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डोनाल्ड ट्रंप ने ₹88 लाख की सालाना फीस लगाकर खत्म कर दिया H1B वीजा प्रोग्राम, भारतीयों पर सबसे ज्यादा असर: कंपनियों ने कर्मचारियों को 24 घंटे में लौटने को कहा

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (19 सितंबर 2025) देर रात एक आदेश पर हस्ताक्षर किया, जिसमें H1B वीजा आवेदनों पर $100,000 (₹88 लाख) की भारी-भरकम अतिरिक्त सालाना फीस लगाई गई। नई फीस नए आवेदनों के लिए तुरंत लागू हो गई है और रिन्यूअल के लिए 21 सितंबर, 2025 को सुबह 12:01 बजे से लागू होगी।

व्हाइट हाउस ने कहा कि H1B वीजा सिस्टम में ‘सिस्टमिक दुरुपयोग’ पर रोक लगाने के लिए फीस बढ़ाई गई है। आदेश में कहा गया कि “विदेशी STEM श्रमिकों की आमद का मुख्य कारण H1B वीजा का दुरुपयोग रहा है।” इसमें दावा किया गया कि अमेरिकी कंपनियाँ अमेरिकी कर्मचारियों को निकालकर कम वेतन पर H1B वीजा धारकों को रख रही हैं।

ट्रंप के कार्यकारी आदेश में कहा गया कि “खास तौर पर सूचना प्रौद्योगिकी (IT) फर्मों ने H1B सिस्टम का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया है, जिससे कंप्यूटर से जुड़े क्षेत्रों में अमेरिकी कर्मचारियों को काफी नुकसान हुआ है।”

H1B वीजा पहले से ही महँगा है, जिसकी लागत $1,700 से $4,500 तक है। जो इसकी तेज प्रोसेसिंग पर निर्भर करता है। अब इसमें $100,000 (लगभग ₹88 लाख) की अतिरिक्त फीस जुड़ेगी। यह फीस नियोक्ता देते हैं, जो इसे बिजनेस खर्च मानते हैं। आदेश के मुताबिक, H1B वीजा के नए या नवीनीकरण आवेदन के साथ $100,000 की अतिरिक्त फीस देनी होगी, वरना आवेदन खारिज हो जाएगा। यह फीस 12 महीने तक लागू रहेगी, जब तक इसे बढ़ाया न जाए।

आदेश में कहा गया, “अमेरिका से बाहर मौजूद किसी विदेशी के लिए H1B याचिका दाखिल करने से पहले, नियोक्ताओं को यह साबित करने वाला दस्तावेज रखना होगा कि इस आदेश में बताई गई $100000 की फीस का भुगतान किया गया है।”

यह बढ़ी हुई फीस कंपनियों के लिए H1B वीजा पर विदेशी कुशल श्रमिकों को रखना लगभग असंभव बना देती है, क्योंकि यह फीस H1B वीजा धारक के औसत वेतन से भी ज्यादा है। केवल कुछ शीर्ष कंपनियाँ ही अपने सबसे मूल्यवान विदेशी कर्मचारियों के लिए इतनी भारी राशि दे सकती हैं। मध्यम स्तर की कंपनियाँ विदेशियों को रखना पूरी तरह बंद कर देंगी और बड़ी कंपनियाँ भी शायद कुछ ही विदेशियों को रखेंगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश में कहा गया कि $100000 की फीस नए या रिन्यूअल फॉर्म के समय देनी होगी, यानी यह सालाना फीस है। वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने भी इसे सालाना फीस बताया। इसलिए अगर कोई कंपनी 6 साल (H1B वीजा की अधिकतम वैधता) तक विदेशी कर्मचारी रखती है, तो उसे $600000 की भारी फीस देनी होगी।

इस कदम से भारत को सबसे ज्यादा नुकसान होगा, क्योंकि H1B वीजा धारकों में लगभग 70% भारतीय हैं। करीब 3 लाख भारतीय वर्तमान में अमेरिका में H1B वीजा पर काम कर रहे हैं, खासकर IT, इंजीनियरिंग और हेल्थकेयर क्षेत्रों में। H1B वीजा को प्रायोजित करने वाली TCS, इन्फोसिस, विप्रो और HCL टेक्नोलॉजीज जैसी भारतीय कंपनियों को अरबों रुपये का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है, जिससे हजारों ऑफशोर नौकरियाँ खतरे में पड़ सकती हैं।

इसी तरह गूगल, अमेजन, मेटा, IBM, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल जैसी वैश्विक टेक कंपनियाँ जो भारत और अन्य देशों से कुशल कर्मचारियों को रखने के लिए इस वीजा प्रोग्राम पर निर्भर हैं, उन्हें भी बड़ा झटका लगेगा।

यह अनुमान है कि कंपनियाँ कई H1B वीजा को उनकी समाप्ति के बाद रिन्यू नहीं करेंगी और प्रभावित लोग अपने देश लौट जाएँगे। नतीजतन भारतीय H1B कर्मचारियों से आने वाली रेमिटेंस जो पिछले साल $37 बिलियन थी, वो कुछ महीनों में तेजी से कम हो सकती है।

यूएस ने रखी है कुछ छूट

नया नियम उन विदेशी कर्मचारियों पर लागू नहीं होगा, जो किसी कंपनी या उद्योग में काम करते हैं, जिसे प्रशासन राष्ट्रीय हित में मानता है। आदेश में कहा गया, “इस नियम के तहत लगाए गए प्रतिबंध किसी भी व्यक्ति, किसी कंपनी में काम करने वाले सभी विदेशियों या किसी उद्योग में काम करने वाले सभी विदेशियों पर लागू नहीं होंगे। अगर होमलैंड सिक्योरिटी सचिव यह तय करता है कि ऐसे विदेशियों को H1B विशेष व्यवसाय श्रमिकों के रूप में रखना राष्ट्रीय हित में है और ये अमेरिका की सुरक्षा या कल्याण के लिए खतरा नहीं है।”

हालाँकि इसमें और स्पष्टता नहीं दी गई। बाद में शायद इसे और साफ किया जाए। लेकिन माना जा रहा है कि हेल्थकेयर, महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा, रक्षा जैसे क्षेत्रों को छूट मिल सकती है।

अमेरिका से बाहर मौजूद वीजा धारकों को 24 घंटे में लौटने को कहा

मौजूदा H1B धारकों पर फीस वृद्धि का असर नहीं पड़ेगा, लेकिन अमेरिका से बाहर मौजूद लोगों की स्थिति अलग है। राष्ट्रपति के आदेश को ट्रैवल बैन के रूप में देखा गया है, जिसे कंपनियों ने यह समझा कि यह अमेरिका से बाहर मौजूद H1B वीजा धारकों पर भी लागू होता है।

आदेश में कहा गया, “होमलैंड सिक्योरिटी सचिव उन याचिकाओं पर निर्णयों को प्रतिबंधित करेंगे, जिनके साथ $100000 का भुगतान नहीं किया गया है। ये आदेष H1B विशेष व्यवसाय श्रमिकों के लिए हैं और जो वर्तमान में अमेरिका से बाहर हैं, यह प्रतिबंध इस आदेश की प्रभावी तारीख से 12 महीने तक लागू रहेगा।”

आदेश के अनुसार, 21 सितंबर, 2025 को सुबह 12:01 बजे से H1B स्थिति में लोग बिना $100000 अतिरिक्त भुगतान के अमेरिका में प्रवेश/वापसी नहीं कर पाएँगे। इसलिए बड़ी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को समय सीमा से पहले, यानी 24 घंटे के भीतर लौटने को कहा है, जो कई लोगों के लिए संभव नहीं हो सकता।

वीकेंड से कुछ घंटे पहले जारी हुए आदेश ने प्रभावित कर्मचारियों और नियोक्ताओं में हड़कंप मचा दिया। माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेजन, जेपी मॉर्गन चेज, एप्पल, TCS जैसी कई कंपनियों ने अपने वैश्विक कर्मचारियों को संदेश भेजे, जिसमें अमेरिका से बाहर मौजूद सभी H1B वीजा धारकों को ’21 सितंबर की समय सीमा से पहले तुरंत लौटने’ और स्टैंपिंग सुनिश्चित करने के लिए कहा गया।

कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका छोड़ने से भी मना किया, ताकि वापसी में परेशानी न हो। एक अमेजन अधिकारी ने कथित तौर पर कंपनी स्तर पर भेजे गए संदेश में कहा, “नजदीकी भविष्य के लिए अमेरिका न छोड़ें।” ये संदेश सोशल मीडिया पर लीक हो गया।

अमेरिकी राष्ट्रपति के आदेश में सिर्फ H1B वीजा का जिक्र है, लेकिन कंपनियों ने H-4 आश्रित वीजा धारकों को भी यही निर्देश दिए हैं।

X पर साझा किए गए एक मेमो में लिखा था, “अगर आप H1B या H-4 स्थिति में हैं और अभी अमेरिका से बाहर हैं, तो हम सलाह देते हैं कि आप कल समय सीमा से पहले अमेरिका लौटने की कोशिश करें। ये आदेश पिछले 30 मिनट में जारी हुआ है, तो हमें पता है कि अचानक यात्रा की व्यवस्था करने का समय बहुत कम है। लेकिन फिर भी, हम आपको पूरी कोशिश करने की सलाह देते हैं।”

भारतीय प्रतिभा पर बहुत निर्भर एप्पल और TCS कथित तौर पर लॉजिस्टिक्स टीमें तैयार कर रही हैं ताकि कर्मचारी जल्दी लौट सकें। उन्हें डर है कि वीजा रिजेक्शन की बाढ़ उनके बड़े प्रोजेक्ट्स को रोक सकती है।

सोशल मीडिया पोस्ट्स से पता चला कि कई H1B वीजा धारक, जो निजी या काम के कारण अमेरिका से बाहर जाने वाले थे, नए नियम की खबर मिलने के बाद फ्लाइट में चढ़ने के बाद भी अमेरिका में रुक गए। उन्हें डर था कि बिना $100,000 फीस के उन्हें दोबारा प्रवेश नहीं मिलेगा।

H1B प्रोग्राम का अंत?

इस भारी फीस वृद्धि के साथ डोनाल्ड ट्रंप ने H1B प्रोग्राम को लगभग खत्म कर दिया। अब शायद ही कोई कंपनी इतनी बड़ी फीस देकर विदेशी कर्मचारियों को रखे। अमेरिकी टेक कंपनियाँ जिन्होंने हाल के वर्षों में दो-तिहाई H1B वीजा हासिल किए अब प्रतिभा की कमी से जूझेंगी, जिससे उनकी ग्रोथ रुक सकती है। छोटी कंपनियाँ और स्टार्टअप्स जो पहले से ही पैसों की तंगी में हैं, शायद विदेशी भर्ती पूरी तरह बंद कर दें। लेकिन सवाल ये है कि क्या वे उतने ही काबिल स्थानीय कर्मचारी ढूँढ पाएँगे?

लगभग तय है कि अब नए H1B वीजा आवेदन नहीं होंगे। H1B वीजा की वैधता 3 साल की होती है, जिसे अधिकतम 6 साल तक बढ़ाया जा सकता है। ऐसे में मौजूदा वीजा धारकों को धीरे-धीरे अपने वीजा की समाप्ति पर देश छोड़ना होगा। ट्रंप ने ग्रीन कार्ड नियम भी कड़े कर दिए हैं, यानी H1B से ग्रीन कार्ड में बदलने का सपना भी खत्म हो गया।

ये देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिकी कंपनियाँ इससे कैसे निपटती हैं। क्या वे ट्रंप के इरादे के मुताबिक ज्यादा स्थानीय कर्मचारियों को रखेंगी या फिर विदेशी कर्मचारियों को रखने के लिए अपनी गतिविधियाँ विदेश में ले जाएँगी?

CM हिमंता ने जिसे बताया ‘फ्लड जिहाद’, उसके पीछे सच में था महबूब-उल-हक का हाथ: SC जाँच में खुलासा- जंगल की जमीन कब्जा कर बनी USTM, पेड़-पहाड़ काटने से आई बाढ़

असम के गुवाहाटी में 5 अगस्त 2024 को भारी बारिश के बाद अचानक बाढ़ आ गई थी। पहाड़ी इलाकों से आया पानी जराबात और मालीगाँव जैसे निचले इलाकों में भर गया, जिससे सड़कें डूब गईं, ट्रैफिक रुक गया और भारी नुकसान हुआ।

उस समय असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने मेघालय की यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (USTM) पर ‘जमीन कब्जाने’ का आरोप लगाते हुए इसे ‘फ्लड जिहाद’ कहा था। इस बयान पर काफी विवाद हुआ।

USTM के चांसलर महबूब-उल-हक ने तब दावा किया था कि यूनिवर्सिटी पूरी तरह वैध है और मेघालय सरकार से सभी मंजूरी ली गई है। उन्होंने गुवाहाटी की खराब ड्रेनेज व्यवस्था को बाढ़ का असली कारण बताया था।

लेकिन अब, एक साल बाद, सुप्रीम कोर्ट की नियुक्त सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की जाँच में USTM पर गंभीर गड़बड़ियाँ सामने आई हैं। जाँच में पाया गया कि यूनिवर्सिटी ने बड़े पैमाने पर अवैध तरीके से जमीन पर कब्जा किया, पहाड़ काटे और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुँचाया। इन कामों की वजह से ही गुवाहाटी के निचले इलाकों में बाढ़ की स्थिति बनी।

USTM एक निजी संस्था है, जिसकी स्थापना 2008 में एजुकेशन रिसर्च एंड डेवलपमेंट फाउंडेशन ने की थी। यह मेघालय के री-भोई जिले के 9th माइल इलाके में, असम की सीमा से लगे जराबात के पास स्थित है।

असम सरकार लंबे समय से इस यूनिवर्सिटी पर जंगल काटने और पहाड़ नुकसान पहुँचाने के आरोप लगाती रही है। असम में रहने वाले एक युवक ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर री-भोई और ईस्ट खासी हिल्स (मेघालय) में हो रहे पर्यावरण नुकसान और उसका असर असम पर पड़ने की शिकायत की थी। मई 2025 में असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि CEC इस मामले की निगरानी और जाँच करे।

USTM की CEC जाँच में क्या पाया गया?

यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी मेघालय (USTM) का कैंपस लगभग 100 एकड़ पहाड़ी इलाके में फैला हुआ है। यहाँ अकादमिक इमारतों के साथ-साथ पीए संगमा मेमोरियल मेडिकल कॉलेज, ऑडिटोरियम और अन्य ढाँचे बनाए गए हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, 2011 से अब तक यूनिवर्सिटी ने कम से कम 5 पहाड़ों को समतल कर दिया ताकि निर्माण के लिए जमीन तैयार हो सके। खास बात यह है कि ज्यादातर कटाई मेघालय की तरफ नहीं बल्कि गुवाहाटी की दिशा वाली ढलानों पर की गई।

पहाड़ों और प्राकृतिक अवरोधों को काटने से जो पहले बारिश के पानी की रफ्तार को धीमा करते थे, अब पानी सीधे और तेजी से नीचे की ओर बहने लगा। इसका नतीजा यह हुआ कि मानसून का पानी सीधे उमखराह और बासिष्ठा नदियों में पहुँचने लगा, जो आगे गुवाहाटी में बाढ़ की स्थिति पैदा करता है।

भारी जंगल कटाई और खुदाई से मिट्टी ढीली हो गई, जिससे बड़े पैमाने पर कटाव और भूस्खलन शुरू हो गए। इसके कारण नदियों में भारी मात्रा में मिट्टी जमा होने लगी।

सबसे अहम बात यह भी है कि जिन इलाकों में यह खुदाई और पहाड़ काटे गए, वह ‘डिम्ड फॉरेस्ट’ क्षेत्र थे, जिन्हें फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट, 1980 के तहत सुरक्षित माना जाता है। यहाँ प्राकृतिक ढलान और पेड़-पौधे बरसात के पानी को नियंत्रित करने के लिए बेहद जरूरी थे।

सुप्रीम कोर्ट की कमेटी (CEC) की रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि केवल मौजूदा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ही नहीं, बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने भी पहले कई बार जराबात इलाके को बाढ़ का बड़ा कारण बताते हुए सीमा पार हो रही जंगल कटाई पर चिंता जताई थी।

USTM द्वारा बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ और पर्यावरणीय क्षति

सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की जाँच में सामने आया है कि यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी मेघालय (USTM) ने बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिवर्सिटी ने लगभग 25 हेक्टेयर ‘डिम्ड फॉरेस्ट’ जमीन पर बिना अनुमति कब्जा कर लिया, जिसमें से 15.71 हेक्टेयर क्षेत्र पर निर्माण हुआ है। इसमें से 13.62 हेक्टेयर यानी 87 प्रतिशत जमीन असल में जंगल थी।

इसी तरह, पीए संगमा मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के लिए तय 12.13 हेक्टेयर जमीन में से करीब 7.64 हेक्टेयर (63%) को तोड़ दिया गया। बाकी जमीन को 2021 तक जंगल माना जाता था लेकिन उस पर भी अवैध कब्जा कर लिया गया, जो 1973 के मेघालय फॉरेस्ट रेगुलेशन का सीधा उल्लंघन है।

जाँच में यह भी पाया गया कि 2017 से लगातार बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और खुदाई की गई है। केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय के आदेशों के बावजूद यूनिवर्सिटी ने कभी भी क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) नहीं किया।

स्थिति यह है कि यूनिवर्सिटी का करीब 93 प्रतिशत हिस्सा अब नष्ट, खुदाई की गई और अवैध रूप से कब्जाई गई जंगल की जमीन है, जिसे CEC ने ‘भयानक पर्यावरणीय आपदा’ बताया है।

रिपोर्ट के अनुसार,असम की तरफ ढलानों पर बड़े पैमाने पर मिट्टी काटी गई और कृत्रिम नाले बनाए गए, जिससे पानी का बहाव और तेज हो गया। इसके बावजूद यूनिवर्सिटी ने कभी भी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) नहीं कराया। इतना ही नहीं, री-भोई जिले में अवैध खनन भी जारी है।

कुल मिलाकर, CEC ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 100 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में जंगल और पहाड़ काटने से गुवाहाटी में 2024 की बाढ़ और भी विनाशकारी हो गई, यहाँ तक कि सात किलोमीटर दूर तक के इलाके भी पानी में डूब गए।

CEC ने USTM पर भारी जुर्माना लगाया

सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी मेघालय (USTM) पर कड़ा कदम उठाते हुए कुल ₹150.35 करोड़ का जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना जंगल की जमीन के अवैध इस्तेमाल, पेड़ कटाई, पर्यावरण क्षतिपूर्ति और बहाली की लागत को ध्यान में रखकर लगाया गया है, जिसकी गणना 2017 से हुई उल्लंघनों के आधार पर की गई है।

CEC ने आदेश दिया है कि 25 हेक्टेयर क्षेत्र को एक साल के भीतर प्राकृतिक जंगल में बहाल किया जाए और वहां बने सभी अवैध ढाँचे हटाए जाएँ। साथ ही, बराबर क्षेत्रफल की गैर-जंगल जमीन पर क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) करने का भी निर्देश दिया गया है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि री-भोई जिले में फिलहाल चल रहे सभी अवैध खनन, पत्थर तोड़ाई और क्रशिंग कार्यों को तुरंत रोका जाए, जब तक कि इस पर व्यापक समीक्षा पूरी न हो जाए। सुप्रीम कोर्ट अब जल्द ही इस पूरे मामले की सुनवाई करेगा।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा लंबे समय से USTM और उसके संस्थापक महबूब-उल-हक की अवैध गतिविधियों पर सवाल उठाते रहे हैं। बता दें कि 22 फरवरी 2025 को असम पुलिस ने महबूब-उल-हक को गुवाहाटी स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया था।

उन पर आरोप था कि उन्होंने श्रीभूमि जिले के एक परीक्षा केंद्र में सीबीएसई की कक्षा 12वीं की फिजिक्स परीक्षा के दौरान गड़बड़ी और अनियमितताएँ की। हालांकि, कांग्रेस और अन्य ‘लिबरल’ समूहों ने इस गिरफ्तारी की आलोचना की थी और इसे राजनीतिक तौर पर निशाना साधना बताया था। बाद में महबूब-उल-हक को जमानत मिल गई।


(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में संघमित्रा ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

पूर्णिया से लेकर दरभंगा तक, हिंदू आस्था पर हमला: क्या चुनाव से पहले बिहार को सुलगाना चाहते हैं इस्लामी कट्टरपंथी?

बिहार में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ लोग माहौल को खराब करने की कोशिश में जुट गए हैं। इसका मकसद साफ है- समाज को बाँटना, हिंदू-मुस्लिम के बीच तनाव पैदा करना और इसका फायदा उठाकर वोटों की सियासत करना। हाल ही में पूर्णिया और दरभंगा में हुई दो घटनाएँ इस बात का सबूत हैं कि कैसे कुछ लोग धार्मिक भावनाओं को भड़काकर माहौल को गर्म करने की कोशिश कर रहे हैं।

पूर्णिया में माँ दुर्गा की मूर्ति तोड़े जाने की घटना और दरभंगा में बाबा विश्वकर्मा की मूर्ति विसर्जन को लेकर हुए विवाद ने साफ कर दिया है कि बिहार में शांति और सौहार्द को निशाना बनाया जा रहा है। आइए इन घटनाओं को समझते हैं और देखते हैं कि कैसे ये सब सियासी फायदे के लिए किया जा रहा है।

पूर्णिया में माँ दुर्गा की मूर्ति तोड़ने का मामला

पूर्णिया के मजगामा हाट में माँ दुर्गा की मूर्ति को तोड़े जाने की घटना ने पूरे इलाके में हंगामा मचा दिया। ये मूर्तियाँ दुर्गा पूजा के लिए बनाई जा रही थीं, जो हिंदुओं के लिए बहुत बड़ा और पवित्र त्योहार है। शुक्रवार (19 सितंबर 2025) की सुबह जब लोगों ने देखा कि मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त हैं, तो उनका गुस्सा फूट पड़ा।

स्थानीय लोगों ने मुस्लिम युवक को पकड़ लिया, जिस पर मूर्ति तोड़ने का आरोप था। गुस्साए लोगों ने उसकी पिटाई कर दी, उसके हाथ रस्सी से बाँध दिए और सड़क जाम करके आगजनी शुरू कर दी। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को बीच-बचाव करना पड़ा।

पुलिस ने आरोपित को किसी तरह भीड़ से बचाकर एक सरकारी भवन में बंद किया, लेकिन गुस्साई भीड़ ने पुलिस पर भी हमला बोल दिया। इस घटना ने पूर्णिया में तनाव का माहौल बना दिया। लोग सड़कों पर उतर आए, टायर जलाए गए और माहौल को शांत करने में पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी। सवाल ये है कि आखिर ऐसी घटना हुई ही क्यों? क्या ये सिर्फ एक व्यक्ति की हरकत थी या इसके पीछे कोई सुनियोजित साजिश थी?

दरभंगा में मूर्ति विसर्जन का विवाद

दरभंगा के सिंहवाड़ा थाना क्षेत्र के कटहरिया गाँव में बाबा विश्वकर्मा की मूर्ति विसर्जन को लेकर बवाल हुआ। ये पहली बार था जब गाँव में बाबा विश्वकर्मा पूजा का आयोजन हुआ था। विसर्जन के लिए जुलूस निकाला जा रहा था, लेकिन रास्ते में कुछ लोगों ने आपत्ति जताई और जुलूस को अपने गाँव से गुजरने से रोक दिया। इससे माहौल तनावपूर्ण हो गया। स्थानीय लोगों का कहना था कि जुलूस निर्धारित रास्ते से जा रहा था, लेकिन अचानक विरोध शुरू हो गया।

प्रशासन ने स्थिति को संभालने की कोशिश की। एसडीएम और एसडीपीओ भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचे, लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार प्रशासन ने विवाद से बचने के लिए जुलूस का रास्ता बदल दिया। मूर्ति को लंबा रास्ता तय करके मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट थाना क्षेत्र के रास्ते विसर्जन के लिए ले जाया गया। इस घटना से स्थानीय लोग नाराज हो गए।

एक युवक ने कहा, “हम उनके त्योहार में जूस पिलाते हैं, लेकिन आज हमारे पर्व का रास्ता रोक दिया गया।” इससे साफ है कि लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हुईं और उनके मन में गुस्सा भरा हुआ है।

क्या है इन घटनाओं का मकसद?

बिहार की इन दोनों घटनाओं को देखकर एक बात साफ है- बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले माहौल को खराब करने की कोशिश हो रही है। पूर्णिया और दरभंगा की घटनाएँ कोई इत्तेफाक नहीं हैं। ये दोनों घटनाएँ धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली हैं और इनका समय भी बहुत सोचा-समझा लगता है। बिहार में दुर्गा पूजा जैसे बड़े त्योहार नजदीक हैं और इसके बाद विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। ऐसे में कुछ लोग चाहते हैं कि हिंदू-मुस्लिम के बीच तनाव पैदा हो, जिससे वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके।

बिहार की सियासत में वोटों का ध्रुवीकरण कोई नई बात नहीं है। कुछ पार्टियाँ खासकर जो खुद को मुस्लिम हितैषी बताती हैं, जैसे आरजेडी और AIMIM इस तरह की घटनाओं का फायदा उठाने की कोशिश करती हैं। इनका मकसद है कि मुस्लिम वोटरों को एकजुट किया जाए और उन्हें ये दिखाया जाए कि बीजेपी-जेडीयू गठबंधन उनके हितों के खिलाफ है।

विकास बनाम सियासी साजिश

पूर्णिया की घटना का समय भी गौर करने लायक है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्णिया में 40,000 करोड़ रुपए की योजनाओं का ऐलान किया। ट्रेन, एयरपोर्ट और दूसरी विकास परियोजनाओं की शुरुआत हुई। बिहार विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की सरकार ने कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और विकास को बढ़ावा देने का काम किया है। लेकिन जब विकास की बातें जोर पकड़ने लगती हैं, तो कुछ लोग माहौल बिगाड़ने की कोशिश शुरू कर देते हैं।

विपक्ष को लगता है कि विकास के मुद्दे पर वो एनडीए को टक्कर नहीं दे सकता। इसलिए वो धार्मिक और सामुदायिक तनाव को हवा देने की कोशिश करता है। पूर्णिया और दरभंगा की घटनाएँ इसका उदाहरण हैं। मूर्ति तोड़ने और विसर्जन रोकने जैसी घटनाएँ लोगों की भावनाओं को भड़काती हैं और समाज में नफरत फैलाती हैं। इसका नतीजा ये होता है कि लोग विकास की बात भूलकर भावनात्मक मुद्दों में उलझ जाते हैं।

चुनाव से पहले माहौल बिगाड़ने के पीछे की रणनीति

बिहार में सभी समुदाय मिलजुलकर रहते हैं और एक-दूसरे के त्योहारों में हिस्सा लेते हैं। फिर ऐसी घटनाएँ क्यों हो रही हैं? साफ है कि ये कुछ लोगों की साजिश है, जो समाज को तोड़ना चाहते हैं। बिहार के लोग चाहे हिंदू हों या मुस्लिम, वे शांति और भाईचारे में विश्वास रखते हैं। लेकिन कुछ सियासी लोग इस भाईचारे को तोड़कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं।

दरभंगा में भी यही देखने को मिला। एक युवक ने कहा कि वो मुस्लिम समुदाय के त्योहारों में हिस्सा लेते हैं, फिर उनके पर्व का रास्ता क्यों रोका गया? ये सवाल हर बिहारी के मन में है। लोग समझ रहे हैं कि ये सब सियासी खेल का हिस्सा है।

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले इस तरह की घटनाएँ बढ़ने की आशंका है। दुर्गा पूजा जैसे बड़े त्योहार के दौरान मूर्ति विसर्जन को लेकर और विवाद पैदा किए जा सकते हैं। इसका मकसद है कि हिंदू और मुस्लिम वोटरों को बाँटा जाए। कुछ पार्टियाँ चाहती हैं कि मुस्लिम वोटर एकजुट होकर उनके पक्ष में वोट करें। इस तरह की सियासत बिहार के विकास और शांति के लिए खतरनाक है।

पूर्णिया और दरभंगा की घटनाएँ बिहार में चुनाव से पहले माहौल बिगाड़ने की साजिश का हिस्सा हैं। ये घटनाएँ समाज को बाँटने और वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश हैं। लेकिन बिहार के लोग समझदार हैं। वे जानते हैं कि उनका असली मुद्दा विकास, रोजगार और शांति है। हमें इन सियासी खेलों को समझना होगा और एकजुट होकर बिहार को आगे ले जाना होगा। शांति और सौहार्द ही बिहार की ताकत है और इसे कोई नहीं तोड़ सकता।

मस्जिद के बाहर माँगता है भीख, करना चाहता है तीसरा निकाह: भिखारी की दूसरी बीवी पहुँची केरल कोर्ट, अदालत ने कहा- सबका पेट पाल सको तो कर लो

केरल हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में एक से ज़्यादा निकाह की इजाजत है, लेकिन एक शर्त है। मियाँ को अपनी हर बीवी के साथ न्याय करना होगा। उसे अपनी सभी पत्नियों का ख्याल रखना होगा। कोर्ट ने यह टिप्पणी एक ऐसे व्यक्ति के मामले में की जो भीख माँगकर गुजारा करता है। वह तीसरा निकाह करने की तैयारी में था। कोर्ट ने सामाजिक कल्याण विभाग को निर्देश दिया कि उस व्यक्ति की काउंसलिंग की जाए ताकि उसे तीसरी निकाह करने से रोका जा सके।

क्या था पूरा मामला?

रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला तब सामने आया जब एक व्यक्ति की दूसरी बीवी ने फैमिली कोर्ट से गुज़ारा भत्ता माँगा था। मियाँ भीख माँगता है और बीवी का दावा था कि वह शुक्रवार (19 सितंबर 2025) को मस्जिदों के बाहर भीख माँगकर लगभग 25,000 रुपए महीने कमाता है।

हालाँकि, फैमिली कोर्ट ने बीवी की गुज़ारा भत्ता की माँग यह कहकर खारिज कर दी थी कि एक भिखारी को यह देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट की टिप्पणी

बीवी ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की और बताया कि उसका मियाँ उसे तलाक की धमकी दे रहा है और तीसरी शादी करने वाला है। केरल हाई कोर्ट के जस्टिस पीवी कुन्हीकृष्णन ने फैमिली कोर्ट के फैसले को तो सही ठहराया, लेकिन तीसरी शादी के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया। जस्टिस ने कहा कि जो व्यक्ति अपनी बीवियों का खर्चा नहीं उठा सकता, उसे एक और निकाह करने का कोई हक नहीं है।

कुरान का हवाला और पॉलिगामी की शर्तें

कोर्ट ने कुरान की आयतों का हवाला देते हुए समझाया कि पॉलिगामी यानि बहुविवाह की इजाजत इस शर्त पर दी गई है कि पुरुष अपनी सभी बीवियों के साथ न्याय कर सके। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी दूसरी या तीसरी बीवी का भरण-पोषण नहीं कर सकता, उसे दोबारा निकाह करने का कोई अधिकार नहीं है।

कोर्ट का यह फैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ में पॉलिगामी (बहुविवाह) के अधिकार को स्पष्ट करता है, लेकिन इसे जिम्मेदारी और न्याय की कसौटी पर परखता है।

कानपुर में सिर्फ ‘I Love Muhammad’ के बैनर पर नहीं है विवाद, हिंदुओं के धार्मिक पोस्टर फाड़ने की छिपाई जा रही बात: जानें FIR में क्या निकला

उत्तर प्रदेश के कानपुर में कथित तौर पर ‘I Love Muhammad’ के बैनर हटाने को लेकर हुए विवाद की चपेट में पूरा देश आता जा रहा है। बिहार से लेकर हैदराबाद तक देश के अलग-अलग हिस्सों में मुस्लिम समुदाय के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। गुजरात के गोधरा में तो इस मामले को लेकर हिंसा भी हुई है और कट्टरपंथियों ने थाने में तोड़फोड़ कर दी है।

इसके अलावा सोशल मीडिया पर इसे लेकर एक संगठित अभियान चलाया जा रहा है और मुस्लिम युवा ‘I Love Muhammad’ के हैशटेग के साथ अपने पोस्ट शेयर कर रहे हैं। इस पूरे प्रदर्शन के पीछे प्रदर्शनकारियों का दावा है, “पैगंबर साहब की शान में गुस्ताखी की जा रही है।”

पुलिस ने इससे जुड़े मामले में करीब एक दर्जन युवकों के खिलाफ केस दर्ज किया है। इसके बाद से ही ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है कि यह विवाद सिर्फ ‘I Love Muhammad’ के पोस्टर को लेकर है।

क्या है असली कहानी?

यह बात सही है कि ‘I Love Muhammad’ के बैनर लगाने को लेकर विवाद हुआ था लेकिन पूरी कहानी इस विवाद से आगे की है। ऑपइंडिया द्वारा ऐक्सेस की गई FIR को पढ़ने के बाद असली बात सामने आ गई।

इस विवाद की शुरुआत हुई 4 सितंबर को रावतपुर थाना क्षेत्र के सैयद नगर मोहल्ले में जफर वाली गली के सामने मुस्लिम समुदाय द्वारा बारावफात की रोशनी के कार्यक्रम में सजावट के लिए ‘I Love Muhammad’ का लाइट बोर्ड लगाया गया। पुलिस द्वारा दर्ज FIR में लिखा गया है, “ऐसा पहले नहीं हुआ था और यह मुस्लिम समुदाय के बारावफात कार्यक्रम के आयोजकों द्वारा नई परंपरा की शुरुआत की जा रही थी।”

इस बोर्ड का स्थानीय लोगों ने विरोध किया तो दोनों पक्षों के बीच बहस शुरू हो गई और पुलिस ने वहाँ से हटवाकर वो बोर्ड थोड़ी दूरी पर लगवा दिया। इसके बाद मामला शांत हो गया। यानी FIR में यह बात स्पष्ट तौर पर लिखी गई है कि जब मामला शांत कराया गया तो बोर्ड वहाँ लगा हुआ था। तो फिर विवाद कैसे हुआ?

असल में विवाद की शुरुआत हुई इसके अगले दिन यानी 5 सितंबर को इस दिन बारावफात का जुलूस निकाला जाना था। FIR के मुताबिक, “जुलूस निकाले जाने पर रावतपुर गाँव में हिंदू बस्ती से जुलूस निकाल रहे मुस्लिम समुदाय के कुछ अज्ञात मुस्लिम युवकों के द्वारा रास्ते में लगे हिंदू समुदाय के धार्मिक पोस्टर को जानबूझकर जुलूस में शामिल गाड़ी…में सवार मुस्लिम युवको द्वारा डंडों की मदद से फाड़ दिया गया।”

पुलिस को 10 सितंबर को इन घटनाओं की CCTV फुटेज भी प्राप्त हो गई। FIR में कहा गया है, “CCTV रिकॉर्डिंग से स्पष्ट हो रहा है कि घटना वाले दिनजुलूस में शामिल मुस्लिम समुदाय के युवकों द्वारा जानबूझकर सांप्रदायिक माहौल खराब करने को लेकर ऐसे कृत्य किए गए जिससे क्षेत्र में अराजकता फैल सके तथा सांप्रदायिक विवाद उत्पन्न हो सके।”

पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR का एक हिस्सा

आप इन शब्दों पर भी ध्यान दें तो स्पष्ट हो जाता है कि यह मामला केवल ‘I Love Muhammad’ के बैनर से जुड़ा हुआ नहीं है। वो बस इस पूरे विवाद का एक हिस्सा है जबकि असली कहानी मुस्लिम युवकों द्वारा हिंदुओं के धार्मिक पोस्टर को मुस्लिम द्वारा फाड़ने की है।

क्या कह रही है पुलिस?

वहीं, इस मामले में रावतपुर थाने के SHO कृष्ण मिश्रा ने भी ऑपइंडिया से बातचीत में इस बात की पुष्टि की है यह FIR ‘I Love Muhammad’ के बैनर लगाने को लेकर नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि जिन युवकों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है, उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश की थी।

इस जानकारी से स्पष्ट है कि यह FIR सिर्फ उस वजह से नहीं लिखी गई है जिसके चलते देशभर में प्रदर्शन किए जा रहे हैं। प्रदर्शनों के दौरान इसके असली पक्ष को छिपा लिया जा रहा है और विवाद को हवा देने के लिए अधूरी जानकारी का इस्तेमाल हो रहा है। जिस तरह गुजरात में इसे लेकर हिंसा की गई है तो आने वाले वक्त में ऐसे प्रदर्शनों को लेकर और सावधानी बरतने की जरूरत है।

‘चिप से शिप तक का भारत में करेंगे निर्माण’: गुजरात को PM मोदी ने दी ₹34200 करोड़ की सौगात, बोले- 2047 तक हर कीमत पर बनना होगा आत्मनिर्भर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के भावनगर में ‘समुद्र से समृद्धि’ कार्यक्रम में हिस्सा लिया। यहाँ पीएम मोदी ने 34,200 करोड़ रुपए से अधिक की विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। ये परियोजनाएँ समुद्री क्षेत्र, ऊर्जा, राजमार्ग, स्वास्थ्य और शहरी विकास से संबंधित हैं, जो न केवल गुजरात बल्कि पूरे देश के समग्र विकास को गति प्रदान करेंगी। पीएम मोदी ने भावनगर से जनता को संबोधित किया।

पीएम मोदी ने कहा, “ये कार्यक्रम तो भावनगर में हो रहा है, लेकिन ये कार्यक्रम पूरे हिंदुस्तान का है। पूरे भारत में समुद्र से समृद्धि से जाने की ओर हमारी दिशा क्या है, उसके लिए आज इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का केंद्र भावनगर को चुना गया है। गुजरात और भावनगर के लोगों को बहुत बहुत बधाई।”

पीएम मोदी ने अपने जन्मदिन पर मिली शुभकामनाओं पर आभार जताते हुए कहा, “17 सितंबर को आप सबने अपने नरेन्द्र भाई को जो शुभकामनाएँ भेजी हैं, देश और दुनिया से जो मुझे शुभकामनाएँ मिली हैं… व्यक्तिगत तौर पर सबका धन्यवाद करना संभव नहीं है, लेकिन भारत के कोने-कोने से, विश्वभर से ये जो प्यार मिला है, आशीर्वाद मिले हैं। ये मेरी बहुत बड़ी संपत्ति है, ये मेरी बहुत बड़ी ताकत है। इसलिए मैं आज सार्वजनिक रूप से देश और दुनिया के सभी महानुभावों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।”

दुनिया में हमारा सबसे बड़ा दुश्मन, दूसरे देशों पर निर्भरता

पीएम मोदी ने कहा, “भारत आज वैश्विक बंधुत्व की भावना के साथ आगे बढ़ रहा है। दुनिया में कोई भी बड़ा दुश्मन नहीं है। हमारा असली दुश्मन दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता है। हम सभी को इस निर्भरता को दूर करने के लिए प्रयास करना चाहिए, क्योंकि हम विदेशी देशों पर जितना अधिक निर्भर होंगे, हमारा देश उतना ही अधिक असुरक्षित होगा।”

पीएम मोदी ने कहा, “आज मैं ऐसे समय में भावनगर आया हूँ, जब नवरात्रि का पर्व शुरू होने वाला है। इस बार GST में कमी की वजह से बाजारों में रौनक भी ज्यादा रहने वाली है। और ये उत्सव के इसी माहौल में आज हम समुद्र से समृद्धि का महा-उत्सव मना रहे हैं। 21वीं सदी का भारत आज समुद्र को बहुत बड़े अवसर के रूप में देख रहा है। थोड़ी देर पहले यहाँ port led development को गति देने के लिए हजारों करोड़ रुपए का शिलान्यास और उद्धाटन किया गया है।”

पीएम मोदी ने कहा, “भारत आज विश्वबंधु की भावना से आगे बढ़ रहा है। दुनिया में हमारा कोई बड़ा दुश्मन नहीं है। सच्चे अर्थ में अगर हमारा कोई दुश्मन है तो वो है दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता…। यही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है और हमें मिलकर भारत के इस दुश्मन को हराना ही होगा।

कॉन्ग्रेस ने देश के युवाओं को नुकसान पहुँचाया

पीएम मोदी ने कहा, “भारत में क्षमता की कभी कोई कमी नहीं रही। लेकिन कॉन्ग्रेस ने देश की क्षमता को लगातार नजरअंदाज किया। यही कारण है कि आजादी के छह-सात दशक बाद भी भारत वह हासिल नहीं कर पाया जिसका वह हकदार था। इसके दो प्रमुख कारण थे। कॉन्ग्रेस ने लंबे समय तक देश को लाइसेंस राज में फँसाए रखा और वैश्विक बाज़ारों से अलग-थलग रखा।

बाद में, जब वैश्वीकरण का दौर शुरू हुआ, तो उसने सिर्फ आयात का रास्ता अपनाया और फिर भी हजारों करोड़ रुपए के घोटाले किए। ऐसी नीतियों के जरिए कॉन्ग्रेस ने हमारे देश के युवाओं को बहुत नुकसान पहुँचाया।”

पीएम मोदी ने कहा, “भारत में सामर्थ्य की कोई कमी नहीं है, लेकिन आजादी के बाद कॉन्ग्रेस ने भारत के हर सामर्थ्य को नजरअंदाज किया, इसलिए आजादी के 6-7 दशकों बाद भी भारत वो सफलता हासिल नहीं कर पाया, जिसके हम हकदार थे। इसके दो बड़े कारण रहे- लंबे समय तक कॉन्ग्रेस सरकार ने देश को लाइसेंस कोटा राज में उलझाए रखा। दुनिया के बाजार से अलग-थलग रखा। कॉन्ग्रेस सरकार की नीतियों ने देश के नौजवानों का बहुत नुकसान किया।”

40% का व्यापार 5% तक ले आई कॉन्ग्रेस

पीएम मोदी ने कहा, “भारत में जहाज निर्माण को मजबूत करने के बजाय, कॉन्ग्रेस ने विदेशी जहाजों को किराये पर लेना बेहतर समझा। परिणामस्वरूप, भारत का जहाज निर्माण तंत्र ध्वस्त हो गया और विदेशी जहाजों पर निर्भरता हमारी मजबूरी बन गई। इसके परिणाम गंभीर थे: पचास साल पहले, हमारा लगभग 40% व्यापार भारतीय जहाजों पर होता था, लेकिन आज यह आँकड़ा मुश्किल से 5% रह गया है। इसका मतलब है कि हमारे लगभग 95% व्यापार के लिए हम विदेशी जहाजों पर निर्भर हो गए, जिसकी देश को भारी कीमत चुकानी पड़ी।”

‘2047 तक होना होगा आत्मनिर्भर’

पीएम मोदी ने कहा, “2047 तक हमें विकसित होना है तो भारत को आत्मनिर्भर होना ही होगा… इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। 140 करोड़ देशवासियों का एक ही संकल्प होना चाहिए- Chip हो या Ship… हमें भारत में ही बनाने होंगे। इसी सोच के साथ आज भारत Maritime Sector भी नेक्स्ट जेनरेशन रिफॉर्म करने जा रहा है। देश के Maritime Sector को मजबूती देने के लिए एक बहुत ऐतिहासिक निर्णय हुआ है… अब सरकार ने बड़े जहाजों को Infrastructure के रूप में मान्यता दे दी है।”

पीएम मोदी ने कहा, “आज भारत एक अलग मिजाज के साथ आगे बढ़ रहा है। हम जो लक्ष्य तय करते हैं उसे अब समय से पहले पूरा करके भी दिखाते हैं। सोलर सेक्टर में भारत अब अपने लक्ष्यों को चार-चार, पाँच-पाँच साल पहले हासिल कर रहा है। हमने समुद्री क्षेत्र में सुधारों की एक श्रृंखला शुरू की है। हमारी सरकार ने राष्ट्र के समक्ष पाँच समुद्री कानूनों को नए रूप में प्रस्तुत किया है। ये कानून शिपिंग क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाएँगे।”

गुजरात में ‘समुद्र से समृद्धि’ कार्यक्रम

कार्यक्रम के दौरान समुद्री क्षेत्र से जुड़े कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स में 7870 करोड़ रुपए से भी अधिक का निवेश शामिल है। इनमें मुंबई में नया क्रूज टर्मिनल, कोलकाता और पारादीप में नए कंटेनर टर्मिनल और कांडला में नया कार्गो बर्थ शामिल हैं। ये सभी काम भारत के बंदरगाहों को और बेहतर बनाएँगे और समुद्री व्यापार को बढ़ावा देंगे।

इसके अलावा, पटना और वाराणसी में जहाज मरम्मत की सुविधाएँ भी बनाई जाएँगी। इससे न सिर्फ समुद्री व्यापार में मदद मिलेगी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी और रोजगार के नए मौके बनेंगे। इन परियोजनाओं से भारत के प्रमुख बंदरगाहों में बदलाव आएगा और इससे भारत में व्यापार को और बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, समुद्री सुरक्षा भी मजबूत होगी।

विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास

प्रधानमंत्री मोदी ने गुजरात में 26354 करोड़ रुपए की परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास भी किया, जिसमें समुद्री परियोजनाओं के अलावा कई और महत्वपूर्ण योजनाएँ शामिल हैं। इनमें ग्रीन बायो-मेथनॉल और नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाएँ हैं, जो भारत को ग्रीन एनर्जी की दिशा में मदद करेंगी। इसके अलावा, सड़कों, अस्पतालों और शहरी परिवहन के लिए भी कई परियोजनाएँ शुरू की जाएँगी, जैसे भावनगर और जामनगर में अस्पतालों का विस्तार और 70 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्गों को चार लेन में बदलना।

प्रधानमंत्री मोदी गुजरात में नवीकरणीय ऊर्जा और स्वास्थ्य सेवाओं के विकास के लिए कुछ महत्वपूर्ण योजनाओं का उद्घाटन भी किया। इनमें 600 मेगावाट की ग्रीन शू पहल, 475 मेगावाट की पीएम-कुसुम सोलर परियोजना और किसानों के लिए सौर ऊर्जा से जुड़े नए कार्यक्रम शामिल हैं। इसके साथ ही, स्वास्थ्य क्षेत्र में भी कई नई योजनाएँ शुरू की जाएँगी, जैसे भावनगर में सर टी जनरल अस्पताल और जामनगर में गुरु गोविंद सिंह सरकारी अस्पताल का विस्तार।

धोलेरा और राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर का दौरा

प्रधानमंत्री मोदी धोलेरा में बन रहे हरित औद्योगिक शहर का हवाई सर्वेक्षण करेंगे। यहाँ एक नया स्मार्ट शहर बनाया जा रहा है, जो पर्यावरण के अनुकूल होगा। इसके बाद, वे लोथल में बन रहे राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर का दौरा करेंगे।

इस परिसर को भारत की पुरानी समुद्री धरोहर को बचाने और बढ़ावा देने के लिए 4500 करोड़ रुपए से बनाया जा रहा है। यह एक बड़ा पर्यटन और शिक्षा का केंद्र बनेगा, जहाँ लोग समुद्री इतिहास के बारे में जान सकेंगे।

ऑपरेशन सिंदूर से डरे जैश-हिजबुल आतंकी, बदलने लगे अपना ठिकाना: PAK एजेंसियाँ कर रहीं शिफ्टिंग में मदद, अफगान बॉर्डर पर बनाया ट्रेनिंग सेंटर

भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान में पल रहे आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन अपने ठिकानों को बदल रहे हैं। अब ये संगठन पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) से हटकर खैबर पख्तूनख्वा इलाके में जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस काम में पाकिस्तान की सरकारी एजेंसियाँ भी इनकी मदद कर रही हैं।

खैबर पख्तूनख्वा का इलाका पहाड़ी और दुर्गम है। इससे वहाँ किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई को अंजाम देना मुश्किल होता है। यह क्षेत्र अफगानिस्तान की सीमा के पास है।ऐसे में यह इलाका आतंकियों के लिए एक ‘सुरक्षित पनाहगाह’ बन जाता है। इसीलिए आतंकी इस इलाके में अब अपना जखीरा तैयार करने की सोच रहे हैं।

जैश-ए-मोहम्मद ने बहावलपुर से अपना ट्रेनिंग कैंप मंसेहरा जिले के गढ़ी हबीबुल्लाह कस्बे में शिफ्ट किया है। वहीं हिजबुल मुजाहिदीन ने लोअर दिर जिले के बंदाई इलाके में नया ट्रेनिंग सेंटर शुरू किया है, जिसका नाम ‘HM 313’ रखा गया है। इन जगहों पर नए लड़ाकों को तैयार करने के साथ-साथ कट्टरपंथी सोच फैलाने का काम भी हो रहा है।

313 नाम बद्र गजवा (एक बड़ा इस्लामी युद्ध) और अलकायदा की ब्रिगेड 313 को एक तरह से श्रद्धांजलि है। ये दुनिया में जिहादी को सही ठहराने के हिज़्ब के इरादे को दर्शाता है।

14 सितंबर 2025 को जैश ने गढ़ी हबीबुल्लाह में एक धार्मिक सभा रखी थी। खास बात ये है कि इसमें हथियारबंद लोगों के साथ पाकिस्तान की स्थानीय पुलिस भी मौजूद थी। इस सभा के जरिए युवाओं को आतंकी संगठन से जोड़ने की कोशिश की गई।

25 सितंबर को जैश-ए-मोहम्मद पेशावर के मरकज शहीद मकसूदाबाद में ऑपरेशन सिंदूर में मारे गए मसूद अजहर के भाई यूसुफ अजहर की याद में एक भर्ती अभियान आयोजित करने की योजना बना रहा है।

यहीं पर संगठन के लिए एक नया नाम ‘अल-मुराबितुन’ की घोषणा भी की जा सकती है। ‘अल-मुराबितुन’ का मतलब इस्लाम की धरती के रक्षक है। ये पश्चिमी अफ्रीका के अलकायदा समूह जैसा होगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक इन गतिविधियों में पाकिस्तान की सेना, पुलिस और कुछ राजनीतिक संगठन भी शामिल हैं और पूरी मदद कर रहे हैं। हाल ही में जैश के एक कमांडर मसूद इलियास कश्मीरी ने सार्वजनिक रूप से यह माना है कि ऑपरेशन सिंदूर में मसूद अजहर के परिवार के कई लोग मारे गए हैं। इससे आतंकी संगठन को काफी नुकसान हुआ है।

ऑपरेशन सिंदूर से डरे आतंकी

जम्मू-कश्मीर में पहलगाम की बैसारन घाटी में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकी हमले के जवाब में भारतीय सेना ने अपनी पूरी तैयारी के साथ 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर की एक बड़ी और सटीक कार्रवाई की।

इस कार्रवाई के तहत पाकिस्तान में सक्रिय आतंकवादी संगठनों के ठिकानों को निशाना बनाकर उन्हें ध्वस्त कर दिया गया। सेना ने बहावलपुर, मुरीदके, मुजफ्फराबाद समेत कई आतंकी और सैन्य ठिकानों पर अपनी कार्रवाई की।

इसके बाद जैश, हिजबुल और लश्कर-ए-तैयबा समेत पाकिस्तान में बसे कई आतंकी संगठनों को तगड़ा नुकसान पहुँचा। साथ ही उन्हें ये संदेश भी मिला कि भारतीय सेना के निशाने पर वो कभी भी आ सकते हैं।

इस ऑपरेशन के बाद ही आतंकियों ने अपने ठिकानों को भारत की रेंज से दूर शिफ्ट करने का फैसला किया है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से हटकर अब वे खैबर पख्तूनख्वा जैसे इलाकों में शरण ले रहे हैं और इसमें पाकिस्तान की सरकारी एजेंसियों की भूमिका भी सामने आ रही है।

चुनाव आयोग ने 474 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों का रजिस्ट्रेशन किया रद्द, पिछले 6 वर्षों से नहीं लड़ा था चुनाव: 359 अन्य दलों को भी भेजा शो-कॉज नोटिस

भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने देश की चुनावी व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। शुक्रवार (19 सितंबर 2025) को चुनाव आयोग ने 474 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (RUPPs) को डीलिस्ट कर दिया क्योंकि ये पिछले 6 सालों से कोई चुनाव नहीं लड़ रहे थे।

इससे पहले 9 अगस्त 2025 को ऐसे ही 334 दल हटाए गए थे। यानी सिर्फ दो महीनों में कुल 808 दलों को बाहर किया गया है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत राजनीतिक दलों को अपना पंजीकरण बनाए रखने के लिए चुनावों में सक्रिय रूप से भाग लेना आवश्यक है। 

चुनाव आयोग का कहना है कि जो पार्टियाँ लगातार 6 साल तक कोई चुनाव नहीं लड़तीं, उन्हें एक्ट के मुताबिक हटाया जा सकता है। इसके पीछे मकसद यह है कि सिर्फ नाम की पार्टियाँ जो चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेतीं, लेकिन चुनाव चिन्ह और टैक्स जैसी सुविधाएँ लेती हैं, उन्हें हटाया जाए।

इस बार सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश पर पड़ा जहाँ 121 पार्टियाँ हटाई गईं जबकि महाराष्ट्र में 44, तमिलनाडु में 42, दिल्ली में 40, पंजाब में 21 और राजस्थान में 17 पार्टियों को हटाया गया।

ECI यहीं नहीं रुका। अब तीसरे चरण में 359 और पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई है। ये वे पार्टियाँ हैं, जिन्होंने भले ही पिछले 6 सालों में चुनाव लड़ा है लेकिन उन्होंने अपने ऑडिटेड अकाउंट्स और चुनाव खर्च की रिपोर्ट तीन सालों (2021-22, 2022-23 और 2023-24) से नहीं दी है।

इन सभी को अब शो-कॉज नोटिस भेजा गया है और जवाब मिलने के बाद उन पर भी फैसला लिया जाएगा। यहाँ भी उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, जहाँ 127 पार्टियाँ इस जाँच के घेरे में हैं, इसके बाद दिल्ली (41), तमिलनाडु (39) और बिहार (30) हैं। फिलहाल भारत में 6 राष्ट्रीय पार्टियाँ, 67 राज्य पार्टियाँ और आज की कार्रवाई के बाद 2046 RUPPs बाकी हैं।

इस पूरी मुहिम का मकसद है कि जो पार्टियाँ न तो चुनाव लड़ती हैं और न ही पारदर्शिता बरतती हैं, उन्हें हटाकर भारत की चुनावी लिस्ट को साफ किया जाए, ताकि लोकतंत्र मजबूत हो और चुनावी प्रक्रिया में गंभीर पार्टियाँ ही बनी रहें।

चुनाव आयोग की यह सख्त कार्रवाई भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में एक अहम कदम है। इससे चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी।

अकबर की क्रूरता का सच किताबों में आने पर नाराज हुए SC के पूर्व जज, बोले- ‘तोड़ा-मरोड़ा जा रहा इतिहास’: जानें कैसे मुगल तानाशाह ने करवाया था 30000 हिंदुओं का नरसंहार

पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस रोहिंटन नरिमन ने हाल ही में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में मुगल शासक अकबर को ‘क्रूर शासक’ (tyrant) के रूप में दिखाए जाने पर नाराजगी जताई है। उन्होंने इसे इतिहास का ‘तोड़-मरोड़’ कर प्रस्तुत करना बताया है।

1 सितंबर 2025 को त्रिवेंद्रम के प्रेस क्लब में आयोजित केएम बशीर स्मृति व्याख्यान (KM Bashir Memorial Lecture) में बोलते हुए उन्होंने अपने एक निजी अनुभव को साझा किया। उन्होंने कहा कि एक बच्चे ने उन्हें एक इतिहास की किताब से कुछ पढ़कर सुनाया, जिसे सुनकर वे चौंक गए।

जस्टिस नरिमन ने कहा, “मैं हैरान रह गया जब बच्चे ने पढ़कर सुनाया कि अकबर को उस किताब में एक ऐसा व्यक्ति बताया गया है जो अत्याचारी था और उसने चित्तौड़ में बड़े पैमाने पर हत्याएँ कराई थी, जहाँ कई महिलाओं ने जौहर किया था। किताब में बस इतना ही लिखा था और महान मुगलों के बारे में लगभग कुछ भी नहीं बताया गया।”

उन्होंने आरोप लगाया कि यह न केवल इतिहास को मिटाने की कोशिश है बल्कि पूरी तरह से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना है।

जस्टिस नरीमन ने लोगों को कथित ‘इतिहास के विरूपण’ के खिलाफ कोर्ट जाने के लिए किया प्रोत्साहित

जस्टिस रोहिंगटन नरिमन ने कहा कि मुगल शासकों, खासकर अकबर ने, भारत की ‘संयुक्त  संस्कृति’ को बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सँभाल कर रखें और उसका सम्मान करें।

अगर इस साझा संस्कृति को तोड़ा जाता है या हमारे इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा या मिटाया जाता है, तो नागरिक इसके खिलाफ कोर्ट जा सकते हैं। जस्टिस नरिमन ने माना कि इतिहास जैसे विषयों में कोर्ट के पास खुद विशेषज्ञता नहीं होती। लेकिन ऐसी स्थिति में कोर्ट विशेषज्ञों की एक समिति बना सकती हैं, जो मामले की जाँच कर सही सुझाव दे और असली इतिहास को बहाल करे।

उन्होंने साफ कहा, “कोर्ट खुद यह काम नहीं कर सकती लेकिन विशेषज्ञों की मदद से सच्चाई सामने लाई जा सकती है। यह सिर्फ मेरी एक सलाह है लेकिन रोकथाम इलाज से बेहतर होता है।”

भारतीय इतिहास की सटीक तस्वीर प्रस्तुत करने के लिए इतिहास की पुस्तकों को किया गया है संशोधित

जस्टिस नरिमन की टिप्पणी हाल ही में कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में किए गए बदलाव के संदर्भ में आई है। यह बदलाव राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 (NCFSE 2023) की सिफारिशों के अनुसार किया है।

इतिहास की यह संशोधित पुस्तक लंबे समय से पेश की जा रही एक एकतरफा और सुंदर रूप में दिखाए गए मध्यकालीन भारत के इतिहास को संतुलित रूप से प्रस्तुत करने की कोशिश करती है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक घटनाओं और कालखंडों की सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को सामने लाना है, यानी यह बदलाव किसी कल्पनात्मक या भावनात्मक इतिहास पर नहीं, बल्कि ठोस ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है।

नई किताब में यह बताया गया है कि जहाँ एक ओर जहाँगीर और शाहजहाँ जैसे मुगल शासकों ने कला और स्थापत्य का संरक्षण किया, वहीं दूसरी ओर यह भी उल्लेख किया गया है कि बाबर जैसे शासकों ने पूरे शहरों की जनता का नरसंहार किया था।

औरंगजेब को एक ऐसा सैनिक शासक बताया गया है जिसने गैर-इस्लामी परंपराओं पर पाबंदी लगाई और गैर-मुसलमानों पर जजिया कर फिर से लगाया। वहीं अकबर के शासन को ‘उदारता और कठोरता का मिश्रण’ कहा गया है।

चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी के बाद अकबर ने 30 हजार हिंदुओं के नरसंहार का दिया था आदेश

पहले के इतिहास की किताबों में मुगल शासक अकबर को धार्मिक सहिष्णुता (tolerance) का प्रतीक बताकर दिखाया गया था। इसमें खास तौर पर यह बताया गया कि अकबर ने जजिया कर (जो गैर-मुस्लिमों पर लगाया जाता था) हटा दिया था। लेकिन इन किताबों में यह बात छुपा ली गई कि चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी के दौरान अकबर ने हिंदुओं के खिलाफ जिहाद छेड़ा था और करीब 30,000 हिंदुओं का नरसंहार (massacre) करवाया था।

चार महीने तक चले इस युद्ध के अंत में अकबर ने इसे ‘इस्लाम की काफिरों पर जीत’ बताया था। युद्ध के बाद न केवल पुरुषों की हत्या की गई बल्कि महिलाओं और बच्चों को गुलाम बना लिया गया। ऐसे में जब जस्टिस नरिमन ने नई इतिहास की किताबों को लेकर अपनी राय दी, तो लगता है कि उनकी जानकारी अधूरी या गलतफहमी पर आधारित थी।

छात्रों को इतिहास का पूरा और संतुलित चित्र दिखाना जरूरी है। शासकों के अच्छे और बुरे दोनों पहलुओं को जानना चाहिए। लेकिन यह भी जरूरी है कि जो इतिहास उन्हें पढ़ाया जा रहा है, वह तथ्यों पर आधारित हो, न कि कल्पना या एकतरफा सोच पर। आखिरी फैसला छात्रों पर छोड़ देना चाहिए कि वे किसी ऐतिहासिक व्यक्ति या काल के बारे में क्या राय बनाते हैं।

गोधरा में ‘I Love Muhammad’ से जुड़े पोस्ट को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों का हंगामा, पुलिसकर्मियों पर पथराव और थाने में तोड़फोड़: वडोदरा में भी पुलिस पर फेंके गए पत्थर

गुजरात के गोधरा और वडोदरा के जूनीगढ़ी इलाके में बीती रात सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट को लेकर कट्टरपंथियों ने पुलिस थानों को निशाना बनाया है। गोधरा में तो कट्टरपंथियों ने थाने में तोड़फोड़ तक कर दी जिसके बाद पुलिस को हालात काबू में करने के लिए लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा है।

गोधरा में I Love Muhammad से जुड़े पोस्ट को लेकर हंगामा

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मामले की जड़ कानपुर से शुरु हुए ‘I Love Muhammad’ के प्रदर्शनों से जुड़ी हुई हैं। गोधरा में पिछले कुछ दिनों से इसी हैशटेग के साथ वायरल वीडियो बनाए जा रहे थे। इन वीडियोज के जरिए सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की साजिश की जा रही थी।

सोशल मीडिया पर लगातार भड़काऊ पोस्ट डालने वाले एक इन्फ्लुएंसर को गोधरा सिटी बी डिवीजन थाने द्वारा बुलाया गया और पुलिस उसे समझाने की कोशिश कर रही थी कि ऐसी पोस्ट से नवरात्रि पर्व से पहले तनाव फैले सकता है। इसके चलते युवक को ऐसे पोस्ट करने से बचना चाहिए।

इस बीच कुछ लोगों द्वारा अफवाह फैला दी गई कि पुलिस युवक को धमका रही है और उसके खिलाफ गलत तरीके से कार्रवाई की जा रही है। इस अफवाह के सामने आते ही करीब आधे घंटे में भीड़ थाने पर उमड़ी और जमकर तोड़फोड़ मचाई गई। इसके बाद कट्टरपंथियों की भीड़ आती गई और थाने पर लगातार हमला होता रहे।

थाने में जमकर तोड़फोड़ की गई और फर्नीचर, खिड़कियाँ और पुलिस के वाहनों को भी नुकसान पहुँचाया गया। साथ ही, भीड़ ने पुलिस कर्मियों पर पथराव भी शुरू कर दिया। जब हालात बेकाबू होने लगे तो पुलिस ने पहले चेतावनी दी और फिर भी लोग नहीं माने तो लाठीचार्ज कर दिया। पुलिस को आंसू गैस के गोले तक छोड़ने पड़े जिसके बाद घंटों की मशक्कत के बाद भीड़ को हटाया जा सका।

जूनीगढ़ी में भी सोशल मीडिया पोस्ट पर बवाल

वहीं, वडोदरा के संवेदनशील जूनीगढ़ी इलाके में एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट ने माहौल बिगाड़ दिया। पोस्ट के बाद एक समुदाय विशेष के लोग थाने पहुँचकर नारेबाजी और सड़क जाम करने लगे, जिससे हालात तनावपूर्ण हो गए।

देखते ही देखते पथराव शुरू हो गया जिसमें पुलिसकर्मी और स्थानीय लोग घायल हुए। इसके बाद जब हंगामा बढ़ा तो स्थिति सँभालने खुद एडिशनल पुलिस कमिश्नर डॉ. लीना पाटिल मौके पर पहुँचीं और लोगों से सख्त संवाद कर भीड़ को कंट्रोल किया।

पुलिस ने साफ कहा है कि हिंसा, तोड़फोड़ और अफवाह फैलाने वालों को किसी भी कीमत पर नहीं बख्शा जाएगा। वीडियोग्राफी से पत्थरबाजों की पहचान हो रही है और अज्ञात लोगों पर प्राथमिकी दर्ज की जा रही है।