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साइकिल से लैंबोर्गिनी तक का सफर और अब ED का शिकंजा, जानें कैसे सट्टेबाजी के जाल में फँसा ‘फैंटेसी एक्सपर्ट’ नाम से मशहूर यूट्यूबर अनुराग द्विवेदी

यूट्यूब की दुनिया में ‘फैंटेसी एक्सपर्ट’ के नाम से मशहूर अनुराग द्विवेदी इन दिनों अपनी शोहरत नहीं, बल्कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई के कारण चर्चा में हैं। उत्तर प्रदेश के उन्नाव के एक साधारण गाँव से निकलकर दुबई में आलीशान जिंदगी जीने वाले अनुराग पर अब मनी लॉन्ड्रिंग और अवैध सट्टेबाजी के गंभीर आरोप लगे हैं।

जानकारी के मुताबिक, ED ने उनके कई ठिकानों पर छापेमारी कर करोड़ों की लग्जरी गाड़ियाँ जब्त की हैं और उनके ‘हवाला’ व ‘दुबई’ कनेक्शन की परतें खोलनी शुरू कर दी हैं।

सट्टे के खेल ने रातों-रात बनाया ‘रंक से राजा’

अनुराग द्विवेदी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी है। उन्नाव के खजूर गाँव का रहने वाला अनुराग कुछ साल पहले तक साधारण साइकिल से चलता था। 2017-18 में क्रिकेट सट्टेबाजी में लाखों रुपए हारने के बाद वह दिल्ली चला गया।

वहाँ उसने ड्रीम-11 जैसे फैंटेसी ऐप्स के लिए ‘टिप्स’ देना शुरू किया और खुद को एक एक्सपर्ट के तौर पर स्थापित किया। देखते ही देखते अनुराग ने अपना खुद का फैंटेसी ऐप लॉन्च कर दिया और सोशल मीडिया के जरिए करोड़ों की दौलत और शोहरत बटोर ली।

दुबई की ‘शाही शादी’ ने खींचा जाँच एजेंसियों का ध्यान

अनुराग की बेहिसाब दौलत का प्रदर्शन तब चरम पर दिखा, जब नवंबर 2025 में उन्होंने दुबई में एक लग्जरी क्रूज पर बेहद भव्य शादी की। इस शादी में उन्होंने 100 से अधिक रिश्तेदारों को अपने खर्च पर हवाई जहाज से दुबई बुलाया और करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए।

(फोटो साभार: NDTV)

सोशल मीडिया पर वायरल हुई इन तस्वीरों ने जाँच एजेंसियों को सतर्क कर दिया। सवाल उठा कि महज कुछ साल में एक यूट्यूबर के पास इतनी संपत्ति कहाँ से आई कि वह दुबई में अचल संपत्तियाँ खरीदने लगा।

यूट्यूब की शोहरत और विवाद

यूट्यूब और सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढ़ने के बाद अनुराग द्विवेदी ने 7 जनवरी 2024 को लखनऊ के इंदिरा गाँधी प्रतिष्ठान में एक बड़ा मीट-अप आयोजित किया। इस कार्यक्रम का नाम ‘तू कर लेगा’ रखा गया था। इस आयोजन में सैकड़ों की संख्या में उनके प्रशंसक और युवा शामिल हुए। कार्यक्रम के जरिए अनुराग ने खुद को एक सफल फैंटेसी क्रिकेट एक्सपर्ट और मोटिवेशनल चेहरे के तौर पर पेश किया, जिससे उनकी लोकप्रियता और ज्यादा बढ़ गई।

लखनऊ के इंदिरा गाँधी प्रतिष्ठान में एक बड़ा मीट-अप आयोजित

इसके कुछ महीने बाद, दिसंबर 2024 में अनुराग द्विवेदी एक बार फिर सुर्खियों में आ गए। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा कर दावा किया कि उन्हें रंगदारी माँगे जाने और जान से मारने की धमकी मिली है। इस पोस्ट के बाद उनके समर्थकों और सोशल मीडिया यूजर्स के बीच हलचल मच गई और मामला तेजी से फैल गया। हालाँकि, कुछ समय बाद उन्होंने यह पोस्ट अपने अकाउंट से हटा ली, लेकिन तब तक यह मुद्दा चर्चा का विषय बन चुका था और अनुराग द्विवेदी का नाम और ज्यादा लोगों तक पहुँच गया।

ED की छापेमारी: लग्जरी कारों का जखीरा जब्त

मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) के तहत कार्रवाई करते हुए ED ने लखनऊ और उन्नाव समेत अनुराग के 9 ठिकानों पर धावा बोला। जाँच के दौरान करीब 5 करोड़ रुपए मूल्य की 5 लग्जरी गाड़ियाँ जब्त की गईं, जिनमें लैंबोर्गिनी, मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू और थार जैसी महँगी कारें शामिल हैं।

उन्नाव में उनके चाचा के घर से भी लैंबोर्गिनी उरुस और फोर्ड एंडेवर जैसी गाड़ियाँ बरामद कर ED दफ्तर में खड़ी कराई गई हैं।

हवाला और अवैध सट्टेबाजी का गंभीर आरोप

ED का दावा है कि अनुराग द्विवेदी अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी प्लेटफॉर्म्स के संचालन और प्रचार में मुख्य भूमिका निभा रहा था। आरोप है कि उसने सोशल मीडिया के जरिए इन प्लेटफॉर्म्स को प्रमोट किया और बदले में ‘हवाला’ ऑपरेटरों व बिचौलियों के माध्यम से बड़ी रकम हासिल की।

जाँच में उसके और उसके परिवार के बैंक खातों में करोड़ों रुपए मिले हैं, जिनका कोई कानूनी स्रोत नहीं है। वर्तमान में अनुराग दुबई में है और ED के कई समन जारी होने के बावजूद पेश नहीं हुआ है।

‘सर तन से जुदा’ का नारा भारत की संप्रभुता-अखंडता को खुली चुनौती: बरेली हिंसा मामले में इलाहाबाद HC ने रिहान की जमानत याचिका की खारिज, पढ़ें कोर्ट ने अपने आदेश में क्या-क्या कहा

बरेली हिंसा मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ नारे को भारत की संप्रभुता, अखंडता और भारतीय न्याय व्यवस्था के खिलाफ बताते हुए सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसा नारा न केवल कानून के शासन को चुनौती देता है, बल्कि लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत एक संवैधानिक देश है जहाँ सजा का निर्धारण कानून करता है, न कि कोई भीड़। इसी आधार पर कोर्ट ने बरेली हिंसा का आरोपि रिहान की जमानत याचिका खारिज कर दी।

कानून और देश के खिलाफ नारा

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ जैसा नारा, चाहे कोई अकेला व्यक्ति लगाए या कोई भीड़, यह सीधे तौर पर कानून की ताकत को चुनौती देता है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसे नारे लोगों को हिंसा और हथियार उठाने के लिए उकसाते हैं, जिससे देश की एकता और सुरक्षा को खतरा होता है।

कोर्ट ने बताया कि इसी कारण ऐसा नारा लगाना भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत अपराध है। जस्टिस ने स्पष्ट किया कि कोई भी नारा जो कानून की प्रक्रिया के बाहर मौत की सजा की वकालत करता है, वह सीधे तौर पर भारतीय कानूनी व्यवस्था के अधिकार को चुनौती देता है।

नारों का धार्मिक और आपराधिक अंतर

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ शब्दों में समझाया कि अलग-अलग धर्मों में बोले जाने वाले नारों का उद्देश्य क्या होता है और कब वे गलत माने जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि आमतौर पर ये नारे ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने के लिए होते हैं।

कोर्ट के अनुसार, इस्लाम में ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’, सिख धर्म में ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ और हिंदू धर्म में ‘जय श्रीराम’ या ‘हर-हर महादेव’ जैसे नारे श्रद्धा और भक्ति के प्रतीक हैं। इन्हें खुशी, आस्था और धार्मिक भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बोला जाता है, इसलिए अपने आप में ये किसी भी तरह से अपराध नहीं हैं।

हालाँकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इन्हीं नारों का इस्तेमाल किसी दूसरे धर्म के लोगों को डराने, धमकाने या हिंसा भड़काने के मकसद से किया जाए, तो वह अपराध की श्रेणी में आ जाता है। कोर्ट ने कहा कि नारे तभी तक स्वीकार्य हैं, जब तक उनका उपयोग गलत इरादे और कानून व्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के लिए न किया जाए।

कुरान में नहीं है ‘सर तन से जुदा’ का जिक्र

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ कहा कि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा कुरान या इस्लाम के किसी भी प्रामाणिक मजहबी ग्रंथ में कहीं नहीं मिलता। अदालत के अनुसार, इस नारे को इस्लाम से जोड़ना गलत है, क्योंकि इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है।

कुरान में नहीं है ‘सर तन से जुदा’ का जिक्र- कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि पैगंबर मोहम्मद ने अपने जीवन में अपमान और तकलीफ सहने के बावजूद हमेशा दया, करुणा और क्षमा का रास्ता चुना। उन्होंने कभी भी किसी के खिलाफ हिंसा करने या सिर कलम करने की बात नहीं कही।

कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि पैगंबर के नाम पर हत्या या हिंसा की बात करना उनके आदर्शों के खिलाफ है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी सोच पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं का पालन नहीं, बल्कि उनका अपमान है।

‘सर तन से जुदा’ नारे की जड़ें कहाँ से जुड़ी हैं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस नारे की पृष्ठभूमि पर भी विस्तार से बात की। कोर्ट ने बताया कि अविभाजित भारत में ईशनिंदा से जुड़ा कानून वर्ष 1927 में अंग्रेजों द्वारा बनाया गया था, ताकि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले मामलों को रोका जा सके।

कोर्ट ने कहा कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इसी कानून में बदलाव किए और उसमें ईशनिंदा के मामलों में मौत की सजा का प्रावधान जोड़ दिया। कोर्ट के अनुसार, ‘सर तन से जुदा’ का नारा वहीं से पैदा हुआ और धीरे-धीरे पाकिस्तान से भारत समेत अन्य देशों में फैल गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ असामाजिक तत्व इस नारे का इस्तेमाल धार्मिक भावना के नाम पर राज्य की सत्ता को चुनौती देने और दूसरे समुदायों में डर का माहौल बनाने के लिए कर रहे हैं, जो पूरी तरह गलत और कानून के खिलाफ है।

बरेली हिंसा और जमानत याचिका खारिज

यह पूरा मामला सितंबर में बरेली में हुई हिंसा से जुड़ा है, जहाँ इत्तेफाक मिन्नत काउंसिल (INC) के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा के आह्वान पर भीड़ जमा हुई थी। आरोप है कि इस दौरान ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए गए, पुलिस पर हमला हुआ और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया।

आरोपित रिहान ने जमानत माँगते हुए खुद को निर्दोष बताया था, लेकिन कोर्ट ने केस डायरी के सबूतों को देखते हुए कहा कि आरोपित रिहान उस अवैध भीड़ का हिस्सा था जिसने न केवल आपत्तिजनक नारे लगाए बल्कि सार्वजनिक शांति को भी भंग किया। साक्ष्यों की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता और याचिका खारिज कर दी।

जिहादियों का हीरो, भारत तोड़ने की ख्वाहिश और ग्रेटर बांग्लादेश का सपना: जानें- कौन था उस्मान हादी जिसकी मौत से सुलगा इस्लामी मुल्क

बांग्लादेश में एक बार फिर हिंसा का दौरा शुरू हो गया है। ढाका में शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद हिंसक विरोध प्रदर्शन जारी हैं। उस्मान हादी के समर्थकों ने मीडिया संस्थानों, शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग और भारतीय उच्चायोग को निशाना बनाया। जगह-जगह तोड़फोड़ और आगजनी की।

उस्मान हादी पर शुक्रवार (12 दिसंबर 2025) को गोलियों से हमला हुआ था, जिसके बाद से वह सिंगापुर के अस्पताल में भर्ती था। सिंगापुर के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार (18 दिसंबर 20205) को बयान जारी कर कहा, “डॉक्टरों के तमाम कोशिशों के बावजूद, हादी ने अपने घावों के कारण दम तोड़ दिया।”

इस घोषणा के तुरंत बाद ही आक्रोशित उस्मान हादी के समर्थक सड़कों पर उतर आए और हादी की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों की गिरफ्तारी की माँग करने लगे। भारी संख्या में भीड़ जमा होने से तनाव फैल गया। देखते ही देखते प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया और भारत-विरोधी नारे तक लगने लगे। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर बांग्लादेश में हिंसा का कारण बना उस्मान हादी कौन है?

कौन है उस्मान हादी?

उस्मान हादी का जन्म बांग्लादेश के झलकाठी जिले के नलचिती उपजिला में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। उसके पिता मदरसा में पढ़ाते थे। हादी ने भी नेराबाद कामिल मदरसे से प्रारंभिक पढ़ाई पूरी की है। इसके बाद ढाका विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग का छात्र था।

वह करीब 32 वर्ष की उम्र में ही इस्लामी संगठन ‘इंकलाब मंच’ का प्रवक्ता बन गया था, जो कट्टरपंथी विचारधारा को प्रचार करता है।

शेख हसीना के तख्तापलट में उस्मान हादी की भूमिका?

शरीफ उस्मान बिन हादी बांग्लादेश में साल 2024 में उपजे छात्र आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरा था, जिसने शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट कराया था। इसके चलते शेख हसीना को देश तक छोड़ना पड़ा था। उस्मान हादी बांग्लादेश के इस्लामी संगठन ‘इंकलाब मंच’ का संयोजक था। यह संगठन शेख हसीना की ‘अवामी लीग’ को खत्म करने में सबसे आगे रहा है।

उस्मान हादी बांग्लादेश में आगामी फरवरी 2026 में होने वाले चुनाव लड़ने की तैयारी में था। वह ढाका-8 सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में प्रचार कर रहा था।

उस्मान हादी का भारत-विरोधी रुख

उस्मान हादी ने भारत के खिलाफ भी कई भड़काऊ बयान दिए हैं। वो शेख हसीना की ‘अवामी लीग’ को भारत से प्रभावित होने के चलते कट्टर आलोचना करता था। वो अक्सर अवामी लीग को उसके भारत के साथ संबंधों को लेकर पार्टी को निशाना बनाता था।

कुछ जगहों पर वह BNP और यूनुस की अंतरिम सरकार पर भारत के नियंत्रण से मुक्त होने में विफल रहने का आरोप लगाता था। उस्मान की मौत के बाद ‘इंकलाब मंच’ ने फेसबुक पोस्ट में भारत का जिक्र करते हुए कहा, “भारतीय वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष में, अल्लाह ने महान क्रांतिकारी उस्मान हादी को बलिदानी के रूप में स्वीकार किया है।”

हादी के भारत-विरोधी रुख ने ही साल 2024 के जुलाई विद्रोह के बाद युवा आंदोलनों को गति दी। अब हादी की मौत के बाद उसके समर्थकों ने भारत पर हमलावरों को शरण देने का आरोप लगाया और भारतीय उच्चायोग बंद करने की माँग की। हादी की बहन महफूजा ने भी हमले के लिए भारत के RAW पर उंगली उठाई।

बांग्लादेश के नक्शे में दिखाए भारत के पूर्वोत्तर राज्य

12 दिसंबर 2025 को उस्मान हादी पर हमले से पहले भी उस्मान हादी ने विवादित फेसबुक पोस्ट किया था। फेसबुक पोस्ट में उसने ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ का नक्शा दिखाया था, जिसमें भारत के 7 पूर्वोत्तर राज्य भी शामिल थे। इस पोस्ट के कुछ घंटों बाद ही ढाका में हादी पर सड़क पर कुछ नकाबपोशों ने गोलियाँ बरसाईं थीं।

अब हादी की मौत के बाद उसके समर्थक भी भारत-विरोधी नारे लगा रहे हैं। समर्थकों का मानना है कि हादी की मौत का कारण भारत है और आरोप लगाया है कि हादी के हमलावर भारत भाग चुके हैं। गुस्साई भीड़ ने बांग्लादेश में भारत के उच्चायोग को निशाना बनाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने समय रहते संभाल लिया। इसके बाद भीड़ ने भारत के उप उच्चायुक्त के घर के बाहर जमा हुई, जिसे हटाने के लिए पुलिस को आँसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा।

‘जो ईसाई के तौर पर रजिस्टर्ड हैं केवल उन्हीं को दें क्रिसमस इवेंट्स की इजाजत’: क्यों गुजरात के धरमपुर और कपराड़ा में हिंदुओं ने उठाई माँग- ग्राउंड रिपोर्ट

गुजरात के वलसाड जिले के धरमपुर और कपराड़ा तालुक के कई गाँवों में अवैध धर्मांतरण और प्रचार गतिविधियों के बढ़ते मामलों को लेकर स्थानीय लोगों ने चिंता जताई है। इसी को लेकर पिछले कुछ दिनों में इन गाँवों के हिंदुओं ने मामलतदार कार्यालय में आवेदन दिए हैं। ग्रामीणों की माँग है कि 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों को दी जाए जिनका नाम सरकारी रिकॉर्ड में आधिकारिक रूप से ईसाई धर्म के फॉलोअर के रूप में दर्ज हो।

हिंदू संगठनों ने यह माँग रखते हुए आशंका जताई है कि इस तरह के आयोजनों से अवैध धार्मिक धर्मांतरण को बढ़ावा मिल सकता है। पिछले कुछ दिनों में धरमपुर और कपराड़ा तालुकाओं के दस से अधिक गाँवों के हिंदू नेताओं ने देव बिरसा सेना और आदिवासी संस्कृति बचाओ सेना जैसे संगठनों के माध्यम से मामलतदार कार्यालय में ज्ञापन सौंपे हैं।

इन आवेदनों में कहा गया है कि पिछले कई वर्षों से आदिवासी इलाकों के विभिन्न गाँवों में ईसाई समुदाय से जुड़े लोग बड़े पैमाने पर सभाएँ, शांति उत्सव, सेमिनार और अन्य कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं जिनका उद्देश्य धार्मिक धर्मांतरण करना बताया गया है। आरोप है कि दिसंबर महीने में मिशनरी और पादरी इन गाँवों में पहुँचते हैं और अलग-अलग स्थानों पर क्रिसमस कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

ज्ञापनों में यह भी दावा किया गया है कि इन क्रिसमस आयोजनों के जरिए आदिवासी समाज को उसकी मूल संस्कृति और परंपराओं से अलग करने की साजिश रची जा रही है, जिससे उनकी स्वदेशी पहचान खत्म होने का खतरा है। संगठनों ने इसे एक गंभीर मुद्दा बताया है।

साथ ही संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं हैं और सभी धर्मों व संप्रदायों का सम्मान करते हैं। उनका कहना है कि क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जो कानूनी रूप से सरकारी रिकॉर्ड में ईसाई के रूप में दर्ज हैं। हिंदू संगठनों ने माँग की है कि जो भी व्यक्ति या समूह क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगे, उससे पहले उससे ईसाई होने का वैध प्रमाण पत्र माँगा जाए और पूरी जाँच-पड़ताल के बाद ही अनुमति दी जाए।

स्थानीय हिंदू क्या कह रहे हैं?

जब ऑपइंडिया की टीम धरमपुर के कुछ गाँवों में जमीनी हकीकत जानने पहुँची, तो कई अहम बातें सामने आईं। जैसे-जैसे धरमपुर शहर से दूर, अंदरूनी इलाकों की ओर बढ़ते हैं तो वैसे-वैसे चर्चों की संख्या साफ तौर पर बढ़ती दिखती है। कई गाँवों में चर्च बनाए गए हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि इससे पहले इन्हीं इलाकों में सरकारी जमीन पर बिना अनुमति अवैध रूप से चर्च बनाए जाने के कई मामले सामने आ चुके हैं।

महाराष्ट्र सीमा से महज दो किलोमीटर दूर स्थित गडीना गाँव के हिंदू नेताओं ने भी धरमपुर मामलतदार कार्यालय में आवेदन दिया है। गाँव के नेताओं ने ऑपइंडिया को बताया कि गडीना की आबादी करीब 1,400 है लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में एक भी व्यक्ति ईसाई के रूप में दर्ज नहीं है। इसके बावजूद गाँव में एक चर्च बनाया गया है, जहाँ नियमित रूप से कार्यक्रम आयोजित होते हैं और हिंदू ग्रामीणों को भी इनमें शामिल किया जाता है।

धरमपुर के एक सुदूर इलाके में स्थित एक चर्च

स्थानीय हिंदुओं का आरोप है कि शुरुआत में भोले-भाले जनजातीय हिंदुओं को इन कार्यक्रमों में बुलाया जाता है। बाद में मिशनरी और पादरी उन्हें लालच देते हैं, चमत्कार के जरिए बीमारी ठीक करने का दावा करते हैं, पैसे का वादा करते हैं और ईसाई धर्म का प्रचार करते हैं। साथ ही उनसे कहा जाता है कि वे और लोगों को भी इन कार्यक्रमों में लाएँ।

गडीना के स्थानीय नेता पीलुभाई चौधरी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “ज्यादातर चर्च बिना किसी अनुमति के अवैध रूप से बनाए गए हैं। बाद में यही चर्च धर्मांतरण की गतिविधियों के केंद्र बन जाते हैं। जब स्थानीय हिंदू जनजातीय लोग वहाँ जाने लगते हैं, तो धीरे-धीरे उन्हें हिंदू देवी-देवताओं की पूजा न करने, मंदिर और पारंपरिक पूजा स्थलों पर न जाने के लिए कहा जाता है। अंत में व्यक्ति पूरी तरह अपने धर्म और संस्कृति से कट जाता है।”

ऑपइंडिया ने ईसाई समूहों द्वारा चलाए जा रहे धर्मांतरण रैकेट के बारे में की स्थानीय लोगों से बात

पीलुभाई चौधरी ने आगे कहा कि अगर किसी गाँव में सरकारी रिकॉर्ड में एक भी व्यक्ति ईसाई के रूप में दर्ज नहीं है, तो वहाँ इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करने का कोई औचित्य नहीं है। अगर अनुमति दी भी जाती है, तो प्रशासन को साफ तौर पर बताना चाहिए कि उस गाँव में कितने ईसाई रहते हैं।

गाँव के नेताओं का यह भी कहना है कि कई जगह लोगों का लालच देकर धर्मांतरण कराया जाता है लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उनका नाम हिंदू ही बना रहता है और वे सरकारी योजनाओं का लाभ भी लेते रहते हैं। उनका कहना है कि यही कारण है कि कई गाँवों में बड़े-बड़े चर्च बन जाने के बावजूद, आधिकारिक रिकॉर्ड में ईसाई आबादी बेहद कम दिखाई देती है।

स्थानीय हिंदुओं को आशंका है कि क्रिसमस कार्यक्रमों के जरिए एक बार फिर धर्म प्रचार और धर्मांतरण की गतिविधियाँ तेज हो सकती हैं। इसी वजह से वे माँग कर रहे हैं कि क्रिसमस कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति केवल उन्हीं लोगों को दी जाए जो सरकारी रिकॉर्ड में पंजीकृत ईसाई हैं।

सिर्फ धरमपुर-कपराड़ा नहीं, पूरे दक्षिण गुजरात के पूर्वी इलाके में असर

यह मुद्दा केवल धरमपुर या कपराड़ा के कुछ गाँवों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में दक्षिण गुजरात के पूरे पूर्वी पट्टी में तेजी से डेमोग्राफिक बदलाव देखे गए हैं। इसमें धरमपुर और कपराड़ा के साथ-साथ डांग, तापी और सूरत जिले के सबसे उत्तरी इलाके, जैसे उमरपाड़ा और देडियापाड़ा भी शामिल हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन लोगों का धर्मांतरण कराया जाता है, वे अक्सर कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं करते। इसी कारण सरकारी रिकॉर्ड में उनका नाम हिंदू ही बना रहता है लेकिन उनके जीवन से धीरे-धीरे हिंदू धर्म और संस्कृति गायब हो जाती है।

हाल ही में ऑपइंडिया ने उमरपाड़ा में एक अवैध चर्च के निर्माण को लेकर एक विशेष रिपोर्ट की थी। इस रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि यह समस्या अब दक्षिण गुजरात से बढ़कर धीरे-धीरे मध्य गुजरात की ओर भी फैल रही है।

जनसंख्या में आए इन बदलावों के चलते कई अन्य समस्याएँ भी सामने आई हैं। डांग और तापी के कई गाँवों में हिंदू धर्म के अनुयायी तौर पर अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं। गाँवों से मंदिर गायब हो रहे हैं और जनजातियों के पारंपरिक धार्मिक स्थल या तो नष्ट किए जा रहे हैं या उनका स्वरूप बदला जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, वर्ष 2022 में सोंगध के एक गाँव में एक प्राचीन आदिवासी धार्मिक स्थल को तोड़कर वहाँ मदर मैरी के लिए धार्मिक ढाँचा बनाए जाने का मामला सामने आया था।

इन सभी कारणों से स्थानीय हिंदू इस बार क्रिसमस से पहले सतर्क हो गए हैं और अपनी माँगें प्रशासन के सामने रख रहे हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन और सरकार इस पूरे मामले में क्या फैसला लेते हैं।

इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया जानने के लिए ऑपइंडिया ने धरमपुर के मामलतदार से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।

(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।)

128 FIR, 32 गिरफ्तारियाँ… जानिए कोडिन के काले साम्राज्य को कैसे खत्म कर रही योगी सरकार, अखिलेश यादव से आलोक की कितनी करीबी?

उत्तर प्रदेश में नशे के काले कारोबार को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार ने जो अभियान छेड़ा है, वह न सिर्फ राज्य की सीमाओं को पार करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया के साम्राज्य को चूर-चूर करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रहा है। यूँ तो कोडिन से बने साधारण कफ सिरप फेन्सेडिल (Phensedyl) का इस्तेमाल खाँसी के इलाज के लिए होता है, लेकिन यह अवैध तस्करी के जरिए हेरोइन जैसी लत फैलाने वाला हथियार बन चुका है।

उत्तप्रदेश में इस दवा की अवैध ब्रिक्री का एक ऐसा रैकेट सामने आया जो राज्य या देश नहीं बल्कि विदेशों तक इसके अवैध कारोबार को फैला चुका था। साल 2024 में योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस मामले की जाँच के लिए एक जॉइंट ऑपरेशन का आदेश दिया। Food Safety and Drug Administration और राज्य की Special Task Force को आदेश मिला कि कोडिन बेस्ड दवाओं और सिरप का अवैध स्टोरेज और स्मगलिंग किया जा रहा है।

साल 2024 से शुरू हुई इस जाँच ने 2025 तक एक विशालकाय नेटवर्क को उजागर किया है, जिसमें 128 FIR दर्ज हुईं, 280 ड्रग लाइसेंस रद्द किए गए, 3.5 लाख से ज्यादा शीशियाँ जब्त की गईं और 32 प्रमुख आरोपित गिरफ्तार हो चुके हैं। अनुमानित 425 करोड़ रुपये का यह काला साम्राज्य उत्तर प्रदेश के 28 जिलों से लेकर नेपाल, बांग्लादेश, दुबई और पाकिस्तान तक फैला था।

इसमें सुपर स्टॉकिस्ट फर्मों से लेकर शेल कंपनियाँ, राजनीतिक कनेक्शन और यहाँ तक कि टेरर फंडिंग का एंगल भी जुड़ गया। समाजवादी पार्टी के नेताओं और अखिलेश यादव के करीबियों के नाम आने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त निर्देश पर STF, FSDA और ED की संयुक्त कार्रवाई ने इस ‘हलाल नशे’ के सिंडिकेट को धराशायी कर दिया, जो युवाओं को बर्बाद करने के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरे में डाल रहा था। अब SIT और ED की जाँच आगे बढ़ रही है, जो हजारों करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी फंडिंग तक पहुँच सकती है।

क्या है कोडिन और उसकी सिरप

कोडिन दरअसल अफ़ीम से निकला हुआ एक पदार्थ है। सामान्य तौर पर जिन सिरप में इसका इस्तेमाल होता है वो खांसी का इलाज करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यदि इसकी अधिक मात्रा ले लिया जाए तो दिमाग को सुन्न कर देता है। लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर हेरोइन या अफीम जैसी ही लत पैदा करने की क्षमता रखता है। बीते कुछ वर्षों में तेजी के साथ सॉफ्ट ड्रग के तौर पर इसका इस्तेमाल लोगों ने करना शुरू किया है। 100 मिली सिरप में अगर 10 मिली कोडिन का इस्तेमाल किया जाए तो इसका सेवन करने वाला व्यक्ति इसका आदी बन सकता है।

कैसे सामने आया पहला मामला?

साल 2024 की फ़रवरी में लखनऊ की सुशांत गोल्फ सिटी इलाके में एक छापा पड़ा। Phensedyl नाम की एक सिरप, जो कोडिन बेस्ड सिरप थी… यूपी एसटीएफ को सूचना मिली कि यहाँ पर बड़ी मात्रा में उसका अवैध भंडारण किया जा रहा है। जब छापा पड़ा तो पता चला कि इसके कागजात फर्जी थे और इस सिरप की सप्लाई चेन संदेह को बढ़ा रही थी।

सुशांत गोल्फ सिटी थाने में NDPS और IPC की अलग-अलग धाराओं में इस मामले की FIR दर्ज हुई। जब इस मामले की सघनता से जाँच हुई तो ये मामला कहीं ज्यादा बड़ा नजर आने लगा। कई महीनों से मिल रहे इनपुट के आधार पर यह कार्रवाई की गई थी। इस छापे के बाद एक साल से भी ज्यादा वक्त तक इस मामले की हर कड़ी की जाँच हुई।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सीधा आदेश था कि इस नशे के अवैध कारोबार के खिलाफ कोई कोताही नहीं बरतनी है। उत्तर प्रदेश की जाँच एजेंसियों ने किया भी ठीक वैसा ही। एक साल के करीब के वक्त में STF और FSDA ने पूरी तरह से जाँच की और हर कड़ी को खंगाला ताकि कोई भी गुनहगार एजेंसियों की नजरों से ना बच सके और इसके पीछे मौजूद पूरे रैकेट का भंडाफोड़ किया जा सके।

सुपर स्टॉकिस्ट और ड्रग माफिया का गठजोड़

इस केस में जब STF ने जाँच आगे बढ़ाई तो सामने आया कि कुछ ऐसी फर्म्स हैं जो सुपर स्टॉकिस्ट हैं। जो दवाओं को बड़ी मात्रा में स्टॉक करने का लाइसेंस रखती हैं। जांच में सामने आया कि, पहले इन्हीं सुपर स्टॉकिस्ट कंपनियों के नाम पर बड़ी मात्रा में कोडिन युक्त कफ सिरप की वैध खरीद दिखाई गई। फिर उन्हें अवैध रूप से बेचने के लिए फर्जी फर्म खड़ी कर दी गई।

रिकॉर्ड में हेराफेरी करके सिरप को दवा की बजाए नशे के सिरप के तौर पर काले बाजार में उतारा गया। उत्तर प्रदेश से सटे राज्यों- बिहार, झारखंड, बंगाल के रास्ते होते हुए इस नशे को नेपाल और बांग्लादेश तक सप्लाई किया जाने लगा। लखनऊ, लखीमपुर खीरी, बहराइच, बनारस, जौनपुर, सहारनपुर समेत प्रदेश के 28 जिलों और कई राज्यों में इस नशे के अवैध कारोबार के तार फैले हुए थे।

इसमें राजनीतिक कनेक्शन से लेकर ड्रग्स के अंतरराष्ट्रीय माफिया तक के नाम सामने आए। प्रदेश सरकार और प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी इसके किंगपिन को गिरफ्तार करना और इसके सिंडिकेट का खुलासा करना।

कैसे हुआ सिंडिकेट का खुलासा?

एक साल के करीब के समय की जाँच के बाद 18 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में एक ट्रक पकड़ा गया। ट्रक के अंदर बड़ी संख्या में चिप्स के कार्टन थे। लेकिन जब इन कार्टन को खोला गया तो अंदर नशे का पूरा जखीरा रखा हुआ था। इन कार्टन के अंदर कोडिन युक्त कफ सिरप की शीशियाँ रखी हुई थी। जब इनकी कीमत का अंदाजा लगाया गया तो प्रशासन के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। इस ड्रग्स की कीमत करीब 3 करोड़ रुपये बताई गई। यहाँ मध्य प्रदेश के तीन तस्कर हेमंत पाल, बृजमोहन शिवहरे और रामगोपाल धाकड़ गिरफ्तार हुए।

पिछली फरवरी से ही STF इसी तरह की तस्करी की कड़ियाँ जोड़ रही थी। जब सोनभद्र से ये सूचना आई तो तार जुड़ने लगे। प्रारंभिक जाँच में पता चला कि यह खेप नेपाल के रास्ते पाकिस्तान जाने वाली थी। इसी के पंद्रह से बीस दिनों के भीतर झारखंड और राँची से भी नशीली दवा की बड़ी खेप पकड़ी गई।
इस मामले की सघन जाँच हुई तो एक नाम सामने आया। नाम था- शुभम जायसवाल। शुभम के नाम तक पहुँचने से पहले एजेंसियों ने 300 से अधिक फर्मों की स्क्रीनिंग की। उनमें से 133 ऐसी फर्म्स के नाम शॉर्टलिस्ट किए गए जो सामूहिक रूप से इस नशे के इस धंधे में या तो सीधे शामिल थे या डायवर्जन में मदद दे रहे थे। और सोनभद्र में ट्रक पकड़े जाने से कुछ महीनों से पहले ही इस तरह की छापेमारी की जाने लगी थी जिससे कि इस पूरे सिंडिकेट की कमर को एक झटके में ही तोड़ा जा सके।

बनारस से दुबई कनेक्शन और नशे का सिंडिकेट

एसटीएफ ने जाँच को तेजी से आगे बढ़ाया तो राज खुलने लगे। शुभम जायसवाल जो मूल रूप से बनारस का रहने वाला है, वो आज के समय में दुबई में रहता है। एसटीएफ ने 27 नवंबर को लखनऊ के विभूतिखंड इलाके में गौरी चौराहे के पास अमित कुमार सिंह उर्फ़ अमित टाटा को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में पता चला कि ये इस ड्रग्स के कारोबार की अहम कड़ी है और दुबई से शुभम जायसवाल के इशारे पर पूरे नेटवर्क को ऑपरेट करता है।

अमित टाटा के पास मिले डिजिटल उपकरणों से सप्लाई रूट, लेनदेन का रूट, सिंडिकेट का पूरा नेटवर्क मैप सब कुछ सामने आ गया। शुभम के इस नशीले कारोबार में उसका पिता भोला प्रसाद भी शामिल था। उसे कोलकाता एयरपोर्ट से उस समय गिरफ्तार किया गया जब वो उत्तर प्रदेश की STF की कार्रवाई से डरकर थाईलैंड भागने की फिराक में था।

STF और उत्तर प्रदेश के औषधि विभाग को मुख्यमंत्री ने आदेश दिया कि इस पूरे नेटवर्क पर कानून का बुलडोजर चलाया जाए। जाँच तेज हो गई। सामने आया कि कुछ बड़ी दवा निर्माता कंपनियों लेबोरेट, थ्री-बी हेल्थकेयर और एबॉट की सप्लाई चेन का इस्तेमाल किया गया।

उत्तर प्रदेश पुलिस के एक बर्खास्त सिपाही आलोक कुमार सिंह का नाम भी सामने आया, जिसकी सात हजार वर्ग फुट की कोठी को देखकर ED के अधिकारी भी सन्न रह गए थे। और बात तब और गहरी हो गई जब इसी बर्खास्त सिपाही के साथ समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की तस्वीर भी निकल कर सामने आ गई। कई बाहुबली नेताओं के नामों को लेकर भी चर्चा हुई, हालाँकि अभी एजेंसियों ने किसी का नाम सामने नहीं किया है।

हालाँकि, इंटरनेट पर शुभम जायसवाल और अमित टाटा के साथ उनकी तस्वीरें और वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं। इसके अलावा इतने बड़े कारोबार के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैल जाने की वजह से संदेह है कि इसमें कुछ बड़े नाम भी शामिल हो सकते हैं। और योगी आदित्यनाथ इसीलिए तेजी के साथ जीरो टॉलरेंस की नीति पर कार्रवाई करने का आदेश दे रहे हैं।

अभी तक क्या कार्यवाई हुई?

इन गिरफ्तारियों और सिंडिकेट के किंगपिन का नाम सामने आने के बाद जरूरी था इस पूरे नेटवर्क की कमर तोड़ना। 8 दिसंबर को लखनऊ में गृह विभाग के प्रमुख सचिव संजय प्रसाद, डीजीपी राजीव कुमार कृष्ण और FSDA कमिश्नर रौशन जैकब ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अब तक की कार्रवाई का पूरा ब्योरा दिया।

बताया गया कि अभी तक 128 FIR दर्ज की गई है, 280 ड्रग लाइसेंस कैंसिल हुए हैं, 3.5 लाख शीशियां जब्त की गई। 32 लोग जो इस तस्करी नेटवर्क से जुड़े हुए थे, उनको अभी तक गिरफ्तार किया गया है। इन गिरफ्तारियों में जो प्रमुख नाम सामने आए हैं वो कुछ इस प्रकार हैं- विभोर राणा, विशाल राणा, सौरभ त्यागी, भोला प्रसाद जायसवाल, आलोक प्रताप सिंह, अभिषेक शर्मा, आकाश पाठक और अमित सिंह उर्फ अमित टाटा।

इस पूरे रैकेट की जाँच के दौरान यूपी STF को दिखा कि ये मामला हजारों करोड़ का बन सकता है। करीब 425 करोड़ रुपए के काले धन का सीधा एस्टीमेट समझ में आने लगा। और इस मामले में एक SIT का भी गठन किया गया है। जो विशेष रूप से इस केस से जुड़े हर तथ्य की सघनता से जाँच करेगी।

3 दिसंबर को ED के द्वारा इस मामले में 67 आरोपितों के खिलाफ ECIR दर्ज किया गया। ED ने 25 ठिकानों पर एकसाथ तलाशी अभियान चलाया। उत्तर प्रदेश के लखनऊ, सहारनपुर, वाराणसी और गाजियाबाद और झारखंड और गुजरात की राजधानियों की लोकेशंस पर भी यह तलाशी अभियान चलाया गया।

तलाशी के दौरान पता चला कि 700 फर्जी फर्म्स 220 लोगों के नाम पर रजिस्टर हैं, जो सीधे तौर पर पैसों के हेरफेर के लिए बनाई गई हैं। ED का अनुमान है कि पैसों का कुल जोड़ हजार करोड़ के ऊपर भी जा सकता है और इसीलिए इस केस में PMLA के तहत कार्रवाई करने की तैयारी भी चल रही है।

बीते दिनों 8 दिसंबर को लखनऊ में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में यूपी पुलिस के डीजीपी राजीव कृष्ण ने बताया कि लखनऊ जोन में कुल 11 मुकदमे दर्ज किए गए हैं, बरेली जोन में 4 मुकदमे, गोरखपुर जोन में 10 मुकदमे, वाराणसी जोन में 2 मुकदमे दर्ज किए गए हैं। जिनके जरिए उस पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने की तैयारी की जा रही है जिसके जरिए ये नशे का अवैध कारोबार चल रहा था।

हलाल नशा है कफ़ सिरप और टेरर फंडिंग का एंगल भी आ रहा है सामने

कई मौकों पर भारत बांग्लादेश बॉर्डर पर बीएसएफ के द्वारा कफ़ सिरफ़ की तस्करी को रोकने और उन्हें जब्त करने की खबरें भी आती हैं। और अब ED की जाँच के दौरान इस तरह की बातें भी निकल कर सामने आ रही हैं कि तस्करी से होने वाली कमाई का इस्तेमाल टेरर फंडिंग के लिए किया जा रहा है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के आसिफ और वसीम नाम के तस्करों का नाम भी इस मामले में सामने आ रहा है। जानकारी मिली है कि आसिफ बांग्लादेश के रास्ते अन्य खाड़ी देशों तक तस्करी करता है। और पैसों के हेरफेर में हवाला के जिस नेटवर्क का सहारा लिया जाता है, शक है कि वो आतंकवादियों को लाभ पहुँचाता हो।

इसके अलावा दावा यह भी किया जाता है कि चूँकि इस्लाम में शराब प्रतिबंधित है तो नशे के लिए इस तरह की कफ सिरप का इस्तेमाल तेजी के साथ बढ़ा है। कफ सिरप को हलाल नशे के तौर पर प्रचारित किया जाता है। और कई ऐसी सूचनाएँ हैं कि कफ सिरप का प्रसार उन क्षेत्रों में ज्यादा है जहाँ मुस्लिम जनसंख्या की बहुलता है।

विस्तार से जानिए उन 12 नामों के बारे में जो कोडिन कफ़ सिरफ़ मामले में मुख्य आरोपित हैं।

शुभम जायसवाल: वाराणसी का रहने वाला है, फ़िलहाल दुबई में रहता है। इस पूरे रैकेट का मास्टरमाइंड यही है।

भोला प्रसाद जायसवाल: वाराणसी का रहने वाला है। शुभम जायसवाल का पिता है। सैली ट्रेडर्स का मालिक है।100 करोड़ का टर्नओवर है।

मनोहर जायसवाल: शुभम जायसवाल के परिवार का सदस्य है। शेल कंपनियों को बनाने में अहम योगदान रहा है।

विभोर राणा: सहारनपुर का रहने वाला है। यह मुख्य सुपरस्टॉकिस्ट है। जीआर ट्रेडिंग कंपनी के ज़रिए इस सिरप की सप्लाई करवाता था।

सौरभ त्यागी: गाजियाबाद का रहने वाला है।इसके पास से 1.57 लाख बोतल पकड़ी गई। इसी ने शुभम जायसवाल का नाम एजेंसियों को बताया था।

विशाल राणा: सहारनपुर का रहने वाला है। विभोर राणा का भाई है। फर्जी बिलिंग और शेल फर्म के नेटवर्क को बनाया था।

पप्पन यादव: लखीमपुर खीरी/बहराइच का रहने वाला है। ट्रांसपोर्ट का काम करता था। नेपाल सप्लाई रूट पर काम करता था।

शादाब: वाराणसी/जौनपुर का रहने वाला है। फर्जी लाइसेंस के ज़रिए लोकल लेवल पर स्टॉकिंग का आरोपी है।

अभिषेक शर्मा: लखनऊ का रहने वाला है। फर्जी ड्रग लाइसेंस रखने का आरोप है। 80 लाख बोतल पकड़ी गई है।

विशाल उपाध्याय: लखनऊ का रहने वाला है। बोगस बिलिंग और पेपरवर्क को हैंडल करता था।

आकाश पाठक: वाराणसी का रहने वाला है। लोकल लेवल पर धंधे को हैंडल करता था।

विनोद अग्रवाल: लखनऊ/वाराणसी का रहने वाला है। पेशे से CA है। शेल कंपनियों के ज़रिए मनी ट्रेल को मैनेज करने का काम करता था।

सपा नेताओं का कनेक्शन आया सामने

इसके अलावा कई और नाम हैं जो सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं। इनमें एक नाम समाजवादी पार्टी के जौनपुर जिले की मलहनी सीट से विधायक लक्की यादव के बेहद करीबी राहुल यादव का भी है। राहुल यादव की तस्वीर अखिलेश यादव के साथ हाथ मिलाते हुए दिख रही है।

इसके अलावा बर्खास्त यूपी पुलिस के सिपाही आलोक सिंह की अखिलेश यादव के साथ की तस्वीरें सोशल मीडिया हर जगह वायरल ही है। जिसका नाम ही इस पूरे रैकेट के भंडाफोड़ की जड़ बनी है। 28 जिलों में जो 128 FIR दर्ज की गई है, उनमें से कई नाम ऐसे बताए जा रहे हैं जिनको अखिलेश यादव के शासनकल में ड्रग लाइसेंस मिले थे। इस अवैध कारोबार को फैलाने में इनकी अहम भूमिका बताई जा रही है, SIT इनसे जुड़े मामलों की पड़ताल कर रही है। वो आज लोकल लेवल पर रिटेलर बने हुए हैं।

योगी आदित्यनाथ सरकार की कार्रवाई से समाजवादी पार्टी में तिलमिलाहट

जितनी तेजी के साथ उत्तर प्रदेश की एजेंसियाँ कोडिन के गुनहगारों को पकड़ रही हैं उसी रफ्तार से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की तिलमिलाहट बढ़ती जा रही है। एक तरफ जहाँ सटीक प्लानिंग के साथ बड़े ड्रग्स माफिया के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त किया जा रहा है, पूरे भारत में फैले इस ड्रग नेटवर्क को अकेले उत्तर प्रदेश की एजेंसियाँ ध्वस्त कर रही हैं, सरकार की तरफ से एजेंसियों को खुली छूट मिली हुई है तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी में तिलमिलाहट साफ नजर आ रही है।

हो भी क्यों ना? यूपी पुलिस के बर्खास्त सिपाही आलोक सिंह की सपा मुखिया अखिलेश यादव के साथ सुखद मुलाकात की तस्वीर अपने आप में कहानी बता रही है। अभी जाँच का दायरा जैसे-जैसे बढ़ रहा है समाजवादी पार्टी की तकलीफ बढ़ती जा रही है।

कोडिन एक बड़ी आबादी को बर्बाद करने वाला जहर बन चुका है। जिसके धंधे से लाभ कमाने वाले लोग समाजवादी पार्टी के करीबियों में गिने जा रहे हैं। अभी कई और नामों का खुलासा और उनका समाजवादियों से संबंध सामने आना बाकी है। उन माफियाओं का नाम भी सामने आ रहा है जिनके एक लंबे समय तक अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव के साथ अच्छे संबंध रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीते दो वर्षों की सतत कार्रवाई से स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले में कोई बचने वाला नहीं है। ED ने अपनी जाँच का दायरा टेरर फंडिंग तक बढ़ाया है और इस नशे के काले कारोबार से 200 करोड़ की कमाई करने वाले बर्खास्त सिपाही की तस्वीर अखिलेश यादव के साथ नजर आई है। सरकार और प्रशासन दोनों ने अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है कि इस नशे के काले कारोबार को समूल नष्ट कर दिया जाएगा।

बुर्का हटाने पर बवाल, न पहनने पर सीधे हत्या: इस्लामी कट्टरपंथियों को नहीं है मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से सरोकार, वरना ‘ताहिरा’ के मर्डर पर क्यों चुप होती जमात?

भारत में बुर्के और हिजाब को लेकर छिड़ी ताजा बहस ने एक बार फिर समाज के दोहरेपन को उजागर कर दिया है। एक तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला डॉक्टर का हिजाब हटाने पर बवाल मचा है, जहाँ पाकिस्तानी डॉन से लेकर देश के तमाम इस्लामी संगठन इसे ‘सम्मान’ की लड़ाई बताकर धमकी दे रहे हैं। लेकिन विडंबना देखिए, ठीक इसी समय उत्तर प्रदेश के शामली से एक रूहँकपा देने वाली खबर आती है, जहाँ एक शौहर ने अपनी बीवी और दो मासूम बच्चों को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि महिला बिना बुर्के के अपने मायके चली गई थी।

हैरानी की बात यह है कि नीतीश कुमार के मुद्दे पर आसमान सिर पर उठाने वाले कट्टरपंथी और ‘नारीवादी’ सुर, शामली की उस बेगुनाह माँ और बच्चों की मौत पर पूरी तरह खामोश हैं। यह दोहरा रवैया साफ करता है कि इस देश में मुस्लिम महिलाओं के ‘अधिकार’ क्या होंगे, यह वो खुद नहीं बल्कि कट्टरपंथी जमात तय करती है। जहाँ ईरान जैसे देशों में महिलाएँ हिजाब की बंदिशों से आजादी के लिए जान दे रही हैं, वहीं भारत में बेंगलुरु से लेकर पटना तक, उसी हिजाब को ‘अनिवार्यता’ बनाने के लिए छात्राओं को मोहरा बनाकर सड़कों पर उतारा जा रहा है।

चुनिंदा नारीवाद: जब ‘एजेंडा’ देखकर बदल जाती है संवेदना

भारत में बुर्का विवाद पर होने वाली चर्चा अक्सर ‘सुविधाजनक राजनीति’ की भेंट चढ़ जाती है। यहाँ खुद को नारीवादी (Feminist) और उदारवादी कहने वाले लोगों का एक ऐसा वर्ग है, जिसका रुख घटना के पात्रों को देखकर बदल जाता है। जब नीतीश कुमार जैसे नेता किसी महिला का हिजाब खींचते हैं, तो यही लोग इसे ‘अस्मिता’ और ‘सम्मान’ की लड़ाई बना देते हैं। बॉलीवुड हस्तियाँ वीडियो जारी कर इसे इस्लाम का अपमान बताती हैं और मुख्यमंत्री से इस्तीफे की माँग करती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के शामली जैसे मामले में ये ‘प्रगतिशील’ स्वर अचानक खामोश हो जाते हैं।

यह मौन बहुत खतरनाक है। यह दर्शाता है कि इन लोगों के लिए ‘महिला अधिकार’ केवल एक राजनीतिक हथियार है। जब कट्टरपंथ की वजह से किसी मुस्लिम महिला की जान जाती है, तो ये लोग इसे ‘मजहबी मामला’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन जब किसी गैर-मुस्लिम नेता से गलती होती है, तो इसे ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ बना दिया जाता है। शामली की घटना, जहाँ शौहर फारुख ने अपनी बीवी ताहिरा और दो मासूम बेटियों की हत्या कर उन्हें सेफ्टी टैंक में दबा दिया क्योंकि बीवी बुर्का नहीं पहनी थी।

इसके साथ ही, बुर्के की आड़ में कट्टरपंथी सोच एक ऐसा समाज रच रही है जहाँ महिलाओं की पहचान केवल उनके पहनावे तक सीमित कर दी गई है। कट्टरपंथी तत्व बुर्के को ‘सुरक्षा’ का नाम देते हैं, लेकिन हकीकत में यह नियंत्रण का एक माध्यम है। बुर्के की आड़ में कई बार ऐसी आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है जहाँ अपराधी की पहचान करना नामुमकिन हो जाता है। चाहे वह मतदान केंद्रों पर फर्जी वोटिंग की कोशिश हो या संदिग्ध गतिविधियों में शामिल होना, बुर्का एक सुरक्षा कवच के बजाय एक ढाल की तरह इस्तेमाल होने लगा है। जब तक समाज इस कट्टरपंथी सोच और नारीवाद के दोहरे मापदंडों को नहीं पहचानेगा, तब तक नुसरत परवीन जैसी महिलाएँ राजनीति का मोहरा बनती रहेंगी और शामली जैसी महिलाएँ कट्टरपंथ की भेंट चढ़ती रहेंगी।

दुनिया में क्यों बढ़ रही है बुर्का बैन की माँग?

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बुर्का और नकाब को लेकर बहस तेज होती जा रही है। भारत में इसे कई बार महिला अधिकार और पसंद से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कई विकसित देशों में इसे बिल्कुल अलग नजरिए से देखा जा रहा है। वहाँ बुर्का को महिलाओं पर दबाव का प्रतीक और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा माना जा रहा है। यही वजह है कि यूरोप और अन्य देशों में बुर्का बैन की माँग लगातार बढ़ रही है।

यूरोप में बुर्का पर रोक की लहर- यूरोप के कई देशों ने बीते कुछ सालों में बुर्का और नकाब पर सख्त कदम उठाए हैं। हाल ही में स्वीडन की उप प्रधानमंत्री एब्बा बुश ने सार्वजनिक जगहों पर बुर्का और नकाब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की बात कही। उन्होंने साफ कहा कि यह महिलाओं के लिए एक तरह का उत्पीड़न है, जिसे सहन नहीं किया जाना चाहिए।

फ्रांस 2011 में ऐसा पहला देश बना, जिसने सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर पूरी तरह रोक लगा दी। इसके बाद बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और नीदरलैंड जैसे देशों ने भी इसी तरह के कानून बनाए। इन देशों का कहना है कि खुले समाज में लोगों को एक-दूसरे को पहचानने का अधिकार होना चाहिए।

बुर्का बैन के पीछे सबसे बड़ा कारण सुरक्षा को बताया गया। यूरोपीय देशों की सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि चेहरा ढकने से किसी व्यक्ति की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। इससे अपराध और आतंकी गतिविधियों को छिपने का मौका मिल सकता है।

इसी वजह से चीन के शिंजियांग प्रांत और श्रीलंका जैसे देशों ने भी बम धमाकों और आतंकी हमलों के बाद सार्वजनिक जगहों पर लंबी दाढ़ी और बुर्का पहनने पर पाबंदी लगाई। सरकारों का कहना है कि सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

यूरोप में बुर्का को केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे लैंगिक असमानता से भी जोड़ा जा रहा है। कई देशों का तर्क है कि बुर्का महिलाओं को समाज से अलग-थलग कर देता है और उन्हें मुख्यधारा से दूर कर देता है।

यूरोपीय नेताओं का कहना है कि अगर कोई महिला समाज का हिस्सा बनना चाहती है, तो उसे पूरी तरह ढका हुआ नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार, चेहरा छिपाने से संवाद, पढ़ाई, नौकरी और सामाजिक मेल-जोल में रुकावट आती है।

पुर्तगाल की संसद ने हाल ही में बुर्का बैन से जुड़े एक बिल को मंजूरी दी है। इस कानून के तहत सार्वजनिक स्थानों पर नकाब पहनने पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। दूसरे यूरोपीय देशों में भी इसी तरह के नियम लागू हैं, जहाँ बार-बार नियम तोड़ने पर जुर्माने के साथ सजा का प्रावधान है। इन देशों का साफ कहना है कि मजहब निजी मामला है, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर नियम सभी के लिए एक जैसे होने चाहिए।

ऑस्ट्रेलिया में भी सांसद पॉलिन हैनसन संसद में बुर्का पहनकर पहुँचीं, ताकि यह दिखा सकें कि चेहरा ढककर किसी सार्वजनिक जगह पर जाना सुरक्षा के लिए कितना जोखिम भरा हो सकता है। उनका कहना है कि अगर आम लोग चेहरा ढककर हर जगह जा सकते हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इस कदम पर उनकी आलोचना भी हुई, लेकिन मुद्दे को लेकर बहस भी हुई।

पश्चिमी देशों का मानना है कि खुले और आधुनिक समाज में पहचान छिपाने की परंपरा को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। उनके लिए यह सिर्फ कपड़ों का मुद्दा नहीं, बल्कि समानता, सुरक्षा और सामाजिक मेल-जोल से जुड़ा सवाल है। यही वजह है कि दुनिया के कई हिस्सों में बुर्का बैन की माँग लगातार तेज होती जा रही है।

क्या वाकई इस्लाम में बुर्का या हिजाब अनिवार्य है?

बुर्का या हिजाब को लेकर दुनिया दो धड़ों में बँटी हुई है। कट्टरपंथी सोच इसे इस्लाम का अभिन्न हिस्सा और महिलाओं के लिए ‘अनिवार्य’ (Mandatory) बताती है, लेकिन यदि गहराई से कुरान और इस्लामी सामग्रियों का लिखित विश्लेषण करेंगे, तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है।

कुरान इस्लाम की बेवसाइट के ट्रू इस्लाम में जानकारी दी गई है। इसका टाइटल ‘बुर्का- इस्लामी या सांस्कृतिक?’। कुरान में ‘हिजाब’ शब्द का जिक्र सात बार आया है। लेकिन इसका इस्तेमाल महिलाओं के पहनावे या ड्रेस कोड के संदर्भ में नहीं किया गया है। वहाँ हिजाब का अर्थ एक ‘पर्दा’ या ‘अवरोध’ (Barrier) है, जो दो चीजों के बीच अलगाव पैदा करता है। कुरान की आयत 24:31 और 33:59 शालीनता (Modesty) की बात करती हैं। आयत 24:31 महिलाओं को अपना ‘सीना’ (जयब) ढकने का निर्देश देती है, न कि चेहरे या बालों को पूरी तरह ढँकने का।

बुर्का-हिजाब पर कुरान व इस्लामी इतिहास क्या कहता है?

इस्लामी विद्वानों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि चेहरे को पूरी तरह ढकना (नकाब या बुर्का) एक मजहबी उर्फ यानि सांस्कृतिक परंपरा है, जो समय के साथ मजहबी रंग में रंग गई। यदि चेहरा ढकना अनिवार्य होता, तो कुरान की वह आयत बेमानी हो जाती जो पुरुषों को अपनी निगाहें नीची रखने और महिलाओं की ‘सुंदरता’ से आकर्षित न होने की सलाह देती है।

चेहरा ढका होने पर सुंदरता और आकर्षण का सवाल ही पैदा नहीं होता। आज के दौर में सऊदी अरब जैसे देशों में भी ‘अबाया’ (ढीला वस्त्र) अनिवार्य नहीं रहा, जबकि तालिबान शासित अफगानिस्तान में बुर्का न पहनना मौत को दावत देने जैसा है। यह विरोधाभास साबित करता है कि बुर्का पहनना मजहब से ज्यादा उस देश की सत्ता और वहां के कट्टरपंथियों की सनक पर निर्भर करता है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद के कपड़े पहनने और धर्म का पालन करने की आजादी देता है, लेकिन जब यह ‘पसंद’ दबाव में बदल जाती है, तो वह शोषण बन जाती है।

मजहब, अधिकार और असुरक्षा की त्रिवेणी

नीतीश कुमार का मामला हो या शामली का हत्याकांड, केंद्र में ‘बुर्का’ ही है। समस्या बुर्के के कपड़े में नहीं, बल्कि उसे पहनने या न पहनने के पीछे छिपे ‘दबाव’ में है। यदि कोई महिला अपनी स्वेच्छा से इसे पहनती है, तो वह उसका अधिकार है, लेकिन यदि इसे न पहनने पर उसे नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया जाए या उसकी जान ले ली जाए, तो यह मजहब नहीं, बल्कि अपराध है।

भारत में इस मुद्दे पर हो रही चर्चा में सबसे बड़ी कमी ‘ईमानदारी’ की है। हम एक तरफ तो आधुनिक भारत का सपना देखते हैं, लेकिन दूसरी तरफ सात साल की बच्चियों को बुर्के में लपेटकर उनकी मानसिक आजादी को कुचलने वाली सोच पर चुप रहते हैं। पाकिस्तान के डॉन द्वारा दी गई धमकी यह बताती है कि यह मुद्दा केवल आस्था का नहीं बल्कि वर्चस्व का है। यदि हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि किसी भी महिला की पहचान उसकी योग्यता और उसके चेहरे से होनी चाहिए, न कि उस कपड़े के टुकड़े से जो उसे समाज से अलग करता है। अंततः, आजादी केवल कपड़े पहनने की नहीं, बल्कि बिना डरे जीने की होनी चाहिए।

महाराष्ट्र के यवतमाल में जन्म प्रमाणपत्र घोटाला, छोटे से गाँव में बने 27000+ सर्टिफिकेट: बांग्लादेशी-रोहिंग्या कनेक्शन की SIT जाँच की माँग

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के ग्रामीण इलाके में जन्म पंजीकरण से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है। जिले की अरनी तहसील की शेंदुरसानी ग्राम पंचायत में सिर्फ तीन महीनों (सितंबर से नवंबर) के भीतर सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) में 1,500 की आबादी वाले गाँव में 27,397 जन्म दर्ज किए गए।

यह गंभीर अनियमितता 24 नवंबर 2025 को सामने आई। इसके बाद जिला स्वास्थ्य अधिकारी (DHO) की शिकायत पर मंगलवार (16 दिसंबर 2025) को यवतमाल सिटी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई।

FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 337, 336(3), 304(2) और IT एक्ट की धारा 65 व 66 के तहत दर्ज की गई है। पुलिस निरीक्षक नंदकिशोर काले ने बताया कि शेंदुरसानी गाँव में जन्म पंजीकरण में गड़बड़ी की शिकायत मिली है और मामले की जाँच शुरू कर दी गई है।

पूर्व भाजपा सांसद किरिट सोमैया ने बुधवार (17 दिसंबर 2025) को गाँव का दौरा किया और इस मामले की गहन जाँच की माँग की। मीडिया से बातचीत में उन्होंने अंदाजा लगाया की ग्राम पंचायत के कंप्यूटर ऑपरेटर की लॉग-इन ID और पासवर्ड का किसी ने गलत इस्तेमाल किया हो सकता है, जिसके जरिए जन्म पंजीकरण में इतनी बड़ी गड़बड़ी की गई।

एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि शक है कि हजारों बांग्लादेशी इसके फायदेमंद हैं। उन्होंने इस मामले में SIT जाँच की माँग की है।

उन्होंने बताया कि रिकॉर्ड में दर्ज ज्यादातर नाम पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों के लोगों के हैं। किरिट सोमैया ने कहा, “मैंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से बात की है और इन सभी फर्जी जन्म पंजीकरण प्रविष्टियों को रद्द करने की माँग की है।” उन्होंने यह भी बताया कि शेंदुरसानी ग्राम पंचायत की CRS ID (MH18241RE) मुंबई में मैप पाई गई है, जिससे साइबर धोखाधड़ी की आशंका और भी मजबूत हो गई है।

राज्य सरकार के निर्देश पर मंगलवर (16 दिसंबर 2025) को ग्राम पंचायत में अवैध और देरी से किए गए जन्म-मृत्यु पंजीकरण के जाँच अभियान को शुरू किया गया। इस दौरान अरनी के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने पाया कि सितंबर से नवंबर 2025 के बीच CRS सॉफ्टवेयर में 27,397 जन्म और 7 मृत्यु के रिकॉर्ड दर्ज किए गए हैं, जो गाँव की वास्तविक आबादी के मुकाबले बिल्कुल असामान्य और संदिग्ध थे।

इसके बाद जिला स्वास्थ्य अधिकारी (DHO) ने इस गड़बड़ी की जानकारी जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) मंदर पाटकी को दी। CEO ने मामले की जाँच के लिए पंचायत विभाग के उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी की अध्यक्षता में एक जाँच समिति गठित की। समिति ने गाँव में मौके पर जाकर जाँच की, जिसमें सामने आया कि 27,397 जन्म और 7 मृत्यु के रिकॉर्ड ग्राम पंचायत के अधिकार क्षेत्र से बाहर के हैं और इन्हें बहुत ही संदिग्ध माना गया।

इसके बाद पुणे के उप स्वास्थ्य सेवा संचालक द्वारा तकनीकी जाँच शुरू की गई। राज्य के लॉग-इन सिस्टम के माध्यम से की गई इस जाँच में सामने आया कि शेंदुरसानी ग्राम पंचायत की CRS ID मुंबई से मैप की गई थी। इसके बाद मामला नई दिल्ली स्थित भारत के अतिरिक्त रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) को भेजा गया।

इन दोनों संस्थानों की जाँच में यह निष्कर्ष निकला कि यह मामला साइबर धोखाधड़ी का है। यह जानकारी 11 दिसंबर 2025 को पुणे के उप स्वास्थ्य सेवा संचालक को दी गई, जिन्होंने आगे चलकर इसकी सूचना जिला परिषद (जिला परिषद प्रशासन) को दी।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अदिति ने अंग्रेजी में लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

‘थिरुपरनकुंड्रम दीपम’ की परंपरा तोड़ने में जुटी तमिलनाडु की DMK सरकार, कोर्ट के आदेश को भी दिखा चुकी है ठेंगा: खुद को अपमानित पा रहे सनातनियों में गुस्सा

मद्रास हाई कोर्ट ने हिंदुओं को पूजा के लिए दीए जलाने की इजाज़त देने के अपने आदेशों का पालन न करने पर तमिलनाडु सरकार को फटकार लगाई है। कोर्ट ने अवमानना ​​याचिका को भी स्वीकार कर लिया है।

हिंदू श्रद्धालुओं के एक समूह ने बुधवार (17 दिसंबर 2025) को मद्रास हाईकोर्ट में कहा कि तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त (HR&CE) विभाग के आयुक्त का हिंदू धर्म के प्रति ‘तिरस्कार और अवमानना’ वाला रवैया है।

ये टिप्पणी तमिलनाडु सरकार और मदुरै जिला प्रशासन द्वारा दायर एक अपील की सुनवाई के दौरान की गई। यह अपील एकल जज के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें थिरुपरकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम (दीपक) जलाने की अनुमति दी गई थी। इसी पहाड़ी पर अरुलमिगु सुब्रमणिया स्वामी मंदिर और सिकंदर बदूशा दरगाह दोनों स्थित हैं।

सरकार की अपील उस आदेश को चुनौती देती है, जो जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने 4 दिसंबर 2025 को अवमानना याचिका पर सुनाते हुए दिया था। उस आदेश में उन्होंने मदुरै जिला प्रशासन द्वारा जारी निषेधाज्ञा को रद्द कर दिया था, जिसके जरिए हिंदू श्रद्धालुओं को थिरुपरकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम जलाने से रोका गया था।

इस अपील पर जस्टिस जी जयचंद्रन और जस्टिस केके रामकृष्णन की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की। इसके अलावा कुछ अन्य अपीलें भी कोर्ट में दायर की गईं, जिनमें 9 दिसंबर 2025 को जस्टिस स्वामीनाथन द्वारा दिए गए एक अन्य आदेश को चुनौती दी गई है। उस आदेश में उन्होंने अवमानना मामले में मुख्य सचिव, एडीजीपी और डीसीपी को पेश होने का निर्देश दिया था, साथ ही केंद्रीय गृह सचिव को भी पक्षकार बनाने को कहा था।

जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि दीपथून (जहाँ दीपक जलाया जाता है) उस क्षेत्र में नहीं है, जो मुस्लिमों का है। इसलिए वहाँ कार्तिगई दीपम जलाने से मुस्लिमों के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसी आधार पर उन्होंने दीपक जलाने की अनुमति दी थी।

आयुक्त ने किया हिन्दू धर्म का अपमान

हिंदू भक्त की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एस श्रीराम ने हाई कोर्ट में कहा कि हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त (HR&CE) विभाग के आयुक्त ने पहले यह टिप्पणी की थी कि भगवान मुरुगन की दो पत्नियाँ होने के बावजूद थिरुपरनकुंद्रम में दो दीपक नहीं जलाए जा सकते।

इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए श्रीराम ने कहा कि उनकी आस्था और उनके भगवानों पर भरोसे का विषय आयुक्त द्वारा उपहास और तिरस्कार का कारण बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह उनके धर्म का अपमान है और उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि ऐसे आयुक्त के पास उन्हें न भेजें, जिनके मन में उनकी आस्था के प्रति सम्मान नहीं बल्कि अपमान है।

वहीं, एक अन्य हिंदू भक्त की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता केपीएस पलनिवेल ने भी दलील दी कि पहाड़ी पर दूसरा दीपक जलाने पर आपत्ति करने का अधिकार अधिकारियों को नहीं है। उन्होंने कहा कि दीप प्रज्वलन एक आवश्यक धार्मिक परंपरा है और इसे पहाड़ी की चोटी पर ही किया जाना चाहिए। यह नहीं कहा जा सकता कि पहले से एक दीपक जल रहा है, इसलिए दूसरा क्यों जलाया जाए। दीपम का धर्म में अपना विशेष महत्व और स्थान है।

पलनिवेल ने आगे बताया कि दीपक जलाने के कई धार्मिक और व्यावहारिक कारण हैं। पहला, यह ईश्वर का प्रतीक और स्वरूप माना जाता है। दूसरा, इससे पूरे गाँव के लोग दूर से इसे देख सकते हैं। तीसरा, पुराने समय में जब बिजली नहीं थी, तब प्रकाश का विशेष महत्व था। उन्होंने यह भी कहा कि पहाड़ों की एक से अधिक चोटियाँ हो सकती हैं और कई पहाड़ दोहरी चोटियों वाले होते हैं। इस पहाड़ी पर भी दो चोटियाँ हैं।

उन्होंने समझाया कि दीपक जलाने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान वह चोटी होती, जिस पर दरगाह स्थित है। लेकिन किसी कारणवश मंदिर अपनी सबसे ऊँची चोटी खो चुका है, इसलिए उसके बाद वाली दूसरी ऊँची चोटी को दीप प्रज्वलन के लिए चुना गया। इसी संदर्भ में उन्होंने कार्तिगई दीपम के धार्मिक महत्व को कोर्ट के सामने विस्तार से रखा।

राज्य चाहता है कि हिंदू अपने अधिकारों का त्याग करके सह-अस्तित्व में रहें: हिंदू श्रद्धालु

सीनियर एडवोकेट एस श्रीराम ने कोर्ट से कहा कि राज्य सरकार की यह दलील स्वीकार नहीं की जानी चाहिए कि भक्तों को कोर्ट जाने के बजाय HR&CE (हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त) विभाग के पास जाकर विवाद सुलझाना चाहिए। श्रीराम ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि अधिकारियों के सामने मेरे अधिकार सुरक्षित हैं। वहाँ मुझे और कितना अपमान और तिरस्कार झेलना पड़ेगा?”

उन्होंने साफ कहा कि इस मामले में मध्यस्थता (मेडिएशन) का कोई मतलब नहीं है। उनका तर्क था कि अब तक जितनी भी शांति बैठकों या समझौता बैठकों का आयोजन हुआ है, हर बार मंदिर को ही पीछे हटना पड़ा है और अपने अधिकार छोड़ने पड़े हैं।

उन्होंने इसकी तुलना मानसिक प्रताड़ना से करते हुए कहा कि यह ऐसा है जैसे पहले चोट पहुँचाई जाए और फिर दर्द में ही समझौते की बात की जाए। श्रीराम ने कहा कि हर बार समाधान के नाम पर हिंदुओं को ही अपने अधिकारों में कटौती करनी पड़ी है।

सीनियर एडवोकेट ने राज्य सरकार पर हिंदुओं के प्रति पक्षपात का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राज्य सह-अस्तित्व की बात तो करता है, लेकिन इसकी कीमत हिंदुओं से उनके अधिकार छोड़ने के रूप में चुकाने को कहा जा रहा है। श्रीराम ने कहा, “राज्य का रवैया यह है कि अपने अधिकारों का दावा मत करो, पीछे हटते रहो और किसी तरह साथ रहते रहो। जबकि राज्य का कर्तव्य है कि वह संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मेरे धार्मिक अधिकारों की रक्षा करे और पूरी तरह निष्पक्ष और तटस्थ रहे।”

उन्होंने यह भी कहा कि वह सह-अस्तित्व के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सह-अस्तित्व का मतलब अधिकारों का समर्पण नहीं हो सकता। श्रीराम ने आगे कहा कि मंदिर के अधिकारों पर अतिक्रमण करने की कोशिशें पहले से हो रही हैं और यह सिर्फ आशंका नहीं है।

उन्होंने बताया कि दूसरी ओर से पहाड़ी को ‘सिकंदर हिल’ कहा जा रहा है, वहाँ पशु बलि की माँग की जा रही है और मंदिर की दीवारों को नुकसान पहुँचाया गया है। उन्होंने कहा कि धर्म का कोई रंग नहीं होना चाहिए, लेकिन एक त्योहार के दौरान पहाड़ियों को हरे रंग से रंग दिया गया। उनके अनुसार, ये सभी घटनाएँ मंदिर और हिंदू धार्मिक अधिकारों पर सीधा हमला हैं।

राज्य द्वारा पहाड़ी का स्वरूप बदलने का प्रयास: हिंदू श्रद्धालु

सीनियर एडवोकेट एस श्रीराम ने जस्टिस स्वामीनाथन द्वारा दिए गए आदेश का बचाव करते हुए कहा कि यह फैसला पूरी तरह से तर्क और कारणों पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू श्रद्धालुओं के वैध अधिकारों को बरकरार रखने के कारण ही जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ डीएमके के नेतृत्व वाले पूरे INDI गठबंधन ने महाभियोग प्रस्ताव शुरू किया है।

श्रीराम ने इस आरोप को सिरे से खारिज किया कि जस्टिस स्वामीनाथन का आदेश मनमर्जी या खयाली सोच पर आधारित था। उन्होंने कहा, “यह एक सुविचारित और कारणों से भरा हुआ आदेश है। अगर कहीं मनमानी है, तो वह अपीलकर्ताओं के पक्ष में है, जो एक पक्ष के प्रति आँख मूँदकर झुके हुए हैं और दूसरे पक्ष का खुलकर स्वागत कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि यही पक्षपात मंदिर प्रशासन और ट्रस्ट बोर्ड तक पहुँच गया है, जो इस मुद्दे पर बोलने से इनकार कर रहे हैं, जबकि कार्यकारी अधिकारी राज्य सरकार की लाइन पर ही काम कर रहा है।

Places of Worship Act को लेकर राज्य की दलील का जवाब देते हुए श्रीराम ने कहा कि हिंदुओं पर धार्मिक स्वरूप बदलने का आरोप गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया, “अगर कोई इस पहाड़ी के धार्मिक स्वरूप को बदल रहा है, तो वह राज्य है। यह स्थान हमेशा से हिंदू श्रद्धालुओं के लिए दीपथून (दीप स्तंभ) रहा है।”

राज्य यह साबित नहीं कर सका कि पत्थर का स्तंभ दीपथून नहीं है: हिंदू श्रद्धालु

हाई कोर्ट में एक अन्य हिंदू भक्त की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता वल्लीअपन ने कहा कि तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी के शीर्ष पर कार्तिगई दीपम जलाना हिंदुओं की एक अनिवार्य धार्मिक परंपरा है। उन्होंने कहा कि कार्तिगई के दिन पहाड़ी पर दीप जलाने के पीछे गहरा धार्मिक आस्था है।

वल्लीअपन ने कोर्ट में कहा, “इस दीप के माध्यम से हमें भगवान के ज्योति स्वरूप के दर्शन होते हैं, जिसे हर कोई देख सकता है। पहाड़ी के ऊपर अग्नि (दीप) जलाने का विशेष धार्मिक महत्व है। हम इसे स्वयं भगवान का रूप मानते हैं, इसलिए इसे पहाड़ी के शीर्ष पर जलाया जाता है।”

उन्होंने यह भी बताया कि राज्य सरकार यह साबित करने के लिए कोई भी दस्तावेज पेश नहीं कर सकी कि जिस स्तंभ पर दीप जलाया जाता है, वह दीपस्तंभ (दीपथून) नहीं है। मुस्लिम पक्ष की दलील का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कल यह तर्क दिया गया कि पूरी पहाड़ी हमारी है, लेकिन यह दावा सही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूरी पहाड़ी देवस्थानम की है, केवल कुछ हिस्से इससे अलग हैं।

इस मामले में अधिवक्ता कृष्णवल्ली ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य बार-बार इस मुद्दे को कोर्ट के बाहर सुलझाने पर जोर क्यों दे रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष को कोर्ट में सुनवाई पर कोई आपत्ति नहीं है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब भी कोई हिंदू या आम नागरिक कोर्ट आता है ताकि पूजा सही तरीके, सही स्थान और सही समय पर हो सके, तो देवस्थानम और HR&CE विभाग यह क्यों कहते हैं कि मामले को HR&CE के पास भेजा जाए।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

परमाणु उर्जा से जुड़े Shanti Bill से स्वास्थ्य-कृषि-ऊर्जा सेक्टर में क्रांतिकारी बदलाव, प्राइवेट सेक्टर को भी मिलेगा मौका: सरकार ने सुरक्षा को लेकर किए हैं इंतजाम, समझिए- इसमें आपका क्या फायदा

परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में निजी भागीदारी की अनुमति देने वाला SHANTI बिल 2025 कई मायने में ऐतिहासिक है। इससे भारत के परमाणु ढाँचे में मूलभूत बदलाव देखने को मिलेगा। इसका फायदा हेल्थ सेक्टर से लेकर कृषि तक में दिखेगा। इससे न सिर्फ निजी कंपनियाँ परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आएँगी, बल्कि ये लंबे समय से चली आ रही निवेशकों के कानूनी बाधाओं को भी दूर करेगा।

नया कानून उस दायित्व व्यवस्था में सुधार करेगा, जिसने देश में उदारीकरण के बावजूद कंपनियों के निवेश को सीमित कर रखा है। परमाणु ऊर्जा काफी संवेदनशील क्षेत्र है, इसलिए अब तक सरकार का पूर्ण नियंत्रण इस क्षेत्र पर रहा है। अब ऐसी कंपनियाँ लगेंगी जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र मिलकर उपक्रम लगाएँगे, हालाँकि सरकार ने साफ कर दिया है कि बेहद संवेदनशील पदार्थों पर अभी भी सरकार का पूर्ण नियंत्रण होगा।

क्या है SHANTI बिल

परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और परमाणु संयंत्रों से होने वाले नुकसान के लिए सिविल दायित्‍व अधिनियम 2010 की जगह SHANTI बिल 2025 यानी भारत के ट्रांसफॉर्म के लिए नाभिकीय ऊर्जा का संधारणीय दोहन और अभिवर्द्धन विधेयक, 2025 (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India (SHANTI) Bill, 2025) को लाया गया है। परमाणु ऊर्जा विनियामक बोर्ड (AERB) को बिल के माध्यम से सांविधिक दर्जा (Statutory Status) प्रदान किया गया है। इससे यह संस्था रेडिएशन और परमाणु ऊर्जा के सुरक्षित उपयोग को सुनिश्चित कर सकेगी।

इस कानून के लागू होने के बाद निजी क्षेत्र की एंट्री परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में हो जाएगी। हालाँकि, सरकार ने सदन में साफ किया है कि ये बिल पुराने बिल के उद्देश्यों को और मजबूत करना है। इस बिल के माध्यम से परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड को वैधानिक दर्ज दिया गया है, ताकि इसे और प्रभावी बनाया जा सके। सरकार निजी क्षेत्र को यूँ ही नहीं एंट्री करने देगी। सरकार का साफ कहना है कि निजी संस्थानों का संवेदनशील पदार्थों पर कोई नियंत्रण नहीं होगा। सरकार सुरक्षा संबंधी मानदंड तय करेगी। रेडियोएक्टिव पदार्थ, ईधन और हेवी वाटर पर सरकार की निगरानी होगी।

परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और सिविल दायित्‍व अधिनियम 2010 को निवेश की राह में रोड़ा माना जाता रहा है। खास कर आपूर्तिकर्ताओं पर दायित्वों को लेकर। इसकी वजह से विश्वस्तर के उद्योग भारत में आने में हिचकिचा रहे हैं। इसको देखते हुए भी बिल में आपूर्तिकर्ताओं के दायित्वों को साफ किया गया है।

क्या मुआवजे को कम किया जा रहा है, सुरक्षा मापदंड क्या हैं

विपक्ष ने आरोप लगाया कि इस कानून से मुआवजे को कम किया जा रहा है। साथ ही विपक्ष कह रहा है कि आपूर्तिकर्ता के उत्तरदायित्व का प्रावधान इसमें नहीं है और यह संवेदनशील क्षेत्र में निजी कॉरपोरेट समूहों के लिए रास्ता खोलने वाला है।

इसका जवाब देते हुए केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने कहा कि इस विधेयक से पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजे को कम नहीं किया गया है। उन्होंन स्पष्ट किया कि रिएक्टर की क्षमता के मुताबिक इसके मालिक के दायित्व को तय किया गया है, ताकि छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर जैसी नई तकनीकों को प्रोत्साहित किया जा सके। इसके तहत दायित्व सीमा 100 करोड़ से 3000 करोड़ रुपए तक होगी।

प्रभावितों को पूरा मुआवजा सुनिश्चित किया जा सके। इसके लिए संचालक का दायित्व, सरकार के परमाणु दायित्व फंड और दूसरे मुआवजे से जुड़ी संधि में भारत की भागीदारी से अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय मुआवजा भी मिलेगा। कानून में संचालक की लापरवाही के लिए सजा के प्रावधान भी लागू रहेंगे। अगर क्षतिपूर्ति राशि रिएक्टर का संचालक पूरा नहीं कर पा रहा है, तो बाकी बचा पैसा केन्द्र सरकार देगी।

विधेयक में परमाणु संचालन से संबंधित विवादों के समाधान के लिए एक परमाणु ऊर्जा निवारण सलाहकार परिषद की स्थापना का भी प्रस्ताव है। नियम तोड़ने के लिए जुर्माना मामूली उल्लंघनों के लिए 5 लाख रुपए से लेकर गंभीर अपराधों के लिए 1 करोड़ रुपए तक है। सभी ऑपरेटरों, चाहे वे सार्वजनिक हों या निजी, उन्हें सरकार से लाइसेंस और एईआरबी से सुरक्षा मंजूरी प्राप्त करना जरूरी होगा।

‘नो-फॉल्ट दायित्व’ की पहले की व्यवस्था जारी रहेगी। इसका अर्थ यह है कि दुर्घटना या क्षति के लिए लापरवाही साबित हुए बिना भी दुर्घटना के लिए ऑपरेटर ही जिम्मेदार होगा। ये अनिवार्य किया गया है कि ऑपरेटर दायित्व राशि के बराबर का बीमा कराएगा।

नया विधेयक के मुताबिक, भारत में हुई किसी परमाणु दुर्घटना से यदि किसी अन्य देश के क्षेत्र में भी नुकसान होता है, तो कुछ शर्तों के साथ वहाँ हुए नुकसान के लिए भी क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है।

परमाणु ऊर्जा दूसरे ऊर्जा के विकल्पों मसलन कोयला, जल की तुलना में ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को कई स्वतंत्र सुरक्षा लेयर के साथ डिजाइन किया जाता है, ताकि एक भी विफलता बड़ी दुर्घटना का कारण न बन सके।

क्या निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित कर सार्वजनिक क्षेत्र को कमजोर किया जा रहा है?

विपक्ष ने सदन में बिल का विरोध करते हुए कहा है कि सरकार सार्वजनिक उपक्रमों की दुश्मन है और एक के बाद एक सार्वजनिक क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपती जा रही है। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र को भी अब निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है। इस आरोप को केन्द्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सदन में खारिज करते हुए कहा कि इस कानून से सार्वजनिक क्षेत्र की क्षमता में कमी नहीं आएगा।

दरअसल सरकार ने पिछले एक दशक में परमाणु ऊर्जा विभाग के बजट में लगभग 170 प्रतिशत की वृद्धि की है। भारत के समकक्ष देशों की तुलना में ऊर्जा क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा का योगदान अभी भी कम है। ऐसे में कोयला, पानी, हवा से प्राप्त होने वाली बिजली के अलावा परमाणु ऊर्जा को प्रोत्साहित करना बेहद जरूरी है, ताकि डेटा प्रोसेसिंग, स्वास्थ्य सेवा और उद्योग जैसे क्षेत्रों की बढ़ती माँग को पूरा किया जा सके।

केन्द्रीय मंत्री के मुताबिक, यह विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा या जनहित से समझौता किए बिना, संसाधन संबंधी बाधाओं को दूर करने, परियोजनाओं के निर्माण की अवधि को कम करने और 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जिम्मेदार निजी और संयुक्त उद्यम की भागीदारी को संभव बनाता है। इसका मकसद 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य और 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को वर्तमान लगभग 8.2 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट करना है।

जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को कम करने में कैसे है सहायक

इस विधेयक में पहली बार परमाणु क्षति की परिभाषा में पर्यावरण और आर्थिक नुकसान को शामिल किया गया है। शांति बिल 2025 का उद्देश्य स्वच्छ और विश्वसनीय ऊर्जा के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार करना है और साथ ही परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के प्रति लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता को भी कायम रखना है। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों और अनुसंधान और नवाचार को भी प्रोत्साहित करना इसका मकसद है।

नया कानून भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप भी है, क्योंकि ये बहुत ही कम कार्बन उत्सर्जन वाला ऊर्जा स्रोत है। इससे स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा। यह विधेयक स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों जैसी विकसित प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देता है, जो कोयले के उपयोग को रोकने में मददगार है। इतना ही नहीं उद्योगपतियों को कार्बन उत्सर्जन टैक्स से भी बचाता है। दरअसल कोयले से चलने वाले पावर प्लांट के विपरीत न्यूक्लियर रिएक्टर चलते समय वायु प्रदूषण नहीं करते हैं और ये कार्बन डाइऑक्साइड नहीं बनाते हैं।

हालाँकि, यूरेनियम की माइनिंग और रिफाइनिंग और रिएक्टर फ्यूल बनाने के प्रोसेस में बहुत ज़्यादा एनर्जी लगती है। न्यूक्लियर पावर प्लांट में भी बहुत ज़्यादा मेटल और कंक्रीट होता है, जिसे बनाने के लिए बहुत ज़्यादा एनर्जी लगती है। अगर यूरेनियम ओर की माइनिंग और रिफाइनिंग के लिए कोयले का इस्तेमाल किया जाता है, या अगर न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाते समय कोयले का इस्तेमाल किया जाता है, तो उन फ्यूल को जलाने से होने वाला एमिशन न्यूक्लियर पावर प्लांट से बनने वाली बिजली से जुड़ा हो सकता है।

न्यूक्लियर एनर्जी से रेडियोएक्टिव कचरा निकलता है

न्यूक्लियर पावर से जुड़ी एक बड़ी समस्या रेडियोएक्टिव कचरे का बनना है, जैसे यूरेनियम मिल टेलिंग्स, रिएक्टर फ्यूल और दूसरे रेडियोएक्टिव कचरे। ये इंसानों के लिए बेहद खतरनाक होते हैं। इसलिए इसकी हैंडलिंग, ट्रांसपोर्टेशन, स्टोरेज और डिस्पोजल को सरकार कंट्रोल करती है।

रेडियोएक्टिव तत्वों की क्षमता को पहले कम किया जाता है, फिर इसे डिस्पोज किया जाता है। इसके लिए रेडियोएक्टिव कचरे को लो-लेवल कचरे या हाई-लेवल कचरे में बाँटा जाता है। दोनों का तरीका अलग-अलग होता है। हालाँकि इन कचरों की तुलना अगर कोयले या दूसरे बिजली बनाने के संसाधनों से की जाए तो ये काफी कम हैं। इसलिए विकसित देश न्यूक्लियर एनर्जी पर लगातार निर्भरता बढ़ा रहे हैं।

परमाणु ऊर्जा एक स्वच्छ और साफ-सुथरा बिजली का स्रोत है, जो दिन-रात और 24 घंटे उपलब्ध रह सकता है। परमाणु ऊर्जा का उत्सर्जन हाइड्रो और पवन ऊर्जा की तरह है। इसलिए परमाणु ऊर्जा 2070 तक नेट जीरो के संकल्प को पूरा करने में ये अहम भूमिका निभाएगा।

कृषि और फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में इस्तेमाल

एटोमिक ऊर्जा का इस्तेमाल कृषि से लेकर फूड तकनीक में तेजी से होने लगा है। भारत में ही रेडिएशन का इस्तेमाल कर 72 तरह की नई फसलें, जिनमें सरसों, सोयाबीन, सनफ्लावर जैसी तिलहन और उरद, मूँग समेत कई दालें, चावल जूट और केले शामिल हैं, पैदा की गई हैं।

इसके अलावा फूड रेडिएशन पर आधारित फूड संरक्षण तकनीक से कोल्ड स्टोरेज समेत कई काम कम खर्च पर और आसानी से किसानों को उपलब्ध हो सकती हैं। इससे न सिर्फ अनाज, मसालों की उम्र बढ़ जाएगी, बल्कि उन्हें रेडिएशन के माध्यम से कीटों और कीड़ों से भी मुक्ति मिल जाएगी। इसका फायदा एग्रीकल्चर सेक्टर में दूरगामी पड़ेगा। इससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने, कृषि लागत को कम करने, किसानों की आय में सुधार लाने और वैश्विक कृषि व्यापार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने में मदद मिलेगी।

हेल्थ सेक्टर को होगा फायदा

इस विधेयक को व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। हेल्थ सेक्टर में इसका काफी महत्व है खास कर कैंसर के इलाज में, इसमें रेडिएशन का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा शोध विकास और नवाचार के क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलेगा। इसके अलावा कृषि और उद्योग से जुड़े अनुसंधान में आयोनाइजिंग रेडिएशन (ionising radiation) का इस्तेमाल कर कई आयाम जोड़े जा सकते हैं।

Bhabha Atomic Research Centre (BARC) ने न्यूक्लियर एनर्जी के माध्यम से पानी की बाढ़ वाले इलाके में कम खर्च पर सफाई करने की तकनीक कई राज्यों में इस्तेमाल की है। इसके व्यापक इस्तेमाल से बाढ़ वाले इलाके में फैलने वाली बीमारी से निजात मिलेगी। पानी की सफाई से बैक्टीरिया वायरस तो पानी से अलग होंगे ही मिट्टी और दूसरे पदार्थ भी अलग हो जाएँगे। यहाँ तक कि पानी के खारेपन को दूर करने के लिए इसका इस्तेमाल गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में हो रहा है।

प्राइवेट पूँजी निवेश और हाई तकनीक के साथ साथ वैश्विक साझेदारी जरूरी है। इसलिए लगातार सरकार इस कोशिश में लगी है कि ज्यादा से ज्यादा पूँजी निवेश को आमंत्रित किया जा सके। हमारे देश में रिलायंस इंडस्ट्री, टाटा पावर और अडानी पावर इस क्षेत्र में आगे आए हैं। विदेशी कंपनियाँ भी दिलचस्पी दिखा रही हैं।

विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा की अपार संभावना की ओर देश को बढ़ना ही होगा। इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी आवश्यक है। परमाणु ऊर्जा सिर्फ बिजली पैदा नहीं करता बल्कि इससे हेल्थ सेक्टर, दूसरे उद्योग, एक्सपोर्ट, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण को भी फायदा होता है। इन क्षेत्रों के विकास और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए ये कानून मील का पत्थर साबित होगा।

भारत-ओमान के बीच CEPA व्यापार समझौता, टैरिफ हटने से ट्रेड को मिलेगी मजबूती: समझें- ऐसी साझेदारियों से देश को कैसे मजबूत बना रही मोदी सरकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओमान यात्रा ने भारत और ओमान के बीच सदियों पुराने रिश्तों को नई ऊँचाई दी है। गुरुवार (18 दिसंबर 2025) को मस्कट में ऐतिहासिक समझौते के तहत भारत और ओमान ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) पर हस्ताक्षर किए।

भारत-ओमान के बीच CEPA समझौता न केवल दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देगा, बल्कि भारत की वैश्विक आर्थिक रणनीति को मजबूत बनाएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे ‘हमारे साझा भविष्य का ब्लूप्रिंट’ करार दिया, जो आने वाले दशकों तक दोनों देशों के संबंधों को आकार देगा।

यह समझौता ओमान का दूसरे देश के साथ दूसरा मुक्त व्यापार समझौता है और लगभग 20 वर्षों बाद उनका पहला ऐसा समझौता है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि इससे वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, ऑटोमोबाइल, रत्न-आभूषण, कृषि रसायन, नवीकरणीय ऊर्जा और ऑटो पार्ट्स जैसे क्षेत्रों में अपार संभावनाएँ खुलेंगी।

भारत-ओमान व्यापार वर्तमान में लगभग 10.5 अरब डॉलर (949.0 अरब रुपए) का है, जिसमें भारत का निर्यात 4.1 अरब डॉलर (370.6 अरब रुपए) और आयात 6.6 अरब डॉलर (596.5 अरब रुपए) है। ऊर्जा और उर्वरक आयात प्रमुख हैं, लेकिन यह समझौता निर्यात को बढ़ाकर व्यापार संतुलन सुधारने में मदद करेगा। ओमान के वाणिज्य मंत्री कैस अल यूसुफ ने बताया कि भारत ओमान का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है और भारतीय निवेश 5 अरब डॉलर (451.9 अरब रुपए) से अधिक हो गया है।

पीएम मोदी की यह यात्रा दोनों देशों के 70 वर्षों के राजनयिक संबंधों की वर्षगाँठ पर हुई, जो भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान ओमान को विशेष अतिथि बनाने के फैसले को और मजबूत करती है। आइए, इस समझौते को विस्तार से समझते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की ओमान यात्रा और समझौते पर हस्ताक्षर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 18 दिसंबर 2025 को मस्कट पहुँचे, जहाँ ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक ने उनका स्वागत किया। यह यात्रा भारत की तीन देशों की यात्रा का आखिरी चरण है और सीईपीए पर हस्ताक्षर का मुख्य आकर्षण रहा। हस्ताक्षर समारोह में प्रधानमंत्री मोदी और सुल्तान के अलावा वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल तथा ओमानी समकक्ष कैस अल यूसुफ मौजूद रहे।

पीएम मोदी ने मस्कट बिजनेस समिट में कहा, “यह समझौता हमें 21वीं सदी में नई ऊर्जा और विश्वास देगा।” उन्होंने ऐतिहासिक समुद्री संबंधों का जिक्र किया, जैसे लोथल बंदरगाह के माध्यम से हुए व्यापार के बारे में। पीएम मोदी ने ओमान की रणनीतिक स्थिति को खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी), पूर्वी यूरोप, मध्य एशिया और अफ्रीका के लिए द्वार बताया। उनकी इस यात्रा के दौरान पॉवर, इन्फ्रा जैसे सहयोग के चार स्तंभों पर चर्चा हुई।

भारतीय कंपनियों ने ओमान के सोहर और सलाला मुक्त व्यापार क्षेत्रों में 7.5 अरब डॉलर (677.8 अरब रुपए) से अधिक निवेश किया है, जो 6,000 से ज्यादा संयुक्त उद्यमों का आधार है।

यह समझौता नवंबर 2023 में शुरू हुई वार्ताओं का परिणाम है और कुछ महीनों में लागू होगा। इससे पहले कैबिनेट ने 12 दिसंबर को इसे मंजूरी दी थी। ओमान ने पाँच वर्षीय मल्टीपल एंट्री ‘इंडिया बिजनेस कार्ड’ वीजा जारी करने का वादा किया है, जो निवेश वाली कंपनियों के अधिकारियों के लिए 15 दिनों में मिलेगा। तेल-गैस और बंदरगाह परियोजनाओं के लिए वर्क परमिट 10 दिनों में जारी होंगे।

भारत-ओमान सीईपीए (CEPA) समझौता क्या है?

भारत-ओमान के बीच सीईपीए यानी व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता एक व्यापार समझौता (Trade Agreement) है, जो वस्तुओं, सेवाओं और निवेश को कवर करता है। यह सीमा शुल्क, गैर-शुल्क बाधाओं को कम या समाप्त करता है, जिससे व्यापार आसान होता है। ओमान में वर्तमान में कुछ उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क है, जो भारत के औद्योगिक निर्यात को प्रभावित करता है। यह समझौता 95 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर बिना किसी चार्ज के लेन-देन को तय करेगा।

भारत और ओमान के बीच यह समझौता बौद्धिक संपदा, सरकारी खरीद, डिजिटल व्यापार, मूल नियम, सीमा शुल्क सहयोग, स्वच्छता और पादप संगरोध उपाय, तकनीकी व्यापार बाधाएँ, विवाद निपटान और छोटे-मध्यम उद्यमों के समर्थन जैसे मुद्दों को शामिल करता है। भारत दवाओं के लिए तेज मँजूरी चाहता है, जो यूएसएफडीए या यूके एमएचआरए जैसी एजेंसियों से पास हो चुकी हों। ओमान के लिए यह 20 वर्षों बाद पहला ऐसा समझौता है, जो उनकी अर्थव्यवस्था को विविधीकृत करेगा।

भारत -ओमान के बीच CEPA समझौता, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

सीईपीए वैश्विक आर्थिक पुनर्संरचना के समय आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और व्यापार विविधीकरण को बढ़ावा देगा। ओमान का बाजार छोटा है (जनसंख्या 50 लाख, जीडीपी 115 अरब डॉलर (10,393.7 अरब रुपए)), लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति इसे महत्वपूर्ण बनाती है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अनुसार, यह भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाएगा।

CEPA से भारत को क्या फायदा होगा

यह समझौता भारत को कई स्तरों पर फायदा पहुँचाएगा। सबसे पहले तो इससे भारत के एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी होगी। इसमें भारत पेट्रोलियम, मशीनरी, चावल, लोहा-इस्पात जैसे उत्पादों का एक्सपोर्ट बढ़ा पाएगा। CPEA की वजह से इन पर लगने वाला भारी टैक्स खत्म होगा, जिसके भारत का एक्सपोर्ट 404 अरब डॉलर तक पहुँच जाएगा। इसके साथ ही कपड़े, जूते, ऑटोमोबाइल, रत्न-आभूषण, नवीकरणीय ऊर्जा और ऑटो पार्ट्स के क्षेत्र में भी नए रास्ते खुलेंगे।

निवेश में होगा फायदा: भारतीय कंपनियाँ ओमान के ग्रीन इस्पात, ग्रीन अमोनिया, एल्यूमीनियम और लॉजिस्टिक्स में निवेश बढ़ा सकेंगी। साल 2020 से भारत का ओमान में निवेश तीन गुना होकर 5 अरब डॉलर पहुँचा चुका है। भारत में भी ओमान का निवेश बढ़ेगा, जो भारत के लिए भी अत्यंत लाभकारी साबित होगा।

सर्विस सेक्टर में फायदा: भारत-ओमान समझौते से सर्विस सेक्टर को भी फायदा होगा। इसके साथ ही स्वास्थ्य, शिक्षा में सहयोग बढ़ेगा।

ऊर्जा सुरक्षा: ओमान से कच्चा तेल, एलएनजी और उर्वरक सस्ते मिलेंगे, जो भारत की कृषि, रसायन, सीमेंट और बिजली क्षेत्रों के लिए जरूरी हैं।

रोजगार: ईपीसी ठेकेदारों के लिए तेज वीजा से हजारों नौकरियाँ पैदा होंगी। जीटीआरआई के अनुसार, गुणवत्ता सुधार से निर्यात स्थायी रूप से बढ़ेगा। कुल मिलाकर यह व्यापार घाटे को कम कर 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने में मदद करेगा।

भारत ने किन अन्य देशों के साथ ऐसे समझौते किए हैं?

भारत ने 2025 तक 14 मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) और 6 अधिमान्य व्यापार समझौते (पीटीए) साइन किए हैं। ये किसानों, व्यापारियों और निर्यातकों के लिए फलदायी साबित हो रहे हैं। भारत के लिए सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार ने श्रीलंका के साथ इस तरह का समझौता किया था।

हालाँकि बीते कुछ समय में मोदी सरकार ने कई बड़े देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (मुक्त व्यापार समझौता) किए हैं। इनमें मॉरीशस (2021) के साथ समझौते ने भऊारत के लिए अफ्रीका के लिए द्वार खोल दिए। फिर पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत और यूएई के बीच 2022 में CEPA समझौता हुई, जिसके तहत UAE ने 90 प्रतिशत भारतीय निर्यात पर टैक्स बेहद कम कर दिया और आज दोनों देशों के बीच व्यापार पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ चुका है।

पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच 2022 में ही ईसीटीए समझौता हुआ, जिसके बाद से भारत के ऑस्ट्रलिया को होने वाले एक्सपोर्ट पर टैक्स काफी कम हो गया।

यहीं नहीं, भारत ने ईएफटीए टीईपीए (2024, 2025 से प्रभावी) के तहत स्विट्जरलैंड, नॉर्वे आदि के साथ ऐसे ही समझौते किए हैं, तो यूके के साथ इसी साल हुए सीईटीए समझौते ने भारत के एक्सपोर्ट की 90 प्रतिशत चीजों पर से टैक्स बेहद कम या लगभग खत्म कर दिया। इन समझौते से भारत के न सिर्फ विदेश संबंध मजबूत हुए, बल्कि भारत के उत्पादन के लिए बड़े बाजार भी मिले हैं।

किन देशों के साथ समझौते पाइपलाइन में हैं?

2025 में भारत 10 से अधिक एफटीए पर तेजी से काम कर रहा है। यूरोपीय संघ के साथ एफटीए वार्ता 2022 से फिर शुरू हुई, जिसके 14 दौर पूरे हो चुके हैं। इसी माह यानी दिसंबर 2025 तक भारत और ईयू के बीच व्यापार समझौता हो जाने की उम्मीद है, जिसके बाद दोनों पक्षों में 250 अरब डॉलर तक व्यापार बढ़ जाएगा।

भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौता (बीटीए) चल रहा है, जिसमें खाद्य उत्पादों पर शुल्क छूट शामिल। अभी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट व अन्य चीजों पर बातचीत हो रही है।

भारत इस समय पेरू, चिली, न्यूजीलैंड, इजराइल के साथ दिसंबर 2025 में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट जैसे समझौते को पूरा करने पर जोर लगा रहा है, जिसके कम से कम 4 चरण पूरे हो चुके हैं। इसी क्रम में कतर के साथ भी समझौते पर बातचीत हो रही है, तो यूएई के साथ समझौते को विस्तार भी दिया जा रहा है। भारत और कनाडा के बीच FTA थम सी गई थी, लेकिन कनाडा में सरकार बदलने के बाद फिर से इस दिशा में तेजी से काम हो रहा है।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की मानें तो मौजूदा समय में भारत कम से कम 50 देशों के साथ ऐसे समझौतों को लेकर बातचीत कर रहा है, जो भारतीय उत्पादों के लिए वैश्विक बाजार के दरवाजे को और बड़ा खोल देगा। ये समझौते 2026 तक भारत को वैश्विक व्यापार में मजबूत बनाएँगे।

वैश्विक मंचों पर भारत की ताकत बढ़ाने में योगदान

भारत और ओमान के बीच यह समझौता भारत की वैश्विक ताकत को कई गुना बढ़ाएगा। अमेरिका के टैरिफ और यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स के बीच खाड़ी में मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित करेगा। ओमान के माध्यम से जीसीसी, अफ्रीका और मध्य एशिया तक पहुँच बढ़ेगी, जो भारत को ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा देगी।

रणनीतिक रूप से ये समझौता बेहद महत्वपूर्ण है। इसके बल पर भारत मिडिल ईस्ट में अपनी पैठ बढ़ाता नजर आ रहा है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत जिन व्यापार समझौतों को अंजाम दे रहा है, वो समझौते विकसित भारत 2047 के विजन को पूरा करने में महत्वपूर्ण कड़ी साबित होंगे, क्योंकि ऐसे समझौतों से न सिर्फ भारत की जीडीपी वृद्धि 7-8 प्रतिशत तक रहेगी, बल्कि यह जी-20 जैसे मंचों पर भारत की नेतृत्व भूमिका को मजबूत करेगा।