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नमाज खामोश इबादत है- आरफा तुमने ठीक कहा, क्योंकि इसके बाद शोर तो पत्थरबाजी का होता है: यकीन न हो तो जुमे पर अपने भाईजानों की हिंसा याद कर लो

बरेली में खाली निजी घर में नमाजियों को हिरासत में लेने वाले मामले पर आरफा ने अपने यूट्यूब चैनल पर 10 मिनट की वीडियो पोस्ट की। घटना पर सवाल उठाते-उठाते आरफा 'नमाज' को दुनिया की सबसे 'खामोश इबादत' में से एक घोषित कर देती हैं।

“नमाज 5 से 15 मिनट में खत्म हो जाती है। कोई शोर शराबा नहीं होता। कोई ढोल नहीं बजता, कोई पड़ोसियों को परेशानी नहीं होती। दुनिया की सबसे खामोश इबादतों में इस नमाज का नाम हैं।”

क्या आप इस बयान से सहमत हैं? अगर आप इस्लामी कट्टरपंथी सोच या एकतरफा नैरेटिव में यकीन रखने वालों में से हैं, तो शायद बिना सवाल किए मान भी गए होंगे। लेकिन सच जानना बहुत जरूरी है। और यह सच आरफा ‘बेगम’ आपको कभी नहीं बताएँगी, क्योंकि उन्होंने आँखों पर पट्टी बाँधी हुई है। ऊपर लिखी गई पंक्तियाँ भी आरफा के बयान की ही हैं, जिन्हें हर जगह मुस्लिम ‘पीड़ित’ दिखता है और ‘पत्रकारिता’ के नाम पर उन्हीं की हक की लड़ाई का ढोंग रचते हुए वे ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ने की धमकी देती फिरती हैं।

‘पत्रकारिता’ के इसी सफर में आरफा को अपने मतलब की खबर मिल जाती है, जिसके जरिए वह हमेशा की तरह ही सरकार को निशाना बना सके और अपने यूट्यूब चैनल की ‘व्यूअरशिप’ भी बढ़ा सकें। खबर बरेली की है, जहाँ एक खाली घर में नमाज पढ़ते कुछ लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया। अब इसी खबर को आधार बनाकर आरफा पूरे देश में अल्पसंख्यकों की आवाज बनने निकल पड़ती हैं।

घटना पर आरफा ने अपने यूट्यूब चैनल पर 10 मिनट की वीडियो पोस्ट की। वीडियो के ट्रेलर में ही आरफा ने ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ने वाले अपने इरादों को पूरा करने की कोशिश की।वीडियो शुरू ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों से होती है। जहाँ होटल में बैठकर आरफा खानुम प्रधानमंत्री मोदी के मंदिर दर्शनों की तस्वीरों को गिनती हैं। फिर कहती हैं- “अगर गिनने पर आऊँ कि प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में कितने मंदिरों में दर्शन किए, तो शायद सुबह से शाम हो जाए।”

यहीं वीडियो के दर्शक भटक जाते हैं, क्योंकि वह वीडियो की हेडलाइन पढ़कर इस उम्मीद से क्लिक करते हैं कि आरफा बरेली की घटना पर बात करेंगी। लेकिन उन्हें सामने मिलती हैं पीएम मोदी की तस्वीरें। आरफा के यूट्यूब स्ब्सक्राइबर्स, जिनमें से अधिकतर उनकी जैसी ही इस्लामी कट्टरपंथी सोच रखते हैं, यहाँ वह मन में सोचते हैं- “हम तो आरफा के मुँह से इस्लाम की दीन सुनने आए थे और यहाँ आरफा मंदिरों के दर्शन करा रही हैं।” ये बड़ा ही शॉकिंग मोमेंट हो गया होगा, उनके लिए।

खैर, आगे बढ़ते हैं। तो अब आरफा अपने पत्रकारिता के मंसूबे बताने लगती हैं, जो शायद अब तक पूरे देश को समझ आ चुके हैं। वही मंसूबे, जिनसे वह मुस्लिमों को पीड़ित दिखाते हुए ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ना चाहती हैं, लेकिन जब वही मुस्लिम मजहब के नाम पर ‘आतंकवादी’ बनता है तो इससे जुड़े सवाल उनके लिए ‘फनी‘ हो जाते हैं।

इसके बाद अब आती है असल मुद्दे की बारी। बरेली में नमाज पढ़ने पर पुलिस हिरासत वाला मामला। इस मुद्दे पर यूँ तो आरफा का रुख उनके ‘पत्रकारिता के मंसूबों’ से मेल खाता है। लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात कुछ और है।

घटना पर सवाल उठाते-उठाते आरफा ‘नमाज’ को दुनिया की सबसे ‘खामोश इबादत’ में से एक घोषित कर देती हैं। अब यह भी एक ‘फनी’ मोमेंट ही है। क्योंकि शायद आरफा यहाँ ‘नमाज’ नाम के किसी व्यक्ति का जिक्र कर रही हैं और उस नमाज को कोई नोबेल पुरस्कार मिला है। क्योंकि इस्लाम मजहब में जो ‘नमाज’ होती है, उसका तो शांति से कोई लेना-देना है नहीं। और यह साबित भी हो चुका है, जब ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें जुमे की नमाज के बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़काई गई।

और जब बात दुनिया के सबसे खामोश इबादत ‘नमाज’ की हो रही हो, तो जमीन पर जो हकीकतें सामने आती हैं, वे कतई वैसी नहीं दिखतीं जैसा आरफा अपने वीडियो में पेश करती हैं। याद करें इंदौर को वो वायरल वीडियो जहाँ मुस्लिम भीड़ ने जुमे की नमाज के बाद खुलेआम पूरे शहर को जलाने की धमकी दी। आरफा से सवाल है कि क्या ये विचार ‘खामोश इबादत’ करने के बाद आते हैं?

पूर्व बीजेपी नेता नुपुर शर्मा के ‘पैगंबर’ पर बयान के विरोध में देशभर में जगह-जगह दंगे हुए, उनमें से अधिकतर जुमे की नमाज के बाद ही भड़के थे। इन्हीं में गंगा नगरी प्रयागराज में जुमे की नमाज के बाद दंगे भड़के, पुलिस की गाड़ियों पर पथराव और आगजनी का वो मंजर। उत्तर प्रदेश के इतिहास में ‘काले पन्नों’ में दर्ज संभल हिंसा में भी जुमे की नमाज के बाद भीड़ जुटाई गई थी। और पिछले साल 2025 बरेली में ‘आई लव मोहम्मद’ विवाद पर हिंसा भी जुमे की नमाज के बाद ही भड़की थी।

ये तो कुछ गिने-चुने मामले हैं, लेकिन आए दिन मामले सामने आते हैं कि जुमे की नमाज के बाद मुस्लिम ने हिंदू की दुकान तोड़ी, सरकार के विरोध में प्रदर्शन भी जुमे की नमाज के बाद ही शुरू होते हैं। यहाँ कटाक्ष है कि इसी नमाज को आरफा दुनिया की सबसे ‘खामोश इबादत’ का तबका दे रही हैं।

सच तो यह है कि आरफा ‘बेगम’ का यह तरीका नया नहीं है। यह वही पुरानी स्क्रिप्ट है, जो वह हर बार दोहराती हैं। जहाँ भी किसी मुस्लिम का नाम जुड़ जाए, वहाँ आरफा को तुरंत जुल्म, नाइंसाफी और संविधान खतरे में दिखने लगता है। तब आरफा इस्लाम की दीन देने लग जाती है, नमाज को ‘खामोश इबादत’ कहने लग जाती हैं।

लेकिन जब वही मुस्लिम भीड़ बनकर सड़क पर उतरता है, पत्थर चलाता है, धर्मांतरण और लव जिहाद करता है और ‘शहादत’ के नाम पर आत्मघाती हमले करता है तब आरफा की आवाज कहीं गायब हो जाती है। उसे यह सवाल ‘मजाकिया’ लगने लगते हैं।

बरेली वाली घटना में भी आरफा को मुस्लिम नमाज पढ़ते दिखाई दे रहे हैं और पुलिस मानो विलन। जबकि इस फैक्ट को नजरअंदाज कर दिया गया कि पुलिस ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी की कार्रवाई सिर्फ घर में नमाज पढ़ने के कारण नहीं हुई, बल्कि एक खाली निजी घर के अंदर बिना प्रशासनिक अनुमति के सामूहिक रूप से ऐसा करने पर की गई।

यहाँ आरफा को नमाज से दिक्कत नहीं हुई, न ही उन्हें शांति से कोई लेना-देना है। आरफा को सिर्फ मौका चाहिए था- सरकार को घेरने का, प्रधानमंत्री पर तंज कसने का और अपने यूट्यूब चैनल की व्यूअरशिप बढ़ाने का। इसीलिए बरेली की घटना को उठाकर वह पूरे देश के मुस्लिमों को पीड़ित बताने निकल पड़ती हैं, लेकिन इंदौर, प्रयागराज, संभल और बरेली विवाद और हिंसा जैसे मामलों पर चुप रहती हैं या बात घुमा देती हैं। यही उनकी ‘पत्रकारिता’ है, जो सवाल पूछने की जगह ढाल बन जाती है।

और आखिर में, आरफा से एक सीधा सवाल- अगर नमाज इतनी ही ‘खामोश इबादत’ है, तो जुमे की नमाज के बाद हिंसा क्यों भड़कती हैं? क्या ये सब भी उसी ‘खामोश इबादत’ का हिस्सा है? साथ ही एक और हकीकत भी जान ही लो आरफा, आधा सच दिखाने से खुद को आवाज उठाने वाली ‘पत्रकार’ बताना बंद कर दो, क्योंकि तुम्हारे इस एजेंडो को देश पहचान चुका है।

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पूजा राणा
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