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साँप की मिस्ट्री, बाली की ट्रिप और लोहागढ़ का किला: 20 साल की सिया ने 3 बार रची थी मंगेतर केतन को मारने की साजिश, जानिए कैसे पुलिस की पड़ताल में सब पोल खुली

पुणे के दो बिजनेसमैन के बच्चे सिया और केतन जल्द ही शादी के बँधन में बँधने वाले थे। लेकिन सगाई के बाद से ही सिया के मंसूबे कुछ ठीक नहीं थे। वह एक दूसरे लड़के चेतन से प्यार करती थी। अब मंगेतर केतन को बीच से हटाने के लिए उसने हत्या की प्लानिंग शुरू कर दी थी। पहली बार केतन बच गया, लेकिन दूसरी बार सिया और उसके प्रेमी चेतन की फुल प्रूफ प्लानिंग सफल हो गई। लेकिन केतन के परिवार के शक और पुलिस की जाँच ने सिया और उसके प्रेमी चेतन को आखिर पकड़ ही लिया।

यह मामला लव अफेयर का है। 20 साल की सिया गोयल पुणे के मसाला व्यापारी की बेटी है और 24 साल के केतन अग्रवाल के पिता का रीयल एस्टेट में बड़ा नाम है और केतन भी पिता की कंपनी में ही डायरेक्टर था। दोनों की जोड़ी एकदम फिट दिखाई देती थी। दोनों परिवारों के बीच जब से रिश्ता हुआ था तब से घर में खुशियों की लहर थी। पूरा परिवार सिया और केतन की 25 नवंबर 2026 को होने वाली शादी की तैयारियों में जुटा हुआ था। लेकिन इसी बीच उन्होंने केतन को खो दिया।

केतन की मौत को शुरुआत उनकी ही मंगेतर सिया गोयल ने हादसा बताया। सिया के मुताबिक, 18 जून 2026 को लोनावला के पास लोहागढ़ किले में दोनों ट्रेकिंग करने गए थे, तभी केतन अग्रवाल का पहाड़ी से पैर फिसल गया। यह कहानी उसने केतन के परिवार को सुनाई। लेकिन परिवार को यकीन नहीं हुआ, उन्हें शक था कि उनके बेटे की मौत कोई हादसा नहीं बल्कि सोची-समझी हत्या है। बेटे का अंतिम संस्कार करने के बाद केतन का परिवार पुलिस के पास गया, बेटे की हत्या की रिपोर्ट दर्ज करवाई और पुलिस की जाँच में उनका शक सही निकला।

18 जून वाले दिन आखिर क्या हुआ, हादसा या हत्या?

जब केतन के अंतिम संस्कार के चार दिन बाद सिया उनके घर पहुँची। यहाँ सिया की बातचीत केतन की बहन से हुई। केतन की बहन ने सिया से घटना वाले दिन को लेकर कई सवाल किए लेकिन सिया के जवाबों में हिचकिचाहट साफ दिखाई दी। केतन की बहन को सिया पर शक हुआ। यहीं से पुलिस को इस मर्डर मिस्ट्री को सुलझाने में मदद मिली। परिवार की शिकायत पर पुलिस ने घटनास्थल की जाँच शुरू की और सिया के फोन कॉल डिटेल्स भी खंगाली।

सिया के कॉल डिटेल्स में चेतन चौधरी का नाम बार-बार सामने आया। पूछने पर पता लगा कि 22 साल का चेतन उसका बॉयफ्रेंड है। दोनों के बीच जनवरी 2026 से जून तक छह महीने में 2004 कॉल्स हुए हैं। पुलिस के मुताबिक दोनों के बीच 238 घंटे बातचीत हुई है। इतनी लंबी बातचीत ने पुलिस का ध्यान खींचा और दोनों से पूछताछ शुरू की।

सख्ती से पूछताछ में पुलिस को पता लगा कि 18 जून 2026 को ट्रेकिंग के लिए केतन और सिया लोहागढ़ किले गए थे। यहाँ 400 फीट गहरी खाई से सिया और उसके प्रेमी चेतन ने केतन को धक्का दिया था। बाद में केतन का शव खाई से बरामद हुआ था। सबके सामने आ गया कि केतन की मौत कोई हादसा नहीं थी। पुलिस ने सिया को गिरफ्तार कर लिया है।

चेतन की गतिविधियों पर पुलिस को गहराया शक

यहाँ शक पहले सिया पर ही था लेकिन उसका प्रेमी चेतन भी इस हत्या में शामिल है, इसका पता लगाने के लिए पुलिस की चेतन की 18 जून 2026 की संदिग्ध गतिविधियों पर नजर गई। चेतन का फोन का इंटरनेट सुबह 7 बजे से लेकर शाम 5.40 बजे तक बंद था। पुलिस ने इसे जाँच के लिए अहम सबूत की तरह देखा।

पुलिस को पूछताछ में पता लगा कि हत्या वाले दिन चेतन अपना फोन अपनी दुकान पर ही छोड़ गया था। उसने लोकेशन ट्रेसिंग से बचने के लिए ऐसा किया। वह अपने एक कर्मचारी का फोन लोहागढ़ लेकर गया था। इससे सामने आया कि लोहागढ़ किले में हत्या वाले दिन चेतन भी सिया के साथ ही था। पुलिस को ऐसी कई कड़ी हाथ लगी हैं जो चेतन को इस हत्या से जोड़ती हैं।

सीसीवीटी में कैद हुआ आरोपित चेतन (फोटो साभार: dainik bhaskar)

पुलिस की जाँच में यह शक पक्का भी हो गया। पुलिस ने लोहागढ़ किले के टिकट काउंटर का सीसीटवी फुटेज खंगाला। सीसीटवी में केतन और सिया एक साथ दिख रहे हैं लेकिन उनके ठीक कुछ मीटर पीछे एक व्यक्ति भी दिखाई दे रहा है जिसने 33 डिग्री सेल्सियस के तापमान में भी हुडी पहनी हुई थी। वह अपनी पहचान छिपाने की कोशिश कर रहा था। पुलिस की जाँच में सामने आया कि यह व्यक्ति चेतन ही था। पुलिस ने चेतन को गिरफ्तार कर लिया है।

एक बार में नहीं, तीन बार में हत्या की प्लानिंग हुई सफल: साँप मिस्ट्री

पुलिस जाँच में यह भी सामने आया कि सिया और चेतन ने पहले भी दो बार केतन को मारने की साजिश की थी, जिसमें वह फेल हो गए थे। 31 मई 2026 को भी केतन को लोहागढ़ किला ले जाया गया था वहाँ भी केतन को धक्का देने का प्लान बना था। यहाँ केतन को धक्का दिया ही था लेकिन वह झाड़ी पकड़कर बच गया और खुद को बचाने के लिए सिया ने ‘साँप-साँप’ चिल्लाना शुरू कर दिया। यह पहली प्लानिंग फेल हो गई।

इसके बाद 14 जून 2026 को दोबारा लोहागढ़ किला जाना का प्लान सिया ने बनाया। क्योंकि केतन ट्रेकिंग का शौकीन था तो लोहागढ़ किले जैसी जगह जाने के लिए मनाना सिया के लिए मुश्किल नहीं हुआ। लेकिन केतन की माँ ने उसे जाने से मना कर दिया। इसके बाद 18 जून 2026 को सिया ने फिर एक बार वही प्लानिंग को अंजाम दिया और केतन की सबसे प्यारी चीज ट्रेकिंग को ही उसकी मौत की वजह बना दिया।

यह भी पता लगा कि लोहागढ़ किले में केतन अपनी मंगेतर सिया का प्री-बर्थडे सेलिब्रेट करने गया था। वह सिया को कुछ स्पेशल गिफ्ट करने वाला था। लेकिन उससे पहले ही सिया ने पहाड़ से धक्का देकर केतन को मौत के घाट सुला दिया। और सिया अपने प्रेमी चेतन के साथ वापस लौट आई।

केतन के घर में शादी की खुशियाँ मातम में बदली

केतन और सिया की शादी अरेंज थी, जो दोनों परिवारों की सहमति से तय हुई थी। दोनों परिवार शादी से बहुत खुश थे। शादी इसी साल 25 नवंबर को राजस्थान के उदयपुर स्थित एक शाही पैलेस में होने वाली थी। शादी में परिवार ₹17 करोड़ खर्च करने वाला था। मेहमानों के लिए दो चार्टर्ड प्लेन की भी व्यवस्था की गई थी।

लेकिन केतन की हत्या के बाद सिया का असली चेहरा सामने आ गया। केतन के पिता विशाल अग्रवाल ने कहा, “अगर वह (सिया) शादी नहीं करना चाहती थी, तो वह बस मना कर सकती थी, हम तुरंत शादी कैंसिल कर देते। उन्होंने इतना बड़ा और कठोर कदम उठाने का फैसला क्यों किया? उनकी सोच कैसी है? उनकी सोच इतनी बेरहम है कि किसी का 26 साल का बेटा मारा जा सकता है… समाज को ऐसी बेरहम सोच पर ध्यान देने की जरूरत है। यह सोच कहाँ से आती है- उनके परिवार से, उनकी परवरिश से?…”

केतन के पिता ने सरकार से इस केस को फास्ट-ट्रैक करने की अपील की और यह भी माँग की कि अपराधियों को जल्द से जल्द सजा दी जाए। उन्होंने कहा कि अपराधियों को फाँसी की सजा से कम कुछ नहीं मिलना चाहिए।

वहीं केतन की माँ ने कहा, “मेरे बेटे की मौत के लिए सिया और उसका बॉयफ्रेंड जिम्मेदार हैं। सिया ने मुझे धोखा दिया और झूठ बोला। मैं सिया, उसका बॉयफ्रेंड, उसके माता-पिता और बुआ-फूफा के लिए मौत की सजा की माँग करती हूँ।”

जिस सिया के प्यार में पागल था केतन, उसने ही दी मौत

सिया और केतन की बेशक अरेंज मैरिज क्यों न थी, लेकिन केतन अपनी मंगेतर सिया से बहुत प्यार करता था। दोनों की फरवरी 2026 में सगाई हो चुकी थी। सगाई की तस्वीरों में दोनों एक परफेक्ट जोड़ी की मिसाल पेश कर रहे हैं। तस्वीरों में केतन बेहद खुश दिखाई दे रहा है।

सिया औऱ केतन की सगाई की तस्वीरें (फोटो साभार: AajTak)

केतन सगाई के बाद से ही सिया को अपनी पत्नी मान चुका था। उसने सिया को शादी के लिए प्रपोज भी किया था। सामने आई वीडियो में केतन ने सिया के लिए सरप्राइज प्लान किया है। केतन ने सिया के लिए अपनी गाड़ी फूलों से सजाई है जिसे देख सिया खुश होती है और दोनों गले मिलते हैं। ऐसे ही एक वीडियो में एक होटल में केतन अपनी मंगेतर सिया को घुटनों पर बैठकर प्रपोज करता दिख रहा है। दोनों खूब डांस भी करते हैं।

केतन ने सिया के बर्थडे के लिए काउंटडाउन भी शुरू किया था, जिसे सिया ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर भी रीशेयर किया था। केतन के दोस्तों ने बताया कि वह सिया के बर्थडे के लिए काफी उत्साहित था। केतन ने सिया के बर्थडे के लिए महाबलेश्वर के एक लग्जरी रेसॉर्ट में 40 कमरे भी बुक कराए थे। इसके अलावा लोहागढ़ किले पर प्री-वेडिंग फोटोशूट की भी तैयारी चल रही थी।

जहाँ तक तरफ केतन अपना सबकुछ सिया पर लुटाने को तैयार था वहीं सिया मन ही मन केतन को पसंद नहीं करती थी, वह अपने प्रेमी चेतन के साथ जिंदगी बसाने के सपने बुन रही थी। जब शादी से पहले केतन और सिया बाली घूमने जाने वाले थे, तब सिया ने पासपोर्ट खो जाने का बहाना देकर ट्रिप कैंसिल कर दी। क्योंकि उसके दिमाग में केतन को मारने की साजिश चल रही थी। और आखिरकार उसने इस प्यारे रिश्ते और एक होनहार बेटे केतन की जिंदगी छीन ली।

कॉन्ग्रेस की ‘भगवा आतंक’ वाली थ्योरी को किया फेल, दुनिया को आतंकी इशरत का सच बताया: पढ़िए उन RVS मणि के बारे में सब, जिन्हें मोदी सरकार ने दिया पद्म पुरस्कार

केंद्रीय गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकारी आर वी एस मणि को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रीय पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया है। उन्हें सिविल सेवा में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए यह सम्मान दिया गया है। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मु्द्दों पर सिस्टम के अंदर रहकर भी अपनी आवाज बुलंद की, ये उनके साहस का सम्मान है।

कौन हैं आरवीएस मणि

आरवीएस मणि पूर्व आईएएस अधिकारी हैं। वे केन्द्रीय गृह मंत्रालय के पूर्व अवर सचिव रहे। आंतरिक सुरक्षा में एक विशिष्ट सरकारी अधिकारी के रूप में उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने यूके के मैनचेस्टर विश्वविद्यालय से मानव संसाधन विकास में एम.एस.सी और दिल्ली विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की है। वे संस्कृत भाषा के ज्ञाता हैं और उन्हें भगवत गीता और वैदिक ग्रंथों का अच्छा ज्ञान है।

2006-10 तक वे गृह मंत्रालय के आंतरिक सुरक्षा विभाग में तैनात थे। वे एक निजी विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर भी रहे हैं। राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर पाँच पुस्तकें उन्होंने लिखी है। उन्होंने सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद अपनी किताबों को प्रकाशित किया, जिसमें यूपीए सरकार के काले कारनामों का जिक्र है।

‘भगवा आतंकवाद’ की कहानी गढ़ने का किया विरोध

आरवीएस मणि ने तथाकथित ‘भगवा आतंकवाद‘ की अवधारणा को खारिज करते हुए इसे एक सोची‑समझी राजनीतिक साजिश बताया। उन्होंने अपनी आपबीती और आंतरिक सुरक्षा मामलों पर राजनीतिक हस्तक्षेप के खुलासों को अपनी पुस्तक, ‘The Myth of Hindu Terror: Insider Account of Ministry of Home Affairs 2006-2010’ में विस्तार से बताया है।

किताब में उन्होंने कहा है कि 2009 में गृह मंत्रालय में राजनीतिक नेतृत्व ने उन पर ‘भगवा आतंक’ की कहानी गढ़ने वाले दूसरे हलफनामे पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया था। उन्होंने दावा किया कि हिंदुओं को बदनाम करने और उन्हें आतंकवादी बताने की एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश रची गई थी।

उन्होंने किताब में लिखा है कि 2006 में नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में बम विस्फोट के बाद तत्कालीन पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे, कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और गृह मंत्री शिवराज पाटिल बैठे थे और उन्हें बुलाया गया था। मणि से विस्फोट को लेकर सवाल पूछे गए थे, जिसमें उन्होंने खास मजहबी समूह के आतंकी हमलों की जानकारी दी थी। इस जानकारी से वे खुश नहीं थे। उनका कहना है कि उनकी बातचीत में नांदेड़, बजरंग दल आदि के बार-बार संदर्भ थे। उन्होंने कहा है कि नांदेड़ विस्फोट के बाद पहली बार ‘भगवा आतंक’ शब्द का इस्तेमाल किया गया।

किताब में कहा गया है कि मक्का मस्जिद धमाके के मामले में असली आरोपितों को बचाकर निर्दोष लोगों को फँसाया गया, जिन्हें बाद में 2018 में क्लीन चिट मिली। मालेगाँव विस्फोट मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस केस में भी साध्वी प्रज्ञा और एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी पुरोहित को जानबूझकर फँसाया गया। मालेगाँव विस्फोट में सबूत रहते हुए भी उसे दरकिनार कर दिया गया और नैरेटिव को पूरी तरह बदल दिया गया।

यह पहला मौका था जब कथित तौर पर हिंदू संगठनों की भागीदारी की रिपोर्ट मुंबई एटीएस से गृह मंत्रालय को भेजी गई थी और साध्वी प्रज्ञा को मुख्य आरोपी बनाया गया था। वह कहते हैं कि उन्हें पता नहीं है कि मोटरसाइकिल, जो एटीएस के अनुसार प्रमुख साक्ष्य था (जिसकी बाद में व्याख्या हुई कि साध्वी प्रज्ञा द्वारा बेच दी गई थी) को प्लांट किया गया था या नहीं, लेकिन एटीएस द्वारा लगाए गए समय ने कई सवाल खड़े कर दिए थे। उनका कहना है कि मुंबई धमाकों के दौरान एटीएस को गिरफ्तारी करने में 5 महीने से अधिक का समय लगा जबकि मालेगाँव मामले में लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी में केवल 35 दिन लगे।

इशरत जहाँ मामले में जबरदस्ती हलफनामे पर हस्ताक्षर कराया गया-मणि

आरवीएस मणि ने दावा किया कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को जेल भेजने की साजिश रची गई थी। मणि के अनुसार, उन्होंने जो हलफनामा साइन किया था, उसमें खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट शामिल थी, जिसमें इशरत जहां को लश्कर‑ए‑तैयबा से जुड़ा बताया गया था। उनका कहना है कि इशरत जहाँ और उसके साथ मौजूद लोगों का उद्देश्य तत्कालीन गुजरात सरकार के शीर्ष नेतृत्व यानी मोदी और शाह को निशाना बनाना था।

मणि ने यूपीए सरकार के दौरान इशरत जहाँ मामले में दाखिल 2 अलग-अलग तरह के हलफनामे को उजागर करने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने दावा किया कि पहले हलफनामे में इशरत जहाँ को लश्कर ए तैयबा का ‘कार्यकर्ता’ बताया गया था, जो आतंकी मॉड्यूल का हिस्सा थी और भारत में बड़े बड़े नेताओं को अपना निशाना बनना चाहती थी।

यह हलफनामा खुफिया एजेंसी के रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया था। इसमें इशरत जहाँ के आतंकी बैकग्राउंड के बारे में जानकारी दी गई थी। दूसरा हलफनामा कुछ हफ्ते बाद दाखिल किया गया, जिसमें खुफिया जानकारी नदारद थे और गुजरात पुलिस की कार्रवाई का भी इससे कोई लेना-देना नहीं था। यह तत्कालीन यूपीए सरकार ने बनवाया था और इस पर मणि को राजनीतिक दबाव में हस्ताक्षर करने पड़े थे।

उन्होंने ‘डिसेप्शन ए फैमिली दैट डिसीव्ड द होल नेशन’, ‘भगवा आतंक एक षड्यंत्र’ और दलाल जैसी किताबें में इनसब की विस्तार से चर्चा की है। आरवीएस मणि ने यह भी कहा कि 2004 में अहमदाबाद के पास हुई घटना को गलत तरीके से एनकाउंटर बताया गया, जबकि वह एक क्रॉस‑फायर की स्थिति थी, जिसमें पहले गोली दूसरी ओर से चलाई गई थी।

उनके अनुसार, इशरत जहाँ के साथ दो और लोग थे जो अवैध तरीके से सीमा पार कर पाकिस्तान से भारत में घुसे थे, लेकिन तत्कालीन सरकार ने राजनीतिक कारणों से उसे निर्दोष और ‘बिहार की बेटी’ बताने की कोशिश की। ये लोग इशरत जहाँ के साथ एनकाउंटर में मारे गए। इशरत जहाँ एक आतंकवादी थी, इसकी पुष्टि बाद में मुंबई हमले का मास्टरमाइंड डेविड कोलमैन हेडली ने भी किया था।

मणि ने अपनी किताब में यूपीए शासन के दौरान आतंकी जाँच में किस तरह से राजनीतिक हस्तक्षेप किया जाता था, उसकी भी चर्चा की है। मणि ने उस समय के सीबीआई निदेशक के एक कथित बयान के बारे में बताया है कि ‘काली दाढ़ी’ और ‘सफेद दाढ़ी’ को जेल भेजने की बात कही गई थी। उनका दावा है कि यह इशारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की ओर था।

केरल में एलोहिम ग्लोबल वर्शिप सेंटर के पादरी बिनु वझामुट्टोम पर नाबालिगों से मारपीट, बंधक बनाकर जबरदस्ती काम कराने के आरोप: ईसाई नेता के खिलाफ सड़क पर उतरे लोग

केरल के पथानामथिट्टा में 21 जून 2026 को भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने ओमल्लूर स्थित एलोहीम ग्लोबल वर्शिप सेंटर के बाहर प्रदर्शन किया। यह केंद्र पादरी बिनू वझामुट्टोम द्वारा चलाया जाता है। बीजेपी कार्यकर्ताओं ने पादरी की गिरफ्तारी की माँग की।

उन पर आरोप है कि उनकी संस्था द्वारा संचालित स्नेहथानल में नाबालिगों और अन्य लोगों के साथ मारपीट की गई, उन्हें अवैध रूप से रखा गया और उनसे काम करवाया गया।

जब बीजेपी कार्यकर्ता पादरी की गिरफ्तारी की माँग करते हुए नारे लगा रहे थे, उसी दौरान चर्च के अनुयायी साप्ताहिक प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए वहाँ पहुँच गए। प्रदर्शन कर रहे लोगों ने उन्हें केंद्र के अंदर जाने नहीं दिया और पादरी के खिलाफ नारेबाजी की, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हो गई।

पादरी के समर्थकों ने हाथों में बाइबल उठाकर कहा कि उन्हें प्रार्थना करने के लिए अंदर जाने दिया जाए क्योंकि यह उनका अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी व्यक्ति पर आरोप हैं तो उनका फैसला कानूनी प्रक्रिया के जरिए होना चाहिए, न कि मजहबी कार्यक्रमों को रोककर।

कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुबह से ही केंद्र के आसपास अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया था। स्थिति को संभालने के लिए पुलिस ने बीच में हस्तक्षेप किया और पादरी के समर्थकों को सुरक्षा के साथ प्रार्थना हॉल के अंदर पहुँचाया, जिसके बाद प्रार्थना सभा जारी रह सकी।

पास्टर बिनु वझमुट्टोम ने कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर के साथ साझा किया था मंच

पादरी बिनू वझामुट्टोम से जुड़े विवाद के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर की कुछ पुरानी तस्वीरें फिर से साझा की जाने लगीं, जिनमें दोनों एक मंच पर साथ दिखाई दे रहे हैं। मार्च 2024 में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर शशि थरूर ने लिखा था कि उन्होंने एलोहीम ग्लोबल वर्शिप सेंटर जाकर पादरी बिनू से मुलाकात की और उनके निमंत्रण पर वहाँ मौजूद लोगों को संक्षिप्त रूप से संबोधित भी किया।

एलोहीम ग्लोबल वर्शिप सेंटर के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर पादरी बिनू वझामुट्टोम की ओर से आयोजित और संचालित प्रार्थना सभाओं के कई वीडियो मौजूद हैं। कुछ लोगों का आरोप है कि ऐसी प्रार्थना सभाओं का इस्तेमाल कमजोर और संवेदनशील हिंदुओं को ईसाई मजहब अपनाने के लिए प्रभावित करने के उद्देश्य से किया जाता है।

(साभार: Youtube)

17 साल के लड़के की शिकायत से सामने आया था उत्पीड़न का मामला

पादरी बिनू वझामुट्टोम से जुड़ा विवाद तब शुरू हुआ जब इडुक्की जिले के कट्टप्पना के पास अनक्कारा के रहने वाले 17 साल के एक लड़के ने चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट (CPU) से संपर्क किया। लड़के ने आरोप लगाया कि पथानामथिट्टा स्थित संस्था में रहने के दौरान उसके साथ मारपीट की गई और उससे जबरन काम कराया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उसे शिक्षा, रहने की सुविधा और रोजगार से जुड़ी ट्रेनिंग देने का वादा करके संस्था में लाया गया था। विवाद सामने आने के बाद पादरी का एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें वह किशोर को नौकरी आधारित शिक्षा और रहने की व्यवस्था देने का भरोसा देते दिखाई दिए।

बताया गया कि पीड़ित करीब तीन महीने तक उस केंद्र में रहा। अपनी शिकायत में उसने कहा कि उसकी पढ़ाई प्रभावित होने लगी और उससे बार-बार संस्था में काम कराया जाने लगा, जिसके बाद उसने प्रबंधन से सवाल करना शुरू किया। आरोप है कि बाद में प्रबंधन ने उस पर चोरी का आरोप लगाया और डंडे से उसकी पिटाई की।

पीड़ित के परिवार का यह भी आरोप है कि संस्था चलाने वाले लोग बच्चों को डराने और नियंत्रण में रखने के लिए पेपर स्प्रे का इस्तेमाल करते थे। परिवार के मुताबिक, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के कारण किशोर को गंभीर मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा।

FIR दर्ज, तीन स्टाफ सदस्य गिरफ्तार

लड़के की शिकायत के आधार पर कट्टप्पना पुलिस ने शुरुआत में संस्था के मैनेजर रेजी और स्टाफ सदस्य सिजो और बेनी के खिलाफ मामला दर्ज किया। बाद में यह मामला एलावुमथिट्टा पुलिस को सौंप दिया गया। पुलिस ने 20 जून को पथानामथिट्टा बस स्टैंड के पास से तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

आरोपितों पर मारपीट, अवैध रूप से बंधक बनाकर रखने, बाल मजदूरी कराने और किशोर न्याय अधिनियम के उल्लंघन से जुड़े प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है। इसी बीच 15 साल के एक अन्य लड़के की शिकायत के आधार पर अलग मामला भी दर्ज किया गया, जिसमें उसने भी अपने साथ मारपीट होने का आरोप लगाया।

इडुक्की की एक पूर्व कर्मचारी ने भी शिकायत दर्ज कराई और आरोप लगाया कि पादरी बिनू वझामुट्टोम ने उसे धमकी दी थी। इसी महिला ने 17 साल के लड़के के परिवार को उत्पीड़न की जानकारी दी थी। महिला ने अपने और अपने बच्चों की सुरक्षा की माँग करते हुए पादरी के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। वहीं संस्था के कामकाज को लेकर सामाजिक न्याय विभाग भी जाँच कर रहा है।

CWS ने गंभीर अनियमितताओं की ओर किया इशारा

विवाद सामने आने के बाद चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) ने आरोपों की जाँच की। जाँच के दौरान ऐसे संकेत मिले कि संस्था में रह रहे अन्य लोगों के साथ भी उत्पीड़न और शोषण हुआ हो सकता है। पथानामथिट्टा सीडब्ल्यूसी की अध्यक्ष लीना सुभाष ने कहा कि संस्था में लोगों को अवैध रूप से रखा जा रहा था।

उन्होंने बताया कि वहाँ तीन बच्चे मिले और खराब हालत में मिली एक महिला और उसके शिशु को भी वहाँ से सुरक्षित निकाला गया।

उन्होंने कहा, “हमें यह भी जानकारी मिली है कि एक दूसरी महिला और उसका बच्चा भी यहाँ रह रहे थे। उन्हें भी तलाशना जरूरी है। जिस 17 साल के लड़के को हमने वहाँ से निकाला, उसके शरीर पर चोट के निशान थे। उन्होंने बयान दिया है कि उनके साथ मारपीट की गई, उनसे काम कराया गया और उन्हें कोई भुगतान नहीं किया गया।”

अब अधिकारी यह जाँच कर रहे हैं कि क्या वहाँ रह रही अन्य महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के साथ भी इसी तरह का व्यवहार किया गया था।

पंचायत अध्यक्ष ने कहा- रह रहे लोगों ने की मारपीट की शिकायत

चेन्नीरक्करा ग्राम पंचायत की अध्यक्ष कोचू मोल कोशी ने कहा कि वहाँ रह रहे लोगों के बयान से पता चलता है कि स्नेहथानल वृद्धाश्रम में लगातार उत्पीड़न होता था। उन्होंने बताया कि जब अधिकारी वहाँ पहुँचे, उस समय संस्था में 21 लोग रह रहे थे। इनमें से दो लोगों को हर दिन काम कराने के लिए पादरी के घर ले जाया जाता था।

कोशी ने कहा, “वहाँ रहने वाले लोगों ने बताया कि उनके साथ मारपीट की जाती थी। वहाँ मौजूद सभी बुजुर्ग महिलाओं ने हमें बताया कि उन लड़कों को पीटा जाता था। जो महिला वहाँ सफाई का काम करती थी, उसके साथ एक छोटा बच्चा भी था। उसे अपने बच्चे की देखभाल तक करने नहीं दी जाती थी और उससे पूरे समय काम कराया जाता था।”

अधिकारी अब उस दूसरी महिला और बच्चे की भी तलाश कर रहे हैं, जिनके बारे में बताया गया है कि वे भी संस्था में रह रहे थे।

पादरी ने आरोपों से किया इनकार, साजिश का लगाया आरोप

पादरी बिनू वझामुट्टोम ने 21 जून 2026 को मलयालम में एक वीडियो जारी कर कहा कि उन्हें किसी भी तरह के उत्पीड़न की जानकारी नहीं थी। उन्होंने कहा कि उनकी जानकारी के अनुसार यह मामला बच्चों के बीच हुए किसी विवाद से जुड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि मामला अदालत में है, इसलिए वह इस पर ज्यादा जानकारी साझा नहीं कर सकते।

उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि वह कहीं छिप गए थे। पादरी ने दावा किया कि उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है और यह पूरा विवाद उसी का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि जो भी दोषी पाया जाएगा, उसे कानून के तहत अधिकतम सजा मिलनी चाहिए, लेकिन उनके और संस्था के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं।

उन्होंने आगे कहा कि स्नेहथानल पिछले पाँच साल से चल रहा है। उन्होंने विदेशी फंड लेने या संस्था के नाम पर चंदा जुटाने की बात से इनकार किया और दावा किया कि संस्था उनके मंत्रालय और एलोहीम ग्लोबल वर्शिप सेंटर से मिलने वाले पैसों से चलाई जाती है।

वझामुट्टोम ने ओमल्लूर पंचायत अध्यक्ष अथिरा पर भी व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण झूठे बयान देने का आरोप लगाया और कहा कि वह वकीलों से सलाह लेने के बाद कानूनी कार्रवाई करेंगे। मामले की आगे जाँच जारी है। पुलिस और बाल कल्याण विभाग के अधिकारी पूर्व निवासियों और स्टाफ के बयान दर्ज कर रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या संस्था में और लोगों के साथ भी मारपीट, जबरन काम, अवैध रूप से रोके रखने या किसी अन्य तरह के शोषण की घटनाएँ हुई थीं।


महरंग बलोच पर मलाला का मौन… अफगान महिलाओं के लिए मंच-मंच भाषण, लेकिन पाकिस्तानी फौज के बलोचों के दमन पर नोबेल विजेता खामोश क्यों?

पाकिस्तान में अत्याचारों का कोई अंत नहीं होता है। बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन के खिलाफ संघर्ष करने वाली बलोच याकजेहती कमेटी (BYC) की मुखिया महरंग बलोच को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। जिस डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप के बदले जनता की आवाज को हथियार बनाया था, जिसे टाइम मैगजीन ने 2024 में ‘TIME100 नेक्स्ट’ में शामिल किया था और BBC ने 100 सबसे प्रेरणादायक महिलाओं में जगह दी थी उसे उम्रभर के लिए जेल में डाल दिया।

तभी से सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक गूँज रहा है… लेकिन तब दुनिया के कोने-कोने से मानवाधिकार का झंडा उठाने वाली नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला युसूफजई की टाइमलाइन पर सन्नाटा है। हाँ, उन्हें फिक्र है तो अफगानिस्ता की, तालिबान की और वहाँ की महिलाओं की.. बाकी उनके खुद के मुल्क में महिलाओं के साथ जो होता हो वो होता रहे, उस पर कोई चिंता नहीं।

महरंग बलोच: ‘बलूचिस्तान की शेरनी’

महरंग बलोच को समझना हो तो पहले बलूचिस्तान को समझना होगा। पाकिस्तान का यह सबसे बड़ा प्रांत दशकों से ‘एनफोर्स्ड डिसअपियरेंस’ यानी सरकारी तंत्र द्वारा लोगों के जबरन गायब कर दिए जाने की त्रासदी झेल रहा है। महरंग के अब्बू अब्दुल गफ्फार लंगोव खुद इस तंत्र के शिकार हुए। जब महरंग मात्र 16 साल की थी तब 2009 में उनके अब्बू को हिरासत में ले लिया गया। तभी से इस लड़की ने विरोध को अपनी जिंदगी बना लिया।

बलोच मेडिकल कॉलेज से MBBS की पढ़ाई करते हुए भी महरंग सड़कों पर रही। उनके अब्बू का तो शव कुछ समय बाद मिल गया और तब से उन्होंने BYC के बैनर तले लॉन्ग मार्च निकाले, धरने दिए और हजारों लापता बलोचों के परिजनों की आवाज बनीं।

जुलाई 2024 में ग्वादर में हुए ‘राजी मुची’ बलोच राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान हुई हिंसा में फ्रंटियर कॉर्प्स के एक सिपाही शब्बीर बलोच की मृत्यु हो गई। पाकिस्तानी सरकार ने इसका ठीकरा महरंग पर फोड़ा। मार्च 2025 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। फिर ट्रायल को खुली अदालत से जेल ट्रायल में बदला और फिर उन्हें उम्रकैद मिली। लेकिन इस पर दुनियाभर में महिला अधिकारों की झंडाबरदार मलाला युसूफजई खामोश हैं।

मलाला के मौन पर सवाल

आप में से कई लोग इस नाम से परिचित होंगे, जो नहीं जानते होंगे उन्हें बताएँ कि मलाला आतंक के खिलाफ महिलाओं की आवाज का कथित प्रतीक हैं। मलाला यूसुफजई का जन्म 12 जुलाई 1997 को पाकिस्तान की स्वात घाटी में हुआ था।। जब तालिबान ने स्वात पर कब्जा किया और लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी लगाई, तब ग्यारह साल की मलाला ने BBC उर्दू के लिए ‘गुल मकई’ नाम से डायरी लिखनी शुरू की। अक्टूबर 2012 में तालिबान के एक बंदूकधारी ने उनके स्कूली बस में उन्हें गोली मार दी। मलाला बचीं और ब्रिटेन में इलाज के बाद महिला अधिकारों की आवाज बन गईं। 2014 में महज 17 साल की उम्र में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला।

अब वह महिलाओं के लिए आवाज तो उठाती हैं लेकिन कहा जाता है कि तभी तक जब तक कि उनकी अपनी छवि को कोई नुकसान न हो? मार्च 2025 में जब महरंग को पहली बार गिरफ्तार किया गया था, तब मलाला ने कहा था, “मैं महरंग बलोच की हिरासत को लेकर परेशान और चिंतित हूँ, यह उनका अधिकार है कि वे आवाज उठाएँ। उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।” यह सराहनीय था।

लेकिन 22 जून 2026 को जब उम्रकैद की सजा सुनाई गई, जब दुनियाभर के मानवाधिकार संगठन बोल उठे, जब BYC ने इसे ‘बलोच राष्ट्र के प्रति नफरत की अभिव्यक्ति’ कहा तब मलाला की आवाज कहाँ थी? दूसरी तरफ अफगानिस्तान की महिलाओं के लिए मलाला की आवाज निरंतर और मुखर है। वे तालिबान को ‘जेंडर अपार्थेड’ का दोषी कहती हैं, UN में भाषण देती हैं, हार्वर्ड में सेमिनार करती हैं। यह काम जरूरी है और इसकी तारीफ होनी चाहिए। लेकिन एक सवाल अनुत्तरित रहता है कि अफगानिस्तान की महिलाओं पर तालिबान का जुल्म जितना बड़ा मुद्दा है, क्या बलोचिस्तान में राज्य-प्रायोजित गुमशुदगियाँ, बलोच महिलाओं की पुकार और एक डॉक्टर-एक्टिविस्ट की उम्रकैद उतना बड़ा मुद्दा नहीं?

इससे और आगे बढ़ें तो पाकिस्तान में हर साल हजारों हिंदू और ईसाई लड़कियों का अपहरण कर जबरन धर्म-परिवर्तन और शादी करवाई जाती है। संयुक्त राष्ट्र के 2025 के विश्लेषण के अनुसार, इन मामलों में 75% पीड़ित हिंदू महिलाएँ हैं और 80% मामले सिंध प्रांत से हैं।

मलाला ने कभी सीधे पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों के जबरन धर्म-परिवर्तन को नाम लेकर नहीं कोसा। जब एक ट्विटर यूजर ने उनसे इन लड़कियों के लिए आवाज उठाने की गुजारिश की, तो मलाला ने उन्हें ब्लॉक कर दिया। यहाँ सवाल चुनाव का है। जब मलाला तालिबान को ‘जेंडर अपार्थेड’ का मुजरिम कहती हैं तो वे सही हैं। लेकिन जब उसी पाकिस्तान में हिंदू बच्चियों को उठाकर उनकी जिंदगी तबाह की जाती है और जब एक बलोच डॉक्टर को उम्रकैद की सजा मिलती है तो यही मलाला क्यों चुप हो जाती हैं?

अफगानिस्तान की महिला पर बोलना आसान है क्योंकि तालिबान उनकी दुश्मन है, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय उनकी बात सुनता है और वहाँ उन्हें नहीं जाना है तो कोई बड़ा राजनीतिक जोखिम नहीं है। लेकिन पाकिस्तान की फौज के खिलाफ बलोचों के दमन पर बोलना, वहाँ की हिंदू अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए लड़ना यह राजनीतिक रूप से जोखिमभरा है। और शायद यही कारण है कि मलाला की आवाज वहाँ पहुँचते-पहुँचते दब जाती है।

कभी ग्रीस से लेकर गंगा तक थी दहाड़, अब सिर्फ गिर तक सीमित क्यों हैं एशियाई शेर?: पढ़ें विलुप्ति के कगार से जंगलों पर फिर से राज करने का सफर

जूनागढ़ से अमरेली की ओर जाने वाले रास्ते पर सुबह के वक्त जब हवा में रात की ठंडक बाकी हो, मालधारियों के नेसड़ों (बस्तियों) से धुआँ उठ रहा हो और पेड़ों की छाँव में बैठे मालधारियों के पास ही किसी खेत की आड़ में शेरनी अपने बच्चों के साथ आराम कर रही हो, तो यह नजारा दुनिया के अधिकाँश हिस्सों में असंभव माना जाएगा। अफ्रीका के कई क्षेत्रों में शेर और इंसान के बीच की दूरी जितनी ज्यादा हो, उतना अच्छा माना जाता है, लेकिन गुजरात के गिर और उसके आसपास के इलाकों में सदियों से एक अलग ही कहानी लिखी जा रही है। यहाँ शेर और इंसान न सिर्फ एक जमीन साझा करते हैं, बल्कि वे एक ही पर्यावरण के भागीदार बनकर जीते आए हैं।

आज दुनिया में अगर कोई जंगलों में खुलेआम घूमते हुए एशियाई शेरों को देखना चाहता है, तो उसे गुजरात के काठियावाड़ (सौराष्ट्र) में आना पड़ता है। गिर और उसके आसपास के इलाकों के अलावा पूरी दुनिया में इस प्रजाति का प्राकृतिक अस्तित्व कहीं नहीं है। लेकिन यह बात जितनी गौरव की है, उतनी ही हैरान करने वाली भी है, क्योंकि एक समय ऐसा था जब एशियाई शेर सिर्फ गुजरात में ही नहीं, बल्कि उत्तर अफ्रीका से लेकर पश्चिम एशिया और भारत के विशाल क्षेत्रों में पाए जाते थे।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)

फिर ऐसा क्या हुआ कि वे पूरी दुनिया से गायब हो गए? और सबसे जरूरी बात कि जब हर जगह से उनका अस्तित्व मिट रहा था, तब ‘गांडी गिर’ (घने गिर) में ही वे कैसे बच सके? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें सिर्फ गिर के जंगलों में नहीं, बल्कि हजारों साल पुराने इतिहास में पीछे जाना होगा।

एक समय ग्रीस से गंगा तक गरजते थे एशियाई शेर

आज शेरों का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के मन में अफ्रीका के सवाना के दृश्य सामने आते हैं, लेकिन इतिहास का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसमें एशियाटिक शेरों का साम्राज्य भी उतना ही विशाल था। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि शेरों की उत्पत्ति यूरोप में हुई थी और इसके बाद वे एशिया माइनर की तरफ फैले। हजारों साल पहले एशियाई शेर उत्तर अफ्रीका के भूमध्य सागर के तट से लेकर ईरान, इराक और पूरे उत्तर भारत तक पाए जाते थे।

भारतीय उपमहाद्वीप में उनका क्षेत्र आज के गुजरात से बहुत आगे तक फैला हुआ था। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश के हिस्सों में भी शेरों की मौजूदगी दर्ज थी। महाभारत काल के वर्णनों में शेरों का उल्लेख मिलता है। भगवान बुद्ध के समय से पहले तो वे सिंध से लेकर बिहार तक के क्षेत्रों में घूमते हुए माने जाते हैं। मौर्य और गुप्त काल के दौरान शेर राजसत्ता और शक्ति का प्रतीक थे। आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक माना जाने वाला अशोक स्तंभ के चार शेर इसी परंपरा की याद दिलाते हैं।

भारतीय संस्कृति में शेर सिर्फ एक जानवर नहीं था। देवी दुर्गा का वाहन शेर है। कई शिल्पों में शेर का विशेष स्थान है और प्राचीन साहित्य में वह शौर्य और पराक्रम के रूपक के रूप में बार-बार दिखाई देता है। एक तरह से देखें तो शेर भारतीय सभ्यता की कल्पना में हजारों साल से मौजूद रहा है, लेकिन प्रकृति के इतिहास में गौरव हमेशा अस्तित्व की गारंटी नहीं देता।

…जब विलुप्ति की कगार पर पहुँच गए थे एशियाई शेर

19वीं सदी तक पहुँचते-पहुँचते एशियाई शेरों के लिए स्थिति भयानक हो गई थी। एक तरफ बढ़ता शिकार और दूसरी तरफ घटते जंगल। राजाओं-नवाबों, महाराजाओं और ब्रिटिश अधिकारियों के लिए शेर का शिकार प्रतिष्ठा का विषय बन गया था। उस समय की तस्वीरों और वर्णनों में शेर के शिकार को एक गौरवपूर्ण उपलब्धि के रूप में पेश किया गया है।

सिर्फ शिकार ही जिम्मेदार नहीं था। खेती का दायरा बढ़ा, इंसानी बस्तियाँ फैलीं, जंगल कटे और शेरों के प्राकृतिक आवास सीमित होते गए। बड़े शिकारी जानवरों के लिए सबसे बड़ी जरूरत इलाके की होती है। जैसे-जैसे यह इलाका घटता गया, वैसे-वैसे उनकी संख्या भी घटती गई।

नतीजे में एक समय ऐसा भी आया जब पूरी दुनिया में एशियाई शेरों की आखिरी उम्मीद सिर्फ गिर के जंगल ही बचे। 19वीं सदी के अंत में उनकी संख्या इतनी कम हो गई थी कि कुछ अनुमानों के अनुसार केवल एक दर्जन शेर ही बचे रह गए थे। एक प्रजाति, जिसने हजारों साल तक विशाल भूभाग पर राज किया था, अब विलुप्ति की कगार पर खड़ी थी।

लेकिन यहाँ से कहानी में एक अप्रत्याशित मोड़ आता है; क्योंकि गिर सिर्फ एक जंगल नहीं था, वह उससे भी कहीं बढ़कर था।

आखिरकार गिर में ही क्यों बचे शेर?

इस सवाल का सबसे सीधा जवाब देना हो तो कहा जा सकता है कि गिर में शेरों को जीने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मिलीं, लेकिन यह जवाब अधूरा है। हकीकत में गिर की सफलता किसी एक कारण का परिणाम नहीं है, यह कई कारकों के संयोग से बनी गाथा है।

गिर में पानी था, गिर में जंगल थे, गिर में शिकार के लिए जानवर थे, लेकिन यह सब तो दूसरे कई इलाकों में भी था। गिर को अनोखा बनाने वाली बात यह थी कि यहाँ पूरा इकोसिस्टम लंबे समय तक टिका रह सका।

गिर के जंगलों को अक्सर एक ही प्रकार के जंगल के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तव में यहाँ कई प्रकार की वनस्पतियाँ और जमीन देखने को मिलते हैं। सूखे पतझड़ वाले जंगल, कँटीले वन, घास के मैदान, नदी किनारे के इलाके और खुले मैदान मिलकर एक ऐसा पर्यावरणीय तालमेल बनाते हैं, जिसे बड़े शिकारी जानवरों के लिए आदर्श माना जाता है। शेरों को सिर्फ आश्रय ही नहीं बल्कि शिकार भी चाहिए और गिर के पास इसकी भी कोई कमी नहीं थी।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Bing)

चीतल, सांभर और नीलगाय: शेरों के साम्राज्य का आधार

किसी भी शेर की दहाड़ के पीछे एक पूरी खाद्य श्रृंखला (फूड चेन) काम कर रही होती है। अगर जंगल में पर्याप्त शिकार न हो, तो शेर लंबे समय तक टिक नहीं सकते। गिर की सबसे बड़ी ताकतों में से एक यहाँ की समृद्ध शिकार आबादी रही है।

चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली सूअर, चिंकारा और चौसिंगा जैसी प्रजातियों ने गिर के पर्यावरण को जीवित रखा। सालों के दौरान इन प्रजातियों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। खासतौर पर चीतल की आबादी में हुई वृद्धि गिर के पूरे इकोसिस्टम के लिए निर्णायक साबित हुई। जहाँ एक समय उनकी संख्या हजारों में थी, वहीं बाद के दशकों में वह कई गुना बढ़ गई।

शेरों की सफलता के पीछे ये मूक नायक हैं, क्योंकि किसी भी शिकारी का भविष्य उसके शिकार के भविष्य से ही जुड़ा होता है। लेकिन अभी भी गिर की सबसे बड़ी ताकत की बात बाकी है और शायद वही इस पूरी गाथा का दिल है।

गिर का दिल: मालधारियों और शेरों के बीच सह-अस्तित्व

अगर गिर के शेरों की सफलता की कहानी से जंगलों को हटा दिया जाए, तो भी ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। अगर शिकार वाले जानवरों को हटा दिया जाए, तो धीमा-धीमा कुछ कम होने का अहसास होता रहेगा। लेकिन अगर इस कहानी से मालधारी लोगों को निकाल दिया जाए, तो शायद गिर को समझना ही असंभव हो जाएगा।

गिर के जंगलों में सदियों से एक ऐसा समाज रहता है, जिसकी जीवनशैली, संस्कृति और अस्तित्व ही पशुपालन से जुड़ा हुआ है। इन्हें हम मालधारी के नाम से जानते हैं। गिर के अंदर और आसपास स्थित उनके आवासों को ‘नेस’ (नेसडा) कहा जाता है। बाहर से आने वाले व्यक्ति के लिए यह सिर्फ कुछ घरों और मवेशियों का समूह लग सकता है, लेकिन वास्तव में ये नेस गिर के सामाजिक और सांस्कृतिक पर्यावरण का अभिन्न हिस्सा हैं।

दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में शेर और इंसान के बीच का रिश्ता संघर्ष का होता है। अफ्रीका के कई देशों में शेरों द्वारा मवेशियों के शिकार के कारण स्थानीय लोगों में नाराजगी देखी जाती है। कई जगहों पर शेरों और इंसानों के बीच का संघर्ष इतना बढ़ जाता है कि दोनों में से किसी एक को पीछे हटना पड़ता है, लेकिन गिर में दशकों नहीं, बल्कि सदियों से एक अलग ही व्यवस्था विकसित होती रही। यहाँ मालधारी और शेर एक-दूसरे की मौजूदगी को जीवन के स्वाभाविक हिस्से के रूप में स्वीकार करते आए हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि यहाँ कभी नुकसान नहीं होता। शेर मवेशियों का शिकार भी करते हैं और मालधारियों को आर्थिक नुकसान भी होता है, लेकिन इसके बावजूद गिर में शेरों के प्रति जो नजरिया देखने को मिलता है, वह दुनिया के अन्य कई इलाकों से अलग है। शायद इसकी वजह यह है कि गिर के लोगों के लिए शेर बाहर से आया हुआ कोई खतरा नहीं है। वह इस जमीन का उतना ही पुराना निवासी है, जितने वे खुद हैं।

गिर के पुराने मालधारियों से बात करें तो वे शेरों के बारे में इस तरह बातें करते हैं जैसे किसी दूर के जंगली जानवर के बारे में नहीं, बल्कि सालों से जानने वाले पड़ोसी के बारे में बात कर रहे हों। उनके लिए शेर के प्रति नजरिया डर और सम्मान के अनोखे मिश्रण से बना है। वे जानते हैं कि शेर ताकतवर है, खतरनाक भी हो सकता है, लेकिन साथ ही वे यह भी जानते हैं कि शेर का सम्मान करना पड़ेगा, वह देव-प्राणी है और जंगलों का खुद से बना राजा भी। शेरों का बर्ताव कैसा होता है, उनकी हलचल कैसी होती है और किस परिस्थिति में सावधान रहना चाहिए, यह भी ‘गांडी गिर’ के मालधारियों को सिखाना नहीं पड़ता।

शायद यही वजह है कि गिर में इंसान और शेर के बीच का सह-अस्तित्व सिर्फ नीतियों या कानूनों से नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे अनुभव और आपसी समझ से टिका हुआ है।

इस सह-अस्तित्व का मतलब यह भी नहीं है कि दोनों के बीच कोई अदृश्य दोस्ती है। प्रकृति में रिश्ते हमेशा वास्तविक होते हैं, लेकिन गिर में सालों के दौरान एक प्रकार का संतुलन विकसित हुआ। एक तरफ शेरों ने इंसानी बस्तियों के बीच जीना सीखा और दूसरी तरफ स्थानीय लोगों ने शेरों की मौजूदगी के साथ जीने का तरीका विकसित किया।

शायद यही गिर का सबसे बड़ा रहस्य है। जब दुनिया के कई इलाकों में इंसान और बड़े शिकारी जानवरों के बीच का संघर्ष उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन गया, तब गिर में यह रिश्ता पूरी तरह से टूटा नहीं। इसमें उतार-चढ़ाव आए, चुनौतियाँ आईं, लेकिन मूल संतुलन बना रहा और शायद इस संतुलन के बिना गिर आज एशियाटिक शेरों का आखिरी घर नहीं होता।

नेस से जंगल तक: सह-अस्तित्व की अनूठी संस्कृति

गिर को समझने के लिए सिर्फ शेरों को देखना काफी नहीं है। गिर को समझने के लिए उसके लोगों, उनकी बोली, उनके मवेशियों, उनके नेसड़ों और उनके दैनिक जीवन को भी समझना होगा।

सुबह-सुबह गिर के किसी नेस में जब दिन की शुरुआत होती है, तो जीवन की रफ्तार सदियों पुरानी परंपराओं के साथ आगे बढ़ती दिखाई देती है। पशुओं को चराने ले जाया जाता है, दूध दुहा जाता है, घर के कामकाज शुरू होते हैं और जंगल के बीच इंसानी जिंदगी अपनी रफ्तार से आगे बढ़ती है। यह पूरी जीवन पद्धति ऐसी जमीन पर विकसित हुई है जहाँ शेरों की मौजूदगी हमेशा रही है।

इसीलिए गिर में सह-अस्तित्व कोई सरकारी नारा नहीं है, यह एक जीवंत हकीकत है। इस रिश्ते ने समय के साथ कई बदलाव भी देखे हैं। गिर के संरक्षण के लिए कुछ मालधारी परिवारों का पुनर्वास भी किया गया। कई लोग जंगल के बाहर बसे, फिर भी गिर और मालधारियों के बीच का रिश्ता आज भी टूटा नहीं है। गिर की पहचान में उनका योगदान इतना गहरा है कि शेरों की कहानी से उन्हें अलग करना मुमकिन नहीं है।

अगर गिर के जंगल इस प्रजाति का शरीर हैं, तो मालधारी और स्थानीय समाज इसकी आत्मा हैं। लेकिन अगर सिर्फ सह-अस्तित्व ही काफी होता, तो शायद शेरों की संख्या कुछ दर्जनों पर ही रुकी रहती। गिर की कहानी का दूसरा बड़ा अध्याय तब शुरू हुआ, जब संरक्षण को वैज्ञानिक दिशा मिली और गुजरात ने शेरों को बचाने के लिए एक लंबी और निरंतर यात्रा शुरू की।

गुजरात का संरक्षण मॉडल: दहाड़ को फिर जिंदा करने वाले प्रयास

एशियाई शेरों की इस विजय गाथा में गिर के जंगल और मालधारी जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण संरक्षण की वह लंबी यात्रा भी है, जिसने एक समय विलुप्ति की कगार पर खड़ी प्रजाति को फिर से मजबूत बनाया। कई बार जब वन्यजीव संरक्षण की सफलता की बात होती है, तो लोग सिर्फ अंतिम परिणाम देखते हैं। वे आज गिर में दिखने वाले शेरों को देखते हैं, लेकिन उस परिणाम तक पहुँचने के पीछे दशकों का नियोजन, अनुसंधान, नीतियाँ और लगातार निगरानी काम करती रही है।

आजादी के बाद के शुरुआती सालों में ही यह साफ हो गया था कि अगर शेरों को बचाना है, तो सिर्फ शिकार पर प्रतिबंध काफी नहीं होगा, बल्कि उनके पूरे इकोसिस्टम को बचाना होगा। इसी समझ के तहत 1965 में गिर को अभयारण्य का दर्जा मिला। आज के समय में यह फैसला सामान्य लग सकता है, लेकिन उस समय के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि पहली बार पूरा दृष्टिकोण शेर से आगे बढ़कर उसके आवास पर केंद्रित होने लगा।

1970 के दशक में गिर पर व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन शुरू हुए। शेर कैसे रहते हैं, उनकी हलचल कैसी होती है, उन्हें कितना इलाका चाहिए, उनके लिए शिकार वाली प्रजातियाँ कितनी महत्वपूर्ण हैं और जंगल के अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं… इस सबको समझने का प्रयास हुआ। शायद आज के दौर में यह बात स्वाभाविक लगे, लेकिन उस समय तक भारत में वन्यजीव संरक्षण अभी विकास के चरण में था। गिर ने इस दिशा में एक नया रास्ता दिखाया।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI GROK)

इसी बीच एक ऐतिहासिक फैसला भी लिया गया। गिर के अंदर रहने वाले कई मालधारी परिवारों का पुनर्वास किया गया। यह फैसला आसान नहीं था। पीढ़ियों से जंगल में रह रहे लोगों के लिए अपना पारंपरिक निवास स्थान छोड़ना सहज नहीं था, लेकिन संरक्षण की दीर्घकालिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह प्रक्रिया अपनाई गई। नतीजतन, जंगल के कई इलाकों को प्राकृतिक रूप से पुनर्जीवित होने का मौका मिला। घास के मैदानों, वनस्पतियों और शिकार वाले जानवरों की आबादी को इसका सीधा फायदा मिला।

इसके बाद गिर का संरक्षण सिर्फ एक अभयारण्य तक सीमित नहीं रहा। गिर को एक बड़े लैंडस्केप के रूप में देखने की शुरुआत हुई। गिरनार और अन्य इलाकों को भी संरक्षण की व्यापक योजना से जोड़ा गया, क्योंकि एक हकीकत साफ हो रही थी कि शेरों की संख्या बढ़ रही थी और उन्हें और अधिक इलाके की जरूरत पड़ने वाली थी।

इस अवधि में गुजरात वन विभाग ने कई ऐसे कदम उठाए, जो आम लोगों की नजर में शायद न आएँ, लेकिन शेरों के अस्तित्व के लिए बेहद अहम थे। जैसे गिर के इलाकों में वायरलेस नेटवर्क तैयार करना, लगातार मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करना, वनमित्रों की नियुक्ति करना, स्थानीय समाज के साथ संवाद बढ़ाना और वन्यजीवों के लिए खतरनाक साबित हो सकने वाले हजारों खुले कुओं को सुरक्षित बनाने का काम, यह सब एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण का हिस्सा था।

इन कदमों का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। गिर के जंगल और अधिक स्वस्थ हुए, शिकार वाली प्रजातियों की संख्या बढ़ी और सबसे महत्वपूर्ण बात, शेरों की संख्या भी लगातार बढ़ने लगी।

177 से 891 तक: विलुप्ति की कगार से वापसी

किसी भी संरक्षण गाथा की सबसे बड़ी परीक्षा उसके परिणामों में दिखाई देती है। गिर के शेरों की कहानी में भी यही सच है। 1968 की गणना में शेरों की संख्या 177 थी। यह आँकड़ा खुद याद दिलाता है कि स्थिति कितनी नाजुक थी। अगर कुछ दशक पहले की स्थिति देखी जाए, तो यह प्रजाति लगभग विलुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी थी। लेकिन इसके बाद शुरू हुई एक ऐसी यात्रा, जो आज दुनिया के सबसे सफल वन्यजीव संरक्षण उदाहरणों में गिनी जाती है।

आखिरकार, साल 1974 में संख्या 180 हुई। 1979 में 205, 1984 में 239, 1990 में 284, 1995 में 304। नई सहस्राब्दी की शुरुआत तक यह संख्या 327 तक पहुँच गई। इसके बाद रफ्तार और तेज हुई; 2005 में 359, 2010 में 411 और अगले दशक में तो यह वृद्धि और भी साफ दिखाई दी।

ये आँकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं। हर बढ़ते आँकड़े के पीछे और ज्यादा सुरक्षित जंगल और अधिक समृद्ध शिकार प्रजातियाँ, मजबूत संरक्षण व्यवस्था और एक पूरे समाज की भागीदारी छिपी है। जब 2020 में शेरों की संख्या 674 तक पहुँची, तभी यह साफ हो गया था कि गिर की कहानी अब सिर्फ बच जाने की बात नहीं रह गई है, बल्कि अब यह विकास और विस्तार की विजय गाथा बन चुकी है।

और फिर आया 2025 का आँकड़ा। गुजरात सरकार द्वारा घोषित की गई हालिया गणना के अनुसार, राज्य में एशियाई शेरों की संख्या बढ़कर 891 तक पहुँच गई है। एक सदी पहले विलुप्ति की कगार पर खड़ी प्रजाति के लिए यह सिर्फ सफलता नहीं है, बल्कि यह एक असाधारण पुनरुत्थान है।

दुनिया में वन्यजीव संरक्षण के कई उदाहरण मिलते हैं, लेकिन ऐसी प्रजातियाँ बहुत कम हैं जो एक समय सिर्फ दर्जनों तक सीमित हो गई हों और फिर से लगभग 900 के आँकड़े तक पहुँच गई हों।

अब सिर्फ गिर नहीं, पूरा काठियावाड़ है शेरों का साम्राज्य

शेरों की संख्या में हुई इस बढ़ोतरी ने एक नई हकीकत को भी जन्म दिया। गिर अब उनके लिए पर्याप्त नहीं था। एक समय ऐसा था जब लगभग पूरी आबादी गिर के जंगलों में केंद्रित थी, लेकिन जैसे-जैसे संख्या बढ़ी, शेरों ने नए इलाकों की तरफ बढ़ना शुरू कर दिया। गिरनार, तटीय इलाके, अमरेली और भावनगर के क्षेत्र… धीरे-धीरे शेरों ने अपने पुराने साम्राज्य का एक नया नक्शा बनाना शुरू कर दिया।

आज स्थिति यह है कि राज्य के कई शेर गिर के कोर (मुख्य) क्षेत्र से बाहर रहते हैं। वे खेती-बाड़ी वाले इलाकों, नदी तटीय क्षेत्रों, झाड़ियों वाले लैंडस्केप और इंसानी बस्तियों के पास भी देखे जाते हैं। दुनिया के दूसरे हिस्सों में शायद यह चिंता का विषय बने, लेकिन गुजरात में यह एक अलग ही हकीकत बन चुकी है।

इसका मतलब यह नहीं है कि चुनौतियाँ खत्म हो गई हैं। बढ़ती आबादी के साथ नए सवाल भी खड़े होते हैं, लेकिन एक बात निर्विवाद है कि एशियाटिक शेर अब सिर्फ गिर के जंगलों में कैद रहने वाली प्रजाति नहीं हैं; वे फिर से अपने क्षेत्र का विस्तार कर रहे हैं।

एक प्रजाति बची, एक विरासत जीवंत रही

आखिरकार गिर के शेरों की कहानी सिर्फ शेरों की नहीं है। यह गिर के जंगलों की कहानी है। यह चीतल और सांभर की कहानी है। यह मालधारियों की कहानी है। यह वन रक्षकों, वैज्ञानिकों और संरक्षण के लिए दशकों तक काम करने वाले हजारों लोगों की कहानी है। यह गुजरात की वह कहानी है, जिसमें प्रकृति और इंसान के बीच का रिश्ता सिर्फ संघर्ष से तय नहीं होता।

एक समय ऐसा था जब एशियाई शेरों का इतिहास खत्म होता दिख रहा था। उनकी दहाड़ धीरे-धीरे दुनिया के नक्शे से गायब हो रही थी, लेकिन गिर ने उस दहाड़ को जिंदा रखा। गिर के जंगलों ने उन्हें आश्रय दिया, शिकार वाली प्रजातियों ने उन्हें जीवन दिया, मालधारियों ने सह-अस्तित्व का उदाहरण पेश किया और गुजरात के संरक्षण प्रयासों ने उन्हें फिर से उठने का मौका दिया।

आज जब गिर के किसी जंगल में शेर की दहाड़ गूँजती है, तो वह महज एक जानवर की आवाज नहीं होती। वह एक ऐसी सफलता की गूँज होती है, जो याद दिलाती है कि अगर सही इच्छाशक्ति, सही नीतियाँ और समाज की भागीदारी हो, तो विलुप्ति की कगार से भी वापसी संभव है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

ईसाइयों के टेक्सास में पाँव पसारता इस्लाम: जानिए क्यों एक हिंदू को अपने ही घर में छिपाने पड़े भगवान, हार गई ‘कट्टरपंथ’ के खिलाफ आवाज उठाने वाली नेता

हाल ही में ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट ने एच-1बी वीजा पर अमेरिका गए भारतीयों की बदलती स्थिति को सामने रखा। रिपोर्ट में एक ऐसा मामला भी सामने आया, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए। एक भारतीय मूल के हिंदू व्यक्ति को अपना घर बेचने के लिए उसमें स्थापित भगवान गणेश की मूर्ति तक हटानी पड़ी, क्योंकि खरीदार मूर्ति देखते ही घर खरीदने से पीछे हट रहे थे। यह कोई साधारण कहानी नहीं है, बल्कि उस सामाजिक बदलाव की ओर इशारा करती है जिसकी चर्चा आज टेक्सास में लगातार हो रही है।

अमेरिका का ईसाई बहुल राज्य टेक्सास लंबे समय तक काउबॉय संस्कृति, तेल उद्योग और पारंपरिक अमेरिकी पहचान का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य की डेमोग्राफी तेजी से बदली है। बड़ी संख्या में नए प्रवासी यहाँ आकर बस रहे हैं, जिनमें मुस्लिम की संख्या लगातार बढ़ रही है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि टेक्सास में नई मस्जिदों, इस्लामी स्कूलों, इस्लामी कम्युनिटी सेंटरों और बड़े मजहबी प्रोजेक्ट्स का विस्तार भी देखने को मिला है।

टेक्सास की आबादी में 67 प्रतिशत हिस्सा साझा करने वाले ईसाइयों का कहना है कि यह बदलाव टेक्सास की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को छीन रहा है। यही वजह है कि टेक्सास में बढ़ता इस्लामीकरण और उससे जुड़े सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव अब चिंता का विषय बन चुके हैं। स्थानीय नेताओं, कार्यकर्ताओं और मीडिया संस्थान भी मान रहे हैं कि यह डेमोग्राफी परिवर्तन तो है ही साथ ही टेक्सास की संस्कृति के लिए भी एक बड़ा ‘खतरा’ है।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर टेक्सास में क्या सही में इस्लाम पैर पसार रहा है और किस तरह बदलती डेमोग्राफी का असर टेक्सास की सामाजिक और सांस्कृतिक तस्वीर पर पड़ रहा है।

भारतीय ने भगवान गणेश की मूर्ति घर से निकाली: ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में क्या खुलासा?

ब्लूमबर्ग की एच-1बी वीजा को लेकर अमेरिका में सख्त नीतियों पर एक रिपोर्ट की गई। इस रिपोर्ट में सामने आया कि भारतीय मूल के निवासी रवि वाविलाल उन हजारों भारतीयों में शामिल हैं जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में टेक्सास के तेजी से बढ़ते शहरों में घर खरीदे थे। रवि बताते हैं कि उनका परिवार 2023 में नॉर्थ कैरोलिना के शार्लेट आकर बसा था। लेकिन कुछ महीनों पहले ही उन्हें स्टेज-4 कैंसर हो गया, जिसकी वजह से उनकी नौकरी चली गई और उन्होंने अपना घर बेचने का फैसला किया। लेकिन घर बेचने में भी इतनी परेशानियाँ झेलनी पड़ेंगी, ये शायद उन्हें नहीं मालूम था।

रिपोर्ट के मुताबिक, खरीदारों को आकर्षित करने के लिए उन्हें अपने घर से भगवान गणेश की प्रतिमा और हिंदू धर्म के अन्य प्रतीकों को हटाना पड़ा। रवि याद करते हुए बताते हैं कि कैसे खरीदार उनके घर आए और पाँच मिनट के भीतर ही चले गए। जब उन्होंने वजह जानने के लिए ब्रोकर से संपर्क किया तो उन्हें पता चला कि खरीदार उनके घर में रखी भगवान गणेश की मूर्ति को देखकर ऐसा कर रहे थे।

रवि कहते हैं, “वहाँ अभी भी बहुत सारी धार्मिक और निजी चीजें रखी थीं। हमें एहसास हुआ कि हर तरह के लोगों को आकर्षित करने के लिए हमें अपने घर को बहुत ही सामान्य बनाना होगा। हमने सब कुछ पैक कर लिया। हमने पास ही एक पब्लिक स्टोरेज एरिया किराए पर लिया और सारा सामान उस स्टोरेज रूम में रख दिया। हमें उन सभी यादों से खुद को अलग करना पड़ा जो हमने वहाँ बनाई थीं। अब तक, तीन महीनों में, सचमुच कोई ऑफ़र नहीं आया है। हम नुकसान उठाकर भी यह घर बेचने को पूरी तरह तैयार हैं।”

ब्लूमबर्ग की वीडियो में रवि भगवान गणेश की मूर्ति को स्टोर रूम से बाहर निकालते दिख रहे हैं और फिर मूर्ति के सामने दीया जलाते हैं। उनके हाव-भाव से साफ जाहिर था कि कैसे उन्हें जबरदस्ती अपनी धार्मिक पहचान से अलग किया गया।

टेक्सास की बदलती डेमोग्राफी: आखिर कितनी तेजी से बढ़ रही है मुस्लिम आबादी?

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में सामने आए अनुभवों को समझने के लिए टेक्सास की बदली डेमोग्राफी को देखना जरूरी है। पिछले दो दशकों में राज्य की मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ रही है और अब यह केवल एक छोटे प्रवासी समुदाय तक सीमित नहीं रह गई है। नई मस्जिदों, इस्लामी स्कूलों, इस्लामी कम्युनिटी सेंटरों, इस्लामी सड़कों के नाम और मजहबी परिसरों के विस्तार के साथ ‘इस्लाम’ की मौजूदगी टेक्सास के कई हिस्सों में पहले की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देने लगी है।

विश्व जनसंख्या समीक्षा के अनुसार, साल 2020 में टेक्सास में मुस्लिम आबादी 3.13 लाख से अधिक थी, जिससे यह अमेरिका में मुस्लिम आबादी वाले प्रमुख राज्यों में शामिल हो गया। वहीं बाकी डेमोग्राफी अध्ययनों और सामुदायिक संगठनों के अनुमान इससे भी बड़ी संख्या बताते हैं। कई हालिया अध्ययनों में टेक्सास की मुस्लिम आबादी 4 से 5 लाख के बीच आँकी गई है। खास तौर से नॉर्थ टेक्सास क्षेत्र में इस्लामी संगठनों का दावा है कि केवल डलास-फोर्ट वर्थ क्षेत्र में ही मुस्लिम आबादी कई लाख तक पहुँच चुकी है।

अगर पिछले दो दशकों के आँकड़ों को देखें तो वृद्धि के रुझान और साफ हो जाते हैं। टेक्सास स्टेट हिस्टोरिकल एसोसिएशन के अनुसार, 1990 में टेक्सास में लगभग 1.4 लाख मुस्लिम थे। साल 2000 से 2010 के बीच मुस्लिम आबादी में तेज वृद्धि दर्ज की गई और 2010 तक यह संख्या लगभग 4.2 लाख के आसपास पहुँचने का अनुमान लगाया गया था। उसी दौरान मुस्लिम आबादी का प्रतिशत भी लगभग तीन गुना बढ़ा।

इस वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रवासन को माना जाता रहा है। टेक्सास लंबे समय से इंजीनियरों, डॉक्टरों, आईटी पेशेवरों, छात्रों और उद्यमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका से आने वाले प्रवासियों ने यहाँ बड़े पैमाने पर बसावट की है। प्यू रिसर्च सेंटर बताता है कि अमेरिका में मुस्लिमों की वृद्धि का प्रमुख कारण अंतरराष्ट्रीय प्रवासन, युवा आबादी और प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि है।

मस्जिदों से लेकर EPIC सिटी तक: कैसे पाँव पसार रहा ‘इस्लामीकरण’?

टेक्सास में मुस्लिम आबादी की बढ़ती संख्या के साथ ‘इस्लामीकरण’ पर भी चिंता जताई जा रही है। इस पर टेक्सास में बहस तेजी से उभरी है कि क्या राज्य में केवल मुस्लिम समुदाय का विस्तार हो रहा है या फिर एक अलग सामाजिक और मजहबी ढाँचा भी आकार ले रहा है? यही सवाल हाल के महीनों में टेक्सास में कई नेताओं, एक्टिविस्ट और मीडिया रिपोर्ट्स में उठे।

इस बहस का सबसे चर्चा में रहने वाला उदाहरण EPIC सिटी परियोजना है। यह परियोजना डलास (Dallas) शहर के पास ईस्ट प्लानो इस्लामी सेंटर (EPIC) से जुड़े लोगों द्वारा एक बड़े आवासीय और सामुदायिक विकास प्रोजेक्ट के रूप में सामने आई। प्रोजेक्ट को टेक्सास में बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए आवास, शिक्षा और सामुदायिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना है।

GB News ने भी टेक्सास में ‘इस्लामीकरण’ पर डॉक्यूमेंट्री की है। डॉक्युमेंट्री में एंकर टेक्सास की बदलती पर चिंता व्यक्त करते हुए कहता है कि जिस राज्य को कभी काउबॉय संस्कृति और अमेरिकी पहचान के लिए जाना जाता था, वहाँ अब मस्जिदों और मुस्लिमों की बढ़ती मौजूदगी एक नया दृश्य पेश कर रही है। डॉक्युमेंट्री में इस्लाम के ‘हिंसक’ इतिहास पर भी बात होती है।

जब एंकर टेक्सास की ही एक एक्टिविस्ट से पूछता है कि क्या टेक्सास सचमुच बदल रहा है? इस पर एक्टिविस्ट जवाब देती हैं कि अगर कोई धर्म को सही तरीके से फॉलो कर रहा है तो इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन इस्लाम का इतिहास खंगालें या कुरान पढ़ें तो पता लगता है कि वह सिर्फ ‘कब्जा’ और ‘हत्या’ की दीन देता है। एक्टिविस्ट बताती हैं कि यहाँ रहने वाले मुस्लिम टेक्सास में शरिया लॉ लागू करने की चेतावनी देते हैं।

एक्टिविस्ट मुस्लिम बहुल देश ईरान और नाइजीरिया का उदाहरण भी देती हैं। बातचीत में टेक्सास को अलगा UK बनने देने पर भी चिंता जताई जाती, जहाँ मुस्लिमों के ग्रूमिंग गैंग ने ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाया। इस मुस्लिम गैंग की हैवानियत बताते हुए हाल ही में ब्रिटिश सांसद रुपर्ट लोव ने इस पर विस्तार से ‘रेप गैंग इन्क्वायरी रिपोर्ट‘ पेश की है, इस रिपोर्ट में 2.5 लाख से ज्यादा ब्रिटिश लड़कियों के रेप की सच्चाई है।

डॉक्युमेंट्री में आगे उन इलाकों को दिखाया गया है जहाँ मुस्लिम आबादी और संस्थानों का विस्तार हुआ है। कैमरा ऐसी सड़कों पर जाता है जहाँ एक्टिविस्ट के मुताबिक पहले अमेरिकी ऐताहिसिक व्यक्तित्वों और फाउंडिंग फादर्स के नाम दिखाई देते थे, लेकिन अब कुछ सड़कों के नाम अरबी या इस्लाम से जुड़े नामों पर रखे गए हैं। डॉक्युमेंट्री में बदले नाम ‘अल-फाजी’ (Al-Fazi) और ‘गजाली’ (Ghazali) सड़कों को दिखाया गया है।

डॉक्युमेंट्री में मुस्लिमों के ‘कब्जे’ का जीता-जागता उदाहरण भी देखा गया, जब शूट करते हुए एंकटर को एक मुस्लिम ने ‘इस्लामोफोबिक’ कहकर भगा दिया। इसके अलावा डॉक्युमेंट्री में टेक्सास में बनी बड़ी-बड़ी मस्जिदों और हलाल रेस्टोरेंट को भी दिखाया गया।

टेक्सास की राजनीति में ‘इस्लामीकरण’ का गूँज रहा मुद्दा

मुस्लिम आबादी की बढ़ती संख्या, नई मस्जिदों और EPIC सिटी जैसे प्रोजेक्ट्स को लेकर उठ रहे ‘इस्लामीकरण’ के सवाल अब टेक्सास की राजनीति में भी गरमा रहे हैं। जहाँ रिपब्लिकन नेता, एक्टिविस्ट और चुनावी उम्मीदवार लगातार इस पर खुलकर बोल भी चुके हैं।

हाल ही में रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय ने दावा किया कि टेक्सास में मुस्लिम आबादी में पिछले कुछ वर्षों के दौरान 172 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। रॉय ने EPIC सिटी जैसे प्रोजेक्ट्स को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी समुदाय के नाम पर ऐसी व्यवस्था विकसित न हो जो अमेरिकी कानून और संवैधानिक मूल्यों से अलग दिशा में जाए। इसी दौरान उन्होंने शरिया लॉ को भी खारिज किया और कहा कि टेक्सास में इसकी कोई जगह नहीं है।

इसी तरह टेक्सास में मेयर पद का चुनाव लड़ चुकीं वैलेंटीना गोमेज भी इस मुद्दे को अपनी राजनीतिक पहचान का प्रमुख हिस्सा बना चुकी हैं। गोमेज लगातार यह दावा करती रही हैं कि टेक्सास केवल जनसंख्या परिवर्तन नहीं बल्कि सांस्कृतिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों से EPIC सिटी और ‘इस्लामीकरण’ के खिलाफ अभियान चलाया।

इसी दौरान वह उस समय राष्ट्रीय सुर्खियों में भी आईं जब उन्होंने कैमरे के सामने कुरान जलाकर विरोध प्रदर्शन किया। वे मानती हैं कि मुस्लिम ‘रेपिस्ट’ होते हैं, जो हमेशा ईसाई देशों में हिंसा फैलाते हैं। गोमेज कहती रही हैं कि उनका उद्देश्य ‘टेक्सास से इस्लाम को खत्म करना है।’ गोमेज बताती हैं कि उनके काम के लिए मुस्लिमों द्वारा उन्हें लगातार धमकियाँ भी दी जाती हैं।

कट्टरपंथे के खिलाफ बोलते हुए और इसी को अपना चुनावी मुद्दा बनाते हुए वैलेंटीना गोमेज को 2024 में मेयर चुनाव और 2026 में 31वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव (US House) के प्राइमरी चुनाव हार गईं।

अगर टेक्सास में सचमुच इस्लामीकरण बढ़ रहा है, तो आगे क्या होगा?

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में सामने आया वह भारतीय परिवार केवल एक घर बेचने की कहानी नहीं है। जिस व्यक्ति को अपना घर बेचने के लिए भगवान गणेश की मूर्ति हटानी पड़ी, वह घटना चिंता पैदा कर देती है कि टेक्सास में ‘इस्लामीकरण’ हो रहा है। चिंता इसीलिए भी है क्योंकि ब्रिटेन में भी यही हुआ। वहाँ भी डेमोग्राफिक बदलावों पर वर्षों तक खुलकर चर्चा नहीं हुई। बाद में रोदरहैम, रोचडेल और दूसरे शहरों में ग्रूमिंग गैंग कांड सामने आए, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया।

ईरान का उदाहरण भी देना जरूरी है। 20वीं सदी के मध्य का ईरान और आज का ईरान दो बिल्कुल अलग तस्वीरें पेश करते हैं। वहाँ राजनीतिक सत्ता और मजहबी पहचान का गठजोड़ आखिर में पूरे शासन ढाँचे को बदलने तक पहुँच गया। टेक्सास को लेकर चिंता जताने वाले लोग इसी वजह से कहते हैं कि किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन को केवल जनसंख्या के आँकड़ों तक सीमित करने नहीं देखा जा सकता।

आज टेक्सास में नई मस्जिदें बन रही हैं, मुस्लिम समुदाय का विस्तार हो रहा है, बड़े सामुदायिक प्रोजेक्ट्स सामने आ रहे हैं और इस विषय पर राजनीतिक ध्रुवीकरण भी बढ़ रहा है। यह बदलाव आखिर किस दिशा में जाएगा, इसका जवाब आने वाला समय देगा। लेकिन इतना तय है कि टेक्सास में जो बहस आज शुरू हुई है, वह केवल एक राज्य की बहस नहीं रह गई है। यह दुनिया के कई देशों की तस्वीर सामने लाकर रख देती है।

‘बलूचिस्तान की शेरनी’ को आतंकी घोषित कर पाकिस्तान ने दी उम्रकैद की सजा, आवाज दबाने के लिए बनाया फर्जी केस: जानें डॉ महरंग बलोच को, जिसके नाम से काँपता है मुल्ला मुनीर और शहबाज शरीफ

पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन के विरुद्ध संघर्ष करने वाली आवाज महरंग बलोच को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। महरंग बलोच पेशे से एक डॉक्टर हैं। बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी क्वेटा में एंटी-टेररिज्म कोर्ट के जज मुहम्मद अली मोबिन ने सोमवार (22 जून 2026) को इस सजा का एलान किया, जिसके खिलाफ बलूचिस्तान में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हो रहा है। उन्हें ‘बलूचिस्तान की शेरनी’ भी कहा जाता है।

यह सजा बलूचिस्तान में लंबे समय से हो रहे मानवाधिकार हनन और ‘जबरन गुमशुदगियों’ के खिलाफ उनकी शांतिपूर्ण राजनीतिक सक्रियता के बीच आई है। महरंग बलोच को मार्च 2025 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वे क्वेटा की हुड्डा जिला जेल में हिरासत में थीं। महरंग और उनके समर्थकों ने इन आरोपों को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ और मानवाधिकारों की आवाज को दबाने का प्रयास बताया है।

बलूच संगठनों ने जताई नाराजगी

कोर्ट के फैसले का मानवाधिकार ग्रुप, विपक्ष और दूसरे संगठनों ने विरोध किया है और लोकतंत्र पर हमला करार दिया। महरंग बलोच का बेबाक अंदाज पाकिस्तानी शासन के लिए ‘खतरा’ माना जाता है। वह बलूच यकजेहती कमेटी की प्रमुख हैं। इस संगठन के विरोध प्रदर्शन के दौरान 2024 में ग्वादर में एक सुरक्षा अधिकारी की मौत हो गई थी, जिसका उन्हें दोषी ठहराया गया है।

द बलूचिस्तान पोस्ट के मुताबिक, ये फैसला उस वक्त आया, जब महंरग बलोच और दूसरे नेताओं को हिरासत में लेने के खिलाफ लोग सड़कों पर थे और उनके वकीलों ने कोर्ट की कार्यवाही का बायकॉट कर रखा था। दरअसल संगठन के कई नेताओं को 12 जून को गिरफ्तार किया गया था, जो जेल में भी कार्रवाई के खिलाफ धरना दे रहे हैं।

संगठन के दो अहम सदस्य सिबगतुल्लाह बलूच और बलोच कादिर खान को भी उम्रकैद की सजा दी गई है। बीवाईसी ने इस फैसले का विरोध करते हुए इसे बलूच राष्ट्र के प्रति नफरत का इजहार करने वाला फैसला बताया है।

संगठन ने जन आंदोलन के माध्यम से फैसले को चुनौती देने का फैसला किया है। इसके साथ ही बलूचिस्तान में एक बार फिर पाकिस्तान के प्रति नफरत पैदा हो गई है। महरंग बलोच काफी प्रभावी वक्ता हैं। उनका इलाके में काफी सम्मान है।

कौन हैं महरंग बलोच

1993 में जन्मीं महरंग पेशे से डॉक्टर हैं लेकिन वैश्विक स्तर पर उनकी पहचान मानवाधिकार कार्यकर्ता के तौर पर होती है। उन्हें बलूचिस्तान के लोगों के हकों के लिए लड़ते-लड़ते एक दशक से ज्यादा का समय बीत गया है।

इस लड़ाई में वो अपने अब्बा को खो चुकी हैं और भाई के अचानक गायब होने के दर्द को जानती हैं। उन्होंने वैसे तो बलोच लोगों के लिए 2006 से ही आवाज उठाना शुरू कर दिया था लेकिन कुछ समय बाद उनके अब्बा का अपहरण कर लिया गया और फिर 2011 में उनका शव क्षत-विक्षत हालत में मिला।

महरंग उस समय तक इतना सक्रियता से प्रदर्शनों में नहीं जुड़ीं थीं, लेकिन 2017 में जब भाई भी अचानक किडनैप कर लिया गया, तब उन्होंने मैदान में आने की ठानी। महरंग ने अपने भाई के लिए प्रदर्शन किए, मार्च में शामिल हुई, बैठकों में गईं। उनके आवाज उठाने का ये लाभ हुआ कि अपहरणकर्ताओं को 2018 में उनके भाई को लौटाना पड़ा।

राजनीति में कैसे हुई एंट्री

महरंग इस बीच ये समझ चुकी थीं कि ये दर्द जो उन्होंने सहा वो उनके अकेले की नहीं है, बल्कि बलूचिस्तान में कई परिवार इस दर्द को झेल रहे हैं। नतीजतन भाई के आने के बाद भी महरंग ने अपना काम नहीं छोड़ा। वह अपहरण होने वाले लोगों के लिए इंसाफ माँगती रहीं। बाद में 2019 में उन्होंने अपनी एक पार्टी बनाई- बलूच यकजहती समिति (बीवाईसी)।

पार्टी बनाने के बाद उन्होंने छोटी-छोटी बैठकें शुरू कीं। दरवाजे पर जा जाकर लोगों को जोड़ा। धीरे-धीरे उनके साथ घर की बुजुर्ग औरतों से लेकर बेटियाँ तक जुड़ने लगीं। उनके साथ चलने वाला काफिला बड़ा होने लगा।

महरंग का ‘बलूचिस्तान की शेरनी’ है

महरंग का असर आज बलूचिस्तान पर ऐसा है कि उनकी एक आवाज पर लाखों बलोच घर से निकल कर सड़क पर आ जाते हैं। उनकी बेबाक टिप्पणी बलोचों पर हुए अत्याचार को लेकर पाकिस्तान को चेतावनी ये बताता है कि वे झुकने के लिए तैयार नहीं हैं। 2025 में उन्हें हिरासत में लेने से पहले एक मार्च हुआ था जिसमें अनुमान था कि करीबन 2 लाख लोग आए थे। इन लोगों को रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्च किया, आंसू गैस छोड़े लेकिन लोगों ने हार नहीं मानी।

उलटा लोग महरंग की हिम्मत देख उनके कायल हो गए। युवा लड़कियों ने बताया कि वो मार्च में महरंग को देखने आई हैं। उन्होंने कहा कि मार्च में उन्हें पहली बार पता चला कि बलूचिस्तानी लोगों ने अपने परिजनों को खोया है और उनका दर्द महरंग बयाँ कर रही हैं क्योंकि उन्होंने भी अपनों को खोया है।

डरती है पाकिस्तान सरकार

महरंग बलोच के अहिंसक विरोध प्रदर्शनों में लाखों की संख्या में बलोच लोग, विशेषकर महिलाएँ और युवा शामिल होते हैं, जिसने पाकिस्तानी हुकूमत की नींद उड़ा दी है। पाकिस्तान के मुनीर शहबाज की जोड़ी को डर लगता है कि यह जन-आंदोलन कहीं बड़े स्तर पर बलूचिस्तान को उनसे अलग न कर दे, जहाँ के ‘रेयर अर्थ मेटल्स’ दिखा कर वे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को आकर्षित करने की कोशिश करते रहे हैं। इसलिए सरकार बलोचों को दबाने के लिए लगातार बल प्रयोग करती रहती है।
उनकी नेता महरंग बलोच को हिरासत में रखा हुआ है और अब झूठे केस में फँसा कर उम्रकैद की सजा दिलवा दी है। लेकिन महरंग और दूसरे बलोचों ने इसका डटकर सामना करने की ठानी है। महरंग के पिता मजदूर थे, लेकिन उन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की और आज वो जिन बलोच लोगों के लिए संघर्ष कर रही हैं, वो उन तमाम लोगों के दर्द को बयान करता है, जिन्होंने पाकिस्तानी फौज के कारण अपनों को खोया और जिन्हें पता भी नहीं कि उनके अपने जीवित हैं भी या नहीं।

आज उनके नाम और काम के बारे में सिर्फ बलूचिस्तानी ही नहीं जानते बल्कि अलग-अलग जगह के लोग, जो इंसानियत की पैरवी करते हैं वो उनके मुरीद हैं। उनकी लोकप्रियता तेजी से मुल्क में बढ़ रही है। वहीं सरकार कोशिश कर रही है कि महरंग का असर देश के अन्य जगहों पर न पड़े। इसी कारण से मुल्क की सरकार लोगों को महरंग के साथ जुड़ने से रोक रही है। इंटरनेट बंद कराया जा रहा है और जवान तैनात किए जा रहे हैं ताकि प्रदर्शन पर काबू पाया जा सके।

डलास में इतिहास ने अपना नया बादशाह चुना

सोमवार की रात अर्जेंटीना टूर्नामेंट में अपना दूसरा मैच खेलने उतरी। मुकाबला ऑस्ट्रिया के खिलाफ था, जो अपने पिछले मैच में जॉर्डन को 3-1 से हरा चुकी थी। वहीं, अर्जेंटीना ने मेसी की हैट्रिक की बदौलत अल्जीरिया को 3-0 से करारी शिकस्त दी थी।

ग्रुप J का यह मुकाबला डल्लास के विशालकाय स्टेडियम में खेला गया। दोनों टीमें मैदान पर उतरीं और अर्जेंटीना ने 4-4-2 की फॉर्मेशन अपनाई। टीम ने पिछले मैच वाली ही स्टार्टिंग लाइन-अप पर भरोसा जताया। दूसरी ओर, ऑस्ट्रिया के लिए मार्सेल साबित्ज़र और डेविड अलाबा पर बड़ी जिम्मेदारी थी कि वे अपने साथियों के साथ मिलकर अर्जेंटीनी रथ को रोकें। रेफरी की व्हिसल बजते ही लगभग 94,000 दर्शकों की मौजूदगी में मैच का आगाज हुआ।

खेल के सातवें मिनट में ही ऑस्ट्रिया की डिफेंस लाइन ने लाऊतूरो मार्टीनेज़ को ‘D’ के भीतर फाउल कर दिया। इसके चलते अर्जेंटीना को शुरुआती क्षणों में ही पेनाल्टी मिल गई। कप्तान लियो मेसी पेनाल्टी किक लेने के लिए स्पॉट की ओर बढ़े। रेफरी के संकेत के बाद उन्होंने किक ली, लेकिन 94,000 दर्शकों के सामने मेसी की कमजोर किक को ऑस्ट्रियाई गोलकीपर ने आसानी से रोक लिया। मेसी ने अपनी टीम को बढ़त दिलाने का सुनहरा मौका गंवा दिया।

विडंबना देखिए। शुरुआत उस तरह नहीं हुई थी, जैसी इतिहास लिखने वाले खिलाड़ियों के लिए अक्सर कल्पना की जाती है। पाँचवें मिनट में अर्जेंटीना को पेनाल्टी मिली। पूरा स्टेडियम जानता था कि यह एक रिकॉर्ड बनाने वाला क्षण हो सकता है। मेसी आगे बढ़े, रन-अप लिया और शॉट मारा। गेंद बाहर चली गई। क्षणभर के लिए ऐसा लगा मानो इतिहास ने अपना दरवाज़ा बंद कर लिया हो। लेकिन इतिहास महान खिलाड़ियों को दूसरी बार दस्तक देने का अवसर देता है। 37वें मिनट में अर्जेंटीना ने ऑस्ट्रिया की रक्षा पंक्ति को तोड़ा। गेंद मेसी तक पहुँची। बॉक्स के बाहर से निकला उनका बायाँ पैर मानो किसी कलाकार की तूलिका बन गया। गेंद फार पोस्ट में जाकर समा गई।

इसके बाद खेल आगे बढ़ा और साबित्ज़र को एक मौका मिला। उन्होंने अर्जेंटीनी गोलपोस्ट से करीब 25 मीटर की दूरी से निशाना साधा, लेकिन वे लक्ष्य से चूक गए। फिर 23वें मिनट में साबित्ज़र ने एक बार फिर खतरनाक तरीके से हमला किया, लेकिन गेंद गोलपोस्ट के भीतर नहीं जा सकी। ऑस्ट्रिया के इन शुरुआती हमलों से अर्जेंटीनी टीम जैसे-तैसे बचती रही। फिर, 38वें मिनट में जादूगर मेसी ने अचानक गोल दागकर अर्जेंटीना को 1-0 की बढ़त दिला दी। यह गोल उनके बार्सिलोना के दिनों की याद दिला गया। यह बेहद खूबसूरत गोल था, जिसमें लेफ्ट-बैक फाकुन्दो मेदीना ने बाईं छोर से बेहतरीन क्रॉस डाला और लियो ने अपने सिग्नेचर स्टाइल में लेफ्ट-फुटर किक से इसे गोल में बदल दिया। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 1-0 रहा।

दूसरे हाफ में अर्जेंटीना और साबित्ज़र के नेतृत्व वाली ऑस्ट्रिया, दोनों ने लगातार गोल करने की कोशिश की। कई मौकों पर दोनों टीमों को फ्री-किक भी मिली, लेकिन वे गोल में तब्दील नहीं हो सकीं। अंत में, 90+5 मिनट पर मेसी ने विरोधी रक्षापंक्ति के चार खिलाड़ियों को छकाते हुए शानदार गोल कर स्कोर 2-0 कर दिया। इस गोल के साथ ही लगभग 29 वर्षीय मेसी विश्व कप में सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी बन गए। साथ ही, वे विश्व कप में लगातार छह मैचों में गोल दागने वाले पहले खिलाड़ी भी बन गए। इस जीत के साथ अर्जेंटीना ने अगले दौर में अपनी जगह पक्की कर ली। मेसी का जादू आने वाले कुछ हफ्तों तक और बरकरार रहेगा।

विश्व कप के इतिहास में कई महान खिलाड़ी आए। कई रिकॉर्ड बने और टूटे। लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो रिकॉर्ड नहीं बनाते, बल्कि रिकॉर्ड की परिभाषा बदल देते हैं। लियोनेल मेसी शायद उन्हीं में से एक हैं। पाँचवें मिनट की चूकी हुई पेनाल्टी अब सिर्फ एक फुटनोट है। क्योंकि इतिहास को आखिरकार वही नाम मिला, जिसकी वह प्रतीक्षा कर रहा था।

इसके बाद, पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस का मुकाबला इराक से हुआ। फ्रेंच टीम अपना पिछला मैच सेनेगल के खिलाफ 3-1 से जीतकर आई थी, जबकि इराक को नॉर्वे से 4-1 की शिकस्त मिली थी। यह मैच पूरी तरह एकतरफा रहा, जहां फ्रांस ने इराक के गोलपोस्ट पर 19 बार हमले किए। एमबाप्पे के दो गोल और डेंबेले के एक गोल की बदौलत फ्रांस ने फिलाडेल्फिया में यह मुकाबला 3-0 से जीत लिया। फ्रांस की लगातार शानदार जीत ने साबित कर दिया है कि उन्हें टूर्नामेंट का प्रबल दावेदार क्यों माना जा रहा है।

आगे, न्यूजर्सी स्टेडियम में नॉर्वे का सामना सेनेगल से हुआ। मैच शुरू होते ही दोनों टीमों ने आक्रामक फुटबॉल का प्रदर्शन किया और दोनों के गोलकीपर काफी व्यस्त दिखे। 43वें मिनट में स्थानापन्न खिलाड़ी पेडरसेन ने नॉर्वे को बढ़त दिलाई। पहले हाफ तक नॉर्वे 1-0 से आगे रहा। दूसरे हाफ के दूसरे ही मिनट में एर्लिंग हालांड ने मार्टिन ओडेगार्ड के असिस्ट पर गोल दागकर स्कोर 2-0 कर दिया। हालांकि, सेनेगल ने पांच मिनट के भीतर ही जवाबी गोल कर मैच में जान फूंक दी। फिर 58वें मिनट में हालांड ने एक और गोल दागकर नॉर्वे को 3-1 से आगे कर दिया। दूसरे हाफ के शुरुआती 12 मिनट में ही तीन गोल हो गए, जिससे स्टेडियम में मौजूद दर्शक झूम उठे। मैच के 90+3 मिनट में इस्माइला सार ने सेनेगल के लिए दूसरा गोल किया, लेकिन एर्लिंग हालांड के दो गोलों की बदौलत नॉर्वे ने यह रोमांचक मुकाबला 3-2 से जीत लिया। ग्रुप J के एक अन्य मुकाबले में अल्जीरिया ने जॉर्डन को 2-1 से हराया।

अब नजरें आज रात भारतीय समयानुसार 10:30 बजे ह्यूस्टन स्टेडियम में होने वाले मुकाबले पर हैं, जहां पुर्तगाल का सामना उज़्बेकिस्तान से होगा। पुर्तगाली टीम हाल के दिनों में काफी विवादों से घिरी रही है। टूर्नामेंट से पहले सभी उन्हें जीत का दावेदार मान रहे थे, अब देखना यह है कि क्या खिलाड़ी अपनी निजी गलतफहमियां भुलाकर एक टीम के तौर पर खेल पाएंगे।

इसके बाद रात 1:30 बजे, बोस्टन में थॉमस टुकेल की इंग्लिश टीम का मुकाबला घाना से होगा। कल सुबह 4:30 बजे, टोरंटो में पनामा का सामना क्रोएशिया से होगा। क्रोएशियाई टीम के लिए अगले दौर में जगह बनाने के लिए यह मैच जीतना बेहद जरूरी है।

टूर्नामेंट में लगातार बेहतरीन मुकाबले देखने को मिल रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं कि किसी दिन काबो वर्दे और कुराकाओ जैसे छोटे राष्ट्रों से इतर, एक जमाने में ‘एशियाई शेर’ कहे जाने वाली भारतीय फुटबॉल टीम भी विश्व कप का हिस्सा होगी। हम इस प्यारे खेल से जुड़ी खबरें और खूबसूरत कहानियाँ आप तक पहुँचाते रहेंगे। हमारे साथ बने रहिए।

कोविड काल में दुनिया को मुश्किल में डालने वाले डॉ फौसी पर किया खुलासा तो तुलसी गबार्ड को ही निशाना बनाने लगा वॉशिंगटन पोस्ट: हिंदूवादी ट्रस्ट को बताया ‘कल्ट’, पढ़ें लेख में कैसे परोसी हिंदुओं से घृणा

पूर्व अमेरिकी खुफिया प्रमुख तुलसी गैबार्ड पर 21 जून 2026 को द वाशिंगटन पोस्ट ने एक ‘विशेष’ रिपोर्ट छापा है, जिसमें उन्हें एक पंथ से जुड़े होने और उनके धार्मिक बैकग्राउंड को उजागर करने का दावा किया गया है।

जॉन स्वेन द्वारा लिखित ‘तुलसी गैबार्ड, उनके गुरु और रहस्यमय संदेश जिन्होंने उनके राजनीतिक करियर में मदद की’ शीर्षक वाला यह लेख, हिंदू-विरोधी मानसिकता और विदेशियों से नफरत को दर्शाता है। यह अमेरिका में आम तौर होता है। इसमें हिंदू के साथ उनके स्थायी संबंधों को ‘उजागर’ करने का दावा किया गया, जिसे एक ‘पंथ’ के रूप में प्रस्तुत किया गया।

इस लेख में हिन्दू धर्म के साथ उनके जुड़ाव को एक घोटाले के रूप में पेश करने की कोशिश की गई, जिससे पता चलता है कि यह एक तरह का धोखा और आम लोगों के विश्वास को तोड़ने जैसा था। गौरतलब है कि गैबार्ड अपने 78 वर्षीय आध्यात्मिक गुरु, जगद्गुरु सिद्धस्वरूपानंद परमहंस के साथ अपने संबंध को लेकर बेहद पारदर्शी रही हैं। सिद्धस्वरूपानंद परमहंस को क्रिस बटलर के नाम से भी जाना जाता है।

उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने आध्यात्मिक गुरू की चर्चा की है और अपने जीवन के बारे में बताया है। उनका पालन-पोषण हवाई स्थित ‘साइंस ऑफ आइडेंटिटी फाउंडेशन’ (SIF) में हुआ। यह संगठन की स्थापना उनके आध्यात्मिक गुरु बटलर ने ‘हरे कृष्णा आंदोलन’ से अलग होकर की थी। तुलसी के माता-पिता इसके प्रमुख सदस्य थे। उस समुदाय में उनका पालन-पोषण हुआ। इसके पर्याप्त दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं।

दिलचस्प बात यह है कि यह लेख तुलसी गबार्ड के खुफिया प्रमुख पद से इस्तीफे के बाद प्रकाशित हुआ। उन्होंने अपने पति के रेयर बोन कैंसर की जानकारी मिलने के बाद अमेरिकी राष्ट्रीय खुफिया निदेशक के पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने हाल ही में आधिकारिक तौर पर कोविड-19 की उत्पत्ति से संबंधित जानकारी सार्वजनिक की थी।

इसमें तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन के मुख्य चिकित्सा सलाहकार डॉ. एंथोनी फौसी के बारे में सनसनीखेज खुलासे थे। इसमें कहा गया, “डॉ. एंथोनी फौसी ने वुहान प्रयोगशाला में खतरनाक गेन-ऑफ-फंक्शन अनुसंधान को आर्थिक मदद के तौर पर अमेरिकी करदाताओं के लाखों डॉलर दे दिए। अपने कार्यों की सच्चाई को दबाने और वायरस के प्रयोगशाला-लीक मूल को छिपाने के लिए खुफिया एजेंसी के भीतर ‘राजनीतिक तत्वों’ के साथ काम किया और 2024 में शपथ लेकर कॉन्ग्रेस से झूठ बोला।”

वाशिंगटन पोस्ट ने उन सनसनीखेज खुलासों को नजरअंदाज किया, जिसने न केवल लाखों अमेरिकियों बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित किया। अखबार ने सच्चाई को सामने लाने वाली महिला को बदनाम करने का विकल्प चुना। लोकप्रिय टीवी हस्ती मेघन मैक्केन ने भी इसी मुद्दे को उठाते हुए लेख को ‘पूरी तरह से देशद्रोही, घृणित और घटिया हमला’ बताया।

उन्होंने आरोप लगाया, “वे डॉ. एंथोनी फौसी या बायो लैब पर हुए खुलासे को कवर नहीं करेंगे। ये दोनों ही बातें अमेरिकी लोगों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है, लेकिन वे इस घिसी-पिटी, हिंदू-विरोधी, कट्टरपंथी बकवास को फैलाने में समय बर्बाद करेंगे।”

हिंदू-विरोधी भावना को खोजी पत्रकारिता का नाम दिया गया

वॉशिंगटन पोस्ट ने दावा किया कि ‘कुछ पूर्व सदस्यों ने इस समूह को एक पंथ बताया था’ और इसके अनुयायी बाकी दुनिया से कटे हुए थे। संगठन ने इन आरोपों का पुरजोर खंडन किया है। लेखक ने आगे आरोप लगाया कि बटलर अपने अनुयायियों के जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों पर नियंत्रण रखता था और उसकी आज्ञा का पालन करने पर जोर देता था।

वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, उन्होंने राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए वर्षों गँवाए। वाशिंगटन में गबार्ड का उदय उसी प्रयास का परिणाम था। पूरी रिपोर्ट एसआईएफ की पूर्व सदस्य रेबेका साल्ट्जबर्ग के बयानों पर आधारित है, जो गबार्ड के अभियानों में शामिल थीं।

पूरी कहानी गबार्ड के खिलाफ साजिश नजर आती है जो उनके उल्लेखनीय करियर की बात नहीं करता, बल्कि एक ‘सत्ता-लोभी हिंदू गुरु द्वारा रची गई साजिश का नतीजा’ बताने की कोशिश की गई। इतनी बात वॉशिंगटन पोस्ट ने बिना किसी ठोस सबूत के कही गई।

जो तथ्य काफी समय से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थे, उन्हें हिंदू धर्म के प्रति घृणा फैलाने के लिए शातिर तौर पर इस्तेमाल किया गया। स्वेन ने अपने लेख में सवाल किया क्या कोई एकांतप्रिय गुरु गुप्त रूप से गबार्ड के सार्वजनिक कार्यकाल को निर्देशित करने की कोशिश कर रहा था? इसका उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय के एक राजनेता के प्रति घृणा को बढ़ावा देना था।

लेख में कहा गया है कि अगर बटलर गबार्ड के राजनीतिक करियर का मार्गदर्शन कर रहे थे, तो उन दोनों ने इसे गुप्त रखा होगा। हालाँकि इसमें यह भी माना है कि बटलर और गबार्ड दोनों ने बार-बार कहा कि उन्होंने न तो उन्हें यह निर्देश दिया कि किसे वोट देना है और न ही उन्हें राजनीतिक सलाह प्रदान की।

बटलर के पिता को ‘कट्टर वामपंथी चिकित्सक’ कहा गया। एक ऐसी विचारधारा जिसकी मुख्यधारा मीडिया में आमतौर पर प्रशंसा की जाती है, लेकिन जाहिर तौर पर तब नहीं जब यह उनके एजेंडे के विपरीत हो।

वाशिंगटन पोस्ट ने कहा कि ‘इंडिपेंडेंट्स फॉर गॉडली गवर्नमेंट’ नामक एक पार्टी उभरी, जिसमें बटलर के अनुयायी शामिल थे। इन्होंने आह्वान किया था कि ‘अयोग्य राजनेताओं को उनके पदों से हटा दिया जाना चाहिए’ और उनकी जगह ‘संतों जैसे व्यक्तियों’ को नियुक्त किया जाना चाहिए।

इसके बाद स्वेन ने गबार्ड की राजनीति में असाधारण प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा, “उन्होंने भगवद-गीता हाथ में लेकर शपथ ली थी और कहा था कि उन्हें कॉन्ग्रेस की पहली हिंदू अमेरिकी सदस्य होने पर गर्व है।” ताकि वे अपने धर्म के प्रति अपनी निष्ठा को रेखांकित कर सकें। बाद में 2012 में ओक्लाहोमा में उनसे घर खरीदने वाली कंपनी की खोज करते समय उन्हें एक ईमेल पता “@nineisles.com” मिला। इससे उन्हें वाशिंगटन में दुष्ट ‘हिंदू गुरु’ और उसके शिष्य के बारे में ज्यादा पुख्ता जानकारी मिली।

लेख में लिखा था, “हिंदी में नौ द्वीप नवद्वीप कहलाता है, जो भारत के पश्चिम बंगाल क्षेत्र का एक शहर है और हरे कृष्ण भक्तों के लिए एक तीर्थ स्थल के रूप में कार्य करता है।”

एसआईएफ ने अखबार का विरोध करते हुए इसे उसकी छवि को नुकसान पहुँचाने वाला बताया है। एसआईएफ की अध्यक्ष जेनी बिशप ने लेखक से कहा, “मुझे नहीं लगता कि वाशिंगटन पोस्ट के पाठक डीएनआई के धर्म पर एक और अविश्वसनीय, कट्टरपंथी हमले में रुचि लेंगे।”

संगठन ने स्वाइन के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि दो लोगों ने बटलर को एक चरमपंथी ‘पंथ’ के नेता के रूप में पेश करने के लिए अपनी जान देने की इच्छा जताई थी।

“यह सब हिंदू-विरोधी भावना और धार्मिक कट्टरता है। जब कोई हिंदू सार्वजनिक शख्सियत किसी हिंदू धार्मिक व्यक्ति से आध्यात्मिक गुरु वाला रिश्ता रखता है या उसके विचारों से सहमत होता है, तो इसे ही गुप्त नियंत्रण का सबूत मान लिया जाता है।” एसआईएफ के एक अन्य प्रतिनिधि ने साल्ट्जबर्ग की आलोचना करते हुए कहा है कि वह संगठन से पैसे ऐंठना चाहता है और मना करने पर ‘प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने’ की धमकी देता है। उन्होंने आगे कहा, “मुझे लगता है कि इससे इन आरोपों को देखने और उनका मूल्यांकन करने का नजरिया पूरी तरह बदल जाता है।”

यह उल्लेखनीय है कि साल्ट्जबर्ग को ऑस्टिन के पास बच्चों की हिरासत से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था। उसने बटलर के एक वरिष्ठ शिष्य से ‘मेरे और मेरे बच्चों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए’ 250000 डॉलर की माँग की। उसने जोर देकर कहा कि बटलर ने उससे ‘भागे हुए बच्चे की रक्षा करने’ का अनुरोध किया था, लेकिन पुलिस के हस्तक्षेप के बाद उसने अपनी कहानी बदल दी, जिसके कारण उसे दो साल की जेल की सजा और भारी जुर्माना का सामना करना पड़ सकता है। हालाँकि बटलर ने उससे बातचीत करने से इनकार कर दिया और उसे वरिष्ठ शिष्य के पास जाने के लिए कहा।

लेख में कहा गया है, “जिस क्षण साल्टजबर्ग ने मुझे बताया कि उसे किशोर भगोड़े मामले में गिरफ्तार किया गया है और एसआईएफ नेताओं से उसका मतभेद हो गया है, मुझे आशंका थी कि एसआईएफ उसकी विश्वसनीयता पर हमला कर सकता है। ऐसा हुआ भी, लेकिन उस तरह से नहीं जैसा मैंने सोचा था।” लेख में इस बात पर जोर दिया गया कि उस पर हिन्दू आध्यात्मिक संगठन की आलोचना करने के कारण हमला किया गया। इस बात को ध्यान में रखे बिना कि उसकी स्थिति किसी व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रभावित हो सकती है।

सुनील खेमानी ने भी तुलसी और बटलर पर हमला करने की निंदा की। लेख में उन्हें बटलर का दाहिना हाथ बताया गया है। ऐसा लगता है, मानो वे एक आध्यात्मिक गुरु के बजाय एक आपराधिक गिरोह चला रहे हों।

उन्होंने कहा, “एक दशक से भी अधिक समय पहले की इन सामग्रियों का अधिकांश भाग मेरे और दूसरे सलाहकारों ने दिए हैं, जिनमें तिलसी गबार्ड के पिता और राज्य सीनेटर माइक गबार्ड भी शामिल हैं। मैंने कई वर्षों तक मीडिया, भाषणों और नीतिगत संदेशों पर उनके साथ काम किया है। इनमें से एक या दो सामग्री बटलर से प्राप्त हुई होंगी, विशेष रूप से भगवद-गीता, हिंदू धर्म और वैदिक गुरु प्रणाली की शिक्षाओं से जुड़ी सामग्री।”

उन्होंने आगे कहा, “इस दावे का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं है कि यह सारा काम बटलर से संबंधित है। फाइल के नाम,उसके चुनिंदा अंश इसे साबित नहीं करते हैं।”

गबार्ड के चीफ ऑफ स्टाफ ने भी रिपोर्ट को ‘एक असंतुष्ट पूर्व स्वयंसेवक द्वारा व्यक्तिगत लाभ के लिए की गई 250000 डॉलर की जबरन वसूली की असफल कोशिश से जुड़े आरोप’ बताया। उन्होंने कहा, “उनकी आस्था और निष्ठा पर किए गए हमले न केवल झूठे हैं, बल्कि हिंदू विरोधी कट्टरता का स्पष्ट उदाहरण हैं।”

स्वाइन ने इस पूरे लेख में यह साबित करने की कोशिश करते रहे कि गबार्ड को बटलर नियंत्रित और निर्देशित करते थे और उन्हें बटलर से ही संदेश प्राप्त होते थे। हालाँकि उन्होंने समय के साथ अपने राजनीतिक रुख में बदलाव किया, जिसमें समलैंगिकता पर उनके विचार भी शामिल हैं, जो एसआईएफ के विचारों के विपरीत हैं।

अमेरिकी राजनीति के विशेषाधिकार प्राप्त ईसाई चेहरे

संयुक्त राज्य अमेरिका में, ईसाइयत या इब्राहीमी से मेल न खाने वाली किसी भी सोच या धर्म को वर्जित या पंथ के रूप में वर्गीकृत करने की प्रवृत्ति है। तुलसी गबार्ड और बटलर के खिलाफ वाशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट इसी घटना का एक उदाहरण है। प्रसिद्ध टीवी प्रचारक, पादरी पाउला व्हाइट-केन को पिछले साल ‘नवनिर्मित व्हाइट हाउस फेथ ऑफिस के विशेष सरकारी कर्मचारी और वरिष्ठ सलाहकार’ के रूप में नियुक्त किया गया था ।

व्हाइट पिछले दो दशकों से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की आध्यात्मिक सलाहकार रही हैं। उन्होंने ट्रम्प की तुलना यीशु मसीह तक से कर दी थी , जिसका भारी विरोध हुआ। नकदी धोखाधड़ी में शामिल होने के कारण उनके ईसाई आलोचकों ने उन्हें ‘ झूठी टीचर’ कहा था। उन्होंने 1000 डॉलर के बदले एक निजी देवदूत की नियुक्ति सहित ‘सात अलौकिक आशीर्वाद’ देने का वादा किया था। उन्होंने 2016 में 1144 डॉलर में ‘पुनरुत्थान के बीज’ भी बेचे थे। उन्होंने दावा किया कि ईश्वर ने उन्हें यह दी थी।

व्हाइट और उनके पति ने ‘विदाउट वॉल्स इंटरनेशनल चर्च’ की स्थापना की थी। दोनों को कई विवादों और निजी जेट पर किए गए खर्च सहित धन के दुरुपयोग के आरोपों का सामना करना पड़ा था। वह मंच पर अपने अजीबोगरीब कारनामों और अपने भाषणों के दौरान नस्ल और आप्रवासन पर विवादास्पद टिप्पणियां करने के लिए भी कुख्यात हैं।

ट्रंप की करीबी होने और लंबे समय से साथ रहने खासकर उनके प्रशासन में शामिल होने के बाद भी उन पर ट्रंप के प्रभाव को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया जाता है।

ये घृणित हमले अमेरिका में केवल हिंदू धर्म तक ही सीमित नजर आते हैं। अमेरिका में ऐसे कई अन्य लोग भी हैं, जिनका रिकॉर्ड संदिग्ध है, लेकिन ईसाई होने के कारण उन्हें इस तरह की शत्रुता का सामना नहीं करना पड़ता।

ओक्लाहोमा के एक चर्च पादरी जैक्सन लाहमियर ने ‘पास्टर्स फॉर ट्रंप’ की स्थापना की थी। उससे विवाहेतर संबंध का खुलासा हुआ, जिसके बाद ओक्लाहोमा से अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की सीट के लिए हुए दूसरे दौर के चुनाव से उसे हटना पड़ा। हालाँकि राष्ट्रपति ट्रंप ने उनका समर्थन किया था और उन्हें ‘MAGA (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन)’ योद्धा के रूप में सराहा था।

हालाँकि, ओक्लाहोमा के पहले कॉन्ग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से उनकी उम्मीदवारी उस समय धराशायी हो गई जब डेली मेल ने कैटलिन सिमंस की को भेजे गए उनके रोमांटिक टेक्स्ट मैसेज जारी कर दिए। कैटलिन पूर्व मिस ओक्लाहोमा यूएसए हैं और उन्होंने चुनाव प्रचार के लिए चंदा इकट्ठा करने का काम किया था।

डेली वायर की लेखिका और रिपब्लिकन रणनीतिकार कार्ली बर्ड ने लाहमियर को ‘एक अहंकारी और घिनौना व्यक्ति’ करार दिया। उन्होंने कहा, “वह जानते हुए भी कि उसका अफेयर चल रहा था, चुनाव में इसलिए बना रहा क्योंकि उसे लगा कि वह बच जाएगा। उसने पहले इनकार किया, लेकिन फिर चुनाव से हट गया और फिर डेली मेल यूएस को एक इंटरव्यू दिया।”

लाहमियर ने स्वीकार किया कि उसका अफेयर था और उन्होंने उस महिला को चूमा था। उनके अनुसार, “चुनाव के दौरान दोनों के बीच शारीरिक संबंध नहीं बने। हालाँकि उन्होंने 2022 में उसके साथ यौन संबंध बनाने की बात कबूल की। उन्होंने माना कि वो अपनी पत्नी को धोखा दे रहे थे।

हालाँकि उनके गंभीर अपराध के कारण उन्हें ‘पंथ’ का नेता घोषित नहीं किया गया और न ही इससे उनके संगठन पर देश के प्रेस द्वारा कड़ी निगरानी रखी गई। यह पैटर्न उन सभी मामलों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है जहाँ आरोपी द्वारा अपनाए गए धर्म का पालन करने पर धर्म या समूह का कोई उल्लेख नहीं होता।

वाशिंगटन पोस्ट ने अपने दावों में सच्चाई की परवाह किए बिना, गबार्ड पर राजनीतिक रूप से प्रेरित हमला करते हुए एक विशेष धर्म को नीचा दिखाने की कोशिश की। इसके लिए उसकी आलोचना की ही जानी चाहिए। हालाँकि इससे कोई बदलाव नहीं आएगा, क्योंकि व्हाइट हाउस से लेकर अखबारों के दफ्तरों तक हिंदू विरोधी भेदभाव गहराई से समाया हुआ है।

यही कारण है कि उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने अपने MAGA समर्थकों को संतुष्ट करने के लिए अपनी हिंदू पत्नी के धर्म परिवर्तन की उम्मीद जताई और स्वाइन ने एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी की राजनीति पर चर्चा करते समय धर्म का मुद्दा बीच में लाया। यही वजह है कि हिंदू समूहों को पंथ कहा जाता है, जबकि ईसाई संगठनों के लिए ऐसी शब्दावली का प्रयोग कभी नहीं किया जाता।

(यह लेख मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

लखनऊ अग्निकांड के दौरान आखिरी कॉल्स, धुएँ में घुटती साँसें और 15 जिंदगियों का अंत: पढ़ें पीड़ित परिवारों की दर्दनाक दास्तां

सोमवार (22 जून 2026) की दोपहर किसी और दिन जैसी ही थी। लखनऊ के अलीगंज इलाके में उषा मेहता मार्ग स्थित उस तीन मंजिला इमारत के भीतर रोज की तरह जिंदगी चल रही थी। कहीं कंप्यूटर स्क्रीन पर काम हो रहा था, कहीं छात्र अपने नोट्स लेकर बैठे थे, कहीं कोई लाइब्रेरी में अगले एग्जाम की तैयारी कर रहा था।

किसी ने घर पर फोन करके कहा होगा कि शाम तक लौट आएँगे, किसी ने माँ से पूछा होगा कि खाने में क्या बना है और किसी ने अगले महीने की योजना बना ली होगी। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ घंटों बाद इन्हीं फोन कॉल्स में से कुछ आखिरी साबित होंगी और कुछ लोग उस इमारत से कभी बाहर नहीं निकल पाएँगे।

दोपहर बीतते-बीतते उस इमारत में अचानक अफरातफरी मच गई। कुछ लोगों ने पहले धुआँ देखा, कुछ ने जलने की गंध महसूस की और कुछ को समझ ही नहीं आया कि आखिर हुआ क्या है। लेकिन कुछ ही मिनटों में पूरा माहौल बदल गया। दोपहर करीब 3 बजे इसी प्रॉपर्टी में आग लगी, जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई।

भीषण अग्निकांड के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अलीगढ़ में चल रहे सभी कार्यक्रम छोड़ सीधे लखनऊ पहुँचे। मुख्यमंत्री के निर्देश पर राहत एवं बचाव कार्य को तेज किया गया, घायलों के इलाज की विशेष व्यवस्था की गई और कुछ ही घंटों के भीतर आरोपितों की गिरफ्तारी व जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू कर दी गई।

आग नहीं, धुआँ बना लोगों की जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन

शुरुआती जाँच में आग की शुरुआत एसी डक्ट से होने की आशंका जताई गई है, लेकिन इस हादसे को सिर्फ आग का हादसा कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता। इस घटना में सबसे घातक चीज आग नहीं बल्कि धुआँ साबित हुआ। आग ने कुछ हिस्सों को अपनी चपेट में लिया, लेकिन उससे पहले धुएँ ने पूरी इमारत को भर दिया।

उस समय बिल्डिंग में अलग-अलग गतिविधियां चल रही थीं। बेसमेंट और निचली मंजिलों पर अन्य व्यावसायिक काम थे, जबकि ऊपर लाइब्रेरी, कोचिंग और एनिमेशन से जुड़ी गतिविधियां चल रही थीं। ऊपर मौजूद लोगों को शायद शुरुआत में लगा कि नीचे उतर जाएँगे, लेकिन धुआँ इतनी तेजी से फैला कि कुछ ही मिनटों में साँस लेना मुश्किल हो गया।

लोग बाहर निकलने के लिए दौड़े लेकिन गलियारे धुएँ से भर चुके थे। जो लोग सीढ़ियों की तरफ पहुँचे, उन्हें सामने कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ वापस कमरों में लौटे, कुछ खिड़कियों की तरफ भागे और कुछ वहीं फँस गए। बाद में डॉक्टरों और शुरुआती रिपोर्टों में यही सामने आया कि बड़ी संख्या में मौतें सीधे आग से नहीं बल्कि दम घुटने के कारण हुईं।

इसका मतलब था कि कई लोगों के पास जिंदा रहने का मौका था, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता उनके पास नहीं पहुँच पाया।

‘पापा मुझे बचा लो…’ – वे फोन कॉल्स जो अब कभी नहीं कटेंगी

इस हादसे का सबसे दर्दनाक हिस्सा वह नहीं था जो बाहर से दिखाई दिया, बल्कि वह था जो मोबाइल फोन के जरिए परिवारों तक पहुँचा। जब लोगों को लगा कि अब हालात हाथ से निकल रहे हैं, तो उन्होंने अपने सबसे करीब लोगों को फोन किया। 23 वर्षीय सुखमणि सिंह ने अपने पिता को फोन किया, कहा, “पापा आग लग गई है, मुझे आकर बचा लो।”

आवाज में डर था और उम्मीद भी थी कि शायद कुछ मिनट में कोई पहुँच जाएगा। पिता तुरंत निकले लेकिन रास्ते और हालात दोनों उनसे तेज थे। 25 साल के आदित्य श्रीवास्तव ने भी मदद की गुहार लगाई। उसके दोस्त बताते हैं कि वह लगातार संपर्क करने की कोशिश कर रहा था। किसी ने माँ को फोन किया, किसी ने भाई को, किसी ने दोस्त को।

अपने बेटे की तलाश में भटक रहे पारिजोत सिंह ने बताया कि उनके पास फोन आया था। उनका बेटा आग में फंसा था, उसने उन्हें फोन कर कहा, “पापा, आग लग गई है..मुझे बचा लो..” पारिजोत ने कहा कि बेटे की आवाज सुनकर उनके पैरों के नीचे से जमीन निकल गई और वो भागते हुए वहाँ पहुँचे लेकिन, पुलिसवालों ने उन्हें आगे नहीं जाने दिया।

एक माँ लगातार रोते हुए कह रही थी कि उसे उसके बेटे तक जाने दिया जाए। लेकिन अंदर हालात ऐसे थे कि किसी को जाने नहीं दिया जा सकता था। जो लोग बाहर खड़े थे, वे सिर्फ इंतजार कर सकते थे और कई लोगों के लिए यही इंतजार आखिरी साबित हुआ।

सुरक्षा व्यवस्था ही बन गई मौत का जाल, खुद को बचाने की कोशिश में लगे रहे लोग

हादसे के बाद जो जानकारियाँ सामने आईं, उन्होंने कई सवाल खड़े कर दिए। बताया गया कि जिस एनिमेशन सेंटर में कई छात्र और कर्मचारी मौजूद थे, वहाँ पूरी व्यवस्था काफी हद तक ऑटोमेटिक और बायोमीट्रिक सिस्टम पर आधारित थी। एंट्री नियंत्रित थी और दरवाजे भारी थे।

लेकिन हादसे के दौरान बिजली चली गई। परिजनों और शुरुआती जानकारी के मुताबिक, बिजली जाते ही सिस्टम ठप हो गया और गेट लॉक जैसी स्थिति में आ गया। अंदर मौजूद लोगों ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन हालात उनके खिलाफ थे। कुछ लोगों ने दरवाजा धक्का देकर खोलने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।

जब लगा कि अब दरवाजा रास्ता नहीं बनेगा, तो लोगों ने दूसरी दिशा तलाशनी शुरू की। कुछ युवाओं ने शीशे तोड़े। कुछ ने पाइप पकड़कर नीचे उतरने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कुछ लोग तार पकड़कर नीचे आते दिखाई दिए। कुछ लोग नीचे गिर गए। कुछ घायल हो गए। कुछ शायद उतर ही नहीं पाए।

इस बीच एक के बाद एक साथ चार-पाँच बच्चों ने छलांग लगा दी। इनमें एक बच्चा नीचे लगी ग्रिल पर गिर गया, जिसकी सरिया उसके पेट में धंस गई। कुछ लोगों ने तीसरी मंजिल से छलांग लगाने का फैसला किया, क्योंकि अंदर रहना उन्हें ज्यादा खतरनाक लग रहा था। यह वह पल था जहाँ हर व्यक्ति अपने तरीके से जिंदगी बचाने की कोशिश कर रहा था।

संयम, सूरजभान, आदित्य, रहमान: 15 नामों के पीछे छूट गई पूरी दुनिया

इस हादसे में जिन लोगों की जान गई, वे सिर्फ आँकड़े नहीं थे। हर नाम के पीछे एक घर था, एक संघर्ष था और किसी का पूरा भविष्य था। कानपुर के संयम विज के घर में कुछ दिन पहले ही दादी का निधन हुआ था। घर में तेरहवीं की तैयारी चल रही थी। परिवार को उम्मीद थी कि संयम आएगा और सारी जिम्मेदारियाँ संभालेगा।

लेकिन शाम तक खबर बदल चुकी थी। जिस घर में रस्मों की तैयारी थी, वहाँ मातम फैल गया। सूरजभान सिंह अपने घर का बड़ा सहारा थे। पिता पहले ही नहीं रहे थे। माँ और छोटे भाई की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। वह नौकरी के लिए बाहर रहते थे लेकिन घर आते रहते थे। इस बार भी माँ इंतजार कर रही थीं।

फर्क सिर्फ इतना था कि परिवार को सच पता था और माँ को नहीं। 24 वर्षीय अब्दुल रहमान परिवार का इकलौता कमाने वाला बेटा था। अब्बू लकवाग्रस्त बताए गए। अम्मी घर संभालती थीं। कुछ महीने पहले नौकरी मिली थी और परिवार को लगा था कि अब हालात सुधरेंगे।

आदित्य श्रीवास्तव थ्री-डी एनिमेशन सीख रहे थे। उनके सपनों की दिशा तय हो रही थी। लेकिन जिस जगह से करियर बनना था, वहीं उनकी जिंदगी रुक गई। मृतकों में सागर, नीलेश, अनामिका, संयम, अनुछा, सुखमनी, आदित्य श्रीवास्तव, ज्योति, भविष्य, अब्दुल रहमान, सूरज शाह, शाहजान, जयनिल चक्रवर्ती, मोहम्मद अम्मार और सुमाल्या के नाम सामने आए।

मृतकों और घायलों के लिए मुआवजे का ऐलान, अलीगंज थाने में मुकदमा, 4 आरोपित गिरफ्तार

हादसे में जान गँवाने वाले लोगों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को 5-5 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। इसके अलावा घायलों को 50-50 हजार रुपए की सहायता राशि देने का भी ऐलान किया गया। सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रभावित परिवारों को हर संभव मदद उपलब्ध कराई जाएगी।

मुख्यमंत्री ने मामले की गहन जाँच के लिए दो सदस्यीय विशेष जाँच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया है। SIT को सात दिनों के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है। घटना के संबंध में थाना अलीगंज में 6 लोगों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया गया है और चार आरोपितों को गिरफ्तार भी कर लिया है।

प्रारंभिक जाँच में लापरवाही सामने आने पर मुख्यमंत्री के निर्देश पर चार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लखनऊ विकास प्रधिकरण ने अलीगंज की उस इमारत को गिराने का नोटिस जारी कर दिया है। इससे पहले 10 मई 2016 को ध्वस्तीकरण का आदेश भी जारी किया था। 

सीएम योगी ने परिवारों को दिया कड़ी कार्रवाई का आश्वासन

घटना के बाद सरकार की तरफ से कार्रवाई तेज हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ घटनास्थल पर पहुँचे, अधिकारियों से घटना की सारी जानकारी ली। इसके बाद उन्होंने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) का दौरा किया और आग लगने की घटना में घायल हुए लोगों से मुलाकात की।

मुख्यमंत्री ने शोक-संतप्त परिवारों से बातचीत की, उनके प्रति संवेदना व्यक्त की और आश्वासन दिया कि हर जिम्मेदार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

अब इमारत की स्वीकृति से लेकर फायर सेफ्टी और प्रशासनिक जिम्मेदारियों तक हर पहलू की जाँच की जा रही है। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सच यह है कि हादसे के बाद शुरू हुई कार्रवाई उन परिवारों की जिंदगी को पहले जैसा नहीं कर सकती, जिनके घरों के दरवाजे अब हमेशा के लिए अधूरे इंतजार में रह गए।

कहीं माँ अब भी फोन की स्क्रीन देख रही है, कहीं पिता आखिरी कॉल को बार-बार याद कर रहे हैं। लखनऊ का यह अग्निकांड सिर्फ एक हादसा नहीं बनकर रह गया है। यह उन सपनों की कहानी बन गया है जो नौकरी, पढ़ाई और बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर उस इमारत में गए थे, लेकिन वापस नहीं लौट सके।