मध्य प्रदेश के महू में हिन्दुओं पर पथराव के मामले में दर्ज की गई FIR से मुस्लिमों की प्लानिंग का खुलासा हुआ है। चैंपियंस ट्रॉफी मैच के बाद जीत का जश्न मनाते लोगों पर पथराव की पहले से प्लानिंग की गई थी। इस मामले में 17 मुस्लिम नामजद आरोपित बनाए गए हैं।
महू में हुई हिंसा के बाद 10 मार्च, 2025 को महू थाने में FIR दर्ज करवाई गई है। FIR में मुस्लिमों पर दंगा, मारपीट, हमला समेत अन्य कई धाराएँ लगाई गई हैं। FIR में 17 नामजद आरोपितों के साथ ही कई अज्ञात लोगों को आरोपित बनाया गया है। FIR हमले के पीड़ित एक हिन्दू की तरफ से दर्ज करवाई गई है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।
FIR में पीड़ित ने बताया है कि वह रविवार (9 मार्च) को चैंपियंस ट्रॉफी में न्यूजीलैंड के खिलाफ भारत की जीत के बाद अपने कई दोस्तों के साथ जश्न मनाने निकला था। पीड़ित ने बताया कि वह अपने साथियों के साथ शांतिपूर्वक जीत का जुलूस निकाल रहे थे।
पीड़ित ने बताया कि इसी दौरान मोती महल चौराहे पर बबलू, तैय्यब, गोलू, एहमद, पप्पू, अहमद, जमशेद, अब्दुल अनीस, शेरू, लल्लू, सैय्यद, इमरान, अफजल, सोहेल, रफीक और इमरान (2) समेत बाकी अज्ञात लोग आ गए। पीड़ित के अनुसार, इन मुस्लिमों ने पहले जीत का जश्न मना रहे हिन्दुओं को गालियाँ बकीं।
FIR के अनुसार मुस्लिमों ने कहा, “हमने तो पहले से प्लान बनाकर रखा था कि तुम सालों चिल्ला-चिल्लाकर जश्न मनाओगे तो आज तुम्हारा इलाज कर देंगे। हम सभी नें गालियाँ देने से मना किया तो सभी नें षडयंत्र पूर्वक इकट्ठा होकर ईंट-पत्थर जो पहले से इकट्ठा करके रखें थे, जिससे हम पर पथराव कर दिया।”
पीड़ित ने बताया कि इस पथराव के चलते वह और उनके साथी गंभीर रूप से घायल हो गए। पीड़ित ने यह भी बताया कि मुस्लिमों ने इसके बाद धमकी दी कि अगर हिन्दुओं ने दोबारा जुलूस निकाला तो उनकी हत्या कर दी जाएगी। पीड़ितों की बसों में तोड़फोड़ की गई
पुलिस अब इस मामले में जाँच करके गिरफ्तारियाँ कर रही है। इंदौर एसपी राजेश द्विवेदी ने बताया, “अभी एक FIR दर्ज हुई है, 17 लोग इसमें नामजद हैं। कुछ शिकायत और आई हैं। इन पर कार्रवाई हो रही हैं। 12 लोगों को पकड़ा गया है। बाकी को पकड़ने का प्रयास किया जा रहा है। FIR में बलवा जैसी धाराएँ लगाई जा रही हैं।”
वहीं इंदौर ग्रामीण एसपी हितिका वत्सल ने 2 FIR की जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि अब स्थिति सामान्य है। गौरतलब है कि रविवार को महू में भारतीय टीम की जीत का जश्न मनाते लोगों पर मुस्लिमों ने हमला कर दिया था, इसमें कई लोग घायल हुए थे।
महाराष्ट्र के ठाणे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की एक शाखा पर हमला किया गया। शाखा पर जम कर पत्थर बरसाए गए। हमले के दौरान शाखा के भीतर बच्चे मौजूद थे। हमलावरों की पहचान अभी नहीं हुई है। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ठाणे के डोम्बीवली के वीर सावरकर नगर में एक RSS शाखा का आयोजन किया गया था। यह शाखा संजू चौधरी नाम के एक स्वयंसेवक ने चालू की थी। इसमें बच्चों को प्रशिक्षण दिया जाता था। यहाँ रविवार (9 मार्च, 2025) को भी शाम में प्रशिक्षण चल रहा था।
इस प्रशिक्षण में 30 से अधिक बच्चे शामिल थे। इन बच्चों को यहाँ खेलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा था। इसी दौरान बाहर से पथराव चालू हो गया। यह पथराव काफी देर तक चला। इसके बाद संजू चौधरी ने बच्चों को यहाँ से अलग किया। पथराव में किसी के घायल होने की सूचना नहीं है।
मामले में तिलकनगर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करवाई गई है। मामला अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज किया गया है। शाखा संचालकों ने बताया है कि पहले भी इस शाखा पर पथराव हो चुका है। लेकिन तब उन्होंने इस घटना को नजरअंदाज कर दिया था। हालाँकि, महीने भर के भीतर ही यह दूसरी बार घटना हो गई।
पुलिस ने शिकायत मिलने के बाद जाँच चालू कर दी है। संघ शाखा पर पत्थर किसने चलाए, यह अभी तक साफ़ नहीं हो सका है। पुलिस ने इलाके के CCTV खंगालने चालू कर दिए हैं। वह पत्थर फेंकने वालों के उद्देश्य की भी जाँच कर रही है। पुलिस ने बताया है कि सुरक्षा के लिए घटनास्थल पर पुलिसबल तैनात किया गया है।
घटना के बाद भाजपा और RSS के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने नाराजगी जताई है और पुलिस से जल्द कार्रवाई की माँग की है। हालाँकि, अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका है।
भारत के पड़ोसी देश नेपाल में एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस बार बार लड़ाई पार्टियों के बीच नहीं है। नेपाल में हिन्दू राजशाही की वापसी के लिए जोरदार आवाज उठी है। लोकतंत्र के आने से पहले नेपाल के राजा रहे ज्ञानेंद्र शाह काठमांडू वापस लौटे हैं। उन्होंने इसके साथ ही एक सन्देश भी नेपाली जनता को दिया है।
नेपाली वापस चाहते हैं हिन्दू राजशाही
रविवार (9 मार्च, 2025) को नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह वापस राजधानी काठमांडू आए। वह पोखरा से एक विशेष हेलिकॉप्टर से काठमांडू आए थे। उनका एयरपोर्ट के बाहर लाखों की भीड़ ने स्वागत किया। नेपाल के राजा इसके बाद एक गाड़ी में सवार हुए।
इस दौरान उनके समर्थक राजशाही के वापस लाए जाने के लिए नारे लगा रहे थे। हाथों में ‘राजशाही वापस लाओ’, ‘हमें हमारा राजा वापस दो’ और ‘ये नेपाल ज्ञानेंद्र का है’ की तख्तियां पकडे लोगों ने ज्ञानेंद्र का स्वागत किया। ज्ञानेंद्र ने समर्थन में उमड़ी भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस के पसीने छूट गए।
जय पशुपतिनाथ हाम्रो राजालाई स्वागत छ #KingGyanendra returns home. Thousands welcomed him today sparking nostalgia for the monarchy. Massive support of public shows Love for our Hindu King. pic.twitter.com/QVbqz8dBcw
ज्ञानेंद्र इसके बाद अपने घर निर्मल निवास चले गए। 77 वर्षीय ज्ञानेंद्र नेपाल के अलग-अलग मंदिरों में पूजा करने के बाद काठमांडू पहुँचे हैं। उनका यह दौरा विशेष रहा क्योंकि इससे पहले हिन्दू राजशाही को लेकर इतनी बड़ी भीड़ सड़कों पर नहीं उमड़ी थी। नेपाल में लगातार राजशाही वापस लाने के लिए अब रैलियाँ आयोजित हो रही हैं।
इन सबके बीच भीड़ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की फोटो लिए लोग भी दिखे। इन पोस्टर पर भी राजशाही के समर्थन में बातें लिखी हुई थीं। योगी आदित्यनाथ नाथ पंथ के मुखिया हैं, जिसका नेपाल के राजपरिवार के साथ विशेष रिश्ता रहा है।
सन्देश से भी बढ़ा उत्साह
भीड़ का उत्साह ज्ञानेंद्र के एक वीडियो सन्देश से भी बढ़ा हुआ था। यह वीडियो कुछ दिनों पहले राजा ने जारी किया था। इस वीडियो में ज्ञानेंद्र ने कहा कि नेपाल का इतिहास मिटाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने हिन्हार नेपालियों के लगातार विदेश जाने पर चिंता जताई। इन सबके बीच उन्होंने एक बड़ा सन्देश दिया।
ज्ञानेंद्र ने नेपाल के लोकतंत्र समर्थक नेताओं पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि इन नेताओं ने बदलाव लाने का वादा किया था लेकिन इसमें पूरी तरह फेल हो गए। ज्ञानेंद्र ने कहा कि नेपाल पर कोई विपदा ना आए, इसलिए उन्होंने अपने पद भी छोड़ दिए थे।
नेपाल पर लगभग 6 साल तक राज करने वाले ज्ञानेंद्र ने इसके बाद चेतावनी देते हुए कहा कि उनके त्याग को कमजोरी ना समझा जाए। इन सबके बाद ज्ञानेंद्र ने सबसे बड़ा बम गिराया। उन्होंने कहा कि अब नेपाल को बचाने का समय आ गया है और इसमें सभी नेपाली उनका साथ दें। उन्होंने कोई भी जिम्मेदारी उठाने के लिए खुद को तैयार बताया।
नेपाली पार्टियों में खलबली
राजा ज्ञानेंद्र के वापस आने और लाखों लोगों के समर्थन में उतरने के बाद नेपाली पार्टियों में खलबली मच गई है। नेपाल की सरकार ने राजशाही समर्थकों पर जुर्माना लगाया है। नेपाल की बाकी पार्टियाँ राजा ज्ञानेंद्र की इस वापसी पर अभी कुछ बोलने का फैसला नहीं ले पा रही हैं।
वहीं नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने आरोप लगाया है कि राजा ज्ञानेंद्र देश को अस्थिर करना चाहते हैं। ओली ने ज्ञानेंद्र को चुनाव में उतरने की चुनौती दी है। ओली ने पूछा है कि आखिर ज्ञानेंद्र किस लिए लोगों का समर्थन माँग रहे हैं। उन्होंने ज्ञानेंद्र पर भी और कई आरोप जड़े।
माओवादी क्रान्ति के बाद खत्म हुई थी हिन्दू राजशाही
नेपाल में राजशाही का अंत 2008 में हो गया था। तब तक नेपाल हिन्दू राष्ट्र हुआ करता था। ज्ञानेंद्र नेपाल के आखिरी राजा थे। नेपाल में राजशाही का अंत माओवादी आंदोलन के चलते हुआ था। लगभग एक दशक तक नेपाल में माओवादी आंदोलन चला था जिसमे हजारों लोग मारे गए थे। इसके बाद ज्ञानेंद्र ने गद्दी छोड़ने का ऐलान किया था।
नेपाल में 2008 में लोकतंत्र की स्थापना हो गई थी। लेकिन नेपाल तबसे लगातार राजनीतिक अस्थिरता झेलता आया है। माओवादी पार्टियां अलग हो चुकी हैं। नेपाल में इस बीच 13 बार सरकार बदल चुकी है। 2008 के बाद से नेपाल में संविधान भी बदल चुका है। ऐसे में राजशाही के प्रति वापस लोग आकर्षित हो रहे हैं।
मध्य प्रदेश में इंदौर के महू इलाके के भीतर जामा मस्जिद के सामने भारतीय क्रिकेट टीम फैंस पर पथराव हुआ। मस्जिद से निकली भीड़ ने फैंस को रोक कर उन पर पत्थर बरसाए। इसके बाद महू में अलग-अलग जगह आगजनी हुई, गाड़ियाँ तोड़ी गईं। मुस्लिमों की इस हिंसा हिंसाके तुरंत बाद उनका बचाव करने वाला गैंग इंटरनेट पर एक्टिव हो गया। हिंसा के तुरंत बाद हिन्दुओं को ही हिंसा का जिम्मेदार ठहराया गया, कारण वही कि हिन्दू मुस्लिम इलाके में पहुँचे और वहाँ पटाखे चलाए, जिससे बवाल हुआ।
मस्जिद के पास हुआ पथराव
महू के जामा मस्जिद रोड इलाके के पास जैसे ही रविवार (9 मार्च, 2025) को भारतीय क्रिकेट फैन्स चैंपियंस ट्रॉफी का जश्न मनाने पहुँचे, यहाँ बवाल हो गया। यहाँ से सामने आई वीडियो में दिखता है कि पत्थरबाजी के दौरान अल्लाह-हू-अकबर और नारा-ए-तकबीर जैसे नारे भी लग रहे थे।
इसके बाद यह पथराव दूसरे इलाकों में फैला और कई लोग इसकी चपेट में आए। घटना के कई वीडियो भी वायरल हुए हैं। इनमें से एक वीडियो में भीड़ मस्जिद से बाहर निकलती दिखाई देती है। दंगे में कई जगह आग लगाई गई और गाड़ियाँ जला दी गईं। एक मंदिर के पास पथराव की भी बात सामने आई।
हिंसा में 4 लोग घायल हुए हैं। पुलिस ने बताया है कि वह वीडियो और बाकी सूत्रों के माध्यम से आरोपितों की पहचान कर रही है। पुलिस ने 13 लोगों को हिंसा के बाद हिरासत में लिया है। घायलों का इलाज चल रहा है। प्रशासन ने बताया है कि अब इलाके में शांति कायम है। महू में सेना भी तैनात की गई है। हिन्दू संगठनों ने घटना के विरोध में बंद का ऐलान किया है।
हिंसा चालू होते ही इस्लामी कट्टरपंथी एक्टिव
हमले के तुरंत बाद मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने का प्रयास चालू हो गया। हमले को सही भी ठहराया जाने लगा। यह काम करने वाले इस्लामी कट्टरपंथी तुरंत एक पैटर्न भी खोज लाए। दिल्ली दंगों के दौरान हिन्दुओं के खिलाफ हमले का प्लान करने वाला शरजील इमाम का साथी आसिफ मुजतबा ने भी यही दावा किया।
Even celebrations have become a tool for demeaning Muslims , resorting to violence and destruction of Muslim properties. In #Mhow in indore, a crowd celebrating India’s victory resorted to communal sloganeering outside a mosque, resulting into arson & violence.#Mhow#Indorepic.twitter.com/fYU7aTR91s
मुजतबा ने दावा किया कि भारत की जीत का जश्न मनाते हुए मस्जिद के बाहर ‘धार्मिक नारेबाजी’ हुई। उसने दावा किया कि अब जश्न मनाते हुए लोग भी मुस्लिमों को भड़काते हैं।
एक और हैंडल ‘हेट डिटेक्टर’ ने दावा किया कि हिन्दुओं ने मुस्लिमों की नमाज में दखल डाला, पटाखे जलाए और अपमानजनक नारेबाजी भी की। इस हैंडल ने दावा किया कि इसी लिए हमला हुआ।
Celebratory rally near Jama Masjid allegedly sparked tensions as derogatory slogans & firecrackers disrupted Taraweeh prayers, leading to clashes and arson.
इसी हैंडल यह भी दावा किया कि हमला तब शुरू हुआ जब हिन्दुओं ने जीत का जश्न मनाते हुए जय श्री राम के नारे लगाए और भगवा ध्वज लहराया।
मुस्लिम भीड़ को हिंसा के लिए भड़काने के आरोपित मोहम्मद जुबैर ने भी इसी सुर में सुर मिलाया।
कुल मिलाकर सबका कहना था कि हिन्दुओं के पटाखे जलाने और कथित तौर पर नारे लगाने से मुस्लिम भड़के। लेकिन सबने यह बात स्वीकार की कि हिंसा मुस्लिमों की तरफ से चालू हुई।
मोहम्मद जुबैर ने इसके बाद दावा किया कि हिन्दुओं ने मस्जिद में पटाखा फेंका, लेकिन बाद में यह झूठ भी बेनकाब हो गया।
इसी जामा मस्जिद के इमाम ने खुद स्वीकार किया कि हिंदुओं को पीट-पीटकर मारने की कोशिश करके मुसलमानों ने ही हिंसा की शुरुआत की थी। न्यूज18 को दिए गए एक इंटरव्यू में, इमाम ने स्वीकार किया कि हिंसा की शुरुआत मुस्लिमों ने की और हिन्दुओं को निशाना बनाया।
हमेशा पीड़ित दिखाने का प्रयास
ऐसा पहली बार नहीं है कि हिंसा करने के बाद मुस्लिमों ने उसे जायज ठहराया है। कुछ ही दिन पहले बहराइच में रामगोपाल मिश्रा की हत्या मुस्लिमों ने गोली मारके कर दी थी। रामगोपाल मिश्रा का जुर्म था कि उन्होंने एक मुस्लिम घर पर झंडा लगाने की कोशिश की थी। इसके बाद रामगोपाल को ही हिंसक और मुस्लिमों को पीड़ित बताया गया था। महू के मामले से भी साफ़ है कि मस्जिद से हमला हुआ लेकिन मुस्लिम बचाव में जुटे हुए हैं।
गुजरात के अहमदाबाद के उपनगरीय इलाके साणंद में हर शुक्रवार को सड़क पर नमाज पढ़ने की खबरें आती है, जिसकी वजह से स्थानीय लोगों खासकर व्यापारियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा है। ऐसे में शनिवार (8 मार्च 2025) को हिंदू नेताओं ने स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग को ज्ञापन सौंपकर मामले में हस्तक्षेप की माँग की है। व्यापारियों का कहना है कि इस समस्या का तुरंत हल निकाला जाए, क्योंकि इससे उनके व्यापार पर असर पड़ रहा है।
ज्ञापन में कहा गया है, ”साणंद में डाक चौक के पास एक मस्जिद है, जिसके बाहर की सड़क हर शुक्रवार को बंद कर दी जाती है। इस दौरान सड़क पर ही नमाज पढ़ा जाता है। जिसकी वजह से व्यापारियों, पैदल चलने वालों और आम लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।” ज्ञापन में कहा गया है कि मस्जिद 3 मंजिला इमारत में है। उसमें काफी जगह है। इसके बावजूद सिर्फ आम लोगों को परेशान करने के लिए सड़क पर नमाज पढ़ी जा रही है।
व्यापारियों ने प्रशासन से पूछा है कि क्या तीन मंजिला मस्जिद होने के बावजूद सड़क पर हो रही नमाज को लेकर कोई अनुमति दी गई है? अगर ऐसी व्यवस्था प्रशासन की तरफ से की गई है, तो ये प्रशासन हमें बता दे और अगर ऐसा कोई कदम प्रशासन ने नहीं उठाया है, तो वो तत्काल कार्रवाई करते हुए इन गतिविधियों को रुकवा दे।
हिंदू नेताओं और व्यापारियों ने कहा है कि अगर सड़क पर नमाज पढ़ना बंद नहीं हुआ, तो वो लोग आंदोलन के लिए मजबूर हो जाएँगे। इस ज्ञापन को साणंद के एसपी, अहमदाबाद के कलेक्टर, साणंद नगरपालिका के अध्यक्ष और मामलातदार को भी भेजी गई है। इसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास भी उपलब्ध है।
नमाज अदा करने वाले ज्यादातर प्रवासी, सुरक्षा व्यवस्था पर असर
प्रशासन से हस्तक्षेप की माँग करने वाले व्यापारियों और हिंदू नेताओं में आणंद शहर बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष कमलेश व्यास ने ऑपइंडिया से बातचीत की। उन्होंने बताया कि काफी समय से सार्वजनिक सड़क पर नमाज पढ़ी जा रही है। इस दौरान घंटे – 2 घंटे के लिए सड़क बंद कर दी जाती है। लोगों का आना-जाना थम जाता है, तो व्यापार भी ठप पड़ जाता है।
कमलेश व्यास ने कहा कि अभी तो रमजान का महीना शुरू ही हुआ है, लेकिन भीड़ हर बार बढ़ती ही जा रही है। इनमें से अधिकतर नमाजी प्रवासी हैं। उनका सवाल है कि जब 3 मंजिला मस्जिद बनी है, उसके बावजूद सड़क पर नमाज क्यों पढ़ी जा रही। उन्होंने कहा, “हमें नमाज पढ़ने, किसी धर्म से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन सार्वजनिक सड़कों को जाम करके नमाज पढ़ने से आम लोगों को समस्या हो रही है।”
भारत ने आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी 2025 का फाइनल मैच न्यूजीलैंड को 4 विकेट से हराकर जीत लिया। भारतीय टीम की इस ऐतिहासिक जीत के बाद पूरे देश में लोग खुशी मना रहे थे। गाँधीनगर के दहेगाम में भी लोगों ने जश्न मनाया, लेकिन दहेगाम में विजय जुलूस निकालना उन पर भारी पड़ गया, क्योंकि ‘उगमणोवास बड़ी मस्जिद’ के पास मुस्लिमों की भीड़ ने उन पर पथराव कर दिया। इस घटना के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है और कुछ मुस्लिम हमलावरों को पकड़ भी लिया है।
यह घटना रविवार (9 मार्च 2025) को हुई। भारत की जीत के बाद गाँधीनगर के दहेगाम में हिंदू लोग विजय जुलूस निकाल रहे थे। जुलूस में लोग ‘भारत माता की जय’ के नारे भी लगा रहे थे। जब यह जुलूस कस्बे के इलाके में ‘उगमणोवास बड़ी मस्जिद’ के पास पहुँचा, तो वहाँ मौजूद मुस्लिम भीड़ ने पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। इस हमले में कई गाड़ियों को भी तोड़ दिया गया।
दहेगाम में हुई इस पत्थरबाजी में 3 हिंदू नौजवान घायल हो गए। उन्हें फौरन गाँधीनगर के अस्पताल में ले जाया गया। घायल युवक धवल मिस्त्री ने दहेगाम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने हमलावरों मोहम्मद, अरबाज खान, ओवैश, साजिद हुसैन, वसीम, मोहम्मद तोफीक, संजय, मोहम्मद इरफान और नासिर खान के साथ-साथ 6 अनजान लोगों की भीड़ के खिलाफ मामला दर्ज किया। एफआईआर की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।
जीत का जश्न मना रहे लोगों को दी गालियाँ
एफआईआर में कहा गया है कि धवल मिस्त्री भारत की जीत की खुशी में अपने दोस्त की बाइक लेकर विजय जुलूस की बाइक रैली में शामिल हुए थे। रात करीब 11 बजे यह रैली मुस्लिम कस्बे में पहुँची। वहाँ ‘उगमणोवास बड़ी मस्जिद’ के पास एक मुस्लिम भीड़ बैठी हुई थी। शिकायत में बताया गया कि गाड़ियों की रेस की आवाज से भीड़ भड़क गई और ‘यहाँ क्यों आए हो?’ कहकर हमला कर दिया। यह भी आरोप है कि मुस्लिम भीड़ ने जीत का जश्न मना रहे लोगों को गालियाँ दीं।
एफआईआर की कॉपी
घायल का इलाज जारी, कुछ आरोपित गिरफ्तार
शिकायत में आगे कहा गया कि इस घटना के बाद 2-3 और मुस्लिम लोग हाथ में डंडे लेकर आए और जुलूस पर टूट पड़े। इस दौरान 7-8 बाइकों में तोड़फोड़ भी की गई। एफआईआर के मुताबिक, इसके बाद धवल मिस्त्री डर गए और अपनी बाइक वहीं छोड़कर भागने लगे। भागते वक्त वह घायल हो गए। फिर वहाँ मौजूद दूसरे हिंदुओं ने उन्हें रिक्शे में बिठाकर गाँधीनगर सिविल अस्पताल भेज दिया। डॉक्टर ने बताया कि धवल के पैर में फ्रैक्चर हो गया है।
अभी धवल मिस्त्री का इलाज चल रहा है। ऑपइंडिया से बात करते हुए उनके भाई ने बताया कि वह अस्पताल में अकेले हैं और अपने भाई का इलाज करवा रहे हैं। धवल के भाई राहुल अभी अस्पताल में उनके साथ हैं। उन्होंने कहा कि इस घटना के बारे में बाद में और जानकारी देंगे। जब नई जानकारी आएगी, तो इस खबर को अपडेट कर दिया जाएगा।
दहेगाम पुलिस स्टेशन के पीआई देसाई ने ऑपइंडिया से बात की। उन्होंने कहा कि जैसे ही घटना की खबर मिली, पुलिस मौके पर पहुँच गई और हालात को काबू में करने की कोशिश शुरू कर दी। उन्होंने बताया कि मोहम्मद, अरबाज खान, ओवैश, साजिद हुसैन, वसीम, मोहम्मद तोफीक, संजय, मोहम्मद इरफान और नासिर खान के अलावा 6 अज्ञात लोगों की भीड़ के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 189(2), 191(2), 191(3), 352 और 324(4) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
गुजरात पुलिस के अधिकारी ने आगे बताया कि अभी अलग-अलग टीमें इसकी जाँच कर रही हैं। कुछ हमलावरों को पकड़ भी लिया गया है। उन्होंने कहा कि इस मामले की जाँच चल रही है। जब मौके से और खास जानकारी मिलेगी, तो इस खबर को अपडेट कर दिया जाएगा।
मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती भाषा में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
अरुणाचल प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू किए जाने का ईसाई विरोध कर रहे हैं। प्रदेश की जनसंख्या में एक तिहाई हिस्सा रखने वाले ईसाई समुदाय के कई संगठन इसको लेकर सड़क पर उतर आए हैं। यह कानून बीते 5 दशक पहले अरुणाचल विधानसभा की मंजूरी पा चुका है लेकिन अब तक लागू नहीं हो सका है। इस बीच राज्य में ईसाई आबादी 30 गुना बढ़ चुकी है। लेकिन अब भाजपा सरकार इस कानून को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह काम गुवाहाटी हाई कोर्ट के एक आदेश के बाद हो रहा है।
क्यों हो रहा प्रदर्शन?
6 मार्च, 2025 को अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में लाखों ईसाई सड़कों पर उतरे। इन्हें अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (ACF) नाम के एक संगठन ने इकट्ठा किया था। यह ईसाई अरुणाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम कानून (APFRA) वापस लेने की माँग कर रहे हैं। यह कानून अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय समुदाय के संरक्षण के लिए बनाया गया था।
ईसाई प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह क़ानून उनके धार्मिक अधिकारों पर हमला करता है और सरकार इसे लागू ना करे। इससे पहले फरवरी, 2025 में भी उन्होंने इस कानून के विरोध में एक बार भूख हड़ताल भी की थी। ACF ने दावा किया है कि यह क़ानून ईसाई समुदाय को लक्ष्य बनाकर लागू किया जाएगा।
ACF ने अरुणाचल प्रदेश के बाकी संगठनों से भी इस क़ानून का विरोध करने को कहा है। उन्होंने कहा है कि इससे राज्य की लगभग एक तिहाई ईसाई जनसंख्या को नुकसान होगा। राज्य में विपक्षी कॉन्ग्रेस ने भी ईसाई संगठनों का समर्थन किया है और कहा है कि सरकार यह कानून लागू करके जबरदस्ती बवाल खड़ा करना चाहती है।
क्या कहता है यह क़ानून?
ईसाई समूह वर्ष 1978 में राज्य विधानसभा द्वारा पारित किए गए अरुणाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (APFRA) कानून को लागू ना करने की माँग कर रहे हैं। यह कानून लालच या दबाव से करवाए जाने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए बनाया गया था।
इस कानून के अंतर्गत बौद्ध धर्म (मोनपा, मेम्बा, शेरदुकपेन, खम्बा, खम्पति और सिंगफोस द्वारा प्रचलित), वैष्णव (नोक्टेस द्वारा प्रचलित), आका और प्रकृति पूजक (दोन्यी-पोलो उपासक) को स्थानीय धर्म का दर्जा दिया गया था। यानी यह राज्य में पहले से मौजूद धर्म माने गए थे।
यह कानून कहता है, “कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्षत रूप से या किसी भी व्यक्ति को शक्ति, लालच किसी और झाँसे में लेके धार्मिक आस्था से किसी अन्य धार्मिक आस्था में परिवर्तित नहीं करेगा या परिवर्तित करने का प्रयास नहीं करेगा और ना ही कोई व्यक्ति ऐसे किसी धर्म परिवर्तन के लिए उकसाएगा।”
इसका उल्लंघन करने वाले को 2 साल की सजा और ₹10 हजार तक का जुर्माना झेलना पड़ सकता है। इसके अलावा कानून में यह भी स्पष्ट किया गया था कि राज्य में यदि कोई धर्मांतरण करना चाहता है तो उसे पहले प्रशासन को सूचित करना पड़ेगा। ऐसा ना करने पर 1 वर्ष तक की सजा या फिर ₹1000 का जुर्माना झेलना पड़ेगा।
1978 में पास हुआ, अब हो रहा लागू
अरुणाचल प्रदेश में यह कानून 1978 में जनता पार्टी के शासनकाल में लाया गया था। तब प्रेम खांडू थान्गुन यहाँ के मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार ने राज्य के जनजातीय समूहों की संस्कृति का संरक्षण करने और उन्हें धर्मांतरण के जाल से बचाने के लिए यह कानून पारित किया था। लेकिन बाद में लम्बे समय तक राज्य में कॉन्ग्रेस सरकारें रहीं और इसे लागू नहीं किया गया।
अरुणाचल प्रदेश में यह कानून इसलिए लाया गया था क्योंकि इससे पहले मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड जैसे राज्य में बड़ी आबादी ईसाई हो चुकी थी। हालाँकि, यह कानून 1978 के बाद से 2025 तक लागू नहीं हो सका। इसके पीछे राज्य में ईसाई समूहों का दबाव था।
अब यह कानून गुवाहाटी हाई कोर्ट के आदेश के बाद लागू किया जा रहा है। सितम्बर, 2024 में हाई कोर्ट की ईटानगर बेंच ने राज्य सरकार को आदेश दिया था कि वह इसे लागू करने के लिए मसौदा तैयार करें। इसकी डेडलाइन मार्च में खत्म हो रही है, ऐसे में राज्य सरकार इस पर कदम बढ़ा रही है। वहीं इसके विरोध में ईसाइयों ने अपना प्रदर्शन तेज कर दिया है।
क्यों जरूरी है कानून लागू होना?
अरुणाचल प्रदेश में जहाँ दशकों तक इस कानून का विरोध ईसाई करते रहे हैं, वहीं इस बीच राज्य में ईसाइयों की आबादी लगभग 30 गुना बढ़ चुकी है। जनसंख्या के आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 1971 में राज्य में मात्र 0.79% आबादी ही ईसाइयत मानती थी। 2011 की जनसंख्या में यह आँकड़ा 30% के पार पहुँच चुका था।
यह तेज बढ़त तब हुई जब अरुणाचल प्रदेश को इंदिरा गाँधी ने 1971 में केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया। इसके बाद राज्य में राजीव गाँधी के राज के दौरान जब यह राज्य बना तो इसने और भी तेज रफ्तार पकड़ ली। वहीं इसी दौरान हिन्दुओं की आबादी केवल 22% से 29% तक ही पहुँची है।
अरुणाचल प्रदेश में 1971 से 2011 के बीच सबसे तेजी से बौद्धों और स्थानीय मान्यताओं को मानने वाले (अधिकांश दोन्यी पोलो) की संख्या में कमी आई है। जनसंख्या रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 1971 में राज्य की 63% आबादी स्थानीय धर्मों को मानने वाली (अधिकांश दोन्यी पोलो) और 13% से अधिक बौद्ध थे।
2011 आते-आते बौद्ध जनसंख्या जहाँ घट कर 11% पर आ गई है तो वहीं दोन्यी पोलो राज्य में मात्र 26% पर आ गए हैं। राज्य में अब आगे और भी धर्मांतरण ना हो सके, इसलिए राज्य में कानून लागू हो रहा है तो ईसाई संगठन विरोध कर रहे हैं। हालाँकि, इस कानून को यहाँ के स्थानीय समूहों ने पूरा समर्थन दिया है।
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और बेटे चैतन्य के घर पर ED ने 10 मार्च 2025 को छापेमारी की है। यह कार्रवाई छत्तीसगढ़ में कथित शराब घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों के सिलसिले में की गई। ईडी की टीम ने भिलाई स्थित चैतन्य बघेल के निवास समेत कुल 14 स्थानों पर एक साथ छापे मारे।
VIDEO | ED raids Congress leader Bhupesh Baghel's premises in Bhilai as part of a money laundering investigation against his son – Chaitanya Baghel – in an alleged liquor scam case.
Chaitanya Baghel shares the Bhilai accommodation with his father and hence the premises are being… pic.twitter.com/AdUWic1y26
ईडी का आरोप है कि भूपेश बघेल के कार्यकाल में 2161 करोड़ रुपए का शराब घोटाला हुआ, जिसमें कई उच्च पदस्थ अधिकारी और कारोबारी शामिल थे। उन्हें संदेह कि इस घोटाले में चैतन्य बघेल भी शामिल हो सकते हैं। टीम अपनी छानबीन कर रही हैं।
VIDEO | On ED conducting raids premises of party leader Bhupesh Baghel as part of its probe against his son in Bhilai, Congress MP Ranjeet Ranjan (@Ranjeet4India) says, "This is not something new, and his family is repeatedly being harassed, but we respect the court. The ED -… pic.twitter.com/M27B15ew9X
इस बीच भूपेश बघेल ने इस कार्रवाई को लेकर बयान दिया है। उन्होंने कहा यह एक झूठा मामला है जो पिछले सात वर्षों से चल रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा कि यदि कोई पंजाब में कॉन्ग्रेस को रोकने का प्रयास कर रहा है, तो यह गलतफहमी है।
सात वर्षों से चले आ रहे झूठे केस को जब अदालत में बर्खास्त कर दिया गया तो आज ED के मेहमानों ने पूर्व मुख्यमंत्री, कांग्रेस महासचिव भूपेश बघेल के भिलाई निवास में आज सुबह प्रवेश किया है.
अगर इस षड्यंत्र से कोई पंजाब में कांग्रेस को रोकने का प्रयास कर रहा है, तो यह गलतफहमी है.
इस छापेमारी की खबर सुनने के बाद पार्टी सांसद मणिकम टैगोर ने कहा, “हम सभी जानते हैं कि ईडी पीएम मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री का पालतू कुत्ता बन गई है। वे इस कुत्ते को जहाँ चाहते हैं वहाँ भेज देते हैं। भूपेश बघेल कॉन्ग्रेस के मजबूत नेता हैं और उन्होंने ऐसी जंग लड़ी हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी और छत्तीसगढ़ के लोग उनके साथ खड़े हैं हम सभी जानते हैं कि भाषा और आरएसएस की गढ़ी झूठी बातें हारेंगी।”
पश्चिम बंगाल में एक बार फिर हिंदू मंदिरों पर हमले की खबर सामने आई है। रविवार (9 मार्च 2025) को बशीरहाट शहर के शंखचूरा बाजार में काली माता के मंदिर में कट्टरपंथियों ने तोड़फोड़ की और काली माता की मूर्ति को खंडित कर दिया गया। इस भीड़ की अगुवाई स्ठानीय टीएमसी नेता शाहनूर मंडल कर रहा था।
भाजपा नेता दिलीप घोष ने सोशल मीडिया एक्स पर बताया कि माँ काली की मूर्ति को नुकसान पहुँचाया गया। उनके मुताबिक, ये हमला स्थानीय टीएमसी नेता शाहनूर मंडल के नेतृत्व में हुआ, जो निंदरिया पंचायत से हैं। दिलीप घोष ने लिखा, “बशीरहाट पुलिस स्टेशन के तहत शंखचूरा बाजार के काली मंदिर में मूर्ति तोड़ी गई। ये शाहनूर मंडल के इशारे पर हुआ।”
1.1 In a shocking incident, the idol of Goddess Kali was vandalized at the Kali temple in Shankhchura Bazaar, under the jurisdiction of the Basirhat Police Station. The act of vandalism reportedly took place under the leadership of Shahanoor Mondal (TMC) of Nindaria Panchayat. pic.twitter.com/9t3z5by2KG
— Dilip Ghosh (Modi Ka Parivar) (@DilipGhoshBJP) March 9, 2025
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अमित मालवीय ने भी इस घटना पर गुस्सा जताया। उन्होंने कहा, “जादवपुर के बाद अब बशीरहाट दक्षिण विधानसभा के शंखचारा बाजार में काली माता की मूर्ति क्षतिग्रस्त की गई। टीएमसी विधायक इसे भाजपा की साजिश बता सकते हैं या कह सकते हैं कि हिंदुओं ने खुद ऐसा किया। ममता बनर्जी पिछले पाँच दिनों से हिंदुओं पर बढ़ते अत्याचार पर चुप क्यों हैं?”
West Bengal is fast turning into another Bangladesh.
After Jadavpur, another incident has emerged—an idol of Goddess Kali has been vandalized in Sankhachara Bazaar, located in the Basirhat South Assembly constituency.
पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष डॉ. सुकांत मजूमदार ने भी टीएमसी और ममता बनर्जी पर निशाना साधा। उन्होंने एक्स पर लिखा, “साकचुरो बाजार में मंदिर में घुसकर माँ काली की मूर्ति के हाथ, पैर और सिर तोड़ दिए गए। शाहनूर मंडल के कट्टरपंथी गुट ने हिंदुओं को जान से मारने की धमकी दी। पुलिस खामोश है। ममता बनर्जी, बहुत हो गया! अगर आप पश्चिम बंगाल को ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ समझती हैं, तो गलतफहमी में हैं। हम हिंदुओं की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं होने देंगे। भाजपा इसका जवाब देगी।”
At the Sakchuro Bazar area of Nindaria Gram Panchayat, under the Basirhat Dakshin Assembly constituency, a temple was forcibly entered, and the idol of Shri Shri Kali Mata was vandalized—Her hands, feet, and head broken. Local Hindus are also being threatened with death by the… pic.twitter.com/Fv9vI3AxIw
— Dr. Sukanta Majumdar (@DrSukantaBJP) March 9, 2025
ये पहली बार नहीं है जब पश्चिम बंगाल में मंदिरों पर हमले हुए हैं। भाजपा ने ममता सरकार से सख्त कार्रवाई की माँग की है, लेकिन अभी तक कोई ठोस जवाब नहीं मिला है।
बांग्लादेश में शेख हसीना का तख्तापलट करने में बड़ा हाथ संयुक्त राष्ट्र (UN) था। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNCHR) के कमिश्नर ने खुद यह बात कबूली है। उन्होंने एक इंटरव्यू में यह बात स्वीकार की है कि उन्होंने बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रदर्शन के दौरान फ़ौज के हाथ बाँध दिए थे।
BBC के साथ एक इंटरव्यू में हाई कमिश्नर वोल्कर तुर्क ने यह बातें कहीं हैं। उन्होंने कहा है कि UN ने फ़ौज को ISIS, अल कायदा और हरकत उल अंसार जैसे इस्लामी कट्टरपंथियों पर एक्शन लेने से मना किया था। उन्होंने बांग्लादेशी फ़ौज को धमकाया भी था।
क्या कहा वोल्कर तुर्क ने?
5 मार्च, 2025 को BBC के हार्डटॉक कार्यक्रम में तुर्क से गाजा, सूडान, यूक्रेन समेत बाकी इलाकों पर बात की। इस दौरान BBC ने कहा कि इन सभी इलाकों में UN एकदम निष्प्रभावी रहा है। तुर्क ने इसके बाद बांग्लादेश का उदाहरण दिया।
वोल्कर तुर्क ने कहा, “मैं आपको पिछले साल बांग्लादेश का उदाहरण दे रहा हूँ। जुलाई-अगस्त के दौरान, छात्रों द्वारा वहाँ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुआ था। वह शेख हसीना सरकार से तंग आ चुके थे, वहाँ बड़े पैमाने पर दमन हो रहा था।”
उन्होंने आगे कहा, “उनके लिए (प्रदर्शनकारियों) सबसे बड़ी उम्मीद वास्तव में हमारी आवाज़, मेरी आवाज़ और हम जो कर पाए, वह थी। हमने स्थिति पर ध्यान दिया और फ़ौज को चेतावनी दी कि अगर उन्होंने प्रदर्शनकारियों को रोका, तो उन्हें शांति अभियानों में सैनिक नहीं भेजने दिए जाएँगे। इसके बाद फ़ौज के रुख में बदलाव आया।”
क्यों UN की धमकी से डरी बांग्लादेशी फ़ौज
गौरतलब है कि बांग्लादेश संयुक्त राष्ट्र के शान्ति मिशन में बड़ी संख्या में सैनिक भेजता है। वर्तमान में बांग्लादेश ने लगभग 5000 सैनिक UN मिशन में भेजे हुए हैं। UN मिशन में गए सैनिकों को औसत तनख्वाह से अधिक पैसा मिलता है और फ़ौज को भी इससे कमाई होती है।
बांग्लादेश को शान्ति मिशन से हर साल लगभग ₹2600 करोड़ की कमाई होती है। इनमें से आधा ही वह अपने सैनिकों को देता है। बाकी पैसा फ़ौज के हिस्से जाता है। इससे उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी बड़ी जगह मिलती है।
ऐसे में UN की यह धमकी फ़ौज पर काम कर गई और उन्होंने अंत समय में शेख हसीना के आदेश मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा और दंगाइयों ने हिंसा जारी रखी। मोहम्मद यूनुस ने इसके बाद सत्ता पर कब्जा कर लिया था।
यूनुस और UN किस तरह आपस में मिले हुए थे, इसकी सच्चाई भी तुर्क ने बता दी। उन्होंने बताया कि मोहम्मद यूनुस ने सत्ता संभालते ही UN से एक जाँच कमिशन बनवाया। इसके लिए उन्होंने तुर्क से सम्पर्क किया। तुर्क ने बताया कि उन्होंने यूनुस की पूरी मदद की।
उन्होंने यह भी बताया कि मोहम्मद यूनुस ने तुर्क से फ़ौज पर नियंत्रण करने को कहा था। UN अब शेख हसीना के शासन के दौरान हुए कथित दमन को लेकर रिपोर्ट तैयार कर रहा है। वहीं अभी तक UN की तरफ से यह नहीं पूछा गया हैकि बांग्लादेश में यूनुस किस हैसियत से सत्ता पर काबिज हैं।