Tuesday, March 10, 2026
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जो खुली सीमा मणिपुर में हिंसा की जिम्मेदार, जिससे ड्रग्स तस्करी का बना अड्डा; उसकी बाड़बंदी का क्यों विरोध कर रहे नागा-कुकी संगठन: ₹20000 करोड़ खर्च कर म्यांमार सीमा को सील कर रही भारत सरकार

मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों के सीमावर्ती समुदाय इस योजना का विरोध कर रहे हैं। कुकी समुदायों के प्रमुख संगठनों का कहना है कि ये दोनों कदम उनकी पारंपरिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

देश की सीमा की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। भारत ने म्यांमार के साथ लगने वाली 1,643 किलोमीटर लंबी खुली और असुरक्षित सीमा पर बाड़ (फेंसिंग) लगाने का बड़ा फैसला लिया है। यह काम बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (BRO) द्वारा अगले दस सालों में कई चरणों में पूरा किया जाएगा।

इस परियोजना में लगभग 20,000 करोड़ सिर्फ बाड़ लगाने पर खर्च होंगे। इसके अलावा 11,000 करोड़ से ज्यादा की लागत से 60 से अधिक बॉर्डर सड़कों का निर्माण भी किया जाएगा। इस परियोजना के तहत 1,500 किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा पर बाड़ लगाई जाएगी, जिसमें से 300 किलोमीटर हिस्से में इलेक्ट्रिक फेंसिंग भी होगी।

इसका मुख्य उद्देश्य भारत-म्यांमार सीमा पर सुरक्षा को मजबूत करना और खासतौर पर पूर्वोत्तर के संवेदनशील क्षेत्रों में स्थिति को नियंत्रित करना है। यह कदम मणिपुर में लंबे समय से चल रही जातीय हिंसा को देखते हुए उठाया गया है। कुकी-जो और मैतेई समुदायों के बीच हिंसा में अब तक 250 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और हालात सामान्य नहीं हुए हैं।

हिंसा के कारण राज्य में अब तक 60,000 से अधिक लोग आंतरिक रूप से बेघर हो चुके हैं। वहीं, राज्य से लगभग 6,000 हथियार लूटे गए, जिनमें से आधे से भी कम अब तक बरामद हो पाए हैं। इसके अलावा, फरवरी 2021 में म्यांमार में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद वहाँ सेना और विद्रोही गुटों के बीच चल रही लड़ाई के कारण 31,000 से अधिक लोग सीमा पार करके भारत में शरण ले चुके हैं।

म्यांमार में जारी अस्थिरता के कारण भारत-म्यांमार सीमा पर हालात और बिगड़ते जा रहे हैं। हाल के छह-सात महीनों में सीमा पर करीब 1,125 करोड़ रुपए की ड्रग्स जब्त की गई हैं। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि तस्करी, मानव तस्करी और सशस्त्र घुसपैठ के मामलों में तेजी आई है।

इसी के चलते भारत सरकार सीमा पर बाड़ लगाने और फ्री मूवमेंट रेजीम (FMR) को खत्म करने की योजना पर काम कर रही है। FMR के तहत भारत और म्यांमार के सीमावर्ती लोग बिना वीजा के 16 किलोमीटर तक एक-दूसरे के देश में जा सकते थे।

इसे लेकर मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों के सीमावर्ती समुदायों ने इस योजना का विरोध किया है। कुकी समुदायों के प्रमुख संगठनों का कहना है कि ये दोनों कदम उनकी पारंपरिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।

विरोध करने वालों का मानना है कि फेंसिंग से उन समुदायों को नुकसान होगा जिनके पारिवारिक, जातीय और सांस्कृतिक रिश्ते सीमा के दोनों ओर बसे लोगों से जुड़े हैं। इससे आपसी व्यापार, संपर्क और सामाजिक संबंधों पर भी असर पड़ सकता है। हालाँकि सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि इस फेंसिंग का मकसद आम नागरिकों की आवाजाही रोकना या रिश्ते तोड़ना नहीं है।

उन्होंने बताया कि योजना के तहत बाड़ पर बायोमेट्रिक सिस्टम से लैस गेट लगाए जाएँगे, जिससे स्थानीय लोग तय प्रक्रिया के तहत आ-जा सकें। ये गेट स्थानीय समुदायों के साथ बातचीत कर स्थापित किए जाएँगे, ताकि सुरक्षा और सांस्कृतिक संबंध दोनों बने रहें।

भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़ लगाने का मुख्य उद्देश्य हथियारबंद समूहों की आवाजाही पर रोक लगाना, हथियारों, ड्रग्स, मानव तस्करी और अवैध घुसपैठ को रोकना है। एक सरकारी सूत्र के अनुसार, मणिपुर के मोरेह इलाके में 10 किलोमीटर लंबी बाड़ का निर्माण सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है।

इसे सुरक्षा बढ़ाने और व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में एक प्रभावी कदम बताया जा रहा है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि यह पहल वैध व्यापार गतिविधियों को भी आसान बनाएगी और इससे स्थानीय लोगों को तो आर्थिक लाभ मिलेगा ही साथ ही अवैध व्यापार पर भी रोक लगेगी।

हालाँकि इस परियोजना का नागा संगठनों द्वारा विरोध किया जा रहा है। मणिपुर के कई प्रमुख नागा संगठन जैसे यूनाइटेड नागा काउंसिल, ऑल नागा स्टूडेंट्स एसोसिएशन, नागा वूमेन यूनियन और नागा पीपल्स मूवमेंट फॉर ह्यूमन राइट्स साउथ ने राज्यपाल के माध्यम इसके खिलाफ गृह सचिव अजय कुमार भल्ला को एक याचिका सौंपी है।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से अपील की है कि इस सीमा बाड़बंदी को तुरंत रोका जाए और FMR को 20 दिनों के भीतर फिर से लागू किया जाए।

इन नागा संगठनों ने इस फैसले के विरोध में कई तरह के आंदोलन शुरू किए हैं। इसमें नागा-बहुल इलाकों में सरकारी दफ्तरों का घेराव और जिला स्तर पर रैलियाँ शामिल हैं। वे FMR को खत्म करने और सीमा पर बाड़ लगाने के खिलाफ कड़ा विरोध जता रहे हैं।

इससे पहले भी इस सीमा क्षेत्र में तनाव देखने को मिला है। जुलाई 2023 में हथियारबंद उग्रवादियों ने कुछ इमारतों को आग के हवाले कर दिया था। इसके बाद पुलिस ने स्थिति को नियंत्रण में लिया। लेकिन इसके कुछ समय बाद कुकी उग्रवादी वहाँ पहुँचे और उन्होंने गोलीबारी शुरू कर दी थी।

यह घटना लूटपाट और आगजनी से जुड़ी थी, जिसमें कई निजी घरों को जला दिया गया था। एक पत्रकार का घर भी आग के हवाले कर दिया गया था। ऐसा बताया गया कि यह इलाका कथित तौर पर उन मैतेई (Meitei) समुदाय के लोगों को दिया गया था जो पहले हुई हिंसा की वजह से वहाँ से भाग गए थे।

ऐसा संदेह है कि यह हमला पड़ोसी देश म्यांमार (पहले बर्मा) से किया गया था। मामले की जाँच शुरू की गई और 4 से 5 लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, 700 से ज्यादा अवैध प्रवासी म्यांमार से भारत में घुसे हैं। असम राइफल्स ने चंदेल और मणिपुर पुलिस को इसकी जानकारी दी है।

वरिष्ठ पत्रकार वासबीर हुसैन ने जानकारी देते हुए बताया कि मणिपुर सरकार ने असम राइफल्स को इन 718 नए अवैध प्रवासियों को वापस भेजने (Deport) का आदेश दिया है। उन्होंने आगे बताया, “मोरेह के दूसरी तरफ़ बर्मा का तामू शहर है जो भारत-म्यांमार मैत्री पुल से जुड़ा है और जहाँ भारतीय और म्यांमार के लोग लगभग 10 से 20 किलोमीटर की दूरी से आ-जा सकते हैं। इसके लिए किसी दस्तावेज़ की ज़रूरत नहीं है। बस गेट पर एंट्री करनी होती है। आपको तामू के अंदर जाने और वापस आने की इजाज़त है। सीमावर्ती शहर की यही स्थिति है।”

बता दें कि मोरेह मणिपुर का एक सीमावर्ती शहर है, वहाँ कुकी और मैतेई समुदाय के लोगों के अलावा बड़ी संख्या में तमिल, मलयाली, हिंदू, बौद्ध भी रहते हैं। हाल ही में हुई हिंसा की पहली लहर में मीतैई समुदाय पर हमले हुए, जिससे उन्हें शहर छोड़कर इंफाल घाटी के राहत शिविरों में जाना पड़ा। इसके साथ ही म्यांमार से लगी कुछ पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाएँ खासकर मिजोरम, अब ड्रग्स की तस्करी के लिए एक बड़े रास्ते के रूप में उभर रही हैं।

मिजोरम के जरिए याबा टैबलेट्स (यह मेथामफेटामिन या मेथ नामक नशीली दवा होती है) और अन्य सिंथेटिक ड्रग्स भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्रों तक पहुँचाई जा रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, इन नशीली दवाओं की तस्करी से म्यांमार के कुछ आतंकी गुटों को भी फायदा पहुँच रहा है।

इस गंभीर समस्या को देखते हुए, मिजोरम की कई स्वयंसेवी संस्थाओं (NGOs) ने म्यांमार के साथ लगी सीमा पर एक लंबी बाड़ लगाने की माँग की है। दरअसल फरवरी से मार्च 2025 के बीच ड्रग्स की 1,36,526 अमेरिकी डॉलर (लगभग 1.1 करोड़ रुपये) की खेप जब्त की गई थी, जिससे इस खतरे की गंभीरता और बढ़ गई है।

मूल रुप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में चंद्रानी दास ने लिखी है। इसे सौम्या सिंह ने अनुवाद किया है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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Chandrani Das
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