बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के मुखिया मुहम्मद युनुस ने चीन यात्रा के दौरान भारत के सिलिगुड़ी चिकन नेक पर बयान दिया। उन्होंने कहा कि भारत के साथ पूर्वोत्तर राज्य लैंडलॉक्ड यानी जमीन से घिरे हैं ऐसे में चीन को बांग्लादेश में अपना आर्थिक प्रभाव अधिक बढ़ाना चाहिए।
इसके बाद क तुर्की इस्लामिक समूह ‘सल्तनत-ए-बांग्ला’ ने ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ नाम से एक नक्शा जारी किया। इसमें भारत के पूर्वोत्तर और पूर्वी हिस्सों को शामिल किया गया है।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के इस बयान और तथाकथित नक्शे से गुस्साए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बांग्लादेश को चेतावनी दी है। डेरगांव में प्रेस ब्रीफिंग में सीएम सरमा ने कहा कि हमारे पास एक चिकन एक है लेकिन बांग्लादेश के पास दो चिकन नेक्स हैं। अगर बांग्लादेश हमारे चिकन नेक पर हमला करता है तो हम बांग्लादेश के दोनों चिकन नेक्स पर हमला करेंगे।
सरमा ने आगे कहा कि बांग्लादेश का चिकन नेक मेघालय से सटा है और बांग्लादेश की चटगाँव बंदरगाह को जोड़ता है। यह भारत के चिकन नेक से भी पतला है और बस पत्थर फेंकने की दूरी पर स्थित है।
इस बीच एक रिपोर्ट ये भी आई कि चीन बांग्लादेश को सिलीगुड़ी के पास भारतीय सीमा के करीब लालमुनिरहाट में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बनाए गए एयरबेस को फिर से तैयार करने में मदद कर रहा है। वर्तमान में इस बंद पड़े एयरबेस पर बांग्लादेश की वायु सेना का नियंत्रण है। हालाँकि यह दशकों से बेकार पड़ा हुआ है।
14 बार जन्म ले तब बांग्लादेश कर पाएगा हमला
मुख्यमंत्री सरमा ने कहा, “कोई भी देश यह भ्रम न पाले कि वह भारत का चिकन नेक छीन सकता है। ऑपरेशन सिंदूर से भारत ने यह पहले ही साबित कर दिया है कि वह कितना मजबूती से खड़ा है। बांग्लादेश को भारत पर हमला करने से पहले 14 बार जन्म लेना होगा।”
इसके बाद बांग्लादेश में जारी किए गए तथाकथित ग्रेटर बांग्लादेश वाले मानचित्र पर सीएम हिमंत सरमा ने कहा कि बांग्लादेश एक ‘छोटा सा देश’ है। उसे पर इतना ध्यान देने की जरूरत नहीं है। लोग ऐसा नक्शा बना सकते हैं और छाप सकते हैं। हम भी बांग्लादेश को असम का हिस्सा दिखाने वाला नक्शा बना सकते हैं, लेकिन किसी के नक्शा बना देने भर से असलियत नहीं बदलती।
कौन से हैं बांग्लादेश के दो चिकन नेक
भारत के सिलीगुड़ी गलियारा को चिकन नेक नाम से भी जाना जाता है। लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा और 60 किलोमीटर लंबा ये वह रास्ता है जो पूरे पूर्वोत्तर को भारत से जोड़ता है। इसी तरह बांग्लादेश के पास भी दो चिकन नेक्स है।
बांग्लादेश का पहला चिकन नेक चटगाँव बंदरगाह से बांग्लादेश के अन्य हिस्सों को जोड़ता है। त्रिपुरा के पास स्थित यह चिकन नेक मिरसराय उपजिले में लगभग 40 किलोमीटर की भूमि है।
बांग्लादेश का दूसरा चिकन नेक रंगपुर डिवीजन के दक्षिणी कॉरिडोर है जो मेघालय के पास है। यह चिकन नेक दक्षिण पश्चिम गौराहिल्स से पश्चिम बंगाल में दक्षिण दिनाजपुर तक रंगपुर को बाकी हिस्सों से जोड़ता है और यह लगभग 90 किलोमीटर लंबा है।
बांग्लादेश को कैसे नुकसान पहुँचा सकती है उसी की चिकन नेक
दक्षिण त्रिपुरा के पास वाला बांग्लादेश का चिकन नेक काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर इसे बंद कर दिया जाए तो बांग्लादेश का लगभग 20% हिस्सा देश से कट जाएगा। दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि चटगाँव बांग्लादेश का सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह है।
बांग्लादेश के दो चिकन नेक्स (फोटो साभार- इंडिया टुडे)
चटगाँव शहर भी बांग्लादेश के लिए काफी जरूरी शहर है। हालाँकि जंगल और नदियों से भरा यह इलाका भारत के लिए एक मुसीबत ही है क्योंकि म्यांमार के घुसपैठियों, अवैध बांग्लादेशियों समेत अन्य उग्रवादियों के लिए बहुत ही उपयुक्त जगह रही है।
अब बात करते हैं बांग्लादेश के दूसरे चिकन नेक की। दूसरा चिकन नेक बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन में है। असल में यह बांग्लादेश का पूरा उत्तरी भू-भाग है जो लगभग 16,000 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा में फैला है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए रंगपुर काफी अहम है। रंगपुर में ही जूट, चीनी, चावल और तंबाकू की मिल और बड़ी-बड़ी कंपनियां मौजूद हैं।
अगर बांग्लादेश के इन दोनों चिकन नेक बांग्लादेश के साथ से निकल जाता है तो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी और उसका असल नक्शा ही पलट सकता है।
भारत ने जब से आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया है तब से पाकिस्तान बौखला गया है। हर रोज भारत के खिलाफ एक नई चाल चलने की पाकिस्तान नाकाम कोशिशें कर रहा है।
इसके तहत सुरक्षा एजेंसियों के हवाले से सूचना मिली है कि करीब 37 पाकिस्तानी और बांग्लादेशी आतंकी इस समय नेपाल में मौजूद हैं और भारत में घुसपैठ करने की ताक में हैं। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बहराइच से बलरामपुर तक की नेपाल सीमा पर एसएसबी के 1500 अतिरिक्त जवानों को तैनात किया गया है। एसएसबी 42वीं वाहिनी ने सीमा क्षेत्र में दोहरी गश्त भी शुरू कर दी है। सुरक्षा के मद्देनजर वन क्षेत्र में अतिरिक्त चौकी भी बनाई गई है।
बलरामपुर के एएसपी योगेश कुमार का कहना है कि एसएसबी और पुलिस की संयुक्त टीम सीमा पर 24 घंटे नजर रख रही है। इसके अलावा ग्राम सुरक्षा समितियों को भी सक्रिय किया गया है। 42 वीं बटालियन के कमांडेंट गंगा सिंह उदावत का कहना है कि जिन 37 लोगों के बारे में सूचना मिली है, वो सभी बांग्लादेश से नेपाल पहुँच चुके हैं और सभी भारत और नेपाल की खुली सीमा का फायदा उठाते हुए भारत मे घुसने की कोशिश कर सकते हैं। इसलिए सीमा पर कड़े इंतजाम के साथ लगातार निगरानी रखी जा रही है।
37 लोगों में 10 बांग्लादेशी और 27 पाकिस्तानी बताए जा रहे हैं। सूचना के बाद सीमा पर 24 घंटे पेट्रोलिंग चल रही है ताकि कोई अवांछित नागरिक भारत में प्रवेश न कर सके। सभी के परिचय पत्र की भी चेकिंग की जा रही है। नेपाल से लगते उत्तर प्रदेश के महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, पीलीभीत व लखीमपुर खीरी में अलर्ट भी जारी कर दिया गया है।
इन लोगों के भारत में दाखिल होने की कोशिश करने का मकसद साफ है कि पाकिस्तान कोई बड़ी साजिश रच रहा है और फिर किसी नापाक हरकत को अंजाम देने की फिराक में है।
दिल्ली पुलिस और भारतीय जाँच एजेंसियों ने एक बड़े ऑपरेशन को अंजाम देते हुए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के दो जासूसों को गिरफ्तार किया है। इनमें से एक नेपाली मूल का अंसारुल मिया अंसारी है, जिसे दिल्ली के एक होटल से पकड़ा गया। यह ऑपरेशन जनवरी से मार्च 2025 तक चला, जिसमें खुफिया जानकारी के आधार पर अंसारुल को 15 फरवरी 2025 को हिरासत में लिया गया। उसके पास से भारतीय सशस्त्र बलों से जुड़े कई गोपनीय दस्तावेज बरामद हुए, जो वह पाकिस्तान भेजने की फिराक में था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अंसारुल 2008 से कतर में कैब ड्राइवर के रूप में काम कर रहा था। वहाँ उसकी मुलाकात एक ISI हैंडलर से हुई, जिसने उसे लालच और वैचारिक उकसावे के जरिए अपने जाल में फँसाया। जून 2024 में अंसारुल को पाकिस्तान के रावलपिंडी ले जाया गया, जहां ISI के वरिष्ठ अधिकारियों ने उसे जासूसी की ट्रेनिंग दी। उसे खास तौर पर भारतीय सेना से जुड़े गोपनीय दस्तावेज, तस्वीरें और जियोलोकेशन डेटा इकट्ठा करने का काम सौंपा गया। इसके बाद उसे नेपाल के रास्ते भारत भेजा गया, ताकि वह दिल्ली में आतंकी हमले की साजिश को अंजाम दे सके।
जाँच एजेंसियों को जनवरी 2025 में खुफिया सूचना मिली थी कि एक ISI जासूस नेपाल के रास्ते दिल्ली में घुसने वाला है। इसके आधार पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और केंद्रीय एजेंसियों ने मिलकर एक सीक्रेट ऑपरेशन शुरू किया। सूत्रों के मुताबिक, यह जासूसी कला का एक शानदार नमूना था, जिसमें भारतीय एजेंसियाँ हर कदम पर अंसारुल से आगे रहीं। जाँच में यह भी सामने आया कि दिल्ली में एक बड़े आतंकी हमले की साजिश रची जा रही थी, जिसमें सैन्य ठिकानों की गोपनीय जानकारी का इस्तेमाल होना था।
अंसारुल को भारत में मदद करने वाला राँची का रहने वाला अखलाक अजाम था, जिसे मार्च 2025 में गिरफ्तार किया गया। अखलाक ने अंसारुल को लॉजिस्टिक सपोर्ट और दस्तावेज इकट्ठा करने में मदद की। दोनों के मोबाइल फोन की जाँच में पाकिस्तानी हैंडलरों के साथ संदिग्ध बातचीत के सबूत मिले, जो एक बड़े षड्यंत्र की ओर इशारा करते हैं। दिल्ली पुलिस ने दोनों के खिलाफ आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official Secrets Act) के तहत मामला दर्ज किया और मई 2025 में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की।
अंसारुल और अखलाक को दिल्ली की तिहाड़ जेल के हाई-सिक्योरिटी वार्ड में रखा गया है। अधिकारियों ने उनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी है, ताकि वे जेल में अन्य कैदियों को प्रभावित न कर सकें। जाँच एजेंसियां अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश में जुटी हैं।
सुप्रीम कोर्ट में 20 मई 2025 से वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। यह कानून 1995 के वक्फ अधिनियम में बदलाव करता है, जो वक्फ संपत्तियों (इस्लामिक कानून के तहत धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए समर्पित संपत्तियों) के प्रबंधन से संबंधित है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभाव करता है और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता में दखल देता है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का दावा है कि यह संशोधन वक्फ प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने और निजी व सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण को खत्म करने के लिए लाया गया है। सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने याचिकाकर्ताओं, केंद्र सरकार और अन्य पक्षों के तर्क सुने।
सुनवाई के पहले दिन याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई दलील
सुप्रीम कोर्ट में मामले में पहले दिन की सुनवाई 20 मई 2025 को सुबह 11:41 बजे शुरू हुई। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने दलीलें दीं, जबकि याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, राजीव धवन, ए.एम. सिंघवी, सी.यू. सिंह और हुजेफा अहमदी ने तर्क रखे। कोर्ट ने पहले तीन मुद्दों पर सुनवाई तय की थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने कई अन्य बिंदु भी उठाए।
कपिल सिब्बल ने दी ये दलीलें
कपिल सिब्बल ने कहा, “यह कानून वक्फ की सुरक्षा के लिए लाया गया है, लेकिन इसका असली मकसद वक्फ संपत्तियों को हड़पना है। यह कानून इस तरह बनाया गया है कि बिना किसी प्रक्रिया के वक्फ संपत्ति छीनी जा सकती है। कोई सरकारी अधिकारी फैसला करता है और संपत्ति तुरंत वक्फ नहीं रह जाती। कोई भी विवाद खड़ा कर सकता है।”
वक्फ-बाय-यूजर (लंबे समय तक उपयोग से बनी वक्फ संपत्ति) को खत्म करने पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर की अवधारणा को खत्म कर दिया गया है, जिसे बाबरी मस्जिद केस में मान्यता मिली थी। 1925 के कानून में पंजीकरण का प्रावधान था, लेकिन अगर पंजीकरण नहीं हुआ तो संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती, यह नया है।”
प्राचीन स्मारकों पर सिब्बल ने तर्क दिया, “अगर कोई संपत्ति प्राचीन स्मारक घोषित हो जाती है, तो वह वक्फ नहीं रहती। इससे धार्मिक अधिकार छिन जाते हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है।”
धारा 3(सी) पर उन्होंने कहा, “धारा 3(सी) के तहत बिना जाँच के संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती। कोई ज्यूडिशियल प्रक्रिया नहीं है। वक्फ बनाने वाले को कोर्ट जाना पड़ता है और तब तक संपत्ति का दर्जा बदल जाता है। यह अनुच्छेद 25, 26 और 27 का उल्लंघन है।”
5 साल तक इस्लाम का अभ्यास करने की शर्त पर सिब्बल ने तंज कसते हुए कहा, “मुझे यह साबित करना होगा कि मैं 5 साल से मुस्लिम हूँ। कौन तय करेगा कि मैं मुस्लिम हूँ? अगर मैं मरने से पहले वक्फ बनाना चाहूँ, तो क्या मुझे 5 साल इंतजार करना होगा? यह अपने आप में असंवैधानिक है।”
गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने पर सिब्बल ने कहा, “पहले वक्फ बोर्ड में सभी मुस्लिम थे, अब 12 में से 7 गैर-मुस्लिम हो सकते हैं। यह धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप है और अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है।” सिब्बल ने धारा 3(डी) और 3(ई) पर सवाल उठाया, “ये धाराएँ मूल बिल में नहीं थीं और जेपीसी में इन पर चर्चा नहीं हुई। यह प्रक्रियात्मक रूप से गलत है।”
राजीव धवन की दलीलें
राजीव धवन ने कहा, “यह कानून धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है। ब्रिटिश काल में भी वक्फ की परिभाषा नहीं बदली गई। इस बड़े पैमाने पर वक्फ की अवधारणा को खत्म करने की क्या जरूरत थी? यह हर धर्म के लिए खतरा है।” उन्होंने जोड़ा, “यह कानून अनुच्छेद 25, 26 और 29 का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद 29 संस्कृति संरक्षण का अधिकार देता है। इसे छीनने से धर्मनिरपेक्ष ढाँचा खत्म हो जाएगा।”
अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलील पेश करते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, “यह कानून मुस्लिमों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर करता है। यह आतंक पैदा करने की रेसिपी है।”
वक्फ-बाय-यूजर पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर ज्यादातर गैर-पंजीकृत होते हैं। इसे खत्म करना और 5 साल तक इस्लाम का अभ्यास साबित करने की शर्त केवल मुस्लिमों के लिए है। यह अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।”
धारा 3(डी) पर सिंघवी ने तर्क दिया, “यह धारा प्राचीन स्मारक अधिनियम को वक्फ कानून पर हावी करती है, जिससे 1991 के पूजा स्थल अधिनियम के तहत संरक्षित स्मारकों पर भी असर पड़ता है।”
सरकार के दावे का खंडन करते हुए उन्होंने कहा, “सरकार कहती है कि 2013 के बाद वक्फ संपत्तियों में 116% की वृद्धि हुई। यह वृद्धि नहीं, बल्कि डिजिटाइजेशन का नतीजा है।”
इस मामले में वकील चंदर उदय सिंह ने अपनी दलील में कहा, “पहले गैर-पंजीकरण की सजा सिर्फ मुतवल्ली पर जुर्माना था। अब 2025 के कानून में पूरी वक्फ संपत्ति ही खत्म हो जाती है।”
सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी की दलीलें
अहमदी ने कहा, “धारा 3(डी) का प्रभाव बहुत गंभीर है। यह पुरानी मस्जिदों को भी प्रभावित करता है। इसे तुरंत रोकना चाहिए।”
5 साल की शर्त पर उन्होंने पूछा, “क्या कोई मुझसे पूछेगा कि मैं 5 बार नमाज पढ़ता हूँ या शराब पीता हूँ? प्रैक्टिसिंग इस्लाम का कोई स्पष्ट सिद्धांत नहीं है।”
धारा 107 और 108 पर अहमदी ने कहा, “ये धाराएँ पुरानी वक्फ संपत्तियों को रेट्रोस्पेक्टिव रूप से खत्म करती हैं। यह अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।”
केंद्र सरकार की तरह से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा पक्ष
तुषार मेहता ने कहा, “कोर्ट ने तीन मुद्दों पर सुनवाई तय की थी, लेकिन याचिकाकर्ता कई अन्य बिंदु उठा रहे हैं। मैं अनुरोध करता हूँ कि सुनवाई इन्हीं तीन मुद्दों तक सीमित रहे।”
उन्होंने जोड़ा, “यह कानून वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकने और निजी व सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण को खत्म करने के लिए है।” साथ ही उन्होंने जोड़ा कि वक्फ इस्लाम के पालन की आवश्यक शर्त नहीं है।
मेहता ने कहा, “17 अप्रैल को सरकार ने आश्वासन दिया था कि कुछ प्रमुख प्रावधान लागू नहीं किए जाएँगे। इसलिए कानून पर पूरी तरह रोक की जरूरत नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने की ये टिप्पणियाँ
सीजेआई गवई ने कहा, “किसी कानून को असंवैधानिक मानने के लिए बहुत मजबूत आधार चाहिए। कानून की संवैधानिकता की धारणा होती है।”
सिब्बल से पूछा, “पुराने कानून में पंजीकरण अनिवार्य था या स्वैच्छिक?” सिब्बल ने जवाब दिया, “1923 के कानून में ‘शैल’ शब्द था, लेकिन गैर-पंजीकरण की कोई सजा नहीं थी, सिवाय मुतवल्ली को हटाने के।”
प्राचीन स्मारकों पर सीजेआई ने कहा, “खजुराहो मंदिर में लोग प्रार्थना करते हैं, भले ही वह प्राचीन स्मारक है। क्या इससे प्रार्थना का अधिकार छिनता है?”
सुनवाई के दूसरे दिन केंद्र सरकार ने अपनी दलीलें विस्तार से रखीं
सुप्रीम कोर्ट में वक्फ मामले की दूसरे दिन बुधवार (21 मई 2025) को सुनवाई सुबह 12:15 बजे शुरू हुई। इस दिन केंद्र सरकार ने अपनी दलीलें विस्तार से रखीं। जिसमें केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश की।
मेहता ने कहा, “यह कानून 1923 से चली आ रही वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग की समस्या को खत्म करने के लिए है। जेपीसी ने 36 बैठकों में 96 लाख प्रतिनिधित्वों को सुना और व्यापक चर्चा के बाद यह कानून पारित हुआ।”
धारा 3(सी) पर उन्होंने कहा, “धारा 3(सी) के तहत राजस्व अधिकारी केवल राजस्व रिकॉर्ड ठीक करते हैं। यह अंतिम निर्णय नहीं है। वक्फकर्ता ट्रिब्यूनल, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है।”
मेहता ने जोड़ा, “धारा 3(सी) का फैसला सिर्फ पेपर एंट्री है। सरकार को स्वामित्व लेने के लिए टाइटल सूट दायर करना होगा।”
वक्फ-बाय-यूजर पर मेहता ने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर को खत्म करने का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बिना पंजीकरण के कोई संपत्ति वक्फ न बने। इससे निजी और सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण रुकेगा।”
मजहबी अधिकारों पर मेहता ने तर्क दिया, “वक्फ इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। दान हर धर्म में होता है, लेकिन इसे अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना गया।”
गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, “यह समावेशिता के लिए है। वक्फ संपत्ति, जैसे स्कूल या अनाथालय, गैर-मुस्लिमों के लिए भी हो सकती है।”
5 साल की शर्त पर मेहता ने कहा, “शरिया कानून में निकाह, तलाक या वसीयत के लिए भी खुद को मुस्लिम साबित करना होता है। इस कानून में बस 5 साल की समय सीमा तय की गई है।”
पंजीकरण पर मेहता ने सिब्बल की दलील का खंडन किया, “यह कहना गलत है कि 1923 में पंजीकरण नहीं था। बंगाल वक्फ अधिनियम में भी वक्फ-बाय-यूजर था और पंजीकरण जरूरी था।”
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
एक याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर को खत्म करना और गैर-पंजीकृत वक्फ को अमान्य करना धार्मिक और संपत्ति के अधिकारों का हनन है।”
सिब्बल ने दोहराया, “धारा 3(डी) और 3(ई) को बिना जेपीसी चर्चा के शामिल किया गया, जो प्रक्रियात्मक रूप से गलत है।”
कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
सीजेआई ने मेहता से पूछा, “क्या धारा 3(सी) के तहत सरकार अपने ही दावे का फैसला करेगी?” मेहता ने जवाब दिया, “राजस्व अधिकारी केवल रिकॉर्ड ठीक करते हैं, टाइटल का फैसला नहीं।”
कोर्ट ने कहा, “धारा 3(सी) के तहत संपत्ति का कब्जा तब तक नहीं लिया जा सकता, जब तक धारा 83 की प्रक्रिया पूरी न हो।”
सिब्बल की दलील पर सीजेआई ने कहा, “मेहता तकनीकी रूप से सही हैं कि 1923 में भी पंजीकरण का प्रावधान था।”
सुनवाई के तीसरे दिन की अहम दलीलें
वक्फ कानून को लेकर सुनवाई तीसरे दिन भी चली। गुरुवार (22 मई 2025) को सुनवाई सुबह 12:06 बजे शुरू हुई। इस दिन केंद्र सरकार और अन्य पक्षों ने अपनी दलीलें पूरी कीं, और कोर्ट ने कुछ अहम टिप्पणियाँ कीं।
केंद्र सरकार का पक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा
मेहता ने अपनी दलील शुरू करते हुए कहा, “1923 के बाद से वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग की शिकायतें थीं। 1954 में एक और कानून आया। 1995 में नया वक्फ अधिनियम बना। लेकिन 2013 में धारा 40 ने वक्फ बोर्ड को असीमित अधिकार दे दिए, जिसके कारण निजी और सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण बढ़ा।”
उन्होंने कहा, “लाखों की संख्या में शिकायतें थीं कि गांव के गांव वक्फ संपत्ति घोषित हो रहे हैं। निजी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड हड़प रहा है। यह कानून उस दुरुपयोग को रोकने के लिए है।”
धारा 3(सी) पर मेहता ने दोहराया, “यह केवल राजस्व रिकॉर्ड को ठीक करने की प्रक्रिया है। अगर कोई विवाद है, तो कलेक्टर जांच करता है। यह अंतिम फैसला नहीं है। वक्फकर्ता ट्रिब्यूनल या कोर्ट जा सकता है।”
वक्फ-बाय-यूजर पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर की अवधारणा पुराने कानून में भी थी, लेकिन इसे और सख्त करना जरूरी था ताकि बिना दस्तावेज के संपत्तियां वक्फ न बनें।”
गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने पर मेहता ने कहा, “वक्फ बोर्ड का काम धार्मिक नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष है। स्कूल, अस्पताल जैसी वक्फ संपत्तियां सभी के लिए होती हैं। गैर-मुस्लिमों को शामिल करना समावेशिता के लिए है।”
5 साल की शर्त का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, “यह शरिया कानून के हिसाब से है। वक्फ बनाने के लिए व्यक्ति को मुस्लिम होना चाहिए, और यह सुनिश्चित करने के लिए 5 साल की शर्त रखी गई है।”
मेहता ने जोड़ा, “यह कानून जेपीसी की 36 बैठकों और 96 लाख प्रतिनिधित्वों के बाद बनाया गया है। यह एक सोचा-समझा कदम है।”
अन्य पक्षों की दलीलें-
वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे (1995 के वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता की ओर से) कहा, “1995 के वक्फ अधिनियम के कई प्रावधान 2025 के संशोधन में भी हैं। सुप्रीम कोर्ट को दोनों कानूनों पर एक साथ विचार करना चाहिए। हाई कोर्ट की याचिकाओं को यहाँ लाने की जरूरत नहीं है।” उन्होंने जोड़ा, “अगर 100 साल पुरानी वक्फ संपत्तियाँ अब वक्फ नहीं रहेंगी, तो यह गंभीर समस्या है।”
के. परमेश्वर (याचिकाकर्ता की ओर से) ने कहा, “लिखित दलीलें पूरी याचिका की तरह हैं। हमें सभी मुद्दों पर बहस करने की इजाजत दी जानी चाहिए।” उन्होंने धारा 3(सी) पर कहा, “यह धारा संपत्ति का दर्जा बदल देती है बिना किसी ज्यूडिशियल प्रक्रिया के। यह गलत है।”
डॉ. जी. मोहन गोपाल (श्री नारायण मानव धर्मम ट्रस्ट की ओर से) ने कहा, “सभी पाँच मुख्य याचिकाएँ मुस्लिम पक्षों की हैं। इससे यह धारणा बनती है कि मामला ध्रुवीकृत है। गैर-मुस्लिम पक्षों को भी सुनना चाहिए।” उन्होंने जोड़ा, “यह कानून केवल मुस्लिमों के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लिए खतरा है।”
वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्णकुमार (वक्फ बोर्ड) ने कहा, “धारा 32 कहती है, ‘वक्फ बोर्ड वक्फकर्ता (Waqif) की इच्छाओं के अनुसार काम करता है।’ धारा 96 और 97 भी इस पर चर्चा करती हैं, जो राज्य वक्फ बोर्ड और केंद्र सरकार के निर्देशों से जुड़ी हैं।”
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने कहा, “280 एएसआई (ASI) स्मारकों पर वक्फ दावा किया गया है। धारा 25(2)(ए) राज्यों को आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर कानून बनाने की अनुमति देती है।” उन्होंने कहा, “न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) पर एक नौ-सदस्यीय पीठ (Nine-Judge Bench) विचार कर रही है। श्रीर मठ (Shrur Mutt) मामला अंतरिम आदेश (Interim Order) पर प्रासंगिक है।”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “CEO (Chief Executive Officer) पहले मुस्लिम होना चाहिए था, लेकिन अब यह ‘Enabling Provision’ (सक्षम करने वाला प्रावधान) है। धारा 38 कहती है, ‘Executive Officer (Executive Officer) मुस्लिम होना चाहिए।'” उन्होंने कहा, “वक्फ बोर्ड संविधान के अनुच्छेद 12 (Article 12) के तहत ‘State’ (राज्य) है। इसमें ‘Community Restriction’ (समुदाय पाबंदी) नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ
सीजेआई गवई ने कहा, “हमने पहले कहा था कि 1995 के वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को इस मामले में नहीं सुना जाएगा। हम केवल 2025 के संशोधन पर ध्यान देंगे।”
धारा 3(सी) पर सीजेआई ने पूछा, “क्या कलेक्टर अपने ही दावे का फैसला करेगा?” मेहता ने जवाब दिया, “यह भ्रामक और गलत तर्क है। कलेक्टर केवल रिकॉर्ड ठीक करता है, स्वामित्व का फैसला नहीं।”
वक्फ-बाय-यूजर पर कोर्ट ने कहा, “अगर जामा मस्जिद जैसे स्मारक को वक्फ-बाय-यूजर के तहत मान्यता मिली है, तो उसे कैसे खत्म किया जा सकता है?”
गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने पर कोर्ट ने पूछा, “क्या हिंदू धार्मिक ट्रस्ट में मुस्लिमों को शामिल किया जा सकता है?” मेहता ने जवाब दिया, “यह समावेशिता का सवाल है। वक्फ बोर्ड का काम धर्मनिरपेक्ष है।”
सिब्बल की दलील पर सीजेआई ने टोका, “आप कहते हैं कि मस्जिदों में चढ़ावा नहीं चढ़ता। मैं दरगाह गया हूँ और मैंने देखा है कि वहाँ भी चढ़ावा चढ़ाया जाता है।”
तीनों दिनों की सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति अधिकारों पर हमले की बात कही, जबकि सरकार ने इसे वक्फ मैनेजमेंट सुधारने का कदम बताया। कोर्ट ने अभी तक कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है और अगली सुनवाई 5 जून 2025 को होगी। यह मामला धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं से जुड़ा है, इसलिए सभी पक्षों की चिंताओं को संतुलित करना जरूरी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रामफोसा पर श्वेत नरसंहार का आरोप लगाया है। व्हाइट हाउस में ट्रंप और रामफोसा के बीच नोंकझोंक भी हुई। दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति का अमेरिका दौरा संबंधो को सुधारने के लिए किया गया था।
शुरुआत में तो दोनों राष्ट्रपति काफी दोस्ताना माहौल में बातचीत करते दिखे। लेकिन, खत्म होते-होते दोनों के बीच तनाव पैदा हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने अचानक श्वेत नरसंहार का मुद्दा उठाते हुए दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति पर आरोप लगाना शुरू कर दिया।
WOW! President Trump just halted the meeting with the South African President to show videos of prominent South African politicians calling for genocide against white South Africans.
राष्ट्रपति ट्रंप ने वीडियो दिखाते हुए दावा किया कि दक्षिण अफ्रीका में श्वेत किसानों को मारा जा रहा है। शुरुआत में राष्ट्रपति रामफोसा शांत रहे लेकिन फिर वीडियो की प्रामाणिकता पर सवाल किया। उन्होने कहा कि वो इसकी जाँच करेंगे। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप शांत नहीं हुए उन्होने कई रिपोर्ट की प्रतियाँ दिखाई। इनमें श्वेत नागरिकों की हत्या का जिक्र था। इस पर ट्रंप जोर- जोर से कहने लगे “मौत..मौत..” और फिर पेज पलटते हुए मारे गए श्वेत किसानों के फोटो की ओर इशारा करते हुए कहा- “ये दफन स्थल है।”
वीडियो में सफ़ेद क्रॉस दिखाए गए, जिसके बारे में ट्रम्प ने दावा किया कि ये श्वेत लोगों की कब्रें हैं। ट्रंप ने अफ्रीकी राष्ट्रपति से कहा कि विपक्षी नेता भड़काऊ भाषण दे रहे हैं। उन्होंने विपक्षी नेता जूलियस मालेमा को गिरफ़्तार किए जाने की माँग भी की।
यह वीडियो सितंबर 2020 में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान बनाया गया था, जब एक हफ़्ते पहले उनके खेत पर दो लोगों की हत्या कर दी गई थी। क्रॉस वास्तविक कब्रों को चिह्नित नहीं करते थे। लेकिन दक्षिण अफ़्रीका सरकार के विरोधियों ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि वे उन किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें वर्षों से मारा गया है।
श्वेत किसानों का जिक्र करते हुए ट्रंप ने फिर कहा, “हमारे पास ऐसे कई लोग हैं जिन्हें लगता है कि उन्हें सताया जा रहा है, और वे संयुक्त राज्य अमेरिका आ रहे हैं।”
उन्होंने कहा, “लोग अपनी सुरक्षा के लिए दक्षिण अफ्रीका से भाग रहे हैं। उनकी ज़मीन जब्त की जा रही है और कई केस ऐसे भी हैं जब उन्हें मार दिया गया है,” ट्रंप के बगल में कुर्सी पर बैठे और संयमित रहते हुए रामफोसा ने उनके दावों का खंडन किया। उन्होंने कहा, “अगर अफ़्रीकनेर किसानों का नरसंहार हुआ होता, तो मैं शर्त लगा सकता हूँ कि ये तीनों सज्जन यहाँ नहीं होते,” रामफोसा ने गोल्फ़र एर्नी एल्स और रीटिफ़ गूसेन और अरबपति जोहान रूपर्ट का ज़िक्र करते हुए कहा, जो सभी श्वेत थे और जो कमरे में मौजूद थे। इससे ट्रम्प संतुष्ट नहीं हुए।
1994 में रंगभेद खत्म होने के बाद दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका के रिश्तों में लगातार दुराव होता गया है। अभी दोनों देशों के रिश्ते काफी निचले स्तर पर हैं।
वक्फ कानून की संवैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में सुनवाई चल रही है। इसी कड़ी में केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वक्फ बोर्ड और हिन्दू धार्मिक न्यास (ट्रस्ट) अलग-अलग तरह की संस्थाएँ हैं और दोनों का काम भी भिन्न है। केन्द्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि दोनों की तुलना नहीं की जा सकती।
बुधवार (21 मई, 2025) को सुप्रीम कोर्ट में वक्फ कानून के संबंध में हुई सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह दलीलें दी हैं। CJI बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच के सामने उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड एक धर्मनिरपेक्ष संस्था है लेकिन मंदिरों के धार्मिक ट्रस्ट धार्मिक संस्थाएँ हैं।
वक्फ बोर्ड सेक्युलर – केन्द्र सरकार
SG तुषार मेहता ने कहा कि दान सभी धर्म के लोग करते हैं। उन्होंने कहा कि जैसे हिन्दू धर्म में दान है वैसे ही इस्लाम में वक्फ का जिक्र भी है। उन्होंने इसके बाद कहा कि लेकिन वक्फ इस्लाम का जरूरी हिस्सा नहीं है। उन्होंने इसके बाद वक्फ बोर्ड के कामों को गिनाते हुए इसे एक सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) संस्था बताया।
उन्होंने कहा, “वक्फ बोर्ड के कामों पर एक बार नजर डालें। इसके काम वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन, इनका ऑडिट और इनका लेखा जोखा रखना है ये पूरी तरह से सेक्युलर काम हैं।” उन्होंने इसके बाद वक्फ बोर्ड के नए क़ानून में दो गैर मुस्लिम सदस्यों की न्युक्ति को इस आधार पर सही बताया।
उन्होंने कहा, “अधिकतम दो गैर-मुस्लिम सदस्य होने से – क्या इससे कोई चरित्र बदल जाएगा? वक्फ बोर्ड किसी भी वक्फ की किसी भी धार्मिक गतिविधि को नहीं छू रहा है।” गौरतलब है कि वक्फ के नए कानून का विरोध करने वाले इसकी तुलना हिन्दू मंदिरों के लिए बनने वाले धार्मिक ट्रस्ट से कर रहे हैं।
इसको लेकर SG मेहता ने कहा, “हिंदू ट्रस्ट केवल धार्मिक गतिविधियों से संबंधित है जबकि वक्फ धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों से संबंधित है। हिंदू ट्रस्ट के काम कई सारे हैं… हिंदू ट्रस्ट के आयुक्त मंदिर के अंदर जा सकते हैं। यहाँ पुजारी का फैसला राज्य सरकार करती है जबकि वक्फ बोर्ड धार्मिक गतिविधियों को बिल्कुल भी नहीं छूता।”
SG मेहता ने स्पष्ट किया कि हिंदू ट्रस्ट पूरी तरह से धार्मिक हैं। उन्होंने बताया कि यह ट्रस्ट जहाँ धार्मिक संपत्तियों के लिए ही बनते हैं तो वहीं वक्फ सम्पत्ति कोई मस्जिद, दरगाह, अनाथालय, स्कूल हो सकती है।
जानिए क्यों मंदिर बोर्ड और वक्फ में है अंतर
नए वक्फ कानून में मोदी सरकार ने प्रावधान किया है कि वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्य भी शामिल किए जा सकते हैं। इस कानून का विरोध करने वाले दलील देते हैं कि वक्फ सम्पत्तियाँ पूरी तौर से मुस्लिमों का निजी मसला हैं, इसलिए इन पर किसी फैसले और प्रबन्धन को लेकर गैर मुस्लिम कैसे दखल दे सकते हैं।
उन्होंने यह भी दलील सुप्रीम कोर्ट में दी है कि जहाँ वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल करने की बात कही गई है वहीं मंदिरों का प्रबन्धन करने वाले बोर्ड या हिन्दू न्यासों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने इसे पक्षपात करार दिया है। हालाँकि, इस दलील में कई खामियाँ हैं।
गौरतलब है कि मंदिरों के प्रबन्धन के लिए बनाए जाने वाले बोर्ड का गठन सरकार करती है। इन बोर्ड में सरकारी अधिकारी और कुछ और व्यक्ति नियुक्त किए जाते हैं। यह मंदिर के कामकाज को देखते हैं। इनका अधिकार क्षेत्र मंदिर के कामकाज तक ही होता है।
मंदिर ट्रस्ट, वक्फ बोर्ड की तुलना में ना किसी सम्पत्ति पर अपनी तरफ से दावा ठोंक सकते हैं और उनके पास अपना कोई ट्रिब्यूनल होता है। वक्फ बोर्ड के पास अब तक यह शक्तियाँ भी थीं। यहाँ तक कि वह किसी सम्पत्ति को अपना बता कर सरकारी एजेंसियों से उस पर कब्जा दिलाने को कह सकता था।
वक्फ बोर्ड के खिलाफ यदि कोई व्यक्ति अपील करता तो उसे वक्फ ट्रिब्यूनल में जाना पड़ता। इसके उलट मंदिर बोर्ड ना ऐसा कोई दावा ठोंक सकते थे, ना वह सरकारी एजेंसियों को इससे सम्बन्धित कोई आदेश दे सकते थे। उनका अपना कोई ट्रिब्यूनल भी नहीं होता था।
इसके अलावा आर्थिक मामलों में भी मंदिर बोर्ड को उतने अधिकार नहीं होते हैं। मंदिरों में आने वाला सारा दान का पैसा इन ट्रस्ट के जरिए सरकार के पास जाता है। वक्फ बोर्ड के जरिए इन संपत्तियों से आने वाला पैसा वापस मुस्लिमों के हित के लिए लगाया जाता है। इसके लेखाजोखा में भी गड़बड़ रहती है।
ऐसे में इन दोनों की तुलना एकदम ठीक नहीं है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि शायद ही ऐसा कोई मामला सामने आया हो जहाँ किसी मंदिर बोर्ड ने किसी गाँव की पूरी जमीन पर दावा ठोंक दिया हो। लेकिन वक्फ बोर्ड यह भी कर चुका है। मंदिर बोर्डों के कभी गैर हिन्दुओं को परेशान करने के मामले भी सामने नहीं आए।
ऐसे में यह दलील देने वाले लोग मात्र धार्मिक सिरा खोज कर वक्फ कानून में कमियाँ ढूंढ रहे हैं। हालाँकि केन्द्र सरकार लगातार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट सभी बातों का जवाब दे रही है।
प्रोपेगेंडा चलने वाला पोर्टल ‘द वायर’ हमेशा से यह कहता आया है कि ‘लव जिहाद’ जैसे कोई बात दुनिया में है ही नहीं। अब उसी के एक पत्रकार उमर रशीद पर एक हिंदू महिला ने रेप, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना और बीफ खिलाने समेत कई गंभीर आरोप लगाए हैं।
तथाकथित प्रोग्रेसिव और लिबरल पत्रकार उमर रशीद द वायर में पॉलिटिकल जर्नलिस्ट है। उसे लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर हिंदू महिला ने अपने दर्द को शब्दों में बयां किया है। इस पोस्ट को पढ़कर उमर रशीद के मानसिक स्तर और जाहिलियत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
?SHOCKING – Kashmiri Muslim journo Omar Rashid @omar7rashid who works for @thewire_in trapped a Hindu girl
पोस्ट में महिला ने बताया कि दिल्ली में कुछ लिबरल मीडिया सर्कल्स से जुड़ाव और अनुभवी पत्रकार के तौर पर वह उमर राशिद के जाल में फँस गई। शुरुआत में राशिद ने ‘प्रोग्रेसिव पॉलिटिक्स’ और ‘लोधी गार्डन’ में टहलने के बहाने उसे अपने जाल में फँसाया।
महिला ने लिखा कि उमर राशिद ने इसी तरकीब के जरिए कई महिलाओं को अपने जाल में फँसाया है। इस दौरान वह अपनी उस झूठी छवि को महिलाओं के सामने लेकर आता है जिसमें वह ऐसा मुस्लिम है जिसे पालतू जानवर पस्द हैं, भोजन पसंद है, जो प्रोग्रेसिव लिबरल है और जिसने अपनी माँ को खो दिया है।
महिला ने उमर रशीद को एक ‘सीरियल एब्यूजर’ और ‘बालात्कारी’ का तमगा देते हुए लिखा है कि उसे बुरी तरह पीटा जाता था। उमर राशिद ने उसे लात, घूँसे, थप्पड़ मारे हैं और कई बार बर्बरतापूर्वक बलात्कार किया है।
अपने रिलेशनशिप के दौरान उसे उसे हद से ज्यादा यौन उत्पीड़न, दुर्व्यवहार, मारपीट और बर्बर्तापूर्ण बलात्कार का सामना करना पड़ा। इसके कारण जिससे उसका खून बहा और चोटें आईं।
पीड़ित हिंदू महिला ने यह भी कहा की उमर राशिद ने कभी भी सुरक्षित सेक्स नहीं किया। रशीद के कई अनजान लोगों से भी शारीरिक संबंध थे। इस वजह से महिला को कई बार स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास जाकर अबॉर्शन करवाने पड़े और सेक्शुअली ट्रांसमिटेड इनफेक्शन (STI) का इलाज करवाना पड़ा।
महिला ने आगे लिखा कि राशिद को पता था कि महिला आर्थिक तौर पर मजबूत नहीं है और संघर्ष कर रही है। इसके बावजूद उसने महिला की सारी चीजों को तोड़ दिया। इनमें से कई चीजें उसके घर से मिली निशानियाँ भी थी जिसे वह कभी भी खोना नहीं चाहती थी।
वह उसे बुरी तरीके से बेइज्जत करता था और उसे पाँव पड़कर माफी माँगने पर मजबूर कर देता था। इस दौरान वह उसकी माँ के साथ भी किस तरह रेप करेगा इसके बारे में बोलता था।
महिला ने लिखा कि उसके बीमार होने, असुरक्षित सेक्स के लिए ‘न’ कहने के बावजूद उमर ने कई बार उसका बर्बर्तापूर्वक रेप किया। यहाँ तक कि खुद को बचाने के लिए वह बाथरूम में छिपती थी।
महिला ने आगे लिखा कि उमर राशिद ने उसे कई बार बीफ खाने के लिए मजबूर किया जबकि वह नहीं खाती थी। हर बार जब वह उसे जबरदस्ती बीफ खिलाता था तो उसे उल्टी हो जाती थी। राशिद खुद को कश्मीरी मुस्लिम होने और उसे ‘गैर-मुस्लिम’ होने पर उलाहना देता था।
महिला ने अपनी पोस्ट को साप्रदायिक रंग न देने की अपील की है। उसने लिखा कि वह नहीं चाहती कि उसके साथ हुई घटना को ‘सांप्रदायिक रंग’ दिया जाए, बल्कि इसे उन अनगिनत कहानियों में से एक के तौर पर देखा जाना चाहिए, जिसमें महिलाएँ कार्यस्थल पर संपर्क में आने वाले अधिक उम्र के और ताकतवर पुरुषों के दुर्व्यवहार और उत्पीड़न का शिकार होती हैं।
द वायर ने अपने पत्रकार के खिलाफ आरोपों को स्वीकारा
प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द वायर’ ने अपने पत्रकार उमर राशिद पर लगे गंभीर आरोपों को स्वीकार किया है। द वायर द्वारा साझा किए गए नोट में लिखा है, “उमर राशिद पिछले कुछ वर्षों से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में द वायर में योगदान दे रहे हैं। उन पर लगे आरोपों को संस्थान ने गंभीरता से लिया है। इस मामले में लागू प्रासंगिक कानूनों और प्रक्रियाओं के अनुसार हम जाँच करेंगे और तय करेंगे कि पोस्ट पर लगाए गए आरोपों पर आगे क्या कार्रवाई की जा सकती है।”
The Wire's statement on the grave allegations against one of our contributors, Mr. Omar Rashid: pic.twitter.com/eeZZWkntp8
गौरतलब है कि कई वर्षों से ‘द वायर’ और इसी तरह के अन्य वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘लव जिहाद’ के उन मामलों को सिरे से नकार देते हैं, जहाँ मुस्लिम पुरुष एक झूठी पहचान के साथ हिंदू या ईसाई महिलाओं को अपना निशाना बनाते हैं और बाद में उन्हें शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न, अपमान, बलात्कार और हिंसा का शिकार बनाते हैं।
इस मानसिकता के पीछे वह इस्लामी सोच है जिसके मुताबिक गैर मुस्लिम महिलाएं यानी काफिर सेक्स स्लेव बनाने के योग्य हैं। ऐसी सोच वाले मानते हैं कि काफिर महुलाओं का यौन शोषण करना मुस्लिम मर्दों का दायित्व है और इससे सवाब मिलता है।
भारत सहित पूरी दुनिया में हजारों की तादाद में महिलाएँ इस सोच की शिकार रही हैं। ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग इस मामले में खास कुख्यात रहा। यहाँ यजीदी महिलाओं को यौन दासी बनाने का मामला भी खासा चर्चित रहा है।
भारत में भी अजमेर गैंगरेप और ब्लैकमेल मामले काफी लंबे समय तक सुर्खियाँ में रहे। केरल में तो यह एक संगठित रूप से चलाई जाने वाला अभियान है जिसमें हिंदू और ईसाई महिलाओं को इसका निशाना बनाया जाता है।
अफसोस की बात है कि आज की आधुनिक माने जाने वाली दुनिया में भी इस तरह की मध्यकालीन पार्श्विक मानसिकता घर किए हुए हैं और द वायर जैसे वामपंथी संगठन ऐसी मानसिकता को खारिज करना तो दूर उलटे उसे बढ़ावा देने में आगे रहते हैं।
इंदौर के एरोड्रम इलाके में पत्नी के धोखा देने और जिम जाने के बहाने मकसूद खान से मिलने के दुखी पति दिनेश मिश्रा ने जहर खाकर अपनी जान देने की कोशिश की। पति दिनेश मिश्रा को नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहाँ उसकी हालत गंभीर है। दिनेश ने जहर खाने से पहले सुसाइड नोट लिखा और फिर रोते हुए वीडियो में अपनी हालत की जानकारी दी।
अपने सुसाइड नोट में दिनेश ने लिखा है कि उसकी पत्नी जब जिम जाती थी तो वहीं पर मुस्लिम युवक मकसूद खान ने उसे ‘लव जिहाद’ में फँसा लिया। पत्नी उससे रोज मिलती थी और जरूरत पड़ने पर पैसे भी देती थी। दिनेश ने कहा है कि इसके सबूत उसके पास मौजूद हैं क्योंकि कई बार ऑनलाइन पेमेंट किया गया है।
दिनेश ने सुसाइड नोट में लिखा है कि जब वो काम के सिलसिले में घर से बाहर जाता था तो देर रात भी उसकी पत्नी निकल जाती थी। उसने वीडियो फुटेज के रूप में सबूत के होने की बात भी कही है। दिनेश के मुताबिक वह घर पर रहता था तो पत्नी कमरे से उसे निकाल कर मकसूद खान से बात करती थी।
तंग आकर उसने पुलिस से मदद लेनी चाही, लेकिन उसे मदद नहीं मिली। वह थाने में गया और अपनी पूरी कहानी सुनाई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अंत में खुद ही पत्नी की छानबीन करने लगा और शहर के 100 से ज्यादा सीसीटीवी फुटेज खंगाले। इस दौरान उसे मकबूल खान का पता चला।
दिनेश ने ये भी दावा किया है कि 10 साल तक वो काफी सहन करता रहा है। शादी के बाद जब बच्चा छोटा था तो पत्नी मायके गई थी और देर रात तक किसी से फोन पर बात करती रहती थी। पति दिनेश ने जब उसकी फोन डीटेल निकाली तब इसका पता चला। उस वक्त भी वह पत्नी को छोड़ना चाहता था लेकिन बच्चे के छोटा होने की वजह से कमजोर पड़ गया।
हरियाणा के हिसार से पाकिस्तान के लिए देश की जासूसी के आरोप में पकड़ी गई यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा के पाकिस्तान प्रेम को लेकर सोशल मीडिया का बाजार गर्म है। ज्योति की पर्सनल डायरी से लेकर पाकिस्तान में शादी करने की कई खबरें सोशल मीडिया पर चल रही हैं। इसे लेकर हिसार पुलिस ने एक प्रेस नोट जारी किया है।
राष्ट्रीय सुरक्षा का दिया हवाला
हिसार पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी किए अपने प्रेस नोट में कहा है कि यह जाँच राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित है। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और सोशल मीडिया के लोगों से अनुरोध है कि किसी भी तरह की रिर्पोटिंग में संयम बरतें और आधिकारिक प्रेस नोट के तथ्यों को ही मानें। साथ ही लिखा है कि किसी भी तरह के भ्रामक खबरों को फैलाने से बचा जाना चाहिए।
ज्योति 18 मई से 5 दिन के लिए पुलिस रिमांड पर है। सोशल मीडिया पर चल रही खबरों के लिए पुलिस ने प्रेस नोट में कुछ बिंदुओं में अफवाहों का खंडन किया है। पुलिस ने लिखा कि आरोपी ज्योति अभी भी हिसार पुलिस की हिरासत में है। केंद्रीय जाँच संस्थाएँ उससे पूछताछ तो कर रही हैं, लेकिन किसी भी एक संस्था को उसे सौंपा नहीं गया है।
सैन्य जानकारियों से पुलिस का इंकार
पुलिस ने कहा है कि आरोपी ज्योति मल्होत्रा के पास से सेना के कोई तथ्य या किसी भी सैन्य, रक्षा या रणनीतिक जानकारी की पहुँच होने पर कोई सबूत नहीं मिला है। हालाँकि प्रेस नोट में ये जरूर लिखा गया है कि ज्योति पाकिस्तान इंटेलिजेंस ऑफिसर्स (PIOs) के संपर्क में थी और सूचनाओं का आदान प्रदान किया था।
उसके पास से 3 मोबाइल फोन, एक लैपटॉप और कुछ इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स भी बरामद किए गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स की जाँच के लिए उसे फॉरेंसिक लैब भेजा गया है। साथ ही ज्योति के 4 बैंक अकाउंट की भी पड़ताल की जा रही है।
वीजा दिलाने वाले से भी हो रही पूछताछ
ज्योति कई बार पाकिस्तान का दौरा कर चुकी है। उसके ब्लॉग्स और वीडियो में पाकिस्तानी की चर्चा कई तरह से दिखती है। उशमें वह पाकिस्तान की बड़ाई करती हुई नजर आती है।
पुलिस ने ज्योति को वीजा दिलवाने वाले कुरुक्षेत्र के एजेंट हरकीरत को भी पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया है। हरकीरत के पास से भी 2 मोबाइल फोन और गैजेट्स मिले हैं। हालाँकि उसे अभी गिरफ्तार नहीं किया गया है। ज्योति के साथ उसके फोन को भी फॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया है।
वायरल चैट और डायरी को पुलिस ने नकारा
ज्योति के साथ एक पाकिस्तानी जासूस की व्हाट्सएप चैट भी वायरल हुई थी। इस व्हाट्सएप चैट के बारे में हिसार पुलिस ने कहा है कि इसकी सत्यता प्रमाणित नहीं हुई है। इसके अलावा ज्योति ने पाकिस्तान से वापस आने के बाद एक डायरी लिखी थी जिसमें उनका पाकिस्तान प्रेम खुलकर सामने आया था।
हिसार पुलिस ने इस डायरी को लेकर भी भ्रामक खबरों के बारें में स्पष्ट किया है। पुलिस का कहना है कि आरोपी की कथित डायरी के जो पन्ने सार्वजनिक रूप से दिखाए जा रहे हैं, वह पुलिस के पास है ही नहीं।
धर्म बदलने की जानकारी नहीं
इसके अलावा ज्योति के किसी पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ऑफिसर के साथ शादी या धर्म परिवर्तन के बारे में भी अभी तक कोई पुख्ता तथ्य सामने नहीं आया है। हालाँकि इस प्रेस नोट में हिसार पुलिस ने ज्योति के पाकिस्तान जासूसों के संपर्क में होने की बात साफ तौर पर लिखी है।
पुलिस ने कहा है कि ज्योति यह जानती थी कि जिन लोगों के साथ वह संपर्क में है उनमें से कुछ लोग पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ऑफिसर्स हैं। इसके अलावा इस तरह का कोई तथ्य नहीं मिला है जिससे यह कहा जा सके की ज्योति किसी आतंकवादी संगठन के संपर्क में थी और उसके आतंकवादी घटनाओं में भी ज्योति की संलिप्ता के तथ्य सामने नहीं आए हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मंगलवार (20 मई 2025) को ‘गोल्डन डोम’ नामक एक नई और उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणाली शुरू करने की घोषणा की। यह प्रणाली अंतरिक्ष से आने वाले खतरों को रोकने में सक्षम होगी। ट्रम्प ने अनुमान लगाया कि इस परियोजना की लागत लगभग 175 बिलियन डॉलर (लगभग 1,460 करोड़ रुपए) होगी और इसे तीन वर्षों के भीतर चालू किया जाएगा। उन्होंने यह भी वादा किया कि यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 2029 तक पूरी हो जाएगा, जो उनके संभावित दूसरे कार्यकाल का अंतिम वर्ष होगा।
इस नई प्रणाली का उद्देश्य हाइपरसोनिक मिसाइलों, बैलिस्टिक मिसाइलों और उन्नत क्रूज मिसाइलों को नष्ट करना है। ट्रम्प ने कहा कि इसके लिए ‘आधिकारिक रूप से एक आर्किटेक्चर का चयन’ किया जा चुका है। यह प्रणाली मौजूदा अमेरिकी रक्षा बुनियादी ढांचे के साथ उन्नत तकनीकों को एकीकृत करेगी, जिससे अंतरिक्ष से प्रक्षेपित मिसाइलों समेत सभी विदेशी मिसाइल खतरों से देश की सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकेगा।
ट्रम्प ने जनवरी में ‘गोल्डन डोम’ कार्यक्रम की शुरुआत रूस और चीन से बढ़ते मिसाइल खतरों को विफल करने के लक्ष्य के साथ की थी। इस परियोजना का उद्देश्य ऐसा उपग्रह नेटवर्क स्थापित करना है, जो संभवतः सैकड़ों की संख्या में आने वाली मिसाइलों का पता लगाने, उनका पीछा करने और उन्हें रोकने में सक्षम हो।
व्हाइट हाउस की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रम्प ने घोषणा की कि अमेरिकी अंतरिक्ष बल के जनरल माइकल गुएटलीन इस रणनीतिक कार्यक्रम के प्रमुख कार्यक्रम प्रबंधक होंगे। ट्रम्प ने यह भी बताया कि निर्माण कार्य शुरू करने के लिए अगले वर्ष के बजट में 25 बिलियन डॉलर (लगभग 208.75 करोड़) दिए जाएंगे।
यह प्रणाली इतनी शक्तिशाली होगी कि यह मिसाइलों को दुनिया के किसी भी हिस्से से या अंतरिक्ष से दागे जाने पर भी उन्हें रोकने में सक्षम होगी। ट्रंप ने कहा कि यह प्रणाली अब तक की सबसे बेहतरीन मिसाइल रक्षा प्रणाली होगी और यह उनके उस लंबे समय से किए गए चुनावी वादे को पूरा करेगी, जिसमें उन्होंने उड़ान के किसी भी चरण में मिसाइलों को नष्ट करने वाली अत्याधुनिक सुरक्षा ढाल बनाने की बात कही थी।
उन्होंने कहा कि गोल्डन डोम अमेरिका की मातृभूमि की रक्षा करेगा। कनाडा ने भी इस परियोजना में शामिल होने की इच्छा जताई है। ट्रंप ने इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा प्रस्तावित अंतरिक्ष-आधारित मिसाइल रक्षा प्रणाली “स्टार वार्स” का भी उल्लेख किया।
इस परियोजना की प्रेरणा उन्हें 2024 में ईरान द्वारा इजरायल पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों के दौरान मिली, जब इजरायल की आयरन डोम प्रणाली ने 300 से अधिक हमलों को विफल कर दिया था। ट्रंप ने अमेरिका में भी एक ऐसी ही प्रणाली की बात शुरू की। उन्होंने इस पहल को अमेरिका की सफलता और अस्तित्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
गोल्डन डोम और इसका महत्व
गोल्डन डोम एक अत्याधुनिक मिसाइल रक्षा प्रणाली होगी जिसमें अंतरिक्ष और जमीन दोनों सुरक्षित होंगे। यह सिस्टम चार महत्वपूर्ण चरणों में मिसाइल खतरों से निपटने के लिए बनाया जा रहा है, प्रक्षेपण से पहले ही खतरे को पहचानना और नष्ट करना, शुरुआती रोकथाम, रास्ते में कार्रवाई, और अंतिम समय में रोकथाम। इसका मतलब है कि यह प्रणाली मिसाइलों को उनके लॉन्च होते ही चाहे वे ज़मीन से दागी गई हों या अंतरिक्ष से ट्रैक, नष्ट और रोकने में सक्षम होगी।
यह प्रणाली विशेष रूप से हाइपरसोनिक मिसाइलों जैसे खतरों को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। हाइपरसोनिक मिसाइलें अपनी बेहद तेज गति और ग्लाइड चरण में कम ऊँचाई पर उड़ने के कारण पारंपरिक रडार सिस्टम से ट्रैक नहीं होता है। इसलिए उन्हें जमीन या समुद्र से रोकना मुश्किल होता है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरिक्ष-आधारित ट्रैकिंग और अवरोधन प्रणालियाँ अधिक प्रभावी साबित होती हैं, क्योंकि वे मिसाइलों को उनके बूस्ट चरण में ही पहचान सकती हैं, जब उनका उड़ान मार्ग पहले से ही पता होता है, जिससे लक्ष्य साधने और समय पर प्रतिक्रिया संभव हो पाती है।
पेंटागन के प्रमुख पीट हेगसेथ के अनुसार, गोल्डन डोम का डिज़ाइन मौजूदा जमीनी रक्षा क्षमताओं के साथ ताल मेल में काम करेगा और यह क्रूज़ मिसाइलों, बैलिस्टिक मिसाइलों, हाइपरसोनिक मिसाइलों और ड्रोन से, चाहे वे पारंपरिक हों या परमाणु, अमेरिका की रक्षा करने में सक्षम होगा। पेंटागन के योजनाकार पिछले कई महीनों से इस प्रणाली के विभिन्न संस्करणों पर काम कर रहे हैं, जिनमें लागत के हिसाब से ‘मध्यम’, ‘उच्च’ और ‘अतिरिक्त उच्च’ श्रेणियाँ शामिल हैं। इन संस्करणों में अंतरिक्ष आधारित इंटरसेप्टर को भी शामिल किया गया है, और उनकी कुल लागत और क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि कितने सेंसर और उपग्रह तैनात किए जाते हैं। एक अमेरिकी योजना अधिकारी ने बताया कि इस समय आवश्यकताओं और प्रणाली की जटिलता को लेकर चर्चाएँ चल रही हैं।
एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्ट के अनुसार, पहली बार अमेरिका अंतरिक्ष आधारित इंटरसेप्टर खरीदेगा। कॉन्ग्रेस के बजट कार्यालय ने अनुमान लगाया है कि गोल्डन डोम प्रणाली के अंतरिक्ष आधारित घटकों की लागत अगले 20 वर्षों में 542 बिलियन डॉलर (लगभग 45.25 लाख करोड़ रुपए) तक पहुँच सकती है। ट्रंप के प्रस्तावित कर राहत विधेयक में इस कार्यक्रम के लिए शुरुआती चरण में 25 बिलियन डॉलर (लगभग 2.075 लाख करोड़ रुपए) की राशि की माँग की गई है, जो फिलहाल कॉन्ग्रेस में लंबित है।
पेंटागन लंबे समय से चेतावनी देता आ रहा है कि चीन और रूस की अत्याधुनिक मिसाइल क्षमताओं के चलते अमेरिका को नए प्रकार की प्रतिरक्षा प्रणाली की आवश्यकता है। गोल्डन डोम के अतिरिक्त उपग्रह और अंतरिक्ष आधारित इंटरसेप्टर इन परिष्कृत मिसाइलों को उनकी उड़ान के शुरुआती या मध्य चरण में ही नष्ट करने में सक्षम होंगे। यही अंतरिक्ष तत्व इस परियोजना की सबसे अधिक लागत के लिए ज़िम्मेदार माने जा रहे हैं।
अमेरिकी अंतरिक्ष बल के प्रमुख जनरल चांस साल्ट्ज़मैन ने सांसदों को बताया कि गोल्डन डोम में इस्तेमाल होने वाले हथियार ऐसी नई और उभरती हुई आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें अब तक किसी सैन्य संगठन ने पूरा नहीं किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि रूस और चीन पहले ही अंतरिक्ष में आक्रामक हथियार तैनात कर चुके हैं, जिनमें ऐसे उपग्रह शामिल हैं जो अमेरिकी उपग्रहों को निशाना बनाकर गिरा सकते हैं, जिससे अमेरिका की सुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
गोल्डन डोम की आवश्यकताओं को पेंटागन द्वारा अभी भी विकसित किया जा रहा है। एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, पेंटागन और अमेरिकी उत्तरी कमान वर्तमान में एक ‘प्रारंभिक क्षमता दस्तावेज़’ पर काम कर रहे हैं, जो यह निर्धारित करेगा कि इस प्रणाली से क्या-क्या हासिल किया जाना चाहिए। उत्तरी कमान, जो अमेरिका की मातृभूमि की रक्षा के लिए ज़िम्मेदार है, इस बात को परिभाषित कर रही है कि उसे किस प्रकार की क्षमताओं की आवश्यकता है।
ट्रंप ने वादा किया है कि गोल्डन डोम प्रणाली का पूरा निर्माण संयुक्त राज्य अमेरिका में ही किया जाएगा, जिसमें जॉर्जिया, अलास्का, फ्लोरिडा और इंडियाना जैसे राज्यों में प्रमुख सुविधाएँ स्थापित की जाएँगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अमेरिकी संस्करण इज़राइल की आयरन डोम प्रणाली से प्रेरित होगा, लेकिन इसे कहीं अधिक व्यापक और शक्तिशाली बनाया जाएगा ताकि यह चीन, रूस, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे दुश्मनों से आने वाले लंबी दूरी के मिसाइल खतरों का मुकाबला कर सके।
गौरतलब है कि इज़राइल की आयरन डोम वायु रक्षा प्रणाली 2011 में सक्रिय हुई थी और तब से उसने हमास और अन्य विरोधियों द्वारा दागे गए हजारों कम दूरी के रॉकेट और प्रोजेक्टाइल को सफलतापूर्वक रोकने का काम किया है।
ट्रंप ने इस बात पर भी जोर दिया कि पूरी प्रणाली का निर्माण पूरी तरह स्वदेशी होगा। इस परियोजना के लिए रेथियॉन, एल-3 हैरिस टेक्नोलॉजीज और लॉकहीड मार्टिन जैसे प्रमुख रक्षा ठेकेदारों को संभावित उम्मीदवार माना जा रहा है। पेंटागन उपग्रहों, सेंसर और इंटरसेप्टर सहित विभिन्न घटकों का परीक्षण जल्द शुरू करने की योजना बना रहा है और इन तकनीकों के सफल परीक्षण के बाद उन्हें बड़े पैमाने पर गोल्डन डोम नेटवर्क के तहत खरीदा जाएगा।
ट्रंप ने वादा किया है कि गोल्डन डोम प्रणाली का पूरा निर्माण संयुक्त राज्य अमेरिका में ही किया जाएगा, जिसमें जॉर्जिया, अलास्का, फ्लोरिडा और इंडियाना में प्रमुख निर्माण और संचालन स्थल होंगे। उन्होंने कहा कि यह अमेरिकी प्रणाली इज़राइल की आयरन डोम से प्रेरित होगी, लेकिन इसे कहीं अधिक व्यापक और शक्तिशाली रूप में विकसित किया जाएगा ताकि यह चीन, रूस, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों से आने वाले लंबी दूरी के मिसाइल खतरों का प्रभावी रूप से सामना कर सके।
इज़राइल की आयरन डोम प्रणाली, जो 2011 से सक्रिय है, हमास और अन्य दुश्मनों द्वारा दागे गए हजारों कम दूरी के रॉकेट और प्रोजेक्टाइल को रोकने में सक्षम रही है। ट्रंप ने ज़ोर देकर कहा कि गोल्डन डोम की पूरी उत्पादन प्रक्रिया स्वदेशी होगी।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए संभावित प्रमुख ठेकेदारों में रेथियॉन, एल-3 हैरिस टेक्नोलॉजीज और लॉकहीड मार्टिन शामिल हैं। पेंटागन उपग्रहों, सेंसर और इंटरसेप्टर जैसे कई प्रमुख तत्वों का परीक्षण शुरू करने की योजना बना रहा है, और इन तकनीकों की सफल जाँच के बाद उन्हें गोल्डन डोम नेटवर्क के तहत बड़े पैमाने पर खरीदा जाएगा।
गोल्डन डोम और रोनाल्ड रीगन का स्टार वॉर्स कार्यक्रम
ट्रंप के गोल्डन डोम प्रस्ताव का एक प्रमुख हिस्सा ऐसे मिसाइल पहचानने वाले यंत्र और मिसाइल मारक यंत्र उपग्रहों का नेटवर्क बनाना है, जिन्हें पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जाएगा। इस प्रणाली में हजारों छोटे उपग्रह शामिल होंगे, जो किसी मिसाइल के पनडुब्बी या साइलो से लॉन्च होते ही, महज कुछ सेकंड के भीतर उस पर हमला करने में सक्षम होंगे। कुछ साल पहले तक इतने बड़े उपग्रह नेटवर्क की कल्पना भी मुश्किल थी, लेकिन अब यह तकनीकी रूप से संभव होता नजर आ रहा है।
इस दिशा में एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स पहले ही अग्रणी भूमिका निभा रही है, जिसने स्टारलिंक नामक एक विशाल इंटरनेट संचालित उपग्रह नेटवर्क तैनात करना शुरू किया है। स्पेसएक्स के अनुसार, स्टारलिंक नेटवर्क में इस समय लगभग 7,000 उपग्रह कक्षा में सक्रिय हैं। जो कि अंतरिक्ष आधारित मिसाइल रक्षा के लिए आवश्यक उपग्रहों की संख्या के अधिकांश अनुमान के करीब है।
दिलचस्प बात यह है कि एक अरबपति, जो हाल ही में बने यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (DOGE) के प्रमुख हैं और ट्रंप प्रशासन में सलाहकार की भूमिका निभा रहे हैं, वो गोल्डन डोम परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्हें राष्ट्रपति ट्रंप के करीबी सहयोगी के रूप में भी जाना जाता है। पलांटिर और एंडुरिल जैसी प्रमुख रक्षा टेक कंपनियों के साथ, स्पेसएक्स अब सिस्टम के महत्वपूर्ण अंतरिक्ष घटकों के निर्माण के लिए एक प्रमुख दावेदार बन गई है।
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) में मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट के निदेशक टॉम कराको ने कहा कि गोल्डन डोम प्रयास ‘काफी समय से विचाराधीन’ है और इसे अब सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने यह भी माना कि अंतरिक्ष से आने वाली मिसाइलों को रोकना एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भविष्य का अगला बड़ा सैन्य संघर्ष संभवतः पृथ्वी के वायुमंडल के ऊपर, अंतरिक्ष में ही लड़ा जाएगा।
उनका मानना है कि गोल्डन डोम की क्षमताएँ संयुक्त राज्य अमेरिका को एक मजबूत और बहुआयामी रक्षा प्रदान करेंगी, जिसका उपयोग आवश्यकता पड़ने पर उपग्रह विरोधी युद्ध जैसी स्थितियों में भी किया जा सकेगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि “अंतरिक्ष में मौजूद और अंतरिक्ष से गुजरने वाली बहुत सी चीजों से निपटने की आवश्यकता है,” जो इस प्रणाली की व्यापक उपयोगिता को दर्शाता है।
गोल्डन डोम और रोनाल्ड रीगन की स्टार वार्स
कई वर्षों से, अमेरिकी राजनेता अंतरिक्ष आधारित मिसाइल रक्षा प्रणाली का सपना देखते आए हैं। इस दिशा में पहली बड़ी पहल 1983 में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने की थी, जब उन्होंने सोवियत संघ से आने वाली मिसाइलों को रोकने के लिए एक प्रणाली की योजना की घोषणा की थी। इस योजना को रणनीतिक रक्षा पहल (Strategic Defense Initiative – SDI) कहा गया, जिसका उद्देश्य अंतरिक्ष-आधारित लेजर और इंटरसेप्टर के माध्यम से परमाणु हमले से अमेरिका की रक्षा करना था।
रीगन ने एक ऐसी रक्षात्मक ढाल की परिकल्पना की थी, जो दुश्मन की मिसाइलों को उनके उड़ान के हर चरण में पहचान कर नष्ट कर सके, भले ही उस समय ऐसी तकनीकें उपलब्ध न थीं। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया, “मुझे पता है कि यह एक कठिन कार्य है, जिसे इस सदी के अंत से पहले पूरा नहीं किया जा सकता है। इसमें कई मोर्चों पर वर्षों, शायद दशकों का प्रयास लगेगा।”
रणनीतिक रक्षा पहल (SDI) की आलोचना करने वालों ने इसे ‘स्टार वार्स’ कहा, यह तर्क देते हुए कि यह योजना व्यावहारिक रक्षा प्रणाली से अधिक विज्ञान कथा जैसी थी। फिर भी, इसने 1980 के दशक की रणनीतिक चर्चाओं को गहराई से प्रभावित किया और अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हथियारों की संख्या घटाने की चर्चा को दिशा दी। उस समय SDI की अनुमानित लागत 60 बिलियन डॉलर से $100 बिलियन डॉलर (लगभग 4.98 लाख करोड़ से 8.30 लाख करोड़) के बीच आँकी गई थी। हालाँकि यह प्रणाली पूरी तरह साकार नहीं हो सकी, सोवियत संघ उसके पहले ही बिखर गया।
रिपोर्टों के अनुसार, राष्ट्रपति रीगन की SDI को बनाए रखने की जिद के कारण सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव के साथ कई अहम हथियार वार्ताएँ रुक गई थीं। अब ट्रंप का गोल्डन डोम उसी उद्देश्य को दोहराता है। एक ऐसी मिसाइल रक्षा प्रणाली जो अमेरिकी मातृभूमि को अंतरिक्ष से आने वाले खतरों से बचा सके।
गोल्डन डोम और SDI दोनों ही ऐसे ऐतिहासिक क्षणों का प्रतीक हैं जब अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने ऐसी सैन्य प्रौद्योगिकियों की योजना बनाई जो उस समय की क्षमताओं से कहीं आगे थीं। यदि गोल्डन डोम सफल होता है, तो यह पहले के ‘स्टार वार्स’ कार्यक्रम की तरह वैश्विक हथियार नियंत्रण, सैन्य अंतरिक्ष नीति और परमाणु निरोध की अमेरिकी रणनीति को मौलिक रूप से बदल सकता है।
ट्रंप ने दावा किया, “रोनाल्ड रीगन (40वें अमेरिकी राष्ट्रपति) इसे कई साल पहले चाहते थे, लेकिन उनके पास उस समय तकनीक नहीं थी। यह अब कुछ ऐसा है जो हमारे पास होने जा रहा है। हम इसे उच्चतम स्तर पर बनाए रखेंगे और हम वास्तव में वह काम पूरा करेंगे जिसे राष्ट्रपति रीगन ने 40 साल पहले शुरू किया था।” उन्होंने यह भी जोर दिया कि गोल्डन डोम प्रणाली कीकनीक ‘जितनी हो सके उतनी परिपूर्ण है,’ हालाँकि इसके कुछ हिस्सों का अभी तक परीक्षण नहीं किया गया है।
ट्रंप का सपना
अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रंप ने अमेरिकी अंतरिक्ष बल की स्थापना का समर्थन किया, जिसे 20 दिसंबर 2019 को औपचारिक रूप से सेना की एक नई शाखा के रूप में गठित किया गया। इसका उद्देश्य चीन और रूस द्वारा अंतरिक्ष में बढ़ती सैन्य गतिविधियों के जवाब में अमेरिका की सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करना था। अब ट्रंप द्वारा प्रस्तावित गोल्डन डोम, अंतरिक्ष में तैनात की जाने वाली पहली अमेरिकी रक्षा प्रणाली बनने जा रही है। उन्होंने कहा, “मैंने अमेरिकी लोगों से वादा किया था कि मैं अपनी मातृभूमि को विदेशी मिसाइल हमले के खतरे से बचाने के लिए अत्याधुनिक मिसाइल रक्षा कवच का निर्माण करूँगा।”
पिछले साल सैन्य अधिकारियों ने कहा था कि उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका की रक्षा के लिए गोल्डन डोम जैसी मिसाइल ढाल की तत्काल आवश्यकता का संकेत नहीं दिया था, क्योंकि मौजूदा मिसाइल रक्षा प्रणालियाँ पहले से ही सक्रिय थीं। इसके बावजूद, ‘ट्रंप की सबसे श्रेष्ठ रक्षा कवच’ बनाने की टिप्पणी को उनकी रैलियों में भारी समर्थन मिला। इस जनसमर्थन के चलते रिपब्लिकन पार्टी ने 2024 के चुनावों से पहले इस मिसाइल ढाल परियोजना को अपने आधिकारिक पार्टी मंच का हिस्सा बना लिया।
जनवरी में ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी किया, जिसमें अमेरिकी रक्षा सचिव पीटर हेगसेथ से इस परियोजना को पूरा करने का आग्रह किया गया। 27 जनवरी को जारी आदेश में कहा गया, “बैलिस्टिक, हाइपरसोनिक और क्रूज मिसाइलों तथा अन्य उन्नत हवाई हमलों से होने वाले खतरे संयुक्त राज्य अमेरिका के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बने हुए हैं।”
पेंटागन के मुख्य प्रवक्ता और रक्षा सचिव पीटर हेगसेथ के वरिष्ठ सलाहकार सीन पार्नेल ने कहा, “रक्षा विभाग ने मौजूदा अमेरिकी मिसाइल रक्षा तकनीक और अत्याधुनिक नवाचारों की समीक्षा के लिए देश के सबसे प्रतिभाशाली दिमागों और सर्वोत्तम तकनीकी विशेषज्ञों को एकत्र किया है, ताकि हमारी मातृभूमि के लिए एक भरोसेमंद सुरक्षा छतरी को तेजी से विकसित और तैनात किया जा सके।”
हालाँकि, इस प्रणाली की असली कसौटी यह होगी कि क्या यह अपने भविष्य के वादों को राजनीतिक जाँच और तकनीकी सीमाओं के सामने टिकाए रख सकेगी, जैसा कि 1980 के दशक में रणनीतिक रक्षा पहल (SDI) के साथ हुआ था।