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पत्रकार की गिरफ्तारी या बिजली-पानी की माँग… जानिए POK में सड़कों पर उतरकर लोग क्यों कर रहे बवाल, शहबाज सरकार का विद्रोह करने की खुली धमकी

पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार के खिलाफ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में जनता सड़कों पर उतरी है। सरकार के खिलाफ यह विद्रोह अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से आम सुविधाओं से त्रस्त लोगों का गुस्सा है, जिन्हें बिजली, पानी और इंटरनेट सेवा तक नहीं मिल पा रहा है। रावलकोट समेत पूरे पुंछ डिवीजन में ये प्रदर्शन पिछले एक हफ्ते से जारी है। जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट आवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC) ने ‘शटर डाउन हड़ताल‘ का ऐलान किया।

इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने दुकानें बंद कर दी, सड़के जाम कर दी और बड़े पैमाने में रैलियाँ निकाली। रैलियों में शहबाज शरीफ सरकार के खिलाफ ‘जब तक जनता तंग रहेगी, जंग रहेगी’, पानी चोरों और ‘बिजली चोरों’ जैसे नारे लगाए गए। इसके अलावा लोगों ने पत्रकार सोहराब बरकत की रिहाई की भी माँग की। प्रदर्शनकारियों ने सरकार को अल्टीमेटम तक दे दिया कि अगर माँगे पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन और तेज होगा।

POK में प्रदर्शनकारियों की माँगे क्या हैं?

प्रदर्शन की वजह बुनियादी सुविधाओं में भारी कमी है। आम लोगों को कई-कई दिनों तक बिजली नहीं मिलती, इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क बार-बार बंद कर दिया जाता है और साफ पानी जैसी जरूरी चीजों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनके इलाके के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल तो किया जाता है, लेकिन बदले में उन्हें कुछ नहीं मिलता। क्षेत्र में बेरोजगारी और महँगाई भी पुराना मुद्दा है।

प्रदर्शनकारियों की माँग बिजली और पानी को लेकर है। बिजली, जो पाकिस्तान पर कहर बनकर बरपी बाढ़ के चलते प्रभावित है। बाढ़ के चलते क्षेत्र में बिजली के खंभे गिर गए, जिनको अब तक शहबाज शरीफ सरकार ठीक नहीं कर सकी है। वहीं भारत के साथ सिंधु जल समझौता खत्म होने के बाद से ही पाकिस्तान पानी की बूँद-बूँद के लिए तरस रहा है। इसके अलावा प्रदर्शनकारी एक स्थानीय पत्रकार सोहराब बरकत की रिहाई की भी माँग कर रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों की पाकिस्तानी सरकार को चेतावनी

व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों, वकीलों और नागरिक समाज कार्यकर्ताओं के गठबंधन जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC) ने प्रदर्शनों का नेतृत्व किया है। संगठन ने ही पाकिस्तानी सरकार को साफ चेतावनी देते हुए कहा कि अगर माँगे पूरी नहीं हुई तो आंदोलन और तेज होगा।

रैलियों में घोषणा की गई कि दो मुख्य रास्ते बंद कर दिए जाएँगे। इनमें एक रास्ता ब्रीड स्टेशन की ओर जाने वाला और दूसरा शाहराह ए गाजी मिल्लत की ओर जाने वाला रास्ता है। संगठन ने आम लोगों से भी विरोध प्रदर्शन में जुड़ने की अपील की है।

चेतावनी से सीधे तौर पर पाकिस्तानी प्रशासन को बड़ा झटका लगा। जन आक्रोश को देखते हुए पाकिस्तान ने भारी संख्या में पुलिस सेना और अर्धसैनिक बल तैनात कर दिए हैं। यह साफ है कि POK की आवाज अब पाकिस्तान की प्रशासन को डराने का दम रखती है।

कौन और कहाँ है सोहराब बरकत?

सोहराब बरकत पाकिस्तानी मीडिया आउटलेट सियासत (Siasat) में कार्यरत पत्रकार है। इसके अलावा वह एक यूट्यूब चैनल के होस्ट भी हैं। बरकत को 26 नवंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में जाते समय इस्लामाबाद एयरपोर्ट से हिरासत में लिया गया था।

पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पत्रकार सोहराब बरकत पर पाकिस्तान की राष्ट्रीय साइबर अपराध जाँच एजेंसी (NCCIA) ने सरकारी संस्थानों पर अपमानजनक टिप्पणी करने और गलत सूचना फैलाने का आरोप लगाया है। NCCIA ने 05 अगस्त 2025 को बरकत पर इन आरोपों में मामला दर्ज किया था।

पत्रकार बरकत के वकील साद रसूल के मुताबिक, यह टिपप्णी विपक्षी दल पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ की सदस्य सनम जावेद ने बरकत के साथ एक इंटरव्यू में की थी, जो सियासत के यूट्यूब चैनल पर प्रकाशित हुआ था। अमेरिकी के संगठन पत्रकारों की सुरक्षा के लिए समिति (CPJ) ने बरकत की हिरासत को पाकिस्तानी अधिकारियों की मीडिया पर प्रताड़ना का उदाहरण बताया है।

POK में प्रदर्शन से पाकिस्तानी सरकार की असफलता?

POK में यह प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है। तीन महीने में दूसरी बार POK के लोगों का सरकार के खिलाफ विद्रोह सामने आया है। अक्टूबर 2025 में ही हजारों लोगों ने 38 माँगों के साथ सड़कों पर उतरे थे, लेकिन माँगों को मानने के बजाए पाकिस्तानी प्रशासन ने हिंसा चुनी। पाकिस्तानी रेंजर्स ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं। इसमें 12 लोगों की मौत हुई थी।

POK में फैली ये अशांति पाकिस्तान में शहबाज शरीफ नेतृत्व वाली सरकार की कमजोरी और पाकिस्तानी प्रशासन की असफलता को उजागर करती है। ये वही पाकिस्तान है, जो दावा करता है कि वह भारत के खिलाफ कश्मीरियों के अधिकारों की रक्षा करता है, लेकिन POK के लोग जिस परेशानियों से जूझ रहे हैं, उसे देखकर सरकार के दावे खोखले साबित होते हैं।

क्षेत्र के लोग दशकों से चले आ रहे शोषण, भ्रष्टाचार और तानाशाही जैसे हालातों से अब पूरी तरह थक चुके हैं और आवाज बुलंद कर रहे हैं। बावजूद पाकिस्तानी सरकार कोई ठोस सुधार या समाधान करने को तैयार नजर नहीं आ रही है। अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो POK में तनाव और बढ़ सकता है।

कंधा टूटा, सिर में चोट आई और हड्डियों में भी फ्रैक्चर: मुंबई में आवारा कुत्ता भगाने पर भोलानाथ को अहमद शेख और साथियों ने किया घायल, पढ़ें- FIR में क्या लिखा है

मुंबई के घाटकोपर में मंगलवार (16 दिसंबर 2025) की देर रात घर लौट रहे एक शख्स और उसके रिश्तेदारों पर जानलेवा हमला हो गया। हैरानी की बात यह है कि विवाद सिर्फ एक भौंकते हुए आवारा कुत्ते को भगाने को लेकर शुरू हुआ था। इस हमले में शालिग्राम भोलानाथ यादव नाम के शख्स का कँधा टूट गया है और सिर में गंभीर चोटें आई हैं, जिसके लिए उन्हें टांके लगवाने पड़े।

पंतनगर पुलिस स्टेशन की सीमा में हुए इस हमले को इलाके के ही तीन लोगों ने अंजाम दिया। इस मामले में दर्ज की गई FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

उस रात आखिर हुआ क्या था?

यह पूरी घटना मंगलवार (16 दिसंबर 2025) की रात (तड़के) करीब 2:30 बजे की है। मुंबई के घाटकोपर ईस्ट स्थित रमाबाई कॉलोनी के श्रावस्ती बुद्ध विहार के पास यह सब हुआ। शिकायतकर्ता शालिग्राम यादव अपना काम खत्म करने और खाना खाने के बाद अपने भतीजे आकाश यादव और एक रिश्तेदार राजन यादव के साथ पैदल घर लौट रहे थे।

यादव के मुताबिक, रास्ते में उनका भतीजा आकाश बाथरूम जाने के लिए रुका, तभी वहाँ मौजूद एक आवारा कुत्ता उस पर जोर-जोर से भौंकने लगा। कुत्ते को डराकर भगाने के लिए आकाश ने अपनी चप्पल उठाई, हालाँकि उसने कुत्ते को मारा नहीं था। पास ही अलाव (आग) ताप रहे तीन लोगों ने इस पर ऐतराज जताया और आकाश पर कुत्ते को मारने का आरोप लगाते हुए झगड़ा शुरू कर दिया।

उन तीनों ने समझाने की कोशिश की कि उन्होंने कुत्ते को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है और वे शांति से वहाँ से आगे बढ़ गए। लेकिन आरोप है कि उन तीन लोगों ने पीछा करके उन्हें बीच रास्ते में रोक लिया और उनके साथ बुरी तरह मारपीट की।

क्या कहती है FIR?

ऑपइंडिया ने इस मामले में शालिग्राम भोलानाथ यादव की शिकायत पर पंतनगर पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई FIR की कॉपी हासिल की है। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं 115(2), 118(1), 118(2), 3(5) और 352 (जैसे मारपीट और चोट पहुँचाना) के तहत दर्ज किया गया है।

स्रोत: महाराष्ट्र पुलिस

FIR के मुताबिक, हमला करने वाले तीनों आरोपितों की पहचान इमरान अहमद शेख, संपत भागीरथ सुतार और ऋतिक संजय चंद्रमोरे के रूप में हुई है। ये तीनों रमाबाई कॉलोनी के ही रहने वाले हैं। शिकायतकर्ता शालिग्राम ने बताया कि सबसे पहले ऋतिक ने उनके सिर पर लकड़ी के फट्टे से वार किया, जिससे खून बहने लगा। इसके बाद इमरान ने उसी फट्टे से उनके बाएँ कंधे, पैर और पीठ पर ताबड़तोड़ हमला किया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं।

स्रोत: महाराष्ट्र पुलिस

यही नहीं, तीसरे आरोपित संपत ने आकाश और राजन के साथ लात-घूंसों से मारपीट की। वारदात को अंजाम देने के बाद तीनों आरोपित मौके से भाग निकले। घायल शालिग्राम को इलाज के लिए राजावाड़ी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने बताया कि उनके बाएँ कंधे में फ्रैक्चर (हड्डी टूट गई) है और सिर के घाव भरने के लिए कई टाँके लगाने पड़े हैं।

स्रोत: महाराष्ट्र पुलिस

हमले के बाद डर और असुरक्षा का माहौल

अपने बयान में शालिग्राम यादव ने बताया कि वे इस इलाके में पिछले 25 साल से रह रहे हैं, लेकिन आज से पहले उनके साथ कभी ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर गहरा डर जताया है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अब मोहल्ले के लोगों को खुद को बचाने का भी हक नहीं है, खासकर तब जब कोई आवारा कुत्ता उन पर हमला करने की कोशिश करे?

फिलहाल, पुलिस इस मामले की आगे की जाँच कर रही है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

कोर्ट की फीस भरो, फिर डालो जितने मर्जी केस: वक्फ बोर्ड को गुजरात HC ने दिया झटका, 150 अर्जी खारिज करके जानिए क्या दिया फैसला

गुजरात हाई कोर्ट ने वक्फ बोर्ड को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि वक्फ बोर्ड अब अदालत के शुल्क का भुगतान किए बिना मामले दायर नहीं कर सकते हैं। एक हफ्ते तल चली सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने वक्फ निकायों द्वारा दायर लगभग 150 याचिकाओं को खारिज कर दिया।

यह फैसला गुजरात के इतिहास में वक्फ मामलों की सबसे बड़ी सामूहिक अस्वीकृतियों में से एक है और इस लंबे समय से चली आ रही धारणा का अंत करता है कि कोर्ट और ट्रिब्युनलों में अपील करते समय वक्फों को विशेष छूट प्राप्त थी, जबकि दूसरी ओर मंदिरों और अन्य धार्मिक संस्थानों के कोर्ट फीस देते थे।

वक्फ की 150 याचिकाओं को किया खारिज

गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस जेसी दोशी ने यह फैसला वक्फ बोर्ड की ओर 150 याचिकाओं को खारिज कर सुनाया है। इन याचिकाओं में किराएदारों या कथित अतिक्रमणकारियों से वक्फ संपत्तियों का कब्जा वापस लेने और उससे जुड़े अन्य लाभ (जैसे मुनाफा) की माँग की गई थी।

याचिकाकर्ताओं में सुन्नी मुस्लिम ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट, वडोदरा सहेर मस्जिद सभा ट्रस्ट और अहमदाबाद की सरखेज रोजा कमेटी जैसे वक्फ ट्रस्टों ने गुजरात राज्य वक्फ ट्रिब्युनल के आदेशों को चुनौती दी थी। इन आदेशों में कहा गया था कि किसी भी विवाद की सुनवाई से पहले अदालत शुल्क (कोर्ट फीस) जमा करना जरूरी है।

हाई कोर्ट ने कहा कि वक्फ ट्रस्टों ने ट्रिब्युनल के सामने ऐसी राहते माँगी थीं, जिनमें दोनों पक्षों के बीच विवाद था और जिनका फैसला करने के लिए उनके अधिकारों और जिम्मेदारियों का कानूनी तौर पर निर्धारण करना जरूरी थी। इसलिए ये मामले साधारण आवेदन नहीं, बल्कि पूरे विवाद वाले मुकदमे की तरह थे।

कोर्ट ने साफ कहा कि वक्फ अधिनियम की धारा 83 के तहत दायर आवेदन न्यायिक कार्यवाही होते हैं। ये मुकदमे का रूप लेते हैं, इसलिए इन पर गुजरात न्यायालय शुल्क अधिनियम, 2004 लागू होता है। इस कारण कोर्ट फीस देना अनिवार्य है।

हाई कोर्ट का वक्फ ट्रिब्युनल आदेशों में दखल से इनकार

गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि वक्फ ट्रिब्युनल ने जो पहला आदेश दिया था, उसमें मुकदमे की कीमत (Valuation) को अदालत शुल्क और क्षेत्राधिकार के हिसाब से ठीक करने का निर्देश दिया गया था। इस आदेश को वक्फ संस्थानों ने किसी भी उच्च अदालत में समय पर चुनौती नहीं दी। बाद में जब कोर्ट ने अदालत शुल्क न देने के कारण वाद (Plaint) खारिज कर दिया, तब इस पर आपत्ति उठाई गई।

हाई कोर्ट ने कहा कि जब पहले आदेश को सही समय पर चुनौती ही नहीं दी गई, तो अब दूसरे आदेश को केवल इस आधार पर गलत नहीं ठहराया जा सकता कि पर्याप्त कोर्ट फीस नहीं दी गई थी। कोर्ट ने साफ कहा कि उसे निचली अदालत के आदेशों में कोई गंभीर कानूनी गलती, अधिकार क्षेत्र से जुड़ी कमी या कानून की गलती नजर नहीं आती, जिसकी वजह से दोबारा हस्तक्षेप किया जाए। इसी आधार पर अदालत ने सभी याचिकाएँ खारिज कर दीं।

फीस जरूरी, केवल ‘आवेदन’ कहने से नियम नहीं बदलते: कोर्ट

हालाँकि, वक्फ संस्थानों की ओर से वकील ने यह दलील दी कि वक्फ अधिनियम में अदालत शुल्क देने को लेकर कोई साफ प्रावधान नहीं है, इसके तहत दायर किसी भी आवेदन पर कोर्ट फीस नहीं देनी होती। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि गुजरात न्यायालय शुल्क अधिनियम, 2004 की धारा 1(5) साफ बताती है कि राज्य के सभी न्यायालयों और सार्वजनिक कार्यालयों में लगने वाली फीस इसी कानून के तहत तय होगी, जब तक किसी खास कानून में अलग से कोर्ट फीस को लेकर प्रावधान न किया गया हो।

कोर्ट ने यह भी कहा कि गुजरात न्यायालय शुल्क अधिनियम की धारा 4 के अनुसार, जब तक तय कोर्ट फीस जमा नहीं की जाती, तब तक किसी भी अदालत में कोई दस्तावेज दाखिल, प्रदर्शित या रिकॉर्ड नहीं किया जा सकता और न ही कोई सार्वजनिक कार्यालय उन दस्तावेजों को स्वीकार कर सकता है।

हाई कोर्ट ने आगे बताया कि वक्फ ट्रिब्युनल को सिविल कोर्ट का दर्जा दिया गया है और उसे मुकदमे की सुनवाई, डिक्री या आदेश लागू करने के लिए सिविल कोर्ट जैसी सभी शक्तियाँ मिली हुई हैं। ऐसे में सिर्फ यह कह देना कि मामला ‘आवेदन’ के रूप में दायर हुआ है, उसे मुकदमे से अलग नहीं बनाता। जब तक उस आवेदन के जरिए पक्षों के अधिकारों और जिम्मेदारियों का फैसला माँगा जा रहा है, तो वह असल में मुकदमा जैसा ही माना जाएगा।

इसी कारण कोर्ट ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि वक्फ अधिनियम की धारा 83 के तहत होने वाली सभी कार्यवाहियों पर कोर्ट फीस बिल्कुल लागू नहीं होगी।

वक्फ मामलों में दशकों पुरानी गलतफहमी पर लगा विराम

पहले कुछ कानूनी प्रावधानों के तहत वक्फ संस्थानों को कोर्ट फीस से छूट मिलती थी। लेकिन अब यह छूट खत्म मानी जाएगी। गुजरात हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मुस्लिम वक्फ ट्रस्टों को भी अन्य धार्मिक ट्रस्टों और चैरिटेबल संस्थाओं की तरह ही अदालत में मामला लड़ने के लिए तय कोर्ट फीस चुकानी होगी।

कई दशकों से छोटे दरगाह प्रबंधनों से लेकर बड़े मस्जिद बोर्डों तक यह मान्यता बनी हुई थी कि वक्फ से जुड़े विवादों पर कोर्ट फीस नहीं लगती, क्योंकि पुराने वक्फ कानून में कोर्ट फीस को लेकर कोई साफ उल्लेख नहीं था। लेकिन अब कोर्ट ने इस गलतफहमी को दूर कर दिया है।

देशभर में वक्फ बोर्ड पर बहस के बीच हाई कोर्ट का फैसला

यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब देशभर में वक्फ प्रशासन को लेकर चर्चा चल रही है। इस साल की शुरुआत में संसद ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 पास किया था, जिसका उद्देश्य वक्फ की जमीन और संपत्तियों के प्रबंधन को ज्यादा आधुनिक और व्यवस्थित बनाना है। इस कानून को लेकर जहाँ कुछ लोगों ने सराहना की है, वहीं कुछ ने इसकी आलोचना भी की है।

फैसले के समर्थकों का कहना है कि नए बदलावों से कामकाज में पारदर्शिता आएगी और वक्फ संस्थानों का प्रशासन मजबूत होगा। वहीं सरकारी सूत्रों का मानना है कि हाई कोर्ट का यह आदेश कानून के सामने सभी को समान मानने की दिशा में एक अहम कदम है और इससे अदालतों की प्रक्रिया में चली आ रही पुरानी असमानता भी खत्म होगी।

गुजरात डिप्टी सीएम ने कोर्ट के फैसले को बताया ‘ऐतिहासिक’

गुजरात के डिप्टी सीएम हर्ष रमेश संघवी हाई कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक करार दिया है। डिप्टी सीएम ने कहा कि भारत में सभी धर्म एक समान हैं और कोर्ट ने सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों को सुनिश्चित किया है।

डिप्टी सीएम हर्ष संघवी ने कहा, “वक्फ कानून, जिसे कॉन्ग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति के जरिए राजनीतिक लाभ के लिए पेश किया था। उसमें ऐसे प्रावधान थे जो वक्फ संपत्तियों और ट्रिब्युनल मामलों को कोर्ट फीस से छूट देते थे। वहीं मंदिरों, गुरुद्वारों और अन्य धार्मिक संस्थानों से संबंधित संपत्ति और ट्रिब्युनल मामलों पर कोर्ट फीस लगाया जाता था।”

मुस्लिम मुल्क में महादेव की आस्था: मस्कट के उस 125 साल पुराने शिव मंदिर की गाथा जिसे गुजराती व्यापारियों ने बनाया, जानिए क्या है इसके चमत्कारी कुएँ का रहस्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सफल इथियोपिया यात्रा के बाद ओमान की राजधानी मस्कट पहुँचे। इथियोपिया में रणनीतिक साझेदारी को नए आयाम देने के बाद, ओमान में उनका स्वागत किसी उत्सव से कम नहीं रहा। हाथों में तिरंगा लिए और ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाते हुए लोगों का हुजूम सड़कों पर उतरा।

ओमान की राजधानी मस्कट में एक ऐतिहासिक शिव मंदिर है, जिसकी चर्चा पहले भी हो चुकी है। यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि अरब जगत में भारतीय विरासत की मजबूती का गवाह भी है।

125 साल पुराना इतिहास: गुजरात से ओमान तक का सफर

मस्कट के मुत्तरा क्षेत्र में स्थित ‘मोतीश्वर महादेव मंदिर’ खाड़ी क्षेत्र (गल्फ) के सबसे पुराने हिंदू मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर की नींव आज से करीब 125 साल पहले 1900 के आसपास रखी गई थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, गुजरात के कच्छ इलाके के ‘भाटिया’ व्यापारिक समुदाय के लोग 1500 के दशक में ही व्यापार के सिलसिले में ओमान में बसने लगे थे। इन्हीं व्यापारियों ने अपनी आस्था को जीवित रखने के लिए इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।

समय के साथ यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि ओमान में रह रहे भारतीय समुदाय का सबसे बड़ा संगम स्थल बन गया। 19वीं सदी में गुजराती व्यापारियों का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि उनके सुल्तानों के साथ बेहद मधुर संबंध थे। इसी सौहार्द की विरासत को आगे बढ़ाते हुए 1999 में इस मंदिर का भव्य नवीनीकरण किया गया, जो आज अपनी पूरी आभा के साथ मस्कट के ‘अल आलम पैलेस’ के समीप स्थित है।

रेगिस्तान में चमत्कार: मंदिर के कुएँ का रहस्य

ओमान एक रेगिस्तानी देश है जहाँ बारिश बहुत कम होती है और पानी की किल्लत एक सामान्य बात है। लेकिन मोतीश्वर शिव मंदिर के साथ एक ऐसी मान्यता जुड़ी है जिसे भक्त महादेव का चमत्कार मानते हैं। मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुआँ स्थित है, जो भीषण गर्मी और सूखे के बावजूद कभी खाली नहीं होता। रेगिस्तानी इलाका होने के बावजूद इस कुएँ में साल भर पर्याप्त जल रहता है।

स्थानीय लोग और श्रद्धालु इस कुएँ को बेहद पवित्र और चमत्कारी मानते हैं, क्योंकि इसके आसपास कहीं और पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नजर नहीं आता। महाशिवरात्रि जैसे बड़े त्योहारों पर जब 20 हजार से भी अधिक श्रद्धालु यहाँ एकत्रित होते हैं, तब भी यह कुआँ अपनी शीतलता से मंदिर की जीवंतता को बनाए रखता है। यह कुआँ भक्तों की आस्था को और अधिक दृढ़ बनाता है।

तीन देवताओं का वास: मंदिर की आध्यात्मिक संरचना

मोतीश्वर मंदिर परिसर में केवल एक नहीं, बल्कि तीन प्रमुख देवताओं के मंदिर स्थापित हैं। यहाँ ‘श्री आदि मोतीश्वर महादेव’, ‘श्री मोतीश्वर महादेव’ और ‘श्री हनुमान जी’ के अलग-अलग मंदिर हैं। मंदिर का संचालन पूरी तरह व्यवस्थित है, जहाँ मुख्य पुजारियों के साथ-साथ भारी संख्या में स्वयंसेवक अपनी सेवाएँ देते हैं। यह मंदिर खाड़ी देशों में सनातन धर्म की परंपराओं को अक्षुण्ण रखे हुए है।

यहाँ केवल शिवरात्रि ही नहीं, बल्कि वसंत पंचमी, रामनवमी, हनुमान जयंती और गणेश चतुर्थी जैसे त्योहार भी उसी उत्साह के साथ मनाए जाते हैं जैसे भारत में। मंदिर प्रशासन और ओमान सरकार के बीच का समन्वय यह दर्शाता है कि एक मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद ओमान ने भारतीय संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता को कितना सम्मान दिया है।

अमरीन ने हुस्न को हथियार बना हिंदू व्यापारी को वीडियो कॉल पर फँसाया, ब्लैकमेल कर ऐठें लाखों: मेरठ पुलिस ने गिरोह को बेनकाब कर 4 पकड़े, पढ़ें FIR की डिटेल्स

उत्तर प्रदेश के मेरठ में पुलिस ने हनीट्रैप के जरिए ब्लैकमेलिंग और रंगदारी वसूली करने वाले एक संगठित गिरोह का खुलासा किया है। लिसाड़ी गेट थाना पुलिस ने इस मामले में अमरीन समेत दो महिलाओं और 2 अन्य आरोपितों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि इस गिरोह ने एक कपड़ा व्यापारी अरुण को अश्लील वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उससे बड़ी रकम वसूली है।

प्रहलाद नगर निवासी अरुण द्वारा 14 दिसंबर 2025 को दर्ज कराई गई FIR में इस पूरे घटनाक्रम का सिलसिलेवार वर्णन किया गया है। अरुण ने FIR में अमरीन, शमीना, अतीक और आफताब को नामजद किया था जबकि एक अन्य आरोपित अज्ञात था। अरुण के साथ यह घटना 13 दिसंबर 2025 को हुई थी।

अरुण से रकम वसूलने से पहले अमरीन ने अरुण को वीडियो कॉल पर अपने जाल में फँसा लिया था। बातचीत के बहाने वह लगातार वीडियो कॉल पर जुड़ती रही और इसी दौरान अमरीन ने दोनों के बीच हुए अतरंग पलों को चुपचाप रिकॉर्ड कर लिया था।

कैसे अमरीन ने अरुण को फँसाया?

पीड़ित अरुण ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में बताया है कि करीब 3-4 दिन पहले उनके मोबाइल फोन पर एक अज्ञात नंबर से कॉल आई। कॉल करने वाली युवती ने अपना नाम अमरीन बताया और बातचीत शुरू की। इसके बाद उसने वीडियो कॉल पर बात करनी शुरू कर दी और उसी दौरान वीडियो कॉल के स्क्रीनशॉट ले लिए।

13 दिसंबर 2025 को युवती ने यह कहकर अरुण को अपने घर बुलाया कि घर पर कोई नहीं है। शाम करीब 5:30 बजे अरुण बताए गए पते पर पहुँचा हैदर पब्लिक स्कूल वाली गली में स्थित है। जैसे ही वह घर के अंदर गए, वहाँ अमरीन की अम्मी शमीना, उसका चाचा अतीक, एक व्यक्ति आफताब (जिसे मुल्ला बताया गया) और एक अन्य व्यक्ति भी पहुँच गए।

FIR के मुताबिक, आरोपितों ने अरुण का वीडियो बनाना शुरू कर दिया और फोटो व वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उसे डराया। पीड़ित का आरोप है कि इन लोगों ने उन्हें झूठे मुकदमे में फँसाकर जेल भिजवाने की धमकी दी और 5 लाख रुपए की रंगदारी माँगी। डर के कारण अरुण ने अपनी 10 ग्राम की सोने की चेन और 7,500 रुपए उन्हें दे दिए। इसके बावजूद आरोपितों ने एक लाख रुपए और देने की माँग की। ना देने पर फोटो-वीडियो वायरल करने की धमकी दी।

FIR का एक हिस्सा

FIR के मुताबिक, अरुण ने दोस्तों और घर से पैसे जुटाकर उसी शाम करीब 7:30 बजे आरोपितों को उनके घर जाकर एक लाख रुपए नकद दे दिए। इसके बाद भी उत्पीड़न नहीं रुका। आरोप है कि अगली सुबह अमरीन के चाचा अतीक ने एक अन्य मोबाइल नंबर से कॉल कर 50 हजार रुपए और माँगने शुरू कर दिए तथा रकम न देने पर जान से मरवाने की धमकी दी। लगातार मिल रही धमकियों से डरे पीड़ित ने लिसाड़ीगेट थाने पहुंचकर पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई है।

पुलिस ने आरोपितों को किया गिरफ्तार

मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने तत्काल हस्तक्षेप करते हुए संबंधित थाने की टीम को त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए। निर्देश मिलते ही पुलिस ने योजनाबद्ध ढंग से कार्रवाई करते हुए विकासपुरी बिजली घर के पास से चारों नामजद आरोपितों अतीक, आफताब, शमीना और अमरीन को दबोच लिया।

पुलिस जाँच के दौरान पीड़ित द्वारा लगाए गए सभी आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए गए जिसके बाद चारों को गिरफ्तार कर लिया गया। तलाशी के दौरान आरोपियों के कब्जे से 35 हजार रुपये नकद, एक सोने की चेन और चार मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं, जिनका उपयोग कथित तौर पर पीड़ित को फँसाने, वीडियो बनाने और धमकाने में किया गया था।

जाँच में यह भी खुलासा हुआ है कि आरोपित किसी एक घटना को नहीं बल्कि संगठित गिरोह के रूप में इस तरह की वारदातों को अंजाम दे रहे थे और ब्लैकमेलिंग के जरिए लोगों से मोटी रकम वसूलते थे। पुलिस अब गिरोह के अन्य संभावित सदस्यों और पूर्व मामलों की भी पड़ताल कर रही है। फिलहाल सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।

वेनेजुएला पर अमेरिकी घेराबंदी, नार्को की आड़ में तेल का बड़ा खेल: समझें- भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा कितना असर

दुनिया की सबसे बड़ी तेल संपदा वाले देशों में से एक वेनेजुएला फिर से अमेरिकी निशाने पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 दिसंबर 2025 को एक बड़ा ऐलान किया कि सभी सैंक्शंस वाले तेल टैंकरों पर ‘संपूर्ण ब्लॉकेड‘। इसका मतलब साफ है कि वेनेजुएला में तेल लेने या बेचने वाले जहाजों को रोक देना।

डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के शासन को ‘फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन’ करार दिया। इन सबके लिए ट्रंप ने बहाना बनाया है नार्को-टेररिज्म, ड्रग्स और ह्यूमन ट्रैफिकिंग को। लेकिन सच्चाई क्या है, वो कम ही लोग समझ पा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ये सब तेल के खेल की आड़ है। वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं। ये भंडार करीब 303 अरब बैरल के हैं। वहीं, अमेरिका की पुरानी रिफाइनरियाँ इसी हेवी क्रूड ऑयल के संशोधन के लिए बनी थी, जो फिलहाल ठप हैं। ऐसे में ट्रंप का असली मकसद मादुरो को हटाकर तेल पर कंट्रोल हासिल करना लगता है, ताकि वो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गति दे सकें।

हालाँकि अमेरिका की यह घेराबंदी सिर्फ वेनेजुएला को नहीं, पूरी दुनिया को हिला सकती है। सप्लाई चेन के बाधित होने से तेल कीमतें बढ़ेंगी। खासकर भारत जैसे आयातक देशों पर असर पड़ेगा। भारत 85% तेल बाहर से लाता है। वेनेजुएला से सस्ता हेवी क्रूड मिलना बंद होने से डीजल महँगा होगा, ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ेगी, महँगाई चढ़ेगी।

बता दें कि ट्रंप ने मार्च 2025 में वेनेजुएला तेल खरीदने वाले देशों पर 25% टैरिफ भी लगा दिया था। जिससे भारत की रिलायंस जैसी कंपनियों ने वेनेजुएलन तेल से तौबा कर लिया था। कुछ ऐसा ही हाल ट्रंप ने रूसी तेल को लेकर किया है, ऐसे में भारतीय कंपनियों को नुकसान ही नुकसान होता दिख रहा है।

वैसे, ट्रंप ने वेनेजुएला की घेरेबंदी का बहाना जिन ड्रग्स को बताया है, वो आँकड़ों पर तो कहीं टिकता ही नहीं दिखता, क्योंकि वेनेजुएला ड्रग्स का ट्रांजिट पॉइंट तो है, लेकिन US तक पहुँचने वाले कोकीन का सिर्फ 5-8% हिस्सा ही होकर यहाँ से गुजरता है। जबकि ड्रग्स के अमेरिका में पहुँचने का मुख्य जमीनी रास्ता मैक्सिको है।

बहरहाल, इन सारी चर्चाओं के बीच आइए समझते हैं, तेल के उस खेल को, जिसके लिए डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को एक और जंग में ढकेलने के लिए तैयार खड़े दिख रहे हैं।

वेनेजुएला का तेल खजाना: दुनिया का सबसे बड़ा, लेकिन उत्पादन क्यों गिरा?

वेनेजुएला को ‘तेल का सौदा’ कहते हैं। यहाँ दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं- 303.3 अरब बैरल। यह सऊदी अरब (297 अरब) से भी ज्यादा है। ज्यादातर तेल ओरिनोको बेल्ट में है, जो एक्स्ट्रा-हेवी क्रूड से भरा है। यह तेल गाढ़ा, चिपचिपा और सल्फर युक्त होता है। इसे निकालना मुश्किल और महँगा है। लेकिन इसकी माँग भी ज्यादा होती है, क्योंकि इस भारी तेल को रिफाइन करने पर इससे डीजल, एस्फाल्ट और हेवी इंडस्ट्री के फ्यूल बनते हैं। भंडारों के हिसाब से वेनेजुएला और रूस दुनिया के करीब 67% हेवी ग्रेड के तेल का भंडार रखते हैं।

अब वेनेजुएला के तेल उत्पादन की बात करें तो उत्पादन के मामले में वेनेजुएला की हालत खराब है। साल 2000 में 3.2 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) तेल का उत्पादन करने वाला वेनेजुएला नवंबर 2025 में सिर्फ 860,000 bpd तेल ही निकाल पाया था। ऐसा इसलिए, क्योंकि ह्यूगो चावेज और मादुरो के शासन में PDVSA (स्टेट ऑयल कंपनी) का बुरा हाल हो गया था।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, वेनेजुएला का अक्टूबर में 1.01 मिलियन bpd था, लेकिन गिरावट जारी है। अगर सैंक्शंस हट जाएँ तो 1-2 साल में तेल का उत्पादन 2 मिलियन bpd तक पहुँच सकता है। लेकिन ट्रंप की नई घेराबंदी से फिलहाल ये गिरावट की ओर ही जा रही है।

अमेरिकी रिफाइनरियाँ वेनेजुएला के तेल पर ही बनीं, अब क्यों परेशान?

अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है, लेकिन आयात भी खूब करता है। अमेरिका की गल्फ कोस्ट की रिफाइनरियाँ जिनकी अमेरिकी क्षमता की कुल 40% तक कैपेसिटी है, वो हेवी क्रूड के लिए डिजाइन की गईं थी। ये रिफायनरियाँ 1970-80 के दशक में मैक्सिको, कनाडा और वेनेजुएला के हेवी तेल के हिसाब से बनीं थी। खासकर वेनेजुएला का मेरेय ब्लेंड (सुपर-हेवी) के लिए ये परफेक्ट फिट हैं। लेकिन वेनेजुएला से तेल के इंपोर्ट पर रोक लगने की वजह से ये फैक्ट्रियाँ लगभग ठप हैं। अभी ये कुल 15-17% ही उत्पादन कर पा रही हैं।

अब डोनाल्ड ट्रंप की ब्लॉकेड से US को भी नुकसान होना तय है। हेवी क्रूड की कमी से डीजल प्राइस बढ़ेंगे। रिफाइनरियाँ लाइट क्रूड (शेल ऑयल) पर कम प्रॉफिट कमाती हैं। EIA के मुताबिक, US ने 2001 में 1.3 मिलियन bpd वेनेजुएला से लिया, अब 100,000 से कम। कनाडा से ज्यादा आयात होगा, लेकिन पाइपलाइन लिमिट्स हैं। विशेषज्ञ कहते हैं, US ‘स्टक’ है, एनवायरनमेंटल रेगुलेशंस से नई रिफाइनरियाँ नहीं बनीं। ऐसे में ट्रंप तेल तो चाहते हैं, लेकिन बहाने से।

ट्रंप के बहाने नार्को-टेररिज्म में वेनेजुएला का रोल कितना बड़ा?

ट्रंप का मुख्य आरोप है: मादुरो नार्को-टेररिस्ट हैं, वो कार्टेल डे लॉस सोल्स चला रहे रहे हैं। US ने इसे टेररिस्ट ग्रुप घोषित कर दिया है। UNODC के मुताबिक, US-बाउंड कोकीन का सिर्फ 5% वेनेजुएला रूट से आता है, जबकि 80% ईस्टर्न पैसिफिक (कोलंबिया-इक्वाडोर) से और मैक्सिको के रास्ते आता है। वहीं, फैंटेनिल चीन से मैक्सिको के रास्ते अमेरिका में जाता है।

सैंक्शंस के नीचे तेल का काला बाजार, कैसे व्यापार करता है वेनेजुएला?

यहाँ ये समझना अहम है कि अमेरिका ने वेनेजुएला को साल 2017 से ज्यादा ही टारगेट पर रखा है। सरकारी कंपनी PDVSA पर इसी साल बैन लगाया गया था, तो अमेरिकी लोगों के वेनेजुएला से कारोबार पर साल 2019 में रोक लगा दी गई। हालाँकि वेनेजुएला उनकी कोशिशों से रुका नहीं, बल्कि शैडो फ्लीट्स के जरिए अपना कारोबार करता रहा। लेकिन पूरी नाकाबंदी से इस पर काफी हद तक लगाम लग जाएगी। वेनेजुएला न तो कच्चा तेल अवैध तरीके से बाहर भेज सकेगा और न ही रूक से नेफ्था जैसे उत्पाद खरीद सकेगा, जो रिफायनिंग के लिए बेहद जरूरी उत्पाद है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर छाएगा संकट

वैसे तो दुनिया भर में तेल सप्लाई में वेनेजुएला का हिस्सा महज 1% ही है, लेकिन वो अधिकतर हेवी क्रूड का उत्पादन करता है। हैवी क्रूड की कमी से इसे बाय-प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ेंगी। हवाई जहाजों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की सप्लाई में दिक्कत आएगी, तो मिडल डिस्टिलेट (डीजल) का मार्केट भी टाइट हो जाएगा। रूस-ईरान पर बैन की वजह से दुनिया पहले से ही परेशान है और अब वेनेजुएला की घेरेबंदी इस वैश्विक समस्या को और ज्यादा बढ़ा देगी।

भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा वार

भारत तीसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार है। साल 2023-24 में भारत ने वेनेजुएला से 254,000 bpd लिया था। मुख्य रूप से रिलायंस और नायरा एनर्जी वेनेजुएलन तेल को प्रोसेस करते हैं। लेकिन ट्रंप के 25% टैरिफ से फरवरी 2025 में ये खरीदी 93,000 bpd तक गिर गई थी। इसकी सप्लाई रूस से बढ़ी थी, लेकिन रूस पर भी बैन के चलते अब दिक्कतें अपना असली असर दिखाएँगी

इस वजह से भारत में डीजल 10-15 प्रतिशत महँगा हो सकता है। इसकी वजह से ट्रांसपोर्ट और कृषि क्षेत्र पर भी व्यापक असर पड़ सकता है। नतीजे जीडीपी पर नकारात्मक असर के तौर पर दिख सकते हैं। यही नहीं, भारत में महँगाई भी 6-7 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।

तेल का खेल कब होगा खत्म?

अमेरिका द्वारा वेनेजुएला की घेरेबंदी तेल के लालच में है। वैश्विक सप्लाई चेन से उन्हें कोई मतलब नहीं दिखता। वो सिर्फ अमेरिका की जेब भरना चाहते हैं और वेनेजुएलन तेल भंडारों पर कब्जे की नीयत बनाए बैठे हैं। ऐसे में ग्लोबल साउथ को एकजुट होकर अमेरिकी प्रेशर के मुकाबले के लिए तैयार होना पड़ेगा, क्योंकि वेनेजुएला पर संकट आएगा तो नुकसान ग्लोबल साउथ को ज्यादा होगा।

जवाहरलाल नेहरू के 51 बक्से पेपर्स को लेकर फिर हुआ विवाद, कॉन्ग्रेस ने की झूठ फैलाने की कोशिश तो सरकार ने खोली पोल: जानें सोनिया गाँधी के पास मौजूद इन दस्तावेजों में दफन है क्या राज?

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ’51 बक्से पत्रों’ को लेकर एक बार फिर राजनीति गर्मा गई है। सोनिया गाँधी के पास मौजूद नेहरू-एडविना समेत कई हस्तियों के पत्रों के कॉन्टेंट को लेकर अक्सर चर्चा होती है। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) लंबे वक्त से इन पत्रों को माँग रहा है लेकिन कॉन्ग्रेस इनकी मौजूदगी से इनकार करती रही है। अब कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में नेहरू के पत्रों से जुड़े सरकार के एक जवाब के बाद खुद की ‘जीत’ की डुगडुगी बजाकर बीजेपी पर आरोप लगा दिया। लेकिन कॉन्ग्रेस की यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी और केंद्र सरकार ने सारा सच सामने रखते हुए कॉन्ग्रेस की खुशी पर पानी फेर दिया। अब इस मामले को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

कैसे शुरु हुआ विवाद?

हालिया विवाद की शुरुआत हुई 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में बीजेपी सांसद संबित पात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल से। संबित ने संस्कृति मंत्रालय से पूछा कि ‘क्या वर्ष 2025 में पीएमएमएल के वार्षिक निरीक्षण के दौरान भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कतिपय दस्तावेज संग्रहालय से गायब पाए गए हैं। इसके जबाव में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि ‘निरीक्षण के दौरान संग्रहालय से जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कोई दस्तावेज गायब नहीं पाया गया है’।

कॉन्ग्रेस का ‘मनगढ़ंत’ नैरेटिव: ‘गायब’ शब्द के सहारे बचने की कोशिश

कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दिए गए एक लिखित उत्तर को अपनी ढाल बनाया है। बस, इसी एक शब्द ‘गायब’ को पकड़कर कॉन्ग्रेस ने ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया कि भाजपा का प्रोपेगेंडा धराशायी हो गया।

कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने X पर (ट्वीट) पोस्ट कर पूछा, “कल आखिरकार लोकसभा में सच्चाई सामने आ ही गई। क्या अब माफी माँगी जाएगी?”

संस्कृति मंत्रालय का ‘पोस्ट वार’: कॉन्ग्रेस को दिखाया आईना

कॉन्ग्रेस के शोर के बीच संस्कृति मंत्रालय ने सिलसिलेवार पोस्ट के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। मंत्रालय ने बताया कि 29 अप्रैल 2008 को सोनिया गाँधी के प्रतिनिधि एमवी राजन ने बकायदा पत्र लिखकर माँग की थी कि सोनिया गाँधी पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सभी निजी पारिवारिक पत्र और नोट्स वापस लेना चाहती हैं।

इसके बाद, 5 मई 2008 को 51 कार्टन (बक्से) भरकर नेहरू पेपर्स सोनिया गाँधी के आवास पर भेज दिए गए थे। मंत्रालय ने यह भी लिखा कि PMML पेपर्स को वापस पाने के लिए सोनिया गाँधी के ऑफिस के साथ लगातार संपर्क में है।

मंत्रालय ने दो तारीख ’28 जनवरी 2025 और 3 जुलाई 2025′ को बताते हुए लिखा कि नेहरू पेपर्स PMML से ‘गायब’ नहीं हैं क्योंकि उनकी लोकेशन (whereabouts) का पता है- वे सोनिया गाँधी के पास हैं।

मंत्रालय का सबसे कड़ा प्रहार यह था कि ये दस्तावेज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री से संबंधित हैं और राष्ट्र की ‘दस्तावेजी विरासत’ हैं, न कि किसी की ‘निजी संपत्ति’ (Private Property)। इनका PMML की कस्टडी में होना और नागरिकों एवं विद्वानों के लिए उपलब्ध होना शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इन 51 बक्सों में आखिर क्या है?

विवाद की सबसे बड़ी जड़ वे दस्तावेज हैं जो इन 51 बक्सों के भीतर कैद हैं। PMML के रिकॉर्ड बताते हैं कि इन कागजातों में नेहरू जी द्वारा विभिन्न महान हस्तियों को लिखे गए पत्र और नोट्स शामिल हैं। संबित पात्रा ने ट्वीट कर पूछा कि आखिर एडविना माउंटबेटन को लिखे गए उन पत्रों में ऐसा क्या है जिसे ‘सेंसर’ करने की जरूरत पड़ गई? एडविना के अलावा, इन बक्सों में जयप्रकाश नारायण, अल्बर्ट आइंस्टीन, अरुणा आसफ अली, विजयलक्ष्मी पंडित और बाबू जगजीवन राम के साथ हुए पत्राचार भी शामिल हैं।

इतिहासकारों का मानना है कि इन पत्रों में देश के विभाजन, तत्कालीन कूटनीति और नेहरू के व्यक्तिगत विचारों के ऐसे पहलू हो सकते हैं जो कॉन्ग्रेस के बनाए ‘महिमा मंडित’ इतिहास को चुनौती दे सकें। अहमदाबाद के इतिहासकार रिजवान कादरी ने पत्र लिखकर इन पत्रों तक पहुँच माँगी। उनका कहना है कि गाँधी जी और पटेल के रिकॉर्ड तो व्यवस्थित हैं, लेकिन नेहरू के रिकॉर्ड का एक बड़ा हिस्सा (जो सोनिया गाँधी के पास है) शोध के लिए उपलब्ध नहीं है। क्या कॉन्ग्रेस डरती है कि अगर ये 51 बक्से सार्वजनिक हुए, तो नेहरू की वह छवि धूमिल हो जाएगी जो दशकों से पेश की जाती रही है?

पहले भी हुआ है विवाद: क्या इतिहास पर किसी एक परिवार का एकाधिकार है?

नेहरू के दस्तावेजों पर कब्जे का विवाद कोई नया नहीं है। 1971 के बाद इंदिरा गाँधी ने ये कागजात नेहरू मेमोरियल को सौंपे थे, लेकिन एक शर्त के साथ। शर्त यह थी कि इंदिरा गाँधी ही इन दस्तावेजों की ‘मालकिन’ रहेंगी और उनकी अनुमति के बिना कोई भी शोधकर्ता इन्हें देख नहीं पाएगा।

1984 में इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद सोनिया गाँधी इन दस्तावेजों की ‘ट्रस्टी-गार्जियन’ बन गईं। PMML सोसाइटी अब इस पर कानूनी राय ले रही है कि क्या कोई दान की गई चीज इस तरह वापस ली जा सकती है और क्या राष्ट्रीय इतिहास के दस्तावेजों पर किसी परिवार का मालिकाना हक हो सकता है।

हाल ही में ‘द नेहरू आर्काइव‘ के नाम से एक डिजिटल प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें नेहरू के 104 खंडों के कार्यों को ऑनलाइन किया गया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सोनिया गाँधी के पास रखे 51 बक्से वापस नहीं आते, तब तक यह आर्काइव अधूरा रहेगा। भाजपा का तर्क है कि कॉन्ग्रेस ने हमेशा इतिहास को ‘कंट्रोल’ करने की कोशिश की है।

नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय (NMML) का नाम बदलकर प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) करने पर भी कॉन्ग्रेस ने खूब विरोध किया था, क्योंकि वे नेहरू को केवल एक परिवार तक सीमित रखना चाहते हैं, जबकि सरकार उन्हें देश के सभी प्रधानमंत्रियों की विरासत का हिस्सा मानती है।

माफी किसे माँगनी चाहिए?

कॉन्ग्रेस ने ‘गायब’ शब्द के पीछे छिपकर जिस तरह भाजपा से माफी की माँग की है, वह ‘चोरी और ऊपर से सीनाजोरी’ जैसा मामला है। सरकार के जवाब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दस्तावेज चोरी नहीं हुए, बल्कि सोनिया गाँधी ने उन्हें ‘होल्ड’ कर रखा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या देश के पहले प्रधानमंत्री के पत्र किसी निजी अलमारी में बंद होने चाहिए या राष्ट्रीय पुस्तकालय में?

अगर कॉन्ग्रेस पारदर्शी है, तो उसे ये 51 बक्से तुरंत वापस करने चाहिए। माफी भाजपा को नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस को माँगनी चाहिए जिसने 2008 में राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेजों को एक निजी आवास की संपत्ति बना दिया।

राजस्थान के हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री का विरोध, किसान महापंचायत से उभरा नया संकट: राजनीति और पर्यावरण का टकराव

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में किसानों का आक्रोश सड़कों पर उतर आया है। एशिया की सबसे बड़ी एथेनॉल फैक्ट्री के खिलाफ जिले के जंक्शन धान मंडी में बुधवार (17 दिसंबर 2025) को हुई महापंचायत ने पूरे इलाके को हिला दिया। हजारों किसान ट्रैक्टरों पर सवार होकर इकट्ठा हुए, नारे लगाए और अपनी माँगें दोहराईं। इस दौरान ‘फैक्ट्री बंद करो, किसान बचाओ’ के नारे गूंजते रहे।

अच्छी बात ये रही कि महापंचायत शांतिपूर्ण रही, लेकिन हवा में तनाव की गंध साफ महसूस हो रही थी। किसान चिल्ला रहे थे कि ये फैक्ट्री उनकी जमीन, पानी और आने वाली नस्लों को तबाह कर देगी। दूसरी तरफ प्रशासन ने इंटरनेट सेवा चौथे दिन भी बंद रखी, धारा 144 लगा दी और भारी पुलिस बल तैनात कर दिया।

सवाल ये उठ रहा है कि क्या ये सिर्फ स्थानीय किसानों का दर्द है, या राजनीति और बाहरी ताकतें इसे भड़का रही हैं? खासकर पंजाब से आए किसान जत्थों ने आंदोलन को हवा दी है, जो इसे 2020-21 के बड़े किसान आंदोलन की याद दिला रहा है।

एथेनॉल फैक्ट्री है विवाद की जड़, 2023 की मंजूरी से शुरू हुई जंग

हनुमानगढ़ का टिब्बी इलाका हमेशा से हरा-भरा रहा है।किसान साल भर मेहनत करते हैं, ताकि बाजार में अच्छी कीमत मिले। लेकिन 2023 में जब तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने चंडीगढ़ की ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड को 450 करोड़ रुपये की इस बड़ी प्रोजेक्ट की मंजूरी दी, तो किसानों के चेहरे पर काली परत चढ़ गई।

कंपनी का प्लान था कि राठीखेड़ा गाँव में ये फैक्ट्री बनेगी, जो चावल के भूसे से एथेनॉल बनाएगी। कंपनी वाले कहते थे कि इससे नौकरियाँ मिलेंगी, किसानों को भूसा बेचने का अच्छा दाम मिलेगा और पर्यावरण को भी फायदा होगा – क्योंकि एथेनॉल पेट्रोल का साफ विकल्प है।

लेकिन किसानों को ये सपना झूठा लगा। हनुमानगढ़ पहले से सूखे की मार झेल रहा है। यहाँ का भूजल स्तर 100 फीट से भी नीचे चला गया है। किसान कुओं पर निर्भर हैं, लेकिन बिजली की कटौती और पानी की कमी से पहले ही परेशान हैं। फैक्ट्री को रोज 50-60 लाख लीटर पानी चाहिएगा, जो नहरों और भूजल से ही आएगा। इससे खेत सूख जाएँगे, फसलें मरेंगी। ऊपर से प्रदूषण का डर।

किसान कहते हैं कि फैक्ट्री से निकलने वाली हवा में जहर घुलेगा। मीथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी चीजें, जो साँस की बीमारियाँ और कैंसर का खतरा बढ़ाएँगी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने तो मंजूरी दे दी, लेकिन किसानों का आरोप है कि पर्यावरण जांच (EIA) में गड़बड़ी हुई। लोकल लोग कहते हैं, “कागजों पर सब साफ था, लेकिन जमीन पर असर देखा नहीं गया।”

विरोध की शुरुआत 10 दिसंबर को हुई। टिब्बी में एक छोटी महापंचायत बुलाई गई। वहाँ से उत्तेजित किसान फैक्ट्री साइट पर पहुँच गए। गुस्से में तोड़फोड़ हुई- मशीनें तोड़ीं, गाड़ियाँ जलाईं। पुलिस ने लाठीचार्ज किया, 16 किसान घायल हो गए और 40 को गिरफ्तार कर लिया। इलाके में तनाव फैल गया।

हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री के विरोध में किसान महापंचायत, प्रशासन ने बनाई कमेटी
हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री के विरोध में किसान महापंचायत, प्रशासन ने बनाई कमेटी, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

हालाँकि किसान संघर्ष समिति ने हार नहीं मानी। 12 दिसंबर को प्रशासन से बात हुई। सहमति बनी कि एक जाँच कमेटी बनेगी, जो किसानों की आपत्तियों को देखेगी। तब तक निर्माण रुकेगा। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा ने इसे ‘समझौता नहीं, धोखा’ बताया। उन्होंने कहा, “हमारी माँग पूरी तरह फैक्ट्री बंद करना है, आधी-अधूरी जाँच से काम नहीं चलेगा।” इसी गुस्से ने 17 दिसंबर की बड़ी महापंचायत को जन्म दिया था।

महापंचायत का माहौल: शांति से भरा तनाव, हजारों की भीड़

17 दिसंबर का दिन हनुमानगढ़ के लिए यादगार बन गया। जंक्शन धान मंडी में दोपहर 12 बजे महापंचायत शुरू हुई। सुबह से ही ट्रैक्टरों की कतारें लग गईं, लेकिन प्रशासन ने ट्रैक्टर लाने पर रोक लगाकर सख्ती बरती।

माहौल तनावपूर्ण था। इंटरनेट चौथे दिन भी बंद था, ताकि अफवाहें न फैलें। धारा 144 लागू थी, ड्रोन आसमान में घूम रहे थे। पुलिस की फौज तैनात थी, जिला कलेक्टर खुशाल यादव खुद मौजूद थे। लेकिन किसान शांत रहे। कोई हिंसा नहीं हुई।

पूर्व विधायक बलवान पूनिया (कम्युनिस्ट पार्टी) ने मंच से कहा, “सरकार ने एमओयू साइन किया, लेकिन किसानों से पूछा नहीं। हम एमओयू रद्द होने तक पीछे नहीं हटेंगे।” पंजाब से आए एक जत्थे के नेता ने चेतावनी दी, “अगर फैक्ट्री बनी तो पूरे पंजाब के किसान सड़कों पर उतरेंगे। ये राजस्थान का मुद्दा नहीं, देश का है।” लेकिन स्थानीय किसान कहते हैं, “ये बाहरी लोग आग भड़का रहे हैं। हम तो बस अपनी जमीन बचाना चाहते हैं।”

किसानों ने रखी 3 मुख्य माँग

महापंचायत के दौरान प्रशासन के अधिकारी भी वहाँ थे। बातचीत हुई। किसानों ने तीन मुख्य माँगें रखीं – फैक्ट्री का एमओयू रद्द हो, आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएँ और जाँच कमेटी निष्पक्ष बने। प्रशासन ने वादा किया कि राज्य सरकार को पत्र लिखा जाएगा। हालाँकि किसानों ने 20 दिन का समय दिया है और कहा है कि 7 जनवरी को संगरिया में अगली महापंचायत की जाएगी। अगर मांगें पूरी न हुईं, तो आंदोलन और तेज होगा। एक किसान ने बताया, “हम शांतिपूर्ण लड़ेंगे, लेकिन हारेंगे नहीं। सरकार को पता चलना चाहिए कि किसान जिंदा है।”

कॉन्ग्रेस का राजनीतिक खेल दिखा साफ

इस आंदोलन में राजनीति का रंग साफ झलक रहा है। 2023 में जब कॉन्ग्रेस सत्ता में थी, तो इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी गई। अब विपक्ष में बैठी कॉन्ग्रेस वाले ही सबसे जोर-शोर से विरोध कर रहे हैं। संगरिया के विधायक अभिमन्यु पूनिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “भाजपा सरकार कॉरपोरेट्स के गुलाम बनी हुई है। किसानों पर लाठियाँ चलाना उनकी पुरानी आदत है।”

FIR में भी कॉन्ग्रेस के सांसदों और विधायकों के नाम हैं। बलवान पूनिया ने 10 दिसंबर की तोड़फोड़ को ‘सरकारी साजिश’ बता दिया। विपक्ष का कहना है कि भाजपा बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुँचा रही है, जबकि किसान मर रहे हैं।

बाहरी जत्थे भड़का रहे आंदोलन, 2020 की यादें ताजा

आंदोलन को सबसे ज्यादा हवा पंजाब से आ रही है। पंजाब के किसान जत्थे भारतीय किसान यूनियन और संयुक्त मोर्चा के लोग बड़े जत्थों में पहुँचे। उन्होंने मंच से चेतावनी दी, “अगर राजस्थान में किसान हार गए, तो पंजाब में भी आग लग जाएगी।” एक पंजाबी किसान नेता ने कहा, “हमारी सीमाएँ जुड़ी हैं, दर्द एक है। फैक्ट्री बंद करो, वरना सीमा पार आंदोलन होगा।”

लेकिन स्थानीय लोग शक में हैं। एक बुजुर्ग ने बताया, “ये पंजाब वाले प्रोफेशनल प्रोटेस्टर्स लगते हैं। 2020-21 के दिल्ली आंदोलन में भी ऐसे ही आए थे। वे आग भड़काते हैं, फिर चले जाते हैं। हमारा नुकसान होता है।”

किसान एकता के नाम पर हनुमानगढ़ में अस्थिरता फैलाने की कोशिश

पंजाब से आने वाले जत्थों ने महापंचायत को रंग दे दिया। वे पुराने नारे दोहरा रहे थे – ‘किसान एकता जिंदाबाद’। राकेश टिकैत जैसे नेता पहुँचे, जिन्होंने कहा, “ये हनुमानगढ़ का मुद्दा नहीं, पूरे देश का किसान संघर्ष है।” लेकिन आलोचक कहते हैं कि ये बाहरी हस्तक्षेप आंदोलन को राष्ट्रीय बनाने की कोशिश है। पंजाब में पहले से किसान आंदोलन की यादें ताजा हैं। अब हनुमानगढ़ को उसी तरह भड़काने की साजिश लग रही है।

एक स्थानीय नेता ने कहा, “पंजाब वाले अपनी राजनीति चला रहे हैं। हमारी समस्या सुलझाओ, बिना बाहरी आग लगाए।” ये हस्तक्षेप आंदोलन को लंबा खींच सकता है, जिससे जिले की फसलें और बाजार प्रभावित होंगे।

प्रशासन ने बनाई कमेटी, फिलहाल थमा है बवाल

प्रशासन ने महापंचायत से पहले ही कमर कस ली थी। हालाँकि पर्यावरण विभाग ने पाँच सदस्यीय कमेटी बना दी है। इसके अध्यक्ष संभागीय आयुक्त होंगे और जिला कलेक्टर-विशेषज्ञ सदस्य होंगे। ये कमेटी भूजल, प्रदूषण और पानी की जाँच करेगी। रिपोर्ट आने तक काम रुका रहेगा।

हालाँकि एक किसान नेता ने कहा, “कमेटी ठीक है, लेकिन एमओयू रद्द न हुआ तो हम रुकेंगे नहीं। 20 दिन बाद फैसला लेंगे।” फिलहाल 7 जनवरी को संगरिया में अगली महापंचायत की प्लानिंग हो रही है। अगर माँगें पूरी न हुईं, तो आंदोलन तेज होगा। प्रशासन की ये सख्ती किसानों को चुप तो कर सकती है, लेकिन गुस्सा दबा नहीं सकती।

कुल मिलाकर हनुमानगढ़ का ये आंदोलन विकास और किसान के बीच जंग है। सरकार को चाहिए कि किसानों की आवाज सुने। उनकी समस्याओं का हल निकाला जाए। फैक्ट्री को लेकर किसानों की चिंता को दूर किया जाए। बहरहाल, अब सबकी निगाहें कमेटी की रिपोर्ट पर है।

इथियोपिया ही नहीं साल भर में 6 अफ्रीकी देशों में पहुँचे PM मोदी, चीन का प्रभाव कम कर भारत को ग्लोबल साउथ का लीडर बनाने पर फोकस: जानें क्यों हमारे लिए अहम है अफ्रीका महाद्वीप?

यह भारत के लिए बहुत गर्व का पल था जब इथियोपिया के प्रधानमंत्री डॉक्टर अबी अहमद ने वैश्विक नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इथियोपिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, ‘ग्रेट ऑनर निशान ऑफ इथियोपिया’ से सम्मानित किया। इस सम्मान ने पीएम मोदी की दूरदर्शी नेतृत्व और दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने की दिशा में अहम योगदान को मान्यता दी है।

यह सम्मान भारत के ग्लोबल पावरहाउस के तौर पर उभरने को दिखाता है और ग्लोबल साउथ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए पीएम मोदी को मिले भरोसे और पहचान को भी उजागर करता है।

इतना ही नहीं पीएम मोदी के भव्य डिनर का आयोजन किया गया, जिसमें वंदे मातरम् गाकर कलाकारों ने मंत्रमुग्ध कर दिया। पीएम मोदी ने इस दौरान दोनों हाथों को हवा में उठाकर तालियाँ बजाई और कलाकारों की हौसला अफजाई की।

पीएम मोदी का ये पहला इथियोपिया दौरा है। इससे भारत और इथियोपिया के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ दोनों के गहरे भरोसे और सहयोग को नया आयाम मिलेगा। पीएम मोदी के दौरे में अक्सर अनौपचारिक बातचीत और व्यक्तिगत कैमेस्ट्री सुर्खियाँ बनती हैं। इस दौरे के दौरान भी ये देखा गया। इथियोपिया के पीएम अहमद का प्रोटोकॉल तोड़कर खुद गाड़ी चलाना और खास तरह का कॉफी पिलाना यह दिखाता है कि भारत अब अफ्रीका के लिए सिर्फ एक व्यापारिक भागीदार नहीं, बल्कि एक सच्चा दोस्त है।

पीएम मोदी के इस दौरे के दौरान व्यापार, निवेश, एग्रीकल्चर, डिजिटल, स्किल डेवलपमेंट, स्वास्थ्य सेवा, ऊर्जा, आतंकवाद विरोधी अभियान और साइबर सुरक्षा पर बातचीत होगी। भारत और इथियोपिया ने अगले 5 साल में द्विपक्षीय संबंधों को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। इथियोपिया भारत के लिए एफडीआई का अहम स्रोत है क्योंकि यहाँ 615 से ज्यादा भारतीय कंपनियाँ काम कर रही हैं।

पीएम मोदी ने इथियोपिया के संसद को संबोधित किया

प्रधानमंत्री मोदी ने इथियोपिया की संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा, “भारत और इथियोपिया का जलवायु और भावना, दोनों में गर्मजोशी है। लगभग 2000 साल पहले, हमारे पूर्वजों ने समुद्र पार कर गहरे रिश्ते बनाए थे। हिंद महासागर के पार, व्यापारी मसालों और सोने के साथ यात्रा करते थे, लेकिन उन्होंने सिर्फ सामान का ही व्यापार नहीं किया, बल्कि उन्होंने विचारों और जीवन शैली का भी आदान-प्रदान किया।”

उन्होंने कहा कि अदीस और धोलेरा जैसे बंदरगाह सिर्फ व्यापार केंद्र नहीं थे, बल्कि सभ्यताओं के बीच पुल थे। आधुनिक समय में हमारे रिश्ते एक नए युग में प्रवेश करते हैं। 1941 में भारतीय सैनिकों ने इथियोपिया की आज़ादी के लिए इथियोपियाई लोगों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी।”

पीएम मोदी ने कहा, “भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ और इथियोपिया का राष्ट्रगान, दोनों हमारी ज़मीन को माँ कहते हैं। वे हमें अपनी विरासत, संस्कृति, सुंदरता पर गर्व करने और मातृभूमि की रक्षा करने के लिए प्रेरित करते हैं।”

2025 में पीएम मोदी ने की 5 अफ्रीकी देशों की यात्रा

पिछले 11 सालों में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-अफ्रीका संबंधों को काफी प्रमुखता दी और रणनीतिक साझेदारी को एक नए स्तर पर पहुँचाया। यहाँ तक कि पिछले 1 साल में पीएम मोदी ने 6 अफ्रीकी देशों की यात्रा की। इनमें इथियोपिया के अलावा दक्षिण अफ्रीका (नवंबर 2025), घाना (जुलाई 2025), नामीबिया (जुलाई 2025), मॉरीशस (मार्च 2025) और नाइजीरिया (नवंबर 2024) शामिल हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने मार्च 2015 में पहली बार मॉरीशस और सेशेल्स की यात्रा की। इसके अगले साल यानी जुलाई 2016 में वे मोजाम्बिक, तंजानिया, केन्या और दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर गए। हालाँकि नवंबर 2025 में उन्होंने दोबारा दक्षिण अफ्रीका की यात्रा की थी। ठीक दो साल बाद यानी जुलाई 2018 में वे रवांडा, युगांडा की यात्रा की। जुलाई 2025 में नामीबिया, घाना की यात्रा की थी।

उन्होंने अपनी यात्राओं के जरिए अफ्रीका के साथ इस जुड़ाव को और तेज़ किया है। इन यात्राओं ने पूरे अफ्रीका में राजनयिक और विकासात्मक संबंधों को नई जान दी है, जो उनके नेतृत्व में एक रणनीतिक पहुँच को दिखाता है।

2025 की इस पाँचवीँ अफ्रीका यात्रा ने भारत के अफ्रीका प्रथम नीति को स्पष्टता से उभारा है। भारत, अफ्रीकी देशों के साथ मिलकर ‘ग्लोबल साउथ’ की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रमुखता से उठा रहा है।

अफ्रीकी संघ का मुख्यालय इथियोपिया में है। पीएम मोदी की ये यात्रा अफ्रीकी संघ को जी-20 में शामिल करने के भारत की कोशिशों और ब्रिक्स देशों में अच्छा तालमेल बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्रिक्स का 2026 सम्मेलन की मेजबानी भारत करने वाला है।

G20 का अफ्रीकन यूनियन बना सदस्य

सितंबर 2023 में भारत की G20 समिट की मेज़बानी के दौरान सबसे यादगार पलों में से एक था, प्रधानमंत्री मोदी का अफ्रीकी यूनियन को G20 में स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल होने का न्योता देना। उस वक्त एयू के चेयरपर्सन अजाली असौमानी थे। भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान, 2023 में अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाया गया। इससे अफ्रीकी देशों के साथ भारत के गहरे होते संबंधों की एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना जाता है।

अफ्रीकी यूनियन के फिलहाल 55 सदस्य देश हैं। अब यूरोपीय यूनियन की तरह अफ्रीकी यूनियन का महत्व है। इस कदम ने समावेशी वैश्विक शासन को बढ़ावा देने और दुनिया के मंच पर अफ्रीका की आवाज़ को मज़बूत करने के प्रति भारत के समर्पण को दिखाया था।

चीन का बढ़ता असर और लोन लेने के लिए मजबूर देश

अफ्रीकी देशों के साथ भारत के रिश्ते बहुत पुराने हैं, लेकिन दशकों की डिप्लोमैटिक बयानबाजी के बावजूद, ये रिश्ते अक्सर ठंडे ही रहे। पीएम मोदी की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने भारत-अफ्रीका संबंधों में नई जान फूँकी है, उन्हें प्राथमिकता दी है और कई तरह की पार्टनरशिप को आगे बढ़ाया है। कई लोग इसे इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के प्रति भारत की कूटनीति के तौर पर देखते हैं।

अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र यानी AfCFTA भारतीय निवेशकों को अफ्रीका के बड़े बाजार में व्यापक अवसर दे रहा है। दरअसल अफ्रीका भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। इसके साथ द्विपक्षीय व्यापार करीब 9 हजार करोड़ रुपए का है। यूरोपीय संघ और चीन दो सबसे बड़े व्यापार साझेदार हैं।

अफ्रीका में विकास की गति तेज हुई है। इससे उपभोक्ता बाजार का भी विस्तार हुआ है। निवेशक इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं । भारत ने शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे द्विपक्षीय सहयोग के माध्यम से अफ्रीकी देशों में मानवीय जीवन में सुधार के लिए काफी सहयोग दिया है।

खास कर कोरोना के वक्त भारत ने कम से कम 25 अफ्रीकी देशों को टीके और आवश्यक चिकित्सा सामग्री उपलब्ध कराई थी, जिसकी अफ्रीकी देशों के साथ साथ पूरी दुनिया ने सराहना की थी।

अफ्रीका में भारत तकनीक विकास में भी मदद कर रहा है इसलिए आईआईटी कैंपस खोले गए हैं। पैन अफ्रीकी ई नेटवर्क चलाए जा रहे हैं। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से अफ्रीका को डिजिटल तौर पर मजबूत बनाने में भारत लगा हुआ है।

अफ्रीका के गरीब देशों के संसाधनों पर चीन की गिद्ध नजर है। इन देशों में निवेश कर और लोन देकर चीन अपने ऋण जाल में उसे फँसा रहा है। ऐसे में भारत को एक तरफ इन देशों की मदद करनी है, दूसरी तरफ चीन के बढ़ते निवेश से प्रतिस्पर्धा भी करनी है। ये बड़ी चुनौती है। कई परियोजनाओं को पूरा करने में देरी हो रही है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।

भारत ने नई दिल्ली में 2015 में तीसरे भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी। इसमें अफ्रीकी देशों की भागीदारी चार गुना से अधिक बढ़ गई, जो गहरे और अधिक व्यापक जुड़ाव की दिशा में एक बदलाव का संकेत है। लेकिन इसके बाद भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन की बैठक हर तीन वर्षों में होनी थी, वह 2015 के बाद नहीं हो पा रही है।

आयुर्वेद का अफ्रीका में बड़ी संभावना

केन्या के पूर्व प्रधानमंत्री रायला ओडिंगा ने 2022 में पीएम मोदी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा था कि आयुर्वेद ने उनकी बेटी की आँखों की रोशनी वापस लौटा दी। ओडिंगा ने पीएम मोदी को आयुर्वेद को अफ्रीका में लाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि स्वदेशी पौधों का उपयोग चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है और इससे अनगिनत लोगों को लाभ होगा।

पिछले एक दशक में भारत ने अफ्रीका के साथ अपनी विकास साझेदारी को काफी मजबूत किया है। करीब 43 अफ्रीकी देशों के 206 बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में भारत ने 12.37 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया है। इसके अलावा अफ्रीकी युवाओं के लिए 50,000 स्कॉलरशिप भी दी हैं, जिनमें से 42,000 से ज्यादा का इस्तेमाल पहले ही किया जा चुका है।
पिछले 10 वर्षों में भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (आईटीईसी) कार्यक्रम के माध्यम से लगभग 40,000 अफ्रीकियों ने भारत में प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

भारत ने अपनी टेली-शिक्षा और टेलीमेडिसिन परियोजना के दूसरे चरण के तहत 2019 से अब तक 22 अफ्रीकी देशों के 15,000 से अधिक युवाओं को अलग-अलग तकनीकी डिग्री और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए छात्रवृत्ति दी है।

दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गाँधी द्वारा चलाए गए रंगभेदी निषेध आंदोलन की वजह से लोग आज भी भारत को महात्मा गाँधी के सत्य और अहिंसा के पुजारी के तौर पर देखते हैं। यहाँ से भारत-अफ्रीका एकजुटता की आध्यात्मिक सोच शुरू होती है। पीएम मोदी ने उस दृष्टिकोण को व्यावहारिक और प्रभावशाली नीतियों में परिवर्तित कर इसे भारत- अफ्रीका के बीच मजबूत आधारशिला में बदल दिया है।

पाकिस्तान की ‘खराब’ दवाएँ, मानवीय संकट से जूझती आधी आबादी और निर्वासितों की मार: जानें- दवाओं को मोहताज अफगानिस्तान का मददगार कैसे बन रहा भारत

तालिबान राज में अफगानिस्तान में आम लोगों के लिए हालात लगातार मुश्किल होते जा रहे हैं। पाकिस्तान के साथ जारी सीमा विवाद के बीच तालिबान सरकार द्वारा पाकिस्तानी दवाओं के आयात पर पूरी तरह रोक लगाए जाने से देश में बुनियादी दवाओं की भारी किल्लत पैदा हो गई है। लोग बहुत जरूरी दवाओं के लिए भी मारे-मारे घूम रहे हैं।

पाकिस्तान से धोखा खाए अफगानिस्तान को अब भारत का सहारा है। अफगान लोगों के लिए हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने वाले भारत पर भरोसा जताते हुए तालिबान के स्वास्थ्य मंत्री नूर जलाल जलाली मंगलवार (16 दिसंबर 2025) को नई दिल्ली पहुँचे हैं।

पाक से दवाओं के आयात पर अफगानिस्तान का बैन

कुछ ही दिन पहले की बात है जब काबुल में तालिबान-शासित सरकार के उप-प्रमुख और आर्थिक मामलों के प्रभारी अब्दुल गनी बरादर ने हाल ही में घोषणा की कि पाकिस्तान से आने वाली सभी दवाओं के आयात पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। बरादर ने पाकिस्तानी दवाओं की गुणवत्ता को ‘खराब’ बताते हुए अफगान में आयात करने वालों को निर्देश दिया कि वे 3 महीने के भीतर पाकिस्तानी कंपनियों के साथ अपने सभी बकाया भुगतान निपटाएँ और वैकल्पिक देशों से दवाओं की आपूर्ति की व्यवस्था करें।

हालाँकि जमीनी हकीकत यह है कि नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश अफगानिस्तान के लिए बेहद कठिन साबित हो रही है। तालिबान सरकार में प्रशासनिक मामलों के महानिदेशक नूरुल्लाह नूरी के अनुसार, अफगानिस्तान में इस्तेमाल होने वाली 70% से अधिक दवाएँ अब तक पाकिस्तान से ही आयात की जाती रही हैं। ऐसे में अचानक लगाए गए प्रतिबंध का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है जिन्हें अब साधारण दवाएँ भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।

अफगानिस्तान के चरमराए ‘हेल्थ सिस्टम’ पर दोहरा बोझ

पिछले कई दशकों से अफगानिस्तान अपनी जरूरत की दवाओं का केवल एक बेहद छोटा हिस्सा ही खुद तैयार कर पाता रहा है। देश में दवा निर्माण से जुड़ा बुनियादी ढाँचा कमजोर है, फार्मास्यूटिकल लैब्स की भारी कमी है, क्वालिटी कंट्रोल की प्रभावी व्यवस्था नहीं है और आपूर्ति श्रृंखला भी बार-बार बाधित होती रही है। ऐसी कई कमजोरियों के कारण अफगानिस्तान लंबे समय से दवाओं के आयात पर निर्भर बना हुआ है।

वर्तमान संकट से पहले भी अफगानिस्तान में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद खराब मानी जाती थी। अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद हालात और ज्यादा बिगड़ गए। इसके बाद देश ने एक गंभीर मानवीय संकट का सामना किया, जिसे लगातार पड़ रहे सूखे, विनाशकारी बाढ़ और अर्थव्यवस्था के लगभग ठप हो जाने ने और गहरा कर दिया।

ईरान और पाकिस्तान से बीते कुछ महीनों में बड़ी संख्या में निर्वासित किए गए अफगानों के दबाव ने अफगानिस्तान की पहले से ही कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था को टूटने की कगार पर ला खड़ा किया है। लौटाए गए इन लोगों में सैकड़ों हजार ऐसे हैं जिन्हें तत्काल चिकित्सीय सहायता की जरूरत है लेकिन सीमित संसाधनों के चलते स्वास्थ्य तंत्र उनकी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ दिख रहा है।

आँकड़ों के अनुसार, जनवरी से 13 अगस्त के बीच ईरान से लगभग 18.6 लाख अफगानों को वापस भेजा गया जबकि पाकिस्तान से 3.14 लाख से अधिक लोगों की वापसी हुई। इस तरह सिर्फ आठ महीनों के भीतर ही 20 लाख से ज्यादा अफगान नागरिक अपने देश लौटने को मजबूर हुए हैं। इनमें से अधिकतर लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, देश की कुल 4.6 करोड़ आबादी में से करीब 2.29 करोड़ लोग यानी लगभग आधी आबादी को मानवीय सहायता की जरूरत है। 1.68 करोड़ लोगों को सहायता के लिए चिन्हित किया गया है, जिसके लिए करीब 2.42 अरब अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता बताई गई है।

संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े (फोटो साभार: UN)

इस बीच अफगानिस्तान में मानवीय सहायता अभियानों को धन की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे हालात और ज्यादा चिंताजनक हो गए हैं। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही बेहद कमजोर है और खासकर ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच असमान बनी हुई है। सीमित संसाधनों, इन्फ्रा की कमी और प्रशिक्षित कर्मियों के अभाव ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को टूटने कगार पर ला खड़ा किया है।

अफगानिस्तान में संक्रामक बीमारियों का बार-बार फैलना, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्याएँ, कुपोषण और नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज मृत्यु और बीमारियों की दर में इजाफा कर रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में कई बीमारियों के फैलने का गंभीर खतरा बना हुआ है। इनमें एक्यूट वॉटर डायरिया, खसरा, पोलियो, क्रीमियन-कांगो हैमरेजिक फीवर (CCHF), डेंगू, कोविड-19, काली खांसी (पर्टुसिस) और मलेरिया जैसी बीमारियाँ शामिल हैं।

विशेषज्ञों और मानवीय संगठनों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य और मानवीय सहायता के लिए तुरंत और पर्याप्त फंडिंग नहीं की गई तो अफगानिस्तान में बीमारियों, मौतों और मानसिक स्वास्थ्य संकट की स्थिति और भयावह हो सकती है। कमजोर स्वास्थ्य ढांचा और लगातार बढ़ती जरूरतें देश को एक लंबे और गहरे मानवीय संकट की ओर धकेल रही हैं।

अफगानिस्तान को ‘स्वस्थ’ रहने के लिए भारत से मदद की जरूरत

अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी, उद्योग-वाणिज्य मंत्री अल्हाज नूरुद्दीन अजीजी के बाद स्वास्थ्य मंत्री मौलवी नूर जलाल जलाली भारत आए हैं। यह दौरा स्वास्थ्य संकट से जूझते अफगानिस्तान को मदद के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। भारत लगातार अफगानिस्तान के स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की कोशिश में लगा है। इसी महीने की शुरुआत में भारत ने इन्फ्लुएंजा और मेनिन्जाइटिस के टीकों की 63,734 खुराकें अफगानिस्तान भेजी थीं।

इसके अलावा, बीते 28 नवंबर को भारत ने अफगानिस्तान की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए 73 टन जीवन रक्षक दवाएँ, टीके और आवश्यक सामग्री भेजी थी। विदेश मंत्रालय ने ‘X’ पर लिखा था, “अफगानिस्तान के स्वास्थ्य सेवा प्रयासों को बढ़ावा देते हुए भारत ने तत्काल चिकित्सा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 73 टन जीवन रक्षक दवाएँ, टीके और आवश्यक पूरक सामग्री काबुल भेजी हैं। अफगान जनता के प्रति भारत का अटूट समर्थन जारी है।”

पिछले अक्टूबर में जब अमीर खान मुत्ताकी भारत आए थे तब भी भारत ने अफगानिस्तान को स्वास्थ्य सेवाओं की मदद देने का एलान किया था। भारत ने काबुल में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों और मरीजों के लिए एक विशेष केंद्र बनाने की घोषणा की थी। इसके साथ ही एक आधुनिक जाँच केंद्र (डायग्नोस्टिक सेंटर) बनाने, काबुल के इंदिरा गाँधी इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ में पुराने हीटिंग सिस्टम को बदले जाने की घोषणा की गई थी।

इसके अलावा भारत काबुल के बगरामी इलाके में 30 बेड का एक नया अस्पताल, कैंसर के इलाज के लिए एक ऑन्कोलॉजी सेंटर और गंभीर दुर्घटनाओं के इलाज के लिए एक ट्रॉमा सेंटर भी बनवा रहा है। साथ ही, देश के अलग-अलग इलाकों में माताओं और नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए पक्तिका, खोस्त और पक्तिया प्रांतों में 5 मैटरनिटी हेल्थ क्लीनिक बनाए जाने की घोषणा भी की है। इस दौरे के समय भारत ने अफगानिस्तान को 20 एंबुलेंस भी भेंट की हैं ताकि मरीजों को समय पर अस्पताल पहुँचाया जा सके।

ऐसे समय में जब कई देश अफगानिस्तान को केवल राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसकी विदेश नीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि अफगान लोगों की पीड़ा है और इस मुश्किल घड़ी में भारत अफगानिस्तान के साथ खड़ा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को व्यवहार में उतारकर सीमाओं, मतभेदों और वैश्विक राजनीति से ऊपर उठकर भारत अपने सदियों पुराने दोस्त के साथ मजबूती से खड़ा है।