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बांग्लादेश में जो पुलिस वाले रोक रहे थे हिंसा, यूनुस सरकार सबको कर रही अरेस्ट: निशाने पर 1000+, 41 जेल में – ‘ऑपरेशन डेविल हंट’ में 4700+ गिरफ्तार

बांग्लादेश में तख्तापलट के सहारे सत्ता में आई मोहम्मद यूनुस सरकार लगातार दमन चक्र चला रही है। उसने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग को खत्म करने की कसम खा ली है। आवामी लीग के कार्यकर्ताओं और नेताओं को पकड़ने के लिए विशेष ओपरेशन चलाया जा रहा है। शेख हसीना की सरकार में हिंसा रोकने वाले पुलिसकर्मियों को भी जेलों में भरा जा रहा है।

शेख हसीना की पार्टी में रहे लोगों पर भी यूनुस सरकार दमनचक्र चला रही है। उन्होंने पकड़ने के लिए यूनुस सरकार ने ‘ओपरेशन डेविल हंट’ नाम का एक अभियान चलाया है। इसके तहत अब तक 4790 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं। इनमें से अधिकांश आवामी लीग और ऐसे ही संगठनों से जुड़े हुए लोग हैं।

मोहम्मद यूनुस की सरकार नहीं चाहती कि आवामी लीग के कार्यकर्ता उसकी कारस्तानियों को उजागर करें। इसके लिए देश भर में इन्हें पकड़ने के लिए सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों को लगाया गया है। मोहम्मद यूनुस की सरकार ने दावा किया है कि यह अभियान अपराधियों को पकड़ने और कानून व्यवस्था सुधारने के लिए चलाया गया है।

आवामी लीग के आम कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि पूर्व सांसद और मंत्री भी निशाने पर हैं। आवामी लीग के लगभग 100 सांसदों और पूर्व मंत्रियों को अब तक मोहम्मद यूनुस की सरकार अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार करके जेल में डाल चुकी है। इनमें महिला नेता दीपू मोनी भी शामिल हैं।

शेख हसीना के अलावा लगभग 200 नेता, अलग-अलग देशों को भाग चुके हैं। उन्होंने यह कदम यूनुस सरकार के दमनचक्र से बचने को उठाया है। देश में कथित अपराधियों को पकड़ रही यूनुस सरकार, शेख हसीना का घर दिनदहाड़े गिरा देने वाले एक भी कट्टरपंथी को गिरफ्तार नहीं कर सकी है।

बांग्लादेश में जुलाई-अगस्त के दौरान हुई हिंसा को रोकने का काम करने वाले 1059 पुलिसकर्मी भी अब यूनुस सरकार के निशाने पर हैं। तख्तापलट के सहारे सत्ता में आई यूनुस सरकार इनको गिरफ्तार कर रही है। 41 को गिरफ्तार किया भी जा चुका है।

शेख हसीना की सरकार के दौरान बांग्लादेश में पुलिस के मुखिया रहे IGP अब्दुल्लाह अल मामून को भी गिरफ्तार किया गया है। उन पर मानवता के खिलाफ अपराध करने का आरोप लगाया गया है। इसके अलावा ढाका के पुलिस कमिश्नर रहे असदुज्ज्मान मियाँ को भी यूनुस सरकार ने गिरफ्तार किया है। उन पर ही यही आरोप लगाए गए हैं।

गिरफ्तारियाँ सिर्फ शीर्ष पुलिस अधिकारीयों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि शेख हसीना की सरकार के दौरान बांग्लादेश के बड़े शहरों के पुलिस कमिश्नर रहे अधिकांश पुलिस अधिकारी जेलों में ठूंस दिए गए हैं। आलोचकों का कहना है कि यूनुस सरकार उनसे इस्लामी कट्टरपंथियों पर कार्रवाई करने का बदला निकाल रही है।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भेड़िया धँसान भीड़ क्योंकि सिस्टम को नहीं है सिविक सेंस

15 फरवरी 2025 की रात पहली बार नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ नहीं मची। पहली बार मौतें नहीं हुईं। पहली बार जिम्मेदारों को बचाने के लिए भीड़ को दोषी साबित करने की कोशिश नहीं हुई।

लेकिन इस शोर में यह बात नहीं हुई कि हर बार भगदड़ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के उसी हिस्से में क्यों मचती है जो अजमेरी गेट की तरफ से करीब पड़ता है? हर बार भगदड़ में मरने वाले उन्हीं ट्रेनों में सवार होने के लिए क्यों आए रहते हैं जो यूपी-बिहार-झारखंड जैसे प्रदेशों (जिन्हें दिल्ली की राजनीतिक शब्दावली में पूर्वांचल कहते हैं) की ओर जा रही होती है? उस भय की भी बात नहीं हुई जिसके साथ हम पूर्वांचल के लोग हर बार इन ट्रेनों में सफर करते हैं और भारतीय रेलवे को गरियाते हुए अपने घरों तक जाते हैं।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर क्यों मची भगदड़

आधिकारिक जानकारियों पर ‘यकीन’ करें तो प्रयागराज जाने वाली स्पेशल ट्रेन का प्लेटफॉर्म बदलने की कोई घोषणा नहीं हुई। प्लेटफॉर्म 14 और 15 नंबर पर एक तरफ प्रयागराज स्पेशल पर चढ़ने के लिए लोग सवार थे, दूसरी तरफ स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस में चढ़ने के लिए लोग जुटे थे। इसी दौरान प्लेटफॉर्म नंबर 16 पर प्रयागराज स्पेशल ट्रेन आने की घोषणा हुई। लोगों को लगा कि उनकी ट्रेन अब 16 नंबर पर आएगी। 16 नंबर प्लेटफॉर्म तक जल्दी से जल्दी पहुँचने की होड़ में सीढ़ी पर किसी का पैर फिसला और फिर एक-एक कर लोग गिरते गए और उनके ऊपर से चढ़कर लोग बढ़ते गए।

भगदड़, भीड़ और सोशल मीडिया के ‘वीर’

सोशल मीडिया के धुरंधरों का कहना है कि भीड़ इसलिए मची क्योंकि पूर्वांचल के लोगों में ‘सिविक सेंस’ नहीं है। कुछ का कहना है कि हमारी ‘क्रयशक्ति’ बढ़ गई है इसलिए हम सफर अधिक करने लगे हैं। अपने तीर्थ स्थलों पर भेड़िया धँसान जाने लगे हैं। साथ में अपने बच्चों, बुजुर्ग माँ-बाप, कुटुम्बों को लेकर जा रहे हैं। उपदेश भी दिया जा रहा है कि जब भीड़ है तो महाकुंभ में क्यों जा रहे हैं। भीड़ है तो ट्रेन में चढ़ने क्यों आ रहे हैं। भविष्य के लिए चेतावनी भी दी जा रही है कि इतने लोग जुटेंगे तो कोई कुछ नहीं कर सकता। माने आपको अकाल मौत मरना ही होगा। इनके अलावा हर मामले में ‘षड्यंत्र’ सूँघ लेने वाली प्रजाति अलग ही स्तर पर थेथरई कर रही है।

मैं भी उस भीड़ का हिस्सा हूँ जो अभिशप्त और अभ्यस्त है

मैं भी उसी भीड़ का हिस्सा हूँ जिसमें सिविक सेंस नहीं है। मैं भी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के उन्हीं प्लेटफॉर्मों से ट्रेन पकड़ता हूँ, जहाँ भगदड़ मचती है। मैं भी उन्हीं ट्रेनों में सवार होता हूँ, जिसमें चढ़ने के लिए आने वाले लोग भगदड़ में मर जाते हैं। आपको लगेगा कि मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मैं छठ की उस भीड़ का हिस्सा नहीं था। गर्मी छुट्टी में घर जाने वाली उस भीड़ का हिस्सा मेरी पत्नी-बच्चे नहीं थे। महाकुंभ जाने वाली उस भीड़ का हिस्सा मेरे माता-पिता नहीं थे।

पर मैं भाग्यशाली नहीं हूँ, ​क्योंकि मैं जब भी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आता हूँ तो मुझे ऐसी ही भीड़ मिलती है। हर बार मुझे ट्रेन के कोच में अपनी बर्थ से बाथरूम तक पहुँचने में कसरत करनी पड़ती है। कभी भी मुझे आसानी से टिकट नहीं मिलता है। यहाँ तक कि मुझे ट्रेन में चढ़ाने के लिए आया हुआ व्यक्ति भी अक्सर रेलवे स्टेशन के बाहर से ही चला जाता है, क्योंकि पूर्वांचल की तरफ जाने वाली ट्रेनों के प्लेटफॉर्म टिकट की बिक्री कब बंद कर दी जाए, इसका कोई पूर्वानुमान नहीं लगा सकता।

मैं लाइन से ही रेलवे स्टेशन में घुसा था

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, भारत के किसी गाँव-देहात का खुला रेलवे स्टेशन नहीं है। इस रेलवे स्टेशन में प्रवेश करने के लिए लोगों को लाइन में लगना पड़ता है। स्कैनर से गुजरना होता है। अपने सामान बैगेज स्कैनर में डालने होते हैं। एक पौवा भी दिखने पर सुरक्षाकर्मी आपको लाइन से अलग कर किनारे ले जाते हैं। जाँच की प्रक्रिया से गुजरकर ही आप स्टेशन के भीतर प्रवेश करते हैं। उस प्लेटफॉर्म पर पहुँचते हैं, जहाँ आपकी ट्रेन आने की सूचना होती है। इसमें भीड़ के हिसाब से कभी भी सहूलियत नहीं दी जाती है। देनी भी नहीं चाहिए। इस दौरान कहीं भी यह सुनिश्चित नहीं किया जाता है कि आपके पास ट्रेन में चढ़ने का या प्लेटफॉर्म का टिकट है या नहीं। यही प्रक्रिया भी है।

पर आप जब प्लेटफॉर्म पर पहुँचते हैं तो हमेशा ट्रेन की क्षमता से इतने अधिक लोग होते हैं जिसे भीड़ कहा जा सके। ट्रेन में चढ़ने के लिए वैसी ही मारामारी होती है जैसा भीड़ की स्थिति में होता है। यह जरूर है कि इसकी तीव्रता सामान्य कोच में सबसे ज्यादा, उससे कम शयनयान कोच और उससे कम वातानुकूलित तृतीय श्रेणी में होता है। वातानुकूलित प्रथम श्रेणी में ऐसा हुड़दंग नहीं दिखता है।

जाहिर है मैं सिविक सेंस के साथ ही रेलवे स्टेशन के भीतर घुसा था। आपकी व्यवस्था के हिसाब से ही आगे बढ़ा था। पर प्लेटफॉर्म पर व्यवस्था का कोई ‘सिविक सेंस’ नहीं है, मजबूरन मैं भीड़ हो जाता हूँ।

कौन लोग बनाते हैं मुझे ट्रेन की भीड़

  • मौजूदा नियम है कि आप अपनी यात्रा से 60 दिन पहले टिकट आरक्षित करवा सकते हैं। पूर्वांचल की तरफ जाने वाली ट्रेनों में आरक्षण खुलते ही सीटें फुल हो जाती हैं। उसके बाद धकाधक वेटिंग काटी जाती है। लोग पैसा देकर भी वेटिंग इस उम्मीद में नहीं लेते कि टिकट कन्फर्म हो जाएगा। यह तो भगवान भरोसे है। वेटिंग टिकट इसलिए लेते हैं क्योंकि यात्रा की तिथि आगे बढ़ाने पर भी किस्मत नहीं बदलनी है। कमोबेश सालभर यही हाल होता है।
  • आप बिना सामान्य टिकट के भी इन ट्रेनों में सवार हो सकते हैं। रेलवे की तरफ से प्लेटफॉर्म पर ही टीसी तैनात किए जाते हैं। वे फाइन के साथ आपका टिकट बना देते हैं, अब आप किसी भी डिब्बे में अब चढ़ सकते हैं। जबकि रेलवे को पहले से ही पता होता है कि ट्रेन की क्षमता से कहीं अधिक टिकट बुक हो चुके हैं।
  • रेलवे सुरक्षाकर्मी पैसे लेकर सामान्य डिब्बों में लोगों को घुसाते हैं। इन डिब्बों में इतनी अधिक भीड़ होती है कि टिकट चेक करना भी संभव नहीं होता है। यानी कुछ रुपए देकर आप दिल्ली से दरभंगा जैसी जगहों पर जा सकते हैं।
  • कोच अटेंडेंट अपनी सीट बेचते हैं। पैंट्री कार की सीट बेची जाती है। यहाँ तक कि जेनरेटर यान में गार्ड के लिए बने कक्ष की भी बिक्री होती है। जिनकी तैनाती नियम-कायदों का पालन सुनिश्चित करवाने, यात्रियों की सहूलियत सुनिश्चित करने के लिए की जाती है, उन्हीं लोगों ने पूर्वांचल जानी वाली सभी ट्रेनों में मिल बाँटकर खाने वाला पूरा सिस्टम विकसित कर रखा है।

माना है कि हमें सिविक सेंस नहीं है। लेकिन आपके सिस्टम का यह कैसा ‘सिविक सेंस’ है जो मुझे अपनी मेहनत की कमाई से आरक्षित की गई सीट पर भी आराम से सफर करने की सहूलियत नहीं दे पाता है।

मुझे भीड़ बनने से कैसे बचा सकते हैं

  • हमारे इलाकों से मजबूरी का पलायन होता है। कारण रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधा हमें अपने इलाकों में ही उपलब्ध करवाइए, उद्योग-धंधे दीजिए, ताकि मजबूरी का पलायन रुके। फिर एक साथ घर लौटने की ऐसी होड़ भी नहीं दिखेगी जो भीड़ बन जाती है।
  • य​दि ऐसा नहीं कर सकते तो फिर रेलवे को अपने इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने ही होंगे। वह चाहे प्लेटफार्म की संख्या बढ़ानी हो, अजमेरी गेट की तरफ से स्टेशन का विस्तार करना हो या फिर ट्रेन की संख्या बढ़ानी हो। वेटिंग टिकट काट-काटकर, फाइन वाले टिकट-काट काटकर राजस्व बढ़ाने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी। स्पेशल ट्रेनों को समयबद्ध करना होगा। ऐसी हर एक ट्रेन की अलग पहचान सुनिश्चित करनी होगी।
  • रेलवे कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करनी होगी। सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी स्थिति में आरक्षित सीटों से अधिक यात्री डिब्बे में सफर नहीं करें। सामान्य डिब्बों में भी संख्या सुनिश्चित करनी होगी। यात्री जैसे ही भीड़ बनते दिखे उन्हें डायवर्ट करने की तत्काल व्यवस्था करनी होगी।

हमारी इन आकांक्षाओं का भार PM मोदी पर ही है

व्यवस्था पर सवाल करना, जवाबदेही तय करने की माँग करना, सरकार की नीयत पर संदेह जताना नहीं है। वैसे भी जो प्रधानमंत्री (नरेंद्र मोदी) देश के गाँव-गाँव में रहने वाले लोगों के आवास, शौचालय, राशन तक की चिंता करता हो, उसे पूर्वांचल के लोगों को ट्रेनों में होने वाली तकलीफों का पता नहीं हो, यह माना नहीं जा सकता। यह सत्य है कि इस सरकार में दशकों से अटकी परियोजनाओं पर काम हुआ है। रेलवे के आधुनिकीकरण ने जोर पकड़ा है। यह भी सत्य है कि मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर की एक क्षमता है और उससे अधिक बोझ नहीं बढ़ाया जा सकता। यह भी सत्य है कि इस समस्या का रातोंरात समाधान नहीं हो सकता है।

लेकिन इसका समाधान हादसों पर पर्दा डालना भी नहीं है। ‘भक्तों’ को समझना होगा कि कभी-कभी जबरन की छवि बचाने की कोशिश, छवि को कितना नुकसान कर जाती है, इसका पता तक नहीं चलता है। नहीं तो क्या कारण है कि जिसके नेतृत्व में बीजेपी ने राजनीति की नई ऊँचाइयों को छुआ, उसके ही अगुआई में 240 पर आ गई और सरकार उन सहयोगियों के भरोसे पर टिक गईं जिनके अपने क्षेत्रीय एजेंडे हैं।

हमने नरेंद्र मोदी जैसा लोक की चिंता करने वाला नेतृत्व नहीं देखा। इसलिए हमारे सवाल तीखे हैं। हमारी आकांक्षाओं का बोझ भारी है। इसलिए हम अभिशप्त और अभ्यस्त वाली स्थिति से बाहर आने को तड़फड़ा रहे हैं।

कुशीनगर मस्जिद पर UP पुलिस- प्रशासन ने चलाया बुलडोजर, सुप्रीम कोर्ट ने भेज दिया अवमानना नोटिस, आगे की तोड़फोड़ पर रोक

कुशीनगर की मदनी मस्जिद पर हुई तोड़फोड़ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी प्रशासन पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने इस मामले में अधिकारियों को अवमानना का नोटिस जारी किया और उनसे दो हफ्तों में जवाब माँगा है। साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया है कि अगली सुनवाई तक मस्जिद के किसी भी हिस्से को और नुकसान नहीं पहुँचाया जाए।

जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि बिना नोटिस और सुनवाई के तोड़फोड़ अवमानना के दायरे में आती है। कोर्ट ने यूपी प्रशासन से पूछा कि उनके खिलाफ अवमानना कार्रवाई क्यों न की जाए। कोर्ट ने साफ किया कि इस मामले में दोषी अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा और अगर आदेशों का उल्लंघन पाया गया तो व्यक्तिगत रूप से भी जवाबदेही तय होगी।

मस्जिद प्रशासन की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि 9 फरवरी 2025 को बिना किसी पूर्व सूचना के प्रशासन ने मदनी मस्जिद के बाहरी हिस्से और प्रवेश द्वार को ध्वस्त कर दिया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के 13 नवंबर 2024 के आदेश का उल्लंघन है, जिसमें बिना नोटिस और सुनवाई के किसी भी इमारत को गिराने पर रोक लगाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने दलील दी कि मस्जिद का निर्माण निजी जमीन पर वैध स्वीकृति के साथ हुआ था और 1999 में नगर पालिका से मंजूरी भी प्राप्त थी। हालाँकि, एक स्थानीय नेता की शिकायत के बाद दिसंबर 2024 में प्रशासन ने मस्जिद पर कार्रवाई शुरू की। जाँच में उप जिलाधिकारी (SDM) ने पुष्टि की थी कि मस्जिद का निर्माण कानून के दायरे में था। इसके बावजूद 9 फरवरी को बिना कोई नोटिस दिए प्रशासन ने भारी पुलिस बल और बुलडोजर के साथ मस्जिद का बाहरी हिस्सा तोड़ दिया।

अब इस मामले में यूपी सरकार और संबंधित अधिकारियों को दो हफ्तों में अपना पक्ष रखना होगा। तब तक मस्जिद पर किसी भी तरह की तोड़फोड़ पर रोक रहेगी।

वर्शिप एक्ट पर याचिकाओं से गुस्साया सुप्रीम कोर्ट, नई पर लगाई रोक: ओवैसी-कॉन्ग्रेस समर्थन में पहुँच चुके शीर्ष अदालत

सुप्रीम कोर्ट ने प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट के मुकदमे में याचिकाओं की बढ़ती संख्या पर नाराजगी जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देने के लिए दायर की जाने वालीनई याचिकाएँ ना स्वीकार किए जाने का आदेश दिया है। इस मामले की सुनवाई तीन जज की संविधान बेंच करने वाली है।

सोमवार (17 फरवरी, 2025) को प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट मुकदमे की सुनवाई के दौरान CJI संजीव खन्ना ने कहा कि मामले में दखल देने वाली याचिकाओं पर एक सीमा होनी चाहिए। उन्होंने याचिकाओं की बड़ी संख्या को देखते हुए सोमवार को इस मामले की सुनवाई से इनकार कर दिया।

याचिकाओं से सुप्रीम कोर्ट हुआ नाराज

CJI संजीव खन्ना ने कहा, “हम आज प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट मामले पर सुनवाई नहीं करेंगे। यह 3 जजों की बेंच का मामला है। बहुत सारी याचिकाएँ दायर की गई हैं। मार्च में इसकी तारीख लगाई जाए। दखल देने वाली याचिका दायर करने की भी एक सीमा होती है।”

CJI संजीव खन्ना ने कह़ा है कि इस मामले में वही याचिकाएँ अब स्वीकार की जाएँगी जो इस मुकदमे के कोई नए पहलू से जुड़ी हों। इसके अलावा दायर हो चुकी याचिकाओं में से जिन पर कोई नोटिस जारी नहीं किया गया है, उनको भी कोर्ट ने रद्द कर दिया।

अब इस मामले की सुनवाई अप्रैल, 2025 में एक संवैधानिक मामलों की सुनवाई करने वाली एक बेंच करेगी। गौरतलब है कि प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट के इस मामले में कानून का समर्थन करते हुए कॉन्ग्रेस, जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द, कम्युनिस्ट पार्टी और ज्ञानवापी मस्जिद कमेटी समेत कई लोगों ने याचिका डाली है। इनके अलावा असदुद्दीन ओवैसी, समाजवादी पार्टी इकरा चौधरी ने भी याचिका दाखिल की है।

हिन्दू पक्ष ने कानून को दी है चुनौती

इन सभी ने इस मामले में खुद को पार्टी बनाए जाने की माँग की है। हालाँकि, लगातार आती नई याचिकाओं से सुप्रीम कोर्ट नाराज है। गौरतलब है कि इस कानून को हिन्दुओं की तरफ से सुब्रमण्यम स्वामी, अश्विनी उपाध्याय और बाकी संगठनों ने चुनौती दी है। 

हिन्दू पक्ष ने कहा है कि इस कानून के जरिए उन सभी धार्मिक स्थलों को कानूनी मान्यता दे दी गई जिनका स्वरुप 1947 से पहले बदल दिया गया था। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि इस कानून की धारा 2,3 और 4 को रद्द कर दिया जाए। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि कानून के चलते उन धार्मिक स्थलों को भी वह वापस नहीं ले सकते, जिनको आक्रांताओं ने तोड़ा था।

हिन्दू पक्ष ने इस कानून को संसद में पास किए जाने का भी विरोध किया है। हिन्दू पक्ष का कहना है कि यह ऐसा कानून है जो लोगों को न्यायालय के दरवाजे खटखटाने से रोकता है ऐसे में यह असंवैधानिक है। हिन्दू पक्ष ने इसके अलावा कानून की संवैधानिकता पर भी प्रश्न उठाए हैं।

क्या है 1991 का प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट?

पूजास्थल अधिनियम, 1991 या फिर प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट, 1991 पीवी नरसिम्हा राव की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस सरकार 1991 में लेकर आई थी। इस कानून के जरिए किसी भी धार्मिक स्थल की प्रकृति यानी वह मस्जिद है मंदिर या फिर चर्च-गुरुद्वारा, यह निर्धारित करने को लेकर नियम बनाए गए हैं।

इस कानून के अनुसार, देश के आजाद होने के दिन यानी 15 अगस्त, 1947 को जिस धार्मिक स्थल की स्थिति जैसी थी, वैसी ही रहेगी। यानि इस दिन यदि कोई स्थान मस्जिद था तो वह मस्जिद रहेगा। कानून में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी धार्मिक स्थल का स्वरुप बदलने की कोशिश करेगा तो उसकी 3 वर्ष तक का कारावास हो सकता है।

इसी कानून में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति यदि किसी धार्मिक स्थल के स्वरुप के बदलने को लेकर याचिका कोर्ट में लगाएगा तो वह भी नहीं मानी जाएगी। यानि कोई भी व्यक्ति किसी मस्जिद के मंदिर होने का दावा नहीं कर सकता या फिर किसी मंदिर के मस्जिद होने का दावा नहीं किया जा सकता।

कानून में यह भी स्पष्ट तौर पर कहा है कि यदि यह स्पष्ट तौर पर साबित हो जाए कि इतिहास में किसी धार्मिक स्थल की प्रकृति में बदलाव किए गए थे तो भी उसका स्वरुप नहीं बदला जाएगा। यानी यह सिद्ध भी हो जाए कि किसी मंदिर को इतिहास में तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी तो भी उसे अब दोबारा मंदिर में नहीं बदला जा सकता।

कुल मिलाकर यह कानून कहता है कि 1947 के पहले जिस भी धार्मिक स्थल में जो कुछ बदलाव हो गए या फिर उस दिन जैसे थे, वह वैसे ही रहेंगे। उनके ऊपर अब कोई दावा नहीं किया जा सकेगा। इसी कानून में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को छूट दी गई थी।

इस कानून में कई छूट भी दी गई हैं। यह कानून कहता है कि यदि किसी धार्मिक स्थल में बदलाव 15 अगस्त, 1947 के बाद हुए हैं तो ऐसे में कानूनी लड़ाई हो सकती है। इसके अलावा ASI द्वारा संरक्षित स्मारकों को लेकर भी इसमें छूट दी गई है।

बिहार में हनुमान चालीसा पाठ से लौट रहे लोगों पर पत्थरबाजी, इंटरनेट बंद: चश्मदीदों ने बताया- मस्जिद के पास हुआ हमला, 300+ की मुस्लिम भीड़ में शामिल थे औरत और बच्चे भी

बिहार के जमुई में हनुमान चालीसा पाठ करके लौट रहे हिन्दुओं पर हमला किया गया। भीड़ ने हिन्दुओं के काफिले को घेर कर हमला किया और ईंट-पत्थर बरसाए। उन्होंने कई गाड़ियाँ तोड़ दीं। हिन्दू कार्यकर्ताओं ने बताया है कि हमला करने वाले मुस्लिम थे। इस हमले में महिलाएँ भी घायल हुई हैं। पुलिस के अधिकारी इस घटना के बाद मौके पर पहुँच गए हैं। जमुई में इंटरनेट बंद कर दिया है। पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जमुई के बलियाडीह गाँव में रविवार (16 फरवरी, 2025) को हिन्दू स्वाभिमान संगठन के कार्यकर्ता हनुमान चालीसा पाठ के लिए गए थे। हनुमान चालीसा पाठ करने के बाद यह कार्यकर्ता जब वापस निकले तो मस्जिद के पास एक भीड़ ने इनकी गाड़ियों पर हमला कर दिया।

यह हमला गाँव के मुस्लिम बहुल इलाके से गुजरते हुए हुआ। हमला करने वाली भीड़ ने इनकी गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए और ईंट पत्थर चलाए। हमले में हिन्दू स्वाभिमान संगठन के जिलाध्यक्ष नीतीश कुमार और हिन्दू कार्यकर्ता खुशबू पाण्डेय समेत लभग 10 कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हो गए।

न्यूज 18 बिहार के अनुसार, बलियाडीह गाँव में हुए हमले में महिलाएँ और बच्चे तक शामिल थे। हमले में घायल एक कार्यकर्ता ने बताया, “हमलोग हनुमान चालीसा करके वापस लौट रहे थे, इतने में ही 300-400 लोगों ने हमला कर दिया।” एक और कार्यकर्ता ने बताया कि मुस्लिम इलाके में उन पर बिना किसी कारण के पथराव हुआ और गाड़ियाँ तोड़ी गईं।

हमले में घायल खुशबू पाण्डेय ने बताया, “बलियाडीह गाँव में भालेश्वर नाथ मंदिर में हनुमान चालीसा का कार्यक्रम था। प्रसाद ग्रहण करके वापस लौटने के दौरान मस्जिद से कुछ दूरी पहले ही अचानक से पथराव होना चालू हो गया। गाड़ी तोड़ी गई। वहाँ अल्लाह हू अकबर के नारे लग रहे थे।”

खुशबू पाण्डेय ने बताया कि उन्हें ढूंढ कर मारने की योजना चल रही थी और पुलिस पर भी हमला करने की बात हो रही थी। बताया गया है कि कई घंटे तक हिन्दू कार्यकर्ता इलाके में फंसे रहे। घटना के कुछ वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। इसमें पत्थरबाजी होती दिखती है।

मामले में स्थानीय स्तर के पुलिसकर्मियों के द्वारा लापरवाही की बात भी सामने आई है। हालाँकि, घटनास्थल पर पहुँचे पुलिस बल ने शांति कायम करवा दी है। पुलिस ने जमुई में अफवाह फैलने से रोकने के लिए इन्टरनेट भी बंद करवा दिया है। जमुई के एसपी मदन कुमार आनंद ने इस कार्रवाई की जानकारी दी है।

उन्होंने बताया, “हनुमान चालीसा कर लौट रहे लोगों के खिलाफ नारेबाजी के बाद पुलिस पार्टी ने उच्चाधिकारियों को सूचना नहीं दी। उन्होंने खुद ही मामला हैंडल करने की कोशिश की और रास्ता भी बदलने की बात की। हमने उनसे स्पष्टीकरण माँगा है और साथ ही निलंबित भी कर दिया है।”

पुलिस ने इस घटना के बाद मुकदमा दर्ज किया है। इसमें 8 लोगों को नामजद जबकि 50 लोगों को अज्ञात में आरोपित बनाया है। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 9 उपद्रवियों को गिरफ्तार भी किया है। गाँव में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिसबल तैनात है।

भारत को चीन के हवाले करना चाहती है कॉन्ग्रेस? पहले नेहरू ने जमीन गँवाया, अब कॉन्ग्रेस नेता सैम पित्रोदा बोले- वे दुश्मन नहीं: राहुल गाँधी भी करते रहे हैं तारीफ

इंडियन ओवरसीज़ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष और राहुल गाँधी के करीबी सहयोगी सैम पित्रोदा ने सोमवार (17 फरवरी 2025) को चीन को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि चीन को हमारा दुश्मन मानने की जरूरत नहीं है और इसे बेवजह बड़ा मुद्दा बनाया जा रहा है।

IANS से बातचीत में पित्रोदा ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि चीन से कोई बड़ा खतरा है। इस विषय को कई बार बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।”

पित्रोदा ने अमेरिका पर चीन के खिलाफ माहौल बनाने का आरोप लगाया और भारत की भी आलोचना की कि वह चीन के प्रति टकराव का रवैया अपनाता है।

सैम पित्रोदा ने कहा, “हमारी सोच शुरू से ही टकराव वाली रही है, और यही रवैया हमें दुश्मन बनाता है। हमें इस पैटर्न को बदलने की जरूरत है।”

पित्रोदा ने चीन को लेकर नरमी भरा रुख अपनाते हुए कहा, “शुरू से ही यह मान लेना कि चीन हमारा दुश्मन है, न चीन के लिए सही है और न ही किसी और के लिए।”

उन्होंने चीन की तारीफ करते हुए कहा कि भारत को उसके साथ संवाद, सहयोग और सह-निर्माण पर जोर देना चाहिए, न कि ‘कमांड और कंट्रोल’ मानसिकता अपनानी चाहिए। उन्होंने आगे कहा, “चीन हमारे आसपास है, चीन आगे बढ़ रहा है।”

राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस का ‘चीन प्रेम’

राहुल गाँधी पहले भी चीन की खुलकर तारीफ कर चुके हैं।

मार्च 2023 में कैम्ब्रिज बिजनेस स्कूल में अपने विवादित भाषण में राहुल गाँधी ने चीन को ‘महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाला’ और ‘प्राकृतिक शक्ति’ बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि चीन में ‘सामाजिक समरसता’ है।

राहुल गाँधी ने चीन की विवादित और आक्रामक बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का भी समर्थन किया था। 2022 में ‘द प्रिंट’ की कॉलमनिस्ट श्रुति कपिला से बातचीत में उन्होंने कहा था कि चीन अपने आसपास के देशों की तरक्की चाहता है।

हालाँकि, 2023 में लद्दाख दौरे के दौरान राहुल गाँधी ने यह भी कहा था कि “चीन ने लद्दाख में भारत की चरागाह भूमि पर कब्जा कर लिया है।” लेकिन 2022 में ब्रिटेन में उन्होंने बयान दिया था कि “लद्दाख, चीन के लिए वही है, जो रूस के लिए यूक्रेन है।”

राहुल गाँधी ने 2020 में विदेशी ताकतों से भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की अपील भी की थी।

चीन और कॉन्ग्रेस का गुप्त समझौता

राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) और चीन के बीच वित्तीय लेन-देन की जानकारी 2020 में सामने आई थी। ऑपइंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2006 के बाद चीनी सरकार ने RGF को 1 करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग दी थी।

2008 में UPA सरकार के दौरान कॉन्ग्रेस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के बीच एक समझौता (MoU) हुआ था। इसमें दोनों दलों को “महत्वपूर्ण द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर विचार-विमर्श करने का अवसर” देने की बात कही गई थी।

राजीव गाँधी फाउंडेशन में 2005 से ही राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा ट्रस्टी के रूप में जुड़े हुए हैं, जबकि सोनिया गाँधी इसकी चेयरपर्सन हैं।

दिलचस्प बात यह है कि 2017 के डोकलाम विवाद के दौरान राहुल गाँधी ने गुपचुप तरीके से चीन के राजदूत लुओ झाओहुई से मुलाकात की थी। इसके अलावा साल 2018 में कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान उन्होंने गुपचुप तरीके से चीनी मंत्रियों से भी मुलाकात की थी।

यहाँ ये बात बताना भी जरूरी है कि राहुल गाँधी के परनाना और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा देकर आँख मूँदकर बैठ गए थे और चीन ने 1962 में भारत पर हमला कर दिया था। इस युद्ध में भारत की पराजय हुई थी। इससे सबक लेने की जगह बाद की कॉन्ग्रेस लीडरशिप ने भी चीन प्रेम जारी रखा।

पहले ही साफ हो गई रहती यमुना, लेकिन केजरीवाल ने नहीं होने दिया: दिल्ली के LG ने AAP सरकार की कारस्तानी उजागर की, 4 चरणों में सफाई का बनाया प्लान-नदी में उतरीं मशीनें

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार जाते ही यमुना नदी की सफाई चालू हो गई है। यमुना की सफाई के लिए सबसे पहले बड़ी मशीनें गंदगी निकालने को लगाई गई हैं। यमुना सफाई का यह काम दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना के प्रयास के बाद चालू हुआ है। इस बीच उनका एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें वह बता रहे हैं कि केजरीवाल सरकार के दौरान क्यों यमुना साफ़ नहीं हो पाई और कैसे मुख्यमंत्री रहते हुए अरविन्द केजरीवाल ने ही यमुना की सफाई के खिलाफ रोक लगवा दी थी।

दिल्ली में रविवार (16 फरवरी, 2025) को  ट्रैश स्कीमर, वीड हार्वेस्टर और ड्रेज यूटिलिटी क्राफ्ट जैसी बड़ी-बड़ी मशीनें यमुना के लिए भेजी गईं। इन मशीनों को यमुना में उतार कर जलकुम्भी और पानी की सतह पर पड़ा कचरा उठाया जाने लगा। इसके अलावा ड्रेजर के जरिए यमुना के भीतर से कूड़ा निकाला जा रहा है। इसकी वीडियो भी सामने आई हैं। यमुना में कूड़ा निकालने के अलावा खरपतवार निकालने पर भी काम चल रहा है। यमुना गन्दी ना हो, इसके लिए 4 सूत्रीय कार्यक्रम बनाया गया है।

LG विनय कुमार सक्सेना ने बताया है कि सबसे पहले यमुना से कूड़ा कचरा निकाला जाएगा। दूसरे चरण में यमुना में गंदगी लाने वाले हर प्रकार के नाले की सफाई की जाएगी। तीसरे चरण में दिल्ली सीवर ट्रीटमेंट कैपेसिटी को सही चलाने पर काम होगा। इसके बाद चौथे चरण में दिल्ली में सीवर क्षमता बढ़ाने, नए STP बनाने, नए नाले बनाने समेत बाकी इन्फ्रा से जुड़े हुए काम होंगे। यह रणनीति लागू करने के लिए LG सक्सेना ने दिल्ली सरकार के अफसरों से भी मुलाक़ात की है।

यमुना साफ़ करने को लेकर लगातार प्रयास चलते आए हैं लेकिन दिल्ली की केजरीवाल सरकार ही इसमें अडंगा लगाती रही है। यह खुलासा भी विनय सक्सेना ने किया है। उन्होंने इस संबंध में भाजपा के पूर्व राज्यसभा एमपी विनय सहस्त्रबुद्धे के साथ पॉडकास्ट में खुलासा किया है कि यमुना सफाई का काम अरविन्द केजरीवाल की AAP सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाकर रुकवाया था।

LG सक्सेना ने बताया, “नजफगढ़ नाले से ही 74% कचरा यमुना में आता है। हमने उसको साफ़ करने का बीड़ा उठाया था। नजफगढ़ नाले का 20 किलोमीटर और यमुना का 11 किलोमटर का एरिया हमने साफ करवाना चालू किया था। इसमें जनता ने भी सहभागिता की। हमने NGT के मुखिया को बुलाया और यमुना तथा नजफगढ़ नाला दिखाया… उन्होंने हमारे काम को देख कर सभी विभागों की एक उच्च स्तरीय कमिटी बनाई जिसमें राज्य और केंद्र के विभाग शामिल थे। उन्होंने मुझे इसका चेयरमैन बना दिया।”

उन्होंने आगे बताया, “केजरीवाल साहब मुझसे हमेशा मिलते थे और मेरे काम की प्रशंसा करते थे। वह कहते थे कि हम यह नहीं कर पाए लेकिन आप कर रहे हैं और हम इस में आपका साथ देंगे। मैंने एक बार उनको नजफगढ़ नाला दिखाने के लिए बुलाया। उनको इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि 57 किलोमीटर का नजफगढ़ नाला भी दिल्ली में है। इसके कुछ ही दिनों के बाद एक सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर आया और यमुना की सफाई पर रोक लग गई।”LG विनय सक्सेना की यह बातचीत आप नीचे लगे वीडियो में 30 मिनट के बाद सुन सकते हैं।

LG सक्सेना ने बताया कि इस आदेश के लिए केजरीवाल सरकार सुप्रीम कोर्ट गई थी। उन्होंने बताया कि केजरीवाल यमुना सफाई का क्रेडिट नहीं किसी को ले जाने देना चाहते थे, इसीलिए वह सुप्रीम कोर्ट गए। उन्होंने बताया कि तब से ही यमुना में सफाई का काम रुक गया।

असम सरकार का पाकिस्तानी तौकीर शेख के खिलाफ FIR का आदेश, कॉन्ग्रेस MP गौरव गोगोई की बीवी का था सुपरवाइजर: ISI कनेक्शन का आरोप

कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई की ब्रिटिश पत्नी के सुपरवाइजर रहे पाकिस्तानी अली तौकीर शेख के खिलाफ अब जाँच होगी। असम सरकार ने अली तौकीर शेख के खिलाफ एक FIR दर्ज किए जाने का आदेश दिया है। पुलिस अब अली तौकीर शेख और उसके गौरव गोगोई की पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न के साथ लिंक पर जाँच करेगी।

रविवार (16 फरवरी, 2025) को असम कैबिनेट की बैठक में इस मामले की जाँच करवाने का फैसला लिया गया। कैबिनेट ने असम DGP को इस मामले में एक केस दर्ज करने का आदेश दिया है। कैबिनेट ने कहा है कि पुलिस असम और पूरे भारत में अली शेख के नेटवर्क की जाँच करे।

कैबिनेट ने भारत में उन लोगों और संगठनों की जाँच करने को भी कहा है, जो अली तौकीर शेख से जुड़े हुए थे और उसके काम में सहायता की थी। असम कैबिनेट ने कहा है कि इस जाँच के लिए पुलिस केन्द्रीय एजेंसियों की सहायता भी ले और पूरी सच्चाई सामने रखे।

असम कैबिनेट ने कहा है कि तौकीर पाकिस्तान सरकार से जुड़ा रहा है और CDKN तथा LEAD पाकिस्तान नाम के दो संगठन भी चलाता था। इनमें एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई भी हिस्सा थीं। यह संगठन भारत और पाकिस्तान दोनों में काम करते हैं। कैबिनेट ने कहा कि एलिजाबेथ और तौकीर के जुड़े होने की बात भी सामने आई है।

कैबिनेट ने कहा है कि एक पाकिस्तानी का भारत के आंतरिक और नीतिगत मामलों में ऐसा दखल संदेह पैदा करता है। कैबिनेट ने कहा कि कथित तौर पर पर्यावरण के लिए काम करने वालों का असल उद्देश्य क्या था, इसको लेकर जाँच की जानी चाहिए।

CM हिमंता बिस्वा सरमा ने इस मामले में कैबिनेट बैठक के बाद कहा, “अली के सोशल मीडिया पोस्ट से पता चलता है कि वह भारत विरोधी और असम विरोधी हैं। इसलिए एक सांसद की पत्नी का शादी के बाद भी पाकिस्तान जाना निश्चित रूप से संदेह और सवालों को जन्म देता है। कैबिनेट ने आज DGP से इस मामले में जाँच करने को कहा है।”

उन्होंने कहा, “एलिजाबेथ ने 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में गौरव गोगोई के प्रचार के दौरान भी काम किया था। इसलिए पुलिस इस बात की भी जाँच करेगी कि क्या उन्होंने भारत की चुनाव प्रक्रिया में भाग लेकर अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया है।”

गौरतलब है कि गौरव गोगोई की ब्रिटिश नागरिक पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न ने 2011 से 2015 के बीच पाकिस्तान में काम किया है। उनके दिल्ली में भी काम करने के दौरान एक सुपरवाईजर पाकिस्तानी था। मुख्यमंत्री बिस्वा सरमा ने उनके इस्लामाबाद जाने और विवाह के 13 वर्षों तक भारतीय नागरिकता नहीं लेने को लेकर भी प्रश्न खड़े किए थे। अब इस पर जाँच होगी।

वहीं कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने इस मामले में लगाए गए आरोपों को निराधार बताया है। उन्होंने इस मामले में कानूनी कार्रवाई करने की बात भी कही है। उन्होंने इसे जनता का ध्यान भटकाने की एक साजिश करार दिया है।

अमेठी के उस मंदिर में गूँजा ‘हर हर महादेव का नारा’, जिसे मुस्लिमों ने कर किया था बंद: 20 साल बाद हुई पूजा, दलित जेठूराम ने 120 साल पहले कराया था निर्माण

उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में मुसाफिरखाना थाना क्षेत्र के औरंगाबाद गाँव में स्थित 120 साल पुराने पंच शिखर शिव मंदिर में 20 साल बाद पूजा-अर्चना संपन्न हुई। प्रशासन की सख्ती और भारी पुलिस सुरक्षा के बीच रविवार (16 फरवरी 2025) को मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हवन-पूजन हुआ। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूँज उठा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मंदिर दलित (अनुसूचित वर्ग) के जेठूराम द्वारा 120 वर्ष पूर्व बनवाया गया था, लेकिन बीते 20 सालों से मुस्लिमों द्वारा अतिक्रमण कर इसे बंद करवा दिया गया था। ग्रामीणों ने पंच शिखर शिव मंदिर की मुक्ति के लिए प्रशासन से गुहार लगाई थी, जिसके बाद कार्रवाई करते हुए मंदिर को पुनः भक्तों के लिए खोल दिया गया।

पूजा-अर्चना संपन्न होने के बाद श्रद्धालुओं ने इसे सनातन धर्म की विजय बताया। मंदिर परिसर और आस-पास पीएसी सहित भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। सीओ मुसाफिरखाना अतुल सिंह और तहसीलदार स्वयं मौके पर उपस्थित रहे।

भाजपा के जिला मंत्री अतुल सिंह ने कहा कि यह हिंदू समाज की धार्मिक आस्था की जीत है। वहीं, एक बुजुर्ग श्रद्धालु ने कहा कि वर्षों बाद अपने मंदिर में पूजा कर गर्व महसूस हो रहा है।

ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर पहले पुजारी गणेश तिवारी और उनके परिवार की देखरेख में था, लेकिन दो दशक पहले उन्हें मजबूरी में पलायन करना पड़ा। इसके बाद मंदिर पर मुस्लिमों ने अतिक्रमण कर लिया और पूजापाठ बंद हो गई। अब प्रशासन की कार्रवाई से मंदिर भक्तों के लिए पुनः खुल गया है। धार्मिक संगठनों और हिंदू समाज ने इस फैसले का स्वागत किया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि अमेठी और उसके आसपास के क्षेत्रों में ऐसे कई ऐतिहासिक धार्मिक स्थल हैं, जो विभिन्न कारणों से बंद पड़े हैं या अतिक्रमण का शिकार हो चुके हैं। स्थानीय लोगों की माँग है कि प्रशासन अन्य मंदिरों को भी मुक्त कराए और धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखे।

‘फाँसी ना लगा लें, इसलिए उतरवाई पगड़ी’, अमेरिका से डिपोर्ट हुए शख्स ने बताया: तीसरी फ्लाइट 112 को लेकर आई, 75 हरियाणा-पंजाब जबकि 33 गुजरात से

अमेरिका में ‘डंकी’ रूट के सहारे घुसने वाले भारतीयों के डिपोर्ट होने का सिलसिला लगातार जारी है। अमेरिका से 112 अवैध प्रवासियों का एक जत्था भारत वापस भेजा गया है। अमेरिकी वायुसेना का एक विमान इन 112 लोगों को अमृतसर लेकर पहुँचा है। इनमें अधिकांश लोग हरियाणा, पंजाब और गुजरात से हैं।

घुसपैठियों का यह तीसरा जत्था रविवार (16 फरवरी, 2025) शाम को अमृतसर के गुरु रामदास एयरपोर्ट पहुँचा। इन 112 लोग में 44 हरियाणा, 33 गुजरात जबकि 31 लोग पंजाब से थे। 2 लोग उत्तर प्रदेश और 1 उत्तराखंड जबकि 1 हिमाचल प्रदेश से था।

सुरक्षा एजेंसियों ने अमेरिका से वापस किए गए 112 लोगों से कुछ देर पूछताछ की और 17 फरवरी, 2025 की सुबह उन्हें उनके घर के लिए रवाना कर दिया। हरियाणा ने अपने यहाँ के लोगों के लिए एक बस भेजी थी जबकि पंजाब ने भी कुछ वाहनों का इंतजाम किया था।

इससे पहले शनिवार को भी एक विमान से 119 भारतीय वापस भेजे गए थे। इनमें भी अधिकांश हरियाणा, पंजाब और गुजरात से थे। इस विमान से वापस आए लोगों ने हथकड़ियाँ लगाने, बेड़ियाँ पहनाने और पगड़ी उतारने सम्बन्धी शिकायत की थी।

इससे पहले 5 फरवरी, 2025 को आई एक फ्लाइट के लोगो ने भी ऐसी ही शिकायत की थी। हालाँकि, अब डिपोर्ट होने वाले शख्स ने ही इसका कारण बताया है। अमेरिका से डिपोर्ट किए गए 25 वर्षीय मनदीप सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए बताया है कि बेड़ियाँ और हथकड़ी की कार्रवाई सुरक्षा के लिए की गई थी।

मनदीप सिंह ने बताया कि अमेरिका से डिपोर्ट किए जाने पर कई लोग काफी डिप्रेशन में होते हैं और वह विमान के भीतर ही कोई कदम उठा सकते हैं, ऐसे में उन्हें रोकने के लिए ही यह बेड़ियाँ-हथकड़ी पहनाई गईं।

मनदीप सिंह ने कहा, “हमें भी हथकड़ी और जंजीरों से बांध दिया गया था, ठीक वैसे ही जैसे 5 फरवरी को भेजे गए लोगों के साथ किया गया था। हम लगभग 66 घंटे नरक जैसी स्थिति में रहे।लेकिन यह डिपोर्ट हो रहे लोगों की सुरक्षा के लिए था क्योंकि कोई दूसरों की मनोस्थिति का अंदाजा नहीं लगा सकता है, और डिप्रेशन में कुछ भी हो सकता है।”

मनदीप सिंह ने बताया, “डिपोर्ट किए जाने के बाद हमारी मानसिक हालत ठीक नहीं होती। हममें से कई डिप्रेशन में होते हैं… इस तरह का डिप्रेशन न केवल हमारे लिए बल्कि विमान में मौजूद सभी लोगों के लिए ख़तरा बन सकती थी। इसलिए, किसी नुकसान से बचने के लिए, अधिकारियों के पास हमें बेड़ियों मे बाँधने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।”

वहीं पगड़ी उतारने को लेकर भी एक सिख युवा ने सच्चाई बताई है। अमेरिका से वापस भेजे गए युवक जसविंदर सिंह ने बताया, “मुझे 27 जनवरी को हिरासत में लिया गया और डिटेंशन सेंटर ले जाया गया, वहाँ उन्होंने मुझसे मेरी पगड़ी सहित मेरे सारे कपड़े उतारने को कहा।”

जसविंदर ने बताया, “मैंने और दूसरे सिख युवकों ने उनसे कम से कम हमारी पगड़ियाँ लौटाने को कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर तुममें से कोई भी फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेता है, तो इसके लिए कौन ज़िम्मेदार होगा?”

गौरतलब है कि अमेरिका से अब तक अमेरिका से तीन फ्लाइट भारत आ चुकी हैं। इनमें से एक में 104, दूसरी में 119 जबकि तीसरी में 112 भारतीय वापस भेजे गए हैं। कुल मिलाकर अभी तक 335 भारतीय वापस भेजे जा चुके हैं। आने वाले दिनों में और भी भारतीय डिपोर्ट होने की आशंका है।