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‘बहुत फजीहत हुई, पछता रहा होगा’: NDA संसदीय दल की बैठक में PM मोदी ने विपक्ष को घेरा, कहा- राहुल गाँधी का बचपना जाता नहीं

‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता को लेकर एनडीए संसदीय दल की बैठक में पीएम मोदी का सम्मान किया गया। बैठक में प्रस्ताव पास किया गया जिसमें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से लेकर आतंकी संगठन टीआरएफ तक का जिक्र है।

बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ देश की सेना का सम्मान है और इसे देश के सामने लाना बेहद जरूरी है। विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर बहस की माँग करके विपक्ष खुद पछता रहा होगा। उनकी बहुत फजीहत हुई। उन्होंने कहा कि ऐसी चर्चा विपक्ष रोज कराए और हमें जवाब देने का मौका दे।

बैठक में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर प्रस्ताव भी पास किया गया। इसमें पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए पर्यटकों के प्रति गहरी संवेदन प्रकट करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। प्रस्ताव में कहा गया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘ऑपरेशन महादेव’ में अदम्य साहस दिखाने वाले सेना के जांबाजों को सलाम करता है। उनका साहस देश की सुरक्षा के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।

पीएम मोदी ने एनडीए संसदीय दल की बैठक में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को लेकर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (4 अगस्त 2025) के ऑबजर्वेशन में कह दिया है अब हम क्या कहें। सुप्रीम कोर्ट ने जितनी बड़ी फटकार लगाई है ये बहुत बड़ी बात है। ये तो पत्थर पैर पर मारना ही नहीं बल्कि आ बैल मुझे मार वाली हालत है।

भारत की कूटनीतिक जीत की हुई चर्चा

बैठक में पारित प्रस्ताव में अमेरिका ने पहलगाम हमले की जिम्मेदारी लेने वाले संगठन टीआरएफ को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया। ब्रिक्स देशों ने साझा बयान में पहलगाम हमले की निंदा की। पाकिस्तान की धरती से आतंकवाद फैलाने का क्वाड देशों ने विरोध किया। ये भारत की कूटनीतिक जीत को दर्शाता है।

तिरंगा यात्रा में बढ़ चढ़ कर लें हिस्सा- पीएम

पीएम मोदी ने सांसदों से कहा कि वे खेल दिवस और तिरंगा यात्रा जैसे देशव्यापी कार्यक्रम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें और संसदीय क्षेत्र के लोगों को इसमें शामिल होने के लिए उत्साहित करें। इस दौरान गृह मंत्री अमित शाह की तारीफ करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि लाल कृष्ण आडवाणी के बाद सबसे लंबे समय तक गृह मंत्री के पद पर अमित शाह बने हुए हैं। ये तो अभी शुरुआत है।

एनडीए संसदीय दल की बैठक में संसद भवन का ऑडिटोरियम ‘हर हर महादेव’ और ‘भारत माता की जय’ के जयकारे से गूँज उठा। बैठक के दौरान महिला सांसदों को अग्रिम पंक्ति में बैठाया गया था। नए सांसदों से पीएम मोदी का परिचय भी कराया गया। कठिन परिस्थिति में पीएम मोदी के असाधारण नेतृत्व की सराहना की गई। प्रस्ताव में कहा गया कि पीएम मोदी के दूरदर्शी और दृढ़ नेतृत्व ने देश को दिशा दी और देशवासियों के दिल में एकता, अखंडता और गर्व की भावना जगाई।

जिन कम्युनिस्टों ने काटे स्वयंसेवक सदानंदन के पैर, सरेंडर से पहले उनको CPM के गुंडों ने दिया ‘हीरो’ जैसा मान: केरल का Video वायरल

केरल में राज्यसभा सांसद C सदानंदन मास्टर के 1994 में पैर काटने वाले कम्युनिस्टों को हीरो की तरह विदाई दी गई है। यह विदाई जेल जाने से पहले दी गई। विदाई पाने वाले 8 कम्युनिस्ट 7 महीनों से फरार थे। इस विदाई समारोह में केरल की पूर्व शिक्षा मंत्री KK शैलजा तक मौजूद रहीं।

इस विदाई को लेकर अब कम्युनिस्ट पार्टी की थू-थू हो रही है। यह सम्मान समारोह थालसेरी सेशंस कोर्ट के बाहर और फिर कन्नूर जिले के मत्तनूर में आयोजित किया गया। यह वहीं जगह है जहाँ हमला हुआ था। कार्यक्रम में पार्टी के कार्यकर्ताओं ने दोषियों को माला पहनाई, नारे लगाए और हीरो की तरह विदा किया।

इसमें मत्तनूर की विधायक और राज्य की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के के शैलजा भी शामिल हुईं। उनके इस सार्वजनिक समर्थन पर अब सभी राजनीतिक दलों की तीखी प्रतिक्रिया आई है। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं।

वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे को हीरो जैसा सम्मान दिया जा रहा है। यह सब तब हो रहा है जब  सुप्रीम कोर्ट ने भी इन कम्युनिस्टो की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने हमले को ‘पूर्वनियोजित’ और ‘गंभीर रूप से निंदनीय’ बताया था।

सदानंदन मास्टर इस हमले में स्थायी रूप से दिव्यांग हो गए थे। उन्होंने कहा, “यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है और समाज को गलत संदेश देता है। ये लोग दोषी हैं, किसी कोर्ट ने इन्हें बरी नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट तक ने इनकी सजा बरकरार रखी। इसके बावजूद CPI(M) ने उन्हें नायक की तरह विदाई दी और एक निर्वाचित विधायक के.के. शैलजा ने इसमें हिस्सा लिया,  यह और भी चिंता की बात है।”

हमला, जमानत और जश्न

25 जनवरी 1994  को, कन्नूर (केरल) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सह कार्यवाह और स्कूल टीचर सदानंदन अपने रिश्तेदारों से मिलकर अपनी बहन की शादी की तैयारी के लिए घर लौट रहे थे। तभी CPI(M) पार्टी से जुड़े गुंडों ने उन पर हमला किया। इस हमले में वे पूरी तरह से अपाहिज हो गए और तब से अब तक व्हीलचेयर पर हैं।

इस मामले में कुल 12 लोगों को आरोपित बनाया गया था, लेकिन 1997 में कन्नूर की अदालत ने केवल 8 को दोषी ठहराया। चार अन्य आरोपितों को साजिश के आरोप से बरी कर दिया गया। शुरुआत में सभी पर TADA के तहत आरोप लगाए गए थे, लेकिन बाद में ये प्रावधान हटा दिए गए।

इन दोषियों को 7 साल की सजा सुनाई गई थी, लेकिन पिछले करीब 30 सालों में वे ज्यादातर समय जमानत पर बाहर रहे क्योंकि उनकी अपीलें कोर्ट में लंबित थीं।

जनवरी 2025 में,  केरल हाईकोर्ट ने दोषियों की सजा को बरकरार रखा और कहा,  “यह हमला किसी गुस्से या अचानक उकसावे में नहीं हुआ था, यह एक पूर्व-नियोजित हमला था। आरोपितों को किसी भी तरह की रियायत नहीं दी जा सकती।”

कोर्ट ने मुआवजे की राशि भी बढ़ाकर हर दोषी को पीड़ित को 50,000 रुपए देने का आदेश दिया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की अंतिम याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने उनकी जमानत रद्द कर दी और उन्हें 4 अगस्त 2025  तक आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया था।

खुद कर रहे रूस से व्यापार, भारत को दे रहे शांति का ज्ञान: तेल खरीद पर ट्रंप ने टैरिफ बढ़ाने की कही बात, विदेश मंत्रालय ने दिखा दिया आईना

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार (4 अगस्त 2025) को कहा कि भारत रूसी तेल खरीद कर यूक्रेन के साथ युद्ध को बढ़ावा दे रहा है इसलिए अमेरिका भारत से आने वाले सामानों पर और अधिक टैरिफ लगाएगा। इसके बाद भारत ने भी अमेरिका को करारा जवाब दिया है।

ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर भारत पर टैरिफ को लेकर पोस्ट साझा की। ट्रंप ने लिखा, “भारत भारी मात्रा में रूसी तेल खरीद कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसे ऊँचे दामों पर बेच रहा है और भारी मुनाफा कमा रहा है। भारत को इस बात की कोई परवाह नहीं है कि रूस के कारण यूक्रेन में कितने लोगों की जान जा रही है। इस वजह से मैं भारत से आने वाले सामानों पर अधिक टैरिफ लगाऊँगा।”

इससे पहले 30 जुलाई को ट्रंप ने भारत से आयात पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की थी।

भारत ने दिया करारा जवाब

ट्रंप के इस पोस्ट के बाद भारत ने भी जवाब दिया है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक्स पर जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा, “अमेरिका भी रूस से परमाणु उद्योग के लिए यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड, ईवी उद्योग के लिएपैलेडियम के साथ उर्वरक और रसायन आयात करता है। ऐसे में भारत को निशाना बनाना न केवल अनुचित है, बल्कि गलत भी है। भारत हर बड़ी अर्थव्यवस्था की तरह अपने राष्ट्रीय हित और आर्थिक सुरक्षा की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।”

विदेश मंत्रालय की ओर से साझा की गई जानकारी में भारत ने अमेरिका के साथ यूरोपियन यूनियन पर भी जमकर निशाना साधा। मंत्रालय ने लिखा कि यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद भारत को रूस से तेल आयात करने पर अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा निशाना बनाया जा रहा है, जबकि भारत ने यह आयात तब शुरू किया जब यूरोप ने पारंपरिक आपूर्ति को अपनी ओर मोड़ लिया था। उस समय अमेरिका ने भी भारत को ऐसे आयात के लिए प्रोत्साहित किया ताकि वैश्विक ऊर्जा बाजार स्थिर रह सके।

अमेरिका को करारा जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि जो देश भारत की आलोचना कर रहे हैं वे खुद रूस से व्यापार कर रहे हैं और उनके लिए यह कोई मजबूरी नहीं है। भारत का तेल आयात पूरी तरह से घरेलू उपभोक्ताओं को सस्ती और स्थिर ऊर्जा कीमतें देने के उद्देश्य से किया गया है और यह वैश्विक बाजार की स्थिति से मजबूरी में उठाया गया कदम है।

डेटा के साथ यूरोपियन यूनियन को दिया जवाब

अपने पोस्ट में विदेश मंत्रालय ने महज कोरी बात ही नहीं की, बल्कि तथ्यों को भी साथ ही साथ सबके सामने रख दिया। पोस्ट में रणधीर ने लिखा, “2024 में यूरोपीय संघ ने रूस से 67.5 बिलियन यूरो का व्यापार किया और 2023 में सेवाओं का व्यापार 17.2 बिलियन यूरो रहा। ये भारत-रूस व्यापार से कहीं अधिक है।”

विदेश मंत्रालय ने जानकारी दी कि यूरोपीय संघ ने 2024 में 16.5 मिलियन टन LNG (गैस) आयात किया, जो 2022 के रिकॉर्ड 15.21 मिलियन टन से भी ज्यादा था। यूरोप रूस के साथ जो व्यापार करता है उसमें ऊर्जा के अलावा उर्वरक, खनिज, रसायन, स्टील, मशीनरी और ट्रांसपोर्ट उपकरण भी शामिल हैं।

ट्रंप पहले भी ब्रिक्स देशों पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दे चुके हैं। अगर ऐसा होता है, तो भारतीय सामानों के आयात पर प्रभावी टैरिफ 35% होगा। अमेरिका में एक विधेयक भी पारित होने वाला है। इसके तहत रूस के साथ भारत, चीन और ब्राजील के लेन-देन पर 500% अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है।

भारत ने भी साफ तौर पर बता दिया है कि वह बातचीत के जरिए समाधान चाहता है लेकिन किसी के भी दबाव में नहीं आकर ऐसा नहीं होगा।

‘द केरल स्टोरी’ को मिला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तो रोए ‘अवॉर्ड फॉर सेल’ वाले जितेश पिल्लई: साथ देने आईं साक्षी-दिया, असल दर्द है ‘इस्लामी कट्टरपंथ’ की सच्चाई खुलना

71वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ को दो सम्मान मिले हैं। सुदिप्तो सेन को सर्वश्रेष्ठ डायरेक्टर और प्रसांतनु मोहपात्रा को सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफर का पुरस्कार दिया गया है। फ़िल्मी दुनिया में सम्मान के प्रतिमान माने जाने वाले यह पुरस्कार एक तय प्रक्रिया के तहत सरकार देती है।

द केरल स्टोरी को मिले इन सम्मानों पर लेकिन अब कुछ लोग परेशान हो गए हैं। ‘द केरल स्टोरी’ को मिले इन सम्मानों पर फिल्मी चेहरे और पत्रकार सवाल उठा रहे हैं। यह वही लोग हैं जो खुद दर्जन के भाव से पुरस्कार बाँटते हैं और इनकी सच्चाई भी सबको पता है।

अब फिल्मफेयर मैगजीन के एडिटर जितेश पिल्लई ने ‘द केरल स्टोरी’ को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर नाराजगी जताई है। उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार के जूरी सदस्य आशुतोष गोवारिकर की आलोचना की है। जितेश पिल्लाई ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर प्रलाप किया है।

इंस्टाग्राम पर जितेश पिल्लाई ने इसको लेकर लिखा, “एक खतरनाक फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पुरस्कार देकर राष्ट्रीय पुरस्कार के जूरी ने गलत संकेत दिए हैं। चलिए एक पल के लिए फिल्म के शातिर प्रचार और इसकी झूठी कहानी को भूल जाइए… यह अब तक बनी सबसे घटिया फिल्मों में से एक है- इसकी स्क्रिप्ट सबसे घटिया ढंग से लिखी गई है, इसमें एक्टिंग बेहद खराब है, फोटोग्राफी बेहद घटिया है और निर्देशन भी बेढंगे तरीके से किया गया है।”

उन्होंने आगे लिखा, “क्या जूरी के अध्यक्ष आशुतोष गोवारिकर को सिनेमाटोग्राफी की इतनी गंदी समझ है कि वह ऐसी फिल्म को पुरस्कार देते हैं और जख्म पर नमक छिड़कने के लिए इसे सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पुरस्कार भी दिया गया है।”

पिल्लई ने अपना रोना जारी रखते हुए कहा, “मुझे नहीं पता कि इसे चुनने का मापदंड क्या था और किस वर्ष इसका चयन किया गया था? जब हमारे पास कटहल, बलगम, चिता, 12वीं फेल, आत्म, ऑल वी इमेजिन ऐज लाइट, विदुथलाई और ऐसी ही कई अच्छी फिल्में थीं तो केरल स्टोरी को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पुरस्कार नहीं दिया चाहिए था।”

जितेश पिल्लई ने यह भी कहा, “अच्छे सिनेमा के प्रेमियों का सिर शर्म से झुक गया है। यह वाकई अब तक का सबसे बुरा झटका है और सिनेमा की उत्कृष्टता जज करने के लिए बुरा समय है।”

केरल में इस्लामी कट्टरपंथ और जिहाद की सच्चाई पर रोने वाले जितेश पिल्लई खुद फिल्मफेयर नाम के अवॉर्ड शो से जुड़े हैं। सिनेमा की उत्कृष्टता पर जार-जार रोने वाले जितेश पिल्लई का फिल्मफेयर तो बिकता है। और यह कोई हवा-हवाई दावा नहीं है।

इसकी पोल खुद ऋषि कपूर ने साल 2016 में एक इंटरव्यू के दौरान खोल दी थी। जब उन्होंने कहा था कि फिल्म ‘बॉबी’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड खरीदना पढ़ा था। यह बात ऋषि कपूर ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में भी लिखी थी।

सिंगर अमाल मलिक तक ने फिल्मफेयर अवॉर्ड शो पर ‘पक्षपात’ का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि यह अवॉर्ड शो केवल स्टार किड्स यानी हीरो-हीरोइन के बेटे-बेटियों को लॉन्च करने का एक साधन है।

उन्होंने कहा था कि स्टार किड्स को ‘बेस्ट डेब्यू अवार्ड’ देकर बॉलीवुड में नए मौके दिलाए जाते हैं। मलिक ने कहा था कि इससे अक्षय कुमार, रणदीप हुड्डा और दिलजीत दोसांझ जैसे बड़े कलाकारों को नीचा दिखाया जाता है।

‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ फिल्म के लीड एक्टर अभय देओल ने भी फिल्मफेयर अवॉर्ड को लेकर अपना अनुभव साझा किया था। उन्होंने कहा था कि अवॉर्ड समारोह ने उन्हें इंडस्ट्री में ‘डिमोट’ कर दिया है। वे कहते हैं कि जिंदगी न मिलेगी न दोबारा के लीड एक्टर से अब वे सपोर्टिंग एक्टर बन गए हैं।

ऐसे में प्रश्न उठता है कि जिस फिल्मफेयर के बल पर पिल्लई द केरल स्टोरी को लेकर रो रहे हैं, वह तो एक बाजारू अवॉर्ड है। एक क्षण को मान लेते हैं कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में हो सकता है चुनाव गलत हो गया हो, लेकिन वहाँ कोई भी पुरस्कार बिकने के लिए नहीं रखा था।

निर्देशन, सिनेमेटोग्राफी और बाकी चीजों को लेकर 2 बीघे की पोस्ट में रोने वाले पिल्लई का असल दर्द है इस फिल्म की विषयवस्तु। यह फिल्म उस जिहादी मानसिकता को पर्दे पर उतारती है, जिसे पिल्लई जैसे लिबरल दबा कर रखना चाहते हैं।

हमेशा ला ला लैंड टाइप की फिल्मों को लेकर ज्ञान बघारने वाले पिल्लई को कडवा सच पचा नहीं है। कोई और शख्स यह बातें करता तो ठीक भी लगता। लेकिन वह शख्स बोल रहा है, जिसका करियर की छत अवॉर्ड बेचने वाली मैगजीन की दीवारों पर खड़ी हैं। विडंबना का इससे अप्रतिम उदाहरण दूसरा शायद ही देखने को मिले।

इस आलोचना में उनका साथ देने वालों का नाम गेस करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। बस एक बार वह नाम याद कर लीजिए जो हमेशा ही इस्लामी कट्टरपंथ पर चुप रहे हैं। जी! आपने सही समझा, अब उनके साथ ‘पाकिस्तानी प्रेम’ दिखा चुकी एक्ट्रेस दिया मिर्जा और सोनाक्षी सिन्हा भी जुड़ गई हैं।

जितेश पिल्लई की द केरल स्टोरी को राष्ट्रीय पुरस्कार को मिलने पर आलोचना वाली इंस्टाग्राम पोस्ट में कमेंट कर अपनी राय दी है। हालाँकि, इससे यह सच्चाई नहीं बदलती कि द केरल स्टोरी ने उस पहलू को छुआ, जहाँ पर साउथ बॉम्बे के फिल्मकार जाने से भी डरते हैं।

कमल हासन ने सनातन पर उगला जहर, शिक्षा के बहाने बताया धर्म को ‘जंजीर’: डेंगू-मलेरिया बोलने पर उदयानिधि को भी बचा चुके, DMK के सपोर्ट से पहुँचे हैं राज्यसभा

राज्यसभा सांसद और अभिनेता कमल हासन ने सनातन परंपरा को लेकर विवादित टिप्पणी की है। मक्कल निधि मय्यम (MNM) मुखिया कमल हासन ने चेन्नई में एक कार्यक्रम के दौरान सनातन पर निशाना साधते हुए कहा कि शिक्षा ही वह हथियार है जो सनातन को तोड़ सकती है। उनके इस बयान को लेकर हिन्दू संगठनों ने कड़ा विरोध दर्ज करवाया है।

कमल हासन ने क्या कहा?

कमल हासन अपने बयान में नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET) को लेकर हमलावर थे और इस दौरान उन्होंने कहा, “किसी और चीज़ को छोड़कर सिर्फ शिक्षा को ही अपने हाथ में लो।” उन्होंने कहा, “बहुसंख्यक मूर्ख तुम्हें हरा देंगे, केवल शिक्षा ही नहीं हरा पाएगी।”

हासन ने आगे कहा, “शिक्षा ही एकमात्र हथियार है जो तानाशाही और सनातन की जंजीरों को तोड़ सकता है।”

बीजेपी ने किया हासन का विरोध

बीजेपी के नेताओं ने कमल हासन के इस बयान पर एतराज जताते हुए इसका विरोध किया है। तमिलनाडु की बीजेपी नेता तमिलसाई सुंदरराजन ने कहा कि कमल हासन ने हिंदू भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। उन्होंने कहा कि वह अब केवल एक अभिनेता नहीं है और उन्हें राज्यसभा सांसद होने के नाते उन्हें अधिक जिम्मेदार होना चाहिए।

सुंदरराजन ने कहा कि कमल हासन DMK के नेताओं से ज्यादा एम के स्टालिन के वफादार हैं और वह लोगों को धर्म के नाम पर बाँटने में लगे हैं। उनका कहना है कि हिंदुओं का अपमान करना तमिलनाडु में फैशन बनता जा रहा है।

बीजेपी के लोकसभा सांसद अरुण गोविल ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है। गोविल ने शिक्षा से सनातन मिटाने के बयान पर कहा कि सनातन से बड़ी कोई और शिक्षा नहीं है।

पहले भी सनातन विरोधी बयान देते रहे हैं हासन

कमल हासन का सनातन के खिलाफ जहर उगलने का लंबा इतिहास रहा है। कभी उन्होंने हिंदू शब्द को मुगलों से जोड़ा तो कभी गोडसे को हिंदू आतंकवादी बताया था। हासन ने इससे पहले सनातन को पेरियार की विचारधारा से जोड़ते हुए कहा था कि यह विचारधारा सामाजिक असमानता को बढ़ावा देती है।

‘हिंदू आतंकवाद’ के जिस शब्द को कॉन्ग्रेस के काल में गढ़ने की कोशिश की गई थी उसे भी कमल हासन ने अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल किया था। 2019 में एक चुनावी भाषण देते हुए उन्होंने कहा था, “मैं ये बात महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने कह रहा हूँ। आजाद भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था, उसका नाम नाथूराम गोडसे था।” जाहिर है उन्होंने आतंकवाद को उस धर्म से नहीं जोड़ने की हिम्मत दिखाई होगी जिससे सबसे ज्यादा आंतकी आते हैं।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन के सनातन विरोधी बयानों का भी कमल हासन ने बचाव किया था। सनातन की तुलना डेंगू-मलेरिया से करने वाले और इसे मिटाने का दंभ भरने वाले उदयनिधि को कमल हासन ने युवा बच्चा कहकर क्लीन चिट दे दी थी। एक बार उन्होंने इसे उदयनिधि का निजी बयान बताया था। उन्होंने हिंदू शब्द को भी मुगलों से जोड़ा और महाभारत को लेकर भी वह अनर्गल प्रलाप कर चुके हैं।

कमल हासन सनातन पर जहर उगलने के अलावा जम्मू-कश्मीर में भी जनमत संग्रह कराए जाने की बात कर चुके हैं। 2019 में जब देश पुलवामा हमले के दर्द से गुजर रहा था तो इसके कुछ ही दिनों बाद कमल हासन ने कश्मीर में जनमत संग्रह की वकालत की थी। उन्होंने कहा था, “भारत कश्मीर में जनमत संग्रह क्यों नहीं करा रहा है? भारतीय सरकार किससे डरती है?” यही नहीं उन्होंने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को आजाद कश्मीर बताया था।

डिपोर्ट नीति का दिमाग, व्हाइट हाउस का डिप्टी चीफ ऑफ़ स्टाफ… अब भारत के खिलाफ: जानें कौन हैं ट्रंप के कान भरने वाले स्टीफन मिलर, क्यों ‘हेट मॉन्गर’ का मिला है खिताब

अमेरिका और भारत के रिश्ते इन दिनों कुछ ख़ास अच्छे नहीं हैं। वजह है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रवैया। उन्होंने लगातार भारत के विरुद्ध वाकयुद्ध का ऐलान कर रखा है। भारत के खिलाफ उन्होंने टैरिफ का ऐलान भी किया है। हालाँकि, इन बीच एक ऐसा नाम सामने आया है जिसे वाइट हाउस में भारत विरोधी विचारों को हवा देने का जिम्मेदार माना गया है। यह नाम है स्टीफन मिलर। मिलर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सहयोगी हैं, वाइट हाउस में ‘डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ’ हैं।

अगर सीधे-सीधे कहें तो ट्रंप को दुनिया के अलग-अलग देशों के खिलाफ भड़काने के प्रमुख जरूर हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना सबसे अच्छा दोस्त बताने वाले ट्रंप आजकल उखड़े हुए हैं तो इसकी एक बड़ी वजह मिलर भी हैं।

मिलर ने भारत पर लगाए आरोप

मिलर ने भारत पर यूक्रेन और रूस युद्ध को फंड करने का आरोप लगाया है। उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान कहा, “ट्रंप ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत द्वारा रूस से तेल खरीदकर इस युद्ध को फंडिंग करना स्वीकार्य नहीं है।” मिलर का कहना है कि रूसी तेल खरीदने में भारत मूल रूप से चीन के साथ जुड़ा हुआ है जो यह एक आश्चर्यजनक बात है।

अब कैसे मिलर जैसे पश्चिमी देशों के लोग ये अनुमान लगा लेते हैं कि भारत का तेल खरीदा का छोटा हिस्सा तो फंडिंग कर रहा है लेकिन यूरोप गैस खरीदे तो सब बढ़िया है। इन लोगों की असल दिक्कत भारत की ऊर्जा जरूरतों के पूरा होने से है।

भारत को बात-बात पर तेल खरीदने का ज्ञान देने वाले पश्चिमी देशों की नैतिकता के मापदंड कैसे हैं वो इस रिपोर्ट से समझिए। अब इन देशों का मानना है कि भारत युद्ध की फंडिंग कर रहा है लेकिन दो दिन पहले की ही एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप का रूस से गैस आयात जुलाई में 37% (पिछले महीने के मुकाबले) बढ़ा गया है।

कौन हैं स्टीफन मिलर?

39 वर्षीय मिलर ट्रंप के सबसे प्रभावशाली सलाहकारों में शामिल हैं। मिलर ने 2016 और 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की रणनीति बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। अमेरिका से दूसरे देशों के अवैध लोगों को चुन-चुनकर जिस नीति के तहत निकाला जा रहा है, माना जाता है कि उसके कर्ता-धर्ता भी मिलर ही हैं।

मिलर सबसे लंब समय से ट्रंप के सलाहकार रहे लोगों में शामिल हैं और उनके भाषण भी लिखते रहे हैं। मिलर की ताकत का अंदाजा लगाना हो तो NPR की इस रिपोर्ट को देख लीजिए। यह रिपोर्ट बताती है कि मिलर अन्य लोगों को तो छोड़िए अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस की बातों को भी दरकिनार कर देते हैं।

यहूदी माता-पिता की संतान मिलर बचपन से ही कुख्यात रहे हैं। ‘द गार्जियन’ की एक रिपोर्ट में उनके बचपन से नस्लवादी होने का ज़िक्र किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि स्कूली दिनों में मिलर का स्कूल के सफाई कर्मचारियों के प्रति घृणित रवैये का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया था।

रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल में मिलर का हिस्पैनिक मूल के साथी छात्रों के प्रति तिरस्कार भरा रवैया था और एक लेख में उन्होंने अपने स्कूल को लेकर लिखा था कि ‘यहाँ ओसामा बिन लादेन का बहुत स्वागत होता’। ड्यूक विश्वविद्यालय में कॉलेज के दिनों में मिलर श्वेत राष्ट्रवादी विचारकों के साथ जुड़ गए।

ग्रेजुऐशन के बाद मिलर ने वाशिंगटन जाकर कॉन्ग्रेस के लिए काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने ट्रंप के पहले अटॉर्नी जनरल जेफ सेशंस के लिए काम किया था। 2015 में ट्रंप द्वारा अपना राष्ट्रपति अभियान शुरू करने के बाद मिलर ने सेशंस के सीनेट कार्यालय को छोड़ दिया और ट्रंप के काम करने लगे। ट्रंप के बैनन की सिफारिश पर उन्हें भाषण लिखने के काम में लगा दिया गया।

मिलर की एक जीवनी भी लिखी गई है। जब कोई किसी की जीवनी लिखता है तो उसके व्यक्तित्व के हिसाब से, कर्मों से हिसाब से पुस्तक का अच्छा नाम खोजने की कोशिश करता है लेकिन मिलर की जीवनी का नाम है- हेट मॉन्गर यानी नफरत फैलाने वाला। इससे ज्यादा इस पर कुछ लिखे जाने की शायद जरूरत नहीं है।

मिलर की जीवनी (चित्र: Amazon)

राष्ट्रपति के सलाहकारों के कान भरने पर जब अमेरिका ने भुगता

मिलर ऐसे

कोई पहले सलाहकार भी नहीं है जो किसी राष्ट्रपति के कान भरकर उन्हें भड़काने में लगे हों। अमेरिकी इतिहास में कई ऐसे चर्चित सलाहकार रहे हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे हेनरी किसिंजर जैसे लोगों को आज भी याद किया जाता है।

किसिंजर ने वियतनाम युद्ध को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी और भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी को लेकर अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के सलाहकार और उप-रक्षा मंत्री रहे पॉल वोल्फोविट्ज़ को 2003 के इराक युद्ध का सबसे बड़ा हिमायती माना जाता है।

कहा जाता है कि 9/11 के हमले के बाद कैंप डेविड में सबसे पहले वोल्फोविट्ज़ ने ही युद्ध के विचार को उठाया था। 2001 से 2005 बुश के कार्यकाल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहीं कोंडोलीज़ा राइस जैसे सलाहकारों को अफगानिस्तान युद्ध में अमेरिका की भूमिका के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

वोटर ID-चॉकलेट-चिप तक ने बताया पाकिस्तानी थे पहलगाम के आतंकी, पर कॉन्ग्रेस नेता मानने को तैयार नहीं: सर्जिकल स्ट्राइक-बालाकोट के समय भी आतंकी मुल्क को दे दिया था क्लीनचिट

पहलगाम हमला करने वाले इस्लामी आतंकी हाल ही में ‘ऑपरेशन महादेव’ में मार दिए गए थे। सेना ने इन्हें जम्मू एवं कश्मीर में एक एनकाउंटर में मार गिराया था। यह तीनों आतंकी पाकिस्तान से आए थे। इनकी पाकिस्तानी पहचान भी स्थापित हो गई है। आतंकियों के पास से मिली वोटर ID, चिप और बाक़ी सामान से भी नई जानकारियाँ निकली हैं। हालाँकि, कॉन्ग्रेस नेता रोज नए सबूत आने के बाद भी सच्चाई स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। वह रोज एक नए बहाने से पाकिस्तान को क्लीन चिट थमा रहे हैं।

आतंकियों की लाश से मिले ID कार्ड

ऑपरेशन महादेव में सुलेमान, जिब्रान और अबू हमजा अफगानी मारे गए थे। इन्हीं तीनों ने पहलगाम में हिन्दुओं को चुन-चुन कर मारा था। हालाँकि, जब श्रीनगर के दाचीगाम में सुरक्षाबलों ने इन्हें मार गिराया तो इनकी तलाशी ली गई। अब इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि इस तलाशी में 2 आतंकियों के पास से पाकिस्तान में जारी किए गए 2 लैमिनेटेड वोटर ID कार्ड मिले हैं। यह वोटर ID कार्ड पाकिस्तान चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए थे। यह वोटर ID कार्ड अबू हमजा अफगानी और सुलेमान के थे।

सुरक्षा एजेंसियों ने उनके वोटर ID कार्ड के सहारे पाकिस्तान की वोटर लिस्ट में उनका नाम भी सत्यापित कर लिया है। दोनों आतंकी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के रहने वाले थे। इनमें से एक लाहौर की रावलपिंडी तहसील का रहने वाला है तो वहीं दूसरा आतंकी पंजाब के ही गुजरांवाला का रहने वाला है। इससे पहले गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में भी स्पष्ट किया था कि सरकार के पास इन तीनों आतंकियों के पाकिस्तानी होने के पूरे सबूत हैं, जिनमें वोटर ID नम्बर तक शामिल हैं।

चिप-चॉकलेट ने पूरा चिट्ठा सामने रखा

ID कार्ड ने जहाँ स्पष्ट कर दिया कि यह आंतकी पाकिस्तानी थे तो वहीं इनके पास से मिली एक चिप ने इन आतंकियों का पूरा कच्चा-चिट्ठा ही सामने रख दिया। रिपोर्ट में बताया गया कि यह चिप आतंकियों के पास से मिले डैमेज सैटेलाइटली फोन से बरामद हुई थी। इस चिप में इन तीनों आतंकियों के NADRA रिकॉर्ड थे। NADRA पाकिस्तान में वही काम करता है, जो भारत में UIDAI करती है। इस तरह इन आतंकियों के फिंगरप्रिंट, चेहरे की जानकारियाँ और यहाँ तक कि पते भी थे।

इसके अलावा इन आतंकियों के पास से पाकिस्तान में बने खाने-पीने के सामान भी मिले हैं। इसमें कराची में बनाई जाने वाली चोकोमैक्स और कैंडीलैंड टॉफ़ी भी शामिल हैं। इन सब सबूतों से स्पष्ट हुआ है कि यह तीनों आतंकी पाकिस्तानी थे और इन्हें भारत में हमले करने के लिए घुसाया गया था। पता चला है कि यह आतंकी मई, 2022 में भारत में गुरेज इलाके से घुसे थे। इसके बाद इन्होंने हमले चालू किए। सुरक्षा एजेंसियों ने इनका रेडियो कम्यूनिकेशन भी पकड़ लिया था।

कॉन्ग्रेस अब भी नहीं मानने को तैयार

वोटर ID कार्ड, NADRA डिटेल्स और यहाँ तक कि पाकिस्तान में बने सामान के साथ इन आतंकियों की पहचान स्थापित हो जाने के बावजूद भी कॉन्ग्रेस के नेता मानने को तैयार नहीं हैं। कॉन्ग्रेस नेता लगातार पाकिस्तान को क्लीन चिट दे रहे हैं कि आतंकियों के पाकिस्तानी होने का कोई सबूत नहीं है। उन्होंने वामपंथी मीडिया पोर्टल द क्विंट को दिए एक इंटरव्यू में जाँच पर प्रश्न उठाए थे और आतंकियों के पाकिस्तानी होने के दावों को मानने से इनकार किया था।

चिदंबरम ने कहा था, “वे (NIA) यह बताने को तैयार नहीं है कि इन हफ्तों में उन्होंने क्या किया? क्या NIA ने आतंकियों की पहचान की है या पता लगाया है कि वे कहाँ से आए थे? आपने कैसे मान लिया कि आतंकी पाकिस्तान से थे।” चिदंबरम के इस बयान का खंडन गृह मंत्री शाह ने संसद में कर दिया था। हालाँकि, इसके बाद भी कॉन्ग्रेस नेता नहीं माने। उन्होंने आतंकियों की पहचान को लेकर प्रश्न उठाने जारी रखे।

कॉन्ग्रेस के नेता यह सब तब कर रहे हैं जब पूरी तरह से स्थापित हो गया है कि आतंकी पाकिस्तानी ही थे और वहीं से घुसपैठ करके जम्मू एवं कश्मीर आए थे। हालाँकि, यह कोई पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस ने सेना के शौर्य पर सवाल उठाए हों। कॉन्ग्रेस का यही रवैया इससे पहले 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 की बालाकोट स्ट्राइक पर रहा था। तब भी सेना से सबूत माँगे जा रहे थे। कहीं उनकी कार्रवाई को झुठलाया जा रहा था।

कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान सेना से सर्जिकल स्ट्राइक सबूत माँगे थे। उन्होंने कहा था कि सरकार सर्जिकल स्ट्राइक की बात करती है। वे दावा करते हैं कि हमने इतने लोग मार गिराए लेकिन सबूत नहीं दिए। केवल झूठ के पुलिंदे से ये राज कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह के अलावा मध्य प्रदेश से ही आने वाले कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ ने भी सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत माँगे थे।

उन्होंने कहा था, “देश की जनता जानना चाहती है कि सर्जिकल स्ट्राइक कब हुआ? कहाँ हुआ? इसका क्या परिणाम हुआ? सिर्फ मुँह से कह देने भर से काम नहीं चलेगा।” यह बयान उन्होंने तब दिया था जब वह स्वयं संवैधानिक पद पर थे। उन्होंने यह बयान मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए दिया था। बालाकोट स्ट्राइक पर भी कॉन्ग्रेस ने हवा हवाई प्रश्न उठाए हैं। कॉन्ग्रेस सांसद इमरान मसूद ने हाल ही में बालाकोट स्ट्राइक को लेकर विवादित बयान दिया था।

इमरान मसूद ने दावा किया था कि पाकिस्तान हमारे हमलों का मजाक उड़ाता है। मसूद ने सर्जिकल स्ट्राइक पर उंगली उठाते हुए कहा कि पाकिस्तानियों का कहना है कि हिंदुस्तानियों ने तीन कौवे मार दिए हमारे। उनका यह बयान सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था। इसके अलावा कॉन्ग्रेस नेता पहलगाम का बदला लेने को किए गए ऑपरेशन सिंदूर तक को नहीं बख्शते। उन्होंने इसे भी कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद कर्नाटक के एक कॉन्ग्रेस MLA ने प्रश्न उठाए थे। कॉन्ग्रेस के कर्नाटक विधायक कोथुर मंजूनाथ ने बयान में कहा, “ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक दिखावा था। कुछ हुआ ही नहीं। बस दिखावे के लिए तीन चार विमान ऊपर भेजे और वापस बुला लिए।” कॉन्ग्रेस नेता राशिद अल्वी और पृथ्वीराज चव्हान ने भी ऐसी ही बातें की थी। कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री रहे कपिल सिब्बल ने पहलगाम का बदला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जाकर लेने की बात कही थी।

कॉन्ग्रेस हमेशा ही ऐसे मामलों पर या तो सेना के विरुद्ध खड़ी दिखाई पड़ती है या फिर सरकार के विरुद्ध। सरकार के विरुद्ध वह राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे भी नहीं छोड़ती। पाकिस्तानी आतंकियों के मारे जाने पर चिदंबरम और मणिशंकर अय्यर के बयान वही बातें करते हैं जो पाकिस्तान हमेशा करता है। वह एक तरह से पाकिस्तान को क्लीन चिट देते हैं और भारत का पक्ष भी कमजोर करते हैं। राहुल गाँधी ने इसी बीच सेना की कार्रवाई को सवालों म खड़ा किया। हालाँकि, कॉन्ग्रेस अपनी राजनीति से बाज नहीं आती।

वह पाकिस्तान को बचाती है। कॉन्ग्रेस का दायरा पाकिस्तान को बचाने तक ही सीमित नहीं है। बाटला हाउस में मारे गए आतंकियों को लेकर सलमान खुर्शीद ने कहा था कि इस पर सोनिया गाँधी रोईं थी। यह कॉन्ग्रेस के तुष्टिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण था। देश के भीतर और बाहर खड़े होने वाली सुरक्षा चिंताओं पर कॉन्ग्रेस के ऐसे रवैये ने उसकी भद्द भी पिटवाई है। हालाँकि, उसके नेता मानने को तैयार नहीं हैं।

‘जुमे की नमाज, रमजान में एक्टिव रहता है… बच्चों से है इश्क’: अमेरिका में रेपिस्ट को बचाने के लिए उतरा इस्लामी संगठन, सोमालिया के इब्राहिम ने 12 वर्षीय बच्ची का गाड़ी में किया था रेप

अमेरिका में कई इस्लामी संगठन सार्वजनिक तौर पर अब रेपिस्ट और दूसरे अपराध करने वाले मुस्लिमों के बचाव में उतर आए हैं। ऐसा की कारनामा मिनेसोटा स्थित अल-इहसान इस्लामिक सेंटर ने किया है। उसने एक बलात्कारी के बचाव में जस्टिस को खत लिखा है।

जुलाई 2024 में एक सोमाली मुस्लिम अप्रवासी कलिनले इब्राहिम दिरी ने एक बच्ची का रेप किया। 12 साल की ये बच्ची अपने घर के बाहर खेल रही थी। उस वक्त उसकी माँ घर पर नहीं थी। दिरी ने पहले बच्ची का अपहरण किया और फिर यौन शोषण का शिकार बनाया। कोर्ट ने इस मामले में उसे दोषी ठहराया था और 12 साल जेल की सजा सुनाई। इतने जघन्य अपराध के बावजूद इस्लामी संगठन बलात्कार की सजा कम करने और उसके ‘मानवीयता’ की बात करने लगे हैं।

दिरी का जन्म सोमालिया में गृहयुद्ध के दौरान हुआ था और 2006 में अमेरिका आने से पहले उन्होंने केन्या के एक शरणार्थी शिविर में अपना जीवन व्यतीत किया। हालाँकि दिरी की नागरिकता पर सस्पेंस बना हुआ है, लेकिन दिरी ज्यादातर मिनेसोटा और नॉर्थ डकोटा में ही रहा है।

जुलाई 2024 में इस सोमाली मुस्लिम आप्रवासी पर एक 12 साल की बच्ची के साथ बलात्कार का मामला दर्ज किया गया। शिकायत के अनुसार, पीड़िता मिनियापोलिस स्थित अपने घर के पास खेल रही थी, तभी दिरी छिप कर उसके पास पहुँचा और उससे बात करने लगा। उसने कथित तौर पर पूछा कि क्या बच्ची की माँ घर पर है? पीड़िता ने कहा कि नहीं वह घर पर नहीं है।

आरोपी वहाँ से चला गया और कुछ देर बाद वापस लौटा। उसने बच्ची के मुँह पर हाथ रखा और जबरन कार में बिठाया। बच्ची के सिर पर हमला किया ताकि वह ज्यादा न छटपटाए। कार को कुछ दूर ले जाकर उसके साथ जबरन रेप किया। बच्ची बहुत बुरे हाल में अपने घर पहुँची।

आरोपी दिरी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इसी साल मई में कोर्ट ने डिरी को नाबालिग के साथ रेप का दोषी पाया। डिरी के परिवार ने न्यायाधीश को पत्र लिखकर उसकी सजा तय करते समय उसके ‘चरित्र’ के दूसरे पहलुओं पर गौर करने और ‘सामुदायिक योगदान’ पर विचार करने का आग्रह किया।

परिवार के पत्र के अलावा अल-इहसान इस्लामिक सेंटर ने भी न्यायाधीश को खत लिखा है जिसमें दोषी दिरी को ‘हल्की सजा’ देने पर विचार करने का अनुरोध किया गया है। पत्र में रेपिस्ट को एक ‘समर्पित पारिवारिक व्यक्ति’ बताया गया।

दिरी के जघन्य अपराध को हल्का करने की कोशिश करते हुए इस्लामिक सेंटर ने कहा, “डिरी को एक नई संस्कृति में नए सिरे से शुरुआत करने की चुनौती का सामना करना पड़ा।” और बच्ची के साथ रेप करने से पहले वह एक ‘मिलनसार’ और ‘पारिवारिक व्यक्ति’ के रूप में जाना जाता था।

इसमें मुस्लिम बलात्कारी के अपने परिवार और बच्चों के प्रति ‘प्रेम’ को भी उजागर किया गया है, और कहा गया है कि दिरी अल-इहसान इस्लामिक सेंटर मस्जिद में एक सक्रिय स्वयंसेवक भी तरह रहा है, ‘ हर शुक्रवार की नमाज, रमजान और सामुदायिक कार्यक्रमों के दौरान वह एक्टिव रहता था।’

अल-इहसान इस्लामिक सेंटर के कार्यकारी निदेशक अहमद अंशुर के इस पत्र पर हस्ताक्षर हैं। इसमें दिरी के ‘गुणों’ का वर्णन है। इसमें लिखा गया है, “आप अक्सर दिरी को बुज़ुर्गों को घर पहुँचाने में मदद करते या बाहर सफाई में मदद करते पाएँगे। उनमें सेवा भाव है और हमारे समुदाय को एकजुट रखने वाले की प्रतिबद्धता है।”

पत्र में लिखा गया है, “एक ऐसा व्यक्ति जिसने हर काम परिवार और समुदाय के लिए किया हो, उसकी ऐसी हालत देख कर हम सकते में हैं। हम सम्मानपूर्वक अनुरोध करते हैं कि इस पत्र के जरिए कलीनल दिरी के व्यक्तित्व को समझा जाए। उनके योगदान भले ही सुर्खियाँ न बनें, लेकिन समुदाय के लिए काफी सकारात्मक रहे हैं।”

अल-इहसान सेंटर ने एक बलात्कारी को एक नायक और पीड़ित के रूप में पेश किया क्योंकि वह एक मुसलमान है। उसे उस वक्त उस बच्ची के बारे में नहीं सोचा, जिसे 12 साल की उम्र में डिरी की दरिंदगी का सामना करना पड़ा। इस्लामिक सेंटर ने घटना का जिक्र तक नहीं किया, निंदा करना तो दूर की बात है।

ब्रा लहराकर शुरू हुआ तख्तापलट, आज हिंदू युवतियों को नंगा करने पर पहुँचा: बांग्लादेश में महिलाओं के लिए ‘त्रासदी’ था बीता 1 साल, ‘सेकुलर’ युनूस सरकार का हासिल केवल ‘इस्लामी कट्टरपंथ’

बांग्लादेश में तख्तापलट को 1 साल पूरे हो गए हैं। आज से ठीक 12 महीने पहले बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना अचानक अपने ही मुल्क को छोड़कर भागना पड़ा था क्योंकि वहाँ की कथित ‘छात्र युवा शक्ति’ ने प्रधानमंत्री आवास पर हमला बोल दिया था। इस अटैक के बाद जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर आईं उन्हें कभी कोई नहीं भुला सकता और उसके बाद जो हुआ उसे पूरी दुनिया देख रही है।

एक साल पहले मीडिया में जिस ‘छात्र प्रदर्शन’ को क्रांतिकारी बताया जा रहा था उसका अंत पूर्व प्रधानमंत्री के अंडरगार्मेंट फैलाने से हुआ। याद करिए कैसे छात्रों के नाम पर इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ प्रधानमंत्री आवास में घुसी थी और तमाम सामान चुराने के साथ ब्रा-ब्लाउज को चुराकर ले भागे थे। उस दिन बांग्लादेश में हसीना सरकार की सत्ता का अंत था और हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार में बढ़ौतरी की शुरुआत।

हाल में बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद की एक रिपोर्ट आई थी। इस रिपोर्ट में जानकारी दी गई थी 4 अगस्त से 30 जून के बीच 330 दिनों की अवधि में देश भर में धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की कुल 2442 घटनाएँ हुईं। इनमें हत्या, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, धार्मिक स्थल पर हमले, ईशनिंदा के आरोप में गिरफ्तारियाँ, घर-व्यवसाय पर कब्जा जैसे मामले शामिल थे।

ऑपइंडिया, पहले बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार को लेकर अपनी विस्तृत रिपोर्ट कर चुका है। आज कुछ घटनाएँ याद दिलाकर हम आपको ये बताएँगे कि पिछले एक साल में कैसे हिंदू महिलाओं के साथ इस्लामी कट्टरपंथियों ने सुलूक किया।

  • बात 26 जून 2025 की है। बांग्लादेश के कुमिल्ला में एक हिंदू महिला अपने मायके रहने आई थी। जब बांग्लादेशी नेशनलिस्ट पार्टी के नेता फजोर अली ने उसे अपनी हवस का शिकार बनाया। फजोर अली ने उसे घर में अकेला पाकर उसके साथ बलात्कार किया और उसकी रोती-चीखती नंगी वीडियो बनाई और उसे वायरल भी किया। वीडियो में महिला हाथ जोड़कर रोते हुए हुए उसे छोड़ने को कह रही थी, मगर फरोज के साथ खड़े एक शख्स को उस पर एक भी बार दया नहीं आई। अंत में पीड़िता मदद के लिए और तेज चिल्लाई तो आखिर में पड़ोसी मदद के लिए पहुँचे। पीड़िता को अस्पताल ले जाया जहाँ पुष्टि हुई कि उसके साथ दुष्कर्म किया गया है।
  • अगला मामला। शेख हसीना सरकार के जाने के चंद दिनों बाद का है। सतखीरा जिले में 30-35 लोगों की भीड़ एक हिंदू महिला के घर में घुसी। फिर उसके घर को लूटा और बाद में उसे गौशाला ले गए जहाँ उसे चुप रहने की धमकी देकर सबने बारी-बारी से उसके साथ बलात्कार किया। दुष्कर्म के बाद महिला अचेत अवस्था में थी। उसे अस्पताल ले जाया गया और पूछा गया लेकिन महिला ने बताया कि उसके साथ जिन्होंने कुकर्म किया वो उनमें से किसी को नहीं पहचान सकती क्योंकि उसके मुँह पर मास्क था।
  • 52 साल की एक अन्य हिंदू महिला भी बांग्लादेशी कट्टरपंथियों की दरिंदगी का शिकार 24 दिसंबर 2024 को हुई थी। बसना के साथ गैंगरेप हुआ था। कट्टरपंथियों ने न केवल उसे शारीरिक प्रताड़नाएँ दी थी बल्कि उसे मानसिक रूप से भी परेशान किया था। महिला को अपने साथ हुई घटना पर इतना लज्जित महसूस हुआ कि उन्होंने खुद कीटनाशक पीकर हत्या कर ली।
  • इसी तरह एक हिंदू महिला ने अपने घर हुई लूटपाट की जानकारी देते हुए बताया कि इस्लामी कट्टरपंथियों ने घर में घुस सिर्फ सामान नहीं लूटा बल्कि वह तलवार-धारदार हथियार के दमपर घर की एक महिला को पकड़ लिया और उसे दूसरे कमरे में ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म भी किया। गनीमत बस इतनी रही कि उन्होंने उसकी जान को बख्श दिया क्योंकि परिवार के मुताबिक इस्लामी कट्टरपंथी महिला का गला काटना चाहते थे।

हिंदू महिलाओं के साथ हुई ये घटनाएँ अंतिम खबरें नहीं है। इनकी लिस्ट लंबी है। अब भी ऐसे तमाम मामलों से मीडिया भरा पड़ा हुआ है। वहीं अनगिनत वीडियोज सोशल मीडिया पर मौजूद हैं जिनमें हिंदू महिलाएँ रो-रोकर अपनी व्यथा बता रही हैं, लेकिन सुनवाई के नाम पर कोई एक्शन तक नहीं लिया होता।

शेख हसीना की सरकार जाने के बाद हिंदू कई रात अपने घर, अपने मंदिर, अपनी महिलाओं की रक्षा में जागते रहे। उन्होंने बार-बार गुहार लगाई कि उनकी मदद की जाए, उन्हें बचाया जाए, सरकार देश में सांप्रदायिक सद्भाव बहाल रहें, अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करें… लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई।

आज जब उस तख्तापलट को हुए 1 साल हो गया है। इस्लामी कट्टरपंथियों के दबदबे से मुल्क गर्त में रोज नए तरीके से ढकेला जा रहा है। न सांस्कृतिक विरासत बच पा रही है और न ही संस्कृति बचाने वाले। चुन-चुनकर हिंदू धर्मस्थलों को निशाना बनाया जाता है। समय-समय पर हिंदू विरोधी की हिंसा की बात सामने आती है… और जहाँ तक हिंदू महिलाओं के अधिकारों को संरक्षित करने की बात है तो इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि वहाँ इस्लामियों की सत्ता आने के बाद से सभी महिलाओं की आवाज दबाने की बात हो रही है।

महिला आयोग करो खत्म, लड़कियों को खेलने मत दो: इस्लामी जमातों के तर्क

अप्रैल 2025 की खबर पढ़िए। बांग्लादेश में इस्लामवादी गठबंधनों ने एक माँग उठाई थी कि देश में जो सरकारी महिला आयोग चल रहा है उसे खत्म किया जाए। इस माँग को करते हुए इस्लामी कट्टरपंथियों ने कहा था- समानता सुनिश्चित करना एक पश्चिमी विचारधारा है। पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता नहीं रखी जानी चाहिए।

इसके अलावा जनवरी 2025 में खबर आई थी कि इस्लामी संगठनों के दबाव में आकर महिलाओं का एक फुटबॉल मैच को रद्द करना पड़ा था क्योंकि ये मैच इस्लामी कट्टरपंथियों को नहीं पसंद था। उन्होंने मैच से कुछ दिन पहले ही सैंकड़ों की तादाद में इकट्ठा होकर आयोजन स्थल पर हमला कर दिया और हर जगह तोड़फोड़ कर दी थी। एक स्कूल के प्रिंसिपल ने तो यहाँ तक कहा था कि लड़कियों का फुटबॉल खेलना गैर-इस्लामी है। ये मजहबी जिम्मेदारी है ऐसी चीजों को रोका जाए तो इस्लामी मान्यता के खिलाफ हों।

प्रधानमंत्री मोदी से लड़कियों ने माँगी मदद

बता दें कि बांग्लादेश में महिलाएँ अपनी सुरक्षा को लेकर इतनी व्यथित हो चुकी थीं कि उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर सामने आए एक पत्र के अनुसार बांग्लादेशी हिंदू लड़कियों ने पीएम मोदी से गुहार लगाई थी कि उन्हें बचा लिया जाए। पत्र में लिखा था- “हमारे साथ बांग्लादेश में बहुत बुरी चीजें हो रही हैं। हम पर सुनियोजित तरीके से हमले और अत्याचार किए जा रहे हैं। मैं आपको इस स्थिति का वर्णन नहीं कर सकती।”

इस पत्र में लड़की ने लिखा था कि बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथी और आतंकी समूह ने हिंदुओं पर अकल्पनीय अत्याचार शुरू किए हैं। लड़कियों के साथ बलात्कार हो रहा, घरों-मदिरों पर गोलीबारी हो रही है, हिंदुओं के व्यवसायों को लूटा जा रहा है और संपत्ति न देने पर जान से मारने की धमकी दी जा रही है। इस पत्र की प्रमाणिकता क्या है ये तो नहीं पता लेकिन इसे शेयर करने वाले रिटार्यड फौजी हैं और उन्होंने दावा किया था कि इस पत्र को एक बांग्लादेशी लड़की ने ही लिखा है।

पत्र वो किस लड़की ने लिखा यहाँ ये जानना जरूरी नहीं है बल्कि ये जानना जरूरी है कि ये स्थिति आई कैसे। 4-5 अगस्त को बांग्लादेश में यूँही तख्तापलट नहीं हो गया था। इसी पृष्ठभूमि उसी समय से तैयार होने लगी थी जब शेख हसीना की पार्टी ने आम चुनाव में जीत हासिल की और लगातार चौथी बार अपनी सरकार बनाई।

छात्र प्रदर्शन था इस्लामी कट्टरपंथ की साजिश

5 जून से बांग्लादेश में एक प्रदर्शन शुरू हुआ जो सरकारी नौकरी से 30% कोटा हटाए जाने के विरोध में शुरू हुआ। 1जुलाई को बांगलादेश बंद की घोषणा करते हुए सड़के और रेलवे लाइन तक जाम कर दी गई। इस दौरान पूर्व सरकार ने स्थिति संभालने के प्रयास करते हुए इंटरनेट ब्लॉक किए, कर्फ्यू लगाए, लेकिन प्रदर्शन हल्का नहीं हुआ। 18 जुलाई के आसपास ये प्रदर्शन और व्यापक स्तर पर मीडिया में दिखाया जाने लगा। 4 अगस्त को खबर आई कि प्रदर्शनकारी और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प हो गई है और 5 अगस्त को उनके पीएम आवास में घुसकर लूटपाट करने की खबर आई।

दिलचस्प बात ये है कि 5 अगस्त तक ये पूरा प्रदर्शन ‘छात्र प्रदर्शन’ बताकर मीडिया में फैलाया गया था, लेकिन बाद शेख हसीना के मुल्क छोड़ते ही नजर आने लगा कि इन सबमें इस्लामी कट्टरपंथियों का क्या हाथ था। शेख हसीना के आवास से निकालकर ब्रा और ब्लाउज लहराने वाली उपद्रवी मानसिकता हिंदुओं के घरों पर चुन-चुनकर अटैक करने लगी। उन्होंने अल्पसंख्यक हिंदुओं को ऐसे निशाना बनाया जैसे वो इसी अवसर की फिराक में थे। करीबन 3-4 दिन हमलों की अनगिनत खबरें सामने आईं। इसके बाद 8 अगस्त को घोषणा की गई कि नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद युनूस अंतरिम सरकार के प्रमुख बनें और अगले चुनाव तक देश संभाले। सत्ता हाथ में आते ही युनूस सरकार ने दिखावा किया कि वो अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों के खिलाफ एक्शन लेंगे, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। उलटा जिन लोगों पर हिंसा के केस थे उनपर से केस वापस लेने तक की खबरें आईं और ये पता चला कि सेकुलर चेहरा दिखाते हुए जिसे मुल्क संभालने को दिया गया उस पर तो असल पमें कट्टरपंथ का रंग चढ़ा हुआ है।

POK के गाँव से लोगों ने खदेड़ा LeT का कमांडर… ‘ऑपरेशन महादेव’ में मारे गए आतंकी के ‘जनाजा-ए-गायब’ में शामिल होने आया था, जानें क्या होता है ये

ऑपरेशन महादेव के तहत मारे गए आतंकी ताहिर का पीओके के रावलकोर्ट के खाई गाला गाँव में जनाजा निकला। लेकिन ये आम जनाजा नहीं बल्कि ‘जनाजा ए गायब’ था। इस दौरान आतंकियों के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।

दरअसल ‘जनाजा ए गायब’ में लश्कर ए तैयबा के आतंकी शामिल होना चाहते थे। उसे देख कर रावलकोट के खाई गाला गाँव के लोगों का गुस्सा भड़क उठा। गाँव वालों ने लश्कर के कमांडर रिजवान हनीफ को खदेड़ दिया। दरअसल ताहिर के परिवार ने साफ मना कर दिया था कि ‘जनाजा ए गायब’ में लश्कर के आतंकियों को शामिल होने की जरूरत नहीं है।

इसके बावजूद लश्कर का स्थानीय कमांडर रिजवान हनीफ वहाँ पहुँच गया। उसके साथियों ने गाँव वालों को बंदूक दिखा कर डराना चाहा। इस पर गाँव वालों का गुस्सा भड़क उठा। आतंकियों और ग्रामीणों के बीच तीखी नोकझोंक हुई। इसके बाद लोगों ने लश्कर के आतंकियों को गाँव से खदेड़ दिया।

आतंकवाद का विरोध करने लगी है पीओके की जनता

घटना से साफ पता चलता है कि पहलगाम आतंकी हमले में पाकिस्तान शामिल था, वहीं ये भी सामने आया कि पीओके की जनता अब आतंकियों के खिलाफ खुल कर अपना विरोध जता रही है। आतंकी ताहिर के ‘जनाजा ए गायब’ को आतंकियों की भर्ती का जरिया बनाना चाहते थे। भारत के खिलाफ जहर उगलना चाहते थे। लेकिन ग्रामीणों ने उनकी नहीं सुनी। लोग अब हर हाल में अपने बच्चों को आतंकी बनने से बचाना चाहते हैं। इसलिए ग्रामीण अब आतंकियों के खिलाफ सार्वजनिक बहिष्कार की योजना बना रहे हैं। ये पीओके में आई नई सोच और जागरुकता को दर्शाता है।

घटना को लेकर कुइयाँ और ख्याला क्षेत्र के ग्रामीण एक सार्वजनिक ‘जिगरा’ यानी पारंपरिक परिषद की बैठक करना चाहते हैं। बैठक में आतंकवाद का विरोध करेंगे। ‘जनाजा एक गायब’ के बाद एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे से पूछ रहा है, “ये कौन लोग हैं जो हमारे बच्चों का ब्रेनवॉश करते हैं और भारत जैसी सैन्य शक्ति के खिलाफ खड़ा करते हैं।”

क्या होता है ‘जनाजा ए गायब’

‘जनाजा ए गायब’ शवों की गैरमौजूदगी में किया जाना वाला सुपुर्दे खाक का एक तरीका है। इस्लामी परंपरा के मुताबिक जब किसी मुस्लिम की मौत ऐसी जगह हो जाए, जहाँ से शव न आ पाए और जनाजे की नमाज पढ़ने के लिए कोई मौजूद न हो, तो उसके परिजन शव की गैरमौजूदगी में नमाज अदा करते हैं और अंतिम दुआ करते हैं।

कौन था ताहिर हबीब

ताहिर पाकिस्तान का आतंकी था। लश्कर ए तैयबा में शामिल होने से पहले वह पाकिस्तानी फौज में था। वह पाकिस्तानी छात्र संगठन इस्लामी जमीयत तलाबा का सदस्य भी रहा है। उसने स्टूडेंट लिबरेशन फ्रंट से भी कनेक्शन थे। वह अफगानिस्तान के सदोजाई पठान समुदाय था था, जो 18वीं शताब्दी में अफगानिस्तान से आकर पुंछ के इलाके में बस गए थे। उसके समुदाय सरोजाई पठान ने पुंछ विद्रोह में अहम भूमिका निभाई थी। अफगान कनेक्शन की वजह से खुफिया रिकॉर्ड में उसे ‘अफगानी’ नाम दिया गया।

भारत ने मोस्ट वॉटेड आतंकी उसे घोषित किया था। पहलगाम हमले में उसने अहम भूमिका निभाई थी। इस हमले में 26 पर्यटक मारे गए थे। इसके बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया और पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के साथ-साथ आतंकियों को टारगेट करने के लिए ‘ऑपरेशन महादेव’ शुरू किया गया। इसके तहत पहलगाम हमले में शामिल आतंकियों का एनकाउंटर कश्मीर की दुर्गम घाटी में किया गया।

भारत में आतंकियों के शवों का क्या किया जाता है?

अगर आतंकी भारत का है और उसकी पहचान हो जाती है तो उसके शव को परिजनों को सौंप दिया जाता है। लेकिन परिजन जब आतंकी के शव को लेने से मना कर दें तो उस आतंकी की रीति रिवाज के मुताबिक दफनाया जाता है या अंतिम संस्कार किया जाता है। इसका खर्च स्थानीय प्रशासन वहन करता है।

अगर पाकिस्तान या दूसरे देश का आतंकवादी होता है, तो पहले शव को पाकिस्तान या संबंधित देश को सौंपने की कोशिश की जाती है। अगर संबंधित देश शव को ले जाने को तैयार नहीं होता है तो आतंकी के शव को गुप्त रूप से उसके रीति रिवाज के मुताबिक दफना दिया जाता है। आम तौर पर सुरक्षा कारणों से इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती है।