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सालार मसूद की दरगाह पर 10 साल में आए चढ़ावे का नहीं मिला हिसाब, ‘घोटाले’ से जुड़ा सपा के पूर्व मंत्री का भी नाम: जानिए कैसे खुला पूरा मामला और कमेटी ने क्या कहा

उत्तर प्रदेश के बहराइच की सालार मसूद दरगाह एक बार फिर विवादों में है। इस बार मामला दरगाह पर आने वाले चढ़ावे और उसके वित्तीय रिकॉर्ड से जुड़ा है। आरोप है कि दरगाह में पिछले कई वर्षों में आए चढ़ावे और दान का पूरा हिसाब उपलब्ध नहीं है। जिलाधिकारी की ओर से रिकॉर्ड माँगे जाने के बाद भी कई सालों का वित्तीय ब्योरा नहीं मिल पाया।

इसके बाद दरगाह में बड़े वित्तीय घोटाले की आशंका जताई जा रही है। मामले में भाजपा (बीजेपी) नेताओं ने करोड़ों रुपए की हेराफेरी का आरोप लगाया है, जबकि समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री यासर शाह का नाम भी विवाद में सामने आया है। दूसरी तरफ दरगाह इंतजामिया कमेटी सभी आरोपों को बेबुनियाद बता रही है।

दरगाह के चढ़ावे को लेकर बवाल

बहराइच की सालार मसूद दरगाह को देश की प्रसिद्ध दरगाहों में गिना जाता है। यहाँ हर साल लाखों मुस्लिम पहुँचते हैं और नकद दान के अलावा सोना, चाँदी और अन्य कीमती वस्तुएँ चढ़ाते हैं। हाल के दिनों में दरगाह के चढ़ावे और संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर सवाल उठने लगे।

विवाद तब और बढ़ गया जब दरगाह से जुड़े कुछ लोगों और भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि दरगाह में आने वाले चढ़ावे का सही हिसाब-किताब नहीं रखा गया। आरोप यह भी है कि वर्षों से जमा हुई धनराशि और अन्य संपत्तियों के उपयोग में गंभीर अनियमितताएँ हुई हैं। इसी बीच कुछ पुश्तैनी खादिमों ने दावा किया कि दरगाह में चढ़ाई गई सोने-चाँदी की कीमती ज्वेलरी अब दिखाई नहीं दे रही है। उनका कहना है कि अगर आभूषण सुरक्षित हैं तो उन्हें सार्वजनिक रूप से दिखाया जाना चाहिए।

भाजपा के आरोप

विवाद को लेकर भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष कुँवर बासिल अली ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और पूरे मामले की SIT से जाँच कराने की माँग की है।कुँवर बासिल अली का आरोप है कि दरगाह वक्फ नंबर-19 की बेशकीमती संपत्तियों और चढ़ावे के प्रबंधन में बड़े स्तर पर अनियमितताएँ हुई हैं।

बासित अली ने माँग की है कि पिछले लगभग 20 वर्षों के वित्तीय लेनदेन की निष्पक्ष जाँच कराई जाए। उनका आरोप है कि दरगाह में आने वाले दान, चढ़ावे और चंदे की रकम में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई है। उनका कहना है कि मामले की निष्पक्ष जाँच होने पर करोड़ों रुपए के वित्तीय गड़बड़ी का सच सामने आ सकता है।

मामला बढ़ने के बाद प्रदेश सरकार के प्रभारी मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने भी जिलाधिकारी अक्षय त्रिपाठी से विस्तृत रिपोर्ट माँगी है। रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर देने को कहा गया है। इससे साफ है कि प्रशासन भी आरोपों को गंभीरता से देख रहा है।

डीएम ने माँगा ब्योरा, लेकिन रिकॉर्ड नहीं मिला

बहराइच के जिलाधिकारी अक्षय त्रिपाठी ने दरगाह के वित्तीय रिकॉर्ड की जानकारी माँगी तो कई सवाल खड़े हुए। जाँच के दौरान यह बात सामने आई कि पिछले 10 वर्षों के चढ़ावे और आय-व्यय से जुड़े कई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, दरगाह प्रबंधन की ओर से पूरा वित्तीय ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया जा सका।

इसी वजह से बड़े वित्तीय गोलमाल या घोटाले की आशंका जताई जा रही है। जिलाधिकारी ने मामले को गंभीर मानते हुए उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड को पत्र भेजकर जाँच की आवश्यकता बताई है। जाँच में एक कर्मचारी की नियुक्ति पर भी सवाल उठे हैं, जबकि वर्तमान समय में 170 कर्मचारियों के काम करने का दावा कमेटी कर रही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर दरगाह में हर साल बड़ी मात्रा में चढ़ावा आता रहा है, तो उसका पूरा लेखा-जोखा कहाँ है और रिकॉर्ड उपलब्ध क्यों नहीं है।

सपा के पूर्व मंत्री की मिलीभगत के आरोप

इस पूरे विवाद में समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री यासर शाह का नाम भी सामने आया है। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया है कि दरगाह की इंतजामिया कमेटी में शामिल कुछ लोगों के साथ मिलकर वित्तीय अनियमितताओं को संरक्षण दिया गया।

कुँवर बासित अली ने मुख्यमंत्री से की गई शिकायत में यासर शाह की भूमिका की भी जाँच कराने की माँग की है। उनका आरोप है कि दरगाह से जुड़े आर्थिक मामलों में पूर्व मंत्री की भी भूमिका रही है और इसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।

दरगाह कमेटी ने क्या सफाई दी?

वहीं दरगाह इंतजामिया कमेटी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। कमेटी के वरिष्ठ सदस्य एडवोकेट दिलशाद अहमद का कहना है कि भ्रष्टाचार और गबन के आरोप पूरी तरह निराधार हैं।

कमेटी का दावा है कि दरगाह का हर वित्तीय लेनदेन नियमों के अनुसार होता है और सभी प्रक्रियाएँ वक्फ बोर्ड के नियमों के तहत संचालित की जाती हैं। कमेटी के अनुसार, चढ़ावे की गिनती सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में होती है और पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड की जाती है। इसलिए हेराफेरी की संभावना नहीं है। कमेटी ने यह भी कहा है कि कर्मचारियों की नियुक्तियाँ और अन्य प्रशासनिक कार्य भी पूरी पारदर्शिता के साथ किए जाते हैं।

कब-कब विवादों में रही सालार मसूद दरगाह?

बहराइच की सालार मसूद दरगाह पिछले कुछ वर्षों में कई बार विवादों में रही है। 2025 में दरगाह में लगने वाले जेठ मेले और उर्स को लेकर भी बड़ा विवाद खड़ा हुआ, जब बहराइच प्रशासन ने कानून-व्यवस्था के मद्देनजर मेले की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुँचा और कई दिनों तक राजनीतिक व सामाजिक बहस का विषय बना रहा।

जून 2026 में एक नया विवाद तब सामने आया, जब प्रदेश सरकार के मंत्री अनिल राजभर ने दरगाह परिसर का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से सर्वे कराने की माँग की। उनका कहना था कि दरगाह के ऐतिहासिक और पुरातात्विक पहलुओं की जाँच होनी चाहिए।

दिल्ली पुलिस ने कुछ गलत नहीं किया: जानिए कैसे पुलिसवालों के खिलाफ हिंसा भड़काने के लिए झूठ का जाल बुन रहे हैं अभिजीत दिपके

दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र परीक्षाओं में गड़बड़ी के नाम पर शुरू हुआ प्रदर्शन अब पूरी तरह राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो चुका है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अभिजीत दिपके और उनकी संस्था ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) पर शनिवार (20 जून 2026) को तय समय सीमा समाप्त होने के बाद भी जबरन सड़क रोकने और दिल्ली पुलिस के खिलाफ दुष्प्रचार करने के गंभीर आरोप लगे हैं। दिल्ली पुलिस ने नियम के मुताबिक शाम को अनुमति खत्म होने पर प्रदर्शनकारियों को शांति से हटने को कहा था, लेकिन दिपके और उनके साथियों ने वहां से हटने के बजाय सोशल मीडिया पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना शुरू कर दिया।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने रात में उनकी बिजली काट दी और पानी-टॉयलेट की सुविधाएँ बंद कर दीं, जिसे बाद में बहाल कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर वीडियो और पोस्ट डालकर जनता को उकसाते हुए कहा, “पुलिस मुझे गिरफ्तार करने वाली है। मैं आप सभी से अपील करता हूँ कि अगर मुझे गिरफ्तार भी कर लिया जाए, तब भी देश भर में यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन रुकना नहीं चाहिए!” दिल्ली पुलिस ने साफ किया है कि उनकी तरफ से कोई बल प्रयोग या शारीरिक कार्रवाई नहीं की गई है, बल्कि केवल कानून का पालन करने की हिदायत दी गई थी।

जानकारों का मानना है कि यह दिल्ली पुलिस के खिलाफ एक सोची-समझी ‘डॉग व्हिसलिंग’ (भीड़ को उकसाने की नीति) है, ताकि पुलिस को बल प्रयोग के लिए मजबूर किया जा सके। इस फ्लॉप शो को हिट बनाने के लिए अब इसमें परीक्षाओं के मूल मुद्दे को भटकाकर ‘मेरा लिंग, मेरी मर्जी’ और पुरुषों के साड़ी पहनने जैसे अजीबोगरीब वामपंथी एजेंडे शामिल कर लिए गए हैं।

यह रणनीति ठीक वैसी ही है जैसी अतीत में किसान आंदोलन के दौरान लाल किले की हिंसा और साल 2020 के दिल्ली दंगों से पहले अपनाई गई थी, जहाँ अफवाहें फैलाकर पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद जंतर-मंतर पर टेंट गाड़ने और सड़कों को अनिश्चितकाल के लिए ब्लॉक करने की इस जिद के सामने दिल्ली पुलिस ने गजब के संयम और पेशेवर रवैये का परिचय दिया है। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।

दिल्ली पुलिस का बेमिसाल संयम Vs अभिजीत दिपके का खतरनाक विक्टिम कार्ड

दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर से लेकर सोशल मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तक, पिछले कुछ दिनों से एक बेहद सोची-समझी स्क्रिप्ट को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है। यह स्क्रिप्ट कोई नई नहीं है, बल्कि देश ने इसे पहले भी कई आंदोलनों के दौरान बार-बार देखा है। इस खेल का सीधा सा नियम है- पहले किसी मुद्दे के नाम पर प्रदर्शन की अनुमति माँगो, प्रशासन जब सहयोग करते हुए अनुमति दे दे तो चुपचाप प्रदर्शन करो, लेकिन जैसे ही अनुमति का निर्धारित समय समाप्त हो जाए, तो वहाँ से हटने के बजाय वहीं पर खूँटा गाड़कर बैठ जाओ। इसके बाद जब पुलिस कानून के दायरे में रहकर आपको वहाँ से हटने की हिदायत दे, तो तुरंत मोबाइल का कैमरा ऑन करो, चेहरे पर लाचारी का भाव लाओ और सोशल मीडिया पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलते हुए अफवाहें फैलाना शुरू कर दो।

इस बार इस पूरी पटकथा के मुख्य सूत्रधार बने हैं सोशल मीडिया के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे अभिजीत दिपके। इस पूरे ड्रामे के बीच जो सबसे बड़ा सच दबाने की कोशिश की जा रही है, वो यह है कि दिल्ली पुलिस ने पूरे मामले में रत्ती भर भी कुछ गलत नहीं किया है। पुलिस ने तो प्रदर्शनकारियों को पूरा सहयोग दिया, लेकिन दिपके और उनके साथी जानबूझकर कानून व्यवस्था को ऐसी स्थिति में धकेलना चाहते हैं जहाँ पुलिस को मजबूरन बल प्रयोग करना पड़े और इन्हें अपनी फ्लॉप हो चुकी राजनीति को चमकाने का एक नया बहाना मिल जाए।

नियमों को ठेंगा और जंतर-मंतर को पिकनिक स्पॉट बनाने की सोची-समझी जिद

हमारा देश और इसकी व्यवस्था किसी एक व्यक्ति की सनक से नहीं, बल्कि स्थापित कानूनों और नियमों से चलती है। दिल्ली का जंतर-मंतर भले ही देश में विरोध प्रदर्शनों का एक प्रमुख केंद्र रहा हो, लेकिन वहाँ किसी भी आयोजन के लिए दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन से एक निश्चित समय सीमा तक की लिखित अनुमति लेनी अनिवार्य होती है।

अभिजीत दिपके की संस्था ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को भी इसी नियम के तहत जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की बकायदा अनुमति दी गई थी। उन्होंने दिनभर वहाँ अपना कार्यक्रम किया भी, लेकिन असली तमाशा तब शुरू हुआ जब अनुमति का समय समाप्त हो गया। जैसे ही शाम को तय वक्त खत्म हुआ, पुलिस ने एक बेहद सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें शांतिपूर्वक वहाँ से जाने के लिए कहा।

यह एक ऐसा नियम है जो देश के हर आम और खास नागरिक पर समान रूप से लागू होता है। मगर दिपके ने कानून का सम्मान करने के बजाय वहाँ से हटने से साफ इनकार कर दिया और सोशल मीडिया को अपना नया हथियार बना लिया। उन्होंने इंटरनेट पर यह दुष्प्रचार शुरू कर दिया कि प्रशासन ने उनकी बिजली काट दी है और पानी-टॉयलेट की सुविधाएँ बंद कर दी हैं, जबकि हकीकत यह थी कि सुरक्षा और कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कुछ समय की प्रशासनिक मुस्तैदी के बाद सभी आवश्यक नागरिक सुविधाएँ बहाल थीं।

सोचने वाली बात यह है कि जब आपके पास उस जगह पर रुकने की कोई कानूनी वैधता ही नहीं बची, तो आप वहाँ जबरन क्यों डटे हुए हैं? दिपके और उनके मुट्ठी भर साथी अब जंतर-मंतर की उस संवेदनशील सड़क पर क्रिकेट खेल रहे हैं। यह दृश्य अपने आप में हास्यास्पद और गंभीर दोनों है। क्या जंतर-मंतर जैसी संवेदनशील जगह प्रदर्शन के लिए है या उसे किसी पिकनिक स्पॉट या खेल के मैदान में तब्दील कर दिया जाना चाहिए?

असल में प्रदर्शनकारियों की तरफ से यह दलील देना कि “अगर हमें जंतर-मंतर से हटाना है तो प्रदर्शन के लिए कोई स्थायी जगह दो” ये कुछ और नहीं बल्कि वहाँ अवैध रूप से टेंट गाड़ने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। यह ठीक उसी पुराने ढर्रे पर चल रहा है जो कभी अन्ना आंदोलन के शुरुआती दिनों में देखा गया था, जहाँ शुरुआत में प्रशासन प्रदर्शनकारियों को नजरअंदाज करता है, फिर वह जगह एक पिकनिक स्पॉट में बदलती है और देखते ही देखते वहाँ पक्के तंबू तन जाते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे वामपंथी विचारधारा के सेलिब्रिटी, विपक्ष के तमाम बड़े नेता और खास एजेंडे वाले चेहरे वहाँ अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने और कैमरे के सामने फोटो खिंचवाने पहुँचने लगते हैं ताकि किसी न किसी बहाने यह पूरा तमाशा राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बना रहे।

झूठी गिरफ्तारी का खौफ पैदा कर दिल्ली पुलिस के खिलाफ डॉग व्हिसलिंग का खेल

अभिजीत दिपके ने हद तो तब कर दी जब उन्होंने सोशल मीडिया पर बाकायदा एक भावुक पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि पुलिस उन्हें किसी भी वक्त गिरफ्तार करने वाली है। उन्होंने अपने समर्थकों से अपील कर डाली कि अगर वे गिरफ्तार भी हो जाएँ, तो देशव्यापी शांतिपूर्ण प्रदर्शन थमना नहीं चाहिए।

अब इस पूरे बयान के पीछे छिपी क्रूर सच्चाई को समझिए। दिल्ली पुलिस ने दिपके या उनके साथियों पर न तो कोई लाठी चलाई, न ही उन्हें शारीरिक रूप से वहाँ से घसीटकर हटाया। पुलिस के जवान बेहद शालीनता से कानून का पालन करने की अपील कर रहे थे, लेकिन दिपके इस बात को बखूबी जानते हैं कि जब तक वे खुद को एक ‘बेचारे’ और ‘सताए हुए’ एक्टिविस्ट के रूप में पेश नहीं करेंगे, तब तक उन्हें सोशल मीडिया पर लाइक्स, शेयर्स और री-ट्वीट्स की वो अटेंशन नहीं मिलेगी जिसके वो भूखे हैं।

यह पूरी कवायद सीधे तौर पर दिल्ली पुलिस के खिलाफ ‘डॉग व्हिसलिंग’ यानी इशारों-इशारों में अपनी हिंसक भीड़ को उकसाने की एक बेहद खतरनाक कोशिश है। जब आप अपने मंच से यह झूठ फैलाते हैं कि पुलिस आपके खिलाफ दमनकारी नीति अपना रही है और आपको जेल में डालने वाली है, तो आप अनजाने में नहीं, बल्कि जानबूझकर अपने समर्थकों के दिलों में कानून के रखवालों के प्रति नफरत और गुस्से का जहर घोल रहे होते हैं। आप उस भीड़ को इस बात के लिए तैयार कर रहे होते हैं कि वे पुलिसकर्मियों को अपना दुश्मन समझें और उन पर हमला कर दें। इतिहास गवाह है कि इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी और अफवाहों का अंत हमेशा बेहद हिंसक और दुखद रहा है।

अतीत के खूनी सबक और उकसावे की राजनीति का भुक्तभोगी इतिहास

जब हम दिपके की इस उकसावे वाली रणनीति को देखते हैं, तो हमें अतीत की उन दो बड़ी और भयावह घटनाओं को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने दिल्ली को हिलाकर रख दिया था। सबसे पहला उदाहरण है किसान आंदोलन के नाम पर हुई लाल किले की हिंसा। उस आंदोलन के दौरान भी प्रदर्शनकारियों ने महीनों तक दिल्ली की सीमाओं को बंधक बनाए रखा, सड़कों पर तंबू गाड़े और अपनी समानांतर व्यवस्था खड़ी कर ली। दिल्ली पुलिस ने महीनों तक असीम धैर्य का परिचय दिया, लेकिन आंदोलन के तथाकथित नेताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने लगातार यह झूठ फैलाया कि सरकार और पुलिस किसानों को कुचलना चाहती है।

इस उकसावे का अंतिम परिणाम देश ने 26 जनवरी के पावन दिन देखा, जब दिल्ली की सड़कों पर सरेआम तलवारें लहराई गईं, बैरिकेड्स तोड़े गए और लाल किले की प्राचीर पर चढ़कर देश के तिरंगे का अपमान करते हुए एक धार्मिक ध्वज फहरा दिया गया। उस दिन सैकड़ों पुलिसकर्मियों को ट्रैक्टरों से कुचलने का प्रयास किया गया, उन्हें ऊँचाइयों से नीचे खाई में धकेल दिया गया, लेकिन पुलिस ने तब भी संयम नहीं खोया।

ठीक ऐसा ही खूनी खेल साल 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान भी खेला गया था। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध की आड़ में शाहीन बाग जैसी जगहों पर सड़कें रोकी गईं और इंटरनेट पर यह अफवाहें फैलाई गईं कि पुलिस एक खास समुदाय को निशाना बना रही है। मंचों से भड़काऊ और जहरीले भाषण दिए गए जिसका नतीजा उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीषण हिंदू विरोधी दंगों के रूप में सामने आया।

उस हिंसा में पेट्रोल बमों और अवैध हथियारों से पूरी दिल्ली को दहला दिया गया, जिसमें दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की बेरहमी से हत्या कर दी गई और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के शरीर पर चाकुओं के अनगिनत घाव कर उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया।

यह दोनों ऐतिहासिक उदाहरण इस बात के गवाह हैं कि जब-जब दिपके जैसे लोग पुलिस के खिलाफ अफवाहें फैलाकर जनता को उकसाते हैं, तब-तब उसका खामियाजा सड़क पर खड़े आम पुलिस के जवानों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है।

फ्लॉप शो को हिट बनाने का आखिरी पैंतरा और भटकता हुआ एजेंडा

दरअसल, अभिजीत दिपके और उनके सहयोगियों की असली हताशा और बौखलाहट इस बात से पैदा हो रही है कि उनका यह पूरा आंदोलन जनता के बीच बुरी तरह ‘फ्लॉप’ साबित हुआ है। इस आंदोलन की शुरुआत में रणनीतिकारों को यह पूरी उम्मीद थी कि दिल्ली पुलिस पहले ही दिन जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर देगी, जिससे उन्हें तुरंत हंगामा करने, खुद को पीड़ित दिखाने और मीडिया की सुर्खियाँ बटोरने का मौका मिल जाएगा।

लेकिन दिल्ली पुलिस ने बेहद समझदारी दिखाते हुए उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया और उन्हें नियमपूर्वक प्रदर्शन करने की इजाजत दे दी, जिसके कारण उनका पहला प्रदर्शन पूरी तरह बेअसर रहा। इसके बाद उन्होंने लखनऊ, पुणे, नागपुर और जयपुर जैसे अन्य बड़े शहरों में भी इस तरह के प्रदर्शन आयोजित करने की कोशिश की, लेकिन देश के जागरूक युवाओं और आम जनता ने इस नौटंकी को पूरी तरह खारिज कर दिया।

जब दिपके ने देखा कि छात्र आंदोलन और परीक्षाओं की पारदर्शिता के नाम पर शुरू हुआ यह तमाशा पूरी तरह बिखर रहा है, तो उन्होंने इस आंदोलन के मूल मुद्दे को ही बदल दिया। जो प्रदर्शन देश के छात्रों की परीक्षाओं और उनके भविष्य को लेकर शुरू हुआ था, उसमें अचानक ‘मेरा लिंग, मेरी मर्जी’, ‘मेरा जेंडर, मेरी मर्जी’ और पुरुषों के साड़ी पहनने जैसे बेहद अजीबोगरीब और भटकाने वाले वामपंथी एजेंडे शामिल कर लिए गए।

जब देश के आम छात्रों ने देखा कि उनके नाम पर कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत और वैचारिक राजनीति चमका रहे हैं, तो उन्होंने इस आंदोलन से पूरी तरह दूरी बना ली। अब जब इस आंदोलन के पास न तो भीड़ बची है और न ही जनता का समर्थन, तो इनके पास सिर्फ एक ही आखिरी पैंतरा बचा है कि जैसे भी हो, पुलिस को उकसाकर बल प्रयोग करने पर मजबूर किया जाए ताकि गिरती हुई राजनीतिक साख को दोबारा जिंदा किया जा सके।

क्या दिल्ली पुलिस इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदने के लिए तैयार है?

यह पूरा मामला अब किसी कानून व्यवस्था की समस्या से ज्यादा एक विशुद्ध राजनीतिक मसला बन चुका है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि कोई भी व्यक्ति या समूह विरोध प्रदर्शन के अधिकार के नाम पर सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों या सरकारी जगहों को अनिश्चितकाल के लिए ब्लॉक नहीं कर सकता।

कानून के मुताबिक, यदि कोई प्रदर्शनकारी समय सीमा खत्म होने के बाद भी स्वेच्छा से उस जगह को खाली नहीं करता है, तो प्रशासन के पास कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए हल्का बल प्रयोग करने का पूरा अधिकार है।

लेकिन दिल्ली पुलिस अभिजीत दिपके के इस चक्रव्यूह और उनकी गहरी साजिश को अच्छी तरह समझती है। पुलिस जानती है कि दिपके और उनके साथी इसी ताक में बैठे हैं कि कब कोई पुलिसकर्मी उन पर हाथ उठाए या लाठी चलाए, और कब वे उस फुटेज को दुनिया भर में दिखाकर खुद को लोकतंत्र का सिपाही घोषित कर सकें।

यही वजह है कि दिल्ली पुलिस ने गजब के धैर्य, पेशेवर रवैये और प्रशासनिक सहयोग का परिचय दिया है। पुलिस ने बिना किसी बल प्रयोग के केवल संवाद और कानून के दायरे में रहकर स्थिति को संभाला है। अब देश के युवाओं और जागरूक नागरिकों को यह तय करना होगा कि क्या वे सोशल मीडिया पर बैठकर देश में अराजकता फैलाने वाले ऐसे फ्लॉप नेताओं के भड़काऊ वीडियो के बहकावे में आएँगे या फिर धरातल पर मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी कर रही दिल्ली पुलिस के इस बेमिसाल संयम और सच का साथ देंगे।

जो कभी AIMIM-कॉन्ग्रेस का रहा था प्रचार, उसके पोस्टर अब CJP के प्रदर्शन में चमके: जानिए कौन है US से युवाओं को भड़काने और पुलिस को धमकाने वाला उस्मान अली?

जैसा कि 20 जून 2026 को दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर विवादित NEET मुद्दे पर नए विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बन गया, तो इसी बीच ऑपइंडिया ने अमेरिका में रहने वाले सोशल मीडिया ‘एक्टिविस्ट’ की प्रदर्शनों में छाप का पता लगाया। इसमें पता चला कि उसका असर सिर्फ डिजिटल दुनिया तक ही सीमित नहीं था बल्कि दिल्ली की सड़कों तक भी फैला हुआ था।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह प्रदर्शन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और सरकार के खिलाफ NEET से जुड़ी शिकायतों को लेकर युवाओं के मुद्दों पर केंद्रित कर एक आंदोलन की तरह पेश किया गया। लेकिन ग्राउंड रिपोर्टिंग में ऐसे सबूत मिले कि इस आंदोलन को ऐसे लोग हवा दे रहे थे जिनका इसमें कोई सीधा मतलब भी नहीं निकलता था औऱ हजारों मील दूर से युवाओं को उकसा रहे थे।

ऐसा ही एक व्यक्ति उस्मान फैजान अली का नाम सामने आया, जो अमेरिका में रहता है और खुद को सोशल मीडिया एक्टिविस्ट बताता है। वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए भारतीय युवाओं को भड़काने, उन्हें संगठित करने और अधिकारियों के साथ टकराव के लिए भावनात्मक रूप से प्रेरित करने का काम कर रहा था।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कई लोग ऐसे पोस्टर और प्लेकार्ड लिए हुए दिखाई दिए, जिन पर सोशल मीडिया कमेंटेटर ध्रुव राठी, एक्टिविस्ट अभिजीत दिपके और अभिनेत्री राखी सावंत की तस्वीरें लगी थीं। लेकिन इन पोस्टरों को ध्यान से देखने पर एक खास बात सामने आई। कई पोस्टरों पर एक दाढ़ी वाले व्यक्ति की तस्वीर भी प्रमुखता से छपी हुई थी, जिसकी पहचान ‘इंडियन उस्मान फैजान अली- फ्रॉम USA’ के रूप में की गई थी।

इस खुलासे के बाद कई सवाल खड़े हो गए। सबसे बड़ा सवाल यह था कि जिस प्रदर्शन को छात्रों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का आंदोलन बताया जा रहा था, उसमें विदेश में रहने वाले एक ‘एक्टिविस्ट’ की तस्वीर वाले पोस्टर आखिर क्यों दिखाई दे रहे थे? और उससे भी जरूरी बात यह है कि उन पोस्टरों को लेकर चल रहे लोगों में से कितने लोग वास्तव में जानते थे कि उस्मान फैजान अली कौन हैं?

जब ऑपइंडिया ने प्रदर्शन स्थल पर मौजूद कई प्रदर्शनकारियों से बात की, तो उनके जवाब चौंकाने वाले थे। कई लोगों ने माना कि उन्हें उस्मान फैजान अली के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। एक युवा प्रदर्शनकारी ने खुलकर बताया कि उसे यह पोस्टर आयोजकों की तरफ से दिया गया था और उसे यह भी नहीं पता था कि पोस्टर पर जिसकी तस्वीर लगी है, वह कौन है। अन्य प्रदर्शनकारियों से भी इसी तरह के जवाब मिले।

यह विरोधाभास एक व्यापक रणनीति की ओर इशारा करता है। अली किसी आंदोलन को स्वाभाविक रूप से खड़ा करने के बजाए उसे हाईजैक करने की कोशिश करते दिख रहे हैं, आक्रोश पैदा कर रहे हैं और जमीनी स्तर पर आसानी से प्रभावित होने वाले युवाओं को सुनियोजित प्रचार सामग्री वितरित करके जनता के गुस्से को निर्देशित कर रहे हैं।

उनकी सोशल मीडिया गतिविधियों पर नजर डालने से भी ऐसा ही पैटर्न दिखाई देता है। उस्मान अली मुख्य रूप से @bbm_india_ नाम के इंस्टाग्राम अकाउंट के जरिए सक्रिय हैं और पिछले कई हफ्तों से CJP के प्रदर्शनों से जुड़ी बेहद भावनात्मक और उग्र कंटेन्ट साझा कर रहे हैं। उस्मान के वीडियो सिर्फ प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने तक सीमित नहीं हैं। इनमें बार-बार यह माहौल बनाने की कोशिश की जाती है कि यह आंदोलन नाराज युवाओं और भारतीय सरकार के बीच एक बड़ी लड़ाई है।

उस्मान के कंटेंट में भावनात्मक भाषा, आक्रामक संदेश और युवाओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश बार-बार दिखाई देती है कि वे किसी ऐतिहासिक आंदोलन का हिस्सा हैं। इसका उद्देश्य साफ नजर आता है। किसी सार्वजनिक मुद्दे को लेकर लोगों की नाराजगी को बड़े पैमाने पर ऐसे आंदोलन में बदलना, जो गुस्से और टकराव से प्रेरित हो।

इसका एक प्रमुख उदाहरण 1 जून 2026 को देखने को मिला, जब उस्मान अली ने दिल्ली पुलिस को संबोधित करते हुए एक वीडियो पोस्ट किया। इस वीडियो में शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील करने के बजाय चेतावनी जैसा लहजा दिखाई दिया। उन्होंने दिल्ली पुलिस से कहा कि CJP कार्यकर्ताओं और अभिजीत दिपके के समर्थकों को जंतर-मंतर पर जुटने की अनुमति देने से पहले बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया जाए।

वीडियो में उन्होंने बार-बार लोगों की ऐसी ‘सुनामी’ आने की बात कही, जिसे रोकना या नियंत्रित करना अधिकारियों के लिए मुश्किल होगा। उस्मान अली के बयान में यह संदेश देने की कोशिश दिखाई दी कि भीड़ इतनी बड़ी होगी कि प्रशासन के किसी भी प्रयास को पीछे छोड़ सकती है।

यहाँ उस्मान की भाषा काफी ध्यान देने वाली थी। शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा देने के बजाय, उस्मान अली ऐसा माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है कि जिससे टकराव पैदा हो। CJP के समर्थकों तक यह संदेश पहुँचाने की कोशिश की गई कि वे एक ऐसी ताकत का हिस्सा हैं जो सरकार को चुनौती देने की क्षमता रखती है।

इस तरह की भावनात्मक और आक्रामक भाषा का इस्तेमाल अक्सर वे लोग करते हैं जो भीड़ को भावनात्मक रूप से भड़काना चाहते हैं और समर्थकों को धीरे-धीरे अधिक आक्रामक रवैया अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

स्थिति को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि ये संदेश विदेश में बैठे एक व्यक्ति की ओर से दिए जा रहे थे। एक तरफ भारतीय युवाओं को सड़कों पर उतरने, पुलिस कार्रवाई का सामना करने और कानूनी जोखिम उठाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ इन संदेशों को देने वाला व्यक्ति खुद विदेश में सुरक्षित माहौल में मौजूद था और किसी भी संभावित परिणाम से दूर था।

उस्मान अली का चिट्ठा सिर्फ इतना ही नहीं है। जब से CJP को सोशल मीडिया पर पहचान और समर्थन मिलने लगा, तब से वह ‘कॉकरोचेज’ को संगठित और सक्रिय करने के लिए लगातार ऐसे भड़काऊ पोस्ट साझा कर रहा है। बीते दिन भी उस्मान ने एक नया वीडियो पोस्ट किया, जिसमें जमीन पर चल रही घटनाओं को प्रभावित करने की कोशिश दिखाई दी। इस बार उन्होंने सार्वजनिक रूप से दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों से प्रदर्शन की अनुमति देने की अपील की। हालाँकि इस अपील के साथ एक अप्रत्यक्ष चेतावनी जैसा संदेश भी जुड़ा हुआ था।

वीडियो में बार-बार यह संकेत दिया गया कि अगर प्रदर्शनकारियों को रोका गया, तो इससे अशांति और अस्थिरता की स्थिति पैदा हो सकती है। इस तरह के संदेशों के जरिए उस्मान ने प्रशासन पर दबाव बनाने और समर्थकों के बीच तनावपूर्ण माहौल तैयार करने की कोशिश की।

यह अली का ऐसा तरीका है जिससे वह खुद को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराए जाने से बचा लेता है, लेकिन लोगों की भावनाओं को भड़काता भी रहता है। वह खुलकर हिंसा की बात नहीं करता, लेकिन बार-बार ऐसा माहौल बनाता है कि अगर प्रशासन कोई कार्रवाई करेगा तो टकराव होना तय है। इसका असर यह होता है कि लोगों में तनाव बढ़ता है, पुलिस और प्रशासन पर भरोसा कम होता है और उसके समर्थक हर सरकारी कार्रवाई को अपने ऊपर अत्याचार की तरह देखने लगते हैं। और यह सब वह अमेरिका में बैठकर कर रहा है, जबकि खुद को भारत में लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ने वाला बताता है।

अली की सोशल मीडिया गतिविधियों को देखने पर लगता है कि यह कोई एक-दो बार की बात नहीं है, बल्कि काफी समय से चला आ रहा उसका तरीका है। उसके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर ज्यादातर पोस्ट लोगों के गुस्से को बढ़ाने, विपक्षी विचारों को ज्यादा से ज्यादा फैलाने और राजनीतिक मतभेदों को संघर्ष और विरोध की नजर से दिखाने पर केंद्रित रहती हैं।

उसका यूट्यूब चैनल “Button Ballot Movement by Osman Faizan Ali” भी उसके राजनीतिक मकसदों की झलक देता है। हालाँकि आज यह चैनल ज्यादा सक्रिय नहीं है, लेकिन पुराने वीडियो और सामग्री से पता चलता है कि वह लंबे समय से विदेश में रहते हुए भी भारतीय राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है।

13 मई 2024 को अपलोड की गई एक ऑडियो रिकॉर्डिंग में उस्मान अली ने हैदराबाद और सिकंदराबाद के मतदाताओं से सीधे अपील की थी। इस रिकॉर्डिंग में उसने लोगों से कहा कि वे रणनीतिक तरीके से AIMIM और कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों को वोट दें, ताकि भाजपा को हराया जा सके। उसके संदेश का फोकस किसी खास नीति, योजना या विकास के मुद्दे पर नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को संगठित वोटिंग के जरिए हराने पर था।

यह ऑडियो रिकॉर्डिंग दिखाती है कि उस्मान अली का ‘एक्टिविज्म’ केवल छात्र मुद्दों या सामाजिक अभियानों तक सीमित नहीं हैं। इसके बजाय यह एक ऐसे पैटर्न की ओर इशारा करती है, जिसमें वह विदेश में रहते हुए भारत की राजनीतिक बहस और चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।

आज के समय में उस्मान का CJP के प्रति समर्थन किसी पुराने वैचारिक जुड़ाव या लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता का परिणाम नहीं लगता। बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि वह युवाओं के एक वर्ग के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे इस वायरल इंटरनेट ट्रेंड का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। समय और हालात के साथ उसकी राजनीतिक स्थिति और रुख भी बदलते रहे हैं।

जैसा कि 2024 में देखा गया था, उस्मान अली हैदराबाद और सिकंदराबाद के मतदाताओं से AIMIM और कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों का समर्थन करने की खुलकर अपील कर रहे थे, ताकि भाजपा को हराया जा सके। ऐसे में CJP के प्रति उनका मौजूदा समर्थन किसी ठोस वैचारिक प्रतिबद्धता से अधिक राजनीतिक अवसरवाद जैसा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि उसकी सक्रियता किसी तय विचारधारा या सिद्धांतों पर आधारित नहीं है। बल्कि वह उन आंदोलनों और मुद्दों के साथ जुड़ता दिखाई देता है, जिनसे उसे सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान और समर्थन मिलने की संभावना होती है। 2024 तक अली AIMIM और कॉन्ग्रेस के समर्थन में प्रचार कर रहा था और भाजपा को चुनावी तौर पर चुनौती देने की बात कर रहा था। वहीं आज वह CJP के नेतृत्व वाले आंदोलन का खुलकर समर्थन करता नजर आ रहा है।

जंतर-मंतर पर हुई घटनाओं से पता चलता है कि सोशल मीडिया ने राजनीतिक लामबंदी के तरीके को कैसे बदल दिया है। पहले विरोध प्रदर्शनों का संचालन मुख्य रूप से जमीन पर मौजूद लोग करते थे और वे अपने कामों के लिए जवाबदेह होते थे। लेकिन आज, हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे एक्टिविस्ट एक बटन दबाकर नैरेटिव बना सकते हैं, प्रोपेगैंडा तैयार कर सकते हैं, कैंपेन का मैटीरियल बाँट सकते हैं और बड़ी भीड़ के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।

इस मामले की सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है, उनमें से कई को पूरी जानकारी भी नहीं है। जंतर-मंतर पर उस्मान अली के पोस्टर लेकर चल रहे कई प्रदर्शनकारियों को यह तक नहीं पता था कि वह कौन हैं। इसके बावजूद वे अनजाने में उस्मान की छवि और संदेश को आगे बढ़ाने का काम कर रहे थे।

इसी वजह से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। कितने युवा ऐसे कंटेंट को देख रहे हैं, बिना यह समझे कि उसके पीछे की मंशा क्या है? कितनों को संस्थाओं के साथ टकराव को एक सकारात्मक या वांछनीय परिणाम के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है? और कितने लोग यह समझते हैं कि उन्हें जोखिम उठाने के लिए प्रोत्साहित करने वाले लोग अक्सर खुद उन परिणामों का सामना नहीं करते?

जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन एक नए तरह की राजनीति की तस्वीर दिखाता है, जहाँ विदेश में बैठे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्थानीय मुद्दों और लोगों की नाराजगी का इस्तेमाल अपने बड़े राजनीतिक मकसदों के लिए करने की कोशिश करते हैं। लगातार भड़काऊ कंटेंट दिखाकर, सरकारी संस्थाओं को दुश्मन की तरह पेश करके और प्रदर्शनों को सरकार के साथ सीधी लड़ाई बताकर, उस्मान फैजान अली जैसे लोग लोगों की नाराजगी को संगठित विरोध में बदलने की कोशिश करते हैं।

जबकि धरने-प्रदर्शन में शामिल लोगों को गिरफ्तारी, कानूनी कार्रवाई या हालात बिगड़ने पर हिंसा जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, वहीं विदेश में बैठकर लोगों को उकसाने वाले लोग इन खतरों से दूर रहते हैं। ऐसे में जोखिम युवाओं को उठाना पड़ता है, जबकि पहचान और राजनीतिक फायदा सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों को मिलता है।

इसलिए जंतर-मंतर प्रदर्शन में उस्मान फैजान अली की तस्वीर का प्रमुखता से दिखना सिर्फ एक सामान्य बात नहीं है। यह दिखाता है कि विदेश में बैठा एक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट किस तरह भारत के एक आंदोलन से खुद को जोड़ने, युवाओं में गुस्सा बढ़ाने और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए उन्हें टकराव की ओर धकेलने की कोशिश कर रहा है।

यह घटना याद दिलाती है कि सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक हलचल सिर्फ सड़कों पर मौजूद लोगों से नहीं बनती। अब ऐसे लोग भी उस पर असर डाल रहे हैं, जो हजारों किलोमीटर दूर बैठे हैं, लेकिन इंटरनेट के जरिए लोगों को प्रभावित करने, संगठित करने और आंदोलनों को दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं।

(मूलरूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

हर पीढ़ी अपने पिता के खिलाफ विद्रोह करती है: तुर्गनेव का उपन्यास और भारतीय परिवारों का बदलता चेहरा

कुछ किताबें अपने समय की कहानी कहती हैं। कुछ किताबें अपने समाज का दस्तावेज़ बन जाती हैं। और कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो समय और भूगोल दोनों को पार कर जाती हैं। वे मनुष्य के स्वभाव को समझने की चाबी बन जाती हैं।

इवान तुर्गनेव का 1862 में प्रकाशित उपन्यास Fathers and Sons ऐसी ही एक कृति है। पहली नज़र में यह रूस के एक विशेष ऐतिहासिक दौर की कहानी लगती है। एक ऐसा रूस जो सामंतवाद से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा था। जहाँ पुरानी अभिजात संस्कृति और नई वैज्ञानिक चेतना के बीच टकराव शुरू हो चुका था। लेकिन यदि आप इस उपन्यास को केवल रूस की कहानी समझते हैं तो आप इसकी सबसे बड़ी शक्ति को नहीं समझते।

क्योंकि यह पुस्तक वास्तव में किसी देश की ना होकर हर परिवार की कहानी है। यह पिता और पुत्र की कहानी है। यह परंपरा और आधुनिकता की कहानी है। यह उस क्षण की कहानी है जब एक पीढ़ी दुनिया को बदलना चाहती है और दूसरी पीढ़ी उसे बचाकर रखना चाहती है। और इसी कारण, फादर्स डे पर शायद Fathers and Sons से अधिक प्रासंगिक कोई उपन्यास नहीं हो सकता।

बाज़ारोव: वह युवक जो हर मूर्ति तोड़ देना चाहता था

उपन्यास का केंद्रीय पात्र येवगेनी बाज़ारोव है। रूसी साहित्य के इतिहास में शायद ही कोई पात्र इतना प्रभावशाली रहा हो। बाज़ारोव स्वयं को निहिलिस्ट कहता है। आज यह शब्द बहुत लोगों को केवल दार्शनिक अवधारणा जैसा लग सकता है, लेकिन तुर्गनेव के समय में इसका अर्थ था, हर उस चीज़ को नकार देना जिसे समाज पवित्र मानता है।

परंपरा? नकार दो।
कला? बेकार।
कविता? समय की बर्बादी।
धर्म? अंधविश्वास।
रोमांस? रासायनिक प्रतिक्रिया।

बाज़ारोव का सबसे प्रसिद्ध कथन है –  “एक अच्छा केमिस्ट बीस कवियों से अधिक उपयोगी है।”

यह पूरी एक पीढ़ी का घोषणापत्र था। आज के भारत में भी हमें ऐसे बाज़ारोव हर जगह दिखाई देते हैं। वे सोशल मीडिया पर हैं। विश्वविद्यालयों में हैं। स्टार्टअप्स में हैं। वे हर स्थापित सत्य से प्रश्न पूछते हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई परंपरा तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती तो उसे बचाए रखने का कोई कारण नहीं।

वे वंश, जाति, कुल, परंपरा, सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक रूढ़ियों को चुनौती देते हैं। और ठीक वैसे ही जैसे उपन्यास में होता है, पुरानी पीढ़ी उन्हें अक्सर अहंकारी, विद्रोही या संस्कारहीन मानती है। लेकिन तुर्गनेव की महानता यह है कि वे बाज़ारोव का उपहास नहीं उड़ाते। वे उसके भीतर की ईमानदारी को पहचानते हैं। बाज़ारोव झूठ नहीं बोलता।

वह जो मानता है, उसी पर जीता है। समस्या उसके विचारों में नहीं, उसके पूर्ण आत्मविश्वास में है। उसे लगता है कि मनुष्य को पूरी तरह तर्क से समझा जा सकता है। और यहीं से उसकी त्रासदी शुरू होती है।

निकोलई: वह पिता जिसे इतिहास अक्सर भूल जाता है

उपन्यास के सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में से एक हैं निकोलई किर्सानोव। वे कोई महान दार्शनिक नहीं हैं। कोई योद्धा नहीं हैं। कोई क्रांतिकारी नहीं हैं। वे केवल एक पिता हैं। और शायद इसी कारण इतने महत्वपूर्ण हैं। निकोलई उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बदलती दुनिया को देखकर घबराती भी है और उसे स्वीकार भी करना चाहती है। वे अपने बेटे अर्कादी से प्रेम करते हैं। इतना प्रेम कि जब बेटा विश्वविद्यालय से लौटता है तो उनकी खुशी छिपाए नहीं छिपती। लेकिन उसी क्षण उन्हें यह भी महसूस होता है कि उनका बेटा अब पहले वाला नहीं रहा।

उसकी भाषा बदल गई है। उसके विचार बदल गए हैं। उसके आदर्श बदल गए हैं। आज का भारत ऐसे निकोलई से भरा पड़ा है। वे पिता जो अपने बच्चों को विदेश भेजते हैं। उनके लिए लैपटॉप खरीदते हैं। उन्हें अपनी पसंद का करियर चुनने देते हैं। लेकिन भीतर कहीं यह भय भी रहता है कि कहीं आधुनिकता की दौड़ में उनका बच्चा उनसे दूर न हो जाए।

निकोलई किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वे उस मौन प्रेम का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पिता अक्सर व्यक्त नहीं कर पाते।

पावेल: परंपरा की आखिरी तलवार

यदि निकोलई उदार परंपरा हैं, तो पावेल किर्सानोव उसकी कठोरता हैं। वे सम्मान, मर्यादा, प्रतिष्ठा और शिष्टाचार की दुनिया से आते हैं। उनके लिए जीवन केवल उपयोगिता का प्रश्न नहीं है। उनके लिए कुछ मूल्य ऐसे हैं जिनकी रक्षा किसी भी कीमत पर होनी चाहिए।

जब बाज़ारोव इन मूल्यों का मज़ाक उड़ाता है तो पावेल इसे केवल वैचारिक असहमति नहीं मानते। उन्हें लगता है कि यह पूरी सभ्यता पर हमला है। यहीं से दोनों के बीच तनाव बढ़ता है। और अंततः यह तनाव उस प्रसिद्ध द्वंद्व युद्ध तक पहुँचता है।

वह द्वंद्व जो वास्तव में दो व्यक्तियों का नहीं था

Fathers and Sons का सबसे प्रतीकात्मक अध्याय है पावेल और बाज़ारोव का द्वंद्व। सतह पर यह दो व्यक्तियों की लड़ाई है। लेकिन वास्तव में यह दो युगों की लड़ाई है। एक तरफ वह दुनिया है जो सम्मान, संस्कृति और परंपरा में विश्वास करती है। दूसरी तरफ वह पीढ़ी है जो विज्ञान, प्रयोग और उपयोगिता को सर्वोच्च मानती है।

द्वंद्व में कोई महान विजय नहीं होती। कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकलता।

और शायद यही तुर्गनेव का संदेश था। इतिहास में भी ऐसा ही होता है। पुरानी पीढ़ी नई को पूरी तरह हरा नहीं सकती। नई पीढ़ी पुरानी को पूरी तरह मिटा नहीं सकती। अंततः दोनों को साथ रहना पड़ता है। आज भारत में भी यही संघर्ष दिखाई देता है।

एक ओर वे लोग हैं जो मानते हैं कि हमारी सभ्यता की जड़ें ही हमारी शक्ति हैं। दूसरी ओर वे लोग हैं जो मानते हैं कि भविष्य केवल नवाचार और वैज्ञानिक सोच से बनेगा। लेकिन वास्तविक भारत इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है।

ओडिंत्सोवा: जहाँ तर्क पहली बार हारता है

उपन्यास का सबसे सुंदर और सबसे मानवीय हिस्सा है बाज़ारोव और अन्ना ओडिंत्सोवा का संबंध। यहाँ पहली बार बाज़ारोव अपने ही सिद्धांतों से टकराता है। जिस व्यक्ति ने प्रेम को केवल जैविक प्रक्रिया कहा था, वही प्रेम में पड़ जाता है। जिस व्यक्ति ने भावनाओं को कमजोरी कहा था, वही भावनाओं के सामने असहाय हो जाता है।

ओडिंत्सोवा उसे अस्वीकार कर देती है। लेकिन असली चोट अस्वीकृति नहीं है। असली चोट यह है कि बाज़ारोव को पहली बार महसूस होता है कि वह उतना तार्किक नहीं है जितना वह समझता था।

यह साहित्य का एक कालजयी क्षण है। क्योंकि यह केवल बाज़ारोव की कहानी नहीं है। यह हम सबकी कहानी है। हम अपने बारे में अनेक सिद्धांत बनाते हैं। हमें लगता है कि हम पूरी तरह व्यावहारिक हैं। फिर जीवन में कोई व्यक्ति आता है और हमें पता चलता है कि हम उतने मजबूत नहीं हैं जितना हमने सोचा था।

बाज़ारोव की मृत्यु: उपन्यास का सबसे बड़ा पाठ

महान साहित्य अक्सर अपने अंतिम अध्यायों में अपनी सबसे बड़ी बात कहता है। बाज़ारोव किसी क्रांति में नहीं मरता। वह किसी युद्ध का नायक नहीं बनता। वह इतिहास बदलते हुए नहीं मरता। वह एक साधारण संक्रमण का शिकार होकर मर जाता है।

यह दृश्य पढ़ते समय पाठक को झटका लगता है। इतना विशाल व्यक्तित्व। इतने बड़े विचार। इतनी तीखी बुद्धि। और अंत? इतना साधारण? लेकिन तुर्गनेव यहीं अपना सबसे गहरा संदेश देते हैं।

मनुष्य विचारधाराओं से बड़ा नहीं होता। मृत्यु के सामने निहिलिज्म भी छोटा पड़ जाता है। अंतिम क्षणों में बाज़ारोव किसी दर्शन की बात नहीं करता। वह अपने माता-पिता को याद करता है। वह प्रेम को याद करता है। वह मनुष्य बन जाता है। यहीं उसका अहंकार टूटता है। और यहीं उसकी मानवता जन्म लेती है। 

भारत के ड्राइंग रूम में आज भी जीवित है यह उपन्यास

यदि आप ध्यान से देखें तो Fathers and Sons आज के भारत में हर दिन घट रहा है। जब बेटा कहता है कि परंपरा को तर्क से परखा जाना चाहिए। जब पिता कहते हैं कि हर चीज़ किताबों से नहीं सीखी जा सकती। जब परिवार के भोजन की मेज़ पर राजनीति बहस बन जाती है। जब नई पीढ़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करती है। जब पुरानी पीढ़ी सामाजिक जिम्मेदारी की। तब कहीं न कहीं तुर्गनेव का उपन्यास जीवित हो उठता है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि यह आधुनिकता का समर्थन करता है। और न ही यह कि यह परंपरा की रक्षा करता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह संवाद का पक्ष लेता है। तुर्गनेव किसी को खलनायक नहीं बनाते। वे हमें बताते हैं कि हर पीढ़ी अधूरी है। युवाओं के पास ऊर्जा होती है, लेकिन अनुभव नहीं। बुजुर्गों के पास अनुभव होता है, लेकिन कभी-कभी परिवर्तन का साहस नहीं। समाज तब आगे बढ़ता है जब दोनों एक-दूसरे को सुनते हैं।

हर बाज़ारोव को एक निकोलई की आवश्यकता होती है

फादर्स डे पर Fathers and Sons पढ़ना केवल एक साहित्यिक अनुभव नहीं है। यह अपने परिवार को समझने का प्रयास है। यह अपने पिता को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर है। यह समझने का अवसर है कि जिन लोगों से हम कभी-कभी असहमत होते हैं, उन्हीं लोगों ने हमें दुनिया को चुनौती देने का साहस भी दिया है। तुर्गनेव अंततः हमें यही सिखाते हैं कि सभ्यताएँ केवल विचारों से नहीं बनतीं। वे संबंधों से बनती हैं।

तर्क आवश्यक है। लेकिन तर्क अकेला पर्याप्त नहीं। मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए प्रेम चाहिए। करुणा चाहिए। स्मृतियाँ चाहिए। और शायद एक पिता चाहिए, जो भले ही आपकी हर बात से सहमत न हो, लेकिन फिर भी आपके लौटने का इंतज़ार करता रहे।

क्योंकि हर घर में एक बाज़ारोव होता है। और हर बाज़ारोव की कहानी के पीछे कहीं न कहीं एक निकोलई खड़ा होता है। शांत, धैर्यवान, लगभग अदृश्य।

लेकिन पूरी कहानी को थामे हुए।

गोलशून्य कुराकाओ का ऐतिहासिक उदय: सैंतीस वर्षीय एलोय रूम बने ‘संकटमोचक’

फीफा विश्व कप का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है। हर दिन कुछ नया कारनामा हो रहा है। यह विश्व कप हमें नित कई शानदार मैच और कई खूबसूरत कहानियां दे रहा है। संपूर्ण विश्व से फुटबॉल के दीवाने तीनों मेजबान देशों (अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको) तक पहुँचे हैं। लग ही नहीं रहा कि यह दुनिया एक माह पूर्व निराशा से घिरी हुई थी। तीनों मेजबान देशों में तमाम जग से लोग पहुंचे हैं और साथ-साथ इस महाउत्सव का आनंद ले रहे हैं।

कल कई बेहतरीन मैच खेले गए। बीते दिनों में कनाडा और मेक्सिको शानदार जीत दर्ज कर अगले दौर में अपनी जगह सुनिश्चित कर ही चुके थे। अब बारी अमेरिकी टीम की थी। उनका सामना तुर्की के विरुद्ध एक बड़ा उलटफेर कर चुकी ऑस्ट्रेलिया से था।

सिएटल के स्टेडियम में मैच शुरू होता है। दोनों ही टीमें यह मैच जीत अगले दौर में जगह बनाना चाहती थीं। स्टेडियम में हजारों की संख्या में घरेलू समर्थकों की भीड़ अपनी टीम की हौसला-अफजाई के लिए तैयार थी और अमेरिकी टीम ने अपने घरेलू समर्थकों को बिल्कुल भी निराश नहीं किया। तिरेसठ प्रतिशत समय गेंद अपने नियंत्रण में रखते हुए अमेरिकी टीम ने 2-0 से यह मैच जीत, बाकी दोनों मेजबान देशों की ही भांति अगले दौर में जगह बना ली।

आगे, बोस्टन में स्कॉटलैंड का सामना मोरक्को की टीम से था, जहां एक दफा फिर इस्माइल सैबारी ने अपनी टीम के लिए एक बेहतरीन गोल दागकर न सिर्फ जरूरी जीत दिलाई, बल्कि ब्राजील के साथ अपने ग्रुप में अंकों के आधार पर बराबरी पर खड़ा कर दिया।

अगला मैच फिलाडेल्फिया में था, जहां ब्राजील की टीम हैती के विरुद्ध मैदान में उतरने जा रही थी। यह मैच बेहद शानदार रहा। ब्राजील 4-4-2 की फॉर्मेशन के साथ मैदान में उतरी। एक बेहद ही आक्रामक फुटबॉल खेलते हुए पहले हाफ में ही ब्राजील ने तीन गोल दाग दिए थे। माथियूस कुन्हा ने दो शानदार गोल किए व एक गोल विनीसियस जूनियर ने लगाया। हालाँकि, पहले हाफ में ब्राजील को एक झटका तब लगा, जब उनके स्टार खिलाड़ी राफिन्हा को चोटिल हो जाने के कारण बीच मैच में ही मैदान से बाहर जाना पड़ा। बाद में मेडिकल टेस्ट होने पर मालूम हुआ कि उन्हें हैमस्ट्रिंग इंजरी हो गई है।

मैच का दूसरा हाफ कमोबेश थोड़ा शांत ही रहा। ब्राजील ने और गोल करने के प्रयास तो किए, मगर उन्हें सफलता नहीं मिली। फॉरवर्ड लाइन में माथियूस कुन्हा व विनीसियस जूनियर ने बेहद शानदार फुटबॉल खेलकर तमाम दर्शकों का दिल जीत लिया। दोनों के गोलों की बदौलत ब्राजील यह मैच 3-0 से जीतने में सफल रहा।

इसके पश्चात, सैन फ्रांसिस्को में इस टूर्नामेंट की डार्क हॉर्स कही जा रही तुर्की की टीम का मुकाबला पराग्वे से था। ग्रुप डी का यह मुकाबला दोनों ही टीमों के लिए ‘करो या मरो’ वाला था। खैर, मैच शुरू होता है। कोई कुछ समझ पाता, इससे पहले ही चौबीस वर्षीय मातिआस गलार्ज़ा ने एक गोल दागकर पराग्वे को मुकाबले में अहम बढ़त दिला दी। यह इस विश्व कप में किसी भी टीम द्वारा लगाया गया अब तक का सबसे तेज गोल था। तुर्की के खिलाड़ियों की हालत ऐसी थी कि काटो तो खून नहीं; एकाएक यह क्या हुआ था, वे समझ ही न पाए।

तुर्की के लिए यह मैच जीतना बेहद जरूरी था। सभी खिलाड़ी एकजुट होकर धैर्य के साथ अटैक करना शुरू कर देते हैं। चालहानोलू, अर्दा गुलर और केनान यिल्दिज़ लगातार विरोधी गोलपोस्ट पर घातक हमले करने लगे, परंतु सफलता मिल नहीं पा रही थी। तभी पहले हाफ के बिल्कुल अंतिम क्षणों में पराग्वे के सबसे अनुभवी खिलाड़ी मिग्वेल अलमिरोन को रेफरी द्वारा रेड कार्ड दिखा दिया जाता है। रेड कार्ड अर्थात मिग्वेल अलमिरोन को अब मैदान से बाहर जाना था। तुर्की के खिलाड़ियों व समर्थकों में एकाएक खुशी की लहर दौड़ जाती है। अब मैच में वापसी के द्वार खुलते नजर आ रहे थे।

दूसरा हाफ शुरू होता है। तुर्की लगातार विरोधी गोलपोस्ट पर हमले करता है; एक के बाद एक अटैक। मात्र दस खिलाड़ियों के साथ खेलने को मजबूर पराग्वे की टीम जैसे-तैसे अपने किले की रक्षा कर रही थी। आज शायद पराग्वे के लड़ाके गोल न खाने का कोई दृढ़ संकल्प करके आए थे। तुर्की के तमाम भगीरथ प्रयासों को उन्होंने नाकाम कर दिया।

मैच 1-0 से समाप्त हो जाता है और पराग्वे यह मैच जीत जाता है। चौबीस वर्षों बाद फीफा विश्व कप में वापसी करने वाली तुर्की ने इस मैच में अठत्तर प्रतिशत समय गेंद अपने कब्जे में रखते हुए पराग्वे के गोलपोस्ट पर तैंतीस दफे हमले किए। एक पूरा हाफ दस खिलाड़ियों के साथ खेल रही पराग्वे ने इन सभी तैंतीस हमलों को आज जाने कैसे गोल में तब्दील नहीं होने दिया। नतीजा यह हुआ कि अच्छा फुटबॉल खेलकर भी आज तुर्की हार गई। जोहान क्रुएफ ने सच ही तो कहा था, “जीतने के लिए, आपको अपने प्रतिद्वंद्वी से एक गोल अधिक करना होता है।” तुर्की आज यही नहीं कर पाई और इस हार के चलते वह विश्व कप से बाहर हो गई।

तुर्की ने अब तक ग्रुप स्टेज के अपने दोनों मैचों में मिलाकर विरोधी गोलपोस्ट पर कुल बासठ शॉट्स लगाए, परंतु वे टूर्नामेंट में फिलहाल एक भी गोल करने में नाकामयाब रहे हैं। यह सबसे बड़ा कारण रहा कि इतने सारे युवा सितारों से लैस तुर्की की टीम अच्छा फुटबॉल खेलने के बावजूद अपने दोनों मैच हारकर घर वापस जाएगी।

खैर आगे, ह्यूस्टन स्टेडियम में नीदरलैंड्स को स्वीडन के खिलाफ ग्रुप एफ के मैच में उतरना था। मैच शुरू होता है। लगभग उनहत्तर हजार दर्शक स्टेडियम में मौजूद थे, जिसमें स्टेडियम के तीन छोरों पर नीदरलैंड्स के समर्थक पारंपरिक नारंगी रंग पहने अपनी टीम का हौसला बढ़ाने के लिए तैयार थे।

मैच शुरू होते ही दोनों टीमें लगातार अटैक करती हैं। प्रयास यह रहता है कि मैच जीतकर ग्रुप में अपनी स्थिति मजबूत की जाए। ‘ओरांजे’ के सेंट्रल फॉरवर्ड ब्रायन ब्रॉबी मैच के पाँचवें व सत्रहवें मिनट में दो गोल दागकर अपनी टीम को 2-0 से आगे कर देते हैं। लेकिन ग्योकेरेस, एलेक्जेंडर इसाक और अयारी जैसे घातक अटैकिंग माइंडसेट वाले खिलाड़ियों की मौजूदगी के चलते स्वीडन कभी भी हताश नजर नहीं आया। वे लगातार नीदरलैंड्स के गोलपोस्ट पर हमले कर रहे थे, बस गोल स्कोर नहीं कर पा रहे थे।

दूसरा हाफ शुरू होता है, लेकिन अबकी दफा कोडी गाक्पो सैंतालीसवें व चौवनवें मिनट में नीदरलैंड्स के लिए लगातार दो गोल कर टीम को चार गोल की बढ़त दिला देते हैं। स्कोर 4-0 हो जाता है। स्वीडन फिर भी हथियार नहीं डालती, वह अब भी लड़ती है। मैच के उनसठवें मिनट में एंथोनी इलांगा स्वीडन के लिए एक गोल कर देते हैं। स्कोरबोर्ड पर अब स्कोर 4-1 हो जाता है। लेकिन मैच के अंतिम क्षणों में एक बार फिर, पिछले मैच के गोलस्कोरर समरविले एक गोल लगाकर 5-1 के स्कोर के साथ इस मैच में नीदरलैंड्स की जीत सुनिश्चित कर देते हैं। जिसने यह मैच देखा नहीं, उसे स्कोरकार्ड बताएगा कि मैच एकतरफा रहा, परन्तु ऐसा था नहीं। स्वीडन की टीम बहुत बहादुरी से अंत तक लड़ती रही। उन्होंने कई घातक काउंटर-अटैक भी किए, लेकिन आज नीदरलैंड्स के गोलकीपर वेरब्रूगन ने कई अहम बचाव किए। नीदरलैंड्स वह टीम हो गई है जिसने विश्व कप के इतिहास में सौ से अधिक गोल दागे हैं, परन्तु अब तक विश्व कप की ट्रॉफी अपने हाथों में लेने से वंचित रह गई है।

आगे, धुआंधार अंदाज में टूर्नामेंट में अपने अभियान का आगाज करने वाली जर्मनी के समक्ष टोरंटो में आइवरी कोस्ट की टीम थी। ग्रुप ई के इस मुकाबले में सभी को चौंकाते हुए आइवरी कोस्ट, फ्रैंक केसी के गोल की बदौलत मैच के तीसवें मिनट में जर्मनी पर अहम बढ़त बना लेती है। जर्मनी वापसी के प्रयास करती रहती है, परन्तु हर दफा आइवरी कोस्ट का मिडफील्ड व रक्षापंक्ति मिलकर उनके हमलों को नेस्तनाबूद कर देती है। उनके अनुभवी गोलकीपर भी लगातार कई शानदार सेव कर रहे थे। पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर 1-0 ही रहता है।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। लगभग बीस मिनट का खेल हो जाने पर भी आइवरी कोस्ट जर्मनी की टीम पर बढ़त बनाए हुए थी। मैच के साठ मिनट बीत जाने पर कोच नागेल्समान ट्रिपल सब्स्टीट्यूशन करते हैं और पिछले मैच के स्कोरर उंदाव के साथ अमीरी व लेवेलिंग को मैदान पर उतारते हैं। एक बार फिर उंदाव को मैदान में उतारने का फैसला तुरुप का इक्का साबित होता है। मैच के अड़सठवें मिनट में स्थानापन्न खिलाड़ी अमीरी गोल करने हेतु उंदाव की तरफ गेंद बढ़ाते हैं; उंदाव कोई गलती नहीं करते और शानदार गोल दाग जर्मन खेमे को राहत की सांस लेने का मौका दे देते हैं। स्कोर हो जाता है 1-1।

आइवरी कोस्ट लगातार काउंटर अटैक करके गोल करने की कोशिशें जारी रखती है। लेकिन, एक दफा फिर उंदाव मैच के 90+3 मिनट में गोल दाग देते हैं। आइवरी कोस्ट के तमाम समर्थकों के दिलों को तोड़ते हुए जर्मनी 2-1 से यह मैच जीतकर, पिछले दो संस्करणों की विफलताओं को पीछे छोड़, अगले दौर में अपनी जगह पक्की कर लेती है। उंदाव दो मैचों में तीन गोल दाग चुके हैं व दो गोल असिस्ट भी कर चुके हैं। निश्चित तौर पर वे अब तक जर्मनी के सबसे असरदार हथियार साबित हुए हैं। उनका यह प्रदर्शन निश्चित ही अब कोच नागेल्समान को उन्हें प्लेइंग इलेवन में जगह देने को मजबूर कर देगा।

फिर, ग्रुप ई के अन्य मुकाबले में कंसास सिटी स्टेडियम में इक्वाडोर के सम्मुख जनसंख्या के आधार पर विश्व कप में क्वालीफाई करने वाला सबसे छोटा राष्ट्र कुराकाओ था। यह मैच 0-0 के स्कोर के साथ ड्रॉ रहा, परन्तु इस मैच ने खेलप्रेमियों को आज एक नया नायक दे दिया। कुराकाओ के सैंतीस वर्षीय गोलकीपर, जिनका नाम आज से पहले यह खबर पढ़ रहे शायद ही किसी व्यक्ति ने सुना होगा, आज मैच के हीरो रहे। इक्वाडोर ने विपक्षी गोलपोस्ट पर छब्बीस शॉट्स लगाए, जिसमें से पंद्रह निशाने पर रहे। लेकिन कुराकाओ के गोलकीपर एलोय रूम ने उन सभी पंद्रह शॉट्स को गोलपोस्ट के भीतर जाने से रोक दिया। यह वाकई ऐतिहासिक था।

कुराकाओ जैसा छोटा राष्ट्र, जो पहली दफा विश्व कप का हिस्सा बना है, अपने नायक एलोय रूम के इस शानदार प्रदर्शन की बदौलत विश्व कप के इतिहास में आज अपना पहला अंक अर्जित करने में सफल हो गया।

आगे, मेक्सिको में खेले गए ग्रुप एफ के एक अन्य मुकाबले में जापान ने ट्यूनीशिया को 4-0 से रौंद दिया। पिछले मैच में जापान के लिए गोल करने वाले दाईची कमाडा ने ही आज भी जापान के लिए खूबसूरत गोल दागकर खाता खोला। इस बड़ी जीत के साथ ‘समुराई ब्लूज’ ने अपने ग्रुप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है।

अब, आज रात भारतीय समयानुसार रात साढ़े नौ बजे अटलांटा स्टेडियम में 2010 विश्व कप के विजेता स्पेन का मुकाबला पिछले संस्करण की विजेता (अर्जेंटीना) को हराकर संपूर्ण विश्व को चौंका देने वाली सऊदी अरब की टीम से होगा। ख़बरें हैं कि लामीन यमाल प्लेइंग इलेवन में वापसी कर सकते हैं।

आगे, रात साढ़े बारह बजे ईरान के ‘पर्शियन चीताज’ का सामना बेल्जियम की सशक्त टीम से होगा। वहीं, रात साढ़े तीन बजे उरुग्वे मियामी के स्टेडियम में काबो-वर्दे से भिड़ती नजर आएगी।

माहौल गर्माता जा रहा है। उन्माद अपने चरम पर है। बने रहिए साथ, इस खूबसूरत खेल की जादुई कहानियों का दौर जारी रहेगा।

क्रांतिकारी या मसीहा या पागल? कौन था भरत तिवारी जिसके एनकाउंटर पर बिहार में हो रहा बवाल, जानिए CM सम्राट चौधरी को क्यों देना पड़ा न्यायिक जाँच का आदेश

बिहार के भोजपुर (आरा) में पुलिस एनकाउंटर में मारे गए भरत भूषण तिवारी को लेकर बिहार पुलिस पर सवाल उठ रहे हैं। अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस मामले की न्यायिक जाँच के आदेश दिए हैं। भरत तिवारी को लेकर सोशल मीडिया भी दो गुटों में बँटा नजर आ रहा है। कुछ लोग उसके समर्थन में हैं तो कई उसे पुलिस पर गोली चलाने वाला अपराधी बता रहे हैं। इस लेख में समझेंगे कि इस मामले में अब तक क्या हुआ और भरत तिवारी (Bharat Tiwari) का सोशल मीडिया खँगालने पर हमें क्या पता चला है?

अब तक क्या-क्या हुआ?

इस मामले की शुरुआत 15 जून को हुई। 15 जून 2026 को और उससे पहले भी फेसबुक पोस्ट में उसने देश में क्रांतिकारी युद्ध छेड़ने और जगदीशपुर के SDM का एनकाउंटर करने की बात कही थी। इसके बाद पुलिस 15 जून को दो बार उसके घर पहुँची, एक बार वह नहीं मिला और उस दिन वह थाने नहीं पहुँचा।

इसके बाद पुलिस ने बताया कि 16 जून को भोजपुर के शाहपुर थाने को सूचना मिली थी कि एक शख्स हथियार लेकर घूम रहा है। वह शख्स बिलौटी गाँव का रहने वाला भरत भूषण तिवारी ही था। भरत की अवैध हथियार लिए कई तस्वीरें सामने आई हैं। उसी दिन पुलिस पूछताछ के लिए भरत तिवारी के घर पहुँची। पुलिस जब पूछताछ कर रही थी तो उस दौरान भी भरत हाथ में बंदूक लिए हुए था। उसके अपने फेसबुक पेज पर एक लाइव किया जिसमें वह पुलिस के सामने हथियार लिए दिख रहा है।

भरत के इस फेसबुक पोस्ट पर लिखा गया, “आज हुआ कुछ ये की बिहार सरकार और बिहार के सिस्टम के द्वारा खास करके वही सा** जगदीशपुर का वो जो बोकवा SDM है जिसका एनकाउंटर होने वाला है उसके द्वारा मेरे साथ कुछ हरकत की गई।”

पोस्ट में आगे लिखा गया, “गनीमत है की शाहपुर के अभी कुछ दिनों पहले आए नए थाना प्रभारी ने मैटर सँभाल लिया नहीं तो कहीं आज साला प्रशासन में से ही कुछ रंगबाज छपरियों का एनकाउंटर हो जाता या तो मेरा ही हो जाता और इसी के साथ इस देश में एक नई क्रांतिकारी युद्ध को जन्म दे दिया जाता।”

इस वीडियो के साथ भरत ने लिखा, “आप सभी ये देखिये की कैसे बिहार का CM और बिहार सरकार के प्रशासन का कुछ गदहवा सब सा** SDM वा के इशारे पर कैसे मेरा एनकाउंटर करना चाहता है और सुनने में आ रहा है की अब बाहर से टीम आएगी और वो भी पूरी तैयारी के साथ मेरा एनकाउंटर करने के लिए तो सा** अब कई भेड़िए मिलकर एक शेर का शिकार करेगा रे तो सा** आ जाओ तुमलोगो के साथ अब शिकार शिकार ही खेला जाएगा।”

भरत ने लोगों से अपील करते हुए आगे लिखा, “आप सभी ये देख लिजिए की ऐसा युद्ध करने में अपना बहुत कुछ कैसे खो देना पड़ता है और अभी तो ये सिर्फ शुरुवात है अभी आगे समाज और देश के लिए अपना बहुत कुछ त्याग देना पड़ेगा क्यूँकि किसी भी देश में ऐसे ही कोई क्रांति नहीं आती।”

यह खबर जब सोशल मीडिया पर फैली तो उसने अपने फेसबुक पेज पर भी इससे जुड़े की लिंक्स शेयर किए। वहीं, भोजपुर पुलिस ने भी देर रात X पर एक पोस्ट कर इस घटना की जानकारी दी। पुलिस ने बताया कि भरत मानसिक रूप से अस्वस्थ (विक्षिप्त) है।

भोजपुर पुलिस ने कहा, “शाहपुर थाना को सूचना मिली थी कि एक व्यक्ति हथियार लेकर घूम रहा है ।इस सूचना के सत्यापन हेतु जब शाहपुर थाना की पुलिस टीम संबंधित व्यक्ति के घर पहुँची , तब यह तथ्य सामने आया कि वह व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वथ है। उसे तत्काल उचित इलाज और देखरेख के लिए मेंटल हॉस्पिटल भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।”

पुलिस ने बताया कि भरत के पास मौजूद हथियार को बरामद करने और उसे नियंत्रण में लेने के लिए पुलिस टीम द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं जिससे किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके।

इसके बाद आई 17 जून की तारीख। 17 जून को सुबह-सुबह भरत तिवारी ने फेसबुक पर लाइव आकर कहा कि पुलिस उसे पागल साबित करके उसे ले जाना चाहती है। इस वीडियो में वह अपनी तुलना भगत सिंह के भी करता नजर आया। वीडियो में कह रहा है, “इन लोगों को अपना पागलपन दिखाते हैं और इन लोगों को दौड़ा-दौड़कर मारते हैं।” इसके बाद वीडियो में वह घर के बाहर मौजूद पुलिसकर्मियों पर गोली चलाता भी नजर आया।

पुलिसकर्मियों पर गोली चलाता भरत तिवारी

वीडियो में वह लगातार पुलिसकर्मियों को मारने की धमकी देता रहा। साथ ही, उसने इस पोस्ट में लिखा, “देश के इस क्रांतिकारी युद्ध में बिहार पुलिस पे गोलियाँ बरसाईं गई और उसके बाद इन सभी का मैं एनकाउंटर करने निकला तो ये सब सा** दुम दबा के भाग गया।” उसने वायरल वीडियो में दावा किया कि उसे पुलिस ने घर के भीतर ही बंद कर दिया है।

कुछ देर बाद भरत तिवारी घर से बाहर निकला और फिर एक बार पुलिसकर्मियों को एनकाउंटर की धमकियाँ देने लगा। वो लगातार पुलिसकर्मियों को गालियाँ देता रहा और उन्हें ठोकने की बात कहता रहा। इसके बाद उसने खुद को विक्षिप्त बताए जाने पर पुलिस को खूब उल्टा-सीधा कहा।

उसने फेसबुक पर लिखा, “अरे सा** बिहार का CM, बिहार पुलिस का सिस्टम और पुरे बिहार का गँजेड़ी सिस्टम सा** तु सब कौन सा नशेड़ी है रे, सा** तुम सभी मुझे सिर्फ पागल ही क्यूँ बोल रहा है उसके साथ वो सभी बातें भी बोलो जो एक क्रांतिकारी योद्धा के लिए समय समय पर इस देश में बोला जाता है।”

‘एनकाउंटर’ के दिन भरत के साथ क्या-क्या हुआ?

इसके बाद 17 जून 2026 को करीब सुबह 9 बजे भरत एक बार फिर फेसबुक पर लाइव आया और इस बार वह एक खुले मैदान में पुलिस के सामने खड़ा था। फेसबुक पर मौजूद करीब 15 मिनट के इस वीडियो में वो लगातार पुलिसकर्मियों को धमकाता और उन पर बंदूक तानता नजर आया। वह वीडियो में बंदूक दिखाकर पुलिसकर्मियों को भाग जाने की बात कहता रहा।

इस वीडियो एक पुलिसकर्मी की बात का जवाब देते हुए उसने कहा, “किस चीज का सरेंडर, यहाँ तो युद्ध होगा। या तो तुम या मैं। तुमने पागल क्यों बोला।” इसके बाद उसने पुलिसकर्मियों पर गोली भी चला दी। जिसे इस वीडियो में 2:25 मिनट के बाद देखा जा सकता है।

इस वीडियो के बाद भरत एक आखिरी बार फिर फेसबुक पर लाइव आया। करीब 3:45 मिनट के इस वीडियो में उसने कहा कि पुलिस उसकी माँगे मानने को तैयार हो गई है और उसकी बात मुख्यमंत्री तक पहुँचाई जाएगी। भरत ने लाइव वीडियो में कहा कि उसे अब हथियार डालने में कोई दिक्कत नहीं है।

उसने अपनी माँग बताते हुए कहा, “कोई भी नेता, मंत्री, विधायक और कोई भी अधिकारी समाज के साथ झूठा वादा नहीं करेगा। अगर करेगा तो उसे किसी भी हाल में पूरा करना होगा। नहीं करेगा तो मेरे जैसे लोगों को हथियार उठाना पड़ेगा।”

उसने कहा कि अब माँग पूरी होने और समाज में बदलाव आने की संभावना दिख रही है तो वह हथियार रखने जा रहा है। इसके बाद उसने वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों के पास अपना हथियार फेंक दिया।

भरत ने पुलिसकर्मियों के सामने फेंका हथियार (फोटो साभार: भरत तिवारी फेसबुक)

इस हथियार को फेंकने के बाद उसके एनकाउंटर की खबर आई। इसकी भी दो अलग दावे हैं, एक दावा पुलिस का है और वहाँ मौजूद लोगों का। भोजपुर पुलिस ने शाम करीब 4 बजे X एक पोस्ट में भरत तिवारी की मौत की जानकारी दी।

पुलिस ने लिखा, “9 बजे पुलिस को सूचना मिली की भरत भूषण तिवारीहाथ में पिस्टल लहराते हुए हवाई फायरिंग कर रहा है। पुलिस व STF द्वारा उससे लगातार आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया लेकिन वह पिस्टल से रुक-रुककर फायरिंग करता रहा। जब जवान उसकी तरफ बढ़े तो उसने पुलिस पर सीधे फायरिंग कर दी। जिसके बाद पुलिस ने आत्मरक्षा में फायरिंग की और शख्स के पैर में गोली लगी। इलाज के दौरान पटना के PMCH में उसकी मौत हो गई।”

लेकिन वहाँ मौजूद लोगों का कुछ और दावा है। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक प्रत्यक्षदर्शी ने कहा, “भरत तिवारी ने हम लोगों के सामने हथियार फेंका, जिसके बाद पुलिसवालों ने दौड़कर उन्हें पकड़ लिया। इसके बाद कुछ दूर तक उन्हें ले गए और उन्हें गोली मार दी। हम लोगों ने देखा था कि उन्हें तीन गोलियाँ मारी गई है। अब डॉक्टर 5 गोली लगने की बात कह रहे हैं, तो भरत तिवारी को रास्ते में पुलिसवालों ने 2 और गोली मारी होगी।”

इस मुठभेड़ पर सवालों के बीच लोग आक्रोशित हो गए और 18 जून 2026 को भरत के शव को हाईवे पर रखकर हंगामा किया गया। आक्रोशित ग्रामीणों ने एनएच-922 जाम कर दिया था और इसके बाद खूब बवाल हुआ, पुलिस को लाठी तक चलानी पड़ी।

अब मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि इस हंगामे को लेकर दो FIR दर्ज की गई हैं जिनमें एक में भरत के पिता काशीनाथ तिवारी और भाई चंदन तिवारी को भी आरोपित बनाया गया है। उन पर हथियार रखने और सरकारी काम में बाधा डालने जैसे आरोप लगाए गए हैं। वहीं, हंगामे-सड़क जाम को लेकर 14 नामजद सहित 50 से अधिक अज्ञात लोगों पर दूसरी FIR दर्ज की गई है।

इस मामले में भरत तिवारी की माँ सुमन देवी ने भी आवेदन देकर माँग की है कि शाहपुर थानाध्यक्ष समेत एनकाउंटर में शामिल अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए। उनका कहना है कि उनके बेटे ने पुलिस के सामने हथियार फेंककर आत्मसमर्पण कर दिया था।

CM सम्राट ने दिए न्यायिक जाँच के आदेश

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर तो हंगामा मचा ही, बिहार ने राजनीति में भी खूब बवाल मचा हुआ है। घटना पर हंगामा बढ़ने के बाद शाहपुर थाना प्रभारी राजेश कुमार मलाकार समेत कई सिपाहियों को निलंबित कर दिया गया है।

कई नेता भरत तिवारी के घर पहुँच रहा है और परिवार के साथ संवेदनाएँ जता रहे हैं। RJD नेता तेजस्वी यादव ने सम्राट सरकार को घेरते हुए कहा कि यह फर्जी एनकाउंटर है और पुलिस ने पहले भी कई बार जाति देखकर एनकाउंंटर किए हैं।

खुद BJP और उसके सहयोगियों की तरफ से भी सवाल उठाए गए। JDU के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि इस मामले की जाँच वरिष्ठ अधिकारी से कराकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। बिहार में BJP के मंत्री मिथिलेश तिवारी ने भी इस एनकाउंटर पर सवाल उठाए।

लगातार सवालों के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शनिवार (20 जून 2026) को इस मामले में जाँच का ऐलान कर दिया। उन्होंने X पर लिखा, “पुलिस मुठभेड़ की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जाँच हेतु उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा न्यायिक जाँच कराने का निर्णय लिया गया है। न्यायिक जाँच का उद्देश्य घटना के सभी पहलुओं की निष्पक्षता एवं पारदर्शिता के साथ जांच सुनिश्चित करना है।”

क्रांतिकारी या अपराधी: कौन था भरत तिवारी, लोगों और उसकी सोशल मीडिया से क्या पता चला?

भरत तिवारी (Bharat Tiwari) को लेकर दो तरह की चर्चाएँ हैं एक वर्ग भरत में अपराधी देख रहा है जो हथियार लेकर सोशल मीडिया से कथित क्रांति करना चाहता था तो वहीं एक वर्ग के लिए वो हमेशा मदद करने वाला शख्स है। भरत की फेसबुक पोस्ट देखने से एक बात तो साफ है कि उसे सरकार और सिस्टम के खिलाफ भयंकर गुस्सा था और उसने कई आपत्तिजनक बातें भी लिखी हैं।

पिछले कुछ दिनों से वह लगातार सोशल मीडिया पर आक्रामक बातें लिख रहा था। वो देश में एक क्रांतिकारी युद्ध छेड़ने और एक नई तरह की सोच की बातें कर रहा था। लोगों की मदद के लिए किए गए उसके कई पोस्ट में भी आपत्तजनक और आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया गया है। 15 जून 2026 को एक फेसबुक पोस्ट में उसने देश में क्रांतिकारी युद्ध छेड़ने और जगदीशपुर के SDM का एनकाउंटर करने की बात कही थी।

इस पोस्ट में भरत ने लिखा, “बिहार के CM और पूरे सिस्टम को मेरा ये संदेश है की 2 दिनों में मुझे बता दो की सभी घोषणाओं और सभी विकास के कार्यों को किया जाएगा या नहीं। अगर 2 दिनों में मुझे ये पता नहीं चलता है कि सभी विकास के कार्यों को करवाया जाएगा या नहीं तो फिर उसके बाद इस देश में क्रांतिकारी युद्ध करने की घोषणा कर दी जाएगी और उसका समय भी बता दिया जाएगा और उसमें सबसे पहले जगदीशपुर के SDM का एनकाउंटर कर दिया जाएगा।”

इस पोस्ट में उसने लिखा, “अभी मेरी जैसा मैं कर रहा हूँ तो उसको देख कर…गद्दारों और देशद्रोहियों को बहुत मजा आ रहा है। खासकर इस देश को जो इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहते हैं। ऐसे लोग ज्यादा खुश ना हों क्यूंकि जिस दिन सा** तुम सभी का ऐसे कुछ भी इलाज करने का मुझे सिर्फ एक भी मौका मिल गया तो सा** तुम जैसे लोगों का वो हाल करूँगा की तुम्हारी रूह तक काँप उठेगी”

12 जून 2026 के एक पोस्ट में उसने प्रशासन से लोगों की मदद करने की अपील की और इसी पोस्ट में बेहद आक्रामक भाषा का भी इस्तेमाल किया गया। उसने लिखा, “जवईनिया गाँव के असहाय और मजबूर लोगों को बसाने के लिए उस गड्ढे वाले स्थान पर 1 से 2 दिनों में मिट्टी नहीं डाला गया…तो उसके बाद बिहार के सिस्टम में बैठा कोई भी सा** लुच्चा और लफंगा यहाँ आ गया तो उस सा* छपरी का एनकाउंटर कर दिया जाएगा”

भरत तिवारी का फेसबुक पोस्ट

इसी मामले को लेकर उसने 7 जून 2026 को लिखा, “गड्ढे वाले स्थान पर मिट्टी नहीं भरा गया है। 2,4 दिन मैं और देख लेता हूँ नहीं तो साला जो बोली से नहीं मानेगा तो उसको गोली खाकर जरुर मान जाना चाहिए। हाँ, SDM सा* का एनकाउंटर तो होगा।” वो पिछले दिनों से लगातार इस मुद्दे को उठा रहा था।

6 जून को एक अन्य विषय पर उसने लिखा, “आप सभी लोगो से मैं बताना चाहता हूँ बिलौटी गाँव में जो जवनिया गाँव के लोगो को बसाने का निर्णय लिया गया है और इस क्रम में जो जो विकास के कार्य यहाँ होने वाले थें तो उसमें सबसे पहले एक कार्य में लापरवाही और भ्रष्टाचार होते हुए पाया गया है जो की ये सरकारी चापा कल (हाथी पांव चापा कल) का कार्य है।”

उसने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ी पोस्ट भी शेयर की हैं। बाढ़ प्रभावित गाँवों की मदद से जुड़े कई पोस्ट भी भरत की फेसबुक प्रोफाइल में नजर आते हैं। नीतीश कुमार की विदाई पर भरत ने लिखा, “बिहार में छपरीबाज CM का अंत हुआ और अब आने वाला CM छपरीबाज होगा की नहीं ये तो आने वाला समय खुद बता देगा।”

इससे पहले के कई फेसबुक पोस्ट में उसने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए इसी तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। वह नीतीश कुमार सरकार की नीतियों की लगातार आलोचना करता रहा था।

11 सितंबर 2025 के एक पोस्ट में उसने लिखा, “आप सभी लोगो को एक सूचना देना था की मैं समाज और देश के लिए जो एक क्रांतिकारी युद्ध लड़ रहा हूँ, उस लड़ाई में मुझे एक और नया युद्ध शामिल करने का मौका मिलने वाला था लेकिन अब कुछ-कुछ छपरी CM और उसके लोग मुझे समझने लगे हैं की इसका आगे का प्लान क्या हो सकता है।” इसमें उसने लिखा कि उसकी जमीन पर कब्जे का प्रयास किया जा रहा है।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि भरत तिवारी का आपराधिक इतिहास भी था। मार्च 2025 में भरत तिवारी के खिलाफ सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने, मारपीट करने, गाली-गलौज, जान से मारने की धमकी देने तथा पुलिस पदाधिकारी के साथ दुर्व्यवहार को लेकर केस दर्ज किया गया था। आरोप था कि भरत ने पुलिस पदाधिकारी की वर्दी का कॉलर पकड़ लिया था और उनके साथ धक्का-मुक्की की थी।

पुराने फेसबुक पोस्ट दिखाने पर भरत की सिस्टम से नाराजगी साफ नजर आती है और उसने कई बार आक्रामक भाषा का भी इस्तेमाल किया है। लेकिन दूसरी तरफ कई लोगों के लिए वह एक मदद करने वाला हीरो था।

दैनिक भास्कर से बिलौटी गाँव के पास के बाढ़ प्रभावितों में शामिल एक शख्स ने कहा, “भरत तिवारी हम लोगों के लिए भगवान जैसे थे। वे रोज आते थे, देखते थे कि चापाकल में पानी आ रहा है या नहीं। लाइट आई या नहीं।” एक अन्य महिला ने कहा, “भरत तिवारी हम लोगों के लिए सब कुछ थे, वे हम लोगों के लिए भगवान जैसे थे। हम लोग उन्हें भगवान जैसा मानते भी थे।”

अंजलि नामक उस महिला ने कहा, “भरत तिवारी ने अपने गले में पहने हुए महावीरी लॉकेट को बेचकर पिस्टल खरीदी थी। ये बात उनकी माँ ने हम लोगों को बताया था। वारदात के दिन पुलिसकर्मियों की 50 से अधिक संख्या थी। 20 से अधिक गोलियाँ चली थी लेकिन भरत तिवारी ने सिर्फ तीन गोलियाँ चलाई थी, वो भी दो जमीन पर और एक हवाई फायरिंग की थी।”

एक अन्य शख्स का कहना है कि भरत तिवारी पागल या मेंटल होता तो हम लोगों की भलाई के बारे में क्यों सोचता और स्कूल खुलवाने या बिजली-पानी की व्यवस्था की बात क्यों करता। उन्होंने कहा, “प्रशासन उन्हें पागल घोषित करने में जुटा था, इसलिए भरत तिवारी ने हथियार उठाया था। भरत तिवारी हम लोगों के लिए मसीहा थे।”

बताया जाता है कि वो लगातार बाढ़ के पानी में समा गए घरों को लेकर आवाज उठाता रहता था। जवइनियां गाँव की दिक्कतों को लेकर वह लगातार जिला प्रशासन से मुलाकात करता और गाँव में बिजली, पानी की स्थिति ठीक करने की चर्चा करता रहता।

भरत तिवारी के विषय में लोगों की राय और पुलिस की थ्योरी, दोनों एक दूसरे के बिल्कुल विपरित हैं। सोशल मीडिया खँगालने पर दिखता है कि उसकी भाषा आक्रामक थी और वो एनकाउंटर करने और गोली मारने जैसी बाते लिखता था। वहीं, दूसरी और सोशल मीडिया पर ऐसी बातें भी हैं जिसमें वो लोगों के मुद्दा सड़क, गाँव, पानी, बिजली की बातें उठा रहा है। भरत नायक है या खलनायक है, उसकी हत्या हुई या पुलिसकर्मियों ने बचवा में गोली मारी ये तो अब न्यायिक जाँच ही बताएगी।

कश्मीरी लड़कियों का शोषण, जेब में कंडोम और ‘लव लेटर’: पूर्व आतंकी मुश्ताक ने खोली पाकिस्तान की पोल, बताया- जन्नत-हूर का ख्वाब दिखा फँसाते हैं

पूर्व कश्मीरी आतंकी और बाद में भारतीय सेना के लिए अंडरकवर ऑपरेटिव के तौर पर काम कर चुके मुश्ताक अहमद भट ने यूट्यूबर प्रखर गुप्ता के लोकप्रिय पॉडकास्ट (‘PGX: Raw & Real’) पर एक इंटरव्यू में 90 के दशक से लेकर 2016 तक के आतंक की उस काली सच्चाई को खोलकर रख दिया, जिसे पाकिस्तान हमेशा दुनिया से छिपाना चाहता है।

उन्होंने बताया कि सरहद पार से आने वाले आतंकी ‘मुजाहिद’ होने का दावा कर घाटी में केवल अपनी हवस मिटाने और कश्मीरी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद करने आते थे।

कश्मीर में पिछले तीन दशकों से पाकिस्तान जिस ‘जिहाद’, ‘मजहब की लड़ाई’ और ‘आजादी की लड़ाई’ का नैरेटिव दुनिया के सामने पेश करता रहा है, उसकी हकीकत क्या है? क्या सचमुच हजारों कश्मीरी युवा किसी मकसद के लिए हथियार उठाकर सीमा पार गए थे या फिर वे एक ऐसे खेल का हिस्सा बन गए थे जिसमें मजहब, राजनीति, प्रोपेगेंडा और विदेशी एजेंसियों के हित सबसे ऊपर थे और युवाओं की जिंदगी का कोई मोल नहीं था?

इन सवालों का जवाब उस व्यक्ति ने दिया है, जिसने इस काली दुनिया को भीतर से देखा। उसने कश्मीर में बंदूक संस्कृति का उदय देखा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के कैंपों में समय बिताया, अफगानिस्तान में सैन्य प्रशिक्षण लिया, ‘जिहाद’ की विचारधारा के नाम पर होने वाली ब्रेनवॉशिंग को करीब से देखा और बाद में उस रास्ते को छोड़कर भारतीय सेना के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम किया। यह व्यक्ति है मुश्ताक अहमद भट, जिन्हें कभी ‘अशफाक’ और ‘रोमियो’ जैसे कोड नेम से जाना जाता था।

प्रखर के पॉडकास्ट में मुश्ताक अहमद भट ने ऐसे कई खुलासे किए, जो पाकिस्तान के दशकों पुराने दावों को चुनौती देते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार मुठभेड़ों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की तलाशी के दौरान उनकी जेबों से जिहाद और शहादत के संदेश नहीं, बल्कि कश्मीरी लड़कियों को लिखे गए प्रेम पत्र निकलते थे। कई मामलों में कंडोम भी बरामद हुए।

मुश्ताक के अनुसार, जब पकड़े गए आतंकियों से पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम और जिहाद के नाम पर लड़ने आए हैं तो उनके पास ऐसी चीजें क्यों हैं?, तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं होता था। वे बहस से बचते थे या गुस्से में जवाब देते थे। यह वह पहला सच था जो उस छवि से बिल्कुल अलग था, जो पाकिस्तान और उसके समर्थक संगठनों द्वारा ‘मुजाहिदीन’ के बारे में बनाई जाती रही है।

मुश्ताक बताते हैं कि कई विदेशी और पाकिस्तानी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे। दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में ऐसे मामले सामने आए जहाँ आतंकियों ने स्थानीय परिवारों में शरण ली, परिवार की लड़कियों के साथ रात बिताई और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। वैसी लड़कियाँ और उनके होने वाले बच्चों की जिंदगी बदल गई। यह कहानी केवल आतंकियों की निजी हरकतों की नहीं है, बल्कि यह कहानी उस पूरे तंत्र की है, जिसने हजारों युवाओं को ‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नाम पर इस्तेमाल किया।

एक संपन्न और राजनीतिक परिवार से आने वाला युवक

मुश्ताक अहमद भट किसी आर्थिक मजबूरी या सामाजिक उपेक्षा के कारण उस रास्ते पर नहीं गए थे। वे कश्मीर के एक प्रभावशाली और राजनीतिक परिवार से आते थे। उनके दादा गाँव के मुखिया थे और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा थी। जमीन-जायदाद की कमी नहीं थी। पढ़ाई सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में हुई। सामान्य जीवन चल रहा था।

लेकिन 1980 के दशक के अंत तक कश्मीर तेजी से बदल रहा था। 1987 के चुनावों के बाद राजनीतिक असंतोष बढ़ा। चुनावी धांधली के आरोप लगे। अलगाववादी भावनाओं को हवा मिली। पाकिस्तान ने इस असंतोष को अवसर के रूप में देखा। घाटी में धीरे-धीरे एक नया माहौल बनने लगा।

मुश्ताक बताते हैं कि उस दौर में बंदूक केवल हथियार नहीं थी, बल्कि प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी थी। कॉलेजों और युवाओं के बीच पिस्तौल और AK-47 आकर्षण का केंद्र बन गए थे। जिसके पास हथियार होता था, उसे अलग नजर से देखा जाता था।

मुश्ताक ने स्वीकार किया कि वे भी इसी माहौल से प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि बंदूक शक्ति का प्रतीक है। युवाओं के मन में यह धारणा बैठाई जा रही थी कि हथियार उठाना ही सम्मान पाने का रास्ता है। यही वह दौर था जब कश्मीर का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा की ओर बढ़ रहा था।

‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नारों से शुरू हुई यात्रा

मुश्ताक बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें भी यही बताया गया कि वे एक बड़े और पवित्र मिशन का हिस्सा बनने जा रहे हैं। ‘आजादी’ जुल्म के खिलाफ संघर्ष’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्द लगातार सुनाई देते थे। रैलियाँ निकलती थीं। भाषण होते थे। युवाओं को बताया जाता था कि वे इतिहास बदलने जा रहे हैं।

धीरे-धीरे ऐसे युवाओं की पहचान की जाती थी, जो भावनात्मक रूप से प्रभावित हो चुके हों। मुश्ताक भी उन्हीं युवाओं में शामिल हो गए। कुछ समय बाद उन्हें बताया गया कि वे सीमा पार जाने के लिए तैयार रहें। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि सीमा पार जाकर वे किसी महान उद्देश्य के लिए काम करेंगे।

कुपवाड़ा से सीमा पार और मुजफ्फराबाद तक

1990 के आसपास मुश्ताक और उनके साथियों को कुपवाड़ा के रास्ते सीमा पार कराया गया। यह यात्रा आसान नहीं थी। जंगलों, पहाड़ों और कठिन रास्तों से गुजरते हुए वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पहुँचे। रात में चलना, दिन में छिपना और लगातार सतर्क रहना इस यात्रा का हिस्सा था।

आखिरकार वे मुजफ्फराबाद पहुँचे, जहाँ उनका स्वागत किया गया। उन्हें बताया गया कि अब वे जिहाद के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। यहीं से शुरू हुई वह प्रक्रिया, जिसे मुश्ताक बाद में ‘ब्रेनवॉशिंग’ के रूप में याद करते हैं। मुजफ्फराबाद के कैंपों में हर तरफ एक ही बात सुनाई देती थी- जिहाद, शहादत और जन्नत।

युवाओं को बताया जाता था कि यह दुनिया अस्थायी है और असली सफलता शहादत में है। मजहबी भाषणों, भावनात्मक कहानियों और प्रचार सामग्री के जरिए उनके भीतर एक विशेष मानसिकता विकसित की जाती थी, लेकिन कुछ ही समय बाद मुश्ताक को कई बातें खटकने लगीं।

उन्होंने देखा कि जिन युवाओं के नाम पर पैसा आता था, वह उन तक नहीं पहुँचता था। कैंपों के वरिष्ठ लोग बेहतर सुविधाओं में रहते थे, जबकि युवा साधारण और कठिन परिस्थितियों में रहते थे। यहीं से उनके मन में पहला बड़ा सवाल पैदा हुआ। अगर यह सचमुच मजहब और सिद्धांतों की लड़ाई है, तो फिर भ्रष्टाचार क्यों?

विदेशी प्रतिनिधियों के सामने तैयार किया गया नैरेटिव

मुश्ताक के अनुसार, एक समय उन्हें ऐसे कार्यक्रमों में भी शामिल किया गया जहाँ विदेशी प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लोगों के सामने कश्मीर की एक विशेष तस्वीर पेश की जाती थी। उन्हें बताया जाता था कि क्या कहना है और कैसे कहना है। भारतीय सेना के खिलाफ कथित अत्याचारों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं।

लोगों को भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता था ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहानुभूति हासिल की जा सके। मुश्ताक के अनुसार, यहीं से उन्हें एहसास होने लगा कि केवल हथियारों का ही नहीं, बल्कि नैरेटिव और प्रोपेगेंडा का भी एक बड़ा खेल चल रहा है।

मुजफ्फराबाद में कुछ समय बिताने के बाद मुश्ताक अहमद भट और उनके साथ मौजूद कई अन्य युवाओं को अफगानिस्तान भेजे जाने की तैयारी शुरू हुई। उन्हें बताया गया कि अब वे असली ट्रेनिंग लेने जा रहे हैं। वहाँ से लौटकर वे ‘बड़े मिशन’ का हिस्सा बनेंगे।

उस समय तक मुश्ताक के मन में कई सवाल पैदा हो चुके थे, लेकिन वे उस मशीनरी के भीतर थे जहाँ सवाल पूछना आसान नहीं था। जो व्यक्ति सवाल पूछता था, उस पर शक किया जाता था। जो संगठन की लाइन से अलग सोचता था, उसे पसंद नहीं किया जाता था। ऐसे माहौल में अधिकांश युवा चुप रहना ही बेहतर समझते थे।

पाकिस्तान से अफगानिस्तान तक का सफर, हिज्ब-ए-इस्लामी के कैंप में मिली ट्रेनिंग

मुश्ताक बताते हैं कि उन्हें और उनके साथियों को पहले पेशावर की ओर ले जाया गया। वहाँ से उन्हें अफगानिस्तान पहुँचाया गया। उस समय अफगानिस्तान युद्ध और अस्थिरता का केंद्र था। सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई के बाद भी वहाँ हथियारबंद गुट सक्रिय थे और अलग-अलग संगठनों के कैंप चल रहे थे।

यहीं पर मुश्ताक को पहली बार एहसास हुआ कि कश्मीर का मुद्दा केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। यह एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है, जहाँ अलग-अलग देशों, संगठनों और विचारधाराओं के लोग मौजूद थे। अफगानिस्तान में मुश्ताक को हिज्ब-ए-इस्लामी से जुड़े कैंपों में प्रशिक्षण दिया गया।

यहाँ उन्हें हथियार चलाने, विस्फोटक इस्तेमाल करने, घात लगाकर हमला करने और कठिन इलाकों में लड़ने की ट्रेनिंग दी गई। AK-47 से लेकर दूसरे हथियारों तक, हर चीज सिखाई जाती थी। युवाओं को यह विश्वास दिलाया जाता था कि वे किसी पाक युद्ध का हिस्सा हैं।

लेकिन मुश्ताक कहते हैं कि ट्रेनिंग के दौरान भी उन्हें बार-बार यह महसूस होता था कि जो बातें मंचों पर कही जाती हैं और जो जमीन पर दिखाई देता है, दोनों में बहुत अंतर है। मुश्ताक बताते हैं कि अफगानिस्तान पहुँचने के बाद उन्होंने पहली बार युद्ध को वास्तविक रूप में देखा।

फिल्मों और भाषणों में युद्ध को रोमांचक दिखाया जाता है, लेकिन जमीन पर वह केवल मौत, तबाही और दर्द छोड़ता है। उन्होंने टूटे हुए घर देखे, घायल लोगों को देखा, ऐसे परिवार देखे जिनके कई सदस्य मारे जा चुके थे। ऐसे बच्चे देखे जिन्होंने अपने माता-पिता खो दिए थे। यही वह समय था जब उनके भीतर ‘जिहाद’ की चमक फीकी पड़ने लगी।

जन्नत के सपने और मौत की सच्चाई

मुश्ताक बताते हैं कि कैंपों में युवाओं को बार-बार बताया जाता था कि शहादत सबसे बड़ी सफलता है। उन्हें जन्नत और हूरों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं, लेकिन अफगानिस्तान में उन्होंने देखा कि मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग थे। वे युवा थे जिन्हें भावनाओं में बहाकर यहाँ तक लाया गया था। जो लोग फैसले लेते थे, वे सुरक्षित जगहों पर बैठे रहते थे।

यहीं से उनके मन में यह सवाल और गहरा हो गया कि आखिर इस पूरी व्यवस्था का फायदा किसे हो रहा है? मुश्ताक बताते हैं कि धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि ‘जिहाद’ केवल विचारधारा नहीं, बल्कि एक कारोबार भी बन चुका है।

फंड जुटाए जाते थे, दान लिया जाता था, विदेशों में अभियान चलाए जाते थे, युवाओं के नाम पर पैसा आता था, लेकिन उस पैसे का बड़ा हिस्सा ऊपर बैठे लोगों तक ही सीमित रहता था। जिन युवाओं को मैदान में भेजा जाता था, उनके हिस्से में केवल खतरा और मौत आती थी।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बिताए समय के दौरान मुश्ताक को यह समझ आने लगा कि कश्मीर का मुद्दा कई लोगों के लिए राजनीतिक साधन बन चुका है। कश्मीर में जितना तनाव रहेगा, उतना ही यह मुद्दा जिंदा रहेगा। जितने ज्यादा युवा हथियार उठाएँगे, उतना ही यह नेटवर्क मजबूत रहेगा। इसलिए युवाओं को लगातार भावनात्मक रूप से प्रभावित किया जाता था।

उन्हें बताया जाता था कि वे किसी महान मिशन का हिस्सा हैं, लेकिन असलियत में वे एक ऐसे खेल का हिस्सा थे जिसमें उनका इस्तेमाल हो रहा था।

युवाओं का शोषण

मुश्ताक की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है, वे बार-बार कहते हैं कि सबसे ज्यादा नुकसान कश्मीरी युवाओं का हुआ। कई युवा पढ़ाई छोड़कर चले गए, कई कभी वापस नहीं लौटे, कई मारे गए, कई जेलों में पहुँचे और कई ऐसे थे जिन्हें यह तक समझ नहीं आया कि वे आखिर किसके लिए लड़ रहे हैं।

मुश्ताक मानते हैं कि वे खुद भी उसी दौर में बहक गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि जिस रास्ते पर वे चल पड़े थे, उसका अंत केवल विनाश था। अफगानिस्तान के अनुभवों, कैंपों में देखे गए भ्रष्टाचार और लगातार दिखाई दे रहे विरोधाभासों ने मुश्ताक की सोच पूरी तरह बदल दी।

अब उन्हें समझ आने लगा था कि जिहाद के नाम पर बहुत कुछ ऐसा किया जा रहा है जिसका मजहब या इंसाफ से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने महसूस किया कि युवाओं को इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्हें मरने के लिए तैयार किया जा रहा है। और जो लोग उन्हें भेज रहे हैं, वे खुद कभी मैदान में नहीं उतरते।

यहीं से उन्होंने तय किया कि उन्हें इस रास्ते से बाहर निकलना है। मुश्ताक बताते हैं कि वापसी का फैसला आसान नहीं था, जो संगठन छोड़ना चाहता था, उस पर नजर रखी जाती थी। उसकी निष्ठा पर सवाल उठाए जाते थे, लेकिन उन्होंने तय कर लिया था कि वे अपनी बाकी जिंदगी इसी रास्ते पर नहीं बिताएँगे।

भारतीय सेना के साथ नई शुरुआत

वापसी के बाद उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव आया, उन्होंने भारतीय सेना के साथ काम करना शुरू किया। यह एक असाधारण परिवर्तन था, जो व्यक्ति कभी सीमा पार जाकर प्रशिक्षण ले चुका था, वही बाद में आतंकवाद के खिलाफ अभियानों का हिस्सा बना। मुश्ताक बताते हैं कि भारतीय सेना ने उन पर भरोसा किया, उन्हें मौका दिया।

मुश्ताक के अनुसार, “जो मेरी आर्मी है इंडियन आर्मी यह पूरी वर्ल्ड की ऐसी आर्मी है जिसने कल के दहशतगर्द को अपनाया और इसको अपना बेस्ट दे दिया और उसने भी अपना बेस्ट दे दिया। यह बहुत बड़ी बात है मेरी आर्मी की, इंडियन आर्मी की कि दुनिया में कहीं भी आपको मिसाल नहीं मिलेगी।”

मुश्ताक ने करीब 31 वर्षों तक भारतीय सेना के साथ काम किया। उनका अनुभव उपयोगी साबित हुआ क्योंकि वे उस दुनिया को भीतर से जानते थे। उन्होंने देखा था कि आतंकवादी नेटवर्क कैसे काम करता है, कैसे युवाओं को फँसाया जाता है, कैसे प्रोपेगेंडा फैलाया जाता है और कैसे सीमा पार बैठे लोग कश्मीर को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं।

प्रेम पत्र, कंडोम, हूरों के नाम पर कश्मीरी लड़कियों का शोषण

मुश्ताक के खुलासों में सबसे ज्यादा चर्चा उन घटनाओं की हुई जिनमें मारे गए आतंकियों की जेबों से प्रेम पत्र और कंडोम मिले। उनके अनुसार, यह उस नैरेटिव को चुनौती देता है जिसमें आतंकियों को केवल मजहबी योद्धा के रूप में पेश किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे।

पॉडकास्ट में मुश्ताक ने कैमरे के सामने उन पुराने ‘लव लेटर्स’ के बंडल भी दिखाए, जो अलग-अलग ऑपरेशनों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की जेबों से निकले। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में लिखे गए इन खतों में कहीं भी जिहाद या किसी मजहबी मकसद की बात नहीं दिखी, बल्कि उनमें कश्मीरी लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाने और शादी के सपने दिखा कर प्रभाव में लेने वाली बातें होती थी।

कई खतों में लिखा था, “पापी से नहीं, पाप से नफरत करो…”, “मैं तुम्हारे अच्छे कैरेक्टर से प्यार करता हूँ…”। मुश्ताक का दावा था कि विदेशी आतंकी इसी तरह के झूठे प्रेम और भरोसे का माहौल बनाकर मासूम लड़कियों को अपने करीब लाने की कोशिश करते थे। मामला सिर्फ इन खतों तक सीमित नहीं था।

पूर्व कमांडर ने दावा किया कि कई मुठभेड़ों के दौरान मारे गए या पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकियों के पास से कंडोम भी बरामद हुईं। जब उनसे पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम के नाम पर लड़ाई लड़ने आए हैं तो ऐसी चीजों की जरूरत क्यों पड़ी, तब वे जवाब देने के बजाय भड़क जाते थे। वे हूरों का ख्वाब लेकर आते थे और कश्मीरी लड़कियों का शोषण करते थे।

मुश्ताक के मुताबिक, दक्षिण कश्मीर के कुछ गाँवों में आज भी ऐसे परिवार मौजूद हैं जिनकी जिंदगी पाकिस्तानी आतंकियों के आने-जाने के बाद बदल गई। उनका कहना था कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय घरों में शरण लेते थे और अस्थायी या छद्म शादियों के जरिए लड़कियों से रिश्ते बनाते थे।

यमरश और उरपोरा नागबल गाँवों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि साजिद और आदिल पठान जैसे पाकिस्तानी आतंकियों ने स्थानीय लड़कियों से संबंध बनाए और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। पीछे रह गए बच्चे और वे महिलाएँ, जिन्हें समाज की नजरों और मुश्किलों के साथ आगे बढ़ना पड़ा।

सालों तक ‘शहादत’ और ‘जिहाद’ के नाम पर कश्मीर में हिंसा फैलाने वाले आतंकियों की वास्तविकता अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।

कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद कोई मजहबी लड़ाई नहीं था, बल्कि एक ऐसा खेल था जिसमें युवाओं के हाथों में पत्थर और बंदूकें देकर बड़े कमांडरों और पाकिस्तानी आतंकियों ने अपने स्वार्थ पूरे किए। यह सच घाटी के उन युवाओं के लिए एक आईना है, जो आज भी पाकिस्तान के प्रभाव में आकर अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।

CCP के प्रोपेगेंडा को भारतीयों का जवाब, खोल दी चीनी ‘जाति व्यवस्था’ की पोल: जानें- कौन हैं ‘शि-नोंग-गोंग-शांग’ और हुकौ सिस्टम?

वर्षों तक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी सामाजिक वास्तविकताओं को एक ‘सुरक्षा कवच’ के अंदर छिपा कर रखा था और भारत की सामाजिक संरचना और जाति व्यवस्था के बारे में नफरत फैलाता रहा। हालाँकि अब सोशल मीडिया पर भारतीय यूजर्स ने मीम्स के जरिए सीसीपी की चूलें हिला दी है। बहस मजेदार है और वह चीनी जातिवादी व्यवस्था को बताता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स, इंस्टाग्राम हो या दूसरा प्लेटफॉर्म, सब पर भारतीय यूजर्स चीन के जमीनी हकीकत बता रहे हैं। कहीं मीम्स है तो कहीं वीडियो या व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ। इसके माध्यम से चीनी जाति व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं। दरअसल भारतीय यूजर्स चीन के हाउसहोल्ड रजिस्ट्रेशन सिस्टम ‘हुकौ’ को जातिवाद से जोड़ रहे हैं।

भारत में विद्वानों के बीच चीनी जाति व्यवस्था और उसके आधुनिक ‘हुकौ’ स्वरूप पर चर्चा होती रहती है, लेकिन वास्तव में भारतीय लोग चीन की जाति व्यवस्था के केवल संशोधित रूप से ही परिचित हैं। लेकिन भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने चीन की इस छुपी हुई सामाजिक सच्चाई को वैश्विक स्तर पर उजागर कर दिया है।

यह अभियान 11 जून 2026 के जोर पकड़ा। इसमें चीन के प्राचीन चार व्यवसायों यानी शि-नोंग-गोंग-शांग को एक वंशानुगत पदानुक्रम के रूप में और आधुनिक हुकोउ घरेलू पंजीकरण प्रणाली के भीतर संस्थागत भेदभाव को उजागर करने वाली पोस्ट शामिल थीं।

इससे पहले कि हम यह जानें कि भारतीय चीन की सामाजिक वास्तविकताओं को जानने के लिए उत्सुक क्यों हैं, चीन की जाति व्यवस्था के बारे में, ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों पहलुओं को जानना महत्वपूर्ण है।

कई भारतीय यूजर्स चीन के सामाजिक ताने बाने की तुलना भारत की जाति व्यवस्था से करने लगे। उनका तर्क है कि चीन में एक ऐसा सिस्टम है, जो तय करता है कि आप किस घर में पैदा हुए हैं, उसी हिसाब से अवसर मिलेंगे।

‘चार व्यवसायों’ से लेकर ‘हुकौ’ सिस्टम तक

‘चार व्यवसायों’ की व्यवस्था झोऊ राजवंश से चली आ रही है, हालांकि इसे बाद के कालखंडों में औपचारिक रूप दिया गया। यह सम्राट के अधीन एक आदर्श सामाजिक पदानुक्रम था। इस व्यवस्था के तहत लोगों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया था।

सबसे ऊपर शि (士) जाति थी। इसमें विद्वान, कुलीन वर्ग, अधिकारी और समग्र शासक वर्ग शामिल थे।

शि के बाद नोंग (农) आते थे, जो किसान, कृषि उत्पादक और खाद्य उत्पादन करने वाले लोग थे। सैद्धांतिक रूप से सम्मानित होने के बावजूद, व्यवहार में उन्हें निम्न श्रेणी का माना जाता था।

तीसरे स्थान पर गोंग (工) था। इस श्रेणी में कारीगर और शिल्पकार शामिल थे।

सामाजिक पदानुक्रम में सबसे निचला स्तर शांग (商) समूह का था। इसमें व्यापारी और सौदागर शामिल थे। इन्हें लाभ-उन्मुख और कम महत्वपूर्ण माना जाता था।

कुछ काल में, जियानमिन या निम्न वर्ग की एक निचली श्रेणी होती थी। सम्राट इन सभी श्रेणियों से ऊपर होता था।

चीन के बाहर कई चीन समर्थक तत्वों और चीनी विद्वानों का तर्क है कि यह व्यवस्था भारत की वर्ण या जाति व्यवस्था के समान नहीं थी। उनका कहना है कि वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से वंशानुगत या शुद्धता पर आधारित थी, जबकि ‘चार व्यवसाय’ व्यवस्था वंशानुगत होने की तुलना में अधिक व्यावसायिक थी।

हालाँकि वर्ण व्यवस्था भी अपने मूल वैदिक रूप में वंशानुगत या जन्म-निर्धारित नहीं थी। जहाँ चीन की ‘शि-नोंग-गोंग-शांग’ पदानुक्रम व्यवसाय पर आधारित थी, वहीं भारत की वर्ण व्यवस्था गुणों और कर्मों पर आधारित थी।

ब्राह्मणों में वैदिक पुजारी, विद्वान और शिक्षक शामिल थे, क्षत्रिय शासक वर्ग और योद्धा थे, वैश्य व्यापारी, किसान और सौदागर थे, और अंत में शूद्र सेवा प्रदाता थे। यह व्यवस्था मूलतः श्रम विभाजन और एक सामाजिक संगठन पर आधारित थी जिसमें व्यक्ति की योग्यता, गुण, कर्तव्य और रुचियां उनके वर्ण का निर्धारण करती थीं। ऐसा नहीं है कि इसे जन्मजात ही माना जाता था।

वर्ण व्यवस्था सैद्धांतिक रूप से लचीली थी और मूलतः व्यक्तिगत आचरण और योग्यता पर आधारित थी। कई प्रख्यात व्यक्ति योग्यता और आचरण के बल पर ब्राह्मण बने, जबकि कई मामलों में बुरे आचरण के कारण जाति और प्रतिष्ठा का नुकसान होता था। इनमें से कोई भी जन्म पर आधारित नहीं था।

यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि बाद के कालखंडों में जाति व्यवस्था वंशानुगत हो गई। मूल व्यवस्था जन्म पर आधारित नहीं थी, चीन के चार व्यवसायों की तरह ही थी । सामाजिक पदानुक्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं हैं। कई देशों में धर्म या व्यवसाय पर आधारित पदानुक्रम हैं,जो या तो मूल रूप से कठोर और भेदभावपूर्ण थे या समय के साथ भ्रष्टाचार के कारण विकृत हो गए। हालाँकि केवल भारत के संदर्भ में ही सामाजिक पदानुक्रम और अपवर्जन को हिंदू संस्कृति और धर्म का सार बताने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

यह जानबूझकर हिंदू धर्म को बदनाम करने और यह धारणा स्थापित करने के लिए किया जाता है कि केवल हिंदू धर्म और संस्कृति ही भारतीय समाज और संस्कृति को परिभाषित करती है, जबकि भारत विविध धर्मों और संस्कृतियों का घर है, जिनकी अपनी अलग-अलग पदानुक्रम हैं।

इसके बावजूद, चीनी प्रचार का कारखाना भारतीय जाति व्यवस्था की सुविधाजनक नकारात्मक बातों को चुन-चुनकर पेश करता है, उन्हें अपने अतिरंजित आख्यानों के साथ मिलाकर भारत को एक सामंती, विभाजित और यहाँ तक ​​कि ‘हीन’ देश के रूप में चित्रित करता है। जबकि भारत काल्पनिक प्राचीन चीन और वर्तमान कम्युनिस्ट चीनी दोनों आदर्श लोक से बिल्कुल अलग है। यहाँ हर कोई ‘समान’ है।

हुकौं प्रणाली: चीन की वास्तविक जाति व्यवस्था

स्वतंत्र भारत ने कानूनों और सामाजिक सुधारों के माध्यम से जातिगत भेदभाव को समाप्त करने में काफी हद तक सफलता हासिल की है, जबकि कम्युनिस्ट चीन ने काफी सख्त हुकौं प्रणाली को अपनाया है।

हुकौं प्रणाली की उत्पत्ति युद्धरत राज्यों के काल (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) से मानी जाती है। यह व्यवस्था भारत की वर्ण व्यवस्था और प्राचीन चीन की चार व्यवसायों की व्यवस्था से अलग है। हुकौं प्रणाली लोगों को जन्म-आधारित विशेषाधिकारों के आधार पर विभाजित करती है।

हुकौं एक पारिवारिक पंजीकरण व्यवस्था है, जिसे चीनी कम्युनिस्ट क्रांति के बाद 1958 में कड़ाई से लागू किया गया। इसके तहत सीसीपी ने हर चीनी नागरिक के लिए जन्म से ही हुकौं का दर्जा प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया था।

यह लोगों को दो समूहों में विभाजित करता है: कृषि प्रधान (ग्रामीण) बनाम गैर-कृषि प्रधान या शहरी। यह एक विशिष्ट स्थान से भी जुड़ा हुआ है, जैसे स्थानीय या बाहरी। शहरी हुकौं को बेहतर सरकारी स्कूलों और कॉलेजों, रियायती स्वास्थ्य सेवाओं और आवास, पेंशन और सामाजिक कल्याण के साथ साथ सरकारी और स्थाई नौकरियाँ मिलती है। वे मूल रूप से एक विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक की तरह हैं।

बहुसंख्यक ग्रामीण हुकौं के सामने कई तरह की दिक्कतें आती हैं। कई मीडिया रिपोर्टों और अध्ययनों के अनुसार, जब ग्रामीण हुकू धारक काम के लिए शहरों में पलायन करते हैं, तो उन्हें आमतौर पर केवल अस्थायी निवास परमिट ही मिलते हैं। इन ग्रामीण हुकौं धारकों के बच्चे गाँवों में ही उपेक्षित रह जाते हैं और शहरी स्कूलों में अतिरिक्त फीस की समस्या का सामना करते हैं।

दरअसल, चीन जनवादी गणराज्य (सीसीपी) जिस सरकारी शिक्षा प्रणाली को चलाती है, वहाँ शहरी हुकौं को ही प्रवेश मिलता है। ग्रामीण हुकौं सामाजिक और आर्थिक रूप से अलग-थलग हैं। सार्वजनिक संसाधनों तक उनकी पहुँच बहुत कम है। इनके बच्चे जिन स्कूलों में पढ़ते हैं, वे ट्यूशन फीस पर निर्भर हैं, इनकी इमारतें जर्जर हैं और सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में ये सरकारी स्कूलों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरते।

पलायन करने के बाद शहरी विद्यालयों में भी प्रवेश न मिलने के कारण श्रमिक कभी-कभी अपने बच्चों को शिक्षा के लिए अकेले ही अपने ग्रामीण इलाके में वापस भेजने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इससे पीढ़ी दर पीढ़ी शिक्षा का पिछड़ापन बना रहता है, जबकि शहरी हुकौं के शैक्षिक स्तर में पीढ़ी दर पीढ़ी सुधार हुआ है, चाहे वह स्कूली शिक्षा हो या उच्चस्तरीय शिक्षा।

चीन की राजधानी बीजिंग में पिछले एक दशक में कई ग्रामीण स्कूलों को बंद कर दिया गया या ध्वस्त कर दिया गया है। इससे ग्रामीण हुकौं शिक्षा में और भी पिछड़ गए।

प्रवासी ग्रामीण श्रमिकों के बच्चों के लिए मुख्यधारा के सरकारी स्कूलों में प्रवेश पाने का एकमात्र तरीका ‘5 परमिट’ प्रस्तुत करना है। इनमें श्रम अनुबंध और स्थानीय आवास का प्रमाण शामिल है। हालाँकि प्रवासी कामगारों के लिए शहरी हुकौं प्राप्त करना लगभग असंभव है। चूँकि अधिकांश प्रवासी कामगार अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में कार्यरत हैं और अनौपचारिक अपार्टमेंट में रहते हैं, इसलिए वे शहरी हुकू प्राप्त करने की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते।

अपनी उल्लेखनीय पुस्तक ‘द अर्बनाइजेशन ऑफ पीपल’ में समाजशास्त्री एली फ्रीडमैन ने उल्लेख किया है कि अन्य क्षेत्रों में भेदभावपूर्ण प्रथाओं और सामाजिक स्थितियों के विपरीत चीनी हुकौं प्रणाली ‘पूरी तरह से राज्य द्वारा बनाई गई है, जो व्यवस्थित तरीके से लोगों के बीच विभाजन करती है।’

“हुकौं और शहरी ग्रामीण शैक्षिक असमानता: कौन पीछे छूट गए हैं?” शीर्षक वाले एक अध्ययन में जेयु झाओ ने शिक्षा क्षेत्र में ग्रामीण हुकौं द्वारा सामना की जाने वाली असमानताओं का विस्तार से वर्णन किया है।

अध्ययन में कहा गया है कि चीन की शिक्षा प्रणाली में शहरी-ग्रामीण असमानताएँ व्याप्त हैं, जिसका कारण हुकौं का शैक्षिक संसाधनों और अवसरों पर पड़ने वाला भेदभावपूर्ण प्रभाव है। कई शहरों में, स्थानीय हुकौं के बिना प्रवासी छात्रों को नौ वर्षीय अनिवार्य निःशुल्क शिक्षा से वंचित कर दिया जाता है। अधिकांश सरकारी स्कूलों को प्रवासी छात्रों के लिए कोई सरकारी निधि प्राप्त नहीं होती है। परिणामस्वरूप, प्रवासी छात्रों को या तो निजी संस्थानों में जाना पड़ता है या अपने हुकौं की स्थिति से जुड़े गाँव लौटना पड़ता है, जहाँ उन्हें निःशुल्क लेकिन बुनियादी स्तर की शिक्षा मिल सकती है।

प्रवासी श्रमिक कारखानों और निर्माण कार्यों में सबसे खतरनाक, गंदे और कम वेतन वाले काम करते हैं, इसलिए उन्हें समाज में निम्नतम दर्जे का माना जाता है। शहरी हुकू धारकों की तुलना में उन्हें समान काम के लिए कम वेतन मिलता है। नौकरी देने में भेदभाव का सामना करना पड़ता है और शहरी सुविधाओं तक उनकी पहुँच सीमित होती है। किसानों (नोंगमिन) और अन्य ग्रामीण हुकौं धारकों की भी यही स्थिति है।

चीन की हुकौं प्रणाली जन्म आधारित भेदभावपूर्ण जाति व्यवस्था के समान है, क्योंकि शहरी और ग्रामीण हुकू धारकों की आर्थिक स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक संसाधनों तक पहुँच में जन्म के आधार पर असमानता पाई जाती है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसने जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को जन्म के आधार पर स्थायी गरीबी में धकेल दिया है।

स्पष्ट रूप से, चीन का समाजवाद-साम्यवाद केवल दिखावटी बातों तक ही सीमित है और सीसीपी ने न केवल माओ-पूर्व हुकोउ (हुजी) प्रणाली को अपनाया, जो मूल रूप से किसी व्यक्ति के निवास स्थान पर आधारित थी, बल्कि इसे जन्म-आधारित बनाकर और भी कठोर और भेदभावपूर्ण बना दिया, जिससे निवास की स्थिति वंशानुगत हो गई।

आर्थिक दृष्टि से, हुकू प्रणाली ने चीन को एक दोहरी अर्थव्यवस्था बनाने में मदद की, जिसमें अकुशल श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा शामिल था। जन्म-आधारित और संस्थागत रूप से स्थापित बहिष्करणकारी हुकू व्यवस्था के माध्यम से, सीसीपी ने सस्ते श्रम की प्रचुरता के बल पर सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास हासिल किया, जिसकी उसे अपने सत्तावादी शासन को कायम रखने के लिए आवश्यकता थी।

दरअसल, शुरुआत में हुकू की विरासत पितृसत्तात्मक नहीं बल्कि मातृसत्तात्मक थी। नहीं, यह कोई प्रगतिशील कदम नहीं था; बल्कि, इतिहासकार प्रोफेसर ग्लेन पीटरसन ने इसे आर्थिक रूप से संपन्न पिताओं द्वारा अपनी संतानों को शहरी हुकू का दर्जा विरासत में देने के अवसर का उन्मूलन बताया।

पीटरसन ने अपनी पुस्तक ‘ द पावर ऑफ वर्ड्स: लिटरेसी एंड रिवोल्यूशन इन साउथ चाइना, 1949-95’ में लिखा है कि माता के माध्यम से हुकू का दर्जा प्रदान करके, आर्थिक रूप से संपन्न पिताओं को छुटकारा दिलाया गया। उन्हें अपनी संतानों को शहरी हुकू का दर्जा विरासत में देने का अवसर समाप्त कर दिया गया था। … हुकू पर नियंत्रण से राज्य की और से दी जाने वाली सेवाओं – शिक्षा, भोजन, आवास, रोजगार, उपभोक्ता उत्पाद और दूसरे लाभों को कुछ लोगों तक सीमित कर दिया गया है। इसके अलावा, 1959-61 के भीषण अकाल के बाद चीन ने भूमि से कानूनी और स्थायी रूप से बंधे किसानों को देश की अनिश्चित खाद्य आपूर्ति की गारंटी के लिए भी एक साधन की तरह इस्तेमाल किया।

हुकौं वंशानुक्रम को पितृवंशीय बनाने का निर्णय 1998 में लिया गया था।

सैम नन स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के प्रोफेसर डॉ. फी-लिंग वांग ने अपनी चर्चित कृति, ऑर्गेनाइजिंग थ्रू डिवीजन एंड एक्सक्लूजन: चाइनाज हुको सिस्टम (2005) में हुको को ‘जनसंख्या को छोटे-छोटे खंडों में विभाजित कर उसपर नियंत्रण उपाय’ के रूप में वर्णित किया है।

वांग ने लिखा है कि चीन की शाही हुकू प्रणाली एक तरह से संस्थागत बहिष्कार का काम करती थी। स्थान-आधारित जनसंख्या की गतिहीनता के अलावा, विभिन्न कुलीन कुलों, आम लोगों (मुख्य रूप से किसानों) और विभिन्न निम्न-वर्गीय कुलों (दास, खानाबदोश, अछूत जैसे कि कंगाल या वेश्याएं) का वंशानुगत हुकू वर्गीकरण हमेशा बना रहा। अंतिम दो राजवंशों (मिंग और किंग) में, कानूनी रूप से समान आम लोगों को चार वंशानुगत हुकू श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया था।

सैनिक, किसान, व्यापारी और हस्तशिल्प श्रमिक- ये चार भाग थे। उनकी कानूनी स्थिति समान थी, लेकिन कर भार और शाही परीक्षाओं में भाग लेने के अधिकार के साथ-साथ आवागमन के अधिकार के संबंध में उनके साथ अक्सर अलग-अलग व्यवहार किया जाता था। निम्न-वर्गीय कुलों की कई श्रेणियों को और भी बहिष्कृत किया गया था। … हालांकि, वर्तमान पीआरसी हुकू प्रणाली के विपरीत, शाही हुकू प्रणाली ने औपचारिक रूप से अधिकांश आबादी को नहीं, बल्कि मुख्य रूप से सामाजिक रूप से अवांछनीय अल्पसंख्यक या हाशिए के समूहों को बहिष्कृत किया था।”

चीन जनवादी गणराज्य ने जिस जन्म आधारित हुकू प्रणाली को अपनाना और उसे कायम रखा, वह पारंपरिक चीनी विद्वान गुओ टिंगलिन की सलाह पर आधारित है। उन्होंने कहा था, “जब जनता गाँवों में रहती है, तो व्यवस्था बनी रहती है; जब जनता शहरों में उमड़ती है, तो अव्यवस्था फैल जाती है।”

पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में हुकू शासन व्यवस्था असल में एक जातिगत या रंगभेद जैसी व्यवस्था है, जो ‘दो चीन’ का निर्माण करती है।

हुकौं प्रणाली आज भी चीन में प्रचलित है और इसमें कई सुधार हुए हैं। हालाँकि सुधारों के बावजूद मूलभूत विभाजन अभी भी बना हुआ है। आय, शिक्षा और अवसरों में शहरी-ग्रामीण अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। श्रम बाजारों में भेदभाव और पूर्वाग्रही सामाजिक दृष्टिकोण अभी भी सर्वविदित है।

कई अध्ययनों से पता चलता है कि माओ युग की हुकौं नीति ने किसानों को शहरों की जरूरतों को पूरा करने और चीन के औद्योगीकरण के लिए धन जुटाने के लिए एक ही स्थान पर बाँधकर रखा था। ग्रेट लीप फॉरवर्ड और सामूहिकीकरण ने ग्रामीण चीन को और भी अधिक तबाह कर दिया।

दरअसल, सांस्कृतिक क्रांति (1966-76) के दौरान, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘वर्ग प्रणाली’ के माध्यम से वंशानुगत भेदभाव को संस्थागत रूप दिया। परिवारों को उनकी क्रांति-पूर्व संपत्ति या राजनीतिक स्थिति के आधार पर वर्गीकृत किया गया था। जिन्हें ‘वर्ग शत्रु’ घोषित किया गया था, उनका सामाजिक और राजनीतिक महत्व खत्म होने का असर उनके बच्चों पर पड़ा।

चाहे वह सांस्कृतिक क्रांति के दौरान कलंकित “पांच काली श्रेणियां” और सीसीपी-समर्थित “पांच लाल श्रेणियां” हों या हुकू प्रणाली, चीन का अपने ही लोगों के खिलाफ भेदभाव का एक निंदनीय इतिहास रहा है, चाहे वह राजनीतिक विचारों के आधार पर हो या जन्म के आधार पर।

यदि जाति शब्द का प्रयोग चीन की जन्म आधारित भेदभावपूर्ण व्यवस्था के संदर्भ में न किया जाए तो यह बौद्धिक बेईमानी होगी। जाति कोई भारतीय शब्द नहीं है; इसकी उत्पत्ति स्पेनिश और पुर्तगाली शब्द ‘कास्टा’ से हुई है, जिसका अर्थ है ‘नस्ल, वंश, प्रजाति या प्रकार’। स्वयं ‘कास्टा’ शब्द लैटिन शब्द ‘कास्टस’ से आया है, जिसका अर्थ है ‘शुद्ध’। इस शब्द की यूरोपीय उत्पत्ति और जन्म/वंश आधारित शुद्धता यह दर्शाती है कि जाति व्यवस्था किसी न किसी रूप में यूरोप में भी विद्यमान थी। हालाँकि, आधुनिक काल में ‘जाति’ शब्द का इस्तेमाल विशेष रूप से हिंदुओं की जाति व्यवस्था के संदर्भ में ही किया गया है।

भारतीयों ने व्यंग्यात्मक लहजे में ‘चीनी जाति व्यवस्था’ की आलोचना की, वहीं सीसीपी ने इसके काट के लिए अपने मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स का इस्तेमाल किया।

पिछले कुछ दिनों में, भारतीय नेटिजन्स ने चीन के ऐतिहासिक और प्रचलित सामाजिक पदानुक्रमों और संबंधित भेदभाव पर वीडियो, मीम्स और व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के साथ सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर टाइमलाइन पर अपना दबदबा बनाए रखा है।

जैसे ही भारतीयों ने चीन में जन्म के आधार पर मौजूद शहरी-ग्रामीण खाई को उजागर किया, भारत विरोधी दुष्प्रचार फैलाने के लिए कुख्यात सीसीपी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने ‘भारतीय नेटिजन्स का आरोप है कि चीन में ‘जाति व्यवस्था’ है’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया।

ग्लोबल टाइम्स ने भारतीय प्रतिक्रिया को ‘हास्यास्पद’, ‘चीनी ऐतिहासिक संस्कृति को नहीं जाननेवाले, जैसे आरोप लगाते हुए चीनी ‘विशेषज्ञों’ का हवाला देकर खारिज करने की कोशिश की।

ऐसा लगता है कि अब चीन की सत्ताधारी एजेंसियों के साथ-साथ आम भारतीयों ने भी चीन की उस सुनियोजित वैश्विक छवि को धूमिल कर दिया है, जिसमें चीन को एक सामंजस्यपूर्ण और योग्यता-आधारित साम्यवादी समाज दिखलाया जाता था। भारतीय नेटिजन्स ने ‘चीनी जाति व्यवस्था’ पर कई पोस्ट डाली। इसमें चीन की जन्म-आधारित पदानुक्रम प्रणाली को उजागर किया गया, लेकिन ग्लोबल टाइम्स भारतीय व्यंग्य को समझने में विफल रहा।

कई वर्षों तक, चीनी सरकारी मीडिया बॉट्स और इन्फ्लुएंसर्स ने भारत, भारतीयों और भारतीय समाज के बारे में अधूरी सच्चाई, झूठा दुष्प्रचार किया। बांग्लादेश और पाकिस्तान के अनहेल्दी स्ट्रीट फूड के वीडियो को X, फेसबुक, इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर भारतीय बताकर प्रसारित किया, जाति व्यवस्था को अपने तरीके से उठाया। यहाँ तक कि सीसीपी बॉट्स ने ऑनलाइन भारतीयों के खिलाफ नफरत फैलाई।

हालाँकि भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने स्थिति को पूरी तरह पलट दिया। जहाँ एक ओर जाति व्यवस्था को लेकर लगाए गए आरोपों का खंडन करने के लिए चीन की मुखपत्र और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही है, वहीं दूसरी ओर चीन में ऐतिहासिक मुद्दों को उठाकर उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का खेल खेला जा रहा है।

भारत में चल रहे सोशल मीडिया अभियान और चीन की प्रतिक्रिया में ‘जाति’ एक प्रमुख शब्द बन गया है, लेकिन यह सिर्फ जाति या भेदभाव तक सीमित नहीं है। भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने ‘फायरवॉल’ को तोड़ते हुए ऐसे फोटो या वीडियो शेयर किए, जिससे समाज के विभाजन का पता चलता है। चाहे वह गरीबी से जुड़ी वीडियो हों, प्रवासियों की कहानियाँ हों या इसी तरह की जमीनी कहानियाँ हों। यह हास्यास्पद है कि चीन की सरकार भारतीय इंटरनेट यूजर्स से घबरा रही हैं, जो चीन के दुष्प्रचार का जवाब दे रहे हैं। प्रतिदिन 2.5 जीबी इंटरनेट का उपयोग करने वाले भारतीय इंटरनेट यूजर्स दुनिया को चीन की चाल, चरित्र और चेहरे से अवगत करा रही है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘शांति की रक्षा के लिए सामर्थ्य भी जरूरी’: PM मोदी ने कोलकाता में नौसेना को सौंपे 3 ‘मेड इन इंडिया’ युद्धपोत, पढ़ें- कैसे गेमचेंजर होंगे ‘INS अग्रय, दूनागिरी और संशोधक’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (21 जून 2026)  को कोलकाता में आयोजित एक विशेष समारोह में भारतीय नौसेना को तीन अत्याधुनिक स्वदेशी जंगी जहाज INS दुनागिरी, INS अग्रय और INS संशोधक समर्पित किए हैं। ये तीनों पोत पूरी तरह भारत में डिजाइन और निर्मित किए गए हैं और इन्हें नौसेना के बेड़े में शामिल किया जाना ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

इन जंगी जहाजों की खास बात यह है कि तीनों अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैयार किए गए हैं। एक समुद्री युद्ध के लिए, दूसरा पनडुब्बियों से मुकाबले के लिए और तीसरा समुद्र की गहराई तथा समुद्री क्षेत्रों के सर्वेक्षण के लिए बनाया गया है। ऐसे में इनका एक साथ नौसेना में शामिल होना भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता को कई गुना बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है।

पीएम मोदी ने क्या कहा?

कार्यक्रम के दौरान PM मोदी ने कहा, “दुनिया गवाह है कि मैरीटाइम क्षमता के बिना कोई भी राष्ट्र बड़ी शक्ति नहीं बन सकता। समुद्र से विकास जुड़ा है, सुरक्षा जुड़ी है, समृद्धि जुड़ी है।” साथ ही उन्होंने कहा कि आने वाले समय में, क्रिटिकल मिनरल्स, डीप-सी रिसोर्सेज और नई ऊर्जा के स्रोत भी समुद्र से ही जुड़ेंगे।

उन्होंने कहा, “जिस देश का समुद्री सामर्थ्य मजबूत होगा, उसका आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भी उतना ही मजबूत होगा। और भारत इस वास्तविकता को अच्छी तरह से समझता है। भारत इसके लिए स्वयं को तैयार कर रहा है।”

पीएम मोदी ने कहा, “आज INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक उसी यात्रा को नई गति दे रहे हैं। ये तीनों पोत, भारत के तीन महत्वपूर्ण संकल्पों के भी प्रतीक हैं। इनका निर्माण भारत में हुआ है। इनकी डिजाइन भारत में तैयार हुई है। इनके निर्माण में भारतीय उद्योगों की प्रतिभा लगी है। भारतीय इंजीनियरों का कौशल लगा है। भारतीय श्रमिकों का परिश्रम लगा है। और यही नए भारत की सबसे बड़ी ताकत है।”

उन्होंने कहा, “भारत निर्माता बनना चाहता है और जिस दिन निर्माता होंगे ना, उस दिन हम निर्णायक भी होंगे। बीते वर्षों में 40 से अधिक ‘मेड इन इंडिया’ युद्धपोत और पनडुब्बियाँ नौसेना में शामिल हुई हैं। यानी लगभग हर कुछ सप्ताह में भारतीय नौसेना को एक नई शक्ति मिली है। वर्तमान में भी 45 बड़े नौसैनिक प्लेटफॉर्म निर्माणाधीन हैं। यह केवल संख्या नहीं है।”

साथ ही उन्होंने कहा, “अब समय आ गया है कि भारत समुद्री शक्ति के अगले चरण में प्रवेश करे। इसलिए भारत ने शिपबिल्डिंग के क्षेत्र के लिए एक नई दृष्टि के साथ आगे बढ़ना शुरू किया है। हाल के वर्षों में अनेक पॉलिसी रिफॉर्म्स किए गए हैं। घरेलू निर्माण क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष कदम उठाए गए हैं। शिपिंग सेक्टर के लिए 70 हजार करोड़ रुपए का प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया गया है।”

PM मोदी ने कहा, “भारत ने हमेशा से समुद्र को सहयोग का माध्यम माना है। लेकिन भारत ये भी जानता है कि शांति की रक्षा के लिए सामर्थ्य भी उतना ही आवश्यक है। समृद्धि की रक्षा के लिए सुरक्षा आवश्यक है। और भविष्य के निर्माण के लिए आत्मनिर्भरता अनिवार्य है।”

उन्होंने कहा, “आज INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक इसी भावना के प्रतीक बनकर भारतीय नौसेना में शामिल हुए हैं। ये उस भारत के प्रतीक हैं जो 21वीं सदी में अपने सामर्थ्य को पहचान रहा है, जो अपनी क्षमताओं पर विश्वास कर रहा है, और जो दुनिया के सामने नए आत्मविश्वास के साथ तेज गति से ऊर्जा से भरे हुए संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा है।”

क्या है इस कमीशनिंग समारोह का महत्व?

कार्यक्रम का आयोजन कोलकाता के श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट पर किया गया। भारतीय नौसेना के अनुसार यह केवल तीन जहाजों की कमीशनिंग नहीं, बल्कि भारत के बढ़ते स्वदेशी रक्षा निर्माण और नौ सैनिक आधुनिकीकरण का प्रतीक है।

इन जहाजों को भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो ने डिजाइन किया है, जबकि इनका निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता ने किया है। तीनों पोतों में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी मटेरियल का इस्तेमाल किया गया है, जिससे भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता का प्रदर्शन भी होता है।

INS दुनागिरी: दुश्मन को चकमा देने वाला स्टील्थ जंगी जहाज

INS दुनागिरी प्रोजेक्ट-17A के तहत तैयार किया गया पाँचवाँ स्टील्थ फ्रिगेट है। स्टील्थ तकनीक के कारण इसे दुश्मन के रडार पर पहचानना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि इसे भारतीय नौसेना के सबसे आधुनिक जंगी जहाजों में गिना जा रहा है।

इस जंगी जहाज में कई उन्नत हथियार और सेंसर लगाए गए हैं। इसकी सबसे बड़ी ताकत ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जो दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल मिसाइलों में शामिल है। इसके अलावा इसमें मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली भी लगी है।

दुनागिरी सतही युद्ध, वायु रक्षा और पनडुब्बी रोधी अभियानों को एक साथ अंजाम देने में सक्षम है। नौसेना को उम्मीद है कि इसके शामिल होने से समुद्र में भारत की मारक क्षमता और रणनीतिक बढ़त और मजबूत होगी।

INS अग्रय: पनडुब्बियों का काल बनेगा यह जंगी जहाज

INS अग्रय अर्नाला श्रेणी का एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनकी निगरानी करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें नष्ट करना है।

आज के दौर में पनडुब्बियाँ किसी भी देश की नौसेना के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक मानी जाती हैं। ऐसे में अग्रय भारतीय तटीय सुरक्षा को नई मजबूती देगा।

इस जंगी जहाज में हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी रॉकेट लॉन्चर और आधुनिक सोनार प्रणाली लगाई गई है। सोनार तकनीक समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करती है। उथले (shallow) समुद्री इलाकों में यह जहाज विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है।

भारतीय नौसेना के लिए यह जहाज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तटीय क्षेत्रों, बंदरगाहों और रणनीतिक समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभाएगा।

INS संशोधक: समुद्र की गहराइयों का वैज्ञानिक प्रहरी

INS संशोधक एक बड़ा सर्वेक्षण पोत है, जिसे समुद्र की गहराई, समुद्री मार्गों और समुद्र के नीचे की भौगोलिक संरचना का अध्ययन करने के लिए बनाया गया है।

यह जहाज तटीय क्षेत्रों के साथ-साथ गहरे समुद्र में भी सर्वेक्षण करने में सक्षम है। नौसेना के लिए ऐसे सर्वेक्षण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि इनके आधार पर समुद्री नक्शे तैयार किए जाते हैं और नौसैनिक अभियानों की योजना बनाई जाती है।

संशोधक में ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (AUV) और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROV) जैसी आधुनिक तकनीकें मौजूद हैं। इनकी मदद से समुद्र के भीतर जाकर विस्तृत जानकारी जुटाई जा सकती है।

यह जहाज केवल रक्षा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान, बंदरगाह विकास और नागरिक परियोजनाओं में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

तीनों जहाज क्यों हैं भारत के लिए खास?

INS दुनागिरी, अग्रय और संशोधक तीन अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं। दुनागिरी युद्धक क्षमता बढ़ाएगा, अग्रय पनडुब्बी खतरों से सुरक्षा देगा और संशोधक समुद्री जानकारी जुटाने का काम करेगा। यानी एक ही दिन भारतीय नौसेना को युद्ध, सुरक्षा और सर्वेक्षण तीनों क्षेत्रों में नई ताकत मिलने जा रही है। यही कारण है कि इसे भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण का बड़ा कदम मान रहे हैं।

200 से ज्यादा MSME ने निभाई भूमिका

INS दुनागिरी, अग्रय और संशोधक के निर्माण में देशभर के 200 से अधिक छोटे से छोटे और मध्यम उद्यमों (MSME) ने योगदान दिया है। इससे हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला।

रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों और छोटे उद्योगों की भागीदारी बढ़ने से भारत का रक्षा क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक आत्मनिर्भर बन रहा है। यही वजह है कि इन जंगी जहाजों को केवल सैन्य उपलब्धि नहीं बल्कि औद्योगिक सफलता के रूप में भी देखा जा रहा है।

हिंद महासागर में और मजबूत होगी भारत की मौजूदगी

पिछले कुछ सालों में भारत लगातार अपनी समुद्री शक्ति बढ़ाने पर जोर दे रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक चुनौतियों और जियोपॉलिटिकल कॉम्पिटिशन को देखते हुए नौसेना आधुनिक जहाजों और हथियार प्रणालियों को तेजी से अपने बेड़े में शामिल कर रही है।

INS दुनागिरी, INS अग्रय और INS संशोधक की कमीशनिंग इसी रणनीति का हिस्सा है। इनके शामिल होने से भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ेगी, समुद्री निगरानी बेहतर होगी और तटीय सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी।

आत्मनिर्भर भारत की बड़ी सफलता

इन तीनों युद्धपोतों का नौसेना में शामिल होना ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री, भारतीय डिजाइन और भारतीय शिपयार्ड में निर्माण यह साबित करता है कि भारत अब रक्षा क्षेत्र में केवल खरीदार नहीं बल्कि निर्माता के रूप में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

नौसेना, सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के शिपयार्ड, निजी उद्योग और MSME के संयुक्त प्रयासों से तैयार ये तीनों जंगी जहाज भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और समुद्री शक्ति का प्रतीक बन चुके हैं। आने वाले सालों में ये जहाज भारतीय नौसेना को और अधिक सक्षम, आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाएँगे।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026: केवल आसन नहीं, आधुनिक जीवन की बिखरती कड़ियों को जोड़ने का भारतीय सूत्र है योग

दिनचर्या के स्तर पर आए बदलाव, भोजन में परिवर्तन, शारीरिक गतिविधियों में बदलाव और जीवन में स्क्रीन टाइम का बढ़ता प्रभाव, ये कुछ ऐसे परिवर्तन हैं, जो पिछले एक दशक में बहुत तेजी से सामने आए हैं। इससे जहाँ मनुष्य को अनेक क्षेत्रों में लाभ हुआ है, वहीं जीवन में अनेक विकृतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं।

एक तरफ तकनीकी प्रगति हुई है, आर्थिक अवसरों में वृद्धि हुई है, कौशल विकास, वैश्विक संपर्क, उद्यमिता और अनेक क्षेत्रों में विकास हुआ है। वहीं दूसरी ओर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव, सामाजिक संबंधों में दूरी, कार्य और जीवन के संतुलन का बिगड़ना, कई बार पहचान का संकट, मोटापा (Obesity), एंग्जायटी (Anxiety) और डिप्रेशन (Depression) जैसी समस्याएँ भी तेजी से बढ़ी हैं। आज ये सब लगभग सामान्य बातें बनती जा रही हैं।

एक तरफ सब कुछ प्राप्त करने की दौड़ है, तो दूसरी तरफ उसी दौड़ में शामिल होने के दुष्परिणाम भी हैं। ऐसे युग में कुछ तो ऐसा चाहिए, जहाँ मनुष्य अपने मूल से जुड़ा रहे, अपनी जड़ों से स्वयं को जोड़े रखे। ऐसा संतुलन चाहिए, जिससे जीवन में ऊर्जा और समय का सुंदर समन्वय बना रहे।

ऐसी खोज में जब हम निकलते हैं, तो हमें इसका उत्तर अपनी ही परंपरा में मिलता है। वर्षों पहले हमारे ही हिंदू संतों, ऋषियों और मुनियों ने हमें योग का अमूल्य उपहार दिया। यही योग हर प्रश्न का उत्तर है और यही योग हर समस्या का समाधान है।

योग, जिसकी परंपरा वैदिक काल, सिंधु सभ्यता के प्रोटो-शिव (सिंधु सभ्यता की पशुपति मुहर), श्रीमद्भगवद्गीता, बौद्ध एवं जैन परंपराओं से होती हुई महर्षि पतंजलि तथा अनेक योग परंपराओं और पद्धतियों तक विकसित हुई, आज भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ मानव जीवन का मार्गदर्शन कर रहा है। 

जहाँ एक ओर स्वामी विवेकानन्द ने 19वीं शताब्दी में इस परंपरा का विश्व से परिचय कराया, वहीं 21वीं शताब्दी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखकर योग को विश्व के हर कोने तक पहुँचाने का प्रयास किया। आज 21 जून मात्र एक साधारण तिथि नहीं रह गई है, बल्कि वह दिन बन गया है जब सनातन धर्म रूपी वटवृक्ष से निकले अद्भुत फल योग को सम्पूर्ण विश्व हर्षोल्लास के साथ अपनाता और मनाता है।

इस वर्ष विश्व 12वाँ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाएगा। भारत ने इस वर्ष की थीम “Yoga for Healthy Ageing” रखी है। वैसे भी योग प्रत्येक आयु वर्ग के लिए समान रूप से लाभदायक है। इस वर्ष का मुख्य कार्यक्रम भी कोलकाता शहर में आयोजित होगा। लंबे समय तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का केंद्र रहे बंगाल की धरती से योग का यह शंखनाद भारत के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व में भारतीयता की इस महान परंपरा का संदेश देगा।

श्री रामकृष्ण परमहंस, माँ शारदा, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस तथा अनेक योगियों, संतों, क्रांतिकारियों और महर्षियों की यह पावन भूमि इस ऐतिहासिक अवसर की साक्षी बनेगी।

स्वामी विवेकानन्द का वह उद्घोष, “उठो भारत! अपनी आध्यात्मिकता के बल पर सम्पूर्ण विश्व को जीत लो।”,आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। 

विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी ने भी योग को एक नवीन आयाम से देखते हुए उसके मूल अर्थ जोड़ने पर विशेष बल दिया है, जहाँ व्यक्ति को समाज से जोड़ने की बात कही जाती है। आज के समय में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। एक ओर भागदौड़ भरी जीवनशैली, शहरीकरण, गाँवों और छोटे शहरों से महानगरों की ओर पलायन, संकरे फ्लैटों का जीवन और अनजान वातावरण, इन सबने व्यक्ति को भीड़ के बीच भी अकेला कर दिया है। लोग लाखों की संख्या में साथ रहते हैं, फिर भी अपनापन कहीं खो रहा है।

ऐसे वातावरण में व्यक्ति मानसिक शांति, आत्मीय संबंधों और अपनेपन की तलाश में जुटा है। ऐसे समय में व्यक्ति को समाज से जोड़ने का प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। योग के माध्यम से जहाँ आसन, प्राणायाम, सूर्यनमस्कार और विभिन्न क्रियाओं से शारीरिक एवं मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं, वहीं उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति समाज से जुड़ता है। योग से जुड़ना केवल अपने शरीर या स्वास्थ्य से जुड़ना नहीं है, बल्कि अपने आप से, अपने परिवार से, अपने समाज से, अपने राष्ट्र से और अंततः सम्पूर्ण विश्व के कल्याण से जुड़ना है। यही वह संदेश है, जिसे भारत सदियों से सम्पूर्ण विश्व को देता आया है।