खूबसूरत घड़ियों के लिए दुनियाभर में मशहूर स्विट्जरलैंड 14 जून को एक जनमत संग्रह करने जा रहा है। इसमें स्विस मतदाता ये तय करेंगे कि देश की आबादी को 2050 तक 10 मिलियन यानी 1 करोड़ तक सीमित रखना है या नहीं। इस प्रस्ताव को परंपरावादी स्विस पीपुल्स पार्टी का समर्थन मिला हुआ है।
देश में प्रवासियों की बढ़ती संख्या और जनसंख्या वृद्धि को लेकर चिंता जताई जा रही है। अगर जनमत संग्रह जनसंख्या कैपिंग के पक्ष में आता है, तो स्विटजरलैंड दुनिया का पहला देश होगा, जो जनसंख्या कंट्रोल के लिए ऐसी कैपिंग लगाएगा। हालाँकि इसे पास होने के लिए ‘डबल बहुमत’ की जरूरत है, यानी राष्ट्रीय स्तर पर वोटों का पूर्ण बहुमत और देश के 26 कैंटन (राज्यों) में से ज्यादातर का समर्थन। शुरुआती ओपिनियन पोल से पता चलता है कि ‘हाँ’ और ‘ना’ में करीब का टक्कर है।
Switzerland to vote on far-right proposal to cap population at 10 million
स्विटजरलैंड की जनसंख्या करीब 91 लाख है। जनमंत संग्रह में प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद देश की जनसंख्या 95 लाख से ऊपर जाते ही सरकार इसे रोकने के लिए अहम कदम उठाएगी। सरकार शरणार्थियों और प्रवासियों के प्रवेश पर रोक लगा सकती है। जनसंख्या को बढ़ावा देने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर पुनर्विचार कर सकती है, जिसमें यूरोपीय यूनियन के साथ लोगों की बेरोकटोक आवाजाही की गारंटी देने वाला अहम समझौता भी शामिल है।
संघीय परिषद जनसंख्या कैपिंग के विरोध में हैं
देश के संघीय परिषद ने चेतावनी दी है कि यह प्रस्ताव स्विटरलैंड की आर्थिक समृद्धि को नुकसान पहुँचाएगा। इससे लेबर मार्केट के खुलेपन और यूरोपीय संघ के साथ संबंधों पर असर पड़ेगा, जिससे लंबी अवधि की विकास दर को लेकर अनिश्चितता पैदा हो सकती है। हालाँकि देश फिलहाल मैक्रो-इकोनॉमिक रूप से मजबूत स्थिति में है। यहाँ विकास दर स्थिर है, महँगाई कम है और वैश्विक घटनाक्रम का निकट भविष्य में सीमित असर पड़ने की संभावना है। लोगों का जीवन स्तर दुनिया में सबसे अच्छा है।
लेकिन, सबसे अहम है स्विस लेबर मार्केट के खुलेपन पर रोक, जिसने हाल के दशकों में देश की आर्थिक ग्रोथ को आगे बढ़ाया है। 2022 से EU और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) के सदस्य होने के नाते स्विटरलैंड में इन संगठनों के देशों के नागरिकों को स्विट्जरलैंड में रहने और काम करने का अधिकार है।
फेडरल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस के अनुसार, 2002 और 2024 के बीच लोगों की बेरोकटोक आवाजाही की वजह से स्विट्जरलैंड में प्रति व्यक्ति आय में करीब 24% की बढ़ोतरी हुई, इसलिए इमिग्रेशन ने स्विट्जरलैंड को एक छोटी खुली अर्थव्यवस्था में स्किल की कमी को दूर करने और प्रोडक्टिविटी को सपोर्ट करने की फ्लेक्सिबिलिटी दी है, जो हाई वैल्यू-एडेड इंडस्ट्रीज पर निर्भर है।
राजधानी ज्यूरिख के पास रुशलिकॉन में ‘बेल्वोइर’ और थैलविल में ‘सेडार्टिस’ जैसे लग्जरी होटलों के CEO मार्टिन वॉन मूस ने कहा, “एक स्विस नागरिक के तौर पर, मुझे हमारे देश के भविष्य और उसकी समृद्धि की बहुत चिंता है।”
उन्होंने कहा, “अगर हमारे सभी विदेशी कर्मचारी चले गए, तो होटल चल ही नहीं पाएगा।” उन्होंने बताया कि उनके 115 कर्मचारियों में से लगभग आधे स्विट्जरलैंड के बाहर से हैं।”
यही वजह है कि स्विस नियोक्ता संघ ने कहा है कि देश का भविष्य प्रवासी मजदूरों पर निर्भर रहेगा। संगठन ने चेतावनी दी है कि मजदूरों की कमी की वजह से कंपनियाँ दूसरे देश में शिफ्ट हो सकती हैं। सबसे अहम बात यह है कि यह ‘बूढ़ों का देश’ बनता जा रहा है।
स्विस सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, 2055 तक स्विट्जरलैंड में 20 से 64 साल की उम्र के लोगों की आबादी का हिस्सा 60% से घटकर 56% हो जाएगा। वहीं, 65 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों की आबादी का हिस्सा अभी के 21% से बढ़कर 27% हो जाएगा।
इस सीमा (कैप) का विरोध करने वालों का तर्क है कि कई नए आने वाले लोग उद्यमी रहे हैं, जिन्होंने स्विस अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया है। वे नेस्ले, स्वैच और ABB जैसी जानी-मानी कंपनियों का उदाहरण देते हैं, जिन्हें पूरी तरह या आंशिक रूप से विदेशियों ने शुरू किया था। एवेनिर सुइस (Avenir Suisse) की 2023 की एक स्टडी के अनुसार, स्विट्जरलैंड में कंपनियों के मालिकों में से 39% विदेशी थे।
क्या है जनमत संग्रह के नियम
स्विटरजलैंड में डायरेक्ट डेमोक्रेसी है यानी वे चुनाव के अलावा रेफरेंडम के जरिए किसी भी कानून पर खुद वोट करते हैं कि संसद को कोई काम करना चाहिए या नहीं। इसके लिए पूरे देश में वोटिंग होती है। यहाँ एक नियम यह भी है कि किसी मुद्दे पर डेढ़ महीना पहले यानी करीब 18 महीने के अंदर एक लाख लोग दस्तखत कर दें तो उस मुद्दे पर वोटिंग होती है। यहाँ संसद फैसला नहीं लेती, बल्कि पूरा देश मिलकर जनमत संग्रह के माध्यम से फैसला लेता है।
दरअसल यहाँ की SVP पार्टी देश की संस्कृति की रक्षा के नाम पर प्रवासियों का लगातार विरोध कर रही है और ‘जिससे हमें प्यार है उसे बचाना है’ के नारे लगा रही है। फिलहाल देश की करीब 27 फीसदी आबादी प्रवासियों की है। इसी तरह का एक प्रस्ताव 2014 में पारित हुआ था, लेकिन इसे कभी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया था।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जिस तरह अपराधियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति बनाई है, उसी तरह अब उनसे जब्त की गई सामग्री को भी प्रयोग में लाया जाएगा। दरअसल गाजियाबाद पुलिस ने अलग-अलग थानों के मालखानों में सालों से बंद पड़े 16,378 किलोग्राम (करीब 16 हजार किलो) से ज्यादा के नशीले पदार्थ जब्त कर उसे पूरी तरफ नष्ट किया है।
इसी के साथ, अपराधियों से पकड़ी गई 4.206 किलोग्राम शुद्ध अफीम को नष्ट करने के बजाय सरकारी अफीम कारखाने (गाजीपुर) भेजा गया है। इस अफीम का इस्तेमाल अब नशे के लिए नहीं, बल्कि गंभीर बीमारियों की दवाएँ बनाने में किया जाएगा। योगी सरकार का यह कदम दिखाता है कि कैसे अपराध की सामग्री का इस्तेमाल अब जन-कल्याण के लिए हो रहा है।
थानों में जमा ड्रग्स को ऐसे किया गया नष्ट
गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट के थानों में सालों से भारी मात्रा में नशीले पदार्थ जमा थे। इन मादक पदार्थों की वजह से थानों के मालखानों में जगह कम पड़ रही थी और इनके दुरुपयोग का खतरा भी बना हुआ था। इसी समस्या को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर एक उच्च स्तरीय ड्रग डिस्पोजल कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी में अपर पुलिस आयुक्त अपराध और अपर पुलिस उपायुक्त यातायात जैसे वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया था।
इस विशेष कमेटी ने कोर्ट, संबंधित विभागाध्यक्षों और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) से सभी जरूरी कानूनी अनुमतियाँ और अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) प्राप्त किए। इसके बाद बुधवार (10 जून) को धौलाना स्थित एक अधिकृत बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट एंड डिस्पोजल केंद्र में कुल 63 मुकदमों से जुड़े मादक पदार्थों को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। नष्ट किए गए सामान में सबसे अधिक मात्रा नंदग्राम थाने से बरामद हुई 15,735 लीटर कोडीन युक्त नशीली कफ सिरप की थी। नियमों के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी कराई गई।
जब्त अफीम से दवा बनने की पूरी प्रक्रिया
अफीम एक खास पौधे से मिलती है। इस पौधे का नाम ‘अफीम पोस्त‘ है। इसे वैज्ञानिक भाषा में पैपावर सोम्रिफेरस कहते हैं। इस पौधे पर हरे रंग के कच्चे फल लगते हैं। इन कच्चे फलों को ‘डोडा’ कहा जाता है। जब इन डोडों पर हल्का सा चीरा लगाया जाता है, तो उनमें से सफेद रंग का गाढ़ा दूध जैसा रस निकलता है। यही रस हवा के संपर्क में आकर सूख जाता है और गोंद जैसा काला-भूरा बन जाता है। इसी सूखे रस को हम अफीम कहते हैं।
अफीम के अंदर कई तरह के प्राकृतिक तत्व होते हैं। विज्ञान की भाषा में इन तत्वों को ‘एल्कलॉइड्स’ कहते हैं। अफीम में ऐसे 25 से ज्यादा अलग-अलग तत्व पाए जाते हैं। जब पुलिस अपराधियों से यह अफीम पकड़ती है, तो उसे गाजीपुर के सरकारी कारखाने में भेजा जाता है। इस कारखाने को ‘सरकारी अफीम और अल्कलॉइड वर्क्स’ (GOAW) कहते हैं। यहाँ वैज्ञानिक सबसे पहले लैब में अफीम की पूरी जाँच करते हैं। वह देखते हैं कि अफीम कितनी असली है। इसके बाद मशीनों की मदद से अफीम को अच्छी तरह साफ किया जाता है।
अफीम से कैसे निकाली जाती है दवा?
साफ करने की इस प्रक्रिया को ‘प्रोसेसिंग’ कहते हैं। प्रोसेसिंग के दौरान वैज्ञानिक अफीम के अंदर से दो सबसे जरूरी तत्व अलग करते हैं। पहले तत्व का नाम ‘मॉर्फीन’ है। दूसरे तत्व का नाम ‘कोडीन’ है। ये दोनों तत्व बहुत काम के होते हैं। जब ये तत्व अफीम से अलग हो जाते हैं, तो सरकार इन्हें दवा बनाने वाली बड़ी कंपनियों को बेच देती है। ये कंपनियाँ इन तत्वों की मदद से बहुत ही असरदार और तेज दर्द को ठीक करने वाली दवाएँ तैयार करती हैं।
इन दोनों तत्वों का काम अलग-अलग बीमारियों में होता है। उदाहरण के लिए, ‘कोडीन’ नाम के तत्व का इस्तेमाल सूखी खांसी को ठीक करने के लिए किया जाता है। इससे खांसी के कफ सिरप बनाए जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, ‘मॉर्फीन’ नाम का तत्व बहुत तेज दर्द को रोकने के काम आता है। डॉक्टर इसका इस्तेमाल गंभीर मरीजों के लिए करते हैं। मॉर्फीन की मदद से दर्द को दबाने वाले इंजेक्शन और गोलियाँ (टैबलेट) बनाई जाती हैं। इस तरह यह अफीम मरीजों का जीवन बचाने के काम आती है।
क्या हर पकड़ी गई अफीम से दवा बन सकती है?
यहाँ एक बात समझना बहुत जरूरी है। पुलिस जो भी अफीम पकड़ती है, उस हर अफीम से दवा नहीं बनाई जा सकती। असल में, नशा बेचने वाले तस्कर बहुत चालाक होते हैं। वे ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए अफीम में मिलावट कर देते हैं। वे अफीम का वजन बढ़ाने के लिए उसमें स्टार्च, पाउडर या खराब केमिकल मिला देते हैं। कभी-कभी तो इसमें आर्सेनिक और लेड जैसी जहरीली चीजें भी मिला दी जाती हैं। ऐसी मिलावटी अफीम इंसानी शरीर के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक और जानलेवा हो जाती है।
जब पुलिस इस अफीम को गाजीपुर या नीमच के सरकारी कारखाने में भेजती है, तो वहाँ सबसे पहले उसकी शुद्धता जाँची जाती है। इसके लिए लैब में एक खास टेस्ट होता है। अगर टेस्ट में अफीम मिलावटी निकलती है, तो कारखाना उसे लेने से मना कर देता है। यही नहीं, अगर अफीम में सीलन (नमी) या फंगस लगी हो, तो भी वह रिजेक्ट हो जाती है। ऐसी खराब अफीम को दवा बनाने के लायक नहीं माना जाता। बाद में, इस खराब अफीम को भी बाकी नशीले पदार्थों की तरह आग में जलाकर या केमिकल डालकर पूरी तरह नष्ट कर दिया जाता है। कारखाने में सिर्फ और सिर्फ एकदम शुद्ध अफीम का ही इस्तेमाल दवा बनाने के लिए होता है।
योगी सरकार: अपराध खत्म कर लोगों की भलाई का नया सफर
उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ की सरकार आई है, कामकाज का तरीका बिल्कुल बदल गया है। पहले के समय में पुलिस जो करोड़ों रुपए की अफीम पकड़ती थी, वह थानों के मालखानों में सालों तक बंद रहती थी। वह रखी-रखी सड़ जाती थी या फिर कई बार चोरी भी हो जाती थी। लेकिन अब योगी सरकार ने इस पूरे सिस्टम को साफ-सुथरा और बेहतर बना दिया है। अब पकड़ी गई चीजों का सही इस्तेमाल हो रहा है।
सरकार की इस नई नीति से एक साथ दो बड़े फायदे हो रहे हैं। पहला फायदा यह है कि पुलिस नशे का काला कारोबार करने वाले अपराधियों को पकड़कर उनका पूरा नेटवर्क तोड़ रही है। दूसरा फायदा यह है कि उनसे जो अफीम मिल रही है, उसका इस्तेमाल बीमार और लाचार लोगों के इलाज के लिए किया जा रहा है। सरकार एक तरफ अपराधियों पर कड़ा एक्शन ले रही है, तो दूसरी तरफ उनकी जब्त की गई चीजों को जनता की भलाई में लगा रही है। यह सरकार की एक बहुत अच्छी और दूर की सोच को दिखाता है।
पुलिस और कानून के लिए क्यों जरूरी है यह कदम?
कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह कार्रवाई बहुत जरूरी है। थानों के मालखानों में बहुत ज्यादा नशा जमा रखना खतरे से खाली नहीं होता। हमेशा डर रहता है कि कहीं यह नशीले पदार्थ चोरी न हो जाएँ। यह भी डर रहता है कि कोई इन्हें दोबारा चोरी-छिपे बाजार में न बेच दे। इसलिए समय-समय पर अभियान चलाकर इन्हें नष्ट करना बहुत जरूरी है। इससे थानों का रिकॉर्ड एकदम साफ हो जाता है और पुलिस के कामकाज में ईमानदारी बनी रहती है।
गाजियाबाद पुलिस ने इन नशीले पदार्थों को खुले में नहीं जलाया। खुले में जलाने से हवा जहरीली हो जाती है। इसके बजाय पुलिस इन्हें धौलाना के एक विशेष वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट में लेकर गई। वहाँ पूरी सावधानी और नियमों के साथ इन्हें नष्ट किया गया। इससे पर्यावरण को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुँचा। उत्तर प्रदेश पुलिस का यह कदम देश के बाकी राज्यों के लिए भी एक मिसाल है। यह दिखाता है कि कैसे कड़े नियमों का पालन करके जनता की भलाई और सुरक्षा की जा सकती है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी की पार्टी TMC लगभग टूट की कगार पर खड़ी है। अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आ रही है कि ममता बनर्जी के विरोध में विधायकों और सांसदों के बड़े-बड़े गुट बन गए हैं। कई राज्यसभा सांसद एक के बाद एक इस्तीफा दे रहे हैं। गुरुवार (11 जून 2026) तक शुखेंदु शेखर, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक इस्तीफा दे चुके हैं।
अनुमान लगाया जा रहा है कि TMC से टूट के बाद ये नेता बड़ी संख्या में सत्तारूढ़ BJP का रुख कर सकते हैं। चुनावी हार के बाद से ही लगातार TMC के कई नेताओं, प्रवक्ताओं और सांसदों का रुख बदला हुआ है। BJP को लेकर दिखने वाला उनका आक्रामक रुख शांत है और कई तो BJP सरकार और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की तारीफ भी कर चुके हैं।
ऐसे में यदि चुनावी हार के बाद बड़ी संख्या में TMC के नेता भाजपा (BJP) की ओर आते हैं तो यह भाजपा के लिए जितना अवसर है, उतनी ही बड़ी चुनौती या कहें तो परीक्षा भी है। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि TMC से कौन BJP में आ रहा है बल्कि यह है कि वे अपने साथ क्या लेकर आ रहे हैं- अनुभव या वही पुराना तंत्र?
किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव जीतना जरूरी होता है। लोकतंत्र में संख्या मायने रखती है। BJP को केंद्र की सरकार चलानी है, कई महत्वपूर्ण विधेयक (Bills) पास कराने हैं, संगठन को मजबूत करना है, स्थानीय स्तर पर पकड़ बनानी है और इन सबके लिए अनुभवी नेताओं और प्रभावशाली चेहरों की जरूरत पड़ती है।
इन्हीं वजहों से विपक्षी दलों के नेताओं को पार्टी में शामिल किया जाता है या उनका समर्थन लिया जाता है। BJP को इसकी जरूरत दिखाई भी पड़ रही है। लेकिन यहीं BJP को सँभालने की भी जरूरत है। कुछ दिनों पहले बंगाल के BJP के मंत्री स्वपन दासगुप्ता भी यही चिंता जता चुके हैं।
स्वपन दासगुप्ता ने X पर एक पोस्ट में लिखा था, “मैं TMC की इस खुद की बर्बादी पर कोई दुख या अफसोस नहीं जताता। मेरी बस यही उम्मीद है कि इन उपद्रवी लोगों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल BJP को खराब न करने लगे।”
उन्होंने लिखा था, “बीजेपी में हमें हमेशा ऐसे झूठे दोस्तों से सावधान रहना होगा, जो आज अपने पुराने पाप और गलतियाँ छिपाने या धोने के लिए हमारे करीब आने की कोशिश कर रहे हैं। बंगाल को इस खराब राजनीतिक माहौल से पूरी तरह बाहर निकालने का काम अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता।”
I shed no tears for the TMC’s self-destruction. My only hope is that the political culture of the vandals doesn’t start contaminating the W.Bengal BJP. We in the BJP have to be always wary of false friends who are today cosying up to us because they need to wash away their past…
स्वपन दासगुप्ता की यह चिंता बेजा नहीं है। क्योंकि पश्चिम बंगाल में लोगों की नाराजगी केवल किसी एक पार्टी से नहीं रही बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति से रही है जिसमें स्थानीय स्तर पर पार्टी का मतलब ही प्रशासन बन जाना, गुंडई करना, राजनीतिक विरोध को दबाना और संगठन का डर पैदा करना शामिल रहा है।
लेफ्ट शासन के दौरान ‘कैडर राज’ खूब चर्चा में रहा। बाद में TMC पर भी वही आरोप लगे कि उसने केवल झंडा बदला लेकिन तरीका नहीं। ऐसे में यदि BJP खुद को एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में पेश करती है तो उसके सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति परिवर्तन का भरोसा दे।
TMC के जिन नेताओं के भाजपा में आने की चर्चा होती है, उनमें कई ऐसे होते हैं जो वर्षों तक उसी व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं जिसकी आलोचना BJP करती रही है। इनमें से कुछ पर स्थानीय दबंगई, भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा या अवसरवाद के आरोप भी लगे होते हैं। ऐसे नेताओं को बिना किसी राजनीतिक या नैतिक फिल्टर के पार्टी में शामिल करने से खतरा पैदा होने की संभावना है।
संगठन का मूल कार्यकर्ताओं के हाशिए पर जाने की तो चिंताएँ रहेंगी ही लेकिन सबसे बड़ी चिंता होगी उसी कल्चर के लौट आने की। भाजपा सत्ता में आई है और मान लीजिए कि नेतृत्व के केंद्र में फिर वे ही लोग आ जाते हैं जो पहले TMC की स्थानीय सत्ता संरचना का हिस्सा थे। तब क्या गारंटी है कि वही ‘सिस्टम’ वापस नहीं आएगा।
कई बार राजनीति में लोग विचारधारा नहीं, सत्ता के हिसाब से दल बदलते हैं। ऐसे नेताओं की प्राथमिकता अक्सर संगठन नहीं बल्कि अपना प्रभाव बनाए रखना होती है। अगर उन्हें बिना शर्त जगह मिलती है, तो वे अपने पुराने नेटवर्क, पुराने तौर-तरीके और पुराने समीकरण भी साथ लाते हैं।
यह कहना भी व्यावहारिक नहीं होगा कि किसी भी दूसरे दल के व्यक्ति को BJP में नहीं आना चाहिए। लोकतंत्र में राजनीतिक बदलाव स्वाभाविक है। कई नेता सचमुच विचार बदलकर आते हैं। कई लोग किसी पार्टी की गलतियों से निराश होकर नया रास्ता चुनते हैं। लेकिन BJP को सतर्कता तो बरतनी ही होगी।
BJP को यह याद रखना होगा कि बंगाल के लोगों ने केवल एक पार्टी बदलने के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक तंत्र बदलने की उम्मीद में विकल्प तलाशा है। अगर वही चेहरे, वही मानसिकता और वही सत्ता संस्कृति नए झंडे के नीचे लौट आई तो BJP के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसलिए बीजेपी को इसका ध्यान रखना होगा कि अगर नेता आएँ भी तो वो तंत्र ना लौट आए जिससे लोग दशकों तक परेशान होकर BJP को सत्ता में लाए हैं।
उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों, जैसे- लखनऊ के केजीएमयू, सीजीपीजीआई में हाल में सामने आए धर्मांतरण के मामलों को देखते हुए योगी सरकार इस पर अंकुश लगाने के लिए एक सेल बनाने जा रही है। इससे पहले राज्य भर में जबरन धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म समपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक लागू किया था, जिसके तहत दोषियों को 20 साल तक की कैद या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है।
अब राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने मेडिकल कॉलेजों में धर्मांतरण और लव जिहाद के मामले की गंभीरता को समझते हुए चिकित्सा संस्थानों में धर्मांतरण रोकथाम के लिए विशेष निगरानी सेल बनाने के निर्देश दिए है। कुलाधिपति के विशेष कार्याधिकारी डॉ. सुधीर एम बोबड़े की ओर से विश्वविद्यालय को पत्र भेज कर जरूरी कदम उठाने को कहा है।
क्या है धर्मांतरण रोकथाम निगरानी सेल
केजीएमयू के बाद लखनऊ पीजीआई से लव जिहाद का मामला सामने आने से हड़कप मच गया। यहाँ एक लड़की पिछले कई दिनों से लापता है। इसको देखते हुए राज्यपाल ने निगरानी सेल बनाने के निर्देश दिए। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी यूनिवर्सिटी से जुड़े सभी उत्तर प्रदेश के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में ऐसे सेल का निर्माण किया जा रहा है, जो धर्मांतरण संबंधी गतिविधियों को रोकेगा।
कैसे काम करेगा सेल
सेल छात्रो, डॉक्टरों और कॉलेज के कर्मचारियों को धर्मांतरण को लेकर जागरूक करेगा।
किसी भी तरह के संदिग्ध गतिविधियों पर कड़ी नजर रखेगा।
छात्रों और कर्मचारियों को नियमों, अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में जानकारी दी जाएगी।
समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाया जाएगा, ताकि सभी अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सचेत रहें।
किसी भी तरह की शिकायत मिलने पर उसे कॉलेज दबाएगा नहीं, बल्कि मामले के तह तक जाकर नियमानुसार एक्शन लेगा।
विश्वविद्यालय प्रशासन का उद्देश्य है कि शैक्षणिक संस्थानों में स्वस्थ और सुरक्षित वातावरण बना रहे, इसलिए सेल का निर्माण किया जा रहा है।
धर्मांतरण से जुड़ी एक के बाद एक कई मामले सामने आने के बाद छात्र-छात्राओं समेत संस्थान के तमाम लोगों की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए। जाँच में ये पता चला कि संस्थानों के हॉस्टल और मेडिकल कॉलेज परिसर में धर्मांतरण गिरोह सक्रिय है, जो जूनियर छात्रों, डॉक्टरों, नर्सिंग के छात्र, डॉक्टरों और कर्मचारियों को निशाना बना रहा है। सेल के माध्यम से इन गिरोहों पर लगाम कसी जाएगी।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी कॉलेजों को जल्द सेल गठित करने और उसकी सूचना विश्वविद्यालय को देने को कहा है। धर्मांतरण को लेकर किसी भी तरह की शिकायत मिलने पर नियम के मुताबिक कार्रवाई करने के लिए कहा गया है। इसको लेकर सतर्कता बढ़ाने के लिए कहा गया है।
एसजीपीजीआई में ‘लव जिहाद’ का मामला
एसजीपीजीआई परिसर में रहने वाले एक हिन्दू परिवार की 21 साल की बेटी अचानक 26 मई 2026 को लापता हो गई। परिवार के संपर्क में रहने वाले इरशाद अली पर परिवार ने धर्मांतरण करने और उसे सीरिया भेजने का आरोप लगा रहा है। इरशाद अली ने युवती को प्रेमजाल में फँसा कर परिवार से ‘दोस्ती’ कर ली थी।
वह लड़की को सीरिया ले जाने की बात कह रहा था। इरशाद अली को पीजीआई के डॉक्टर अजमल का समर्थन मिला हुआ था। डॉक्टर अजमल ने पीजीआई परिसर में मस्जिद बनवाया था। एक और मस्जिद उसने पहलगाम में बनवाया था। डॉक्टर अजमल के विदेश जाने पर फिलहाल रोक लगी हुई है। इस घटना ने पीजीआई में युवती को बहला फुसला कर सीरिया जैसे इस्लामिक देश भेजने, धर्मांतरण करने और उसमें संस्थान की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
केजीएमयू में धर्मांतरण मामला
लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में हिंदू महिला डॉक्टर के लव जिहाद का मामला हाल ही में सामने आया था। महिला डॉक्टर को प्रेम जाल में फँसाकर डॉ. रमीजुद्दीन ने उसका शोषण किया और उस पर धर्मांतरण का दबाव बनाया। रमीजुद्दीन शादीशुदा था और उसने हिन्दू लड़की का धर्मांतरण करा कर उससे निकाह कर रखा था।
रमीजुद्दीन की बीवी ने ही हिन्दू महिला डॉक्टर को पूरी कहानी बताई थी। मामला सामने आने के बाद परत-दर-परत कट्टरपंथियों की साजिश का पता चला। इस धर्मांतरण का राजनीतिक गठजोड़ भी सामने आया और पता चला कि कैसे सपा-बसपा जैसे राजनीतिक दल सालों से इनलोगों के संरक्षक बने हुए थे। इस दौरान पता चला कि सिर्फ डॉक्टर रमीजुद्दीन ही नहीं उसका अब्बू सलीमुद्दीन भी 4 हिन्दू महिलाओं से निकाह कर रखा था और उन्हें इस्लाम कबूलने के लिए मजबूर किया था।
आगरा मेडिकल कॉलेज में धर्मांतरण के मामले
डॉक्टर रमीजुद्दीन ने अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई आगरा मेडिकल कॉलेज से की थी। 2012 में वहाँ इस्लामिक मेडिकोज मीट नाम से संगठन बनाया था। इसकी बैठकों में मौलाना छात्रों को बताते थे कि कैसे हिन्दू लड़कियों से नजदीकी बढ़ाकर इस्लाम कबूल करवाया जाए और निकाह करने के लिए मजबूर किया जाए।
इस्लामिक मेडिकोज नाम का एक वॉट्सऐप ग्रुप भी था जिसमें ये कट्टरपंथी जुड़े हुए थे। डॉक्टर रमीजुद्दीन की तरह की 4-5 डॉक्टर बस इस काम में ही लगे हुए थे। रमीजुद्दीन लड़कियों को सेक्स पॉवर दिखाने के लिए अमेरिका से गाँजा भी मँगवाता था और उसका सेवन करता था।
रमीजुद्दीन जब केजीएमयू आया तो उसक वक्त 4-5 मुस्लिम डॉक्टर कट्टरपंथी भगोड़ा जाकिर नाइक के संपर्क में थे। 2004 के आसपास केजीएमयू में इनका प्रभाव इतना था कि हिजाब पहनना और बकरदाढ़ी रखना आम हो गया। ये लोग हिन्दू लड़कियों को फँसाने लगे थे।
केजीएमयू और आगरा मेडिकल कॉलेज दोनों में ही इस्लामिक मेडिकोज मीट होती थी। यही वजह है कि हिन्दू लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाने और धर्मातरण कराने का तरीका भी दोनों जगहों पर एक जैसा था।
वर्षों से चल रहा धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ का खेल
यह साफ नहीं है कि KGMU और आगरा के ये समूह आपस में जुड़े थे या अलग-अलग काम कर रहे थे। इतना जरूर है कि मेडिकल कॉलेजों में मौलानाओं का आना-जाना धीरे-धीरे सामान्य होता गया। बस्ती मेडिकल कॉलेज में पिछले एक साल से मौलाना आने लगे। बुलंदशहर मेडिकल कॉलेज में तो एक फर्स्ट-ईयर के HOD पर मेडिकल साइंस पढ़ाते समय हदीस के उदाहरण देने का आरोप लगा, जिसे बाद में साथी फैकल्टी ने समझाकर रोका।
बुलंदशहर में मुस्लिम छात्रों की संख्या अधिक होने के कारण नमाज की व्यवस्था के लिए प्रिंसिपल पर दबाव भी बनाया गया। हालाँकि, विरोध के बाद यह संभव नहीं हो पाया। कुल मिलाकर, मौलानाओं की मौजूदगी अब कई मेडिकल कॉलेजों में आम हो गई है।
डॉ भूपेंद्र बताते हैं कि आज से करीब 10-15 साल पहले भी KGMU धर्मांतरण का बड़ा अड्डा बना हुआ था। उस समय सपा-बसपा की सरकारें थीं और आसपास की मस्जिदों से मौलाना अक्सर कैंपस में आते-जाते थे। बाद में योगी सरकार आने के बाद काफी समय तक हालात शांत रहे। पिछले कुछ सालों से यह गतिविधियाँ फिर से शुरू हो गई हैं।
रमीज का दिल्ली विस्फोट के अपराधी से संबंध
दिल्ली के लाल किले के पास हुए बम विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए डॉ. परवेज अंसारी के साथ रमीज़ के संबंधों का भी खुलासा हुआ है। उन्होंने एसएन मेडिकल कॉलेज की छात्राओं का धर्म परिवर्तन कराने के उद्देश्य से एक नेटवर्क बनाया था। दोनों एक ही छात्रावास में साथ रहते थे और हिंदू लड़कियों को लुभाने की योजना बनाते थे। उन्होंने कई मौलवियों को मिलाकर एक समूह बनाया था। कॉलेज में दाखिला लेने वाली हर नई मुस्लिम छात्रा को उनके समूह में शामिल कर लिया जाता था।
मेडिकल के छात्र और जूनियर डॉक्टर सबसे पहले अपनी महिला सहपाठियों से धर्म परिवर्तन कराने के उद्देश्य से दोस्ती करते थे। वे उनकी हर हरकत पर बारीकी से नज़र रखते थे, व्याख्यान कक्ष से लेकर पुस्तकालय तक उनके साथ रहते थे। एक बार घनिष्ठता स्थापित हो जाने पर, वे लड़कियों के आपत्तिजनक वीडियो रिकॉर्ड करते थे और फिर उनका इस्तेमाल उन्हें इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए दबाव डालने के लिए करते थे। ऐसी खबरें हैं कि कई महिलाएँ और छात्राएँ इस साजिश का शिकार हुईं।
राज्यभर में जबरन धर्मांतरण और ‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म समपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक लागू किया था, जिसके तहत दोषियों को 20 साल तक की कैद या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है ।
ऐसे मामलों पर अंकुश लगाने के लिए योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म समपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक लागू किया है। लालच, धोखाधड़ी से धर्मांतरण कराने पर 3 से 10 साल की जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है। विदेशी फंडिंग या बड़े पैमाने पर अवैध धर्मांतरण कराने पर 7 से 14 वर्ष तक की सजा और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का नियम है।
शादी का झाँसा देकर, ब्लैकमेल कर या जबरन धर्म परिवर्तन कराने जैसे मामलों में 20 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। नए संशोधनों के अनुसार, अब किसी भी व्यक्ति को पीड़ित होने पर या अवैध धर्मांतरण की सूचना देने पर FIR दर्ज कराने का अधिकार दिया गया है। ऐसे मामलों में जमानत पर भी सख्ती बरती गई है।
आज के समय में सोशल मीडिया पर समझदारी से ज्यादा गुस्सा और विवाद तेजी से फैलते हैं। ऐसे माहौल में कई बार सिर्फ ध्यान खींचने के लिए लोग बिना वजह विवाद खड़ा कर देते हैं। इसी महीने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर प्रसाद वेदपाठक ने भी कुछ ऐसा ही किया, जब उन्होंने महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई की एक हाउसिंग सोसाइटी में जैन मुनियों की सुविधा के लिए बनाए गए सफेद रास्ते को लेकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की।
सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ी इस व्यवस्था को प्रसाद वेदपाठक ने सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। उन्होंने इसे ‘जैन जिहाद’ जैसा भड़काऊ और विवादित शब्द कहकर पेश किया जिसके बाद जैन समुदाय ही नहीं बल्कि दूसरे लोगों ने भी इस पर आपत्ति जताई और विरोध किया।
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यह विवाद एक बार फिर एक अहम सवाल खड़ा करता है कि आखिर प्रसाद वेदपाठक कौन हैं और वे ऐसी परंपरा को लेकर जैन समुदाय पर निशाना क्यों साध रहे हैं, जिसकी जड़ें करुणा और मानवता में निहित हैं?
कैसे एक सफेद रास्ते को बना दिया गया ‘जैन जिहाद’
पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब प्रसाद वेदपाठक ने मुंबई के घाटकोपर इलाके की एक हाउसिंग सोसाइटी के वीडियो पोस्ट किए। इन वीडियो में उन्होंने जैन मुनियों के आने-जाने की सुविधा के लिए बनाए गए सफेद रास्तों पर आपत्ति जताई।
गौरतलब है कि जैन मुनि अक्सर नंगे पैर चलते हैं और अहिंसा व सादगी के बेहद सख्त नियमों का पालन करते हैं। गर्मियों के दौरान कई जगह रास्तों पर अस्थायी रूप से सफेद कोटिंग की जाती है ताकि जमीन कम गर्म रहे और मुनियों को चलने में आसानी हो।
वहीं, बारिश के मौसम में सीमेंट के रास्तों पर अक्सर काई जम जाती है। जैन दर्शन के अनुसार, काई सिर्फ एक परत नहीं बल्कि जीवित तत्व मानी जाती है, जिसमें अनगिनत सूक्ष्म जीव मौजूद होते हैं। चूँकि जैन मुनि हर जीव के प्रति अहिंसा के सिद्धांत का पालन करते हैं इसलिए वे काई पर चलने से बचते हैं क्योंकि ऐसा करने से उन सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुँच सकता है।
इसी वजह से कई बार रास्तों के कुछ हिस्सों पर सफेद पेंट या सफेदी की जाती है। इससे एक तरफ गर्मियों में जमीन ठंडी रहती है, वहीं बारिश में काई जमने की संभावना भी कम हो जाती है। इसका उद्देश्य किसी तरह का अलगाव, कब्जा या क्षेत्र पर दावा करना नहीं होता जैसा कि वेदपाठक और कुछ अन्य लोगों ने दिखाने की कोशिश की। इसका मकसद सिर्फ इतना होता है कि जैन मुनि सुरक्षित तरीके से चल सकें और गोचरी (भोजन के लिए घर-घर जाना) जैसी अपनी धार्मिक परंपरा निभाते हुए अनजाने में किसी जीव को नुकसान न पहुँचे।
यानी जिसे प्रसाद वेदपाठक ने धार्मिक दबदबे या ‘जैन जिहाद’ की तरह दिखाने की कोशिश की वह असल में जैन धर्म के सबसे मूल सिद्धांतों में से एक ‘हर छोटे से छोटे जीव के प्रति करुणा’ का हिस्सा है।
इस परंपरा को पहले समझने की कोशिश करने के बजाय वेदपाठक ने इसे ‘जैन जिहाद’ जैसा भड़काऊ नाम दे दिया। सोशल मीडिया पर कई लोगों जिनमें जैन समुदाय के सदस्य भी शामिल थे ने इसके पीछे की परंपरा और वजह समझाने की कोशिश की। एक सोशल मीडिया यूजर ने सोसाइटी में सफेद रास्ता बनाए जाने की जैन परंपरा को विस्तार से समझाया जिसका वीडियो नीचे देखा जा सकता है।
हालाँकि, लोगों द्वारा वजह समझाने के बाद भी प्रसाद वेदपाठक अपने दावे पर अड़े रहे। उन्होंने इस पूरे मामले को ‘इलाके पर कब्जा दिखाने’, ‘धार्मिक राजनीति’ और जैन समुदाय द्वारा कथित दबदबा बनाने से जोड़कर पेश करना जारी रखा।
बाद में उन्होंने उस सफेद रास्ते को दोबारा पेंट भी करवा दिया। लेकिन तब तक ऐसा लग रहा था कि उनका मकसद पूरा हो चुका था कि खुद को इस लड़ाई का विजेता दिखाना, खुद को पीड़ित पक्ष बताना और विवाद को लगातार जिंदा रखकर चर्चा और ध्यान बटोरना।
विवाद भड़काने के बाद खुद को पीड़ित बताने की कोशिश
जब उनके बयान को लेकर आलोचना बढ़ने लगी, तब प्रसाद वेदपाठक का रुख अचानक बदलता दिखा। एक लंबे सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने दावा किया कि वे हमेशा से जैन धर्म की करुणा, विनम्रता और अहिंसा की भावना की प्रशंसा करते रहे हैं। उन्होंने जैन समुदाय से अपील भी की कि वे उन सोसाइटी निवासियों के प्रति सहानुभूति दिखाएँ जिन्हें कथित तौर पर इस सफेद रास्ते से परेशानी हुई।
हालाँकि, उनके इस बयान में सबसे अहम सवाल का जवाब नहीं था कि आखिर उन्होंने शुरुआत में जैन समुदाय को ‘दबदबा बनाने वाला’ क्यों बताया और एक सामान्य धार्मिक परंपरा को ‘जैन जिहाद’ जैसा भड़काऊ नाम क्यों दिया?
दिलचस्प बात यह रही कि जैन धर्म के प्रति सम्मान जताने का दावा करने के बावजूद वे बार-बार यह संकेत देते रहे कि यह सफेद रास्ता किसी तरह की धार्मिक ताकत दिखाने का तरीका है और जैन समुदाय दूसरों पर अपनी बात थोप रहा है।
यही बात लोगों को खटकती रही और उनके रुख में विरोधाभास साफ नजर आया। अगर मामला सिर्फ सोसाइटी की सहमति या स्थानीय व्यवस्था का था, तो फिर ऐसी भाषा का इस्तेमाल क्यों किया गया जो साफ तौर पर सांप्रदायिक प्रतिक्रिया भड़काने वाली मानी जा सकती है?
जैनों के खिलाफ हिंदुओं को खड़ा करने की कोशिश?
इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू शायद यह था कि प्रसाद वेदपाठक ने मामले को ‘महाराष्ट्र के लोग बनाम जैन’ के रूप में पेश करने की कोशिश की। वीडियो, कैप्शन और लगातार सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए उन्होंने यह माहौल बनाने का प्रयास किया कि जैन समुदाय कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा प्रभाव रखने वाला और दबदबा बनाने वाला समूह है।
उनकी यह बात सोशल मीडिया पर पहले से कट्टर सोच रखने वाले कुछ लोगों के बीच तेजी से फैली और उन्होंने इस नैरेटिव को आगे बढ़ाया।
इसी दौरान ‘विवादित एक्टिविस्ट’ तीस्ता सीतलवाड़ ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। 2002 के गुजरात दंगों और फर्जी दस्तावेज, गवाहों को प्रभावित करने जैसे आरोपों से जुड़े मामले में 2022 में गुजरात ATS द्वारा गिरफ्तार की जा चुकी तीस्ता सीतलवाड़ ने सफेद रास्ते के विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जैन ‘नए दबदबा बनाने वाले’ बनते जा रहे हैं और मुंबईकरों के खिलाफ काम कर रहे हैं।
विडंबना यह है कि भारत की कुल आबादी में जैन समुदाय की हिस्सेदारी करीब 0.4 प्रतिशत ही है। इसके बावजूद, वही समूह जो अक्सर इस्लामी कट्टरता या मुस्लिम वर्चस्ववाद को लेकर उठने वाली चिंताओं को ‘बहुसंख्यक मानसिकता’ कहकर खारिज कर देता है, उसने अचानक इस छोटे से समुदाय को सामाजिक सौहार्द के लिए खतरे की तरह पेश करना शुरू कर दिया।
जब जमीन कब्जाने, जबरन धर्मांतरण की कोशिशों या धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाने जैसे मामलों पर सवाल उठते हैं, तब ऐसे कई एक्टिविस्ट मुसलमानों को बहुसंख्यक पूर्वाग्रह का शिकार बताने लगते हैं। लेकिन जैन समुदाय के मामले में तस्वीर उलटी दिखाई गई और एक छोटे अल्पसंख्यक समुदाय को उसकी सदियों पुरानी, अहिंसा, करुणा और हर जीव के सम्मान पर आधारित परंपरा का पालन करने के लिए निशाना बनाया गया।
कुल मिलाकर, सफेद रास्ते को लेकर प्रसाद वेदपाठक द्वारा शुरू किए गए विवाद से लेकर जैन समुदाय को ‘दमनकारी’ की तरह दिखाने की कोशिश तक, पूरे घटनाक्रम में एक सुनियोजित अभियान जैसी झलक दिखी जिसका मकसद जैन समुदाय और हिंदू समाज के बीच दूरी पैदा करना प्रतीत हुआ।
वेदपाठक ने पहलगाम आतंकी हमले को ‘इस्लामिक जिहाद’ कहने से किया परहेज
प्रसाद वेदपाठक का सेलेक्टिव आक्रोश उस समय और साफ नजर आता है, जब उसकी तुलना अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले पर उनकी प्रतिक्रिया से की जाती है। इस हमले में पाकिस्तानी आतंकियों ने पर्यटकों की धार्मिक पहचान पूछकर उन्हें निशाना बनाया था और उनकी हत्या कर दी थी।
हालाँकि, इस घटना के पीछे मौजूद इस्लामी जिहादी सोच पर खुलकर सवाल उठाने के बजाय, वेदपाठक ने लोगों को ‘एकता’ का संदेश देना ज्यादा जरूरी समझा। उन्होंने लोगों को पीड़ितों की हिंदू पहचान पर चर्चा न करने की सलाह दी और कहा कि ऐसा करने वाले लोग अनजाने में आतंकियों के एजेंडे को ही आगे बढ़ा रहे हैं।
उन्होंने लोगों से सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने की बात कही और इस हमले को मुख्य रूप से प्रशासनिक या सुरक्षा व्यवस्था की विफलता के रूप में पेश किया, न कि धार्मिक नफरत से प्रेरित हिंसा के तौर पर।
जब आतंकियों ने लोगों को हिंदू होने की वजह से चुनकर निशाना बनाया, तब वेदपाठक सांप्रदायिक चर्चा से बचने, एकता बनाए रखने और प्रशासनिक जवाबदेही की बात करते दिखे। लेकिन जब मामला जैन धर्म की एक पुरानी और अहिंसा पर आधारित धार्मिक परंपरा का आया, तब उन्होंने बिना हिचक इसे ‘जैन जिहाद’ कह दिया और एक छोटे अल्पसंख्यक समुदाय को सामाजिक समस्या की तरह पेश करने लगे।
पहली बार नहीं जब वेदपाठक ने जैन परंपराओं को निशाना बनाया
दिलचस्प बात यह है कि सफेद रास्ते को लेकर हुआ विवाद जैन परंपराओं से वेदपाठक का पहला टकराव नहीं था। अप्रैल 2025 में उन्होंने मशहूर रणकपुर जैन मंदिर जाने के बाद भी सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जताई थी। वेदपाठक ने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि मंदिर में प्रवेश से पहले लोगों को बेल्ट, वॉलेट जैसी चमड़े (लेदर) की चीजें बाहर रखनी पड़ती हैं।
इसके अलावा, उन्होंने मंदिर में मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान महिलाओं के प्रवेश से जुड़े नियम पर भी सवाल उठाए थे। हालाँकि, ये दोनों बातें जैन धार्मिक परंपराओं में कोई नई या असामान्य चीज नहीं मानी जातीं।
जैन धर्म में चमड़े से बनी चीजों पर रोक का सीधा संबंध उसके सबसे मूल सिद्धांत अहिंसा से है। इसी तरह, जैन धर्मग्रंथों जिन्हें जैन आगम कहा जाता है, में यह उल्लेख मिलता है कि मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर परिसर में प्रवेश से बचना चाहिए। यह नियम सिर्फ रणकपुर मंदिर तक सीमित नहीं है बल्कि दुनिया भर के कई जैन मंदिरों में लंबे समय से धार्मिक परंपरा के रूप में माना जाता रहा है।
वेदपाठक: मूर्ति पूजा का विरोधी, बीफ खाने की बात और ध्रुव राठी का फैन
प्रसाद वेदपाठक खुद को अक्सर हिंदू हितों की आवाज उठाने वाले व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं। लेकिन उनका पुराना सोशल मीडिया रिकॉर्ड एक अलग तस्वीर दिखाता है।
एक वायरल पोस्ट में वेदपाठक ने उन्हें गिफ्ट में मिली भगवान गणेश की एक कलाकृति को लेकर नाराजगी जताई थी। उन्होंने एक यूजर पर निशाना साधते हुए लिखा था, “तुम्हें पता था कि मैं मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करता, फिर भी तुमने मुझे गणपति की म्यूरल गिफ्ट की।”
वेदपाठक के सोशल मीडिया पोस्ट में ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जहाँ उन्होंने खुले तौर पर बीफ खाने की बात की है। हिंदू समाज के बड़े हिस्से में बीफ खाना धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से वर्जित माना जाता है। एक पोस्ट में उन्होंने अपने फॉलोअर्स से ‘Beef and Bacon Burger’ को लेकर सुझाव भी माँगे थे।
वेदपाठक की वैचारिक पसंद भी किसी से छिपी नहीं रही है। अप्रैल 2024 में उन्होंने जर्मनी में रहने वाले यूट्यूब ध्रुव राठी का एक पुराना इंटरव्यू शेयर किया था और उन्हें भारतीय मीडिया का भविष्य बताया था।
यह इसलिए भी चर्चा का विषय बना क्योंकि ध्रुव राठी और उनके समर्थक समूह पर अक्सर हिंदू समाज से जुड़े मुद्दों को लेकर विवादित नैरेटिव बनाने के आरोप लगते रहे हैं जबकि वे खुद को निष्पक्ष टिप्पणीकार के रूप में पेश करते हैं।
जैन समुदाय के सफेद रास्ते वाले विवाद में भी वेदपाठक का तरीका कुछ इसी पैटर्न जैसा दिखाई दिया कि पहले किसी संवेदनशील मुद्दे को उठाना, फिर उसे सबसे भड़काऊ तरीके से पेश करना, विवाद और प्रतिक्रियाएँ बटोरना और बाद में आलोचना बढ़ने पर खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश करना।
गुस्से और विवाद को बना लिया ‘बिजनेस मॉडल’?
अगर सफेद रास्ते वाले विवाद को अलग-थलग देखा जाए तो यह एक छोटा सा मामला लग सकता है। लेकिन जब इसे प्रसाद वेदपाठक के पुराने व्यवहार और बयानों के साथ जोड़कर देखा जाता है तो एक पैटर्न साफ नजर आने लगता है।
एक सामान्य जैन परंपरा को ‘जैन जिहाद’ बता दिया जाता है। मंदिरों की धार्मिक परंपराओं को भेदभाव का उदाहरण कहा जाता है। भगवान गणेश की तस्वीर वाला एक गिफ्ट नाराजगी की वजह बन जाता है।
ऐसा लगता है कि धार्मिक भावनाओं का मुद्दा भी चुनिंदा तरीके से उठाया जाता है क्योंकि यहाँ ज्यादा विवाद, बहस और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया मिलने की संभावना है। यहाँ मुख्य बात कोई सिद्धांत या विचारधारा नहीं बल्कि ध्यान खींचना दिखाई देता है।
आज सोशल मीडिया के दौर में गुस्सा, विवाद और आक्रोश भी एक तरह का ‘कंटेंट’ बन चुका है जिससे लोकप्रियता और कमाई दोनों हासिल की जा सकती हैं। कई इन्फ्लुएंसर्स के लिए ऐसे मुद्दों को विवाद में बदलना फायदे का सौदा बन जाता है। जितना बड़ा विवाद, उतनी ज्यादा चर्चा और उतना ज्यादा एंगेजमेंट। जैन समाज के सफेद रास्ते वाला मामला भी कुछ ऐसा ही नजर आता है।
जैन परंपरा को समझने की कोशिश करने के बजाय, वेदपाठक ने उसे विवाद का मुद्दा बनाया। सदियों पुरानी अहिंसा और करुणा पर आधारित धार्मिक व्यवस्था को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई। जब इस पर विरोध शुरू हुआ, तो खुद को पीड़ित पक्ष की तरह पेश करने का प्रयास भी देखने को मिला।
हो सकता है कि सोसाइटी का वह सफेद रास्ता अब हट गया हो लेकिन पूरे जैन समुदाय को शक और नाराजगी के नजरिए से देखने का माहौल बनाने की कोशिश ने प्रसाद वेदपाठक के बारे में कहीं ज्यादा बातें उजागर कर दीं बजाय जैन समुदाय के।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) एक बार फिर सुर्खियों में है लेकिन इस बार वजह कोई बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग या नई खोज नहीं बल्कि एक ऐसा तकनीकी संकट है जिसने अंतरिक्ष एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी। ISS में लगातार बढ़ रहे एयर लीक ने हालात इतने गंभीर कर दिए कि NASA को एहतियातन कुछ अंतरिक्ष यात्रियों को ‘सेफ हेवन’ में भेजना पड़ा और आपातकालीन निकासी तक की तैयारी करनी पड़ी।
हालाँकि स्थिति बाद में नियंत्रण में आ गई लेकिन इस घटना ने दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे महँगी अंतरिक्ष प्रयोगशाला की बढ़ती उम्र, उसकी सुरक्षा और अंतरिक्ष मिशनों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ISS पृथ्वी से लगभग 400 किलोमीटर ऊपर परिक्रमा करने वाली मानव निर्मित सबसे बड़ी अंतरिक्ष प्रयोगशाला है। यहाँ अंतरिक्ष यात्री रहते हैं और वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं। यह करीब 28000 km/h की रफ्तार से चलता है और हर 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है। इसका पहला मॉड्यूल 1998 में लॉन्च किया गया था और तब से यह लगातार सक्रिय है।
अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और कनाडा सहित कई देशों की साझेदारी से चल रहा यह स्टेशन पिछले करीब तीन दशकों से अंतरिक्ष अनुसंधान का केंद्र बना हुआ है। यहाँ वैज्ञानिक माइक्रोग्रैविटी में ट्रीटमेंट, बायोलॉजी, फिजिक्स, कृषि और स्पेस टेक्नोलॉजी से जुड़े प्रयोग करते हैं।
स्टेशन का आकार लगभग एक फुटबॉल मैदान जितना है और यह मानव उपस्थिति वाला अंतरिक्ष में सबसे बड़ा ठिकाना माना जाता है।
आखिर कहाँ से हो रहा है एयर लीक?
मौजूदा समस्या ISS के रूसी हिस्से में मौजूद ज्वेज्दा (Zvezda) सर्विस मॉड्यूल के भीतर स्थित PrK ट्रांसफर टनल से जुड़ी हुई है। यह टनल एक डॉकिंग पोर्ट को मुख्य मॉड्यूल से जोड़ती है। सितंबर 2019 में पहली बार यहाँ दबाव में कमी दर्ज की गई थी। जाँच में पता चला कि इस हिस्से में छोटी दरारें मौजूद हैं जिनसे धीरे-धीरे हवा बाहर निकल रही है।
— International Space Station (@Space_Station) June 5, 2026
तब से रोस्कोस्मोस इस समस्या को दूर करने के लिए कई बार अस्थायी और स्थायी सीलेंट का इस्तेमाल कर चुका है। हालाँकि हर मरम्मत के बाद कुछ समय के लिए स्थिति बेहतर हुई लेकिन रिसाव पूरी तरह बंद नहीं हो सका। पिछले कई वर्षों में यह समस्या बार-बार सामने आती रही और अब इसे स्टेशन की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौतियों में गिना जा रहा है।
हाल में क्यों बढ़ गई चिंता?
जून 2026 के पहले सप्ताह में प्रोग्रेस-95 कार्गो यान के संचालन के दौरान रोस्कोस्मोस इंजीनियरों ने पाया कि स्थिति पहले की तुलना में अधिक गंभीर हो चुकी है। पहले जहाँ हर दिन लगभग एक पाउंड हवा का नुकसान हो रहा था, वहीं अब यह बढ़कर करीब दो पाउंड प्रतिदिन तक पहुँच गया।
इसके अलावा इंजीनियरों को PrK टनल में कुछ नए संदिग्ध क्षेत्र भी मिले, जहाँ से हवा के रिसाव की आशंका जताई गई। यही वजह थी कि रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ने सामान्य पैचवर्क मरम्मत की बजाय अधिक व्यापक निरीक्षण और संरचनात्मक मरम्मत की योजना बनाई।
बढ़ती रिसाव दर ने NASA और रोस्कोस्मोस दोनों को सतर्क कर दिया क्योंकि लगातार दबाव में कमी स्टेशन की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
मरम्मत के दौरान क्यों अलर्ट पर आया पूरा स्टेशन?
लीकेज के सोर्स तक बेहतर पहुँच बनाने के लिए रोस्कोस्मोस ने एक विशेष मेटल ब्रैकेट को काटने की योजना तैयार की थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, रूसी कॉस्मोनॉट्स एक आरी (Saw) की मदद से उस हिस्से तक पहुँचने वाले थे जहाँ उन्हें दरार होने की आशंका थी।
NASA को चिंता थी कि इस प्रक्रिया से आसपास की स्ट्रक्चर को नुकसान पहुँच सकता है और स्थिति और खराब हो सकती है। इसी वजह से अमेरिकी मिशन कंट्रोल ने एहतियातन पाँच अंतरिक्ष यात्रियों को ‘सेफ हेवन‘ प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया। इसके तहत उन्हें स्पेस एक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान में जाकर बैठने के लिए कहा गया, ताकि यदि कोई आपात स्थिति पैदा हो तो वे तुरंत स्टेशन छोड़ सकें।
यह स्थिति लगभग दो घंटे तक बनी रही। बाद में जब रोस्कोस्मोस ने मरम्मत कार्य रोकने और अतिरिक्त जाँच करने का फैसला किया तो NASA ने भी राहत की साँस ली और अंतरिक्ष यात्रियों को वापस सामान्य कार्यों पर लौटने की अनुमति दे दी।
किन अंतरिक्ष यात्रियों को भेजा गया था सेफ हेवन में?
NASA के निर्देश के बाद क्रू-12 मिशन के चार सदस्यों और NASA के एक अन्य अंतरिक्ष यात्री को ड्रैगन कैप्सूल में जाने के लिए कहा गया। इनमें NASA की जेसिका मीर, जैक हैथवे, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की सोफी एडेनॉट, रोस्कोस्मोस के आंद्रेई फेड्यायेव और NASA के क्रिस विलियम्स शामिल थे।
दूसरी ओर रूसी कॉस्मोनॉट्स सर्गेई कुड-स्वेर्चकोव और सर्गेई मिकायेव स्टेशन पर ही रहे और संभावित मरम्मत अभियान की तैयारियों में जुटे रहे। ड्रैगन कैप्सूल इस दौरान एक लाइफबोट की तरह तैयार रखा गया था, जो जरूरत पड़ने पर कुछ ही मिनटों में स्टेशन से अलग होकर पृथ्वी की ओर रवाना हो सकता था।
NASA और रोस्कोस्मोस के बीच कहाँ है मतभेद?
ISS में एयर लीक को लेकर दोनों एजेंसियों के बीच लंबे समय से नजरिए का अंतर देखा गया है। NASA का मानना है कि समस्या की वास्तविक जड़ अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और किसी भी बड़े स्ट्रक्चरल इन्वेन्शन से पहले अधिक डेटा जुटाना जरूरी है।
दूसरी ओर रोस्कोस्मोस अपेक्षाकृत आक्रामक मरम्मत रणनीति अपनाने के पक्ष में दिखाई देता है। यही वजह थी कि जब रूसी एजेंसी ने स्ट्रक्चर को काटकर अंदर तक पहुँचने की योजना बनाई तो NASA ने इस पर आपत्ति जताई।
2024 में NASA के इंस्पेक्टर जनरल की रिपोर्ट में भी यह उल्लेख किया गया था कि दोनों एजेंसियाँ इस बात पर भी पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि किस स्तर पर पहुँचकर इस रिसाव को अस्थिर या अस्वीकार्य माना जाए।
हालाँकि मौजूदा मामले में रोस्कोस्मोस द्वारा मरम्मत कार्य रोकने के फैसले का NASA ने समर्थन किया और दोनों एजेंसियों ने संयुक्त रूप से आगे की जाँच जारी रखने पर सहमति जताई।
फिलहाल स्थिति क्या है?
रोस्कोस्मोस के अनुसार हालिया निरीक्षण के दौरान दो संभावित रिसाव बिंदुओं की पहचान की गई थी। इनमें से एक को सफलतापूर्वक सील कर दिया गया है, जबकि दूसरे क्षेत्र की जाँच जारी है। साथ ही उन सभी स्थानों का पुनः निरीक्षण किया जा रहा है जहाँ पहले सीलेंट लगाए गए थे।
NASA ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल ड्राइवर ग्रुप की सुरक्षा को कोई तत्काल खतरा नहीं है। सभी अंतरिक्ष यात्री सामान्य कार्यों पर लौट चुके हैं और वैज्ञानिक गतिविधियाँ पहले की तरह जारी हैं। फिर भी एजेंसियाँ इस समस्या को पूरी तरह समाप्त करने के लिए दीर्घकालिक समाधान तलाश रही हैं।
क्या ISS को खाली कराने की नौबत आ सकती है?
ISS के 27 वर्षों के ऑपरेशनल हिस्ट्री में अब तक कभी पूरी तरह से निकालने की आवश्यकता नहीं पड़ी है। हालाँकि अंतरिक्ष मलबे के खतरे या तकनीकी समस्याओं के दौरान कई बार सेफ हेवन प्रक्रिया लागू की गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा एयर लीक चिंता का विषय जरूर है, लेकिन फिलहाल यह उस स्तर तक नहीं पहुँचा है जहाँ पूरे स्टेशन को खाली कराना पड़े। फिर भी यदि रिसाव लगातार बढ़ता रहा और प्रभावी समाधान नहीं मिला तो भविष्य में स्टेशन के कुछ हिस्सों को स्थायी रूप से बंद करने जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
ISS पर इस समय कौन-कौन से वैज्ञानिक प्रयोग चल रहे हैं?
तकनीकी चुनौतियों के बावजूद ISS पर वैज्ञानिक अनुसंधान लगातार जारी हैं। हाल के दिनों में अंतरिक्ष यात्री 3D बायोप्रिंटिंग के जरिए मानव कार्टिलेज ऊतक तैयार करने, स्टेम सेल अनुसंधान, माइक्रोबायोलॉजी प्रयोग और अंतरिक्ष में पौधों की वृद्धि से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं।
इसके अलावा अल्फाल्फा फसलों की खेती, मानव शरीर पर माइक्रोग्रैविटी के प्रभावों का अध्ययन और लंबी अवधि के अंतरिक्ष अभियानों के लिए हेल्थ से जुड़े रिसर्च भी जारी हैं। इन प्रयोगों का उद्देश्य भविष्य में चंद्रमा और मंगल जैसे मिशनों के लिए आवश्यक वैज्ञानिक आधार तैयार करना है।
ISS पर कितना खर्च हुआ, कौन देता है पैसा और क्यों माना जाता है दुनिया का सबसे महँगा वैज्ञानिक प्रोजेक्ट?
ISS को मानव इतिहास की सबसे महंगी वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग परियोजनाओं में गिना जाता है। जब 1998 में इसका निर्माण शुरू हुआ था, तब इसकी लागत का अनुमान काफी कम था, लेकिन समय के साथ नए मॉड्यूल जोड़ने, अंतरिक्ष यात्रियों के मिशन, कार्गो उड़ानों, रखरखाव और चलाने में लगने वाले खर्चों के कारण इसकी कुल लागत लगातार बढ़ती गई।
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के अनुसार, ISS के विकास, निर्माण, असेंबली और शुरुआती वर्षों के संचालन पर लगभग 100 अरब यूरो (करीब 10 लाख करोड़ रुपए) खर्च हुए थे।
वहीं बाद के वर्षों में इसको चलाने और रखरखाव लागत जुड़ने के बाद अलग-अलग अंतरिक्ष एजेंसियों के अनुमान बताते हैं कि ISS पर अब तक कुल खर्च 150 से 170 अरब डॉलर (करीब 12.5 से 14 लाख करोड़ रुपए) के बीच पहुँच चुका है। इसी वजह से इसे दुनिया की सबसे महँगी मानव निर्मित संरचनाओं में शामिल किया जाता है।
ISS किसी एक देश की संपत्ति नहीं है बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय साझेदारी परियोजना है। इसके प्रमुख साझेदार अमेरिका (NASA), रूस (रोस्कोस्मोस), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA), जापान (JAXA) और कनाडा (CSA) हैं।
इनमें सबसे बड़ा वित्तीय योगदान अमेरिका का है। NASA न केवल स्टेशन के अधिकांश ऑपरेशन का खर्च उठाता है, बल्कि हर साल इसके रखरखाव, रिसर्च और क्रू तथा कार्गो मिशनों पर अरबों डॉलर खर्च करता है। NASA के लिए अकेले ISS का सालाना ऑपरेशन का खर्च लगभग 3 अरब डॉलर माना जाता है।
रूस ने भी ISS के निर्माण और ऑपरेशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। रूसी अंतरिक्ष निगम एनर्जिया के अनुसार, 1994 से 2023 के बीच रूस ने ISS कार्यक्रम में लगभग 14.2 अरब डॉलर (करीब 1.36 लाख करोड़ रुपए) का निवेश किया है। वहीं ESA, जापान और कनाडा ने अपने-अपने मॉड्यूल, वैज्ञानिक उपकरणों और तकनीकी संसाधनों के जरिए अरबों डॉलर का योगदान दिया है।
विशेषज्ञों के मुताबिक ISS पर हुआ खर्च केवल अंतरिक्ष स्टेशन बनाने तक सीमित नहीं है। इसमें अंतरिक्ष में मॉड्यूल पहुँचाने के लिए किए गए दर्जनों स्पेस शटल मिशन, लगातार होने वाली सप्लाई उड़ानें, वैज्ञानिक प्रयोग, ग्राउंड कंट्रोल नेटवर्क और अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा व प्रशिक्षण जैसी लागतें भी शामिल हैं। यही कारण है कि लगभग तीन दशक बाद भी यह परियोजना दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग के उदाहरणों में गिनी जाती है।
कब तक सेवा में रहेगा ISS?
NASA फिलहाल ISS को 2030 तक चलने की योजना पर काम कर रहा है। इसके बाद स्टेशन को नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कराकर नष्ट कर दिया जाएगा। हालाँकि अमेरिका की कॉन्ग्रेस में एक विधेयक पर चर्चा चल रही है जिसके तहत ISS को 2032 तक चलाने की बात कही जा रही है।
इस प्रस्ताव को अमेरिकी सीनेट के कई वरिष्ठ नेताओं का समर्थन प्राप्त है। उनका मानना है कि निजी अंतरिक्ष स्टेशनों के पूरी तरह तैयार होने तक ISS को सक्रिय रखना जरूरी है। साथ ही यह कदम अंतरिक्ष क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी के मुकाबले अमेरिका की स्थिति मजबूत बनाए रखने में भी मदद कर सकता है।
बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस गौतम सिंह पटेल और उनके परिवार को 2024 में दाऊदी बोहरा समुदाय के एक उत्तराधिकार विवाद में दिए गए उनके फैसले के कारण पिछले करीब 10 महीनों से लगातार धमकियों और जानलेवा हमलों का सामना करना पड़ रहा है। स्थिति इंतनी गंभीर हो गई कि लंदन में रहने वाली उनकी बेटी के घर पर हमला भी किया गया। पूर्व जस्टिस से माँग की जा रही है कि वे वीडियो रिकॉर्ड कर उसमें फैसला वापस लेने की बात कहें।
इस मुद्दे पर अब भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने दखल दिया है। उन्होंने लंदन की अपनी यात्रा के दौरान इस मुद्दे को भारतीय उच्चायोग के सामने रखा। CJI सूर्यकांत ने भारतीय उच्चायुक्त पी कुमारन से इस मामले पर चर्चा की और जस्टिस पटेल और उनके परिवार की सुरक्षा के संबंध में आश्वासन प्राप्त किया। उच्चायुक्त ने भरोसा दिलाया कि पटेल या उनके परिवार को कोई नुकसान नहीं पहुँचेगा और इसके लिए लंदन पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं।
पूर्व जस्टिस गौतम पटेल से वीडियो बनाकर फैसला वापस लेने की माँग
पूर्व जस्टिस गौतम पटेल ने द वायर को बताया कि खुद को दाऊदी बोहरा समुदाय के प्रभावशाली लोगों का समूह बताने वाले कुछ लोगों ने उनसे फैसला वापस लेने की माँग की। उनसे कहा गया कि वे भारत से बाहर जाकर एक यूट्यूब वीडियो जारी करें, जिसमें यह स्वीकार करें कि उन्होंने दबाव या किसी प्रलोभन के कारण गलत फैसला दिया था।
साथ ही उनसे यह भी कहा गया कि वे बॉम्बे बार एसोसिएशन से भी यह वीडियो अपलोड करने को कहें और पत्रकारों को इंटरव्यू देकर इन बातों को दोहराएँ। धमकी देने वालों से इन माँगों को पूरा करने के लिए सितंबर (2025) के आखिर तक का समय दिया।
लेकिन पूर्व जस्टिस पटेल ने इन माँगों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उनका कहना है कि किसी न्यायिक फैसले को इस तरह ‘वापस लेना’ कानून में संभव ही नहीं है। इसके बाद से ही पटेल और उनके परिवार पर खतरा मंडराने लगा। अब तक उनके परिवार पर 5 बार निशाना बनाया जा चुका है, इनमें चार बार लंदन में और एक बार मुंबई में।
लंदन में पटेल की बेटी के घर पर हमले से लेकर पत्नी को धमकियाँ तक, क्या-क्या हुआ?
अगस्त 2025 में लंदन में रहने वाली जस्टिस पटेल की बेटी अदिति के घर में घुसपैठ की घटना हुई। शुरुआत में इसे सामान्य चोरी या सेंधमारी का मामला माना गया, लेकिन कुछ सप्ताह बाद तस्वीर साफ होने लगी। अदिति को एक पत्र मिला, जो उनके पिता के नाम लिखा गया था। पत्र में जस्टिस पटेल के फैसले को ‘गलत’ बताते हुए उनसे उसे वापस लेने की माँग की गई थी।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि पत्र लिखने वालों ने अदिति के घर में हुई घुसपैठ की जिम्मेदारी भी ली। इसके सबूत के तौर पर उन्होंने एक एसडी कार्ड भेजा, जिसमें घर में घुसने का वीडियो होने का दावा किया गया था। इसके कुछ दिन बाद 9 सितंबर 2025 को मुंबई में जस्टिस पटेल की पत्नी को भी यही पत्र मिला। इस संबंध में मुंबई पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई।
लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। 22 अप्रैल 2026 को अदिति पर लंदन में उनके घर के पास हमला किया गया। वह अपने बच्चे को स्कूल छोड़कर लौट रही थीं, तभी एक नकाबपोश व्यक्ति ने उन पर हमला कर दिया। उन्हें कई बार मुक्के मारे गए और जमीन पर गिरने के बाद भी लातों से पीटा गया। पड़ोसियों के मौके पर पहुँचने के बाद हमलावर वहाँ से भाग निकला। इस हमले में अदिति की नाक टूट गई। खास बात यह रही कि उनके पास मौजूद फोन और पर्स नहीं छीना गया, जिससे यह सामान्य लूटपाट की घटना नहीं लगी और इसके पीछे की मंशा साफ हुई।
अब जस्टिस के परिवार को जान से मारने की धमकी
अब 5 जून 2026 को अदिति के लंदन स्थित घर पर एक और पत्र पहुँचा, जिसमें जस्टिस पटेल और उनके परिवार को सीधे जान से मारने की धमकी दी गई। पत्र में कहा गया कि उन्हें पहले ही काफी चेतावनी दी जा चुकी है और अगला कदम ‘श्मशान’ होगा। धमकी देने वालों ने फिर वही पुरानी माँग दोहराई कि अगर जस्टिस पटेल पहले वाले पत्र में बताई गई शर्तें मान लें, तभी कथित ‘कॉन्ट्रैक्ट’ रद्द किया जाएगा।
इस पत्र के साथ भी एक एसडी कार्ड भेजा गया। हालाँकि परिवार ने उसे खुद देखने के बजाय सीधे पुलिस को सौंप दिया। जस्टिस पटेल का कहना है कि उन्हें पूरा विश्वास है कि धमकी भरे पत्रों और उनकी बेटी पर हुए हमलों के बीच सीधा संबंध है। फिलहाल लंदन पुलिस इस पूरे मामले की जाँच कर रही है, जबकि भारत और ब्रिटेन दोनों देशों के अधिकारियों ने जस्टिस पटेल और उनके परिवार की सुरक्षा को लेकर कदम उठाने का भरोसा दिया है।
आखिर दाऊदी बोहरा उत्तराधिकार विवाद क्या है?
इस पूरे विवाद को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि शिया इस्लाम के दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘दाई-अल-मुतलक’ (Dai-al-Mutlaq) का पद क्या होता है। दाई-अल-मुतलक समुदाय का सर्वोच्च आध्यात्मिक प्रमुख माना जाता है। उनके धार्मिक फैसलों और नेतृत्व को समुदाय में विशेष महत्व दिया जाता है।
विवाद की शुरुआत जनवरी 2014 में हुई, जब दाईदी बोहरा समुदाय के 52वें दाई-अल-मुतलक सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन का निधन हो गया। उनके निधन के तुरंत बाद उनके बेटे सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन ने 53वें दाई-अल-मुतलक के रूप में नेतृत्व संभाल लिया। लेकिन यहीं से उत्तराधिकार को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया।
दूसरी तरफ बुरहानुद्दीन के सौतेले भाई खुझैमा कुतुबुद्दीन ने दावा किया कि उन्हें वर्ष 1965 में ही गुप्त रूप से उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया था। दाऊदी बोहरा परंपरा में उत्तराधिकारी घोषित करने की प्रक्रिया को ‘नस्स’ (Nass) कहा जाता है। कुतुबुद्दीन का कहना था कि उन्हें वैध उत्तराधिकारी बनाया गया था, इसलिए 53वें दाई का पद उन्हें मिलना चाहिए था।
2014 से 2024 तक, अदालत में कैसे चली 10 साल की लड़ाई?
मार्च 2014 में खुझैमा कुतुबद्दीन ने बॉम्बे हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया। उन्होंने अदालत से माँग की कि उन्हें दाऊदी बोहरा समुदाय का वैध 53वाँ दाई-अल-मुतलक घोषित किया जाए। इसके जवाब में सैयदना मुफद्दीन ने कहा कि उनके अब्बा ने सार्वजनिक रूप से कई मौकों पर उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।
मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों ने दस्तावेज, धार्मिक परंपराओं से जुड़े तर्क, गवाह और अन्य सबूत पेश किए। इसी बीच 2016 में खुझैमा कुतुबुद्दीन का निधन हो गया। इसके बाद उनके बेटे ताहेर फखरुद्दीन ने अदालत में यह लड़ाई आगे बढ़ाई। यह मामला धीरे-धीरे भारत के सबसे चर्चित धार्मिक उत्तराधिकार मामलों में बदल गया। सुनवाई कई वर्षों तक चली। नवंबर 2022 से अंतिम बहस शुरू हुई और 5 अप्रैल 2023 को सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया।
पूर्व जस्टिस गौतम पटेल ने क्या फैसला दिया और विवाद क्यों बढ़ा?
करीब एक साल बाद 23 अप्रैल 2024 को बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस गौतम पटेल ने अपना फैसला सुनाया। उन्होंने ताहेर फखरुद्दीन की याचिका खारिज कर दी और माना कि सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन को ही वैध रूप से 53वाँ दाई-अल-मुतलक नियुक्त किया गया था। अदालत ने कहा कि उनके पक्ष में पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, जबकि विरोधी पक्ष अपने दावे को साबित करने में सफल नहीं रहा।
फैसला सुनाते समय जस्टिस पटेल ने यह भी कहा था कि उन्होंने मामले को ‘आस्था नहीं, बल्कि सबूतों’ के आधार पर तय किया है। अदालत का काम धार्मिक मान्यताओं पर फैसला देना नहीं, बल्कि प्रस्तुत साक्ष्यों की जाँच करना है। फैसले पर दाऊदी बोहरा समुदाय ने एक प्रेस रिलीज जारी करके इसे ‘ऐतिहासिक फैसला’ बताते हुए तारीफ भी की थी।
अब इसी फैसले पर जस्टिस गौतम पटेल को निशाना बनाया जा रहा है। इसीलिए यह मामला केवल एक रिटायर्ड जस्टिस और उनके परिवार की सुरक्षा का नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या किसी न्यायाधीश को उसके फैसले के लिए इस तरह निशाना बनाया जा सकता है। यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है।
स्पेसएक्स की स्टारलिंक बिजनेस ऑपरेशंस की वाइस प्रेसिडेंट लॉरेन ड्रायर (Lauren Dreyer) ने ब्लूमबर्ग (Bloomberg) के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। ब्लूमबर्ग ने कहा था कि ईरान युद्ध से जुड़ी सुरक्षा चिंता के कारण भारत में स्टारलिंक का लॉन्च रुक गया है।
लॉरेन ड्रायर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर पोस्ट करके इस रिपोर्ट को ‘भ्रामक’ और ‘अज्ञात स्रोतों के नाम पर किया गया निराधार दावा’ करार दिया। उनके अनुसार, लॉन्च में देरी की खबरें पूरी तरह से गलत हैं और उनकी कंपनी के भारत सरकार के साथ सार्थक चर्चा चल रही है।
ड्रायर ने बताया कि स्टारलिंक ने आवश्यक नियामक और अनुपालन प्रक्रियाओं (regulatory and compliance processes) को पूरी पारदर्शिता के साथ पूरा किया है। भारत सरकार के साथ पूरी जिम्मेदार के साथ काम किया है। उन्होंने आगे कहा कि स्टारलिंक ने देश के लिए एक ‘खास डिप्लॉयमेंट मॉडल’ तैयार किया है, जो देश की संप्रभुता को ध्यान में रखते हुए टेक्नोलॉजी, रेगुलेटरी और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करेगा।
ड्रायर ने कहा कि कंपनी को सरकार से देश के दूरदराज और कम सेवा वाले क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को आगे बढ़ाने के लिए काफी उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिल रही है। हम भारत के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और सरकार के साथ मिलकर जल्द ही देश में स्टारलिंक की सेवाएँ शुरू करने के लिए काम कर रहे हैं।
Starlink remains in active and productive discussions with the Government of India contrary to misleading stories based upon unsubstantiated claims from anonymous sources.
We have worked with the Government through all of the required regulatory and compliance processes in a… https://t.co/BQdcDHmPaf
मामले से जुड़े जानकारों का भी कहना है कि ईरान युद्ध जैसी कोई बात नहीं है और केवल तकनीकी मंजूरी तथा स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़े तकनीकी मुद्दे विचाराधीन हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के एक सूत्र ने भी कहा, “हाँ, क्योंकि तकनीकी मंजूरी और स्पेक्ट्रम के आवंटन को लेकर एक मसला है। बाकी सब ठीक है। मुझे नहीं लगता कि ईरान युद्ध की वजह से कोई चिंता की बात है।”
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में क्या है?
9 जून (मंगलवार) को ब्लूमबर्ग ने “Starlink India Launch Hits Security Roadblock Before SpaceX IPO” (SpaceX IPO से पहले Starlink के भारत में लॉन्च में सुरक्षा संबंधी अड़चन) नाम से एक लेख छापा। इसमें दावा किया गया कि मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, भारत ने एलन मस्क की स्पेस-बेस्ड इंटरनेट सर्विस Starlink को कमर्शियल ऑपरेशन शुरू करने की मंजूरी देने की प्रक्रिया को रोक दिया है। इसकी वजह ईरान युद्ध में इसके सैटेलाइट टर्मिनल का इस्तेमाल है।
लेख में अंदरूनी सूत्रों का हवाला देते हुए कहा गया कि Starlink को ऑपरेशन शुरू करने के लिए जो आखिरी मंजूरी चाहिए थी, उन्हें गृह मंत्रालय के तहत आने वाली सुरक्षा एजेंसियों ने रोक दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मिडिल ईस्ट में संकट के दौरान स्टारलिंक टर्मिनल का इस्तेमाल किया गया था, जबकि ईरानी क्षेत्र में इस सर्विस का लाइसेंस नहीं था, इसलिए भारत को भू-राजनीतिक तनाव के समय अमेरिका स्थित ऑपरेटर को नियंत्रित करने को लेकर चिंता है।
ब्लूमबर्ग ने बताया, “यह झटका ऐसे समय में लगा है जब SpaceX इतिहास का सबसे बड़ा IPO लाने की तैयारी कर रहा है। 12 जून 2026 को Nasdaq पर लिस्टिंग के जरिए 1.75 ट्रिलियन डॉलर के वैल्यूएशन का लक्ष्य है। कंपनी के मुख्य रेवेन्यू इंजन के तौर पर Starlink उस वैल्यूएशन के लिए अहम है।”
इसमें यह भी कहा गया है कि चीन ने इस सर्विस तक पहुँच को असल में रोक दिया है, जबकि दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश और इंटरनेट के सबसे बड़े बाजार भारत तक अब पहुँच नहीं हो पा रही है। आर्टिकल में यह भी बताया गया है कि किसी भी कमर्शियल लॉन्च (चाहे वह स्टारलिंक का हो या किसी और का) के लिए जरूरी सैटेलाइट-स्पेक्ट्रम प्राइस प्लान, इस गतिरोध की वजह से रुका हुआ है।
सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया है कि भारत के टेलीकम्युनिकेशन विभाग ने इसका फ्रेमवर्क तो तैयार कर लिया है, लेकिन मंजूरी के लिए इसे अभी तक यूनियन कैबिनेट के पास नहीं भेजा गया है।
ब्लूमबर्ग ने कहा, “स्टारलिंक को भारत में लगभग एक साल पहले ‘ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट’ लाइसेंस मिला था। इससे उसे समझौता करने और ऑपरेशन की तैयारी करने की इजाजत मिली, लेकिन यह लाइसेंस एक बड़ी रेगुलेटरी प्रक्रिया का सिर्फ एक पड़ाव था, जो अब रुक गई है।”
इसमें बताया गया कि स्टारलिंक ने पिछले साल सिक्योरिटी से जुड़े डेमो दिखाए थे, जिनकी जाँच एक स्पेशल सिक्योरिटी पैनल और टेलीकॉम अधिकारियों ने की थी। आर्टिकल में कहा गया है कि तब से भारतीय अधिकारियों ने और पूछताछ की है और नियमों का ज्यादा सख्ती से पालन करने की माँग की है।
ब्लूमबर्ग के अनुसार, स्टारलिंक की सिक्योरिटी मंजूरी तब तक पेंडिंग रहेगी, जब तक वह यह साफ नहीं कर देती कि अपनी ग्लोबल पहुँच और अमेरिकी मालिकाना हक के बावजूद, वह भारतीय सिक्योरिटी नियमों का पालन कैसे सुनिश्चित करेगी। खासकर जियोपॉलिटिकल तनाव की वजह से पड़ने वाले दबाव के वक्त क्या करेगी।
आर्टिकल में लिखा है, “यह जाँच सिर्फ स्टारलिंक तक सीमित नहीं है। लोगों ने बताया कि ईरान संघर्ष के बाद भारतीय अधिकारियों ने सैटेलाइट-कम्युनिकेशन सेक्टर के प्रति ज्यादा सतर्कता बरती है। यह चिंता जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता के बीच विदेशी नियंत्रण वाले कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भरता को लेकर व्यापक बेचैनी को दिखाती है।”
इसमें बताया गया है कि स्टारलिंक भारतीय अधिकारियों के साथ लगातार बातचीत कर रही है, हलफनामे दे रही है और यह दिखा रही है कि वह क्षेत्रीय डेटा स्टोरेज मानकों का पालन करती है। कंपनी ने जमीनी स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चर भी बनाया है, जिसमें मुंबई में एक हब और भारत में लगभग दस गेटवे शामिल हैं।
कंपनी के सीनियर अधिकारी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों से नियमित रूप से मिलते रहे हैं। हालाँकि, ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से कहा है कि भारत अभी स्टारलिंक को मंजूरी देने में हिचकिचा रहा है, जब तक कि उसके सिक्योरिटी से जुड़े मुद्दों को सुलझा नहीं लिया जाता।
ब्लूमबर्ग के दावों का खंडन
ब्लूमबर्ग के दावों को स्टारलिंक और केंद्र सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। हालाँकि यह कोई अकेली घटना नहीं है। हाल ही में इस मीडिया प्लेटफॉर्म को तब शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी जब उसने RBI को लेकर कहा था कि उसने विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के लिए 12 अरब डॉलर का सोना बेचा। बाद में ब्लूमबर्ग ने उस मनगढ़ंत लेख के लिए माफी माँगी।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
राष्ट्रसेवा, सुशासन एवं जनकल्याण को समर्पित आपके 12 वर्षों के सफलतम कार्यकाल पर आपको समस्त प्रदेशवासियों की ओर से अनंत शुभकामनाएँ। आपके यशस्वी नेतृत्व में उत्तर प्रदेश आस्था और अर्थव्यवस्था का अद्भुत संगम बन कर उभरा है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर रामलला का विराजमान होना, काशी विश्वनाथ धाम के सफल पुनरुद्धार आदि के साथ ही “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के आपके मूल मंत्र ने विगत 12 वर्षों में भारत के विकास को नई दिशा, नई गति और नया विश्वास प्रदान किया है। राष्ट्र ने सेवा, सुरक्षा, सुशासन और समृद्धि के नए प्रतिमान स्थापित किए हैं।
इसी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश भी जनकल्याण, सुशासन और समावेशी विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियाँ अर्जित करते हुए ‘विकसित भारत’ के संकल्प को साकार करने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। आपके प्रेरक नेतृत्व में संचालित जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ उत्तर प्रदेश के करोड़ों नागरिकों तक पहुँचा है।
स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत प्रदेश में लगभग 3 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ जबकि प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से लगभग 65 लाख परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराया गया। आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत लगभग 10 करोड़ पात्र नागरिकों को स्वास्थ्य सुरक्षा कवच प्राप्त हुआ। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना एवं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के माध्यम से लगभग 15 करोड़ लोगों को निःशुल्क राशन उपलब्ध कराया जा रहा है।
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना से 1.86 करोड़ महिलाओं को धुएँ से मुक्ति मिली, जबकि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के माध्यम से प्रदेश के 3 करोड़ से अधिक किसानों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता प्राप्त हुई। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना तथा अन्य किसान हितैषी कार्यक्रमों ने कृषि उत्पादन, उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
आपके मार्गदर्शन में उत्तर प्रदेश ने रोजगार और कौशल विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। मिशन रोजगार के अंतर्गत 9 लाख से अधिक युवाओं को पारदर्शी एवं निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से सरकारी सेवाओं में नियुक्ति प्रदान की गई है। वहीं कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से 25 लाख युवाओं को उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण एवं प्लेसमेंट उपलब्ध कराए गए हैं। निवेश आधारित औद्योगिक विकास, एमएसएमई, ओडीओपी, स्टार्टअप तथा स्वरोजगार योजनाओं के माध्यम से प्रदेश में 3 करोड़ से अधिक रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर सृजित हुए हैं, जिससे युवा शक्ति प्रदेश की विकास यात्रा की प्रमुख भागीदार बनी है।
आपके दूरदर्शी नेतृत्व में उत्तर प्रदेश आधुनिक आधारभूत संरचना के क्षेत्र में भी देश का अग्रणी राज्य बनकर उभरा है। दिल्ली-मेरठ 12-लेन एक्सप्रेसवे, दिल्ली-मेरठ नमो भारत (RRTS), देश का प्रथम इनलैंड वाटरवे, उत्तर प्रदेश से होकर गुजरने वाले ईस्टर्न और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, वंदे भारत एवं नमो भारत जैसी आधुनिक रेल सेवाओं ने प्रदेश की कनेक्टिविटी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं। आज उत्तर प्रदेश अपनी विश्वस्तरीय एक्सप्रेस-वे श्रृंखला के कारण देशभर में ‘एक्सप्रेस-वे प्रदेश’ के रूप में स्थापित हो चुका है।
स्मार्ट सिटी मिशन, आधुनिक हवाई अड्डों, मेट्रो परियोजनाओं, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तथा औद्योगिक कॉरिडोर के विकास ने निवेश, व्यापार, पर्यटन और औद्योगिक गतिविधियों को नई गति प्रदान करते हुए प्रदेश की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाई दी है। आपकी प्रेरणा से उत्तर प्रदेश में रूल ऑफ लॉ की स्थापना हुई है। आज प्रदेश माफिया-मुक्त, दंगा-मुक्त और भयमुक्त वातावरण की पहचान बना चुका है। व्यापारी, निवेशक, उद्योगपति तथा मातृशक्ति स्वयं को सुरक्षित अनुभव कर रहे हैं। बेहतर कानून-व्यवस्था और निवेश-अनुकूल वातावरण ने उत्तर प्रदेश को देश के सबसे आकर्षक निवेश गंतव्यों में स्थापित किया है।
इन प्रयासों का परिणाम है कि आज उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था वर्ष 2017 की तुलना में लगभग तीन गुना हो चुकी है। प्रति व्यक्ति आय में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है तथा बेरोजगारी दर लगभग 18 प्रतिशत से घटकर लगभग 3 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है। उत्तर प्रदेश आज वन ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की ओर तीव्र गति से अग्रसर है तथा ‘विकसित भारत’ के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
आज इस गौरवपूर्ण अवसर पर हम पुनः यह विश्वास व्यक्त करते हैं कि उत्तर प्रदेश आपके प्रेरक नेतृत्व एवं सतत मार्गदर्शन में ‘विकसित भारत’ के संकल्प के अनुरूप ‘विकसित उत्तर प्रदेश’ के निर्माण हेतु पूर्ण समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ कार्य करता रहेगा तथा राष्ट्र निर्माण में अपना सर्वोत्तम योगदान देता रहेगा।
कुछ आयोजनों का कैलेंडर में आना केवल तारीखों का बदलना नहीं होता। वे ऋतुओं की तरह आते हैं और फुटबॉल विश्व कप उनमें सबसे बड़ी ऋतु है। 11 जून 2026 से अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको की धरती पर एक बार फिर वही मौसम उतरने वाला है, जिसमें करोड़ों लोग अपने-अपने देशों की सीमाओं से निकलकर एक गोल गेंद के नागरिक बन जाते हैं।
इस बार मंच और भी विशाल है। 48 टीमें। 104 मैच। तीन मेजबान देश। लेकिन सच पूछिए तो विश्व कप कभी आँकड़ों का उत्सव नहीं रहा। विश्व कप दरअसल स्मृतियों का उत्सव है। किसी को याद होगा कि कैसे कतर की उस सुनहरी रात में लियोनेल मेसी ने ट्रॉफी को अपने होंठों से लगाया था। वह केवल एक खिलाड़ी नहीं था जो कप को चूम रहा था, वह एक अधूरी पीढ़ी थी जो अपने सबसे सुंदर सपने को छू रही थी।
किसी को याद होगा कि कैसे किलियन एम्बाप्पे हारकर भी विजेता की तरह मैदान छोड़ रहे थे। किसी को याद होगा कि मोरक्को ने दुनिया को बताया था कि चमत्कार केवल परीकथाओं में नहीं होते। और किसी को शायद आज भी वह तस्वीर याद होगी जिसमें क्रिस्टियानो रोनाल्डो अकेले सुरंग की ओर बढ़ रहे थे, जैसे समय स्वयं उन्हें धीरे-धीरे विदा कह रहा हो। विश्व कप यही करता है। गोल से ज़्यादा यादें बनाता है।
अमेरिका इस बार केवल मेजबान नहीं है। यह उस देश की मेजबानी है जिसने दशकों तक दुनिया को हॉलीवुड, एनबीए और सुपर बाउल दिए लेकिन फुटबॉल को कभी अपने सांस्कृतिक सिंहासन का हिस्सा नहीं बनाया। अब वही अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजन का केंद्र बनने जा रहा है।
लॉस एंजेलिस की रोशनी, न्यूयॉर्क की बेचैनी, डलास की गर्मी, मेक्सिको सिटी का शोर और टोरंटो की बहुभाषी भीड़… पूरा उत्तरी अमेरिका अगले एक महीने तक एक विशाल स्टेडियम में बदल जाएगा। और फिर शुरू होगा वह अनुष्ठान जो हर चार साल में दुनिया को कुछ समय के लिए युद्धों, चुनावों, आर्थिक संकटों और वैचारिक लड़ाइयों से ऊपर उठा देता है।
दर्शक फिर इंतजार कर रहे हैं। अर्जेंटीना के प्रशंसक मेसी को आखिरी बार विश्व कप में देखने के लिए तैयार बैठे हैं। 39 वर्ष की आयु में शायद यह उनका अंतिम नृत्य हो। शायद आखिरी बार हम उन्हें नीली-सफेद जर्सी में कप्तान की पट्टी बाँधे देखेंगे। शायद आखिरी बार किसी कॉर्नर फ्लैग के पास खड़े होकर वे दुनिया को यह याद दिलाएँगे कि प्रतिभा उम्र से बड़ी होती है।
दूसरी तरफ रोनाल्डो हैं। 41 वर्ष। छठा विश्व कप। समय के साथ लड़ता हुआ एक मनुष्य। फुटबॉल इतिहास में शायद ही कोई खिलाड़ी अपनी महत्वाकांक्षा को इतने लंबे समय तक जीवित रख पाया हो।
यह विश्व कप उनके लिए केवल एक टूर्नामेंट नहीं, इस विरासत का अंतिम अध्याय भी हो सकता है। लेकिन विश्व कप केवल विदाई का मंच नहीं होता। यह आगमन का भी मंच है। कहीं लामिन यामाल अपने समय की घोषणा करने को तैयार हैं। कहीं एरलिंग हालैंड पहली बार विश्व कप के बड़े रंगमंच पर अपने गोलों की भूख लेकर उतरेंगे।
कहीं जूड बेलिंघम, मुसियाला, पेड्री और अर्दा गुलर जैसी नई पीढ़ी दुनिया से कहेगी, कि ‘अब कहानी केवल मेसी और रोनाल्डो की नहीं रही।’ हर विश्व कप एक पीढ़ी को विदा करता है और दूसरी को जन्म देता है।
और फिर वे टीमें हैं जिनका इंतज़ार पूरी दुनिया कर रही है।
स्पेन अपनी तकनीकी कविता लेकर उतरेगा।
फ्रांस अपनी गति और शक्ति के साथ।
ब्राजील अपनी शाश्वत सांबा आत्मा के साथ।
इंग्लैंड अपनी उम्मीदों और पुराने अभिशापों के साथ।
अर्जेंटीना अपने गौरव की रक्षा करने के लिए।
पुर्तगाल अपने महानतम खिलाड़ी के लिए।
मोरक्को फिर साबित करना चाहेगा कि पिछली बार का सफर दुर्घटना नहीं था।
और नॉर्वे… शायद हालैंड के साथ अपनी नई कथा लिखना चाहेगा।
फिर उद्घाटन समारोह, रोशनी। संगीत होगा और कैमरे होंगे। दुनिया के सबसे बड़े कलाकार। और उन सबके बीच लाखों दर्शकों की धड़कनें होंगी जो अपने-अपने शहरों में रात भर जागने वाले हैं। दिल्ली से लेकर ढाका तक। ब्यूनस आयर्स से लेकर कासाब्लांका तक। लिस्बन से लेकर सियोल तक। कहीं कोई बच्चे की तरह जर्सी पहन रहा होगा। कहीं कोई पुराने विश्व कप की तस्वीरें देख रहा होगा। कहीं कोई मेसी की आखिरी जादूगरी की प्रतीक्षा कर रहा होगा। कहीं कोई रोनाल्डो के आखिरी गोल का सपना देख रहा होगा।
और यही विश्व कप की सबसे सुंदर बात है। यह हमें याद दिलाता है कि मनुष्य केवल राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था और संघर्षों का प्राणी नहीं है। हम सभी के भीतर अब भी एक शिशु जीवित है। एक शिशु जो एक गेंद को उड़ते हुए देखकर अपनी साँस रोक लेता है। जो अंतिम मिनट के गोल पर अजनबियों को गले लगा लेता है। जो हारने पर रो पड़ता है। और जीतने पर पूरी रात नहीं सोता। 11 जून से वही बच्चा फिर जागने वाला है।
दुनिया फिर से एक गेंद के पीछे चल पड़ेगी। और अगले कुछ सप्ताहों तक पृथ्वी का सबसे बड़ा धर्म न राष्ट्रवाद होगा, न विचारधारा। वह होगा, फुटबॉल।