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स्मार्ट लॉक्स बन रहे मौत का फंदा, दिल्ली से लखनऊ तक बिजली कटते ही जाम हुए बायोमेट्रिक दरवाजे: आखिर ‘फेल सिक्योर’ तकनीक क्यों ले रही मासूमों की जान?

देश के अलग-अलग हिस्सों से बीते कुछ सालों में सामने आई कई दर्दनाक दुर्घटनाओं ने एक गंभीर सुरक्षा सवाल खड़ा कर दिया है। दिल्ली के ओल्ड राजिंदर नगर में बेसमेंट में पानी भरने की घटना हो, मालवीय नगर के एक होटल में लगी आग हो या फिर लखनऊ की एक लाइब्रेरी का अग्निकांड… इन सभी हादसों में एक भयावह समानता देखने को मिली। आपात स्थिति के दौरान जैसे ही बिजली गुल हुई, बायोमेट्रिक और स्मार्ट लॉक वाले दरवाजे पूरी तरह जाम हो गए। नतीजा यह हुआ कि लोग अंदर ही फंसे रह गए और समय रहते बाहर न निकलने के कारण कई मासूमों को अपनी जान गंवानी पड़ी।

जानकारों के मुताबिक, यह जानलेवा संकट स्मार्ट डोर्स की एक खास कार्यप्रणाली यानी मैकेनिज्म के कारण पैदा होता है। आज के समय में बायोमेट्रिक दरवाजे मुख्य रूप से दो सिद्धांतों पर काम करते हैं: पहला ‘फेल सिक्योर’ (Fail Secure) और दूसरा ‘फेल सेफ’ (Fail Safe)। इनमें से ‘फेल सिक्योर’ तकनीक सबसे घातक साबित हो रही है। इस तकनीक का सीधा मतलब यह है कि बिजली रहे या न रहे, दरवाजा हर हाल में लॉक ही रहेगा।

ऐसे दरवाजों को खोलने के लिए बिजली का होना एक अनिवार्य शर्त (प्री-रिक्विजिट) है। सामान्य स्थिति में जब आप अपना थंब या फेस दिखाते हैं, तो बिजली का सिग्नल अंदर लगे मैग्नेट को एक्टिवेट करता है, स्प्रिंग पीछे हटता है और दरवाजा खुलता है। लेकिन बिजली कटते ही यह सिस्टम पूरी तरह ठप हो जाता है।

इसके विपरीत ‘फेल सेफ’ लॉक्स बिल्कुल उल्टे सिद्धांत पर काम करते हैं। इसमें परमानेंट मैग्नेट दरवाजे को हर वक्त चिपका कर रखता है। बायोमेट्रिक देने पर मैग्नेट की पावर कटती है और दरवाजा खुल जाता है। यानी अगर बिजली चली जाए तो ‘फेल सेफ’ दरवाजे अपने आप अनलॉक हो जाते हैं। भारत में इस सुरक्षित तकनीक का इस्तेमाल न होने के पीछे सामाजिक अविश्वास एक बड़ी वजह है।

वैसे, आम लोगों में ये बात कही जाती है कि भारत एक लो-ट्रस्ट सोसायटी है, जहाँ लोगों को यह डर सताता है कि बिजली जाने पर दरवाजा खुला रहने से चोरी हो जाएगी। लोग सुरक्षा से ज्यादा संपत्ति को तवज्जो देते हैं।

नियमों के मुताबिक, फेल सिक्योर दरवाजों का इस्तेमाल सिर्फ उन जगहों पर होना चाहिए जहाँ कोई बेहद महँगा एसेट सुरक्षित रखना हो, न कि इंसानी आवाजाही वाली जगहों पर। इसके अलावा हर ऐसे स्मार्ट दरवाजे में एक ‘मैकेनिकल ओवरराइड’ यानी मैनुअल लॉक सिस्टम होना अनिवार्य है, ताकि आपातकाल में उसे हाथ से खोला जा सके। लेकिन देश में सेफ्टी गाइडलाइंस की धज्जियाँ खुलेआम उड़ाई जा रही हैं।

लखनऊ और दिल्ली के हादसों से साफ है कि मालिकों को बच्चों की जिंदगी से ज्यादा अपने कीमती फर्नीचर और सामान की फिक्र थी, जिसका खामियाजा मासूमों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ा।

जिस ‘पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग’ पर कीर स्टार्मर समेत ब्रिटेन के तमाम PM रहे मौन, उसके खिलाफ सिर्फ ऋषि सुनक ने उठाई थी आवाज: जानिए कैसे लिया था पीड़िताओं के लिए स्टैंड

ब्रिटेन में आठवाँ प्रधानमंत्री अपना पूरा कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर को 22 जून 2026 को अपने इस्तीफे की घोषणा करनी पड़ी। यह घोषणा लेबर पार्टी के भीतर बढ़ते दबाव की वजह से की गई। दरअसल उनके प्रतिद्वंद्वी एंडी बर्नहैम ने 18 जून को हुए मेकरफील्ड उपचुनाव में निर्णायक जीत हासिल की थी।

इस जीत के साथ ही बर्नहैम ने पार्टी नेतृत्वकर्ता के तौर पर खुद को स्थापित कर लिया और स्टार्मर के लिए चुनौती बन गए। ​​स्टार्मर की घटती लोकप्रियता के कई कारण हैं, लेकिन पाकिस्तानी मुस्लिम बलात्कार गिरोहों के मुद्दे को जानबूझकर कर नजरअंदाज करना, उनकी लोकप्रियता में कमी की अहम वजह है।

कीर स्टार्मर जनता और लेबर पार्टी के समर्थकों में लगातार अलोकप्रिय होने जा रहे थे। उनकी एक के बाद एक ली गई नीतिगत फैसलों की आलोचना हो रही है। उन्होंने पीटर मैंडेलसन को अमेरिका में ब्रिटेन का राजदूत नियुक्त किया, जिसे सुरक्षा एजेंसियों ने क्लीन चिट नहीं दी गई थी। स्टार्मर को पार्टी के भीतर विरोध का सामना करना पड़ रहा था, क्योंकि लेबर पार्टी को अंदेशा था कि अगले आम चुनाव में स्टार्मर के फैसलों की वजह से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

पार्टी ने ही कीर स्टार्मर को पद छोड़ने और एंडी बर्नहैम के लिए रास्ता बनाने का आदेश दिया। दरअसल बर्नहैम की हालिया चुनावी जीत ने इस उम्मीद को जगाया है कि उनका नेतृत्व अगले चुनाव में लेबर पार्टी को करारी हार से बचा सकता है।

22 जून को अपने भाषण में कीर स्टार्मर ने स्वीकार किया कि उनकी पार्टी आगामी चुनाव के लिए उन्हें विश्वस्त चेहरा नहीं मानती, जिसके दम पर चुनाव जीता जा सकता है।

दरअसल कीर स्टार्मर लगातार राजनीतिक लाभ के लिए मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपना रहे हैं। इससे ब्रिटिश जनता में भारी गुस्सा है। यह याद रखना आवश्यक है कि प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने जून 2025 में अपनी नीति में अचानक बदलाव किया और ऑडिट और सिफारिशों के बाद पाकिस्तानी मुस्लिम बलात्कारी ग्रुमिंग गैंग की जाँच कराने का वादा किया था।

हालाँकि जनवरी 2025 में स्टार्मर ने यौन शोषण करने वाले गिरोहों की जाँच की माँग करने वालों को धुर दक्षिणपंथी विचारधारा का समर्थन करने वाला बताया था। दरअसल उस वक्त अमेरिकी अरबपति एलोन मस्क ने ब्रिटेन सरकार पर जोरदार हमला किया था। उन्होंने मुस्लिम बलात्कार गिरोहों के मुद्दे पर स्टार्मर सरकार द्वारा कदम नहीं उठाने की बात कही थी और वर्षों से पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रुमिंग गैंग द्वारा गैर-मुस्लिम लड़कियों के शोषण करने की बात कही थी।

पाकिस्तानी मुस्लिम बलात्कार गिरोहों की जाँच शुरू करने में भी कीर स्टार्मर ने तत्परता नहीं दिखाई। जब उनपर दबाव बढ़ा तो उन्होंने जाँच शुरू की। इससे दोनों पक्षों के बीच वे अलोकप्रिय हुए।

लेबर पार्टी की मुस्लिम-समर्थक नीतियों के खिलाफ कंजर्वेटिव पार्टी के कड़े विरोध के बावजूद, लेबर सरकार ने ब्रिटेन के रुख में बदलाव करते हुए फिलिस्तीनी राज्य का समर्थन किया है और इजरायल को कुछ हथियारों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह बदलाव गाजा में मानवीय संकट को लेकर पार्टी नेतृत्व और कई क्षेत्रों में लेबर पार्टी के समर्थक मुसलमानों के दबाव के बीच हुआ है। इजरायल-फिलिस्तीन मुद्दे पर 2024 में मुस्लिम बहुल सीटों पर लेबर पार्टी का समर्थन कम होने के बाद यह नीतिगत बदलाव आया है।

स्टार्मर को दोहरी नीति अपनाने के आरोपों का भी सामना करना पड़ा है। इफ्तार कार्यक्रमों की मेजबानी करने से लेकर मुसलमानों को ‘आधुनिक ब्रिटेन का चेहरा’ कहने और ‘इस्लामोफोबिया’ से निपटने के लिए आत्मघाती रूप से सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने तक, स्टार्मर ने अपनी पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक को खुश रखने के लिए हद से ज्यादा प्रयास किए।

दरअसल दिसंबर 2025 में कीर स्टार्मर के नेतृत्व वाली लेबर सरकार की प्रस्तावित ‘इस्लामोफोबिया’ (या ‘मुस्लिम विरोधी घृणा’) की परिभाषा पर ब्रिटिश हिंदू, सिख और मानवाधिकार समूहों ने गहरी आपत्ति जताई है | आलोचकों का मानना है कि इसमें मौजूद अस्पष्ट शब्दावली, जैसे- ‘नस्लीयकरण’ और ‘पूर्वाग्रही रूढ़िवादिता’, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबा सकती है और एक तरह से पिछले दरवाजे से ‘ईशनिंदा कानून’ (ब्लास्पहमी लॉ) की वापसी का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। हिंदू और सिख समूहों ने चेतावनी दी है कि केवल मुस्लिम के लिए ऐसी अलग और अस्पष्ट परिभाषा बनाने से अन्य धर्मों के प्रति भेदभाव की भावना पैदा होगी।

क्राउन प्रॉसिक्यूशन सर्विस (सीपीएस) के प्रमुख, लोक अभियोजन निदेशक (डीपीपी) के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कीर स्टार्मर को कुप्रबंधन के आरोपों का भी सामना करना पड़ा।

पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रुमिंग गैंग और कीर स्टार्मर की चुप्पी

1980 के दशक में टेलफोर्ड शहर में एक घटना ने पाकिस्तानी मुस्लिम रेपिस्ट गैंग की ओर लोगों का ध्यान खींचा। उस वक्त 11 साल की छोटी बच्ची को बहला-फुसलाकर अगवा किया गया, झूठी देखभाल का दिखावा किया गया और फिर नशीली दवाइयाँ देकर बलात्कार किया गया। उसे पीटा गया, बेचा गया और यहाँ तक ​​कि ग्रुमिंग गिरोहों ने उसकी हत्या भी कर दी। इस दौरान देखा गया कि गोरी बच्चियों का रेप कर उसे बलात्कारी दूसरे बलात्कारी के हवाले कर देता था।

ऐसे रेपिस्ट ज्यादातर ब्रिटिश पाकिस्तानी मूल के थे। तीन लड़कियों की हत्या कर दी गई थी और दो त्रासदियों की वजह से मारी गईं। 170000 आबादी वाले शहर में लगभग 1000 लड़कियाँ पीड़ित हुईं। टेलफोर्ड में, ये पाकिस्तानी गिरोह ऐसा अड्डे चला रहे थे, जहाँ लड़कियों को प्रेमजाल में फँसा कर उन्हें गिफ्ट देकर अपने साथ लाते थे।

रोदरहम में भी इसी तरह का एक रैकेट चल रहा था। 226000 की आबादी वाले शहर में पाकिस्तानी मूल के पुरुषों ने करीब 1500 लड़कियों का रेप किया गया और उन्हें खरीदा-बेचा गया। कई पीड़ितों के साथ गैंगरेप किया गया और यह दुर्व्यवहार 1997 से 2013 तक बेरोकटोक जारी रहा। रोशडेल में यह सिलसिला 2002 में शुरू हुआ। कम से कम 47 युवतियों को दुर्व्यवहार का शिकार बनाया गया। प्रशासनिक और कानूनी अधिकारियों की प्रतिक्रिया इतनी निष्क्रिय रही है कि ये गिरोह “ग्रेट ब्रिटेन” की सड़कों पर आज भी खुलेआम घूम रहे हैं।

ब्रिटेन में हडर्सफ़ील्ड, रोदरहम, रोशडेल, ऑक्सफोर्ड, ब्रिस्टल, पीटरबरो और न्यूकैसल सहित कई स्थानों पर यौन शोषण के कारनामों का खुलासा हुआ। कई रिपोर्टों और जांचों के बावजूद, स्टोववुड और टूरवे जैसी जांच कार्रवाइयों के बावजूद, यौन शोषण करने वाले गिरोहों द्वारा किए गए यौन शोषण के वास्तविक पैमाने का पता नहीं लगाया जा सका।

ये ‘ग्रूमिंग’ अपराध यूनाइटेड किंगडम को लगातार परेशान कर रहे हैं, क्योंकि नेशनल सोसाइटी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू चिल्ड्रन (एनएसपीसीसी) ने 2023 में बताया कि पिछले पांच वर्षों में युवाओं के खिलाफ ऑनलाइन ग्रूमिंग अपराधों में 82% की वृद्धि हुई है।

पाकिस्तानी ग्रुमिंग गैंग ने गरीब श्वेत और गैर-मुस्लिम लड़कियों के साथ बलात्कार किया। यह मुद्दा सबसे पहले रोदरहम, रोशडेल और टेलफोर्ड जैसे शहरों में सामने आया। रोदरहम पर 2014 की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 1400 बच्चों का 16 वर्षों में यौन शोषण किया गया। इसके ज्यादातर अपराधी पाकिस्तानी मूल के पुरुष थे। हालाँकि कंजर्वेटिव पार्टी भी पूरी तरह निर्दोष नहीं है, लेकिन लेबर सरकार और कानून प्रवर्तन अधिकारियों ने जानबूझकर इस मामले को नजरअंदाज किया।

हाल ही में सांसद रूपक लो की अध्यक्षता में बनी कमेटी की रेप गैंग इंक्वायरी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ब्रिटिश सरकार और सीपीएस ने जातीयता और धर्म से संबंधित डेटा को किस प्रकार दबाया। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि लेबर पार्टी ने मुस्लिम वोट बैंक की नाराजगी से बचने के लिए जाँच में देरी की या फिर उसे रोक दिया। इसमें आगे कहा गया है कि बलात्कार के जिहादियों को हल्की सजा दी गईं और उन्हें देश से बाहर नहीं निकाला गया। स्टार्मर के कार्यकाल में तो हद ही हो गया, सीपीएस ने हजारों बलात्कारी जिहादियों को केवल ‘चेतावनी’ देकर छोड़ दिया।

ओपइंडिया ने पहले भी रिपोर्ट किया था कि कैसे ब्रिटेन के राजनेता, विशेषकर लेबर पार्टी, जिहाद के मामलों को कम करके आँकते हैं। लेबर पार्टी की सांसद सारा चैंपियन को 2017 में द सन में प्रकाशित एक लेख के लिए माफी माँगनी पड़ी थी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि ब्रिटेन की अहम समस्या ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों द्वारा श्वेत लड़कियों का बलात्कार और शोषण है”। चैंपियन को न केवल माफी माँगनी पड़ी, बल्कि अपने पद से इस्तीफा भी देना पड़ा।

2012 में, लेबर पार्टी के नेता और गृह मामलों की चयन समिति के अध्यक्ष कीथ वाज ने ग्रूमिंग जिहाद अपराधों को कम करके आँका। उन्होंने कहा कि पूरे समुदाय को ‘कलंकित’ नहीं किया जाना चाहिए।

दो दशकों से अधिक समय तक हजारों गैर-मुस्लिम नाबालिग और वयस्क लड़कियों को निशाना बनाने वाले मुस्लिम बलात्कार गिरोहों को पकड़ने में ब्रिटिश सरकारों और कानून प्रवर्तन अधिकारियों की सामूहिक विफलता का कारण ‘इस्लामोफोबिया’ से बचने की सोच है। लेबर पार्टी के नेताओं के साथ-साथ ब्रिटिश मीडिया भी इस मामले में पाकिस्तानी ग्रुमिंग गैंग या पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश मुस्लिम ग्रुमिंग गैंग कहने से बचता रहा। इसके बजाय ‘दक्षिण एशियाई ग्रूमिंग गैंग’ का इस्तेमाल किया।

रूढ़िवादी राजनेताओं, ब्रिटिश देशभक्तों और एलोन मस्क ने स्टार्मर पर पाकिस्तानी बलात्कार गिरोह के अपराधों में मिलीभगत का आरोप लगाया। कई लोगों ने माँग की थी कि सीपीएस प्रमुख के रूप में अपने कार्यकाल और प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान इन अपराधों के खिलाफ कार्रवाई न करने के लिए स्टार्मर पर मुकदमा चलाया जाए।

कुल मिलाकर कीर स्टार्मर ने पाकिस्तानी ग्रुमिंग गैंग पर एक्शन लेने से परहेज किया, वहीं ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री और कंजर्वेटिव नेता ऋषि सुनक ने जोखिम उठाकर पाकिस्तानी मुस्लिम यौन शोषण गिरोहों के खिलाफ आवाज उठाया और उन्हें जिहादी करार दिया।

ऋषि सुनक ने उठाए थे कदम

ऋषि सुनक ब्रिटेन के एकमात्र ऐसे राष्ट्राध्यक्ष रहे, जिन्होंने न केवल मुस्लिम यौन शोषण गिरोहों की निंदा की, बल्कि इस बात पर भी जोर दिया कि कैसे राजनीतिक शुद्धता ने राजनेताओं को बलात्कार जिहाद के खिलाफ बोलने से रोका। साथ ही यह भी बताया कि वह ब्रिटेन में यौन शोषण गिरोहों की समस्या से कैसे निपटेंगे।

अक्टूबर 2025 में पदभार संभालने से कुछ महीने पहले दिए गए एक साक्षात्कार में, तत्कालीन प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने ग्रूमिंग या रेप जिहाद को ‘भयानक अपराध’ बताया था और प्रधानमंत्री बनने पर इस समस्या से प्राथमिकता के आधार पर निपटने का वादा किया था।

सुनक ने घोषणा की थी कि वे राष्ट्रीय अपराध एजेंसी में एक नया टास्क फोर्स बनाएँगे, जो यौन शोषण करने वाले गिरोहों की निगरानी करेगा। उन्होंने कहा था, “हम हर जगह पुलिस बलों के लिए इसे प्राथमिकता देना अनिवार्य करेंगे। मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूँ कि सभी पुलिस बल इसमें शामिल लोगों की पहचान दर्ज करें, जो वर्तमान में नहीं किया जाता क्योंकि लोग ऐसा नहीं करना चाहते। मैं यौन शोषण में शामिल लोगों के लिए आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान करना चाहता हूँ, जिसमें पैरोल के बहुत सीमित विकल्प होंगे। एक कंजर्वेटिव सरकार को लोगों की सुरक्षा के आड़े राजनीतिक स्वार्थ को नहीं आने देना चाहिए । ”

सुनक ने अपना वादा निभाया और अप्रैल 2023 में देश में मुस्लिम यौन शोषण गिरोहों की जाँच में पुलिस की सहायता के लिए एक नए ‘ग्रूमिंग गैंग्स टास्क फोर्स’ बनाया । इस टास्क फोर्स में सुनक ने जाँच में सहायता के लिए विशेषज्ञ अधिकारियों की नियुक्ति की घोषणा की, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यौन शोषण गिरोहों के पीछे के अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाया जाए। उन्होंने यह भी वादा किया कि यौन शोषण गिरोह के सदस्यों और सरगनाओं को उनके अपराधों के लिए कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी।

सुनक ने यह भी घोषणा की थी कि उनकी सरकार ऐसा कानून लाएगी जिससे यौन शोषण करने वाले गिरोह के सरगना को सजा सुनाते समय एक वैधानिक कारक के रूप में शामिल किया जा सके, जो इन अपराधों के लिए सबसे कड़ी सजा सुनिश्चित करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाएगा।

ऋषि सुनक के पास पाकिस्तानी मुस्लिम यौन शोषण गिरोहों को जड़ से खत्म करने का एक दूरदर्शी दृष्टिकोण और बड़ी योजनाएँ थीं। हालाँकि, आम चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी की करारी हार ने ब्रिटेन की उन उम्मीदों पर पानी फेर दिया कि देश में यौन शोषण गिरोहों का अंत होगा और हजारों पीड़ितों को न्याय मिलेगा।

कंजर्वेटिव पार्टी का 14 साल का शासन अर्थव्यवस्था, महँगाई, आव्रजन और ब्रेक्जिट के बाद की चुनौतियों से निपटने के तरीके को लेकर जनता के असंतोष और पार्टी के आंतरिक मतभेदों के कारण चुनावी हार के साथ समाप्त हुआ। हालाँकि ऋषि सुनक जानते थे कि वे एक डूबते जहाज का नेतृत्व कर रहे हैं, फिर भी उन्होंने राजनीतिक लाभ हासिल करने की होड़ और राजनीतिक शुद्धता को पाकिस्तानी मुस्लिम बलात्कार गिरोहों से ब्रिटिश लड़कियों के लिए न्याय और सुरक्षा के अपने प्रयासों में बाधक न बनने देने का भरसक प्रयास किया।

कीर स्टार्मर को ऋषि सुनक की तुलना में कहीं अधिक समय तक सत्ता में रहने और राजनीतिक स्थिरता मिली, फिर भी स्टार्मर कई मोर्चों पर विफल रहे। पाकिस्तानी मुस्लिम यौन शोषण गिरोहों के पीड़ितों को न्याय दिलाने के मामले में स्टार्मर के बार-बार बदलते रुख को प्रधानमंत्री के रूप में उनकी सबसे बड़ी असफलताओं में से एक माना जाएगा।

(यह लेख मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

6 पर FIR, 4 गिरफ्तार और 4 अधिकारी सस्पेंड: लखनऊ अलीगंज अग्रिकांड में CM योगी ने रातोंरात लिया सख्त एक्शन, SIT गठित कर कहा- 7 दिन में चाहिए हर जवाब

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में अलीगंज क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देर रात तक लगातार मॉनिटरिंग करते हुए सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए। हादसे की जानकारी मिलते ही मुख्यमंत्री ने अलीगढ़ में चल रहे सभी कार्यक्रम छोड़ सीधे लखनऊ पहुँचे। मुख्यमंत्री के निर्देश पर राहत एवं बचाव कार्य को तेज किया गया, घायलों के इलाज की विशेष व्यवस्था की गई और कुछ ही घंटों के भीतर आरोपितों की गिरफ्तारी व जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू कर दी गई।

लखनऊ पहुँचने के बाद मुख्यमंत्री सबसे पहले घटनास्थल पर पहुँचे। उन्होंने राहत एवं बचाव कार्यों की जानकारी ली और मौके पर मौजूद अधिकारियों से पूरे घटनाक्रम पर रिपोर्ट माँगी। घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) पहुँचे। यहाँ उन्होंने भर्ती घायलों का हालचाल जाना और उनके परिजनों से बातचीत की।

मृतकों और घायलों के लिए मुआवजे का ऐलान

हादसे में जान गँवाने वाले लोगों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को 5-5 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। इसके अलावा घायलों को 50-50 हजार रुपए की सहायता राशि देने का भी ऐलान किया गया। सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रभावित परिवारों को हर संभव मदद उपलब्ध कराई जाएगी।

मुख्यमंत्री आवास पर हुई हाई लेवल मीटिंग, SIT का गठन

केजीएमयू से निकलने के बाद मुख्यमंत्री ने अपने सरकारी आवास पाँच कालीदास मार्ग पर देर रात उच्च स्तरीय बैठक बुलाई। बैठक में शासन, पुलिस, अग्निशमन, विकास प्राधिकरण और अन्य संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री ने पूरे मामले की विस्तृत समीक्षा की और हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए।

बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने मामले की गहन जाँच के लिए दो सदस्यीय विशेष जाँच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया। एसआईटी में पर्यटन, धर्मार्थ कार्य एवं संस्कृति विभाग के अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात और लखनऊ जोन के अपर पुलिस महानिदेशक प्रवीण कुमार को शामिल किया गया है। जाँच दल को सात दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।

सरकार के अनुसार एसआईटी यह जाँच करेगी कि भवन में फायर सेफ्टी मानकों का पालन हुआ था या नहीं, संबंधित विभागों ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया या नहीं और किन अधिकारियों या व्यक्तियों की लापरवाही से यह हादसा हुआ। एसआईटी को सात दिनों के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।

अलीगंज थाने में मुकदमा, 4 आरोपित गिरफ्तार

घटना के संबंध में थाना अलीगंज में 6 लोगों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया गया है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 110, 105, 125, 3(5) और उत्तर प्रदेश अग्निशमन सेवा अधिनियम की धारा 6/10 के तहत छह अभियुक्तों और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

पुलिस ने जाँच में तेजी दिखाते हुए कुछ ही घंटों के भीतर चार आरोपितों को गिरफ्तार भी कर लिया। गिरफ्तार किए गए आऱोपितों में अलीगंज निवासी रामकृ्ष्ण उपाध्याय, सीतापुर रोड क्षेत्र के वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला, बालागंग निवासी तुषॉक कृष्णा जायसवाल और मड़ियाँव निवासी सुरेश कुमार साहू शामिल हैं। पुलिस अन्य आरोपितों और जिम्मेदार लोगों की तलाश में भी जुटी हुई है।

चार अधिकारियों पर गिरी गाज

प्रारंभिक जाँच में लापरवाही सामने आने पर मुख्यमंत्री के निर्देश पर चार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। इनमें जानकीपुरम बिजली विभाग के एक्सईएन कलेक्शन गौरव कुमार, इंदिरा नगर फायर विभाग के एफएसएसओ कमलेन्द्र कुमार सिंह, लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) के सहायक अभियंता अनिल कुमार और जूनियर इंजीनियर प्रमोद पांडे शामिल हैं।\

सरकार का मानना है कि अगर संबंधित विभाग समय पर निरीक्षण और नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करते तो इस तरह की बड़ी दुर्घटना को रोका जा सकता था। इसी कारण शुरुआती स्तर पर जिम्मेदारी तय करते हुए इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई है।

2016 में एलडीए ने जारी किया था ध्वस्तीकरण आदेश

जाँच के दौरान सामने आए दस्तावेजों के अनुसार अलीगंज सेक्टर-डी के उषा मेहता मार्ग स्थित इस तीन मंजिला भवन का आवासीय नक्शा 20 अगस्त 2014 को स्वीकृत हुआ था। हालाँकि वर्ष 2016 में एलडीए ने कथित अनधिकृत निर्माण को लेकर मामला दर्ज किया और 10 मई 2016 को ध्वस्तीकरण का आदेश भी जारी किया था। बाद में भवन मालिकों की आपत्तियों के बाद 5 जुलाई 2016 को यह आदेश वापस ले लिया गया था। अब एसआईटी इस पहलू की भी जाँच कर रही है।

यह भी सामने आया कि जिस प्रॉपर्टी में आग लगी थी, उसके कई बार मालिक बदले गए थे। अधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक भवन संख्या एमएस/102/डी वर्ष 1980 में आवंटित हुई थी। इसके बाद 2005 और फिर 2013 में इसका मालिकाना हक बदला। 7 अगस्त 2014 को एलडीए ने इसे नए मालिकों के नाम म्यूटेट किया था।

सोमवार (22 जून 2026) दोपहर करीब 3 बजे इसी प्रॉपर्टी में आग लगी, जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई। प्रारंभिक जाँच में आग एसी डक्ट से शुरू होने और पर्याप्त इमरजेंसी एग्जिट नहीं होने की आशंका जताई गई है। अब जाँच एजेंसियां भवन मानकों और फायर सेफ्टी नियमों के पालन की भी पड़ताल कर रही हैं।

PFI के ‘मिशन 2047’ में भारत सरकार को उखाड़ फेंकने का लक्ष्य, MP ATS की जाँच में चौंकाने वाले खुलासे: जानें- पाकिस्तानी हैंडलर कैसे आतंकी स्लीपर सेल्स को दे रहे टारगेट किलिंग का टास्क

मध्य प्रदेश एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) ने 12 जून 2026 को आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप में मोहम्मद फराज को गिरफ्तार किया था। उसकी गिरफ्तारी के बाद जाँच में एक बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ, जो पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की उस योजना को आगे बढ़ाने में जुटा था, जिसका उद्देश्य भारत सरकार को गिराकर देश में इस्लामिक राज स्थापित करना है।

इस योजना को ‘मिशन 2047’ नाम दिया गया था। इस योजना का पहली बार साल 2022 में खुलासा हुआ था, जिसके कुछ महीने बाद केंद्र सरकार ने PFI पर प्रतिबंध लगा दिया था। पूछताछ के दौरान आरोपितों ने बताया कि युवाओं को कट्टरपंथ की ओर प्रेरित करने का काम कैसे किया जा रहा था।

जाँच एजेंसियों के अनुसार, इस मॉड्यूल से जुड़े लोगों को व्हाट्सएप, टेलीग्राम और अन्य मैसेजिंग ऐप्स के जरिए कट्टरपंथी विचारों से प्रभावित किया जा रहा था। बताया गया कि इनमें से कुछ समूहों का संचालन पाकिस्तान में बैठे हैंडलर कर रहे थे, जो नए लोगों को अलग-अलग काम सौंपते थे और उन्हें ‘सच्चा जिहादी’ बनने के लिए प्रेरित करते थे।

जाँच में यह भी सामने आया कि उन्हें तय किए गए लक्ष्यों की हत्या करने और जिहाद के नाम पर जान देने के लिए तैयार रहने की बात कही जाती थी।

जाँच में जिन चार आरोपितों की पहचान सामने आई है, उनमें मोहम्मद फराज उर्फ खालिद सैफुल्लाह, नईम अब्दुल्ला, शाकिर मेव और इजहार-उल-हक शामिल हैं। ATS फिलहाल इन सभी की व्यक्तिगत भूमिका, पाकिस्तान से जुड़े संपर्कों, डिजिटल नेटवर्क, संभावित फंडिंग चैनलों और अलग-अलग राज्यों में युवाओं की भर्ती के प्रयासों की जाँच कर रही है।

‘मिशन 2047’ और सरकार को गिराने की योजना

बिहार के मधुबनी से गिरफ्तार किए गए इजहार-उल-हक ने जाँच एजेंसियों को बताया कि वह और पाकिस्तान से जुड़े इस नेटवर्क के अन्य लोग ‘मिशन 2047’ पर काम कर रहे थे। इस मिशन का उद्देश्य साल 2047 तक पूरे भारत में PFI के एजेंडे को लागू करना था।

ATS के अनुसार, इस योजना के तहत मौजूदा शासन व्यवस्था की जगह कट्टर इस्लामिक व्यवस्था स्थापित करने की योजना बनाई गई थी। इजहार ने एजेंसी को बताया कि देशभर में ‘मुजाहिदीन’ के रूप में तैयार किए जा रहे लोग निर्देश मिलने पर एक साथ सामने आएँगे और सरकार को गिराने की कोशिश करेंगे।

बताया गया कि पाकिस्तान में बैठे हैंडलरों ने नेटवर्क से जुड़े लोगों को भरोसा दिलाया था कि इस उद्देश्य के लिए एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। भर्ती किए गए लोगों से कसम भी दिलाई जाती थी कि समय आने पर वे टारगेट किलिंग को अंजाम देंगे और देशभर में डर का माहौल बनाएँगे।

अब जाँच एजेंसियाँ इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान करने और यह पता लगाने पर ध्यान दे रही हैं कि इसकी गतिविधियाँ कितनी दूर तक फैली थीं। ATS ने संगठन की संरचना और उसके सदस्यों द्वारा अपनाए गए तरीकों के बारे में पूछताछ के लिए इजहार को 22 जून तक रिमांड पर लिया था।

पाकिस्तानी हैंडलर भर्ती किए गए लोगों को जिहाद और शहादत के लिए कर रहे थे प्रेरित

मोहम्मद फराज से पूछताछ के दौरान सामने आया कि इस मॉड्यूल के सदस्य पाकिस्तान से संचालित व्हाट्सएप समूहों के संपर्क में थे। फराज ने जाँच एजेंसियों को बताया कि हैंडलर जिहादी वीडियो, मजहबी सामग्री और वीडियो कॉल के जरिए भर्ती किए गए लोगों को प्रभावित करते थे।

उन्होंने उससे कहा कि वह एक ‘सच्चा जिहादी’ बने, उसे दिए गए हर निर्देश का पालन करे और मिशन को पूरा करते समय अपनी जान कुर्बान करने के लिए तैयार रहे। बताया गया कि हैंडलरों ने उससे कहा था कि जिहाद के रास्ते पर चलते हुए मौत होने पर उसे शहादत मिलेगी।

उन्होंने ऐसे काम भी सौंपे जिनका उद्देश्य डर का माहौल बनाना था और निर्देश दिया गया था कि आदेश मिलने पर तय किए गए लक्ष्यों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। फराज को पासपोर्ट बनवाने के लिए भी कहा गया था। उसे बताया गया था कि किसी दूसरे देश के रास्ते उसे पाकिस्तान ले जाया जाएगा और वहाँ उसे मुजाहिदीन के रूप में प्रशिक्षण दिया जाएगा।

ATS जिन अन्य सूचनाओं की जाँच कर रही है, उनमें अफगानिस्तान में विशेष प्रशिक्षण की योजनाओं का भी उल्लेख है। तलाशी के दौरान ATS ने फराज के मोबाइल फोन से जिहादी दस्तावेज और PDF फाइलें बरामद कीं। जाँच एजेंसियों का मानना है कि इनमें से कुछ सामग्री पाकिस्तान से भेजी गई थी।

फराज को गरीब और कुँवारे युवाओं की भर्ती का सौंपा गया था काम

भोपाल में एक डॉक्टर के क्लिनिक में काम करने वाले फराज को मध्य प्रदेश में नेटवर्क तैयार करने का काम सौंपा गया था। पाकिस्तानी हैंडलर चाहते थे कि वह ऐसे गरीब, अविवाहित और अपेक्षाकृत कम उम्र के युवाओं की पहचान करे, जिन्हें परिवार के प्रभाव से अलग किया जा सके और धीरे-धीरे कट्टरपंथ की ओर ले जाया जा सके।

इस मॉड्यूल ने विशेष रूप से अविवाहित युवाओं को निशाना बनाया था ताकि माता-पिता, पत्नी या बच्चों की चिंता उन्हें खतरनाक कामों को अंजाम देने से न रोक सके। भर्ती किए जाने वाले लोगों से सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए संपर्क किया जाता था।

फराज ने समूह बनाए, कट्टरपंथी गतिविधियों से जुड़े वीडियो साझा किए और नए सदस्यों को बड़े नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश की। जाँच के दौरान जुटाई गई सामग्री से संकेत मिले हैं कि युवा भर्ती किए गए लोगों को 40 हजार रुपए तक वेतन दिया जाता था।

उपयुक्त लोगों की पहचान करने और उन्हें नेटवर्क से जोड़ने के तरीकों पर चर्चा के लिए बैठकें आयोजित की जाती थीं। इसके बाद उन्हें इस्लामिक शरीयत और ब्लासफेमी कानून लागू करने के नाम पर उकसाया जाता था। बताया गया कि कट्टरपंथ की ओर ले जाने की प्रक्रिया चरणों में की जाती थी।

किसी भर्ती किए व्यक्ति को पहले सीमित समय के भीतर पूरा करने के लिए एक काम दिया जाता था। अगला काम तभी सौंपा जाता था जब वह पहले दिए गए काम को पूरा कर लेता था।

व्हाट्सएप और टेलीग्राम के जरिए संचालित हो रहा था नेटवर्क

चारों आरोपितों ने पूछताछ के दौरान स्वीकार किया कि वे टेलीग्राम और व्हाट्सएप समूहों के जरिए भारत और पाकिस्तान में मौजूद लोगों के संपर्क में थे। फराज करीब चार साल से ऐसे प्लेटफॉर्म पर सक्रिय था। समूहों में उसे ‘खालिद सैफुल्लाह’ के नाम से जाना जाता था और डिजिटल नेटवर्क को बढ़ाने में मदद के लिए उसे ‘लश्कर कमांडर’ की पहचान भी दी गई थी।

जाँच एजेंसियों के अनुसार, इन ऑनलाइन समूहों का इस्तेमाल जिहादी सामग्री फैलाने, बैठकें आयोजित करने, काम सौंपने और भर्ती किए गए लोगों पर नजर रखने के लिए किया जाता था। पाकिस्तानी हैंडलर तय करते थे कि कौन-सा काम दिया जाएगा और उसे कब तक पूरा करना होगा।

इस पूरी प्रक्रिया को इस तरह तैयार किया गया था कि हर चरण में सदस्यों को केवल सीमित जानकारी मिले। एक काम पूरा होने के बाद ही हैंडलर अगला निर्देश जारी करते थे। ATS फराज के मोबाइल फोन, चैट रिकॉर्ड, सोशल मीडिया अकाउंट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल गतिविधियों की जाँच कर रही है ताकि उससे जुड़े लोगों की पहचान की जा सके।

मॉड्यूल के भीतर तय की गई थीं अलग-अलग भूमिकाएँ

जाँच एजेंसियों ने आरोपियों को सौंपी गई अलग-अलग जिम्मेदारियों की पहचान की है। फराज सोशल मीडिया के जरिए नए लोगों को जोड़ने और मध्य प्रदेश में नेटवर्क को बढ़ाने का काम कर रहा था। नईम अब्दुल्ला नेटवर्क के भीतर संपर्क मजबूत करने में मदद करता था और उसने फराज को सीधे पाकिस्तानी जिहादी हैंडलरों से मिलवाया था।

फराज ने ATS को बताया कि वह देवबंद निवासी नईम को करीब पाँच या छह साल से जानता था। बताया गया कि नईम ने फराज और बिहार के एक अन्य संदिग्ध को विदेशी हैंडलरों से मिलवाया था। बाद में ATS ने फराज से पूछताछ के दौरान मिली जानकारी के आधार पर उसे गिरफ्तार किया।

इजहार-उल-हक और शाकिर मेव बंद कमरों में बैठकें आयोजित करने और युवाओं को कट्टरपंथ की ओर प्रेरित करने के लिए भाषण देने में शामिल थे। शाकिर को दूसरे स्तर का कमांडर बताया गया, जिसकी इस मॉड्यूल में महत्वपूर्ण भूमिका थी।

नेटवर्क की संरचना ऐसी बनाई गई थी कि अलग-अलग सदस्य भर्ती, संपर्क, वैचारिक प्रशिक्षण और विदेशी हैंडलरों से जुड़े कामों को संभाल सकें।

ATS की गिरफ्तारी और जाँच की समयरेखा

ATS ने अपनी पहली गिरफ्तारी 12 जून 2026 को की, जब मोहम्मद फराज को भोपाल के काजी कैंप इलाके से हिरासत में लिया गया। 13 जून को पूछताछ के दौरान जाँच एजेंसियों ने उसके पुराने संपर्कों और सोशल मीडिया समूहों की जाँच की। इससे उन्हें नईम अब्दुल्ला तक पहुँचने में मदद मिली।

नईम को 13 और 14 जून के बीच उत्तर प्रदेश के सहारनपुर क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया। ATS ने फराज और नईम से अलग-अलग पूछताछ की और दोनों के बयानों का आमना-सामना भी कराया। शाकिर मेव को 14 जून को राजस्थान के अलवर जिले के टपूकड़ा थाना क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया।

उसे कोर्ट में पेश किया गया और पूछताछ के लिए रिमांड पर लिया गया। लगातार चल रही जाँच के दौरान इजहार-उल-हक से जुड़ी जानकारी सामने आई। उसे 18 जून को गिरफ्तार किया गया और 20 जून को भोपाल की कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने उसे 22 जून तक रिमांड पर भेज दिया।

अब एजेंसी अन्य सदस्यों, स्थानीय मददगारों और उन लोगों की पहचान करने की कोशिश कर रही है, जो कट्टरपंथ से जुड़ी बैठकों में शामिल हुए हो सकते हैं।

विदेशी संपर्क और फंडिंग के रास्तों की जाँच जारी

मामले से जुड़ी सामग्री में संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कतर, तुर्की, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल में PFI से जुड़ी गतिविधियों का उल्लेख किया गया है। जाँच एजेंसियाँ यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या भारत में धन पहुँचाने के लिए बांग्लादेश और नेपाल का इस्तेमाल रास्तों के रूप में किया गया था।

सामग्री में हाथरस गैंगरेप मामले के बाद मॉरीशस से उत्तर प्रदेश में PFI से जुड़े चैनलों तक पैसा भेजे जाने का भी उल्लेख किया गया है। ATS फराज और अन्य आरोपितों के बैंकिंग रिकॉर्ड की जाँच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उन्हें विदेश से या भारत के भीतर काम कर रहे माध्यमों के जरिए कोई धन मिला था या नहीं।

फराज ने जाँच एजेंसियों को बताया कि उसके अब्बू बैटरी मरम्मत का काम करते थे और वह अपने परिवार का इकलौता बेटा था। एजेंसी उसकी आर्थिक पृष्ठभूमि की तुलना उसकी डिजिटल गतिविधियों और नेटवर्क से जुड़े संभावित लेन-देन के साथ कर रही है।

क्लिनिक की नौकरी के पीछे छिपी हुई थीं फराज की गतिविधियाँ

फराज करीब 15 साल तक खुशबू क्लिनिक में कंपाउंडर का काम करता था। अपने इलाके में वह एक मजहबी व्यक्ति के रूप में जाना जाता था। वह और उसकी बीवी घर पर बच्चों को पढ़ाते थे और हर मंगलवार सुबह कुरान की कक्षाएँ भी आयोजित करते थे। घर के बाहर लगे एक बोर्ड पर सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक कक्षाओं का समय लिखा हुआ था।

ATS ने उसके घर पर कार्रवाई गोपनीय तरीके से की। करीब 12 अधिकारियों की टीम, जिसमें तीन महिला कर्मी भी शामिल थीं, घर को चारों ओर से घेरने के बाद छत के रास्ते अंदर दाखिल हुई और उसे हिरासत में लिया। बाद में उसका घर और जिस क्लिनिक में वह काम करता था, दोनों बंद पाए गए।

जाँच एजेंसियाँ अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि उसके पेशेवर, मजहबी या आसपास के संपर्कों में से किसी को भर्ती के लिए संपर्क किया गया था या नहीं। ATS उसकी मार्शल आर्ट्स ट्रेनिंग, कम चर्चित एप्लिकेशन के इस्तेमाल, सोशल मीडिया पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों और विदेश जाने की संभावित तैयारियों की भी जाँच कर रही है।

डिजिटल सबूतों, आरोपितों के बयानों और पाकिस्तानी हैंडलरों से उनके संपर्कों की जाँच की जा रही है ताकि नेटवर्क के पूरे दायरे का पता लगाया जा सके और यह जाना जा सके कि क्या देश के अन्य हिस्सों में पहले से स्लीपर सेल तैयार किए जा चुके थे।

क्या है PFI का ‘मिशन 2047’?

साल 2022 में OpIndia को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से जुड़ा एक आठ पन्नों का आंतरिक दस्तावेज मिला था, जिसका शीर्षक India Vision 2047 था। ‘Towards Rule of Islam in India’ टैगलाइन वाले इस दस्तावेज में साल 2047 तक, यानी भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने तक, देश में इस्लामिक सरकार स्थापित करने के लिए चरणबद्ध योजना का उल्लेख किया गया था।

दस्तावेज में दावा किया गया था कि राजनीतिक सत्ता ब्रिटिश शासन के दौरान मुसलमानों से ‘अन्यायपूर्ण तरीके से छीन ली गई’ थी और इसे फिर से मुस्लिम समुदाय के पास लौटना चाहिए। इसमें यह भी कहा गया था कि अपने उद्देश्य को हासिल करने के लिए PFI को मुस्लिम बहुमत के समर्थन की आवश्यकता नहीं है।

दस्तावेज के अनुसार, संगठन का मानना ​​था कि भारत की मुस्लिम आबादी के 10% लोगों का समर्थन भी हिंदू बहुमत को ‘घुटने टेकने’ पर मजबूर करने और इस्लाम की ‘शान’ को बहाल करने के लिए पर्याप्त होगा। इस योजना को चार चरणों में विभाजित किया गया था। 

पहले चरण में अलग-अलग मुस्लिम संप्रदायों को PFI के बैनर के तहत एकजुट करने, भर्ती बढ़ाने और ऐसी इस्लामिक पहचान तैयार करने पर जोर दिया गया था जो भारतीय पहचान से ऊपर हो। कार्यकर्ताओं को आक्रामक और रक्षात्मक तरीकों का प्रशिक्षण देने की बात कही गई थी, जिसमें रॉड, तलवार और अन्य हथियारों के उपयोग का भी उल्लेख था।

दस्तावेज में यह भी कहा गया था कि मुस्लिमों को वास्तविक या निर्मित शिकायतों की बार-बार याद दिलाई जाए ताकि भारतीय राज्य और हिंदुओं के प्रति असंतोष बनाए रखा जा सके।दूसरे चरण में विरोधियों के बीच डर पैदा करने और सामूहिक ताकत दिखाने के लिए चुनिंदा हिंसा के इस्तेमाल का प्रस्ताव रखा गया था।

जिन कार्यकर्ताओं में क्षमता दिखाई दे, उन्हें आग्नेयास्त्रों (Firearms) और विस्फोटकों का उन्नत प्रशिक्षण देने की बात कही गई थी। साथ ही संविधान, राष्ट्रीय ध्वज और बीआर आंबेडकर जैसे शब्दों का इस्तेमाल अंतिम उद्देश्य को छिपाने के लिए किए जाने का उल्लेख भी था।

दस्तावेज में कार्यपालिका और न्यायपालिका में प्रभाव बढ़ाने, अनुकूल परिणाम हासिल करने और फंडिंग व सहायता के लिए इस्लामिक देशों से संबंध बनाने की बात भी कही गई थी।

तीसरे चरण में PFI ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ राजनीतिक गठबंधन बनाने और इन समुदायों तथा RSS के बीच दूरी पैदा करने की योजना का उल्लेख किया था। संगठन चुनाव लड़ना, धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता कम करना और खुद को मुसलमानों तथा वंचित समुदायों का प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करना चाहता था।

इस चरण में हथियार और विस्फोटक जमा करने तथा प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं के जरिए उन लोगों पर हमला करने की बात भी कही गई थी जिन्हें संगठन अपने हितों के खिलाफ मानता था।

चौथे चरण में PFI के मुसलमानों के निर्विवाद नेता के रूप में उभरने और राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता हासिल करने लायक राजनीतिक समर्थन जुटाने की कल्पना की गई थी। सत्ता में आने के बाद वफादार कार्यकर्ताओं को कार्यपालिका, न्यायपालिका, पुलिस और सशस्त्र बलों में नियुक्त करने की बात कही गई थी।

संगठन का विरोध करने वालों को हटाने और मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था की जगह इस्लामिक संविधान लागू करने का भी उल्लेख था। दस्तावेज में हर मुस्लिम परिवार से कम से कम एक व्यक्ति की भर्ती, गुप्त प्रशिक्षण केंद्र बनाने, हथियार और विस्फोटक रखने के लिए भंडार तैयार करने और एक समर्पित सशस्त्र बल बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया था।

कार्यकर्ताओं को ‘अंतिम संघर्ष’ से पहले हिंदू और RSS नेताओं की व्यक्तिगत जानकारी इकट्ठा करने के निर्देश दिए गए थे। PFI ने भारतीय राज्य के साथ टकराव की स्थिति में विदेशी इस्लामिक देशों से सहायता लेने की संभावना का भी उल्लेख किया था। इसमें विशेष रूप से तुर्की के साथ संबंधों का जिक्र किया गया था और अन्य इस्लामिक देशों के साथ भी ऐसे संबंध विकसित करने की बात कही गई थी।

इस तरह मिशन 2047 को केवल वैचारिक अभियान के रूप में नहीं, बल्कि कट्टरपंथ, भर्ती, राजनीतिक प्रभाव, सशस्त्र प्रशिक्षण, विदेशी समर्थन और संगठित हिंसा के जरिए भारत की संवैधानिक व्यवस्था को बदलने के लिए एक दीर्घकालिक कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत किया गया था।

PFI क्या है और इस पर प्रतिबंध क्यों लगाया गया था?

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) एक इस्लामवादी संगठन था, जो कई भारतीय राज्यों में अपने सदस्यों, सहयोगी संगठनों और राजनीतिक इकाइयों के व्यापक नेटवर्क के जरिए काम करता था। संगठन खुद को मुसलमानों और अन्य वंचित समुदायों के अधिकारों और सशक्तिकरण के लिए काम करने वाला समूह बताता था।

हालाँकि केंद्रीय और राज्य एजेंसियों की जाँच में संगठन को कट्टरपंथ, हिंसक गतिविधियों के लिए लोगों को संगठित करने, आतंक वित्तपोषण, हथियारों के प्रशिक्षण और भारतीय राज्य को चुनौती देने में सक्षम एक गुप्त नेटवर्क तैयार करने के प्रयासों से जोड़ा गया।

यह संगठन लंबे समय से जाँच एजेंसियों की नजर में था और ‘India Vision 2047’ दस्तावेज PFI के खिलाफ कार्रवाई की दिशा में महत्वपूर्ण आधारों में से एक बना। प्रतिबंध तक पहुँचने वाली घटनाओं की शुरुआत 2022 में हुई, जब पुलिस ने फुलवारी शरीफ में एक संदिग्ध नेटवर्क का खुलासा किया।

जाँच एजेंसियों ने अथर परवेज और मोहम्मद जलालुद्दीन को गिरफ्तार किया और ऐसे दस्तावेज बरामद किए, जिनमें मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथ की ओर ले जाने, हथियारों का प्रशिक्षण देने और भारत को इस्लामिक राज्य में बदलने की दिशा में काम करने की योजनाओं का उल्लेख था।

जलालुद्दीन की पहचान प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) के पूर्व सदस्य के रूप में भी हुई थी, जो बाद में PFI से जुड़ गया था। आगे की गिरफ्तारियों और तलाशी में व्हाट्सएप समूह, विदेशी संपर्क, डिजिटल सामग्री और ‘गजवा-ए-हिंद’ नेटवर्क से जुड़े संबंधों की जानकारी सामने आई।

जाँच एजेंसियों ने BJP युवा नेता प्रवीण नेट्टारू की हत्या और पटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली पर हमले की साजिश सहित कई हिंसक घटनाओं में PFI की संभावित भूमिका की भी जाँच की। सरकार का मामला मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर आधारित था- संगठन का देशव्यापी नेटवर्क, उसके फंडिंग चैनल और हिंसक व आतंकवादी गतिविधियों में उसकी संलिप्तता।

सितंबर 2022 में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA), प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राज्य पुलिस ने कई राज्यों में छापेमारी की। इस दौरान PFI के सैकड़ों सदस्यों और पदाधिकारियों को हिरासत में लिया गया, जबकि डिजिटल उपकरण, दस्तावेज और वित्तीय रिकॉर्ड जब्त किए गए।

गृह मंत्रालय के अनुसार, PFI और उससे जुड़े संगठनों को भारत और विदेश से बैंकिंग चैनलों, हवाला और दान के जरिए धन प्राप्त हुआ। बताया गया कि इस धन को कई खातों के जरिए घुमाया गया ताकि उसके वास्तविक उद्देश्य को छिपाया जा सके और बाद में उसका इस्तेमाल गैरकानूनी तथा आतंकवादी गतिविधियों के लिए किया गया।

सरकार ने PFI सदस्यों के ISIS सहित आतंकवादी संगठनों से संबंधों और RSS जैसे संगठनों में घुसपैठ तथा संवेदनशील जानकारी जुटाने के प्रयासों का भी उल्लेख किया। 28 सितंबर 2022 को केंद्र सरकार ने गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत PFI पर पाँच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया।

इसके साथ उससे जुड़े आठ अन्य संगठनों पर भी प्रतिबंध लगाया गया। सरकार ने निष्कर्ष निकाला कि PFI की गतिविधियाँ भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं। इस तरह प्रतिबंध केवल उसकी विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि कट्टरपंथ, विदेशी फंडिंग, हिंसक साजिशों, आतंक संबंधों और भारत की संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने की कथित संगठित योजना से जुड़े एकत्रित सबूतों के आधार पर लगाया गया।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

फादर्स डे पर ‘ट्रांस डैड’ की कहानी छापने वाले न्यूयॉर्क टाइम्स पर भड़के लोग: समझें- मुख्यधारा की संस्कृति में ट्रांसजेंडर एक्टिविज्म को कैसे बढ़ावा दे रहा वेस्टर्न मीडिया

न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) ने पूरी तरह से एक्टिविज्मको पत्रकारिता का रूप दे दिया है। न्यूयॉर्क टाइम्स का एक्टिविज्म इतना अलग-अलग तरह का है कि एक दिन यह अखबार कट्टरपंथियों का मानवीय चेहरा दिखाता है, तो दूसरे दिन खास जेंडर रोल (लिंग भूमिकाओं) वाले त्योहारों में ‘वोक एजेंडा’ घुसा देता है। इस साल फादर्स डे के मौके पर न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक गेस्ट एस्से (अतिथि निबंध) प्रकाशित किया, जिसमें ‘ट्रांस डैड’ को एक सामान्य बात के रूप में दिखाया गया। हालाँकि फादर्स डे पर न्यूयॉर्क टाइम्स के इस ट्रांस एक्टिविज्म पर लोग भड़क गए और उसे जमकर खरी-खोटी सुनाने लगे।

यह लेख ज़ैक एलाम्स द्वारा लिखा गया है, जो जन्म से एक महिला हैं लेकिन खुद को ‘ट्रांस’ पुरुष मानती हैं। यह लेख हन्ना जैकब्स के चित्रों के साथ एक कॉमिक-स्ट्रिप (चित्रकथा) के रूप में सामने आया है।

‘टू माई डॉटर, माई जेंडर वॉज नेवर कॉम्प्लिकेटेड’ (मेरी बेटी के लिए, मेरा जेंडर कभी उलझा हुआ नहीं था) शीर्षक वाले इस लेख के लेखक ज़ैक एलाम्स को लंदन के एक एडिटर और मोशन डिजाइनर के रूप में बताया गया है। एलाम्स 18 साल की उम्र से एक ट्रांस पुरुष के रूप में रह रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के इस लेख में एलाम्स ने अपनी ‘पत्नी’ के साथ इलियट नाम की बेटी की परवरिश के अनुभवों को याद किया।

न्यूयॉर्क टाइम्स में 21 जून 2026 को प्रकाशित इस लेख ने न केवल जन्मजात महिलाओं को पुरुष मानकर पिता के रूप में बच्चों की परवरिश करने को सामान्य बताया, बल्कि पीड़ित होने की कहानी (विक्टिमहुड नैरेटिव) को भी आगे बढ़ाया। लेख में ‘पिता बनने’ को इस रूप में पेश किया गया है कि इसने ज़ैक एलाम्स को एक जैविक महिला से ट्रांस पुरुष में बदलने (ट्रांसिशनिंग) के लिए जेंडर-चेंज प्रोसीजर (लिंग परिवर्तन प्रक्रिया) से गुजरने और अपनी खुद की बनाई पहचान को पूरी तरह से अपनाने के बाद मिलने वाले व्यक्तिगत तानों से उबरने में मदद की।

एलाम्स इस बात पर जोर देते हैं कि एक माता-पिता के रूप में ट्रांस पुरुषों को ‘मोटी चमड़ी’ (सहनशील) होने की जरूरत होती है। न्यूयॉर्क टाइम्स का यह लेख एलाम्स की छोटी बेटी द्वारा अपने ट्रांस डैड की सेक्सुअलिटी को सहजता से स्वीकार करने को मददगार और प्रगतिशील के रूप में दिखाता है।

इस लेख में सार्वजनिक या रोजमर्रा के पलों की कुछ कहानियां शामिल हैं, जिसमें एलाम्स की बेटी एलाम्स के शरीर और अतीत के बारे में सवाल पूछती है या टिप्पणी करती है। मुख्य बातचीत इस प्रकार है-

सड़क पर चलते हुए बेटी पूछती है, “डैड, आपके पास कितने समय तक ब्रेस्ट (स्तन) थे?”

एक पूल पर: “अगर आप एक महिला थीं तो आपकी मूँछें कैसे उग आईं?”

खेल के मैदान पर बेटी कहती है, “मैं बड़ी होकर दाढ़ी बढ़ाना चाहती हूँ।” दूसरा बच्चा जवाब देता है, “तुम दाढ़ी नहीं बढ़ा सकतीं। तुम एक लड़की हो।” बेटी जवाब देती है, “मेरे डैड ने बढ़ाई थी और वह एक लड़की थे।”

हालाँकि न्यूयॉर्क टाइम्स ने जेंडर ट्रांजिशन या सेक्स चेंज प्रोसीजर जैसे जटिल मुद्दों को बच्चे द्वारा आसानी से समझने और ‘ट्रांस डैड’ के रूप में कही जाने वाली बातों की सामाजिक स्वीकृति पर जोर दिया, लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों ने इसके समय और जानबूझकर की गई रूपरेखा पर सवाल उठाए।

कई लोगों ने एक बड़े पारंपरिक त्योहार का इस्तेमाल एक जैविक महिला की ‘ट्रांसजेंडर’ पहचान और पेरेंटिंग के अनुभव को केंद्र में रखने और ‘डैड’ शब्द को फिर से परिभाषित करने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स की आलोचना की। ‘ट्रांस लोग भी डैड और मॉम होते हैं’ जैसी बात को धीरे से बढ़ावा देने के लिए कॉमिक फॉर्मेट का इस्तेमाल दिलचस्प है। इस फॉर्मेट ने बच्चे के जेंडर से जुड़े सवालों को ‘मजेदार’ और बच्चों के बीच ‘जेंडर-सेंसिटाइजेशन’ (लिंग संवेदीकरण) के लिए शेयर करने लायक बना दिया, क्योंकि छोटे बच्चों को यह समझाने से बेहतर क्या हो सकता है कि जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी (GAS) से गुजरना सामान्य और इच्छा के योग्य है।

फादर्स डे पर ट्रांसजेंडर वोक नैरेटिव लाने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स की आलोचना करते हुए, ‘एंड वोकनेस’ ने एक्स (X) पर लिखा, “फादर्स डे पर न्यूयॉर्क टाइम्स। हम मीडिया से जितनी नफरत करते हैं, वह काफी नहीं है।”

लेखक एलेक्स बेरेन्सन ने आलोचना और कटाक्ष को मिलाते हुए लिखा, “मैं @nytimes को इस फादर्स डे पर पुरुषों और पिता बनने के प्रति सांस्कृतिक अभिजात वर्ग (कल्चरल एलीट) के नजरिए को पूरी तरह से पकड़ने के लिए बधाई देना चाहता हूँ – हाँ, टाइम्स के लिए, डैड बनना कुछ ऐसा है जो आप अपने स्तनों को कटवाने के बाद बेहतर महसूस करने के लिए करते हैं। इसे खुद से नहीं गढ़ा जा सकता।”

मशहूर पॉडकास्टर केटी मिलर ने लिखा, “न्यूयॉर्क टाइम्स ने फादर्स डे के लिए ट्रांस डैड होने के बारे में कार्टून प्रकाशित किए। इस तरह वे हमारे बच्चों को भ्रष्ट करने की कल्पना करते हैं।”

इस बीच फॉक्स बिजनेस के पत्रकार चार्ल्स गैस्परिनो ने लिखा, “प्रोग्रेसिव लेफ्ट और देश के बाकी हिस्सों (मान लीजिए करीब 80% अमेरिकी) के बीच की खाई फादर्स डे पर @nytimes की इस बकवास के कारण कभी इतनी चौड़ी नहीं रही। और आप हैरान होते हैं कि ट्रम्प क्यों चुने गए। टू माई डॉटर, माई जेंडर वॉज नेवर कॉम्प्लिकेटेड।”

कई अन्य लोगों ने न्यूयॉर्क टाइम्स के इस लेख को पुरुषों को मिटाने और फादर्स डे को ‘ट्रांस डैड्स डे’ में बदलने का एक प्रयास बताया। फादर्स डे पर गैर-जैविक/ट्रांस दृष्टिकोण को अनुकूल कवरेज देने में अमेरिका और उसके बाहर के कई अन्य पुराने मीडिया घराने भी न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ शामिल हो गए हैं। यह न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा पिता या माँ से जुड़े पारंपरिक अवसरों, यानी लिंग भूमिकाओं का जश्न मनाने वाले दिनों का उपयोग करके मुख्यधारा में ‘ट्रांस डैड’, ‘ट्रांस मॉम’ या ‘ट्रांस पेरेंट्स’ के विचार को थोपने और सामान्य बनाने का एक सीधा प्रयास है।

हालाँकि ट्रांस एक्टिविस्ट पूरे अमेरिका और कई यूरोपीय देशों के स्कूलों में इन कहानियों को आक्रामक रूप से बढ़ावा दे रहे हैं, लेकिन उनके मीडिया सहयोगी जेंडर को लेकर भ्रमित माताओं और वोक लोगों को मंच दे रहे हैं ताकि क्रॉस-सेक्स हार्मोन इंजेक्शन, प्यूबर्टी ब्लॉकर्स, GAS और ‘ट्रांस पेरेंटहुड’ के इस्तेमाल को वास्तविक जैविक जेंडर और रिश्तों के बराबर और सामान्य, और कभी-कभी उससे बेहतर साबित किया जा सके।

रणनीति वोक जेंडर विचारधारा को रोजमर्रा के सांस्कृतिक प्रतीकों में शामिल करने की है। अब ट्रांस एक्टिविस्ट ट्रांसजेंडर पहचान, जेंडर फ्लुइडिटी (लिंग की चंचलता) को सामान्य बनाने के लिए पारंपरिक त्योहारों और भूमिकाओं को एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं और ‘पेरेंट’ को जैविक सेक्स से अलग करने के लिए फादर्स डे से बेहतर अवसर और क्या हो सकता था। यह जबरन थोपा गया समावेशन (इंक्लूजन) है।

पारंपरिक रूप से ‘जेंडर’ और ‘सेक्स’ शब्दों का इस्तेमाल एक-दूसरे की जगह किया जाता रहा है और यह एक वैज्ञानिक और तार्किक रूप से स्वीकृत तथ्य रहा है कि केवल दो ही जेंडर होते हैं जिन्हें सामान्य माना जा सकता है। इसके विपरीत, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामान्य से अलग और विसंगति माना जाता है। नॉन-बाइनरी और ‘जेंडर फ्लुइड’ लोग दावा करते हैं कि वे पारंपरिक सर्वनामों (प्रोनाउन्स) के साथ सहज नहीं हैं क्योंकि वे जेंडर पहचान से जुड़े हैं। इसके कारण ‘They/Them’ और ‘Xe/Xhrer’ जैसे नए सर्वनामों का आविष्कार हुआ।

अमेरिका और यूरोप इस जेंडर-अफर्मेशन और इससे जुड़ी राजनीतिक बहसों का केंद्र रहे हैं, यह सड़न दुनिया भर के कई देशों में फैल चुकी है।

स्पष्ट रूप से डोनाल्ड ट्रम्प की सत्ता में वापसी ने अमेरिका में ट्रांस एक्टिविज्म की लहर को धीमा कर दिया होगा। ‘वोकनेस’ खत्म नहीं हुई है, बल्कि यह सतह के नीचे सुलग रही है। रिपब्लिकन के सत्ता से बाहर होते ही, ट्रांसजेंडर पहचान को सामान्य बनाने का काम फिर से पूरे जोर-शोर से शुरू हो जाएगा।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

इतिहास की भूल सुधार या नई सियासी जंग? ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ के ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ बनने से लगी कॉन्ग्रेसियों के ‘अंग विशेष’ में आग: जानें इस मामले का ‘बंगाल के कसाई’ और नेहरु से खास कनेक्शन

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘नाम बदलने’ के एक फैसले ने देशव्यापी बहस छेड़ दी है। कोलकाता की ऐतिहासिक और बेहद व्यस्त सड़कों में से एक ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ (Suhrawardy Avenue) का नाम अब बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ (Gopal Mukherjee Road) कर दिया गया है। कोलकाता नगर निगम (KMC) द्वारा जारी इस आधिकारिक नोटिफिकेशन के बाद जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) इसे ‘ऐतिहासिक न्याय’ और ‘हिंदुओं के स्वाभिमान की बहाली’ बताकर जश्न मना रही है, वहीं कॉन्ग्रेस और वामपंथी खेमे में इसके खिलाफ तीखा विरोध देखा जा रहा है।

कॉन्ग्रेस इस फैसले को भाजपा की ‘ध्रुवीकरण की राजनीति’ करार दे रही है और सोशल मीडिया पर आम हिंदुओं को भाजपा कार्यकर्ता बताकर उनका मजाक उड़ा रही है। कॉन्ग्रेस का तर्क है कि यह सड़क ‘बंगाल के कसाई’ कहे जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं, बल्कि उसके चाचा और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम कुलपति (VC) डॉ. हसन सुहरावर्दी के नाम पर थी।

लेकिन क्या वाकई इतिहास इतना सीधा और साफ है? क्या सिर्फ नाम का अंतर होने से एक देशद्रोही और अंग्रेजों के मददगार परिवार का दाग धुल जाता है? क्या कॉन्ग्रेस का इस सुहरावर्दी परिवार से लगाव सिर्फ आज का है या इसके तार देश के बंटवारे, जवाहरलाल नेहरू और पूर्व कार्यवाहक राष्ट्रपति हिदायतुल्लाह तक जुड़े हुए हैं? आइए इस पूरी कड़वी हकीकत, दफन इतिहास और ‘गोपाल पाठा’ के शौर्य की कहानी को विस्तार से समझते हैं।

कौन था हसन सुहरावर्दी? अंग्रेजों की चाटुकारिता और ‘सर’ की उपाधि का सच

कॉन्ग्रेस का इकोसिस्टम आज चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम साल 1933 में डॉ. हसन सुहरावर्दी के सम्मान में रखा गया था, जो एक बड़े सर्जन और शिक्षाविद थे। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो समझ आता है कि हसन सुहरावर्दी को अंग्रेजों ने ‘सर’ (Sir) की उपाधि और यह सड़क उनके किसी ‘अकादमिक योगदान’ के लिए नहीं, बल्कि भारत की एक महान बेटी और स्वतंत्रता सेनानी के साथ गद्दारी करने के इनाम में दी थी।

बात 6 फरवरी 1932 की है। कलकत्ता विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह (Convocation) चल रहा था। मंच पर ब्रिटिश गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन (Sir Stanley Jackson) भाषण दे रहा था। उसी समय 21 साल की एक निडर बंगाली स्वतंत्रता सेनानी बीना दास (Bina Das) अपनी डिग्री लेने के बहाने वहाँ पहुँचीं। उनके पास एक रिवॉल्वर थी, जिसे उन्होंने अपनी पोशाक में छुपा रखा था। भारत माँ को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के संकल्प के साथ बीना दास ने गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर एक के बाद एक 5 गोलियाँ दाग दीं।

गवर्नर जैक्सन ने किसी तरह झुककर अपनी जान बचाई। इसी दौरान वहाँ मौजूद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. हसन सुहरावर्दी ने देशभक्त बीना दास को पीछे से दबोच लिया और उन्हें ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया।

इतिहास की गवाही: हसन सुहरावर्दी ने एक क्रूर ब्रिटिश अधिकारी की जान बचाने के लिए अपने ही देश की एक क्रांतिकारी बेटी को अंग्रेजों के क्रूर शिकंजे में सौंप दिया। इस ‘वफादारी’ से खुश होकर ब्रिटिश हुकूमत ने हसन सुहरावर्दी को ‘सर’ (Knighthood) की उपाधि से नवाजा और साल 1933 में उनके घर के सामने वाली सड़क का नाम ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ रख दिया।

इस घटना के बाद बीना दास को 9 साल की कठोर जेल हुई। उनके साथ जुड़ीं अन्य महिला क्रांतिकारियों, जैसे कमला दासगुप्ता (जिन्होंने रिवॉल्वर का इंतजाम किया था), को लंबे समय तक जेल की कालकोठरी में यातनाएँ सहनी पड़ीं। कॉन्ग्रेस आज जिस हसन सुहरावर्दी के नाम का बचाव कर रही है, वह असल में अंग्रेजों का वो पिट्ठू था जिसने भारतीय क्रांतिकारियों के खून और आंसुओं की कीमत पर ब्रिटिश सरकार से जागीरें और सम्मान पाया था। इतना ही नहीं, हसन सुहरावर्दी मुस्लिम लीग और ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (Two-Nation Theory) का कट्टर समर्थक था और उसकी बेटी बाद में पाकिस्तान जाकर वहाँ की राजनीति में सक्रिय हो गई।

‘बंगाल के कसाई’ हुसैन सुहरावर्दी से क्या था हसन का रिश्ता?

भाजपा और राष्ट्रवादी विचारकों का कहना है कि सुहरावर्दी चाहे ‘हसन’ हो या ‘हुसैन’ दोनों एक ही कट्टरपंथी और भारत-विरोधी सुहरावर्दी परिवार के सदस्य थे। हसन सुहरावर्दी रिश्ते में हुसैन शहीद सुहरावर्दी (Huseyn Shaheed Suhrawardy) का सगा चाचा था। और यह हुसैन शहीद सुहरावर्दी कौन था? इसे इतिहास ‘बंगाल का कसाई’ (Butcher of Bengal) के नाम से जानता है।

साल 1946 में जब मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के टुकड़े करने के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) का आह्वान किया, तब बंगाल का मुख्यमंत्री यही हुसैन शहीद सुहरावर्दी था। 16 अगस्त 1946 को कोलकाता की सड़कों पर हिंदुओं का जो कत्लेआम हुआ, उसकी पूरी स्क्रिप्ट इसी हुसैन सुहरावर्दी ने लिखी थी।

हुसैन ने मुख्यमंत्री रहते हुए पुलिस को बैरकों में रहने का आदेश दिया और मुस्लिम लीग के गुंडों को खुली छूट दे दी। देखते ही देखते कोलकाता की सड़कें हिंदुओं की लाशों से पट गईं, माताओं-बहनों की अस्मत लूटी गई और घरों को फूंक दिया गया। इस नरसंहार के पीछे इसी सुहरावर्दी परिवार का हाथ था।

नेहरू का ‘सुहरावर्दी प्रेम’ और कॉन्ग्रेस का पुराना तुष्टिकरण

अब सवाल उठता है कि कॉन्ग्रेस को इस सुहरावर्दी परिवार से इतनी हमदर्दी क्यों है? आर्काइवल रिकॉर्ड्स और ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि हसन सुहरावर्दी जब इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहा था, तब उसकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से हुई थी। दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी जो जीवनभर रही।

यही वजह थी कि जब दिसंबर 1948 में यानी देश के बँटवारे और कोलकाता नरसंहार के दो साल बाद जब ‘बंगाल के कसाई’ हुसैन शहीद सुहरावर्दी पर भारत सरकार ने इनकम टैक्स (आयकर) की देनदारी का शिकंजा कसा, तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू खुद उसके बचाव में उतर आए। नेहरू ने तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय को व्यक्तिगत रूप से पत्र लिखे। नेहरू ने चिंता जताई कि सुहरावर्दी पर कार्रवाई करने से ‘राजनीतिक परिणाम’ खराब हो सकते हैं, इसलिए मामले को रफा-दफा किया जाए या ढील दी जाए।

यह वही हुसैन सुहरावर्दी था जो भारत में करोड़ों की संपत्ति और अपनी काली यादें छोड़कर बाद में पाकिस्तान भाग गया और वहाँ का प्रधानमंत्री बना। कॉन्ग्रेस के इसी सुहरावर्दी प्रेम के कारण दशकों तक कोलकाता के दिल में हिंदुओं के हत्यारों और स्वतंत्रता सेनानियों के गद्दारों के परिवार का नाम चमकता रहा।

हिदायतुल्लाह कनेक्शन: कार्यवाहक राष्ट्रपति और पाकिस्तान जाने वाला परिवार

कॉन्ग्रेस के शासनकाल में तुष्टिकरण की जड़ें कितनी गहरी थीं, इसका एक और उदाहरण मोहम्मद हिदायतुल्लाह (M. Hidayatullah) का देश के शीर्ष पदों पर बैठना है। हिदायतुल्लाह भारत के मुख्य न्यायाधीश और बाद में कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति (Acting President) भी बने।

यहाँ हिदायतुल्लाह और सुहरावर्दी परिवार के तार जोड़ना महत्वपूर्ण है। हसन सुहरावर्दी की बेटी शाइस्ता सुहरावर्दी का निकाह मोहम्मद इकरामुल्लाह से हुआ था। शाइस्ता सुहरावर्दी मोरक्को में पाकिस्तान की राजदूत रही थी। उसके शौहर मोहम्मद इकरामुल्लाह पाकिस्तान के लिए लगा और मोहम्मद अली जिन्नाह का बहुत करीबी था। हिदायतुल्लाह इसी इकारामुल्लाह का सगा छोटा भाई था।

एक तरफ इकरामुल्लाह पाकिस्तान का पहला विदेश सचिव था और बाद में कनाडा, फ्रांस, पुर्तगाल और यूके में पाकिस्तान का राजदूत था और 1963 में मरा, तो दूसरी तरफ मोहम्मद हिदायतुल्लाह यहाँ भारत में न्यापालिका में सीढ़ियाँ चढ़ता रहा। आजीद से पहले वो सेंट्रल प्रोविंस का जज था और 1954 में वो नागपुर हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना, जो उस समय देश का सबसे कम उम्र का चीफ जस्टिस था।

साल 1956 में वो एमपी का चीफ जस्टिस बना और 1968 में भारत का चीफ जस्टिस। इसके बाद 1969 में वो कार्यवाहक राष्ट्रपति रहा, जब देश में इंदिरा गाँधी की सरकार थी और फिर CJI पद से रिटायर होने के बाद 1979 में देश का उप राष्ट्रपति भी बना। इस बीच 1982 में कुछ समय वो देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति एक बार फिर से बना। तब भी केंद्र में इंदिरा गाँधी की ही सरकार थी। सोचिए सुहरावर्दी परिवार की जड़ें देश में कहाँ से कहाँ तक फैली रही और कॉन्ग्रेस कैसे उसे पालती-पोसती रही। आज के जमाने में भी सवाल पूछ लिए जाए तो शायद कॉन्ग्रेसियों के पास कोई ढंग का जवाब न हो।

हकीकत यह है कि हिदायतुल्लाह का परिवार भी उसी सुहरावर्दी नेटवर्क और मुस्लिम लीग की विचारधारा से गहराई से प्रभावित था। देश के विभाजन के बाद हिदायतुल्लाह के परिवार के कई करीबी लोग और रिश्तेदार भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे और वहाँ बड़े पदों पर आसीन हुए। लेकिन इसके बावजूद कॉन्ग्रेस ने उन्हें भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुँचाया। यही कारण है कि आज जब सुहरावर्दी के नाम पर चोट होती है, तो कॉन्ग्रेस के पूरे इकोसिस्टम को दर्द होता है।

कौन थे गोपाल पाठा? जिन्होंने कोलकाता के हिंदुओं को कटने से बचाया

अब बात करते हैं उस महानायक की, जिनके नाम पर अब इस सड़क का नाम ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ रखा गया है। कोलकाता के लोग उन्हें आदर और गर्व से ‘गोपाल पाठा’ (Gopal Patha) कहते हैं। ‘पाठा’ बांग्ला शब्द है जिसका अर्थ होता है बकरा। गोपाल जी का कॉलेज स्ट्रीट पर मीट का पारिवारिक व्यवसाय था, इसलिए लोग उन्हें प्यार से इस नाम से बुलाते थे।

16 अगस्त 1946 को जब हुसैन शहीद सुहरावर्दी के गुंडों ने हिंदुओं का सामूहिक संहार शुरू किया, तब हिंदू समाज नेतृत्वविहीन और असहाय था। उस समय महज 5 फीट 4 इंच के कद वाले गोपाल पाठा हिंदुओं के रक्षक बनकर सामने आए। उन्होंने नारा दिया, “अगर वो हमारा एक मारेंगे, तो हम उनके दस मारेंगे। हम कायरों की तरह नहीं मरेंगे।”

गोपाल पाठा ने स्थानीय युवाओं को एकजुट किया और ‘भारतीय जातीय वाहिनी’ (Indian National Force) नाम का एक संगठन बनाया। उन्होंने कसाई सुहरावर्दी के दंगाइयों को करारा जवाब दिया। गोपाल पाठा और उनके साथियों के इसी पराक्रम का परिणाम था कि मुस्लिम लीग का कोलकाता को पूरी तरह से पाकिस्तान में मिलाने और हिंदुओं को खदेड़ने का मंसूबा मिट्टी में मिल गया। उन्होंने अपनी जान पर खेलकर हजारों हिंदू परिवारों, माताओं और बहनों की रक्षा की।

सितंबर 1946 में महात्मा गाँधी कोलकाता आए। उन्होंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया और हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों से शांति की अपील करते हुए अपने-अपने हथियार उनके चरणों में सरेंडर करने को कहा। मुस्लिम लीग के गुंडों ने अपने कुछ जंग लगे हथियार गाँधी जी के सामने रख दिए।

जब गाँधी जी के दूत गोपाल पाठा के पास पहुँचे और उनसे हथियार डालने को कहा, तो गोपाल पाठा ने गाँधी जी के सामने जाने से साफ मना कर दिया। उन्होंने संदेश भिजवाया, “मैं अपने हथियार गाँधी जी के चरणों में क्यों रखूँ? जब हम पर हमले हो रहे थे, हमारी महिलाओं को उठाया जा रहा था, तब गाँधी जी कहाँ थे? क्या गाँधी जी हमारी महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी लेंगे? अगर कोई अपराधी मेरी बहन पर हाथ उठाएगा, तो मैं उसकी कलाई काट दूँगा, यह मेरी नजर में हिंसा नहीं, मेरा धर्म है। मैं हथियार नहीं डालूँगा।”

गोपाल पाठा ने अंत तक हथियार सरेंडर नहीं किए, क्योंकि वे जानते थे कि कायरता से शांति नहीं खरीदी जा सकती।

गोपाल मुखर्जी रोड हिंदुओं के सम्मान की बहाली, ये बीजेपी सरकार का साहसिक कदम

दशकों तक पश्चिम बंगाल में वामपंथियों और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) का राज रहा, जिन्होंने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते गोपाल पाठा जैसे नायक को इतिहास की किताबों से गायब कर दिया और गद्दारों के नाम पर बनी सड़कों को सहेज कर रखा।

लेकिन पश्चिम बंगाल की वर्तमान भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता नगर निगम के माध्यम से ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ का नाम बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ करके एक ऐतिहासिक भूल को सुधारा है।

मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इस फैसले पर ट्वीट करते हुए लिखा, “दशकों तक हमारे शहर की एक मुख्य सड़क का नाम उस व्यक्ति (या परिवार) के नाम पर रहा जिसने राजनीतिक लाभ के लिए निर्दोष नागरिकों के नरसंहार की साजिश रची और सत्ता का दुरुपयोग किया। वीर गोपाल मुखर्जी के नाम पर इस सड़क का नामकरण कर, जिन्होंने हजारों मासूमों की जान बचाई, आखिरकार इतिहास के साथ न्याय किया गया है। यह समय पश्चिम बंगाल के असली नायकों को याद करने और उन्हें सम्मान देने का है।”

नाम बदलना क्यों है हिंदुओं का वास्तविक सम्मान?

कॉन्ग्रेस आज भले ही ‘हसन’ और ‘हुसैन’ के नाम का तकनीकी खेल खेलकर हिंदुओं का मजाक उड़ाए, लेकिन सच यही है कि हसन सुहरावर्दी ने देश की बेटी बीना दास को गिरफ्तार करवाकर अंग्रेजों से वफादारी निभाई थी, और उसी के परिवार ने भारत मां के टुकड़े किए थे। ऐसे किसी भी व्यक्ति या परिवार का नाम स्वतंत्र भारत की सड़कों पर होना देश के स्वतंत्रता सेनानियों और विभाजन के शिकार हुए लाखों निर्दोष हिंदुओं का अपमान था।

भाजपा सरकार ने गोपाल पाठा के नाम पर सड़क का नाम रखकर यह साबित किया है कि अब देश अपने रक्षकों का सम्मान करेगा, न कि भक्षकों और गद्दारों का। यह फैसला केवल एक सड़क का नाम बदलना नहीं है, बल्कि यह बंगाली हिंदुओं के खोए हुए गौरव, पराक्रम और आत्मसम्मान को वापस लौटाने वाला एक क्रांतिकारी कदम है, जिसके लिए वर्तमान सरकार निश्चित रूप से बधाई की पात्र है।

‘मेड इन इंडिया’ का ग्लोबल ‘स्पंदन’: पेरिस में मोदी-मैक्रों ने क्यों थाम लिया इस स्टार्टअप का हाथ?

फ्रांस के नीस शहर में आयोजित ‘भारत इनोवेट्स 2026’ के मंच से राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का संबोधन भारत-फ्रांस संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत है। उन्होंने वैश्विक समुदाय को स्पष्ट संदेश दिया कि यूरोप को अब भारत के प्रति अपने पुराने दृष्टिकोण को छोड़ना होगा। मैक्रों की इन बातों के गहरे आर्थिक और रणनीतिक मायने हैं। रक्षा सौदों में ‘मेक इन इंडिया’ को प्राथमिकता, भारतीय स्टार्टअप्स के लिए वित्तीय सहयोग और अत्याधुनिक AI तकनीक साझा करने जैसे कदम यह साबित करते हैं कि भारत अब सिर्फ तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि फ्रांस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भविष्य की रूपरेखा तैयार करने वाला एक बराबर का साझेदार है।

फ्रांस अब कूटनीतिक वादों के साथ-साथ ‘फ्रेंच टेक’, ‘चूज़ फ्रांस’ और ‘फ्रांस 2030’ जैसे अपने प्रमुख तकनीकी अभियानों के दरवाजे भारतीय स्टार्टअप्स के लिए पूरी तरह से खोल रहा है। इसके अलावा, आगामी ‘विवाटेक समिट 2026’ (VivaTech 2026) में दोनों देश मिलकर भारतीय इनोवेशन को यूरोपीय बाजार में बड़े पैमाने पर लॉन्च करने की तैयारी में हैं।

नीतियों और समझौतों से परे, इस तकनीकी साझेदारी की असली और जमीनी तस्वीर तब दुनिया के सामने आई, जब इसी समिट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

इस प्रदर्शनी में उत्तराखंड के युवाओं द्वारा तैयार किया गया एक ऐसा नवाचार भी शामिल था, जिसने पेरिस में फ्रांस के राष्ट्रपति को भी अचंभे में डाल दिया। वायरल हो रहे इस वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को एक छोटी सी डिवाइस के बारे में बेहद बारीकी से समझाते हुए नजर आ रहे हैं। यह डिवाइस करोड़ों लोगों की जान बचाने वाला स्वदेशी ‘स्पंदन ईसीजी’ (Spandan ECG) है। यह भारत के उस स्टार्टअप का कमाल है, जिसने अपनी तकनीक से वैश्विक मंच पर अपना लोहा मनवाया है।

सौरभ बडोला, रजत जैन, साबित रावत और नितिन चंदोला की कोर टीम ने मिलकर ‘स्पंदन’ (Spandan) को विकसित किया है। माचिस की डिब्बी के आकार का यह पोर्टेबल ईसीजी उपकरण हृदय संबंधी असामान्यताओं का शुरुआती चरण में ही पता लगाने में सक्षम है। इस नवाचार का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाना और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम छोर तक चिकित्सा सुविधाएँ (Last-mile connectivity) पहुँचाना है, ताकि समय रहते लोगों की जान बचाई जा सके।

यह डिवाइस उत्तराखंड के युवाओं की मेहनत का परिणाम है। इनकी कंपनी ‘सनफॉक्स टेक्नोलॉजी’ (Sunfox Technologies) ने जिस तरह से हेल्थ-टेक के क्षेत्र में क्रांति लाई है, वह काबिले तारीफ है। यह उपकरण न केवल पोर्टेबल है, बल्कि दिल की समस्याओं को घंटों पहले भांप लेने का दावा करता है।

इस सफर की शुरुआत ‘शार्क टैंक इंडिया’ (Shark Tank India) के मंच से हुई थी, जहाँ से इस आइडिया ने देश भर में पहचान बनाई। इसके बाद, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ (Mann Ki Baat) में भारत के स्वदेशी मेडिकल नवाचारों और स्टार्टअप्स के प्रयासों की सराहना की थी, जिसमें ‘स्पंदन’ जैसे अभिनव उपकरणों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया। आज ‘मन की बात’ से शुरू हुआ यह सफर पेरिस में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों तक पहुँच चुका है।

उत्तराखंड की इस स्टार्टअप कंपनी ने अपनी अनोखी तकनीक से अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का मान बढ़ाया है। हिमालय की दुर्गम चोटियों और चारधाम यात्रा के कठिन रास्तों पर यह पोर्टेबल ईसीजी मशीन आज हजारों श्रद्धालुओं की ‘लाइफ-लाइन’ बनी हुई है।

पेरिस में आयोजित दुनिया के सबसे बड़े टेक्नोलॉजी इवेंट्स में से एक, ‘विवाटेक 2026’ (VIVATECH 2026) में सनफॉक्स टेक्नोलॉजी ने अपने उत्पादों का लोहा मनवाया। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मैक्रों ने कंपनी के स्टॉल का दौरा किया। मजे की बात यह है कि इस बार ‘विवाटेक’ में भारत को ‘सेंटर ऑफ अट्रैक्शन’ बनाया गया था, जहाँ देश के 20 चुनिंदा स्टार्टअप्स को अपनी तकनीक दिखाने का मौका मिला।

दोनों नेताओं ने इस तकनीक के सामाजिक प्रभाव को काफी करीब से समझा। कंपनी के सीईओ रजत जैन ने प्रधानमंत्री को बताया कि कैसे उनके पोर्टेबल ईसीजी उपकरण कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में भी हृदय रोगों की जांच को आसान बना रहे हैं। खास तौर पर चारधाम यात्रा मार्गों पर कंपनी का मुफ्त कार्डियक मॉनिटरिंग कार्यक्रम एक मिसाल बन चुका है।

दिलचस्प बात यह रही कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्पंदन के संस्थापकों से यह भी पूछा कि क्या यह तकनीक अमरनाथ यात्रा जैसे दुर्गम और लो-नेटवर्क वाले इलाकों में भी काम कर सकती है। कंपनी का आत्मविश्वास से भरा जवाब था कि इसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही विकसित किया गया है।

फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों भी इस तकनीक से काफी प्रभावित दिखे और उन्होंने फ्रांस में इसके संभावित उपयोग पर चर्चा की। अब सनफॉक्स यूरोपीय मानकों के अनुसार ‘सीई’ (CE) सर्टिफिकेशन हासिल करने की प्रक्रिया में है, जिससे यूरोप के बाजार में भी ‘मेड इन इंडिया’ की गूंज सुनाई देगी। इसके अलावा, कंपनी अब ‘कार्डियक अमाइलॉइडोसिस’ (Cardiac Amyloidosis) जैसी दुर्लभ बीमारियों पर शोध के लिए फ्रांस की एक संस्था के साथ मिलकर काम कर रही है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तराखंड की गलियों से निकला यह स्टार्टअप अब पूरी दुनिया के दिल की धड़कन सुरक्षित करने की राह पर है। ‘मन की बात’ से शुरू हुआ यह सफर आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के बढ़ते दबदबे की कहानी कह रहा है।

कुलदेवी का आशीर्वाद, झरने का चमत्कार और सैंकड़ों कश्मीरी पंडितों की आस्था: पढ़िए J&K में लगने वाला खीर भवानी मेला क्यों है सबसे खास, किसकी होती है पूजा

जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गाँव में आज से वार्षिक माता खीर भवानी मेले की शुरुआत हो गई। ज्येष्ठ अष्टमी के अवसर पर आयोजित होने वाला यह मेला कश्मीरी पंडित समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन माना जाता है।

हर वर्ष हजारों श्रद्धालु देश के विभिन्न राज्यों से यहाँ पहुँचकर माता रग्न्या देवी के दर्शन करते हैं, पवित्र झरने में खीर अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

इस वर्ष भी जम्मू से हजारों श्रद्धालु संगठित काफिलों में घाटी पहुँचे हैं। प्रशासन की ओर से सुरक्षा, चिकित्सा शिविर, हेल्प डेस्क, यातायात नियंत्रण, साफ-सफाई और आपातकालीन सेवाओं के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मंदिर परिसर और यात्रा मार्गों पर विशेष निगरानी रखी गई ताकि श्रद्धालु शांतिपूर्ण वातावरण में पूजा कर सकें।

हालाँकि खीर भवानी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है। यह कश्मीर की प्राचीन धार्मिक परंपराओं, कश्मीरी पंडित समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, विस्थापन की स्मृतियों और घाटी की साझा सामाजिक विरासत से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यह मेला आज भी धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक, तीनों स्तरों पर विशेष महत्व रखता है।

सदियों पुराना तीर्थ: क्या है माता खीर भवानी मंदिर का इतिहास?

माता खीर भवानी मंदिर जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गाँव में स्थित है और इसे कश्मीर के सबसे पवित्र शक्ति स्थलों में गिना जाता है। यह मंदिर देवी रग्न्या या राग्न्या भगवती को समर्पित है, जिन्हें शक्ति का स्वरूप और कश्मीरी पंडित समुदाय की कुलदेवी माना जाता है।

मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि काफी प्राचीन मानी जाती है। इस स्थल के ऐतिहासिक संदर्भ कल्हण की राजतरंगिणी, भृगु संहिता और अबू-अल-फजल की ऐन-ए-अकबरी जैसे ग्रंथों में मिलते हैं। समय के साथ यह स्थान केवल पूजा का केंद्र नहीं बल्कि कश्मीरी हिंदू समाज के सांस्कृतिक जीवन का भी प्रमुख आधार बन गया।

वर्तमान मंदिर संरचना डोगरा शासनकाल में विकसित हुई। माना जाता है कि महाराजा प्रताप सिंह ने इसके आधुनिक स्वरूप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जबकि बाद में महाराजा हरि सिंह के समय इसका संरक्षण और विस्तार किया गया।

मंदिर की वास्तु संरचना पारंपरिक मंदिरों से कुछ अलग है क्योंकि यहाँ पूजा का केंद्र कोई विशाल गर्भगृह नहीं बल्कि मंदिर परिसर के बीच स्थित एक प्राकृतिक पवित्र झरना है, जिसके चारों ओर धार्मिक गतिविधियाँ संपन्न होती हैं। एक कथा यह भी है कि रावण के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर माँ रग्न्या प्रकट हुई थीं।

इसके बाद रावण ने उनकी स्थापना कुलदेवी के रूप में करवाई। हालाँकि रावण के व्यवहार और बुरे कर्म के चलते देवी नाराज हो गईं और रावण की नगरी छोड़कर चली गईं। इसके बाद भगवान राम ने जब रावण का वध किया तो राम ने हनुमान से कहा कि वह देवी की स्‍थापना किसी उपयुक्त स्थान पर करवाएँ। इसके बाद हनुमान की मदद यहाँ स्थापना कराई गई

खीर का प्रसाद, ज्येष्ठ अष्टमी और मंदिर से जुड़ी प्रमुख मान्यताएँ

इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा देवी को चावल की खीर खीर अर्पित करने की है। इसी वजह से इस स्थान को ‘खीर भवानी’ के नाम से जाना जाता है। श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित पवित्र झरने के पास पहुँचकर खीर, दूध, फूल और अन्य प्रसाद अर्पित करते हैं। मान्यता है कि माता रग्न्या देवी भक्तों की रक्षा करती हैं और उनके जीवन में समृद्धि और शांति लाती हैं।

ज्येष्ठ अष्टमी का दिन विशेष महत्व रखता है। इसी दिन वार्षिक मेले का आयोजन होता है और इसे देवी की विशेष पूजा का अवसर माना जाता है। सुबह से ही श्रद्धालु पारंपरिक परिधान पहनकर मंदिर पहुँचते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और पूजा-अर्चना में भाग लेते हैं।

कई परिवारों के लिए यह केवल व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा का हिस्सा भी है।

रहस्यमयी झरना: माता खीर भवानी मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा और उससे जुड़ी मान्यताएँ

माता खीर भवानी मंदिर की सबसे विशिष्ट और चर्चित पहचान मंदिर परिसर के बीच स्थित पवित्र प्राकृतिक झरना है। इसी झरने के चारों ओर पूरा धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होता है और यही इस मंदिर को अन्य शक्ति स्थलों से अलग बनाता है। स्थानीय परंपरा में इस झरने को ‘स्यंध’ (Syandh) कहा जाता है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।

इस झरने से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यता इसके पानी के रंग को लेकर है। ऐसा माना जाता है कि इस झरने का पानी क्षेत्र की समृद्धि के आधार पर रंग बदलता है और इसे घाटी के भविष्य, सामाजिक परिस्थितियों या बड़े परिवर्तनों से जोड़कर देखा जाता है। सामान्य परिस्थितियों में पानी का रंग हल्का, साफ या दूधिया दिखाई देना शुभ माना जाता है।

वहीं गहरा, धुंधला या काला रंग कठिन समय या अशुभ संकेत के रूप में देखा जाता है। इस मान्यता को लेकर समुदाय में कई पीढ़ियों से कहानियाँ और स्मृतियाँ प्रचलित रही हैं। 1990 में कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर पलायन से ठीक पहले इसका पानी कथित तौर पर काला हो गया था।

किसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में कुंड का जल काला हो जाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि जम्मू-कश्मीर में कोई विपत्ति आने वाली है। 2014 की बाढ़ और कारगिल युद्ध के दौरान कुंड के जल का रंग क्रमशः काला और लाल हो गया था। हालाँकि यह कुंड घाटी की उन्नति का संकेत भी देता है।

कहा जाता है कि जब अनुच्छेद-370 हटाया गया था तब कुंड का जल हरे रंग का हो गया था। जल का यह हरा रंग कश्मीर की उन्नति और खुशहाली का प्रतीक माना गया।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह झरना केवल जल का स्रोत नहीं बल्कि देवी रग्न्या की उपस्थिति और कृपा का प्रतीक है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु इस झरने में खीर, दूध, पुष्प और प्रसाद अर्पित करते हैं। इसी परंपरा के कारण इस तीर्थ का नाम ‘खीर भवानी’ पड़ा। पूजा के दौरान श्रद्धालु झरने के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और शांति तथा समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

पलायन के बाद भी कायम रहा रिश्ता: कश्मीरी पंडितों के लिए क्यों खास है यह मेला?

खीर भवानी मेला कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि उनकी सामूहिक पहचान का भी हिस्सा है। दशकों तक घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के सामाजिक जीवन में यह मेला विशेष स्थान रखता था। परिवारों के लिए यह वार्षिक धार्मिक और सामुदायिक मिलन का अवसर होता था।

लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर में आतंकवाद, लक्षित हिंसा, हत्याओं, धमकियों और असुरक्षा के माहौल के बीच बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर पलायन करना पड़ा। इस घटना ने समुदाय की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। करीब 5 लाख कश्मीरी हिंदुओं ने अपनी मिट्टी से दूर होने का दर्द झेला।

लगातार नरसंहार और प्रताड़ना के चलते उन्हें घाटी से भागने को मजबूर होना पड़ा। विस्थापन के बाद भी खीर भवानी मेला समुदाय की स्मृति और धार्मिक परंपरा का केंद्र बना रहा। आज भी बड़ी संख्या में लोग हर वर्ष इस मेले में शामिल होकर अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव महसूस करते हैं।

बदलते समय में मेले की नई भूमिका

खीर भवानी मेले की एक महत्वपूर्ण पहचान इसकी सामाजिक भूमिका भी है। कई वर्षों से स्थानीय मुस्लिम समुदाय इस आयोजन में सहयोग करता रहा है। श्रद्धालुओं के स्वागत, व्यवस्थाओं और स्थानीय स्तर पर सहयोग की परंपरा को घाटी के सामाजिक संबंधों और साझा संस्कृति के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।

इसी वजह से इस मेले को अक्सर कश्मीरियत यानी साझा सांस्कृतिक विरासत और सहअस्तित्व से भी जोड़ा जाता है। इस वर्ष प्रशासन ने सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए। मंदिर परिसर के आसपास अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, मेडिकल कैंप लगाए गए और सहायता केंद्र बनाए गए।

आगामी अमरनाथ यात्रा को देखते हुए भी सुरक्षा व्यवस्थाओं को और मजबूत किया गया। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल आयोजन को सफल बनाना नहीं बल्कि श्रद्धालुओं के बीच भरोसा और सुरक्षा की भावना को बनाए रखना भी है।

आस्था से आगे: क्यों विशेष है खीर भवानी मेला?

माता खीर भवानी मेला कश्मीर की उन परंपराओं में शामिल है जहाँ धर्म, इतिहास और समाज एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। तुलमुल्ला स्थित यह मंदिर केवल एक तीर्थस्थल नहीं बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय की आस्था, सांस्कृतिक निरंतरता और ऐतिहासिक स्मृति का केंद्र है।

आज भी जब हजारों श्रद्धालु यहाँ पहुँचकर माता रग्न्या देवी को खीर अर्पित करते हैं, तो यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता, यह उस परंपरा को जीवित रखने का प्रयास भी होता है जिसने समय के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन अपनी पहचान को बनाए रखा है।

यमाल मुस्कुराया, सालाह चमके और काबो वर्दे ने दुनिया रोक दी: FIFA विश्व कप में अंडरडॉग्स की रात

गुजरे दिनों फीफा (FIFA) विश्व कप में जो खेल प्रेमियों को देखने मिला, वह किसी जादू से कम नहीं था। एक के बाद एक लगातार रोमांचक मुकाबले, जो आपको रात भर सोने न दें।

सर्वप्रथम, बीती रात अटलांटा स्टेडियम में 2010 विश्व कप विजेता स्पेन का मुकाबला पिछले संस्करण में अर्जेंटीना को चौंका चुकी सऊदी अरब की टीम से था। पिछले मैच में हुई गलतियों से सबक लेते हुए स्पेनिश टीम के कोच लुई डे ला फुएन्ते ने अपनी प्लेइंग इलेवन में कुछ बदलाव किए। मिडफील्ड में दानी ओल्मो को अधिक आक्रामक भूमिका दी गई, जिससे पेड्री को आगे बढ़कर खेल रचने की अधिक स्वतंत्रता मिली।

वहीं लेफ्ट विंग पर गावी की जगह एलेक्स बाएना को मौका दिया गया। साथ ही चोट से उबरकर लामीन यमाल भी टीम में वापसी कर रहे थे।

इस बार स्पेनिश टीम अपने पिछले मैच की तुलना में कहीं अधिक संतुलित और आत्मविश्वास से भरी नजर आ रही थी। मैच के शुरुआती मिनटों से ही स्पेन ने विपक्षी गोलपोस्ट पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। रोड्री, पेड्री और दानी ओल्मो लगातार फॉरवर्ड लाइन के लिए मौके तैयार कर रहे थे।

मैच के दसवें मिनट में ही लामीन यमाल ने शानदार गोल दागकर स्पेन को बढ़त दिला दी। इसके बाद सऊदी अरब की टीम कुछ संभल पाती, उससे पहले ही सेंट्रल फॉरवर्ड मिकेल ओयारजाबाल ने दो गोल दागकर मैच के पच्चीसवें मिनट से पहले ही स्पेन को 3-0 से आगे कर दिया।

स्पेन का दबदबा पूरे मैच में साफ दिखाई दे रहा था। पहले हाफ में ही उसने मुकाबले की दिशा लगभग तय कर दी थी। दूसरे हाफ की शुरुआत में एक और गोल के साथ स्पेन की बढ़त 4-0 हो गई। लामीन यमाल की वापसी ने टीम के आक्रमण को अतिरिक्त धार दी थी। यह मैच 4-0 से जीतकर स्पेन ग्रुप एच में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया।

मैं खबर पढ़ रहे तमाम साथियों का ध्यान एक उन्नीस वर्षीय खिलाड़ी की ओर भी दिलाना चाहूंगा, जिसे शायद उतनी चर्चा नहीं मिलती जितनी वह डिजर्व करता है। इस खिलाड़ी का नाम है पाऊ कुबार्सी।

कम उम्र में ही पाऊ कुबार्सी स्पेन की रक्षापंक्ति के महत्वपूर्ण सदस्य बन चुके हैं। डिफेंस में उनका संयम, पोजिशनिंग और खेल की समझ उन्हें अपनी पीढ़ी के सबसे प्रतिभाशाली सेंटर-बैक खिलाड़ियों में शामिल करती है। बड़े मंच पर जिस परिपक्वता के साथ वह खेलते हैं, वह वाकई प्रशंसनीय है।

आगे, रात साढ़े बारह बजे लॉस एंजिलिस स्टेडियम में केविन डी ब्रुएना की बेल्जियम का मुकाबला ईरान की टीम से था। यहां एक ऐसा परिणाम सामने आया जिसकी बहुत कम लोगों ने कल्पना की होगी। ईरान ने बेल्जियम जैसी मजबूत टीम को 0-0 की बराबरी पर रोक दिया। इस नतीजे के बाद ग्रुप जी की स्थिति और भी रोचक हो गई।

इसके बाद मियामी में ग्रुप एच के एक अन्य मुकाबले में मार्सेलो बिएल्सा की उरुग्वे को काबो वर्दे का सामना करना था। उरुग्वे के लिए यह मैच जीतना बेहद जरूरी था। दूसरी ओर, काबो वर्दे पहले ही इस विश्व कप में स्पेन के खिलाफ प्रभावशाली प्रदर्शन कर सबका ध्यान अपनी ओर खींच चुकी थी।

मार्सेलो बिएल्सा ने अपनी टीम को 4-2-3-1 फॉर्मेशन के साथ मैदान में उतारा। उगार्ते और वालवर्दे टीम के लिए यह मैच जीतना चाहते थे। वहीं काबो वर्दे के गोल की जिम्मेदारी एक बार फिर उनके अनुभवी गोलकीपर वोज़िन्हा के कंधों पर थी।

मैच शुरू होते ही काबो वर्दे ने भी आक्रामक इरादे दिखाए। दोनों टीमें लगातार हमले करती नजर आईं। मैच के इक्कीसवें मिनट में काबो वर्दे को उरुग्वे के गोलपोस्ट से लगभग तीस मीटर दूर फ्री-किक मिली। डिफेंसिव मिडफील्डर केविन पीना ने शानदार राइट-फुटेड शॉट लगाया और गेंद सीधे गोलपोस्ट में जा समाई। पूरी दुनिया को चौंकाते हुए काबो वर्दे ने बढ़त हासिल कर ली।

हालाँकि उरुग्वे ने हार नहीं मानी। मैच के चवालीसवें मिनट में मैक्सिमिलियानो अराउजो ने हेडर के जरिए बराबरी दिलाई। इसके ठीक एक मिनट बाद अराउजो के पास पर अगुस्तिन कानोब्बियो ने गोल कर उरुग्वे को 2-1 की बढ़त दिला दी। पहला हाफ समाप्त होते-होते उरुग्वे वापसी कर चुका था।

दूसरे हाफ में काबो वर्दे ने तीन बदलाव किए और उनका असर भी दिखा। सब्स्टीट्यूट खिलाड़ी हेलियो वरेला ने गोल कर स्कोर 2-2 कर दिया। इसके बाद दोनों टीमों ने जीत के लिए पूरा जोर लगाया, लेकिन कोई और गोल नहीं हो सका।

मैच 2-2 की बराबरी पर समाप्त हुआ। उरुग्वे के लिए यह निराशाजनक परिणाम था, जबकि काबो वर्दे के लिए विश्व कप इतिहास का एक यादगार क्षण। जिस साहस और अनुशासन के साथ उन्होंने पूरे मैच में संघर्ष किया, वह प्रशंसा के योग्य है।

आगे, वैंकूवर में ग्रुप जी के मुकाबले में मिस्र ने न्यूज़ीलैंड को 3-1 से हराकर अपने समूह में शीर्ष स्थान हासिल कर लिया। स्टार खिलाड़ी मोहम्मद सालाह ने भी गोल दागकर दर्शकों को झूमने का मौका दिया।

अब आज रात विश्वविजेता अर्जेंटीना भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे डल्लास में ऑस्ट्रिया के खिलाफ मैदान में उतरेगी। एक बार फिर दुनिया की निगाहें लियो मेस्सी पर होंगी। वहीं पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस रात ढाई बजे फिलाडेल्फिया में इराक का सामना करेगी।

इन सभी मुकाबलों पर आपकी नजर बनी रहनी चाहिए क्योंकि इस बार विश्व कप में शानदार फुटबॉल देखने को मिल रही है। आगे भी कई रोमांचक मुकाबले बाकी हैं। बने रहिए साथ। फुटबॉल की खबरों का सिलसिला जारी रहेगा।

बंगाल की BJP सरकार ने पेश किया पहला पूर्ण बजट, 1 लाख सरकारी नौकरी से लेकर महिला आरक्षण और राजनीतिक हिंसा पीड़ितों की मदद तक: जानें- शुभेंदु अधिकारी सरकार ने जनता को दी कौन-कौन सी सौगातें

पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता में आई BJP सरकार ने अपना पहला बजट पेश किया गया। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए यह ₹4.38 लाख करोड़ का है। राज्य सरकार ने प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता लाने, तेजी से विकास करने और डिजिटल तकनीक को बढ़ावा देने के लिए ‘वेस्ट बंगाल इम्पैक्ट AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) मिशन’ शुरू किया है।

शुभेंदु सरकार ने 1 लाख खाली पदों पर भर्ती की घोषणा की साथ ही महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की भी घोषणा की। उन्होंने 36,000 करोड़ रुपये की ‘अन्नपूर्णा योजना’ जैसी बड़ी योजनाओं को लागू करने की बात कही, साथ ही राजनीतिक हिंसा के शिकार लोगों और परिवार का भी ख्याल रखा है।

वित्त मंत्री स्वप्न दासगुप्ता ने राज्य की पहली BJP सरकार के पहले पूर्ण बजट में कई अहम घोषणाएँ कीं। रोजगार बढ़ाने से लेकर सरकारी कर्मचारियों के महँगाई भत्ते में बढ़ोतरी, महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण, 1 लाख खाली पदों में भर्ती के साथ- साथ बेरोजगारी भत्ता देने की भी घोषणा की। पूरे बजट में हर तबके का ध्यान रखा गया, किसानों, बुजुर्गों, छात्रों, बेरोजगारों, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ-साथ नौकरीपेशा लोगों का भी पूरा ख्याल रखा।

शुभेंदु सरकार के बजट में जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को विशेष सम्मान देते हुए उनकी जयंती (6 जुलाई) को राज्य में सरकारी अवकाश की घोषणा की है। इसके साथ ही उनके पैतृक आवास के जीर्णोद्धार और उनकी 125 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित करने की भी घोषणा की है।

DA में अतिरिक्त 20 फीसदी की बढ़ोतरी

वित्त मंत्री स्वप्र दासगुप्ता ने बजट पेश करते हुए घोषणा की कि राज्य सरकार के कर्मचारियों, अर्ध-सरकारी कर्मचारियों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों और पेंशनभोगियों, जिन्हें अभी तक 18 प्रतिशत की दर से महँगाई भत्ता मिलता है, उन्हें अब अतिरिक्त 20 प्रतिशत महँगाई भत्ता मिलेगा यानी कुल महँगाई भत्ता बढ़कर 38 फीसदी हो जाएगा। DA की नई दरें 1 अक्टूबर, 2026 से लागू होंगी। इससे लाखों सरकारी कर्मचारियों और रिटायर हो चुके लोगों को सीधा फायदा होगा। कर्मचारी लंबे समय से DA बढ़ाने की माँग कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “MLA फंड को ₹70 लाख से बढ़ाकर ₹1 करोड़ कर दिया गया है। होम गार्ड और NBF कर्मियों के मासिक वेतन में ₹2,000 की बढ़ोतरी की गई है। सिविल डिफेंस वॉलंटियर्स को हर महीने 20 दिन के काम की गारंटी दी जाएगी। अर्ध-सरकारी और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को 20 प्रतिशत अतिरिक्त महँगाई भत्ता मिलेगा। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के साथ-साथ आशा वर्कर्स के मासिक मानदेय में भी ₹5,000 की बढ़ोतरी की गई है।”

‘संग्रामी भत्ता’ के जरिए राजनीतिक हिंसा से पीड़ितों को मदद

बजट में राज्य पुलिस बल के लिए कुल 20000 कर्मचारियों की भर्ती की घोषणा की गई है। इससे निश्चित रूप से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और साथ ही कानून-व्यवस्था भी मजबूत होगी। एक नए ‘संग्रामी भत्ता’ (संघर्ष करने वालों या पीड़ित लोगों के लिए भत्ता) की भी घोषणा की गई है। सरकार ने साफ कहा है कि यह भत्ता उन लोगों को दिया जाएगा जो राजनीतिक विचारधारा या राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए हैं। योजना का मकसद राजनीतिक हिंसा के पीड़ितों और उनके परिवारों के प्रति समर्थन दिखाना है।

साथ ही, उच्च शिक्षा ले रही अविवाहित छात्राओं को ₹50,000 की एकमुश्त सहायता राशि मिलेगी। मिड-डे मील पकाने वालों का भत्ता ₹1,000 बढ़ाया जाएगा, और प्राइमरी स्कूलों में मिड-डे मील के लिए प्रति छात्र आवंटन को बढ़ाकर ₹10 किया जा रहा है।

1 लाख नौकरी और बेरोजगारी भत्ता का ऐलान

विधानसभा में बजट पेश करते हुए राज्य के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने कहा, “21 से 45 साल की उम्र के योग्य, पढ़े-लिखे और बेरोजगार युवाओं को हर महीने भत्ता देने के लिए अक्टूबर 2026 में ‘भरोसा’ योजना शुरू की जाएगी। इस योजना के तहत, ग्रेजुएट युवाओं को ₹3,000 का भत्ता मिलेगा, जबकि दूसरों को ₹2,000 मिलेंगे। यह योजना उन परिवारों के उम्मीदवारों के लिए होगी जिनकी सालाना आय ₹1 लाख से कम है और जो अभी किसी दूसरी सोशल सिक्योरिटी स्कीम का फायदा नहीं उठा रहे हैं।”

इसके अलावा 100 मेधावी छात्रों के लिए ‘स्वामी विवेकानंद मेरिट स्कीम’ का प्रस्ताव भी बजट में है। उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही अविवाहित छात्राओं के लिए ₹50,000 की एकमुश्त आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की गई है।

सरकारी नौकरी की परीक्षा की तैयारी के लिए ₹30,000 की एकमुश्त ग्रांट मिलेगी। ये रकम सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों के छात्रों को दी जाएगी। सालों से सरकारी नौकरियों में भर्ती की दिक्कतों को देखते हुए शुभेंदु सरकार ने अधिकतम आयुसीमा में 5 साल की छूट देने की घोषणा की है। बजट में KYC-कंप्लायंट जॉब कार्ड धारकों को 125 दिन का रोजगार देने का प्रस्ताव है और 100 दिन की काम वाली योजना के लिए ₹14,000 करोड़ का आवंटन किया गया है।

AI मिशन पर बंगाल

राज्य के सरकारी विभागों के कामकाज को पूरी तरह से पेपरलेस (कागज-रहित) बनाना और दक्षता बढ़ाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करना है। बंगाल के पुलिस विभाग के लिए एक खास AI सेल बनाया जा रहा है, जो पुलिसिंग, अपराध नियंत्रण और जाँच में AI का अधिक से अधिक इस्तेमाल करेगा। इसके अलावा, राज्य सरकार ‘बंगाल सिलिकॉन वैली’ प्रोजेक्ट के तहत डेटा सेंटर्स और AI से जुड़े उद्योगों के लिए ₹30,000 करोड़ का निवेश करवाने जा रही है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

बजट के दौरान राज्य के वित्त मंत्री ने राज्य में नए आईआईटी और एम्स बनाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उत्तर बंगाल में एक आईआईटी और एक एम्स स्थापित किया जाएगा। कल्याणी के पास एक नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बनाने के साथ-साथ एक आईआईएम स्थापित करने का प्रस्ताव भी है।

पश्चिम बंगाल के बजट में ‘बंगाल एआई मिशन’ के तहत भूमि अधिग्रहण और सरकारी कामकाज को डिजिटल बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। हालाँकि, इसका मुख्य लक्ष्य डिजिटलाइजेशन के अलावा औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना और बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करना है। निवेश को आकर्षित करने,भूमि अधिग्रहण को सरल बनाने और सिंगल-विंडो सिस्टम के लिए एक नई औद्योगिक नीति लागू की गई है।

1 किलोमीटर के दायरे में शराब की कोई दुकान नहीं होगी

अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों या धार्मिक स्थलों के 1 किलोमीटर के दायरे में शराब की कोई दुकान नहीं होगी। बजट में राज्य सरकार ने यह घोषणा की गई है। मिड-डे मील रसोइयों के लिए ₹1,000 का भत्ता बढ़ाने की घोषणा की गई है। साथ ही पैरा-टीचर्स का मासिक सैलरी ₹5,000 बढ़ाया गया है।

किसान परिवार को मिलेंगे ₹36000 सालाना

बजट में हर किसान परिवार को ₹3,000 प्रति माह की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है यानी सालाना हर परिवार को ₹36000 रुपए मिलेंगे। वित्त मंत्री ने बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के लिए ₹1200 करोड़ की लागत वाले एक मास्टर प्लान की घोषणा की और कहा कि इससे बाढ़ की आशंका वाले इलाके का स्थायी विकास सुनिश्चित किया जाएगा। बजट में बुज़ुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों के लिए मासिक भत्ते में 500 रुपए की बढ़ोतरी की घोषणा की गई।

महिलाओं के लिए बड़ी घोषणाएँ

बजट के माध्यम से महिलाओं को सशक्त करने की शुभेन्दु सरकार ने पहल की है। इस दौरान सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण की घोषणा की गई है यानी 1 लाख सरकारी नौकरी मिलने पर उसमें 33000 महिलाओं को नौकरी मिलेगी।

इसके अलावा अन्नपूर्णा योजना की घोषणा की गई है, जिसके लिए राज्य सरकार ने ₹36,000 करोड़ आवंटित किए हैं। योजना के तहत महिलाओं को हर महीने ₹3,000 दिए जाएँगे, जो सीधे बैंक खातों में जमा किया जाएगा। बजट में गर्भवती माताओं के लिए ₹21,000 की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है साथ ही उन्हें छह न्यूट्रिशन किट मिलेंगी।

टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया ताकि किसी तरह की सहायता के लिए सीधा संपर्क किया जा सके और मदद पहुँचाने में देरी न हो। इससे प्रशासन को कानून-व्यवस्था दुरुस्त रखने में मदद मिलेगी। महिलाओं की सुरक्षा के लिए ‘दुर्गा स्क्वाड’ शुरू करने की घोषणा की गई है। अक्टूबर में दुर्गा पूजा से पहले 16000 नए कॉन्स्टेबल तैनात किए जाएँगे।

पश्चिम बंगाल के बजट (2026) में खनन (माइनिंग) गतिविधियों के लिए सेंट्रलाइज्ड ई-ऑक्शन प्रक्रिया लागू करने और आदिवासी बहुल क्षेत्र झारग्राम में एक नई ‘ट्राइबल यूनिवर्सिटी’ स्थापित करने की घोषणा की गई है। इससे स्थानीय जनजातीय युवाओं को उच्च शिक्षा, रोजगार-उन्मुख पाठ्यक्रम, और रिसर्च की सुविधा मिलेगी।

राज्य में रेत और दूसरे खनिजों की नीलामी में पारदर्शिता लाने और अवैध खनन और सिंडिकेट राज को खत्म करने के लिए यह व्यवस्था शुरू की गई है। खदानों की डिजिटल मैपिंग और सीसीटीवी कवरेज के माध्यम से अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाने का प्रावधान है।