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आम लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने में दूसरे नंबर पर पहुँचा भारत… 1 दशक में लगाई 45% फीसदी की छलांग: 2015 में था सिर्फ 19 फीसदी, 2025 में आँकड़ा 64.3% हुआ

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की विश्व सामाजिक सुरक्षा रिपोर्ट में भारत के लिए एक खुशखबरी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा देने में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। आँकड़े कहते हैं कि भारत में 94 करोड़ से भी अधिक लोगों को सामाजिक सुरक्षा दे रहा है। 2015 में ये 19% था जो अब 2025 में 64.3% हो गया है यानी 10 वर्षों में ये आँकड़ा 45% तक बढ़ा है।

केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया ने इस रिपोर्ट पर कहा कि भारत की सामाजिक सुरक्षा कवरेज में हुई यह वृद्धि दुनिया में सबसे तेज विस्तार है। लाखों ऐसे लोग हैं जो विभिन्न खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाओं का लाभ ले रहे हैं। ये सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हमारा लक्ष्य समाज के आखिरी व्यक्ति तक सशक्तिकरण लाना है।

जिनेवा में अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के 113वें सत्र में ILO के महानिदेशक गिल्बर्ट एफ होंगबो के साथ केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री मनसुख मंडाविया ने बातचीत की। इस दौरान उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने पिछले 11 वर्षों में गरीबों और मजदूरों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ लाईं हैं।

ILO श्रम अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी है। ये समय-समय पर अपने 187 सदस्य देशों के बीच सामाजिक सुरक्षा कवरेज का मूल्यांकन करती है। इसके तहत 9 श्रेणियों में आँकड़े लागू किए जाते हैं।

इनमें बेरोजगारी भत्ता, परिवार और बाल लाभ, स्वास्थ्य सुरक्षा, वृद्धावस्था पेंशन, रोजगार संबंधी चोट का लाभ, मातृत्व लाभ, दिव्यांगता लाभ, आय बदलने के जरिए बिमारी का लाभ और सर्वाइवर बेनेफिट शामिल होते हैं।

ILO की मान्यता प्राप्त करने के लिए किसी भी देश की सामाजिक सुरक्षा योजना को कानूनी तौर पर समर्थित, सक्रिय रूप से लागू और पिछले तीन वर्षों के सत्यापित आँकड़ों के साथ प्रस्तुत किया जाना जरूरी होता है।

भारत की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली में विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रमों के माध्यम से काफी विस्तार हुआ है। इसका लक्ष्य लाखों लोगों को वित्तीय सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और खाद्य सहायता पहुँचाना है।

इन कार्यक्रमों ने देश भर में आजीविका में सुधार और गरीबी को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें आयुष्मान भारत, ई-श्रम पोर्टल, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, अटल पेंशन योजना समेत अन्य योजनाएं शामिल हैं।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का 48.8% का आँकलन भारत के सामाजिक सुरक्षा परिदृश्य के लिहाज से अभी अधूरा है। रिपोर्ट के अनुसार, ये डेटा अभी पूलिंग अभ्यास का पहला चरण है। इसमें 8 राज्यों के केंद्रीय और महिला-केंद्रित योजनाओं के लाभार्थियों के आँकड़ें शामिल किए गए हैं। दूसरे चरण के पूरा होने के बाद भारत की कुल सामाजिक सुरक्षा कवरेज 100 करोड़ से अधिक तक पहुँच सकती है।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने सामाजिक सुरक्षा कवरेज का व्यापक मूल्यांकन करने के लिए 19 मार्च 2025 को भारत के सामाजिक सुरक्षा डेटा पूलिंग अभ्यास के पहले चरण की शुरुआत की है। इस पहल का उद्देश्य भारत की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के डेटा को इकट्ठा करना है।

पहले चरण में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और गुजरात सहित दस राज्यों को केंद्रीय स्तर पर डेटा एकत्र करने के लिए चुना गया है।

सामाजिक सुरक्षा कवरेज के आँकड़ों को 2025 में अपडेट करने वाला भारत दुनिया का पहला देश भी है। केंद्रीय मंत्री का कहना है कि इससे डिजिटाइजेशन और लोगों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की प्रणाली में पारदर्शिता मजबूत हुई है।

साउथ दिल्ली से धरे गए 134 बांग्लादेशी, 38 औरतें-43 बच्चे साथ में: अवैध रूप से रहने वाले सब होंगे डिपोर्ट, ‘ऑपरेशन पुश बैक’ तेज

दिल्ली पुलिस की दक्षिणी जिला टीमों ने शहर में 14 अलग-अलग अभियान चलाकर 134 बांग्लादेशी नागरिकों को डिपोर्टेशन के लिए भेजा है। इनमें 38 महिलाएँ और 43 बच्चे भी शामिल हैं। दक्षिणी जिले की कई टीमें झुग्गी-झोपड़ियों और संदिग्ध इलाकों का दौरा कर रही हैं, जहाँ वे संदिग्ध बांग्लादेशी अप्रवासियों की पहचान के लिए वोटर ID और आधार कार्ड की जाँच कर रही हैं।

क्या है ‘ऑपरेशन पुश बैक’?

दिल्ली पुलिस ने दक्षिणी दिल्ली में एक बड़ी कार्रवाई करते हुए पिछले लगभग पाँच महीनों में 134 बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया है। दक्षिणी जिला पुलिस उपायुक्त (DCP) अंकित चौहान ने बुधवार (11 जून 2025) को इसकी जानकारी दी।

DCP के मुताबिक, यह ऑपरेशन 27 दिसंबर 2024 से 10 जून 2025 के बीच चलाया गया। इस दौरान विभिन्न इलाकों में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की गई और उन्हें डिपोर्ट (देश निकाला) किया गया।

सत्यापन अभियान और रणनीति

पुलिस टीमों ने दक्षिणी जिले के संवेदनशील इलाकों में सघन सत्यापन अभियान चलाया इस दौरान आधार कार्ड, वोटर आईडी और अन्य दस्तावेजों की बारीकी से जाँच की गई।

DCP चौहान के अनुसार, यह कार्रवाई एक बड़ी रणनीति का हिस्सा थी, जिसका मुख्य मकसद दिल्ली में गैरकानूनी रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान करना और उन पर कार्रवाई करना था।

दर्ज किए गए मामले और गिरफ़्तारियाँ

इन अभियानों के दौरान कई मामलों में भारतीय दंड संहिता (BNS), विदेशी नागरिक अधिनियम, शस्त्र अधिनियम और आधार अधिनियम के तहत केस दर्ज किए गए हैं। गिरफ़्तारियाँ संगम विहार, फतेहपुर बेरी, लोधी कॉलोनी और मैदानगढ़ी जैसे इलाकों के थानों के अंतर्गत की गईं।

संगम विहार में पाँच बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है। फतेहपुर बेरी में दो बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए है। लोधी कॉलोनी में एक केस में दो बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए। मैदानगढ़ी में एक बांग्लादेशी नागरिक को अवैध हथियार के साथ गिरफ्तार किया गया।

आगे क्या?

पुलिस ने बताया कि अभी और भी ऐसे विदेशी नागरिकों की पहचान की जा रही है, जो अवैध रूप से दक्षिणी दिल्ली में रह रहे हैं। ऐसे नागरिकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

मुस्लिमों ने किया शिव मंदिर की जमीन पर अतिक्रमण, हिन्दुओं ने किया विरोध तो भीड़ हुई हमलावर: पत्थर बरसाए-गाड़ियाँ जलाईं, पश्चिम बंगाल की घटना

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना में भीड़ ने एक हिन्दू मंदिर पर हमला किया। उन्होंने हिन्दुओं और पुलिस पर जम कर पत्थर बरसाए। भीड़ ने शिव मंदिर में भी तोड़फोड़ की। पथराव में हिन्दुओं समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं।

यह घटना मंगलवार (10 जून, 2025) को हुई। घटना तब शुरू हुई जब हिंदू समुदाय के लोगों ने शिव मंदिर की जमीन पर हो रहे अतिक्रमण का विरोध किया। इसके बाद मुस्लिम भड़क गए। भीड़ ने इसके बाद शिव मंदिर में तोड़फोड़ कर दी।

मामला बिगड़ते ही हिंसा फैल गई और भीड़ ने पुलिस पर पत्थर और ईंटें फेंकनी शुरु कर दी। इसके अलावा, इलाके में कई दुकानें और वाहन भी तोड़ दिए गए। इस पथराव में पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हो गए है।

यह घटना दक्षिण 24 परगना के बज-बज इलाके में, रवींद्र नगर पुलिस स्टेशन के पास महेशतला में हुई। हाल ही में वहाँ के हिंदू लोगों ने देखा कि एक पुराने शिव मंदिर के परिसर में मौजूद तालाब को मिट्टी से भरकर धीरे-धीरे कब्जा किया जा रहा है।

लोगों ने इस अतिक्रमण की शिकायत अधिकारियों से की थी, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हुई। मंगलवार को बज-बज इलाके में कुछ मुसलमानों ने शिव मंदिर की जमीन पर फलों की दुकानें लगाने की कोशिश की।

यह देखकर हिंदू समुदाय के लोगों ने उन्हें रोका। इसी बात पर दोनों पक्षों के बीच विवाद शुरू हुआ, जो जल्दी ही झड़प में बदल गया और हिंसा हो गई। इसके बाद मुस्लिम भीड़ ने मंदिर में तोड़फोड़ की और उस पर पत्थर व ईंटें फेंकी। जब पुलिस मौके पर पहुँची तो भीड़ ने उन पर भी हमला कर दिया।

इसके बाद हालात और बिगड़ गए। पूरा इलाका पत्थरों, ईंटों और टूटी हुई चीजों से भर गया, जैसे वहाँ कोई बड़ी तबाही हुई हो। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी के अनुसार, भीड़ ने सिर्फ मंदिर ही नहीं, बल्कि पवित्र तुलसी मंच, आसपास की हिंदू दुकानों और घरों पर भी हमला किया। मंदिर पर पत्थर और ईंटें फेंकी गईं, जिससे वहाँ मौजूद कई चीजों को नुकसान पहुँचा।

भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि यह घटना रवींद्र नगर पुलिस स्टेशन से थोड़ी ही दूरी पर हुई, लेकिन पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि पूरी घटना पुलिस की मौजूदगी में हुई, लेकिन वों उन उपद्रवियों को रोक नहीं पाए।

सुवेंदु अधिकारी ने एक वीडियो भी पोस्ट किया, जिसमें भारी भीड़ को बवाल करते हुए देखा जा सकता है। वीडियो में टूटा हुआ मंदिर और उसके सामने सड़क के दूसरी तरफ पुलिस स्टेशन भी साफ दिखाई दे रहा  है। साथ ही वीडियो में एक स्थानीय हिंदू ने बताया कि भीड़ ने उन्हे मंदिर बंद करने को कहा, लेकिन उन्होंने कहा कि मंदिर खुला रहेगा।

भीड़ ने पुलिस पर पत्थर और ईंटें फेंकी और सड़क पर खड़ी कई गाड़ियों को नुकसान पहुँचाया। आसपास की दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई। एक पुलिसकर्मी की बाइक को आग लगा दी गई और कई पुलिस वाहनों को भी नुकसान पहुँचाया गया।

एक पुलिसकर्मी ने बताया कि शुरुआत में भीड़ कम थी, इसलिए वे तुरंत कुछ नहीं कर पाए। पत्थरबाजी में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए, जिनमें एक महिला कॉन्स्टेबल भी शामिल है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पास की इमारतों की छतों से भी पुलिस पर पत्थर और ईंटें फेंकी गईं।

पुलिस ने हालात काबू में करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और मौके पर अतिरिक्त पुलिस बल और आरएएफ भेजा गया। लेकिन भीड़ शांत नहीं हुई और लगातार पुलिस पर हमला करती रही। हालात बिगड़ते देख पुलिस को कुछ समय के लिए पीछे हटना पड़ा।

बाद में और पुलिस बल पहुँची, तब जाकर हालत पर काबू पाया जा सका। हालाँकि, अब भी कुछ जगहों पर पत्थरबाजी हो रही है। मौके पर पहुँची पुलिस की गाड़ियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। कोलकाता से बड़ी संख्या में पुलिस बल भेजा जा रहा है ताकि हालात पूरी तरह से काबू पाया जा सकें।

कौशांबी में चुनावी रंजिश के चलते बुना गया ‘रेप’ का मामला, आरोपित के पिता ने दी जान तब बेगुनाह निकला सिद्धार्थ: जानें – कैसे एक थप्पड़ की वजह से बर्बाद हो गया पूरा परिवार

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के लोहंदा गाँव में एक फर्जी रेप केस ने एक परिवार को तबाह कर दिया। चुनावी रंजिश के चलते ग्राम प्रधान ने साजिश रची, जिसके कारण एक बेगुनाह युवक जेल गया और उसके पिता ने आत्महत्या कर ली। बाद में जाँच में रेप का आरोप झूठा निकला और युवक को जमानत पर रिहा कर दिया गया।

हालाँकि वो अपने पिता की अंतिम यात्रा तक में शामिल नहीं हो पाया। नाबालिग के कथित रेप से जुड़ा ये मामला पिछले कई दिनों से चर्चा में है, जो ग्राम प्रधान की साजिश, पुलिस की लापरवाही और ब्लैकमेलिंग की करतूतों से जुड़ा पाया गया।

मामला शुरू कैसे हुआ?

27 मई 2025 को सैनी कोतवाली में एक 8 साल की बच्ची के साथ रेप की शिकायत दर्ज की गई। शिकायत में धन्नू उर्फ सिद्धार्थ तिवारी को आरोपित बनाया गया। पुलिस ने 28 मई को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (रेप) और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया। अगले ही दिन, 29 मई को सिद्धार्थ को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

सिद्धार्थ के पिता रामबाबू तिवारी शुरू से चिल्लाते रहे कि उनका बेटा निर्दोष है। उनका कहना था कि गाँव के ग्राम प्रधान भूप नारायण पाल ने पुरानी चुनावी रंजिश के चलते उनके बेटे को फर्जी केस में फँसाया है। रामबाबू ने पुलिस, स्थानीय अफसरों और कोर्ट तक में गुहार लगाई, लेकिन उनकी एक न सुनी गई।

पिता ने की आत्महत्या

न्याय न मिलने से टूट चुके रामबाबू ने 4 जून 2025 को सैनी कोतवाली के सामने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। मरने से पहले उन्होंने अपने शरीर पर एक सुसाइड नोट लिखा, जिसमें ग्राम प्रधान भूप नारायण पाल और उनके भाई वीरेंद्र पाल को बेटे को फँसाने और अपनी मौत का जिम्मेदार बताया। इस नोट में उन्होंने साफ लिखा कि प्रधान ने पुलिस से साँठगाँठ कर सिद्धार्थ को झूठे केस में फँसाया।

रामबाबू की मौत ने पूरे गाँव में हंगामा मचा दिया। उनके बेटे अक्षय तिवारी ने प्रधान, उसके भाई और तीन अन्य लोगों के खिलाफ जहर देकर हत्या का मुकदमा दर्ज कराया। पुलिस ने इस मामले में वीरेंद्र पाल और एक अन्य आरोपित को गिरफ्तार कर जेल भेजा, लेकिन भूप नारायण और दो अन्य लोग फरार हो गए।

रेप का आरोप निकला झूठा

रामबाबू की आत्महत्या के बाद मामले ने तूल पकड़ा। कौशांबी के पुलिस अधीक्षक (SP) राजेश कुमार ने तुरंत एक विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया। SIT ने बच्ची, चश्मदीदों और गाँव वालों के बयान लिए। 8 जून 2025 को बच्ची ने धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया कि उसके साथ कोई रेप नहीं हुआ था।

बच्ची ने बताया कि वह सिद्धार्थ के घर के पास रामायण सुनने गई थी। वहाँ कुछ बच्चे टिन शेड पर पत्थर फेंक रहे थे। सिद्धार्थ ने गुस्से में उसे एक थप्पड़ मारा। बच्ची रोते हुए घर गई और अपनी माँ को बताया। माँ ने गुस्से में रेप की झूठी कहानी बनाई और बच्ची को झूठ बोलने के लिए उकसाया।

SIT ने पाया कि यह पूरा मामला ग्राम प्रधान भूप नारायण पाल और रामबाबू के बीच पुरानी चुनावी रंजिश का नतीजा था। प्रधान ने पुलिस से मिलीभगत कर सिद्धार्थ को फँसाने की साजिश रची। जाँच में सिद्धार्थ को क्लीन चिट मिली। पुलिस ने रेप (धारा 376) और पॉक्सो एक्ट की धाराएँ हटा दीं। इसके बाद सिद्धार्थ के वकील अविनाश कुमार त्रिपाठी ने ACJM कोर्ट में जमानत याचिका दायर की। 9 जून 2025 को कोर्ट ने सिद्धार्थ को जमानत दी और उसी शाम उसे जेल से रिहा कर दिया गया। वह 11 दिन जेल में रहा।

ब्लैकमेलिंग और 20 लाख की उगाही का आरोप

खुद को हाईकोर्ट का वकील बताने वाले रामबाबू के भतीजे आशीष तिवारी ने दावा किया कि ग्राम प्रधान और उनके भाई ने सिद्धार्थ को फर्जी केस में फँसाया। आशीष के मुताबिक, प्रधान ने मामले को रफा-दफा करने के लिए 20 लाख रुपये की माँग की थी। जब परिवार ने पैसे देने से मना किया, तो रामबाबू को जहर देकर मार डाला गया। सुसाइड नोट में भी रामबाबू ने प्रधान को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया था। पुलिस ने इस दावे की जाँच शुरू की, लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है।

लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों पर भी गिरी गाज

SIT की जाँच में पुलिस की बड़ी लापरवाही सामने आई। अगर शुरू में धारा 164 के बयान की ठीक से जाँच की गई होती, तो शायद रामबाबू की जान बच सकती थी। हालाँकि सरकार ने इस मामले में कड़े कदम उठाते हुए पुलिसकर्मियों पर गंभीर कार्रवाई की।

इसी क्रम में सरकार ने सैनी कोतवाली के इंस्पेक्टर बृजेश करवरिया को लाइन हाजिर कर दिया, तो पथरावाँ चौकी प्रभारी आलोक राय और मामले के जाँचकर्ता (IO – Investigation Officer) कृष्ण स्वरूप को निलंबित कर दिया गया। SP राजेश कुमार ने कहा कि पुलिस की भूमिका की भी जाँच की जा रही है। कड़ाधाम थाना प्रभारी धीरेंद्र कुमार को मामले की आगे की जाँच सौंपी गई।

आरोपित ग्राम प्रधान फरार, इनाम घोषित

ग्राम प्रधान भूप नारायण पाल और उनके दो साथी अभी भी फरार हैं। पुलिस को उनकी लोकेशन हरियाणा में मिली है। SP राजेश कुमार ने प्रधान की गिरफ्तारी के लिए 25,000 रुपये का इनाम घोषित किया है। एक पुलिस टीम हरियाणा में छापेमारी कर रही है। गाँव में प्रधान के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा है। लोग उसे जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की माँग कर रहे हैं।

रामबाबू की आत्महत्या और सिद्धार्थ के जेल जाने से तिवारी परिवार पूरी तरह टूट गया। रामबाबू की पत्नी और बेटों का रो-रोकर बुरा हाल है। गाँव वाले भी इस घटना से सदमे में हैं। यह मामला न सिर्फ चुनावी रंजिश की गंदी राजनीति को उजागर करता है, बल्कि पुलिस और प्रशासन की लापरवाही पर भी सवाल उठाता है। अगर पुलिस ने शुरू में निष्पक्ष जाँच की होती, तो एक बाप की जान बच सकती थी।

यह घटना बताती है कि कैसे व्यक्तिगत दुश्मनी और सिस्टम की खामियाँ मिलकर एक परिवार को तबाह कर सकती हैं। सिद्धार्थ को 11 दिन जेल में रहना पड़ा, उसके पिता की जान चली गई, और मुख्य आरोपित अभी भी फरार है। SIT की जाँच ने सच सामने ला दिया, लेकिन रामबाबू को वापस नहीं लाया जा सकता। यह मामला पुलिस, प्रशासन और समाज के लिए सबक है कि हर आरोप की गहन और निष्पक्ष जाँच जरूरी है।

पूरी दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ी मुस्लिम आबादी, भारत समेत हिन्दुओं का जनसंख्या में कई देशों में घट रहा हिस्सा: Pew रिपोर्ट ने बताया- 10 साल में बढ़े 34 करोड़ मुस्लिम

इस्लाम विश्व में सबसे तेजी से बढ़ने वाला मजहब बन गया है। इस्लाम अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मजहबी समूह है। यह जानकारी एक हाल ही में आई रिपोर्ट ने दी है। इसमें यह भी बताया गया है कि जहाँ मुस्लिमों की संख्या बढ़ी है, तो वहीं हिन्दुओं की आबादी लगातार घट रही है।

सोमवार (9 जून 2025) को जारी प्यू रिसर्च सेंटर की ‘वैश्विक धार्मिक परिदृश्य अध्ययन’ रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 से वर्ष 2020 के बीच मुस्लिम आबादी में 34.7 करोड़ (347 मिलियन) की वृद्धि दर्ज की गई, जो सभी अन्य धर्मों की संयुक्त जनसंख्या वृद्धि से अधिक है।

इन दस सालों में जहाँ मुस्लिमों की संख्या तेजी से बढ़ी, वहीं हिंदुओं सहित अन्य प्रमुख धर्मों की आबादी में गिरावट देखी गई। यह अध्ययन वैश्विक स्तर पर धार्मिक जनसांख्यिकी में हो रहे महत्वपूर्ण बदलावों को दर्शाता है।

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पिछले 10 वर्षों में दुनिया भर में मुस्लिमों की आबादी 21% बढ़ी है, जो 1.7 अरब से बढ़कर 2 अरब हो गई। यह बढ़ोतरी बाकी दुनिया की आबादी की तुलना में दोगुनी तेज़ है, क्योंकि कुल वैश्विक आबादी इस दौरान सिर्फ 10% बढ़ी। इसी वजह से मुस्लिमों का दुनिया की आबादी में हिस्सा 24% से बढ़कर 26% हो गया है।

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अध्ययन के अनुसार, ईसाई और मुस्लिमों के बाद तीसरे नंबर पर वे लोग हैं जो किसी धर्म से नहीं जुड़े हैं। हिंदू चौथे स्थान पर हैं, जिनकी हिस्सेदारी वैश्विक आबादी में 15% है।

दुनिया के हर हिस्से में बढ़े मुस्लिम

इस शोध के अनुसार, दुनिया के सभी हिस्सों में मुस्लिम आबादी बढ़ी है, लेकिन हर जगह बढ़ोतरी का स्तर अलग रहा। 2020 तक सबसे ज्यादा बढ़ोतरी उत्तरी अमेरिका में हुई, जहाँ मुस्लिम आबादी 52% बढ़ी। इसके बाद सब अफ्रीका के सहारा क्षेत्र का नंबर आता है, जहाँ मुस्लिम आबादी 34% बढ़कर 2020 में 36.9 करोड़ (369 मिलियन) हो गई। इस क्षेत्र की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी अब 33% है।

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दुनिया के लगभग हर क्षेत्र में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है, लेकिन लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में यह वृद्धि बाकी क्षेत्रों की तुलना में कम रही। वहाँ मुस्लिम आबादी 6% बढ़ी, जबकि गैर-मुस्लिम आबादी 10% बढ़ी।

एशिया प्रशांत क्षेत्र में मुस्लिमों की कुल हिस्सेदारी 2020 में 1.4% बढ़कर 26% हो गई, लेकिन दुनिया में मुस्लिम आबादी की कुल हिस्सेदारी में इस क्षेत्र की भागीदारी 61% से घटकर 59% रह गई। प्यू की रिपोर्ट बताती है कि 2010 के बाद से अफ्रीका के मुस्लिम इलाकों में मुस्लिमों की संख्या बढ़ने लगी है।

अब दुनिया के 18% मुस्लिम इस क्षेत्र में रहते हैं, जो पहले से 2% ज्यादा है।

दुनिया के एक तिहाई मुस्लिम भारत-पाकिस्तान और इंडोनेशिया में

अध्ययन के अनुसार, दुनिया के एक तिहाई मुस्लिम सिर्फ भारत, पाकिस्तान और इंडोनेशिया में रहते हैं। 2020 में भारत में करीब 213 मिलियन (21.3 करोड़) मुस्लिम थे, जो देश की कुल आबादी का 15% हैं। इंडोनेशिया में मुस्लिमों की संख्या भारत से थोड़ी ज्यादा, करीब 240 मिलियन (24 करोड़) थी, जो दुनिया के कुल मुस्लिमों का 12% है।

दुनिया के लगभग 65% मुस्लिम केवल 10 देशों में रहते हैं। इन देशों में कुल 1.3 अरब मुस्लिम हैं। इन 10 में से 9 देशों में इस्लाम बहुसंख्यक धर्म है, सिर्फ भारत एक ऐसा देश है जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं।

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5 देश जहाँ मुस्लिम आबादी में बड़ा बदलाव आया

कजाकिस्तान, बेनिन, लेबनान, ओमान और तंजानिया जैसे पाँच देशों में मुस्लिम आबादी में बड़े बदलाव देखे गए हैं। इनमें से तीन देशों कजाकिस्तान, बेनिन और लेबनान में मुस्लिमों की संख्या बढ़ी है। कजाकिस्तान में 8.2%, बेनिन में 7.9% और लेबनान में 5.5% की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, ओमान और तंजानिया में मुस्लिम आबादी घट गई है। ओमान में 8.3% और तंजानिया में 5.5% की कमी दर्ज की गई है।

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इन पाँच देशों (कजाकिस्तान, बेनिन, लेबनान, ओमान और तंजानिया) में मुस्लिम आबादी में जो बदलाव हुए, उसका मुख्य कारण पलायन है। कुछ देशों में गैर-मुस्लिम लोग बाहर चले गए, जिससे मुस्लिम आबादी का प्रतिशत बढ़ा, जबकि कुछ जगहों पर मुस्लिम शरणार्थियों के आने से उनकी संख्या बढ़ी।

यूरोप के कई देशों में भी मुस्लिम आबादी बढ़ी है, इसका कारण आप्रवासन (immigration) और मुस्लिमों की औसत से अधिक जन्म दर है। हालाँकि, इन देशों में मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी में बढ़ोतरी 5% से कम रही।

दूसरी ओर ईसाई अब भी दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक समूह हैं, लेकिन पिछले दस सालों में उनकी जनसंख्या में केवल 12 करोड़ (122 मिलियन) की बढ़त हुई और उनकी वैश्विक हिस्सेदारी घटकर 28.8% रह गई, जो पहले से 1.8% कम है।

पूरी दुनिया में घट रहे हिन्दू

प्यू के रिपोर्ट्स के मुताबिक, दक्षिण एशिया के चार देशों भारत, नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू आबादी में थोड़ी गिरावट दिखी, लेकिन यह गिरावट 5% से कम है। किसी भी देश या इलाके में हिंदुओं की हिस्सेदारी में कोई बड़ी बढ़ोतरी या कमी नहीं हुई है।

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ईसाई, मुस्लिम और धर्म ना मानने वालों के बाद हिंदू दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धार्मिक समूह हैं। 2010 से 2020 के बीच हिंदू आबादी में 12% की वृद्धि हुई है, जो करीब 11 करोड़ से बढ़कर 12 करोड़ के करीब पहुँच गई है, लेकिन इस दौरान हिंदुओं का विश्व जनसंख्या में हिस्सा थोड़ा घटकर 15.0% से 14.9% हो गया। इसके पीछे की वजह रही कि गैर हिंदुओं की वृद्धि दर भी लगभग बराबर रही, इसलिए हिंदुओं का वैश्विक हिस्सेदारी लगभग स्थिर ही रही।

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दुनिया के लगभग 99% हिंदू एशिया प्रशांत क्षेत्र में रहते हैं। भारत, नेपाल और मॉरीशस में वे सबसे बड़ा धार्मिक समूह हैं।

शोध के अनुसार, पिछले 10 सालों में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में हिंदू आबादी में 62% तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जो अब करीब 32 लाख (3.2 मिलियन) है। इसी दौरान उत्तरी अमेरिका में भी हिंदू आबादी 55% बढ़कर 36 लाख (3.6 मिलियन) तक पहुँच गई है। ये बढ़ोतरी मुख्य रूप से आर्थिक अवसरों के कारण हुई है, जिससे हिंदू लोग संयुक्त अरब अमीरात (UAE), यूरोप और अन्य जगहों पर प्रवास कर रहे हैं।

2010 से 2020 के बीच हिंदुओं की भौगोलिक स्थिति में थोड़ा बदलाव आया है। एशिया पेसिफिक में हिंदू आबादी में 0.2% की थोड़ी कमी हुई, जबकि उत्तरी अमेरिका और मध्य पूर्व उत्तरी अफ्रीका में हिंदुओं की संख्या में 0.1% की बढ़ोतरी हुई है।

1950-2015 के बीच 43% बढ़ी मुस्लिम आबादी

पूरी दुनिया की तरह भारत में भी तेजी से मुस्लिम आबादी बढ़ी है। मई 2024 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, 1950 से 2015 के बीच मुस्लिमों की आबादी 43.15% बढ़ी, जबकि हिंदुओं की आबादी में 7.85% की कमी आई। इसी दौरान ईसाइयों और सिखों की आबादी में भी क्रमशः 5.38% और 6.58% की गिरावट हुई।

इस अवधि में भारत की कुल आबादी में हिंदुओं का हिस्सा 84% से घटकर 78% हो गया, जबकि मुस्लिमों की हिस्सेदारी 9.84% से बढ़कर 14.09% हो गई है। भारत के पड़ोसी देशों में जहाँ मुस्लिम या उनके संप्रदाय की आबादी 50% से ज्यादा है, वहाँ मुस्लिम समुदाय की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

बांग्लादेश में सबसे ज्यादा 18.5% की वृद्धि हुई, इसके बाद पाकिस्तान में 3.75% और अफगानिस्तान में 0.29% की बढ़ोतरी हुई है। मई 2022 में जारी पाँचवीं राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में मुस्लिमों महिलाओं का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) सबसे ज्यादा है। फर्टिलिटी रेट किसी 15-49 वर्ष की महिला द्वारा जन्म दिए गए बच्चों की संख्या है।

यदि किसी समूह की महिलाओं का टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 से अधिक है तो उसकी आबादी बढती है। यदि यह कम होता तो आबादी में कमी आती है। NFHS सर्वे बताता है हिन्दुओं में TFR पिछले कुछ वर्षों में घटकर 3.4 से 2.0 बच्चों तक आ गया है। (1992-93 से 2019-21 के बीच)। लेकिन मुस्लिम समुदाय में प्रति महिला औसत यह TFR 2.36 हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 15 से 19 साल की उम्र की मुस्लिम महिलाओं में किशोरावस्था में गर्भधारण ज्यादा होता है, यह प्रतिशत 8% है, जो अन्य धर्मों की महिलाओं से ज्यादा है। जब दूसरी संतान की बात आती है, तो मुस्लिमों में सबसे कम महिलाएँ ऐसी हैं जो दूसरा बच्चा नहीं चाहतीं। 15 से 49 साल की उम्र की विवाहित महिलाओं में, 72% सिख और 71% हिंदू महिलाएँ आगे बच्चे नहीं चाहतीं, जबकि मुस्लिम महिलाओं में यह संख्या 64% है।

जाति की जिस आग में देश को जलाना चाहते हैं राहुल गाँधी, उसमें कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ही झुलसी: जानिए – खुद की जाति जनगणना क्यों बनी जी का जंजाल, ‘आलाकमान’ को क्यों नहीं कबूल

कर्नाटक में एक बार फिर जातिगत जनगणना का मुद्दा सियासत का केंद्र बन गया है। कॉन्ग्रेस, जो पिछले कुछ सालों से इस मुद्दे को अपने ‘सामाजिक न्याय’ के एजेंडे का चेहरा बनाती रही, अब खुद अपने ही बनाए जाल में फँसती नजर आ रही है। इस मुद्दे के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सियासी पहचान को मजबूत करने की कोशिश में लगे राहुल गाँधी भी कर्नाटक में इस मुद्दे के उलझने से मुश्किल में पड़ गए हैं।

अब डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के ताजा बयानों और कॉन्ग्रेस हाईकमान के यू-टर्न से साफ है कि पार्टी बैकफुट पर है। दूसरी तरफ, बीजेपी इसे कॉन्ग्रेस की नाकामी और ध्यान भटकाने की साजिश करार दे रही है।

आखिर ये नौबत क्यों आई? 2015 की जातिगत जनगणना की रिपोर्ट में ऐसा क्या था कि कॉन्ग्रेस को पलटना पड़ रहा है? कॉन्ग्रेस का वादा क्या था और अब क्यों उसे अपने कदम पीछे खींचने पड़ रहे हैं? और सबसे अहम, राहुल गाँधी का ‘जाति ब्रेकिंग न्यूज’ वाला नैरेटिव अब उनके लिए जंजाल क्यों बन रहा है? चलिए, इस पूरे मसले को विस्तार से समझते हैं।

क्यों फिर से उठा जातिगत जनगणना का मुद्दा?

10 जून 2025 को कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने ऐलान किया कि वो राज्य में फिर से जातिगत जनगणना करवाएगी। डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने कहा, “90 दिनों के भीतर इसकी टाइमलाइन तय हो जाएगी और प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी।” लेकिन सवाल ये है कि जब 2015 में करवाया गया सर्वे पहले ही तैयार है, तो दोबारा जनगणना की जरूरत क्यों पड़ी? कॉन्ग्रेस तो इस सर्वे को ‘कर्नाटक मॉडल’ के तौर पर प्रचारित करती रही थी। फिर अब अचानक यू-टर्न क्यों?

इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है 2015 की जातिगत जनगणना की रिपोर्ट, जिसे एच. कांथराज की अगुआई में कर्नाटक पिछड़ा वर्ग आयोग ने तैयार किया था। इस रिपोर्ट को फरवरी 2024 में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को सौंपा गया था।

इसमें सुझाव दिया गया था कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण 32% से बढ़ाकर 51% और मुस्लिमों का आरक्षण 4% से 8% किया जाए। कुल मिलाकर अगर ये सिफारिशें लागू होतीं, तो कर्नाटक में कुल आरक्षण 85% तक पहुँच जाता – 51% OBC, 24% SC-ST और 10% EWS के लिए।

लेकिन इस रिपोर्ट ने कर्नाटक की दो सबसे प्रभावशाली जातियों लिंगायत और वोक्कालिगा को नाराज कर दिया। इन समुदायों का दावा है कि उनकी आबादी को इस सर्वे में कम करके आँका गया। सर्वे के मुताबिक, लिंगायतों की आबादी कुल जनसंख्या का करीब 11% और वोक्कालिगा की 10% से थोड़ा ज्यादा थी।

ये आँकड़े उनके अपने अनुमानों से बहुत कम थे। कर्नाटक की सियासत में बड़ा रोल अदा करने वाले लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय इस बात से भड़क गए कि उनकी गिनती कम दिखाई गई, जबकि मुस्लिमों की आबादी में 1984 से 2015 के बीच 94% की बढ़ोतरी दिखाई गई। सर्वे में मुस्लिम OBC में सबसे बड़ा समूह बन गए थे और उनकी हिस्सेदारी 18.08% बताई गई।

साल 2015 की जातिगत जनगणना की रिपोर्ट में क्या था?

साल 2015 की जातिगत जनगणना, जिसे कर्नाटक पिछड़ा वर्ग आयोग ने एच. कांथराज के नेतृत्व में शुरू किया और 2020 में के. जयप्रकाश हेगड़े ने पूरा किया, कर्नाटक की सियासत में भूचाल ला देने वाली थी। इस सर्वे में कई चौंकाने वाले आँकड़े सामने आए-

मुस्लिम आबादी में 94% की बढ़ोतरी: 1984 के वेंकटस्वामी कमीशन के सर्वे में मुस्लिम आबादी 39.63 लाख थी, जो 2015 में बढ़कर 76.9 लाख हो गई। यानी 30 साल में उनकी आबादी लगभग दोगुनी हो गई। उनकी हिस्सेदारी 1984 में 10.97% थी, जो 2015 में बढ़कर 18.08% हो गई।

लिंगायत और वोक्कालिगा की आबादी: 1984 में लिंगायतों की आबादी 61.14 लाख (16.92%) और वोक्कालिगा की 42.19 लाख (11.68%) थी। 2015 में लिंगायतों की आबादी 8.50% बढ़कर करीब 66 लाख और वोक्कालिगा की 46% बढ़कर करीब 61 लाख हो गई। लेकिन उनकी हिस्सेदारी में कमी आई, क्योंकि मुस्लिम और OBC समुदायों की आबादी तेजी से बढ़ी।

OBC की हिस्सेदारी: सर्वे के मुताबिक, कर्नाटक की कुल आबादी में OBC की हिस्सेदारी 69.60% थी। इस आधार पर आयोग ने OBC आरक्षण को 32% से बढ़ाकर 51% करने की सिफारिश की। इसमें मुस्लिमों का आरक्षण 4% से बढ़ाकर 8% करने की बात थी।

कुल आरक्षण 85% तक: अगर ये सिफारिशें लागू होतीं, तो कर्नाटक में कुल आरक्षण 85% हो जाता – 51% OBC, 24% SC-ST और 10% EWS के लिए। यह सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी मामले में तय 50% की सीमा को पार करता, जिसके लिए कॉन्ग्रेस ने झारखंड और तमिलनाडु का उदाहरण दिया, जहाँ क्रमशः 77% और 69% आरक्षण लागू है।

इस रिपोर्ट ने कॉन्ग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दीं। लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों ने इसे ‘अन्याय’ करार दिया और कहा कि उनकी आबादी को जानबूझकर कम दिखाया गया। वहीं, सिद्धारमैया की कुरुबा जाति को ‘अधिक पिछड़ा’ से ‘सबसे पिछड़ा’ श्रेणी में डालने की सिफारिश ने भी विवाद खड़ा किया।

कॉन्ग्रेस का वादा और यू-टर्न

कॉन्ग्रेस ने 2013 में सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल में जातिगत जनगणना शुरू की थी। तब इसे ‘सामाजिक न्याय’ का ऐतिहासिक कदम बताया गया था। राहुल गाँधी ने भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और बार-बार कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट की 50% आरक्षण की सीमा को तोड़ना चाहते हैं। कॉन्ग्रेस ने इसे ‘कर्नाटक मॉडल’ के तौर पर पेश किया और दावा किया कि ये पिछड़े वर्गों, दलितों और मुस्लिमों के लिए गेम-चेंजर होगा।

लेकिन जब 2024 में ये रिपोर्ट सामने आई, तो कॉन्ग्रेस के सामने दोहरी चुनौती थी। पहली – लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों का विरोध, जो कर्नाटक की सियासत में बड़ा रोल अदा करते हैं। दूसरी – पार्टी के भीतर का अंतर्विरोध। सिद्धारमैया इसे लागू करने के पक्ष में थे, क्योंकि ये उनकी ‘अहिन्दा’ (अल्पसंख्यक, OBC और दलित) रणनीति को मजबूत करता। लेकिन डीके शिवकुमार जो खुद वोक्कालिगा हैं, और लिंगायत नेताओं ने इसका विरोध शुरू कर दिया।

17 अप्रैल 2025 को हुई कैबिनेट बैठक में इस रिपोर्ट पर चर्चा तो हुई, लेकिन कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया। कॉन्ग्रेस हाईकमान को लगा कि ये मुद्दा पार्टी के लिए सियासी नुकसान कर सकता है। नतीजा? दिल्ली में मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गाँधी के साथ बैठक के बाद फैसला लिया गया कि पुराने सर्वे को या तो पूरी तरह स्क्रैप किया जाए या उसमें संशोधन किया जाए।

डीके शिवकुमार बोले- ‘सबको साथ लेकर चलेंगे’

डीके शिवकुमार ने 10 जून 2025 को दिल्ली में मीडिया से बात करते हुए कहा, “जाति जनगणना का डेटा करीब 10 साल पुराना है। हमारे बुजुर्गों ने सुझाव दिया है कि हर वर्ग के नेताओं को इस बारे में बोलने का मौका देकर सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जाए। इसलिए हम विचार कर रहे हैं कि सभी को मौका दिया जाए ताकि किसी भी वर्ग को कोई असुविधा न हो और किसी के साथ नाइंसाफी न हो। हम कैबिनेट में इस पर चर्चा करेंगे और दोबारा जनगणना की तारीख तय करेंगे। इस बार इसे ऑनलाइन भी करवाएंगे। ये एक लंबी प्रक्रिया है। जल्द ही हम बताएँगे कि ये कब शुरू होगी और कैसे होगी।”

शिवकुमार ने आगे कहा, “हम लोगों की भावनाओं को समझते हैं, हम हर जिंदगी का सम्मान करते हैं। हमने समाज के अलग-अलग वर्गों से जानकारी ली है। कुछ लोग मानते हैं कि ये 10 साल पुराना सर्वे है, जिसमें बहुत खर्चा हुआ था। लेकिन हम उस रिपोर्ट से सहमत हैं, जो भी उसमें है। हम सिर्फ आँकड़ों को लेकर चिंतित हैं। 22 जून को हम इस पर अंतिम फैसला लेने वाले थे, लेकिन उससे पहले हाईकमान ने हमें बुलाया। उन्होंने डिटेल्स माँगी हैं। उन्होंने मीडिया लीडर्स से सलाह ली और हमें निर्देश दिया कि आप अपनी नीति के मुताबिक चलें, जो बैकवर्ड क्लास कमीशन कहता है, उसी के हिसाब से करें। किसी को नाराज नहीं होना चाहिए।”

शिवकुमार का ये बयान साफ दिखाता है कि कॉन्ग्रेस अब हर तरफ से दबाव में है। एक तरफ वो अपने ‘सामाजिक न्याय’ के नैरेटिव को बचाना चाहती है, दूसरी तरफ लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों को नाराज नहीं करना चाहती।

बीजेपी ने बताया ‘कॉन्ग्रेस की साजिश’

बीजेपी ने इस मुद्दे को कॉन्ग्रेस की नाकामी और सियासी ड्रामेबाजी करार दिया। कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने कहा, “जब भी कॉन्ग्रेस सरकार अपनी प्रशासनिक नाकामियों के चलते संकट में आती है, वो जातिगत जनगणना का प्रस्ताव लाती है। ये सामाजिक चिंता से नहीं, बल्कि लोगों का ध्यान भटकाने की साजिश है। बेंगलुरु में चिन्नास्वामी स्टेडियम के पास हाल की स्टैम्पेड में 11 लोगों की मौत हुई। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार जो पब्लिसिटी के जुनून में डूबी है और लोगों के गुस्से का सामना कर रही है, इस जनगणना को फिर से लाकर अपनी नाकामियों को छिपाने की कोशिश कर रही है।”

उन्होंने सवाल पूछा है कि क्या कॉन्ग्रेस सरकार ये मान रही है कि 160 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करके की गई जनगणना पूरी तरह बेकार थी? उन्होंने कहा, “डिप्टी सीएम का बयान यही दिखाता है। अब समय आ गया है कि लोग कॉन्ग्रेस की चालाकी, गैर-जिम्मेदारी और जनता को तंग करने की नीति को सबक सिखाएँ।”

बीजेपी के महासचिव सुनील कुमार कारकला ने कहा, “कॉन्ग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक सरकार की तैयार की गई जातिगत जनगणना की रिपोर्ट को रद्द कर दिया है। ये रिपोर्ट नंदी हिल्स में कैबिनेट बैठक में मंजूरी के लिए तय थी। लेकिन हाईकमान ने इसे खारिज कर दिया और डेटा में गड़बड़ी का हवाला देकर दोबारा सर्वे का आदेश दिया। कॉन्ग्रेस और सीएम सिद्धारमैया को समुदायों में असंतोष पैदा करने के लिए माफी माँगनी चाहिए।”

राहुल गाँधी का जंजाल

राहुल गाँधी ने पिछले कुछ सालों में जातिगत जनगणना को अपनी सियासी रणनीति का केंद्र बनाया था। वो बार-बार कहते रहे कि उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट की 50% आरक्षण की सीमा को तोड़ना चाहती है। 2024 में उन्होंने कहा था, “हम भारत में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए 50% की दीवार को तोड़ देंगे।” कर्नाटक में उनकी पार्टी ने इस दिशा में कदम भी उठाया। लेकिन अब वही मुद्दा उनके लिए जंजाल बन रहा है।

कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों का विरोध कॉन्ग्रेस के लिए सियासी नुकसान का सबब बन सकता है। ये दोनों समुदाय परंपरागत रूप से बीजेपी और जेडी(एस) के वोटर रहे हैं। कॉन्ग्रेस की ‘अहिन्दा’ रणनीति (अल्पसंख्यक, OBC और दलित) इन समुदायों को पहले ही नजरअंदाज करती रही है। अब अगर कॉन्ग्रेस 2015 की रिपोर्ट को लागू करती है, तो लिंगायत और वोक्कालिगा और नाराज होंगे। और अगर नहीं करती तो उसका ‘सामाजिक न्याय’ का नैरेटिव कमजोर पड़ जाएगा।

राहुल गाँधी की मुश्किल ये है कि वो राष्ट्रीय स्तर पर तो जातिगत जनगणना का ढोल पीट रहे हैं, लेकिन कर्नाटक में उनकी अपनी सरकार इसे लागू करने में नाकाम रही है। इससे बीजेपी को मौका मिल गया है कि वो कॉन्ग्रेस को ‘वोटबैंक की राजनीति’ करने वाली पार्टी करार दे।

कॉन्ग्रेस की रणनीति में अहिन्दा वोटबैंक

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की रणनीति हमेशा से ‘अहिन्दा’ (अल्पसंख्यक, OBC और दलित) वोटबैंक को मजबूत करने की रही है। ये शब्द सबसे पहले कॉन्ग्रेस के नेता देवराज उर्स ने दिया था और सिद्धारमैया ने इसे अपनी सियासी पहचान बनाया। 2015 की जनगणना में OBC और मुस्लिम आरक्षण बढ़ाने की सिफारिश इसी रणनीति का हिस्सा थी। कर्नाटक में मुस्लिम आबादी 18.08% है और वो OBC में सबसे बड़ा समूह हैं। कॉन्ग्रेस को लगता है कि अगर वो मुस्लिमों और OBC को ज्यादा आरक्षण देगी, तो उसका वोटबैंक और मजबूत होगा।

लेकिन ये रणनीति अब उलटी पड़ रही है। लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों का विरोध कॉन्ग्रेस के लिए सिरदर्द बन गया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट की 50% आरक्षण की सीमा को तोड़ने की बात भी कानूनी पचड़े में फंस सकती है। कॉन्ग्रेस ने झारखंड और तमिलनाडु का उदाहरण तो दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का इंद्रा साहनी फैसला अभी भी लागू है।

कर्नाटक में जातिगत जनगणना का मुद्दा कॉन्ग्रेस के लिए दोधारी तलवार बन गया है। एक तरफ पार्टी अपने ‘सामाजिक न्याय’ के नैरेटिव को बनाए रखना चाहती है, जिसके तहत वो OBC, मुस्लिम और दलित वोटबैंक को साधने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों का विरोध उसे बैकफुट पर ले आया है। डीके शिवकुमार का बयान कि “हम हर समुदाय को साथ लेकर चलेंगे” कॉन्ग्रेस की मजबूरी को दिखाता है।

राहुल गाँधी, जो जातिगत जनगणना को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सियासी पहचान का हिस्सा बनाना चाहते थे, अब खुद इस जंजाल में फँसते जा रहे हैं। उनकी पार्टी न तो 2015 की रिपोर्ट को लागू कर पा रही है, न ही इसे पूरी तरह खारिज कर पा रही है। बीजेपी इसे कॉन्ग्रेस की नाकामी और सियासी ड्रामेबाजी बता रही है और कर्नाटक की जनता के बीच ये सवाल उठ रहा है कि क्या कॉन्ग्रेस वाकई सामाजिक न्याय की बात करती है, या ये सिर्फ वोटबैंक की राजनीति है?

कुल मिलाकर राहुल गाँधी का ‘जाति ब्रेकिंग न्यूज’ वाला ड्रामा अब उनके लिए जंजाल बन गया है। और कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की ये उलझन आने वाले दिनों में और गहरा सकती है।

केन्द्र सरकार ने क्यों बदला AC पर नियम, 20°C-28°C की क्यों लगाई लिमिट… इससे बिजली की कितनी बचत: जानिए सब कुछ

केन्द्र सरकार ने बिजली की खपत को कम करने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। केन्द्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने एयर कंडीशनर (AC) को लेकर नए नियम का ऐलान किया हैं। यह जल्द ही लागू हो जाएँगे। केन्द्र सरकार ने यह नियम एयर कंडीशनर के तापमान को लेकर बनाए हैं।

इस नियम के तहत, अब पूरे भारत में सभी AC केवल 20°C से 28°C के बीच के तापमान पर ही काम करेंगे। इसका मतलब है कि कोई भी व्यक्ति अपने AC को 20°C से कम या 28°C से ज्यादा तापमान पर सेट नहीं कर पाएगा।

यह कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि बहुत कम तापमान पर AC चलाने से बिजली की भारी खपत होती है। इससे न केवल ऊर्जा की बर्बादी होती है, बल्कि बिजली की माँग भी तेजी से बढ़ती है। यह माँग गर्मियों में काफी तेजी से बढ़ती है। अब इस नई नीति से बिजली बचाने में मदद मिलेगी।

केन्द्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इस नीति को एक साहसिक निर्णय बताया है और कहा कि यह AC के इस्तेमाल के आदतों में सुधार को देखते हुए ये कदम जरूरी है। अब इस निर्णय के बाद AC निर्माता कंपनियों को अपने उपकरणों के सॉफ्टवेयर को अपडेट करना होगा ताकि वे नए नियमों के अनुसार काम कर सकें। सरकार इस नीति के अमल पर नजर रखेगी।

भारत ऐसी नीति लागू करने वाला कोई पहला देश नहीं है, पहले से ही AC को लेकर दुनिया भर के अलग-अलग देशों में नियम लागू हैं।

और कौन से देशों में हैं ऐसे नियम?

सिंगापुर के सार्वजनिक भवनों में AC का तापमान 24-26°C के बीच रखा जाता है, जो वहाँ की गर्म जलवायु के लिए ठीक है। सिंगापुर की सरकार ऊर्जा बचाने के लिए ‘Go 25’ अभियान चला रही है, जिससे घरों और दफ्तरों में 25°C या उससे ज्यादा तापमान रखने को बढ़ावा दिया जा रहा है।

ऑस्ट्रेलिया में कोई तापमान रखने पर कोई कानूनी सीमा नहीं है, लेकिन सरकार 23-25°C तापमान की सलाह देती है। साथ ही ऑस्ट्रेलिया में केवल उन AC को बेचने की अनुमति है जो ऊर्जा की बचत के मानकों पर खरे उतरते हैं। जहाँ थर्मोस्टेट तापमान तय करने का कोई राष्ट्रीय नियम नहीं है।

चीन की सरकारी और व्यावसायिक इमारतों में AC का तापमान कम से कम 26°C रखने की सख्त सलाह है, खासकर गर्मियों में, ऐसा करना सार्वजनिक इमारतों में अनिवार्य है। यहाँ भी बिजली की खपत करने को यह नियम लागू किया गया है।

दक्षिण कोरिया में भी गर्मियों में AC का तापमान 26°C या उससे ऊपर रखने की नीति है। सार्वजनिक कार्यालयों को ऊर्जा बचाने के लिए इस नियम का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

भारत सरकार ने क्यों उठाया यह कदम?

सरकार ने AC के तापमान को 20°C से 28°C के बीच सीमित करने का फैसला इसलिए लिया है ताकि देश में बिजली की खपत को कम किया जा सके और ऊर्जा का समझदारी से उपयोग किया जा सके। भारत में बढ़ते मध्यम वर्ग के साथ लगातार AC की बिक्री बढ़ रही है, इसी से बिजली खपत भी बढ़ रही है।

एक रिपोर्ट बताती है कि अकेले 2024 में ही देश में 1.4 करोड़ AC बिके थे। यह 4 वर्षों में दोगुनी हो चुकी है। यह अंदाजा लगाया गया है कि 2050 तक भारत में 9 गुना वृद्धि AC के मामले में होने वाली है। ऐसे में बिजली की खपत तेजी से बढ़ेगी।

मई-जून जैसे महीनों में भीषण गर्मी के चलते लोग अक्सर अपने AC को बहुत कम तापमान, जैसे 20-21°C पर चलाते हैं। इसके चलते बिजली की खपत तेजी से बढ़ती है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि बहुत कम तापमान पर AC चलाने पर बिजली खपत में 20% तक की बढ़ोतरी होती है। एकाएक बिजली की माँग बढ़ने से पॉवर ग्रिड पर भी दबाव पड़ता है।

भारत की ज़्यादातर बिजली कोयले से बनने के कारण, बिजली की ज्यादा खपत का मतलब ज्यादा प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो ब्युरो ऑफ एनर्जी इफिशन्सी (BEE) का कहना है कि तापमान को 20°C से कम या 28°C से ज्यादा पर सेट करना अकुशल और नुकसानदायक है।

ऐसे में सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और बिजली बचत, दोनों को देखते हुए यह निर्णय लिया है।

इस कदम से क्या फायदे?

सरकार चाहती है कि देश में सभी लोग AC का इस्तेमाल एक तय तापमान सीमा यानि 20°C से 28°C  के बीच ही रहे, इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बिजली की खपत कम होगी और देश को ऊर्जा की बचत में मदद मिलेगी।

जब कम बिजली खर्च होगा, तो देश को आर्थिक लाभ होगा और साथ ही प्रदूषण भी घटेगा, जिससे पर्यावरण को कम नुकसान होगा। यह नियम हर व्यक्ति के लिए फायदेमंद होगा, सभी के लिए एक समान तापमान पर AC चलने से न केवल आराम मिलेगा बल्कि बिजली का बिल भी कम आएगा।

सरकार इस बदलाव को जल्द ही लागू करने जा रही है और लोगों को इसके फायदे समझाकर जागरूक भी किया जा रहा है। इस नियम का मकसद सिर्फ तापमान सीमित करना नहीं है, बल्कि लोगों की सोच बदलना है ताकि वे ऊर्जा का उपयोग ज्यादा जिम्मेदारी से करें।

खुद को खत्म कर लेगा पर आतंकवाद खत्म नहीं करेगा कटोरा लेकर घूम रहा पाकिस्तान, भारत से लड़ने के लिए रक्षा बजट 18% बढ़ाया: स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा का पैसा घटाया

बीते लगभग एक दशक से भारी आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान अब अपनी फ़ौज पर खर्च फिर बढ़ाने जा रहा है। IMF, विश्व बैंक और सऊदी अरब जैसे देशों की चौखट पर कर्ज के लिए खड़ा रहने वाला पाकिस्तान फ़ौज पर खर्च वित्त वर्ष में 2025-26 के लिए अपने 18% बढ़ाने जा रहा है।

पाकिस्तान का रक्षा बजट अब 2.5 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये (लगभग 14 अरब डॉलर) होगा। पाकिस्तान पर पहले से ही करीब 22 लाख 80 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। पाकिस्तान का कर्ज और GDP के बीच अनुपात लगभग 65% है। यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक माना जाता है।

पाकिस्तान के पास विदेशी मुद्रा भंडार भी इतना ही बचा है कि वह केवल तीन महीने का आयात कवर कर सकता है। पाकिस्तान में महँगाई भी बहुत ज्यादा है और आर्थिक हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं। अब भारत से कम्पटीशन करने की होड़ में, पाकिस्तान ऐसे फैसले ले रहा है जो उसकी आर्थिक स्थिति को और पतला कर सकते हैं।

हाल ही में भारत द्वारा किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद पाकिस्तान के शेयर बाजार में 10% की गिरावट दर्ज की गई थी, इससे उसकी अर्थव्यवस्था को और झटका लगा था। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भले ही कमजोर हालत में हो, लेकिन इसके बावजूद इस्लामाबाद ने अपने बजट का करीब 18% हिस्सा फ़ौज को दे दिया है।

पाकिस्तान ने अपनी फ़ौज का यह पैस गरीबी हटाने, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे ज़रूरी क्षेत्रों के बजट में कटौती करके दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि पाकिस्तान की फ़ौज रोटी से ज्यादा महत्वपूर्ण बंदूकों को देती है।

हालाँकि, यह फैसला हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि हाल ही में पाकिस्तान के फ़ौज प्रमुख असीम मुनीर को फील्ड मार्शल का पद मिला है। इससे यह साफ हो गया है कि पाकिस्तान अब केवल नाम का लोकतंत्र रह गया है, असल में वहाँ फ़ौज की चलती है और देश एक तरह से फौजी तानाशाही में बदल चुका है।

डरा हुआ पाकिस्तान अब आतंकियों को दे रहा बढ़ावा

पाकिस्तान में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) और पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (PMLN) गठबंधन सरकार वर्तमान में सत्ता में है, जिसने रक्षा बजट में तेज़ी से बढ़ोतरी करने का फैसला किया है। पाकिस्तानी सरकार ने इसका कारण उनके फौजी ठिकानों पर हुए भारत के हमलों को बताया है। पाकिस्तान को इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी।

खास बात यह रही कि इन हमलों के वक्त पाकिस्तान की रक्षा व्यवस्था सतर्क नहीं थी। वर्ष 2024-25 में पाकिस्तान का रक्षा बजट 2122 अरब (2.122 लाख करोड़ रुपए) था, जो उससे पिछले साल के मुकाबले 15% ज़्यादा था।

अब 2025-26 के लिए इसमें और बढ़ोतरी की गई है। ऐसे में 2 वर्ष में कुल 35% की बढ़ोतरी रक्षा बजट में हुई है। हालाँकि, मौजूदा हालात और बढ़ती सैन्य गतिविधियों को देखते हुए इस साल का असली रक्षा खर्च इससे कहीं ज़्यादा होने की संभावना है।

पाकिस्तान की चिंता और हताशा इस बात से साफ झलकती है कि उसके योजना मंत्री अहसान इकबाल ने रक्षा बजट में बढ़ोतरी को भारत द्वारा सिंधु जल संधि को खत्म करने के फैसले से जोड़ दिया है। पाकिस्तान इस संधि को अपनी ‘जीवन रेखा’ मानता है और भारत की अपस्ट्रीम बांध परियोजनाओं को ‘जल आक्रमण’ बता रहा है।

पाकिस्तान लगातार भारत से अपील कर रहा है कि वह इस फैसले पर पुनर्विचार करे। वहीं इस बीच उसने चीन की मदद से एक नई बाँध परियोजना पर काम तेज कर दिया है। इसके लिए वह चीन की मदद लेने वाला है।

पाकिस्तान रक्षा बजट को ऐसे समय में बड़ी प्राथमिकता दे रहा है, जब देश का सार्वजनिक कर्ज मार्च 2024 तक बढ़कर रिकॉर्ड 76 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपए (22 लाख 80 हजार करोड़ रुपए) तक पहुँच चुका है, यह बात सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में भी बताया गया है।

पिछले दस वर्षों में पाकिस्तान का कुल कर्ज पाँच गुना बढ़ चुका है। 2020-21 में यह 39.8 ट्रिलियन रुपए से लगभग दोगुना होकर बढ़ा। इस कर्ज में 24.5 ट्रिलियन रुपए की विदेशी उधारी और 51.5 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपए की घरेलू देनदारियाँ शामिल हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इतना ज़्यादा कर्ज और उसका सही ढंग से प्रबंधन न होना पाकिस्तान की आर्थिक और राजकोषीय स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन गया है। पाकिस्तान इस समय IMF के कर्ज पर निर्भर है। मई 2025 में IMF ने पाकिस्तान को 1 बिलियन डॉलर (₹8500 करोड़) का कर्ज दिया था।

इसके साथ ही IMF ने पाकिस्तान पर 11 नई शर्तें भी लगा दीं। अब कुल मिलाकर IMF की शर्तों की संख्या 50 हो गई है, जो 7 बिलियन डॉलर के कर्ज के बदले में लगाई गई हैं। IMF ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर भारत के साथ तनाव बढ़ा, तो इससे पाकिस्तान की आर्थिक हालत और खराब हो सकती है।

IMF के अनुसार, 2025 में पाकिस्तान की बेरोजगारी दर 8.5% है। वहीं गरीबी दर भी बढ़ रही है, 2017 में जहाँ 39.8% लोग गरीबी में थे, 2021 में यह बढ़कर 44.7% हो गए। गरीबी का माप प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 4.2 डॉलर आय के आधार पर किया गया है।

स्रोत: आईएमएफ

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में गरीबों की स्थिति लगातार खराब हो रही है। देश में इस समय गरीबी दर 42.4% है और 2024-25 में करीब 19 लाख (1.9 मिलियन) और लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाएँगे। पाकिस्तान की 2.6% आर्थिक विकास दर इतनी कम है कि इससे गरीबी में कोई खास कमी नहीं हो पा रही है।

पाकिस्तान की एक गंभीर सच्चाई यह है कि जहाँ देश की 45% आबादी गरीबी में और 16.5% आबादी बेहद गरीबी (अत्यधिक गरीबी) में जी रही है, वहाँ की सेना-समर्थित सरकार गरीबी घटाने और युवाओं को रोजगार देने पर ध्यान देने के बजाय रक्षा बजट को 18% बढ़ाने को ज़्यादा जरूरी मान रही है।

इस बीच, भारत द्वारा सिंधु जल संधि को रद्द करने के बाद पाकिस्तान के सिंधु नदी बेसिन में पानी का बहाव कम हो गया है, जिससे देश का कृषि क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। अनुमान है कि इससे फसलों की पैदावार में कपास के लिए 29.6% और चावल के लिए 1.2% तक की गिरावट आ सकती है। इससे क्षेत्रीय विकास दर 2% से भी नीचे रह सकती है।

इसके अलावा, पाकिस्तान को खाद्य सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर ग्रामीण इलाकों में लगभग 1 करोड़ (10 मिलियन) लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा की स्थिति में हैं।

पिछले 25 वर्षों में IMF ने पाकिस्तान को करीब 22 बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद दी है। इसके बावजूद, पाकिस्तान की सामाजिक और आर्थिक स्थिति अब भी बेहद गंभीर बनी हुई है। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है कि यह सारा पैसा आखिर जा कहाँ रहा है।

यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है जब यह सामने आता है कि पाकिस्तान ने अब तक अपनी सेना पर 185 बिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च किए हैं, जो कि IMF से मिली मदद से 5 से 10 गुना ज़्यादा है।

ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि दुनिया, खासकर वो देश और संस्थाएँ जो पाकिस्तान को कर्ज देती हैं, यह सवाल करें कि जब पाकिस्तान इतनी बड़ी रकम रक्षा पर खर्च कर सकता है, तो फिर उसे बार-बार आर्थिक संकट से उबरने और भुगतान संतुलन बनाए रखने के लिए कर्ज की ज़रूरत क्यों पड़ रही है।

पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मिले कर्ज का गलत इस्तेमाल किया है। इस पैसे का उपयोग देश के अंदर इस्लामी आतंकवादियों को पालने, उन्हें सुरक्षा देने और उन्हें फंड करने में किया गया, जो बाद में पाकिस्तानी सेना के इशारे पर भारत में आतंकी हमले करते हैं।

पाकिस्तान में सेना का दबदबा इतना ज़्यादा है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसी ज़रूरी नागरिक ज़रूरतों को बार-बार नजरअंदाज किया गया है। यह सिर्फ इस साल नहीं, बल्कि कई सालों से हो रहा है। यह एक शर्मनाक और पुराना पैटर्न बन चुका है।

भारत को नुकसान पहुँचाने और एक तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था से प्रतिस्पर्धा करने का पाकिस्तान का जुनून उसकी नीतियों और सोच को बिगाड़ चुका है। यह मानसिकता उसे खुद के विकास से भटका रही है।

पाकिस्तान की स्थिति आज घोर कुप्रबंधन, राजनीतिक अस्थिरता, भारी कर्ज और एक ऐसी सेना की वजह से खराब है जो देश के संसाधनों का बड़ा हिस्सा ले जाती है लेकिन बदले में देश को बहुत कम देती है। पाकिस्तान लगातार IMF और चीन से कर्ज लेकर अपनी अर्थव्यवस्था को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने भारी कर्ज के बावजूद, उसका रक्षा बजट हर साल बढ़ रहा है।

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, इसे यहाँ क्लिक करके विस्तार से पढ़ सकते हैं।

अमेरिका में यहूदी प्रार्थनाघर पर हमला करने वाला था पाकिस्तानी शहजेब, चाकू-राइफल और गोलियों का दिया था ऑर्डर: कनाडा ने ISIS आतंकी को किया डिपोर्ट, अब चलेगा मुकदमा

20 साल के पाकिस्तानी नागरिक मुहम्मद शहज़ेब खान को कनाडा से अमेरिका प्रत्यर्पित कर दिया गया है। मुहम्मद शहजे़ब पर आरोप है कि वह न्यूयॉर्क शहर के एक बड़े यहूदी प्रार्थना स्थल केंद्र पर ISIS के इशारे पर एक बड़ा आतंकी हमला करने की साजिश रच रहा था। शहज़ेब की योजना थी कि वह 7 अक्टूबर 2024 को, यानी हमास के इज़राइल पर हमले की पहली बरसी पर, ब्रुकलिन के यहूदी केंद्र में घुसकर अँधाधुँध गोलीबारी करे।

लेकिन अमेरिका और कनाडा की सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी से उसकी यह खूनी साजिश नाकाम हो गई। शहज़ेब को 4 सितंबर 2024 को कनाडा में अमेरिकी सीमा के पास ही गिरफ्तार कर लिया गया था और अब उसे अमेरिका लाकर 11 जून 2025 को न्यूयॉर्क की कोर्ट में पेश किया जाएगा।

साजिश की कहानी

मुहम्मद शहज़ेब खान, जिसका दूसरा नाम शाहज़ेब जादून भी है, कनाडा में रह रहा था। लेकिन वह आतंकी संगठन ISIS की जहरीली विचारधारा से बुरी तरह प्रभावित था। नवंबर 2023 से उसने सोशल मीडिया और कुछ खास एनक्रिप्टेड ऐप्स पर ISIS का प्रचार करना शुरू कर दिया था।

इसी दौरान वह 2 अंडरकवर अमेरिकी एजेंट्स (जासूसों) के संपर्क में आया और उन्हें बताया कि वह अमेरिका में एक आतंकी हमला करना चाहता है। शुरुआत में शहज़ेब का निशाना कोई और शहर था, लेकिन अगस्त 2024 में उसने अपनी योजना बदली और न्यूयॉर्क सिटी को निशाना बनाने का फैसला किया।

शहज़ेब ने खास तौर पर ब्रुकलिन में एक यहूदी धार्मिक केंद्र को चुना। शहज़ेब ने अमेरिकी एजेंट्स से कहा था, “हम न्यूयॉर्क जा रहे हैं उन्हें काटने के लिए” और शेखी बघारी थी कि यह अमेरिका में 9/11 के बाद की सबसे बड़ी आतंकी घटना हो सकती है।

शहज़ेब ने न्यूयॉर्क शहर के ब्रुकलिन इलाके में एक यहूदी प्रार्थना स्थल को हमला करने के लिए चुना था। शहज़ेब ने अमेरिकी जासूसों से कहा था कि हम न्यूयॉर्क जा रहे हैं उन्हें खत्म करने के लिए। शहज़ेब ने यह भी डींग मारी थी कि यह हमला अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद की सबसे बड़ी आतंकी घटना बन सकता है।

शहज़ेब ने अंडरकवर एजेंट्स से AR-15 राइफलें, चाकू और ढेर सारी गोलियाँ मंगवाईं। 4 सितंबर 2024 को शहज़ेब एक स्मगलर (तस्कर) की मदद से अमेरिका में घुसने की कोशिश कर रहा था, लेकिन कनाडा की सीमा से करीब 12 मील पहले ही उसे पकड़ लिया गया था।

अमेरिका में शहज़ेब पर दो गंभीर आरोप

पहला आरोप ‘आतंकी संगठन को समर्थन देने की कोशिश’ है। इस आरोप में उसे अधिकतम 20 साल तक की जेल हो सकती है।

दूसरा आरोप ‘सीमाओं के पार आतंक फैलाने की साजिश’ है, इस आरोप में उसे अधिकतम उम्रकैद की सजा मिल सकती है।

FBI डायरेक्टर का ट्वीट

FBI के डायरेक्टर ने इस मामले पर जानकारी देते हुए कहा, “@FBI और @NYPDNews की टीम ने न्यूयॉर्क में एक संभावित आतंकी हमले की साजिश को नाकाम कर एक बड़ी सफलता हासिल की है। मुहम्मद शहज़ेब खान नामक व्यक्ति को, जो ISIS से प्रेरित था, यहूदी केंद्र को निशाना बनाने की कोशिश करते हुए पकड़ा गया है।”

FBI डायरेक्टर ने आगे कहा, “यह हमारी साझा सुरक्षा एजेंसियों के बेहतरीन समन्वय और अटूट प्रतिबद्धता का प्रमाण है। हम आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई में हमेशा सतर्क रहेंगे और देश की सुरक्षा सुनिश्चित करते रहेंगे। हमारे एजेंट्स और पार्टनर्स को सलाम।”

डोनाल्ड ट्रंप, जेडी वेंस, एलन मस्क… कौन है ‘किल लिस्ट’ जारी करने वाला अलकायदा आतंकी आतिफ अवलाकी: कहा- अमेरिकी मुस्लिमों जिहाद छेड़ो, ‘कचरा’ साफ करो

यमन बेस्ड आतंकी संगठन अल-कायदा इन द अरेबियन पेनिनसुला (AQAP) के सरगना साद बिन आतिफ अल-अवलाकी ने एक 34 मिनट का वीडियो जारी किया है। इस वीडियो में उसने अमेरिका में रहने वाले मुस्लिमों से जिहाद छेड़ने और वहाँ के बड़े-बड़े लोगों जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस और टेस्ला कंपनी के मालिक एलन मस्क की हत्या करने की खुलेआम अपील की है। इस वीडियो का नाम है “इंसाइटिंग द बिलीवर्स”। इसे AQAP के समर्थक ऑनलाइन प्रोपेगेंडा का हथियार बनाकर सर्कुलेट कर रहे हैं।

साद ने इस वीडियो में कहा कि अमेरिका इजरायल और हमास के बीच चल रही जंग में इजरायल का साथ दे रहा है और इसके लिए उसका बदला लेना जरूरी है। उसने अमेरिका में रहने वाले करीब 45 लाख मुस्लिमों से कहा, “तुम्हें किसी से सलाह लेने की जरूरत नहीं, बस बदला लो! बदला लो! उन काफिर अमेरिकियों को मारो।” उसने ट्रंप, वेंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेग्सेथ और एलन मस्क को ‘धरती का कचरा’ और ‘सबसे बड़े अपराधी’ बताया। उसने इन नेताओं, उनके परिवारों और व्हाइट हाउस से जुड़े लोगों को निशाना बनाने की बात कही।

साद ने गाजा में जारी जंग का जिक्र करते हुए कहा कि वहाँ मुस्लिमों पर हो रहे जुल्मों के बाद अब कोई सीमा नहीं बची। उसने कहा, “गाजा में हमारे लोगों के साथ जो हो रहा है, उसका बदला लेना जरूरी है।” उसने यहूदियों के खिलाफ भी हिंसा भड़काने की कोशिश की और कहा, “यहूदियों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं छोड़नी चाहिए, जैसे उन्होंने फलस्तीनियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी।” उसने गाजा में अस्पतालों पर हो रही बमबारी का हवाला दिया और मुस्लिमों से बदला लेने की अपील की।

इसके साथ ही साद ने हाल के कुछ हमलों की तारीफ भी की। उसने जुलाई 2024 में ट्रंप पर हमले की कोशिश और मई 2025 में वाशिंगटन डीसी में इजरायली दूतावास के कर्मचारियों पर हुए हमले का जिक्र किया। उसने इन हमलों को सही ठहराया और कहा कि ऐसे और हमले होने चाहिए।

साद ने सिर्फ लोगों पर हमले की बात नहीं की, बल्कि उसने अमेरिकी अर्थव्यवस्था और सरकार को भी नुकसान पहुँचाने की बात कही। उसने हैकर्स से कहा कि वो अमेरिका और खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को निशाना बनाएँ। उसने माइक्रोसॉफ्ट और एलन मस्क की कंपनियों जैसे टेस्ला को भी ‘वैध निशाना’ बताया। उसने AQAP की पत्रिका ‘इंस्पायर’ का जिक्र करते हुए लोगों को बम बनाने की तकनीक सीखने की सलाह दी, ताकि वो हमले कर सकें।

ये वीडियो ऐसे समय में आया है, जब AQAP को पिछले कुछ सालों में काफी कमजोर माना जा रहा है। अमेरिका के ड्रोन हमलों और संगठन के अंदर आपसी झगड़ों की वजह से इसकी ताकत कम हुई है। फिर भी संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, AQAP के पास अभी भी 3,000 से 4,000 सदस्य हैं। अमेरिका ने AQAP को विदेशी आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है। ये संगठन 2009 में यमन और सऊदी अरब के अल-कायदा ग्रुपों के गठजोड़ (विलय) के बाद बना था।

विशेषज्ञों का मानता है कि साद गाजा का मुद्दा उठाकर यमन के हूती विद्रोहियों की बढ़ती लोकप्रियता को चुनौती देना चाहता है। हूती विद्रोही भी इजरायल के खिलाफ हमले कर रहे हैं, और साद को लगता है कि हूतियों की लोकप्रियता से AQAP की अहमियत कम हो रही है। जानकारों का मानना है कि ये वीडियो AQAP की तरफ से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश है।

साद बिन आतिफ अल-अवलाकी कौन है?

साद बिन आतिफ अल-अवलाकी यमन के शबवा प्रांत के अल-शुबाह इलाके की अल-अवालिक जनजाति से है। वो 2024 में AQAP का नेता बना, जब संगठन का पुराना सरगना खालिद अल-बतरफी मर गया। इससे पहले साद AQAP की शूरा परिषद का हिस्सा था और हमलों की योजना बनाने में शामिल था। वो अनवर अल-अवलाकी का रिश्तेदार है, जो एक कुख्यात आतंकी था और 2011 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया था। अमेरिका ने साद पर 60 लाख डॉलर का इनाम रखा है, क्योंकि उसने पहले भी अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर हमले की बात कही थी।

साद का जन्म यमन में हुआ था और वो अल-कायदा की विचारधारा को फैलाने में हमेशा सक्रिय रहा है। 2023 में भी वो एक वीडियो में दिखा था, जिसमें उसने यमन की दक्षिणी जनजातियों से संयुक्त अरब अमीरात और दक्षिणी परिषद के खिलाफ लड़ने को कहा था। उसका संगठन अपने खर्चे चलाने के लिए बैंक लूट, हथियार तस्करी और फिरौती जैसे अपराध करता है।