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जो हिंदू लड़की इस्लाम नहीं कबूलती, उसका दिल्ली के शाहीनबाग में होता था रेप: दलित पीड़िता ने बयाँ की आगरा ‘मुस्लिम गैंग’ की बर्बरता, मुस्लिम बना जुनैद से करवा दिया था निकाह

आगरा मामले से जिस धर्मांतरण गिरोह का पर्दाफ़ाश हुआ है, वह इस्लाम ना कबूलने पर लड़कियों का रेप करता था। यह गैंग दिल्ली में इन लड़कियों को कैद रखता था। धर्मांतरण करा चुकी लड़कियों को ‘सेफ जोन’ में रखा जाता था। यह सारी जानकारी एक पीड़िता ने ही दी है।

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस गैंग के सरगना अब्दुल रहमान कुरैशी के चंगुल से हरियाणा की एक लड़की आजाद करवाई गई है। उस लड़की को दिल्ली के शाहीन बाग़ के हॉस्टल में कैद करके अब्दुल रहमान ने रखा था। बाद में अब्दुल लड़की को अपने घर ले गया, जहाँ उसका धर्मांतरण करवा दिया।

अप्रैल 2025 में लड़की का धर्मांतरण गिरोह के सदस्य जुनैद से निकाह कराया गया। अब लड़की को कोलकाता भेजने की तैयारी थी। हरियाणा की लड़की अब पुलिस के पास सुरक्षित है। लड़की ने पुलिस को धर्मांतरण गिरोह से संबंधित अहम जानकारियाँ दी है।

लड़की ने जुनैद के बारे में भी बताया, जो धर्मांतरण गिरोह का सदस्य है। वह वर्तमान में पुलिस से बचने को भागा हुआ है। पुलिस उसे पकड़ने की कोशिश में लगी हुई है।

धर्मांतरण करवा बना दिया था ‘शिफा’

हरियाणा की लड़की ने बताया कि 2019 में फेसबुक पर जुनैद से उसकी दोस्ती हुई थी। धीरे-धीरे बातचीत बढ़ने लगी और वह घर की परेशानियाँ भी साझा करने लगी। लड़की के पिता फैक्ट्री में काम करते हैं और काफी मुश्किलों से घर का खर्चा चलाते हैं। लड़की की आर्थिक स्थिति का फायदा जुनैद ने आसानी से उठा लिया।

जब 25 नवबंर 2024 को लड़की की शादी तय हुई, तभी जुनैद ने लड़की को बरगलाना शुरू कर दिया। कहने लगा कि शादी करके लड़की की जिंदगी खराब हो जाएगी। जुनैद ने लड़की से कहा, “अल्लाह के लिए तुम सब छोड़कर मेरे पास आ जाओ।” जुनैद की बातों में आकर लड़की ने शादी से 12 दिन पहले अपना घर छोड़ दिया और दिल्ली आ गई।

जुनैद ने ही हरियाणा की लड़की को शाहीन बाग के एक हॉस्टल में ठहराया था। लड़की ने बताया कि वहाँ एक मौलाना आता था और इस्लाम के बारे में ब्रेनवॉश करता था। साथ ही हिंदू धर्म के खिलाफ भड़काता था। इस दौरान इस्लाम से प्रभावित होने के लिए कुछ वीडियो भी दिखाए गए।

लड़की ने पुलिस को बताया कि धर्मांतरण अब्दुल रहमान के घर पर हुआ था। लड़की का नाम इसके बाद शिफा रख दिया गया। रहमान ही लड़की का सारा खर्चा उठाता था। रहमान ने ही जुनैद से लड़की का निकाह कराया। फिर निकाह के बाद दोनों को दूर रहने सलाह दी। रहमान कहता था कि जुनैद के पास अभी बड़ी जिम्मेदारी है।

कुछ समय बाद लड़की को पता लगा कि जुनैद तो शादीशुदा है। रहमान ने ही लड़की को यह बात बताई थी। रहमान कहता था कि उनके मजहब में सब जायज़ है। कहता कि प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं होता है।

लड़की वापस परिवार के पास जाएगी

पुलिस की पूछताछ के बाद अब हरियाणा की लड़की को वापस परिजन को सौंपा जाएगा। वह 12 नवंबर 2024 से घर से लापता थी। परिजन ने हरियाणा के सांपला थाने में गुमशुदगी का दर्ज करवाया था। पुलिस तब से ही तलाश में जुटी हुई थी।

वहीं, गैंग के सरगना अब्दुल रहमान को 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया है। इससे पहले पुलिस की टीम उसे आगरा ले गई थी, जहाँ मामले से जुड़ी कई जानकारियाँ दी।

जानें पूरा मामला

हाल ही में आगरा में धर्मांतरण गिरोह का भंडाफोड़ किया गया। इस गिरोह के तार पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इन्हें कनाडा, UAE और अमेरिका से फंडिंग मिलती थी। यह मामला आगरा की दो लापता बहनों की जाँच से सामने आया।

जाँच में 7 लोगों के खिलाफ सबूत मिले। उनके खिलाफ वारंट जारी हुए। फिर पुलिस ने 11 टीमें छह राज्यों में भेजीं। आगरा पुलिस ने यूपी, गोवा, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, दिल्ली और राजस्थान में छापे मारे। आखिर में कोलकाता की मुस्लिम बस्ती से बहनों को रेस्क्यू किया गया। यहाँ से धर्मांतरण कराने वाले गिरोह के 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

21 जुलाई 2025 को पुलिस ने गैंग के सरगना अब्दुल रहमान कुरैशी को दिल्ली के मुस्तफाबाद से गिरफ्तार किया। पुलिस को उसके घर से ब्रेनवॉश संबंधित कई किताबें भी मिली। उसके चंगुल से हरियाणा की लड़की को भी छुड़ाया गया, जिसका अब्दुल ने जबरन धर्मांतरण करा दिया था।

काँवड़ रूट में खाने-पीने की दुकानों पर दिखाना ही पड़ेगा लाइसेंस-रजिस्ट्रेशन, सुप्रीम कोर्ट ने ग्राहक को बताया ‘राजा’: वामपंथियों की ‘मुस्लिम विक्टिम’ याचिका पर फुल स्टॉप

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार और उत्तराखंड सरकार के रेस्टोरेंट में क्यूआर कोड दिखाने और उसको स्कैन करवाने के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि काँवड़ यात्रा पूरी होने वाली है इसलिए अभी इसकी वैधता पर विचार नहीं किया जाएगा।

टॉप कोर्ट ने कहा है कि रेस्टोरेंट में नॉन वेज पहले बनता था या नहीं ये जानने का अधिकार भी ग्राहकों को है

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एनके सिंह की खंडपीठ ने रेस्टोरेंट के क्यूआर कोड लगाने के यूपी सरकार के आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने होटल और रेस्टोरेंट को औदेश दिया है कि नियम के मुताबिक अपना नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर दिखाने के आदेश का पालन करें। कोर्ट ने कहा कि ग्राहकों को ये जानने का अधिकार है कि रेस्टोरेंट सिर्फ वेज खाना परोसता है या वेज- नॉन वेज दोनों परोसता है।

अगर रेस्टोरेंट में पहले नॉन वेज परोसा जाता था तो ये जानकारी भी ग्राहकों को दी जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ये ग्राहकों के पसंद का सवाल है।

यूपी सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि “इस देश में ऐसे लोग हैं जो अपने भाई के घर में मांसाहारी खाना बनने पर खाना नहीं खाते। भक्तों की भावनाएँ भी जुड़ी हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर रेस्टोरेंट में पूरे साल शाकाहारी खाना परोसा जाता है और वहाँ नॉन वेज भी बेचा जाने लगा है तो ग्राहक को ये जानकारी होना चाहिए क्योंकि ग्राहक राजा होता है। कोर्ट ने कहा कि कुछ लोग लहसुन-प्याज भी नहीं खाते हैं और कुछ वेजिटेरियन रेस्टोरेंट में खाना भी खाना पसंद नहीं करते हैं। ऐसे में ग्राहकों की पसंद का ख्याल रखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि लाइसेंस से ये पता होता है कि ये वेज रेस्टोरेंट है या नॉन वेज रेस्टोरेंट है या दोनों। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि दुकानदार कौन है? बल्कि ग्राहक को ये पता होना चाहिए कि यहाँ क्या-क्या बनता है।

दरअसल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकार ने काँवड़ यात्रा को देखते हुए यात्रा मार्ग पर लगे रेस्टोरेंट और खाने-पीने के सभी दुकानों पर नाम, रजिस्ट्रेशन नंबर लिखना तय कर दिया है। दुकान पर क्यूआर कोड लगाने और स्कैन की सुविधा भी अनिवार्य किया गया था।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार के आदेश को वामपंथी प्रोफेसर अपूर्वानंद झा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और हुजैफा अहमदी सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील हैं।

‘ब्रिटेन नरक बन गया है, यह मुझे नॉर्वे की याद दिला रहा है’: जानिए क्यों ₹2900 करोड़ का घर बेचकर देश छोड़ रहे अरबपति जॉन फ्रेडरिकसन, 300 साल पुराना है ‘द ओल्ड रेक्टोरी’

जॉन फ्रेडरिकसन ने लंदन स्थित अपना आलीशान घर ‘द ओल्ड रेक्टोरी’ बेचने का फैसला किया है। वे ब्रिटेन के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक हैं। उनका कहना है कि ब्रिटेन अब ‘नरक’ बन गया है। उनके घर की कीमत लगभग 2900 करोड़ रुपए बताई जा रही है।

जानकारी के अनुसार, जॉन फ्रेडरिक्स का 300 साल पुराना घर ‘द ओल्ड रेक्टोरी’ ब्रिटेन के सबसे महँगे घरों में से एक माना जाता है। फ्रेडरिकसन जहाजों के एक बड़े कारोबारी और ब्रिटेन के नौवें सबसे अमीर व्यक्ति हैं। वह ब्रिटेन को नरक बताकर अब दुबई चले गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, ‘द ओल्ड रेक्टोरी’ घर की कीमत लगभग 33.7 करोड़ डॉलर (करीब 2900 करोड़ रुपए) है। यह घर 30,000 वर्ग फीट में बना हुआ है। इसमें कुल 10 बेडरूम हैं। इसके अंदर बड़ा बगीचा भी है, जो करीब दो एकड़ में बना हुआ है।

यह बकिंघम पैलेस के बाद ब्रिटेन का तीसरा सबसे बड़ा निजी घर है। 81 साल के फ्रेडरिकसन ने 2001 में यह प्रॉपर्टी खरीदी थी। तब से वह यही रहते थे। हालाँकि अब उन्होंने घर को बेचने की घोषणा करते हुए यूएई में शिफ्ट होने का फैसला किया है।

फ्रेडरिकसन ने कहा, “ब्रिटेन नरक बन गया है। यह मुझे नॉर्वे की याद दिला रहा है। मैं नॉर्वे से जितना हो सके, बचने की कोशिश करता हूँ।” बता दें कि फ्रेडरिकसन का जन्म नार्वे में हुआ था। इससे पहले फ्रेडरिक्सन ने इस साल की शुरुआत में अपनी शिपिंग फर्म, सीटैंकर्स मैनेजमेंट का लंदन स्थित मुख्यालय भी बंद कर दिया था।

Henley & Partners की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में करीब 16,500 करोड़पति यूके छोड़ने वाले हैं। यह संख्या किसी भी अन्य अमीर देश की तुलना में काफी ज्यादा है। यूके भले ही अभी भी दुनिया में पाँचवाँ सबसे बड़ा करोड़पतियों का गढ़ है, लेकिन बीते दस सालों में ये टॉप 10 अमीर देशों में अकेला ऐसा देश है जहाँ अमीर लोगों की संख्या घट रही है।

इसका बड़ा कारण है टैक्स नीतियों में हुए हालिया बदलाव, जिसके तहत अब अपनी संपत्ति पर ज्यादा टैक्स देना होगा। इसके तहत प्राइवेट स्कूल की फीस पर 15% VAT भी लगने वाला है। इन सब कारणों से यूके के कई करोड़पति अब दूसरे देशों का रुख कर रहे हैं, क्योंकि ब्रिटेन की अपेक्षा किसी अन्य देश में उन्हें टैक्स का बोझ कम और फायदे ज्यादा नजर आ रहे हैं।

आयरलैंड में झूठे आरोप लगा किया नंगा, पीट-पीटकर कर दिया लहूलुहान… ‘नस्ली हमले’ को ‘असॉल्ट’ बता रहा था आयरिश मीडिया, भारतीय राजदूत ने लताड़ा

आयरलैंड में एक भारतीय नागरिक को जम कर पीटा गया है और उसके कपड़े फाड़े गए, पतलून उतरवा लिए गए। घटना को आयरिश पुलिस और नेताओं ने भी नस्ली हिंसा करार दिया है। इसके बावजूद आरटीई न्यूज़ जैसे मीडिया संस्थान ने इस पर पर्दा डालने की कोशिश की।

भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा ने घटना के साथ साथ मीडिया के रवैये को भी आलोचना की है। उन्होंने ट्वीट किया है कि एक ‘कथित’ हमले से इतनी भयानक चोट और खून कैसे निकल सकता है? आरटीई न्यूज़ की असंवेदनशीलता और अस्पष्टता देखकर स्तब्ध हूँ।

आयरलैंड में भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा का ट्वीट

द आयरिश टाइम्स के मुताबिक हमलावरों ने उसके कपड़े फाड दिए और जम कर पीटा। आसपास के लोगों ने जब तक उसे बचाया, उसके नाम, हाथ और पैरों से खून निकल रहा था। उसे टैलाघ्ट यूनिवर्सिटी अस्पताल में भर्ती कराया गया। भारतीय नागरिक को 20 जुलाई को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है।

पीड़ित पर बच्चों के नजदीक जाकर गलत व्यवहार करने का आरोप लगाया गया था। पीड़ित पर झूठा आरोप आप्रवासी-विरोधी ऑनलाइन अकाउंट से लगाया गया है।अधिकारी इस घटना को नस्लीय हेट क्राइम के रूप में देख रहे हैं।

एक प्रत्यक्षदर्शी महिला के मुताबिक नस्लवादी गिरोह ने पीड़ित के बैंक कार्ड, फोन, जूते और पतलून चुरा लिए।

उसने कहा, “मैं अपनी सास के पास जा रही थी, तभी मैंने देखा कि एक महिला समेत 13 किशोर उस व्यक्ति को घेर रहे थे। मैंने देखा कि वह व्यक्ति सिर से पैर तक खून से लथपथ था। वह काफी सदमे में था। “

उसने बताया, “उसकी पतलून नीचे खींची गई थी। उसे मारा गया था।”

महिला ने दावा किया, “पिछले चार दिनों में इन युवकों ने चार भारतीयों के चेहरे पर चाकू मारा है। आप में से कितने लोगों को यह बात पता है?”

बिजनेस वीजा पर 3 हफ्तों के लिए गया था शख्स

वहीं टैलाघ्ट साउथ के पार्षद बेबी पेरेप्पाडन ने घटना पर अफसोस जताया है। उन्होंने पीड़ित से अस्पताल में मुलाकात की। पीड़ित फिलहाल गहरे सदमे में हैं और किसी से बात नहीं कर रहा। वह 3 हफ्तों के लिए बिजनेस वीजा पर आया था। यहाँ तक कि डर और सदमे की वजह से किसी से मिलना भी नहीं चाहता है। पार्षद के मुताबिक टेलाघ्ट में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस बल बढ़ाया जाना चाहिए।

पार्षद के मुताबिक लोगों को ये समझना पड़ेगा कि आयरलैंड आने वाले भारतीय वर्क परमिट पर आए हैं और अवैध घुसपैठिए नहीं हैं। आयरलैंड के हेल्थ सेक्टर और आईटी सेक्टर में बड़ी संख्या में भारतीय हैं, साथ ही ये लोग पढ़ाई करने भी यहाँ आते हैं।

आयरलैंड के मंत्री ने नस्लीय हमले की आलोचना की

विदेशी नागरिकों पर झूठे आरोप लगाकर किये जा रहे नस्लीय हमलों पर कानून मंत्री जिम ओ कैलाघन ने अफसोस जताया है। उनका कहना है कि स्थानीय लोग देश में बढ़ रहे क्राइम के लिए आप्रवासियों को जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन जेलों में जब अपराधियों की संख्या देखी जाए, तो आप्रवासियों की आबादी की तुलना में अपराध में लिप्त आप्रवासी काफी कम हैं इसलिए इनपर आरोप लगाना गलत है।

आयरलैंड की प्रमुख पार्टी सिन फेन टीडी ने भारत के नागरिक पर हुए हमले को ‘हिंसक और नस्लवादी’ करार दिया है। पार्टी का कहना है कि ऐसे हमले पूरी तरह अस्वीकार्य हैं और नफरती हमले से लोगों में डर का माहौल है। चाहे वे आयरलैंड के लोग हों या आप्रवासी।

‘हिंदू कोई धर्म नहीं, जो ईसाई नहीं बने उन्हें तब तक मारो जब तक खून न निकल जाए’: जहर उगलने वाले पादरी के नाम पर DMK सरकार ने कर दी तमिलनाडु की सड़क, भारत को बताता था ‘ईसाई मुल्क’

चेन्नई के किलपौक इलाके की वाडेल्स रोड का नाम ‘आर्चबिशप एज्रा सरगुनम रोड’ रखा गया है। यह नाम तमिलनाडु सरकार द्वारा दिवंगत ईसाई प्रचारक और बिशप एज्रा सरगुनम के सम्मान में रखा गया है।

इसका औपचारिक उद्घाटन एक समारोह में किया गया, जिसमें डीएमके मंत्री के एन नेहरू, हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ ट्रस्ट (HR&CE) मंत्री शेखरबाबू, चेन्नई मेयर आर प्रिया और डीएमके विधायक इनिगो इरुधयराज मौजूद थे।

नाम बदलने के इस फैसले को लेकर सोशल मीडिया पर डीएमके सरकार की काफी आलोचना हो रही है। कई लोगों ने एज्रा सरगुनम के हिंदू विरोधी बयानों को लेकर सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना है कि एज्रा ने हमेशा हिंदू धर्म के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी की।

तमिलनाडु में बीजेपी के राज्य अध्यक्ष और विधायक नैनार नागेंद्रन ने DMK के इस फैसले पर आक्रोश जताया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट साझा की। इसमें उन्होंने एज्रा के वीडियो के क्लिप लगाए हैं। इनमें साफ तौर पर एज्रा को हिंदू धर्म के प्रति नफरत फैलाते और लोगों को भड़काते हुए सुना जा सकता है।

नैनार नागेंद्रन ने अपनी पोस्ट में लिखा, “ये शर्म की बात है कि DMK ने चेन्नई के वाडेल्स रोड का नाम उस एज्रा सरगुनम के नाम पर रखा है जो हिंदुओं के प्रति नफरत फैलाता था। मेरी पोस्ट में लगी वीडियो इस बात का प्रमाण है कि उसके मन में हिंदुओं के लिए कितना जहर था। उसने खुले तौर पर हिंदुओं के साथ हिंसा करने के लिए लोगों को उकसाया।”

नैनार नागेंद्रन ने आगे लिखा, “क्या डीएमके के पास अब अल्पसंख्यकों की तुष्टीकरण की राजनीति की कोई सीमा नहीं रह गई है? तमिलनाडु के लोग इसे देख रहे हैं। मैं तमिलनाडु सरकार से गुजारिश करता हूँ कि वाडेल्स रोड का नाम एज्रा सरगुनम के नाम से बदलने के फैसले को निरस्त किया जाए।”

नैनार नागेंद्रन ने जिस वीडियो को अपने पोस्ट में लगाया है उसमें एज्रा को कहते हुए सुना जा सकता है जो लोग आज हिंदू कहे जा रहे हैं, इतिहास में उनका कोई नाम ही नहीं रहेगा। हिंदू धर्म पूरी तरह से एक कृत्रिम धर्म है। इस तरह का कोई धर्म होता ही नहीं है। कोई बोले कि वो हिंदू है तो उसे बोलो कि वो लोगों को धर्म के नाम पर धोखा दे रहा है। अगर कोई हिंदू ईसाई धर्म को स्वीकार न करे, तो उसको दो बार मारो। तबत मारो जब तक उसका खून न निकल आए। भगवान माफ कर देगा। “

इसके अलावा वीडियो में एज्रा को ये भी कहते सुना जा सकता है, “ये एक क्रिश्चियन देश है। 200 साल पहले इस देश में हिंदू नाम का कोई धर्म ही नहीं था। मुझे नहीं पता कि मुस्लिम कैसे इसे बर्दाश्त कर रहे हैं। हो सकता है उन्हें ये अब तक समझ न आया हो या उनके लिए अभी समय नहीं है।”

कौन था एज्रा सरगुनम?

ईसाई प्रचारक और ईवेंजेलिकल चर्च ऑफ इंडिया (ECI) के पूर्व प्रमुख एज्रा सरगुनम का कुछ दिनों पहले ही 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह एक कट्टर ईसाई प्रचारक और डीएमके का करीबी माने जाते था। उसके नेतृत्व में चर्च स्थापना का एक बड़ा मिशन चलाया गया था, जिसके तहत 2005 तक देशभर में दो हजार से अधिक चर्च बनाए गए थे। ECI ने उसके समय में 2056 तक भारत में एक लाख चर्च स्थापित करने का लक्ष्य रखा था।

उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भड़काऊ बयानों और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा का खुला आह्वान भी किया था। उनका कहना था कि वे केवल अपने धर्म का पालन करते हैं। डीएमके नेताओं की मौजूदगी सार्वजनिक मंचों पर अक्सर न केवल हिंदू धर्म के अस्तित्व को नकारा, बल्कि असहमत लोगों के खिलाफ हिंसा भड़काने तक की बात कही। उसका कहना था कि हिंदू धर्म केवल राजनीतिक फायदे के लिए बनाया गया है।

साल 2018 के एक भाषण में एज्रा सरगुनम ने कट्टर इस्लामी संगठन SDPI को खुलकर हिंदुओं के खिलाफ खड़े होने के लिए उकसाया था। सरगुनम का ये बयान उस समय आया था, जब जबरन धर्मांतरण का विरोध करने वाले पीएमके कार्यकर्ता रामलिंगम की हत्या हुई थी।

वह अपने समर्थकों को निर्देश देता था कि अगर कोई हिंदू धर्म को असली धर्म मानता है तो उसे चुप कराना आवश्यक है और इसके लिए हिंसा करना भी गलत नहीं माना जाएगा। सरगुनम जानबूझकर सामाजिक और सांप्रदायिक तनाव भड़काने के लिए ऐसे बयान देता था।

सरगुनम ने सिर्फ हिंदुओं पर ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी अपमानजनक शब्द कहे थे। अपने एक भाषण में उसने न सिर्फ पीएम मोदी के चरित्र पर सवाल उठाए थे बल्कि उनके निजी जीवन का भी मजाक उड़ाया था।

अपने भाषण में सरगुनम ने कहा था मोदी न तो भगवान से डरते हैं और न ही जनता से। उसने कहा था कि मोदी ने कभी पारिवारिक जीवन की मुश्किलें नहीं झेली हैं, इसलिए वो प्रधानमंत्री बनकर शासक करने के योग्य नहीं हैं।

एज्रा सरगुनम का उद्देश्य किसी भी तरीके से भारत में ईसाई धर्म का प्रचार करना था। एक इंटरव्यू में उसने कहा था उसने हरिद्वार में हुए कुंभ मेले जैसे पवित्र हिंदू आयोजन में हिंदू तीर्थयात्रियों को ईसाई साहित्य बाँटा था। उसने बताया कि इस वजह से उसे वहाँ से भगाया गया था। उसने इसे हिंदुओं के खिलाफ अपने मिशन को और मजबूत करने का कारण बताया।

क्या है नेशनल स्पोर्ट्स बिल जो ला रही है मोदी सरकार, क्या क्रिकेट को हाँकने वाली BCCI भी होगी इसका हिस्सा: 25 वर्षों बाद खेल संघों में आएँगे बड़े बदलाव, महिलाओं की बढ़ेगी भागीदारी

मानसून सत्र के दौरान बुधवार (23 जुलाई 2025) को संसद में ‘नेशनल स्पोर्ट्स बिल-2025’ पेश किया जा रहा है। इस बिल के तहत बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया यानी बीसीसीआई भी विधेयक का हिस्सा बन जाएगा। वर्तमान में बीसीसीआई भले ही सरकार के आर्थिक मदद पर निर्भर न हो लेकिन इस बिल में शामिल होने के बाद उसे राष्ट्रीय खेल बोर्ड से मान्यता लेनी पड़ेगी।

युवा मामलों और खेल मंत्रालय की ओर से मंगलवार (22 जुलाई 2025) को ड्राफ्ट स्पोर्ट्स बिल पेश किया जा चुका है। इस बिल का उद्देश्य भारत में विभिन्न खेलों की व्यवस्था को बेहतर स्तर पर लेकर आना है। विश्लेषकों का मानना है कि इसके बाद भारतीय खेलों की दुनिया हमेशा के लिए बदल जाएगी।

खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने इससे पहले भी दो बार कैबिनेट और एक बार संसद में इस बिल को लाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। ड्राफ्ट पेश करने के दौरान खेल और युवा मामलों की राज्य मंत्री रक्षा खड़से ने इस बिल को लेकर कहा, “लगभग 25 वर्षों के बाद भारत में खेल को लेकर नई नीति आ रही है। इसे ‘खेलो भारत नीति’ के नाम से जाना जाएगा। इसमें काफी अच्छी सुविधाओं के साथ अच्छी नीतियाँ शामिल की गई हैं।”

रक्षा ने कहा, “इसमें कई अच्छी नीतियाँ हैं जो स्पोर्ट्स सेक्टर और भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देंगे। साथ ही 2036 के ओलंपिक खेलों में भारत के विजन और खेल को आगे बढ़ाने के लिए काम करेंगे। हर राज्य, हर प्राइवेट सेक्टर को साथ में लेकर खेल को आगे पहुँचाने का हम प्रयास कर रहे हैं।”

क्यों आ रहा नया बिल

नेशनल स्पोर्ट्स गवर्नेंस बिल-2025 का उद्देश्य भारत में खेल प्रशासन को पारदर्शी जवाबदेही और खिलाड़ियों पर केंद्रित रखना है। इसके तहत राष्ट्रीय खेल महासंघ को एक राष्ट्रीय खेल बोर्ड के अधीन लाया जाएगा ताकि खेल संघ में समय पर चुनाव हो सकें। उनकी प्रशासनिक जवाबदेही बन सके और वित्तीय पारदर्शिता को भी सुनिश्चित किया जा सके।

इस बिल के तहत खिलाड़ियों के अधिकारों के लिए खेल ट्रिब्यूनल की स्थापना भी की जाएगी। इस लिहाज से बीसीसीआई को भी अन्य खेल संघो की तरह पारदर्शिता और एक बेहतर खेल संघ के सिद्धांतों का पालन करना होगा

क्या-क्या खासियतें हैं शामिल

राष्ट्रीय खेल बोर्ड या नेशनल स्पोर्ट्स बोर्ड (NSB) के बनने पर उसके अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को केंद्र सरकार की ओर से नियुक्ति दी जाएगी। उसकी चयन समिति में कैबिनेट सचिव या खेल सचिव के साथ भारतीय खेल प्राधिकरण के महानिदेशक, अर्जुन या खेल रत्न पुरस्कार विजेता एक खिलाड़ी और दो अनुभवी खेल प्रशासक शामिल होंगे।

इस नए बिल में प्रशासकों की आयु सीमा को भी 70 वर्ष से 75 वर्ष तक बढ़ा दिया गया है यानी 75 वर्ष की आयु के लोग भी चुनाव लड़ सकते हैं। हालाँकि इसमें अंतरराष्ट्रीय संघ के कानून को प्राथमिकता मिलेगी।

इसी के साथ ही खेल ट्रिब्यूनल स्थापित किया जाएगा जिसका मुख्य उद्देश्य खेल संघ और खिलाड़ियों के बीच हो रहे विवाद या किसी तरह के प्रशासनिक मामलों में निर्णय लेना होगा। साथ ही चुनावी अनियमिताओं पर भी ट्रिब्यूनल नजर रखेगा। ‌

बीसीसीआई पर कैसे पड़ेगा इस बिल का असर

बीसीसीआई के इस बिल में शामिल होने के बाद उसे सूचना के अधिकार (RTI) के तहत लाया जाएगा। इसके जरिए एक आम इंसान भी बीसीसीआई के फैसले के साथ आर्थिक लेनदेनसमेत अन्य जानकारियों के बारे में पूछताछ कर सकता है।

बिल के तहत बनने वाले खेल बोर्ड में इस बात की सुनिश्चितता तय की जाएगी कि बीसीसीआई में भी चुनाव समय पर हों और उसके संचालन में कोई गड़बड़ी न हो। इसके अलावा क्रिकेटरों के चयन के साथ अनुशासनात्मक मामलों में भी बीसीसीआई को खेल ट्रिब्यूनल के निर्णय मानने पड़ेंगे। एक तरह से कहा जाए तो इस बिल में शामिल होने के बाद बीसीसीआई की बादशाहत कम हो जाएगी।

अगर यह बिल कानून बनता है तो भारतीय खेल जगत में यह एक ऐतिहासिक बदलाव होगा जिसमें खिलाड़ियों की भलाई, पारदर्शिता और उनके साथ हुए किसी भी तरह के अन्याय के लिए खेल संघों की जवाबदेही सबसे पहली प्राथमिकता होगी।

असल में क्रिकेट के T20 सीरीज को 2018 में लॉस एंजेलिस में होने वाले ओलंपिक खेलों में भी शामिल किया गया है। इस लिहाज से बीसीसीआई को गवर्नेंस बिल में शामिल करना एक बेहतर निर्णय भी हो सकता है।

इस बिल के आने से पहले खेल मंत्री मनसुख मांडवीया ने कहा था कि इस बिल का मसौदा तैयार करते समय अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति से भी परामर्श किया गया है। इससे 2036 के ओलंपिक खेलों की मेजबानी में भारत की बोली के लिए IOC के साथ बेहतर संबंध स्गेथापित किए जा सकेंगे।

हालांकि इस बिल का मसौदा तैयार करने के दौरान आईओए ने इस खेल बोर्ड का विरोध किया था और इसे सरकारी हस्तक्षेप कहा था। आईओए का कहना है कि इसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की ओर से प्रतिबंध लग सकते हैं।

महिलाओं की बढ़ेगी भागीदारी

इस बिल के कानून बनने के बाद कई नए और बेहतर बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अगर ये कानून बन जाता है तो इसका एक असर खेल में महिलाओं की भागीदारी के तौर पर भी नजर आएगा। इसके तहत बीसीसीआई समेत अन्य खेल संघों की गवर्निंग बॉडी में महिलाओं की भागीदारी अधिक होगी।

राष्ट्रीय ओलंपिक कमिटी (IOC) महिला और पुरुष के बराबर भागीदारी को लेकर काम करता है तो इस लिहाज से नए बिल के लागू होने पर खेल संघ में महिला प्रशासकों की संख्या बढ़ने वाली है।

इसके अलावा राष्ट्रीय खेल बोर्ड की नियुक्ति पर भी सीधे असर पड़ेगा। वर्तमान में यह एक तरीके का नियंत्रित मेकैनिज्म नजर आता है। नए स्पोर्ट्स बिल में खेल बोर्ड की नियुक्ति पूरी तरह से केंद्र सरकार की ओर से की जाएगी। खेल बोर्ड के पास विभिन्न खेल संघों की मान्यता देने और छीनने का भी अधिकार होगा।

असल में राष्ट्रीय खेल बोर्ड वित्तीय अनियमितताओं के साथ चुनाव में हो रही गड़बड़ियों समेत खेल संघ के हर छोटे बड़े मामलों में दखल देने और फैसले लेने के अधिकार रखेगा। उसके तहत एक अध्यक्ष होगा और उसकी में सदस्यों की नियुक्ति केंद्र से की जाएगी।

‘रिश्तों के भी रूप बदलते हैं…’ सत्ता में इंडिया आउट’ का नारा लगाकर आए मोहम्मद मुइज्जू, पर बेपटरी हुई मालदीव की इकोनॉमी तो भारत ने ही दी ‘संजीवनी बूटी’: जानिए PM मोदी की यात्रा के मायने

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय मालदीव दौरे पर जा रहे हैं। ये दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक है। राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू के सत्ता में आने के बाद पहली बार पीएम मोदी मालदीव जा रहे हैं। हालाँकि ये उनकी तीसरी मालदीव यात्रा है।

इससे पहले पीएम मोदी दो दिनों तक 23 जुलाई और 24 जुलाई को यूके के दौरे पर होंगे। यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के आमंत्रण पर पीएम मोदी वहाँ जा रहे हैं। इस दौरान भारत-यूके के बीच द्विपक्षीय वार्ता होगी जिसमें व्यापार, शिक्षा, सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन जैसे विषय शामिल हैं। यूके के किंग चार्ल्स तृतीय ने भी पीएम मोदी को आमंत्रित किया है।

लेकिन इस दौरे के दौरान दुनिया की नजर 25 जुलाई और 26 जुलाई पर होगी, जब पीएम मोदी मालदीव के दौरे पर होंगे क्योंकि हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।

एक साल के तनाव के बाद यात्रा

पीएम मोदी की आधिकारिक मालदीव यात्रा रणनीतिक तौर पर भी काफी अहम है। उन्हें 26 जुलाई, 2025 को मालदीव के 60वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में ‘मुख्य अतिथि’ के तौर पर आमंत्रित किया गया है।

मुइज्जू ने नवंबर 2023 में चुनाव जीतकर मालदीव की सत्ता संभाली। उनके ‘इंडिया आउट’ नीति की वजह से दोनों देशों के रिश्तों में खटास आई। यहाँ तक कि भारतीय सैनिक जो मालदीव में थे, उन्हें बाहर निकालने के लिए भारत पर दबाव बनाया गया।

लक्षद्वीप को पर्यटन केंद्र के रूप में प्रमोट करने को लेकर भी भारत और मालदीव के बीच तनातनी देखने को मिली। तब प्रधानमंत्री मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणियों के कारण मालदीव के दो मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा था। पीएम मोदी पर की गई टिप्पणी भारतीयों को नागवार गुजरी और सोशल मीडिया पर ‘मालदीव बहिष्कार’ अभियान शुरू हुआ। इसका असर मालदीव की अर्थव्यवस्था पर देखा गया क्योंकि भारतीय पर्यटकों का मालदीव के राजस्व में अहम योगदान है।

दोनों देशों ने तनाव कम करने की कोशिश भी की। भारत ने विमान संचालन के मैनेजमेंट के लिए अपने सैन्य कर्मियों की जगह आम इंजीनियरों को नियुक्त करने की पेशकश की। नई दिल्ली ने मुद्रा विनिमय सुविधा (currency swap facility) भी दी। बजट 2025 में मालदीव को दी जाने वाली वित्तीय सहायता ₹600 करोड़ कर दिए गए जो 2024-25 में दिए गए ₹470 करोड़ से ₹130 करोड़ ज्यादा है।

मुइज्जू कर रहे संबंधों को सुधारने की कोशिश

मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू अब भारत के साथ संबंधों को सुधारने के लिए आगे बढ़े हैं। मुइज्जू के सितंबर 2024 में आधिकारिक यात्रा से पहले दोनों भारत विरोधी टिप्पणी करने वाले दोनों मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा था। हालाँकि आधिकारिक तौर पर इस्तीफे की वजह ‘व्यक्तिगत कारण’ बताया गया। लेकिन इस्तीफे की टाइमिंग ऐसी थी कि लोग चौंक गए।

9 जून 2024 को मुइज्जू भारत के दौरे पर आए। तब मालदीव में रूपे कार्ड लॉन्च किए गए थे। पिछले कुछ वर्षों में मालदीव को चीन के करीबी के रूप में देखा गया। लेकिन अब मालदीव ये महसूस करने लगा है कि भारत को नजरअंदाज कर वह आगे नहीं बढ़ सकता है।

भारत और मालदीव अपने राजनयिक संबंधों के 60 वर्ष पूरे कर रहे हैं, प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा द्विपक्षीय संबंधों में एक नई शुरुआत का प्रतीक बन गई है।

चीन की दखलंदाजी से भारत की कूटनीति तक

सत्ता संभालने के बाद मुइज्जू का झुकाव चीन की तरफ देखा गया। उनकी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा जनवरी 2024 में चीन की ही थी। उन्होंने बीजिंग के साथ 20 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनमें सैन्य और वित्तीय सहयोग से जुड़ा समझौता शामिल था। मुइज्जू से पहले मालदीव के राष्ट्रपति का पहला दौरा भारत का हुआ करता था। मुइज्जू ने इस परंपरा को तोड़ा था।

चीन के महत्वाकांक्षी योजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत मालदीव के साथ संबंध सुधारना शुरू किया। 2014 में BRI में शामिल होने के बाद से मालदीव ने चीनी बैंकों से लगभग 1.4 बिलियन डॉलर लिए हैं, जो उसके कुल सार्वजनिक ऋण का लगभग 20% है।

भारत ने मालदीव की अर्थव्यवस्था को बचाया

मालदीव की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर अत्यधिक निर्भर है और उस पर विदेशी कर्ज का बोझ भी भारी है। विदेशी मुद्रा भंडार गंभीर रूप से कम हो गया था और क्रेडिट डाउनग्रेड (ऋण रेटिंग में गिरावट) की आशंका भी गहरा गई थी।

हालाँकि भारत के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने मई 2024 में मालदीव सरकार द्वारा जारी ट्रेज़री बिलों में 50 मिलियन डॉलर का निवेश किया। लेकिन संकट टला नहीं था। जब यह निवेश सितंबर 2024 में परिपक्व होने वाला था, तब मालदीव सरकार के अनुरोध पर इस निवेश को पुनः बढ़ाया गया। मालदीव ने इस सहायता के लिए भारत का आभार व्यक्त किया और इसे आर्थिक स्थिरता और वित्तीय सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति और महासागर विजन

मालदीव भारत का एक प्रमुख समुद्री सहयोगी है। आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए भारत द्वारा दिए गए विशेष कोटा के साथ-साथ ट्रेज़री बिल में निवेश और उसके बाद की मुद्रा अदला-बदली (Currency Swap) यह दर्शाते हैं कि भारत मालदीव के नागरिकों की भलाई के लिए प्रतिबद्ध है।

मालदीव की विदेशी मुद्रा भंडार अगस्त 2024 तक घटकर 443.9 मिलियन डॉलर रह गया था, जो पिछले वर्ष इसी समय 694.2 मिलियन डॉलर था। लेकिन RBI की स्वैप सहायता के चलते मई 2025 में यह बढ़कर 816 मिलियन डॉलर हो गया — जिसका प्रमुख श्रेय भारत द्वारा दी गई $400 मिलियन की राशि को जाता है।

भारत ने क्रेडिट रेटिंग गिरने से बचाया

अगस्त 2024 में फिटेक ने मालदीव के बॉन्ड्स की रेटिंग CCC+ से घटाकर CC कर दी थी और चेतावनी दी थी कि देश डिफॉल्ट के खतरे में है। सितंबर में मूडीज ने भी मालदीव की रेटिंग Caa1 से घटाकर Caa2 कर दी। यदि भारत का हस्तक्षेप न होता, तो ये रेटिंग और गिर सकती थीं।

RBI के स्वैप समझौते और उसके प्रभाव ने इन एजेंसियों को यह संदेश दिया कि मालदीव को भारत का वित्तीय समर्थन हासिल है। इससे मालदीव के लिए अंतरराष्ट्रीय कर्ज लेना महँगा नहीं हुआ और उसकी संप्रभुता और साख बची रही।

मालदीव हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से बेहद अहम स्थिति में स्थित है। भारत लंबे समय से इस क्षेत्र में ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ की भूमिका निभा रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत का यह वित्तीय हस्तक्षेप न केवल आर्थिक सहारा था, बल्कि रणनीतिक जवाब भी था।

विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने फरवरी 2025 में हिन्द महासागर सम्मेलन में भारत की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया कि कैसे भारत ने श्रीलंका को 4 अरब डॉलर की सहायता देकर वहाँ की अर्थव्यवस्था को भी स्थिर किया था। मालदीव के लिए की गई यह सहायता उसी नीति का विस्तार है।

भारत-मालदीव की ऐतिहासिक पार्टनरशिप

भारत हमेशा से अपने पड़ोसियों की मदद के लिए आगे रहा है। भारत और मालदीव के बीच 1965 से लगातार अच्छा रिश्ता रहा है। ब्रिटेन से मालदीव की आजादी के बाद जब भी मालदीव पर मुसीबत आई, भारत संकट मोचक की तरह सामने आया। चाहे वह 1988 का ‘ऑपरेशन कैक्टस’ हो, 2004 की सुनामी हो या फिर कोविड-19 महामारी, भारत सबसे पहले मदद के लिए आगे आया है।

रक्षा संबंधों के अलावा, भारत ने द्वीपसमूह में विभिन्न बुनियादी ढाँचे, स्वास्थ्य और शिक्षा परियोजनाओं को आर्थिक मदद दी। 18 मई 2025 को भारत ने ₹100 करोड़ की मदद दी। इसके लिए 13 समझौतों (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए। मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला खलील ने उस समय कहा था कि भारत की सहायता हमेशा उद्देश्यपूर्ण, सार्थक और मालदीव के लोगों के अनुरूप रहे हैं।

ऐसे में पीएम मोदी की मालदीव यात्रा दोनों देशों के रिश्तों में एक बार फिर मजबूती लाएगी।

‘छांगुर पीर बाहर आएँगे, सबको सबक सिखाएँगे’: विधवा की जमीन पर बनाई मजार, इस्लाम नहीं कबूलने पर गैंगरेप, किसी की बेटी ही कर दी गायब… अब हिंदू पीड़ितों को धमका रहे गुर्गे

छांगुर पीर के धर्मांतरण नेटवर्क का खुलासा हो गया है। छांगुर को गिरफ्तार भी किया जा चुका है, लेकिन उसके गुर्गे अब भी खुलेआम धमकी देते घूम रहे हैं। गुर्गे कहते हैं, “छांगुर बाबा बाहर आएँगे और सबको सबक सिखाएँगे।” छांगुर के धर्मांतरण का गैंग अब भी सक्रिय है, पीड़िताओं को बयान वापस लेने का दबाव डाला जा रहा है।

यह दावा हिंदू रक्षा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय ने किया है। उन्होंने बताया कि छांगुर के खिलाफ बयान देने वाली पीड़िताओं को उसके गुर्गे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। ये धमकी कभी फोन कॉल, कभी मैसेज और कभी रास्ता रोककर दी जा रही हैं। पीड़िताओं को बयान वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। इन धमकियों से पीड़िताओं की जान को खतरा बना हुआ है।

गोपाल राय ने आगे कहा कि छांगुर पीर भले ही जेल में है, लेकिन उसका गैंग अब भी सक्रिय है। उन्होंने साफ कहा कि धर्मांतरण का रैकेट दबाया नहीं गया है, बस अब पर्दे के पीछे चला गया है। उन्होंने कहा, “गैंग पहले हिंदू लड़कियों को फँसाकर उनका ब्रेनवॉश करता था, वही आज उन्हें धमका रहा है। वो चाहते हैं कि केस वापस ले लिया जाए और गवाही न हो सके।”

रिपोर्ट्स के मुताबिक छांगुर का गैंग अब भी सक्रिय है। कुछ पीड़िताएँ उसके कब्जे में भी हैं। छांगुर की गैंग के अधिकतर गुर्गे फरार चल रहे हैं। पुलिस और जाँच एजेंसियाँ इसकी तलाश में लगी हुई हैं।

बलरामपुर से धर्मांतरण का नेटवर्क चलाने वाले छांगुर पीर ने हिंदुओं का खूब प्रताड़ित किया है। कहीं हिंदू लड़की से गैंगरेप तो कहीं जमीन हड़प ली गई। ऐसे ही कुछ पीड़िताओं ने सामने आकर छांगुर के अत्याचार की आपबीती सुनाई है।

बेंगलुरु की हिंदू युवती से गैंगरेप

छांगुर के धर्मांतरण नेटवर्क का शिकार हुई कर्नाटक के बेंगलुरु की युवती से गैंगरेप किया गया था। युवती ने जब धर्मांतरण करने से इनकार किया तो उसे छांगुर के गुर्गों ने रास्ते से उठा लिया। युवती का गैंगरेप कर बुरी तरह पीटा। पुलिस को बताई आपबीती में युवती ने बताया कि उसे सहारनपुर के मोहम्मद वसीम ने लव जिहाद में फँसाया था।

वसीम ने विवेक राठौड़ बनकर इंस्टाग्राम पर दोस्ती की थी। फिर सऊदी अरब बुलाकर बेचने की प्लानिंग थी। लेकिन युवती उनके चंगुल से भाग निकली थी। इसके बाद भी गुर्गों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा और जान से मारने की धमकी देने लगे।

बाप तलाश रहे बेटियाँ, छांगुर के गुर्गे धर्मांतरण कर भगा ले गए

छांगुर के गुर्गों गुंडागर्दी पर उतर आए हैं। कही किसी बाप की बेटी गायब कर दी तो कहीं विधवा की जमीन कब्जा कर मजार बनवा दी। गाजियाबाद के रहने वाले वृद्ध आजाद चौधरी की बेटी चार महीने से गायब है। पिता ने आरोप लगाया कि बेटी का अपहरण कर धर्म परिवर्तन करवा दिया गया है।

बलरामपुर के उतरौला निवासी रघुनाथ निषाद की बेटी का पड़ोसी मुबारक अली ने धर्म परिवर्तन करवा दिया। छह महीने पहले बेटी को बहला-फुसलाकर निकाह कर भगा ले गया। निषाद कहते हैं कि अब उनकी बेटी कहाँ है, इसकी जानकारी नहीं है। निषाद का कहना है कि छांगुर के गुर्गे अब अन्य तीन बेटियों का धर्मांतरण करवाने की धमकी दे रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मेरठ के सिविल लाइंस निवासी सुनील नेगी की बहन आशा नेगी भी धर्मांतरण का शिकार हुई हैं। सुनील बताते हैं कि उनकी बहन 2019 से गायब हैं। बदर अख्तर सिद्दीकी उनकी बहन को लव जिहाद में फँसाकर भगा ले गया है। तभी से उसका पता नहीं लग पा रहा है। इसके बाद सिद्दीकी ने मेरठ की ही अन्य हिंदू युवती को फँसाया। अब दोनों पीड़िताएँ गायब हैं।

विधवा की जमीन कब्जा मजार बनवा दी

इतना ही नहीं छांगुर पीर के गुर्गे हिंदुओं की जमीन हड़प उस पर मजार भी बना देते थे। दादरी की एक ऐसी ही पीड़ित विधवा सामने आई है। उन्होंने बताया है कि दादरी में उनकी जमीन पर छांगुर के गुर्गों ने कब्जा कर मजार बनवा दी। अब वहाँ नमाज पढ़ी जाती है।

पंजाब की यूनिवर्सिटी में पढ़ने गई गोवा की कृष्णा, कश्मीरी सहेलियों ने ब्रेनवॉश कर बना दिया आयशा: फिर दूसरों से कबूल करवाने लगी इस्लाम, आगरा ‘मुस्लिम गैंग’ के लिए जुटाती थी फंड

पंजाब की यूनिवर्सिटी में गोवा की एक हिंदू लड़की पढ़ने पहुँचती है। यहाँ कश्मीरी छात्राएँ लड़की को इस्लाम कबूलने के लिए ब्रेनवॉश करती हैं। उनसे प्रभावित होकर एसबी कृष्णा अब आयशा बन जाती है। यह कहानी है आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह में पकड़ी गई एक लड़की की।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आयशा ने फंडिंग जुटाने के लिए व्हाट्सऐप पर कई ग्रुप बनाए हुए थे। इनके माध्यम से वह प्रभावशाली लोगों से संपर्क में रहती थी। इस प्रक्रिया में आयशा की मदद दिल्ली से पकड़ा गया गैंग का सरगना अब्दुल रहमान करता था। पुलिस पूछताछ में आयशा के बारे में कई खुलासे हुए हैं।

गोवा की हिंदू लड़की का कश्मीरी छात्राओं ने कराया धर्मांतरण

आयशा मूलरूप से गोवा की रहने वाली है। धर्मांतरण से पहले उसका नाम एसबी कृष्णा था। कृष्णा साल 2020 में पंजाब यूनिवर्सिटी में एमएससी डाटा साइंस की पढ़ाई करने आई थी। कॉलेज में उसकी दोस्ती कश्मीर की कुछ छात्राओं से हुई। इन्होने ही कृष्णा का ब्रेनवॉश किया। नमाज पढ़ने और बुर्का पहनने के फायदे गिनाए। धीरे-धीरे कृष्णा इससे प्रभावित होने लगी।

इसके बाद छात्राएँ कृष्णा को अपने साथ कश्मीर ले गईं। यहाँ काफी दिन कृष्णा उनके साथ रही। उधर, कृष्णा के माता-पिता को इसकी जानकारी नहीं थी। बेटी की गुमशुदगी को लेकर परिजनों ने दिल्ली में रिपोर्ट दर्ज करवाई। काफी दिन बाद कश्मीर में मन ना लगने पर कृष्णा अपने आप दिल्ली वापस लौट आई।

कृष्णा वापस लौटने पर परिजन उसे अपने साथ गोवा ले आए। परिजनों ने उसका मोबाइल भी छीन लिया था। इसके चलते अपने सभी दोस्तों और धर्मांतरण गिरोह में शामिल कुछ लोगों से जिन्हें वह तब जानती थी, उनसे संपर्क टूट गया। लेकिन छह महीने बाद वह फिर भागी और इस बार कोलकाता चली गई।

यहाँ एसबी कृष्णा ने धर्म परिवर्तन कर आयशा नाम रख लिया। कोलकाता से ही आयशा का धर्मांतरण गिरोह से जुड़ाव शुरू हुआ। अब आयशा धर्मांतरण कराने के लिए फंडिंग जुटाने लग गई। इस फंडिंग को धर्मांतरण कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

गिरोह में शामिल 6 लोग पहले थे हिन्दू

आयशा जैसे ही 5 अन्य आऱोपितो धर्मांतरण कर गिरोह से जुड़े थे। इन्हें पुलिस ने अलग-अलग राज्यों से गिरफ्तार किया है। जयपुर से गिरफ्तार मोहम्मद अली पहले पियूष पँवार था। मुस्लिम युवती से प्यार में पढ़कर उसने इस्लाम कबूला।

लेकिन कुछ समय बाद युवती उसे छोड़कर चली गई। इसके बाद कलीम सिद्दीकी की मदद से PFI संगठन से जुड़ गया। संगठन के लिए काम करते हुए वह कोलकाता में दीन की तालीम देने लगा। यहाँ गिरोह की सदस्य आयशा से मिला। आयशा से फंडिंग लेकर धर्म परिवर्तन के काम में लग गया।

आरोपित में से एक मोहम्मद इब्राहिम भी पहले रीथ बनिक था। इब्राहिम ने ही आगरा की दोनों बहनों का कोलकाता पहुँचने का इंतजाम कराया था। गैंग का सरगना फिरोजाबाद निवासी अब्दुल रहमान ने भी धर्म परिवर्तन कराया था। इस्लाम कबूलने से पहले उसका नाम महेंद्र पाल जादौन था।

कलीम सिद्दीकी चलाता था गिरोह

धर्मांतरण गिरोह चलाने वाला अब्दुल रहमान है, जिसे दिल्ली के मुस्तफाबाद से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पूछताछ में सामने आया कि रहमान भी असली मास्टरमाइंड नहीं है। रहमान खुद जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे मौलाना कलीम सिद्दीकी के लिए काम कर रहा था।

UPATS ने सिद्दी को साल 2021 में सामूहिक धर्मांतरण के मामले में गिरफ्तार किया था। 2024 में सिद्दीकी और उसके 11 साथियों को उम्रकैद की सजा मिली। तब से वह रहमान के माध्यम से अपनी एक्टिविटी चलाई हुई है।

मुजाहिदा बनने को तैयार थी आगरा की लड़की

कोलकाता से बचाई गई आगरा की दो सगी बहनों का भी धर्मांतरण करा दिया गया था। उन्हें सलफी मुस्लिमों की तरह ब्रेनवॉश किया गया था। दोनों में से एक बहन तो इस कदर ब्रेनवॉश हुई कि वह मुजाहिदा (कुर्बान होने को तैयार) तक बन गई थी। वह बरामद होने के बाद भी घर तक नहीं जाना चाहती थी।

वहीं, गिरोह में शामिल मोहम्मद इब्राहिम ने पुलिस को बताया कि हिंदू युवतियों को मुगल शासन की कहानियाँ सुनाई जाती थी। मुस्लिम शासकों के भारत पर राज की वीडियो दिखाई जाती थी। इससे सिर्फ लड़कियाँ धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि कुर्बान तक होने को तैयार हो जाती थीं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस को बहनों का धर्मांतरण कराने वाली आयशा के फोन से कुछ वीडियो भी बरामद हुए हैं। एक वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर का उद्घाटन कर रहे हैं और वॉयसओवर में एक इस्लामी कट्टरपंथी कह रहा है- “बहुत बन गए सोमनाथ में मंदिर… अब टूटने चाहिए।”

वहीं, पुलिस ने बताया कि कोलकाता में जब बहनों को बचाने के लिए पुलिस पहुँची, तो उन्होंने हिजाब पहना हुआ था। पुलिस को देखते ही वह छिप गईं और वापस लौटने से इनकार कर दिया। बहनों का कहना था कि उन्हें मकसद मिल गया है। महिला पुलिस ने बहनों की काउंसलिंग की और उन्हें सुरक्षित वापस आगरा लाया गया।

पुलिस को बहनों की सोशल मीडिया ID पर AK-47 के साथ तस्वीरें मिली। जाँच एजेंसी ने बहनों को ISIS मॉड्यूल में इस्तेमाल होने का शक जताया है। सोशल मीडिया पर उनका गैंग के सरगना अब्दुल रहमान से भी लंबी-लंबी चैट्स मिली हैं।

बातचीत में बहनों को इस्लाम के लिए मरने और मारने के लिए तैयार किया जा रहा था। इन सभी चैट्स को आरोपितों के खिलाफ तैयार हो रही केस डायरी में भी शामिल किया गया है।

पुलिस इस मामले में लगातार जाँच कर रही है और पीड़ितों को पहचानने का प्रयास कर रही है।

7 बम फटे, 187 लोगों की मौत… 19 साल बाद कोई भी दोषी नहीं: जानिए 7/11 मुंबई धमाकों में जिन 12 को MCOCA कोर्ट ने सुनाई फाँसी-उम्रकैद, वे हाई कोर्ट से कैसे हो गए बरी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार (21 जुलाई 2025) को 2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में दोषी पाए गए सभी 12 आरोपितों को बरी कर दिया है। 2015 में एक विशेष मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट) कोर्ट ने उनमें से पाँच को मौत की सजा और बाकी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चांडक की दो सदस्यीय पीठ ने यह फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि अधिकांश साक्ष्य और गवाहों के बयान विश्वसनीय नहीं थे। ऑपइंडिया ने 2015 के मकोका कोर्ट के फैसले और 21 जुलाई 2025 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को आधार बनाकर घटनाक्रम, सुनवाई, हाई कोर्ट में अपील और अंत में वर्तमान फैसले की समयरेखा तैयार की है।

वह शाम जिसने मुंबई को दहला दिया

11 जुलाई 2006 को मुंबई शहर में बेहद दर्दनाक घटना घटी। इस दिन शाम 6:24 बजे से 6:28 बजे के बीच मुंबई की लाइफलाइन मानी जाने वाली लोकल ट्रेनों को निशाना बनाकर 7 बम धमाके किए गए। ये धमाके वेस्टर्न रेलवे लाइन की फर्स्ट क्लास बोगियों में हुए, और इनका समय इस तरह तय किया गया था कि सब एक के बाद एक कुछ ही मिनटों में हुए।

धमाके जिन स्टेशनों के पास हुए थे, उनमें माटुंगा रोड, माहिम, बांद्रा, खार, जोगेश्वरी, बोरीवली और मीरा रोड शामिल थे। इनमें कुछ ट्रेनें चर्चगेट तो कुछ विरार की ओर जा रही थी। ये धमाके उस समय हुए जब ट्रेनों में सबसे ज्यादा भीड़ होती है। उस समय हजारों यात्री ट्रेनों में सफर कर रहे थे। बमों को प्रेशर कुकर में रख कर काले बैगों में छुपा कर बोगियों के अंदर सामान रखने वाली जगह पर रखा गया था।

बम में RDX और अमोनियम नाइट्रेट जैसे खतरनाक विस्फोटक इस्तेमाल किए गए थे। इसके साथ ही नुकसान को बढ़ाने के लिए बॉल बेयरिंग्स भी रखी गई थीं। टाइमर डिवाइसेज की मदद से सभी धमाके एक साथ कराए गए। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक इस हमले में 187 लोगों की जान गई थी और 829 लोग घायल हुए थे।

धमाकों में फर्स्ट क्लास के डिब्बे पूरी तरह तबाह हो गए थे। शव पटरियों और प्लेटफॉर्म पर बिखरे हुए मिले थे। इस घटना के बाद बोरीवली, बांद्रा, माहिम, खार, माटुंगा रोड और जोगेश्वरी रेलवे पुलिस थानों में FIR दर्ज की गई। घटना की गंभीरता और इसके पीछे की योजना देखकर यह साफ था कि यह एक बड़ी साजिश थी।

अगले दिन महाराष्ट्र एंटी टेररिज्म स्क्वाड (ATS) ने इसकी जाँच शुरू की। बमों को रखने का तरीका और स्टेशन के चुनाव से ये भी समझ आया कि इसके पीछे बहुत सोच-समझकर और प्लानिंग से काम किया गया था। बाद में कोर्ट ने इस घटना को एक जानबूझकर किया गया बड़ा आतंकी हमला बताया। कोर्ट ने साफ किया कि इस हमले का मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों को नुकसान पहुँचा कर शहर में आतंक फैलाना था।

मुंबई में हुए कई मामले दर्ज और ATS ने सँभाली जाँच की कमान

11 जुलाई 2006 को मुंबई में लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के तुरंत बाद पुलिस ने कई FIR  दर्ज की थी। इनमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराएँ 302 (हत्या), 307 (हत्या की कोशिश), 326, 324, 120B (षड्यंत्र), और 427 के अलावा रेलवे एक्ट, एक्सप्लोसिव सब्सटेंस एक्ट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से रोकथाम कानून (PDPP Act) के प्रावधान लगाए गए थे।

बाद में ATS ने कहा कि सभी धमाके एक बड़ी साजिश का हिस्सा हैं, इसलिए इन सभी FIR को मिलाकर एक संयुक्त मामला बनाया गया। यह मामला ATS की मुंबई कालाचौकी यूनिट ने दर्ज किया और पूरे मामले को एक संगठित और सुनियोजित साजिश के रूप में जाँचा गया।

जाँच के दौरान  ATS ने महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (MCOCA) लगाने का फैसला किया। 30 सितंबर 2006 को सक्षम प्राधिकरण से इसकी मंजूरी भी मिल गई। बाद में 11 जनवरी 2007 को और जाँच के बाद, गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और PDPP एक्ट भी आरोपितों पर लागू किए गए।

ATS ने धमाकों की गहराई से जाँच की। इसमें फॉरेंसिक जाँच, ब्लास्ट साइट्स से सबूत जुटाना, विस्फोटक सामग्री और अवशेषों की जाँच शामिल थी। इस जाँच के दौरान 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से ज्यादातर महाराष्ट्र और आस-पास के राज्यों से थे। कई अन्य आरोपित अब भी फरार हैं।

कई गिरफ्तार आरोपित प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) से जुड़े बताए गए और पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क होने की भी बात सामने आई। ATS ने जाँच के बाद साफ किया कि यह पूरी साजिश पाकिस्तान में रची गई थी और उसे स्थानीय लोगों की मदद से भारत में अंजाम दिया गया।

लंबे मुकदमे के बाद 2015 में दोष हुआ सिद्ध

ATS कालाचौकी केस में 13 आरोपितों के खिलाफ एक बड़ी चार्जशीट दाखिल की गई। इसके बाद विशेष मकोका कोर्ट में मुकदमा शुरू हुआ। इन पर आईपीसी, मकोका, यूएपीए, एक्सप्लोसिव्स एक्ट, रेलवे एक्ट और पासपोर्ट एक्ट जैसे कई गंभीर कानूनों के तहत आरोप लगाए गए थे।

मामले की शुरुआत 30 नवंबर 2006 को पहली चार्जशीट दायर होने से हुई और करीब 9 साल बाद 11 सितंबर 2015 को अदालत का अंतिम फैसला आया। इस दौरान 192 गवाहों के बयान दर्ज किए गए, जिनमें चश्मदीद, डॉक्टर, फॉरेंसिक एक्सपर्ट, ATS अधिकारी और पंच गवाह शामिल थे। कोर्ट के सामने पोस्टमार्टम रिपोर्ट्स, फॉरेंसिक रिपोर्ट्स, पंचनामा और मकोका के तहत दर्ज कबूलनामे जैसे कई अहम सबूत पेश किए गए।

अभियोजन पक्ष का कहना था कि यह पूरी साजिश पाकिस्तान में रची गई थी। उनके अनुसार लश्कर-ए-तैयबा और SIMI ने मिलकर योजना बनाई थी। आरोपित पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में ट्रेनिंग लेकर भारत पहुँचे और फिर बम तैयार करने, रेलवे स्टेशनों की रेकी करने और विस्फोटकों को ट्रेनों तक पहुँचाने में लगे। बताया गया कि गोवंडी के एक कमरे में प्रेशर कुकर में RDX और अमोनियम नाइट्रेट भर कर बम बनाए गए और चर्चगेट से रवाना होने वाली सात ट्रेनों में रखे गए थे।

मकोका के तहत आरोपियों के दिए गए कबूलनामों को अदालत ने स्वीकार किया। हालाँकि इनमें से कई बयान बाद में वापस ले लिए गए। कोर्ट ने सबूतों का गहराई से विश्लेषण किया और यह भी माना कि प्रेशर कुकर की खरीद, यात्रा विवरण और घटनास्थल की रेकी जैसी बातें अभियुक्तों को इस साजिश से जोड़ती हैं।

फैसले में कोर्ट ने कमरुद्दीन अंसारी, एहतेशाम सिद्दीकी, फैसल शेख, जीशान सिद्दीकी, सोहेल शेख, आसिफ खान, साजिद अंसारी, माजिद शफी, मुज़म्मिल शेख, तनवीर अंसारी, नवीन खान और शरीफ खान सहित 12 आरोपितों को दोषी करार दिया। वहीं एक आरोपी, अब्दुल वहीद शेख को पर्याप्त सबूत न होने के कारण बरी कर दिया।

इनमें से 5 दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई और बाकी 7 को उम्रकैद दी गई। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह हमला केवल आम नागरिकों पर नहीं बल्कि भारत की संप्रभुता पर भी सीधा हमला था। इसे एक सटीक, योजनाबद्ध और आतंकवादी कार्रवाई बताया गया, जिसमें सभी दोषियों की सीधी और सक्रिय भूमिका थी।

दोष सिद्ध होने के बाद दायर अपील, कानूनी लड़ाई और बरी

2015 के फैसले के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट में कई अपीलें दायर की गईं। एक दशक बाद 21 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने 12 आरोपितों की 2015 की सजा को पलट दिया। डिवीजन बेंच ने सभी आरोपितों को बरी कर दिया।

यह फैसला ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड की दोबारा समीक्षा करने के बाद दिया गया। इसमें गवाहों की गवाही, फॉरेंसिक रिपोर्ट्स, कबूलनामे और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन की जाँच शामिल थी। अभियोजन का केस ज्यादातर उन कबूलनामों पर आधारित था जो आरोपितों से महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) की धारा 18 के तहत लिए गए थे।

यह कानून पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामों को कोर्ट में मान्यता देता है। लेकिन हाई कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ कबूलनामों के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती और इस केस में कोई पुख्ता सबूत मौजूद नहीं थे। कोर्ट ने कबूलनामों की सच्चाई (authenticity) पर शक जताया।

कोर्ट ने पाया कि कई आरोपितों के कबूलनामों में समानता थी। उदाहरण के तौर पर नामों की क्रमबद्धता और घटनाओं का वर्णन बिल्कुल एक जैसा था। कोर्ट ने कहा कि यह समझ से परे है कि अलग-अलग लोग बिल्कुल एक जैसे शब्दों में एक ही बात कहें। कोर्ट को यह भी शक हुआ कि कई हिस्से नकल किए गए हो सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि पुख्ता सबूत के बिना सिर्फ पुलिस हिरासत में दिए गए ऐसे कबूलनामों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए सभी 12 आरोपितों को बरी कर दिया गया।

अभियोजन पक्ष ने यह दावा किया कि आरोपितों की निशानदेही पर प्रेशर कुकर, अमोनियम नाइट्रेट, टाइमर, सिम कार्ड्स और अन्य सामग्री बरामद की गई थी। लेकिन कोर्ट ने पाया कि इन वस्तुओं का उन विस्फोटों में इस्तेमाल हुए उपकरणों से कोई ठोस संबंध साबित नहीं हुआ।

कुछ मामलों में ये सामान ऐसे स्थानों से मिला, जहाँ तक लोग आसानी से पहुँच सकते थे। इससे इनकी प्रामाणिकता और कमजोर हो गई। फॉरेंसिक रिपोर्ट्स भी इन बरामदगी और असली धमाकों में इस्तेमाल हुई सामग्री के बीच कोई सीधा संबंध नहीं दिखा सकी।

फैसले में अदालत ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि आरोपित सीधे तौर पर इस अपराध से जुड़े थे। यह टिप्पणी खासतौर पर उस स्थिति में की गई जब अभियोजन पक्ष आरोपितों की कॉल डाटा रिकॉर्ड (CDR) पेश नहीं कर सका।

जाँच एजेंसियों ने कोर्ट को बताया कि जिन मोबाइल फोन की कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDRs) की बात हो रही थी, वे आरोपितों के नाम पर नहीं थे। इसलिए CDRs को सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया गया। बचाव पक्ष ने CDRs की माँग की, लेकिन उन्हें यह जानकारी समय पर नहीं दी गई। जब कोर्ट ने इसकी अनुमति दी तब तक CDRs को सुरक्षित रखने की समय सीमा खत्म हो चुकी थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का जो दावा किया गया था, खासकर आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मामलों में, उसके लिए ठोस और मजबूत सबूत होना जरूरी है। कोर्ट ने माना कि अगर यह मान भी लिया जाए कि आरोपित पाकिस्तान गए थे, तो भी इस बात का कोई सबूत नहीं था कि वहाँ की गई कथित ट्रेनिंग का 7/11 मुंबई बम धमाकों से कोई सीधा संबंध था।

कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ विदेश यात्रा या ट्रेनिंग से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि उनका सीधा संबंध धमाकों से था। चूँकि अभियोजन पक्ष अन्य बिंदुओं पर भी आरोप साबित करने में असफल रहा, इसलिए पाकिस्तान यात्रा से सिर्फ साबित नहीं किया जा सकता कि विस्फोट इनलोगों ने किया।

मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष के कई गवाहों को कोर्ट ने ‘hostile witness’  घोषित किया। कुछ गवाहों की गवाही, भले ही दर्ज की गई थी, लेकिन उनके पास कोई ठोस सबूत या कानूनी आधार नहीं था, जिससे अभियोजन का केस मजबूत नहीं हो पाया। कोर्ट ने कई गवाहों की बातों को अविश्वसनीय माना।

उदाहरण के तौर पर, गवाह संख्या PW-59 आलम गुलाम कुरैशी ने अपनी गवाही में कहा कि आरोपित नंबर 3 मोहम्मद फैसल शेख ने उसे बताया था कि वह एक जिहादी है और पाकिस्तान जाकर लश्कर-ए-तैयबा से हथियारों की ट्रेनिंग ली है।

यह बात बहुत गंभीर थी, लेकिन इसके बावजूद गवाह ने तुरंत पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी और अक्टूबर 2006 में इसका खुलासा होने तक किसी और को भी इसके बारे में कुछ नहीं बताया।

जब यह साफ था कि आरोपित बम धमाकों के केस में गिरफ्तार हो चुका था, तब भी गवाह ने इतनी अहम जानकारी इतने लंबे समय तक छुपाए रखी। कोर्ट ने कहा कि इतनी देर से किए गए इस खुलासे के कारण गवाह PW-59 की गवाही पूरी तरह अविश्वसनीय हो जाती है और इसलिए उसे खारिज किया जाता है।

भारतीय कानून के अनुसार, अगर परिस्थितिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence) की श्रृंखला मजबूत, स्पष्ट और एक जैसी हो, तो सिर्फ उन्हीं के आधार पर दोष सिद्ध किया जा सकता है। हालाँकि इस मामले में हाई कोर्ट ने उस रास्ते को अपनाने से इनकार कर दिया।

अभियोजन पक्ष ने कई ऐसे परिस्थितिजन्य सबूत पेश किए थे जिन्हें वह एक मजबूत पैटर्न मान रहा था और जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने भी सही माना था। लेकिन हाई कोर्ट को यह नहीं लगा कि ये सबूत कानूनी रूप से आरोपितों को अपराध से जोड़ते हैं।

जजों ने यह नहीं कहा कि अपराध नहीं हुआ और न ही इस बात को नजरअंदाज किया कि साजिश हुई थी। लेकिन उन्होंने यह कहा कि अपराध साबित करने का जो कानूनी मापदंड है, वह इस मामले में पूरा नहीं हुआ। इसी कारण मुंबई में हुए एक सबसे भयावह आतंकी हमले के लिए पहले दोषी ठहराए गए 12 लोगों को अब बरी कर दिया गया है।

प्रॉसिक्यूशन ने भले ही एक विस्तृत केस तैयार किया था, लेकिन हाई कोर्ट ने पाया कि वह सबूत अदालत में स्वीकार्य होने के मानदंडों पर खरे नहीं उतरे। आरोपित इसलिए बरी नहीं हुए क्योंकि अपराध नहीं हुआ, बल्कि इसलिए क्योंकि प्रॉसिक्यूशन उन्हें कानून की सख्ती के साथ अपराध से नहीं जोड़ पाया।

मूल रुप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इसे सौम्या सिंह ने अनुवाद किया है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।