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‘उर्दू शब्दों के इस्तेमाल पर सूचना मंत्रालय ने हिंदी न्यूज चैनलों को भेजा नोटिस’: ‘द वायर’ ने फैलाई झूठी खबर, जानिए क्या है सच

अपनी खबरों से ज्यादा अपने प्रोपेगेंडा के लिए चर्चा में रहने वाला ‘द वायर’ एक बार फिर झूठ फैलाता पकड़ा गया है। वायर ने शनिवार (20 सितंबर 2025) को ‘उर्दू शब्दों के इस्तेमाल पर सूचना मंत्रालय ने हिंदी न्यूज़ चैनलों को भेजा नोटिस’ हेडिंग के साथ एक खबर की।

इससे हेडिंग को पढ़ने से साफ जाहिर होता है कि वायर यह बताना चाहता है कि यह कार्रवाई सूचना मंत्रालय ने की है और इसकी वजह उर्दू शब्दों का इस्तेमाल करना है।

द वायर की हेडलाइन

वायर ने अपनी खबर में आगे लिखा, “सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टीवी9 भारतवर्ष, आजतक, एबीपी, ज़ी न्यूज़ और टीवी 18 को औपचारिक नोटिस भेजा है क्योंकि ये चैनल हिंदी होने के बावजूद प्रसारण में करीब तीस प्रतिशत उर्दू शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं।” वायर ने यहाँ तक भी दावा कि मंत्रालय ने भाषा विशेषज्ञ की नियुक्ति करने का निर्देश दिया है।

इससे पहले की वायर का यह झूठ लोगों तक पहुँचता, सरकार ने खुद ही इसकी पोल खोल दी है। पीआईबी की फैक्ट चेक यूनिट ने रविवार (21 सितंबर 2025) को X पर एक पोस्ट के जरिए इस दावे का सच सामने रख दिया।

पीआईबी ने कहा, “कुछ मीडिया रिपोर्टों और सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया जा रहा है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने हिंदी समाचार चैनलों को अपने प्रसारणों में अत्यधिक उर्दू शब्दों के इस्तेमाल के लिए नोटिस जारी किया है और उन्हें भाषा विशेषज्ञ नियुक्त करने का निर्देश दिया है। यह दावा भ्रामक है।”

पीआईबी ने इसका पूरा सच सामने रखते हुए बताया, “मंत्रालय ने केबल टेलीविजन नेटवर्क विनियमन अधिनियम के प्रावधानों के तहत एक दर्शक की शिकायत संबंधित चैनलों को भेज दी है।” पीआईबी के मुताबिक, चैनलों को निर्देश दिया गया है कि वे शिकायतकर्ता को की गई कार्रवाई से अवगत कराएँ और संबंधित नियमों के अनुसार मंत्रालय को भी सूचित करें।

वायर की झूठ फैलाने की पुरानी आदत रही है लेकिन हर बार की तरह इस बार भी उसका झूठ पकड़ लिया गया है। करीब 10 दिन पहले की ही बात है जब ‘द वायर’ ने पश्चिम बंगाल के बांकुरा में एक मुस्लिम फेरीवाले मइमूर अली मंडल पर हमले की खबर को सांप्रदायिक रंग देकर पेश किया था।

‘द वायर’ ने कहा कि मइमूर को जय श्री राम’ बोलने के लिए मजबूर किया गया लेकिन पुलिस की जाँच में सामने आया कि वायर ने जानबूझकर समाज में जहर फैलाने की कोशिश की थी। इसके अलावा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भी ‘द वायर’ ने भारत के लड़ाकू विमानों के नुकसान का फर्जी नैरेटिव फैलाया था और इसके जरिए मोदी सरकार को बदनाम करने की कोशिश की थी।

हैदराबाद यूनिवर्सिटी में ABVP ने किया NSUI का सूपड़ा साफ, सातों सीटों पर जीते: जानें दिल्ली से लेकर पटना और पंजाब में GenZ कैसे दे रहा राहुल गाँधी को जवाब

भारत में राहुल गाँधी समेत पूरे विपक्ष को Gen-Z ने जवाब दे दिया है। पहले दिल्ली यूनिवर्सिटी में भगवा लहराया। अब हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एबीवीपी ने सभी 7 सीटों पर जीत हासिल कर Gen-Z पीएम मोदी के साथ है, ये साबित कर दिया है।

हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एबीवीपी की जीत

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव में बीजेपी के छात्र विंग यानी एबीवीपी (ABVP) ने शानदार प्रदर्शन किया है। संगठन ने अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, संयुक्त सचिव, महासचिव, कल्चरल सचिव और खेल सचिव समेत सभी 7 अहम पदों पर कब्जा कर लिया है। छात्र नेताओं ने इस जीत को राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति संगठन की प्रतिबद्धता और मेहनत को दिया है। संगठन लगातार राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों पर काम कर रही है। शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के साथ- साथ नैतिकता की बात भी की जा रही है। यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं को एबीवीपी की प्रतिबद्धता पसंद आ रही है। एबीवीपी को ये मार्गदर्शन पीएम मोदी की नेतृत्व वाली एनडीए सरकार से मिल रही है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी में एबीवीपी का प्रदर्शन

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2025 में एबीवीपी ने केंद्रीय पैनल की 4 में से 3 सीटों पर कब्जा कर लिया, जबकि एनएसयूआई को केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा है। एबीवीपी के आर्यन मान अध्यक्ष बने। दीपिका झा संयुक्त सचिव बनीं और कुणाल चौधरी को सचिव पद मिला। इस चुनाव में एनएसयूआई को एकमात्र उपाध्यक्ष पद मिला। सबसे गौर करने वाली बात ये हैं कि इस चुनाव में अध्यक्ष आर्यन मान ने एनएसयूआई के उम्मीदवार को 16000 से अधिक वोटों से हराया। इससे साबित होता है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में एक दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों के दिलों में पीएम मोदी बसते हैं।

जेएनयू में शानदार प्रदर्शन

वामपंथियों का गढ़ कहलाने वाले जेएनयू में भी अप्रैल 2025 में हुए छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी ने शानदार उपलब्धि हासिल की। एबीवीपी ने संयुक्त सचिव का पद जीतने के साथ- साथ काउंसिल की 42 में से 23 सीटों पर विजय हासिल की। ये कैंपस में आ रहे बदलाव को दर्शाता है। यहाँ तक कि स्कूल ऑफ सोशल साइंस जिसमें पहले एबीवीपी का कोई अस्तिव नहीं था, वहाँ भी 2 सीटें हासिल की। इसे खास तौर पर जेएनयू का वामपंथी सेंटर माना जाता है।

पंजाब यूनिवर्सिटी में झंड़ा बुलंद किया

पंजाब विश्वविद्यालय परिसर छात्र परिषद (PUCSC) चुनाव में इस बार बड़ा उलटफेर देखने को मिला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP ने पाँच दशकों में पहली बार अध्यक्ष पद पर जीत हासिल कर इतिहास रच दिया। 1977 में प्रत्यक्ष मतदान व्यवस्था लागू होने के बाद पहली बार ABVP का अध्यक्ष बना है। साल 2024 में ABVP के उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे थे, जबकि 2023 में जसविंदर राणा ने संयुक्त सचिव पद पर जीत दर्ज की थी।

पटना यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन

पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी की मैथिली मृणालिनी ने अध्यक्ष पद जीता। यूनिवर्सिटी के इतिहास में पहली बार एक छात्रा अध्यक्ष बनीं। मार्च 2025 में हुए चुनाव में यहाँ भी एबीवीपी का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। काउंसिल सदस्यों में सबसे ज्यादा सीट एबीवीपी के पास है।

गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन

पूर्वोत्तर का सबसे पहला और बड़े यूनिवर्सिटी गुवाहाटी विश्वविद्यालय में भी पहली बार अध्यक्ष पद पर एबीवीपी ने जीत दर्ज की। सितंबर 2024 में हुए गुवाहाटी विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी ने दबदबा बनाते हुए अध्यक्ष समेत 3 महत्वपूर्ण पदों पर जीत दर्ज की। ये पूर्वोत्तर में मोदी सरकार के कामकाज पर जेन जी के समर्थन का प्रमाण है।

उत्तराखंड के कई विश्वविद्यालयों में जीत

उत्तराखंड के कई विश्वविद्यालयों में एबीवीपी का प्रदर्शन शानदार रहा। उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय में एबीवीपी ने अध्यक्ष समेत सभी 6 अहम पद जीत लिए हैं। वहीं एचएनबी गढ़वाल केन्द्रीय विश्विविद्यालय में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर एबीवीपी के उम्मीदवार निर्विरोध जीत गए।

पिछले कुछ सालों में एबीवीपी ने कई विश्वविद्यालयों में शानदार प्रदर्शन कर साबित कर दिया है कि पीएम मोदी की लोकप्रियता जेन जी में कितनी है। बीजेपी के सिद्धांतों और आदर्शों को छात्र अपना समर्थन दे रहे हैं और ये प्रभावी रणनीति का परिणाम है।

राहुल गाँधी को Gen Z का जवाब

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने हाल ही में जेन-जी से संविधान बचाने और कथित ‘वोट चोरी’ रोकने की अपील की थी। ऐसे में देश के अलग अलग राज्यों में एबीवीपी की शानदार जीत ने उन्हें करारा तमाचा मारा है। जेन जी को देश के लोकतंत्र और संविधान पर पूरा भरोसा है। इनलोगों ने वोट देकर एबीवीपी को जिताया है और वोट चोरी के आरोपों की धज्जियाँ उड़ा दी है।

हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एबीवीपी का जीतना कई मायनों में अहम है। मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र में राहुल गाँधी चारो खाने चित्त नजर आ रहे हैं। ये वही तेलंगाना है, जहाँ कॉन्ग्रेस की सरकार है। 2024 के छात्रसंघ चुनाव में यूनिवर्सिटी में वामपंथी और कॉन्ग्रेस के छात्र संगठनों ने जबरदस्त जीत दर्ज की थी। एक साल बाद उनकी ये हालत राहुल गाँधी के ‘वोट चोरी’ की हवा निकाल दी है। साथ ही छात्रों के मन में मोदी सरकार के प्रति समर्थन और सम्मान को भी ये रिजल्ट दर्शाता है।

भारत में नेपाल और बांग्लादेश की तरह Gen-Z के तख्तापलट का मंसूबा पाले विपक्ष को गहरा धक्का लगा है। हैदराबाद यूनिवर्सिटी में 81 फीसदी वोटिंग हुई है। ये भी साबित करता है कि छात्र-छात्राओं ने बढ़चढ़ कर वोटिंग में हिस्सा लिया और पीएम मोदी के नेतृत्व को समर्थन दिया।

भारत का GenZ 2014 में ही राष्ट्रवादी राजनीति की नींव रख चुका है। GenZ ने अब राहुल गाँधी की अराजक टूलकिट को भी फेल साबित कर दिया है।

तेजस्वी यादव के सामने ही कार्यकर्ताओं ने बकी PM मोदी की माँ को गाली, राजद नेता हिलाते रहे हाथ: करतूत Video में कैद, BJP ने कहा- बिहार की बहनें करेंगी इनका हिसाब

बिहार में चुनाव से पहले विपक्ष राज्य में विकास की बात करने की बजाय प्रधानमंत्री मोदी को गाली देने में व्यस्त है। हाल में ऐसा महुआ विधानसभा में आयोजित एक सभा के दौरान भी देखा गया, जहाँ तेजस्वी यादव के सामने ही राजद (RJD) के कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत माँ को भद्दी गालियाँ दी। यह घटना शनिवार (20 सितंबर 2025) को सामने आई। मंच पर राजद विधायक मुकेश रौशन भी मौजूद थे।

बिहार बीजेपी ने इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया है। वीडियो में देखा जा सकता है कि जब पीएम मोदी को गालियाँ दी जा रही हैं, उस समय RJD विधायक मुकेश रौशन कार्यकर्ताओं को रोकने की बजाय उनका उत्साह बढ़ाते दिख रहें हैं। वीडियो में लोग कह रहे ‘मोदी माद***द’ और तेजस्वी समेत मंच पर खड़े RJD के अन्य नेता उन्हें रोकने की कोशिश भी नहीं कर रहे।

वीडियो के साथ बीजेपी ने एक्स पर लिखा, “तेजस्वी ने अपनी रैली में फिर से मोदी जी की स्वर्गीय माता जी को गाली दिलवाई। RJD के कार्यकर्ता जितना गाली दे रहे थे तेजस्वी उतना ही उनका हौसला बढ़ा रहे थे। राजद-कॉन्ग्रेस की रैलियों का आजकल एकसूत्री कार्यक्रम चल रहा है- ‘माई-बहिन को गाली दो।’ गालीबाजी जारी है इनकी। इनकी गुंडई की मानसिकता, कुंठा और हताशा चरम पर पहुँच चुका है। माँ का अपमान करने वालों को बिहार की जनता माफ नहीं करेगी, इनके गिरे हुए संस्कार का प्रतीक है। हर गाली का हिसाब करेंगी बिहार की माताएँ-बहनें।”

बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय, केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय, विधायक लखेंद्र पासवान और अन्य नेताओं ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उनका कहना है कि यह कोई पहली बार नहीं है। इससे पहले राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान भी पीएम मोदी की माँ को गाली दी गई थी।

नित्यानंद राय ने एक्स पर लिखा, “यह गाली दुनिया के सर्वाधिक लोकप्रिय और देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के खिलाफ हार की बौखलाहट में है..तेजस्वी यादव और राजद वाले याद रखो आपका संस्कार, आपका चरित्र सड़क पर है ..देश और बिहार के लोग देख रहे हैं.. करारा जवाब मिलेगा.. अब पानी सर से ऊपर गुजर रहा है… 14 करोड़ बिहारियो के भावनाओं पर चोट करना बहुत महँगा पड़ेगा।”

बीजेपी के नेताओं का आरोप है कि RJD और कॉन्ग्रेस की रैलियों का एजेंडा ही ‘माँ-बहन को गाली देना’ बन चुका है और तेजस्वी यादव न सिर्फ इस तरह की भाषा को बढ़ावा दे रहे हैं, बल्कि उसे रोकने की कोशिश भी नहीं कर रहे।

गौरतलब है कि पिछली घटना के बाद कॉन्ग्रेस की ओर से एक AI वीडियो भी शेयर किया गया था जिसमें पीएम मोदी की माँ को लेकर आपत्तिजनक बातें कही गई थीं। हाई कोर्ट ने उस पर कॉन्ग्रेस को फटकार लगाई थी और वीडियो तुरंत हटाने का आदेश दिया था।

कर्नाटक में हिंदू से कन्वर्टेड लोगों को ईसाई जातियों में दिखाने का खेल कर रही कॉन्ग्रेस सरकार, राज्यपाल ने जताई आपत्ति: दिल्ली हाईकमान के पास दौड़े DK शिवकुमार

कर्नाटक में प्रस्तावित जाति जनगणना को लेकर बवाल मचा हुआ है। कॉन्ग्रेस सरकार का सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वेक्षण 22 सितंबर से शुरू होकर 7 अक्टूबर तक चलेगा। इसके लिए 1.75 लाख शिक्षकों को काम पर लगाया गया है और करीब 420 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। लेकिन जैसे-जैसे सर्वे की तारीख नजदीक आ रही है, विवाद बढ़ता जा रहा है। कॉन्ग्रेस सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह इस सर्वे के जरिए हिंदू समाज को तोड़ने की कोशिश कर रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सर्वे में जातियों को लेकर बनाए गए कॉलम पर कई सवाल उठ रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि कॉन्ग्रेस ने ऐसी व्यवस्था की है कि जिन हिंदुओं ने ईसाई धर्म अपना लिया है, उन्हें उनके मूल हिंदू जाति के नाम के साथ ‘क्रिश्चियन’ जोड़ा जा रहा है। जैसे, अगर कोई लिंगायत या वोक्कालिगा हिंदू ने ईसाई धर्म अपनाया है, तो उसे ‘ईसाई लिंगायत’ या ‘ईसाई वोक्कालिगा’ लिखा जा रहा है।

दरअसल कैबिनेट के कई मंत्रियों ने पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा तैयार किए गए जाति कॉलमों पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह सूची जटिल है और समुदायों को समझाने में समय लगेगा कि किस कॉलम में सही जानकारी भरनी है।

कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष बी. वाई. विजयेंद्र ने कॉन्ग्रेस पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि सरकार ने 47 नई जातियाँ बना दी हैं, जिससे समाज में भ्रम फैल रहा है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वे सर्वे में अपने धर्म के कॉलम में सिर्फ ‘हिंदू’ ही लिखें। उनका मानना है कि इस तरह के नए नाम समाज को कमजोर करेंगे और आपसी एकता को तोड़ेंगे।

राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने भी इस मामले में अपनी चिंता जाहिर की है। उन्होंने 16 सितंबर को मुख्यमंत्री सिद्धरामैया को पत्र लिखकर कहा कि हिंदू जातियों के आगे ‘क्रिश्चियन’ जोड़ना गलत है, क्योंकि ईसाई धर्म में जातियाँ नहीं होतीं। उन्होंने चेतावनी दी कि यह कदम समाज में अशांति पैदा कर सकता है और सामाजिक ढाँचे को नुकसान पहुँचा सकता है। उन्होंने सरकार से इस पर दोबारा विचार करने को कहा है।

उधर, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सर्वे का बचाव किया है। उनका कहना है कि यह सर्वे लोगों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति जानने के लिए जरूरी है। उन्होंने कहा कि क्रिश्चियन और मुस्लिम भी भारतीय नागरिक हैं, और अगर किसी ने धर्म बदल लिया है, तो उनकी वर्तमान जाति ही दर्ज होगी। सिद्धरामैया ने भाजपा पर इस मुद्दे को राजनीति का हथियार बनाने का आरोप लगाया।

इस बीच, उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार दिल्ली जा रहे हैं, जहाँ वे कॉन्ग्रेस हाईकमान से मिलकर सर्वे को कुछ समय के लिए टालने की बात करेंगे। कुछ मंत्रियों का कहना है कि सर्वे की जाति सूची बहुत जटिल है और लोगों को समझाने में वक्त लगेगा।

रामनगर में 14 साल की नाबालिग छात्रा से समद गाजी ने किया रेप, परिजनों ने लगाया ब्रेनवॉश का आरोप: लव जिहाद गिरोह की आशंका, मुस्लिम लड़कियाँ भी शामिल

उत्तराखंड के रामनगर में एक 14 साल की नाबालिग छात्रा का मामला सोशल मीडिया पर कुछ दिन पहले वायरल हुआ। इस वीडियो में दो छात्राएँ कंप्यूटर कोचिंग से निकलने के बाद सड़क किनारे खड़ी स्कूटी से बुर्का पहनते हुए दिखीं। मामले की जाँच में सामने आया कि एक मुस्लिम छात्रा अपनी हिंदू सहपाठी को बुर्का पहनाकर अपने घर ले जाती थी। पहले छात्रा के परिजनों ने इसे शौकिया कदम बताया, लेकिन बाद में मामला गंभीर हो गया जब बच्ची स्कूल से छुट्टी के बाद घर नहीं लौटी।

तब परिवार की शिकायत पर पुलिस ने छानबीन की तो पता चला कि बच्ची स्कूल तो जाती थी, लेकिन छुट्टी के बाद किसी मुस्लिम छात्रा के घर चली जाती थी। पूछताछ में यह भी सामने आया कि वह एक मुस्लिम युवक समद गाजी के संपर्क में थी।

परिवार का आरोप है कि उनकी बेटी का ब्रेनवॉश किया गया और उसे जाल में फंसाया गया। पुलिस द्वारा कराए गए मेडिकल में दुष्कर्म की पुष्टि भी हुई है, जिससे परिवार की चिंता और बढ़ गई है। इस घटना के बाद क्षेत्र के हिंदू संगठनों ने इसे लव जिहाद का मामला बताते हुए आशंका जताई है कि इसमें किसी बड़े गिरोह का हाथ हो सकता है।

उनका कहना है कि रामनगर में केरला फाइल्स जैसी घटनाएँ हो रही हैं और यदि शीघ्र खुलासा नहीं हुआ तो उग्र आंदोलन किया जाएगा। संगठनों ने MPHIC स्कूल का उदाहरण देते हुए दावा किया कि वहाँ से 20–30 और मामले सामने आ सकते हैं, इसलिए उच्च स्तरीय जाँच जरूरी है।

पुलिस ने बताया की BNS की धारा 140(3) अज्ञात आरोपितों के खिलाफ दर्ज कर ली गई है और आरोपित की तलाश की जा रही है। पुलिस ने संगठनों को भरोसा दिलाया है कि निष्पक्ष जाँच कर सभी कड़ियों का पर्दाफाश किया जाएगा। फिलहाल यह मामला क्षेत्र की शैक्षणिक और सामाजिक व्यवस्था पर गहरी चिंता खड़ी कर रहा है।

पंजाब में AAP सरकार का कर्ज GSDP का 40% तक पहुँचा, ममता के पश्चिम बंगाल पर भी कर्ज का भारी बोझ: CAG रिपोर्ट में खुलासा

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने पहली बार एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें बताया गया है कि भारत के राज्य अपनी वित्तीय स्थिति को कैसे संभाल रहे हैं। यह रिपोर्ट शुक्रवार (19 सितंबर 2025) को CAG के संजय मूर्ति ने स्टेट फाइनेंस सेक्रेटरीज कॉन्फ्रेंस में जारी की।

पिछले दस साल में सभी 28 राज्यों का कुल सार्वजनिक कर्ज तीन गुना से ज्यादा बढ़ गया है, जो 2013-14 में 17.57 लाख करोड़ रुपये था, वह 2022-23 में 59.60 लाख करोड़ रुपये हो गया। राज्यों का कर्ज उनके GSDP (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) के मुकाबले बहुत ज्यादा है, यानी उनकी अर्थव्यवस्था के आकार के हिसाब से कर्ज खतरनाक स्तर पर है।

रिपोर्ट में बताया गया कि 31 मार्च 2023 तक आठ राज्यों का सार्वजनिक कर्ज उनके GSDP का 30% से ज्यादा था। छह राज्यों का कर्ज 20% से कम था और बाकी 14 राज्यों का कर्ज उनके GSDP का 20 से 30% के बीच था।

पंजाब में सबसे ज्यादा 40% कर्ज-GSDP अनुपात

रिपोर्ट के मुताबिक, AAP शासित पंजाब सबसे ज्यादा कर्ज में डूबा है, जहाँ कर्ज-GSDP अनुपात 40.35% है, जो सभी राज्यों में सबसे ज्यादा है। आसान शब्दों में पंजाब का कर्ज उसकी सालाना आर्थिक कमाई के लगभग आधे के बराबर है।

यह समस्या नई नहीं है। पंजाब लंबे समय से कम राजस्व और बढ़ते खर्चों से जूझ रहा है। CAG रिपोर्ट ने पुष्टि की कि पंजाब की स्थिति खराब है। पहले से ही बेरोजगारी, खेती में संकट और उद्योगों के लिए कम मौकों का सामना कर रहे पंजाब के लिए इतना कर्ज विकास में निवेश की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

पंजाब अब बुनियादी ढाँचे जैसे भविष्य की वृद्धि पैदा करने वाले खर्चों पर ध्यान देने के बजाय, उधार लिए गए पैसे का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने में खर्च कर रहा है।

पश्चिम बंगाल भी पीछे नहीं

ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) शासित पश्चिम बंगाल की स्थिति भी अलग नहीं है। CAG रिपोर्ट के अनुसार, राज्य का कर्ज-GSDP अनुपात 33.7% है, जो देश में सबसे ज्यादा में से एक है।

पिछले दस साल में पश्चिम बंगाल का कर्ज बोझ तेजी से बढ़ा है। पंजाब की तरह, पश्चिम बंगाल भी उन 11 राज्यों में शामिल है जो उधार लिए गए पैसे को रोजमर्रा के खर्चों, जैसे वेतन, सब्सिडी और प्रशासनिक लागत में खर्च कर रहे हैं, न कि ऐसी संपत्ति बनाने में जो भविष्य में उनकी वित्तीय स्थिति को सुधार सके।

सार्वजनिक कर्ज GSDP का औसतन 20% रहा: CAG

रिपोर्ट में आगे कहा गया, “औसतन राज्यों का सार्वजनिक कर्ज उनकी राजस्व प्राप्तियों/कुल गैर-कर्ज प्राप्तियों का 150% रहा है। इसी तरह सार्वजनिक कर्ज GSDP का 17-25% के बीच रहा है और औसतन GSDP का 20% रहा है। 2019-20 में GSDP का 21% से बढ़कर 2020-21 में 25% होने का मुख्य कारण कोविड वर्ष में GSDP में कमी थी। 2020-21 से 2022-23 के बीच केंद्र सरकार के ऋणों में वृद्धि बैक-टू-बैक ऋणों, GST मुआवजा कमी और राज्यों को पूँजीगत खर्च के लिए विशेष सहायता के रूप में ऋणों के कारण थी।”

पंजाब, नागालैंड और पश्चिम बंगाल की स्थिति सबसे खराब है लेकिन ज्यादातर अन्य राज्य भी ज्यादा पीछे नहीं हैं। दूसरी ओर ओडिशा, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे कुछ राज्यों ने अपने कर्ज अनुपात को अपेक्षाकृत नियंत्रण में रखा है, जो वित्तीय अनुशासन में बड़ा अंतर दिखाता है।

रिपोर्ट में एक और चिंताजनक बात सामने आई कि पंजाब, पश्चिम बंगाल और नगालैंड जैसे 11 राज्यों में 2022-23 के दौरान पूँजीगत खर्च उनके शुद्ध उधार से कम था।

उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश और पंजाब में पूँजीगत खर्च उनके शुद्ध उधार का क्रमशः केवल 17% और 26% था। इसका मतलब है कि उधार लिया गया ज्यादातर पैसा घाटे को पूरा करने में गया, न कि नई संपत्ति बनाने में।

200 गाड़ियाँ, 5 स्टार टेंट और हर जिले में 10+ कर्मी फिर भी खर्च ₹35000: BJP MP ने प्रशांत किशोर और जन सुराज से पूछे सवाल, कहा- घाटे में डूबी कंपनी से मिला ₹14 करोड़ चंदा

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक सरगर्मी बढ़ती जा रही है। अब तक प्रशांत किशोर सभी दलों पर तरह के तरह आरोप लगा रहे थे तो अब बीजेपी के सांसद संजय जायसवाल ने प्रशांत और उनकी पार्टी जन सुराज पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जायसवाल ने इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट से जन सुराज की ऑडिट रिपोर्ट भी सामने रखी है।

संजय जायसवाल ने लिखा कि ठगी की दुनिया में बिहार की पहचान नटवरलाल से थी, लेकिन प्रशांत किशोर तो ठगने में उसके दादा है। उनका आरोप है कि नटवरलाल ने आम लोगों को ठगा था, जबकि प्रशांत किशोर बिहार के बुद्धिजीवियों को ठग रहे हैं। जायसवाल ने दावा किया कि उन्होंने पीके से जुड़े सात सवाल पूछे हैं, जिनमें से एक सवाल जब एक पत्रकार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठा दिया तो धमकी तक मिल गई।

जायसवाल का आरोप है कि प्रशांत किशोर ने स्वीकार किया कि आंध्र प्रदेश के एक सांसद ने उनकी पार्टी को 14 करोड़ रुपए का चँदा दिया। लेकिन यह चंदा ऐसी कंपनी के जरिए क्यों आया, जो घाटे में डूबी हुई थी, इसका जवाब आज तक नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को इस बात की गहराई से जाँच करनी चाहिए।

भाजपा सांसद ने सबसे बड़ा सवाल जन सुराज पार्टी के वित्तीय आंकड़ों पर उठाया है। उनका कहना है कि 2023-24 में जब पार्टी की ओर से 200 गाड़ियाँ चल रही थीं, फाइव स्टार टेंट और बड़े स्तर पर खाने-पीने की व्यवस्था थी, तब पार्टी ने इलेक्शन कमीशन को केवल 35 हजार रुपए का खर्चा दिखाया। साथ ही, हर जिले में 10 से ज्यादा कर्मचारी काम कर रहे थे, जिनका काम नेताओं को दबाव में लेकर चलना था। इतना बड़ा खर्च सिर्फ 35 हजार रुपए कैसे हो सकता है?

संजय जायसवाल ने यह भी दावा किया कि 17 सितंबर 2024 तक जन सुराज पार्टी का अध्यक्ष सरत कुमार मिश्रा ही थे और यह इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट पर दर्ज है। यहाँ तक कि हर पेज पर उनके और कोषाध्यक्ष अजीत सिंह के हस्ताक्षर भी मौजूद हैं।

सवाल यह है कि फिर अचानक 2 अक्टूबर 2024 को गाँधी मैदान में जन सुराज पार्टी की स्थापना कैसे हो गई? महज 15 दिनों के भीतर सरत कुमार मिश्रा को कैसे हटा दिया गया और उदय सिंह पार्टी के अध्यक्ष कैसे बन गए? उन्होंने तंज कसते हुए लिखा कि प्रशांत किशोर अगर बिहार के युवाओं को करोड़पति बनने का अपना फार्मूला बता देते, तो वही सबसे बड़ा बदलाव यात्रा होता।

जायसवाल का कहना है कि यह सारा खेल सिर्फ दिखावा है और जनता व पत्रकारों को भ्रमित करने के लिए रचा गया है। उन्होंने जन सुराज पार्टी का ऑडिट रिपोर्ट साझा करते हुए कहा कि यह काम उन्होंने 15 दिन पहले किया था और इसमें उन्हें महज दस सेकंड लगे लेकिन सैकड़ों पत्रकार और हजारों यूट्यूबर इस सच्चाई को सामने नहीं ला सके।

प्रशांत किशोर ने डोनेशन को लेकर दी सफाई

जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने आंध्र प्रदेश के YSRCP सांसद अयोध्या रामी रेड्डी की कंपनी से मिले डोनेशन पर बयान दिया है। उन्होंने स्वीकार किया कि पार्टी को 14 करोड़ रुपए का चंदा अयोध्या रामी रेड्डी की एक कंपनी के जरिए मिला। प्रशांत किशोर ने कहा कि अयोध्या रामी रेड्डी वर्तमान लोकसभा में सबसे धनी सांसदों में से एक हैं और उनकी संपत्ति 750 करोड़ रुपए है।

प्रशांत किशोर ने स्पष्ट किया कि उन्हें डोनेशन वही लोग देते हैं, जिनकी मदद उन्होंने पहले की है। उन्होंने कहा कि जब वे उस क्षेत्र में काम कर रहे थे, तब अयोध्या रामी रेड्डी सांसद बने। इसके जरिए उन्होंने यह जताने की कोशिश की कि डोनेशन किसी भी तरह से अवैध या गुप्त नहीं था, बल्कि यह उनकी पहले की सेवाओं और भरोसे के आधार पर मिला।

उन्होंने यह भी बताया कि डोनेशन का स्रोत पारदर्शी था और कंपनी के माध्यम से आने वाले फंड को पार्टी के कार्यों में इस्तेमाल किया गया। प्रशांत किशोर ने पत्रकारों और जनता से अपील की कि इस मामले में सही जानकारी और तथ्य को ही सामने रखा जाए।

हिंदू देवी-देवताओं को गालियाँ देकर कमाई कर रही सरोज सरगम, 6 FIR के बाद भी घूम रही आजाद: देखें- उसके यूट्यूब चैनल में भरा है कितना जहर

प्रयागराज की गलियों में एक यूट्यूबर रहती है, नाम है सरोज सरगम। उसका काम वीडियो बनाना है, लेकिन कंटेंट ऐसा जो लोगों को चौंका दे। वो अपने वीडियो में हिंदू देवी-देवताओं को गालियाँ देती है और अभद्र भाषा का इस्तेमाल करती है। यूट्यूब पर उसने अपना चैनल बना रखा है ‘सरोज सरगम मिर्जापुर’ के नाम से। इस चैनल पर सरोज सरगम लगातार आपत्तिजनक गाने और वीडियो पोस्ट कर रही है।

सरोज सरगम ने हाल ही में एक वीडियो में माँ दुर्गा के लिए ‘रं#$ और हत्यारिन’ शब्द का इस्तेमाल किया, जिससे पूरे हिंदू समाज में गुस्सा फैल गया। सरोज सरगम के खिलाफ एक नहीं, बल्कि 6 FIR दर्ज हो चुकी हैं। लेकिन पुलिस की ढीली कार्रवाई से लोग और भी भड़क गए हैं और सोशल मीडिया पर उसकी तुरंत गिरफ्तारी की माँग कर रहे हैं।

सरोज सरगम के खिलाफ जो FIR दर्ज हुई है, उसपर उसने एक लेटर लिखकर अपने यूट्यूब चैनल पर डाला है। इसमें सरोज सरगम ने लिखती है कि वो हमेशा मिशनरी ऐतिहासिक गीत गाती है (असल में हिंदुओं का अपमान करने वाले गीत होते हैं) और समाज को जगाने का काम करती है। इस पत्र में सरोज FIR का जिक्र करते हुए कहती है कि सभी मिशनरी भाईयों, संगठनों, पार्टियों से तन-मन-धन से सहयोग करे।

सरोज सरगम ने 6 FIR पर मिशनरियों से माँगी मदद

शुरूआत में ही जहर: देवी-देवताओं पर गालियाँ, अश्लील गाने और अभद्र भाषा

सरोज सरगम की एक वीडियो का टाइटल होता है ‘ब्राह्मणों ने शिव का लिंग काटा’। इसमें ये महिला सावन, भगवान शिव और ब्राह्मणों के लिए अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करती है। यह वीडियो एक महीने पहले ही अपलोड हुआ है और इसके व्यूज 190K है। आप समझ ही सकते हैं कि ये महिला पैसा कमाने के चक्कर में कैसा कंटेंट फैला रही है।

सरोज सरगम ने अपनी अगली वीडियो का टाइटल रखा है ‘आंदोलन में आओ ब्राह्मण भगाओ’। इस वीडियो में सरोज सरगम ब्राह्मणों को जुलूमी बताती है और लोगों से कहती है कि ‘मिलकर आओ और ब्राह्मण भगाओ’। 5 महीने पहले डाले गए वीडियो पर 610K व्यूज है, जिसके बाद नफरत फैलाने वाली दुकान सरोज सरगम की रफ्तार पकड़ती है। एक अगली वीडियों में सरोज सरगम ‘हिंदू धर्म से दामन छुड़ाने‘ की बात कहती है, देवी-देवताओं को चोर-लूटेरा बताती है और गंगा में बहाने की बात कहती है।

दरअसल, सरोज सरगम की दुकान हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने से चलती है। इस महिला के चैनल पर 40 वीडियो है, जिसमें से ज्यादातर हिंदुओं के खिलाफ बनाए गए है। पहली वीडियो 3 साल पुरानी है, जिसपर केवल 11 हजार व्यूज है।

सरोज सरगम की पहली वीडियो पर ज्यादा व्यूज नहीं

ज्यादा व्यूज ना मिलने के कारण सरोज सरगम ने सोचा, क्यों ना हिंदुओं को टारगेट किया जाए और इनकी आस्था पर हमला किया जाए, जिससे इसकी कमाई की दुकान चल सके। इसके बाद धड़ाधड़ सरोज सरगम कुछ ऐसी वीडियो निकालना शुरु करती है, जिसमें ब्राह्मण, शिव, विष्णु और माँ दुर्गा को गाली दे रही हो। नीचे दिए गए THUMBNAIL देखकर ही आप समझ सकते हैं इस महिला की मानसिकता।

सरोज सरगम की वीडियो के Thumbnail

अब शुरूआत होती है सरोज सरगम की व्यूज कमाने वाली अश्लीलता के साथ। सरोज सरगम अपनी एक वीडियो का टाइटल रखती हैं ‘जीजा जी चाट लो मेला में आकर’। ऐसे टाइटल और कंटेंट में भी सरोज सरगम को काफी सारे व्यूज मिलते हैं। इस महिला के कंटेंट के सामने तो शायद पोर्न भी फेल हो जाए।

दूसरी वीडियो जिसका टाइटल अभद्र और घटिया

सोशल मीडिया पर गिरफ्तारी की माँग तेज

सोशल मीडिया पर लोग लगातार सरोज सरगम की गिरफ्तारी की माँग कर रहे हैं। X (पहले ट्विटर) पर लोग योगी सरकार से इस पर कार्रवाई करने की अपील कर रहे हैं। कई यूजर्स ने सीधे तौर पर पुलिस को टैग करते हुए कहा है कि यह ‘रिपोस्ट’ तब तक नहीं रुकना चाहिए जब तक सरोज को गिरफ्तार नहीं कर लिया जाता। लोगों का कहना है कि SC/ST एक्ट के चलते हिंदू ऐसे लोगों के खिलाफ खुलकर बोल भी नहीं पाते, जबकि वे लगातार जहर उगल रही हैं। हिंदू संगठन भी इस मामले में कड़ा रुख अपनाए हुए हैं और जल्द से जल्द न्याय की माँग कर रहे हैं।

मिर्जापुर की सरोज सरगम कहती है कि वो बिरहा के गीत गाती है, लेकिन जब आप इस महिला के यूट्यूब चैनल ‘सरोज सरगम मिर्जापुर’ पर जाएँगे, तो खुद देखेंगे की यह किस प्रकार का कंटेंट बनाकर पैसा कमा रही है। मौजूदा समय में सरोज सरगम के चैनल पर कुल 62.6K सब्सक्राइबर है। हिंदू देवी-देवताओं को गाली देना, अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना और मौजूदा सरकार को निकम्मी बताना है सरोज सरगम का असली पेशा है। इंतजार बस इसकी गिरफ्तारी और माफी का है।

जनजातीय परंपराएँ, तांत्रिक अनुष्ठान और देवी मावली की रहस्यमयी यात्रा: बस्तर में 75 दिनों तक चलता है दशहरा, माँ दंतेश्वरी की आराधना है इसकी पहचान

छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में मनाया जाने वाला ‘बस्तर दशहरा’ भारत का सबसे लंबा और अनोखा धार्मिक त्योहार है। 75 दिनों तक चलने वाला यह दशहरा राम-रावण युद्ध या रावण दहन से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से माँ दंतेश्वरी देवी की आराधना, जनजातीय परंपराओं और गुप्त तांत्रिक अनुष्ठानों पर आधारित है।

आस्था और परंपरा का अनुपम संगम है बस्तर दशहरा

बस्तर दशहरा की शुरुआत 13वीं शताब्दी में बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव ने की थी। ऐसी मान्यता है कि जब राजा ने जगदलपुर में माता दंतेश्वरी के दर्शन किए, तो उन्हें माता से आदेश मिला कि राज्य की रक्षा और सुख-समृद्धि के लिए दशहरे का आयोजन किया जाए। इसके बाद राजा ने इस पर्व को शुरू करने का संकल्प लिया।

बस्तर का यह दशहरा एक सामान्य पर्व नहीं है। इसमें कई रहस्यमयी और तांत्रिक परंपराएँ जुड़ी हुई हैं, जैसे देवी दंतेश्वरी की विशेष पूजा, रात्रि में होने वाले अनुष्ठान, देवी का रथ निकालना और अज्ञात शक्तियों का आह्वान भी होता है। यहाँ पर्व न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और जनजातीय परंपराओं का भी अहम हिस्सा है।

इसकी शुरुआत हरेली अमावस्या से होती है, जब जंगल से रथ बनाने के लिए लकड़ी लाने की परंपरा निभाई जाती है। इसे पट जात्रा कहा जाता है। इसके बाद 13 प्रमुख पारंपरिक चरणों में यह उत्सव सम्पन्न होता है, जिसमें काछिन गादी (राज परिवार द्वारा देवी के प्रतिनिधि को गादी सौंपना), कुम्हार जात्रा (रथ निर्माण की शुरुआत), रथारोहण (देवी का रथ सजाना और यात्रा शुरू करना), मावली परघाव (जंगल से देवी मावली को नगर लाना) और अंत में बहराम देव (समापन अनुष्ठान) जैसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान शामिल होते हैं।

रथ यात्रा और जनभागीदारी की अद्भुत मिसाल

बस्तर दशहरा का सबसे खास दृश्य होता है विशाल लकड़ी का रथ, जिसे कोई मशीन और जानवरों नहीं बल्कि हजारों लोग मिलकर रस्सियों से खींचते हैं। यह रथ नगर में घुमाया जाता है। असल में इसे एकता, आस्था और समर्पण का प्रतीक कहा जाता है।

इस पर्व की सबसे अनोखी बात यह है कि यहाँ ब्राह्मणों की बजाय जनजातीय पुजारी, जिन्हें गुड़िया, मांझी, चालकी कहा जाता है, पूजा-अनुष्ठान करते हैं। रात के समय गुप्त तांत्रिक विधियाँ की जाती हैं, जिनमें बाहरी लोगों की अनुमति नहीं होती। माना जाता है कि रात्रि में होने वाले इन अनुष्ठानों के माध्यम से अदृश्य शक्तियों को प्रसन्न किया जाता है, जो बस्तर की रक्षा करती हैं।

मावली देवी और प्रकृति से जुड़ा गहरा रहस्य

इस दशहरा में राज्य की कुलदेवी माँ दंतेश्वरी के साथ एक और देवी मावली की भी विशेष भूमिका होती है। उन्हें विशेष रात्रि अनुष्ठान के बाद जंगल से नगर में लाया जाता है और देवी दंतेश्वरी के पास स्थापित किया जाता है।

यह परंपरा बस्तर की प्रकृति, देवी और जनजातीय संस्कृति के बीच के गहरे संबंध को दर्शाती है। माना जाता है कि इन देवियों की शक्ति और कृपा से ही बस्तर की रक्षा होती है।

सांस्कृतिक विरासत और जनतांत्रिक भावना का उत्सव

बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है। इसमें हर जाति, समुदाय और जनजाति की भागीदारी होती है। यहाँ तक कि बस्तर के राजा भी खुद को इस उत्सव में ‘सेवक’ मानते हैं, जो जनता की भागीदारी और नेतृत्व की भावना को दर्शाता है।

इस दौरान पूरे बस्तर में लोकनृत्य, पारंपरिक गीत-संगीत, वाद्य यंत्र, झांकियों और जनजातीय कला का जीवंत प्रदर्शन होता है। यही वजह है कि आज बस्तर दशहरा न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि देश-विदेश के हजारों पर्यटकों को अपनी अनोखी संस्कृति और परंपरा से आकर्षित करता है।

बस्तर दशहरा केवल देखने का नहीं, महसूस करने का पर्व है। यह पर्व बस्तर की आस्था, प्रकृति, रहस्य और सांस्कृतिक आत्मा का सच्चा प्रतिबिंब है।

डोनाल्ड ट्रंप ने ₹88 लाख की सालाना फीस लगाकर खत्म कर दिया H1B वीजा प्रोग्राम, भारतीयों पर सबसे ज्यादा असर: कंपनियों ने कर्मचारियों को 24 घंटे में लौटने को कहा

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (19 सितंबर 2025) देर रात एक आदेश पर हस्ताक्षर किया, जिसमें H1B वीजा आवेदनों पर $100,000 (₹88 लाख) की भारी-भरकम अतिरिक्त सालाना फीस लगाई गई। नई फीस नए आवेदनों के लिए तुरंत लागू हो गई है और रिन्यूअल के लिए 21 सितंबर, 2025 को सुबह 12:01 बजे से लागू होगी।

व्हाइट हाउस ने कहा कि H1B वीजा सिस्टम में ‘सिस्टमिक दुरुपयोग’ पर रोक लगाने के लिए फीस बढ़ाई गई है। आदेश में कहा गया कि “विदेशी STEM श्रमिकों की आमद का मुख्य कारण H1B वीजा का दुरुपयोग रहा है।” इसमें दावा किया गया कि अमेरिकी कंपनियाँ अमेरिकी कर्मचारियों को निकालकर कम वेतन पर H1B वीजा धारकों को रख रही हैं।

ट्रंप के कार्यकारी आदेश में कहा गया कि “खास तौर पर सूचना प्रौद्योगिकी (IT) फर्मों ने H1B सिस्टम का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया है, जिससे कंप्यूटर से जुड़े क्षेत्रों में अमेरिकी कर्मचारियों को काफी नुकसान हुआ है।”

H1B वीजा पहले से ही महँगा है, जिसकी लागत $1,700 से $4,500 तक है। जो इसकी तेज प्रोसेसिंग पर निर्भर करता है। अब इसमें $100,000 (लगभग ₹88 लाख) की अतिरिक्त फीस जुड़ेगी। यह फीस नियोक्ता देते हैं, जो इसे बिजनेस खर्च मानते हैं। आदेश के मुताबिक, H1B वीजा के नए या नवीनीकरण आवेदन के साथ $100,000 की अतिरिक्त फीस देनी होगी, वरना आवेदन खारिज हो जाएगा। यह फीस 12 महीने तक लागू रहेगी, जब तक इसे बढ़ाया न जाए।

आदेश में कहा गया, “अमेरिका से बाहर मौजूद किसी विदेशी के लिए H1B याचिका दाखिल करने से पहले, नियोक्ताओं को यह साबित करने वाला दस्तावेज रखना होगा कि इस आदेश में बताई गई $100000 की फीस का भुगतान किया गया है।”

यह बढ़ी हुई फीस कंपनियों के लिए H1B वीजा पर विदेशी कुशल श्रमिकों को रखना लगभग असंभव बना देती है, क्योंकि यह फीस H1B वीजा धारक के औसत वेतन से भी ज्यादा है। केवल कुछ शीर्ष कंपनियाँ ही अपने सबसे मूल्यवान विदेशी कर्मचारियों के लिए इतनी भारी राशि दे सकती हैं। मध्यम स्तर की कंपनियाँ विदेशियों को रखना पूरी तरह बंद कर देंगी और बड़ी कंपनियाँ भी शायद कुछ ही विदेशियों को रखेंगी।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश में कहा गया कि $100000 की फीस नए या रिन्यूअल फॉर्म के समय देनी होगी, यानी यह सालाना फीस है। वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने भी इसे सालाना फीस बताया। इसलिए अगर कोई कंपनी 6 साल (H1B वीजा की अधिकतम वैधता) तक विदेशी कर्मचारी रखती है, तो उसे $600000 की भारी फीस देनी होगी।

इस कदम से भारत को सबसे ज्यादा नुकसान होगा, क्योंकि H1B वीजा धारकों में लगभग 70% भारतीय हैं। करीब 3 लाख भारतीय वर्तमान में अमेरिका में H1B वीजा पर काम कर रहे हैं, खासकर IT, इंजीनियरिंग और हेल्थकेयर क्षेत्रों में। H1B वीजा को प्रायोजित करने वाली TCS, इन्फोसिस, विप्रो और HCL टेक्नोलॉजीज जैसी भारतीय कंपनियों को अरबों रुपये का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है, जिससे हजारों ऑफशोर नौकरियाँ खतरे में पड़ सकती हैं।

इसी तरह गूगल, अमेजन, मेटा, IBM, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल जैसी वैश्विक टेक कंपनियाँ जो भारत और अन्य देशों से कुशल कर्मचारियों को रखने के लिए इस वीजा प्रोग्राम पर निर्भर हैं, उन्हें भी बड़ा झटका लगेगा।

यह अनुमान है कि कंपनियाँ कई H1B वीजा को उनकी समाप्ति के बाद रिन्यू नहीं करेंगी और प्रभावित लोग अपने देश लौट जाएँगे। नतीजतन भारतीय H1B कर्मचारियों से आने वाली रेमिटेंस जो पिछले साल $37 बिलियन थी, वो कुछ महीनों में तेजी से कम हो सकती है।

यूएस ने रखी है कुछ छूट

नया नियम उन विदेशी कर्मचारियों पर लागू नहीं होगा, जो किसी कंपनी या उद्योग में काम करते हैं, जिसे प्रशासन राष्ट्रीय हित में मानता है। आदेश में कहा गया, “इस नियम के तहत लगाए गए प्रतिबंध किसी भी व्यक्ति, किसी कंपनी में काम करने वाले सभी विदेशियों या किसी उद्योग में काम करने वाले सभी विदेशियों पर लागू नहीं होंगे। अगर होमलैंड सिक्योरिटी सचिव यह तय करता है कि ऐसे विदेशियों को H1B विशेष व्यवसाय श्रमिकों के रूप में रखना राष्ट्रीय हित में है और ये अमेरिका की सुरक्षा या कल्याण के लिए खतरा नहीं है।”

हालाँकि इसमें और स्पष्टता नहीं दी गई। बाद में शायद इसे और साफ किया जाए। लेकिन माना जा रहा है कि हेल्थकेयर, महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा, रक्षा जैसे क्षेत्रों को छूट मिल सकती है।

अमेरिका से बाहर मौजूद वीजा धारकों को 24 घंटे में लौटने को कहा

मौजूदा H1B धारकों पर फीस वृद्धि का असर नहीं पड़ेगा, लेकिन अमेरिका से बाहर मौजूद लोगों की स्थिति अलग है। राष्ट्रपति के आदेश को ट्रैवल बैन के रूप में देखा गया है, जिसे कंपनियों ने यह समझा कि यह अमेरिका से बाहर मौजूद H1B वीजा धारकों पर भी लागू होता है।

आदेश में कहा गया, “होमलैंड सिक्योरिटी सचिव उन याचिकाओं पर निर्णयों को प्रतिबंधित करेंगे, जिनके साथ $100000 का भुगतान नहीं किया गया है। ये आदेष H1B विशेष व्यवसाय श्रमिकों के लिए हैं और जो वर्तमान में अमेरिका से बाहर हैं, यह प्रतिबंध इस आदेश की प्रभावी तारीख से 12 महीने तक लागू रहेगा।”

आदेश के अनुसार, 21 सितंबर, 2025 को सुबह 12:01 बजे से H1B स्थिति में लोग बिना $100000 अतिरिक्त भुगतान के अमेरिका में प्रवेश/वापसी नहीं कर पाएँगे। इसलिए बड़ी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को समय सीमा से पहले, यानी 24 घंटे के भीतर लौटने को कहा है, जो कई लोगों के लिए संभव नहीं हो सकता।

वीकेंड से कुछ घंटे पहले जारी हुए आदेश ने प्रभावित कर्मचारियों और नियोक्ताओं में हड़कंप मचा दिया। माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेजन, जेपी मॉर्गन चेज, एप्पल, TCS जैसी कई कंपनियों ने अपने वैश्विक कर्मचारियों को संदेश भेजे, जिसमें अमेरिका से बाहर मौजूद सभी H1B वीजा धारकों को ’21 सितंबर की समय सीमा से पहले तुरंत लौटने’ और स्टैंपिंग सुनिश्चित करने के लिए कहा गया।

कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका छोड़ने से भी मना किया, ताकि वापसी में परेशानी न हो। एक अमेजन अधिकारी ने कथित तौर पर कंपनी स्तर पर भेजे गए संदेश में कहा, “नजदीकी भविष्य के लिए अमेरिका न छोड़ें।” ये संदेश सोशल मीडिया पर लीक हो गया।

अमेरिकी राष्ट्रपति के आदेश में सिर्फ H1B वीजा का जिक्र है, लेकिन कंपनियों ने H-4 आश्रित वीजा धारकों को भी यही निर्देश दिए हैं।

X पर साझा किए गए एक मेमो में लिखा था, “अगर आप H1B या H-4 स्थिति में हैं और अभी अमेरिका से बाहर हैं, तो हम सलाह देते हैं कि आप कल समय सीमा से पहले अमेरिका लौटने की कोशिश करें। ये आदेश पिछले 30 मिनट में जारी हुआ है, तो हमें पता है कि अचानक यात्रा की व्यवस्था करने का समय बहुत कम है। लेकिन फिर भी, हम आपको पूरी कोशिश करने की सलाह देते हैं।”

भारतीय प्रतिभा पर बहुत निर्भर एप्पल और TCS कथित तौर पर लॉजिस्टिक्स टीमें तैयार कर रही हैं ताकि कर्मचारी जल्दी लौट सकें। उन्हें डर है कि वीजा रिजेक्शन की बाढ़ उनके बड़े प्रोजेक्ट्स को रोक सकती है।

सोशल मीडिया पोस्ट्स से पता चला कि कई H1B वीजा धारक, जो निजी या काम के कारण अमेरिका से बाहर जाने वाले थे, नए नियम की खबर मिलने के बाद फ्लाइट में चढ़ने के बाद भी अमेरिका में रुक गए। उन्हें डर था कि बिना $100,000 फीस के उन्हें दोबारा प्रवेश नहीं मिलेगा।

H1B प्रोग्राम का अंत?

इस भारी फीस वृद्धि के साथ डोनाल्ड ट्रंप ने H1B प्रोग्राम को लगभग खत्म कर दिया। अब शायद ही कोई कंपनी इतनी बड़ी फीस देकर विदेशी कर्मचारियों को रखे। अमेरिकी टेक कंपनियाँ जिन्होंने हाल के वर्षों में दो-तिहाई H1B वीजा हासिल किए अब प्रतिभा की कमी से जूझेंगी, जिससे उनकी ग्रोथ रुक सकती है। छोटी कंपनियाँ और स्टार्टअप्स जो पहले से ही पैसों की तंगी में हैं, शायद विदेशी भर्ती पूरी तरह बंद कर दें। लेकिन सवाल ये है कि क्या वे उतने ही काबिल स्थानीय कर्मचारी ढूँढ पाएँगे?

लगभग तय है कि अब नए H1B वीजा आवेदन नहीं होंगे। H1B वीजा की वैधता 3 साल की होती है, जिसे अधिकतम 6 साल तक बढ़ाया जा सकता है। ऐसे में मौजूदा वीजा धारकों को धीरे-धीरे अपने वीजा की समाप्ति पर देश छोड़ना होगा। ट्रंप ने ग्रीन कार्ड नियम भी कड़े कर दिए हैं, यानी H1B से ग्रीन कार्ड में बदलने का सपना भी खत्म हो गया।

ये देखना दिलचस्प होगा कि अमेरिकी कंपनियाँ इससे कैसे निपटती हैं। क्या वे ट्रंप के इरादे के मुताबिक ज्यादा स्थानीय कर्मचारियों को रखेंगी या फिर विदेशी कर्मचारियों को रखने के लिए अपनी गतिविधियाँ विदेश में ले जाएँगी?