प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुुरुवार (4 दिसंबर 2025) को अंतर्राष्ट्रीय चीता दिवस के मौके पर वन्यजीव प्रेमियों को शुभकामनाएँ दी हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान अपने कार्यकाल में शुरू किए गए ‘प्रोजेक्ट चीता’ की उपलब्धियों की जिक्र किया है। जब देश में इस प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई थी तो कॉन्ग्रेस जैसे विपक्षी दलों ने इसका खूब मजाक उड़ाया था लेकिन इसकी सफलता ने विरोधियों को शांत कर दिया है।
पीएम मोदी ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री मोदी ने X पर तीन पोस्ट कर वन्यजीव प्रेमियों को शुभकामनाएँ दी हैं। PM मोदी ने X पर लिखा, “हमारे ग्रह के सबसे अद्भुत जीवों में से एक चीते की रक्षा के लिए समर्पित सभी वन्यजीव प्रेमियों और संरक्षणवादियों को ‘अंतरराष्ट्रीय चीता दिवस’ पर मेरी शुभकामनाएँ। हमारी सरकार ने 3 साल पहले इस शानदार जानवर की सुरक्षा और उस पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से ‘प्रोजेक्ट चीता’ शुरू किया था जिसमें यह वास्तव में फल-फूल सके। यह खोई हुई पारिस्थितिक विरासत को पुनर्जीवित करने और हमारी जैव विविधता को मजबूत करने का भी एक प्रयास था।”
PM मोदी ने लिखा, “भारत को कई चीतों का घर होने पर गर्व है और उनमें से एक बड़ी संख्या भारतीय धरती पर पैदा हुई है। उनमें से कई अब कुनो राष्ट्रीय उद्यान और गांधी सागर अभयारण्य में पनप रहे हैं। चीता पर्यटन की लोकप्रियता में भी वृद्धि देखकर खुशी होती है। मैं दुनिया भर के और अधिक वन्यजीव प्रेमियों को भारत आने और चीते को में देखने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ।”
उन्होंने आगे लिखा, “चीता संरक्षण में हमारी प्रगति हमारे लोगों खासतौर पर हमारे समर्पित चीता मित्रों के सामूहिक सहयोग से ही संभव हुई है। वन्यजीवों की रक्षा करना और प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर रहना भारत के लोकाचार का अभिन्न अंग है और हम आज इन प्रयासों में उस भावना को जीवित देखते हैं।”
On International Cheetah Day, my best wishes to all wildlife lovers and conservationists dedicated to protecting the cheetah, one of our planet’s most remarkable creatures. Three years ago, our Government launched Project Cheetah with the aim of safeguarding this magnificent… pic.twitter.com/FJgfJqoGeA
प्रधानमंत्री मोदी ने 17 सितंबर 2022 को अपने जन्मदिन के मौके पर मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो राष्ट्रीय उद्यान में चीते छोड़कर इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। उस समय नामीबिया से 8 चीतों को कूनो लाया गया था।
हालाँकि, तभी से इस प्रोजेक्ट को लेकर BJP और प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठने शुरू हो गए थे। जिस दिन यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ उसी दिन कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने पीएम मोदी पर हमला करते हुए इसे एक नौटंकी करार दिया था। यह कोई पहला या इकलौता हमला नहीं था बल्कि इसके बाद कॉन्ग्रेस और विपक्ष के नेताओं ने पर इस पर लगातार सवाल उठाए।
इतना ही नहीं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने भी इस प्रोजेक्ट पर तंज कसे थे। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष नाना पटोले ने यह दावा किया था कि इन चीतों को भारत में इसलिए लाया जा रह है ताकि यहाँ भी लम्पी वायरस फैलाया जा सके। उन्होंने यह भी दावा किया कि इससे किसानों को नुकसान होगा।
श्योपुर के कॉन्ग्रेस के एक नेता ने तो यहाँ तक दावा कर दिया था कि वो चीते हैं ही नहीं बल्कि बिल्लियाँ हैं। उन्होंने इस प्रोजेक्ट को पैसे की बर्बादी बताया और कहा कि पूरा श्योपुर इससे परेशान है। भारत आए चीतों की जब प्राकृतिक कारणों सो मौत भी हुई तो भी इसे बहस का मुद्दा बना दिया गया। कॉन्ग्रेस ने सत्ता पक्ष से खूब सवाल पूछे।
प्रोजेक्ट चीता की सफलता ने विरोधियों को कराया चुप
1950 के दशक में भारत में चीते को विलुप्त घोषित कर दिया गया था और देश में एक भी चीता नहीं बचा था। दशकों तक इस बात की कोशिशें चलीं कि ‘सबसे तेज धावक’ को फिर भारत लाया जाए। इस बीच जनवरी 2022 में ‘Action Plan for Introduction of Cheetah in India’ बनाया गया और तय हुआ कि 5 वर्षों में 50 चीतों को भारत में बसाया जाएगा। इसके लिए जगह चुनी गई मध्य प्रदेश का कूनो राष्ट्रीय उद्यान।
मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में कुल 20 चीतों को छोड़ा गया था। इनमें 8 चीते सितंबर 2022 में नामीबिया से और 12 चीते फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से लाए गए थे। उस समय कई विशेषज्ञों और आम लोगों ने इस परियोजना पर सवाल उठाए थे लेकिन समय ने यह साबित कर दिया कि ये आशंकाएँ गलत थीं।
भारत में चीते को उसके प्राकृतिक आवास में वापस बसाने की कोशिशें अब एक नए और सफल चरण में प्रवेश कर चुकी हैं। जनसंख्या बढ़ोतरी, बेहतर आवास और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी इन सभी मोर्चों पर देश ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है।
कूनो उद्यान में चीतों की मूवमेंट को दिखाता मैप (फोटो: NTCA)
दिसंबर 2025 तक भारत में 32 चीते सुरक्षित रूप से मौजूद हैं। इनमें से 21 चीते भारत में ही जन्मे शावक हैं। किसी भी देश में इतनी तेज और स्थिर वृद्धि को वन्यजीव क्षेत्र में की बड़ी उपलब्धि माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विश्व स्तर पर किसी भी बड़े मांसाहारी प्रजाति के पुनर्वास कार्यक्रम के लिए सबसे शानदार कार्यक्रम में से एक है।
भारत में जन्मों ने चीतों की संख्या बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। हाल ही में भारत में जन्मी मादा चीता मुखी ने नवंबर 2025 में 5 स्वस्थ शावकों को जन्म दिया। यह उपलब्धि इस प्रोजेक्ट के भविष्य को और मजबूत करती है और बताती है कि देश का वातावरण और इनके संरक्षण की व्यवस्था चीतों के लिए मददगार साबित हो रही है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बुलावे पर वार्षिक भारत-रूस समिट में शामिल होने के लिए भारत आ रहे हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की विदेश यात्राएँ दुनिया में सबसे गोपनीय व किलेबंद सुरक्षा प्रोटोकॉल मानी जाती हैं। जहर, जासूसी, स्वास्थ्य लीक और हमलों के खतरे से बचाने के लिए रूस की एफएसओ एजेंसी उनके जीवन के हर कदम को नियंत्रित रखती है।
दुनिया में कई नेता सुरक्षा घेरे में घूमते हैं, लेकिन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सुरक्षा व्यवस्था इतनी गुप्त और अभेद्य है कि उसे आधुनिक दौर का ‘चलता-फिरता किला’ कहा जा सकता है। उनकी विदेश यात्रा केवल राजनयिक दौरा नहीं, बल्कि एक उच्च स्तरीय गोपनीय सैन्य अभियान जैसी होती है, जिसमें उनका हर कदम पहले से नियंत्रित और सुरक्षित होता है, चाहे वह खाना हो, विमान हो, फोन हो या फिर बाथरूम।
व्लादिमीर पुतिन के ‘पूप सूटकेस’ का रहस्य
पुतिन की सुरक्षा व्यवस्था का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा उनका ‘पूप सूटकेस’ है। विदेश यात्राओं के दौरान उनके निजी बॉडीगार्ड्स उनका मल विशेष बैग में इकट्ठा कर सील करते हैं और उसे एक गुप्त सूटकेस में रूस वापस ले जाया जाता है।
ऐसा कहा जाता है कि पुतिन को अपने स्वास्थ्य के बारे में जानकारी लीक होने का खतरा है इसीलिए वे मल अपने साथ लेकर लौटते हैं। विदेशी ताकतों को राष्ट्रपति के मल के नमूने से उनके स्वास्थ्य की जानकारी पता लग सकती है और वो ऐसा नहीं चाहते हैं।
(फोटो साभार: AI)
यानी ऐसा इसलिए किया जाता है कि राष्ट्रपति के मल का नमूना दूसरे देशों के पास न पहुँच सके। BBC की पूर्व पत्रकार फरीदा रुस्तमोवा बताती हैं कि 1999 में रूस के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही पुतिन की सुरक्षा में उनके मल को इकट्ठा करके वापस रूस लाया जाता है।
पत्रकार के अनुसार, वियना की यात्रा में तो पुतिन अपने प्राइवेट बाथरूम के साथ पहुँचे थे, जिसमें पोर्टेबल टॉयलेट था। पुतिन अपने स्वास्थ्य की जानकारी विदेशी ताकतों तक नहीं पहुँचाना चाहते हैं। वैसे ही पुतिन की स्वास्थ्य को लेकर कुछ वर्षों में कई दावे सामने आए हैं। इससे बचने के लिए राष्ट्रपति ऐसा करते हैं।
इसका उद्देश्य विदेशी जासूसों को उनके स्वास्थ्य विश्लेषण से रोकना है। यह प्रोटोकॉल 2017 के फ्रांस दौरे, 2019 की सऊदी यात्रा और हेलसिंस्की शिखर सम्मेलन में देखा गया।
पत्रकार फरीदा रुस्तामोवा के अनुसार, पुतिन हमेशा निजी या पोर्टेबल शौचालय ही इस्तेमाल करते हैं। यह परंपरा सोवियत काल की उस सोच से जुड़ी है जब स्टालिन ने माओ त्से-तुंग के मल का विश्लेषण करवाया था।
कभी असली पुतिन कभी कॉपी
दावों के मुताबिक, पुतिन ने पब्लिक अपियरेंस में कई बार बॉडी डबल्स का इस्तेमाल किया है, खासकर तब, जब खतरा ज्यादा हो। यूक्रेन की इंटेलिजेंस का दावा है कि कम से कम तीन लोग उनके हमशक्ल के रूप में तैयार किए गए हैं, जिनमें से कुछ ने अपना लुक पूरी तरह मैच कराने के लिए प्लास्टिक सर्जरी तक कराई है।
भोजन सुरक्षा और मोबाइल फूड लैब
पुतिन का भोजन विशेष रूसी शेफ तैयार करते हैं, जो हथियार संचालन और मिलिट्री ट्रेनिंग प्राप्त होते हैं। विदेश यात्राओं में एडवांस टीम होटल से स्थानीय खाद्य सामग्री हटाकर रूसी सामान स्थापित करती है।
बॉडीगार्ड्स भोजन का स्वाद पहले चखते हैं और एक मोबाइल लैब उनकी प्लेट में पहुँचने से पहले जहर या रेडिएशन की जाँच करती है। पुतिन फास्ट फूड, शराब और रात में मीट से परहेज करते हैं और अक्सर ओलिवियर सलाद, बैंगन ऐपेटाइजर और अदरक या गुलाब की चाय पसंद करते हैं।
(फोटो साभार: हिंद फर्स्ट)
बॉडीगार्ड्स: ‘साइलेंट प्रोटेक्टर्स’
एफएसओ की राष्ट्रपति सुरक्षा सेवा (SBP) में चुने जाने वाले बॉडीगार्ड्स 35 वर्ष से कम उम्र, 180 सेमी से ऊँचाई और मानसिक-शारीरिक फिटनेस वाले होते हैं। वे बहुभाषी, मार्शल आर्ट्स प्रशिक्षित और उच्च स्तर की निष्ठा जाँच से गुजरते हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उनकी टीम में स्नाइपर्स, ड्रोन विशेषज्ञ और इलेक्ट्रॉनिक सर्वेलेन्स यूनिट शामिल होती है। अंतर्राष्ट्रीय यात्रा से पहले, उनके बॉडीगार्ड्स को कथित तौर पर दो सप्ताह के लिए क्वारंटीन में रखा जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे पूरी तरह से तैयार हैं और उनमें संक्रमण नहीं है। पुतिन, उनकी निजी जानकारी या रूटीन साझा करना कानूनी रूप से वर्जित है।
वाहन और विमान: बुलेटप्रूफ नहीं, ‘वॉरप्रूफ’
पुतिन का विमान IL-96-300PU, जिसे ‘फ्लाइंग प्लूटो’ कहा जाता है, अत्याधुनिक मिसाइल रक्षा, न्यूक्लियर लॉन्च सिस्टम और मेडिकल सेंटर से लैस है। यह अक्सर दो बैकअप विमानों और लड़ाकू जेट्स के साथ उड़ता है। इसमें मिसाइल डिफेंस सिस्टम, जिम, ऑपरेशन रूम, बार, मेडिकल यूनिट और हाई-सिक्योरिटी कम्युनिकेशन सिस्टम है। माना जाता है कि इस विमान में एक ऐसा बटन भी है जिससे वे हवा में रहते हुए न्यूक्लियर स्ट्राइक की मंजूरी दे सकते हैं।
लैंडिंग के बाद पुतिन जिस कार में बैठते हैं, वह Aurus Senat कहलाती है। यह सिर्फ बुलेटप्रूफ नहीं, बल्कि ग्रेनेड या केमिकल अटैक झेलने में सक्षम है। रिपोर्ट्स कहती हैं कि यह कार चारों टायर पंचर होने पर भी चलती रहती है। इसमें ऑक्सीजन सप्लाई, फायर सप्रेशन सिस्टम, कमांड कंट्रोल और मेडिकल सपोर्ट जैसी सुविधाएँ मौजूद हैं।
होटल और मूवमेंट कंट्रोल सिस्टम
विदेश प्रवास के दौरान पुतिन के लिए अलग लिफ्ट, अलग मार्ग और अलग पानी व हवा की आपूर्ति की व्यवस्था होती है। मोबाइल फोन, ओपन नेटवर्क और सार्वजनिक संपर्क से वे परहेज करते हैं। कई मौकों पर उन्होंने विमान की जगह एक विशेष सुरक्षित ट्रेन का इस्तेमाल किया है। सार्वजनिक कार्यक्रमों में गार्ड्स हैंडहेल्ड एंटी-ड्रोन डिवाइस लेकर चलते हैं।
शीत युद्ध की विरासत और छाया सुरक्षा व्यवस्था
यह संपूर्ण सुरक्षा ढाँचा केजीबी की विरासत है और इसे एफएसओ 1996 से संचालित करती है। इसका उद्देश्य सिर्फ पुतिन की सुरक्षा नहीं बल्कि उनकी निजी जानकारी, खासकर स्वास्थ्य और निर्णय प्रणाली को शून्य जोखिम पर रखना है। उनकी सुरक्षा टीम के कई सदस्य बाद में सरकारी पदों पर पहुँचते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह केवल सुरक्षा नहीं बल्कि सत्ता का सबसे संवेदनशील विश्वास तंत्र है।
हाई अलर्ट मोड में दिल्ली: राजघाट से लेकर भारत मंडपम तक तैयारियाँ
दिल्ली में होने वाली भारत-रूस वार्षिक समिट से पहले राजधानी हाई-अलर्ट मोड में है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन गुरुवार (4 दिसंबर 2025) की रात दिल्ली पहुँचेंगे और दोनों नेता डिनर पर मुलाकात करेंगे। अगले दिन राष्ट्रपति भवन में उनका औपचारिक स्वागत होगा।
शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को पुतिन गाँधी स्मृति स्थल राजघाट जाएँगे। इसके बाद हैदराबाद हाउस में भारत-रूस समिट होगी, जिसमें रक्षा, रणनीतिक साझेदारी और ऊर्जा सहयोग जैसे अहम मुद्दों पर बातचीत तय है। शाम को वह भारत मंडपम में एक कार्यक्रम में शामिल होंगे और रात को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा आयोजित स्टेट डिनर में हिस्सा लेंगे।
सुरक्षा में 5 लेयर का घेरा और रूसी कमांडोज तैनात
पुतिन की यात्रा को लेकर सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट हैं। उन्हें पाँच-स्तरीय सिक्योरिटी कवर दिया जा रहा है। रूसी प्रेसिडेंशियल सिक्योरिटी सर्विस के करीब 50 विशेष कमांडो पहले ही दिल्ली पहुँच चुके हैं। इनके साथ NSG कमांडो, दिल्ली पुलिस की स्पेशल यूनिट्स और स्नाइपर टीमें भी मैदान में हैं।
ड्रोन-निगरानी, जामर, फेशियल रिकग्निशन कैमरे और AI-आधारित ट्रैकिंग सिस्टम सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं। पुतिन के लैंड करते ही कंट्रोल रूम से सभी टीमों को रियल-टाइम अलर्ट और मूवमेंट अपडेट मिलते रहेंगे।
रहने और मूवमेंट के रूट का भी सैनिटाइजेशन
जिस होटल में पुतिन रुकेंगे, वहाँ रूसी सिक्योरिटी एजेंट पहले से तैनात हैं। जिन-जगहों पर वह जा सकते हैं, उनकी भी लगातार जाँच और स्कैनिंग की जा रही है। भारत में उनके इस्तेमाल के लिए रूस से उनकी खास आर्मर्ड लिमोजीन Aurus Senat भी मँगाई गई है।
जब भी किसी पड़ोसी देश पर कोई त्रासदी आती है तब पाकिस्तान के व्यवहार में एक अजीब सा पैटर्न दिखाई देता है। प्राकृतिक आपदा हो, मानवीय संकट हो या लोगों की समस्या- पाकिस्तान उसे मदद की तात्कालिक पुकार की तरह नहीं, बल्कि आत्म-प्रशंसा वाले प्रचार का मौका समझता है।
यह उसकी पेशेवर आदत बन चुकी है- कम से कम काम करके, अधिक अधिक जोर-शोर से उसका प्रचार करना और उम्मीद करना कि दुनिया तालियाँ बजाएगी। लेकिन हर बार सच बाहर आ ही जाता है- ठीक उसी तरह जैसे पाकिस्तान की ‘मदद’ के नाम पर भेजी गई एक्सपायर्ड दालों की बदबू।
पाकिस्तान की ताजा किरकिरी सामने आई। पहले ही विनाशकारी बाढ़ और एक घातक चक्रवात के घावों से जूझ रहा ये द्वीपीय देश पाकिस्तान की ‘मदद’ का शिकार बना। कोलंबो स्थित पाकिस्तान उच्चायोग ने गर्व से ऑनलाइन तस्वीरें पोस्ट कीं, मानो वे राहत सामग्री श्रीलंका के पीड़ितों के लिए किसी बड़ी नेकी के तौर पर भेज रहे हों।
शायद उन्हें उम्मीद थी कि हैशटैग चलेंगे, तारीफें मिलेंगी और कूटनीतिक लाभ होगा। लेकिन इसके बदले में उसे अपमान मिला। उन चमकदार ‘राहत’ पैकेटों पर साफ-साफ तारीख छपी थी- EXP: 10/2024। किसी भी PR फिल्टर से छिप नहीं सकी। राहत सामग्री एक साल से भी अधिक पुरानी, यानी पूरी तरह एक्सपायर्ड थी।
मानवीय सहायता का उद्देश्य संकटग्रस्त लोगों को सहारा देना होता है, लेकिन पाकिस्तान ने श्रीलंका को जो भेजा, वह सहानुभूति के नाम पर पैक किया गया कचरा था। जिन चीजों को फेंक देना चाहिए था, उन्हें उन लोगों को थमा दिया गया जिन्होंने पहले ही बहुत कुछ खो दिया था। यह सिर्फ लापरवाही नहीं- यह क्रूरता है।
और तो और, उच्चायोग ने खुद ही इन एक्सपायर्ड पैकेटों की तस्वीरें पोस्ट कर दीं। मतलब पाकिस्तान की पूरी कूटनीतिक श्रृंखला में किसी ने यह देखने की जहमत तक नहीं उठाई कि वे क्या भेज रहे हैं। सहानुभूति दिखाने के लिए अमीर होना जरूरी नहीं होता, लेकिन पाकिस्तान हर बार यह साबित कर देता है कि उसे परवाह ही नहीं।
यह कोई पहली गलती नहीं- पाकिस्तान की खोखली मानवता वाला पैटर्न
श्रीलंका तो बस उस किताब का नया चैप्टर है जिसे पाकिस्तान वर्षों से लिख रहा है, दिखावटी मानवता का मैनुअल। इसका आइडिया है- कुछ भी भेज दो, नैतिकता का दावा करो और उम्मीद करो कि घरेलू मीडिया और सोशल मीडिया पर लोग इसे वैश्विक सद्भावना कहेंगे। फोटो-ऑप पर आधारित यह दाँव-पेंच पाकिस्तान की पहचान बन चुकी है।
2022 में अपने दूसरे पड़ोसी देश और उस समय अपने साथ भाईचारे रखने का दावा करने वाले अफगानिस्तान को पाकिस्तान ने सड़ा हुआ गेहूं भेजा था। यह थोड़ा बहुत खराब या ‘एक्सपायरी के करीब’ नहीं था बल्कि पूरी तरह से सड़ा हुआ था।
तालिबान तक को सार्वजनिक रूप से कहना पड़ा कि यह गेहूं खाने लायक नहीं है। जब तालिबान आपको क्वालिटी कंट्रोल पर लेक्चर दे, तो समझ जाना चाहिए कि स्थिति कितनी गिर चुकी है।
हालाँकि पाकिस्तान आत्मनिरीक्षण और जवाबदेही से हमेशा ही बचता आया है। यह जाँच करने के बजाय कि ऐसी खराब सामग्री क्यों भेजी गई, पाकिस्तान ने उस अफगान प्रवक्ता को ही हटवा दिया जिसने सच बोलने की हिम्मत की थी।
पाकिस्तान की दुनिया में नैरेटिव हमेशा वास्तविकता से अधिक जरूरी होती है। अगर फैक्ट्स शर्मिंदा कर रहे हों तो तथ्यों को नहीं बल्कि आवाज को दबा दो।
भारत फोटो-ऑप नहीं, असल मदद की उठाता है जिम्मेदारी
एक ओर पाकिस्तान अपने पड़ोसियों को एक्सपायर्ड सामान भेजता है, वहीं भारत जिम्मेदारी, विश्वसनीयता और सम्मान के साथ अपनी मदद की भूमिका निभाता है।
‘पड़ोसी पहले’ नीति के तहत भारत ने दिखाया है कि असल राहत अभियान तेजी के साथ, रणनीतिक और सहानुभूलि के साथ किए जाते हैं।
श्रीलंका में भारत का चल रहा मिशन ऑपरेशन सागर बंधु अब तक 53 टन से अधिक राहत सामग्री भूमि, वायु और समुद्र मार्ग से पहुँचा चुका है- टेंट, हाइजीन किट, सर्जिकल उपकरण, दवाइयाँ, कंबल और अन्य आवश्यक राहत सामग्री, जिन्हें स्क्रैपयार्ड से नहीं, तत्काल जरूरत और संवेदना के साथ जुटाया गया।
भारत की खासियत यह है कि वह सिर्फ सामान ही नहीं भेजता पर साथ ही लोगों की जान भी बचाता है। INS विक्रांत, INS उदयगिरि, INS सुकन्या जैसे नौसैनिक जहाज और MI‑17 और चेतक जैसे हेलीकॉप्टर कठिन से कठिन इलाकों से लोगों को एयरलिफ्ट कर रहे हैं। गर्भवती महिलाएँ, बच्चे, बुजुर्ग, घायल लोग, भारत ने उन्हें आंकड़ों की तरह नहीं, इंसानी जिंदगियों की तरह देखा।
बचाए गए लोगों में कई श्रीलंकाई नागरिक थे। यात्रा के लिए गए और आपदा में फँसे कई भारतीय यात्री थे। कई जर्मनी, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया के पर्यटक भी थे और यहाँ तक कि पाकिस्तानी नागरिक भी शामिल थे। भारत ने मदद करने से पहले किसी का पासपोर्ट नहीं देखा। यही फर्क है- एक जिम्मेदार क्षेत्रीय शक्ति और एक दिखावटी शक्ति के बीच में।
इस्लामाबाद की स्ट्रेटेजी: पीड़ित को नहीं, दर्शकों को इंप्रेस करो
पाकिस्तान के लिए, मानवीय सहायता किसी उत्पाद के मार्केटिंग करने की तरह है, कुछ फोटो खिंचवा लो, दो ट्वीट कर दो, और फिर भूल जाओ। पीड़ित मायने नहीं रखते। मायने यह रखता है कि क्या यह नाटक घरेलू दर्शकों को यह विश्वास दिला सकता है कि उनका देश इस क्षेत्र में एक उदार शक्ति है।
पाकिस्तान का यह व्यवहार एक गहरी सांस्कृतिक और राजनीतिक खामी को उजागर करता है। एक ऐसी राष्ट्रीय मानसिकता जो इनकार पर टिकी है, जहाँ दिखावा हमेशा सच पर भारी पड़ता है।
पाकिस्तान लोगों से अधिक PR को तरजीह देता है; दिखावे को काम से ऊपर रखता है और हर नया संकट इस खोखलेपन को फिर से उजागर कर देता है। समस्या यह नहीं कि पाकिस्तान असली मदद नहीं कर सकता। समस्या यह है कि वह करना चाहता ही नहीं, क्योंकि उसका लक्ष्य पीड़ित को उठाना नहीं होता, उसका लक्ष्य पाकिस्तान के नाजुक अहंकार को ऊपर रखना होता है।
समानांतर में ऑपरेशन सिंदूर: भ्रम में जीने वाला एक देश
अगर पाकिस्तान मानवीय संकट के दौरान इतनी आसानी से झूठ बोल सकता है, तो सोचिए सैन्य गर्व के मामले में उसका भ्रम किस स्तर का होगा। इस साल की शुरुआत में, ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत ने पाकिस्तान में पल रहे 9 आतंकी ठिकानों और कम से कम 11 पाकिस्तानी वायुसेना ठिकानों को निशाना बनाया।
भारत के ये हमले पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा झटका थे, इसने उस कमजोरियों को उजागर कर दिया जिन्हें इस्लामाबाद मानने से भी कतराता है।
हालाँकि जब भारतीय रणनीतिक और रक्षा हलकों में इस ऑपरेशन की सफलता का विश्लेषण हो रहा था तब पाकिस्तान की बड़ी आबादी इस दावे का ऑनलाइन जश्न मना रही थी कि उनकी वायुसेना ने जवाबी कार्रवाई में भारत के दो लड़ाकू विमान गिरा दिए।
इस बात का कोई असल प्रमाण नहीं, कोई मलबा नहीं, कोई सैटेलाइट तस्वीर नहीं, सिर्फ डींगें और डिजिटली बनाई गईं कोर कल्पनाएँ। पाकिस्तान का सच वही होता है जो उसकी प्रोपेगेंडा मशीनें कहती हैं, चाहे सबूत हों या नहीं।
यही मानसिकता एक्सपायर्ड राहत सामग्री वाले घोटाले में भी दिखती है। हकीकत- पीड़ित देश को भेजा गया एक्सपायर्ड भोजन। पाकिस्तानी नैरेटिव- हमने दिन बचा लिया।
हकीकत- गेहूं जिसे तालिबान तक ने ठुकरा दिया। पाकिस्तानी नैरेटिव- इस्लामी मानवता के नेता। हकीकत- भारतीय लड़ाकू विमानों ने सीमा पार सटीक हमले किए। पाकिस्तानी नैरेटिव- काल्पनिक भारतीय नुकसान, काल्पनिक विश्लेषकों द्वारा प्रचार-प्रसार।
पड़ोसी याद रखते हैं
संकट के समय दुनिया भाषणों को नहीं, बल्कि यह याद रखती है कि कौन आया और कैसे आया। श्रीलंका याद रखेगा कि किस पड़ोसी ने सैन्य सहयोग के साथ उपयोगी राहत सामग्री भेजी और किसने एक्सपायर्ड बचा-खुचा सामान भेजा।
अफगानिस्तान याद रखेगा कि किसने जटिल ट्रांजिट बातचीत के बाद 50,000 टन उच्च गुणवत्ता वाला गेहूं भेजा और किसने फफूंदी लगा अनाज ‘दान’ के नाम पर थमा दिया। पाकिस्तान सिर्फ शोर मचाने के लिए सराहना चाहता है। भारत चुपचाप जिंदगियाँ बचाकर सम्मान कमाता है।
दिखावटी उदारता बनाम असल जिम्मेदारी
श्रीलंकाई लोगों को एक्सपायर्ड दवाइयों की जरूरत नहीं है। अफगानों को सड़ा हुआ गेहूं नहीं चाहिए। आपदा पीड़ित पाकिस्तान के PR थिएटर के प्रॉप्स नहीं हैं। मानवीय सहायता कोई चेकलिस्ट नहीं, न ही सोशल मीडिया कंटेंट- यह सहानुभूति का दिखावा है, जिसे पाकिस्तान नकल करने की कोशिश करता है लेकिन हर बार असफल रहता है।
भारत एक जिम्मेदार लीडर देश की तरह काम करता है- राहत, बचाव और भरोसा पहुँचाकर। पाकिस्तान एक दिखावे पर चलने वाले देश की तरह रहता है- बहाने, एक्सपायर्ड खाना और खोखली डींगें पहुँचाकर।
पड़ोसी के सबसे कठिन समय में चरित्र की परीक्षा होता है। भारत का चरित्र चमकता है। पाकिस्तान का चरित्र भी उसकी निर्यातित वस्तुओं की तरह एक्सपायरी डेट वाला है। और उस तारीख की मियाद बहुत पहले ही खत्म हो चुकी है।
ये खबर मूल रूप से जिनित जैन ने लिखी है। अंग्रेजी में इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएँ।
केरल में कॉन्ग्रेस के निलंबित विधायक राहुल मामकूटाथिल पर पहले से ही रेप केस, जबरन गर्भपात और धमकी देने के कई आरोप है और अब पार्टी की महिला ने MLA पर अनुचित मैसेज भेजने के गंभीर आरोप लगाए हैं। बता दें कि आरोपों के बाद से निलंबित विधायक राहुल मामकूटाथिल फरार चल रहे हैं, लेकिन पुलिस ने उन्हें देश छोड़ने से रोकने के लिए लुकआउट सर्कुलर जारी कर दिया है।
इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है, क्योंकि माकपा (CPI-M) के राज्य सचिव एमवी गोविंदन ने सीधे तौर पर कॉन्ग्रेस पर उन्हें गिरफ्तारी से बचाने और छिपाने का गंभीर आरोप लगाया है।
कौन हैं राहुल मामकूटाथिल और उनका राजनीतिक सफर?
राहुल मामकूटाथिल केरल कॉन्ग्रेस के एक युवा नेता हैं। वह पिछले साल नवंबर 2024 में पलक्कड़ सीट से उपचुनाव जीतकर विधायक बने थे। आरोपों में घिरने से पहले वह यूथ कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी थे। हालाँकि, रेप के आरोपों के चलते उन्हें अगस्त में इस पद से इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद से कई महिलाओं और एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति ने उन पर आरोप लगाए, जिसके बाद 25 अगस्त को उन्हें कॉन्ग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया गया था।
राहुल पर लगे गंभीर और सनसनीखेज आरोप
राहुल मामकूटाथिल पर एक के बाद एक कई गंभीर आरोप लगे हैं, जिसकी वजह से पुलिस उनकी तलाश कर रही है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को मिली एक शिकायत के बाद राहुल मामकूटाथिल पर रेप, जबरन गर्भपात, आपराधिक धमकी और डिजिटल ब्लैकमेल का मामला दर्ज हुआ। FIR के अनुसार, उन्होंने एक फ्लैट में महिला का दो बार रेप किया, इसका वीडियो रिकॉर्ड किया और बाद में धमकी देकर ब्लैकमेल किया। महिला के गर्भवती होने पर, उनके सहयोगी (जोबी जोसेफ) ने उसे गर्भपात की गोलियाँ दीं।
केरल से बाहर रहने वाली एक 23 वर्षीय महिला ने कॉन्ग्रेस हाईकमान को शिकायत भेजी है। महिला ने आरोप लगाया है कि राहुल ने शादी के झूठे वादे से उसका यौन शोषण किया, उस पर हमला किया और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित किया। कॉन्ग्रेस की महिला नेता MA शाहनास ने राहुल पर उन्हें अनुचित मैसेज भेजने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राहुल ने उन्हें उनके साथ ‘ट्रिप’ पर चलने के लिए कहा था।
सोशल मीडिया पर कथित व्हाट्सएप चैट और ऑडियो क्लिप भी वायरल हुई है। इसमें राहुल मामकूटाथिल को पहले तो महिला से बच्चा पैदा करने की जिद करते और फिर उसी महिला पर गर्भपात के लिए दबाव डालते हुए सुना गया है।
कॉन्ग्रेस पर बलात्कार के आरोपित विधायक को ‘बचाने’ का आरोप
माकपा (CPI-M) के राज्य सचिव एमवी गोविंदन ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाया है कि वह बलात्कार और जबरन गर्भपात सहित गंभीर आरोपों का सामना कर रहे विधायक राहुल मामकूटाथिल को कथित रूप से छिपाकर उनकी गिरफ्तारी से बचने में मदद कर रही है। गोविंदन ने दावा किया कि मामकूटाथिल कॉन्ग्रेस के समर्थन के बिना गिरफ्तारी से नहीं बच सकते थे और विधायक द्वारा अग्रिम जमानत याचिका के हिस्से के रूप में अदालत में प्रस्तुत हलफनामे को उनके दोष की स्वीकारोक्ति बताया।
वहीं, कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर कुछ नेताओं ने मामकूटाथिल का विधानसभा सत्र में शामिल होने का खुलकर समर्थन किया है। यूडीएफ संयोजक अडूर प्रकाश और पूर्व केपीसीसी अध्यक्ष एमएम हसन ने कहा कि मामकूटाथिल को विधानसभा से प्रतिबंधित नहीं किया गया है और सत्र में भाग लेना एक विधायक का अधिकार है, तथा पार्टी उन्हें दूर रहने का निर्देश नहीं देगी।
हालाँकि, कॉन्ग्रेस के नेताओं ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि मामकूटाथिल ने आरोप लगने के एक दिन के भीतर यूथ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और उन्हें पार्टी की सदस्यता से निलंबित कर दिया गया था, यह दर्शाते हुए कि कॉन्ग्रेस ने महिलाओं के समर्थन में एक दृढ़ रुख अपनाया है। उन्होंने माकपा पर दोहरा मापदंड अपनाने और राजनीतिक लाभ के लिए इस विवाद का फायदा उठाने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया है।
पुलिस कार्रवाई और पार्टी का रुख
आरोप लगने के बाद राहुल मामकूटाथिल कथित तौर पर लापता हो गए हैं। पुलिस ने उन्हें देश छोड़ने से रोकने के लिए लुकआउट सर्कुलर जारी कर दिया है। उनके सहयोगी जोबी जोसेफ का फोन भी बंद है।
इस बीच, राहुल मामकूटाथिल ने फेसबुक पर लिखा है कि उन्हें यकीन है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है और वह कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे। हालाँकि, पार्टी के बड़े नेता उन्हें बर्खास्त करने की माँग कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस ने राहुल को पहले ही निलंबित कर दिया था, लेकिन KPCC अध्यक्ष सनी जोसेफ ने कहा है कि उचित समय पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लेकर कहा है कि उन्होंने बाबरी मस्जिद बनाने के लिए जनता से पैसे माँगे थे। उनके बयान के बाद कॉन्ग्रेस बवाल मचा रही है। लेकिन ये ऐतिहासिक तथ्य है, जिसका वर्णन किताब ‘The Inside Story of Sardar Patel – Diary of Maniben Patel’ के पेज नंबर 24 में की गई है।
किताब में साफ लिखा गया है कि कैसे नेहरू जी बाबरी मस्जिद के निर्माण को लेकर चिंतित थे। वो सरकारी पैसे का उपयोग भी करने को तैयार थे, लेकिन सरदार पटेल ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। इस दौरान सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर का उदाहरण भी दिया, जो लोगों के दान से दिये गए पैसों से बनी थी। लेकिन नेहरू उसके उद्घाटन में जाने से मना कर दिया। यहाँ तक कि राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को भी जाने से रोका था।
नेहरू चाहते थे बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण में सरकारी पैसे लगाना- राजनाथ सिंह
राजनाथ सिंह ने मंगलवार को गुजरात के साधली गाँव में आयोजित यूनिटी मार्च के दौरान ये दावा किया। उन्होंने कहा कि नेहरू ने कभी अयोध्या में बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए सरकारी धन का उपयोग करने का प्रस्ताव दिया था, जिसका तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने कड़ा विरोध किया था।
इतना ही नहीं उन्होंने कहा, “जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर सरकारी खजाने से पैसा खर्च करने की बात छेड़ी थी, सरकारी खजाने के पैसे से बाबरी मस्जिद बनाई जानी चाहिए। उसका भी विरोध सरदार पटेल ने ही किया था।”
राजनाथ सिंह के मुताबिक, सरदार पटेल का स्पष्ट मत था कि धार्मिक स्थलों पर सरकारी धन खर्च नहीं होना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में जनता के दान से जुटाए गए 30 लाख रुपए लगे थे, ना कि इसमें सरकारी पैसा लगा था।
"NEHRU WANTED TO USE TAX PAYERS MONEY TO BUILD BABRI MASJID!" Defence Minister Rajnath Singh's big revelation. The minister said it would have happened had Sardar Patel not put his foot down as he was against appeasement politics. pic.twitter.com/0szxk6MYvo
उन्होंने कहा कि सोमनाथ मंदिर की तरह ही अयोध्या के राम मंदिर निर्माण में भी सरकार का पैसा नहीं लगा है और इसका पूरा खर्च जनता ने उठाया है। राजनाथ सिंह ने यह भी दावा किया है कि सरदार पटेल के निधन के बाद उनके स्मारक के लिए जनता की जुटाई राशि को पंडित नेहरू ने ‘कुएँ और सड़क निर्माण’ में लगाने का सुझाव दिया था, जो बिल्कुल बेतुका था।
नेहरू का नाम आते ही कॉन्ग्रेस की रुदाली शुरू
कॉन्ग्रेस ने नेहरू का नाम लेते ही रोना गाना शुरू कर दिया है। विपक्ष भी बौखला गया। समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेन्द्र यादव ने कहा कि बीजेपी ऐतिहासिक तथ्यों को कैसे पेश करती है, ये पूरा देश जानता है।
VIDEO | Parliament Winter Session: On Defence Minister Rajnath Singh's 'Nehru sought public funds to build Babri Masjid' remark, Congress MP Imran Pratapgarhi (@ShayarImran) says, "Where did he even get such information from? He is the Defence Minister of the country. He has been… pic.twitter.com/QLs9aE7wWb
कॉन्ग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने कहा कि राजनाथ सिंह को ये जानकारी कहाँ से मिली। वे देश के रक्षा मंत्री है। चीफ मंत्री भी रह चुके हैं। ऐतिहासिक सदर्भों में उन्हें सबूत के साथ बात रखनी चाहिए।
वहीं कॉन्ग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने राजनाथ सिंह पर एतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि रक्षा मंत्री को रणनीतिक चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए
The Inside Story of Sardar Patel – Diary of Maniben Patel में जिक्र
दरअसल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का नेहरू पर दावा पुख्ता सबूतों पर ही आधारित है। उन्होंने अपनी छवि के अनुरूप ही पूरी गंभीरता के साथ ये दावा किया है। “The Inside Story of Sardar Patel – Diary of Maniben Patel” की पृष्ठ संख्या 24 में इसका उल्लेख है। इस किताब में 1936 से 1950 तक के उनके तमाम करेस्पॉन्डेंस का उल्लेख है।
(फोटो साभार- The Inside Story of Sardar Patel – Diary of Maniben Patel का पेज नंबर 24)
पेज नंबर 24 में ये लिखा हुआ है कि नेहरू ने जब बाबरी मस्जिद के लिए पैसे पर बात की, तो सरदार पटेल ने कहा कि सरकार मस्जिद बनाने के लिए कोई पैसा नहीं दे सकती।
मुझे लगता है कि कांग्रेस के नेताओं को अपने ही नेताओं के बारे में जानकारी लेने की आदत छूट गई है। पढ़ना-लिखना छोड़ दिया है। नेहरू–गांधी के बारे में भी उन्हें पता नहीं होता है। रक्षामंत्री माननीय राजनाथ सिंह जी ने जो कहा है, कि नेहरु जी ने बाबरी मस्जिद बनवाने का प्रयास किया था और… pic.twitter.com/XBXdz9SnlQ
सरदार पटेल ने कहा था कि सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार के लिए जनता से पैसे माँगे गए थे और 30 लाख रुपए जमा हुए। पटेल ने नेहरू से कहा था कि मंदिर के पुनरुद्धार में कोई सरकारी पैसा नहीं लगा। वह एक प्राइवेट ट्रस्ट द्वारा कराया गया है। मुंशी जी उनके सदस्य हैं और सरकारी धन का कोई उपयोग नहीं हुआ है। इस पर नेहरू चुप हो गये।
नेहरू ने बाबरी मस्जिद का विषय उठाया। सरदार पटेल ने उसका प्रतिरोध किया और उन्होंने कहा कि सोमनाथ के निर्माण का विषय इससे अलग है।
नेहरू ने की राम मंदिर से हिन्दुओं को ‘बेदखल’ करने की कोशिश
जवाहरलाल नेहरू रामजन्मभूमि साइट पर मौजूद प्रतिमाओं को हटाना चाहते थे। इसके लिए उन्होने तत्कालीन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत को निर्देश दिया। हिन्दू-मुस्लिम लड़ाई को देखते हुए जिला मजिस्ट्रेट कंडांगलथिल करुणाकरण नायर यानी केके नायक को सरकार ने राम जन्मभूमि मुद्दे पर रिपोर्ट बनाने के लिए कहा था। उन्होंने अपने सहयोगी गुरुदत्त सिंह को ये काम सौंप दिया। गुरुदत्त सिंह ने 10 अक्टूबर 1949 में रामजन्मभूमि पर राजसी राम मंदिर बनवाने की सिफारिश की थी।
इसके बावजूद रामजन्मभूमि साइट से मूर्तियों को हटाने का निर्देश दिया गया। इस पर तत्कालीन आईसीएस अधिकारी और जिला मजिस्ट्रेट केके नायर ने आदेश को मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने जोर दिया कि हिन्दू यहाँ पूजा करते हैं। मूर्तियों को यहाँ से नहीं हटाया जा सकता है।
इस वजह से कॉन्ग्रेस सरकार ने उन्हें निलंबित भी कर दिया। बाद में कोर्ट ने उन्हें न्याय मिली और आईसीएस अधिकारी के तौर पर नौकरी वापस मिल रही थी, लेकिन उन्होंने नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार के अंदर काम करने से इनकार कर दिया।
दरअसल कॉन्ग्रेस शुरू से ही राममंदिर विरोधी रही है। बाबरी मस्जिद का पुरुउद्धार करने की हितैषी कॉन्ग्रेस को अब ऐतिहासिक तथ्य भी ‘तोड़-मरोड़ कर’ पेश करने वाले लगने लगे हैं। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु द्विवेदी के मुताबिक, उन्होंने खुद कहा था कि जब वे दक्षिण भारत के मंदिरों के बड़े गलियारों में जाते थे, तो उन्हें डिप्रेशन महसूस होता था।
इसका जिक्र उन्होंने 17 मार्च 1959 को अपने भाषण में किया है। दरअसल सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाने से उन्होंने भारत के प्रथम राष्ट्रपति और संविधान सभा के चेयरमैन डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी रोका था। उन्होंने यह साफ़ कर दिया था कि वे सोमनाथ मंदिर को फिर से बनाने के पूरी तरह खिलाफ थे।
केरल हाई कोर्ट ने सोमवार (1 दिसंबर) को एक पुरुष के खिलाफ आपराधिक मामला रद्द कर दिया। कोर्ट ने महिला द्वारा लगाए गए रेप के आरोपों को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा है कि किसी रिश्ते के खत्म होने या बाद में शादी कर लिए जाने पर सहमति से बने संबंध को रेप नहीं कहा जा सकता।
जस्टिस जी गिरीश की सिंगल बेंच ने दोनों पक्षों के दलीलों की जाँच की और महिला के दावों में कई विरोधाभास पाए, जिसके बाद उन्होंने यह फैसला सुनाया।
दरअसल याचिकाकर्ता पुरुष ने हाई कोर्ट से क्रिमिनल केस रद्द करने की माँग की थी। ये केस 23 जुलाई, 2018 को एराट्टुपेट्टा पुलिस द्वारा IPC की धारा 376 और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 66E के तहत दर्ज की गई थी।
शिकायत करने वाली महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपित ने 2011 और 2014 के बीच उसके साथ रेप किया और उसकी आपत्तिजनक तस्वीरें लीं और प्रकाशित करने की धमकी दी और उसका मेंटल टॉर्चर किया। इस पर हाईकोर्ट ने पीड़िता के दावों में कई कमियाँ गिनाई।
हालाँकि, हाई कोर्ट ने पाया कि शिकायत करने वाली महिला की बातों में कई बातें थीं, जिससे पता चलता है कि आरोपित को झूठे केस में फँसाया गया है।
आरोपित पुरुष ने केस को झूठा बताते हुए आपराधिक केस हटाने की माँग की थी और दावा किया था कि उसे इस केस में झूठा फँसाया गया था। आरोपित का कहना है कि उसने शिकायत करने वाली महिला पर केस किया था, क्योंकि उसने उधार लिए गए पैसे वापस नहीं किए थे और उसके साथ इंश्योरेंस फ्रॉड कर रही थी।
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने कहा, “2010 के बाद से याचिकाकर्ता और शिकायत करने वाली महिला के बीच फाइनेंशियल और प्रॉपर्टी के लेन-देन हुए। केस के रिकॉर्ड से भी इसका पता चलता है। ऐसे में शिकायत करने वाली महिला की इस बात पर यकीन करना बहुत मुश्किल है कि याचिकाकर्ता तीन साल से ज़्यादा समय से उसका यौन शोषण कर रहा था, और उसने शर्म के कारण इस जुर्म के बारे में नहीं बताया।”
हाई कोर्ट के मुताबिक, 2017 में शिकायत करने वाली महिला ने चेक डिसऑनर के एक मामले में कोर्ट के सामने याचिकाकर्ता के पक्ष में गवाही दी थी। उसने उसे ‘एक करीबी फैमिली फ्रेंड’ बताया था।
कोर्ट ने सवाल पूछा कि अगर वह फैमिली फ्रेंड था, तो आरोपित कई मौकों पर उसे त्रिशूर और पूंजर में अपने घर आने के लिए मजबूर किया और उसे सरेंडर करना पड़ा, जैसे आरोप मेल नहीं खाते हैं। यह उस शपथ पत्र से भी मेल नहीं खाता जो असल में शिकायत करने वाली महिला ने 26.07.2017 को ज्यूडिशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट कोर्ट के सामने दिया था।
शिकायत करने वाली महिला के दावों पर यकीन न करते हुए, जस्टिस गिरीश ने कहा कि ” पढ़ी-लिखी और नौकरी करने वाली महिला से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह लगभग तीन साल तक पिटीशनर के दबाव और क्रिमिनल धमकी का शिकार रही होगी और यौन उत्पीड़न का शिकार होती रहेगी।”
घटनाओं के क्रम का एनालिसिस करने के बाद, जिसमें आरोपित याचिकाकर्ता द्वारा शिकायत के खिलाफ केस करने से लेकर FIR फाइल करने तक का वक्त शामिल है। हाई कोर्ट का कहना है कि याचिकाकर्ता के इस आरोप में दम था कि उसके खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज की गई है, क्योंकि उसने असल में शिकायत करने वाली महिला के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की थी।
सहमति से बना रिश्ता, रेप के आरोप का आधार नहीं हो सकता: SC
यह मामला ये बताता है कि कैसे भारत में कई महिलाएँ यौन उत्पीड़न से जुड़े कानूनों का गलत इस्तेमाल कर रही हैं। इसकी वजह से बेगुनाह पुरुषों को जेल की हवा खानी पड़ रही है।
ऐसे मामले असली पीड़ितों के मामलों को भी कमजोर करता है और कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया जाता है। कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि आपसी सहमति से बने रिश्तों का खराब होना या शादी न हो पाना, रेप नहीं कहा जा सकता।
मई 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से बने रिश्तों के समय के साथ खराब होने वाले मामलों में क्रिमिनल कार्रवाई शुरू करने से ज्यूडिशियरी पर बोझ बढ़ता है और बेगुनाह लोगों को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।
यह बात सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में कही थी, जिसमें एक शादीशुदा, एक बच्चे की माँ ने 23 साल के एक आदमी पर उनके रिश्ते खराब होने के बाद रेप के झूठे आरोप लगाए थे।
“अगर सहमति से बना रिश्ता खराब हो जाए या पार्टनर दूर चला जाए, तो यह आपराधिक मामला नहीं हो सकता। ऐसा व्यवहार न केवल कोर्ट पर बोझ डालता है, बल्कि ऐसे जघन्य अपराध के आरोपी को पहचाने में भी रुकावट डालता है।
कोर्ट ने बार-बार नियमों के गलत इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी है। कोर्ट ने शादी करने के वादे को तोड़ने वाले व्यक्ति पर IPC की धारा 376 के तहत अपराध के लिए मुकदमा चलाना बेवकूफी बताया है।
झूठे रेप केस से निपटने में हाई कोर्ट का रवैया हुआ सख्त
झूठे रेप केस की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी को देखते हुए कोर्ट रेप केस की सुनवाई करते समय सावधानी बरत रहे हैं। हाल के कुछ मामलों में, कई हाई कोर्ट ने उन क्रिमिनल कार्रवाई को रद्द कर दिया जहां रेप केस झूठे पाए गए थे।
अगस्त 2025 में, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक नाबालिग लड़के के खिलाफ रेप की कार्रवाई को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि शिकायत करने वाली और आरोपित के बीच सहमति से रिश्ता बना था। ऐसे ही एक मामले में, लखनऊ की एक कोर्ट ने एक महिला को 7.5 साल जेल की सजा सुना दी, क्योंकि उसने दो आदमियों को रेप केस और SC/ST एक्ट के तहत अपराधों में फँसाया था।
पिछले साल अगस्त में, बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक 73 साल के पुरुष के खिलाफ फाइल की गई FIR रद्द कर दी थी, जिस पर शादी का झूठा वादा करके एक औरत से रेप करने का आरोप था। हाई कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि शिकायत करने वाली महिला 31 साल से ‘रिलेशनशिप’ में थी और शिकायत करने वाली महिला ने पहले कभी इस रिश्ते के खिलाफ आवाज नहीं उठाई थी।
झूठे आरोप में फँसे पुरुषों के लिए कानूनी उपाय
सहमति से बने रिश्तों में इमोशनल नतीजों के बाद महिलाओं द्वारा रेप कानूनों का इस्तेमाल करने का बढ़ता ट्रेंड चिंताजनक है। इस पर ध्यान देना होगा कि बदला लेने वाले लोग कानूनों का इस्तेमाल हथियार के तौर पर न कर सकें।
ऐसे कई कानूनी नियम हैं जिनका इस्तेमाल झूठे रेप केस का सामना कर रहे पुरुष कर सकते हैं। ऐसे पुरुष हाई कोर्ट में CrPC की धारा 482 (अब धारा 528 BNSS) के तहत FIR रद्द करने की माँग कर सकते हैं।
पुरुष उन महिलाओं के खिलाफ IPC की धारा 182 (सरकारी कर्मचारी को गलत जानकारी देना, धारा 217 BNS) और 211 (चोट पहुंचाने का झूठा आरोप, धारा 248 BNS) के तहत केस दर्ज करा सकते हैं, जो उन पर सेक्सुअल अपराधों का झूठा आरोप लगाती हैं। हालाँकि ये तब हो सकता है जब आरोप मनगढ़ंत साबित हो जाए या आरोपित बरी हो जाए।
इसके अलावा, अगर मजिस्ट्रेट को लगता है कि आरोप का कोई सही आधार नहीं था, तो वह BNSS का सेक्शन 273 लगाकर शिकायत करने वाले को आरोपी को बरी होने के बाद मुआवजा देने का आदेश दे सकता है।
हालाँकि हाईप्रोफाइल रिश्तों से जुड़े मामलों का अक्सर समाज पर बड़ा असर पड़ता है। मीडिया की हेडलाइन उन मामलों को सनसनीखेज बनाती हैं। ऐसे में विवादित पहलुओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।
करीबी रिश्ते मुश्किल होते हैं और कभी-कभी, अलग-अलग सोशियो-इकोनॉमिक पावर डायनामिक्स के कारण, लंबे समय तक चलने वाले रिश्ते ‘मजबूर’ भी हो सकते हैं। भले ही वे ऊपर से सहमति से बने हुए लगें। महिलाओं और यहाँ तक कि पुरुषों के खिलाफ कई बयान आम लोगों में कन्फ्यूजन फैलाते हैं। इसलिए, ज्यूडिशियरी और मीडिया दोनों के लिए जरूरी है कि वे सामाजिक मुद्दों पर सावधानी से बात करें।
(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
भारत की आरक्षण व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन्स’ के लिए बड़ा झटका है। अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण लाभों का हकदार नहीं रहता।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ करार दिया है। यह फैसला जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की सिंगल बेंच ने 21 नवंबर 2025 को सुनाया, जो जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर आधारित है। यह फैसला न सिर्फ उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव के विवाद से निकला है, बल्कि पूरे देश की आरक्षण नीति, धर्मांतरण के मुद्दे और सामाजिक न्याय की बहस को नई दिशा दे सकता है। आइए, जानते हैं क्यों महत्वपूर्ण है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला…
कैसे शुरू हुआ ये मामला, जो राष्ट्रीय स्तर पर बना महत्वपूर्ण
ये मामला उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के सिंदुरिया थाने के अंतर्गत आने वाले ग्राम मथानिया लक्ष्मीपुर एकड़ंगा का है। यहाँ के निवासी जितेंद्र साहनी मूल रूप से केवट समुदाय से ताल्लुक रखते थे।
जितेंद्र साहनी ने अप्रैल 2023 में हाई कोर्ट में अर्जी देकर स्थानीय सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) से अपनी निजी जमीन पर रविवार और बुधवार को ‘यीशु मसीह के वचनों’ पर आधारित प्रार्थना सभाओं के आयोजन की अनुमति माँगी थी। SDM ने इसे मंजूरी दे भी दी थी, लेकिन स्थानीय हिंदुओं के विरोध के बाद 3 मई 2023 को यह अनुमति रद्द कर दी गई।
साहनी की याचिकायाचिका का पूरा हिस्सा
हिंदू देवी-देवताओं पर विवादित टिप्पणी कर उनका मजाक उड़ाता था साहनी
ग्रामीणों का आरोप था कि साहनी ने इन सभाओं का इस्तेमाल गरीब हिंदू परिवारों को लालच देकर ईसाई मजहब अपनाने के लिए उकसाने के लिए किया। एक गवाह लक्षन विश्वकर्मा ने पुलिस जाँच में बयान दिया कि साहनी ने ग्रामीणों को इकट्ठा कर हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया।
लक्षन ने अपने लिखित बयान में कहा, “साहनी ने बताया कि हिंदू धर्म में हजारों देवी-देवता हैं। किसी के आठ हाथ, किसी के चार, किसी के चेहरे पर सूंड है। कोई चूहे की सवारी करता है, कोई मोर की। कोई भाँग पीता है, कोई गाँजा।” गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने कहा, “हिंदू धर्म में जाति के भेदभाव से कोई इज्जत नहीं मिलती, लेकिन ईसाई बनने से नौकरी, बिजनेस और मिशनरी से पैसे का फायदा होगा।”
गवाह का बयान रहा अहमगवाह लक्षन के बयान की कॉपी
इन आरोपों पर पुलिस ने जितेंद्र साहनी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धर्म, जाति या जन्मस्थान के आधार पर शत्रुता फैलाना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) के तहत मुकदमा दर्ज किया। 11 मार्च 2024 को चार्जशीट दाखिल हुई और 24 जुलाई 2024 को ACJM कोर्ट ने संज्ञान ले लिया।
साहनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस मुकदमे को रद्द करने की गुहार लगाई। उनका दावा था कि सभाओं में कोई विवादास्पद भाषण नहीं हुआ और उन्हें झूठा फँसाया जा रहा है। लेकिन कोर्ट पहुँचते ही एक बड़ा राज खुल गया, वो ये था कि साहनी ने अपनी याचिका के साथ दाखिल हलफनामे में खुद को ‘हिंदू’ बताया, जबकि गवाह बयानों से साफ था कि वह ईसाई पादरी बन चुका था।
यह खुलासा कोर्ट के लिए आश्चर्यजनक था। अतिरिक्त सरकारी वकील पंकज त्रिपाठी ने CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह बयानों का हवाला दिया। एक अन्य गवाह बुद्धि राम यादव ने भी पुष्टि की कि साहनी ने गरीबों को लालच देकर धर्मांतरण कराया। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और याचिका खारिज कर दी। जस्टिस गिरि ने कहा, “ट्रायल कोर्ट ही साक्ष्यों की जाँच करेगा। साहनी ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज अर्जी दे सकते हैं, जहाँ वे दावा कर सकते हैं कि IPC की इन धाराओं के तत्व मौजूद नहीं हैं।”
धर्मांतरण के बाद SC वर्ग का लाभ लेना क्यों है संविधान के ‘धोखाधड़ी’?
अब सवाल यह है कि एक आपराधिक मुकदमे की याचिका से आरक्षण का मुद्दा कैसे जुड़ गया? कोर्ट ने साहनी के हलफनामे को ‘गुमराह करने वाला’ बताते हुए इसे संविधान के साथ धोखे का उदाहरण माना। जस्टिस गिरि ने स्पष्ट किया कि SC/ST लाभ केवल उन लोगों के लिए हैं जो हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन परंपरा का पालन करते हैं। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 में साफ लिखा है- “कोई व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग कोई अन्य धर्म मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”
कोर्ट ने ‘हिंदू’ की परिभाषा पर भी रोशनी डाली। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2 के अनुसार, हिंदू में सिख, बौद्ध, जैन और आर्य समाजी शामिल हैं। जो व्यक्ति मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है, वह हिंदू माना जाता है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 2(c) भी इसी पर आधारित है। अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूची में केवल हिंदू, सिख या बौद्ध ही आ सकते हैं।
कोर्ट ने जोर दिया कि ईसाई या इस्लाम जैसे मजहबों में जाति व्यवस्था मान्य नहीं है। इसलिए इन मजहबों को अपनाने वाले व्यक्ति ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव का शिकार नहीं रहते। SC/ST अधिनियम का मकसद ऐसी समुदायों की रक्षा करना है जो सदियों से जाति-आधारित उत्पीड़न झेलते आए हैं। अगर कोई व्यक्ति धर्म बदल लेता है, तो वह इस संरक्षण का हकदार नहीं रहता।
जस्टिस गिरि ने कहा, “धर्मांतरण के बाद SC दर्जा बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। यह आरक्षण नीति के मूल सिद्धांतों – सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है।”
सुप्रीम कोर्ट और अन्य फैसलों का जिक्र, कानूनी इतिहास के फैसलों का रेफरेंस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए फैसलों को ध्यान में रखकर सुनाया। इन फैसले में सबसे प्रमुख है 2024 का C. Selvarani vs. Special Secretary-District Collector मामला। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ लाभ के लिए धर्मांतरण करना ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ है। तमिलनाडु की एक महिला ने ईसाई बनने के बाद भी SC प्रमाणपत्र का दावा किया था, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। इस मामले में जज ने चेतावनी दी थी कि अगर धर्मांतरण सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए छिपाया जा रहा है, तो यह इस नीति के खिलाफ है।
तमिलनाडु के मामले का हाई कोर्ट ने किया जिक्र
इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 1986 के Soosai vs. Union of India मामले को भी अपने फैसले के रेफरेंस में शामिल किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC नियम केवल हिंदू या सिख मानने वालों पर लागू होते हैं। साल 2015 के K.P. Manu vs. Chairman, Scrutiny Committee में तीन शर्तें बताई गईं: (1) जाति की मान्यता, (2) मूल धर्म में वापसी और (3) समुदाय की स्वीकृति। इसके बिना किसी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है।
सूसई केस का रेफरेंस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के Akkala Rami Reddy vs. State of A.P. का भी हवाला दिया। इसमें ईसाई बन चुके व्यक्ति को SC/ST अधिनियम के तहत सुरक्षा से वंचित कर दिया गया, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति भेदभाव नहीं है। आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट ने कहा था कि ऐसे (कन्वर्टेड) व्यक्ति को अब उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जा सकता।”
ये फैसले दिखाते हैं कि धर्मांतरण और आरक्षण का मुद्दा नया नहीं। 1950 के संविधान आदेश से ही यह स्पष्ट था, लेकिन हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों और आरक्षण दुरुपयोग के आरोपों से यह बहस तेज हो चुकी है।
हाई कोर्ट ने जाँच और कार्रवाई के लिए दिए सख्त निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वो निर्देश हैं, जिसमें कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों (DM) को 4 महीने (मार्च 2026 तक) का समय दिया कि वे राज्य में ऐसे मामलों की जाँच करें, जहाँ धर्म बदल चुके लोग SC/ST लाभ ले रहे हैं। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने जाँच के बाद कानूनी कार्रवाई को भी जरूरी बताया है, साथ ही सभी DM को मुख्य सचिव को रिपोर्ट देने को भी कहा है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज के DM को विशेष निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि महाराजगंज के डएम को साहनी के धर्म की 3 महीने में जाँच करनी होगी। अगर साहनी का हलफनामा फर्जी साबित होता है, तो उसके खिलाफ फर्जीवाड़े के मामले में सख्त कार्रवाई के लिए कहा है। ताकि भविष्य में इस तरह के फर्जी हलफनामे दाखिल न किए जा सकें और फर्जीवाड़ों पर रोक लग सके।
हाई कोर्ट के फैसले का हिस्सा
अल्पसंख्यक और एससी-एसटी दर्जे के बीच के अंतर को स्पष्ट करे सरकार
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से केंद्र और राज्य स्तर पर भी हलचल मचनी तय है। क्योंकि हाई कोर्ट ने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, UP के मुख्य सचिव, समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिए हैं कि वो अल्पसंख्यक दर्जा (ईसाई/मुस्लिम) और SC दर्जे के बीच सख्त अंतर सुनिश्चित करें। कोर्ट ने एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट को ये आदेश सभी अधिकारियों तक पहुँचाने का जिम्मा भी सौंपा है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “प्रिंसिपल सेक्रेटरी/एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, माइनॉरिटीज वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ यूपी को भी मामले को देखने और सही कार्रवाई करने या अधिकारियों को निर्देश देने के लिए उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया जाता है ताकि कानून को असलियत/सही मायने में लागू किया जा सके। एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट को भी कानून के अनुसार काम करने का निर्देश दिया जाता है।”
सरकारों की बढ़ी जिम्मेदारी
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब UP सरकार के लिए चुनौती बढ़ गई है। यूपी सरकार की जाँच में 4 महीने में फर्जीवाड़ों के हजारों मामले सामने आ सकते हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को SC और माइनॉरिटी लाभों के बीच बैलेंस भी बनाना पड़ेगा। वहीं, आने वाले समय के लिए सरकारों को भी SC/ST प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया कड़ी करनी पड़ सकती है। खासकर क्रिप्टो क्रिश्चियन जैसे मामलो में।
क्रिप्टो क्रिश्चियन कौन होते हैं?
ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट्स में पहले भी क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर साफ तौर पर बता चुका है कि अपने धर्म को छिपाकर खुद को मूल धर्म का दिखाना और संवैधानिक फायदों को उठाते रहने वाले लोग क्रिप्टो क्रिश्चियन की श्रेणी में आते हैं। जितेंद्र साहनी का भी मामला ऐसा ही है।
जितेंद्र साहनी मूल रूप से हिंदू धर्म के केवट जाति से आते हैं। लेकिन उन्होंने धर्मांतरण कर खुद को ईसाई होना स्वीकार किया। इसके साथ ही कथित तौर पर वो एससी-एसटी वर्ग के लिए दिए जाने वाले सारे फायदे भी प्राप्त करते रहे। उनकी हिम्मत देखिए, कि उन्होंने खुद को हाई कोर्ट में भी हिंदू बताया, जबकि पूरे मामले में साफ है कि वो न सिर्फ ईसाई बन चुका है, बल्कि वो पादरी जैसा पद भी अपने पास रखता है।
क्रिप्टो क्रिश्चियन का एक सबसे अलग और अनोखा रूप ये है कि एक तरफ जहाँ जितेंद्र खुलेआम ईसाइयत का पालन करता है, तो कई ऐसे लोगों को उसने ईसाई बनाया, जिन्होंने न तो सार्वजनिक तौर पर खुद को ईसाई बताया और न ही अपना नाम और धर्म और न ही पहचान बदली। यानि ऐसे लोग कागजों पर हिंदू-दलित बनकर मलाई भी चाट रहे और प्रैक्टिस ईसाई मजहब की करते हैं।
आरक्षण नीति पर नया सवाल, सामाजिक बहस की शुरुआत
भारत संविधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म चुनने की आजादी देता है। लेकिन कोर्ट ने कहा, “धर्म बदलना व्यक्तिगत विश्वास से होना चाहिए, न कि लाभ के लिए।” ऐसे में कोर्ट का यह फैसला आरक्षण व्यवस्था की नींव को मजबूत करता है। SC/ST कोटा शिक्षा, नौकरी और राजनीति में 22.5% आरक्षण देता है, जो राज्यों के स्तर पर अलग-अलग होता है। लेकिन इसके दुरुपयोग के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। कुछ लोग इस वर्ग को मिलने वाले लाभ के लिए धर्म बदलकर भी योजनाओं का लाभ लेते रहते हैं। ऐसे में कोर्ट के फैसले ने इस तरह के फर्जीवाड़े को रोकने का रास्ता दिखा दिया है।
इस पूरे मुद्दे पर ऑपइंडिया ने सीनियर एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से बातचीत की। उन्होंने कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का जो रिजर्वेशन के ऊपर फैसला है, बिल्कुल ठीक फैसला है। हमारे संविधान निर्माता भी यही कह रहे थे कि जो हिंदू दलित है, जो हिंदू में पिछड़े हैं, ट्राइबल है, उनको ही रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा। जो हिंदू कन्वर्ट हो जाएगा, चाहे वह इस्लाम में चला जाए या ईसाइयत में चला जाए, उसको रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिलेगा। यह संविधान निर्माताओं की भी मंशा थी। यही संविधान भी कहता है और यही हाई कोर्ट का फैसला भी है।”
अपनी बात आगे बढ़ाते हुए अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “आप एक तरफ रिजर्वेशन का फायदा लो। यह कहते हुए हम तो ऐसी हैं और फिर दूसरी तरफ आप कन्वर्ट भी हो जाओ। अगर इसकी इजाजत दी गई तो कन्वर्जन बढ़ेगा और यह हमारे संविधान निर्माता बिल्कुल नहीं चाहते थे। रिजर्वेशन का सिस्टम लाया गया था। वह बहुत लिमिटेड समय के लिए लाया गया था। वह गरीबों के लिए लाया गया था। वो केवल और केवल हिंदुओं के लिए लाया गया था।”
एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट आए हुए यह कहने के लिए एक नई नई दलितों की स्थिति तो वैसे ही रहती है। भले वह क्रिश्चियन बन जाए या इस्लाम कबूल कर लें। उस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछा ता कि अगर कन्वर्जन के बाद भी वही स्थिति रहनी है, तो फिर कन्वर्जन क्यों करना? फिर तो हिंदू बने रह सकते हैं। हालाँकि इसका जवाब अभी तक नहीं आया है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पेंडिंग है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में माँग की गई थी कि इस्लाम-ईसाई मजहब अपनाने वालों को भी SC-ST का फायदा मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं आया है।
ऑपइंडिया से बातचीत में अश्विनी उपाध्याय ने आगे कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला यूपी के लिए है लेकिन हाईकोर्ट का फैसला यह अपने आप में एक तरीके से बिल्कुल परफेक्ट फैसला है। इसलिए मध्य प्रदेश की सरकार, महाराष्ट्र की सरकार, देश के सभी अन्य राज्य सरकारों को भी इस फैसले को अपने स्तर पर लागू करना चाहिए और जो लोग कन्वर्ट हो गए हैं, चाहे वो इस्लाम में चले गए हों या ईसाई में, उनका एससी-एसटी का दर्जा खत्म करना चाहिए। उनको एससी-एसटी के मिलने वाले लाभ बंद होने चाहिए। जो लोग केवल हिंदू में रहते हैं और दलित हैं, उनको ही इसका फायदा मिलना चाहिए।”
न्याय की राह में अहम कदम है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला जितेंद्र साहनी के व्यक्तिगत मामले से कहीं आगे जाता है। यह संविधान की भावना को बचाने की कोशिश है, जिसमें आरक्षण उत्पीड़ितों के उत्थान के लिए, न कि धोखे के लिए। जस्टिस गिरि की बेंच ने साफ कहा, “भारत सेक्युलर है, लेकिन कानून अंधा नहीं है।”
हालाँकि अब गेंद प्रशासन के पाले में आ गई है। ऐसे में क्या हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, हाई कोर्ट के इस फैसले पर यूपी सरकार सख्ती से अमल करती है या फिर वो सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी, ये तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे, एक बात अब साफ हो चुकी है कि सामाजिक न्याय की यह लड़ाई के नाम चल रहे धर्मांतरण रैकेटों और फर्जीवाड़ा करने वाले लोगों के लिए आगे की राह कठिन हो चली है।
जापान में मुस्लिम आबादी की बेतहाशा वृद्धि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रही है। यहाँ बड़े-बड़े मस्जिद बन गए हैं। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद देखा जा सकता है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।
जापान में हजार से लाखों में पहुँची मुस्लिम आबादी
दुनियाभर में मुस्लिम आबादी बेहताशा बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक, इस सदी के अंत तक ईसाइयों को पीछे छोड़ते हुए इस्लाम मानने वालों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी।
दुनिया में 200 से ज्यादा देशों में इनकी अच्छी खासी आबादी है। इन देशों में इस्लामी गतिविधियाँ तेजी से बढ़ी हैं। 2013 में विश्व जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 1.6 अरब थी और 2050 तक 2.9 अरब यानी विश्व जनसंख्या का करीब 26% तक पहुँचने का अनुमान है। यही वजह से की विश्व के छोटे-छोटे देशों में भी इनकी संख्या दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ रही है।
छोटा सा एशियाई देश जापान भी इससे अछूता नहीं है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी है। मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.18 फीसदी से 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं।
ये लोग ज्यादातर प्रवासी कामगार हैं, जो टेक्नोलॉजी, बिजनेस और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे के मुताबिक, इनकी संख्या 200,000 से ज़्यादा होने का अनुमान है। मार्च 2021 तक, देश भर में मस्जिदों, यानी पूजा की जगहों की संख्या 1999 में 15 से बढ़कर 113 हो गई है।
जापानी की अधिकांश मुस्लिम आबादी (लगभग 80%) ग्रेटर टोक्यो क्षेत्र, चुक्यो महानगरीय क्षेत्र और किन्ही क्षेत्र में रहते हैं। अब इनका विस्तार दूसरे क्षेत्रों में भी हो रहा है।
जापान में तेजी से बन रहे हैं बहुमंजिला मस्जिद
ईरान और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से मजदूरों के बढ़ते इमिग्रेशन और धर्मांतरण की वजह से जून 2024 तक यहाँ 149 मस्जिदें बन गई हैं। यानी इनकी संख्या 10 गुणा बढ़ गई हैं। कई मस्जिदों को बड़ा बनाया गया है।
टोक्यो में टोक्यो कैमी मस्जिद को हाल ही में बहुमंजिला बनाया गया है और समय-समय पर आम जनता को लुभाने के लिए इस्लामिक गतिविधियाँ चलाई जाती हैं। दिसंबर 2012 के मध्य में एक शुक्रवार को दोपहर के आसपास, टोक्यो के शिबुया वार्ड में टोक्यो कैमी मस्जिद में एक खास आवाज में आदमी ने अज़ान दिया और नमाज का समय बताया। उसने कहा, “मस्जिद घर जैसी है। अल्लाहु अकबर।”
यहाँ तक कि विश्वविद्यालय में भी मस्जिद बन चुकी है। जैसे- वासेदा विश्वविद्यालय के टोकोरोजावा परिसर के पास एक इमारत बनी थी, जिसे मस्जिद के रूप में उपयोग करने के लिए पुनर्निर्मित किया गया है।
(फोटो साभार- प्रोफेसर तनाडा)
90 के दशक में बनी बेतहाशा मस्जिदें
1990 के दशक में यहाँ मस्जिदों की संख्या तेजी से बढ़ी। 1980 में जहाँ सिर्फ 4 मस्जिदें थी, वहीं 1990 के दशक में ये बढ़ कर 90 से ज्यादा हो गई। इन वर्षों में इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए बाहरी देशों से कई लोग आए और मस्जिदों में कार्यक्रम आयोजित कर जापानियों को लुभाने की कोशिश की गई यानी जापानियों के धर्मांतरण में इन कार्यक्रमों की अहम भूमिका रही।
अब हालात ये हैं कि न सिर्फ प्रवासी मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, बल्कि जापान की मूल आबादी का धर्मांतरण तेजी से हुआ है। जापान में प्रवासी मुस्लिमों के बसने और परिवार बसाने की वजह से एक ‘हाइब्रिड मुस्लिम’ आबादी तैयार हो गई है। नमाज पढ़ना और रोजा रखना जैसे रीति रिवाज का पालन बड़ी आबादी करती है। इनमें कट्टरता भी देखी जाती है।
सांसद मिजुहो ने कब्रिस्तान बनाने पर प्रतिबंध लगाने की माँग की
जापान में हाल ही में ये खबर भी सामने आई कि सरकार ने शव दफनाने के लिए कब्रिस्तान बनाने के लिए जमीन देने से इनकार कर दिया है और प्रवासी मुस्लिमों को शव अपने देश लेकर दफनाने को कहा है। हालाँकि सरकार ने जापानी संसद में इसको लेकर स्पष्टीकरण दिया है।
दरअसल हाउस ऑफ काउंसिलर्स की प्रतिनिधि उमेमुरा मिजुहो ने कहा कि जापान में छोटा भू भाग है। प्राकृतिक आपदाएँ यहाँ होती रहती हैं, ऐसे में किसी बड़ी आपदा की स्थिति में दफनाने पर शवों के बाहर निकलने की संभावना है। साथ ही 99 फीसदी आबादी यहाँ दाह संस्कार करती है, इसलिए जापान की स्थिति को देखते हुए दफनाने से जुड़े नियम कड़े किए जाने चाहिए।
इसको लेकर सरकार ने स्थानीय सरकार को इसके बारे में विचार करने को कहा है। साथ ही स्थानीय रीति रिवाजों, नियमों और पर्यावरण को भी ध्यान में रखने को कहा है। क्योडो न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में मुस्लिम आबादी बढ़ने के बाद जापानी मुस्लिमों को दफनाने के लिए नई जगहों की जरूरत है।
एजेंसी का कहना है कि कुछ लोकल सरकारें बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए नए कब्रिस्तानों के लिए ज़मीन अलग रखने को तैयार हैं, जबकि दूसरी सरकारें इतनी मदद नहीं कर रही हैं।
जापान में दाह संस्कार आम बात है और 99.9% शवों का दाह संस्कार किया जाता है। इससे मुसलमान अपने दफ़नाने के तरीकों को लेकर परेशान हैं।
उत्तर-पूर्वी जापान में मौजूद मियागी प्रांत के गवर्नर ने दिसंबर में कहा था कि 2023 में इंडोनेशिया के साथ लोकल इलाकों के लिए मज़दूर देने के लिए मेमोरेंडम साइन करने के बाद एक नए कब्रिस्तान पर विचार किया जा रहा है।
जापान शांति पसंद देश माना जाता है। अनुशासन प्रिय इस देश की बड़ी आबादी बुजुर्ग हो चुकी है। ऐसे में कामगार की जरूरत को पूरा करने के लिए विदेशों से लोग यहाँ आकर बस रहे हैं। इनमें मुस्लिम आबादी सबसे ज्यादा है। खासकर ईरान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया जैसे देशों से कामगार आकर यहाँ स्थायी रूप से बस रहे हैं। इसका असर जापान में दिखने लगा है।
श्रीलंका में चक्रवात दितवाह इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा बनकर आया। श्रीलंकाई राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके ने इसे ‘सबसे चुनौतीपूर्ण विपदा’ घोषित किया। डिजास्टर मैनेजमेंट सेंटर (डीएमसी) के अनुसार, 25 जिलों में 1.55 मिलियन लोग प्रभावित हुए, जिसमें 2,33,000 लोग 1,441 आश्रय स्थलों में विस्थापित हैं।
565 घर पूरी तरह नष्ट हो गए और 20,271 आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए, जबकि केलानी नदी के किनारे बाढ़ ने कोलंबो जैसे शहरों तक को जलमग्न कर दिया। श्रीलंका की पहाड़ियों में भूस्खलन और पूर्वी राज्यों में बाढ़ के कारण बुनियादी ढाँचा ध्वस्त हो गया है। सड़कें, पुल और बिजली आपूर्ति बाधित रही।
यूएन ICEF ने 2,75,000 बच्चों को प्रभावित बताया, जबकि डब्ल्यूएफपी ने राहत कार्यों का परेशानी आने की बात कही। मौसम सुधरने के बावजूद, अलग-थलग समुदायों तक पहुँचना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
दुनिया भर से राहत का आया वादा, भारत ने सबसे पहले पहुँचाई मदद
राहत कार्यों में डीएमसी और नेशनल डिजास्टर रिलीफ सर्विस सेंटर समन्वय कर रहे हैं, जिसमें खोज-बचाव, भोजन वितरण और चिकित्सा सहायता शामिल है। श्रीलंका की मदद करने के लिए यूके, चीन और अन्य देशों ने सहायता का वादा किया, लेकिन भारत ने सबसे तेज और बड़े पैमाने पर योगदान दिया।
भारत ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए ऑपरेशन सागर बंधु शुरू किया। इसके तहत 28 नवंबर 2025 से 53 टन राहत सामग्री, NDRF की 80 सदस्यीय टीमें, IAF हेलीकॉप्टर और सेना कंटिंजेंट भेजे। आईएएफ ने 5.5 टन राहत पैकेट्स गिराए, दर्जनों को आपदा से निकाला और मंडारम नुवारा में 2,000 किलोग्राम आपूर्ति पहुँचाई।
NDRF ने पुत्तलम में 800 लोगों की मदद की, जिसमें गर्भवती महिलाएँ और घायल शामिल थे। आईएनएस सुकन्या ने त्रिंकोमाली में आपूर्ति पहुँचाई, जबकि 2,000 से अधिक भारतीय नागरिकों को भी सुरक्षित निकाला गया।
भारत की ओर से श्री लंका को भेजी गई मदद
भारतीय उच्चायुक्त संतोष झा ने सेडावट्टा में एनडीआरएफ कार्यों की समीक्षा की, जहाँ 6-10 फीट पानी में घर-घर खोज चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीलंकाई राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके से बात की। कुल मिलाकर ‘नेबरहुड फर्स्ट’ और ‘विजन महासागर’ नीति के तहत भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 10 टन राहत आपूर्ति की पुष्टि की।
श्रीलंकाई मीडिया में भारत की मदद की प्रशंसा
भारत से मदद मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बातचीत कर श्रीलंका के राष्ट्रपति दिसानायके ने कहा कि भारत की त्वरित मदद ने राहत और बचाव कार्यों को मजबूती दी और श्रीलंकाई लोगों तक तेजी से मदद पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई।
उन्होंने विशेष रूप से ‘रेस्क्यू टीमों और राहत सामग्री की तेज तैनाती’ की सराहना की और कहा कि श्रीलंका की जनता भारत की समय पर और प्रभावी प्रतिक्रिया की प्रशंसा कर रही है।
साभार- dailynews.lk
पीएमओ और श्रीलंका सरकार की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों के मुताबिक, राष्ट्रपति ने यह भी रेखांकित किया कि भारत ने सिर्फ शुरुआती आपातकाल में ही नहीं, बल्कि पुनर्वास और पुनर्निर्माण के अगले चरणों में भी साथ देने का आश्वासन दिया है, जिसे कोलंबो अत्यंत सकारात्मक संकेत मान रहा है।
श्रीलंकाई दैनिक अखबार डेली मिरर ने भारत की चिकित्सा टीम को जाफेला क्षेत्र में जीवनरक्षक बताया, जहां बाढ़ प्रभावित इलाके में बिना बिजली के पाँच दिनों बाद आरोग्य मैत्री टीम ने इलाज शुरू किया।
इसी अखबार ने ऑपरेशन सागर बंधु के तहत भारत द्वारा 53 टन राहत सामग्री भेजने का उल्लेख किया, जिसमें एनडीआरएफ और वायुसेना की भूमिका प्रमुख रही। डेली न्यूज ने लगातार रिपोर्ट्स में भारत की खोज-बचाव और चिकित्सा सहायता जैसे जाफेला में मेडिकल कैंप और साइक्लोन दितवाह से प्रभावित क्षेत्रों में सहयोग की सराहना की।
श्रीलंका के विशेष वर्ग जैसे सेलेब्रिटीज और क्रिकेटर्स के साथ आम लोगों ने भी सोशल मीडिया के जरिए भारत और यहाँ से भेजी गई मदद की सराहना की। रेडिट पर एक यूजर ने लिखा, “दितवाह चक्रवात में प्रभावित लोगों और इाकों में मदद पहुँचाने के लिए भारत और यहाँ के लोगों का दिल से आभार। आप सच्चे दोस्त हैं।”
पाकिस्तान की आलोचना और एक्सपायर्ड सामान
पाकिस्तान ने दावा किया कि भारत ने श्रीलंका के लिए उसकी सहायता विमान को एयरस्पेस न देकर रोका, लेकिन भारत ने इसे खारिज कर तुरंत मंजूरी देने की बात कही। विदेश कार्यालय ने एक्स पर कहा कि सी-130 विमान 60 घंटे से अधिक इंतजार कर रहा और भारत की आंशिक मंजूरी से काम नहीं हो पा रहा था।
पाकिस्तानी उच्चायोग ने भारत पर ‘शेनानिगन्स’ का आरोप लगाया, जबकि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने राहत अभियान का आदेश दिया। भारत ने इस दावे को ‘हास्यास्पद’ बताकर खारिज किया। तथ्यों के साथ इस बात को सिद्ध कर दिया कि एयरस्पेस के लिए माँगी गई मंजूरी महज 4 घंटे में ही दे दी गई थी।
हालाँकि इस पर मीडिया ने रिपोर्ट किया कि भारत ने पाकिस्तानी उड़ान के लिए देरी से एयरस्पेस खोला। उसने लिखा कि पाकिस्तान ने समुद्री मार्ग से 200 टन सहायता भेजी, लेकिन हवाई अभियान में देरी हुई।
पाकिस्तान के नापाक इरादों के बाद उसकी खिल्ली खुद तब उड़ गई जब श्रीलंका को भेजी गई राहत सामग्री में एक्सपायर्ड दवाएँ और खाद्य सामग्री मिली। इनकी एक्सपायरी डेट अक्टूबर 2024 अंकित थी।
इससे जुड़ी फोटो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई और पाकिस्तान को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। नेटिजनंस ने ‘Have Some Shame’ जैसे हैशटैग ट्रेंड कर पाकिस्तान को आड़े हाथों लिया। श्रीलंका ने भी इस पर असंतोष जताया।
Yesterday Pakistan cried that India was blocking its relief for Sri Lanka. Today we learn the ‘relief’ was expired junk, solely meant for PR. Colombo has conveyed its displeasure to Islamabad.
A disaster of a country trying to provide relief. "South Asian" solidarity and all. pic.twitter.com/04C5P5loSz
कुल मिलाकर अगर कहा जाए तो आपदा में जहाँ एक ओर भारत ने आगे बढ़कर श्रीलंका की न केवल मदद की, बल्कि ये भी साबित किया कि वह एक बेहतर पड़ोसी देश की भूमिका निभाने में कभी पीछे नहीं रहेगा।
वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस संकट के समय में भी अपनी असलियत दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत की बेइज्जती करने की कोशिश में पाकिस्तान को इस बार भी मुँह की खानी पड़ी जब खुद के भेजे गए राहत सामग्री की एक्सपायरी सामने आई। इसके साथ ही दुनिया को ये बी पता चला कि पाकिस्तान वहीं हाथी है जिसके खाने के दाँत अलग और दिखाने के दाँत अलग हैं जिससे आगाह रहने की आवश्यकता है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आने वाले थे, और दिल्ली का कूटनीतिक गलियारा उनके स्वागत की तैयारियों में जुटा था। लेकिन तभी, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के दूतों को न जाने क्या सूझा कि उन्होंने एक भारतीय अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में ‘ज्ञान’ देने वाला एक लेख छपवा डाला। लेख का मकसद रूस को यूक्रेन युद्ध का विलेन बताना और भारत को कान में फुसफुसाकर समझाना कि ‘रूस से दूरी बनाओ’ था।
लेकिन भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस अवांछित दखल को सीधा-सीधा ‘कूटनीतिक बदतमीजी’ करार देते हुए उन्हें करारा जवाब दिया। यूरोपीय दूतों ने सोचा कि भारत उनका मंच है, पर MEA ने साफ कर दिया कि यह देश किसी के एजेंडे पर नहीं चलता। पुतिन की यात्रा से पहले माहौल बिगाड़ने का यह खेल बुरी तरह से उल्टा पड़ गया है और अब भारत ने यूरोप को आईना दिखा दिया है।
UK-फ्रांस-जर्मनी ने अपने लेख में क्या छपवाया था?
इन तीनों देशों के दूतों (फिलिप एकरमैन, थिएरी मथौ और लिंडी कैमरून) ने एक साथ मिलकर टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) में जो लेख छपवाया, उसमें रूस पर सीधे-सीधे युद्ध भड़काने और यूक्रेन में क्रूरता दिखाने के आरोप लगाए गए। लेख का पूरा टोन ऐसा था जैसे वे भारत को समझा रहे हों कि रूस से दूरी बनाओ और यूरोप के नजरिए को अपनाओ। उन्होंने लिखा कि रूस ने यूक्रेन युद्ध ‘निर्दयता’ से लड़ा है और उसे ‘मानव जीवन की कोई परवाह नहीं’ है। उनका दावा था कि रूस साइबरअटैक, झूठी खबरें और दूसरे तरीकों से दुनिया में अस्थिरता फैलाता है। लेख में यहाँ तक कहा गया कि पुतिन ‘जानबूझकर शांति वार्ता में देरी करते हैं’ और शांति को लेकर गंभीर नहीं हैं।
TOI में छपा लेख
लेख का लहजा ऐसा था कि मानो भारत को पढ़ाया जा रहा हो कि रूस कैसे गलत है और कैसे दुनिया उसके खिलाफ खड़ी है। उन्होंने यह भी लिखा कि दुनिया युद्ध खत्म करना चाहती है, लेकिन रूस ऐसा नहीं चाहता। यानी पूरे लेख में कोशिश यही थी कि भारत की जनता और नीति-निर्माताओं में रूस को लेकर नकारात्मक सोच पैदा की जाए। यह पूरा लेख पुतिन की भारत यात्रा से ठीक पहले छापा गया, ताकि माहौल बिगाड़ा जा सके और भारत-रूस रिश्तों में दूरी लाई जा सके।
लेख में तीनों ने साफ तौर पर यह कोशिश की कि भारत पर नैतिक दबाव बनाया जाए कि वह रूस से अपने रिश्तों पर पुनर्विचार करे। उन्होंने यहाँ तक कहा कि रूस का ‘वैश्विक व्यवहार खतरनाक’ है और उसकी नीतियाँ यूक्रेन से बाहर भी दुनिया की स्थिरता के लिए खतरा हैं। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि लेख में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का नाम लेते हुए कहा कि ‘जंग से समाधान नहीं निकलते’, जैसे वे भारत की विदेश नीति को अपने तर्ज पर ढालना चाह रहे हों। यह सब करते हुए उन्होंने यह नहीं सोचा कि भारत अपनी विदेश नीति खुद तय करता है, किसी यूरोपीय निर्देश पर नहीं।
कुल मिलाकर, यह लेख सिर्फ युद्ध पर राय नहीं था, बल्कि भारत को घुमा-फिराकर यह बताने की नाकाम कोशिश थी कि वह रूस से दूरी बनाए। यही वजह है कि इस पूरे मामले ने कूटनीतिक बवाल खड़ा कर दिया और भारत के विदेश मंत्रालय को भी कड़ी प्रतिक्रिया देनी पड़ी।
कंवल सिबल की कड़क प्रतिक्रिया- ‘ये लेख नहीं, प्रचार का पोस्टर’
पूर्व विदेश सचिव कंवल सिबल ने इस लेख पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने X पर पोस्ट कर लिखा, “पुतिन की भारत यात्रा से ठीक पहले रूस के खिलाफ छापा गया यह घटिया और जहरीला लेख सीधा-सीधा कूटनीतिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाता है। यह भारत का अपमान है, क्योंकि यह हमारे एक बेहद करीबी और भरोसेमंद दोस्त देश ‘रूस’ के साथ हमारे रिश्तों पर सवाल उठाता है।”
कंवल सिबल आगे लिखते हैं, कि ये तीनों देशों के दूत भारत के अंदरूनी मामलों में दखल दे रहे हैं। साफ इरादा यही है कि भारत में बैठे pro-Europe लोग रूस के खिलाफ भड़कें और हमारे रूस के साथ रिश्तों की नैतिकता पर उंगली उठाई जाए। इन दूतों को अगर इतनी ही चिंता थी, तो MEA के पास आधिकारिक तौर पर आकर बात करते। लेकिन नहीं, इन्होंने जानबूझकर ऐसा पब्लिक तमाशा किया है, ताकि अपना प्रोपेगेंडा फैलाया जा सके।
This vicious article against Russia just before Putin’s state visit to India breaches diplomatic norms, is a diplomatic insult to India as it questions India’s close ties with a very friendly third country.
It is interference in our internal affairs as the purpose is to fuel… https://t.co/oN5E2iLqT5
इसके अलावा, पूर्व विदेश सचिव ने लिखा, “टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी बड़ी गैर-जिम्मेदारी दिखाई है कि उसने ऐसा लेख छापा। यह भारत की कूटनीति और राष्ट्रीय हित, दोनों के साथ खुला खिलवाड़ है। MEA को चाहिए कि वह इन तीनों दूतों की इस हरकत पर खुलकर नाराजगी जताए, क्योंकि यह साफ तौर पर कूटनीतिक शिष्टाचार का उल्लंघन है।”
विदेश मंत्रालय का कड़ा रुख: ‘हमें मत सिखाओ’
हमारे विदेश मंत्रालय ने इन यूरोपीय दूतों को बिल्कुल साफ और सीधी भाषा में आईना दिखा दिया है। MEA के अधिकारियों ने कहा कि इस तरह किसी विदेशी दूत का भारतीय अखबार (TOI) में आकर भारत को सीख देना न सिर्फ असामान्य है बल्कि पूरी तरह गलत कूटनीतिक तरीका है। दुनिया में कहीं भी राजनयिक ऐसे खुलेआम किसी देश की विदेश नीति में दखल नहीं देते, लेकिन ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के दूतों ने मिलकर यही काम किया और वो भी पुतिन के भारत आने से ठीक पहले।
विदेश मंत्रालय ने साफ-साफ कहा कि यह ‘कूटनीतिक व्यवहार स्वीकार्य नहीं‘ है कि कोई हमें सार्वजनिक रूप से बताए कि हमें रूस जैसे तीसरे देश के साथ कैसे रिश्ते रखने चाहिए। भारत किसी का पिछलग्गू नहीं है। हम कोई उपनिवेश नहीं हैं कि यूरोप बताता फिरें कि हमें किससे दोस्ती करनी है और किससे दूरी रखनी है। भारत एक स्वतंत्र देश है और अपनी विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करता है, न कि यूरोप के नैरेटिव, दबाव या एजेंडे के हिसाब से।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पूरा विवाद ऐसे समय में खड़ा किया गया, जब भारत और रूस एक महत्वपूर्ण श्रम समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। इस समझौते से हजारों भारतीयों को रूस में नौकरी के नए अवसर मिलने वाले हैं। यानी जबकि भारत अपने नागरिकों के लिए मौके बढ़ा रहा है और द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत कर रहा है, यूरोपीय देश यहाँ प्रोपेगेंडा फैलाने की कोशिश में लगे थे। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि हमें ऐसी चालबाजियों से कोई फर्क नहीं पड़ता। हम वही करेंगे जो हमारे देश के हित में है और कोई भी बाहरी ताकत इसे रोक नहीं सकती।
बंद करें ये दखलअंदाजी
ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के दूतों को यह समझना चाहिए कि भारत अब 1947 वाला देश नहीं है। वे इस तरह का दखल और प्रचार करके भारत की विदेश नीति को नहीं बदल सकते। यह आर्टिकल न केवल ओछी हरकत थी, बल्कि उस भारतीय अखबार TOI की भी गलती है जिसने विदेशी दूतों को देशहित के खिलाफ जाकर अपनी बात रखने की जगह दी। इन दूतों को अपनी सीमा में रहना चाहिए और भारत के रिश्तों पर सवाल उठाना बंद कर देना चाहिए। भारत और रूस का साथ मजबूत है और ऐसे फालतू लेख इसे जरा भी हिला नहीं सकते।