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‘मैं 15000 लोगों को मारना चाहता था’: पढ़ें- कौन है फैय्याज प्रेमजी जो ‘इम्युनिटी बूस्टर’ बताकर बाँट रहा था जहरीले कैप्सूल, कितना खतरनाक होता है ‘जिंक फॉस्फाइड’

मुंबई पुलिस ने मुहर्रम जुलूस के दौरान जहरीले कैप्सूल बांटने वाले फय्याज प्रेमजी ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है और पुलिसिया पूछताछ में बड़े खुलासे किए हैं। न्यूज 18 ने पुलिसिया सूत्रों के हवाले से बताया है कि उसका टारगेट जुलूस में शामिल कम से कम 15 हजार लोगों को मारना था। शुक्रवार को मुहर्रम के आशुरा जुलूस के दौरान उसने पेन किलर और इम्यूनिटी बढ़ाने के नाम पर कैप्सूल्स बांटे थे।

दरअसल यह जहरीला जिंक फॉस्फाइड था, जिसे खाने के बाद करीब 11 लोगों की तबियत बिगड़ गई। पुलिस को जानकारी मिलते ही आरोपित फय्याज प्रेमजी को गिरफ्तार किया गया। शनिवार को उसे कोर्ट में पेश किया गया और फिलहाल वह पुलिस की दो दिन की रिमांड में है।

जुलूस में शामिल 15 हजार लोगों को मारने का टारगेट

जानकारी के मुताबिक, फय्याज प्रेमजी मुहर्रम के जुलूस में शामिल लोगों को जिंक फॉस्फाइड खिलाकर मारना चाहता था। इस कैप्सूल्स को उसने ‘दर्द की दवा’ और ‘इम्यूनिटी बूस्टर डोज’ बताया और महिलाओं को देने लगा। ये कैप्सूल्स अधिक से अधिक हाथों में पहुँच पाए, इसके लिए उसने कैप्सूल्स को ऊपर उछाला। उसके पास से 14900 कैप्सूल्स बरामद किए गए हैं।

इस दौरान एक व्यक्ति ने उसे खाया और उसकी तबियत बिगड़ने लगी। उसे लगातार उल्टियाँ हो रही थी और पेट में ऐठन के साथ तेज दर्द था। डीसीपी जयंत मीणा के मुताबिक, नजदीक के अस्पताल में उसे भर्ती कराया गया तो डॉक्टर को मामला संदिग्ध लगा। उसने मरीज से पूछा तो उसने कैप्सूल खाने की बात बताई। डॉक्टर ने पुलिस को जानकारी दी और अलर्ट किया और पुलिस ने घेराबंदी कर फैय्याज प्रेमजी को पकड़ा।

फय्याज शिया समुदाय का बताया जा रहा है, लेकिन वह शियाओं के इस विशाल जुलूस को क्यों टारगेट कर रहा था, इसको लेकर पुलिस पूछताछ कर रही है। मुंबई में मुहर्रम के मौके पर जेजे फ्लाईओवर जंक्शन से शुरू हो कर आरामबाग कब्रिस्ताशियाओं का जुलूस निकलता है, जिसमें देश विदेश के लोग शामिल होते हैं। लेकिन फैय्याज मातम में शामिल लोगों को टारगेट कर रहा था और शारीरिक दर्द से परेशान लोगों को दर्द से राहत के नाम पर ये जहरीला कैप्सूल मुफ्त दे रहा था।

इस दौरान बताया जा रहा है कि 11 लोगों ने ये कैप्सूल खाई थी। इसके बाद इनकी तबियत तेजी से खराब होने लगी और जुलूस से ही इन्हें अस्पताल ले जाया गया। इनमें तुरंत इलाज मिल गया और इनकी जान बच गई।

जानकारों के मुताबिक, लोगों की तबियत खराब होता देख एक महिला को फय्याज पर शक हुआ। उसने इस कैप्सूल को खोला और उसे अजीब सा पाउडर मिला, तब उसने पुलिस को इसकी जानकारी दी।

कहाँ से खरीदा 50 किलो जहरीला जिंक फॉस्फाइड

पुलिस के मुताबिक, उसने पूछताछ में माना है कि वह जूलूस में शामिल लोगों को मारना चाहता था। उसने ऑनलाइन 40000 खाली कैप्सूल्स और 50 किलो जिंक फॉस्फाइड ऑर्डर किया था। जिंक फॉस्फाइड चूहों को मारने की दवा के तौर पर घरों में भी इस्तेमाल की जाती है। इसके अलावा ये खतरनाक कीटनाशक है। इसे खेतों में भी इस्तेमाल किया जाता है।

आरोपित फय्याज प्रेमजी पुणे से कुछ दिनों पहले मुंबई आया था। पहले वह इधर उधर घूमा और दक्षिण मुंबई के एक होटल में ठहरा यहीं से उसने कैप्सूल की डिलीवरी दी थी।

कौन है फैय्याज प्रेमजी

पुलिस की जाँच में पता चला है कि फैयाज प्रेमजी शिया मुस्लिम है। वह बीबीए कर चुका है। वह पुणे में अपने अब्बू का पेंट कंपनी संभालता है। उसका निकाह हो चुका है, लेकिन अपनी बीवी से अलग रहता है। उसकी अम्मी और बहन ईरान में रहते हैं। वह 2019 के बाद कई बार ईरान और इराक जा चुका है। पिछले साल भी वह दो बार ईरान गया था। DCP जयंत मीणा के अनुसार, उसने स्पष्ट रूप से जुलूस को टारगेट करने और लोगों को नुकसान पहुँचाने की बात कही।

जिंक फॉस्फाइड क्या होता है

जिंक फॉस्फाइड एक जहरीला रासायनिक पदार्थ है। इसका इस्तेमाल चूहों और कीड़े मकोड़ों को मारने के खेत-खलिहानों में किया जाता है। पेट में जाने के बाद यह ‘फॉस्फीन गैस’ बनाता है, जिससे शरीर के अँग काम करना बंद करने लगते हैं। यह गैस हृदय, फेफड़े, लीवर, किडनी और दिमाग को निस्क्रिय करने लगता है। इसका कोई एंटीडोट मौजूद नहीं है। लेकिन तुरंत अस्पताल में ले जाने पर मरीज को उसके असर ने निजात दिलाई जा सकती है। देर होने पर ये पूरे शरीर में फैल जाता है, फिर मरीज को बचाना काफी मुश्किल हो जाता है।

एक रात… चार कहानियां: फ्रांस की हैट्रिक, स्पेन की जीत और काबो वर्दे का चमत्कार

गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ ने One Hundred Years of Solitude में लिखा था, “There is always something left to love.”

शायद यही बात फुटबॉल पर सबसे ज़्यादा लागू होती है। क्योंकि हर विश्व कप में कुछ सपने टूटते हैं, कुछ राष्ट्र इतिहास लिखते हैं, कुछ खिलाड़ी अमर हो जाते हैं और कुछ कहानियाँ ऐसी जन्म लेती हैं जिन्हें स्कोरलाइन से नहीं, भावनाओं से याद रखा जाता है। यह खेल केवल नब्बे मिनट का नहीं होता। यह करोड़ों लोगों की उम्मीदों, पीढ़ियों की तपस्या और एक पूरे राष्ट्र की पहचान का उत्सव होता है। इसीलिए विश्व कप का हर दिन किसी महाकाव्य के नए अध्याय जैसा लगता है।

अब फीफा विश्व कप अपने उस पड़ाव पर पहुंच चुका था, जहां हर बीतते दिन के साथ कुछ सपने हमेशा के लिए टूटने वाले थे, तो कुछ कहानियां अमर होने जा रही थीं। जैसे-जैसे टूर्नामेंट आगे बढ़ रहा था, कई देशों को अपना सामान समेटकर वतन लौटना पड़ रहा था, जबकि कुछ टीमें इतिहास की नई इबारत लिखने से बस एक कदम दूर थीं। यही विश्व कप की सबसे बड़ी खूबसूरती है; यहां एक टीम की जीत, किसी दूसरी टीम के सपनों की आखिरी शाम भी होती है।

जहाँ एक ओर फ्रांस जैसी दिग्गज टीम ने अपनी ताक़त का शानदार प्रदर्शन किया, वहीं अटलांटिक महासागर के बीच बसे एक छोटे से द्वीप-समूह काबो वर्दे ने पूरी दुनिया को याद दिला दिया कि फुटबॉल में चमत्कार अभी मरे नहीं हैं।

जैसे-जैसे फीफा विश्व कप अपने निर्णायक दौर की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे कई देशों की यात्रा समाप्त होती जा रही है। दक्षिण कोरिया, कुराकाओ, स्वीडन और कांगो जैसी टीमों ने आख़िरी मिनट तक संघर्ष किया। वहीं तुर्की जैसी टीमों को अच्छा फुटबॉल खेलने के बावजूद उम्मीद से पहले टूर्नामेंट छोड़ना पड़ा।
लेकिन एक बात तय है; इन कुछ हफ़्तों में हर टीम ने दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों का सम्मान और स्नेह अर्जित किया।

क्या आपने हैती को खेलते देखा?

विश्व कप से बाहर होने के बावजूद उन्होंने ऐसा निडर और आकर्षक फुटबॉल खेला कि हर तटस्थ दर्शक उनका प्रशंसक बन गया। ब्राज़ील, मोरक्को और स्कॉटलैंड जैसी मज़बूत टीमों वाले कठिन ग्रुप में भी उन्होंने अपने स्वाभाविक खेल से किसी के सामने घुटने नहीं टेके। विशेषकर एटलस लायंस के विरुद्ध उनका मुकाबला लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
और यही तो विश्व कप की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

कई देशों के लिए इस मंच तक पहुँचना ही एक सपना होता है।

दूसरी ओर इटली जैसा देश है, जहाँ फुटबॉल केवल खेल नहीं, बल्कि संस्कृति का हिस्सा है। कभी अवसर मिले तो नेपल्स की गलियों में जाइए या वहाँ के फुटबॉल इतिहास को पढ़िए। महसूस होगा कि यह खेल वहाँ लोगों की धड़कनों में बसता है। चार बार का विश्व विजेता इटली 2018 और 2022 के बाद 2026 विश्व कप के लिए भी क्वालिफाई नहीं कर सका, जिससे वह लगातार तीसरी बार फुटबॉल के सबसे बड़े मंच से बाहर रह गया। इन कटु अनुभवों के बावजूद भी यह इस खेल की सुंदरता है कि यह किसी महान परंपरा को हमेशा के लिए खत्म नहीं होने देता। और इसी वजह से हैती, काबो वर्दे और ऐसे तमाम छोटे देशों को इस मंच पर बेख़ौफ़ खेलते देखना मन को एक अलग ही संतोष देता है।

फ्रांस बनाम नॉर्वे | डेम्बेले का तूफ़ान

अब बात करते हैं आज के पहले मुकाबले की, जो बोस्टन स्टेडियम में ग्रुप I के अंतर्गत फ्रांस और नॉर्वे के बीच खेला गया। दोनों टीमें अपने शुरुआती दोनों मुकाबले जीतकर पहले ही नॉकआउट चरण में जगह बना चुकी थीं। ऐसे में दोनों कोचों ने जोखिम लेने के बजाय अपने कई प्रमुख खिलाड़ियों को आराम दिया और बेंच स्ट्रेंथ को मौका दिया।

लेकिन फ्रांस की बेंच भी आखिर फ्रांस की ही बेंच थी। मैच की शुरुआती सीटी बजते ही फ्रेंच टीम ने गेंद पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। किलियन एमबाप्पे, उस्मान डेम्बेले, देज़िरे दोऊ और माइकल ओलिसे लगातार नॉर्वे के गोलपोस्ट पर हमले बोल रहे थे। शुरुआती बीस मिनट के भीतर ही नॉर्वे के गोलकीपर एगिल सेल्विक को कई कठिन बचाव करने पड़े।

लेकिन दबाव कब तक झेला जाता?

बीस मिनट पूरे होने से पहले ही उस्मान डेम्बेले ने दो शानदार गोल दागकर फ्रांस को 2-0 की बढ़त दिला दी। दोनों गोल लगभग किसी कलाकार की पेंटिंग जैसे थे।

दाहिने किनारे से गेंद लेकर भीतर की ओर कट करना, डिफेंडर को पीछे छोड़ना और फिर गेंद को शानदार कर्ल के साथ दूर वाले कॉर्नर में पहुँचा देना, ऐसे गोल किसी भी राइट विंगर का सपना होते हैं। दोनों बार सेल्विक ने पूरा प्रयास किया, लेकिन गेंद केवल उनकी निगाहों के सामने से निकलती हुई जाल में जा समाई।

हालाँकि नॉर्वे ने भी हार नहीं मानी।

डेम्बेले के दूसरे गोल के कुछ ही क्षण बाद क्रिस्टोफ़र ऑसगार्ड ने शानदार व्यक्तिगत प्रयास करते हुए चार फ्रांसीसी खिलाड़ियों को छकाया और माइक मैन्याँ को कोई मौका दिए बिना गेंद गोलपोस्ट में पहुँचा दी। स्कोर 2-1 हो चुका था और स्टेडियम में मौजूद नॉर्वे के समर्थक अपने पारंपरिक ‘वाइकिंग क्लैप’ से पूरी टीम का उत्साह बढ़ाने लगे।

लेकिन फ्रांस की आंधी अभी थमी नहीं थी।

32वें मिनट में एक बार फिर डेम्बेले ने लगभग उसी अंदाज़ में अपना तीसरा गोल दाग दिया। यह केवल हैट्रिक नहीं थी, बल्कि तकनीक, गति और आत्मविश्वास का अद्भुत प्रदर्शन था।

इस हैट्रिक के साथ डेम्बेले 2026 विश्व कप में लियोनेल मेसी और जोनाथन डेविड के बाद हैट्रिक लगाने वाले तीसरे खिलाड़ी बने। साथ ही यह विश्व कप इतिहास के सबसे यादगार पहले हाफ़ प्रदर्शनों में से एक बन गया।

पहले हाफ़ की समाप्ति तक फ्रांस 3-1 से आगे था।

दूसरे हाफ़ में भी फ्रांस ने अपना दबदबा बनाए रखा। इस बार देज़िरे दोऊ ने शानदार फिनिश के साथ टीम का चौथा गोल दाग दिया और मुकाबला पूरी तरह फ्रांस की मुट्ठी में चला गया।

अंतिम सीटी बजते ही स्कोरबोर्ड पर 4-1 चमक रहा था।

तीनों मुकाबले जीतकर फ्रांस ने ग्रुप में शीर्ष स्थान हासिल किया और अब अगले दौर में उसका सामना स्वीडन से होगा। वहीं नॉर्वे भी दूसरे स्थान पर रहते हुए नॉकआउट चरण में पहुँच गया, जहाँ उसकी टक्कर आइवरी कोस्ट से होगी।

सेनेगल बनाम इराक | एक रेड कार्ड जिसने मैच की दिशा बदल दी

उधर, टोरंटो में इसी ग्रुप के दूसरे मुकाबले में अफ्रीका की मजबूत टीम सेनेगल का सामना इराक से था। दोनों टीमों के लिए यह मुकाबला प्रतिष्ठा के साथ-साथ उम्मीदों की आख़िरी डोर भी था। शुरुआती दो मैचों में निराशाजनक प्रदर्शन के कारण दोनों लगभग टूर्नामेंट से बाहर मानी जा रही थीं, लेकिन फुटबॉल में अंतिम सीटी बजने से पहले कोई कहानी पूरी नहीं होती।

सेनेगल ने शुरुआत से ही आक्रामक तेवर अपनाए।

मैच के चौथे ही मिनट में मिले कॉर्नर पर हबीब दियारा ने शानदार हेडर लगाकर गेंद को सीधे जाल में पहुँचा दिया। शुरुआती बढ़त ने सेनेगल का आत्मविश्वास और बढ़ा दिया, जबकि इराक पर दबाव साफ़ दिखाई देने लगा। लेकिन असली मोड़ आया तेरहवें मिनट में।

इराकी डिफेंडर रेबिन सुलाका ने एक बेहद लापरवाह और खतरनाक टैकल कर दिया। रेफरी ने बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें सीधे रेड कार्ड दिखाया। अब इराक को लगभग अस्सी मिनट तक दस खिलाड़ियों के साथ खेलना था। किसी भी टीम के लिए यह किसी पहाड़ चढ़ने जैसा कठिन काम होता है।

इसके बावजूद इराक ने पहले हाफ़ में अनुशासित रक्षण का परिचय दिया। दस खिलाड़ियों के साथ खेलने के बावजूद उन्होंने सेनेगल को लगातार गोल करने से रोके रखा। पहला हाफ़ समाप्त होने तक स्कोर 1-0 ही था और इराक अभी भी मुकाबले में बना हुआ था।

दूसरे हाफ़ की शुरुआत के साथ ही सेनेगल के कोच ने एक साथ चार बदलाव किए। यही फैसला मैच का निर्णायक क्षण साबित हुआ।

नई ऊर्जा के साथ मैदान में उतरी सेनेगल की टीम ने मानो आक्रमण की रफ्तार कई गुना बढ़ा दी। अगले पच्चीस मिनट के भीतर उन्होंने लगातार तीन गोल दागकर स्कोर 4-0 कर दिया। इनमें सबसे ज्यादा प्रभावित किया पापे गुएये ने, जिन्होंने दो बेहतरीन गोल किए। उनकी टाइमिंग, मूवमेंट और फिनिशिंग ने इराकी रक्षा पंक्ति को पूरी तरह बिखेर दिया। दस खिलाड़ियों के साथ संघर्ष कर रही इराकी टीम अब मानसिक रूप से भी टूटती दिखाई दे रही थी।
फिर भी सेनेगल यहीं नहीं रुका।

उन्होंने आख़िरी मिनट तक वही तीव्रता बनाए रखी और लगातार इराकी गोलपोस्ट पर हमले करते रहे। मैच समाप्त होने से पहले उन्होंने एक और गोल जोड़ दिया और अंतिम स्कोर 5-0 पर जा पहुँचा। यह जीत केवल तीन अंक भर नहीं थी। यह सेनेगल की आक्रामक क्षमता का भी प्रदर्शन थी।

हालाँकि ग्रुप की दूसरी भिड़ंत में फ्रांस की जीत के कारण फ्रांस और नॉर्वे ने सीधे अगले दौर में जगह बना ली। नॉर्वे अब राउंड ऑफ़ 32 में आइवरी कोस्ट से भिड़ेगा, जबकि सेनेगल की उम्मीदें अब दूसरे ग्रुपों के परिणामों पर टिकी थीं। अगले चौबीस घंटों में तय होना था कि उनका सफ़र यहीं समाप्त होगा या अभी कहानी में एक और मोड़ बाकी है।

स्पेन बनाम उरुग्वे | अनुभव बनाम जिद

भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े पाँच बजे ग्रुप H के दो मुकाबले शुरू हुए। एक ओर ग्वाडलाहारा में स्पेन का सामना मार्सेलो बिएल्सा की उरुग्वे से था। दूसरी ओर, ह्यूस्टन में काबो वर्दे और सऊदी अरब आमने-सामने थे। इन दोनों मैचों पर पूरे ग्रुप की तस्वीर टिकी हुई थी।

स्पेन और उरुग्वे से एक-एक अंक हासिल कर चुकी काबो वर्दे की टीम इतिहास रचने से केवल एक कदम दूर थी। यदि वह सऊदी अरब से हारने से बच जाती और उधर उरुग्वे स्पेन के खिलाफ जीत दर्ज नहीं कर पाता, तो पहली बार विश्व कप के नॉकआउट चरण में पहुँचने का सपना सच हो जाता।

दूसरी तरफ़ सऊदी अरब के सामने भी एक बेहद कठिन लेकिन संभव समीकरण था। अगर वह काबो वर्दे को हरा देता और उरुग्वे स्पेन के खिलाफ़ अंक हासिल कर लेता, तो कहानी पूरी तरह बदल सकती थी। यही गणित दोनों मैदानों पर एक साथ खेला जा रहा था।

स्पेन ने 4-3-3 फॉर्मेशन के साथ शुरुआत की। उरुग्वे के तेज़ और शारीरिक खेल को ध्यान में रखते हुए कोच ने मार्कोस ल्योरेंटे को प्राथमिकता दी, जबकि मिडफ़ील्ड में मिकेल मेरिनो को मौका मिला। यह बदलाव शुरुआत से ही स्पेन के खेल में दिखाई भी दिया।

मैच की पहली सीटी के साथ उरुग्वे ने अपनी पहचान के अनुरूप बेहद आक्रामक और फिजिकल फुटबॉल खेलना शुरू किया। शुरुआती कुछ मिनटों तक स्पेन दबाव में दिखाई दिया, लेकिन धीरे-धीरे उसने गेंद पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। दोनों टीमें लगातार मौके बना रही थीं, लेकिन दोनों ओर रक्षण भी उतना ही मजबूत था। ऐसा लग रहा था कि पहला हाफ़ बिना गोल के समाप्त होगा।

लेकिन 42वें मिनट में स्पेन ने वह दरवाज़ा खोल दिया जिसकी उसे तलाश थी।

दाहिने फ्लैंक से मार्कोस ल्योरेंटे ने सटीक क्रॉस भेजा। बॉक्स के भीतर मौजूद एलेक्स बाएना ने उरुग्वे के दो डिफेंडरों के बीच से शानदार शॉट लगाया। गोलकीपर फर्नांडो मुसलेरा गेंद को रोक तो पाए, लेकिन उसे पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सके। गेंद उनके हाथों से फिसलती हुई गोललाइन पार कर गई।

स्पेन ने बढ़त बना ली थी।

उरुग्वे की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। पहले हाफ़ की समाप्ति से ठीक पहले मैनुएल उगार्ते चोटिल हो गए और उन्हें मैदान छोड़ना पड़ा। उनकी जगह निकोलस डे ला क्रूज़ को उतारा गया।

लेकिन क्या यह बदलाव मैच की दिशा बदल पाएगा?

दूसरा हाफ़: उरुग्वे की आख़िरी जंग

दूसरे हाफ़ की शुरुआत के साथ ही यह साफ़ हो गया कि उरुग्वे अब खोने के लिए नहीं, लड़ने के लिए मैदान में उतरा है। स्पेन की कोशिश थी कि गेंद को अधिक से अधिक समय अपने कब्ज़े में रखा जाए और खेल की रफ़्तार अपने अनुसार नियंत्रित की जाए। दूसरी ओर उरुग्वे के सामने केवल एक ही रास्ता था, जल्द से जल्द बराबरी का गोल।

क्योंकि उसी समय ह्यूस्टन में खेले जा रहे दूसरे मुकाबले में काबो वर्दे सत्तर मिनट बीत जाने के बाद भी सऊदी अरब को गोल करने से रोक चुका था। अगर दोनों मैचों के नतीजे ऐसे ही रहते, तो उरुग्वे का विश्व कप अभियान यहीं समाप्त हो जाता।

यही बेचैनी अब उनके हर आक्रमण में दिखाई देने लगी थी।

मैक्सिमिलियानो अराउजो लगातार बाएँ छोर से स्पेनिश रक्षा पंक्ति को चुनौती दे रहे थे। उनके क्रॉस और तेज़ रन बार-बार स्पेन के डिफेंडरों की परीक्षा ले रहे थे। दूसरी ओर उनाई सिमोन लगातार एकाग्रता के साथ अपने गोलपोस्ट की रक्षा कर रहे थे। कई मौकों पर उन्होंने शानदार बचाव करते हुए स्पेन की बढ़त बरकरार रखी।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, उरुग्वे की हड़बड़ाहट बढ़ती चली गई।

आख़िरी बीस मिनटों में मैच पूरी तरह भावनाओं और दबाव का खेल बन चुका था। स्पेन गेंद पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रहा था, जबकि उरुग्वे हर कीमत पर बराबरी चाहता था।

इसी बीच स्पेन के पास मैच समाप्त करने का सुनहरा अवसर आया। फेरान टोरेस गोलकीपर के सामने लगभग अकेले थे, लेकिन उनका शॉट उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा और मुसलेरा ने राहत की साँस ली। यह मौका चूकने के बाद भी स्पेन ने संयम नहीं खोया।

दूसरी ओर उरुग्वे का धैर्य अब जवाब देने लगा था।

मैच के अंतिम क्षणों में अगुस्तीन कानोबियो ने युवा डिफेंडर पाऊ कुबार्सी पर बेहद ख़तरनाक टैकल कर दिया। रेफरी ने बिना देर किए उन्हें सीधे रेड कार्ड दिखाया। निर्णय से नाराज़ कानोबियो कुछ देर तक रेफरी से बहस करते रहे, लेकिन फैसला बदलने वाला नहीं था।

अब उरुग्वे की उम्मीदें लगभग समाप्त हो चुकी थीं। कुछ ही मिनट बाद अंतिम सीटी बजी और स्पेन ने यह मुकाबला 1-0 से अपने नाम कर लिया। तीनों मैचों में शानदार प्रदर्शन करते हुए स्पेन ग्रुप में शीर्ष स्थान के साथ अगले दौर में पहुँच गया। उधर, कभी विश्व फुटबॉल की सबसे बड़ी ताक़तों में गिने जाने वाले मार्सेलो बिएल्सा के उरुग्वे का सफ़र एक बार फिर ग्रुप चरण में ही समाप्त हो गया।

वहीं… एक छोटे-से द्वीप ने इतिहास लिख दिया

लेकिन उस समय ग्वाडलाहारा से लगभग ढाई हज़ार किलोमीटर दूर ह्यूस्टन में किसी और कहानी का जन्म हो रहा था। काबो वर्दे के खिलाड़ी अपने मैच के अंतिम क्षणों में बार-बार मोबाइल फोन और स्टेडियम की बड़ी स्क्रीन की ओर देख रहे थे। उनकी निगाहें अब अपने मुकाबले पर नहीं, स्पेन और उरुग्वे के स्कोर पर टिकी थीं।

जैसे ही ग्वाडलाहारा से अंतिम सीटी बजने की खबर पहुँची, पूरा स्टेडियम मानो भावनाओं से भर उठा। काबो वर्दे ने कर दिखाया था।

अटलांटिक महासागर के बीच बसे इस छोटे-से द्वीपीय राष्ट्र ने अपने पहले ही फीफा विश्व कप में नॉकआउट चरण में जगह बना ली थी। खिलाड़ी एक-दूसरे से लिपटकर रो रहे थे। कोई घुटनों के बल बैठ गया।

कोई आसमान की ओर देखकर मुस्कुरा रहा था। यह केवल एक ड्रॉ नहीं था। यह वर्षों के संघर्ष, सीमित संसाधनों और अनगिनत सपनों की जीत थी।

कुछ ही क्षण बाद कैमरा काबो वर्दे के अनुभवी गोलकीपर वोजिन्हा पर गया। उनकी आँखें नम थीं। फिर प्रसारण में स्टैंड्स में बैठी उनकी माँ दिखाई दीं, जो खुशी से झूम रही थीं।

इसके बाद कैमरा सीधे काबो वर्दे की राजधानी प्राइया पहुँचा। सड़कों पर हजारों लोग जश्न मना रहे थे। ढोल बज रहे थे। राष्ट्रीय ध्वज हवा में लहरा रहे थे।

लोग एक-दूसरे को गले लगा रहे थे। शायद पूरे देश ने पहली बार महसूस किया कि विश्व फुटबॉल अब केवल बड़े देशों का मंच नहीं रहा। मैदान पर खिलाड़ी अपने कोच बूबिस्ता को कंधों पर उठाकर हवा में उछाल रहे थे। बूबिस्ता के चेहरे पर वर्षों की मेहनत का संतोष साफ़ दिखाई दे रहा था।

कहा जाता है कि बचपन में उन्होंने अपने गाँव में एक छोटे-से टेलीविज़न पर डिएगो माराडोना और लोथार मथायस को खेलते देखा था। वहीं से उन्होंने एक दिन अपने देश को विश्व कप तक पहुँचाने का सपना देखा।

वर्षों बाद वही सपना आज हक़ीक़त बन चुका था। यह विश्व कप के लिए काबो वर्दे का सातवाँ क्वालिफिकेशन प्रयास था। पहली बार वे सफल हुए। और पहली ही बार में उन्होंने नॉकआउट चरण में जगह बनाकर इतिहास रच दिया।

फुटबॉल बार-बार हमें यही सिखाता है; कभी-कभी चमत्कार भी मेहनत का दूसरा नाम होते हैं। लेकिन कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।

अब अगले दौर में काबो वर्दे के सामने विश्व विजेता अर्जेंटीना थी। मियामी में एक ओर होंगे लियोनेल आंद्रेस मेसी.. दूसरी ओर होंगे वोजिन्हा। एक तरफ़ विश्व फुटबॉल का सबसे बड़ा सितारा। दूसरी तरफ़ एक ऐसे छोटे देश का सपना, जिसने दुनिया को यकीन दिलाया कि साहस का कोई आकार नहीं होता।

क्या काबो वर्दे एक और उलटफेर कर पाएगा? या फिर अर्जेंटीना की ताक़त इस खूबसूरत कहानी का अंत लिख देगी? इन सवालों का जवाब हमें अगले दौर में मिलेगा।

कहीं लहराई तलवारें, कहीं चाकू गोदकर ले ली जान तो कहीं AK-47 दिखा फैलाई दहशत: मुहर्रम पर कई राज्यों में इस्लामी कट्टरपंथियों ने की हिंसा, जानें कुछ मामले

देश के अलग-अलग हिस्सों से मुहर्रम के दौरान विवाद, झड़प और हिंसा की कई घटनाएँ सामने आई हैं। कहीं जुलूस के दौरान इस्लामी कट्टरपंथी आपस में ही लड़ पड़े और जान लेने तक पर उतर आए तो कहीं उपद्रव शांत करने पहुँचे सुरक्षाकर्मियों को भी इनकी हिंसा का सामना करना पड़ा।

इस्लामी कट्टरपंथी कहीं तलवार लहराते दिखे तो कहीं से एके47 लहराने का वीडियो सामने आया। हिंदू त्योहार तो इनके निशाने पर रहते ही है, अपने कथित पाक त्योहारों पर भी इनकी हिंसात्मक प्रवृत्ति सामने आ ही जाती है। ऑपइंडिया ऐसी ही सारी घटनाओं को एक साथ संकलित कर रहा है।

बिहार के समस्तीपुर में मुहर्रम पर हिंसा, युवक की चाकू गोदकर हत्या, पुलिस पर भी लाठियों से हमला

बिहार के समस्तीपुर जिले के कल्याणपुर थाना क्षेत्र में मुहर्रम जुलूस के दौरान एक युवक की चाकू मारकर हत्या किए जाने का मामला सामने आया। घटना कल्याणपुर थाना क्षेत्र के गोपालपुर भुट्टा चौक की बताई जा रही है, जहाँ मोहर्रम के अवसर पर ताजिया जुलूस निकाला जा रहा था।

मृतक की पहचान 22 वर्षीय जावेद के रूप में हुई है। जुलूस के दौरान जावेद करतब देख रहा था या उसमें शामिल था, तभी गाँव के ही हैदर नामक युवक ने उस पर चाकू से हमला कर दिया। आरोप है कि हैदर ने सीधे जावेद के सीने पर वार किया और मौके से फरार हो गया।

घटना के बाद जावेद गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा। स्थानीय लोगों और पुलिस की मदद से उसे इलाज के लिए सदर अस्पताल पहुँचाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उपचार के दौरान उसे मृत घोषित कर दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि आरोपित पहले से आपराधिक प्रवृत्ति का है और उसकी जल्द गिरफ्तारी होनी चाहिए।

मामले में सदर DSP-2 संजय कुमार ने बताया कि आरोपित की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी जारी है।

दूसरी घटना मथुरापुर थाना क्षेत्र के रामनगर सारी गाँव में हुई, जहाँ मोहर्रम जुलूस के दौरान दो पक्षों के बीच विवाद शुरू हुआ। कहासुनी जल्द ही हिंसक मारपीट में बदल गई, जिससे इलाके में तनाव फैल गया। झड़प की सूचना पर मौके पर पहुँची पुलिस और प्रशासन की टीम पर उग्र भीड़ ने लाठी-डंडों से हमला कर दिया।

हमले में तीन पुलिस जवान घायल हो गए, जिन्हें समस्तीपुर सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घायल जवानों का इलाज चल रहा है।

मुंबई में मुहर्रम जुलूस में जहर से भरे चूहे मारने वाले 14900 कैप्सूल जब्त

मुंबई में मुहर्रम जुलूस के दौरान जहर मिली चूहे मारने वाली गोलियाँ बाँटने का मामला सामने आया है। इस मामले में पुलिस ने पुणे निवासी फैयाज प्रेमजी को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने उसके पास से 14 हजार से ज्यादा कैप्सूल जब्त किए हैं। घटना जेजे और भायखला इलाके से गुजर रहे मुहर्रम जुलूस के दौरान सामने आई।

पुलिस पेट्रोलिंग टीम ने एक व्यक्ति को संदिग्ध तरीके से कैप्सूल वितरित करते देखा, जिसके बाद उससे पूछताछ की गई और उसके पास मौजूद सामग्री जब्त कर ली गई। जाँच में बरामद कैप्सूलों को लेकर पुलिस ने दावा किया कि उनमें जिंक फॉस्फाइड मिलाया गया था, जो अत्यधिक जहरीला रसायन माना जाता है।

DCP जयंत मीणा के अनुसार, आरोपित के पास से 14,900 भरे हुए कैप्सूल मिले हैं। पूछताछ में उसने बताया कि उसने 30 हजार खाली कैप्सूल और लगभग 50 किलो जिंक फॉस्फाइड मंगवाया था और कई दिनों तक उन्हें भरने का काम किया। मामले में एक व्यक्ति के बीमार पड़ने की भी जानकारी सामने आई है, जिसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।

जाँच में यह भी पता चला है कि फैयाज वर्ष 2019 से 2025 के बीच कई बार ईरान और इराक गया था, जबकि पिछले एक साल में ही वह 19 बार ईरान और इराक गया था। पुलिस अब इन यात्राओं के उद्देश्य, डिजिटल रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा, वित्तीय लेनदेन और संपर्कों की जाँच कर रही है।

बिहार के मुजफ्फरपुर में मुहर्रम जुलूस के दौरान हिंसक झड़प

बिहार के मुजफ्फरपुर में भी मुहर्रम जुलूस के दौरान कुछ समय के लिए तनाव की स्थिति बन गई। मुजफ्फरपुर जिले के हथौड़ी थाना क्षेत्र में निकाली जा रही मातमी जुलूस के दौरान इस्लामी कट्टरपंथी आपस में भिड़ गए। विवाद की शुरुआत दो महिलाओं के बीच हुई कहासुनी से हुई, जो धीरे-धीरे बढ़कर दो समूहों के बीच मारपीट में बदल गई।

देखते ही देखते दोनों पक्षों के बीच लाठी-डंडे चलने लगे। इस झड़प में कई लोगों के घायल होने की सूचना सामने आई है। घटना की जानकारी मिलते ही पहले से तैनात पुलिस टीम तत्काल मौके पर पहुँची और किसी तरह स्थिति पर काबू पा लिया गया।

मामले को लेकर मुजफ्फरपुर के SSP कांतेश कुमार मिश्रा ने बताया कि जुलूस के दौरान दो महिलाओं के बीच शुरू हुआ विवाद बाद में दो गुटों के बीच संघर्ष में बदल गया। उन्होंने बताया कि इस घटना में तीन लोग घायल हुए हैं और पूरे मामले की जाँच की जा रही है।

मुजफ्फरपुर के कई इलाकों में भड़की हिंसा, ड्यूटी पर तैनात ASI मुस्तकिम खान ने भी उठाई तलवार

मुजफ्फरपुर जिले के हथौड़ी, औराई, पीयर और कांटी थाना क्षेत्रों में अलग-अलग जगहों पर तनाव की स्थिति बनी। पीयर थाना क्षेत्र के बरियारपुर चौक पर ताजिया मिलन के दौरान शुरू हुआ विवाद बाद में हिंसक झड़प में बदल गया और दोनों पक्षों के बीच लाठी-डंडे चले।

इसके अलावा कांटी थाना क्षेत्र के दामोदरपुर स्थित सेंट्रल बैंक के पास ताजिया जुलूस के दौरान करतब दिखाने और रास्ता देने को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद हो गया, जो बाद में मारपीट तक पहुँच गया। इसी बीच मुजफ्फरपुर से एक और वीडियो सामने आया, जिसमें वर्दी पहने एक पुलिसकर्मी तलवार से करतब दिखाते नजर आए।

बताया गया कि वीडियो कांटी थाने में तैनात ASI मुस्तकिम खान का है। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, उनकी ड्यूटी मुहर्रम जुलूस में लगी थी और उसी दौरान किसी ने वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।

बिहार के भागलपुर में रेलवे स्टेशन पर तलवारें लेकर घुसे कट्टरपंथी, नारेबाजी कर पैदा की दहशत

बिहार के भागलपुर में मुहर्रम के दौरान रेलवे स्टेशन परिसर में बड़ी संख्या में इस्लामी कट्टरपंथियों के घुसने का मामला सामने आया है। यहाँ 100 से अधिक कट्टरपंथी हाथों में तलवारें लेकर स्टेशन परिसर में पहुँच गए और सीढ़ियों और प्लेटफॉर्म पर नारेबाजी करते रहे। इस दौरान स्टेशन पर मौजूद यात्रियों में असहजता और डर का माहौल देखने को मिला।

घटना से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। कई यूजर्स ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक स्थानों पर शस्त्र प्रदर्शन को लेकर सवाल उठाए हैं तथा कार्रवाई की माँग की है। मामले पर पहले स्टेशन मास्टर अजय ने कहा था कि वीडियो की जाँच की जाएगी।

इसके बाद रेल प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए मामला दर्ज कर लिया। मालदा रेल मंडल की जनसंपर्क पदाधिकारी रूपा मंडल ने बताया कि वायरल वीडियो सामने आने के बाद रेलवे सुरक्षा बल (RPF) से विस्तृत रिपोर्ट माँगी गई थी। जाँच के आधार पर रेलवे अधिनियम की धारा 147 और 145 के तहत FIR दर्ज की गई है।

वीडियो में दिख रहे लोगों की पहचान की जा रही है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

‘ले फिर आ गए’ लिखी वैन को क्रेन पर लटकाकर उड़ाया, मोहर्रम के जुलूस में कट्टरपंथियों ने मचाया हुड़दंग

मध्य प्रदेश के उज्जैन में मंगलवार (23 जून 2026) की रात मोहर्रम के जुलूस के दौरान किए गए एक प्रदर्शन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद हंगामा मच गया। वायरल वीडियो में एक टाटा मैजिक वैन को क्रेन की मदद से करीब 40 फीट की ऊँचाई पर लटकाया गया था।

वैन के ऊपर दो युवक लाल झंडे लहराते दिखाई दिए और कुछ देर बाद वाहन में जोरदार विस्फोट जैसा दृश्य नजर आया। वैन पर ‘ले फिर आ गए’ लिखा हुआ था।

घटना का वीडियो इंस्टाग्राम अकाउंट ‘परवेज एडिट्स 2.0’ पर भी शेयर किया गया था। वीडियो सामने आने के बाद हरिद्वार के संत स्वामी शिवानंद गिरि और हिंदू संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई। हिंदू जागरण मंच ने जिला प्रशासन से पूछा कि क्या इस तरह के प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी।

मामले में पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है। उज्जैन पुलिस के अनुसार जुलूस की अनुमति थी, लेकिन किसी भी तरह के विस्फोटक इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी गई थी। पुलिस ने आयोजक शोएब खान, झंडे लहराने वाले जाहिद खान और तस्लीम खान तथा क्रेन मालिक गोपाल माली के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

यूपी के देवरिया में मुहर्रम जुलूस के दौरान करतब दिखाते आग की चपेट में आया युवक

उत्तर प्रदेश के देवरिया में मुहर्रम जुलूस के दौरान करतब दिखाते समय एक युवक आग की चपेट में आकर घायल हो गया। घटना जिला मुख्यालय स्थित मालवीय रोड पर हुई। युवक को तुरंत अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ इलाज के बाद उसकी हालत स्थिर और खतरे से बाहर बताई जा रही है।

सदर कोतवाली क्षेत्र के बांस देवरिया निवासी सद्दाम खान फाइव स्टार क्लब की ओर से ताजिया जुलूस में शामिल हुआ था। जुलूस के दौरान वह लोहे के एक ड्रम के भीतर बैठकर करतब प्रस्तुत कर रहा था। इसी बीच ड्रम में जल रही आग अचानक भड़क गई और उसके कपड़ों तक पहुँच गई, जिससे वह झुलस गया।

घटना के बाद मौके पर कुछ देर के लिए अफरा-तफरी का माहौल बन गया। हालाँकि अखाड़े के सदस्यों और आसपास मौजूद लोगों ने तुरंत सक्रियता दिखाते हुए आग बुझाई और युवक को सुरक्षित बाहर निकाला। समय पर आग पर काबू पा लेने के कारण बड़ा हादसा टल गया।

इसके बाद सद्दाम खान को तत्काल एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उसका इलाज जारी है। क्षेत्राधिकारी नगर संजय रेड्डी ने बताया कि मालवीय रोड पर मुहर्रम जुलूस निकाला जा रहा था। इसी दौरान यह घटना हुई। पुलिस के अनुसार स्थिति नियंत्रण में रही और कोई अन्य अप्रिय घटना नहीं हुई

यूपी के बरेली में मुहर्रम जुलूस में नोट उड़ाने पर बवाल, चले लाठी-डंडे, 20 घायल

उत्तर प्रदेश के बरेली में मुहर्रम के जुलूस के दौरान बिथरी क्षेत्र के पदारथपुर गाँव में रुपए उड़ाने को लेकर मुस्लिमों में आपस में ही विवाद हो गया, जो कुछ ही देर में हिंसक झड़प में बदल गया। दोनों पक्षों के बीच जमकर मारपीट और लाठी-डंडे चले, जिसमें करीब 15 से 20 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है।

हालात बिगड़ते देख पुलिस को हल्का बल प्रयोग कर स्थिति को नियंत्रित करना पड़ा। गाँव में शाम के समय मुहर्रम का जुलूस निकाला जा रहा था और बड़ी संख्या में लोग उसमें शामिल थे। इसी दौरान जुलूस में कुछ लोगों ने रुपए उड़ाने शुरू कर दिए। रुपए उठाने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी और धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई।

इसी बात को लेकर दो पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हुई, जो बाद में झगड़े में बदल गई। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने पहले दोनों पक्षों को समझाकर शांत कराने की कोशिश की, लेकिन जब स्थिति नियंत्रण से बाहर जाती दिखाई दी तो पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया और लाठियाँ फटकारकर भीड़ को हटाया।

बाद में थाने से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाकर स्थिति को पूरी तरह नियंत्रित किया गया। पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई शुरू कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, झगड़े और माहौल खराब करने में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है। इसके लिए सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं और चिह्नित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर गिरफ्तारी की जाएगी।

यूपी के वाराणसी में मुहर्रम जुलूस के दौरान बढ़ा विवाद

मुहर्रम के मौके पर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में नई सड़क–औरंगाबाद मार्ग पर निकाले जा रहे ताजिया जुलूस के दौरान दो गुटों के बीच विवाद की स्थिति बन गई। देखते ही देखते बड़ी संख्या में मुस्लिम मौके पर जमा हो गए, जिससे कुछ समय के लिए क्षेत्र में अफरातफरी और तनाव जैसा माहौल बन गया।

घटना चेतगंज और लक्सा थाना क्षेत्रों की सीमा पर होने के कारण दोनों थानों की पुलिस तुरंत मौके पर पहुँची और स्थिति को संभालने में जुट गई। पुलिस अधिकारियों ने लोगों से संयम बरतने और जुलूस को शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाने की अपील की। हालांकि कुछ लोगों के हंगामे के कारण हालात नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा।

इसके बाद पुलिस ने विवाद कर रहे लोगों को मौके से हटाया और भीड़ को नियंत्रित कर स्थिति सामान्य कर दी। हालात शांत होने के बाद ताजिया जुलूस अपने तय मार्ग पर आगे बढ़ गया। घटना में किसी के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना नहीं मिली है।

यूपी के प्रयागराज में मुहर्रम के जुलूस में DJ की टक्कर से टूटा मंदिर का चबूतरा

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में मुहर्रम जुलूस के दौरान एक विवाद सामने आया। बहरिया थाना क्षेत्र के नेवादा गाँव में जुलूस के दौरान डीजे वाहन की टक्कर से मंदिर का चबूतरा क्षतिग्रस्त हो गया। घटना के बाद गाँव में कुछ समय के लिए तनाव की स्थिति बन गई।

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन तुरंत सक्रिय हुआ और एहतियात के तौर पर इलाके में पीएसी तैनात कर दी गई ताकि किसी तरह की अप्रिय स्थिति न बने। पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में स्थिति को नियंत्रित किया गया। इसके साथ ही क्षतिग्रस्त हुए मंदिर के चबूतरे की मरम्मत भी कराई गई।

सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियोज मौजूद हैं, जिनमें कट्टरपंथी तलवारें लहराते, उत्पात मचाते, नारेबाजी करते और यहाँ तक की राइफल लहराते भी दिख रहे हैं।

त्योहार किसी भी समुदाय का हो, रमजान हो, होली हो, रामनवमी हो या मुहर्रम इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा फैलाने की घटनाएँ सामने जरुर आती हैं।

लड़कियों को फँसाओ, निकाह से पहले प्रेग्नेंट करो और बच्चा ले लो… क्या है ‘जिहाद अल-अकबर’, जिसके जरिए हिंदू महिलाओं के धर्मांतरण की साजिश कर रहे कट्टरपंथी

राजस्थान के कोटा शहर से धर्मांतरण और महिलाओं के शोषण का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। पुलिस ने बजरंग दल की शिकायत पर मुख्य आरोपित मनीष शर्मा उर्फ मोइन खान को पहले ही गिरफ्तार कर लिया है। आरोपित के पास से हिंदू लड़कियों और महिलाओं के आपत्तिजनक Video मिले हैं। वह सोशल मीडिया पर ग्रुप चलाकर इस पूरे नेटवर्क को ऑपरेट कर रहा था।

अब पुलिस और खुफिया एजेंसियों का पूरा फोकस मोइन खान के मोबाइल से मिल रहे नए सुरागों पर है। मोइन के फोन से डिलीट किए गए डेटा और पाकिस्तान से आए 3 सीक्रेट ऑडियो ने हड़कंप मचा दिया है। इस खुलासे के बाद एक खतरनाक एजेंडा सामने आया है, जिसे ‘जिहाद अल अकबर’ का नाम दिया गया है। पुलिस अब इन कड़ियों को सिलसिलेवार तरीके से जोड़ने में जुटी है।

क्या है ‘जिहाद अल अकबर’ और इसे किसने बनाया है?

‘जिहाद अल अकबर‘ सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स के जरिए चलाया जा रहा एक सुनियोजित डिजिटल एजेंडा है। मोइन खान के मोबाइल से मिले सीक्रेट ऑडियो के मुताबिक, इस खतरनाक साजिश को पाकिस्तान में बैठे कट्टरपंथी आकाओं ने तैयार किया है। ऑडियो में पाकिस्तानी शख्स दावा करता है कि वे लोग इस मिशन पर साल 1992 से काम कर रहे हैं।

जब पाकिस्तान में नया-नया इंटरनेट आया था, तभी से इस ऑनलाइन साजिश का ताना-बाना बुना जा रहा है। इस मिशन को चलाने के लिए पाकिस्तान के हैंडलर्स खुद कभी सीधे सामने नहीं आते हैं। वे भारत में मौजूद अपने स्थानीय एजेंटों को टेलीग्राम, स्नैपचैट और डिस्कॉर्ड जैसे ऐप्स के जरिए गाइड करते हैं। इसके लिए बकायदा सीक्रेट ग्रुप और चैनल बनाए गए हैं, जहाँ से पूरा नेटवर्क चलता है।

क्यों बनाया गया यह मिशन और क्या है इसका असली मकसद?

इस मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत में बड़े पैमाने पर हिंदू महिलाओं का धर्म परिवर्तन करवाना और ईशनिंदा करवाना है। पाकिस्तानी हैंडलर्स फेक सोशल मीडिया आईडी का इस्तेमाल करके भारत की आंतरिक सुरक्षा और अखंडता को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। इसके जरिए देश में हिंदुओं के अंदर ही हिंदू धर्म के प्रति नफरत का बीज बोने की कोशिश की जा रही है।

इसके अलावा, इस साजिश के जरिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे राष्ट्रहित में काम करने वाले संगठनों को भी निशाना बनाने का प्लान था। पाकिस्तानी आका सोशल मीडिया पर ‘इंटरफेथ डाटा’ यानी हिंदू-मुस्लिम से जुड़ा डेटा इकट्ठा करना चाहते हैं। उनका मकसद भारत के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह से तोड़ना और देश को आंतरिक रूप से कमजोर करना है।

स्थानीय लड़कों और कॉलेज के दोस्तों को कैसे किया जा रहा है ट्रेन?

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, इस साजिश को आगे बढ़ाने के लिए स्थानीय एजेंटों को अपने ही कॉलेज मेट्स और दोस्तों को जगाने का टास्क दिया जाता है। मोइन के फोन से मिले ऑडियो में पाकिस्तानी हैंडलर्स ‘वकास’ नाम के लड़के को समझाते हैं। वे कहते हैं कि अपने कॉलेज मेट और दोस्त जो मुस्लिम लड़के हैं, उनको जगाओ और उनके साथ गुप्त मीटिंग करो।

इन लड़कों को भड़काने के लिए सबसे पहले मजहबी बातें दिखाई और समझाई जाती हैं। उन्हें झूठ बोला जाता है कि दूसरे लोग उनके मजहब के साथ क्या गलत कर रहे हैं। फिर उन्हें अपनी सीक्रेट टीम के बारे में बताया जाता है। जब लड़के जोश में आकर साथ चलने को तैयार हो जाते हैं, तब उन्हें धीरे-धीरे और तरीके से आगे का काम करने के लिए ट्रेन किया जाता है।

शादीशुदा हिंदू महिलाओं को कैसे किया जा रहा है टारगेट?

इस पूरे एजेंडे के तहत शादीशुदा हिंदू महिलाओं और नाबालिग लड़कियों को खास तौर पर जाल में फँसाया जाता है। ऑडियो में पाकिस्तानी शख्स कहता है कि उन्हें ऐसी हिंदू लड़कियाँ और महिलाएँ चाहिए, जिनके वीडियो में ‘मंगलसूत्र और माथे का सिंदूर’ साफ दिखाई दे। इन महिलाओं को पहले फेक आईडी के जरिए प्यार के जाल में फँसाया जाता है।

ग्रुप में चल रहे एजेंडे की सच्चाई को बिना किसी कहानी के सीधे शब्दों में लिखा गया है। इसका मतलब है, ‘किसी हिंदू लड़की या फिर महिला को प्यार में फँसाओ, निकाह से पहले ही प्रेग्नेंट कर दो और 9 महीने बाद बच्चा ले लो। बच्चा पैदा होने के बाद वो मुसलमान बन चुकी होगी।’ इसके बाद महिलाओं से देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ अश्लील वीडियो बनवाकर उन्हें ब्लैकमेल किया जाता है।

मोइन खान के बारे में अब तक क्या-क्या पता चला है?

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, आरोपित मनीष शर्मा मूल रूप से हिंदू था, जिसने बाद में धर्म परिवर्तन कर अपना नाम मोइन खान रख लिया था। वह कोटा के विज्ञान नगर का रहने वाला है और केवल 10वीं तक पढ़ा-लिखा है। वह एक दुकान पर काम करता था और साल 2021 में उसकी शादी हुई थी, जिससे उसका एक 4 साल का बच्चा भी है।

मोइन खान पिछले कई सालों से टेलीग्राम और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म्स पर पाकिस्तानी संगठनों के संपर्क में था। उसकी गतिविधियाँ संदिग्ध लगने पर बजरंग दल के हेल्पलाइन नंबर पर शिकायत मिली थी। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने उस पर नजर रखना शुरू किया। जब उसका फोन चेक किया गया, तो उसमें हिंदू धार्मिक प्रतीकों के साथ लड़कियों के हजारों आपत्तिजनक वीडियो और अश्लील कंटेंट बरामद हुए।

पाकिस्तान से आए सीक्रेट ऑडियो क्लिप्स में और क्या-क्या बातें हैं?

मोइन खान के मोबाइल से मिले तीन अलग-अलग ऑडियो क्लिप्स ने इस अंतरराष्ट्रीय साजिश की पुष्टि की है। पहले ऑडियो में पाकिस्तानी शख्स कहता है कि हमारा यह काम नया नहीं है और हम साल 1992 से काम कर रहे हैं। दूसरे ऑडियो में वह कहता है कि इनके जहन में यह चीज बिठा दो कि मुस्लिम सुप्रीम है और इनका भगवान कुछ नहीं है।

तीसरे ऑडियो में पाकिस्तानी हैंडलर भारत में बैठे वकास नाम के लड़के को बिल्कुल सेफ साइड रखने की बात करता है। वह कहता है कि मैं पाकिस्तान में बैठा हूँ, इसलिए तुम कभी सामने मत आना वरना सुरक्षा की दिक्कत हो जाएगी। वह वकास से कहता है कि अगर मैं तुम्हें ग्रुप का एडमिन बना देता, तो RSS के लोग तुम्हारी आईपी आईडी नोट कर तुम्हारे घर पहुँच जाते।

इस पूरे मामले में अब तक क्या-क्या कानूनी कार्रवाई हुई है?

बजरंग दल कार्यकर्ता योगेश रेनवाल की शिकायत पर 15 जून 2026 को कोटा के विजयनगर और उद्योग नगर थाने में मामला दर्ज किया गया था। आरोपित मनीष शर्मा उर्फ मोइन खान के खिलाफ आईपीसी की धारा 196(1)(a), 196(1)(b), 299, 352 और आईटी एक्ट की धारा 66, 67, 67A के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेजा गया है। उद्योग नगर थाना सीआई मांगेलाल ने बताया कि आरोपित का मोबाइल फोन फोरेंसिक जाँच (FSL) के लिए भेजा गया है।

बजरंग दल ने 22 जून को इस पूरे मामले की ऑनलाइन शिकायत केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी है। हिंदू समाज-कोटा ने भी प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर कड़ी कार्रवाई और पूरे नेटवर्क की जाँच की माँग की है। जयपुर में एटीएस ने आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़ी बबीता से खदीजा बनी महिला को पकड़ा था, जिससे जोड़कर भी एजेंसियाँ अलर्ट हैं। मामले को लेकर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ और मंत्री मदन दिलावर ने जांच के बाद दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई का भरोसा दिया है।

पटरियों पर अब हाइड्रोजन की ताकत, पहली फ्यूल सेल ट्रेन का जिंद-सोनीपत ट्रैक पर हाई स्पीड ट्रायल सफल: जानिए कैसे बदलेगा भारतीय रेलवे का भविष्य

भारत अब स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ा चुका है। इसी कड़ी में शुक्रवार (26 जून 2026) को भारतीय रेलवे ने देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल आधारित ट्रेन को का सफल हाई-स्पीड ट्रायल हरियाणा के जिंद-सोनीपत रेलखंड पर किया।

अब जल्द ही इसे यात्री सेवा में उतारने की तैयारी है। यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि अब भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है, जहाँ हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों का विकास और परीक्षण किया जा रहा है।

हालाँकि, ट्रायल के दौरान ट्रेन ने 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार हासिल की लेकिन यात्रियों के साथ इसकी अधिकतम गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा होगी। यह 10 कोच वाली ट्रेन 1200 KW क्षमता वाले हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रोपल्शन सिस्टम से चलेगी।

भारतीय रेलवे का कहना है कि यह परियोजना देश में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने और भविष्य में रेल परिवहन को पर्यावरण के लिए बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

हाइड्रोजन ट्रेन क्या होती है और कैसे काम करती है?

हाइड्रोजन ट्रेन में डीजल इंजन की जगह हाइड्रोजन फ्यूल सेल का इस्तेमाल किया जाता है। फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और हवा में मौजूद ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया से बिजली पैदा होती है, जिससे ट्रेन की मोटर चलते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में धुआँ या कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती बल्कि भाप निकलता है।

यही वजह है कि हाइड्रोजन ट्रेन को डीजल ट्रेनों की तुलना में कहीं अधिक स्वच्छ माना जाता है। इसके अलावा यह तकनीक शोर भी कम करती है, जिससे ध्वनि प्रदूषण में भी कमी आती है। दुनिया भर में इसे भविष्य के हरित परिवहन का महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है।

भारत ने जिंद-सोनीपत रूट को ही क्यों चुना?

भारतीय रेलवे ने हरियाणा के जिंद-सोनीपत सेक्शन को इस परियोजना के लिए पायलट रूट बनाया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह रेलखंड नई तकनीक के परीक्षण के लिए सही माना गया है। यहाँ ट्रैफिक नियंत्रित है और नई प्रणाली की निगरानी करना बाकी जगहों के मुकाबले आसान है।

इस परियोजना के लिए जिंद में हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और रिफ्यूलिंग की विशेष सुविधा तैयार की गई है। यहाँ संपीड़ित हाइड्रोजन गैस को सुरक्षित तरीके से संग्रहित किया जाएगा और ट्रेन में भरा जाएगा। पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (PESO) ने इसके लिए आवश्यक लाइसेंस भी जारी कर दिया है।

सुरक्षा के लिए क्या-क्या इंतजाम किए गए हैं?

हाइड्रोजन एक ज्वलनशील गैस है, इसलिए सुरक्षा इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। रेलवे ने इसके लिए कई आधुनिक सुरक्षा व्यवस्थाएँ की हैं।

रिफ्यूलिंग स्टेशन पर हाइड्रोजन लीक डिटेक्टर, फ्लेम डिटेक्टर, 24 घंटे निगरानी प्रणाली और स्टैंडबाय कम्प्रेसर लगाए गए हैं। हाइड्रोजन भरने वाले उपकरणों की नियमित जाँच और सफाई की जाएगी ताकि धूल या किसी तकनीकी खराबी के कारण कोई जोखिम न बने।

इसके अलावा ट्रेन के संचालन और रखरखाव के लिए विशेष मैनुअल तैयार किए गए हैं, जिन्हें रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गेनाइजेशन (RDSO) से मंजूरी मिल चुकी है। शुरुआती दिनों में प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी ट्रेन के साथ यात्रा करेंगे ताकि किसी भी तकनीकी समस्या का तुरंत समाधान किया जा सके।

शाकूर बस्ती में प्रस्तावित रखरखाव केंद्र पर भी नियमित सुरक्षा ऑडिट और स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू की जाएगी।

भारत के लिए यह उपलब्धि क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क वाले देशों में शामिल है। हर दिन लाखों यात्री और बड़ी मात्रा में माल रेल के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचते हैं। ऐसे में यदि भविष्य में डीजल ट्रेनों की जगह धीरे-धीरे स्वच्छ ऊर्जा से चलने वाली ट्रेनें आती हैं, तो इससे प्रदूषण में कमी लाई जा सकती है।

भारत ने साल 2070 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। रेलवे भी अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए लगातार नई तकनीकों पर काम कर रहा है। हाइड्रोजन ट्रेन उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। यदि यह परियोजना सफल रहती है, तो भविष्य में देश के अन्य नॉन एलेक्टरीफाईड रेल मार्गों पर भी ऐसी ट्रेनें चलाई जा सकती हैं।

दुनिया में हाइड्रोजन ट्रेनों की क्या स्थिति है?

हाइड्रोजन ट्रेन तकनीक अभी शुरुआती दौर में है। दुनिया के कुछ ही देशों ने इसे अपनाया है या इसका परीक्षण किया है। जर्मनी ने सबसे पहले नियमित यात्री सेवा में हाइड्रोजन ट्रेनें उतारी थीं। इसके अलावा जापान, चीन और अमेरिका भी इस तकनीक पर काम कर रहे हैं और अलग-अलग परियोजनाओं का परीक्षण कर चुके हैं।

भारत की यह सफलता इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अब वह भी उन देशों की सूची में शामिल हो गया है जो रेल परिवहन में स्वच्छ ऊर्जा आधारित तकनीक विकसित कर रहे हैं।

आगे क्या होगा?

भारतीय रेलवे के अनुसार जिंद-सोनीपत सेक्शन पर अंतिम हाई-स्पीड ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। अब कुछ नियामकीय मंजूरियाँ और परिचालन संबंधी औपचारिकताएँ पूरी की जाएँगी। इसके बाद इस ट्रेन को यात्रियों के लिए शुरू किया जाएगा।

यदि शुरुआती संचालन सफल रहता है, तो भविष्य में भारतीय रेलवे हाइड्रोजन तकनीक के उपयोग का दायरा बढ़ाने पर विचार कर सकता है। इससे न केवल प्रदूषण कम होगा बल्कि भारत स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन के क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना सकेगा।

बलिदानियों के सम्मान को भी कॉन्ग्रेस ने बनाया प्रोपेगेंडा, मोदी सरकार को घेरने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर फैलाया झूठ: जानें- क्या है ‘एक साल तक बलिदान छिपाने’ का सच

राजनीति में सुर्खियों में बने रहने के लिए कई बार बिना तथ्यों को जाँचे-परखे आरोप लगा दिए जाते हैं। ऐसा ही कुछ कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा ने किया है। पवन खेड़ा ने India Today की खबर को शेयर करते हुए मोदी सरकार पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वीर बलिदानियों के नाम छुपाने का एक गंभीर आरोप लगाया। कल तक तमाम बड़े मीडिया चैनलों की हेडलाइन भी ये ही थी, कि पहली बार ‘सार्वजनिक किए 6 बलिदानियों के नाम’। लेकिन जब इस दावे की पड़ताल की गई, तो सच कुछ और ही निकला।

दरअसल, जिन बलिदानियों के नाम सरकार द्वारा छुपाने का दावा पवन खेड़ा कर रहे हैं, वे नाम पहले से ही देश के सामने थे। रक्षा मंत्रालय और भारतीय सेना ने उनकी शहादत के तुरंत बाद ही पूरे सम्मान के साथ इसकी जानकारी सार्वजनिक की थी। हाल ही में सरकार ने बस इन नामों को नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक (नेशनल वॉर मेमोरियल) की आधिकारिक दीवार और वेबसाइट पर दर्ज कराया है, जिसे कॉन्ग्रेस नेता ने ‘नाम छुपाने’ का सियासी रंग दे दिया।

कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने क्या लगाया आरोप?

पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले 6 जांबाजों की सूची साझा की। इन नामों में सूबेदार मेजर पवन कुमार, राइफलमैन सुनील कुमार (वीर चक्र), लांस नायक दिनेश कुमार, एविएशन टेक्निशियन मूड मुरलीनायक, हवलदार सुनील कुमार सिंह और सार्जेंट सुरेंद्र कुमार (वायु सेना पदक) शामिल थे।

इन नामों को पोस्ट करते हुए पवन खेड़ा ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लिखा कि इन बहादुर बेटों ने पहलगाम हमले के बाद देश के सम्मान और हमारी बहनों के सिंदूर की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उनके नाम राष्ट्रीय चेतना में अंकित होने चाहिए थे। लेकिन, भाजपा सरकार ने पूरे एक साल तक देश से उनकी शहादत को छुपा कर रखा। उन्होंने आगे सरकार के राष्ट्रवाद पर सवाल उठाते हुए लिखा कि जो सरकार खुद को तिरंगे में लपेटती है, उसने हमारे नायकों को वह सम्मान और पहचान नहीं दी, जिसके वे हकदार थे।

फैक्ट चेक में क्या निकला सच?

जब इस दावे का फैक्ट चेक किया गया, तो पवन खेड़ा के आरोप पूरी तरह से निराधार और झूठे साबित हुए। भारतीय सेना, वायुसेना और रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक रिकॉर्ड्स बताते हैं कि इन वीर जवानों के सर्वोच्च बलिदान को कभी छुपाया ही नहीं गया था। जब मई 2025 में पाकिस्तान और PoK में आतंकी ठिकानों को तबाह करने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया गया था, तभी सेना ने समय-समय पर इन जांबाजों की शहादत की जानकारी देश को दी थी। आइए सिलसिलेवार ढंग से देखते हैं कि सच क्या है।

सार्जेंट सुरेंद्र कुमार (वायु सेना पदक): भारतीय वायुसेना (IAF) ने खुद 13 अगस्त 2025 को ट्वीट कर जानकारी दी थी कि तत्कालीन एयर चीफ मार्शल AP सिंह खुद राजस्थान के झुंझुनूं जिले में सार्जेंट सुरेंद्र कुमार के पैतृक गाँव गए थे। वहाँ उन्होंने बलिदानी की माता, पत्नी और बच्चों से मुलाकात कर सांत्वना दी थी। इसे छुपाना कैसे कहा जा सकता है?

सूबेदार मेजर पवन कुमार: भारतीय सेना की व्हाइट नाइट कॉर्प्स ने 16 मई 2025 को ही आधिकारिक तौर पर ट्वीट कर सूबेदार मेजर पवन कुमार की वीरता और सर्वोच्च बलिदान को सलाम किया था।

हवलदार सुनील कुमार सिंह: सेना की व्हाइट नाइट कॉर्प्स ने 7 जून 2025 को ट्वीट कर बताया था कि अस्पताल में इलाज के दौरान 6 जून 2025 को हवलदार सुनील कुमार सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। सेना ने उनके परिवार के साथ एकजुटता व्यक्त की थी।

राइफलमैन सुनील कुमार (वीर चक्र): समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) ने 11 मई 2025 को बाकायदा एक Video रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें जम्मू के त्रेवा गाँव में राइफलमैन सुनील कुमार के पार्थिव शरीर को पूरे सैन्य सम्मान के साथ उनके निवास स्थान पर लाते हुए दिखाया गया था। राइफलमैन सुनील कुमार को वीर चक्र भी मिला है, शायद कॉन्ग्रेस ये बात भूल गई है।

अग्निवीर मूड मुरलीनायक: व्हाइट नाइट कॉर्प्स ने 20 मई 2025 को ट्वीट कर अग्निवीर मूड मुरलीनायक के सर्वोच्च बलिदान को नमन किया था।

लांस नायक दिनेश कुमार: सेना ने 7 मई 2025 को ही ट्वीट कर जानकारी दे दी थी कि पुंछ सेक्टर में पाकिस्तानी गोलाबारी के दौरान लांस नायक दिनेश कुमार ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी।

इन सभी आधिकारिक साक्ष्यों से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि इन 6 वीरों के नाम और उनकी शहादत की गाथा एक साल पहले यानी साल 2025 में ही देश के सामने आ चुकी थी। सरकार ने केवल इस सैन्य नुकसान को आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की डिजिटल और वास्तविक दीवारों पर हमेशा के लिए अंकित किया है, जो कि एक तय प्रक्रिया का हिस्सा है।

बिना पैर-हाथ के आरोप लगाने की ‘कॉन्ग्रेसी’ आदत

इस पूरे मामले से एक बात फिर साफ हो गई है कि कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेताओं को फैक्ट चेक करने की आदत ही नहीं है। हेडलाइन बटोरने और सरकार को घेरने की जल्दबाजी में कॉन्ग्रेस के नेता बुनियादी तथ्यों को भी देखना जरूरी नहीं समझते। देश की सुरक्षा और सैनिकों की शहादत जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी बिना सोचे-समझे राजनीति करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। अगर पवन खेड़ा ने थोड़ा सा भी समय निकालकर भारतीय सेना या रक्षा मंत्रालय के सोशल मीडिया हैंडल खंगाले होते, तो शायद उन्हें खुद ही शर्मिंदगी उठानी पड़ती। लेकिन बिना देखे, बिना जाँचे आरोप मढ़ देना ही आज की राजनीति का नया टूल बन चुका है, जिसमें कॉन्ग्रेस के नेता पूरी तरह माहिर हो चुके हैं।

‘श्मशान का भी व्यवसाय’… ईशा फाउंडेशन को पटना में एशिया के सबसे बड़े शवदाह गृह के संचालन की जिम्मेदारी मिलने पर हंगामा, जानें- ऑपइंडिया से क्या बोली सद्गुरु की संस्था

अंतिम यात्रा किसी परिवार के लिए केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं होती बल्कि वह भावनात्मक रूप से सबसे कठिन समयों में से एक होती है। ऐसे समय में यदि परिवार को अव्यवस्था, लंबी प्रतीक्षा, असुविधा और अनिश्चित खर्च का सामना करना पड़े तो वह पीड़ा और बढ़ जाती है। बिहार सरकार पिछले कुछ समय से इसी क्षेत्र में बदलाव की दिशा में काम कर रही है।

राज्य में आधुनिक शवदाह गृहों के निर्माण और पुराने श्मशान घाटों को सुविधायुक्त बनाने की पहल इसी सोच का हिस्सा है। राजधानी पटना के बाँसघाट शवदाह गृह को आधुनिक स्वरूप देकर उसके संचालन की जिम्मेदारी ‘सद्गगुरु’ जग्गी वासुदेव की संस्था ईशा फाउंडेशन को सौंपी गई है। हालाँकि, इसे लेकर अब विवाद भी शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं।

कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि सरकार संस्था के साथ मिलकर श्मशान का भी ‘व्यवसाय’ कर रही है और इससे गरीबों को कोई लाभ नहीं मिलेगा। हालाँकि, संस्थान का कहना है कि पूरे प्रयास को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है जबकि इसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं बल्कि अंतिम संस्कार व्यवस्था को पारदर्शी, सुविधाजनक और सम्मानजनक बनाना है।

ईशा फाउंडेशन ने ऑपइंडिया को क्या बताया?

इस पूरे मॉडल को समझने से पहले यह देखना जरूरी है कि आखिर सरकार ने यह जिम्मेदारी ईशा फाउंडेशन को क्यों दी, यहाँ कौन-कौन सी सुविधाएँ विकसित की गई हैं। ऑपइंडिया ने ईशा फाउंडेशन से इस विषय पर कुछ सवाल किए, जिसका संस्था ने विस्तार से जवाब दिया है नीचे उन सवालों और जवाबों को क्रमवार लिखा गया है।

● ईशा फाउंडेशन ने शवदाह गृह (श्मशान घाट) के संचालन की जिम्मेदारी क्यों संभाली है?
ईशा फाउंडेशन शवदाह गृहों का संचालन इस उद्देश्य से करता है कि हर व्यक्ति को सम्मानजनक और गरिमापूर्ण अंतिम विदाई मिल सके। तमिलनाडु सरकार के साथ साझेदारी में फाउंडेशन पिछले 15 वर्षों से शवदाह गृहों का संचालन कर रहा है, जहाँ स्वच्छ और सुव्यवस्थित परिसर, प्रशिक्षित कर्मचारी तथा पारंपरिक अंतिम संस्कार की सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

इन केंद्रों पर अब तक 1,25,000 से अधिक अंतिम संस्कार किए जा चुके हैं। इन सुविधाओं के माध्यम से ईशा ने प्राचीन परंपराओं और मृत्यु संस्कारों को ऊर्जा-आधारित दृष्टिकोण के साथ पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है और इसे व्यावसायिक गतिविधि नहीं बल्कि सेवा के रूप में संचालित किया है।

इसी अनुभव को देखते हुए बिहार सरकार ने ईशा फाउंडेशन की सामाजिक एवं पर्यावरणीय इकाई ‘ईशा आउटरीच’ के साथ साझेदारी की है ताकि राज्य में शवदाह गृहों का संचालन और प्रबंधन किया जा सके, जबकि भूमि का स्वामित्व सरकार के पास रहेगा।

● यह शवदाह गृह मौजूदा सरकारी या नगर निगम के शवदाह गृहों से कैसे अलग होगा?
ईशा मॉडल की सबसे बड़ी विशेषता गरिमा, स्वच्छता और संवेदनशील सेवा पर उसका ध्यान है। इन शवदाह गृहों का पेशेवर तरीके से रखरखाव किया जाता है, शुल्क व्यवस्था पारदर्शी होती है और प्रशिक्षित कर्मचारी पूरे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को संवेदनशीलता के साथ संभालते हैं।

परिसर में पारंपरिक अंतिम संस्कार के लिए समर्पित स्थान और सुव्यवस्थित सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं, जिससे शोकग्रस्त परिवारों का बोझ कम हो सके।

● अंतिम संस्कार के लिए क्या शुल्क तय किया गया है?

इलेक्ट्रिक शवदाह के लिए शुल्क ₹3,500 तय किया गया है, जो नगर निकाय समझौते के तहत अनुमत सीमा के भीतर सबसे कम शुल्क बताया गया है। यह राशि बिजली और रखरखाव संबंधी खर्चों को पूरा करने के लिए निर्धारित की गई है। लकड़ी आधारित अंतिम संस्कार के लिए सेवा शुल्क ₹3,500 रहेगा, लेकिन लकड़ी का खर्च परिवार को स्वयं वहन करना होगा।

● क्या गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए कोई रियायत, मुफ्त सेवा या सरकारी सहायता उपलब्ध होगी?

सेवा की भावना को आगे बढ़ाते हुए, ईशा आउटरीच बांस घाट श्मशान घाट पर अंत्योदय अन्न योजना (AAY) कार्डधारकों के लिए निःशुल्क अंतिम संस्कार सेवा उपलब्ध करा रहा है, ताकि आर्थिक कठिनाई किसी भी व्यक्ति को सम्मानजनक अंतिम विदाई देने में बाधा न बने।

● इसे ‘VIP शवदाह गृह’ क्यों कहा जा रहा है?

इसे विशेष या VIP पहुँच के कारण नहीं बल्कि बेहतर बुनियादी ढाँचे के कारण ऐसा कहा जा रहा है। स्वच्छ परिसर, व्यवस्थित पार्किंग, विशाल प्रतीक्षा क्षेत्र और बेहतर सुविधाओं का उद्देश्य हर परिवार को सम्मानजनक और व्यवस्थित वातावरण उपलब्ध कराना है।

● क्या यह पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल (इको-फ्रेंडली) मॉडल पर आधारित होगा? प्रदूषण और उत्सर्जन कम करने के लिए कौन-सी तकनीक इस्तेमाल होगी?

इस शवदाह गृह को पर्यावरण-अनुकूल दृष्टिकोण के साथ विकसित किया जा रहा है। इलेक्ट्रिक शवदाह इसकी प्रमुख व्यवस्था होगी, जिसे उत्सर्जन नियंत्रित करने वाली चिमनी प्रणाली का समर्थन मिलेगा।

साथ ही लकड़ी आधारित भट्टियों को चरणबद्ध तरीके से LPG आधारित प्रणाली में बदलने का प्रस्ताव है, जो पारंपरिक लकड़ी चिताओं की तुलना में कम प्रदूषणकारी होगी और लकड़ी पर निर्भरता भी कम करेगी। उद्देश्य कम उत्सर्जन और पर्यावरणीय प्रभाव वाला आधुनिक शवदाह केंद्र बनाना है।

● पूरे परिसर का संचालन और प्रबंधन कैसे किया जाएगा?
पूरे परिसर का संचालन ईशा आउटरीच द्वारा किया जाएगा, जिसमें मानव संसाधन, सफाई व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, बागवानी और रखरखाव शामिल होगा। इसके अलावा तकनीकी संचालन जैसे भट्टियाँ, विद्युत प्रणाली, प्लंबिंग और अन्य बुनियादी संरचना की जिम्मेदारी भी फाउंडेशन संभालेगा।

● क्या बिचौलियों और अवैध शुल्क वसूली को रोकने के लिए कोई पारदर्शी व्यवस्था होगी?
हाँ, पूरी व्यवस्था पारदर्शिता सुनिश्चित करने और बिचौलियों की भूमिका कम करने के उद्देश्य से बनाई गई है। अंतिम संस्कार और परिसर संचालन सीधे प्रबंधित होने के कारण परिवारों को मुख्य सेवाओं के लिए मध्यस्थों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। जहाँ अतिरिक्त पारंपरिक सेवाओं की आवश्यकता होगी, वहाँ स्पष्ट नियमों का पालन किया जाएगा ताकि अनावश्यक शुल्क न लिया जा सके।

● यदि किसी दिन अंतिम संस्कार के मामलों की संख्या अधिक हो जाए तो भीड़ और प्रतीक्षा समय को कैसे संभाला जाएगा?
हाँ, अधिक संख्या में मामलों को संभालने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की गई है। यह सुविधा एक समय में 18 अंतिम संस्कार संभाल सकती है और इसमें कई भट्टियाँ, प्रशिक्षित ऑपरेटर तथा पर्याप्त सहयोगी कर्मचारी उपलब्ध रहेंगे।

वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 1–2 मामलों की आवश्यकता है, लेकिन बुनियादी ढाँचा कहीं अधिक क्षमता के अनुसार विकसित किया गया है। साथ ही प्रतीक्षा क्षेत्र, बैठने की व्यवस्था और लगभग 40 वाहनों की पार्किंग सुविधा उपलब्ध होगी।

● क्या ईशा फाउंडेशन ने पटना जैसी व्यवस्था कहीं और भी लागू की है?
ईशा फाउंडेशन का ‘कायंथा स्थानम’ मॉडल वर्ष 2010 में तमिलनाडु के कोयंबटूर के नंजुंडापुरम क्षेत्र से शुरू हुआ था, जब पहला शवदाह गृह ईशा को सौंपा गया था। इसके बाद यह मॉडल पूरे राज्य में विस्तारित हुआ। वर्तमान में ईशा तमिलनाडु में 33 शवदाह गृहों का संचालन कर रहा है और पिछले 15 वर्षों में 1,25,000 से अधिक अंतिम संस्कार किए जा चुके हैं।

पिछले वर्ष ईशा ने तमिलनाडु में अपने प्रबंधित शवदाह गृहों पर गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों के लिए मुफ्त अंतिम संस्कार सेवा भी शुरू की थी।

4.5 एकड़ में बने श्मशान में एक साथ 18 शवों की अंत्येष्टि, जानें क्या है सुविधाएँ

पटना का बांसघाट श्मशान 4.5 एकड़ में फैला है। पटना स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने इसे 89.40 करोड़ रुपए की लागत से विकसित किया है। यहाँ पहले मौजूद श्मशान 1.24 एकड़ में फैला था। इसे एक ऐसे परिसर के रूप में तैयार किया गया है जहाँ अंतिम संस्कार से जुड़ी लगभग पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित करने की कोशिश की गई है।

इस परिसर को आधुनिक स्वरूप दिया गया है और इसे एशिया के सबसे बड़े श्मशान परिसरों में से एक बताया जा रहा है। यहाँ एक साथ 18 अंतिम संस्कार किए जा सकते हैं। इसके लिए तीन तरह की व्यवस्थाएँ बनाई गई हैं। पहली व्यवस्था पारंपरिक चिता आधारित अंत्येष्टि की है जिसके लिए 8 खुले स्थल बनाए गए हैं।

दूसरी व्यवस्था इलेक्ट्रिक शवदाह इकाइयों की है, जहाँ 4 आधुनिक यूनिट लगाई गई हैं। तीसरी व्यवस्था 6 लकड़ी आधारित पर्यावरण अनुकूल फर्नेस की है जिनमें कम लकड़ी और नियंत्रित प्रक्रिया के साथ अंतिम संस्कार किया जा सकता है। इसके अलावा गैस आधारित फर्नेस की तैयारी भी की जा रही है जिन्हें भविष्य में शुरू किया जाना प्रस्तावित है।

सरकार का कहना है कि इससे लागत और प्रदूषण दोनों कम होंगे, लेकिन चर्चा केवल दाह प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। अंतिम यात्रा में आने वाले लोगों के लिए यहाँ दो बड़े एसी वेटिंग हॉल बनाए गए हैं ताकि लोगों को कठिन परिस्थितियों में भी धूप, भीड़ और असुविधा का सामना न करना पड़े।

6 वुड क्रीमेसन ओवन हैं। इसे बिहार की कंपनी ने तैयार किया हैं। इसमें शव जलाने में कम लकड़ी लगती है। शव 20-25 मिनट में राख हो जाता है। धुंए को बाहर निकालने के लिए चिमनी लगाई गई है। परिसर में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया गया है, साफ और व्यवस्थित शौचालय बनाए गए हैं, लोगों के लिए कैंटीन की व्यवस्था की गई है।

श्मशान घाट की दीवारों पर पेंटिंग और राजा हरिश्चंद्र की कहानी

इस श्मशान घाट के दीवारों पर पेंटिंग बनाई गई है, जहाँ इंसान के जन्म से लेकर मृत्यु तक की जीवन यात्रा और कर्मों के आधार पर स्वर्ग-नरक के मार्ग को बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है। इसके अलावा राजा हरिश्चंद्र की तस्वीर के साथ उनकी कहानी को उकेरी गई है, यह शोकाकुल लोगों को किसी भी परिस्थिति में सच्चाई और कर्तव्यों के पालन के लिए प्रेरित करेगी।

परिसर की दीवारों पर त्रिशूल बना आकर्षक फ्रेम लगाए गए हैं, जिसे मोक्ष धाम और वैकुंठ धाम नाम दिया गया है। यह एक HPL (हाई प्रेशर लैमिनेट) शीट है। इस व्यू कटर को गुजरात से मंगाया गया है। इसके अलावा परिसर के भीतर अंतिम संस्कार सामग्री उपलब्ध कराने के लिए दुकानें बनाई गई हैं ताकि परिजनों को बाहर भागदौड़ न करनी पड़े।

कपड़े, पूजन सामग्री, अगरबत्ती, लकड़ी, हवन सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुएँ एक ही स्थान पर उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है।

आकर्षण का मुख्य केंद्र श्मशान घाट के दो द्वार हैं। इसमें से एक मोक्ष द्वार और दूसरा बैकुंठ द्वार है। दोनों की ऊँचाई 42 फीट है। एक एंट्री और दूसरा निकास पॉइंट है। दोनों द्वार में कांसे से बना ओम चिन्ह स्थापित किया गया है। इन्हें जालंधर के कारीगर ने तैयार किया है।

गंगाजल, अस्थि विसर्जन, मोर्चरी और डिजिटल सेवाएँ, 12 फीट ऊँची भगवान शिव की प्रतिमा

बांसघाट में कई ऐसी व्यवस्थाएँ भी जोड़ी गई हैं जिनकी चर्चा सामान्य रूप से श्मशान घाटों के संदर्भ में कम होती है। यहाँ गंगाजल आधारित दो अलग तालाब बनाए गए हैं। एक स्नान के लिए और दूसरा अस्थि विसर्जन के लिए उपयोग में लाया जाना प्रस्तावित है। दो तालाबों के बीच 12 फुट ऊँची भगवान शिव की प्रतिमा स्थापित की गई है।

प्रतिमा को तमिलनाडु के आदियोगी के तर्ज पर तैयार किया गया है। इसे बनाने के लिए जालंधर से कारीगर आए थे। इसे फाइबर मटेरियल से बनाया गया है। इस 15 फीट ऊँचे त्रिशूल के साथ स्थापित प्रतिमा में शिव की जटाओं से गंगा निकलती दिखाई देंगी और साथ ही आसपास लाइटिंग भी की गई है। वहीं, आगे की तरफ रास्तों पर ग्रीन एरिया को डेवलप गया है।

इसके पीछे तर्क ये है कि बदलती भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हर समय सीधे नदी तक पहुँच आसान नहीं होती। परिसर में मोर्चरी सुविधा भी विकसित की गई है जिससे आवश्यकता होने पर शव को सुरक्षित रखा जा सके। ऑनलाइन स्लॉट बुकिंग की व्यवस्था को भी जोड़ा गया है ताकि लोगों को लंबी कतारों और अव्यवस्था से राहत मिल सके।

लोग ऑनलाइन स्लॉट भी बुक कर सकते हैं। इसके लिए पटना नगर निगम की वेबसाइट पर जाकर टिकट आईडी जेनरेट करना होगा। व्हाट्सएप चैटबोट 9264447449 के जरिए भी बुकिंग कर सकते हैं। हेल्प डेस्क जैसी व्यवस्था भी रखी गई है ताकि लोगों को दस्तावेज और प्रक्रियाओं में सहायता मिल सके।

वहीं पिकअप सर्विस के लिए मुक्ति रथ भी बुक कर सकते हैं। इसके साथ ही डेथ सर्टिफिकेट के लिए भी आवेदन कर सकते हैं। सरकार का कहना है कि अंतिम संस्कार जैसी व्यवस्था में डिजिटल सुविधाओं का उद्देश्य सुविधा देना है, न कि परंपराओं को बदलना।

‘डिग्निटी इन डेथ’ : संस्था की मूल सोच

इस पूरे मॉडल के केंद्र में जिस विचार की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है ‘डिग्निटी इन डेथ’। ईशा फाउंडेशन का मानना है कि मृत्यु एक मानवीय और भावनात्मक स्थिति है। इसी कारण प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की तैनाती, प्रक्रिया में सहायता, कम प्रतीक्षा समय, परिजनों के साथ सहयोग और व्यवस्थित वातावरण पर जोर दिया गया।

बिहार में अत्याधुनिक तकनीक से 40 शवदाह गृह बनाए जा रहे हैं। इसमें से 20 शवदाह गृह का निर्माण पूरा हो चुका है। उत्तर बिहार के 12 और दक्षिण बिहार के 8 जिलों में आधुनिक शवदाह गृहों का निर्माण हो चुका है। इन तैयार किए गए 20 शवदाह गृहों के सौंदर्यीकरण का काम अंतिम चरण में है, जिसके बाद इन्हें जल्द ही चालू कर दिया जाएगा।

पटना के दीघा घाट में भी ईशा फाउंडेशन की ओर से LPG गैस आधारित श्मशान घाट बनाया जाएगा। इसके अलावा, बेगूसराय के सिमरिया घाट, भागलपुर, गयाजी, सहरसा और छपरा में भी शवदाह गृहों को आधुनिक करने की योजना है। संस्था का यह भी कहना है कि सेवा का उद्देश्य लाभ नहीं बल्कि परिवार को कठिन समय में एक सम्मानजनक अनुभव देना है। सरकार का यह कदम किसी व्यवसाय का विस्तार नहीं बल्कि अंतिम यात्रा को गरिमा देने की कोशिश है।

वेनेजुएला में तबाही के बाद भारत के ‘भूदेव’ की आई याद, हिमालयी क्षेत्रों में तैनात ये सिस्टम बचा सकता है लाखों की जान: समझें कैसे ये दिल्ली-NCR के लिए वरदान जैसा

दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में गुरुवार (25 जून 2026) को आए 7.2 और 7.5 तीव्रता के दो विनाशकारी भूकंपों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। पिछले 100 वर्षों के इस सबसे शक्तिशाली जलजले में अब तक कम से कम 235 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1,500 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं और सैकड़ों इमारतें जमींदोज हो चुकी हैं।

वेनेजुएला की इस भीषण त्रासदी के बाद भारत के भूवैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के बीच हिमालयी क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर चर्चा बेहद तेज हो गई है। भारतीय वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि भारत और यूरेशियाई टेक्टॉनिक प्लेटों के मिलन स्थल पर स्थित हिमालयी क्षेत्र में कभी भी बड़ा भूकंप आ सकता है, जिसका असर दिल्ली-एनसीआर तक देखने को मिलेगा।

भारत के पास ‘भूदेव’, ये बचाएगा लाखों की जान

इस बड़े खतरे से निपटने के लिए भारत ने हिमालय की कोख में एक बेहद आधुनिक सुरक्षा कवच तैयार किया है, जिसे ‘भूदेव (BhuDEV)’ प्लान नाम दिया गया है। दुनिया के किसी भी देश के पास भूकंप आने से पहले उसकी सटीक भविष्यवाणी (समय, स्थान और तीव्रता) करने की तकनीक आज भी मौजूद नहीं है। लेकिन भूकंप की शुरुआत होते ही तबाही मचाने वाले झटकों के पहुँचने से कुछ सेकंड पहले अलर्ट जारी करने वाली तकनीक विकसित कर ली गई है।

इसी तकनीक को ‘अर्थक्वेक अर्ली वार्निंग सिस्टम’ (EEW) कहा जाता है, जो आज के समय में लाखों लोगों की जान बचाने का सबसे बड़ा हथियार साबित हो सकता है।

आईआईटी रुड़की ने तैयार किया है खास सिस्टम

भारत में इस दिशा में सबसे सफल और ऐतिहासिक प्रयास उत्तराखंड सरकार के सहयोग से आईआईटी रुड़की (IIT Roorkee) ने किया है। आईआईटी रुड़की ने एक अत्याधुनिक भूकंप अर्ली वॉर्निंग मोबाइल ऐप और सिस्टम ‘भूदेव’ तैयार किया है। तकनीकी रूप से यह सिस्टम भूकंप के दौरान पैदा होने वाली तरंगों के सिद्धांत पर काम करता है।

जब जमीन के नीचे फॉल्ट लाइनों में हलचल होती है, तो सबसे पहले ‘पी-वेव’ (Primary Wave) निकलती है। यह तरंग बेहद तेज गति से चलती है लेकिन इससे कोई नुकसान नहीं होता। इसके कुछ सेकंड बाद सबसे विनाशकारी ‘एस-वेव’ (Secondary Wave) और अन्य सतही तरँगें पहुँचती हैं, जो इमारतों को गिराती हैं।

हिमालयी क्षेत्रों में जमीन के भीतर लगाए गए सेंसरों का घना नेटवर्क इन गैर-नुकसानदेह पी-वेव्स को तुरंत पकड़ लेता है। जैसे ही सेंसर इन तरंगों को डिकोड करते हैं, वे कंप्यूटर नेटवर्क के जरिए सीधे केंद्रीय सर्वर और आम लोगों के मोबाइल ऐप ‘भूदेव’ पर अलर्ट भेज देते हैं।

यह चेतावनी मिलने का समय इस बात पर निर्भर करता है कि कोई खास शहर या इलाका भूकंप के केंद्र (Epicenter) से कितनी दूरी पर स्थित है। यदि कोई क्षेत्र भूकंप के केंद्र के बिल्कुल नजदीक है, तो वहाँ लोगों को संभलने का समय लगभग न के बराबर मिलेगा, लेकिन केंद्र से दूर स्थित घने बसे मैदानी शहरों को कुछ सेकंड से लेकर एक मिनट तक का अमूल्य मार्जिन मिल जाता है।

इस बेहद महत्वपूर्ण समय अंतराल का उपयोग बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए किया जा सकता है। कुछ ही सेकंड के इस लाइफ-सेविंग मार्जिन के दौरान स्वचालित प्रणालियों के जरिए हाई-स्पीड ट्रेनों को रोका जा सकता है, घरेलू और औद्योगिक गैस पाइपलाइनों की सप्लाई को ऑटोमेटिक कट किया जा सकता है, मेट्रो सेवाओं को स्टेशनों पर ही थामने के निर्देश दिए जा सकते हैं और बिजली ग्रिडों को नियंत्रित कर बड़े शॉर्ट-सर्किट या आगजनी की घटनाओं को टाला जा सकता है। इसके साथ ही बहुमंजिला इमारतों और घरों में मौजूद आम नागरिकों को खुले मैदानों या सुरक्षित स्थानों पर भागने का मौका मिल जाता है।

भारत सरकार के वैज्ञानिक प्रतिष्ठान इस तकनीक को और अधिक सटीक और व्यापक बनाने के लिए युद्धस्तर पर काम कर रहे हैं। सरकार ने इस संबंध में संसद को भी आधिकारिक रूप से अवगत कराया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, “हिमालयी क्षेत्र में भूकंप की पूर्व चेतावनी (EEW) के लिए एक रियल-टाइम सिस्मिक नेटवर्क पूरी तरह से शुरू कर दिया गया है। इसके साथ ही, नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी (NCS) क्षेत्रीय डेटा का इस्तेमाल करते हुए पी-वेव्स (P-Waves) का तेजी से पता लगाने, भूकंप की तीव्रता का तत्काल अनुमान लगाने और संभावित झटकों की जल्द भविष्यवाणी करने के लिए नए प्रोटोटाइप एल्गोरिदम भी विकसित कर रहा है।”

गढ़वाल और कुमाऊँ में तैनात हैं खास सेंसर

वर्तमान में ये एडवांस सेंसर मुख्य रूप से उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों की सक्रिय भ्रंश रेखाओं (Active Fault Lines) के पास घने नेटवर्क के रूप में स्थापित किए गए हैं। देश के सबसे संवेदनशील सीस्मिक जोन-5 के बेहद करीब होने के कारण यह क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि गढ़वाल या कुमाऊँ क्षेत्र में 8 या 9 तीव्रता का कोई बड़ा भूकंप आता है, सीस्मिक जोन-4 में आने वाले दिल्ली-एनसीआर को इस अर्ली वार्निंग सिस्टम के जरिए संभलने के लिए लगभग 40 से 60 सेकंड का बहुमूल्य समय मिल सकता है, जो राजधानी में मची भारी तबाही और लाखों मौतों को रोकने में गेम-चेंजर साबित होगा।

वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो भूकंप की पूर्व चेतावनी देने के मामले में जापान, ताइवान और अमेरिका दुनिया के सबसे उन्नत देश माने जाते हैं, जहाँ इस तकनीक ने हजारों जिंदगियाँ बचाई हैं। वेनेजुएला की ताजा और भयानक त्रासदी भारत को सचेत करती है कि प्राकृतिक आपदाओं को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन ‘भूदेव’ जैसे आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम के विस्तार, भूकंप-रोधी निर्माण तकनीकों और जन-जागरूकता के बेहतरीन तालमेल से देश को सुरक्षित जरूर किया जा सकता है।

श्रद्धालुओं का दान और सिस्टम के भीतर सेंध: जानें- कौन हैं 8 लोग, जिन पर राम मंदिर में दानपात्र से कैश काउंटिंग तक गड़बड़ी के आरोप

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी और हैंडलिंग में कथित गड़बड़ी का मामला अब जाँच के सबसे अहम दौर में पहुँच गया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की शिकायत पर इस मामले में FIR दर्ज हुई है। इसके बाद पुलिस ने इस मामले में अब तक 8 आरोपितों को गिरफ्तार किया। आरोप है कि मंदिर में आने वाले दान की गिनती, रखरखाव और उससे जुड़ी व्यवस्था में बड़े स्तर पर अनियमितताएँ हुईं।

यह मामला पहली बार 7 जून को सामने आया था। इसके बाद यूपी सरकार ने 13 जून को SIT का गठन किया। SIT ने 23 जून को एडिशनल चीफ सेक्रेटरी गृह संजय प्रसाद को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपी। इसी रिपोर्ट के दो दिन बाद कार्रवाई तेज हुई और मंदिर से जुड़े 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार आरोपितों में रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव, लवकुश मिश्रा, अनुकल्प मिश्रा, मनीष यादव, अविनाश शुक्ला, करुणेश पांडेय, सुभाष चंद्र श्रीवास्तव और रमाशंकर मिश्रा शामिल हैं। इस रिपोर्ट में जानेंगे कि ये 8 लोग कौन हैं इन पर क्या आरोप हैं।

FIR की कॉपी का एक हिस्सा

रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव

रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव इस पूरे विवाद का सबसे चर्चित चेहरा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का पूर्व ड्राइवर बताया जाता है और VHP के कारसेवकपुरम से भी जुड़ा रहा है। बताया गया है कि मंदिर की व्यवस्थाओं में उसका हस्तक्षेप रहता था और दानपात्रों की निगरानी से लेकर उन्हें बेसमेंट तक पहुँचाने की प्रक्रिया में उसकी भूमिका थी।

आरोप है कि दानपात्रों की चाबियाँ भी उसी के पास रहती थीं और ट्रस्ट के लोगों से करीबी होने के कारण वह मनमाने तरीके से काम करता था। FIR और रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी शुरुआती चरण में चढ़ावे की रकम में कथित गड़बड़ी हुई और उससे अयोध्या व आसपास के जिलों में संपत्तियाँ बनाने के आरोप लगे। हालाँकि, टिन्नू यादव ने कैश काउंटिंग में अपनी भूमिका से इनकार किया है और आरोपों के पीछे कुछ ‘जलने वाले लोगों‘ को जिम्मेदार बताया है।

रामशंकर मिश्रा

रामशंकर मिश्रा भी दान की रकम गिनने वाली टीम से जुड़े बताए गए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन पर दूसरे कर्मचारियों के साथ मिलकर साजिश रचने का आरोप है। यह भी आरोप लगाया गया है कि उन्होंने अपने बेटे अनुकल्प मिश्रा और दामाद लवकुश मिश्रा को भी चढ़ावा गिनने के काम में लगवाया।

पुलिस के हवाले से आई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रामशंकर मिश्रा अन्य आरोपितों के साथ मिलकर दान की रकम में कथित हेराफेरी करते थे और कैश सॉर्टिंग प्रक्रिया के दौरान CCTV फुटेज में भी दिखे। जाँच एजेंसियों का दावा है कि उन्होंने तय वित्तीय प्रक्रिया को दरकिनार करने में भूमिका निभाई और लंबे समय तक कथित गड़बड़ी को आसान बनाया।

अनुकल्प मिश्रा

अनुकल्प मिश्रा, रामशंकर मिश्र का बेटा है और वह भी दान की रकम गिनने और संभालने की प्रक्रिया में शामिल था। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अयोध्या के मिल्कीपुर क्षेत्र के बसावन गाँव का निवासी है। उसका संबंध ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा से भी बताया गया है।

अनुकल्प की ड्यूटी चढ़ावा गिनने के काम में लगती थी। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि कैश काउंटिंग के दौरान रकम में कथित हेराफेरी की गई और अनुकल्प के घर से चोरी की रकम बरामद होने का दावा भी किया गया है। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि CCTV फुटेज और बरामदगी के आधार पर उसकी भूमिका की जाँच की जा रही है।

लवकुश मिश्रा

लवकुश मिश्रा भी दान की रकम गिनने वाली टीम का हिस्सा था। आरोप है कि चढ़ावे की रकम में कथित हेराफेरी के बाद उसके निपटान यानी ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी लवकुश पर थी। कहा गया है कि उसने मंदिर से चोरी कर करोड़ों रुपए की संपत्ति बनाई है।

शुरुआती जाँच में उसके घर से रकम बरामद होने के दावे सामने आए थे। कुछ रिपोर्ट्स में उसके घर से करीब 12 लाख रुपए कैश मिलने की बात कही गई है। जाँच एजेंसियाँ इस रकम के स्रोत की जाँच कर रही हैं और आरोप है कि वह अनुकल्प मिश्रा के साथ मिलकर दान की रकम की हेराफेरी में सक्रिय रूप से शामिल था।

अविनाश शुक्ला

अविनाश शुक्ला को मंदिर की व्यवस्था और दान की रकम से जुड़ी प्रक्रिया में शामिल व्यक्ति बताया गया है। रिपोर्ट्स में उसे मंदिर का अटेंडेंट या काउंटिंग टीम से जुड़ा सदस्य बताया गया है। आरोप है कि वह दान की रकम को सुरक्षित तरीके से काउंटिंग रूम तक पहुँचाने और गिनती की प्रक्रिया में शामिल था।

पुलिस सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि वह उस कथित सिंडिकेट का अहम सदस्य था, जिस पर चढ़ावे की रकम में गड़बड़ी का आरोप है। उसके बैंक खाते से करीब 5 लाख रुपए बरामद होने की चर्चा भी रिपोर्ट्स में सामने आई है। उस पर दान की रकम के कथित दुरुपयोग और उससे संपत्ति बनाने के आरोप लगाए गए हैं।

मनीष कुमार यादव

मनीष कुमार यादव, रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव का भतीजा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह टिन्नू यादव के छोटे भाई बलराम यादव का बेटा है। पुलिस के हवाले से कहा गया है कि मनीष मंदिर में दान की रकम गिनने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल था।

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि उसके घर से भी चोरी की रकम बरामद हुई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार, जांच के दौरान उसके घर से करीब 36 लाख रुपए नकद मिलने का दावा किया गया है। जाँच एजेंसियाँ अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह रकम कहाँ से आई और इसका संबंध कथित गबन से किस तरह जुड़ता है।

सुभाष चंद्र श्रीवास्तव

सुभाष चंद्र श्रीवास्तव पूर्व बैंक कर्मचारी हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्हें राम मंदिर में कैश काउंटिंग स्टाफ का प्रभारी बनाया गया था। उनकी जिम्मेदारी दान की रकम की गिनती करने वाले कर्मचारियों की निगरानी और पूरी काउंटिंग प्रक्रिया को देखना था। बैंकिंग पृष्ठभूमि के कारण उन्हें इस काम की निगरानी के लिए रखा गया था।

FIR और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन पर निगरानी में कथित लापरवाही और अनियमितताओं में संलिप्तता के आरोप हैं। जाँच एजेंसियाँ यह देख रही हैं कि उनके प्रभारी रहते हुए दान की रकम की गिनती में कथित गड़बड़ी कैसे हुई।

करुणेश पांडेय

करुणेश पांडेय पर दान की रकम से जुड़ी रसीदों और वित्तीय रिकॉर्ड में कथित हेराफेरी का आरोप है। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह अनुकल्प मिश्रा और लवकुश मिश्रा के साथ पूरी साजिश में शामिल था। जाँच एजेंसियों का दावा है कि वह श्रद्धालुओं के चढ़ावे को संभालने वाली कोर टीम का हिस्सा थे।

एक रिपोर्ट के अनुसार, उनकी जिम्मेदारी दान की रकम को गिनती वाले कमरे तक पहुँचाने से भी जुड़ी थी। उन पर आरोप है कि उन्होंने रकम और रिकॉर्ड की हेराफेरी में भूमिका निभाई और कथित गड़बड़ी से संपत्ति अर्जित की।

UP से महाराष्ट्र और कश्मीर तक… पैगंबर मोहम्मद के बहाने सड़कों पर कट्टरपंथी, नाजिया इलाही पर FIR की कर रहे माँग: इस ‘शक्ति प्रदर्शन’ के पीछे साजिश तो नहीं?

सोशल मीडिया पर पैगंबर मोहम्मद और हजरत आयशा के खिलाफ कथित तौर पर की गई एक टिप्पणी को लेकर इस समय देश के कई राज्यों में भारी बवाल मचा हुआ है। मुंबई की रहने वाली नाजिया इलाही खान के एक पुराने बयान के बाद उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र के कई शहरों में अचानक मुस्लिम समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए हैं।

इस मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब AIMIM के नेता असदुद्दीन ओवैसी का एक Video सोशल मीडिया पर Viral हुआ। इसके बाद ओवैसी पर भीड़ को भड़काने और ‘सर तन से जुदा’ जैसे खतरनाक नारों के लिए उकसाने के आरोप लग रहे हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि FIR के बहाने इस्लामी कट्टरपंथी किस दंगे या हिंसा की साजिश को अंजाम देना चाहते हैं?

महाराष्ट्र में पहली FIR और रजा एकेडमी का एक्शन

इस पूरे विवाद की कानूनी शुरुआत महाराष्ट्र से हुई। मुंबई महानगर क्षेत्र के भिवंडी में स्थित शांति नगर थाने में स्थानीय निवासी रविश मोमिन और अदनान अंसारी की शिकायत पर नाजिया इलाही खान और पॉडकास्ट होस्ट दिव्या सिंह के खिलाफ देश की पहली FIR दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 19 जून को इंस्टाग्राम पर पोस्ट की गई एक पॉडकास्ट रील में नाजिया ने आपत्तिजनक बयान दिए जिससे मुस्लिम समुदाय की भावनाएँ आहत हुईं।

इसके साथ ही मुंबई के पाधोनी थाने में रजा एकेडमी के अध्यक्ष अलहाज मुहम्मद सईद नूरी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पहुँचा और नाजिया की तुरंत गिरफ्तारी की माँग की। एडवोकेट इरफान शेख की शिकायत पर पुलिस ने जीरो FIR दर्ज की। डीसीपी रागसुधा के मुताबिक, इस मामले का मुख्य अधिकार क्षेत्र पश्चिम बंगाल में आता है, इसलिए केस को आगे की जाँच के लिए वहाँ ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

मालेगाँव और हैदराबाद में बढ़ा कानूनी शिकंजा

महाराष्ट्र के मालेगाँव में भी ऑल इंडिया सुन्नी जमीयतुल इस्लाम के पदाधिकारियों की शिकायत पर नाजिया के खिलाफ एक और FIR दर्ज की गई। संगठन के प्रतिनिधि सूफी नुरुल अयन साबरी ने बताया कि नाजिया लंबे समय से मुस्लिम समुदाय, उनकी मजहबी हस्तियों और त्यौहारों के खिलाफ विवादित बयान दे रही हैं। उन्होंने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की माँग की है।

दूसरी तरफ, हैदराबाद में भी विभिन्न इस्लामी संगठनों के प्रमुख उलेमाओं ने चारमीनार जोन के डीसीपी किरण खरे प्रभाकर से मुलाकात कर नाजिया के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। इस शिकायत में आरोप लगाया गया कि नाजिया ने हिंदुओं से सरकारी और निजी नौकरियों में मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार करने की अपील की थी। प्रतिनिधिमंडल ने इस बयान को सांप्रदायिक सौहार्द के लिए एक सीधा खतरा बताया।

उत्तर प्रदेश के कई शहरों में भारी विरोध प्रदर्शन

उत्तर प्रदेश में भी इस बयान को लेकर अचानक गुस्सा भड़क उठा है। बलरामपुर के उतरौला कोतवाली में समाजसेवी फिरोज खान और डॉ सलमान जमशेद की तहरीर पर नाजिया के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। वहीं बागपत के बड़ौत कोतवाली में एडवोकेट आकिब चौधरी के नेतृत्व में मुस्लिम समाज ने देर रात थाने का घेराव किया। पुलिस ने बड़ौत में निष्पक्ष जाँच का भरोसा देते हुए लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

इसके अलावा बरेली में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रदेश महासचिव नदीम कुरैशी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल कोतवाली पहुँचा और तहरीर सौंपी। रामपुर के मिलक में भी भैंसोड़ी शरीफ के सैकड़ों लोग रात के समय सीओ रजवीर सिंह परिहार के दफ्तर पहुँचे और शिकायती पत्र देकर सख्त कार्रवाई की माँग की। शामली के थानाभवन में भी युवा जन सेवा समिति के अध्यक्ष डॉ आसिफ की अगुवाई में थाना प्रभारी को ज्ञापन दिया गया।

अलीगंज में ज्ञापन और मध्य प्रदेश-कश्मीर तक फैली आग

उत्तर प्रदेश के अलीगंज और आंवला के लीलौर बुजुर्ग में सैकड़ों लोगों ने इकट्ठा होकर SDM विदुषी सिंह से मुलाकात की और नाजिया के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई की माँग उठाई। इस प्रदर्शन में भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता भी शामिल हुए, जिन्होंने कहा कि सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाली ऐसी हरकतें बर्दाश्त नहीं की जा सकतीं। इटावा में भी AIMIM के जिलाध्यक्ष शमशाद हुसैन वारसी ने डीएम और एसएसपी को ज्ञापन सौंपा।

मध्य प्रदेश के जबलपुर में भी गोहलपुर थाने का मुस्लिम समाज और युवाओं ने भारी घेराव किया और तुरंत FIR की माँग की। वहीं जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में BJP के को-मीडिया प्रभारी साजिद यूसुफ शाह ने नाजिया के बयान की कड़ी निंदा की और कहा कि BJP अल्पसंख्यक मोर्चा से उनका कोई संबंध नहीं है। जम्मू-कश्मीर बीजेपी ने घोषणा की है कि वे इस बयान के खिलाफ श्रीनगर पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराएँगे।

क्या यह देश का माहौल खराब करने की कोई बड़ी साजिश है?

इस पूरे मामले के घटनाक्रम को अगर ध्यान से देखा जाए, तो इसमें एक गहरी और सोची-समझी साज़िश की बू आती है। नाजिया इलाही खान का बयान कुछ दिन पुराना है, लेकिन कई दिनों तक शांत रहने के बाद अचानक एक ही दिन, एक साथ देश के कई राज्यों के शहरों में मुस्लिम समाज का सड़कों पर उतर आना सामान्य बात नहीं है। उत्तर प्रदेश के रामपुर, बरेली, मेरठ से लेकर महाराष्ट्र के मालेगाँव और मध्य प्रदेश के जबलपुर तक जिस तरह अचानक इस्लामी भीड़ जुटी, वह साफ इशारा करता है कि इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है जो बैकस्टेज से इस पूरी भीड़ को कोऑर्डिनेट कर रहा है।

सबसे बड़ा सवाल इसकी टाइमिंग को लेकर है। आमतौर पर देखा गया है कि देश में इस तरह के धार्मिक मुद्दों पर शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद अचानक भारी हिंसा भड़क उठती है। ऐसे में जुमे से ठीक एक दिन पहले पूरे देश में एक सोची-समझी रणनीति के तहत ‘डॉग व्हिसलिंग’ की गई। असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं के Video Viral करना सिर्फ एक बहाना था, असली मकसद गुरुवार को सड़कों और थानों पर अपना भारी शक्ति प्रदर्शन दिखाना था, ताकि शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद बड़ी संख्या में इस्लामी कट्टरपंथियों को भड़काकर देश को दंगे की आग में झोंका जा सके। इस्लामी कट्टरपंथी अक्सर ऐसी पुरानी बातों का सहारा लेकर माहौल खराब करने का षड्यंत्र रचते हैं, जिससे देश की सुरक्षा और आपसी भाईचारे को गंभीर खतरा पैदा होता है।