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SIR पर योगेंद्र यादव ने फिर फैलाया झूठ: जिनका हुआ निधन या जो चले गए उनके वोट कटने को बताया ‘अधिकार छीनना’, तमिलनाडु से 97 लाख नाम कटने पर रोना रोया

फेज-2 के बाद स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत जैसे ही ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी हुई तो कुछ लोगों ने उस पर नाराजगी जतानी शुरू कर दी। इस कथित नाराजगी का पहले से ही अनुमान लगाया गया था। विरोध करने वालों ने इसे ऐसे दिखाने की कोशिश की मानो चुनाव आयोग ने बीजेपी के साथ मिलकर लोगों से उनका वोट देने का हक छीन लिया हो।

21 दिसंबर को, खुद को न्यूज पोर्टल बताने वाले यूट्यूब चैनल ‘द रेड माइक’ से बातचीत करते हुए कॉन्ग्रेस से जुड़े वकील योगेंद्र यादव ने दावा किया कि SIR की वजह से तमिलनाडु में 97 लाख मतदाताओं के वोटिंग अधिकार खत्म हो गए हैं।

यह बात भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा तमिलनाडु और गुजरात की ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी करने के बाद कही गई। ECI के आँकड़ों के अनुसार, तमिलनाडु में 97.3 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं जबकि गुजरात में 73.7 लाख नाम हटाए गए।

आँकड़े सामने आते ही योगेंद्र यादव जैसे लोग यह कहने लगे कि बड़ी संख्या में लोगों से मतदान का अधिकार छीन लिया गया है। हकीकत यह है कि ये दावे आँकड़ों को सही तरह से समझने पर नहीं बल्कि सिर्फ बड़ी संख्या दिखाकर लोगों को डराने और गुमराह करने पर आधारित हैं। तथ्यों को ईमानदारी से देखने के बजाय ऐसे बयान सिर्फ भ्रम फैलाते हैं।

ड्राफ्ट रोल असल में क्या दिखाते हैं

तमिलनाडु में मतदाताओं की संख्या पहले 6.4 करोड़ थी, जो मौजूदा ड्राफ्ट सूची में घटकर 5.4 करोड़ रह गई है। यानी कुल 97.3 लाख नाम हटाए गए हैं। इनमें से 26.9 लाख मतदाताओं को मृत पाया गया।

लगभग 66.4 लाख ऐसे लोग थे जो या तो दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके थे, लंबे समय से वहाँ नहीं रह रहे थे, या फील्ड जाँच के दौरान अपने पते पर नहीं मिले। वहीं, करीब 4 लाख नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि वे एक से ज्यादा जगहों पर दर्ज पाए गए।

इसी तरह की स्थिति गुजरात में भी सामने आई। यहाँ मतदाताओं की संख्या 5.1 करोड़ से घटकर 4.3 करोड़ रह गई। कुल 73.7 लाख नाम सूची से हटाए गए। इनमें 18.1 लाख मतदाता मृत पाए गए जबकि करीब 51.8 लाख लोग अपने दर्ज पते पर नहीं मिले या दूसरी जगह जा चुके थे। इसके अलावा, लगभग 3.8 लाख नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज होने के कारण हटाए गए।

वहीं, तमिलनाडु में 1.2 करोड़ मतदाताओं के नाम नोटिस के लिए चिह्नित किए गए हैं। ये नाम मतदाता सूची से हटाए नहीं गए हैं। दरअसल, इनमें रिकॉर्ड से जुड़ी कुछ गड़बड़ियाँ पाई गई हैं, जैसे माता-पिता और बच्चों की उम्र में असामान्य अंतर या एक ही माता-पिता से बहुत अधिक बच्चों का दर्ज होना। ये केवल जाँच के संकेत हैं, न कि नाम हटाने की कोई कार्रवाई।

लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने की साजिश

चुनाव आयोग (ECI) ने जो डेटा स्पष्ट रूप से दिया है, उसके बावजूद योगेंद्र यादव जैसे कुछ एक्टिविस्ट जो अक्सर ऐसे मामलों पर डर फैलाते हैं, यह दावा कर रहे हैं कि मतदाता हटाने का काम जानबूझकर और बिना वजह किया गया। ऐसे दावे भ्रामक हैं और गंभीर खतरा पैदा करते हैं क्योंकि इससे आम लोगों के मन में यह गलत संदेश जाता है कि चुनाव आयोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने के इरादे से काम कर रहा है।

यादव का निष्कर्ष डेटा की सही व्याख्या से नहीं निकला है। नाम हटाने का मुख्य कारण यह रहा कि संबंधित मतदाता या तो अब मौजूद नहीं थे, अपने दर्ज पते पर नहीं रहते थे, या फिर एक से अधिक जगह पंजीकृत पाए गए। एक ही व्यक्ति के कई पंजीकरण होने की स्थिति में केवल एक वोटर ID ही मान्य होती है, बाकी को रद्द किया जाता है। यह प्रक्रिया ECI द्वारा मतदाता धोखाधड़ी रोकने के लिए जरूरी और तय नियमों के तहत की जाती है।

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन एक संवैधानिक प्रक्रिया है

SIR यानी मतदाता सूची का संशोधन कोई नई या असामान्य प्रक्रिया नहीं है। यह संविधान के तहत नियमित रूप से किया जाने वाला काम है, जिसका मकसद मतदाता सूची को सही और अपडेट रखना होता है। अगर ऐसी समीक्षा न हो, तो सूची में मृत मतदाताओं के नाम, दूसरी जगह जा चुके लोगों की एंट्री और डुप्लीकेट नाम लगातार बने रहते हैं। समय के साथ जब ऐसी गलतियाँ बढ़ती जाती हैं, तो चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगते हैं।

SIR को लोकतंत्र पर हमला कहना खतरनाक है। इससे लोगों का भरोसा उसी प्रक्रिया से उठ सकता है, जिसे चुनावों को निष्पक्ष, पारदर्शी और सुरक्षित बनाए रखने के लिए बनाया गया है।

समाधान पर ध्यान नहीं, समस्या पर गढ़ी जा रही कहानी

चुनाव आयोग ने साफ तौर पर बताया है कि 18 जनवरी 2026 तक मतदाता या राजनीतिक दलों के बूथ स्तर के एजेंट शिकायत और आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। अगर कोई योग्य मतदाता मानता है कि उसका नाम गलत तरीके से चिह्नित किया गया है, तो उसे तय समय सीमा के भीतर शिकायत करने का पूरा अधिकार है। इसके बावजूद सार्वजनिक बहस में प्रक्रिया और तथ्यों पर बात करने के बजाय डर फैलाने और मनगढ़ंत कहानी गढ़ने को ज्यादा तरजीह दी जा रही है।

लोकतंत्र में सटीकता की जरूरत होती है, बढ़ा-चढ़ाकर बताने की नहीं

चुनावी सुधार कभी भी दिखावटी या आकर्षक नहीं होते और मतदाता सूची की जाँच को अक्सर गलत तरीके से पेश किया जाता है। कभी-कभी इसे जानबूझकर योगेंद्र यादव जैसे एक्टिविस्ट और राहुल गाँधी जैसे नेता गलत रंग से पेश करते हैं।

जब सामान्य प्रक्रिया के तहत होने वाले मतदाता सूची सुधार को जानबूझकर वोटरों को हटाने की साजिश बताया जाता है, तो सच और अफवाह के बीच फर्क मिटने लगता है। ऐसे बयान असली प्रक्रिया पर बेवजह शक पैदा करते हैं और लोगों को भ्रमित करते हैं और यही इनका मकसद होता है।

(मूल रूप से ये खबर अंग्रेजी टीम के अनुराग ने लिखी है, जिस इस लिंक पर क्लिक करे पढ़ सकते हैं)

बांग्लादेश में दीपू दास की निर्मम हत्या पर NYT ने गढ़ा पुराना नैरेटिव, दक्षिण एशिया को बताया ‘असहिष्णुता’ का गढ़: अपने मुस्लिम-पीड़ित एजेंडा में भारत को निशाना बनाना भी नहीं भूला

बांग्लादेश के मैमनसिंह में कपड़ा फैक्ट्री में काम करने वाले हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की मुस्लिम भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। इतना ही नहीं, उनके शरीर को पेड़ पर लटकाकर आग लगा दी गई। निर्मम घटना का वीडियो भी 18 दिसंबर 2025 को सामने आया। लेकिन मुस्लिम पीड़ित खबरों को हवा देने वाली विदेशी मीडिया चुप्पी साधे रही। अब कई दिनों बाद अमेरिकी मीडिया संस्थान न्यूयॉर्क टाइम्स (New York Times/NYT) जागा और दीपू चंद्र दास की हत्या पर लेख प्रकाशित किया है।

विदेशी मीडिया में NYT पहला संस्थान बना, जिसने बांग्लादेश में हिंदू युवक की बेरहमी से हत्या को कवरेज दी है। लेकिन यह कवरेज अपने नैरेटिव को ध्यान में रखते हुए की गई है, जिसमें मुस्लिम को अत्याचारी नहीं दिखाना है। NYT में सैफ हसनत और मुजिब मशाल द्वारा लिखे इस लेख में बड़ी चालाकी से भारत को भी निशाना बनाया है। एक हिंदू पर हुए अत्याचार को दिखाते-दिखाते वह भारत में हिंदू को अत्याचारी दिखाना बिल्कुल नहीं भूलता है।

NYT ने हेडलाइन में पूरे दक्षिण एशिया को घेरा

दीपू चंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या बांग्लादेश में हुई और NYT ने यहाँ पूरे दक्षिण एशिया को घेरने शुरू कर दिया। NYT की हेडलाइन- Lynching of a Hindu in Bangladesh Fans Fears of Rising Intolerance से ही उसका एजेंडा साफ झलकता है। हिंदू युवक की बेरहमी से हत्या को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया और फिर उलटा दक्षिण एशिया को धार्मिक असहिष्णुता के एक बड़े पैटर्न का हिस्सा बताया गया।

NYT के लेख का स्क्रीनशॉट

यहाँ शब्दों का खेल करते हुए धार्मिक असहिष्णुता से पूरे दक्षिण एशिया में फैले डर की बात की गई। यानी अर्थ साफ है कि केवल मुस्लिम ही धार्मिक असहिष्णुता तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा दक्षिण एशिया इससे जूझ रहा है। यहाँ तक कि मुस्लिम खुद इसका शिकार हैं। पूरे लेख में मुस्लिम सहकर्मी द्वारा हिंदू युवक की हत्या को कम आँका गया और इसके बावजूद पूरे दक्षिण एशिया पर ऐसी घटनाओं का इल्जाम डाला गया।

हत्यारों को ‘मुस्लिम’ कहने से परहेज

मुस्लिम-पीड़ित एजेंडा को हवा देने वाले NYT ने बांग्लादेश में हिंदू युवक की क्रूरता से की गई हत्या के हत्यारों को ‘मुस्लिम’ बताने से परहेज किया है। NYT ने लिखा है कि दीपू दास की हत्या को उसके ‘को-वर्कर्स’ ने अंजाम दिया है। कथित तौर पर दीपू दास की पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने के कारण हत्या कर दी गई। NYT ने इसे फैक्ट के तौर पर इस्तेमाल किया है, क्योंकि यहाँ एक हिंदू ने उनके मजहब पर टिप्पणी की इसीलिए मुस्लिमों ने जवाब देते हुए उसकी हत्या कर दी, जो सही भी है।

NYT के लेख का स्क्रीनशॉट

NYT लिखता है, “लेकिन दंगों और भीड़ हिंसा की लहर के बीच हुई इस क्रूर हत्या ने बांग्लादेश में पिछले साल छात्रों के नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों में सत्तावादी प्रधानमंत्री को सत्ता से हटाए जाने के बाद से बने तनावपूर्ण नेतृत्व के शून्य को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।” यहाँ बड़ी आसानी से NYT ने मुस्लिमों के क्राइम को बांग्लादेश में विरोध-प्रदर्शनों के बीच छिपा दिया है। वह मानना ही नहीं चाहता है कि यह इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा का नतीजा है और बांग्लादेश में लगातार हिंदुओं पर अत्याचार हो रहे हैं।

भारत के हिंदुओं को बनाया निशाना

NYT ने भारत को भी अपने एजेंडा वाले लेख में घसीटा और दावा किया, “भारत में हिंदू सतर्कता समूहों ने मुस्लिमों और अन्य अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया है। खासकर गोमांस रखने के आरोपों पर।” NYT ने इस मनगढ़ंत दावे के साथ उदाहरण भी पेश किया- “भारत के दक्षिणी भाग में पिछले सप्ताह एक प्रवासी मजदूर की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। पुलिस का कहना है कि भीड़ ने उसे बांग्लादेशी समझ लिया था- भारत के सत्ताधारी हिंदू राष्ट्रवादी राजनेता मुस्लिम प्रवासियों को बांग्लादेशी कहकर पुकारते हैं। 31 वर्षीय राम नारायण बघेल भारत की कठोर जाति व्यवस्था में सबसे निचले पायदान से थे।”

NYT के लेख का स्क्रीनशॉट

यहाँ NYT ने सिर्फ एक उदाहरण देते हुए हिंदुओं को अत्याचारी होने का दावा किया, जबकि इस तथ्य को दरकिनार किया कि बांग्लादेशी घुसपैठिए कैसे भारत में घुसते हैं और नकली पहचान पत्र बना नागरिकता हासिल कर भारतवासियों की वह सारी सुविधा छीनकर अपनी झोली में डालते हैं। NYT जहाँ एकतरफ बांग्लादेश में हिंदू युवक की हत्या पर आरोपितों को मुस्लिम नहीं बता पा रही है, वहीं एक उदाहरण में उसने पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने की कोशिश की है।

दीपू दास की हत्या पर देरी से उठी आवाज, लेकिन वही पुराना नैरेटिव

NYT ने बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की निर्मम हत्या पर बहुत देर से खबर लिखी। लेकिन खबर लिखते समय अपने एजेंडा को नहीं भूले, जहाँ हिंदू समुदाय पर केंद्रित होकर बात करने के बजाए अपना तयशुदा नैरेटिव आगे बढ़ाया। रिपोर्ट में इसे पूरे दक्षिण एशिया में ‘असहिष्णुता के पैटर्न’ से जोड़ दिया गया।

विदेशी मीडिया को पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार अब दिखने लगे हैं, लेकिन भारत को लेकर NYT का वही पुराना रुख है, यहाँ उसे केवल मुस्लिम ही एकमात्र पीड़ित नजर आते हैं। बांग्लादेश में दीपू दास की हत्या पर भी NYT ने साफतौर पर ‘मुस्लिम भीड़’ कहने से बचता नजर आता है, जबकि असलियत कुछ और इशारा करती हैं।

यह रवैया कोई नया नहीं है, बल्कि विदेशी मीडिया का एक आम एजेंडा बन चुका है। भारत में मुस्लिमों के अपराधों या हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है, लेकिन जैसे ही किसी मुस्लिम पर थोड़ी-सी भी आँच आती है तो यही मीडिया तुरंत मुखर हो जाता है।

नकली नहीं है यह कफ सिरप, न जहर है: तमिलनाडु की दवाई से मौत लेकिन UP को लेकर फैलाया भ्रम, कोडिन विवाद से जुड़े हर सवाल का जवाब पाइए एक साथ

उत्तर प्रदेश में कोडिन कफ सिरप विवाद में अब तक 128 FIR दर्ज हुई हैं। 280 ड्रग लाइसेंस रद्द किए गए हैं। सिरप की लाखों शीशियाँ जब्त की गईं हैं। साथ ही, इस मामले से जुड़े 32 प्रमुख आरोपित गिरफ्तार हो चुके हैं।

एक तरफ योगी सरकार इस सिंडिकेट को खत्म करने को लेकर ताबड़तोड़ कार्रवाई कर रही है तो दूसरी तरफ इस मामले को लेकर कई तरह के भ्रम भी फैलाए जा रहे हैं। देश के अलग अलग हिस्सों में कफ सिरप से जुड़ी हुई कई घटनाओं की सूचनाएँ संदर्भ से हटकर गलत ढंग से फैलाई जा रही हैं। हो सकता है ऐसी किसी अफवाह की चपेट में आप भी आए हों, इसलिए हम आपको बताएँगे वो सभी जरूरी बातें जो इस कफ सिरप विवाद के बारे में आपको जानना जरूरी है।

उत्तर प्रदेश का कफ सिरप मामला क्या है?

हमने पहले भी आपको विस्तार से एक लेख के मध्यम से इसके बारे में बताया है। संक्षिप्त में ये समझिए कि कुछ अपराधी तत्वों के द्वारा एक ऐसा रैकेट चलाया जा रहा था जो इन दवाओं की अवैध तस्करी कर रहा था। इसमें जिन सिरप को बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के नहीं बेचा जाना चाहिए, उन्हें बेचा जा रहा था। फर्जी कागजों के जरिए उसकी ओवर स्टॉकिंग की जा रही थी।

फिर शेल कंपनियों के जरिए उसकी तस्करी की जाती थी। जिसका रैकेट ना सिर्फ भारत के कश्मीर और पश्चिम बंगाल तक फैला था बल्कि सरहद पार बांग्लादेश तक फैला हुआ था। उत्तर प्रदेश STF के द्वारा सूचना मिलने पर लखनऊ में एक छापा मारा गया और वहाँ से ये पूरा मामला खुला।

क्या इस कफ सिरप को बेचना अवैध है या ये कफ सिरप मिलावटी है?

नहीं। FSDA (Food Safety and Drug Administration) कमिश्नर रौशन जैकब ने 8 दिसंबर को यूपी में हुई संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये स्पष्ट किया था कि अभी तक जितने मामले सामने आए हैं वो ओवर स्टॉकिंग और उसकी अवैध बिक्री और तस्करी के हैं।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिन भी कफ सिरप को जब्त किया गया है उनको बेचना अवैध नहीं है। यह शेड्यूल एच की कफ सिरप है, जो मनुष्यों के उपयोग के लिए चिकित्सकीय परामर्श पर लेना सही है। इसकी जब्ती का आधार बगैर नियम-कायदे कानून के इसकी बिक्री करना है। साथ ही, इस कफ सिरप तस्करी का मामला नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (एनडीपीएस) ऐक्ट के दायरे में शामिल किया गया है जिसके चलते आरोपितों की जमानत नहीं हो पा रही है।

क्या तमिलनाडु कफ सिरप केस का इस मामले से है कनेक्शन?

तमिलनाडु में बनाई गई कफ सिरप पीने से मध्य प्रदेश और राजस्थान में बच्चों की मौत हुई थी वो मामला बिल्कुल अलग था। उत्तर प्रदेश में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत होने का कोई मामला सामने नहीं आया है। तमिलनाडु के मामले की केंद्र सरकार जाँच कर रही है। उत्तर प्रदेश से इसे जोड़कर केवल भ्रम फैलाया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में जिस कफ सिरप के मामले की जाँच हो रही है वो वैध दवाओं के अवैध तस्करी से जुड़ा मामला है। अतः यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में होने वाली कार्रवाई का मध्य प्रदेश या राजस्थान के मामले से कोई संबंध नहीं है।

क्या इसका उपयोग नशे के तौर पर किया जाता है?

मूलतः यह सिरप खाँसी और उसके दर्द को ठीक करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह ओपियोइड है यानि इसमें अफीम से निकलने वाले पदार्थ का इस्तेमाल होता है। प्रति पाँच मिलीलीटर में दस से बीस मिलीग्राम कोडिन का उपयोग किया जाता है, जिससे या सिरप तैयार होती है।

चिकित्सकीय परामर्श पर जिस मात्रा में इसका उपयोग किया जाता है तब यह सामान्य दवा के तौर पर काम करता है। किंतु जाँच में सामने आया कि नशे के आदी लोगों के द्वारा इसकी काफी अधिक मात्रा का सेवन किया जाता है। और इसमें मौजूद कोडिन अधिक मात्रा में जब सेवन की जाती है तो छह से आठ घंटे तक के लिए नशे का काम करता है।

क्यों 120 रुपए की सिरप 1500 रुपए तक बिकती है?

बांग्लादेश जैसे मुस्लिम बहुल देशों और भारत में उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और सिक्किम के वे क्षेत्र जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक है, वहाँ पर इसका उपयोग नशे के तौर पर किया जा रहा है। चूँकि, इस्लाम में शराब को हराम माना जाता है तो यह कफ सिरप नशे का एक ‘हलाल’ माध्यम बन गया। और इसी वजह से 120 से 160 रुपए में मिलने वाली ये कफ सिरप 1200 से 1500 रुपए तक के दामों पर बिक रही है।

स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश का जो कफ सिरप का मामला है वो पूरी तरह से अवैध भंडारण और बिक्री से जुड़ा है। दवाई के नकली होने या उससे मौत होने के मामले अभी तक सामने नहीं आए हैं। तमिलनाडु के कफ सिरप से हुई मौतों से इसे जोड़कर भ्रम फैलाया जा रहा है ताकि इस सिंडिकेट के खिलाफ कठोर कार्रवाई कर रही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को बदनाम किया जा सके।

अरावली के संरक्षण को मजबूत बनाने वाला SC का ऐतिहासिक फैसला, लेकिन तेज हो गया ‘सेव अरावली’ आंदोलन: जानें- इस विवाद के पीछे हैं कौन से लोग

अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर-पश्चिम भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा की रीढ़ है। गुजरात से दिल्ली तक फैली यह प्राचीन पर्वतमाला थार मरुस्थल को रोकती है, भूजल स्तर बनाए रखती है, जैव विविधता को संरक्षण देती है और दिल्ली-एनसीआर समेत पूरे क्षेत्र की जलवायु को संतुलित करती है।

केंद्र सरकार लंबे समय से अरावली के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है और नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इसे और मजबूत बनाने वाला कदम मानती है। इस फैसले ने अरावली की एक यूनिफॉर्म परिभाषा स्वीकार की, जिससे संरक्षण का दायरा स्पष्ट और वैज्ञानिक हो गया।

केंद्र सरकार का स्पष्ट कहना है कि नई परिभाषा से अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र पूरी तरह संरक्षित रहेगा। केवल 0.19 प्रतिशत इलाके में ही सीमित और नियंत्रित खनन संभव होगा, जो पहले से चल रही वैध लीजों तक सीमित है।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसे ‘अरावली के लिए सुरक्षा कवच’ बताया और कहा कि यह फैसला अवैध खनन पर लगाम लगाएगा तथा सस्टेनेबल डेवलपमेंट को बढ़ावा देगा। सरकार का मानना है कि यह कदम पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाता है।

हालाँकि इस फैसले के बाद राजस्थान में ‘सेव अरावली’ आंदोलन तेज हो गया। कुछ पर्यावरणविदों और विपक्षी दलों का कहना है कि नई परिभाषा से संरक्षण कमजोर होगा।

लोग डरते हैं कि नई परिभाषा से अरावली के बड़े हिस्से को सुरक्षा कवच से बाहर कर दिया जाएगा, जिससे खनन और व्यावसायिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी। लेकिन केंद्र सरकार इसे गलतफहमी करार देती है और तथ्यों के आधार पर स्पष्ट करती है कि यह फैसला अरावली को और मजबूत सुरक्षा देगा।

इस लेख में हम पूरी स्थिति समझेंगे कि ये फैसला क्या है, सरकार का पक्ष क्यों मजबूत है, ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट की भूमिका क्या है और आंदोलन में राजनीतिक रंग क्यों दिख रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला काफी अहम, वैज्ञानिक परिभाषा के साथ संरक्षण पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर अरावली हिल्स की यूनिफॉर्म परिभाषा स्वीकार की, जिसमें 100 मीटर से ऊपर की ऊंचाई वाली पहाड़ियां मुख्य रेंज का हिस्सा मानी गईं। पहले अलग-अलग राज्यों में अलग परिभाषाएं थीं, जिससे अवैध खनन और अतिक्रमण को बढ़ावा मिलता था। अब स्पष्ट और वैज्ञानिक मानदंड अपनाए गए हैं।

केंद्र सरकार का दावा है कि इस परिभाषा से कानूनी तौर पर 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संरक्षित रहेगा। केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र में ही पहले से चल रही वैध माइनिंग लीजों के तहत सीमित खनन हो सकता है। नई माइनिंग लीज पर पूरी रोक लगा दी गई है और सस्टेनेबल माइनिंग प्लान बनाने का आदेश दिया गया है। पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि यह फैसला अवैध खनन करने वालों पर सख्त कार्रवाई का रास्ता खोलेगा, क्योंकि अब संरक्षित क्षेत्र की सीमाएँ बिल्कुल स्पष्ट हैं।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि अरावली की कम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ भी पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं और उन्हें अन्य कानूनों जैसे फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट, वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट और इको-सेंसिटिव जोन नोटिफिकेशन के तहत संरक्षण मिलता रहेगा। नतीजतन कुल संरक्षित क्षेत्र पहले से ज्यादा प्रभावी होगा।

केंद्र सरकार का पक्ष- संरक्षण पहले, विकास संतुलित

केंद्र सरकार बार-बार जोर देती है कि अरावली उसकी प्राथमिकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में कई पहलें चल रही हैं। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा, “हम अरावली को बचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। नई परिभाषा से संरक्षण मजबूत हुआ है, अवैध खनन रुकेगा और केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र में ही नियंत्रित खनन होगा। यह पर्यावरण और विकास का संतुलन है।”

सरकार का तर्क है कि पहले अस्पष्ट परिभाषा के कारण अवैध खनन फल-फूल रहा था। अब स्पष्ट सीमाओं से सैटेलाइट मॉनिटरिंग, ड्रोन सर्विलांस और सख्त कानूनी कार्रवाई आसान होगी। राजस्थान, हरियाणा और गुजरात में पहले से चल रही रिस्टोरेशन परियोजनाएं भी तेज होंगी।

ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट है अरावली को हरा-भरा बनाने की महत्वाकांक्षी योजना

केंद्र सरकार की सबसे बड़ी पहलों में से एक ‘अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट’ है। यह वैश्विक ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ का भारतीय संस्करण है, जिसका उद्देश्य अरावली की 700 किलोमीटर लंबाई के आसपास 5 किलोमीटर बफर जोन में बड़े पैमाने पर हरियाली विकसित करना है। यह गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के 29 जिलों को कवर करेगा।

प्रोजेक्ट में लाखों पेड़ लगाने, जल संरक्षण संरचनाएँ बनाने और स्थानीय प्रजातियों को बढ़ावा देने की योजना है। सरकार का कहना है कि इससे मरुस्थलीकरण रुकेगा, कार्बन सिंक बढ़ेगा और जैव विविधता मजबूत होगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह प्रोजेक्ट और प्रभावी होगा, क्योंकि संरक्षित क्षेत्र स्पष्ट होने से फंड और संसाधन सही जगह लगेंगे।

केंद्र ने राज्यों के साथ मिलकर स्थानीय समुदायों को इसमें शामिल करने की योजना बनाई है, ताकि यह सिर्फ सरकारी प्रोजेक्ट न रहे बल्कि जन आंदोलन बने।

हालाँकि मौजूदा विवाद में लोग इसे सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा से जोड़कर देख रहे हैं। उनका डर है कि संरक्षित क्षेत्र कम होने से ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट सिर्फ नाम का रह जाएगा और खनन कंपनियाँ बफर जोन में भी घुस आएँगी। कुछ पर्यावरणविद कहते हैं कि ग्रीन वॉल को सिर्फ पौधारोपण नहीं, बल्कि पूरे इकोसिस्टम की रिस्टोरेशन बनाना चाहिए- रिज टू वैली ट्रीटमेंट, अवैध खनन पर सख्ती और स्थानीय समुदायों की भागीदारी। लेकिन फिलहाल यह प्रोजेक्ट भी विवाद की छाया में है

‘सेव अरावली’ आंदोलन, गलतफहमी या राजनीति?

फैसले के बाद राजस्थान में प्रदर्शन शुरू हो गए। जयपुर, अलवर, सीकर समेत कई शहरों में लोग सड़कों पर उतरे। #SaveAravalli सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। आंदोलन में पर्यावरणविद जैसे राजेंद्र सिंह, नीलम अहलूवालिया और कुछ स्थानीय ग्रामीण शामिल हैं।

केंद्र सरकार इसे गलतफहमी मानती है और कहती है कि प्रदर्शनकारी नई परिभाषा के फायदों को नहीं समझ रहे। सरकार ने स्पष्ट किया कि 90% से ज्यादा क्षेत्र संरक्षित है और खनन सिर्फ 0.19% तक सीमित। कुछ प्रदर्शनों में कॉन्ग्रेस नेताओं की मौजूदगी से राजनीतिक रंग भी दिख रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र पर खनन माफिया को फायदा पहुँचाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 100 मीटर की सीमा सरकार के अपने रिकॉर्ड्स के खिलाफ है। लेकिन केंद्र और भाजपा का आरोप है कि गहलोत के कार्यकाल में भी अरावली में अवैध खनन चला और लैंड एक्सचेंज के प्रस्ताव आए, जिनसे 50 से ज्यादा मार्बल-डोलोमाइट खदानें फिर खुलने वाली थीं। सरिस्का टाइगर रिजर्व के आसपास क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट घोषित करने में भी देरी के आरोप लगे।

सरकार का कहना है कि राजनीतिक लाभ के लिए पर्यावरण के नाम पर भ्रम फैलाया जा रहा है। तथ्य बताते हैं कि वर्तमान सरकार ने अरावली संरक्षण के लिए सबसे ज्यादा कदम उठाए हैं।

संरक्षण और विकास का संतुलन

अरावली का मामला सिर्फ राजस्थान का नहीं, पूरे उत्तर भारत का है। अगर यह प्राचीन पर्वतमाला नष्ट हुई तो थार मरुस्थल दिल्ली तक पहुँच जाएगा, भूजल खत्म हो जाएगा और जैव विविधता का बड़ा नुकसान होगा। पर्यावरणविद कहते हैं कि अरावली को संवैधानिक पर्यावरणवाद के तहत मजबूत सुरक्षा दी जानी चाहिए।

हालाँकि केंद्र सरकार अरावली को लेकर पूरी तरह सजग है। नई परिभाषा से संरक्षण मजबूत हुआ है, अवैध गतिविधियां रुकेंगी और ग्रीन वॉल जैसे प्रोजेक्ट तेजी से आगे बढ़ेंगे। केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र में सीमित खनन का प्रावधान भी सख्त नियंत्रण में होगा।

आंदोलन करने वालों से सरकार की अपील है कि तथ्यों को समझें और संवाद करें। अगर कोई वास्तविक चिंता है तो उसे दूर किया जाएगा। अरावली का संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकता है और केंद्र सरकार इसे किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देगी।

यह फैसला आने वाली पीढ़ियों के लिए अरावली को सुरक्षित रखने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। पर्यावरण और विकास का संतुलन ही सच्चा विकास है और केंद्र सरकार इसी रास्ते पर चल रही है।

न्यूजीलैंड में भारत के साथ FTA का विरोध, डेयरी प्रोडक्ट्स और फार्मिंग का मुद्दा उठा रहा वहाँ का विपक्ष: US से भी इसी मुद्दे पर गतिरोध, समझिए- क्यों पीछे नहीं हट रही मोदी सरकार

भारत और न्यूजीलैंड के बीच FTA को लेकर सहमति बन गई है। इस पर 2026 के पहली तिमाही में हस्ताक्षर होने की उम्मीद है। इस समझौते के बाद न्यूजीलैंड का बाजार भारत के सारे सामानों के लिए खुल जाएगा और वह भी बगैर टैक्स के। अमेरिकी टैरिफ का भारत के जिन उद्योगों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है वे हैं कपड़ा, जूट, ज्वैलरी आदि। इन उद्योगों को भी नया बाजार मिलेगा, रोजगार बढ़ेंगे। 2047 तक विकसित भारत के संकल्प को इससे मजबूती मिलेगी।

भारत में अगले 5 सालों में होगा 1.6 लाख करोड़ का निवेश

न्यूजीलैंड से समझौते के बाद सभी प्रोडक्ट के लिए बाजार पूरी तरह खुल जाएगा। टैक्स नहीं होने पर ये सस्ते मिलेंगे। जाहिर है ये बिकेंगे भी। इससे इन उद्योगों को काफी फायदा होगा। इन उद्योगों में मजदूरों की ज्यादा जरूरत होती है इसलिए भारत में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। न्यूजीलैंड ने अगले 5 सालों में भारत में 20 बिलियन डॉलर यानी 1.6 लाख करोड़ रुपए से अधिक के निवेश का भरोसा दिया है। भारत से न्यूजीलैंड को जो भी सामान निर्यात होंगे उनपर टैरिफ नहीं लगेगा। इसका फायदा दूसरे उद्योगों को भी होगा।

मोदी सरकार ने अपनी पॉलिसी न बदलते हुए किसानों के हितों का पूरा ख्याल रखा है। भारत न्यूजीलैंड के ज्यादातर प्रोडक्ट पर टैरिफ नहीं लगाएगा, लेकिन डेयरी प्रोडक्ट जैसे घी,दूध, दही, बटर,पनीर आदि के अलावा सब्जी, चना, मटर, मीट, चीनी, ज्वैलरी, तांबा और एल्यूमीनियम जैसे सेक्टर्स पर कोई टैरिफ कम नहीं करेगा। भारत ऐसा कर किसानों के साथ- साथ व्यापारियों को भी राहत देना चाहता है।

50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने के बावजूद अमेरिका के साथ भी व्यापार समझौते को लेकर लगातार बातचीत हो रही है, लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि किसानों के हित को कभी भी अनदेखा नहीं किया जाएगा। जबकि अमेरिका अपने माँसाहार मवेशियों के दूध, चीज, बटर और दूसरे प्रोडक्ट भारत में खपाना चाहता है। भारत इसके लिए तैयार नहीं है।

न्यूजीलैंड के माँस, ऊन, कोयला, लकड़ी टैरिफ फ्री

कुछ ऐसी ही स्थिति न्यूजीलैंड के साथ भी है। यहाँ की डेयरी प्रोडक्ट के लिए भारत अपना टैरिफ कम करने को तैयार नहीं है। इसका न्यूजीलैंड में विरोध हो रहा है। लेकिन न्यूजीलैंड से आने वाले माँस, ऊन, कोयला और लकड़ी के सामान पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा। इसके अलावा कीवी, सेब,चेरी, एवोकैडो और शहद पर भारत टैरिफ में छूट देगा, इसका न्यूजीलैंड को फायदा होगा। भारत में लोगों को ये चीजें सस्ती मिलेंगी।

छात्रों से लेकर पेशेवरों तक को फायदा

जो छात्र पढ़ाई के लिए न्यूजीलैंड जाना चाहते हैं, उन्हें काफी फायदा होने जा रहा है। साइंस और टेक की पढ़ाई करने वाले ग्रेजुएशन और मास्टर छात्रों को कोर्स के बाद 3 साल और पीएचडी करने के बाद 4 साल जॉब कम से कम कर सकेंगे। इसके अलावा हर साल करीब 5000 भारतीय प्रोफेशनल्स को अस्थायी नौकरी वीजा दिये जाएँगे। इससे आईटी, हेल्थकेयर, इंजीनियरिंग, आयुष डॉक्टर, संगीत के टीचर, योग के टीचर को खास तौर पर फायदा मिलेगा। न्यूजीलेंड सालाना 1000 वर्क एंड हॉलीडे वीजा भी देगा।

न्यूजीलेंड में क्यों हो रहा विरोध?

न्यूजीलैंड एक कृषि प्रधान देश है। यह दुनिया के सबसे बड़े डेयरी निर्यातक देशों में एक है। हालाँकि समझौते के तहत ऊन पर टैरिफ नहीं लगेगा, लेकिन माँस, दूध, दही, बटर वगैरह पर भारत ने अपनी नीति के अनुरूप टैरिफ कम नहीं की है। इसके अलावा भारतीयों को इमीग्रेशन छूट दिए जाने पर चिंता जताई जा रही है।

विदेश मंत्री विंस्टन पीटर ने भारत के साथ हुए नए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की आलोचना करते हुए इसे ‘बुरा सौदा’ करार दिया है। उनके मुताबिक, इसमें भारत को बहुत कुछ दिया गया है, खासकर इमिग्रेशन में और बदले में न्यूजीलैंड के लोगों को डेयरी सहित काफी क्षेत्रों में कुछ नहीं मिला है।

पीटर ने कहा कि उनकी पार्टी न्यूजीलैंड फर्स्ट इस समझौते के सख्त खिलाफ है। संसद में इससे संबंधित बिल के खिलाफ वोट करेंगे। पीटर्स का मानना है कि यह समझौता न तो ‘मुक्त’ है और न ही ‘निष्पक्ष’। उन्होंने चिंता जताई कि यह न्यूजीलैंड के आर्थिक और मजदूरों के हितों की ठीक से रक्षा नहीं करता।

पीटर्स ने आरोप लगाया कि नेशनल पार्टी ने समझौते को जल्दीबाजी में निपटाने के चक्कर में क्‍वालिटी से समझौता किया। उनकी पार्टी ‘न्यूजीलैंड फर्स्ट’ चाहती थी कि सरकार तीन साल का पूरा समय लेकर बेहतर शर्तों के साथ समझौता करे। बजाय इसके कि वे जल्दबाजी में ‘घाटे का सौदा’ कर लिया। पीटर्स ने कहा, ‘दुर्भाग्य से इन बातों पर ध्यान नहीं दिया गया।’ उन्होंने आगे कहा, ” प्रधानमंत्री की नेशनल पार्टी ने न्यूजीलैंड के लोगों और भारतीयों दोनों के लिए फायदेमंद हों, ऐसा निष्पक्ष सौदा करने के लिए काफी होमवर्क करना था, लेकिन प्रधानमंत्री की पार्टी ने ‘घाटे वाला सौदा’ करना पसंद किया।”

न्यूजीलेंड के विदेश मंत्री ने कहा कि इस टर्म में विदेश मंत्री के तौर पर ऑस्ट्रेलिया और पैसिफिक के बाहर हमारा पहला दौरा भारत का था और हम इस साल वहाँ से लौटे हैं। और हमारे कहने पर, विदेश मंत्रालय और व्यापार मंत्रालय ने भारत में हमारे पोस्ट और वेलिंगटन में हेड ऑफिस, दोनों जगह भारत-NZ रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए दिए जा रहे रिसोर्स में काफी बढ़ोतरी की है।

हम भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर को लंबे समय से जानते हैं, और एक इंटरनेशनल स्टेट्समैन और न्यूज़ीलैंड-भारत रिश्तों के चैंपियन के तौर पर उनके लिए बहुत सम्मान रखते हैं।

पीएम क्रिस्टोफर ने समझौते का किया समर्थन

न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने समझौते को न्यूजीलैंड के लिए फायदेमंद बताया। उन्होंने कहा कि भारत का विशाल बाजार न्यूजीलेंड की जनता के लिए नए अवसर लेकर आएगा। इससे आर्थिक विकास होगा, बेरोजगारी घटेगी और नए अवसर पैदा होंगे। उन्होंने कहा कि 2022 के चुनाव में जनता से किए गए वादे के मुताबिक उन्होंने इस समझौता के लिए अपनी सहमति दी है। इस पर 2026 के पहले तिमाही में हस्ताक्षर हो जाएगा।

पीएम मोदी ने एफटीए पर सहमति बनने के बाद न्यूजीलेंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर से बात की। पीएम मोदी ने एक्स पर इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि सिर्फ 9 दिनों में FTA पर सहमति बनना भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है।

न्यूजीलैंड सातवाँ ऐसा देश होगा जिसके साथ भारत FTA करने जा रहा है। केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, यह भारत की पहली ऐसी डील है, जिसमें वार्ता करने वाली टीम में सभी महिलाएँ थी। ज्वाइंट सेक्रेटरी पेटल ढिल्लों ने इस टीम का नेतृत्व किया। ये भी एक रिकॉर्ड है कि मात्र 9 महीने में इस डील को फाइनल किया गया। अब तक भारत ने 7 देशों के साथ एफटीए किया है। साथ ही, कई देशों के अलावा यूरोपीय यूनियन, अफ्रीकन यूनियन के साथ बड़ी डील की है।

‘भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की उदाहरण सहित व्याख्या करें?’: जामिया मिलिया इस्लामिया ने BA की परीक्षा में पूछा सवाल, ऑपइंडिया से बोले रजिस्ट्रार- कार्रवाई करेंगे

दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया में अब पढ़ाई के नाम पर प्रोपेगेंडा फैलाने की साजिशें शुरू हो गई हैं। प्रोपेगेंडा भी ऐसा कि भारत की छवि को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताने की कोशिशें शुरू कर दी गई हैं। जामिया यूनिवर्सिटी के प्रशासन ने खुद तो मान लिया है कि देश में मुस्लिमों के खिलाफ हिंसा होती है और यही बात छात्रों से जबरन कहलवाई जा रही है।

जामिया के मुस्लिमों से जुड़े सवाल पर विवाद

दरअसल, यह विवाद परीक्षा में पूछे गए एक सवाल से शुरू हुआ है। जामिया मिलिया इस्लामिया में BA (Honours) Social Work के सेमस्टर एग्जाम में सवाल पूछा गया है कि ‘Discuss the atrocities against Muslim Minorities in India giving suitable examples’ यानी ‘भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचारों पर उचित उदाहरणों के साथ चर्चा करें’। इस सवाल के बाद सोशल मीडिया पर जामिया को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई।

सोशल मीडिया पर शुरू हुई आलोचना

जैसे ही एग्जाम से जुड़ी यह खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर इसे लेकर जामिया पर सवाल उठने शुरू हो गए। कहीं लोगों ने इसे बांग्लादेश की हिंसा से जोड़ा तो कहीं इसे जामिया का पुराना पैटर्न बताया गया है।

VHP के राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. प्रवेश कुमार चौधरी ने X पर एक पोस्ट में इसे चिंता जनक बताया है। उन्होंने X पर लिखा, “…विषय पर उदाहरण सहित चर्चा का प्रश्न पूछा जाना अत्यंत चिंताजनक है।” उन्होंने कहा, “आज जब बांग्लादेश में हिंदुओं पर बर्बर अत्याचार हो रहे हैं। ऐसे समय में भारत के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की परीक्षा में इस प्रकार का प्रश्न पूछा जाना देश और हिंदू समाज के विरुद्ध है।”

एक X यूजर ने लिखा, “जामिया में बच्चे को हिन्दुओं एवं अन्य धर्म के प्रति कट्टर बनाया जा रहा है। सरकार संज्ञान ले।” एक अन्य ने लिखा, “जामिया करके एक यूनिवर्सिटी है भारत में, जो अपने स्टूडेंट्स को एग्जाम के नाम पर कैसे रैडिकलाइज कर रही है।” इसी तरह सैकड़ों लोगों ने जामिया पर सवाल उठाते हुए इस मामले में कार्रवाई करने की बात कही है।

रजिस्ट्रार ने कहा- कार्रवाई करेंगे

इस मामले में जामिया मिलिया इस्लामिया का प्रशासन बात करने से बच रहा है। हमने इस मामले में सोशल वर्क विभाग के प्रमुख रवींद्र रमेश पाटिल से बातचीत करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई। उनके अलावा हमने परीक्षा विभाग से जुड़े एहतशाम उल हक से भी बातचीत करने की कोशिश की लेकिन उनसे भी संपर्क नहीं हो सका। इस मामले में हमने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार मोहम्मद मेहताब आलम रिजवी से बात की है।

मेहताब आलम रिजवी ने ‘ऑपइंडिया’ से बातचीत में कहा है कि इस तरह के प्रश्न पूछा जाना पूरी तरह से गलत है। रिजवी ने इसे प्रश्न-पत्र सेट करने वालों पर टाल दिया है। हालाँकि, उन्होंने ऑपइंडिया से बातचीत में इस बात का आश्वासन दिया है कि इस तरह के सवाल पूछने वालों की जाँच की जाएगी और जो जरूरी होगा वो कार्रवाई भी की जाएगी।

जामिया की मीडिया संयोजक साईमा सईद ने ‘ऑपइंडिया’ से बातचीत में कहा है कि मामले की जाँच शुरू कर दी गई है और इसे बनाने वाले टीचर को ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा। उन्होंने इस तरह के सवाल पूछे जाने को पूरी तरह गलत बताया है।

पहले भी हिंदुओं के साथ भेदभाव का सामने आया है मामला

यह कोई पहली बार नहीं है जब गैर-मुस्लिमों का इस तरह उत्पीड़न किया गया है या उनके साथ भेदभाव की रिपोर्ट सामने आई है। पिछले वर्ष दिल्ली की जामिया मिलिया इस्लामिया में गैर-मुसलमानों के साथ होने वाले भेदभाव और उनपर डाले जाने वाले धर्मांतरण के दबाव को लेकर ‘कॉल फॉर जस्टिस’ ट्रस्ट की एक रिपोर्ट सामने आई थी।

इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि गैर-मुस्लिम महिला सहायक प्रोफेसर ने बताया कि उन्होंने यूनिवर्सिटी में शुरू से ही भेदभाव महसूस किया जहाँ मुस्लिम कर्मचारी गैर मुसलमानों के साथ दु‌र्व्यवहार और भेदभाव करते थे। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि गैर-मुस्लिम महिला सहायक प्रोफेसर ने बताया कि उन्होंने यूनिवर्सिटी में शुरू से ही भेदभाव महसूस किया जहाँ मुस्लिम कर्मचारी गैर मुसलमानों के साथ दु‌र्व्यवहार और भेदभाव करते थे।

रिपोर्ट में कहा गया था कि एक अनुसूचित जनजाति के एक पूर्व छात्र ने बताया था कि कैसे Med पूरा करने के दौरान एक मुस्लिम शिक्षक ने उनसे क्लास में कहा था कि जब तक वह इस्लाम का पालन नहीं करते, उसकी MED पूरी नहीं होगी। 

UP में ‘खेत तालाब योजना’ की सफल कहानी, अब बारिश के भरोसे नहीं रहे बुंदेलखंड के किसान: योगी सरकार ने बनवाए 37000+ तालाब, भूजल स्तर भी सुधरा

उत्तर प्रदेश सरकार की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चल रही ‘खेत तालाब योजना’ पानी बचाने और सिंचाई में मदद करने वाली एक बड़ी योजना है। यह योजना 2017 में शुरू हुई थी। इसका मकसद है कि किसान अपने खेतों में छोटे-छोटे तालाब बनवाएँ, बारिश का पानी उसमें जमा करें और सूखे के दिनों में फसलों की सिंचाई के लिए उसका इस्तेमाल करें।

यह योजना राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के तहत चल रही है और भारत सरकार से भी पैसा मिलता है। राज्य और केंद्र सरकार मिलकर 50-50 फीसदी खर्च उठाते हैं। योजना का मुख्य उद्देश्य है कि भूजल पर निर्भरता कम हो, सिंचाई ज्यादा भरोसेमंद बने और खेती मजबूत हो।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में इस योजना ने सूखे वाले इलाकों में बड़ा बदलाव लाया है। पहले यह योजना बुंदेलखंड के सात जिलों में शुरू हुई थी, अब पूरे राज्य के कई जिलों में फैल चुकी है। ऑपइंडिया ने आरटीआई के जरिए जो आधिकारिक आँकड़े हासिल किए हैं, वे बताते हैं कि इस योजना का दायरा लगातार बढ़ता गया है।

क्यों शुरू की गई खेत तालाब योजना?

दशकों से बुंदेलखंड के किसान सूखे, सूखे कुओं और फसल खराब होने की समस्या से जूझते थे। गर्मी आते ही हैंडपंप सूख जाते थे और खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर रहती थी। खेत तालाब योजना इसी समस्या का छोटा-मोटा, स्थानीय समाधान है। खेत में बने तालाब बारिश का पानी रोकते हैं, जिसे किसान जरूरत पड़ने पर फसल को पानी दे सकते हैं। लंबे समय में भूजल स्तर भी सुधरता है।

यूपी तक की एक रिपोर्ट में बुंदेलखंड के बदलाव को ‘खामोश बदलाव’ बताया गया है। खेतों में छोटे तालाब बनने से अब साल भर सिंचाई हो रही है। पानी की उपलब्धता बढ़ने से खेती सुधरी है और किसानों को मछली पालन से अतिरिक्त कमाई भी हो रही है।

खेत तालाब योजना कई चरणों में, बुंदेलखंड से हुई शुरुआत

उत्तर प्रदेश सरकार की वेबसाइट के अनुसार योजना की शुरुआत बुंदेलखंड के सात जिलों में हुई थी। पहले चरण में 12.20 करोड़ रुपए खर्च करके 2,000 तालाब बनाए गए। ये सात जिले थे झाँसी, जालौन, ललितपुर, बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर और महोबा।

अगले चरण में योजना 73 जिलों तक फैली। इसके लिए 167 विकास खंडों को चुना गया, जहाँ पानी की जरूरत ज्यादा थी और भूजल की स्थिति चिंताजनक थी। इन 73 जिलों में 27.88 करोड़ रुपए खर्च करके 3,384 तालाब बनाए गए। इसके बाद राज्य और केंद्र सरकार ने लगातार पैसा दिया।

पूरे उत्तर प्रदेश में इस योजना के तहत अब तक 37,403 तालाब बन चुके हैं। एक तरफ जहाँ साल 2017-18 में 2,000 तालाब बने थे, तो 2022-23 में सबसे ज्यादा 6,306 तालाब बने।

साल दल साल बने तालाबों की संख्या

आरटीआई से मिली अहम जानकारियाँ, बुंदेलखंड को मिला सबसे ज्यादा फायदा

उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के मृदा संरक्षण विंग ने ऑपइंडिया के आरटीआई के जवाब में बताया कि योजना शुरू होने से अब तक 37,403 तालाब बनाए गए हैं। राज्य सरकार ने कुल 311.43 करोड़ रुपए अनुदान दिए हैं।

आँकड़ों से पता चलता है कि शुरुआती सात बुंदेलखंड जिले हर साल सबसे ज्यादा लाभ पाते रहे हैं। 2016-17 से 2024-25 तक के कुल अनुदान में इन जिलों पर लगातार फोकस रहा।

इस योजना के तहत झाँसी में सबसे ज्यादा 6,213 तालाब बने, बाँदा में 4,743, जालौन में 4,504, महोबा में 4,321, चित्रकूट में 4,228, हमीरपुर में 3,922 और ललितपुर में 3,200 तालाब बने।

जिलावास तालाब की स्थिति

यह निरंतरता दिखाती है कि बुंदेलखंड को सिर्फ शुरुआती प्रयोग नहीं समझा गया, बल्कि योजना के फैलने के बाद भी यहाँ सरकार की ओर से बड़ा सहयोग मिलता रहा।

जमीन पर लोगों की राय और योजना का मकसद

आँकड़ों से आगे बढ़कर लाभार्थियों की बात करें, तो लाभ पाने वाले लोगों की बातें योजना के उद्देश्य से बिल्कुल मेल खाती हैं। बाँदा के लुकतरा गाँव में लोगों ने बताया कि अब रोजमर्रा के पानी और पशुओं के लिए पानी उपलब्ध है, खेती बारिश पर निर्भर नहीं रह गई है। झाँसी के एक किसान ने कहा, “हम अब बारिश पर निर्भर नहीं रहते।”

यूपी तक से बात करते हुए झाँसी के एक सरकारी कृषि अधिकारी ने योजना की कार्यप्रणाली के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि अनुदान सीधे डीबीटी से किसानों के खाते में जाता है। झाँसी में छह हजार से ज्यादा तालाब बन चुके हैं। आरटीआई के आँकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। अधिकारी ने कहा कि योजना से स्थानीय भूजल स्तर में काफी सुधार हुआ है।

बुंदेलखंड के बाहर भी योजना का विस्तार

बुंदेलखंड के बाद योजना कई अन्य जिलों में फैली। इनमें मेरठ, गाजियाबाद, शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बागपत, गौतम बुद्ध नगर, अलीगढ़, हाथरस, कासगंज, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, मथुरा, आगरा, फिरोजाबाद, इटावा, फर्रुखाबाद, कन्नौज, कानपुर देहात, कानपुर नगर, उन्नाव, मैनपुरी, इटावा, औरैया, बरेली, बिजनौर, बदायूँ, पीलीभीत, रामपुर, मुरादाबाद, संभल, अयोध्या, अंबेडकर नगर, गोंडा आदि शामिल हैं।

योजना का यह विस्तार दिखाता है कि राज्य सरकार ने पहले बुंदेलखंड पर फोकस किया और फिर पूरे उत्तर प्रदेश के पानी की समस्या वाले इलाकों तक पहुँचाया।

खेत तालाब योजना के लिए यूपी-केंद्र सरकार ने दिया फंड

खेत तालाब योजना के लिए पैसा चरणबद्ध तरीके से बढ़ता गया। 2016-17 में ₹12.20 करोड़, 2017-18 में ₹24.50 करोड़, 2018-19 में ₹43.22 करोड़ दिए गए। बाद के सालों में भी खर्च बड़ा रहा। 2022-23 में सबसे ज्यादा ₹63.51 करोड़, फिर 2023-24 में ₹35.81 करोड़ और 2024-25 में ₹10.77 करोड़। कुल मिलाकर अब तक 311.43 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं।

खेत तालाब योजना के तहत साल दर साल सरकार द्वारा दिए गया फंड

तालाबों के साइज के आधार पर सरकार देती है पैसा

मान लीजिए कि इस योजना में दो साइज के तालाब हैं, दोनों की गहराई 3 मीटर है। छोटा तालाब 22x20x3 मीटर का होता है, जिसकी अनुमानित लागत 1,05,000 रुपए है। मध्यम तालाब 35x30x3 मीटर का होता है, लागत 2,28,400 रुपए है।

इसके लिए किसानों को 50 फीसदी अनुदान मिलता है, जो डीबीटी से सीधे खाते में जाता है। आमतौर पर काम की प्रगति और पूरा होने पर किस्तों में पैसा मिलता है। इससे छोटे-सीमांत किसानों के लिए निर्माण आसान हो जाता है और वे खुद भी योगदान देते हैं।

खेत तालाब योजना के लिए पात्रता, किसे मिलती है प्राथमिकता और योजना की शर्तें क्या हैं

खेत तालाब योजना में अनुसूचित जाति-जनजाति, अल्पसंख्यक और छोटे-सीमांत किसानों को प्राथमिकता है, लेकिन आरटीआई जवाब में राज्य कृषि विभाग ने कहा कि इस तरह का अलग डेटा रखा नहीं जाता। किसान को आवेदन करना पड़ता है, जिला स्तर से मंजूरी मिलती है। एक किसान को सिर्फ एक तालाब के लिए ही मदद मिल सकती है।

इस योजना के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन जरूरी है और रजिस्ट्रेशन में खेत तालाब विकल्प चुनना पड़ता है।

एक बड़ी शर्त यह है कि लाभार्थी के पास पिछले सात साल में कृषि या उद्यान विभाग से लगा हुआ और अभी चल रहा माइक्रो सिंचाई सिस्टम (ड्रिप या स्प्रिंकलर) होना चाहिए।

कैसे आवेदन करें, कहाँ करें और जरूरी कागजात क्या चाहिए

खेत तालाब योजना के लिए आवेदन उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के पोर्टल agridarshan.up.gov.in पर ऑनलाइन करना होता है।

आवेदक अपनी और जमीन की जानकारी भरते हैं, जरूरी दस्तावेज अपलोड करते हैं और आवेदन के समय टोकन राशि जमा करते हैं। चयन पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर होता है। इसकी पात्रता का सत्यापन होता है और फिर आगे का प्रोसेस होता है।

जरूरी दस्तावेजों में आमतौर पर आधार कार्ड, बैंक विवरण, खसरा-खतौनी जैसे जमीन के कागजात, हाल की फोटो, घोषणा-पत्र और माइक्रो सिंचाई से जुड़े दस्तावेज (तीन पक्षीय समझौता जहाँ लागू हो) शामिल होते हैं।

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने खेत तालाब योजना से लंबे समय का समाधान चुना है, न कि सिर्फ तत्काल राहत के लिए। इस योजना में बारिश का पानी जमा करना और स्थानीय स्तर पर सिंचाई को जोड़ा गया है। डीबीटी से अनुदान सीधे किसानों तक पहुँचता है। इन सबके साथ योजना ने जमीन पर ठोस नतीजे दिए हैं, खासकर सूखे से जूझते बुंदेलखंड में।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

क्या 1 अप्रैल 2026 से इनकम टैक्स अधिकारी आपके ईमेल और WhatsApp चैट को ट्रैक कर पाएँगे? जानें- क्या है इस भ्रम का सच और नए नियम

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि भारत का इनकम टैक्स विभाग जल्द ही हर व्यक्ति की जासूसी कर पाएगा। यूजर्स का दावा है कि नए आयकर कानून के द्वारा टैक्स अधिकारियों को प्राइवेसी भंग करने और ईमेल, चैट और दूसरे कम्युनिकेशन की जाँच करने की बहुत ज़्यादा पावर मिल जाएगी।

अभी चल रही ऑनलाइन चर्चाओं में दावा किया जा रहा है कि इस कानून के 1 अप्रैल 2026 से लागू होने के बाद लोगों की प्राइवेसी से समझौता होगा और उनके मौलिक अधिकार कम हो जाएँगे। उनका कहना है कि इस कानून से भारत सरकार को ईमेल, मैसेज, इंस्टेंट मैसेजिंग चैट वगैरह तक बिना किसी रोक-टोक के एक्सेस मिल जाएगा।

स्रोत-x

लेकिन, यह पहली बार नहीं है जब इंटरनेट पर ऐसी अफवाहें फैली हैं कि इनकम टैक्स अधिकारी को किसी भी नागरिक के ईमेल और WhatsApp मैसेज पढ़ने का अधिकार मिल जाएगा। ऐसी डरावनी बातें लगभग हर बार सामने आती हैं, जब केंद्र टैक्स चोरी रोकने के लिए इनकम टैक्स एक्ट के नियमों को सख्त करने पर विचार करता है। इन्हें ‘मौलिक अधिकारों’ पर चिंता के तौर पर पेश किया जाता है। जनता को गुमराह करने के लिए और सरकार पर दबाव बनाने के लिए अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर ऐसी बातें फैलाई जाती है।

पिछले दस सालों में, टैक्स चोरी में क्लाउड स्टोरेज, एन्क्रिप्टेड फोन, ईमेल इनबॉक्स, ट्रेडिंग ऐप, ई-वॉलेट, बेनामी डिजिटल आइडेंटिटी और मैसेज जैसे डिजिटल टूल्स में एक बड़ा बदलाव आया है। अब पुलिस की तलाशी अभियान में पूरा जोर डिजिटल उपकरणों पर होता है। इससे ज्यादातर सबूत मिल ही जाते हैं।

प्रस्तावित इनकम टैक्स एक्ट, 2025 के सेक्शन 247 के लिए पॉलिसी कॉन्टेक्स्ट देता है, जिसे इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 132 में शामिल पारंपरिक सर्च और सीजर क्लॉज जैसा बताया गया है।

इनकम टैक्स एक्ट 2025 के सेक्शन 247 की जरूरत क्यों है?

इनकम टैक्स एक्ट, 2025 के सेक्शन 247 के द्वारा टैक्स जाँच के लिए कोडिफाइड सर्च और सीजर प्रोविजन लाया गया है। ये एक्ट 1 अप्रैल 2026 को पुराने आयकर विभाग 1961 एक्ट की जगह लेगा।

यह क्लॉज़ आयकर अधिकारियों को उन लोगों के खिलाफ तलाशी की इजाजत देता है, जिसे पहले से ही फॉर्मल लीगल प्रोसीडिंग्स मसलन- समन या नोटिस दिए जा चुके हैं। उन पर इस बात का भी शक हो कि उस व्यक्ति ने टैक्स चोरी की है और जाँच के दौरान इनकम से जुड़े दस्तावेज या जरूरी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड छिपाए हैं। सेक्शन 247 एक टारगेटेड इन्वेस्टिगेशन टूल है, जो डिजिटल इकोनॉमिक रियलिटीज़ को देखते हुए अधिकारियों को अपडेट करता है। यह बिना वारंट वाला सर्विलांस लॉ नहीं है।

कानून में सेक्शन 247 के तहत चल रही टैक्स कार्रवाई के मामले में ये जरूरी है। इसका मतलब ये नहीं है कि कोई भी अधिकारी किसी भी अनजान व्यक्ति के फोन, ईमेल, बैंक अकाउंट और सोशल मीडिया अकाउंट की तलाशी लेना शुरू कर दे।

यह अधिकार तभी काम आता है, जब कोई कानूनी समन या नोटिफ़िकेशन हो, जिसमें अकाउंट बुक या दूसरे कागजात दिखाने के लिए कहा गया हो और टैक्सपेयर उसे नहीं दिखा रहा हो अथवा अधिकारियों को जब इनकम या प्रॉपर्टी के कागजात छिपाने का कोई सबूत मिल जाए। यह भारतीय टैक्स कानून के बुनियादी नियम के मुताबिक ही है।

सेक्शन 247 में वर्चुअल डिजिटल स्पेस को खास तौर पर शामिल किया गया है, जो ऑनलाइन अकाउंट, क्लाउड स्टोरेज, ईमेल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन बैंकिंग, इन्वेस्टिंग और ट्रेडिंग पोर्टल, या किसी भी डिजिटल लेनदेन से जुड़ा है। इसमें फाइनेंशियल या कम्युनिकेशन डेटा को शामिल किया गया है।

वर्तमान में ज्यादातर फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन और जरूरी सबूत अब फिजिकल अकाउंट बुक के बजाय इलेक्ट्रॉनिक रूप से स्टोर किए जाते हैं, इसलिए यह एक्सप्लेनेशन जरूरी है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, यह परिभाषा टैक्स विवादों में सबूत के तौर पर डिजिटल डेटा के महत्व को दर्शाती है।

टैक्सपेयर की प्राइवेसी को लेकर आलोचक उठा रहे सवाल

सेक्शन 247 को लेकर विरोधियों का कहना है कि सुरक्षा न होने पर टैक्स अधिकारी प्राइवेट डिजिटल अकाउंट या सोशल मीडिया को हैक कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ जानकारों ने एक्सेस कोड को ओवरराइड करने की टर्मिनोलॉजी की तुलना प्राइवेट डिवाइस या क्लाउड डेटा तक बिना वारंट के एक्सेस से की है और इसे प्राइवेसी के लिए खतरा बताया है।

मीडियानामा के अनुसार, विरोधियों का दावा है कि यह क्लॉज़ टैक्स अधिकारियों को लोगों के कंप्यूटर, सेल फोन और यहाँ तक कि ईमेल या सोशल मीडिया अकाउंट को भी हैक करने की इजाजत देता है।

हालाँकि, ये सिर्फ उनलोगों के डिजिटल अकाउंट को खंगालने की इजाजत देता है, जिस पर इनकम टैक्स चुराने का शक हो और पहले से समन या नोटिस दिया जा चुका हो। कानून किसी के भी डिजिटल अकाउंट को अपनी मर्ज़ी से एक्सेस करने का अधिकार अधिकारियों को नहीं देता।

दरअसल इनकम टैक्स एक्ट 1961 का सेक्शन 132 भी इसकी इजाजत देता है, लेकिन इसमें जाँच प्रक्रिया काफी लंबी है। यानी सेक्शन 247 मॉडर्न बनाता है और बताता है कि ये अधिकार डिजिटल मामलों में कैसे लागू होते हैं।

तलाशी के दौरान जिन प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए उसे भी नए कानून से मजबूती मिलती है। पुराने टैक्स कानून की तरह नए कानून में ऑथराइज़ेशन ऑर्डर के लिए आग्रह करने, टैक्सपेयर को लिखित जानकारी देने, ज़ब्त किए गए सामान की पूरी जानकारी देने के लिए पंचनामा बनाने और टैक्सपेयर को पूरी जानकारी आधिकारिक तौर पर मिले, ये सुनिश्चित करता है।

ये सुरक्षा रेगुलर एनफोर्समेंट फ्रेमवर्क का हिस्सा हैं और सेक्शन 247 से खत्म नहीं होती हैं। इसके अलावा अगर टैक्सपेयर्स को लगता है कि उनके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो वे कोर्ट में तलाशी प्रक्रिया को चुनौती दे सकते हैं। कुछ मामलों में ज्यूडिशियल रिव्यू अभी भी मौजूद है।

पारंपरिक सर्च स्किल्स असल अकाउंट बुक्स या सेफ या ऑफिस में स्टोर किए गए रिकॉर्ड्स पर फोकस करते थे। आजकल, जरूरी सबूत बैंक ट्रांजैक्शन लॉग, ऑनलाइन इन्वेस्टमेंट स्टेटमेंट, ईमेल, ऑटोमैटिक पोर्टफोलियो रिकॉर्ड, या कम्युनिकेशन चैनल मेटाडेटा में भी मिल सकते हैं।

अगर उस सबूतों को ठीक से एक्सेस नहीं किया जाए, तो टैक्स अधिकारियों को पूरी जानकारी नहीं मिल पाती है। लीगल असेसमेंट से पता चलता है कि आज के समय में काली कमाई का पता लगाने और उसके खिलाफ सबूत जुटाने के लिए सर्च करना जरूरी है, खास कर डिजिटल एसेट्स और डेटा का।

एक आम गलतफहमी यह है कि सेक्शन 247 सभी डिजिटल पर्सनल जानकारी तक बिना रोक-टोक के एक्सेस की इजाज़त देता है। लेकिन ऐसा नहीं है। यदि आयकर अधिकारियों को लगता है कि किसी व्यक्ति के पास अघोषित संपत्ति या अघोषित आय है, तो वे अनुमति की प्रतीक्षा किए बिना संबंधित इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों को खंगाल सकते हैं। इसमें व्यक्तिगत कंप्यूटर डेटा से लेकर कॉर्पोरेट दस्तावेज़ तक सब कुछ शामिल है।

इस धारा के तहत व्यक्तियों या कंपनियों को तकनीकी सहायता प्रदान करना अनिवार्य है, जिसमें एक्सेस कोड और अन्य उपकरण शामिल हैं, ताकि कर अधिकारी डिजिटल रिकॉर्ड की जाँच कर सकें।

इसके अलावा अगर टैक्स पेयर को लगता है कि उसके साथ अधिकारियों ने गलत किया है तो वह कोर्ट में विरोध जता सकता है। भारत के सुप्रीम कोर्ट के प्राइवेसी रूलिंग (के.एस. पुट्टास्वामी) के अनुसार, निजता का अधिकार आर्टिकल 21 के तहत मौलिक अधिकार हैं, लेकिन सरकारी वजहों से इसे रोका भी जा सकता है।

धारा 247 आयकर को आधुनिक बनाती है, ताकि डिजिटल प्रौद्योगिकी के युग में जवाबदेही को बढ़ावा दिया जा सके। अनुपालन को सुगम बनाया जा सके और कर चोरी की विकसित होती तकनीकों से निपटा जा सके।

इनकम टैक्स एक्ट 2025 का सेक्शन 247 एक अच्छा अपडेटेड मैकेनिज्म है, जो भारतीय टैक्स कानून को मॉडर्न फाइनेंशियल रियलिटी के साथ जोड़ता है।

यह गारंटी देता है कि हर तरह की इनकम, चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक या ट्रेडिशनल लेजर में डॉक्यूमेंटेड हो, अथॉरिटीज द्वारा देखी जा सकती है। ऑथराइजेशन, रीज़निंग बिलीफ और प्रोसीजरल प्रोटेक्शन का लीगल स्ट्रक्चर जो टैक्सपेयर्स के अधिकारों को बनाए रखता है, उसे भी बनाए रखा गया है। यह एक संतुलित अप्रोच है, जो प्राइवेसी से समझौता किए बगैर संवैधानिक मापदंडों के मुताबिक सिस्टम को मॉडर्न बनाता है।

(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

मोइनुद्दीन ने ‘अब्बू के उकसाने पर’ गुजरात में हिंदू पिता-पुत्र को मारा चाकू, एक ही समुदाय के लोगों को बार-बार बना रहा निशाना: मीडिया ने बताया ‘मानसिक रूप से अस्थिर’, जानें- पीड़ित ने क्या कहा

गुजरात के आणंद जिले के खंभात शहर से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहाँ मोइनुद्दीन नाम के एक शख्स एक हिंदू पिता और बेटे पर चाकू से हमला कर दिया गया। मीडिया के एक हिस्से में आरोपित को ‘मानसिक रूप से अस्थिर’ बताया जा रहा है लेकिन पीड़ित परिवार का आरोप है कि वह पूरी तरह स्वस्थ है और जानबूझकर सिर्फ एक ही समुदाय को निशाना बना रहा है। पीड़ित परिवार का यह भी कहना है कि आरोपित के पिता ने पुलिस के सामने धमकी भरे अंदाज में कहा कि ‘जो करना है कर लो’ और पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की।

इस मामले में खंभात सिटी पुलिस ने आरोपित के अब्बा सज्जादहुसैन अकबरहुसैन सैयद, भाई मोहम्मद सोहेब सज्जादहुसैन सैयद और अम्मी तेजबीबानिशा सज्जादहुसैन सैयद के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है और आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है। ऑपइंडिया के पास इस FIR की कॉपी मौजूद है। पुलिस ने तीनों के खिलाफ BNS की धाराएँ 125(A), 125(B), 352, 351(3), 54 और गुजरात पुलिस ऐक्ट की धारा 135 के तहत केस दर्ज किया है।

यह घटना रविवार (21 दिसंबर 2025) को खंभात के पीठ बाजार इलाके में हुई। शिकायतकर्ता निहाल रावल की इस इलाके में ‘चामुंडा जनरल स्टोर’ नाम से दुकान है। FIR के मुताबिक, 21 दिसंबर की सुबह निहाल रावल अपनी दुकान पर अपने पिता संजयभाई के साथ बैठे हुए बातचीत कर रहे थे। इसी दौरान नकरटनी पोल इलाके का रहने वाला मोइनुद्दीन सैयद हाथ में चाकू लेकर दुकान में घुस आया और गाली-गलौज करने लगा। आरोप है कि इस दौरान उसने चिल्लाकर कहा, “मेरे अब्बू सज्जाद हुसैन ने कहा है कि दो-तीन रावल को मारकर आओ।”

इसके बाद आरोपित ने निहाल पर चाकू से हमला करने की कोशिश की लेकिन निहाल ने दुकान का काउंटर आगे कर दिया जिससे वह बच गया। हालाँकि, आरोपित ने दोबारा हमला करने की कोशिश की। इस बार निहाल के पिता संजयभाई ने बीच में आकर कुर्सी आगे की लेकिन इसके बावजूद उनके बाएँ हाथ पर चाकू लग गया और खून बहने लगा। घटना के बाद मौके पर लोग इकट्ठा हो गए और मोइनुद्दीन को पकड़कर उसके घर ले जाया गया। आरोप है कि इसी दौरान आरोपित के अब्बू, भाई और अम्मी ने पीड़ित परिवार को धमकाना शुरू कर दिया। पुलिस ने पूरे मामले में FIR दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है और आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

पीड़ित को दी जान से मारने की धमकी

पीड़ित निहाल रावल ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि जब वह थाने में मौजूद थे और पुलिस के सामने पूरी घटना की जानकारी दे रहे थे, उसी दौरान आरोपित के पिता ने उन्हें खुलेआम धमकाया। निहाल के अनुसार, आरोपी के पिता ने कहा, “मेरा बेटा पागल है, वह घर से चाकू लेकर निकला था। मेरा बेटा हर जगह घूमेगा, जो करना है कर लो।” उसने यह भी धमकी दी, “अगर तुमने मोइनुद्दीन के खिलाफ कोई शिकायत की तो मैं तुम्हें जान से मार दूँगा।” इन सभी बातों की पुष्टि FIR में हुई है।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि मोइनुद्दीन ने पहले खंभात के रहने वाले कमलेश रावल, अनिल रावल और गोपालभाई रावल पर हमला किया था। उसने बार-बार रावल समुदाय के लोगों को ही निशाना बनाया और हमला किया। कहा जाता है कि उसने करीब 6 बार अलग-अलग लोगों पर हमला किया और यह भी सच है कि सभी पीड़ित रावल समुदाय से थे।

मीडिया ने आरोपित को बताया ‘मानसिक रूप से अस्थिर’

इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स, वीडियो और अन्य संदर्भों में आरोपी मोइनुद्दीन को लगातार ‘मानसिक रूप से अस्थिर‘ बताया जा रहा है। वहीं, शिकायतकर्ता नेहल ने ‘ऑपइंडिया’ से बातचीत में कहा है कि मोइनुद्दीन पूरी तरह मानसिक रूप से स्वस्थ है और जो कुछ भी कर रहा है, जानबूझकर और सोच-समझकर कर रहा है।

नेहल का तर्क है कि अगर मोइनुद्दीन सच में मानसिक रूप से अस्थिर होता, तो वह अपने ही घर में चाकू से हमला करता या अपने आसपास रहने वाले अन्य मुसलमानों पर भी हमला करता लेकिन ऐसा नहीं है। उसके हमले सिर्फ हिंदू रावल समुदाय के लोगों पर ही हो रहे हैं। नेहल ने मीडिया से सवाल करते हुए कहा कि आमतौर पर मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति बिना भेदभाव के सभी पर हमला करता है, यहाँ तक कि अपने परिवार वालों पर भी। फिर ऐसा क्यों है कि मोइनुद्दीन ऐसा नहीं कर रहा?

आगे बात करते हुए नेहल ने कहा कि मोइनुद्दीन का चलना, बोलना और व्यवहार पूरी तरह सामान्य है लेकिन इसके बावजूद उसे ‘पागल’ या ‘मानसिक रूप से अस्थिर’ बताकर पेश किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि फिलहाल पुलिस मोइनुद्दीन के कथित ‘मानसिक अस्थिरता’ से जुड़े सर्टिफिकेट की जाँच कर रही है और अगर इसमें कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो आगे की कार्रवाई की जाएगी।

गौर करने वाली बात यह भी है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी ‘वर्ग विशेष’ के आरोपी को मीडिया द्वारा ‘मानसिक रूप से अस्थिर’ बताया गया हो। बीते कई वर्षों से ऐसे कई मामलों में, जहाँ पीड़ित हिंदू और आरोपी मुस्लिम रहा है। मीडिया ने आरोपित को बचाने के लिए उसे मानसिक रूप से अस्थिर बताने की कोशिश की है। नेहल का कहना है कि इस मामले में भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

हाँ, भारत हिंदू राष्ट्र है और यह संविधान में लिखे जाने की जरूरत नहीं

भारत एक ‘हिंदू राष्ट्र’ है, इस छोटे वाक्य के निहितार्थ बड़े हैं। यह वाक्य भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। भारत को हिंदू राष्ट्र मानें या ना, इस पर लंबे वक्त से चर्चा होती रही है। अब इसकी चर्चा फिर शुरू हुई है और इसके पीछे है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत का कोलकाता में दिया गया एक बयान।

संघ के 100 साल पूरे होने पर देश में कई जगहों पर संवाद कार्यक्रम हो रहे हैं और कोलकाता में ऐसे की एक कार्यक्रम के दौरान भागवत ने कहा कि भारत हिंदू राष्ट्र है और यह संविधान में लिखे होने की आवश्यकता नहीं है। कॉन्ग्रेस ने चिर-परिचित अंदाज में इसका विरोध किया और उन्हें संविधान विरोधी तक कह दिया है।

मोहन भागवत ने क्या है?

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, “संविधान की प्रस्तावना हिंदुत्व को ही बताती है। उसमें हिंदू शब्द नहीं है लेकिन सब उपासनाओं को स्वतंत्रता है। न्याय है, स्वतंत्र है, समता है। यह सब कहाँ से आया? डॉ. बाबा साहब आंबेडकर ने कहा है कि यह मैंने फ्रांस से नहीं लिया बल्कि यह तथागत बुद्ध से लिया। बंधु भाव, उन्होंने कहा है संसद में भाषण में कहा है बंधु भाव यही धर्म है तो धर्म पर आधारित संविधान, ये किसकी विशेषता है ये हिंदू राष्ट्र की विशेषता है।”

उन्होंने कहा, “हिंदू शब्द का उपयोग नहीं किया, हिंदू शब्द के बारे में रिजर्वेशंस भी होंगे लेकिन स्वभाव से तो सब लोग वही थे। उन्होंने जो निर्माण किया उसमें उसी की छाया है। फिर हिंदू राष्ट्र बहुत पुराना है। सूर्य पूर्व में उगता है, कब से उगता है पता नहीं तो अब इसको भी संविधान की मंजूरी चाहिए क्या? हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है।”

भागवत ने आगे कहा, “भारत को मातृभूमि मानने वाला, भारतीय संस्कृति पर श्रद्धा रखने वाला और भारतीय पूर्वजों का गौरव मन में रखने वाला एक भी व्यक्ति हिंदुस्तान की भूमि पर जब तक जीवित है तब तक भारत हिंदू राष्ट्र है। ये संघ का विचार है। और इसलिए हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है।”

उन्होंने कहा, “अभी मन में आया संसद के कि बदलो और उसमें शब्द डालो वो डालेंगे नहीं डालेंगे तो भी ठीक है कुछ उस शब्द से मतलब नहीं है क्योंकि हम है हम हिंदू है हमारा हिंदू राष्ट्र है यह सत्य है किसी पोथी में लिखा होगा नहीं लिखा होगा जो है सो है वो बदलेगा नहीं।”

कॉन्ग्रेस का विरोध

कभी भगवान राम के अस्तित्व तक सवाल उठाने वाली कॉन्ग्रेस के लिए भागवत भी संविधान विरोधी हो गए हैं। कॉन्ग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि संविधान नहीं कहता है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है। उन्होंने कहा कि भागवत के बयान से पता चलता है कि उन्हें ना संविधान की परवाह है और ना वह उसका सम्मान करते हैं। लेकिन क्या वाकई इस देश को हिंदू राष्ट्र को होने के लिए किसी संवैधानिक दर्जे की ही जरूरत है।

भारत बेशक एक हिंदू राष्ट्र ही है

भारत एक हिंदू राष्ट्र है। यह कोई राजनीतिक बहस नहीं बल्कि भारत की सभ्यतागत और सांस्कृतिक पहचान है। इसे केवल कानून-संविधान तक सीमित करके देखना इस विचार के साथ अन्याय होगा। भारत का हिंदू राष्ट्र होना इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है जो ‘सनातन काल’ से एक राष्ट्र के रूप में रहा है। जब देश में आधुनिक संविधान, संसद या मौजूदा लोकतांत्रिक ढाँचा नहीं था, तब भी भारत एक हिंदू राष्ट्र था।

भारत हजारों साल पुरानी सभ्यता है। जब दुनिया के अधिकतर देश पैदा भी नहीं हुए थे, तब भारत में वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ रचे जा चुके थे। यह धरती हमेशा से सनातन विचारों की भूमि रही है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि ‘हिंदू’ धर्म से आगे बढ़कर जीवन जीने का तरीका है।

भारत की राष्ट्रीय पहचान या कहें तो हिंदू पहचान, किसी एक राजनीतिक सहमति से नहीं बनी है बल्कि यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक यात्रा का परिणाम है। भारतीय परंपरा में हिंदू होना इस राष्ट्र की उस जीवन-दृष्टि को स्वीकार करना है जिसमें विविधता का विरोध नहीं बल्कि सम्मान किया जाता है। भारत में दर्शन की अनेक धाराएँ विकसित हुईं जिनमें ईश्वर को मानने वाली भी थीं और न मानने वाली भी लेकिन सभी को इसी सभ्यता के भीतर स्थान मिला। सबको ‘हिंदू’ माना गया और सबने इस राष्ट्र को पुण्यभूमि के रूप में स्वीकार भी किया।

भारत की सामाजिक चेतना, उसके त्योहार, उसकी भाषाएँ, उसकी परंपराएँ, उसकी लोक-संस्कृति ये सब एक साझा धारा से निकली हैं। जब राष्ट्र की बहुसंख्यक आबादी, उसकी ऐतिहासिक स्मृति और उसकी सांस्कृतिक निरंतरता एक ही दर्शन को माने तो राष्ट्र की पहचान उसी से बनती है। यही पहचान भारत के हिंदू राष्ट्र होने को साबित करती है।

संविधान भारत के शासन-ग्रंथ है लेकिन वह भारत की सांस्कृतिक आत्मा का निर्माता नहीं है बल्कि उससे ही संविधान को प्रेरणा मिली है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ जैसी अवधारणा और न्याय, स्वतंत्रता और समता जैसे तत्व भारतीय परंपरा में पहले से मौजूद थे। पंथनिरपेक्षता का भारतीय स्वरूप भी इसी हिंदू सभ्यता की देन है जिसमें राज्य सभी पंथों को सम्मान देता है ना कि धर्म को समाज से काट देता है।

हालाँकि, हिंदू राष्ट्र का मतलब यह नहीं कि यहाँ दूसरे धर्मों के लोग सुरक्षित नहीं होंगे। सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। दुनिया में अगर किसी एक देश ने सबसे ज़्यादा धर्मों को शरण दी है, तो वह भारत है। पारसी हों, यहूदी हों सबको भारत ने अपनाया। यह हिंदू सोच की वजह से ही संभव हुआ क्योंकि हिंदू विचार ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का विचार सिखाता है।

भारत एक हिंदू राष्ट्र है क्योंकि इसकी सोच हिंदू है, इसकी आत्मा हिंदू है और इसका इतिहास हिंदू है। यह राष्ट्र सभी का है लेकिन इसकी दिशा और दर्शन सनातन हैं। हिंदू राष्ट्र का मतलब है कि सबके लिए न्याय, सबके लिए सम्मान और सबके साथ विकास। यही भारत की सच्ची पहचान है। इसलिए हिंदू राष्ट्र को मान्यता देने के लिए संविधान में किसी शब्द को जोड़ने की आवश्यकता नहीं क्योंकि भारत की आत्मा पहले से ही हिंदू है।