उत्तर प्रदेश के लखनऊ में समाजवादी पार्टी (सपा) कार्यकर्ता मोहम्मद फरहान हुसैन ने नाबालिग हिंदू लड़की को ‘ग्रूमिंग जिहाद’ में फँसाया। फरहान ने नाबालिग को इस्लाम के प्रति इस तरह से ब्रेनवॉश किया कि वह रोजा और कुरान को मानने लग गई। यहाँ तक कि फरहान ने नाबालिग को घर से भगाने की भी पूरी साजिश रची।
नाबालिग के भाई ने लखनऊ के सादत गंज में आरोपित फरहान हुसैन और उसके अब्बा इसरार हुसैन के खिलाफ छल, शोषण, धर्मांतरण और लव जिहाद मामले में 12 अक्टूबर 2025 को शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत पर संज्ञान लेते हुए पुलिस ने संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की है। इस FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास भी उपलब्ध है।
नाबालिग रोजे और कुरान की बातें करने लगी, फरहान ने घर में चोरी भी करवाई
पीड़िता के भाई के बयान पर दर्ज FIR में बताया गया कि साल 2023 में फरहान हुसैन ने उनकी नाबालिग बहन की मासूमियत का फायदा उठाकर झूठे प्रेम जाल में फँसाया। हुसैन ने पीड़िता का इस हद तक ब्रेनवॉश किया कि वह घर में केवल कुरान और रोजे रखने की बातें करने लगी।
शिकायत में भाई ने बताया कि उनकी नाबालिग बहन ने फरहान हुसैन के कहने पर घर से नगदी और जेवर चुराए। इसकी शिकायत जब घर के नजदीकी थाने में की तो सामने आया कि इसके पीछे फरहान का हाथ है। फरहान ने ही उनकी बहन को भगाने की साजिश के तहत उसे इस चोरी के लिए उकसाया।
इतना ही नहीं पीड़िता के भाई ने बताया कि कई बार बहन के पास से ताबीज, अँगूठी जैसी असामान्य वस्तुएँ भी मिली हैं। भाई ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि फरहान ने उसका पूरी तरीके से ब्रेनवॉश कर लिया है। अब उनकी बहन का परिवार के प्रति आक्रामक व्यवहार हो गया है और उसने दूरी बना ली है।
फरहान हुसैन ने पीड़ित परिवार को दी धमकी
मामले में दर्ज FIR के अनुसार, नाबालिग लड़की के परिवार ने पहले भी कई बार पुलिस से फरहान की शिकायत की है। इस पर फरहान ने परिवार को धमकी दी कि उसके मजहब के लोगों कि संख्या ज्यादा है इसीलिए उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा।
पीड़िता के भाई ने कहा कि फरहान हुसैन का पहले भी कई हिंदू लड़कियों से संबंध रहा है। वह उन लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाकर पैसे ऐंठ चुका है। भाई ने आरोप लगाया कि ऐसे ही फरहान उनकी बहन को भी लव जिहाद में फँसा रहा है। उन्होंने शक जताया है कि फरहान ने शारीरिक और मानसिक शोषण भी किया है।
FIR के मुताबिक, पीड़ित परिवार ने माँग की है कि फरहान हुसैन और उसके अब्बा इसरार हुसैन के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए। साथ ही नाबालिग बहन की सुरक्षा के लिए कदम उठाए जाएँ। पीड़ित परिवार ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लव जिहाद की सख्त नीति के अनुसार कार्रवाई की जाए।
पुलिस की कार्रवाई
FIR के मुताबिक, पुलिस ने फरहान हुसैन के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 49, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 351(2), उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 3 और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की धारा 5(1) की धाराओं के तहत आरोपित बनाया है।
पुलिस ने मामले में आरोपित फरहान को गिरफ्तार कर लिया है।
सपा के बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें वायरल
आरोपित फरहान हुसैन समाजवादी पार्टी (सपा) का सक्रिय कार्यकर्ता है। सपा के बड़े नेताओं के साथ उसकी तस्वीरें भी सामने आई हैं। इनमें सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी शामिल हैं।
फरहान हुसैन समाजवादी पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता है ..और सबसे गंभीर बात ये कश्मीरी मोहल्ले में अपने मजहब की संख्या की अधिकता बता कर अपनी हनक बनाता रहता है .. https://t.co/BCgjIzKPVipic.twitter.com/Pf3IrVR3FE
जब भी ‘केरल’ का नाम सुनाई देता है तो जेहन में सबसे पहले शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र आते हैं क्योंकि वामपंथी मीडिया ने इन दोनों को हमेशा आदर्श की तरह पेश किया है। लेकिन क्या केरल वाकई एक आदर्श राज्य है? असल में सिर्फ पर्दे के पीछे ही नहीं खुले तौर पर भी केरल ड्रग्स के संकट से जूझ रहा है। शहरों से लेकर गाँवों तक राज्य का कोई कोना इस समस्या से अछूता नहीं है। ड्रग्स के कारण सैकड़ों जिंदगियाँ तबाह हो चुकी हैं और अनगिनत परिवार टूट गए हैं।
अब तक पंजाब को भारत का ‘ड्रग्स का गढ़’ माना जाता था लेकिन ताजा रिपोर्ट्स केरल की एक भयावह तस्वीर पेश करती हैं। सिर्फ साल 2024 में ही राज्य में 27,700 मादक पदार्थों से जुड़े मामले दर्ज किए गए, जो पंजाब से तीन गुना ज्यादा हैं। पंजाब में इसी अवधि में सिर्फ 9,000 के करीब केस दर्ज हुए।
आबादी के लिहाज से देखें तो केरल में हर एक लाख लोगों पर मादक पदार्थों से जुड़े 78 केस सामने आए हैं और यह दर पूरे देश में सबसे अधिक है। राज्य के सभी 14 जिले इस संकट से प्रभावित हैं। 2025 के शुरुआती दो महीनों में ही केरल में 30 हत्याएँ हुईं, जिनमें से आधी ड्रग्स से जुड़ी थीं।
राज्यसभा में 12 मार्च 2025 को पेश किए गए आँकड़े बताते हैं कि पिछले तीन सालों से एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के तहत सबसे अधिक मामले केरल में ही दर्ज हो रहे हैं। साल 2022 में 26,918 केस, 2023 में 30,715 केस और 2024 में 27,701 केस दर्ज हुए। इसकी तुलना में पंजाब में यही आँकड़े 12,423, 11,564 और 9,025 रहे। महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी मामले इतने नहीं हैं। यह साफ इशारा करता है कि नशे से जुड़े अपराधों के मामले में केरल अब ‘हॉटस्पॉट’ पंजाब से कहीं आगे निकल चुका है।
स्रोत: गृह मंत्रालय, राज्यसभा
‘गॉड्स ओन कंट्री’ (भगवान का देश) कहे जाने वाला यह खूबसूरत राज्य आज ड्रग्स के जाल में जकड़ चुका है। पुलिस और अन्य एजेंसियाँ भले इस समस्या पर काबू पाने की कोशिश में जुटी हैं लेकिन आगे का रास्ता अंधकारमय और बेहद चुनौतीपूर्ण दिख रहा है।
‘420 कल्चर’ की चपेट में युवा पीढ़ी
सन 1971 में अमेरिका के हाई स्कूल में पढ़ने वाले 5 दोस्तों ने 4 बजकर 20 मिनट (4:20 PM) का समय अपने ‘गांजा सेशन’ के कोड के तौर पर तय किया था। आधी सदी से भी ज्यादा वक्त गुजरने के बाद यही ‘420 कल्चर’ अब दुनिया भर के युवाओं में फैल चुका है और केरल की नई पीढ़ी भी इससे अछूती नहीं रही। यहाँ के युवाओं के बीच यह ‘420 कल्चर’ अब एक तरह के ‘बगावत के प्रतीक’ के रूप में देखा जा रहा है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, केरल के युवाओं के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर ‘420‘ शब्द वाले हैशटैग और स्लैंग खुलेआम देखे जा सकते हैं। इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और फेसबुक पर ‘420’ से जुड़ी मीम्स और वीडियो यह दर्शाते हैं कि किस तरह नशे की संस्कृति को अब कूल बना दिया गया है और यह युवाओं के बीच लोकप्रिय होता जा रहा है।
फोटो क्रेडिट: इंस्टाग्राम
गांजा को अक्सर एक ‘हल्का नशा’ मान लिया जाता है। लेकिन जमीनी हकीकत देखने पर समझ आता है कि यह नशे की लत को बढ़ाता ही जाता है। कई किशोर नशेड़ियों ने अधिकारियों को दिए बयानों में बताया कि उनका नशे की लत का सफर स्कूल के दिनों में दोस्तों के साथ गांजा पीने से शुरू हुआ और फिर धीरे-धीरे यह एमडीएमए (MDMA), कोकीन और मेथ जैसे खतरनाक ड्रग्स तक पहुँच गया।
प्रशासन का कहना है कि यह 420 कल्चर बच्चों का बचपन और भविष्य दोनों छीन रहा है। माता-पिता जहाँ अपने बच्चों को स्कूल और कॉलेज में सुरक्षित समझते हैं, वहीं अब यही कैंपस नशे के फैलाव के सबसे बड़े अड्डे बन चुके हैं। इडुक्की जिले में तो एक हैरान करने वाला मामला सामने आया, जब एक स्कूल टूर पर गए कुछ छात्रों ने एक्साइज विभाग के दफ्तर में जाकर ‘गांजा वाली बीड़ी’ जलाने के लिए माचिस माँगी।
कई सर्वे बताते हैं कि स्कूल के बच्चों में नशे के प्रयोग का स्तर चौंकाने वाला है। एक सरकारी अध्ययन में पाया गया कि केरल के 10वीं कक्षा के 37% और 8वीं कक्षा के करीब 23% छात्रों ने कभी न कभी कोई अवैध नशा या इनहेलेंट आजमाया है। इनमें सबसे अधिक प्रचलित गांजा ही है। स्थानीय मीडिया ने इस संकट को ‘उड़ता केरल’ नाम दिया है, ठीक उसी तरह जैसे ‘उड़ता पंजाब’ फिल्म ने पंजाब के नशे की हकीकत उजागर की थी।
अधिकतर मामलों में केरल के युवाओं की नशे की शुरुआत गांजा से होती है लेकिन अब यह आसानी से उपलब्ध भी है। राज्य की पुलिस और एक्साइज विभाग के मुताबिक, आज केरल के बाजार में ‘हाइड्रोपोनिक गांजा’ नाम की एक बेहद शक्तिशाली किस्म फैली हुई है जिसमें टीएचसी (THC) का स्तर 40% से भी अधिक होता है।
यह गांजा खेतों में नहीं बल्कि लैब में तैयार किया जाता है और अधिकतर दक्षिण-पश्चिम एशिया से तस्करी करके लाया जाता है। 2022 में ऐसे गांजे की तस्करी लगभग ना के बराबर थी, लेकिन 2024–25 में ही अधिकारियों ने 89 किलो से अधिक गांजा एयरपोर्ट्स पर पकड़ा। 2025 के शुरुआती 7 महीनों में यह जब्ती 129.7 किलो तक पहुँच गई है।
यह ‘थाई-ग्रोन’ यानी थाईलैंड में उगाया गया गांजा बेहद ताकतवर होता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत एक किलो पर एक करोड़ रुपए तक पहुँच सकती है। दिलचस्प बात यह है कि जब भारत में गांजे की एंट्री पर निगरानी बढ़ी तो तस्करों ने अपना रास्ता बदलकर मध्य-पूर्व (Middle East) के जरिए इसे भारत लाना शुरू कर दिया। ‘420 कल्चर’ भले ही गांजे को ‘कूल’ की निशानी की तरह पेश करता हो लेकिन सच्चाई यह है कि इसने केरल के युवाओं को नशे की गहरी दलदल में धकेल दिया है।
केरल ही क्यों? कहाँ हैं ड्रग्स की इस महामारी की जड़ें
केरल में नशे की समस्या कोई रातों-रात नहीं आई। इसके पीछे कई गहरे और आपस में जुड़े कारण हैं, जिन्होंने इस राज्य को नशे की लत के प्रति बेहद संवेदनशील बना दिया है। भौगोलिक स्थिति यहाँ वरदान भी है और अभिशाप भी। केरल का 590 किलोमीटर लंबा समुद्र तट अरब सागर से जुड़ा है। यह जहाँ अंतरराष्ट्रीय व्यापार को आसान बनाता है, वहीं दूसरी ओर मादक पदार्थों की तस्करी के लिए एक खुला दरवाजा भी बन गया है।
पिछले कुछ वर्षों में तस्करों ने केरल के तटवर्ती अंतरराष्ट्रीय जहाज मार्गों का खुलकर फायदा उठाया है। इसके अलावा, राज्य की नजदीकी बड़े ट्रांजिट हब्स जैसे बेंगलुरु और चेन्नई से होने के कारण यहाँ जमीन के रास्ते बनी नशे की सप्लाई चेन और भी मजबूत हो गई है।
कुछ उदाहरण देखें तो बेंगलुरु से MDMA (जिसे एक्स्टेसी या पार्टी ड्रग भी कहा जाता है) और मेथामफेटामाइन जैसे घातक ड्रग्स केरल पहुँचते हैं। वहीं, गांजा आंध्र प्रदेश और ओडिशा के पहाड़ी इलाकों से तमिलनाडु के रास्ते आता है। यह समस्या इतनी गहराई तक फैली है कि पुलिस ने पूरे राज्य में करीब 1,300 ‘ब्लैक स्पॉट्स’ चिन्हित किए हैं यानी ऐसे इलाके जहाँ से नशे की खरीद-फरोख्त होती है, इसमें शहर और गाँव दोनों इलाके शामिल हैं।
इंटरनेट का इस्तेमाल भी केरल में इस संकट को और गहराता है। नशा तस्कर अब एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स और डार्क वेब के जरिए कारोबार करते हैं और भुगतान क्रिप्टोकरेंसी में लेते हैं। इससे पुलिस के लिए इन नेटवर्क्स को ट्रैक करना और भी मुश्किल हो गया है।
कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, केरल में अब नशे की होम डिलीवरी उसी तरह हो रही है जैसे पिज्जा ऑर्डर किया जाता है। बाइक पर घूमने वाले डिलीवरी एजेंट्स ग्राहकों के दरवाजे तक नशा पहुँचा रहे हैं। कई पेडलर (तस्कर) सुपरबाइक्स पर नकली नंबर प्लेट लगाकर घूमते हैं और शक से बचने के लिए खुद को ‘युवा जोड़ों’ के रूप में पेश करते हैं।
इस ‘ई-कॉमर्स स्टाइल’ नशे के धंधे ने पुलिस की नींद उड़ा दी है क्योंकि उन्हें लगातार अपनी जाँच और ट्रैकिंग तकनीक को अपडेट करना पड़ रहा है ताकि इन स्मार्ट तस्करों से निपटा जा सके।
सप्लाई चेन के अलावा, केरल के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं ने भी नशे के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की है। फिल्मों और सोशल मीडिया पर ‘गैंगस्टर कल्चर’ और तथाकथित ‘माचो कूलनेस’ को ग्लैमरस तरीके से दिखाया जाता है। इससे कई युवा अपराधी जीवनशैली की नकल करने लगे हैं। नशे के गिरोह इस मनोविज्ञान को भाँप चुके हैं और स्थानीय गुंडे और संगठित गिरोह अब छात्रों को अपने ‘चेले’ की तरह फँसाते हैं, उन्हें छोटा पेडलर बना देते हैं। इस तरह, नेटवर्क फैलता जाता है और बड़े तस्कर खुद को सुरक्षित रखते हैं।
एक्साइज विभाग के अधिकारियों का कहना है कि तस्कर जानबूझकर स्कूल और कॉलेज के छात्रों को ही डीलर बनाते हैं, क्योंकि नाबालिगों पर पुलिस का शक कम जाता है। कोच्चि के एक पॉलीटेक्निक कॉलेज में हाल ही में पुलिस ने छापा मारा तो पाया कि कई छात्र कैंपस में गांजा बेच रहे थे। पहली बार पकड़े गए छात्रों पर मुकदमा नहीं चला लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया कि नशे का नेटवर्क अब स्कूल-कॉलेजों तक पहुँच चुका है।
केरल में बेरोजगारी भी इस समस्या को बढ़ाने वाला बड़ा कारण है। राज्य में हर साल हजारों ग्रेजुएट निकलते हैं लेकिन उनके सपनों के मुकाबले अवसर बहुत कम हैं। कई युवा बिना नौकरी के खाली बैठे रहते हैं और इसी खालीपन को नशा भर देता है। धीरे-धीरे कई लोग खुद नशा बेचने लगते हैं ताकि कुछ कमाई कर सकें।
इसके अलावा, केरल से बड़ी संख्या में लोग विदेशों खासकर खाड़ी देशों में काम करने जाते हैं। उनके बच्चे यहाँ अकेले रह जाते हैं। माँ-बाप की गैरमौजूदगी में बच्चों को वही भावनात्मक सहारा और मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। ऐसे किशोर अक्सर भावनात्मक खालीपन या विद्रोह के चलते नशे की तरफ मुड़ जाते हैं।
नशे की यह समस्या केवल केरल में रहने वालों तक सीमित नहीं है बल्कि उन लोगों में भी फैल रही है जो विदेश से लौटकर आते हैं। उत्तर केरल के एक नशामुक्ति केंद्र में 28 वर्षीय युवक ने बताया कि अबू धाबी में काम करते वक्त उसके साथी मलयाली साथियों ने ही उसे ‘कल्लू’ यानी क्रिस्टल मेथ से परिचित कराया। उसकी कहानी इस नए चलन की झलक देती है, जहाँ प्रवासी जीवन, विदेशी माहौल और डिजिटल पहुँच मिलकर नशे के नए अंतरराष्ट्रीय जाल बना रहे हैं।
फैलते तस्करी मार्ग और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क
खुफिया एजेंसियों के अनुसार, भारत के कुल नशीले पदार्थों के व्यापार का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान से जुड़ी डी-कंपनी (दाऊद इब्राहिम सिंडिकेट) के नियंत्रण में है, जो परंपरागत रूप से उत्तर भारत के रास्ते ड्रग्स की सप्लाई करती थी। लेकिन अब केरल इस नेटवर्क का नया ठिकाना बन चुका है।
2024 से राज्य सरकार ने नशे के खिलाफ अपने अभियानों को तेज किया है। ‘ऑपरेशन डी-हंट’ के तहत विशेष दस्तों ने अचानक छापेमारी अभियान चलाए। बताया जाता है कि 22 फरवरी से 1 मार्च 2025 के बीच पुलिस ने 17,256 संदिग्धों की जाँच की, 2,762 एनडीपीएस (NDPS) मामले दर्ज किए और 2,854 लोगों को गिरफ्तार किया।
उसी हफ्ते के दौरान, एजेंसियों ने 1.3 किलो MDMA, 153.5 किलो गांजा, और थोड़ी मात्रा में हेरोइन व हैश ऑयल जब्त किया। इसके बाद 11 सितंबर 2025 को पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर छापेमारी की गई, जिसमें 146 गिरफ्तारियाँ और 140 नए केस दर्ज हुए। MDMA और गांजा दोनों बरामद हुए। प्रमुख कार्रवाइयों में अगस्त 2024 में हैदराबाद में एक फार्मा यूनिट के नाम पर चल रही MDMA लैब का भंडाफोड़ और सितंबर 2024 में ओडिशा में गांजा की खेती चला रहे एक केरल निवासी की गिरफ्तारी शामिल थी।
हालाँकि, गिरफ्तारियों का पैटर्न अभी भी ठीक नहीं नजर आता है है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ों के मुताबिक, 2022 में केरल में NDPS कानून के तहत हुई कुल गिरफ्तारियों में से करीब 93.7% मामले ‘निजी इस्तेमाल’ के थे। लगभग 26,600 गिरफ्तारियों में से केवल 1,660 तस्कर थे जबकि 24,959 लोग ‘कम मात्रा’ में ड्रग्स रखने वाले उपभोक्ता थे।
नशे के नेटवर्क इस कानून का फायदा उठाते हैं और वे माल को ‘व्यावसायिक मात्रा’ की सीमा से कम-कम बाँट देते हैं (जैसे 0.5 ग्राम MDMA से कम या 1 किलो गांजा से कम) ताकि गिरफ्तारी होने पर जमानत मिल सके और सजा से बचा जा सके। पुलिस अब फॉलो-अप छापों के जरिए इन छोटी मात्राओं को जोड़कर बड़े केस तैयार कर रही है और सरकार से ‘कम मात्रा’ की परिभाषा पर पुनर्विचार की माँग कर रही है।
नाबालिगों और पहली बार पकड़े गए लोगों के मामलों में अधिकारियों के पास कुछ विवेकाधिकार भी होता है। उदाहरण के लिए, 2023 में कोच्चि के एक हॉस्टल में कुछ छात्रों को थोड़ी मात्रा में ड्रग्स के साथ पकड़ा गया था। पुलिस ने उन पर केस दर्ज नहीं किया बल्कि निगरानी में रखा। रिपोर्टों के अनुसार, राज्य में हर साल हजारों लोगों को NDPS के तहत सजाएँ दी जाती हैं लेकिन इनमें अधिकतर छोटे विक्रेता और उपभोक्ता ही होते हैं।
सकारात्मक बात यह है कि समाज और धार्मिक संगठन भी अब इस संकट से निपटने के लिए आगे आ रहे हैं। नशामुक्ति केंद्रों में अब तक एक लाख से अधिक बाह्य रोगी (OPD) और हजारों भर्ती मरीजों का इलाज किया जा चुका है। यह एक अच्छी शुरुआत है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि राज्य में नशे की समस्या नियंत्रण में आ रही है।
संकट से समाधान की ओर: क्या है आगे का रास्ता?
इसमें कोई संदेह नहीं कि केरल की नशे की समस्या से निपटने के लिए केवल पुलिसिया कार्रवाई काफी नहीं है। विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं की राय भी यही है कि अब एक सामूहिक प्रयास की जरूरत है। इसका मुख्य उद्देश्य रोकथाम और जागरूकता पर होना चाहिए।
क्योंकि अब स्कूल और कॉलेज नशा तस्करों के निशाने पर हैं, इसलिए शैक्षणिक संस्थानों में संगठित नशा-रोधी शिक्षा कार्यक्रम और छात्रों द्वारा संचालित ‘पीयर-एजुकेशन’ मॉडल जरूरी हैं ताकि बच्चे खुद जागरूक होकर साथियों को बचा सकें।
सोशल मीडिया भी युवाओं को नशे से दूर रखने में एक बड़ी भूमिका निभा सकता है। राज्य में अब शिक्षकों और अभिभावकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है ताकि वे नशे की लत के शुरुआती संकेत पहचान सकें। यह शुरुआती रोकथाम किसी भी तरह की लत को बढ़ने से रोकने में मदद करती है।
राज्य सरकार ने स्कूलों में ‘रैंडम ड्रग टेस्टिंग’ का प्रस्ताव भी रखा है। यह भले विवादित हो लेकिन यह दिखाता है कि अब खुद सरकार भी मानती है कि नशा शिक्षा संस्थानों के भीतर तक घुस चुका है।
प्रवर्तन एजेंसियाँ अब खासकर MDMA और मेथामफेटामाइन जैसे सिंथेटिक ड्रग्स और बड़े सप्लाई नेटवर्क पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। हालाँकि, हैरानी की बात यह है कि 590 किलोमीटर लंबे तट की निगरानी के लिए फिलहाल सिर्फ एक कोस्ट गार्ड पोत ही उपलब्ध है। राज्य अब स्कैनर, ड्रोन और साइबर मॉनिटरिंग सिस्टम में निवेश कर रहा है ताकि तस्करी और डार्कनेट पर हो रही डील्स पर नजर रखी जा सके।
चिंता की बात यह है कि राज्य में नशामुक्ति की क्षमता माँग के अनुपात में बहुत कम है। सरकारी और निजी साझेदारी के तहत अब तक करीब 1.47 लाख लोगों का इलाज हुआ है लेकिन मानसिक स्वास्थ्य सहायता और पुनर्वास की व्यवस्था अभी भी कमजोर है।
जब तक रोकथाम, शिक्षा और सामाजिक हस्तक्षेप की गति गिरफ्तारियों से तेज नहीं होती, तब तक ‘नशामुक्त केरल’ का सपना सिर्फ एक नारा बनकर रह जाएगा कहीं कोई हकीकत नहीं होगी।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़े सकते हैं।)
पंजाब के लुधियाना में इन दिनों एक टीवी डिबेट को लेकर खासी हलचल मची हुई है। मशहूर न्यूज चैनल आज तक की एंकर अंजना ओम कश्यप पर महर्षि वाल्मीकि को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगा है। वाल्मीकि समाज के एक संगठन ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद पुलिस ने एफआईआर ठोक दी।
यह मामला न सिर्फ मीडिया की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े कर रहा है, बल्कि सदियों पुरानी एक लोककथा को भी फिर से उछाल रहा है। क्या वाकई महर्षि वाल्मीकि पहले डाकू थे? या यह सिर्फ एक काल्पनिक कहानी है? आइए पहले इस ताजा विवाद को समझते हैं, फिर उस लोककथा की गहराई में उतरते हैं जो आज भी बहस का विषय बनी हुई है।
कैसे शुरू हुआ महर्षि वाल्मीकि को लेकर विवाद
यह मामला 7 अक्टूबर 2025 को शुरू हुआ। अंजना ओम कश्यप अपने पॉपुलर शो ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में एक डिबेट कर रही थीं। बहस का मुद्दा था पवित्रता और परिवर्तन। एंकर ने उदाहरण के तौर पर महर्षि वाल्मीकि की प्रचलित कहानी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वाल्मीकि जी का पुराना नाम रत्नाकर था, जो एक डाकू हुआ करते थे। वे लोगों को लूटते थे, लेकिन नारद मुनि से मिलने के बाद उनका जीवन बदल गया।
एक पल की चेतना ने उन्हें राम भक्त बना दिया और वे रामायण के रचयिता बने। अंजना ने इसे सकारात्मक बताया कि कोई भी इंसान बदल सकता है, चाहे वह कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो। लेकिन यह बात वाल्मीकि समाज को चुभ गई। संगठन का कहना है कि महर्षि वाल्मीकि को डाकू बताना उनका अपमान है। वे तो आदिकवि हैं, ब्रह्मा के पौत्र, जिन्होंने रामायण लिखी। इस तरह की बातें समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाती हैं।
यशपाल ने एफआईआर की माँग की, वरना यह राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन बन सकता है। संगठन के प्रमुख संयोजक विजय दानव आम आदमी पार्टी के नेता और पंजाब सरकार के दलित विकास बोर्ड के चेयरमैन भी हैं। उन्होंने कहा, “वाल्मीकि जी हमारे भगवान हैं। उनकी कहानी को तोड़-मरोड़कर पेश करना बर्दाश्त नहीं। अंजना ओम कश्यप की तत्काल गिरफ्तारी हो और वे सार्वजनिक माफी माँगें।”
लुधियाना में तो समाज के लोगों ने सड़कों पर उतरकर विरोध जताया। अंजना की फोटो पर जूते-चप्पल फेंके गए, जूतों की माला पहनाई गई। कम से कम 13 दलित और एससी संगठनों ने भी शिकायत की। पुलिस ने कानूनी सलाह के बाद एफआईआर दर्ज की। इसमें भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का इरादा) और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(v) (समुदाय के सम्मानित व्यक्ति का अपमान) लगाई गई।
जाँच डीएसपी रैंक के अधिकारी को सौंपी गई है और फाइल पुलिस कमिश्नर के पास भेज दी गई। कमिश्नर स्वापन शर्मा ने कहा, “हमने लीगल ओपिनियन लिया। जाँच चल रही है।”
एफआईआर में अंजना के अलावा ग्रुप चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरून पुरी और कंपनी लिविंग मीडिया इंडिया लिमिटेड का नाम भी जोड़ा गया है।
यह विवाद मीडिया फ्रीडम और कम्युनिटी सेंसिटिविटी के बीच की लाइन को धुँधला कर रहा है। एक तरफ अभिव्यक्ति की आजादी, दूसरी तरफ धार्मिक आस्था। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने 2022 में एक इसी तरह के केस में एफआईआर रद्द कर दी थी, जहाँ किसी ने वाल्मीकि को डाकू कहा था। कोर्ट ने कहा था कि महापुरुष इंसान से देवता बने, यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन यहाँ मामला एससी/एसटी एक्ट का है, तो केस आगे बढ़ रहा है।
कहाँ से आई वो कहानी, जो अंजना ने सुनाई
अब सवाल यह है कि अंजना ने जो कहानी सुनाई, वह कहाँ से आई? यह कोई नई बात नहीं। यह सदियों पुरानी लोककथा है, जो वाल्मीकि जयंती पर हर साल सुनाई जाती है। लेकिन विद्वान कहते हैं कि यह कथा रामायण के मूल ग्रंथ से मेल नहीं खाती। महर्षि वाल्मीकि को डाकू बताने वाली यह कहानी आठवीं शताब्दी के बाद प्रचलित हुई। और इसमें रत्नाकर और अग्निशर्मा जैसे नाम अलग-अलग हैं।
आइए इस लोककथा को विस्तार से समझें, उसके प्रमाण देखें और जानें कि यह कैसे बनी, कैसे फैली। यह कथा न सिर्फ मनोरंजक है, बल्कि हमें हमारी सांस्कृतिक विरासत की गहराई दिखाती है।
लोककथाओं की दुनिया में वाल्मीकि जी की कहानी सबसे प्रेरणादायक मानी जाती है। रामायण तो हर घर में है – राम-सीता की कथा, रावण वध, लंका दहन। लेकिन इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि के बारे में जो प्रचलित कथा है, वह कहती है कि वे पहले एक क्रूर डाकू थे। उनका नाम रत्नाकर था। जंगल में रहते थे, राहगीरों को लूटते, मारते-काटते। परिवार के लिए यह सब करते। लेकिन एक दिन भगवान की कृपा हुई और वे ऋषि बने।
यह कहानी स्कूलों में पढ़ाई जाती है, टीवी पर दिखाई जाती है, रामलीला में गाई जाती है। लेकिन क्या यह सच्ची है? विद्वान कहते हैं- नहीं, ये सही बात नहीं है। बल्कि यह एक लोकप्रिय कथा है, जो पुराणों में बाद में जोड़ी गई। असली वाल्मीकि तो ब्राह्मण कुल में जन्मे, ब्रह्मा के पौत्र थे। उन्होंने कभी पाप नहीं किया।
रामायण से समझें महर्षि वाल्मीकि के बारे में
सबसे पहले समझिए कि रामायण क्या है। वाल्मीकि रामायण संस्कृत का पहला महाकाव्य है, आदिकाव्य। इसमें सात कांड हैं – बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा, सुंदर, युद्ध और उत्तर। वाल्मीकि ने खुद लिखा कि वे प्रचेता मुनि के दसवें पुत्र हैं। उत्तरकांड में राम दरबार में वे कहते हैं – “हे राम! मैं प्रचेता का पुत्र हूँ। मनसा, कर्मणा, वाचा – कभी पाप नहीं किया। भूतपूर्वं न किल्विषम्।” मतलब, पहले कभी कोई दोष नहीं।
प्रचेता ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। तो वाल्मीकि ब्रह्मा के पौत्र। वे जन्म से ही ज्ञानी, ब्राह्मण। तमसा नदी के तट पर उन्होंने रामायण रची। एक क्रौंच पक्षी को शिकारी मारते देख दुख से ‘मरा’ शब्द निकला, जो संस्कृत में शोक है। ब्रह्मा ने कहा – इसी से काव्य रचो। लेकिन डाकू वाली कथा? रामायण में इसका जिक्र ही नहीं।
कहाँ से आई महर्षि वाल्मीकि के डाकू होने वाली बात?
अब आती है डाकू वाली कथा। यह सबसे ज्यादा ‘स्कंद पुराण’ में मिलती है, जो आठवीं शताब्दी के आसपास लिखा गया। पुराणों में समय-समय पर जोड़तोड़ होती रही। दलित साहित्य के विद्वान ओमप्रकाश वाल्मीकि अपनी किताब ‘सफाई देवता‘ में कहते हैं – यह कथा तार्किक नहीं है। छठी शताब्दी से पहले के किसी ग्रंथ में वाल्मीकि को डाकू नहीं कहा। वे एक क्रांतिकारी ऋषि थे।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी माना – वाल्मीकि डाकू नहीं थे। डॉ. मंजुला सहदेव के शोध में भी यही मिला। लीलाधर शर्मा ‘पर्वतीय’ की ‘भारतीय संस्कृति कोष‘ में लिखा – वाल्मीकि के भाई ऋषि भृगु थे। दोनों ज्ञानी। डाकू वाला वाल्मीकि अलग था। कुछ कथाओं में तो अंगुलिमाल (बुद्ध काल का डाकू) को भी वाल्मीकि बता दिया जाता है। कुल मिलाकर देखें तो महर्षि वाल्मीकि से जुड़ी लोक कहानियों में हेरफेर बहुत हुआ है।
महर्षि वाल्मीकि के अग्निशर्मा डाकू होने वाली प्रचलित कहानी कौन सी है?
प्रचलित कथा क्या कहती है? एक वर्जन में वाल्मीकि का नाम अग्निशर्मा था। वे ब्राह्मण थे, लेकिन परिवार का पेट पालने कोशिश में जंगल चले गए। अकाल पड़ा, परिवार भूखा। वहाँ डाकुओं की संगत लगी। अग्निशर्मा लूटने लगे। एक दिन सप्तर्षि गुजरे। उन्होंने रोका। अत्रि मुनि ने पूछा – परिवार के लिए लूटते हो, क्या वे तुम्हारे पाप में साथ देंगे? अग्निशर्मा घर गए। सबने मना कर दिया। अग्निशर्मा टूट गए। वापस ऋषियों के पास पहुँते।
ऋषियों ने उन्हें ‘राम’ मंत्र दिया। लेकिन अग्निशर्मा उल्टा बोलते थे, तो ‘मरा-मरा’ जपने को कहा। उन्होंने भीषण तपस्या की। इस दौरान दीमकों ने उनका शरीर ढक लिया। इसे संस्कृत में वल्मीक कहते हैं। ऐसे में ऋषियों ने उनका नाम रखा- वाल्मीकि। उन्होंने शिव की भक्ति की और फिर रामायण रची। यह कथा ‘भक्तमाल’ में है, जो 1585 में नाभादास ने लिखी थी। इसमें 200 भक्तों की कहानियाँ हैं।
रत्नाकर डाकू से जुड़ी कहानी भी जाननी जरूरी
दूसरा वर्जन है उनके रत्नाकर नाम को लेकर। जिसमें एक भीलनी ने बचपन में उनका अपहरण कर लिया। वो भील परिवार में पले-बढ़े। यहाँ वो डाकू बने, जिनके नारद मुनि मिले। उन्होंने नारद मुनि को लूटना चाहा। हालाँकि नारद मुनि ने उन्हें राम जप के लिए तैयार किया। लेकिन रत्नाकर अनपढ़ थे। वो राम नहीं बोल पाए। ऐसे में उन्होंने मरा-मरा का जाप किया, जो राम में बदल गया।
आगे की कहानी में फिर से दीमकों का घेरा है। ब्रह्मा जी के प्रसन्न होने की कहानी है और वाल्मीकि नाम पड़ने की। यह कथा रामचरितमानस में तुलसीदास ने छुआ – “उल्टा नाम जपत जग जाना, बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।” लेकिन तुलसी 16वीं शताब्दी के हैं। मूल रामायण से बहुत बाद। अध्यात्म रामायण, कृतिवास रामायण में भी ऐसी कहानियां हैं। लेकिन ये बाद की हैं। वैशाख नाम के ब्राह्मण की कथा भी मिलती – जिसमें वो पापी बने और फिर तप से वाल्मीकि। श्रीभागवतानंद गुरु की किताब ‘उत्तरकाण्ड प्रसंग एवं संन्यासाधिकार विमर्श‘ में इसकी चर्चा विस्तार से है।
यह कथा कबसे प्रचलित कही जाती है। करीब आठवीं शताब्दी से, जो स्कंद पुराण में विकसित रूप में है। तैत्तिरीय संहिता में वाल्मीकि का जिक्र तीन बार हुआ है, लेकिन कवि के रूप में। महाभारत में भी कवि का ही उल्लेख है। ओमप्रकाश कहते है कि वाल्मीकि नाम तो प्रचलित है, रत्नाकर की कहानी भी, लेकिन डाकू अलग थे।
ये कथा 8वीं सदी के बाद फैली क्योंकि पुराणों में जोड़े गए। रत्नाकर शायद कोई लोक नायक था, जो बाद में वाल्मीकि से जोड़ दिया गया। अग्निशर्मा ब्राह्मण कुल का था, डाकू संगत में फँस गया। दोनों अलग लेकिन कथाएँ मिला दी गईं। आज टीवी पर ये दिखाना आसान है, जो भावनाओं को ठेस पहुँचा सकता है। अंजना का शो इसी कथा पर था, जो एडिट होकर वायरल हुई।
महर्षि वाल्मीकि की पूजा मंदिरों में होती है। देश ही नहीं, विदेशों में भी। पंजाब समेत उत्तर भारत में महर्षि के अनगिनत मंदिर हैं, जहाँ उन्हें पूजा जाता है। बहरहाल, वाल्मीकि जयंती पर ये विवाद और गहरा गया। समाज आंदोलन की तैयारी में है। ये बहस लंबी चलेगी। फिलहाल जाँच चल रही है। अब देखना ये है कि इस पूरे विवाद पर कोर्ट क्या कहता है।
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने IRCTC घोटाले में लालू यादव, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को आरोपित माना है। अब कोर्ट में मामले का ट्रायल चलेगा। आरोपित मानते हुए कोर्ट ने कहा कि घोटाले की साजिश लालू यादव के नेतृत्व में रची गई है। कोर्ट ने यह भी माना कि घोटाले से लालू परिवार को काफी फायदा पहुँचा है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने लालू यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार, आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के आरोप तय किए हैं। इसके अलावा लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव और उनकी पत्नी राबड़ी देवी पर साजिश और धोखाधड़ी समेत कई आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों के तहत ही अब कोर्ट में तीनों पर ट्रायल चलेगा।
कोर्ट ने लालू यादव पर IPC 420, IPC 120B, प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 13(2) और 13 (1)(d) की धाराओं के तहत आरोप तय किए हैं। वहीं राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को धारा 120 बी और IPC 420 में आरोपित माना है। अगर तीनों के खिलाफ इन धाराओं में आरोप कोर्ट में सिद्ध हो जाते हैं तो 7 साल तक की सजा होगी।
सोमवार (13 अक्टूबर 2025) को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में हुई सुनवाई में लालू यादव व्हील चेयर से पहुँचे। उनके साथ तेजस्वी यादव और राबड़ी देवी भी कोर्ट पहुँचे थे। उन्होंने इन आरोपों को निराधार बताया। वहीं कोर्ट ने लालू परिवार से जुड़े लैंड फॉर जॉब्स मामले में फैसले को टालकर अगली सुनवाई की तारीख 10 नवंबर 2025 तय की है।
क्या है IRCTC घोटाला?
IRCTC घोटाला तब का है, जब लालू यादव साल 2004 से 2009 के बीच भारत के रेल मंत्री थे। रेल मंत्री रहते हुए लालू यादव ने रेल मंत्रालय के अधीन IRCTC के दो होटल- राँची का BNR होटल और ओडिशा के पुरी होटल के रखरखाव और सुधार के ठेकों के आवंटन में भ्रष्टाचार किया।
लालू यादव ने इन ठेकों को अपनी पत्नी राबड़ी देवी के स्वामित्व वाली कंपनी सुजाता होटल्स प्राइवेट लिमिटेड को अनुचित रूप से दिलवाया। इसके बदले में कंपनी ने लालू यादव के परिवार को फायदा पहुँचाया। ठेकों में IRCTC के पूर्व ग्रुप जनरल मैनेजर वीके अस्थाना, आरके गोयल और सुजाता होटल्स के निदेशक रहे विजय कोचर और विनय कोचर भी आरोपित हैं। CBI ने मामले में कुल 14 लोगों को आरोपित बनाया।
CBI का आरोपपत्र
IRCTC घोटाले की जाँच CBI के हाथों में है। CBI ने 14 लोगों को मामले में आरोपित बनाया है, जिन्हें अब कोर्ट ने भी आरोपित मान लिया है। मामले में CBI ने कोर्ट में जो आरोपपत्र दाखिल किया है। उसमें कहा गया कि ठेके पर जिस कंपनी को जमीन दी गई है, उसने निविदा प्रक्रिया में धाँधली और हेराफेरी के आरोप लगाए हैं और निजी संस्था सुजाता होटल्स की मदद के लिए शर्तों में फेरबदल किया गया है।
दुर्गापुर के मेडिकल कॉलेज की छात्रा से हुए गैंगरेप मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ‘झूठ’ बोलने को लेकर सियासत गर्म है। ममता बनर्जी ने लड़की के रात 12 बजे एक लड़के के साथ बाहर जाने पर सवाल उठाया है। जबकि लड़की रात 8 बजे बाहर गई थी। अस्पताल के बाहर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होनी चाहिए, न की सिर्फ मेडिकल कॉलेज की। ममता बनर्जी इस मामले पर भी राजनीति करती नजर आ रही हैं।
विपक्षी दलों और महिला अधिकार समूहों ने उन पर ‘पीड़िता को दोषी ठहराने’ का आरोप लगाया है। रविवार (12 अक्टूबर) को इस दर्दनाक घटना पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि लड़कियों को अपनी सुरक्षा के लिए रात में कॉलेज परिसर से बाहर निकलने से बचना चाहिए।
#WATCH | Kolkata, WB: On the alleged gangrape of an MBBS student in Durgapur, CM Mamata Banerjee says, "… The girls should not be allowed to go outside (college) at night. They have to protect themselves also. There is a forest area. Police are searching all the people. Nobody… https://t.co/9cck7wwxcnpic.twitter.com/OnuFiFSIAz
कोलकाता हवाई अड्डे पर पत्रकारों से बात करते हुए, मुख्यमंत्री ने कहा, “लड़कियों को रात में कॉलेज से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उन्हें अपनी सुरक्षा भी करनी होगी।”
सीएम ममता बनर्जी ने कहा, “वह एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में पढ़ रही थी, तो जिम्मेदारी किसकी है? रात 12.30 बजे बाहर क्यों गई? जाँच चल रही है, लेकिन प्राइवेट मेडिकल कॉलेज को अपने छात्रों पर ध्यान देने की जरूरत है। खास तौर पर रात को छात्राओं को बाहर जाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।”
इस बीच पीड़िता के पिता ने उसकी सुरक्षा के मद्देनजर उसे ओडिशा शिफ्ट करने को कहा है। उनका कहना है कि लड़की की जान खतरे में है।
ममता बनर्जी ने झूठ बोला- बीजेपी
बीजेपी ने सीएम ममता बनर्जी पर जनता को गुमराह करने और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट कर पूछा है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लड़की के रात 12:30 बजे बाहर होने के बारे में कहा, जो गलत था। सच्चाई यह है कि आईक्यू सिटी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के अनुसार, लड़की रात 8 बजे बाहर गई थी, जो किसी भी मानक से उचित समय है।
West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee LIED about the girl being out at 12:30 a.m.
The truth is that, as per IQ City Medical College & Hospital, the girl went out at 8 p.m., which is a decent hour by any standard.
दलित छात्रा के साथ कॉलेज परिसर में सामूहिक बलात्कार नहीं हुआ था। बल्कि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी पुलिस और राज्य प्रशासन की है। मुख्यमंत्री ने मेडिकल कॉलेज पर दोष मढ़ने की कोशिश की।
मेडिकल कॉलेज के पास का वन क्षेत्र आपराधिक गतिविधियों का केन्द्र माना जाता है। यहाँ उचित स्ट्रीट लाइटिंग की व्यवस्था नहीं है। दुर्गापुर के स्थानीय लोग ये जानते हैं। पश्चिम बंगाल पुलिस इस क्षेत्र की सुरक्षित बनाने में विफल रही।
मेडिकल कॉलेज की छात्रा के साथ गैंगरेप
दुर्गापुर की एक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज के दूसरे वर्ष की छात्रा के साथ गैंगरेप हुआ था। वह रात 8 बजे अपने पुरुष दोस्त के साथ खाना खाने बाहर गई थी। लड़की का कुछ लोगों ने पीछा किया और दोनों पर हमला किया। इस दौरान उसका दोस्त भाग गया, लेकिन लड़की का गैंगरेप किया गया।
पीड़िता ओडिशा की रहने वाली है। उसके पिता के मुताबिक, अब वह बार बार कहती है कि उसे जीने की इच्छा नहीं रही। उसे मर जाना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वह खुद को नुकसान पहुँचा ले। इस मामले में पुलिस ने तीन आरोपितों अपु बाउरी, फिरदौस शेख और शेख रियाजुद्दीन को गिरफ्तार किया है। जबकि चौथा आरोपित अभी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है।
बंगाल की बिगड़ी कानून व्यवस्था पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। एमबीबीएस द्वितीय वर्ष की छात्रा के साथ हुआ सामूहिक बलात्कार भी राज्य की कानून व्यवस्था की पोल खोल रही है। कॉलेज के नजदीक का वह इलाका आपराधिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है, तो पुलिस यहाँ चौकन्ना क्यों नहीं थी। क्यों यहाँ आपराधिक तत्व मौजूद थे।
बीजेपी का कहना है कि आगामी चुनाव को देखते हुए मुस्लिम समुदाय का समर्थन पाने के लिए ममता बनर्जी जाँच ठीक से न कराएँ और आरोपितों को रिहा करने के लिए क्षेत्र के मुस्लिम समुदाय के नेताओं से बातचीत करती हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। उनकी राजनीतिक स्वार्थ के सामने एक महिला की जान और गरिमा की कोई कीमत नहीं है।
ममता बनर्जी का रेप को कमतर आँकने का इतिहास रहा
ममता बनर्जी ने एक बार फिर यौन उत्पीड़न के मामलों को कम आँकने की कोशिश की और विवादास्पद टिप्पणी की। पिछले कुछ वर्षों में, सीएम बनर्जी और उनकी टीएमसी के वरिष्ठ सदस्यों को बलात्कार की घटनाओं पर अपनी असंवेदनशील प्रतिक्रियाओं को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है।
सबसे अहम मामलों में एक 2012 का पार्क स्ट्रीट सामूहिक बलात्कार मामला था। 6 फरवरी 2012 को कोलकाता के पार्क स्ट्रीट से घर लौट रही एक एंग्लो-इंडियन महिला सुजेट जॉर्डन के साथ चलती कार में 5 लोगों ने रेप किया था।
खबर सामने आने के तुरंत बाद, टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने आरोपितो को क्लीन चिट दे दी। उन्होंने घटना को ‘शजानो घोटोना’ (मनगढ़ंत घटना) करार दिया, जो कथित तौर पर ‘सरकार को बदनाम करने के लिए रची गई थी।’
Recall the infamous Park Street Rape Case of 2012
Soon after the news surfaced, Mamata Banerjee dubbed the incident as ‘shajano ghotona‘ (concocted incident), which was allegedly ‘designed to malign the government.’
टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार समेत उनकी पार्टी के नेताओं ने पीड़िता के चरित्र पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाए और घटना को ‘एक महिला और उसके मुवक्किल के बीच गलतफहमी’ बताया। 2015 में, कोलकाता की एक अदालत ने तीन आरोपियों को दोषी ठहराया, जिससे साबित हुआ कि हमला हुआ था।
During a debate in the West Bengal Vidhan Sabha in 2013 about the rising cases of rapes in the State, Mamata Banerjee had insinuated that it was due to the rise in population.
She also blamed the heinous crime on increase in modernisaion, shopping malls and multiplexes.
2013 में, पश्चिम बंगाल विधानसभा में राज्य में बलात्कार के बढ़ते मामलों पर एक बहस के दौरान, मुख्यमंत्री ने इशारों-इशारों में कहा कि यह राज्य की बढ़ती आबादी के कारण है। उन्होंने बढ़ते बलात्कार के मामलों के लिए आधुनिकीकरण, शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स की बढ़ती संख्या को भी ज़िम्मेदार ठहराया था।
In one rape case in Burdwan’s Katwa in 2012, Mamata Banerjee dismissed the allegations even before the investigation was concluded.
“Harmad-der diye natok shajachhe jatey Banglar naam kharap hochhe"#Translation: They are staging an act to give a bad name to West Bengal.
इसी साल बर्धवान समेत दूसरे रेप मामले में भी उन्होंने आरोपों को दरकिनार किया। उस वक्त जाँच चल रही थी। उन्होंने विपक्ष पर बंगाल को बदनाम करने का आरोप लगाया
In April 2022, Mamata Banerjee again tried to downplay allegations of brutal rape and murder of a 14-year-old girl as a ‘love affair’ gone wrong.
The accused was identified as one Brajgopal, the son of Trinamool Congress (TMC) Gajna Gram Panchayat member Samar Gowla.
अप्रैल 2022 में, ममता बनर्जी उस समय विवादों में घिर गईं जब उन्होंने एक 14 वर्षीय लड़की के साथ हुए बलात्कार और हत्या के आरोपों को ‘प्रेम प्रसंग’ का मामला बताकर कमतर आँकने की कोशिश की। पीड़िता नदिया जिले के हंसखाली की रहने वाली थी।
The body of a 17-year-old Dalit girl was discovered in a canal in Kaliaganj on the morning of April 21.
In a viral video, the police were seen dragging the lifeless body of the victim along the ground.
The incident had drawn the ire of the locals in the area.
आरोपी की पहचान तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के गजना ग्राम पंचायत सदस्य समर गौला के बेटे ब्रजगोपाल के रूप में हुई है।
11 अप्रैल 2022 को उन्होंने दावा किया, “एक आम आदमी के रूप में, मैं कह रही हूँ कि किसी को यह सबूत कहाँ से मिलेगा कि लड़की के साथ वास्तव में बलात्कार हुआ था या वह गर्भवती थी। या कोई और कारण था, जैसे किसी ने उसे पीटा था या वह किसी बीमारी से मर गई थी?”
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया, “निश्चित रूप से प्रेम संबंध था, उसके परिवार को इसके बारे में पता था, और उनके पड़ोसियों को भी। अब अगर कोई लड़की और लड़का एक-दूसरे से प्यार करते हैं, तो मैं उन्हें सजा नहीं दे सकती।”
यहाँ तक कि 2023 में, उत्तर दिनाजपुर के कालियागंज में मृत पाई गई एक 17 वर्षीय दलित लड़की के मामले में भी, बनर्जी ने इस घटना को कम करके आँका और कहा कि यह एक प्रेम संबंध के कारण हुई आत्महत्या थी। पुलिस जाँच पूरी होने से पहले ही उन्होंने कहा, “हमने व्हाट्सएप संदेश देखे हैं… प्रेम संबंध था।”
पीड़ितों को दोषी ठहराने का एक पैटर्न
पार्क स्ट्रीट से लेकर दुर्गापुर तक, बनर्जी के बयानों ने पुलिस व्यवस्था और महिला सुरक्षा में व्यवस्थागत कमियों को दूर करने के बजाय, पीड़ितों पर दोष मढ़ने की प्रवृति रही है। विपक्षी दलों और महिला संगठनों का कहना है कि उनकी बार-बार की गई टिप्पणियाँ ‘इनकार की एक खतरनाक संस्कृति’ को दर्शाती हैं जो पीड़ितों को आगे आने से हतोत्साहित करती है।
दुर्गापुर की जाँच जारी रहने के दौरान ममता बनर्जी के पीड़िता की हॉस्टल से निकलने की टाइमिंग को झूठ बता कर सियासी बवाल पैदा कर दिया है। ये न केवल एक जघन्य अपराध के बारे में, बल्कि सत्ता में बैठे उन लोगों की मानसिकता के बारे में भी सवाल खड़े करती है, जो महिलाओं की सुरक्षा को राज्य की बजाय अपनी ज़िम्मेदारी मानते हैं।
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में शनिवार (11 अक्टूबर 2025) को पुलिस ने रायपुरा थाना क्षेत्र के घुनुवा गाँव में एक ईसाई धर्मांतरण रैकेट को नाकाम किया। यह कार्रवाई तब हुई जब विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने इलाके में हो रहे जबरन धर्मांतरण की सूचना पुलिस को दी।
पुलिस ने दो पुरुषों को गिरफ्तार किया, जबकि एक आरोपित फरार हो गया। मौके से ईसाई धार्मिक साहित्य भी जब्त किया गया। बजरंग दल के जिला सह-समन्वयक शिवेंद्र प्रताप सिंह ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि इलाके में करीब 40% गरीब हिंदू पहले ही ईसाई मजहब में परिवर्तित हो चुके हैं।
घुनुवा गाँव में धर्मांतरण गतिविधि की सूचना
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बजरंग दल के जिला सह-समन्वयक शिवेंद्र प्रताप सिंह को जानकारी मिली कि घुनुवा गाँव में एक भारत वर्मा के घर पर धर्मांतरण बैठकें हो रही हैं। शिवेंद्र और उनके साथी कार्यकर्ताओं ने विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के साथ गाँव पहुँचकर रायपुरा पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने तुरंत घर पर छापा मारा, जिससे कई लोग मौके से भाग गए।
शुरुआत में पुलिस ने पूछताछ के लिए सात लोगों को हिरासत में लिया। शुरुआती पूछताछ के बाद चार ग्रामीणों को छोड़ दिया गया। तीन लोगों पर स्थानीय लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए पैसे देने का आरोप लगा। मौके से पुलिस ने कई नोटबुक और ईसाई मजहब से संबंधित धार्मिक सामग्री जब्त की।
ग्रामीणों ने आर्थिक प्रलोभन और हिंदू देवी-देवताओं के अपमान का आरोप लगाया
छापे के बाद स्थानीय ग्रामीणों ने शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उन्होंने घुनुवा गाँव के भारत वर्मा और रामविशाल तथा मौ थाना क्षेत्र के हटवा गाँव के महेश पर आरोप लगाया कि वे करीब एक साल से उन्हें जबरन ईसाई मजहब अपनाने के लिए मजबूर कर रहे थे। आरोपितों ने पैसे देने के साथ-साथ हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियाँ भी कीं। आरोपित गरीब हिंदू परिवारों को प्रभावित करने के लिए प्रार्थना बैठकें और बाइबल की कहानियाँ सुनाने के कार्यक्रम आयोजित कर रहे थे।
बजरंग दल के शिवेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं, ‘40% गरीब हिंदुओं ने धर्म परिवर्तन किया।’
बजरंग दल के शिवेंद्र सिंह और अश्विनी तिवारी ने इस मामले में शिकायत दर्ज कराई, जिसे ऑपइंडिया ने देखा। शिकायत में उन्होंने बताया कि भारत वर्मा रामविशाल और महेश की मदद से एक साल से अधिक समय से प्रार्थना बैठकें आयोजित कर रहा था। आरोप है कि उन्होंने गरीब हिंदू परिवारों को पैसे देकर ईसाई मजहब में परिवर्तित किया। बैठकों के दौरान वे हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते और ईसा मसीह की तारीफ करते थे।
ऑपइंडिया से खास बातचीत में शिवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि चित्रकूट में कई ईसाई और इस्लामिक समूह धर्मांतरण रैकेट में शामिल हैं। उन्होंने बताया की “स्थानीय गरीब हिंदू आबादी का लगभग 40% हिस्सा पहले ही ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुका है। हम उनके लिए घर वापसी का प्रयास कर रहे हैं,”
शिवेंद्र ने कहा, “बजरंग दल इन समूहों और व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। जब हमें सूचना मिलती है, तो हम पहले पुष्टि करते हैं कि हिंदुओं को ईसाई मत में बदलने के लिए प्रार्थना बैठकें हो रही हैं। पुष्टि होने पर हम तुरंत स्थानीय पुलिस स्टेशन से संपर्क करते हैं। ज्यादातर मामलों में पुलिस तुरंत कार्रवाई कर इन रैकेट को बंद कर देती है। केवल ईसाई समूह ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समूह भी हिंदुओं को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि केवल बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ही फर्क नहीं कर सकते। “हम धर्मांतरण रोकने के लिए व्यापक रूप से काम कर रहे हैं, लेकिन अकेले हम सबको रोक नहीं सकते। यह हर स्थानीय हिंदू का कर्तव्य है कि वे मिलकर इस तरह की गतिविधियों के खिलाफ आवाज उठाएँ।” शिवेंद्र ने पुष्टि की कि मामले में रविवार (12 अक्तूबर 2025) की सुबह FIR दर्ज की गई है और तीसरे आरोपित की तलाश जारी है।
पुलिस जाँच जारी
मीडिया से बात करते हुए रायपुरा थाना के थानाध्यक्ष इंस्पेक्टर विनोद शुक्ला ने पुष्टि की कि दो आरोपितों भारत वर्मा और रामविशाल सविता को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है। तीसरा आरोपित महेश फरार हो गया है और उसे पकड़ने के लिए तलाश शुरू कर दी गई है। जब्त किए गए मजहबी साहित्य की जाँच की जा रही है और ग्रामीणों के बयान दर्ज किए गए हैं।
अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि जाँच में आरोपों की पुष्टि होने के बाद उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस मामले ने स्थानीय लोगों में चिंता पैदा कर दी है और दक्षिणपंथी समूह जिले में गैरकानूनी धर्मांतरण गतिविधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)
कॉन्ग्रेस की वो पुरानी पोल अब खुद उनके बड़े नेता और पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने खोल दी है। कॉन्ग्रेस इंदिरा गाँधी को ‘शहीद’ बताकर हमेशा पॉलिटिकल फायदा उठाती रही है, लेकिन चिदंबरम ने साफ कहा कि ऑपरेशन ब्लू स्टार एक बड़ी ‘गलती’ थी, जिसे टाला जा सकता था।
इस गलती की कीमत इंदिरा गाँधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी और फिर 1984 में सिखों का खौफनाक कत्लेआम हुआ। कॉन्ग्रेस ने आज तक इन दंगों के लिए माफी नहीं माँगी।
दरअसल, इंदिरा गाँधी ने पहले तो जरनैल सिंह भिंडरावाले को बढ़ावा दिया, ताकि अकाली दल की पॉलिटिक्स को कमजोर कर सकें और पंजाब में अपनी पकड़ मजबूत करें। लेकिन जब बात हाथ से निकल गई, तो उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार करवाया। इसके बाद उनकी हत्या हो गई, और दिल्ली समेत कई जगहों पर कॉन्ग्रेस वालों ने सिखों का नरसंहार कर डाला। चलिए, पूरी कहानी को समझते हैं
भिंडरावाले को बढ़ावा देने की शुरुआत
पंजाब में 1980 के दशक में हालात बिगड़ रहे थे। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पंजाब को भारत से अलग करने की साजिश रच रही थी। भारत ने 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश छीना था, तो बदला लेने के लिए आईएसआई ने सिख आतंकवाद को हवा दी। जरनैल सिंह भिंडरावाले को उन्होंने अपना हथियार बनाया, जो खालिस्तान की माँग कर रहा था।
भिंडरावाले को प्रश्रय देने में कॉन्ग्रेस का हाथ था। इंदिरा गाँधी की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने उसे सपोर्ट किया, ताकि अकाली दल की पॉलिटिक्स पर हावी हो सकें। अकाली दल सिखों की मुख्य पार्टी थी और कॉन्ग्रेस चाहती थी कि पंजाब में उसकी ताकत कम हो।
साल 1981 में गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह (जो बाद में राष्ट्रपति बने) ने भिंडरावाले को जेल से छुड़वाया और कहा कि उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। 1982 में इंदिरा गाँधी ने बड़ा पॉलिटिकल मूव खेला और ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति बना दिया।
अप्रैल 1983 से भिंडरावाले ने स्वर्ण मंदिर को अपना हेडक्वार्टर बना लिया। कॉन्ग्रेस की ये रणनीति थी, जिसमें अरुण नेहरू, अरुण सिंह, कमलनाथ और संजय गाँधी जैसे लोग शामिल थे। अंत में ये आग पूरे पंजाब को जला गई, सिखों और पूरे देश का नुकसान हुआ।
ऑपरेशन ब्लू स्टार: राजनीतिक फायदे के लिए करवाया
जब पंजाब हिंसा की आग में जलने लगा, तो इंदिरा गाँधी ने समझौते की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। भिंडरावाले ने हथियारबंद आतंकियों के साथ स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया। खालिस्तानी अलगाववादी पंजाब की स्वायत्तता की माँग को उग्र बना रहे थे। 1984 में लोकसभा चुनाव होने वाले थे और खुद को ‘देशभक्त’ दिखाने के लिए इंदिरा गाँधी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को हरी झंडी दे दी।
ऑपरेशन ब्लू स्टार 3 से 6 जून 1984 तक चला। भारतीय सेना का मकसद अमृतसर के हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) को भिंडरावाले और उसके समर्थकों से मुक्त कराना था। 1 जून 1984 को खालिस्तानी आतंकियों से समझौता फेल होने के बाद 3 जून को सुरक्षा बलों ने मंदिर घेर लिया। एक बड़ी वजह ये भी थी कि 3 जून को गुरु अर्जुन देव का शहीदी दिवस था, और हजारों श्रद्धालु वहाँ जुटने वाले थे। मंदिर के अंदर भिंडरावाले की मोर्चाबंदी और बाहर सेना की, पूरे इलाके को छावनी बना दिया।
4 जून को सेना ने गोलीबारी शुरू की, 5 जून को भारी टक्कर हुई। 83 सैनिक मारे गए, 249 घायल हुए। 6 जून को भिंडरावाले की मौत की खबर आई, और सेना ने मंदिर को मुक्त कर लिया। लेकिन सिखों के पवित्र मंदिर में सेना का घुसना दुनिया भर के सिखों को गुस्सा दिला गया।
चिदंबरम ने कहा कि ये गलत तरीका था। उन्होंने बताया, “मैं किसी सैन्य अधिकारी का अनादर नहीं कर रहा, लेकिन स्वर्ण मंदिर को कब्जे में लेने का वो गलत रास्ता था। कुछ साल बाद हमने सेना को बाहर रखकर सही तरीका दिखाया। ऑपरेशन ब्लू स्टार सभी उग्रवादियों को पकड़ने के लिए था। मैं मानता हूँ कि श्रीमती गाँधी ने उस गलती की कीमत अपनी जान देकर चुकाई। वो गलती सेना, पुलिस, खुफिया और सिविल सर्विस का मिला फैसला था। सिर्फ श्रीमती गाँधी को दोषी नहीं ठहरा सकते।”
बीजेपी नेता अमित मालवीय ने उनका बयान शेयर कर पूछा है कि क्या अब कॉन्ग्रेस सच बोलने और उनके झूठे बयानों का पर्दाफाश करने के लिए चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई करेगी?
बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट किया कि कॉन्ग्रेस इंदिरा और राजीव गाँधी को ‘शहीद’ बताकर माइलेज लेती है, लेकिन चिदंबरम ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को गलती बताकर इस मिथक को तोड़ दिया। राजीव गाँधी की हत्या भी पड़ोसी देशों से निपटने में फेल होने का नतीजा थी। अब क्या कॉन्ग्रेस चिदंबरम के खिलाफ एक्शन लेगी, क्योंकि उन्होंने सच बोला और उनके झूठ का पर्दाफाश किया?
The Congress never misses a chance to claim that Indira Gandhi and Rajiv Gandhi were “martyrs.”
But senior Congress leader P. Chidambaram has now busted that myth — calling Operation Blue Star a mistake for which Indira Gandhi paid with her life. By the same logic, Rajiv… https://t.co/wnImZBsEKi
बीजेपी नेता आरपी सिंह कहते हैं, “ये विवादास्पद नहीं, सच है। ऑपरेशन टाला जा सकता था। गुरुद्वारे की बिजली-पानी काटकर या दूसरे रास्तों से आतंकियों को निकाला जा सकता था। लेकिन इंदिरा गाँधी सिर्फ चुनाव की चिंता में थीं। कॉन्ग्रेस को माफी माँगनी चाहिए। इससे बड़ा अपराध नहीं हो सकता। देश ऐसे अपराध को माफ नहीं करेगा। कॉन्ग्रेस के सारे फैसले पॉलिटिकल हैं।”
#WATCH | Delhi: On former HM and Congress leader P Chidambaram's remarks on Operation Blue Star, BJP leader RP Singh says, "It is not a controversial statement. He has told the truth. Operation Blue Star could have been avoided…The government did not want to explore those… pic.twitter.com/oF91wDUT50
3 से 6 जून 1984 तक भारतीय सेना द्वारा चलाए गए सैन्य कार्रवाई को ऑपरेशन ब्लू स्टार कहा जाता है। इसका मकसद अमृतसर (पंजाब) में हरिमंदिर साहिब परिसर को खालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों से मुक्त कराना था।
ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला 31 अक्टूबर 1984 को लिया गया। इंदिरा गाँधी के दो सिख बॉडीगार्ड्स, सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उन्हें गोली मार दी। हत्या के तुरंत बाद देश भर में सिख विरोधी दंगे भड़क उठे। दिल्ली समेत 40 से ज्यादा शहरों में ये हुआ। दिल्ली में सबसे खराब हालत थी, जहाँ 3,000 से ज्यादा सिख मारे गए। कुल मिलाकर करीब 15,000 लोग मारे गए, और कम से कम 50,000 सिखों को घर छोड़कर भागना पड़ा।
आरोप कॉन्ग्रेस नेताओं पर लगा कि उन्होंने ये दंगे भड़काए। फरवरी 2025 में दिल्ली की एक कोर्ट ने पूर्व कॉन्ग्रेस सांसद सज्जन कुमार को 1984 दंगों में सरस्वती विहार में दो सिखों की हत्या का दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा दी। कॉन्ग्रेस ने इन दंगों के लिए कभी माफी नहीं माँगी।
कॉन्ग्रेस का पुराना चरित्र और चिदंबरम की चुप्पी का टूटना
कॉन्ग्रेस हमेशा पॉलिटिकल फायदे के लिए फैसले लेती रही। मनमोहन सिंह सरकार में 26/11 मुंबई अटैक हुआ, तो पाकिस्तान पर सबूतों के बावजूद अटैक नहीं किया, क्योंकि डर था कि बीजेपी को फायदा हो जाएगा। ये खुलासा पूर्व अमेरिकी प्रेसिडेंट ओबामा ने अपनी किताब में किया। कॉन्ग्रेस के इसी चरित्र को जानते हुए चिदंबरम ने अब चुप्पी तोड़ी।
कॉन्ग्रेस की इन गलतियों का खामियाजा देश और जनता को भुगतना पड़ा। भिंडरावाले को बढ़ावा दिया, फिर हिंसा रोकने के नाम पर ऑपरेशन किया, हत्या हुई तो सिखों का कत्लेआम करवाया। चिदंबरम का बयान पुराने जख्म ताजा कर गया और साफ है कि कॉन्ग्रेस को इन सबके लिए माफी माँगनी चाहिए।
भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच व्यापार और आर्थिक भागीदारी समझौता (TEPA) आधिकारिक तौर पर 1 अक्टूबर, 2025 से लागू हो गया है। इससे आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड के साथ आर्थिक सहयोग के एक नए युग की शुरुआत हुई है। 10 मार्च, 2024 को नई दिल्ली में इस समझौते पर हस्ताक्षर हुआ था।
इस समझौते से अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर यानी 8 लाख 88 हजार 4 सौ करोड़ रुपए का निवेश होगा। साथ ही 10 लाख से ज्यादा सीधा रोजगार मिलेगा। इसके अलावा इससे जुड़े अप्रत्यक्ष रोजगार अलग होंगे। यह इन चार विकसित यूरोपीय देशों के साथ भारत का पहला मुक्त व्यापार समझौता है। वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच व्यापारिक समझौतों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
क्या है EFTA
चार यूरोपीय देशों, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड का ये संगठन व्यापार के दृष्टिकोण से काफी अहम हबै। इसकी स्थापना 1960 में सदस्यों के बीच मुक्त व्यापार और आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। यूरोप में यूके और यूरोपीय संघ के बाद EFTA अहम संगठन माना जाता है।
संगठन यूपोपीय संघ का हिस्सा नहीं हैं। चारों विकसित देश अपनी मजबूत अर्थव्यवस्थाओं, उच्च जीवन स्तर और इनोवेशन के लिए मशहूर हैं। इस समूह में मौजूद स्विट्जरलैंड पहले से ही भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। उसके बाद नॉर्वे का स्थान आता है। इस समझौते से भारतीय वस्तुओं और सेवाओं को नया बाजार मिलेगा। साथ ही अत्याधुनिक तकनीक और निवेश से भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
TEPA समझौता से कितना होगा फायदा
TEPA एक व्यापक और दूरदर्शी समझौता है। इसमें 14 अध्याय हैं, जो व्यापार के महत्वपूर्ण पहलुओं से जुड़े हैं। वस्तुओं के लिए बाज़ार तक पहुँच बनाना, व्यापार करना आसान बनाना, बेवजह की रुकावटों को दूर करना, पर्यावरण मानकों को मानना, व्यापार में तकनीकी बाधाएँ दूर करना, निवेश प्रोत्साहन, सेवाएँ, बौद्धिक संपदा अधिकार शामिल हैं।
किसी भी भारतीय मुक्त व्यापार समझौते में पहली बार ऐसा हुआ है कि समझौते में निवेश और रोजगार सृजन को बाध्यकारी बनाया गया है। ये ‘आत्मनिर्भरता भारत’ की दिशा में अहम कदम है। इस समझौते का लक्ष्य अगले पंद्रह वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर यानी 8 लाख 88 हजार 4 सौ करोड़ रुपए का निवेश और दस लाख प्रत्यक्ष रोजगार सृजित करना है, जो इसे देश के आर्थिक इतिहास की सबसे दूरदर्शी व्यापारिक साझेदारियों में से एक बनाता है।
टीईपीए के मूल में एक मजबूत निवेश प्रक्रिया है। इसमें ईएफटीए देशों को शुरुआती 10 वर्षों के दौरान भारत में 50 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने और उसके बाद के पाँच वर्षों में 50 अरब डॉलर का अतिरिक्त निवेश करने की प्रतिबद्धता होगी। ये रकम अल्पकालिक पोर्टफोलियो निवेशों के बजाय विनिर्माण, इनोवेशन और अनुसंधान में दीर्घकालिक परियोजनाओं में लगाई जाएँगी।
इनसे भारत के प्रतिभाशाली लोगों को यूरोप के उन्नत तकनीकी नेटवर्क से जोड़कर दस लाख प्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का अनुमान है। इसे आसान बनाने के लिए, फरवरी 2025 में निवेशकों के लिए एक भारत-ईएफटीए डेस्क की स्थापना की गई है। जो नवीकरणीय ऊर्जा, विज्ञान, इंजीनियरिंग और डिजिटल बदलाव जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता देते हुए, छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों को प्रोत्साहित करने के लिए संयुक्त उद्यमों और सहयोग को बढ़ावा देगा।
यह समझौता रणनीतिक रूप से टैरिफ को कम या पूरी तरह समाप्त करके संतुलित बाजार तक पहुँच को सुनिश्चित करेगा। EFTA ने अपनी 92.2 प्रतिशत उत्पादों पर टैरिफ में छूट दी है, जिसमें भारत के 99.6 प्रतिशत निर्यात शामिल हैं, जिसमें सभी गैर-कृषि वस्तुएँ और प्रोसेस्ड कृषि उत्पाद शामिल हैं। बदले में, भारत ने अपनी 82.7 प्रतिशत टैरिफ पर रियायतें दी हैं, जिसमें EFTA के 95.3 प्रतिशत निर्यात शामिल हैं।
खास बात ये है कि भारत EFTA से 80 प्रतिशत से अधिक सोना आयात करता है, जहाँ प्रभावी शुल्क अपरिवर्तित रहते हैं। डेयरी, सोया, कोयला, फार्मास्यूटिकल्स, चिकित्सा उपकरण और कुछ खाद्य उत्पादों जैसे संवेदनशील घरेलू क्षेत्रों को या तो बाहर रखा गया है या पाँच से दस वर्षों में सिलसिलेवार तरीके से इन पर टैरिफ कटौती की जाएगी। इससे मेक इन इंडिया और उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना जैसे कार्यक्रमों के तहत भारतीय उद्योगों को बदलाव के साथ- साथ प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त समय मिल रहा है।
इसकी एक प्रमुख विशेषता नर्सिंग, चार्टर्ड अकाउंटेंसी और वास्तुकला जैसे क्षेत्रों में पारस्परिक समझौतों का प्रावधान है। इससे कुशल पेशेवरों के लिए आने-जाने की सुविधा होगी। इसके अलावा, यह समझौता डिजिटल क्षेत्र के विकास में अहम भूमिका अदा करेगा। क्योंकि भारतीय टैलेंट को अस्थायी प्रवास के माध्यम से बाजार में प्रवेश करने का मौका मिलेगा। इससे सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा।
अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने शनिवार (11 अक्टूबर 2025) को तालिबान सरकार की ओर से दारुल उलूम देवबंद का दौरा किया। मुत्ताकी का भारत दौरा पहले से ही चर्चा में है, क्योंकि 2021 में अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद यह तालिबान सरकार का पहला ‘कूटनीतिक’ दौरा है।
मुत्ताकी को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पाबंदियों से अस्थाई छूट मिली। वे 9 अक्टूबर को दिल्ली पहुँचे, जब UNSC ने उन्हें 9 से 16 अक्टूबर तक यात्रा प्रतिबंध से छूट दी।
मुत्ताकी ने भारतीय राजनयिकों, विदेश मंत्री जयशंकर से मुलाकात की और दिल्ली में अफगान दूतावास में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इससे पहले भारत ने काबुल मिशन को ‘दूतावास’ का दर्जा दिया था।
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर स्थित दारुल उलूम देवबंद में मुत्ताकी का सैकड़ों मुस्लिमों, मौलवियों, छात्रों और इस्लामी नेताओं ने स्वागत किया। पाँच घंटे के दौरे में उन्होंने सेमिनरी के रेक्टर मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी और जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी से मुलाकात की, अफगान छात्रों से बात की और लाइब्रेरी का दौरा किया।
मुत्ताकी ने सार्वजनिक सभा को संबोधित किया, कुरान की आयतें पढ़ीं और अफगानिस्तान के इस्लामी विरासत के साथ देवबंद के ‘गहरे रिश्तों’ की तारीफ की। उन्होंने तालिबान की विचारधारा को आकार देने में सेमिनरी की भूमिका पर जोर दिया, जिसकी शुरुआत 1866 में औपनिवेशिक विरोध से हुई थी।
मुत्ताकी से मुलाकात के बाद जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा, “मैंने उनसे कहा कि हमारा रिश्ता सिर्फ शैक्षिक नहीं है। आपने भारत की आजादी में योगदान दिया। हमारे पूर्वजों ने अफगानिस्तान की जमीन को भारत की आजादी के लिए चुना… आपने अपनी आजादी के लिए अमेरिका और रूस जैसे देशों को हराया। हमने आपको सिखाया कि ब्रिटेन को कैसे हराया जाता है।”
मदनी ने आगे कहा, “मैंने उनसे (मुत्ताकी) कहा कि यह मुलाकात दिखाती है कि भारत के मुस्लिम और दारुल उलूम देवबंद का आपके साथ गहरा रिश्ता है। दुनिया के देशों में, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, आपसी तालमेल होना चाहिए। हमने कोई राजनीतिक बात नहीं की। दोनों देशों के रिश्ते बेहतर होंगे। भारत का शिकायत थी कि अफगानिस्तान से आतंकवादी आते हैं। अब इस मुलाकात से साफ है कि अफगानिस्तान से भारत में कोई आतंकवादी नहीं आएगा।”
#WATCH | Saharanpur, UP | After meeting Afghanistan Foreign Minister Amir Khan Muttaqi, Jamiat Ulema-e-Hind President Maulana Arshad Madani says, "… I told him that our ties with you are not just academic. You contributed to the independence of India. Our forefathers chose the… pic.twitter.com/pQkLZufGcq
दारुल उलूम देवबंद तालिबान का वैचारिक केंद्र है। तालिबान की स्थापना देवबंदी सुन्नी इस्लाम के आधार पर हुई, जो सहारनपुर के इस सेमिनरी से शुरू हुआ, जिसकी स्थापना 1866 में हुई थी।
1857 के भारतीय विद्रोह के बाद स्थापित इस सेमिनरी का मकसद औपनिवेशिक दौर में हनफी आदर्शों, धर्मशास्त्र और पारंपरिक इस्लामी शिक्षाओं को संरक्षित करना था।
देवबंद के संस्थापक मुहम्मद कासिम नानौटवी और राशिद अहमद गंगोही ने विदेशी प्रभाव के खिलाफ इस्लामी सिद्धांतों पर लौटने पर जोर दिया, जिसने बाद में आंदोलन की औपनिवेशिक विरोधी और जिहादी धाराओं को प्रभावित किया।
देवबंदी विद्वानों ने 1913 से 1920 के बीच अफगानिस्तान, ऑटोमन साम्राज्य और जर्मन साम्राज्य के साथ वैचारिक कूटनीति शुरू की, ताकि भारत में ब्रिटिशों को चुनौती दी जा सके। बीसवीं सदी की शुरुआत से ही अफगान छात्र उत्तर प्रदेश आए, यहाँ इस्लामी डिग्री हासिल की और अफगानिस्तान में मदरसे व संस्थान स्थापित किए।
भारत के बँटवारे से पहले और बाद में, देवबंदी विचारधारा दक्षिण एशिया, खासकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान में फैली। देवबंदी मौलवी इन देशों में मदरसे स्थापित करने गए, जहाँ सुन्नी मुस्लिम बच्चों को उनकी विचारधारा सिखाई गई।
1980 के दशक में पाकिस्तान में मुहम्मद जिया-उल-हक की इस्लामीकरण नीतियों से अफगान सीमा पर देवबंदी संस्थान बढ़े, जो सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान सऊदी फंडिंग से वहाबी प्रभाव के साथ मिल गए।
इसी दौर में देवबंदी विचारधारा और सऊदी वाहबी प्रभाव के मिश्रण से तालिबान का जन्म हुआ।
तालिबान की शरिया की सख्त व्याख्या देवबंदी कट्टरपंथ और पश्तून जनजातीय नियमों का मिश्रण है। उसमें मौलवियों के पूर्ण अधिकार, सख्त लैंगिक अलगाव और इस्लाम से भटकने वालों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई पर जोर है।
कई तालिबान नेता देवबंदी मदरसों के छात्र रहे हैं। तालिबान का दारुल उलूम देवबंद से सीधा रिश्ता पाकिस्तान के संबद्ध मदरसों के जरिए है, न कि भारत के सेमिनरी से। तालिबान के संस्थापक मुल्ला मोहम्मद उमर सहित कई नेता पाकिस्तान के अकोरा खट्टक में दारुल उलूम हक्कानिया जैसे संस्थानों में पढ़े।
पाकिस्तान का दारुल उलूम हक्कानिया ‘जिहाद का विश्वविद्यालय’ कहलाता है। इसे मौलाना अब्दुल हक ने बनाया, जो बँटवारे से पहले दारुल उलूम देवबंद के छात्र और शिक्षक थे। उनके बेटे समी-उल-हक ने तालिबान का समर्थन किया और अफगान ‘जिहाद’ के लिए छात्रों को तैयार किया।
पाकिस्तान-अफगान सीमा पर फैले मदरसों को पाकिस्तान की ISI ने बढ़ावा दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ISI ने ऑपरेशन साइक्लोन के तहत अमेरिकी CIA के फंड से करीब 90,000 अफगानों, जिसमें तालिबान के शुरुआती नेता शामिल थे, को इन मदरसों में प्रशिक्षित किया, जिससे तालिबान का जन्म एक छात्र मिलिशिया के रूप में हुआ।
‘तालिबान’ शब्द का पश्तो में मतलब ‘छात्र’
साल 1994 तक देवबंदी मदरसों में पढ़े तालिबान लड़ाकों ने कंधार पर कब्जा किया और 2000 तक अफगानिस्तान का 90% हिस्सा नियंत्रित कर इस्लामी अमीरात बनाया।
दशकों से अफगान सुन्नी मुस्लिम दारुल उलूम देवबंद में इस्लामी धर्मशास्त्र पढ़ने आते रहे हैं। आज भी तालिबान के आधिकारिक दस्तावेज और सलाह में देवबंदी ग्रंथों का हवाला दिया जाता है। ग्रैंड मुफ्ती राशिद लुधियानवी, तालिबान के बड़े समर्थक, भी देवबंदी विद्वान थे।
1990 के दशक में तालिबान शासित अफगानिस्तान का दौरा करने के बाद, उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिन्हें फतवों के रूप में प्रकाशित किया गया, जो मुल्ला उमर के शासन को वैध ठहराती थीं। उनके फतवे और ग्रंथ, जो मुस्लिमों को अमीर (तालिबान सुप्रीम लीडर) के प्रति पूर्ण वफादारी सिखाते थे, उमर के आदेश पर दारी और पश्तो में अनुवादित हुए और तालिबान के शरिया शासन का ढाँचा बने।
साल 2001 में जब तालिबान ने बामियान बुद्ध मूर्तियों को नष्ट किया, तब देवबंद ने इस कदम का समर्थन किया था।
देवबंद तालिबान को विदेशी ताकतों को अपनी जमीन से निकालने वाले वीर लड़ाकों के रूप में तारीफ करता है, इसे अक्सर भारत के ब्रिटिश औपनिवेशिक विरोध से जोड़ता है।
हालाँकि, देवबंद तालिबान के चरमपंथ और नागरिकों के खिलाफ क्रूरता से दूरी बनाए रखता है, भारत में शांतिपूर्ण देवबंदी विचारधारा पर जोर देता है। 2021 में महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध जैसे विवादास्पद नीतियों पर भी यह चुप रहा।
मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में संघमित्रा ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
मध्यप्रदेश के भिंड जिले में स्थित दंदरौआ धाम एक अद्भुत और चमत्कारी मंदिर है, जहाँ भगवान हनुमान को डॉक्टर के रूप में पूजा जाता है। लोग उन्हें ‘डॉक्टर हनुमान’ के नाम से जानते हैं क्योंकि यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान उनके सभी रोग और कष्ट दूर कर देते हैं।
मंदिर की विशेषता और मान्यताएँ
इस मंदिर की विशेषता यह है कि भक्त यहाँ इलाज के लिए नहीं, बल्कि आस्था के साथ भगवान के चरणों में झुकने आते हैं और मानते हैं कि हनुमान जी स्वयं उनके रोगों का निदान करते हैं। हर मंगलवार और शनिवार को इस मंदिर में भारी संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं और अपने कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।
इस मंदिर से जुड़ी कई रोचक और चमत्कारी कथाएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि बहुत समय पहले इस स्थान पर खुदाई का काम चल रहा था, तभी अचानक आकाशवाणी हुई कि जहाँ खुदाई हो रही है, वहाँ भगवान की मूर्ति है। लोगों ने जब वहाँ खुदाई की तो जमीन के भीतर से हनुमान जी की एक अनोखी मूर्ति निकली, जिसमें वे सखी यानी गोपी वेश में थे।
खुदाई के बाद ग्रामीणों ने मूर्ति स्थापित कर उसकी प्राण- प्रतिष्ठा करवाई। उस दिन भव्य भंडारे के आयोजन के दौरान एक व्यक्ति को असहनीय दर्द होने लगा। तभी फिर से आकाशवाणी हुई और कहा गया कि पीड़ित व्यक्ति अगर हनुमान जी को बंधन बाँधे और भभूति लगाए तो वह ठीक हो जाएगा।
ऐसा ही किया गया और वह कुछ ही क्षणों में पूरी तरह स्वस्थ हो गया। यह देखकर लोग दंग रह गए और इस स्थान को ‘दर्दहरउआ’ कहने लगे, जिसका अर्थ है दर्द हरने वाला स्थान। समय के साथ यही नाम परिवर्तित होकर ‘दंदरौआ धाम’ बन गया।
कैंसर पीड़ित व्यक्ति के अचानक स्वस्थ होने की कथा भी है प्रचलित
एक अन्य मान्यता के अनुसार, करीब तीन सौ साल पहले यहाँ एक नीम के पेड़ के नीचे से हनुमान जी की यह मूर्ति प्राप्त हुई थी। यह मूर्ति नृत्य करती मुद्रा में है और देखने में अत्यंत आकर्षक है। लोगों का विश्वास है कि यह मूर्ति जीवंत है और कुछ लोग दावा करते हैं कि मूर्ति सचमुच नृत्य करती है, हालाँकि इस रहस्य का आज तक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिल पाया है।
वहीं एक कथा के अनुसार, यहाँ शिवकुमार दास नाम के एक साधु रहते थे जो कैंसर से पीड़ित थे। वे हनुमान जी के परम भक्त थे और रोज मंदिर में पूजा करते थे। एक दिन हनुमान जी डॉक्टर के रूप में उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें रोगमुक्त कर दिया। उसी घटना के बाद से भक्त उन्हें डॉक्टर हनुमान के नाम से पुकारने लगे।
हर साल बड़े मंगल के अवसर पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है। हजारों श्रद्धालु दंदरौआ धाम पहुँचकर भगवान से अपनी मनोकामनाएँ माँगते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस मंदिर की लोकप्रियता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है क्योंकि यहाँ लोगों को अपने विश्वास की सच्चाई का अनुभव होता है।
दंदरौआ धाम आज श्रद्धा, भक्ति और चमत्कार का ऐसा संगम बन चुका है, जहाँ हर आगंतुक को यह एहसास होता है कि अगर आस्था सच्ची हो, तो भगवान हर दर्द मिटा सकते हैं।