है कि RSS ने न्यायपालिका, पुलिस, मीडिया और शिक्षा संस्थानों में ‘घुसपैठ’ कर ली है। यह एक गंभीर आरोप है लेकिन इसके लिए कोई सबूत नहीं दिया गया है। ना कोई दस्तावेज, ना कोई आदेश प्रणाली, ना कोई निर्देश और ना ही कोई वित्तीय कड़ी दिखाई गई है।

इसके बजाय विचारधारा की समानता और संगठनों के आपसी संबंधों को ही साजिश का प्रमाण मान लिया गया है। इसी तर्क से देखा जाए तो दशकों से विश्वविद्यालयों पर हावी वामपंथी शिक्षाविद भी ‘घुसपैठ’ के दायरे में आएँगे। लेकिन जब ऐसे आरोप उठते हैं, तो लेफ्ट-लिबरल इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हैं।

लेख में ‘एफिलिएट’ शब्द का भी बार-बार इस्तेमाल किया गया है। किसी भी हिंदू मुद्दे से जुड़े समूह की गतिविधि को बिना जिम्मेदारी तय किए सीधे RSS से जोड़ दिया जाता है।

फासीवाद और गाँधी की हत्या का संदर्भ लेकिन अदालत के फैसले का नहीं

RSS पर लिखते समय पश्चिमी मीडिया अक्सर शुरुआती संघ विचारकों को फासीवाद से जोड़ता है और महात्मा गाँधी की हत्या का मुद्दा बार-बार उठाता है। इस लेख में भी वही तरीका अपनाया गया है। जबकि भारतीय अदालतें दशकों पहले RSS को एक संगठन के रूप में इस मामले में बरी कर चुकी हैं।

इसके बावजूद न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे संस्थान उस कानूनी निष्कर्ष तक जानबूझकर नहीं पहुँचते और संकेतों को अधूरा छोड़ देते हैं ताकि संदेह बना रहे। गांधी हत्या के लिए RSS को जिम्मेदार ठहराने का दावा बिना न्यायिक फैसले पर बात किए आसानी से किया जाता है क्योंकि यह तय की गई कहानी के अनुकूल बैठता है।

यह इतिहास की निष्पक्ष जाँच नहीं बल्कि एक तय नैरेटिव को बनाए रखने की कोशिश है। RSS को लगातार नैतिक रूप से संदिग्ध दिखाया जाता है क्योंकि अगर अदालतों के फैसलों को स्वीकार कर लिया जाए तो पूरी कहानी ही बिखर जाएगी।

बिना पूरे संदर्भ के बुलडोजर का जिक्र

इसके बाद लेख उत्तर प्रदेश के हिस्से पर आता है, जो पहले से तय ढाँचे पर चलता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद से पश्चिमी मीडिया लगातार उनकी नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश करता रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

लेख में पूरा घटनाक्रम ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर विवाद के इर्द-गिर्द गढ़ा गया है, जिससे राज्य के कुछ हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव फैला। हालाँकि, यह नहीं बताया गया कि हालात तेजी से बिगड़कर कानून-व्यवस्था की समस्या बन गए थे, जहाँ हिंसा भड़काने की कोशिश हुई और मुख्यमंत्री के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी हो गया।

इसी तरह कांवड़ यात्रा के दौरान शांतिपूर्ण श्रद्धालुओं पर फूल बरसाने को भी पश्चिमी मीडिया ने सवालों के घेरे में रखा जबकि उत्तर प्रदेश में पुलिस कार्रवाई हमेशा कानून-व्यवस्था बिगड़ने की घटनाओं के बाद हुई है। ज्ञानवापी और संभल मस्जिद जैसे मामलों में भी दंगाइयों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की जिसे योगी आदित्यनाथ की सख्ती ने बड़े टकराव में बदलने से रोका।

बुलडोजर, गिरफ्तारी, इंटरनेट बंद और पुलिस कार्रवाई को लेख में धार्मिक दमन बताया गया है लेकिन उन घटनाओं का जिक्र नहीं है, जिनकी वजह से सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी। जब योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभाली थी उस वक्त प्रदेश में दंगे, गैंगवार और अपराध आम थे। 2017 के बाद कानून-व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया है। बुलडोजर कार्रवाई भी तभी होती है, जब इमारत अवैध हो और उसका संबंध अपराधी से साबित हो।

इस लेख में इस पूरे क्रम को हटाकर प्रशासनिक कार्रवाई को वैचारिक उत्पीड़न बना दिया गया है। शासन को अपने आप तानाशाही और जनसमर्थन को भीड़ की मानसिकता बताकर पेश किया गया है।

जब सेवा को फासीवादी ढाँचा बताया जाने लगे

पश्चिमी और लेफ्ट-लिबरल मीडिया जिसमें भारतीय भी शामिल हैं, अक्सर हिंदुओं से जुड़ी हर गतिविधि को नकारात्मक रूप में पेश करता है। हाल ही में ‘द कारवां’ ने RSS से जुड़े स्कूलों, छात्रावासों, अनाथालयों, वृद्धाश्रमों, चिकित्सा सेवाओं, योग केंद्रों और आपदा राहत कार्यों को ‘आखिरी छोर तक वैचारिक नियंत्रण’ का जरिया बताया। न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख में भी इसी रिपोर्ट का हवाला दिया गया है।

यह नजरिया असल चिंता को उजागर करता है। समस्या काम से नहीं बल्कि संगठन से है। अगर यही सेवाएँ किसी विदेशी फंडिंग वाले NGO या सोरोस-USAID से जुड़े संस्थान करते तो उनकी तारीफ होती। यहाँ आलोचना राजनीतिक नहीं रह जाती बल्कि सभ्यतागत हो जाती है। जहाँ हिंदू समाज की स्वयंसेवी व्यवस्था को ही अवैध ठहराया जाता है।

लेफ्ट-लिबरल मीडिया को असल बेचैनी किस बात से है

न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख के पीछे एक छिपा हुआ डर दिखता है। RSS ने बिना विदेशी फंडिंग, बिना अभिजात (एलीट) वर्ग की मंजूरी और बिना पश्चिमी उदारवाद के अनुरुप बने, पीढ़ियों तक चलने वाली संस्थाएँ खड़ी की हैं। भारत में ऐसा कोई दूसरा संगठन नहीं कर पाया।

RSS सम्मेलन नहीं बल्कि कार्यकर्ता तैयार करता है। यह दानदाताओं पर नहीं बल्कि स्वयंसेवकों पर चलता है। यह अनुदानों और नौकरशाही पर नहीं बल्कि विकेंद्रीकरण पर आधारित है। RSS की यही स्थायित्व और स्वतंत्रता वाम-उदारवादी और पश्चिमी मीडिया को साजिश जैसी लगती है, क्योंकि वे या तो इस मॉडल को समझना नहीं चाहते या वैचारिक विरोध के कारण समझने से इनकार करते हैं।

लोकतंत्र को माना जाता है, सम्मान नहीं दिया जाता

न्यूयॉर्क टाइम्स का लेख बार-बार यह संकेत देता है कि भले ही भारत में चुनाव होते हों लेकिन असल सत्ता RSS के हाथ में है। संस्थाएँ काम तो कर रही हैं लेकिन उन्हें ‘कब्जे में लिया गया’ बताया जाता है। चुनावी जीत को जनसमर्थन नहीं बल्कि संगठन की चालाकी के रूप में समझाया जाता है। इस तरह पश्चिमी टिप्पणीकार ना कहते हुए भी भारतीय लोकतंत्र पर सवाल खड़े कर देते हैं।

जब राजनीतिक नतीजे उनकी सोच के मुताबिक नहीं होते, तो लोकतंत्र को ही कमजोर बताया जाने लगता है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से पश्चिमी मीडिया बार-बार यह दावा करता रहा है कि भारत में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है या देश तानाशाही की ओर बढ़ गया है।

पत्रकारिता के नाम पर डर की कहानी

इसमें कोई शक नहीं कि RSS की आलोचना हो सकती है। अगर किसी को लगता है कि संगठन ने कुछ गलत किया है, तो सवाल उठाना उसका अधिकार है। उसके विचार, राजनीति और प्रभाव पर चर्चा होनी चाहिए लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स ने जो पेश किया है, वह आलोचना नहीं बल्कि डर पर आधारित कहानी है।

भारी-भरकम शब्दों, अधूरे ऐतिहासिक संदर्भों और सभ्यतागत गलतफहमी के जरिए एक नैरेटिव गढ़ा गया है। RSS को एक सबसे शक्तिशाली गुप्त संगठन बताकर और नाजी से तुलना दोहराकर लेख भारत से ज्यादा लेफ्ट-लिबरल सोच की उस परेशानी को दिखाता है, जो यह स्वीकार नहीं कर पाती कि हिंदू समाज अपने तरीके से संगठित हो सकता है। RSS किसी ‘छाया से निकलकर’ नहीं आया। वह हमेशा सबके सामने रहा है। असल परेशानी यह है कि अब वह अपने अस्तित्व के लिए किसी से अनुमति नहीं माँगता है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

हम रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार, 2025 में राष्ट्रीय मिशन के रूप में अपनाए गए सुधार: PM मोदी का दुनिया को संदेश, कहा- भारत पर भरोसा बनाए रखें

भारत वैश्विक ध्यान का केंद्र बनकर उभरा है। यह हमारे लोगों के रचनात्मक उत्साह के कारण संभव हुआ है। आज, दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देखती है। वे अगली पीढ़ी के उन सुधारों की सराहना करते हैं जिनसे प्रगति की गति तेज हुई है, जो राष्ट्र की विकास क्षमता को और अधिक सशक्त बनाते हैं।

मैं अनेक लोगों से कहता रहा हूँ कि भारत रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार हो चुका है। इस रिफॉर्म एक्सप्रेस का मुख्य आधार भारत की जनसंख्या, हमारी युवा पीढ़ी और हमारे लोगों का अदम्य साहस है।

2025 को भारत के लिए एक ऐसे वर्ष के रूप में याद किया जाएगा जब उसने पिछले 11 वर्षों में हासिल की गई उपलब्धियों के आधार पर सुधारों को एक सतत राष्ट्रीय मिशन के रूप में अपनाया। हमने संस्थानों का आधुनिकीकरण किया, शासन को सरल बनाया और दीर्घकालिक, समावेशी विकास की नींव को मजबूत किया।

हमने उच्च आकांक्षाओं, तेज क्रियान्वयन और गहन परिवर्तन के साथ निर्णायक रूप से आगे बढ़ने का कार्य किया। ये सुधार नागरिकों को गरिमा के साथ जीवन जीने में सक्षम बनाने, उद्यमियों को आत्मविश्वास के साथ नवाचार करने और संस्थानों को स्पष्टता व विश्वास के साथ कार्य करने योग्य बनाने से जुड़े हैं।

आइए, किए गए सुधारों के कुछ उदाहरणों पर गौर करें-

जीएसटी रिफॉर्म:

• 5% और 18% की दो-स्तरीय टैक्स प्रणाली लागू की गई है।

• घरेलू उपभोक्ताओं, एमएसएमई, किसानों और श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर बोझ कम किया गया।

• इसका उद्देश्य विवादों में कमी लाना और अनुपालन को बेहतर बनाना है।

• इस रिफॉर्म से उपभोक्ता भावना और माँग में वृद्धि हुई है। त्योहारी सीजन में बिक्री बढ़ी है।

मध्यम वर्ग को अभूतपूर्व राहत:

• पहली बार, 12 लाख रुपए तक की वार्षिक आय वाले व्यक्तियों को कोई इनकम टैक्स नहीं लगा।

• 1961 के पुराने इनकम टैक्स एक्ट को आधुनिक और सरल इनकम टैक्स एक्ट, 2025 से प्रतिस्थापित किया गया।

• ये सुधार मिलकर भारत को एक पारदर्शी, तकनीकी-आधारित टैक्स प्रशासन की ओर ले जाते हैं।

छोटे और मध्यम बिजनेस को बढ़ावा:

• ‘छोटी कंपनियों’ की परिभाषा का विस्तार कर 100 करोड़ रुपए तक के टर्नओवर वाली कंपनियों को शामिल किया गया।

• हजारों कंपनियों के लिए संचालन का बोझ और उससे जुड़ी लागत कम होगी।

100% एफडीआई इंश्योरेंस रिफॉर्म:

• भारतीय इंश्योरेंस कंपनियों में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी गई है।

• इससे इंश्योरेंस कवरेज और नागरिकों की सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा।

• प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ-साथ, लोगों को बेहतर इंश्योरेंस विकल्प और बेहतर सेवा वितरण भी मिलेगा।

सिक्योरिटी मार्केट रिफॉर्म:

• सिक्योरिटी मार्केट कोड बिल संसद में पेश किया गया है। यह एसईबीआई में शासन मानकों को मजबूत करेगा, निवेशकों की सुरक्षा बढ़ाएगा, संचालन का बोझ कम करेगा और एक विकसित भारत के लिए तकनीकी -आधारित सिक्योरिटी मार्केट को सक्षम बनाएगा।

• रिफॉर्म से संचालन और अन्य अतिरिक्त खर्चों में कमी के कारण बचत सुनिश्चित होगी।

मैरीटाइम और ब्लू इकोनॉमी रिफॉर्म्स:

• संसद के एक ही सत्र, मानसून सत्र में, पांच ऐतिहासिक मैरीटाइम एक्ट पारित किए गए: बिल ऑफ लैडिंग एक्ट, 2025; माल ढुलाई एक्ट, 2025; तटीय शिपिंग एक्ट, 2025; मर्चेंट शिपिंग एक्ट, 2025; और भारतीय बंदरगाह एक्ट, 2025।

• ये सुधार दस्तावेजीकरण को सरल बनाते हैं, विवाद समाधान को आसान करते हैं और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करते हैं।

• 1908, 1925 और 1958 के पुराने कानूनों को भी प्रतिस्थापित किया गया।

जन विश्वास… अपराधीकरण के युग का अंत:

• सैकड़ों पुराने कानूनों को निरस्त कर दिया गया है।

• रिपीलिंग और संशोधन बिल, 2025 के माध्यम से 71 अधिनियम निरस्त किए गए हैं।

व्यापार करने में सुगमता को बढ़ावा:

• सिंथेटिक फाइबर, धागे, प्लास्टिक, पॉलिमर और बेस मेटल्स से संबंधित कुल 22 QCOs रद्द किए गए, जबकि विभिन्न स्टील, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल, एलॉय और उपभोक्ता उत्पाद श्रेणियों में 53 QCOs निलंबित किए गए, जिनमें औद्योगिक और उपभोक्ता सामग्रियों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है।

• इससे परिधान निर्यात में भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी; जूते, ऑटोमोबाइल जैसे विभिन्न उद्योगों में उत्पादन लागत कम होगी; घरेलू उपभोक्ताओं के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स, साइकिल और ऑटोमोटिव उत्पादों की कीमतें कम होंगी।

ऐतिहासिक लेबर रिफॉर्म्स:

• श्रम कानूनों को नया रूप दिया गया है, जिसमें 29 बिखरे हुए श्रम कानूनों को मिलाकर चार आधुनिक श्रम संहिताएँ बनाई गईं।

• भारत ने एक ऐसा लेबर फ्रेमवर्क तैयार किया है जो श्रमिकों के हितों की रक्षा करते हुए व्यावसायिक इकोसिस्टम को बढ़ावा देता है।

• ये सुधार उचित वेतन, समय पर वेतन भुगतान, बेहतर औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थलों पर केंद्रित हैं।

• ये कार्यबल में महिलाओं की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करते हैं।

• संविदा श्रमिकों सहित असंगठित श्रमिकों को ESIC और EPFO के अंतर्गत लाया गया है, जिससे औपचारिक कार्यबल का दायरा बढ़ा है।

भारतीय उत्पादों के लिए विविध और विस्तारित बाजार:

न्यूजीलैंड, ओमान और ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौते किए गए हैं। इनसे निवेश बढ़ेगा, रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय उद्यमियों को भी प्रोत्साहन मिलेगा। ये वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी भागीदार के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत करते हैं।

स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन से मिलकर बने यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) लागू हो गया है। यह विकसित यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत का पहला मुक्त व्यापार समझौता है।

परमाणु ऊर्जा रिफॉर्म्स:

शांति अधिनियम भारत की स्वच्छ ऊर्जा और तकनीकी यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

• यह परमाणु विज्ञान और तकनीकी के सुरक्षित, संरक्षित और उत्तरदायित्वपूर्ण विस्तार के लिए एक मजबूत ढांचा सुनिश्चित करता है।

• यह भारत को एआई युग की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम बनाता है, जैसे डेटा सेंटर, उन्नत निर्माण, ग्रीन हाइड्रोजन और उच्च-तकनीकी उद्योगों को ऊर्जा प्रदान करना।

• यह स्वास्थ्य सेवा, कृषि, खाद्य सुरक्षा, जल प्रबंधन, उद्योग, अनुसंधान और पर्यावरणीय स्थिरता में परमाणु तकनीक के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देता है, जिससे समावेशी विकास और जीवन की बेहतर गुणवत्ता को समर्थन मिलता है।

• यह निजी क्षेत्र की भागीदारी, नवाचार और कौशल विकास के लिए नए रास्ते खोलता है। यह भारत के युवाओं को अत्याधुनिक तकनीकी और अगली पीढ़ी के ऊर्जा समाधानों में नेतृत्व करने के अवसर प्रदान करता है।

निवेशकों, नवप्रवर्तकों और संस्थानों के लिए भारत के साथ साझेदारी करने, निवेश करने, नवाचार करने और एक स्वच्छ, लचीला और भविष्य के लिए तैयार ऊर्जा इकोसिस्टम का निर्माण करने का यह एक उपयुक्त अवसर है।

ग्रामीण रोजगार गारंटी में ऐतिहासिक रिफॉर्म:

• विकसित भारत-G RAM G एक्ट, 2025 के तहत रोजगार गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है।

• इससे गांवों के इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका को सुदृढ़ करने पर अधिक व्यय होगा।

• इसका उद्देश्य ग्रामीण श्रम को उच्च आय और बेहतर संपत्ति सुनिश्चित करने का साधन बनाना है।

शिक्षा रिफॉर्म्स:

संसद में बिल पेश किया गया है।

• एक एकल, एकीकृत उच्च शिक्षा नियामक स्थापित किया जाएगा।

• यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई जैसे कईबहुस्तरीय संस्थाओं को विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान से प्रतिस्थापित किया जाएगा।

• संस्थागत स्वायत्तता को मजबूत किया जाएगा और नवाचार एवं अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाएगा।

2025 के सुधारों की महत्ता न केवल उनके व्यापक दायरे में है, बल्कि उनके अंतर्निहित दर्शन में भी है। हमारी सरकार ने आधुनिक लोकतंत्र की सच्ची भावना के अनुरूप नियंत्रण के स्थान पर सहयोग और विनियमन के स्थान पर सुविधा प्रदान करने को प्राथमिकता दी है।

ये सुधार सहानुभूति के साथ तैयार किए गए हैं, जिनमें छोटे व्यवसायों, युवा पेशेवरों, किसानों, श्रमिकों और मध्यम वर्ग की वास्तविकताओं को ध्यान में रखा गया है। ये परामर्श द्वारा आकारित, आंकड़ों द्वारा निर्देशित और भारत के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित हैं। ये सुधार नियंत्रण-आधारित अर्थव्यवस्था से विश्वास-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने के हमारे दशकों पुराने प्रयासों को गति प्रदान करते हैं, जिसमें नागरिक को केंद्र में रखा गया है।

इन सुधारों का उद्देश्य एक समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना है। विकसित भारत का निर्माण हमारी विकास यात्रा का मार्गदर्शक सिद्धांत है। हम आने वाले वर्षों में भी सुधार एजेंडा को आगे बढ़ाते रहेंगे।

मैं भारत और विदेश में सभी से आग्रह करता हूँ कि वे भारत के विकास वृत्तांत से अपना जुड़ाव और मजबूत करें। भारत पर भरोसा बनाए रखें और हमारे लोगों में निवेश करते रहें!

(प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह लेख अपने ब्लॉग पर लिखा है, आप इस लिंक पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं)

क्या इथेनॉल फैक्ट्रियाँ सच में जानलेवा प्रदूषण फैलाती हैं? अनाज आधारित प्लांट ZLD तकनीक से सुरक्षित, लेकिन नियमों का पालन जरूरी: जानें- क्यों मचा है राजस्थान में बवाल

राजस्थान के हनुमानगढ़ के टिब्बी और संगरिया में अनाज आधारित इथेनॉल फैक्ट्री लगाने का फैसला हुआ, तो लगा राजस्थान में अब इस तरह के उद्योगों की बाढ़ आ जाएगी। अशोक गहलोत के समय एक कार्यक्रम में चंडीगढ़ बेस्ड कंपनी ने हनुमानगढ़ के चावल बेल्ट में इथेनॉल फैक्ट्री लगाने का ऐलान किया, जिसमें ₹450 करोड़ का निवेश होना तय हुआ था। जमीन ले ली गई। प्रक्रिया पूरी हो गई और फिर तभी यहाँ किसानों ने बीते कई माह से मोर्चा संभाल लिया।

आरोप लगाया गया कि इस फैक्ट्री की वजह से मिट्टी दूषित हो जाएगी। भूमिगत जल खराब हो जाएगा। चिमनी से निकले धुएँ से वातावरण जहरीला हो जाएगा। लोगों में बीमारियाँ फैलेंगी और विकास के नाम पर हर तरफ विनाश हो जाएगा। इसके बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। कई दिनों तक शांति से विरोध हुआ और फिर विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप से लिया। फैक्ट्री की बाउंड्री वॉल गिरा दी गई, जमकर हंगामा हुआ।

कॉन्ग्रेस जो अब विपक्ष में आ चुकी है, उसके सांसद-विधायक हिंसा की अगुवाई करने लगे। आखिरकार किसानों के लगातार विरोध-प्रदर्शन के बाद फैक्ट्री प्रबंधन ने तय किया कि वो अब हनुमानगढ़ में अपनी इथेनॉल फैक्ट्री नहीं लगाएगी

इस घटनाक्रम के दूसरे ही दिन हनुमानगढ़ के संगरिया में लगने जा रही दूसरी फैक्ट्री को लेकर बवाल शुरू हो गया। महापंचायतें बुलाई जाने लगी। पंजाब जैसे राज्यों से प्रदर्शनकारी हनुमानगढ़ पहुँचे थे, अब वो संगरिया का रुख करने वाले हैं। बहरहाल, ये सब इसलिए बताया जा रहा है, ताकि आपके मन भी सवाल उठे कि क्या वाकई इथेनॉल की फैक्ट्री लगने से इतनी व्यापक तबाही आ जाएगी कि हर तरफ मातम मच जाएगा?

सवाल ये है कि क्या इथेनॉल फैक्ट्री से इतनी तबाही होगी भी या फिर ये सिर्फ डर की वजह से है। दरअसल, 3 साल पहले पंजाब के फिरोजपुर जिले के जीरा कस्बे में विरोध प्रदर्शन की वजह से एक इथेनॉल फैक्ट्री बंद की जा चुकी है। जीरा का यह प्लांट पहले 2006 में एक डिस्टिलरी के रूप में शुरू हुआ था और 2014 में इसे इथेनॉल उत्पादन इकाई में बदल दिया गया. प्लांट के आसपास के गांवों के निवासियों ने शिकायत की थी कि इससे ज़हरीला कचरा निकल रहा है, जिससे भूजल और जमीन प्रदूषित हो रही है।

यह मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुँचा, जहाँ 2023 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक रिपोर्ट दाख़िल की। रिपोर्ट में औद्योगिक इकाई के आसपास के इलाक़ों में भूजल और मिट्टी के गंभीर रूप से प्रदूषित होने की बात कही गई थी। लगातार बढ़ते विरोध के बीच जुलाई 2022 में जीरा का यह प्लांट बंद कर दिया गया था। अब इसी तरह के प्रदूषण के डर की वजह से इस फैक्ट्री का विरोध किया जा रहा है।

हालाँकि सच ये है कि जीरा की फैक्ट्री एक स्थानीय अकाली नेता के मालिकाना हक वाली फैक्ट्री थी। जिसकी प्रदूषण संबंधी अनदेखियों के चलते इतना नुकसान हुआ। चूँकि जीरा में नुकसान सामने आ चुका है, तो लोगों में डर है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या वाकई इथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्रियाँ इतनी ही घातक होती हैं या फिर जीरा का मामला एक अपवाद है?

क्या इथेनॉल फैक्ट्रियों का प्रदूषण जानलेवा है?

इथेनॉल प्लांट्स (विशेषकर जो अनाज/चावल/मक्का आधारित होते हैं) को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा ‘Red Category’ (लाल श्रेणी) के उद्योगों में रखा जाता है। इसका अर्थ है कि अगर आधुनिक तकनीक का उपयोग न हो, तो ये आत्यधिक जानलेवा और प्रदूषणकारी हो सकते हैं। यहाँ ये ध्यान देना है कि ये फैक्ट्री गन्ना नहीं, चावल से चलती।

क्या प्रदूषण को रोका जा सकता है?

तकनीकी पक्ष के साथ जवाब दें तो हाँ, आधुनिक तकनीक से इसे 99% तक नियंत्रित किया जा सकता है। आज के समय में सरकार ने इथेनॉल प्लांट्स के लिए ZLD (Zero Liquid Discharge) तकनीक अनिवार्य कर दी है। इसमें फैक्ट्री से एक बूंद भी गंदा पानी बाहर नहीं निकलना चाहिए। फैक्ट्री को पानी को रिसाइकिल करना होता है और बचे हुए ठोस कचरे (DDGS) को सुखाकर पशु आहार के रूप में बेचा जाता है। वहीं, हवा के प्रदूषण को रोकने के लिए चिमनियों में ESP (Electrostatic Precipitators) लगाना अनिवार्य है जो हवा में राख के कणों को जाने से रोकता है।

अनाज से इथेनॉल और गन्ने से इथेनॉल बनाने में मुख्य अंतर

इथेनॉल एक जैव ईंधन है जो मुख्य रूप से किण्वन (Fermentation) और आसवन (Distillation) प्रक्रिया से बनता है। भारत में यह पेट्रोल में मिलाकर उपयोग होता है। अनाज (जैसे मक्का, चावल, क्षतिग्रस्त अनाज) और गन्ना दोनों से इथेनॉल बनता है, लेकिन प्रक्रिया, उपज, पर्यावरण प्रभाव और लागत में काफी अंतर है।

कच्चा माल और प्रक्रिया का अंतर

गन्ने से इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया: गन्ने को कुचलकर रस निकाला जाता है। चीनी बनाने के बाद बचा मोलासेस (गुड़ की गाढ़ी चाशनी), B-हैवी मोलासेस या सीधे गन्ने का रस/सिरप उपयोग होता है। इसमें शुगर (सुक्रोज) सीधे यीस्ट से किण्वित होकर इथेनॉल बनाती है। प्रक्रिया सरल और तेज है।

अनाज से इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया: अनाज (मक्का, चावल आदि) में स्टार्च होता है। पहले स्टार्च को पीसकर गर्म पानी में मिलाया जाता है, फिर एंजाइम (अमाइलेज) से शुगर में बदला जाता है (सैकरीफिकेशन)। उसके बाद यीस्ट से किण्वन होता है। यह प्रक्रिया लंबी और अधिक ऊर्जा वाली है।

उपज (यील्ड) और दक्षता: अनाज से प्रति टन कच्चे माल से अधिक इथेनॉल मिलता है (चावल से 450-480 लीटर, अन्य अनाज से 380-460 लीटर)। वहीं गन्ने की मोलासेस से कम उपज होती है, लेकिन गन्ने की प्रक्रिया में बगासे (खोई) से बिजली बनाई जा सकती है, जो ऊर्जा बचाती है।

भारत में इथेनॉल उत्पादन की वर्तमान स्थिति: भारत में इथेनॉल पहले गन्ना मुख्य स्रोत था, लेकिन अब अनाज (खासकर मक्का) से अधिक इथेनॉल बन रहा है। साल 2023-24 में कुल इथेनॉल का 60% अनाज से और 40% गन्ने से आया। दोनों तरीके भारत के 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य (2025 तक) के लिए जरूरी हैं, लेकिन अनाज आधारित उत्पादन अधिक टिकाऊ और विविधता वाला विकल्प है। ऐसे में अब सरकार अनाज आधारित डिस्टिलरी को प्रोत्साहन दे रही है।

चावल (अनाज) से इथेनॉल vs गन्ना से इथेनॉल बनाने में प्रदूषण की तुलना

राजस्थान में चावल आधारित इथेनॉल प्लांट की योजना है, जो अनाज (ग्रेन-बेस्ड) श्रेणी में आता है। दोनों प्रक्रियाओं में मुख्य अंतर प्रदूषण के स्तर में है- गन्ना आधारित (मोलासेस) प्रक्रिया ज्यादा प्रदूषण फैलाती है, खासकर पानी और मिट्टी का। अनाज आधारित (जैसे चावल या मक्का) कम प्रदूषण वाली और पर्यावरण अनुकूल मानी जाती है।

प्रदूषण कौन ज्यादा फैलाता है?

गन्ना आधारित इथेनॉल बनाने में जल प्रदूषण (सबसे बड़ा) का खतरा है। दरअसल, इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया में ‘स्पेंट वॉश’ (Spent_Wash) निकलता है। यह बहुत ही जहरीला और गहरे रंग का तरल पदार्थ होता है। यदि इसे बिना ट्रीट किए जमीन पर छोड़ दिया जाए या नहर में डाल दिया जाए, तो यह मीलों तक भूजल (Groundwater) और मिट्टी को बंजर बना सकता है। भारत में कई शुगर मिल्स/डिस्टिलरी से अनट्रीटेड एफ्लुएंट डिस्चार्ज के केस हैं, जो गंगा जैसी नदियों को प्रभावित करते हैं।

इस तरह की फैक्ट्रियों से वायु प्रदूषण भी होता है। बॉयलर चलाने के लिए यदि धान की भूसी (Rice husk) या कोयले का इस्तेमाल होता है, तो उससे राख (Fly ash) और धुआँ निकलता है। वहीं, किण्वन (Fermentation) की प्रक्रिया के कारण आसपास के 2-3 किलोमीटर के क्षेत्र में एक अजीब सी खट्टी गंध रह सकती है।

अनाज आधारित कम प्रदूषित: कम पानी लगता है (मक्का से ~2570 लीटर पानी प्रति लीटर इथेनॉल vs गन्ना से 3000+), और ज्यादातर प्लांट ZLD (Zero Liquid Discharge) होते हैं, ऐसे में कोई तरल कचरा बाहर नहीं निकलता। ठोस कचरा (DDGS) उपयोगी होता है। भारत में ग्रेन-बेस्ड प्लांट को सरकार ज्यादा प्रोत्साहन दे रही है क्योंकि ये पर्यावरण के लिए बेहतर हैं।

कचरे का निपटान कैसे होता है?

गन्ना आधारित: स्पेंट वॉश को बायोमेथेनेशन, कंसंट्रेशन (इवैपोरेशन) और इंसीनरेशन से ट्रीट करते हैं। नए नियमों से ZLD अनिवार्य है, लेकिन पुराने प्लांट में अक्सर अनट्रीटेड डिस्चार्ज होता है। बगासे (खोई) से बिजली बनती है।

अनाज आधारित: इवैपोरेशन और ड्राइंग से ठोस DDGS बनता है, जो चारा बनकर बिकता है। ZLD आसान होता है, कोई तरल प्रदूषण नहीं। राजस्थान जैसे सूखे इलाके में ये ज्यादा उपयुक्त।

कुल मिलाकर, राजस्थान में चावल आधारित प्लांट बेहतर विकल्प है क्योंकि कम पानी और प्रदूषण। लेकिन स्थानीय विरोध (हनुमानगढ़ में) ZLD होने के बावजूद पानी निकासी और हवा प्रदूषण की आशंका से है। सरकार ZLD सुनिश्चित करती है तो समस्या कम हो सकती है।

ZLD तकनीक क्या है?

ZLD का फुल फॉर्म है Zero Liquid Discharge (जीरो लिक्विड डिस्चार्ज)। यह एक उन्नत वेस्टवाटर ट्रीटमेंट तकनीक है जिसमें इंडस्ट्री से निकलने वाले वेस्टवाटर (गंदे पानी) का 100% ट्रीटमेंट किया जाता है, ताकि बाहर कोई लिक्विड वेस्ट न निकले। पूरा पानी रिसाइकल हो जाता है और बचा ठोस कचरा (सॉलिड्स) सुरक्षित तरीके से डिस्पोज किया जाता है।

यह तकनीक मुख्य रूप से पानी की कमी वाले इलाकों, सख्त पर्यावरण नियमों वाले देशों (जैसे भारत) और प्रदूषण करने वाली इंडस्ट्रीज (डिस्टिलरी, टेक्सटाइल, केमिकल, फार्मा, शुगर मिल्स) में इस्तेमाल होती है। भारत में CPCB (सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड) ने कई इंडस्ट्रीज के लिए ZLD अनिवार्य कर दिया है, खासकर इथेनॉल डिस्टिलरी में।

ZLD क्यों जरूरी है?

  • पर्यावरण संरक्षण: नदियों, झीलों या जमीन में गंदा पानी नहीं जाता।
  • पानी की बचत: 95-99% पानी रिसाइकल होकर दोबारा इस्तेमाल होता है।
  • संसाधन रिकवरी: कचरे से नमक, केमिकल या फर्टिलाइजर जैसे उपयोगी पदार्थ निकाले जा सकते हैं।
  • कानूनी अनुपालन: भारत में कई राज्यों में ZLD प्लांट लगाना अनिवार्य है।

ZLD प्रक्रिया से प्रदूषण कैसे किया जा सकता है कम

ZLD सिस्टम आमतौर पर कई स्टेज में काम करता है। हर इंडस्ट्री के वेस्टवाटर के हिसाब से थोड़ा बदलाव होता है, लेकिन बेसिक फ्लो ऐसा है-

प्री-ट्रीटमेंट (Pretreatment): वेस्टवाटर से बड़े कण, तेल, ग्रीस या सस्पेंडेड सॉलिड्स हटाए जाते हैं। इसमें फिल्ट्रेशन, सेडिमेंटेशन या केमिकल ट्रीटमेंट (जैसे pH एडजस्टमेंट) होता है।

बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट: ऑर्गेनिक मैटर (BOD/COD) को बैक्टीरिया से ब्रेकडाउन किया जाता है। इथेनॉल डिस्टिलरी में स्पेंट वॉश का यह स्टेज महत्वपूर्ण है।

मेम्ब्रेन टेक्नोलॉजी (RO/Ultrafiltration): रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) या अल्ट्राफिल्ट्रेशन से नमक और अशुद्धियाँ अलग की जाती हैं। इससे 70-90% साफ पानी निकलता है (परमिएट) और कंसंट्रेटेड ब्राइन बचता है।

इवैपोरेशन (Evaporation): बचे कंसंट्रेट को मल्टी-इफेक्ट इवैपोरेटर (MEE) से गर्म करके पानी उड़ाया जाता है। इससे और पानी रिकवर होता है।

क्रिस्टलाइजेशन या ड्रायिंग: आखिरी स्टेज में बचा गाढ़ा ब्राइन क्रिस्टलाइजर या स्प्रे ड्रायर से ठोस नमक/सॉलिड्स में बदल दिया जाता है। कोई लिक्विड नहीं बचता।

इथेनॉल डिस्टिलरी में खास: गन्ना आधारित में स्पेंट वॉश बहुत प्रदूषित होता है, इसलिए बायो-मेथेनेशन के बाद MEE + क्रिस्टलाइजर इस्तेमाल होता है। अनाज आधारित में DDGS बनता है, जो आसान ZLD देता है।

भारत में कई कंपनियाँ जैसे Uttam Energy, Alfa Laval, Saltworks ZLD प्लांट बनाती हैं, खासकर इथेनॉल प्लांट्स के लिए। ZLD पर्यावरण के लिए बेहतरीन है, लेकिन सही डिजाइन और ऑपरेशन जरूरी है। राजस्थान जैसे सूखे इलाकों में इथेनॉल प्लांट्स के लिए यह परफेक्ट सॉल्यूशन है।

उद्योग बंद करना समस्या का हल नहीं

बहरहाल, इथेनॉल फैक्ट्री हो या कोई भी फैक्ट्री, भारत में प्रदूषण को लेकर नियम कागजों पर बहुत सख्त हैं, लेकिन धरातल पर उनका पालन कई कारकों पर निर्भर करता है। चूँकि भारत सरकार इथेनॉल ब्लेंडिंग (ई-20 पेट्रोल) पर बहुत जोर दे रही है, इसलिए इन प्लांट्स पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की सीधी निगरानी रहती है।

वैसे, आजकल ‘ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम’ (OCEMS) लगे होते हैं जो सीधे बोर्ड को डेटा भेजते हैं। कई बार स्थानीय अधिकारी रात के समय या भारी बारिश के दौरान निगरानी में ढिलाई बरतते हैं, उस समय कुछ फैक्ट्रियाँ गंदा पानी छोड़ देती हैं। ZLD प्लांट और ESP को चलाने का खर्च (बिजली और केमिकल) बहुत ज्यादा होता है। मुनाफा बढ़ाने के लिए कभी-कभी मालिक इन मशीनों को बंद कर देते हैं।

हालाँकि फैक्ट्री का विरोध करने की बजाय, स्थानीय लोगों और जागरूक नागरिकों की एक ‘निगरानी समिति’ होनी चाहिए जो यह सुनिश्चित करे कि फैक्ट्री से गंदा पानी बाहर न निकले और रोजगार में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिले। उद्योग बंद करना समस्या का हल नहीं है, लेकिन नियमों का पालन न करना एक अपराध है। दोनों के बीच का संतुलन ही सही विकास है।

चूँकि कॉन्ग्रेस की विध्वसंक नीतियों के चलते अब फैक्ट्री बंद हो गई, तो ये राजस्थान के विकास और उद्योग के लिए बड़ा झटका है। एक फैक्ट्री आने के बाद 10 और फैक्ट्रियाँ भी आती। हनुमानगढ़ एक इंडस्ट्रियल हब बन सकता था, लेकिन कॉन्ग्रेस की राजनीति की वजह से पूरे राजस्थान को झटका लगा है। इस प्रोजेक्ट के बाहर जाने से दूसरे कई प्रोजेक्ट भी नहीं आएँगे।

BMC चुनाव 2026 में BJP बनी शिवसेना का ‘बड़ा भाई’, मुंबई पर कब्जे के लिए ठाकरे ब्रदर्स आए साथ: जानें- सीट बंटवारे से लेकर इस ‘धनी’ सियासी जंग की हर अहम बात

देश की सबसे अमीर नगर निगम बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के चुनाव अब सर पर आ गए हैं। 15 जनवरी 2026 को वोटिंग होगी और 16 जनवरी को नतीजे आएँगे। कुल 227 सीटों वाली इस निगम पर कब्जा करने की लड़ाई में सत्तारूढ़ महायुति और विपक्षी दलों के बीच काँटे की टक्कर होने वाली है।

नामांकन की आखिरी तारीख 30 दिसंबर 2025 से ठीक एक दिन पहले महायुति ने अपना सीट बँटवारा फाइनल कर लिया। इसी बीच विपक्ष में भी गठबंधन की तस्वीर साफ हुई है। यह चुनाव सिर्फ मुंबई की सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि मराठी अस्मिता, विकास और हिंदुत्व के मुद्दों पर भी बड़ा मुकाबला है। आइए विस्तार से समझते हैं कि सीट बंटवारा कैसे हुआ, कौन बड़ा भाई बना और शिवसेना के दो गुटों के बीच क्या जंग चल रही है।

महायुति में सीट बँटवारा, बीजेपी बनी बड़ा भाई

महायुति गठबंधन में भाजपा और एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना मुख्य पार्टनर हैं। अजित पवार की एनसीपी इस बार मुंबई में अलग लड़ रही है। लंबी खींचतान के बाद 29 दिसंबर 2025 को सीट बंटवारे पर मुहर लग गई। अब कुल 227 सीटों में से भाजपा को 137 सीटें मिली हैं, वहीं, एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना को 90 सीटें मिलीं।

दोनों दल अपने कोटे से कुछ सीटें छोटे सहयोगियों को दे सकते हैं। मुंबई भाजपा अध्यक्ष अमित साटम ने कहा कि पहले 207 सीटों पर सहमति बनी थी, फिर बाकी 20 पर भी फैसला हो गया। अब संयुक्त प्रचार शुरू होगा।

बीजेपी और शिवसेना-शिंदे ने दिखाई मजबूती

यह बंटवारा भाजपा की मजबूती दिखाता है। पहले की बातचीत में शिंदे गुट 100 से 125 सीटें माँग रहा था, लेकिन भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत रखी। 2024 के विधानसभा चुनाव और हाल की नगर परिषद चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। उसकी संगठन शक्ति और केंद्र की ताकत ने उसे गठबंधन में ‘बड़ा भाई’ बना दिया।

पहले मुंबई की राजनीति में शिवसेना हमेशा बड़ा भाई रही थी। 2017 के बीएमसी चुनाव में अविभाजित शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और महापौर पद उसके पास था। लेकिन अब शिंदे गुट को भाजपा पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की कई बैठकों के बाद यह फॉर्मूला तय हुआ। महायुति का दावा है कि वे 150 से ज्यादा सीटें जीतकर मुंबई में अपना महापौर बनाएंगे।

शिवसेना बनाम शिवसेना, ठाकरे भाइयों का गठबंधन

इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत है दो शिवसेना गुटों का आमना-सामना। एक तरफ शिंदे गुट महायुति के साथ सरकारी ताकत और विकास के नाम पर वोट माँग रहा है। दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना (यूबीटी) ने राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) से गठबंधन किया है। 20 साल बाद ठाकरे भाई एक साथ आए हैं। उन्होंने ‘मराठी मानूस’ की अस्मिता और ‘बीजेपी की लूट’ के मुद्दे पर फोकस किया है।

सीट बंटवारे में उद्धव की शिवसेना (यूबीटी) को 145-150 सीटें मिली हैं, तो एमएनएस को 65-70 सीटें। हालाँकि कुछ सीटें शरद पवार की एनसीपी (एसपी) को भी दी जा सकती हैं, लेकिन बातचीत चल रही है।

भांडुप और विखरोली जैसे कुछ वार्डों पर दोनों दलों में थोड़ी खींचतान हुई, लेकिन बड़े हित में फैसला हो गया। उद्धव और राज ठाकरे ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करके गठबंधन का ऐलान किया। उनका कहना है कि मुंबई को मराठी लोगों का गढ़ बनाए रखना है और बीजेपी की ‘बाहरी’ सत्ता को रोकना है।

यह गठबंधन महायुति के लिए बड़ी चुनौती है। 2017 में एमएनएस ने 7 सीटें जीती थीं, जो बाद में उद्धव गुट में शामिल हो गईं। अब दोनों ठाकरे मिलकर मराठी वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं।

विपक्ष का दूसरा खेमा- कॉन्ग्रेस और वंचित बहुजन आघाड़ी का गठबंधन

महाविकास आघाड़ी (एमवीए) में दरार पड़ गई। जिसके बाद कॉन्ग्रेस ने उद्धव-राज के गठबंधन को ‘सांप्रदायिक’ बताकर अलग रहने का फैसला किया। ऐसे में कॉन्ग्रेस ने प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए) से गठबंधन किया। यह गठबंधन दलित, अल्पसंख्यक और उत्तर भारतीय वोटों को जोड़ने की कोशिश है।

सीट बँटवारे में कॉन्ग्रेस को करीब 165 सीटें मिली हैं, तो वीबीए को 62 सीटें मिली हैं। इसके अलावा कुछ सीटें राष्ट्रीय समाज पक्ष और आरपीआई (गवई) को भी मिल सकती हैं।

कॉन्ग्रेस ने अपनी पहली लिस्ट में 87 उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि यह विचारधारा का गठबंधन है, सत्ता की लड़ाई नहीं। लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं में थोड़ी नाराजगी है क्योंकि कई मजबूत सीटें वीबीए को दी गईं।

BMC चुनाव काफी अहम, विधानसभा चुनाव से पहले का सेमीफाइनल

बीएमसी का बजट 74 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। यह एशिया की सबसे अमीर निगम है। सड़कें, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास के काम यहां के मुख्य मुद्दे हैं। पिछले चुनाव 2017 में अविभाजित शिवसेना ने 84 सीटें, भाजपा ने 82, कॉन्ग्रेस ने 31, एनसीपी ने 9 और एमएनएस ने 7 सीटें जीती थीं। उसके बाद शिवसेना टूटी और शिंदे गुट भाजपा के साथ चला गया।

अब महायुति विकास और हिंदुत्व के नाम पर वोट माँग रही है। विपक्ष मराठी अस्मिता, भ्रष्टाचार और बीजेपी की ‘केंद्र की ताकत’ के खिलाफ लड़ रहा है। नामांकन 23 दिसंबर से शुरू हो चुके हैं। कई दलों ने अपनी लिस्टें जारी कर दी हैं। भाजपा और कॉन्ग्रेस ने 60-80 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं।

यह चुनाव मुंबई की राजनीति का नया अध्याय लिखेगा। क्या भाजपा पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर महापौर पद हासिल करेगी? या ठाकरे भाई मिलकर पुरानी शिवसेना की ताकत लौटाएँगे? या कॉन्ग्रेस-वीबीए कोई सरप्राइज देंगे? 15 जनवरी को वोटिंग के बाद सब साफ हो जाएगा। मुंबईकरों की नजर इस रोचक मुकाबले पर टिकी है।

DW न्यूज, ध्रुव राठी और KAS: NGO, एक्टिविज्म के सहारे भारत के खिलाफ जर्मनी की वैचारिक जंग; जानिए क्यों राहुल गाँधी पहुँचे हर्टी स्कूल

2023 में भारत की एक अदालत ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को मानहानि के एक मामले में दोषी ठहराया। उन्हें सजा सुनाई गई और कुछ समय के लिए उनकी लोकसभा सदस्यता भी रद्द हुई। यह मामला पूरी तरह भारत का था, नागरिक से लेकर अदालत और कानून तक सब भारतीय थे लेकिन इस फैसले पर सबसे पहला अंतरराष्ट्रीय बयान भारत के किसी पड़ोसी या रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी से नहीं बल्कि जर्मनी से आया। जर्मन विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह स्थिति पर नजर बनाए हुए है और उम्मीद करता है कि न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं होगा।

यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। सवाल यह नहीं कि बयान आया बल्कि यह कि जर्मनी को क्यों लगा कि उसे भारत के एक आंतरिक न्यायिक मामले पर टिप्पणी करनी चाहिए। यही सवाल आज उस बड़ी पजल की हिस्सा बनता है जिसे अब तक अक्सर नजरअंदाज किया गया है।

DW न्यूज और हिंदी-उर्दू स्पेस में जर्मनी की मौजूदगी

आमतौर पर जब भारत में विदेशी दखल, रेजिम चेंज या नैरेटिव वॉर की चर्चा होती है, तो उंगलियाँ सीधे अमेरिका की ओर उठती हैं। CIA, USAID और डीप स्टेट जैसे शब्द आम हो चुके हैं लेकिन इसी शोर में एक देश अक्सर बिना ध्यान खींचे निकल जाता है- जर्मनी।

BBC और Voice of America के अलावा अगर किसी विदेशी शक्ति ने भारत के हिंदी-उर्दू स्पेस को रणनीतिक रूप से साधा, तो वह न रूस था, न फ्रांस बल्कि वह जर्मनी था। डॉयचे वेले (DW) न्यूज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्ष 2024 में DW के हिंदी-उर्दू प्लेटफॉर्म को भारत में 60 साल पूरे हुए। टैक्सपेयर्स के पैसे से चलने वाला यह स्टेट-फंडेड मीडिया भारत कवरेज में एक साफ पैटर्न दिखाता है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय मीडिया और बहुसंख्यक समाज पर लगातार हमले, कोविड काल में ‘out of control India‘ जैसे नैरेटिव, कश्मीर में सुरक्षा बलों को ‘occupying force‘ कहना और अलगाववादी स्वरों को मंच देना शामिल है।

BBC की भारत में गहरी पैठ को औपनिवेशिक और कॉमनवेल्थ इतिहास से समझा जा सकता है लेकिन DW की इतनी लंबी और सुसंगठित मौजूदगी को संयोग नहीं कहा जा सकता। यह जर्मनी की नई सॉफ्ट पावर रणनीति का हिस्सा है जिसमें कम शोर लेकिन गहरी पैठ के साथ नैरेटिव सेट करना शामिल है।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद का जर्मनी: टैंकों से नहीं, विचारों से वापसी

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने मान लिया था कि जर्मनी अब सिर्फ एक व्यापारिक साझेदार भर रह जाएगा। वास्तविकता यह है कि शुरुआती झटकों के बाद जर्मनी कभी हाशिए पर गया ही नहीं। उसकी वापसी टैंकों और मिसाइलों के साथ नहीं हुई बल्कि संस्थाओं, नैतिकता और लोकतंत्र की भाषा के जरिए हुई।

युद्ध के बाद जर्मनी ने ‘Wandel durch Handel‘ यानी ‘व्यापार के जरिए बदलाव’ की नीति अपनाई जिसमें कम राजनीति, कम नैतिक उपदेश और ज्यादा आर्थिक-सॉफ्ट पावर थी। यह उसका पहला चरण था। अब जर्मनी खुद को केवल आर्थिक शक्ति नहीं बल्कि एक ‘मोरल सुपरपावर‘ के रूप में पेश करना चाहता है जो दुनिया को बताए कि लोकतंत्र कैसा होना चाहिए, मानवाधिकार क्या होते हैं और आजादी की सही परिभाषा क्या है।

यहीं से समस्या शुरू होती है। जब कोई देश खुद को नैतिक निर्णायक मान लेता है, तो दूसरों की संप्रभुता उसे बाधा लगने लगती है। भारत, जो अपने लोकतंत्र के लिए पश्चिमी देशों से प्रमाणपत्र नहीं चाहता है वो स्वाभाविक रूप से इस टकराव का केंद्र बन जाता है।

अपराधबोध से नैतिक दादागिरी तक

जर्मनी की आधुनिक विदेश नीति उसके नाजी अतीत और यहूदियों के नरसंहार के गहरे अपराधबोध से जुड़ी है। दशकों तक चले इस अपराधबोध से निकलने के लिए जर्मनी ने ‘मोरल रीब्रांडिंग’ का रास्ता चुना यानी खुद को दुनिया का नैतिक शिक्षक बना लेना। समय के साथ यह प्रायश्चित दखल में बदलता गया। इस दखल का नतीजा भारत जैसे देशों के लोकतंत्र को ‘सुधारने’ की जिद में नजर आने लगा।

अमेरिका जहाँ खुले सैन्य ऑपरेशन, तख्तापल्ट और युद्ध करता है। वहीं, जर्मनी का तरीका शांत और संस्थागत है और वो NGOs, अकादमिक नेटवर्क, मीडिया और फाउंडेशन्स के जरिए विचारधारा का विस्तार। यही कारण है कि जर्मनी कम दिखाई देता है लेकिन जमीनी स्तर पर उसकी पकड़ कहीं ज्यादा गहरी होती है।

भारत में जर्मनी के फ्रंट्स

भारत में जर्मनी का प्रभाव कई चेहरों में दिखता है जैसे सिविल सोसायटी, अकादमिक नेटवर्क, मीडिया, डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स और ‘डेमोक्रेटिक बैकस्लाइडिंग’ का फ्रेम आदि। इनके चेहरे अलग हैं, दिशा एक ही है।

ऐसा भी नहीं है कि किसी का ध्यान जर्मनी के इन तरीकों पर कभी गया ही नहीं। ऑपइंडिया ने जब CSDS पर रिसर्च की थी तो हमने बताया था कि CSDS जैसी संस्थाओं के पीछे जर्मनी की भूमिका कितनी गहरी है। हमारे इस रिसर्च पेपर में आप पढ़ भी सकते हैं कि जर्मनी अपनी संस्थाओं को उन देशों में सक्रिय होने के लिए फंडिंग दे रहा है जहाँ उसने मान लिया है कि ‘लोकतंत्र खतरे में है’।

यही कारण है कि जर्मन विदेश मंत्रालय अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी, मणिपुर हिंसा या अन्य भारतीय आंतरिक मामलों पर बयान देने से नहीं हिचकता। यह केवल कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि जर्मनी की उस नई विदेश नीति का हिस्सा है, जिसमें ‘मानवाधिकारों की रक्षा, देश की अपनी संप्रभुता से ऊपर’ रखी जाती है।

राहुल गाँधी, हर्टी स्कूल और नैरेटिव एक्सपोर्ट

इसी संदर्भ में राहुल गाँधी की जर्मनी यात्राओं को भी देखा जाता है। हाल ही में उन्होंने जर्मनी के हर्टी स्कूल ऑफ गवर्नेंस में लेक्चर दिया। यह संस्थान भी नाजी अतीत के ‘प्रायश्चित’ से जुड़ा है। यह स्कूल जिस हर्टी फाउंडेशन ने बनाया था, वो असल में 19वीं सदी के एक बड़े डिपार्टमेंट स्टोर (Tietz department store) से आया है लेकिन नाजी दौर में इस यहूदी टिट्ज़ परिवार की संपत्ति को आर्यीकरण (Aryanization) के नाम पर छीन लिया गया था, जिससे फाउंडेशन को फायदा पहुँचा। यह फाउंडेशन अब ‘प्रायश्चित’ के नाम पर ‘लोकतंत्र को मजबूत करने’ के लिए भारी निवेश करता है।

अब यह कथित ‘प्रायश्चित’ दूसरे देशों के लोकतंत्र में दखल डालने का बहाना बन गया है जिसमें भारत जैसे देशों की राजनीति में अपनी नीतियों और विचारों को थोपना शामिल है। जब ऐसे मंचों से जब राहुल गाँधी ‘Institutional Capture’ या ‘People will fight each other’ जैसे बयान देते हैं, तो यह केवल भाषण नहीं रह जाते बल्कि यह एक नैरेटिव का निर्यात होता है। और इसका असल इंजन है KAS।

KAS: एक वैचारिक इंजन

कोनराड आडेनाउअर श्टिफ्टुंग (Konrad Adenauer Stiftung) जिसे संक्षेप में KAS कहा जाता है, इस पूरी कहानी का सबसे अहम किरदार है। यह कोई न्यूट्रल NGO या सामान्य थिंक-टैंक नहीं है। KAS दरअसल जर्मनी की सत्तारूढ़ राजनीतिक परंपरा की वैचारिक मशीन है, जिसकी जड़ें सीधे Christian Democratic Union (CDU) में जाती हैं। खुद KAS अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है कि वह CDU से politically affiliated संस्था है। इसमें कोई पर्दा नहीं है, कोई संकोच नहीं है।

इसमें हैरानी भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि CDU और KAS, इन दोनों के पीछे जो वैचारिक आत्मा थी, वह एक ही व्यक्ति था- कोनराड आडेनाउअर (Konrad Adenauer)। यदि इस एक व्यक्ति को समझ लिया जाए, तो न केवल आधुनिक जर्मनी की राजनीति को समझा जा सकता है, बल्कि यह भी समझ में आता है कि आज जर्मनी कई मोर्चों पर इतना बेचैन और आक्रामक क्यों दिखाई देता है।

कोनराड आडेनाउअर: जर्मनी के पहले चांसलर की कहानी

कोनराड आडेनाउअर कोई साधारण नेता नहीं थे। वे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिम जर्मनी के पहले चांसलर बने। नाजी तबाही के बाद खंडहरों में खड़े जर्मनी को दोबारा उठाने और उसे पश्चिमी दुनिया की मुख्यधारा में वापस लाने वाला चेहरा वही थे। उन्होंने जर्मनी को अलग-थलग नहीं छोड़ा। उन्होंने जर्मनी को अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के साथ जोड़ा, NATO में शामिल कराया और यूरोपीय एकीकरण की नींव रखी, जिसकी शुरुआत European Coal and Steel Community से हुई। यह सब केवल सत्ता या रणनीति की राजनीति नहीं थी। इसके पीछे एक गहरी वैचारिक योजना थी।

कोनराड कट्टर रोमन कैथोलिक थे। वे पूरी जिंदगी बाइबिल पढ़ते रहे और राजनीति को ईसाई नैतिकता से अलग मानने को तैयार नहीं थे। उनका विश्वास था कि ईसाई सामाजिक मूल्यों के बिना कोई भी समाज टिकाऊ नहीं हो सकता। उनके लिए यूरोप केवल भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि एक Christian civilization था और यदि उसमें से ईसाई मूल्य निकाल दिए गए, तो वह सभ्यता खोखली हो जाएगी।

इसी कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कोनराड की नजर में असली वैश्विक संघर्ष था- ईसाई सभ्यता बनाम मार्क्सवाद। वे कम्युनिज्म को नाजीवाद जितना ही खतरनाक मानते थे और सोवियत संघ को स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा समझते थे। यही सोच उन्हें NATO और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी तक ले गई।

इसी वैचारिक आधार पर Christian Democratic Union (CDU) का गठन हुआ। CDU कोई सामान्य पार्टी नहीं थी। इसे जानबूझकर इस तरह गढ़ा गया कि सदियों से बँटे कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट एक मंच पर आ सकें और ईसाई सिद्धांतों पर आधारित राजनीति कर सकें। कोनराड का मानना था कि राजनीति को ईसाई नैतिकता से चलना चाहिए।

पेशे से वकील कोनराड 1917 में कोलोन के मेयर बने लेकिन 1933 में नाजियों के सत्ता में आते ही उन्हें पद से हटा दिया गया। नाजी शासन के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा। 1944 में हिटलर की हत्या की कोशिश के बाद गेस्टापो (नाजियों की सीक्रेट पुलिस) ने उन्हें फिर गिरफ्तार किया। युद्ध के बाद वह राइनलैंड के Christian Democratic दल के अध्यक्ष बने फिर British Zone के CDU का अध्यक्ष इसके बाद Parliamentary Council का राष्ट्रपति और अंततः पश्चिम जर्मनी का चांसलर बन गए।

20 दिसंबर 1955 को CDU से जुड़े नेताओं ने Society for Christian Democratic Educational Work नामक संस्था बनाई, जिसका उद्देश्य शिक्षा, रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के जरिए ईसाई लोकतांत्रिक विचारधारा को फैलाना था। 1964 में इस संस्था का नाम बदलकर Konrad Adenauer Stiftung रखा गया। यानी KAS सीधे तौर पर CDU की वैचारिक विरासत और कोनराड आडेनाउअर की सोच का संस्थागत विस्तार है।

भारत और दुनिया में KAS का वैचारिक युद्ध

आज यही KAS भारत में सक्रिय है। यह CSDS जैसी संस्थाओं को फंडिंग देता है। इन्हीं के जरिए भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए जाते हैं, बहुसंख्यक समाज को निशाना बनाया जाता है और संप्रभुता को कमजोर करने वाले नैरेटिव गढ़े जाते हैं। जानकारी के अनुसार 2016 से अब तक KAS ने CSDS को 2.6 करोड़ रुपए से अधिक की फंडिंग दी है।

कागजों पर KAS शिक्षा, रिसर्च और स्कॉलरशिप की बात करता है लेकिन जमीनी स्तर पर इसका काम युवाओं को ट्रेन करना, पॉलिसी नैरेटिव बनाना और मीडिया व अकादमिक नेटवर्क तैयार करना है। इससे सीधे सरकारें नहीं गिरतीं लेकिन समाज की सोच बदली जाती है। आज सरकारें टैंकों से नहीं बल्कि विचारों और डिजिटल नैरेटिव्स से अस्थिर होती हैं।

भारत से जुड़े मामलों पर जर्मनी के बयान, केजरीवाल की गिरफ्तारी, मणिपुर हिंसा या मानवाधिकार बनाम संप्रभुता ये सब इसी वैचारिक फ्रेम से आते हैं। KAS जैसे संगठन टैंक नहीं भेजते बल्कि वे विचार, नेटवर्क और नैरेटिव भेजते हैं।

यह मॉडल अमेरिका के USAID जैसा है। फर्क यह है कि USAID अमेरिकी मॉडल को बढ़ावा देता है जबकि KAS यूरोपीय और विशेष रूप से जर्मन रास्ते को। KAS देशों को EU मॉडल के अनुरूप ढालने की कोशिश करता है। इसी कारण दोनों संस्थाओं के बीच कई देशों में टकराव भी दिखता है। KAS चाहती है कि देश यूरोप से जुड़ें और USAID चाहती है कि देश अमेरिका के अनुसार चलें।

इतिहास में भी जर्मनी का भारत को लेकर रुख इसी रणनीति से तय रहा है। 1961 में गोवा मुक्ति पर पश्चिम जर्मनी ने भारत की आलोचना की क्योंकि पुर्तगाल NATO का सदस्य था। 1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान भी शुरुआत में जर्मनी ने भारत की आलोचना की। 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद जर्मनी ने सहायता रोकी और भारत पर NPT में शामिल होने का दबाव डाला।

जर्मन राजनीति का श्टिफ्टुंग मॉडल

जर्मनी की राजनीतिक व्यवस्था में एक अनोखी चीज है Stiftung यानी राजनीतिक फाउंडेशन्स। ये फाउंडेशन पार्टियों से जुड़े होते हैं, सरकारी फंड लेते हैं और दुनिया भर में ‘लोकतंत्र सिखाने’ निकलते हैं। भारत में इनके पैटर्न के कारण गृह मंत्रालय ने कई बार सख्त रुख अपनाया है। इसी प्रक्रिया में CPR और Oxfam India जैसे संगठनों के FCRA लाइसेंस रद्द हुए हैं।

जर्मनी की इस रणनीति के तीन प्रमुख स्तंभ उसके राजनीतिक फाउंडेशन मॉडल Stiftung में दिखाई देते हैं। पहला नाम फ़्रीडरिष एबर्ट श्टिफ्टुंग (Friedrich Ebert Stiftung- FES) का है। यह संस्था जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) से जुड़ी मानी जाती है। आरोप है कि FES उन गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को फंड देती है, जो ‘लेबर राइट्स’ के नाम पर औद्योगिक अशांति को बढ़ावा देते हैं और विकास परियोजनाओं का विरोध करते हैं। वर्ष 2022 में FES की एक रिपोर्ट को लेकर विवाद हुआ था, जिसमें भारत की तुलना authoritarian regimes से की गई थी और ‘cow vigilantes’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था।

दूसरी संस्था है हाइनरिष बॉएल श्टिफ्टुंग (Heinrich Böll Stiftung- HBS) जो जर्मनी की ग्रीन पार्टी से जुड़ी है। भारत को लेकर सबसे आक्रामक रुख इसी संस्था का बताया जाता है। कोयला परियोजनाओं, न्यूक्लियर एनर्जी, अडानी जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से लेकर आरोग्य सेतु ऐप तक, HBS ने कई मुद्दों पर आपत्ति जताई है। जाँच एजेंसियों द्वारा जब कई मामलों में money trail खंगाली गई, तो कुछ मामलों में उसका सिरा इन जर्मन फाउंडेशनों तक पहुँचने की बात सामने आई।

तीसरी अहम संस्था है कोनराड आडेनाउअर श्टिफ्टुंग (Konrad Adenauer Stiftung- KAS), जो जर्मनी की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) से जुड़ी है। KAS का फोकस युवाओं, पॉलिसी मेकर्स और अकादमिक जगत पर बताया जाता है। यह संस्था सर्वे, फेलोशिप और विभिन्न प्रोग्राम्स के जरिए सरकार विरोधी विचारधाराओं को वैचारिक रूप देने का काम करती है। मीडिया, रिसर्च और ट्रेनिंग तीनों क्षेत्रों में KAS एक साथ सक्रिय रहती है।

Feminist Foreign Policy: नैतिकता या दखल?

जर्मनी की विदेश नीति में एक नया शब्द हाल के वर्षों में बार-बार सामने आया है- Feminist Foreign Policy। जर्मनी की विदेश मंत्री ऐनालेना बेयरबॉक ने इसे ‘महिलाओं के अधिकार और समानता’ के नाम पर पेश किया। लेकिन भारत के संदर्भ में इस नीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। भारत के मामले में जर्मनी की इस नीति के तहत दिए गए कई बयान विवादों में रहे हैं। कश्मीर मुद्दे पर जर्मनी का पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाते हुए संयुक्त राष्ट्र के दखल की बात करना, मणिपुर हिंसा को ‘हिंदू बनाम ईसाई’ के फ्रेम में पेश करना और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर सार्वजनिक टिप्पणी करना इन सबको भारत की ‘रेड लाइन’ पार करने के उदाहरण के रूप में देखा गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि जर्मनी केवल कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है बल्कि उसने भारत में डिजिटल और सूचना युद्ध के लिए भी कई मोर्चे तैयार किए हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया की अहम भूमिका मानी जाती है। जर्मनी के सरकारी मीडिया संस्थान डॉयचे वेले (DW) का नाम पहले भी इन बहसों में आ चुका है।

इसके अलावा, कुछ भारतीय डिजिटल प्लेटफॉर्म और मीडिया संस्थानों के जर्मनी से जुड़े नेटवर्क भी चर्चा में हैं। द कारवां जैसे मीडिया संस्थान का नाम Konrad Adenauer Stiftung (KAS) के Media Programme Asia नेटवर्क से जुड़ा है। आरोप है कि जर्मनी बदलते समय के साथ अपने सूचना युद्ध की रणनीति और पैकेजिंग दोनों में बदलाव करता रहा है।

इसी कड़ी में कुछ डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स पर भी सवाल उठते हैं, जिनका प्रभाव 2019 के आम चुनाव से पहले अचानक बढ़ा। उदाहरण के तौर पर ध्रुव राठी, जो पहले ज्यादा चर्चित नहीं थे लेकिन बाद में BBC, NDTV जैसे मंचों पर जाति, आरक्षण, गंगा, चुनाव और EVM जैसे संवेदनशील मुद्दों पर दिखाई देने लगे और यूट्यूब पर तेजी से लोकप्रिय हुए।

जर्मनी भारत-विरोधी डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स के लिए एक तरह का सुरक्षित ठिकाना बन गया है। जर्मनी के सख्त प्राइवेसी और फ्री स्पीच कानून उन्हें भारतीय कानूनी कार्रवाई से बचाने में मदद करते हैं।

जर्मनी की Normative Power

विश्लेषकों के मुताबिक, यह सब जर्मनी की उस रणनीति का हिस्सा है जिसे Normative Power कहा जाता है। एक बहुध्रुवीय दुनिया में जर्मनी सैन्य ताकत के बजाय नैरेटिव, संस्थाओं और विचारधाराओं के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। जर्मनी यह तय करने की भूमिका अपने हाथ में रखना चाहता है कि कौन देश ‘लोकतांत्रिक’ है और कौन नहीं।

भारत आज जर्मनी का एक अहम आर्थिक साझेदार है लेकिन जर्मनी का राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग भारत को एक उभरते हुए सभ्यतावादी राज्य (Civilizational State) के रूप में स्वीकार करने में असहज दिखता है। खासतौर पर तब जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में टॉप-3 की दौड़ में भारत के आगे बढ़ने से जर्मनी के पीछे छूटने की आशंका है।

क्या हम इस खेल को पहचान रहे हैं कि आज की जंग बॉर्डर पर नहीं बल्कि संस्थाओं, विचारों और नैरेटिव्स में लड़ी जा रही है। ऑपइंडिया की इन सभी पर नजर बनी हुई है और इसीलिए हम CSDS की तरह ही जर्मनी के बाकी के इन फ्रंट्स पर भी जल्दी ही एक और बड़ी रिसर्च लेकर आएँगे ताकि इस पूरे नेक्सस की बारीकियों और मोडस ऑपरेंडाई से आप भी वाकिफ हो सकें।