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भारत में 4 करोड़ पीड़ित, दुनियाभर में 17 करोड़… 14 साल की चर्चा के बाद PCOS का नाम बदलकर किया PMOS: जानिए इससे महिलाओं के इलाज में कैसे होगा फायदा

महिलाओं में होने वाली आम हार्मोनल दिक्कतें, जिसे मेडिकल की भाषा में PCOS यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम कहा जाता है, उसका नाम बदल दिया गया है। अब इसे PMOS यानी पोलीइंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम कहा जाएगा। विशेषज्ञों ने ये बदलाव बीमारी को सही तरीके से समझने में मदद करने के लिए किया है।

प्राग में आयोजित यूरोपीय एंडोक्रिनोलॉजी कॉन्ग्रेस में नए नाम की घोषणा के बाद ‘द लैंसेट’ ने 12 मई 2026 को इसे प्रकाशित किया। गौरतलब है कि दुनिया भर में हर 8 में से 1 महिला यानी करीब 170 मिलियन से ज्यादा महिलाएँ PMOS से पीड़ित हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनुमान लगाया है कि प्रजनन आयु वाली 10% से 13% महिलाएँ इस समस्या से गर हैं।

कई क्षेत्रों में यह समस्या ज्यादा है। उदाहरण के लिए, उत्तरी यूरोप में यह समस्या दक्षिण एशिया की तुलना में कम है। हालाँकि डब्ल्यूएचओ यह भी बताता है कि इस विकार से पीड़ित 70% से अधिक महिलाएँ इसके बारे में जानती भी नहीं।

एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के एमआरसी (मेडिकल रिसर्च काउंसिल) सेंटर फॉर रिप्रोडक्टिव हेल्थ के प्रोफेसर कॉलिन डंकन के हवाले से ‘द गार्जियन’ ने कहा है कि यह पुराना शब्द संभवतः तब प्रचलित हुआ, जब शोधकर्ताओं ने शुरू में महिला मरीजों के ओवरी की जाँच की और उनमें तरल पदार्थ से भरी कई छोटी-छोटी ग्रंथियाँ पाई गई। ये थैलियाँ फॉलिकल्स हैं, जो अंडाणु धारण करने वाली संरचनाएँ हैं। उन्होंने आगे कहा कि ये सिस्ट नहीं हैं।

स्वस्थ महिलाओं में हर महीने ओवरी के अंदर कई फॉलिकल्स विकसित होते हैं। अंततः, इनमें से एक मेच्योर होकर अंडाणु उत्पन्न करता है जबकि अन्य नष्ट हो जाते हैं। अगर महिला बीमार हो, तो कुछ फॉलिकल्स का विकास रुक जाता है और वे अंडाणु में नहीं बदल पाता। इसके लक्षण आमतौर पर टीनएज के शुरुआत में दिखने लगते हैं, लेकिन यह एक ऐसी समस्या है जो महिलाओं को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित कर सकती है।

क्यों बदला गया नाम

PCOS के नाम से ऐसा लगता था कि ये सिर्फ ओवरी के सिस्ट से जुड़ी बीमारी है, लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता। ये बीमारी सिर्फ पीरियड्स या ओवरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर पर असर डाल सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बीमारी को बेहतर तरीके से समझाने के लिए नया नाम PMOS दिया गया है। यह महिलाओं में होने वाले हॉर्मोनल और मेटाबॉलिक दिक्कतों को बताता है। इसमें वे सारी समस्याएँ मसलन पीरियड्स अनियमित होना, फर्टिलिटी, वजन असंतुलित होना, त्वचा संबंधी बीमारी और मेंटल हेल्थ भी आ सकते हैं।

शुरुआत में इसे केवल प्रजनन संबंधी बीमारी माना जाता था और उस समय इसे स्टीन लेवेंथल सिंड्रोम के नाम से जाना जाता था। 1980 के दशक में वैज्ञानिकों ने पाया कि यह इंसुलिन प्रतिरोध या रक्त में सामान्य इंसुलिन स्तर पर शरीर की प्रतिक्रिया करने में असमर्थता से भी जुड़ा हुआ है।

पीएमओएस के लक्षण

पीएमओएस की समस्या आने पर महिलाओं में पीरियड की साइकिल बिगड़ सकते हैं। चेहरे पर ज्यादा बाल या मुँहासे आ सकते हैं। वजन बढ़ना, प्रेग्नेंसी में दिक्कत, एंजायटी और डिप्रेशन जैसे लक्षण पाए जाते हैं। कई बार मरीज दिल की बीमारी, हाई कॉलेस्ट्रॉल, फैटी लीवर, स्लीपिंग दिक्कतें और डायबटीज, ब्लड प्रेशर का शिकार हो जाता है।

यह व्यक्ति के मनोविज्ञान को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाता है, जिससे डिप्रेशन, चिंता, जीवन की गुणवत्ता में कमी और खाने संबंधी दिक्कतें आती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी महिलाओं में ये ‘पुरुष वाले हार्मोन’ मौजूद होते हैं, लेकिन पीएमओएस से पीड़ित महिलाओं में इनकी मात्रा अत्यधिक होती है। फॉलिकल-स्टिम्युलेटिंग हार्मोन और ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन के बीच असंतुलन से स्थिति बिगड़ती है। इसके अलावा दूसरी वजहों से भी हॉर्मोनल दिक्कतें आती हैं।

(साभार- pmc.ncbi.nlm.nih.gov)

मोटापा इस बीमारी की एक वजह है। इसके कारण अतिरिक्त एंड्रोजन को अवशोषित करने वाले प्रोटीन का स्तर कम हो जाता है साथ ही यह इंसुलिन प्रतिरोध से भी जुड़ा हुआ है। पीएमओएस एक जेनेटिक बीमारी है, जो परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। एक्सपर्ट डंकन के मुताबिक, “इसका अर्थ है कि पॉलीसिस्टिक अंडाशय के बिना भी पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम हो सकता है, या अनियमित मासिक धर्म के बिना भी पॉलीसिस्टिक अंडाशय सिंड्रोम हो सकता है।” वर्तमान में रोटरडैम सिस्टम का उपयोग इसके इलाज के लिए किया जाता है।

नाम में बदलाव और महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए इसका महत्व

पिछले 14 वर्षों से 56 रिसर्चर और संस्थानों ने पीसीओएस का नाम बदलने की वकालत की। एक सर्वेक्षण के दौरान 14360 जवाब मिले।

कुल मिलाकर 22000 लोगों को शामिल करते हुए एक व्यापक अभियान के बाद ऐतिहासिक निर्णय लिया गया और नाम बदलकर पीएमओएस किया गया। इसका शॉर्ट नाम है – पॉलीएंडोक्राइन यानी कई हार्मोन सिस्टम वाला। मेटाबोलिक: मेटाबॉलिज्म से जुड़ा इंसुलिन, ब्लड शुगर कंट्रोल, ब्लड प्रेशर जैसी समस्या है। ओवेरियन यानी ओवरी और सिंड्रोम यानी लक्षणों का एक साथ होना।

इसको देखते हुए विशेषज्ञों ने पीसीओएस का नाम बदला, क्योंकि इसमें सिर्फ पीरियड्स से जुड़ी समस्याएँ आती हैं। नया नाम यह बताता है कि यह सिर्फ ओवरी की ही नहीं, बल्कि पूरे शरीर में इससे दिक्कत आ सकती है। जानकारों के मुताबिक, नाम बदलने से बीमारी के प्रति जागरुकता बढ़ेगी और महिलाओं को सही इलाज मिल पाएगा।

भारत के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में पीएमओएस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, खासकर शहरी युवा महिलाओं और टीनएजर में। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (PCMR) की पीसीओएस जाँच में पाया गया है कि इससे पीड़ित महिलाओं की संख्या 3.7% से लेकर 22% तक हो सकती हैं। जानकारों के मुताबिक, दिनचर्या में गड़बड़ी, शहरी जीवनशैली, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन, बढ़ता मोटापा, नींद नहीं आना और तनाव महिलाओं में तेजी से बढ़ा है।

ऐसी महिलाओं में कम उम्र में ही मेटाबॉलिज्म संबंधी समस्याओं का खतरा होता है। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, पीएमओएस से पीड़ित लगभग एक तिहाई भारतीय महिलाओं में मेटाबोलिक सिंड्रोम पाया जाता है।

नाम बदलने से महिलाओं को होगा फायदा

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, इस स्थिति से जुड़े लक्षणों को कई जगहों पर सामाजिक रूप से हीन भावना से देखा जाता है। इससे परिवारिक और सामाजिक संबंध, नौकरी के अवसर में कमी, अपनेपन की भावना, मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचता है। डिप्रेशन, चिंता, नकारात्मक भावनाएँ इनलोगों में अधिक होती है।

महिलाओं में अपने शरीर के प्रति जागरूकता की कमी देखी गई है। महिलाएँ अपनी स्थिति को बाहरी दुनिया के सामने व्यक्त करने में असमर्थ होती हैं, तो वे खुद को अलग-थलग और एकांत में रहना पसंद करती हैं। इसे मासिक धर्म और प्रेग्नेंसी से जुड़े होने के कारण इस विषय पर खुल कर बात नहीं करतीं।

पीसीओएस का नाम बदलकर पीएमओएस करना सिर्फ शब्दावली में बदलाव नहीं है। यह बताता है कि लोगों में मेडिकल साइंस को लेकर समझ बढ़ रही है। हालाँकि अभी और भी जागरुकता की जरूरत है। अगर महिलाएँ अपनी समस्या नहीं बताएँगी, तो उसका इलाज कैसे होगा।

(मूलरूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

इटली और भारत: इंडो-मेडिटेरेनियन के लिए एक स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप

भारत और इटली के बीच संबंध अब एक निर्णायक दौर में पहुँच चुके हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के रिश्तों में अभूतपूर्व तेजी आई है और यह सौहार्दपूर्ण मित्रता से आगे बढ़कर स्वतंत्रता, लोकतंत्र और भविष्य को लेकर साझा विजन पर आधारित एक सच्ची स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप में बदल गए हैं।

ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था गहरे बदलाव के दौर से गुजर रही है, इटली और भारत की साझेदारी उच्च राजनीतिक और संस्थागत स्तर पर नियमित संवाद से आगे बढ़ रही है और अब एक नए तथा व्यापक आयाम हासिल कर रही है, जो हमारी आर्थिक गतिशीलता, सामाजिक रचनात्मकता और हजारों साल पुरानी सभ्यतागत समझ को साथ जोड़ती है। हमारा सहयोग इस साझा समझ को दर्शाता है कि 21वीं सदी में समृद्धि और सुरक्षा इस बात से तय होगी कि देश इनोवेशन, एनर्जी ट्रांजिशन के प्रबंधन और स्ट्रैटेजिक संप्रभुता को मजबूत करने में कितने सक्षम हैं। इसी उद्देश्य से हमने अपने द्विपक्षीय संबंधों को और गहरा तथा डाइवर्स बनाने का संकल्प लिया है, ताकि नए लक्ष्यों को हासिल किया जा सके और एक-दूसरे की पूरक क्षमताओं का बेहतर उपयोग हो सके। हमारा लक्ष्य इटली की डिजाइन क्षमता, मैन्युफैक्चरिंग एक्सीलेंस और वर्ल्ड-क्लास सुपरकंप्यूटर्स, जो उसे एक इंडस्ट्रियल पावरहाउस बनाते हैं, को भारत की तेज आर्थिक ग्रोथ, इंजीनियरिंग टैलेंट, बड़े पैमाने की क्षमता, इनोवेशन और 100 से ज्यादा यूनिकॉर्न तथा 2 लाख स्टार्ट-अप वाले एंटरप्रेन्योरशिप इकोसिस्टम के साथ जोड़कर मजबूत तालमेल बनाना है। यह केवल साधारण इंटीग्रेशन नहीं, बल्कि ऐसा साझा वैल्यू क्रिएशन है जिसमें दोनों देशों की औद्योगिक ताकतें एक-दूसरे को और मजबूत बनाती हैं।

यूरोपियन यूनियन और भारत के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट दोनों दिशाओं में ट्रेड और इनवेस्टमेंट बढ़ाने का रास्ता खोलता है। हमारा लक्ष्य 2029 तक इटली और भारत के बीच 20 बिलियन यूरो के ट्रेड टारगेट को हासिल करना और उससे आगे निकलना है। इसके लिए डिफेंस और एयरोस्पेस, क्लीन टेक्नोलॉजी, मशीनरी, ऑटोमोटिव कंपोनेंट्स, केमिकल्स, फार्मास्युटिकल्स, टेक्सटाइल, एग्री-फूड, टूरिज्म समेत कई सेक्टर्स पर फोकस किया जाएगा।

‘मेड इन इटली’ हमेशा से पूरी वर्ल्ड में एक्सीलेंस का प्रतीक रहा है और आज इसकी स्वाभाविक साझेदारी ‘मेक इन इंडिया’ पहल के हाई-क्वालिटी लक्ष्यों के साथ बन रही है। इस संदर्भ में भारत के लिए प्रोडक्शन को लेकर इटली की कंपनियों की बढ़ती रुचि और इटली में भारतीय इंडस्ट्री की बढ़ती मौजूदगी, जिनकी संख्या अब दोनों तरफ से 1000 से ज्यादा हो चुकी है, एक सकारात्मक संकेत है जो हमारी सप्लाई चेन के इंटीग्रेशन को और मजबूत करेगा।

टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन हमारी साझेदारी के केंद्र में है। आने वाले दशकों को ऐसी टेक्नोलॉजिकल क्रांति आकार देगी जिसका दायरा बेहद व्यापक होगा। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, क्रिटिकल मिनरल्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर्स में तेज प्रगति शामिल है। भारत का डायनामिक इनोवेशन इकोसिस्टम, हाई स्किल्ड प्रोफेशनल टैलेंट पूल और इटली की एडवांस्ड इंडस्ट्रियल क्षमताएं इन सेक्टर्स में हमारे सहयोग को स्वाभाविक और रणनीतिक बनाती हैं। हमारी यूनिवर्सिटीज और रिसर्च सेंटर्स के बीच बढ़ती साझेदारी भी इसे मजबूत आधार देगी।

भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पहले ही बड़ी संख्या में देशों, खासकर ग्लोबल साउथ में, अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। खासतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब हमारे समाज और ग्लोबल अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाल रही है। इटली और भारत लंबे समय से यह सुनिश्चित करने के लिए साथ काम कर रहे हैं कि AI डेवलपमेंट जिम्मेदारीपूर्ण और मानव-केंद्रित हो। इसी नजरिये से भारत और इटली AI को समावेशी विकास के एक मजबूत माध्यम के रूप में भी देखते हैं, खासकर ग्लोबल साउथ के लिए, जहां डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और सुलभ बहुभाषी टेक्नोलॉजी विभाजन बढ़ाने के बजाय उसे कम कर सकती हैं। टेक्नोलॉजी के केंद्र में इंसान को रखने वाले भारत के MANAV विजन और मानवीय परंपरा पर आधारित मानव-केंद्रित “एल्गोर-एथिक्स” को बढ़ावा देने में इटली की अग्रणी भूमिका के आधार पर हमारी साझेदारी यह सुनिश्चित करना चाहती है कि AI सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम बने। हमारा दृष्टिकोण भारत की डिजिटल क्षमता को इटली की एथिकल और इंडस्ट्रियल विशेषज्ञता के साथ जोड़ता है, ताकि टेक्नोलॉजी मानव गरिमा की सेवा करे। सुरक्षित डिजिटल सहयोग, कैपेसिटी बिल्डिंग और मजबूत साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी बेस्ट प्रैक्टिसेज को साझा करते हुए हमारा लक्ष्य ऐसा स्वतंत्र, भरोसेमंद और समान अवसर वाला डिजिटल स्पेस तैयार करना है, जिसमें हर देश AI को आकार देने और उससे लाभ उठाने में सक्षम हो। यही दृष्टिकोण इटली की G7 प्रेसीडेंसी और नई दिल्ली में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट 2026 के निष्कर्षों के केंद्र में है। AI को इंसानों द्वारा इंसानों के लिए बनाए गए एक माध्यम के रूप में देखने का मतलब यह स्पष्ट करना है कि टेक्नोलॉजी न तो लोगों की जगह ले सकती है, न उनके मौलिक अधिकारों को कमजोर कर सकती है और न ही इसका इस्तेमाल जनमत को प्रभावित करने या लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बदलने के लिए होना चाहिए। तेजी से जुड़ती दुनिया में स्वतंत्रता और मानव गरिमा की रक्षा को लेकर हमारा दृष्टिकोण इसी चुनौती पर आधारित है।

हमारा सहयोग स्पेस सेक्टर तक भी फैला हुआ है। स्पेस एक्सप्लोरेशन और सैटेलाइट टेक्नोलॉजी में भारत की प्रभावशाली प्रगति, साथ ही एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में इटली की उत्कृष्ट क्षमता, संयुक्त पहलों और अगली पीढ़ी की टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट के लिए बड़े अवसर प्रदान करती है।

सिक्योरिटी और स्टेबिलिटी देशों की समृद्धि सुनिश्चित करने के लिए बेहद जरूरी बनी हुई हैं। इटली और भारत डिफेंस, सिक्योरिटी और स्ट्रैटेजिक टेक्नोलॉजी जैसे सेक्टर्स में अपने सहयोग को और मजबूत करना चाहते हैं। हमारा सहयोग महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक नेटवर्क, ड्रग तस्करी, साइबर क्राइम और मानव तस्करी जैसे खतरों के खिलाफ मजबूती बढ़ाने में मदद करेगा।

एनर्जी हमारी साझेदारी का एक और प्रमुख स्तंभ है। डाइवर्सिफाइड एनर्जी सोर्सेज की ओर बढ़ रहे ग्लोबल ट्रांजिशन के लिए इनोवेशन, इनवेस्टमेंट और सहयोग की जरूरत है। भारत और इटली रिन्यूएबल एनर्जी से लेकर हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी तक, और स्मार्ट ग्रिड से लेकर मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर तक कई क्षेत्रों में साथ काम कर रहे हैं। ग्रीन हाइड्रोजन एक्सपोर्ट हब बनने की भारत की पहल जहां अपार संभावनाएं प्रदान करती है, वहीं यह रिन्यूएबल इंफ्रास्ट्रक्चर में इटली की एडवांस्ड टेक्नोलॉजी और यूरोप के लिए एनर्जी गेटवे के रूप में उसकी रणनीतिक भूमिका के साथ पूरी तरह मेल खाती है। इस संदर्भ में भारत की अगुवाई वाली प्रमुख पहलों, इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA), कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) और ग्लोबल बायोफ्यूल्स अलायंस (GBA) में अन्य देशों के साथ हमारा सहयोग भी महत्वपूर्ण है।

फिजिकल, डिजिटल और मानवीय कनेक्टिविटी वह कड़ी है जो हमें एक साथ जोड़ती है। भारत और इटली दोनों ग्लोबल अर्थव्यवस्था के दो अहम केंद्रों, इंडो-पैसिफिक और मेडिटेरेनियन, के मध्य स्थित हैं। इन क्षेत्रों को अलग-अलग दायरों के रूप में नहीं, बल्कि तेजी से एक-दूसरे से जुड़ते हुए क्षेत्रों के रूप में देखा जाना चाहिए।

दरअसल, हम उस उभरते हुए ‘इंडो-मेडिटेरेनियन’ को देख रहे हैं, जो ट्रेड, टेक्नोलॉजी, एनर्जी, डेटा और विचारों का एक महत्वपूर्ण कॉरिडोर बनता जा रहा है, जो हिंद महासागर को यूरोप से जोड़ता है। इसी आपस में जुड़े हुए क्षेत्र में हमारे संबंध स्वाभाविक रूप से एक विशेष स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप में विकसित हो रहे हैं, जो दो महाद्वीपों को जोड़ते हुए नई ग्लोबल डायनामिक्स को आकार दे रही है।

इसी संदर्भ में इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर हमारे क्षेत्रों को मॉडर्न ट्रांसपोर्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल नेटवर्क, एनर्जी सिस्टम और मजबूत सप्लाई चेन के जरिए जोड़ने की एक दूरदर्शी पहल है। भारत और इटली इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए अन्य साझेदार देशों के साथ मिलकर काम करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।

हम अपनी साझा चुनौतियों का समाधान दोनों देशों के बीच गहरी साझेदारी और दीर्घकालिक सांस्कृतिक संबंधों के आधार पर कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति में ‘धर्म’ की अवधारणा उस जिम्मेदारी की भावना को दर्शाती है, जो हमारे कार्यों का आधार बननी चाहिए, जबकि ‘वसुधैव कुटुम्बकम’, यानी ‘पूरी दुनिया एक परिवार है’ का सिद्धांत आज के आपस में जुड़े डिजिटल युग में गहराई से प्रतिध्वनित होता है। ऐसे मूल्य इटली की पुनर्जागरण काल से जुड़ी मानवतावादी परंपरा में भी स्वाभाविक रूप से दिखाई देते हैं, जो हर व्यक्ति की गरिमा और समाजों तथा लोगों को जोड़ने में संस्कृति की शक्ति को महत्व देती है।

इसलिए हमारा साझा विजन लोगों को केंद्र में रखकर मजबूत और भविष्योन्मुखी भारत-इटली साझेदारी की नींव रखना है।

(यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ मिलकर लिखा है)

खपत का 66% खाद्य तेल आयात करता है भारत, तिजोरी पर ₹1.61 लाख करोड़ का बोझ: समझें कैसे ये सेहत के साथ देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है भारी

जब भी भारत के तेल आयात की बात होती है, तो सबसे पहले कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल पर चर्चा होती है। लेकिन एक और ऐसी चीज है जो हर दिन चुपचाप लगभग हर भारतीय घर तक पहुँचती है वह है खाद्य तेल यानी एडिबल ऑयल

सड़क किनारे मिलने वाले खाने से लेकर बड़े रेस्तराँ तक, पैकेज्ड फूड से लेकर घर की रसोई तक, खाद्य तेल आज भारतीय जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन चुका है। लेकिन आज इस विषय पर चर्चा क्यों हो रही है? इसका जवाब पिछले तीन वर्षों की उन घटनाओं में छिपा है जिन्होंने भारत के खाद्य तेल क्षेत्र की असली कमजोरी को उजागर कर दिया।

फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर बड़ा हमला शुरू किया। कुछ ही हफ्तों में दोनों देशों से आने वाला सनफ्लावर ऑयल लगभग पूरी तरह रुक गया और इसकी कीमतें तेजी से बढ़ गईं। इसके ठीक दो महीने बाद अप्रैल 2022 में इंडोनेशिया, जो दुनिया के सबसे बड़े पाम ऑयल (ताड़ का तेल) निर्यातकों में से एक है, ने अपने घरेलू भंडार को सुरक्षित रखने के लिए पाम ऑयल के निर्यात पर रोक लगा दी।

भारत इंडोनेशिया से बड़ी मात्रा में पाम ऑयल आयात करता है, इसलिए इस फैसले का असर सीधे भारतीय बाजार पर पड़ा और कीमतें बढ़ गईं। अब हाल के समय में मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर पैदा हुई चिंताओं ने भी नई परेशानी खड़ी कर दी है।

दुनिया के समुद्री रास्ते से होने वाले लगभग एक-तिहाई कच्चे तेल का व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में शिपिंग और माल ढुलाई लागत बढ़ने का खतरा बना हुआ है। इन सभी घटनाओं ने यह साफ कर दिया कि भारत की रसोई वैश्विक युद्धों, निर्यात प्रतिबंधों, सप्लाई चेन संकट और भू-राजनीतिक तनावों के प्रति बेहद संवेदनशील हो चुकी है।

आज भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का लगभग 60% हिस्सा आयात करता है। अमेरिका, चीन और ब्राजील जैसे देशों के बाद भारत दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य तेल अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। अनुमान है कि 2024-25 में खाद्य तेल आयात पर भारत को लगभग 18.3 अरब डॉलर यानी करीब 1.61 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़े।

पाम ऑयल, जिसका इस्तेमाल प्रोसेस्ड फूड, स्नैक्स और बेकरी उत्पादों में बड़े पैमाने पर होता है, मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है। सोयाबीन ऑयल अर्जेंटीना और ब्राजील से आयात होता है, जबकि सनफ्लावर ऑयल रूस और यूक्रेन से आता है। इसी दौरान भारत में खाद्य तेल की खपत पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ी है।

अब बढ़ती तेल खपत केवल आयात तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका संबंध मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग और फैटी लिवर जैसी बीमारियों से भी जुड़ चुका है। इस लेख में हम समझेंगे कि कैसे रसोई में इस्तेमाल होने वाला एक सामान्य खाद्य पदार्थ अब स्वास्थ्य, विदेशी निर्भरता और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।

भारत की कुल खपत बनाम उत्पादन

आज भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल उपभोक्ताओं और आयातकों में शामिल है। भारतीय हर साल लगभग 25-26 मिलियन टन खाद्य तेल का उपभोग करते हैं, जबकि देश में उत्पादन केवल 11-12 मिलियन टन के आसपास होता है। यानी भारत की लगभग 60% जरूरतें विदेशी देशों से पूरी होती हैं।

इसी वजह से भारत ने 2024-25 में करीब 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करने के लिए लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपए खर्च किए। यह कोई नई स्थिति नहीं है। 2023-24 में भी भारत ने लगभग 15.96 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करने पर करीब 1.32 लाख करोड़ रुपए खर्च किए थे। वैश्विक कीमतें बढ़ने के कारण आयात लागत में करीब 22% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

बढ़ती माँग बनाम धीमा घरेलू उत्पादन, आत्मनिर्भरता में सुधार 

बढ़ती आबादी, तेजी से हो रहा शहरीकरण, फास्ट फूड का बढ़ता चलन और रेस्तराँ संस्कृति के विस्तार के कारण खाद्य तेल की खपत लगातार बढ़ी है। लेकिन घरेलू उत्पादन इस बढ़ती माँग के साथ कदम नहीं मिला पाया। हालाँकि पिछले एक दशक में भारत की खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भरता में कुछ सुधार जरूर हुआ है।

सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2015 में जहाँ आत्मनिर्भरता करीब 36.8% थी, वहीं 2024 तक यह लगभग 44% तक पहुँच गई। इसके पीछे घरेलू तिलहन उत्पादन में बढ़ोतरी और सरकारी नीतियों का योगदान रहा। फिर भी तेजी से बढ़ती माँग के मुकाबले घरेलू उत्पादन अभी भी काफी पीछे है।

भारत आयातित खाद्य तेल पर निर्भर क्यों है?

भारत कृषि प्रधान देश होने के बावजूद खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। इसकी सबसे बड़ी वजह पारंपरिक फसलों पर ज्यादा निर्भरता है। भारत में किसान गेहूँ और धान जैसी फसलें उगाना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं क्योंकि उन्हें MSP, सरकारी खरीद, सिंचाई और सब्सिडी जैसी सुविधाएँ मिलती हैं।

इसके विपरीत, तिलहन फसलें जैसे सोयाबीन, सूरजमुखी, सरसों और मूंगफली अधिक जोखिम भरी मानी जाती हैं। इनकी कीमतें अस्थिर रहती हैं, कीटों का खतरा ज्यादा होता है और बारिश पर निर्भरता भी अधिक रहती है। तिलहन किसानों को गेहूँ और धान किसानों जैसी मजबूत सरकारी सुरक्षा नहीं मिलती।

एक और बड़ी समस्या कम उत्पादकता है। भारत में कई जगहों पर तिलहन फसलें कमजोर मिट्टी और सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में उगाई जाती हैं, जिससे उत्पादन कम रहता है। दूसरी तरफ इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों ने समय के साथ बेहद प्रभावी पाम ऑयल उद्योग विकसित कर लिया।

बढ़ती खपत और बदलती जीवनशैली

भारत में तली हुई चीजों, पैकेज्ड स्नैक्स, बेकरी उत्पादों, रेस्तराँ और फास्ट फूड की खपत तेजी से बढ़ी है। जैसे-जैसे शहर बढ़े और फूड डिलीवरी ऐप्स आम हुए, वैसे-वैसे खाद्य तेल की खपत भी बढ़ती गई। अगर आँकड़ों की बात करें, तो 2001 में एक भारतीय औसतन सालभर में 8.2 किलो खाद्य तेल का सेवन करता था।

2023-24 तक यह बढ़कर 23.5 किलो प्रति व्यक्ति हो गया। यानी कुछ ही वर्षों में प्रति व्यक्ति खपत लगभग 15 किलो बढ़ गई। भारत की खाद्य तेल खपत और घरेलू उत्पादन के बीच बढ़ता अंतर अब इसे केवल रसोई का सामान नहीं बल्कि एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक मुद्दा बना चुका है।

कौन-कौन से तेल आयात करता है भारत?

भारत अलग-अलग प्रकार के खाद्य तेल अलग-अलग देशों से आयात करता है। पाम ऑयल भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला खाद्य तेल है, जो मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है। इसकी कम कीमत और लंबी शेल्फ लाइफ के कारण इसका इस्तेमाल प्रोसेस्ड फूड, चिप्स, बिस्किट और बेकरी उत्पादों में बड़े पैमाने पर होता है।

भारत बड़ी मात्रा में सोयाबीन ऑयल अर्जेंटीना और ब्राजील से आयात करता है, जबकि सनफ्लावर ऑयल रूस और यूक्रेन से आता है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया कि वैश्विक संकट भारत की खाद्य तेल सप्लाई को कितना प्रभावित कर सकते हैं। हालाँकि भारत सरसों और मूंगफली जैसे तेलों का उत्पादन खुद करता है, लेकिन घरेलू उत्पादन तेजी से बढ़ती माँग को पूरा नहीं कर पा रहा। परिणामस्वरूप, भारत आयातित खाद्य तेलों पर अत्यधिक निर्भर है। 

1998 का सरसों तेल कांड

भारत के खाद्य तेल इतिहास में 1998 का सरसों तेल कांड एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। उस समय उत्तर भारत में सरसों का तेल व्यापक रूप से इस्तेमाल होता था। बाद में पता चला कि इसमें जहरीला आर्गेमोन ऑयल मिलाया जा रहा था, जिससे ‘एपिडेमिक ड्रॉप्सी’ नाम की गंभीर बीमारी फैल गई।

इस बीमारी से लोगों के शरीर में सूजन, साँस लेने में दिक्कत और दिल संबंधी समस्याएँ होने लगीं। इस घटना में 60 से अधिक लोगों की मौत हो गई और करीब 3000 लोग बीमार पड़े।

इस घटना के बाद लोगों का खुला सरसों तेल पर भरोसा टूट गया। सरकार ने सख्त खाद्य सुरक्षा नियम लागू किए और धीरे-धीरे ब्रांडेड रिफाइंड ऑयल और सस्ते आयातित पाम ऑयल का इस्तेमाल बढ़ने लगा। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस घटना ने भारत में आयातित और रिफाइंड तेलों की ओर झुकाव को तेज कर दिया।

वनस्पति की कहानी

रिफाइंड ऑयल के आम होने से पहले वनस्पति भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली कुकिंग फैट्स में से एक था। इसे देसी घी के सस्ते विकल्प के रूप में लाया गया था। मिठाइयों, बेकरी, रेस्तराँ और स्ट्रीट फूड में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता था। ‘डालडा’ इसका सबसे प्रसिद्ध ब्रांड बन गया था।

लेकिन बाद में पता चला कि वनस्पति में ट्रांस फैट की मात्रा काफी ज्यादा होती है, जो हृदय रोग और मोटापे से जुड़ी है। समय के साथ सस्ता आयातित पाम ऑयल वनस्पति की जगह लेने लगा क्योंकि यह बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए ज्यादा सस्ता और सुविधाजनक था। इससे भारत की आयातित तेलों पर निर्भरता और बढ़ गई।

सस्ते पाम ऑयल की अर्थव्यवस्था

आज भारत के खाद्य तेल बाजार में पाम ऑयल का सबसे बड़ा हिस्सा है और यह कुल खाद्य तेल खपत का 37% से ज्यादा हिस्सा बनाता है। कई दशकों तक पाम ऑयल दुनिया के सबसे सस्ते खाद्य तेलों में शामिल रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह ऑयल पाम पेड़ों की बहुत ज्यादा उत्पादन क्षमता है।

एक हेक्टेयर जमीन से करीब 3.3 टन पाम ऑयल निकलता है, जबकि सोयाबीन से केवल 0.4 टन और सूरजमुखी से लगभग 0.7 टन तेल मिलता है। हालाँकि 2024 तक स्थिति कुछ बदली और पाम ऑयल की कीमतें लगभग 10% बढ़ गईं, जबकि सोयाबीन ऑयल की कीमतों में करीब 9% की गिरावट आई।

इसके बावजूद पाम ऑयल आज भी कम लागत, लंबी शेल्फ लाइफ और ज्यादा तापमान सहने की क्षमता के कारण खाद्य उद्योग की पहली पसंद बना हुआ है। बिस्किट, चिप्स, इंस्टेंट फूड, फ्रोजन फूड और बेकरी उत्पादों में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है क्योंकि इससे उत्पादन लागत कम रहती है।

यही वजह है कि सस्ता होने के कारण पाम ऑयल धीरे-धीरे भारत के प्रोसेस्ड फूड और कमर्शियल कुकिंग सेक्टर का अहम हिस्सा बन गया।

पाम ऑयल से जुड़ी स्वास्थ्य चिंताएँ

भारत अपना ज्यादातर पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात करता है। दुनिया की लगभग 85% पाम ऑयल सप्लाई इन्हीं दो देशों से आती है, इसलिए पाम ऑयल भारत के सबसे बड़े आयातित खाद्य उत्पादों में शामिल हो गया है।

समय के साथ सस्ता आयातित पाम ऑयल बड़े पैमाने पर पारंपरिक तेलों की जगह लेने लगा क्योंकि इसे खरीदना आसान था और यह खाद्य उद्योग के लिए ज्यादा सस्ता पड़ता था। भारत में बिकने वाले कई रिफाइंड और ब्लेंडेड ऑयल में भी पाम ऑयल मिला होता है, लेकिन अक्सर लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती।

हालाँकि ज्यादा मात्रा में पाम ऑयल का सेवन स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बन गया है। इसमें लगभग 50% सैचुरेटेड फैट होता है। WHO और कई शोधों के अनुसार, इससे खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) बढ़ सकता है और हृदय रोग का खतरा भी बढ़ता है।

इसके बावजूद बिस्किट बनाने वाली कंपनियाँ, रेस्तराँ, होटल और फूड इंडस्ट्री आज भी बड़े पैमाने पर पाम ऑयल का इस्तेमाल कर रहे हैं क्योंकि यह आसानी से उपलब्ध और अपेाकृत सस्ता होता है। इससे भारत की आयातित खाद्य तेलों पर निर्भरता लगातार बढ़ती जा रही है।

बढ़ती तेल खपत के पीछे का स्वास्थ्य संकट

बढ़ती खाद्य तेल खपत अब केवल आर्थिक समस्या नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे यह एक बड़ा स्वास्थ्य संकट भी बनती जा रही है। पिछले दो दशकों में भारत में खाद्य तेल का सेवन तेजी से बढ़ा है। बदलती खानपान की आदतों और आधुनिक जीवनशैली ने लोगों के भोजन में तेल की मात्रा काफी बढ़ा दी है।

आज तली हुई स्ट्रीट फूड, फास्ट फूड, प्रोसेस्ड स्नैक्स और बेकरी उत्पादों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है, जिनमें बड़ी मात्रा में तेल का उपयोग होता है। हाल के वर्षों में फूड डिलीवरी ऐप्स और रेस्तरां संस्कृति ने भी ज्यादा तेल वाले खाने की खपत को और बढ़ा दिया है। हमने तेल की भारी खपत के आर्थिक प्रभावों पर चर्चा की है, लेकिन भारतीयों के स्वास्थ्य का क्या?

ज्यादा मात्रा में तेल का सेवन कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। अगर प्रति व्यक्ति खाद्य तेल खपत की बात करें, तो 1960 के दशक में भारत में एक व्यक्ति सालभर में केवल 3-4 किलो खाद्य तेल का सेवन करता था।

लेकिन 2024-25 तक यह बढ़कर लगभग 25.3 किलो हो गया है और अनुमान है कि 2030-31 तक यह 40 किलो तक पहुँच सकता है। यानी करीब 60 सालों में भारत में तेल की खपत लगभग 7 गुना बढ़ गई है। अगर हाल के आँकड़ों को देखें, तो 2001 में एक व्यक्ति औसतन सालभर में लगभग 8.2 किलो खाद्य तेल इस्तेमाल करता था।

यानी पिछले दो दशकों में यह खपत लगभग तीन गुना हो चुकी है। यह स्थिति इसलिए और चिंता बढ़ाती है क्योंकि ICMR यानी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार, एक व्यक्ति को प्रतिदिन केवल 20-30 ग्राम तेल का सेवन करना चाहिए, जो सालभर में लगभग 12 किलो के बराबर होता है।

लेकिन आज भारतीय लोग इससे लगभग दोगुना तेल खा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, जरूरत से ज्यादा तेल खाने से मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दूसरी लाइफस्टाइल बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ता है।

दोबारा इस्तेमाल होने वाला तेल और छिपे खतरे

NFHS-5 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 24% महिलाएँ और 23% पुरुष मोटापे या अधिक वजन की समस्या से जूझ रहे हैं। भारत उन देशों में शामिल हो चुका है जहाँ मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस के अनुसार, दुनिया में मोटापे से ग्रस्त बच्चों की दूसरी सबसे बड़ी आबादी भारत में है।

अनुमान है कि 2040 तक भारत में लगभग 5.6 करोड़ बच्चे मोटापे का शिकार हो सकते हैं। यह समस्या केवल मोटापे तक सीमित नहीं है, बल्कि डायबिटीज जैसी बीमारियाँ भी तेजी से बढ़ रही हैं। वर्तमान में भारत में लगभग 8.98 करोड़ वयस्क डायबिटीज से पीड़ित हैं और अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या बढ़कर 15.67 करोड़ तक पहुँच सकती है।

अगर आँकड़ों को देखें, तो पिछले तीन दशकों में भारत में डायबिटीज के मामलों में भारी बढ़ोतरी हुई है। 1990 में जहाँ लगभग 3% आबादी डायबिटीज से प्रभावित थी, वहीं 2021 तक यह बढ़कर करीब 6% हो गई। डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, खराब खानपान, ज्यादा तेल वाला भोजन, प्रोसेस्ड फूड और बढ़ता मोटापा इसके मुख्य कारण हैं।

भारत में हृदय रोग और कार्डियोवैस्कुलर बीमारियाँ भी तेजी से बढ़ रही हैं। ये बीमारियाँ दिल और रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करती हैं और इनका सीधा संबंध अस्वस्थ खानपान और अत्यधिक तेल सेवन से माना जाता है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के अनुसार, 2016 तक भारत में होने वाली कुल मौतों में लगभग 28% मौतें हृदय रोगों की वजह से हो रही थीं।

वहीं WHO इंडिया के आँकड़ों के अनुसार, 40 से 69 साल की उम्र के लोगों में होने वाली लगभग 45% मौतों के पीछे कार्डियोवैस्कुलर बीमारियाँ जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ दशकों में भारत में हृदय रोगों से होने वाली मौतों की संख्या लगभग दोगुनी हो चुकी है। 1990 में हर साल करीब 22.6 लाख लोगों की मौत हृदय रोगों से होती थी, जो 2020 तक बढ़कर लगभग 47.7 लाख हो गई।

इसके साथ ही हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है। आज भारत में हर चार में से एक व्यक्ति हाई ब्लड प्रेशर से प्रभावित है। लेकिन बड़ी संख्या में लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं होती या उनका इलाज सही तरीके से नहीं हो पाता।

रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के लगभग 80% घरों में तलने वाला तेल कई बार दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। बार-बार गर्म किया गया तेल ट्रांस फैट, फ्री रेडिकल्स और जहरीले तत्व पैदा करता है, जो शरीर में सूजन बढ़ाने के साथ-साथ हृदय रोग, फैटी लिवर और कुछ प्रकार के कैंसर का खतरा भी बढ़ा सकता है।

कैसे भारतीय रसोई को प्रभावित करती हैं वैश्विक घटनाएँ?

भारत की बड़ी आबादी और भारी आयात निर्भरता के कारण देश वैश्विक घटनाओं से आसानी से प्रभावित हो जाता है। भारत खाद्य तेल के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर है, इसलिए दुनिया में होने वाले युद्ध, निर्यात प्रतिबंध और सप्लाई चेन संकट का सीधा असर भारतीय रसोई तक पहुँचता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। भारत रूस और यूक्रेन से बड़ी मात्रा में सनफ्लावर ऑयल आयात करता है। युद्ध शुरू होने के बाद सप्लाई चेन प्रभावित हुई और भारत में खाद्य तेल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं। इसी तरह भारत पाम ऑयल के लिए इंडोनेशिया और मलेशिया पर काफी निर्भर है।

जब इन देशों ने निर्यात पर प्रतिबंध लगाए, तो भारत में पाम ऑयल की कीमतें तुरंत बढ़ गईं। पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में होने वाले बदलाव का असर सीधे पैकेज्ड फूड, रेस्तराँ और घरों में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेल की कीमतों पर पड़ता है।

मुद्रा विनिमय दर यानी रुपए की कमजोरी भी इस समस्या को और बढ़ाती है। क्योंकि भारत खाद्य तेल डॉलर में खरीदता है, इसलिए जब रुपया कमजोर होता है तो आयात लागत बढ़ जाती है, भले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर क्यों न हों। यानी भारत की बढ़ती आयात निर्भरता ने भारतीय रसोई को वैश्विक युद्धों, शिपिंग संकटों और निर्यात प्रतिबंधों से जोड़ दिया है।

अब दुनिया में हजारों किलोमीटर दूर होने वाले संघर्ष भी भारत में कुकिंग ऑयल की कीमतें बढ़ा सकते हैं। इसी वजह से खाद्य तेल अब केवल रसोई का सामान्य सामान नहीं रह गया, बल्कि यह भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक और रणनीतिक मुद्दा बन चुका है।

सरकार की प्रतिक्रिया और पीएम मोदी की अपील

आयातित खाद्य तेल पर बढ़ती निर्भरता और लाइफस्टाइल बीमारियों के तेजी से बढ़ने के कारण सरकार ने भी इस मुद्दे पर ध्यान देना शुरू किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार लोगों से तेल की खपत कम करने की अपील कर चुके हैं। उन्होंने लोगों से 10% तेल कम इस्तेमाल करने की अपील करते हुए कहा, “इससे देश सेवा भी होगी और देह सेवा भी होगी।”

स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित करते हुए उन्होंने चेतावनी दी थी कि आने वाले वर्षों में मोटापा और लाइफस्टाइल बीमारियाँ भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।

बाद में विश्व स्वास्थ्य दिवस पर भी उन्होंने कहा कि जरूरत से ज्यादा तेल का सेवन कम करना केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का मामला नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक खाद्य तेल सेवन का सीधा संबंध मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और हृदय रोग जैसी बीमारियों से है।

इसलिए तेल की खपत कम करने से एक तरफ लोगों का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है और दूसरी तरफ देश का आयात बिल भी घट सकता है। सरकार ने जागरूकता अभियान चलाने के साथ-साथ नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स–ऑयलसीड्स (NMEO-OS) और नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स–ऑयल पाम (NMEO-OP) जैसी योजनाएँ भी शुरू की हैं।

इन योजनाओं का उद्देश्य देश में तिलहन उत्पादन बढ़ाना, किसानों को बेहतर प्रोत्साहन देना, खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता मजबूत करना और आयात पर निर्भरता कम करना है। अब सरकार खाद्य तेल को केवल खाने-पीने की चीज नहीं मान रही, बल्कि इसे आर्थिक सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता से जुड़ा बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा मानकर काम कर रही है।

आप क्या कर सकते हैं: तेल की खपत कम करने के आसान उपाय

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, तेल की खपत कम करने के लिए लोगों को अपनी आदतों और जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत है। सबसे आसान तरीका यह है कि खाना बनाते समय तेल को बिना नापे इस्तेमाल करने के बजाय उसकी मात्रा तय करके इस्तेमाल किया जाए।

डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि इस्तेमाल किए गए तेल को दोबारा गर्म या बार-बार इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। बार-बार गर्म करने से तेल में ट्रांस फैट, फ्री रेडिकल्स और जहरीले तत्व बनने लगते हैं, जो हार्ट अटैक, डायबिटीज, फैटी लिवर और कुछ प्रकार के कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं।

विशेषज्ञ कम प्रोसेस्ड और कोल्ड-प्रेस्ड तेलों का इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। साथ ही एक ही प्रकार के तेल पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग तेलों का संतुलित इस्तेमाल बेहतर माना जाता है। पैकेज्ड फूड खरीदते समय उसके लेबल पढ़ना भी जरूरी है, क्योंकि कई प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में छिपे हुए फैट और रिफाइंड ऑयल मौजूद होते हैं।

डीप फ्राइड स्नैक्स, फास्ट फूड, बेकरी उत्पाद और ज्यादा प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करने से लंबे समय में स्वास्थ्य जोखिम काफी घट सकते हैं। इसके साथ ही भाप में पकाना, ग्रिल करना, रोस्टिंग और एयर फ्राइंग जैसी हेल्दी कुकिंग तकनीकें तेल की जरूरत कम कर सकती हैं।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि बच्चों को छोटी उम्र से ही हेल्दी खानपान की आदतें सिखाना बहुत जरूरी है, क्योंकि कम उम्र में ही मोटापा और लाइफस्टाइल बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं।
डॉक्टरों के अनुसार, संतुलित भोजन, सीमित मात्रा में तेल का सेवन और घर का बना खाना लंबे समय तक स्वस्थ रहने के सबसे प्रभावी तरीकों में शामिल हैं।

निष्कर्ष

कुकिंग ऑयल भले ही रसोई में इस्तेमाल होने वाली एक सामान्य चीज लगे, लेकिन इसके पीछे विदेशी निर्भरता, बदलती खानपान की आदतें, बढ़ते स्वास्थ्य खतरे और आर्थिक असुरक्षा की बड़ी कहानी छिपी हुई है। आज भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है।

कृषि प्रधान देश होने के बावजूद भारत खाद्य तेल के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है। इसकी वजह से भारतीय घर वैश्विक युद्धों, निर्यात प्रतिबंधों, सप्लाई चेन संकट और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव से आसानी से प्रभावित हो जाते हैं।

दूसरी तरफ जरूरत से ज्यादा खाद्य तेल का सेवन देश में मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और दूसरी लाइफस्टाइल बीमारियों को तेजी से बढ़ा रहा है। इसलिए खाद्य तेल का मुद्दा अब केवल खेती या खाने तक सीमित नहीं रहा। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा, खाद्य महँगाई और आत्मनिर्भरता से जुड़ा बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है।

सरकार घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने और आयात निर्भरता कम करने के लिए कई योजनाएँ और सुधार लागू कर रही है। लेकिन लंबे समय में असली बदलाव तभी संभव होगा जब लोग स्वस्थ खानपान अपनाएँ, संतुलित मात्रा में तेल का सेवन करें, किसानों को बेहतर समर्थन मिले और लोगों में जागरूकता बढ़े। भारत के खाद्य तेल संकट का समाधान केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं बल्कि खाने की आदतें बदलने से भी जुड़ा हुआ है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

कोलकाता का पार्क सर्कस एरिया आजादी के बाद से ही इस्लामी कट्टरपंथियों की उपद्रव-हिंसा का रहा केंद्र, पहली बार कसी लगाम: जानें मुस्लिमों ने कैसे अब तक की सरकारों पर बनाए रखा था दबाव

मध्य कोलकाता का पार्क सर्कस इलाका एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। इस बार सड़क पर नमाज पढ़ने और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर लगी रोक के विरोध में प्रदर्शन हो रहा था। इस दौरान अचानक हिंसा भड़क गई और प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़प हो गई। भीड़ ने गाड़ियों में तोड़फोड़ की, जिससे कुछ पुलिसवाले भी घायल हो गए हैं।

इस ताजा घटना के बाद पार्क सर्कस को लेकर राजनीति भी गरमा गई है। दरअसल, यह इलाका पिछले कई सालों से बड़े प्रदर्शनों और भीड़ जुटाने का मुख्य केंद्र रहा है, खासकर तब जब मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं। अब इस पूरे मामले पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि जो लोग भी कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश करेंगे, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। सरकार अब किसी भी तरह की हिंसा या अशांति फैलाने की कोशिश को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी।

CM शुभेंदु अधिकारी की चेतावनी

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पथराव की घटना पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने साफ कहा है कि हिंसा करने वालों के खिलाफ राज्य सरकार बहुत सख्ती से निपटेगी। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि बंगाल में अब गुंडागर्दी बिल्कुल नहीं चलने दी जाएगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को कानून के तहत कार्रवाई करने की पूरी छूट दे दी गई है। अब वह समय बीत चुका है जब पुलिसवालों को बिना किसी सरकारी समर्थन के अकेले छोड़ दिया जाता था। अब सरकार पुलिस के साथ मजबूती से खड़ी है।

CM शुभेंदु अधिकारी ने आगे कहा कि कुछ लोगों को पहले की ढीली व्यवस्था की आदत हो गई थी। उन्हें लगता था कि वे कुछ भी करेंगे और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। लेकिन अब सरकार साफ संदेश देना चाहती है कि पथराव करना, शांति भंग करना या मजहबी नारों की आड़ में तनाव फैलाना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस सोशल मीडिया पर नजर रख रही है, क्योंकि ऐसी खबरें आई हैं कि घटना होने से पहले ही इसके बारे में जानकारी इंटरनेट पर डाल दी गई थी।

मुख्यमंत्री ने कोलकाता पुलिस को और मजबूत बनाने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि पुलिस बल को बेहतर सुविधाएँ और गाड़ियाँ दी जाएँगी। इसके साथ ही, उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री से अपील की है कि राज्य में पहले से मौजूद पैरामिलिट्री (अर्धसैनिक बलों) की कंपनियों को कुछ समय के लिए यहीं रहने दिया जाए, क्योंकि उनके अचानक जाने से पुलिस पर काम का दबाव बढ़ सकता है। आखिर में उन्होंने आम जनता से भी अपील की कि वे शांति बनाए रखने में पुलिस और प्रशासन का सहयोग करें।

पुलिस की कार्रवाई

यह हिंसा पार्क सर्कस सेवन पॉइंट चौराहे के पास हुई, जहाँ सड़क पर नमाज पढ़ने और लाउडस्पीकर की आवाज सीमित करने के सरकारी नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन बुलाया गया था। इस दौरान इस्लामी कट्टरपंथी वहाँ इकट्ठा हो गए और सड़क जाम कर दी, जिससे ट्रैफिक रुक गया। खुफिया जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने पहले से ही वहाँ सुरक्षा बल तैनात कर रखा था।

अधिकारियों के मुताबिक, जैसे ही पुलिस ने सड़क से जाम हटाने की कोशिश की, माहौल बिगड़ गया। इस्लामी भीड़ ने सुरक्षाकर्मियों और वहाँ खड़ी गाड़ियों पर पत्थर और ईंटें फेंकनी शुरू कर दीं, जिससे पुलिस की गाड़ियाँ और कई दूसरी गाड़ियाँ टूट गईं। हालात को काबू में करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और भीड़ को खदेड़ दिया, जिसके बाद वहाँ भारी पुलिस बल तैनात किया गया और ट्रैफिक को दोबारा शुरू कराया गया।

पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार किया है और इलाके में फ्लैग मार्च भी किया है। प्रशासन ने इस घटना को कुछ दिन पहले राजाबाजार में शुक्रवार की नमाज के दौरान हुए विवाद से भी जोड़कर देखा है, जहाँ पुलिस ने सड़क पर नमाज न पढ़ने की सरकारी नीति को लागू करने की कोशिश की थी और तब भी झड़प हुई थी।

दरअसल, नई सरकार ने सड़क पर होने वाली मजहबी गतिविधियों को लेकर बहुत कड़ा रुख अपनाया है। बीजेपी नेताओं का साफ कहना है कि नमाज सिर्फ मस्जिदों के अंदर होनी चाहिए और इससे सड़कों पर आम लोगों को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसी नीति के तहत प्रशासन अब लाउडस्पीकर की आवाज और सड़कों पर भीड़ जुटाने के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई कर रहा है।

पार्क सर्कस: क्यों बनता है यह बड़े प्रदर्शनों का केंद्र?

पार्क सर्कस में हुई इस घटना ने एक बार फिर इस इलाके के पुराने इतिहास की याद दिला दी है। यह इलाका लंबे समय से बड़े-बड़े प्रदर्शनों और भारी भीड़ जुटाने का मुख्य केंद्र रहा है। जब भी समुदाय से जुड़ा कोई बड़ा आंदोलन होता है, तो पार्क सर्कस उसका मुख्य अड्डा बन जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस इलाके की बनावट और यहाँ की सड़कें ऐसी हैं, जहाँ बहुत ही कम समय में बहुत बड़ी भीड़ आसानी से इकट्ठा हो जाती है।

भौगोलिक नजरिए से देखें तो पार्क सर्कस कोलकाता के सबसे जुड़े हुए इलाकों में से एक है। इसके आसपास कई मुख्य सड़कें हैं और पास में ही घनी आबादी वाली बस्तियाँ भी हैं। इसके अलावा, हर शुक्रवार को जुमे की नमाज के समय यहाँ वैसे भी भारी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं। ऐसे में जब भी कोई सामाजिक या राजनीतिक तनाव होता है, तो यहाँ लोगों को एकजुट करना बहुत आसान हो जाता है। यही वजह है कि पिछले कई सालों में मुस्लिम समुदाय से जुड़े जितने भी बड़े प्रदर्शन हुए हैं, वे या तो इसी इलाके से शुरू हुए हैं या फिर यहीं आकर उन्हें असली रफ्तार मिली है।

CAA-NRC के खिलफ पार्क सर्कस मैदान बना आंदोलन का बड़ा केंद्र

इसका सबसे बड़ा उदाहरण साल 2020 की सर्दियों में देखने को मिला था, जब नागरिकता कानून (CAA) और NRC के खिलाफ हुए आंदोलन ने पार्क सर्कस मैदान को एक बड़ा केंद्र बना दिया था। दिल्ली के शाहीन बाग आंदोलन से प्रेरणा लेकर यहाँ मुस्लिम महिलाओं ने दिन-रात का धरना शुरू कर दिया था। प्रदर्शन कर रही महिलाओं का कहना था कि जब तक नागरिकता कानून और NRC से जुड़ी उनकी चिंताएँ दूर नहीं होतीं, वे वहाँ से नहीं हटेंगी।

इस आंदोलन में पार्क सर्कस और उसके आसपास के इलाकों की मुस्लिम महिलाएँ लगातार शामिल हुईं। कई महिलाएँ अपने बच्चों और परिवार के सदस्यों को भी साथ लाई थीं, जबकि छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी उनका साथ दिया। जैसे-जैसे यह प्रदर्शन बढ़ा, वहाँ नारेबाज़ी होने लगी और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। आंदोलन के बड़ा होने पर प्रदर्शनकारियों ने टेंट, शौचालय और लाउडस्पीकर जैसी सुविधाओं की माँग भी की। इस आंदोलन को वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने ‘स्वतंत्रता आंदोलन 2’ यानी दूसरी आज़ादी की लड़ाई का नाम भी दे दिया था।

धरने पर बैठी कई मुस्लिम महिलाओं का कहना था कि उन्होंने इससे पहले कभी किसी राजनीतिक आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया था, लेकिन नागरिकता छिन जाने के डर से वे इस बार सड़क पर उतरने को मजबूर हुईं। आंदोलन के दौरान प्रदर्शन स्थल पर दिल का दौरा पड़ने से समीदा खातून नाम की एक महिला की मौत हो गई, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया।

इस दौरान कई बड़े कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं ने भी पार्क सर्कस मैदान का दौरा किया। यह प्रदर्शन कोलकाता में सीएए (CAA) के खिलाफ सबसे बड़ा चेहरा बन गया और इसके बाद पूरे देश में पार्क सर्कस की चर्चा होने लगी।

रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में बड़ी रैली

पार्क सर्कस एक बार फिर उस समय एक बड़े आंदोलन का केंद्र बना, जब म्यांमार वापस भेजे जा रहे रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में एक हजार से ज्यादा मुस्लिम लोग इकट्ठा हुए। म्यांमार सरकार द्वारा रोहिंग्याओं को वापस बुलाने के फैसले के खिलाफ कई मुस्लिम संगठनों ने मिलकर एक बड़ी रैली निकाली। यह मार्च पार्क सर्कस मैदान से शुरू हुआ था और वहाँ से होते हुए म्यांमार के दूतावास (कंसुलेट ऑफिस) की तरफ बढ़ा था।

इस प्रदर्शन के बाद बंगाल में भारी राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई। बीजेपी नेताओं ने तब की राज्य सरकार (ममता बनर्जी सरकार) पर तीखा हमला बोला और आरोप लगाया कि सरकार इस मुद्दे के जरिए वोट बैंक की राजनीति कर रही है। इस बड़ी रैली के बाद पार्क सर्कस की यह पहचान और मजबूत हो गई कि जब भी मुस्लिम संगठनों से जुड़ा कोई मुद्दा होता है, तो भारी भीड़ जुटाने के लिए इसी इलाके को चुना जाता है।

नई सरकार के आते ही बदल गई पुलिस की सख्ती

पुलिस ने पार्क सर्कस मामले में जो कार्रवाई की, उसे नई बीजेपी सरकार के समर्थक एक बड़े बदलाव के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि टीएमसी (TMC) का राज खत्म होने के बाद अब प्रशासन के काम करने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। नई सरकार का साफ कहना है कि अब कानून-व्यवस्था को लेकर कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी। जो लोग भी सड़कें जाम करेंगे, पुलिस पर पत्थर फेंकेंगे या हिंसा फैलाएँगे, उनके खिलाफ तुरंत और कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

सरकार के समर्थकों का कहना है कि पहले ऐसे मामलों में शामिल लोगों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती थी और वे आसानी से बच जाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब गड़बड़ी करने वालों को तुरंत गिरफ्तार किया जा रहा है, संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया जा रहा है और पुलिस का सख्त रूप साफ दिखाई दे रहा है। संवेदनशील जगहों पर पुलिस का फ्लैग मार्च करना, सड़कों पर भीड़ जमा करने से रोकना और तुरंत एक्शन लेना इस नए बदलाव के सबसे बड़े उदाहरण हैं।

एक बार फिर पार्क सर्कस राजनीति और चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस पूरी घटना ने यहाँ के पुराने इतिहास, पुराने आंदोलनों और अब सरकार की नई कड़क नीति को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की तरफ से प्रशासन ने बिल्कुल साफ संदेश दे दिया है कि कानून के दायरे में रहकर शांतिपूर्वक काम करने की पूरी आजादी है, लेकिन अगर किसी ने भी प्रदर्शन की आड़ में हिंसा करने या शहर की शांति भंग करने की कोशिश की, तो पुलिस उसे किसी भी कीमत पर बख्शेगी नहीं।

(यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

ममता राज में रेप केस का खुलासा करने वाली महिला IPS को किया गया था शंट, अब CM शुभेंदु ने सौंपी अहम जिम्मेदारी: जानें कौन हैं ‘सुपरकॉप’ दमयंती सेन, जिनसे काँपते हैं अपराधी

पश्चिम बंगाल में ‘माँ-माटी-मानुष’ का नारा देकर सत्ता में आई ममता बनर्जी सरकार का असली चेहरा उस समय बेनकाब हो गया था, जब उन्होंने अपनी ही सरकार की नाक के नीचे हुए एक खौफनाक गैंगरेप को ‘मनगढ़ंत कहानी’ बता दिया था।

उस दौर में राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर मुख्यमंत्री ममता के सुर में सुर मिला रहे थे, लेकिन एक निडर महिला IPS अधिकारी ऐसी थीं, जिन्होंने सत्ता के दबाव के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया। नाम है- दमयंती सेन

ममता सरकार ने सच को उजागर करने के बदले इस जांबाज अधिकारी को इनाम देने के बजाय सालों-साल हाशिए (साइडलाइन) पर धकेल कर रखा। लेकिन कहते हैं न कि सच कभी हारता नहीं है। बंगाल में BJP की सरकार बनते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बड़ा और सराहनीय कदम उठाया है।

उन्होंने तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के 15 साल के काले शासनकाल के दौरान महिलाओं और बच्चों पर हुए अत्याचारों की जाँच के लिए एक हाई-लेवल विशेष आयोग बनाया है। CM शुभेंदु अधिकारी ने इस बेहद महत्वपूर्ण जाँच आयोग का ‘सदस्य सचिव’ (Member Secretary) दमयंती सेन को नियुक्त कर उन्हें वो सम्मान लौटाया है, जिसकी वो हकदार थीं।

कौन हैं ‘सुपरकॉप’ दमयंती सेन?

दमयंती सेन 1996 बैच की भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की एक बेहद तेजतर्रार अधिकारी हैं। 1970 में जन्मी दमयंती पढ़ाई-लिखाई में बचपन से ही बेहद होनहार और हमेशा फर्स्ट क्लास रही हैं। उन्होंने कोलकाता के प्रतिष्ठित जादवपुर विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र (Economics) में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की।

उनकी काबिलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह कोलकाता पुलिस के इतिहास में जॉइंट कमिश्नर (क्राइम) के पद पर तैनात होने वाली पहली महिला अधिकारी थीं। इसके बाद वे कोलकाता पुलिस की स्पेशल कमिश्नर भी बनीं। प्रशासनिक हलकों में उनकी ईमानदारी, कड़क स्वभाव और बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम करने के अंदाज की मिसाल दी जाती है।

ममता बनर्जी का वो ‘झूठ’ जिसने हिला दिया था बंगाल

कहानी की शुरुआत होती है 6 फरवरी 2012 से। कोलकाता के आलीशान पार्क स्ट्रीट इलाके में एक नाइट क्लब से लौट रही महिला के साथ चलती कार में सामूहिक बलात्कार (पार्क स्ट्रीट गैंगरेप) होता है। तब ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार को सत्ता में आए कुछ ही समय हुआ था।

अपनी सरकार की छवि को बचाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बिना किसी जाँच के इस भयानक कांड को ‘सजानो घोटोना’ (एक मनगढ़ंत कहानी) करार दे दिया। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि यह उनकी सरकार को बदनाम करने की एक राजनीतिक साजिश है। मुख्यमंत्री का यह बयान पीड़ित महिला के घावों पर नमक छिड़कने जैसा था।

जब मुख्यमंत्री के झूठ के सामने अड़ गईं दमयंती सेन

ममता बनर्जी ने तो इसे झूठ मान लिया था, लेकिन उस समय क्राइम ब्रांच की प्रभारी जॉइंट कमिश्नर दमयंती सेन चुप नहीं बैठीं। उन्होंने मुख्यमंत्री के राजनीतिक बयानों की परवाह न करते हुए पूरी लगन से जाँच की।

दमयंती सेन और उनकी टीम ने वैज्ञानिक और पुख्ता सबूत जुटाए और यह साबित कर दिया कि बलात्कार की घटना कोई अफवाह नहीं बल्कि 100 फीसदी कड़वा सच थी। उन्होंने चंद दिनों के भीतर ही रसूखदार आरोपितों को दबोचकर सलाखों के पीछे भेज दिया।

सच बोलने की ‘सजा’ और ममता राज में ‘वनवास’

ममता बनर्जी के दावों को झूठा साबित करना और पीड़ित महिला को न्याय दिलाना दमयंती सेन के करियर पर भारी पड़ गया। बौखलाई ममता सरकार ने केस सुलझने के तुरंत बाद ही उनका ट्रांसफर कोलकाता पुलिस मुख्यालय (लालबाजार) से हटाकर बैरकपुर पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज में एक बेहद मामूली और कम महत्वपूर्ण पद पर कर दिया।

सरकार ने इसे ‘रूटीन ट्रांसफर’ कहा, लेकिन पूरा बंगाल समझ गया था कि सच का साथ देने की वजह से एक ईमानदार अफसर को प्रताड़ित किया जा रहा है। इसके बाद TMC के पूरे कार्यकाल में उन्हें मुख्यधारा से दूर रखा गया।

हालाँकि, कलकत्ता हाई कोर्ट को उनकी ईमानदारी पर इतना भरोसा था कि अदालत ने 2014 के ‘मध्यमग्राम बलात्कार कांड’, साल 2022 के चार बड़े रेप केस और चर्चित रसिका जैन मौत मामले की जाँच सीधे दमयंती सेन को सौंप दी थी।

पर्सनल लाइफ: एक साहसी सिंगल मदर

दमयंती सेन अपनी निजी जिंदगी को हमेशा मीडिया और लाइमलाइट से दूर रखती हैं। उनके माता-पिता या भाई-बहन के बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं है। उन्होंने जीवन में कभी शादी नहीं की, लेकिन वह एक बेहद गौरवान्वित ‘सिंगल मदर’ हैं। उन्होंने एक बच्चे को गोद लिया है और अकेले ही उसका बेहतरीन पालन-पोषण कर रही हैं।

CM शुभेंदु का मास्टरस्ट्रोक: बेटियों को सुरक्षा, अपराधियों को सजा

पश्चिम बंगाल की सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ताबड़तोड़ और कड़े फैसले ले रहे हैं। पिछली सरकार के दौरान हुए संस्थागत भ्रष्टाचार, ‘कट मनी’, रिश्वतखोरी और महिलाओं-बच्चों के खिलाफ हुई हिंसा के खिलाफ उन्होंने कड़ा रुख अपनाया है। शुभेंदु सरकार ने इसके लिए दो अलग-अलग जाँच आयोगों का गठन किया है।

पहला है संस्थागत भ्रष्टाचार की जाँच, जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस विश्वजीत बसु की अध्यक्षता में यह कमेटी काम करेगी, जिसमें ADG रैंक के अधिकारी जयरमन सदस्य-सचिव होंगे।

दूसरा है महिला एवं बाल उत्पीड़न की जाँच, जिसमें रिटायर्ड जस्टिस समाप्ति चटर्जी की अध्यक्षता में बनी इस कमेटी में IPS दमयंती सेन को ‘सदस्य सचिव’ बनाया गया है। यह आयोग विशेष रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अल्पसंख्यक समुदायों की पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाएगा।

1 जून से लगेगा न्याय का ‘जनता दरबार’

ममता सरकार जहाँ अपराधियों को बचाने और सच छुपाने के आरोपों से घिरी रही, वहीं शुभेंदु सरकार ने सीधे जनता के द्वार जाने का फैसला किया है। यह विशेष आयोग आगामी 1 जून से राज्य के अलग-अलग थानों में जाकर ‘जनसुनवाई’ करेगा, जहाँ पीड़ित महिलाएँ बिना किसी डर के सीधे अपनी शिकायतें दर्ज करवा सकेंगी।

1 जून से पहले दमयंती सेन की देखरेख में अधिकारियों की टीम पुराने सभी लंबित मामलों का डेटा जुटा रही है। सालों तक हाशिए पर रहने के बाद दमयंती सेन की यह वापसी बंगाल की कानून-व्यवस्था के लिए एक नया सवेरा है और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की न्यायप्रिय सोच का सबसे बड़ा प्रमाण है।

खरीफ की फसल के लिए UP की तैयारी पूरी, अभी से खाद-बीज-सिंचाई के लिए निगरानी तंत्र तैयार: जानें किसान हित में क्या-क्या कदम उठा रही योगी सरकार

उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा कृषि प्रधान राज्य है, जहाँ करोड़ों किसान प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है। हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने, कृषि उत्पादन को स्थिर रखने तथा खेती को अधिक लाभकारी बनाने के लिए अनेक ठोस कदम उठाए हैं।

खासतौर पर उर्वरकों की उपलब्धता, उनकी आपूर्ति व्यवस्था, कालाबाजारी पर नियंत्रण और किसानों तक समय पर खाद पहुँचाने के क्षेत्र में योगी आदित्यनाथ सरकार की कार्यशैली उल्लेखनीय रही है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए खाद और उर्वरकों की आपूर्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। प्रदेश में यूरिया, डीएपी, एनपीके और एमओपी जैसे प्रमुख उर्वरकों का पर्याप्त भंडारण किया गया है।

राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के साथ मिलकर किसानों तक समय पर खाद पहुँचाने की प्रभावी व्यवस्था विकसित की है। यूपी सरकार का कहना है कि प्रदेश में लाखों मीट्रिक टन उर्वरक उपलब्ध हैं और लगातार अतिरिक्त आवंटन भी कराया जा रहा है।

किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने की व्यवस्था

उत्तर प्रदेश सरकार ने खरीफ और रबी सीजन में खाद की कमी न होने देने के लिए बड़े स्तर पर भंडारण किए। एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश सरकार ने लगभग 4.8 मिलियन टन उर्वरकों का भंडार तैयार किया, जो कुल मांग का लगभग 84 प्रतिशत था। राज्य सरकार ने केवल घोषणाएँ नहीं कीं, बल्कि जमीनी स्तर पर खाद उपलब्ध कराने की दिशा में प्रभावी प्रशासनिक प्रबंधन भी किया।

खेती में समय पर खाद की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि बुआई या सिंचाई के समय किसान को खाद नहीं मिले तो इसका सीधा असर फसल पर पड़ता है। इसे ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने बहुस्तरीय निगरानी तंत्र विकसित किया है।

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार कृषि विभाग ने ये भी स्पष्ट किया है कि प्रदेश के सभी जिलों में पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध हैं तथा किसानों को अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। इस प्रशासनिक पारदर्शिता ने सरकार और किसानों के बीच विश्वास बढ़ाने का काम किया है।

कालाबाजारी और जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई

देश के कई राज्यों में खाद की कालाबाजारी और कुछ अन्य परेशानियों से जूझ रहे किसानों के लिए बड़ी समस्या रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए कठोर कदम उठाए हैं।

सरकार ने उर्वरकों की टैगिंग एवं पॉइंट ऑफ सेल (PoS) मशीनों के माध्यम से बिक्री को अनिवार्य बनाया है। किसानों के पहचान पत्र के माध्यम से खाद वितरण की व्यवस्था लागू की गई है। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि अनुदानित उर्वरक वास्तविक किसानों तक ही पहुँचे।

सरकार ने उर्वरकों की अनधिकृत बिक्री, जमाखोरी तथा कालाबाजारी पर उर्वरक नियंत्रण आदेश एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 के अंतर्गत कार्रवाई सुनिश्चित की है।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार योगी सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए कि किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए और उर्वरकों की कालाबाजारी करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी। इसके जरिए किसानों के हितों की रक्षा के लिए ये कदम अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ।

वैज्ञानिक खेती और संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा

सरकार ने किसानों से सही मात्रा में खाद के उपयोग की अपील की है। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई मात्रा के अनुसार ही उर्वरक खरीदने और प्रयोग करने का निर्देश दिया गया है।

यह पहल कई तरह से महत्वपूर्ण है। पहली इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। इसके अलावा किसानों के फसल लगाने की लागत में कमी आती है। सही मात्रा में खाद के उपयोग से उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है और सबसे अहम पहलू येहा कि इससे पर्यावरण संरक्षण भी होता है।

उत्तर प्रदेश सरकार लगातार ‘संतुलित उर्वरक उपयोग’ की अवधारणा को बढ़ावा दे रही है। कृषि विभाग किसानों को जागरूक करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, किसान गोष्ठियाँ और कृषि मेलों का आयोजन भी कर रहा है।

कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की बढ़ती प्रगति

उत्तर प्रदेश ने हाल के वर्षों में कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों का योगदान बढ़कर लगभग 24.9 प्रतिशत तक पहुँच गया है।

यह उपलब्धि कई कारणों से संभव हुई है। समय पर खाद और बीज की उपलब्धता मिली है। इसके अलावा सिंचाई व्यवस्था को बेहतर किया गया है। सरकार ने फसल विविधीकरण के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया है। कृषि तकनीक का विस्तार लगातार किया जा रहा है। और सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा रहा है।

एक रिपोर्ट कहती है कि उत्तर प्रदेश की कृषि वृद्धि दर 17.7 प्रतिशत तक पहुँच गई, जो पूर्व वर्षों की तुलना में काफी अधिक है। इससे ये तो साफ है कि योगी सरकार की कृषि नीतियाँ किसानों के हित में सकारात्मक परिणाम दे रही हैं।

कृषि आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा UP

सरकार द्वारा PoS मशीनों से उर्वरक वितरण की व्यवस्था लागू करना एक बड़ा प्रशासनिक सुधार है। इससे कई लाभ हुए। वास्तविक किसानों की पहचान आसान हुई। इससे फर्जी खरीद पर भी रोक लगी। साथ ही खाद की उपलब्धता का असल डेटा मिला और वितरण प्रणाली अधिक पारदर्शी बनी।

उत्तर प्रदेश सरकार केवल खाद वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि आधुनिकीकरण पर भी विशेष बल दे रही है। आर्थिक सर्वेक्षण में उल्लेख है कि राज्य में सोलर पंपों का विस्तार हुआ है। इसके साथ ही माइक्रो इरिगेशन, सीड पार्क की स्थापना, हाईटेक नर्सरी, कृषि प्रसंस्करण इकाइयों के विकास के साथ कोल्ड स्टोरेज की क्षमता भी बढ़ाई जा रही है। इन पहलों से कृषि को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने में सहायता मिल रही है।

योगी सरकार की सक्रियता के कारण किसानों में यह विश्वास मजबूत हुआ है कि सरकार उनकी समस्याओं के समाधान के लिए तत्पर है। खाद संकट की आशंकाओं के बीच भी राज्य सरकार ने नियमित प्रेस विज्ञप्तियों और प्रशासनिक निर्देशों के माध्यम से किसानों को भरोसा दिलाया कि प्रदेश में पर्याप्त खाद और उर्वरक उपलब्ध हैं।

चुनौतियाँ अभी और भी हैं

हालाँकि उत्तर प्रदेश सरकार ने उर्वरक प्रबंधन में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, फिर भी कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद की माँग लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा किसानी के कुछ क्षेत्रों में अचानक खाद की माँग बढ़ने लगी है।

इनके अलावा कुछ निजी विक्रेताओं द्वारा भी अनियमितताएँ भी बरती जा रही हैं जिस पर सरकार काम कर रही है। इन सभी के साथ-साथ किसानों में वैज्ञानिक खेती के प्रति जागरूकता कम है। इसे बढ़ाए जाने की जरूरत है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए डिजिटल निगरानी प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत होगी। ब्लॉक स्तर पर उर्वरक नियंत्रण कक्ष बनाने, किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड से जोड़ने, जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और कृषि विस्तार सेवाओं को आगे बढ़ाने जैसे कदम किसानों के लिए प्रभावी हो सकते हैं।

योगी आदित्यनाथ सरकार ने यह सिद्ध किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत हो तो किसानों को समय पर संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं। कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की बढ़ती विकास दर, उत्पादन में वृद्धि और किसानों के बढ़ते विश्वास से यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार की नीतियाँ सकारात्मक परिणाम दे रही हैं।

आने वाले समय में यदि सरकार इसी प्रकार कृषि अवसंरचना, तकनीकी नवाचार और किसान हितैषी योजनाओं पर कार्य करती रही, तो उत्तर प्रदेश न केवल देश का सबसे बड़ा कृषि राज्य रहेगा, बल्कि आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि मॉडल के रूप में भी स्थापित होगा।

क्या 20 मई को नहीं मिलेंगी दवाइयाँ? हड़ताल पर क्यों जा रहे हैं देश भर के दुकानदार, क्या हैं इनकी माँगे

भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र और दवा आपूर्ति तंत्र में बुधवार (20 मई 2026) को एक बड़ा गतिरोध देखने को मिल रहा है। ‘ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स’ (AIOCD) ने ई-फार्मेसी प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ और उनके अनियंत्रित संचालन के विरोध में एक दिवसीय देशव्यापी हड़ताल (मेडिकल स्टोर बंद) का आह्वान किया है।

AIOCD का दावा है कि इस विरोध प्रदर्शन में देश भर के लगभग 12.4 लाख से लेकर 15 लाख तक दवा विक्रेता, फार्मासिस्ट और थोक वितरक शामिल हैं। पारंपरिक दवा दुकानदारों का आरोप है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म बिना किसी कड़े नियम-कानून के एक ‘लीगल ग्रे ज़ोन’ (कानूनी अनिश्चितता के दायरे) में काम कर रहे हैं, जिससे न केवल उनका व्यवसाय प्रभावित हो रहा है बल्कि आम जनता के स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है।

दूसरी ओर इस देशव्यापी बंद की घोषणा ने देश भर के उन करोड़ों मरीजों और उनके परिवारों के बीच भारी चिंता पैदा कर दी है जो अपनी नियमित और जीवन रक्षक दवाइयों के लिए पूरी तरह से स्थानीय केमिस्ट दुकानों पर निर्भर हैं। हालाँकि, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के हस्तक्षेप के बाद कई राज्यों के दवा संगठनों ने खुद को इस हड़ताल से अलग कर लिया है, जिससे आंशिक राहत की उम्मीद है।

हड़ताल क्यों हो रही है और कौन से संगठन इसमें शामिल हैं?

इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल का मुख्य कारण पारंपरिक केमिस्टों और ऑनलाइन दवा डिलीवरी ऐप्स (जैसे 1mg, Netmeds, PharmEasy आदि) के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद है। केमिस्ट एसोसिएशन का मानना है कि सरकार द्वारा ई-फार्मेसी को दी गई ढील उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है।

इस आंदोलन का मुख्य नेतृत्व ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) कर रहा है। यह भारत में केमिस्टों की सबसे बड़ी शीर्ष संस्था है, जिसके अंतर्गत देश के विभिन्न राज्यों के जिला और स्थानीय केमिस्ट संगठन आते हैं।

AIOCD के अध्यक्ष जगन्नाथ शिंदे और महासचिव राजीव सिंघल ने संयुक्त बयान में कहा, “यह लड़ाई सिर्फ हमारे व्यापार को बचाने की नहीं है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और देश के स्वास्थ्य मानकों को बनाए रखने की भी है। बिना भौतिक सत्यापन के ऑनलाइन दवाइयाँ बेचना समाज में नशे और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के खतरे को बढ़ा रहा है।”

हड़ताल की मुख्य वजहें क्या हैं?

  • नियामक कमियाँ (Regulatory Gaps): पारंपरिक दुकानदारों का आरोप है कि दवा नियामक (Drug Regulator) ने ऑनलाइन दवा कंपनियों को बिना सख्त नियमों के काम करने की छूट दे रखी है।
  • गलत और फर्जी पर्चियों (Fake Prescriptions) पर दवा की बिक्री: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बिना भौतिक सत्यापन के पुरानी, अधूरी या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा जनरेटेड फर्जी पर्चियों के आधार पर धड़ल्ले से दवाइयां डिलीवर की जा रही हैं।
  • गंभीर बीमारियों की दवाओं का दुरुपयोग: एंटीबायोटिक्स और आदत लगाने वाली (Habit-forming/नशीली) दवाओं की ऑनलाइन अनियंत्रित बिक्री से समाज में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) और नशे की प्रवृत्ति बढ़ने का खतरा है।
  • असमान प्रतिस्पर्धा (Predatory Pricing): बड़े कॉर्पोरेट घरानों के निवेश के दम पर ई-फार्मेसी कंपनियां ग्राहकों को 20% से लेकर 50% तक की भारी छूट (Deep Discounting) दे रही हैं, जिससे छोटे गली-मोहल्ले के केमिस्ट प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पा रहे हैं।

किस कानून और नोटिफिकेशन के खिलाफ है ये हड़ताल?

AIOCD ने सरकार के सामने मुख्य रूप से दो सरकारी गजट नोटिफिकेशन (G.S.R.) को वापस लेने और एक ठोस कानूनी ढाँचा तैयार करने की माँग रखी है। इन दोनों नोटिफिकेशन के बारे में विस्तार से समझने की जरूरत है-

1- G.S.R. 817(E): ई-फार्मेसी का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन

यह एक ड्राफ्ट (प्रारूप) नोटिफिकेशन है जिसे सरकार द्वारा लगभग आठ साल पहले जारी किया गया था। इसका उद्देश्य भारत में ई-फार्मेसी के संचालन के लिए एक औपचारिक पंजीकरण प्रणाली, पर्चियों की जांच के नियम, परिचालन सुरक्षा उपाय और उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान तय करना था।

विवाद की वजह: केमिस्ट एसोसिएशन का कहना है कि यह ड्राफ्ट पिछले आठ सालों से न तो पूरी तरह लागू किया गया और न ही इसे सरकार द्वारा वापस लिया गया। इसकी ‘समीक्षा’ सालों से चल रही है। इस लंबे समय की कानूनी अनिश्चितता का फायदा उठाकर ई-फार्मेसी कंपनियाँ बिना किसी ठोस जवाबदेही और स्पष्ट कानूनी ढाँचे के एक ‘ग्रे ज़ोन’ में अपना कारोबार बढ़ा रही हैं।

2 – G.S.R. 220(E): कोविड-19 महामारी के समय की आपातकालीन राहत

कोविड-19 महामारी के दौरान जब देश में सख्त लॉकडाउन लगा था, तब सरकार ने एक आपातकालीन उपाय के तहत इस नोटिफिकेशन को पेश किया था। इसके तहत पंजीकृत दवा दुकानों को मरीजों के घर तक दवाइयाँ पहुँचाने (Doorstep Delivery) की विशेष अनुमति दी गई थी ताकि लॉकडाउन में किसी की जान को खतरा न हो।

विवाद की वजह: पारंपरिक केमिस्टों का तर्क है कि यह एक अस्थायी आपातकालीन व्यवस्था थी। महामारी खत्म होने के बाद भी कंपनियाँ इस नोटिफिकेशन को एक कानूनी लूपहोल (चोर दरवाजे) की तरह इस्तेमाल कर रही हैं ताकि वे ऑनलाइन दवाओं की होम डिलीवरी जारी रख सकें। केमिस्टों की मांग है कि इस नोटिफिकेशन को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए क्योंकि ऑनलाइन दवा बिक्री की प्रकृति पारंपरिक होम डिलीवरी से बिल्कुल अलग है।

भारत में फार्मा का बाजार और ऑनलाइन मार्केट शेयर

भारत को दुनिया भर में विश्व की फार्मेसी (Pharmacy of the World) के रूप में जाना जाता है। देश का फार्मास्युटिकल बाजार वॉल्यूम (मात्रा) के हिसाब से दुनिया में तीसरे नंबर पर और वैल्यू (मूल्य) के हिसाब से 11वें स्थान पर आता है।

आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों और उद्योग के आँकड़ों के अनुसार, भारतीय फार्मा बाजार की स्थिति निम्नलिखित तालिका के माध्यम से समझी जा सकती है-

  • कुल भारतीय फार्मास्युटिकल बाजार (साल 2025-26 में) लगभग 60 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी ₹4.72 लाख करोड़ से अधिक का है।
    भविष्य का अनुमान लगाएँ तो साल 2030 तक इसके 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है |
  • पारंपरिक रिटेल फार्मेसी का हिस्सा अब भी बड़ा है, जिसमें घरेलू दवा बिक्री में अभी भी लगभग 64% से 65% हिस्सेदारी पारंपरिक केमिस्टों की है |
  • ई-फार्मेसी (ऑनलाइन मार्केट) का शेयर वर्तमान में देखें तो कुल मार्केट शेयर का ये लगभग 4% से 6% है, लेकिन यह 9.45% की वार्षिक दर (CAGR) से तेजी से बढ़ रहा है |

भले ही ऑनलाइन बाजार वर्तमान में प्रतिशत के हिसाब से छोटा दिखता हो, लेकिन महानगरों और टियर-1 शहरों में इसकी पैठ बहुत गहरी हो चुकी है। इस बाजार में बड़े कॉर्पोरेट और तकनीकी दिग्गजों के आने से पारंपरिक खुदरा बाजार का ढाँचा तेजी से बदल रहा है, जिससे खुदरा दुकानदारों को अपने भविष्य पर संकट दिखाई दे रहा है।

हड़ताल कर रहे केमिस्टों को किस बात का डर है?

पारंपरिक दवा विक्रेताओं की चिंताएं केवल तात्कालिक मुनाफे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे एक व्यापक व्यावसायिक और सामाजिक संकट की ओर इशारा कर रहे हैं-

आजीविका पर संकट: भारत में लगभग 5 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दवा व्यापार, लॉजिस्टिक्स और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क से जुड़े हुए हैं। केमिस्टों को डर है कि यदि ई-फार्मेसी को बिना किसी कड़े नियमन के छोड़ दिया गया, तो ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के छोटे दुकानदार पूरी तरह बर्बाद हो जाएँगे।
पारंपरिक केमिस्ट की महत्ता का अंत: भारत में केमिस्ट केवल दवा बेचने वाला नहीं होता, बल्कि ग्रामीण इलाकों में वह प्राथमिक स्वास्थ्य परामर्शदाता (First Point of Healthcare Access) की भूमिका भी निभाता है। केमिस्टों का मानना है कि छोटे स्टोर बंद होने से आम लोगों की स्वास्थ्य पहुँच पर बुरा असर पड़ेगा।
अवैध और अनैतिक व्यापार: बिना भौतिक पर्ची के दवा बेचने से नकली दवाओं के बाजार में आने और मरीजों द्वारा स्वयं से अपना इलाज करने (Self-medication) की प्रवृत्ति बढ़ेगी, जिसकी अंतिम जिम्मेदारी उनके ऊपर आ सकती है।

20 मई को क्या खुला रहेगा और क्या बंद रहेगा?

वैसे तो, AIOCD ने पूर्ण बंद का आह्वान किया है, लेकिन मरीजों की सहूलियत और आपातकालीन सेवाओं को ध्यान में रखते हुए इस बंद का असर आंशिक होने की संभावना है।

क्या बंद रहने की संभावना है?

  • स्टैंडअलोन (स्वतंत्र) स्थानीय और मोहल्ले की दवा दुकानें।
  • निजी थोक दवा वितरण और सप्लाई चेन नेटवर्क।
  • मार्केट और क्लीनिकों के पास स्थित प्राइवेट फार्मेसी काउंटर्स।

क्या खुला रहेगा?

  • अस्पतालों की फार्मेसी जिसमें सरकारी और निजी अस्पतालों से संबद्ध सभी मेडिकल स्टोर खुले रहेंगे।
  • आपातकालीन सेवाएँ खुली रहेंगी, जिसमें आपातकालीन जीवन रक्षक दवाइयों की काउंटर बिक्री चालू रहेगी।
  • सरकारी जन औषधि केंद्र भी खुले रहेंगे। देश भर में सक्रिय 18,600 से अधिक प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र (JAK) और अमृत (AMRIT) फार्मेसी स्टोर पूरी तरह चालू रहेंगे।
  • 24/7 चलने वाले मेडिकल स्टोर भी खुले रहेंगे। ऐसे स्टोर अधिकतर बड़े शहरों में मौजूद हैं।
  • ई-फार्मेसी ऐप्स वाली ऑनलाइन दवा कंपनियों ने बंद का कोई आधिकारिक ऐलान नहीं किया है, इसलिए वे काम करती रहेंगी (हालाँकि स्थानीय डिलीवरी में कुछ देरी हो सकती है)।

किन राज्यों में हड़ताल का असर नहीं होगा?

केंद्रीय दवा नियामक (CDSCO) के अनुसार, कम से कम 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के रिटेल संगठनों ने लिखित आश्वासन देकर खुद को इस हड़ताल से अलग कर लिया है। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, केरल, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, सिक्किम और लद्दाख शामिल हैं। इन राज्यों के संगठनों का कहना है कि वे मानवीय आधार पर और मरीजों की सेवा को ध्यान में रखते हुए अपनी दुकानें खुली रखेंगे।

इस हड़ताल से क्या नुकसान हो सकते हैं?

एक दिन की भी आंशिक केमिस्ट हड़ताल से देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में गंभीर रुकावटें पैदा हो सकती हैं, जिसमें-

  • क्रोनिक मरीजों के लिए संकट: मधुमेह (Diabetes), उच्च रक्तचाप (Blood Pressure), थायराइड, हृदय रोग और अस्थमा जैसी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को यदि समय पर दवा न मिले, तो उनकी स्थिति गंभीर हो सकती है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में परेशानी: बड़े शहरों में तो अस्पतालों और सरकारी केंद्रों के विकल्प मौजूद हैं, लेकिन सुदूर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जहाँ एकमात्र सहारा निजी केमिस्ट की दुकान होती है, वहां मरीजों को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।
  • सप्लाई चेन में रुकावट: थोक वितरकों (Wholesalers) के बंद होने से अस्पतालों में भी दवाओं की दैनिक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे आपातकालीन ऑपरेशनों और गंभीर मरीजों के इलाज में देरी हो सकती है।

सरकार का रुख और समाधान की दिशा

अधिकारियों के अनुसार, AIOCD के प्रतिनिधियों ने हाल ही में राष्ट्रीय दवा नियामक और स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की थी। सरकार ने केमिस्टों को स्पष्ट आश्वासन दिया है कि उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों की सक्रिय रूप से समीक्षा की जा रही है।

ऑनलाइन फार्मेसी और पारंपरिक खुदरा विक्रेताओं दोनों के हितों को संतुलित करने के लिए नियमों (Drugs and Cosmetics Act) में आवश्यक संशोधनों पर विचार किया जा रहा है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि किसी भी नीतिगत बदलाव की प्रक्रिया के दौरान आम नागरिकों और मरीजों के स्वास्थ्य तथा दवाओं की उपलब्धता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

बहरहाल, यह केमिस्ट हड़ताल भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के बदलते डिजिटल परिदृश्य का एक बड़ा संकेत है। जहाँ तकनीक और ऑनलाइन सुविधाएं उपभोक्ताओं को घर बैठे दवाइयाँ दे रही हैं, वहीं देश के लाखों पारंपरिक छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा मानकों को बनाए रखना भी उतना ही अनिवार्य है।

इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान केवल एक संतुलित और सख्त नियामक नीति (Strict Regulatory Framework) के माध्यम से ही संभव है, जहाँ ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यम पूरी पारदर्शिता और जिम्मेदारी के साथ काम कर सकें।

कौन है PM मोदी को टोकने वाली नॉर्वे की पत्रकार Helle Lyng जो खा रही फालतू का फुटेज, चीन-राणा अयूब-The Hindu से क्या है कनेक्शन: अब माँग रही राहुल गाँधी से इंटरव्यू

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान सोमवार (18 मई 2026) को एक नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग (Helle Lyng) सोशल मीडिया पर अचानक चर्चा में आ गईं। उन्होंने दावा किया कि पीएम मोदी ने भारत में ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ से जुड़े सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया।

हेले लिंग नॉर्वे के अपेक्षाकृत कम चर्चित मीडिया संस्थान डैग्सविसन (Dagsavisen) से जुड़ी हैं। दिलचस्प बात यह रही कि घटना से पहले उनके X अकाउंट पर करीब 800 फॉलोअर्स थे और अप्रैल 2024 के बाद से उनका अकाउंट लगभग निष्क्रिय था।

(फोटो साभार: X)

पोस्ट करने के कुछ ही घंटों में उनके फॉलोअर्स 14 हजार से ज्यादा हो गए और भारतीय विपक्षी तथा लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम ने उन्हें सोशल मीडिया पर हाथों हाथ लेना शुरू कर दिया। जिस मीडिया संस्थान से हेले लिंग जुड़ी हैं, उसका X अकाउंट भी 22 जनवरी के बाद से एक्टिव नहीं था, वह अचानक एक्टिव हो गया। फेसबुक पर भी इस वीडियो को पोस्ट किया गया।

डैग्सविसन ने भारत को लेकर एक रिपोर्ट भी प्रकाशित किया था, जिसमें कहा गया कि भारत भले ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हो, लेकिन उसकी लोकतांत्रिक स्थिति ‘कमजोर’ हो रही है।

करीब 50 साल पुरानी इस मीडिया संस्थान ने अपने अखबार में पीएम मोदी के नॉर्वे दौरे पर केनेथ लिया सोलबर्ग (Kenneth Lia Solberg) की रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट की शुरुआत भारत की आर्थिक प्रगति को बताते हुए होती है, लेकिन धीरे- धीरे उसका रुख भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की खामियाँ गिनाने और मोदी सरकार की आलोचना की तरफ मुड़ जाता है।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है, लेकिन लोकतंत्र कमजोर हुआ है। V-डेम लिबरल डेमोक्रेसी इंडेक्स का हवाला देते हुए कहा गया कि भारत का ‘लोकतंत्र’ 1950 के बाद सबसे निचले पायदान पर पहुँच गया है। रिपोर्ट में बीजेपी के राजनीतिक प्रभाव और ‘हिंदुत्व ‘ की आलोचना की गई है और हिंदू राष्ट्रवाद को ‘डरावना’ बताया गया।

(साभार: Dagsavisen)

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि भारत के मुसलमानों के साथ भेदभाव बढ़ा है। यह वही नैरेटिव है जिसे 2014 में पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद कई अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय भारत-विरोधी समूह लगातार आगे बढ़ाते रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नॉर्वे को भारत के साथ व्यापारिक समझौते करते समय इन मुद्दों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, चाहे इससे दोनों देशों को आर्थिक फायदा ही क्यों न हो।

(साभार: Dagsavisen)

केनेथ सोलबर्ग की रिपोर्ट और हेले लिंग के सवालों की भाषा और विषय लगभग एक जैसे दिखाई दिए। उल्लेखनीय बात यह भी रही कि जिस कार्यक्रम में यह घटना हुई, वह कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं बल्कि दोनों प्रधानमंत्रियों का संयुक्त बयान था। वहाँ सवाल-जवाब का कार्यक्रम तय नहीं था। बाद में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की अलग प्रेस ब्रीफिंग आयोजित की गई थी।

जब पीएम मोदी बयान देकर मंच से नीचे उतर रहे थे, तभी हेले लिंग ने जोर से पूछा, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों का जवाब क्यों नहीं देते?” पीएम मोदी बिना प्रतिक्रिया दिए अपने नॉर्वेजियन समकक्ष के साथ आगे बढ़ गए। ठीक यही दृश्य हेले लिंग चाहती थीं।

बाद में उन्होंने कहा, “भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया। मुझे इसकी उम्मीद भी नहीं थी।”

इसके बाद सोशल मीडिया पर उन्हें भारतीय लेफ्ट-लिबरल समूहों की ओर से ‘नई हीरो’ की तरह पेश किया जाने लगा। जब उनके X अकाउंट की फॉलोइंग लिस्ट देखी गई तो उसमें द वायर, द वायर की पत्रकार शिवांगी देशवाल, खुद को पत्रकार बताने वाला राणा अय्यूब और अमेरिका स्थित विवादित एंटी-इंडिया पत्रकार लॉरा लूमर (Laura Loomer) जैसे नाम दिखाई दिए।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने भी यह वीडियो साझा किया। उन्होंने लिखा, “जब छिपाने के लिए कुछ नहीं होता तो डरने की जरूरत नहीं होती। दुनिया जब एक घबराए हुए प्रधानमंत्री को सवालों से भागते देखती है, तो सोचा है कभी कि भारत की छवि पर क्या असर पड़ता है?”

(साभार: X)

राहुल गाँधी के कमेंट के बाद हेले लिंग ने उन्हें इंटरव्यू के लिए अप्रोच किया। उन्होंने लिखा कि क्या आप फोन पर इंटरव्यू देने के लिए मंगलवार को उपलब्ध होंगे। ये जानना दिलचस्प है कि आप नॉर्वे दौरे को लेकर क्या सोचते हैं?

एक्स पर राहुल गाँधी के कमेंट के बाद हेले लिंग ने उन्हें इंटरव्यू के लिए अप्रोच किया। उन्होंने लिखा कि क्या आप फोन पर इंटरव्यू देने के लिए मंगलवार को उपलब्ध होंगे। ये जानना दिलचस्प है कि आप नॉर्वे दौरे को लेकर क्या सोचते हैं।

लिंग नॉर्वे की एक छोटे से मीडिया हाउस से जुड़ी थी। पीएम मोदी पर प्रोपेगेंडा फैलाने से पहले उसे भारत में कोई नहीं जानता था। एक्स पर उसकी आखिरी पोस्ट 10 अप्रैल 2024 की थी। पिछले 2 साल से वह एक्टिव भी नहीं थी। उसके पास ब्लू टिक भी नहीं था और फॉलोअर्स 1000 से कम थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान इन्होंने अचानक पैसे देकर blue tick लिया और एक्टिव हुईं।

इसके बाद इन्होंने प्रोटोकॉल तोड़कर हमारे प्रधानमंत्री को टारगेट किया। इसके तुरंत बाद भारत के विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने इन्हें सोशल मीडिया पर सपोर्ट किया। देखते ही देखते उसे लेफ्ट लिबरल गैंग का समर्थन भी मिल गया।

विडंबना यह रही कि यही राहुल गाँधी असहज सवाल पूछने वाले पत्रकारों को अक्सर ‘बीजेपी प्लांटेड पत्रकार’ कहकर खारिज करते रहे हैं। 2024 में उन्होंने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान एक असहज सवाल पूछने पर एक पत्रकार की पिटाई करा कर हत्या करवा दी थी ।

राहुल गाँधी के अलावा कई विपक्षी नेताओं, प्रचारक, यूट्यूबर्स तथाकथित इतिहासकारों और फेक न्यूज फैलाने वाले सोशल मीडिया हैंडल्स ने भी हेले लिंग का समर्थन किया। राणा अय्यूब ने लिखा, “नॉर्वे दौरे पर भारतीय लोकतंत्र की असल तस्वीर दिखी।”

TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि नॉर्वे की मीडिया ने वह दिखाया जो ‘गोदी मीडिया’ नहीं दिखा सकती।

(साभार: X)

TMC सांसद सागरिका घोष ने पीएम मोदी का मजाक उड़ाते हुए लिखा, “नो क्वेश्चन प्लीज, हम विश्वगुरु हैं।”

(साभार: X)

राजू पारुलेकर ने कहा कि यह भारत के लिए शर्मनाक बात है कि उसका प्रधानमंत्री दुनिया के सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल नहीं ले सकता।

(साभार: X)

प्रोपेगैंडाबाज यूट्यूबर अर्पित शर्मा ने इसे भारत के लिए शर्मनाक बताया और कहा कि पीएम मोदी अंतरराष्ट्रीय मीडिया को जवाब भी नहीं दे सकते।

(साभार: X)

फर्जी इतिहासकार डॉ रुचिका शर्मा ने दावा किया कि पीएम मोदी ‘स्वतंत्र प्रेस से एलर्जी’ रखते हैं और जब पत्रकार ने सवाल पूछा तो उन्होंने अपनी गति तेज कर दी।

(साभार: X)

कॉन्ग्रेस नेता श्रीनिवास बीवी ने प्रधानमंत्री मोदी का मजाक उड़ाते लिखा, “अरे बाबू भाग क्यों रहे हो, पूरे विश्व के सामने थू-थू करा दी।”

(साभार: X)

यूट्यूबर ध्रुव राठी बनकर फर्जी खबरें फैलाने वाले एक व्यक्ति ने इसे मोदी के लिए ‘अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती’ बताया।

(साभार: X)

खुद को फैक्ट चेकर बताने वाले प्रोपेगैंडाबाज और ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने इस घटना का मजाक उड़ाते हुए कहा कि ANI हर जगह मौजूद नहीं रहेगा।

(साभार: X)

जब हमने मूक रैक पर लिंग द्वारा लिखे गए लेखों की जाँच की, तो पाया कि जनवरी 2025 से उन्होंने अपने लेखों में भारत का जिक्र केवल एक बार किया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत को टैरिफ बढ़ाने की धमकी दी थी। ट्रम्प के प्रति घृणा उनकी रिपोर्टों में स्पष्ट रूप से झलकती है, वहीं चीन के प्रति उनके मन में नरमी दिखाई देती है। यह स्पष्ट है कि उनकी कवरेज कभी भी भारत के बारे में नहीं रही है।

(साभार: Muck rack)

‘द हिंदू’ के साथ कथित तालमेल पर सवाल

घटना के दौरान एक और दिलचस्प बात सामने आई। जब हेले लिंग पीएम मोदी से सवाल पूछ रही थीं, उसी समय द हिंदू की पत्रकार सुहासिनी हैदर नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर से सवाल कर रही थीं। बाद में सुहासिनी ने लिंग का वीडियो शेयर किया और लिंग ने भी सुहासिनी का वीडियो साझा किया। इसके बाद सोशल मीडिया पर दोनों के बीच संभावित समन्वय को लेकर सवाल उठने लगे।

भारत पर अचानक फोकस और समय को लेकर सवाल

लिंग और उनके मीडिया संस्थान की पुरानी रिपोर्ट्स देखने पर पता चलता है कि भारत उनके कवरेज के केन्द्र में कभी नहीं रहा। कुछ सामान्य खबरें जरूर थीं, जैसे भूकंप, ट्रंप के टैरिफ या अन्य वैश्विक घटनाएँ, लेकिन भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था या आंतरिक राजनीति पर गहरी विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग लगभग नहीं दिखी।

ऐसे में पीएम मोदी के दौरे के दौरान अचानक भारत के लोकतंत्र और प्रेस स्वतंत्रता को लेकर उनका आक्रामक रुख कई सवाल खड़े करता है। पूरे घटनाक्रम को देखकर यह आशंका जताई गई कि यह एक योजनाबद्ध प्रयास हो सकता है, जिसका उद्देश्य विदेशी धरती पर पीएम मोदी और भारत की छवि को नुकसान पहुँचाना था।

संयुक्त बयान के बाद पीएम मोदी के बिना जवाब दिए आगे बढ़ जाने को ‘प्रेस स्वतंत्रता’ का मुद्दा बनाकर वायरल करने की कोशिश भी इसी दिशा में देखी गई। एक और रोचक तथ्य यह रहा कि हेले लिंग के X प्रोफाइल पर मई 2026 से वेरिफिकेशन दिख रहा था यानी उन्होंने हाल ही में X प्रीमियम लिया था।

(साभार: X)

आमतौर पर वेरिफाइड अकाउंट्स को सोशल मीडिया पर ज्यादा दृश्यता मिलती है। ऐसे में उनका नया वेरिफिकेशन, अचानक वायरल होना और भारतीय लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम द्वारा बड़े स्तर पर प्रमोशन इन सबने संबंध हो सकता है।

जब MEA ने हेले लिंग को दिया जवाब

नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास ने लिंग के हवाले से बताया कि उसी दिन बाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की जानी थी। दूतावास ने लिखा, “प्रधानमंत्री की यात्रा के संबंध में आज शाम 9:30 बजे रेडिसन ब्लू प्लाज़ा होटल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की जा रही है। आप सभी का स्वागत है, आप वहाँ आकर अपने प्रश्न पूछ सकते हैं।” लिंग उस प्रेस ब्रीफिंग में पहुँचीं और वहाँ भी उन्होंने माहौल को टकरावपूर्ण बनाने की कोशिश की।

(साभार: X)

उन्होंने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से पूछा कि नॉर्वे भारत के साथ साझेदारी बढ़ाते समय भारत पर भरोसा क्यों करे। इसके साथ ही उन्होंने मानवाधिकार उल्लंघन और पीएम मोदी द्वारा ‘आलोचनात्मक सवाल’ न लेने का मुद्दा भी जोड़ा।

लेकिन इस बार विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज (Sibi George) ने बेहद शांत लेकिन सख्त तरीके से जवाब दिया। जब लिंग ने बीच में टोका और कहा कि वह सीधा जवाब चाहती हैं, तब जॉर्ज  ने कहा, “आपने सवाल पूछा है, मुझे उसका जवाब देने दीजिए।” लगातार बाधा डालने पर उन्होंने दोबारा कहा, “कृपया बीच में मत बोलिए। यह मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस है।”

जॉर्ज ने भारत की सभ्यतागत विरासत और मानवता के प्रति उसके योगदान का हवाला देते हुए, उनके पहले प्रश्न का उत्तर दिया कि दुनिया को भारत पर भरोसा क्यों करना चाहिए। उन्होंने कहा, “हमें गर्व है कि हम 5000 साल पुरानी सभ्यता वाला देश हैं। हमारी सभ्यता निरंतर विकसित हुई है। हमने दुनिया में बहुत बड़ा योगदान दिया है।”

उन्होंने आगे कहा कि शून्य, शतरंज और योग जैसी अवधारणाओं की उत्पत्ति भारत में हुई है। जब लिंग ने दोबारा उन्हें अपने पसंदीदा प्रारूप में जवाब देने के लिए मजबूर करने की कोशिश की, तो जॉर्ज ने अपना संयम खोए बिना इसका विरोध किया। उन्होंने कहा, “कब जवाब देना है, कहाँ जवाब देना है, कैसे जवाब देना है, ये मेरे अधिकार हैं। आपने सवाल पूछा है। मुझसे किसी खास तरीके से जवाब देने के लिए मत कहिए। मुझे जवाब देने दीजिए।”

इसके बाद उन्होंने कोविड के दौरान भारत के आचरण का हवाला देते हुए कहा कि भारत ‘गुफा में नहीं छिपा’, बल्कि दुनिया की मदद के लिए आगे आया। उन्होंने कहा, “हमने 100 से अधिक देशों को टीके उपलब्ध कराए। इससे भरोसा बढ़ता है। हमने 150 देशों को दवाइयाँ उपलब्ध कराईं। इससे भरोसा बढ़ता है।”

जॉर्ज ने G20 की अध्यक्षता के दौरान भारत की भूमिका का भी उल्लेख किया और बताया कि भारत ने एक विभाजित विश्व को एकजुट किया और दिल्ली घोषणापत्र को सुनिश्चित किया। उन्होंने वैश्विक दक्षिण के मुद्दों को मुख्य मंच पर लाने और अफ्रीकी संघ को जी20 के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करने के भारत के प्रयासों की भी चर्चा की।

उन्होंने कहा, “इससे विश्वास का माहौल बना क्योंकि हम पूरे अफ्रीकी महाद्वीप की आकांक्षाओं और चुनौतियों को, जिन्हें नजरअंदाज किया जा रहा था, G20 के मुख्य मंच पर लाने में सफल रहे।” मानवाधिकार और लोकतंत्र पर बोलते हुए जॉर्ज ने कहा कि भारत एक ऐसे संविधान पर आधारित है जो अपने नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की गारंटी देता है।

उन्होंने कहा, “भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।” उन्होंने बताया कि पिछले आम चुनावों में लगभग एक अरब लोगों ने भाग लिया था। उन्होंने कहा कि भारत के प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकार प्राप्त हैं और उन अधिकारों का उल्लंघन होने पर न्यायालयों में जाने का अधिकार है।

चुनिंदा रिपोर्टों के आधार पर भारत के बारे में राय बनाने वालों पर कटाक्ष करते हुए जॉर्ज ने कहा कि बहुत से लोगों को भारत की ‘विभिन्नता में एकता’ की समझ नहीं है। उन्होंने कहा, “लोग कुछ अज्ञानी गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रकाशित एक-दो समाचार रिपोर्ट पढ़ते हैं और फिर आकर सवाल पूछते हैं। चिंता न करें। हमें लोकतंत्र पर गर्व है।”

जब तक जॉर्ज भारत के संवैधानिक ढाँचे और लोकतांत्रिक परंपराओं पर बात करने लगे, तब तक लिंग कथित तौर पर कमरे से जा चुकी थीं। अंततः भारतीय अधिकारियों को परेशान करने का उनका प्रयास विदेश मंत्रालय के सचिव के विस्तृत, दृढ़ और स्पष्ट जवाब के साथ समाप्त हुआ, जिन्होंने यह साफ कर दिया कि भारत किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रही प्रश्न को पत्रकारिता के नाम पर पेश किए जाने की अनुमति नहीं देगा।

भारत-विरोधी तमाशा रचने की कोशिश

यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि कैसे एक सामान्य राजनयिक यात्रा को एक पत्रकार द्वारा मनगढ़ंत विवाद में बदल दिया गया, जिसका हालिया काम भारत पर शायद ही कोई गंभीर ध्यान केंद्रित करता था। लिंग को प्रश्न पूछने का अवसर देने से इनकार नहीं किया गया था। उन्हें भारतीय दूतावास द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रेस ब्रीफिंग में आमंत्रित किया गया था, जहाँ उन्हें अपने मनचाहे प्रश्न पूछने का अवसर मिला।

हालाँकि उत्तरों पर गंभीरता से विचार करने के बजाय, उन्होंने बार-बार भारतीय अधिकारियों को बाधित किया और उन्हें यह बताने की कोशिश की कि उन्हें कैसे जवाब देना चाहिए। इसके बाद जो कुछ हुआ, उससे वायरल आक्रोश की खोखली सच्चाई सामने आ गई। प्रधानमंत्री मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं हटे थे।

वे एक संयुक्त बयान के बाद चले गए थे, जहाँ प्रश्नोत्तर सत्र निर्धारित नहीं था। वास्तविक प्रेस वार्ता बाद में हुई और विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज ने भारत की लोकतांत्रिक संरचना और संवैधानिक गारंटी से लेकर कोविड काल में इसकी वैश्विक भूमिका, जी20, ग्लोबल साउथ के साथ संपर्क और अफ्रीकी संघ के समर्थन तक, सभी सवालों के विस्तृत जवाब दिए।

फिर भी भारतीय वामपंथी उदारवादी तंत्र ने इस सुनियोजित अवसर का फायदा उठाकर प्रधानमंत्री मोदी और भारत पर हमला किया। लिंग की लोकप्रियता में अचानक उछाल, हाल ही में उनका एक्स-रे सत्यापन, उनके प्रकाशन का भारत-विरोधी स्वरूप और कॉन्ग्रेस नेताओं, TMC सांसदों, प्रचारकों और फर्जी समाचार फैलाने वालों द्वारा इसका तुरंत प्रचार-प्रसार यह दर्शाता है कि यह पत्रकारिता से कहीं अधिक विदेशी धरती पर भारत-विरोधी तमाशा रचने की कोशिश थी।

मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

घर में रहने की जगह नहीं तो जनसंख्या कंट्रोल करो: यूँ ही नहीं CM योगी ने कही यह बात, यदि इसी रफ्तार से बढ़ते रहे तो 2050 तक भारत में होंगे सबसे अधिक मुस्लिम

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुस्लिमों को सड़क पर नमाज नहीं पढ़ने की सलाह दी है। सोमवार (18 मई 2026) को एक कार्यक्रम के दौरान सीएम योगी ने कहा कि सड़क लोगों के चलने के लिए है और इसे तमाशा नहीं बनने देंगे। इसी दौरान सीएम योगी ने मुस्लिम आबादी को लेकर भी चिंता जताई और मुस्लिमों को आबादी कम करने की नसीहत दी।

सीएम आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में कहा, “लोग मुझसे पूछते हैं साहब आपके यहाँ यूपी में क्या सड़कों पर सचमुच नमाज नहीं होती? मैं कहता हूँ कतई नहीं होती है। आप जाकर देख लो नहीं होती है। सड़कें चलने के लिए हैं या कोई भी व्यक्ति आकर के चौराहे पर आकर तमाशा बना देगा। क्या अधिकार है उसको सड़क रोकने का? आवागमन बाधित करने का कौन सा अधिकार है? जहाँ उसका स्थल होगा वहाँ जाकर करें।”

उन्होंने कहा, “उन लोगों ने मुझसे कहा साहब कैसे होगा? हमारी संख्या ज्यादा है। हमने कहा शिफ्ट में कर लो। तुम्हारे घर में रहने की जगह नहीं है तो भाई संख्या नियंत्रित कर लो। और नहीं है सामर्थ्य, तो क्यों बेकार आगे संख्या बढ़ाई जा रही है और ये चाहिए आपको कि अगर आपको सिस्टम के साथ रहना है तो याद करना हम उन नियम और कानून को मानना शुरू करें।”

मुस्लिम आबादी को लेकर सीएम योगी की ओर से दिया गया ये बयान भले ही आपको आक्रामक लगे। लेकिन असल में ये एक फैक्ट है जिसका मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है और कई रिसर्च भी इसको लेकर चिंता जाहिर करती रही हैं।

लगातार बढ़ती रही है मुस्लिमों की आबादी

भारत में 1951, 1971, 1991 और 2011 में जनगणनाएँ हुईं हैं। शुरू से ही जनगणनाओं में धर्म के आधार पर भी डेटा लिए जाते रहे हैं। 1951 की जनगणना में हिंदू आबादी 84 प्रतिशत थी, जबकि मुस्लिम आबादी 9.8 प्रतिशत थी। 1971 तक हिंदू आबादी घटकर 82 प्रतिशत रह गई और मुस्लिम आबादी बढ़कर 11 प्रतिशत हो गई। 1991 में हिंदू आबादी एक फीसदी और घटकर 81 प्रतिशत रह गई और मुस्लिम आबादी बढ़कर 12.2 प्रतिशत हो गई। वहीं, 2011 तक हिंदू आबादी और घटकर 79 प्रतिशत रह गई, जबकि मुस्लिम आबादी 14.2 प्रतिशत तक पहुँच गई।

यानी मुस्लिम आबादी में 24.6 प्रतिशत का इजाफा हुआ है, जबकि हिंदू आबादी में 4.5 प्रतिशत की कमी आई है। वहीं पाकिस्तान में 1951 में हिंदू आबादी 13 प्रतिशत थी जो अब केवल 1.73 प्रतिशत रह गई है। यही हाल बांग्लादेश में भी है जो 22 फीसदी से घटकर 7 प्रतिशत पर रह गई है।

अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट भी चौंकाने वाली

अंतरराष्ट्रीय संस्था प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट भी यह बताती है कि भारत में मुस्लिम आबादी आने वाले दशकों में बढ़ेगी। इसके पीछे संस्था ने मुख्य रूप से कम उम्र की आबादी और ज्यादा प्रजनन दर को कारण माना है।

प्यू रिसर्च के मुताबिक भारत 2050 तक दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश बन सकता है। जहां करीब 31 करोड़ मुसलमान होंगे। जो वैश्विक मुस्लिम आबादी का करीब 11 प्रतिशत होगा। भारत में रिपोर्ट में मुस्लिम महिलाओं की औसत प्रजनन दर हिंदू महिलाओं की तुलना में अधिक बताई गई है।

वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ रही मुस्लिम आबादी

प्यू रिसर्च की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार इस्लाम दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला धर्म है। 2015 में दुनिया में मुस्लिम आबादी करीब 1.8 अरब थी, जो 2060 तक 3 अरब के पार पहुँच सकती है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उच्च प्रजनन दर है।

अध्ययन के अनुसार मुस्लिम महिलाओं की वैश्विक प्रजनन दर 3.1 है, जो प्रमुख धार्मिक समूहों में सबसे ज्यादा है। यही वजह है कि आने वाले दशकों में मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर बाकी धर्मों से अधिक रहने का अनुमान है।

सीएम योगी के बयान के मायने समझिए

दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश भारत है। वहीं, राज्य स्तर पर देखें तो उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा आबादी है। संसाधन, सुविधाओं और तमाम बुनियादी जरूरतों के लिए जनसंख्या नियंत्रण जरूरी है। सरकारें इसको लेकर तमाम तरह के कार्यक्रम चलाती रहती हैं।

सोशल मीडिया पर बढ़ रहे ‘तिलचट्टे’, AAP का पुराना लबड़ा है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ शुरू करने वाला: जानिए सटायर की आड़ लेकर कैसे फैलाया जा रहा प्रोपेगेंडा

कॉकरोच जनता पार्टी… नाम सुनने में भले ही मजाक लगे, लेकिन सोशल मीडिया की दुनिया में यह अब एक ऐसा डिजिटल समूह बन चुका है, जो खुद को ‘बेरोजगार’ और ‘आलसी’ युवाओं की आवाज बताता है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की बेरोजगार युवाओं, वकीलों, पत्रकारों और RTI एक्टिविस्ट पर की गई टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर जो गुस्सा उभरा, उसी माहौल में इस तथाकथित ‘पार्टी’ का जन्म हुआ। शुरुआत मीम और व्यंग्य (सटायर) से हुई, लेकिन देखते ही देखते इसे राजनीतिक एटेंशन मिलने लगी।

फोटो साभार: cockroachjantaparty.org

दिलचस्प बात यह है कि यह कोई आधिकारिक राजनीतिक पार्टी नहीं है। न इसका कोई चुनाव आयोग में पंजीकरण है और न ही कोई औपचारिक संगठनात्मक ढाँचा। इसके बावजूद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इसके तिलचट्टे (फॉलोवर्स) तेजी से बढ़ रहे हैं। पार्टी से जुड़ने वाले लोगों की संख्या 50 हजार तक पहुँच गई।

पहली नजर में इसे युवाओं के गुस्से और सिस्टम से नाराजगी की आवाज की तरह दिखाया गया है, लेकिन थोड़ा गौर करें तो मामला सिर्फ मजाक या मीम तक सीमित नहीं दिखता। सवाल यह है कि क्या यह सच में युवाओं की समस्याओं को उठाने वाला मंच है या फिर इंटरनेट पर बैठे नाराज युवाओं को लगातार सिस्टम के खिलाफ भड़काने का नया तरीका। सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी पोस्ट, मीम्स और तंज के जरिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जहाँ हर चीज के लिए सिर्फ सिस्टम को जिम्मेदार बताया जाता है।

कैसे बनी कॉकरोच जनता पार्टी?

कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत किसी राजनीतिक विचारधारा से नहीं, बल्कि इंटरनेट पर उभरे गुस्से, व्यंग्य और नाराजगी से हुई। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की उस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर अचानक बहस छिड़ गई, जिसमें बेरोजगार युवाओं, वकीलों, पत्रकारों और RTI एक्टिविस्ट्स को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि सिस्टम पर कुछ ‘परजीवी’ हमला कर रहे हैं। उन्होंने इसे युवाओं से जोड़ते हुए कहा, “कुछ युवा कॉकरोच जैसे हैं। इन्हें कोई नौकरी नहीं मिलती और पेशे में भी इनकी कोई जगह नहीं होती। इनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया बन जाते हैं, कुछ RTI एक्टिविस्ट बन जाते हैं, कुछ दूसरे तरह के एक्टिविस्ट बन जाते हैं। और फिर ये सब पर हमला करने लगते हैं।”

देखते ही देखते CJI की इस टिप्पणी पर एक्स, Reddit और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर मीम्स, पोस्ट और कटाक्ष वायरल होने लगे। इसी डिजिटल माहौल में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम सामने आया, जिसे शुरुआत में केवल एक ऑनलाइन मजाक और व्यंग्य माना गया।

लेकिन इंटरनेट पर पैदा होने वाले कई ट्रेंड्स की तरह यह भी धीरे-धीरे एक डिजिटल कम्युनिटी में बदलने लगा। पार्टी ने खुद को उन्हीं युवाओं की आवाज बताना शुरू किया, जिन्हें अक्सर ‘आलसी’, ‘बेरोजगार’ और ‘ज्यादा समय इंटरनेट पर बिताने वाला’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। यही वजह है कि इस पार्टी की एलिजिबिलिटी के लिए भी ‘आलसी’, ‘बेरोजगार’, ‘ज्यादा समय इंटरनेट पर बिताने वाला’ और ‘पेशेवर तरीके से भड़ास निकालने वाले’ जैसी कैटेगरी रखी गईं। ऐसे लोगों को ही पार्टी का ‘योग्य सदस्य’ माना गया।

फोटो साभार: cockroachjantaparty.org

पार्टी का बायो भी इसी नाराजगी और व्यंग्य की राजनीति को आगे बढ़ाता है। इसमें खुद को उन लोगों की पार्टी बताया गया है, जिन्हें सिस्टम ने गिनना ही छोड़ दिया। साथ ही दावा किया गया कि पार्टी की 5 माँगे हैं, कोई स्पॉन्सर नहीं है और यह एक ‘जिद्दी झुंड’ की तरह काम करेगी। पहली नजर में यह व्यवस्था के खिलाफ कटाक्ष जैसा लगता है, लेकिन यही भाषा युवाओं के भीतर ‘सिस्टम ने हमें छोड़ दिया’ वाला भाव मजबूत करती है।

इसका मिशन स्टेटमेंट भी सीधे भावनाओं पर चोट करता है। पार्टी कहती है कि वह उन युवाओं के लिए बनाई गई है, जिन्हें बार-बार आलसी, हर वक्त ऑनलाइन रहने वाला और अब ‘कॉकरोच’ तक कहा जा रहा है। पार्टी के मुताबिक यही उसका मिशन है और बाकी सब केवल व्यंग्य। यानी खुद को मजाक बताकर यह मंच उन युवाओं को जोड़ने की कोशिश करता है, जो पहले से व्यवस्था, नौकरी और राजनीति को लेकर निराश हैं।

फोटो साभार: cockroachjantaparty.org

वहीं पार्टी का विजन केवल नाराजगी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। इसमें कहा गया कि वे कोई नया फंड या टैक्सपेयर्स के पैसों पर विदेश यात्राएँ करने नहीं आए हैं, न ही भ्रष्टाचार को ‘रणनीतिक खर्च’ बताकर पेश करना चाहते हैं। उनका मकसद सिर्फ यह पूछना है कि जनता का पैसा आखिर गया कहाँ। इस तरह का नैरेटिव युवाओं के भीतर पहले से मौजूद असंतोष को और धार देता है।

कॉकरोच जनता पार्टी को मिलने लगा विरोधी पार्टियों का समर्थन

शुरुआत में जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सिर्फ इंटरनेट का मजाक और मीम कल्चर माना जा रहा था, वह धीरे-धीरे विपक्षी नेताओं और सरकार विरोधी चेहरों का ध्यान भी खींचने लगी। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस ट्रेंड को कई विपक्षी नेताओं ने खुलकर समर्थन देना शुरू किया। इससे पार्टी के युवाओं की आवाज बनने के दावे पर सवाल उठने लगे।

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की नेता महुआ मोइत्रा ने पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताई। उन्होंने लिखा, “वह भी कॉकरोच जनता पार्टी में शामिल होना चाहती हैं, वैसे ही जैसे वह पहले से एंटी नेशनल पार्टी की कार्ड होल्डर सदस्य हैं।” और इस न्योते को खुद को पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष बताने वाले अभिजीत दिपके ने स्वागत भी किया।

TMC नेता कीर्ति आजाद ने भी एक्स पर पोस्ट कर लिखा कि वह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जॉइन करना चाहते हैं और पूछा कि इसके लिए योग्यता क्या चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने भी इस ट्रेंड का समर्थन करते हुए कहा, “कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत CJI की टिप्पणी के बाद मजाक के तौर पर हुई थी, लेकिन केवल दो दिनों में इसे 55 हजार से ज्यादा लोगों का समर्थन मिल गया। यह दिखाता है कि लाखों युवा मौजूदा व्यवस्था और राजनीतिक दलों से परेशान हैं और कुछ नया चाहते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे युवाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए और उन्हें सही दिशा ले जाना चाहिए।”

इसी के साथ सोशल मीडिया पर सक्रिय तमाम वामपंथी और सरकार विरोधी लॉबी ने भी इस ट्रेंड को जमकर आगे बढ़ाया। मीम पेज, एक्टिविस्ट अकाउंट्स और राजनीतिक हैंडल लगातार इसे प्रमोट करते दिखाई दिए। यही वह मोड़ था, जहाँ एक तथाकथित ‘व्यंग्य पार्टी’ धीरे-धीरे साफ राजनीतिक रंग लेती नजर आने लगी।

सबसे दिलचस्प बात खुद पार्टी के संस्थापक माने जाने वाले अभिजीत दिपके के बयान में दिखी। उन्होंने कहा कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि कोई कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) समाजवादी पार्टी (SP), तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) या किसी और पार्टी से जुड़ा है, सिर्फ सपोर्ट की जरूरत है। यहाँ BJP का नाम गायब था।

यहीं से सवाल और गहरे हो जाते हैं। अगर यह मंच सच में सिर्फ युवाओं की आवाज होता, तो वह खुद को किसी खास राजनीतिक दिशा से दूर रखता। लेकिन जिस तरह विपक्षी नेताओं, एक्टिविस्ट्स और सरकार विरोधी तत्वों का समर्थन इसे लगातार मिलता गया, उससे यह धारणा मजबूत होने लगी कि कॉकरोच जनता पार्टी युवाओं की समस्याओं से ज्यादा, सरकार विरोधी नैरेटिव को मजबूत करने का नया डिजिटल हथियार के तौर पर सामने आ रही है।

कॉकरोच जनता पार्टी के घोषणा पत्र में विपक्षी पार्टी के प्रोपेगेंडा को हवा दी गई

कॉकरोच जनता पार्टी भले ही सोशल मीडिया पर एक ट्रेंड बन रहा है, लेकिन इसका घोषणा पत्र किसी आधिकारिक राजनीतिक पार्टी की तरह तैयार किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि इसके ज्यादातर मुद्दे सीधे सरकार, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया और बड़े उद्योगपतियों को निशाने पर लेते दिखाई देते हैं। ये वही मुद्दे हैं जो कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम और उसके सहयोगी आए दिन सरकार के विरोध में उठाते रहते हैं।

घोषणा पत्र में कहा गया है कि अगर कॉकरोच जनता पार्टी कभी सत्ता में आती है, तो किसी भी CJI को रिटायरमेंट के बाद ‘इनाम’ के तौर पर राज्यसभा सीट नहीं दी जाएगी। यानी न्यायपालिका और सरकार के मेल-जोल पर निराधार सीधे सवाल उठाए गए।

इसके बाद चुनाव आयोग को लेकर भी बेहद आक्रामक भाषा इस्तेमाल की गई। घोषणा पत्र में कहा गया कि अगर किसी ‘असली वोट’ को हटाया जाता है, चाहे वह कॉकरोच जनता पार्टी शासित राज्य हो या विपक्षी दलों का राज्य, तो मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) पर UAPA लगाया जाना चाहिए। यहाँ तह कहा गया कि लोगों के वोटिंग अधिकार छीनना ‘आतंकवाद से कम नहीं’ है। यह नैरेटिव पिछले कुछ महीनों से कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और दूसरे विपक्षी दलों द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसे मुद्दों पर लगाए जा रहे आरोपों से काफी मिलता-जुलता दिखाई देता है।

घोषणा पत्र में महिलाओं को संसद और कैबिनेट में 50 प्रतिशत आरक्षण देने की भी बात कही गई है, वह भी संसद की सीटें बढ़ाए बिना। इसे केंद्र सरकार के प्रस्तावित परिसीमन अभ्यास के खिलाफ नैरेटिव के तौर पर भी देखा जा रहा है।

सबसे बड़ा हमला मीडिया और बड़े उद्योगपतियों पर किया गया। घोषणा पत्र में कहा गया कि अंबानी और अडानी के स्वामित्व वाले मीडिया संगठनों के लाइसेंस रद्द कर दिए जाएँगे ताकि ‘वास्तव में स्वतंत्र मीडिया’ को जगह मिल सके। साथ ही तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ के एंकर्स के बैंक अकाउंट की भी जाँच कराने की बात कही गई है। यानी यह सीधे उस नैरेटिव को आगे बढ़ाता है, जिसमें बीजेपी सरकार पर बड़े कॉरपोरेट घरानों और मीडिया को नियंत्रित करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं।

इसके अलावा कहा गया कि जो विधायक और सांसद दल-बदल करते हैं उन्हें चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी जाएगी और साथ ही ऐसे सांसद और विधायक के पास 20 वर्षों तक कोई दफ्तर भी नहीं रहेगा।

कुल मिलाकर, ऊपर से मजाक और मीम्स जैसा दिखने वाला यह मंच अपने घोषणा पत्र में लगभग हर उस मुद्दे को उठाता दिखाई देता है, जिसे विपक्षी दल पिछले कुछ समय से सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करते रहे हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी के पीछे का चेहरा अभिजीत दिपके कौन है?

कॉकरोच जनता पार्टी को सोशल मीडिया पर युवाओं की आवाज बनकर पेश किया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे मौजूद चेहरा कोई सामान्य या राजनीति से दूर रहने वाला सोशल मीडिया यूजर नहीं है। इस पूरे डिजिटल कैंपेन के केंद्र में अभिजीत दिपके नाम का वह व्यक्ति है, जिसके तार सीधे आम आदमी पार्टी (AAP) की सोशल मीडिया और चुनावी रणनीतियों से जुड़े दिखाई देते हैं।

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) के रहने वाले अभिजीत दिपके ने बॉस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। लेकिन अभिजीत की पहचान सिर्फ एक पढ़े-लिखे सोशल मीडिया एक्टिविस्ट तक सीमित नहीं रही। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान आई कई मीडिया रिपोर्ट्स में दिपके का नाम उस टीम के हिस्से के तौर पर सामने आया था, जो AAP की सोशल मीडिया छवि को आक्रामक और वायरल अंदाज में तैयार कर रही थी।

उस समय उन्हें पुणे के 23 वर्षीय युवा के तौर पर बताया गया, जो AAP की सोशल मीडिया ट्रांसफॉर्मेशन के पीछे काम कर रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, AAP उस चुनाव में छोटे-छोटे वन लाइनर्स, पैरोडी वीडियो, मीम्स और शॉर्ट क्लिप्स के जरिए अरविंद केजरीवाल की छवि को मजबूत करने और बीजेपी-कॉन्ग्रेस पर हमला करने की रणनीति अपना रही थी।

अभिजीत दिपके खुद इन रिपोर्ट्स में यह समझाते दिखाई दिए थे कि मिलेनियल्स और पहली बार वोट देने वाले युवाओं तक राजनीतिक संदेश पहुँचाने के लिए मीम्स और वीडियो सबसे असरदार तरीका हैं। यानी जिस ‘मीम पॉलिटिक्स’ और इंटरनेट नैरेटिव को आज ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ इस्तेमाल करती दिख रही है, वही तरीका पहले AAP के चुनावी प्रचार में भी इस्तेमाल हो चुका है।

एक दूसरी रिपोर्ट में दिपके को मीडिया स्टडीज ग्रेजुएट बताया गया, जो AAP के कई वायरल मीम्स के पीछे थे। इन मीम्स में बॉलीवुड सीन, एडिटेड तस्वीरें और पॉप कल्चर का इस्तेमाल कर अरविंद केजरीवाल को सकारात्मक तरीके से पेश किया जाता था, जबकि विरोधियों को निशाने पर लाया जाता था।

अभिजीत दिपके का AAP से कनेक्शन

सिर्फ इतना ही नहीं, AAP के ‘वॉर रूम’ से जुड़ी रिपोर्ट्स में भी अभिजीत दिपके का नाम सामने आया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वह पार्टी के नेशनल सोशल मीडिया कोऑर्डिनेशन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। बताया गया कि AAP की सोशल मीडिया टीम अलग-अलग वॉर रूम्स से काम कर रही थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों के जवाब में तुरंत ऑनलाइन नैरेटिव तैयार करती थी।

इसी दौरान दिपके ने यह भी कहा था कि #DelhiwithKejriwal जैसे हैशटैग का मकसद केजरीवाल को ‘अपना बंदा’ और ‘हमारा आदमी’ की छवि में पेश करना था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि AAP की टीम व्हाट्सऐप और फेसबुक पर बहुत ज्यादा फोकस कर रही है और पार्टी के मॉडरेटर्स बीजेपी, कॉन्ग्रेस और दूसरे राजनीतिक हैंडल्स पर नजर रखते थे ताकि पार्टी जिसे ‘फेक न्यूज’ मानती है, उसका जवाब दिया जा सके।

AAP की 2020 की चुनावी रणनीति पर आई एक और रिपोर्ट में अभिजीत दिपके को पार्टी के ‘मीम और पैरोडी ऑफेंसिव’ का अहम चेहरा बताया गया था। यानी फिल्मों, विज्ञापनों और सोशल मीडिया ट्रेंड्स को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर ‘ब्रांड केजरीवाल’ को आगे बढ़ाने की रणनीति में वह प्रमुख भूमिका निभा रहे थे।

यही वजह है कि अब जब वही अभिजीत दिपके ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के पीछे का चेहरा दिखाई देते हैं, तो इसे केवल युवाओं की आवाज के लिए उभरी पार्टी मानना मुश्किल हो जाता है। जिस व्यक्ति का पूरा बैकग्राउंड सोशल मीडिया नैरेटिव, मीम कैंपेन और राजनीतिक डिजिटल प्रचार से जुड़ा रहा हो, उसके नेतृत्व में खड़ा हुआ यह ऑनलाइन कैंपेन अचानक पैदा हुआ मासूम ट्रेंड कम और एक सुनियोजित डिजिटल राजनीतिक कैंपेन ज्यादा नजर आने लगता है।

निष्कर्ष: ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से आखिर हासिल क्या?

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसी चीजें सोशल मीडिया पर पहली नजर में युवाओं की आवाज और सिस्टम के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत जैसी लगती हैं। मीम्स, तंज, वायरल पोस्ट और सरकार विरोधी कंटेंट देखकर कई युवाओं को लगता है कि वे किसी बड़े बदलाव का हिस्सा बन रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे यही चीजें उन्हें असली दुनिया से दूर ले जाने लगती हैं।

पूरा कैंपेन इंटरनेट के गुस्से पर चलता है, जहाँ हर समस्या का जिम्मेदार सिर्फ सिस्टम, सरकार, अदालत, मीडिया या संस्थाओं को बताया जाता है। लगातार ऐसे कंटेंट देखने के बाद कई युवा यह मानने लगते हैं कि इस देश में कुछ ठीक हो ही नहीं सकता। न राजनीति पर भरोसा बचता है, न कानूनी प्रक्रिया पर और न ही लोकतांत्रित संस्थाओं पर।

सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह के ऑनलाइन ट्रेंड युवाओं को गुस्सा तो देते हैं, लेकिन दिशा नहीं। घंटों सोशल मीडिया पर बहस, ट्रोलिंग और मीम शेयर करने के बाद भी जमीन पर उनकी जिंदगी में कुछ बदलता नहीं। नौकरी, करियर, स्किल या असली राजनीतिक भागीदारी की जगह उनकी दुनिया धीरे-धीरे सिर्फ इंटरनेट तक सिमटने लगती है।

यही वजह है कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को केवल मजाक मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। क्योंकि मीम्स और व्यंग्य के पीछे लगातार ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जहाँ युवाओं का भरोसा सिस्टम से टूटे और उनका गुस्सा हमेशा जिंदा रहे। इंटरनेट पर यह सब ‘कूल’ और ‘क्रांतिकारी’ जैसा दिख सकता है, लेकिन आखिर में ज्यादातर युवाओं के हाथ सिर्फ ऑनलाइन नाराजगी ही लगती है, कोई असली बदलाव नहीं।