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विकिपीडिया का भारत के खिलाफ षड्यंत्र: क्या है कार्यशैली, किसके साथ वित्तीय लेन-देन, कैसे करता है सूचनाओं पर कंट्रोल – पढ़िए विस्तृत दस्तावेज

यह डोज़ियर (दस्तावेज) यह प्रदर्शित करने और निर्णायक रूप से स्थापित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है कि विकिपीडिया, एक स्वतंत्र, संपादकीय हस्तक्षेप से मुक्त विश्वकोश नहीं है, जैसा कि विकिमीडिया फाउंडेशन दावा करता है। विकिमीडिया फाउंडेशन दावा करता है कि विकिपीडिया दुनिया भर के हजारों अवैतनिक, उत्साही स्वयंसेवकों के स्वैच्छिक कार्य पर निर्भर करता है।

यह डोज़ियर विशेष रूप से भारत, भारतीय कानूनों और भारत से संबंधित सामग्री पर केंद्रित है, ताकि विकिपीडिया को एक ‘प्रकाशक’ के रूप में मानने के बारे में सिफारिशें तैयार की जा सकें, जो अपने प्लेटफ़ॉर्म पर प्रकाशित सामग्री के लिए सीधे जिम्मेदार है। ‘प्रकाशक’ शब्द से यहाँ मतलब है भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 में तय किए गए दिशा-निर्देश। इसके तहत वेबसाइट को दो कैटेगिरी में रखा गया है – इंटरमीडियरी और प्रकाशक।

फोटो साभार: MIB + सर्वे ऑफ इंडिया

यह डोज़ियर विकिपीडिया और इसकी मूल कंपनी, विकिमीडिया फाउंडेशन के विभिन्न पहलुओं का संक्षेप में विश्लेषण करता है, ताकि विकिपीडिया को “सभी के लिए स्वतंत्र रूप से संपादन योग्य विश्वकोश” के रूप में प्रस्तुत करने के फाउंडेशन के दावों, विश्वसनीय स्रोतों का उपयोग करने, तटस्थ दृष्टिकोण बनाए रखने, और दान पर निर्भर रहने जैसे दावों को समझा जा सके।

डोज़ियर यह भी जाँच करता है कि विकिमीडिया फाउंडेशन को मिलने वाले अनुदान, इन्हें देने वाली संस्थाएं, और एनजीओ व अन्य इकाइयों को दिए गए अनुदानों का विवरण क्या है। इसके अलावा, यह समझने का प्रयास करता है कि भारत में अपनी भौतिक उपस्थिति बनाए बिना, विकिमीडिया फाउंडेशन कैसे भारत में कार्यरत है और अपने व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए विभिन्न संस्थाओं को वित्तपोषण कर रहा है।

यह डोज़ियर सबसे पहले विकिपीडिया के स्पष्ट वामपंथी झुकाव पर मौजूदा शोधों की जाँच करता है और उन तत्वों का विश्लेषण करता है जो इस झुकाव में योगदान देते हैं। उद्धृत किए गए सभी चार शोध-पत्रों में स्पष्ट निष्कर्ष है कि विकिपीडिया में एक अंतर्निहित वामपंथी झुकाव है। विकिपीडिया के “NPOV” (तटस्थ दृष्टिकोण) दिशा-निर्देश का अर्थ यह नहीं है कि विचारों के पूरे स्पेक्ट्रम को समान या उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा। “NPOV” का परिणाम केवल इतना है कि “विश्वसनीय स्रोत” में उल्लेखित विवरणों को शामिल किया जाएगा। लेकिन “विश्वसनीय स्रोत” का चयन ही पक्षपातपूर्ण है, क्योंकि विकिपीडिया में अत्यधिक शक्तिशाली संपादक और प्रशासक “दक्षिणपंथी” (गैर-वामपंथी) स्रोतों को हतोत्साहित या ब्लैकलिस्ट कर देते हैं, जिससे वे स्रोत विकिपीडिया लेखों में संदर्भ सामग्री के रूप में शामिल नहीं किए जा सकते।

विकिपीडिया के सह-संस्थापक लैरी सैंगर ने स्पष्ट रूप से कहा है कि विकिपीडिया में एक स्पष्ट वामपंथी झुकाव है। कई साक्षात्कारों और वार्ताओं में उन्होंने यह बताया है कि विकिपीडिया कैसे संतुलन के पैमाने को विकृत करता है, जिससे जानकारी वास्तविकता का सटीक प्रतिनिधित्व नहीं करती और वामपंथी पक्षपात से ग्रस्त होती है।

यह डोज़ियर और शोध-पत्र यह पाता है कि विकिपीडिया की संरचना ही कुछ व्यक्तियों, जिन्हें ‘प्रशासक’ कहा जाता है, को अनियंत्रित शक्ति देती है। पूरी दुनिया में केवल 435 सक्रिय प्रशासक हैं, जिनके पास संपादकों को प्रतिबंधित करने, स्रोतों को ब्लैकलिस्ट करने, योगदानकर्ताओं पर प्रतिबंध लगाने और लेखों पर किए गए संपादन को स्वीकृत या अस्वीकार करने की शक्ति है। ये प्रशासक विकिपीडिया पर सामग्री के संबंध में असीमित शक्ति रखते हैं।

इस शोध में यह भी पाया गया है कि इनमें से कई संपादक और प्रशासक विकिमीडिया फाउंडेशन द्वारा विकिमीडिया से संबंधित परियोजनाओं के लिए अनुदानों के रूप में भुगतान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार यह निर्णायक रूप से सिद्ध होता है कि विकिपीडिया वह “सभी के लिए स्वतंत्र रूप से संपादन योग्य मॉडल” नहीं है, जैसा कि यह दावा करता है। स्वयं जिमी वेल्स ने भी स्वीकार किया है कि वह विकिपीडिया पर सामग्री का अंतिम मध्यस्थ है।

यह शोध विकिमीडिया फाउंडेशन को मिलने वाले धन और उसके व्यय के विश्लेषण पर केंद्रित है, विशेष रूप से भारत के संदर्भ में। यह पाया गया कि विकिमीडिया फाउंडेशन को ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, रॉकफेलर फाउंडेशन, टाइड्स फाउंडेशन और इनके ही जैसे अन्य प्रेरित-निर्देशित फंडों से करोड़ों डॉलर प्राप्त होते हैं। गूगल भी विकिमीडिया फाउंडेशन को लाखों डॉलर दान करता है और विकिपीडिया सामग्री को बढ़ावा देता है, जिसमें “एब्सट्रैक्ट विकिपीडिया” जैसी परियोजनाओं का वित्तपोषण शामिल है, जिसका उद्देश्य इंटरनेट पर वर्चस्व स्थापित करना है।

विकिमीडिया फाउंडेशन के वित्तीय संबंध टाइड्स फाउंडेशन के साथ गहरे हैं, जिस पर जॉर्ज सोरोस के साथ मिलकर अमेरिकी विश्वविद्यालयों में हमास के समर्थन में विरोध-प्रदर्शन का वित्तपोषण करने का आरोप है।

विकिमीडिया और टाइड्स फाउंडेशन कई ऐसी संस्थाओं को भी फंड करते हैं, जो विशेष रूप से भारत के हितों के खिलाफ कार्य करती हैं और विभिन्न स्तरों पर इसकी संप्रभुता को कमजोर करती हैं।

विकिमीडिया फाउंडेशन और टाइड्स फाउंडेशन के संबंध संदिग्ध संगठनों जैसे हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स, इक्वालिटी लैब्स, आर्ट+फेमिनिज्म, एक्सेस नाउ और भारतीय उद्योगपतियों के खिलाफ ‘हिंडनबर्ग हिट जॉब’ जैसे मामलों के साथ जुड़े पाए गए हैं।

भारत में, विकिमीडिया फाउंडेशन की कोई भौतिक उपस्थिति नहीं है। इसकी पंजीकृत सोसायटी, जो पहले भारत में थी, 2019 में बंद हो गई थी। भारत में उपस्थित न होते हुए भी विकिमीडिया फाउंडेशन दान के रूप में लाखों रुपये एकत्र करता है और भारत में एनजीओ को फंड करता है, जो विकिमीडिया फाउंडेशन के व्यावसायिक हितों को आगे बढ़ाते हैं। इन संगठनों में सभी वामपंथी झुकाव वाले हैं।

विकिपीडिया पर सामग्री के संदर्भ में, यह पाया गया कि संपादकों और प्रशासकों का एक छोटा समूह भारत में सामग्री को विकृत करता है। इसमें एक वो संपादक भी शामिल है, जिस पर मणिपुर राज्य में असंतोष फैलाने और कलह उत्पन्न करने के लिए केस दर्ज किया गया है। ये संपादक अक्सर विकिपीडिया लेखों में तथ्यों (जिनसे उन्हें असुविधा हो) और वैकल्पिक दृष्टिकोण जोड़ने के प्रयासों को बाधित करते हैं। इसके अलावा, गूगल और विकिमीडिया फाउंडेशन की साझेदारी के कारण सामग्री में विशिष्ट हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी पक्षपात देखा गया है।

यह डोज़ियर शोधकर्ता द्वारा सुझाई गई सिफारिशों की सूची के साथ समाप्त होता है। इन सिफारिशों का उद्देश्य विकिमीडिया फाउंडेशन को जवाबदेह बनाना है, जो भारतीय कानूनों का पालन किए बिना एक संपादकीय दिशा निर्धारित करता है। जबकि विकिमीडिया फाउंडेशन का दावा है कि विकिपीडिया केवल एक मध्यस्थ है, यह पाया गया कि विकिपीडिया “प्रकाशकों” के लिए निर्धारित सभी मानकों को पूरा करता है, जैसा कि आईटी दिशा-निर्देशों में परिभाषित है। इसका अर्थ यह होगा कि विकिमीडिया फाउंडेशन को विकिपीडिया पर सभी सामग्री के लिए उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए और भारतीय कानूनों के अधीन रहने के लिए भारत में अपनी उपस्थिति स्थापित करनी चाहिए, जिसमें एफसीआरए, एनजीओ, आईटी दिशा-निर्देश, वित्तीय प्रकटीकरण मानक और अन्य कानून शामिल हैं।

रिसर्च पेपर में सिफारिशें

विकिमीडिया फाउंडेशन और विकिपीडिया पर किए गए शोध के आधार पर निम्नलिखित सिफारिशें दी गई हैं:

विकिपीडिया को एक प्रकाशक घोषित करना

विकिपीडिया ने खुद को एक मध्यस्थ (intermediary) के रूप में दावा किया है, जो ‘विश्वसनीय स्रोतों’ पर आधारित किसी सामग्री या संपादकीय नीति के हस्तक्षेप के बिना एक समुदाय की बुद्धिमत्ता पर निर्भर करता है तथा तटस्थ दृष्टिकोण बनाए रखता है। हालाँकि, जैसा कि शोध में प्रमाणित हुआ है, यह सच नहीं है। विकिपीडिया प्रकाशकों के मानकों को पूरा करता है। वे वर्तमान घटनाओं और ऐतिहासिक घटनाओं पर जानकारी संकलित करते हैं, वे अपने संपादकों और व्यवस्थापकों को भुगतान करते हैं और वे इंटरनेट पर आम लोगों द्वारा आसानी से उपलब्ध हैं। चूँकि विकिपीडिया का एक संपादकीय दृष्टिकोण है, जो संपादकों और व्यवस्थापकों पर आधारित है, इससे यह प्रमाणित होता है कि वे अब एक मध्यस्थ माने जाने के योग्य नहीं हैं। एक प्रकाशक के रूप में घोषित होने के बाद, विकिमीडिया को भारत में अपने कार्यालय स्थापित करने होंगे, एक शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करनी होगी और भारतीय कानूनों के तहत अवैध सामग्री जो भारत की संप्रभुता को कमजोर करती है या असंतोष उत्पन्न करती है, के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।

वित्तीय लेन-देन की जाँच

विकिमीडिया फाउंडेशन भारत में कई वित्तीय लेन-देन करता है ताकि अपने व्यापारिक हितों को बढ़ावा दे सके और उन वामपंथी संगठनों और व्यक्तियों को वित्तीय सहायता दे सके जो अंततः भारत की संप्रभुता को कमजोर करते हैं और असंतोष उत्पन्न करते हैं। भारत में किसी भी वित्तीय लेन-देन, भुगतान और भारत से धन संग्रह भारतीय कानूनों के अंतर्गत आता है, जिनमें आईटी कानून, एफसीआरए, एनजीओ को नियंत्रित करने वाले कानून और आईटी दिशा-निर्देश आदि शामिल हैं। सरकार को विकिमीडिया फाउंडेशन पर यह दबाव डालना चाहिए कि उन्हें कानूनी रूप से भारत में अपनी आधिकारिक उपस्थिति स्थापित करनी चाहिए और भारतीय कानूनों के अनुसार वित्तीय जाँच के अधीन होना चाहिए।

विकिपीडिया लेखों में पक्षपात चिह्नित करने के लिए ब्राउज़र एक्सटेंशन

इस शोध में जैसी चर्चा की गई है, विकिमीडिया फाउंडेशन ने विकिपीडिया के व्यवस्थापक ‘न्यूज़लिंगर’ को हजारों डॉलर का भुगतान किया है, ताकि एक ऐप और ब्राउज़र एक्सटेंशन तैयार किया जा सके, जो विकिपीडिया के पक्षपाती स्रोतों को टेम्पलेटाइज कर सके – इसका मतलब है कि जब भी कोई व्यक्ति इंटरनेट पर किसी वेबसाइट को पढ़ेगा, तो विकिपीडिया संपादकों के पक्षपाती विचार सामने आएँगे, जो यह तय करेंगे कि कौन सा स्रोत विश्वसनीय है और कौन सा नहीं। विकिमीडिया फाउंडेशन और गूगल के सहयोग से, इसमें कोई संदेह नहीं कि इस परियोजना को लागू किया जा सकता है। भारत सरकार को एक ब्राउज़र एक्सटेंशन पर काम करना चाहिए जो विकिपीडिया लेखों में, कम से कम भारत से संबंधित, पक्षपाती विचारों, गलत जानकारी, फर्जी खबरों और मिथ्या सूचना को चिन्हित कर सके।

विकिपीडिया को प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 के तहत जाँचना

प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002, भारत में एंटीट्रस्ट समस्याओं से निपटने के लिए मुख्य कानून है। यह कानून बाजारों में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने, गलत प्रतिस्पर्धात्मक प्रथाओं को रोकने और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए लागू किया गया था। गूगल और विकिमीडिया फाउंडेशन के सहयोग से विकिपीडिया सामग्री और जानकारी के पक्ष में लाभ उठाते जा रहा है, जिससे भारतीय मीडिया और सामग्री स्रोतों को नुकसान हो रहा है। स्रोतों की उपेक्षा और गूगल तथा विकिमीडिया फाउंडेशन द्वारा पक्षपाती जानकारी को प्रमाणित करने से भारतीय वेबसाइटों की राजस्व और रैंकिंग पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, जिनसे वे संपादकीय रूप से सहमत नहीं होते हैं। गूगल और विकिमीडिया फाउंडेशन की प्रतिस्पर्धा-विरोधी प्रथाओं की जाँच की जानी चाहिए।

रेप कर नाबालिग लड़कों को ‘जिन्न’ दिखलाता था कश्मीर का ‘पीर बाबा’ एजाज अहमद, कोर्ट में बोला पीड़ित- साल भर में 500+ बार किया मेरा यौन शोषण: बीमारी ठीक करने का करता था दावा

जम्मू-कश्मीर में एक ‘पीर बाबा’ ने बीमारी ठीक करने के नाम पर दशक से ज्यादा समय तक छोटे बच्चों का यौन शोषण किया। उसने दर्जन भर बच्चों को अपना शिकार बनाया। उसने अपनी कारस्तानी खोलने वाले बच्चों को धमकाया भी। अब उसे कोर्ट ने दोषी करार दिया है।

जम्मू कश्मीर के सोपोर की एक अदालत ने सोमवार (17 फरवरी, 2025) को इस ‘पीर बाबा’ को दोषी ठहराया है। इस पीर बाबा का असली नाम एजाज अहमद शेख है। उसे इस मामले में 10 वर्ष तक की सजा हो सकती है। उसकी इस कारस्तानी का खुलासा 2016 में हुआ था।

एजाज अहमद की यौन प्रताड़ना का शिकार एक बच्चे ने अपने पिता को उसकी कारस्तानियों के विषय में बताया था। बच्चे ने बताया कि उसके साथ एजाज अहमद लगातार दीनी मार्गदर्शन देने के नाम पर लगातार उसके साथ अप्राकृतिक यौन शोषण करता था। यदि बच्चा इससे इनकार करता तो वह उन्हें डराया करता।

इसके बाद एजाज अहमद के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करवाया गया। इसके बाद ‘पीर बाबा’ एजाज का भंडा फूट गया। उसके खिलाफ लगभग एक दर्जन और बच्चों ने ऐसे ही आरोप लगाए। सामने आया कि एजाज अहमद बच्चों को जिन्न से मिलवाने जैसे झाँसे दिए और उन्हें अपनी अपनी हवस का शिकार बनाया।

एक पीड़ित ने बताया कि एक वर्ष के भीतर उसका 500 से अधिक बार यौन उत्पीड़न किया गया। वहीं एक पीड़ित ने बताया कि एजाज अहमद बच्चों को एक दूसरे के साथ यौन संबंध बनाने को कहता था। यहाँ तक कि 10 साल के बच्चों को भी यौन शोषण का शिकार बनाया गया।

इनमें से कई बच्चे तो अब बालिग़ हो चुके हैं। एजाज शेख लगातार इन बच्चों को धमकाता था कि अगर इन बच्चों ने किसी से यौन शोषण का खुलासा किया तो उनकी जिन्दगी खराब हो जाएगी। वह उन्हें मजहब का खौफ भी दिखाता था।

एजाज अहमद ने मामला दर्ज होने के बाद भी पीड़ितों के परिवार को धमकाया। उसने कहा कि उन सभी परिवारों का नुकसान होगा जिन्होंने उस पर आरोप लगाए हैं। हालाँकि, पीड़ितों के परिवार लगातार उसके खिलाफ मुकदमा लड़ते रहे। इस दौरान कोर्ट ने उन पीड़ित बच्चों से कहानी भी सुनी।

कोर्ट में एजाज अहमद ने दावा किया कि उसे पैसों के विवाद के चलते फँसाया गया है। एजाज अहमद ने इस बात का भी सहारा लिया कि FIR देरी से दर्ज करवाई ही थी। हालाँकि, कोर्ट ने उसकी यह दलीलें मानने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने कहा, “उसने पीड़ितों को उनके नाबालिग होने के दौरान अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया, आशीर्वाद देने की आड़ में उनकी कमज़ोरी का फायदा उठाया।” कोर्ट ने कहा कि एजाज अहमद ने इन बच्चों के आठ यौन उत्पीड़न करके इन्हें शर्मिन्दा कर दिया। कोर्ट ने उसे अब बच्चों के यौन शोषण के मामले में दोषी ठहरा दिया है।

इंस्टाग्राम से नाबालिग छात्राओं को फँसाते, फोटो-वीडियो से ब्लैकमेल करते, फिर कहते- मुस्लिम बनो, अपनी सहेलियों से मिलवाओ: अजमेर जैसे सेक्स स्कैंडल से राजस्थान के ब्यावर में बवाल

राजस्थान के ब्यावर शहर में एक गंभीर मामला सामने आया है, जहाँ स्कूली हिंदू छात्राओं को पहले झांसे में लेकर फँसाया, फिर ब्लैकमेल कर उनका शारीरिक शोषण किया गया। आरोपितों ने लड़कियों को होटल और रेस्टोरेंट में बुलाकर उनकी तस्वीरें और वीडियो बना लिए और बाद में उन्हें धमकाने और धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करने की कोशिश की। इस मामले में पुलिस ने रिहान मोहम्मद (20 वर्ष), सोहेल अंसारी (19 वर्ष), लुकमान (20 वर्ष), अरमान पठान (19 वर्ष), साहिल कुरैशी (19 वर्ष) और 2 नाबालिगों को पकड़ा है।

इंस्टाग्राम पर दोस्ती, फिर जाल में फँसाने की साजिश

पुलिस जाँच में पता चला है कि आरोपित मुस्लिम युवक इंस्टाग्राम के जरिए स्कूल जाने वाली हिंदू छात्राओं से दोस्ती करते थे। वे पहले उन्हें मोबाइल फोन देते, फिर धीरे-धीरे अपने जाल में फंसाते। जब लड़कियाँ उन पर विश्वास करने लगतीं, तो वे उन्हें होटल और कैफे में मिलने के लिए बुलाते। वहाँ उनकी गोपनीय तस्वीरें और वीडियो बनाए जाते थे। इसके बाद ब्लैकमेलिंग का खेल शुरू होता था। आरोपितों ने पीड़ित छात्राओं को उनकी सहेलियों से मिलवाने के लिए मजबूर किया। जब लड़कियों ने इंकार किया तो वीडियो वायरल करने की धमकी दी गई।

तीन महीने से चल रहा था गंदा खेल

पुलिस की जाँच में खुलासा हुआ है कि यह पूरी साजिश पिछले तीन महीनों से चल रही थी। इस गैंग में करीब 15 युवक शामिल थे, जिन्होंने कम से कम पाँच स्कूली छात्राओं को अपना शिकार बनाया। सबसे छोटी पीड़िता महज 15 साल की है। सभी पीड़ित छात्राएँ दसवीं कक्षा में पढ़ती हैं। ये मामला तब खुला, जब एक पीड़ित छात्रा ने आरोपितों को देने के लिए अपने घर से पैसे चुराए। आरोपित इन छात्राओं ने पैसे भी वसूलते थे, ताकि वो अपना मुँह बंद रखें। वो लगातार पीड़ित छात्राओं पर धर्मांतरण का भी दबाव डालते थे।

शिकायत के बाद पुलिस हरकत में आई, 7 आरोपित गिरफ्तार

मामले का खुलासा तब हुआ जब एक पीड़िता के पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। सीओ मसूदा सज्जन सिंह ने बताया कि पीड़ित छात्राओं के परिजनों की शिकायत के तुरंत बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ पोक्सो एक्ट, धारा 376 (बलात्कार), और धर्म परिवर्तन के दबाव से संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।

पुलिस ने अब तक 7 आरोपितों रिहान मोहम्मद (20 वर्ष), सोहेल अंसारी (19 वर्ष), लुकमान (20 वर्ष), अरमान पठान (19 वर्ष), साहिल कुरैशी (19 वर्ष) और 2 नाबालिगों को पकड़ा है। पुलिस ने तीन मोबाइल फोन भी जब्त किए गए हैं। अन्य आरोपितों की तलाश में पुलिस की अलग-अलग टीमें दबिश दे रही हैं।

इस पूरे मामले को लेकर हिंदू संगठनों ने जमकर प्रदर्शन किया और कार्रवाई की माँग की। विहिप की अगुवाई में लोगों ने आरोपितों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की माँग की। विहिप के धनराज कावड़िया का कहना है कि पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई के लिए आश्वस्त किया है।

बता दें कि ब्यावर का मामला अजमेर कांड से मिलता जुलता है, जिसमें सैकड़ों हिंदू लड़कियों की अस्मत लूटी गई थी। इस घिनौने मामले के खुलने के बाद कई लड़कियों ने आत्महत्या भी कर ली थी। उस मामले में अजमेर दरगाह से जुड़े लोगों, कॉन्ग्रेस के पदाधिकारियों पर आरोप लगे थे, जिसमें सजा भी सुनाई गई थी। इस मामले का खुलासा 1992 में हुआ था।

‘आखिरी किश्त मैं भर दूँगा, बस अपनी बेटी से शादी करवा दे’: बाइक लोन लेने वाले हिंदू को रिकवरी एजेंट ‘आहीम खान’ ने धमकाया, जाँच में जुटी UP पुलिस

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में फाइनेंस कंपनी के एजेंट आहीम खान ने एक हिन्दू व्यक्ति को बाइक का लोन ना चुकाने पर प्रताड़ित किया। उसने हिन्दू व्यक्ति की पुत्री का निकाह अपने साथ करवाने का दबाव डाला। आहीम खान ने कहा कि अगर हिन्दू व्यक्ति बेटी का निकाह उससे करवा दे तो वह खुद ही बाकी EMI चुका देगा। इस मामले में पीड़ित ने FIR दर्ज करवाई है।

यह पूरा मामला लखीमपुर खीरी के भीरा थाने का है। यहाँ के रहने वाले पुत्तू लाल ने एक बाइक कर्ज के माध्यम से ली थी। वह इसकी लगातार किश्तें भी भर रहे थे। हालाँकि, पुत्तू लाल बाइक की अंतिम किश्त किसी कारण से नहीं भर पाए, जिसके बाद लोन रिकवरी एजेंट आहीम खान ने उन्हें प्रताड़ित करना चालू किया।

पुत्तू लाल को आहीम खान ने लगातार फोन करके गालियाँ दी और परेशान किया। एक दिन आहीम खान ने पुत्तू लाल को बेटी से निकाह करवाने को कह दिया। आहीम खान ने फोन पर पुत्तू लाल से कहा, “आखिरी किश्त मैं भर दूँगा, बस अपनी लड़की से शादी करवा दे।”

आहीम खान की इन धमकियों का एक ऑडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें वह कथित तौर पर गालियाँ भी बक रहा है। हालाँकि, इस ऑडियो की पुष्टि नहीं हो सकी है। आहीम खान की इस प्रताड़ना से तंग आकर पुत्तू लाल ने पुलिस को शिकायत दी और कार्रवाई की माँग की है।

शिकायत के बाद भीरा थाने में आहीम खान के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है। इसके बाद इस मामले में FIR दर्ज करवाई गई। ऑपइंडिया के पास इस मामले की FIR कॉपी मौजूद है। ऑपइंडिया ने इस मामले में भीरा थाना प्रभारी से भी बात की है।

पीड़ित ने करवाई FIR

ऑपइंडिया से बातचीत में उन्होंने बताया, “अभी आरोपित के विषय में सही डिटेल्स का पता नहीं लगा है। जैसे ही पूरी जानकारी सामने आती है, उसके खिलाफ दबिश डाली जाएगी। कार्रवाई के लिए मुकदमा दर्ज कर लिया गया है, पीड़ित को लगातार फोन से परेशान किया जा रहा था। परेशान करने वाले के फोन के माध्यम से उसकी लोकेशन निकलवाई जा रही है।”

चुनाव आयोग से कॉन्ग्रेस की घृणा जारी, ज्ञानेश कुमार के CEC बनने पर राहुल गाँधी ने जताया ऐतराज: पार्टी नेता ने कहा- शेरो-शायरी वाला गया और कव्वाली वाला आया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई चयन समिति की बैठक में ज्ञानेश कुमार को भारत का नया मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) नियुक्त किया गया। वे राजीव कुमार की जगह लेंगे, जो मंगलवार (18 फरवरी 2025) को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। हालाँकि, इस नियुक्ति पर कॉन्ग्रेस ने कड़ा ऐतराज जताया है। वहीं, महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस नेता ने ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति को लेकर आपत्तिजनक बयान दिया है। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता अतुल लोंढे पाटिल ने उन्हें ‘कव्वाली’ वाला तक कह दिया।

ज्ञानेश कुमार को चुनने वाली समिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी शामिल थे। बैठक के दौरान राहुल गाँधी ने इस चयन प्रक्रिया का विरोध किया और इसे सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका के चलते स्थगित करने की माँग की। उनका कहना था कि जब तक शीर्ष अदालत इस मुद्दे पर निर्णय नहीं ले लेती, तब तक नया सीईसी नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए था।

कॉन्ग्रेस का विरोध क्यों?

पिछले साल केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति से संबंधित नया कानून पारित किया था, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को चयन प्रक्रिया से हटा दिया गया। पहले, यह नियुक्ति सीनियरिटी के आधार पर होती थी और चयन समिति में CJI भी शामिल होते थे। इस बदलाव को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है और इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहा है।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और केसी वेणुगोपाल ने कहा कि सरकार संवैधानिक संस्थाओं पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है और यह संविधान की भावना के खिलाफ है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का हवाला देते हुए कहा कि जब यह मामला 19 फरवरी को अदालत में सुना जाना है, तो सरकार को इतनी जल्दीबाजी नहीं करनी चाहिए थी।

कौन हैं ज्ञानेश कुमार?

ज्ञानेश कुमार, 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। वे उत्तर प्रदेश के आगरा के रहने वाले हैं। उन्होंने आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग और हार्वर्ड विश्वविद्यालय से एनवायरमेंटल इकोनॉमिक्स में विशेषज्ञता हासिल की है। अपने करियर में वे केरल सरकार और भारत सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। वे भारत निर्वाचन आयोग में 14 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए थे।

कॉन्ग्रेस नेता का विवादित बयान

महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता अतुल लोंढे पाटिल ने ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति पर कहा कि “शेरो-शायरी (राजीव कुमार) वाला गया और कव्वाली वाला (ज्ञानेश कुमार) आया”। उन्होंने आरोप लगाया कि चयनित नाम सरकार के हिसाब से काम करेंगे। पाटिल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले ये नियुक्ति गलत है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का इंतजार करना चाहिए था।

इस बीच, सभी की नजरें अब सुप्रीम कोर्ट में है। जिसमें बुधवार (19 फरवरी 2025) को मामले की सुनवाई होनी है।

गिरफ्तारी से बचा, पर कोई भी शो नहीं कर पाएगा रणवीर इलाहाबादिया: सुप्रीम कोर्ट ने ‘BeerBiceps’ को बताया ‘गंदे दिमाग वाला’, कहा- ये और इनके साथी निचले स्तर तक गिर चुके हैं

पॉडकास्टर रणवीर इलाहाबादिया को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल गई है। उनकी गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। कोर्ट ने इलाहाबादिया को जाँच में सहयोग देने को कह़ा है। इलाहाबादिया के कोई भी नए शो करने पर भी सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबादिया को राहत देते हुए उसकी काफी आलोचना की है।

इलाहाबादिया की तरफ से गिरफ्तारी पर रोक लगाने की माँग करने वाली याचिका की सुनवाई मंगलवार (18 फरवरी, 2025) को सुप्रीम कोर्ट ने की है। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस कोटीश्वर सिंह ने की है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “मुंबई और गुवाहाटी में दर्ज FIR के तहत याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी पर रोक लगाई जाती है, बशर्ते कि वह समन किए जाने पर जाँच में शामिल हो। उसे गिरफ्तारी से अंतरिम राहत इस शर्त पर दी गई है कि वह पुलिस थाने के भीतर बिना किसी वकील के जाँच में पूरा सहयोग देगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबादिया को लताड़ लगाते हुए कहा, “इस तरह के व्यवहार की आलोचना की जानी चाहिए। आप समाज को हल्के में नहीं ले सकते क्योंकि आप लोकप्रिय हैं। क्या धरती पर कोई ऐसा है जो उसकी इस भाषा को पसंद करेगा। उसके दिमाग में बहुत गंदगी है जिसकी उसने उल्टी कर दी है। हम उसे राहत क्यों दे भला?”

इलाहाबादिया की भाषा को सुप्रीम कोर्ट ने सभी को शर्मसार करने वाला बताया है। कोर्ट ने कहा, “आपने जो शब्द कहे, उससे माता-पिता, बेटियाँ और बहनें शर्मिंदा होंगी। पूरा समाज शर्मिंदा होगा। आप और आपके साथी निचले स्तर तक गिर चुके हैं। अब मामले में कानून का पालन होना चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलाहाबादिया एक गंदे दिमाग वाला विकृत मानसिकता का व्यक्ति है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि केवल 2 FIR के बाद ही इलाहाबादिया तुरंत सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया। कोर्ट ने कहा कि अगर सैकड़ों FIR होती तो राहत देने की बात होती, लेकिन 2 FIR पर ऐसा क्यों किया गया।

बेंच ने इलाहाबादिया को लेकर कहा, “एक बार जब आप ज्यादा FIR में उलझ जाते हैं तो आपके खुद का बचाव करने के अधिकार पर बहुत बड़ी बाधा आ जाती है। ऐसे में कोर्ट को आपकी रक्षा करनी चाहिए। लेकिन सिर्फ इसलिए कि आप सुप्रीम कोर्ट आने की हैसियत रहते हैं, ऐसे में आपकी मदद क्यों की जाए।”

इलाहाबादिया के अरुणाचल प्रदेश के गवर्नर पर अभद्र कमेन्ट के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ लगाई। इलाहबादिया की तरफ से पेश वकील अभिनव चंद्रचूड़ ने दावा किया कि उन्हें हत्या की धमकियाँ मिल रही हैं। उन्होंने दावा किया कि उनकी जुबान काटने पर ₹5 लाख का इनाम रखा गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि अब रणवीर इलाहाबादिया के अश्लील कमेन्ट के मामले में कोई नई FIR दर्ज नहीं की जाएगी और साथ ही उन्हें गिरफ्तारी से राहत मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा के लिए इलाहाबादिया को स्थानीय प्रशासन और कोर्ट के पास जाने को कहा है।

गौरतलब है कि इलाहाबादिया ने कॉमेडियन समय रैना के शो ‘इंडियाज गोट लैटेंट’ में एक प्रतिभागी से माता-पिता के सेक्स को लेकर आपत्तिजनक सवाल किया था। इस टिप्पणी के बाद देश भर में रैना समेत इलाहाबादिया का विरोध हुआ था। असम और मुंबई में उनके खिलाफ FIR भी दर्ज हुई थी।

केरल में उर्स पर निकला हमास आतंकियों के समर्थन में जुलूस, हाथियों पर लगाए गए थे पोस्टर: वामपंथी सरकार के मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता भी हुए शामिल

केरल की वामपंथी सरकार पर इस्लामिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। इस बीच, पलक्कड़ में एक सालाना उर्स के मौके पर हमास-हिजबुल्लाह जैसे इंटरनेशनल आतंकी संगठनों के नेताओं की तस्वीरों का बाकायदा जुलूस निकाला गया, वो भी हाथियों पर सवार होकर। जुलूस में इन आतंकियों के समर्थन में नारे लगाए गए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, केरल के पलक्कड़ जिले के त्रिथला में रविवार (16 फरवरी 2025) की शाम हजारों लोगों की भीड़ के बीच एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में युवाओं ने हाथियों पर चढ़कर आतंकवादी कमांडरों याह्या सिनवार, इस्माइल हानिया और हसन नसरल्लाह के पोस्टर लहराए। इन तीनों को ही इजरायल ढेर कर चुका है।

इस आयोजन में कॉन्ग्रेस नेता वी.टी. बालाराम और केरल की वामपंथी सरकार के मंत्री और CPIM नेता एम.बी. राजेश की मौजूदगी को लेकर भी विवाद गहराता जा रहा है। आयोजकों की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन इस्लामी कट्टरता को बढ़ावा देने के आरोपों के चलते यह मुद्दा सोशल मीडिया पर गर्माया हुआ है।

बीजेपी ने इस घटना को लेकर कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों पर जमकर निशाना साधा है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के. सुरेंद्रन ने इस घटना को ‘चौंकाने वाला’ बताते हुए कहा कि केरल में इस्लामी कट्टरता को खुलेआम बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने माँग की है कि इस मामले में आयोजकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए और जाँच की जाए कि इस तरह की घटनाओं के पीछे कौन लोग हैं।

इस पूरे विवाद के बीच कॉन्ग्रेस नेता वी.टी. बालाराम ने एक फेसबुक पोस्ट में कहा कि त्रिथला उर्स किसी मजहबी आयोजन से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह एक सार्वजनिक सांस्कृतिक उत्सव है जिसमें हर समुदाय के लोग शामिल होते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक वर्ग इस घटना को सांप्रदायिक रंग देकर मुसलमानों और केरल की छवि खराब करने की कोशिश कर रहा है। हालाँकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि हमास के नेताओं के पोस्टर लगाना एक अलग मुद्दा है, लेकिन साथ ही बीजेपी पर इस मामले को ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ के तहत तूल देने का आरोप लगाया।

केरल में पहले भी हुए हैं ऐसे विवाद

यह पहली बार नहीं है जब केरल में इस तरह की गतिविधियाँ देखी गई हैं। 2024 में केरल विश्वविद्यालय के एक युवा महोत्सव का नाम ‘इंतिफ़ादा’ रखने पर विवाद हुआ था क्योंकि यह नाम हमास और फिलिस्तीन-इजरायल संघर्ष से जुड़ा हुआ था। बाद में विश्वविद्यालय प्रशासन को इस नाम को बदलना पड़ा।

यही नहीं, 2023 में, मलप्पुरम में जमात-ए-इस्लामी की युवा शाखा ‘सॉलिडेरिटी यूथ मूवमेंट’ के एक कार्यक्रम में हमास के पूर्व नेता खालिद मशाल ने वर्चुअल माध्यम से भाषण दिया था। इस दौरान ‘हिंदुत्व को खत्म करो’ और ‘जियोनिज्म को खत्म करो’ जैसे भड़काऊ नारे भी लगाए गए थे।

बीजेपी ने की जाँच की माँग, पुलिस ने साधी चुप्पी

बीजेपी ने इस मामले में पुलिस से तत्काल कार्रवाई की माँग की है। पार्टी का कहना है कि केरल में लगातार इस्लामी कट्टरता को बढ़ावा देने वाली घटनाएँ हो रही हैं और सरकार इस पर आँखें मूँदे बैठी है।

हालाँकि, स्थानीय पुलिस का कहना है कि अब तक इस घटना को लेकर कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है, इसलिए किसी के खिलाफ कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है। लेकिन बढ़ते विवाद को देखते हुए प्रशासन इस पर नजर बनाए हुए है।

AAP नेता अनोख मित्तल ने बीवी को मरवा दिया, क्योंकि खुल गया था अवैध संबंधों का राज: सुपारी किलर्स से हत्या करवा लूट का मामला बनाया

लुधियाना पुलिस ने आम आदमी पार्टी (AAP) नेता अनोख मित्तल को अपनी पत्नी की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, मित्तल ने अपनी प्रेमिका प्रतिक्षा के साथ मिलकर सुपारी किलर्स को 2.50 लाख रुपये में हत्या के लिए हायर किया था। इस मामले में पुलिस ने छह लोगों को गिरफ्तार किया है, जबकि एक आरोपित फरार है।

पुलिस कमिश्नर कुलदीप सिंह चहल के मुताबिक, शनिवार (15 फरवरी 2025) की रात अनोख मित्तल अपनी पत्नी मानवी उर्फ लिप्सी के साथ डिनर कर घर लौट रहा था। रास्ते में उसने कार रोकी और तभी पाँच हमलावरों ने अचानक उन पर हमला कर दिया। उन्होंने तेज धारदार हथियारों से मानवी पर वार किए, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। वारदात को लूटपाट जैसा दिखाने के लिए हमलावर मित्तल की कार और पत्नी की ज्वेलरी लेकर फरार हो गए।

पुलिस ने जब मामले की गहराई से जाँच की तो पता चला कि अनोख मित्तल ने खुद ही इस हत्या की साजिश रची थी। उसकी पत्नी को उसके प्रेम संबंध के बारे में जानकारी हो गई थी, जिस वजह से दोनों के बीच काफी समय से तनाव चल रहा था। आए दिन झगड़े बढ़ रहे थे, जिसके चलते मित्तल ने अपनी प्रेमिका प्रतिक्षा के साथ मिलकर पत्नी को रास्ते से हटाने की योजना बनाई।

पुलिस के मुताबिक, हत्या के लिए 2.50 लाख रुपये की डील हुई थी, जिसमें से 50,000 रुपये एडवांस दिए गए थे। बाकी पैसे हत्या के बाद देने की योजना थी।

पुलिस ने इस मामले में अनोख मित्तल, उसकी प्रेमिका प्रतिक्षा और चार सुपारी किलर्स-अमृतपाल सिंह उर्फ बली (26), गुरदीप सिंह (25), सोनू (24) और सागरदीप उर्फ तेजी (30) को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, एक अन्य आरोपित गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी अब भी फरार है।

पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल की गई एक स्विफ्ट, आई-20 और रिट्ज कार को जब्त कर लिया है। साथ ही एक तलवार भी बरामद की गई है, जिससे वारदात को अंजाम दिया गया था।

अब नहीं चलेगा महात्मा गाँधी का ‘आइडिया’, इसे छोड़ना होगा: केरल हाई कोर्ट के जस्टिस मुहम्मद मुश्ताक, जानिए क्यों ‘ग्राम स्वराज’ को बताया अप्रासंगिक

केरल हाई कोर्ट के एक जज ने कहा है कि महात्मा गाँधी का दिया हुआ गाँव का आइडिया अब प्रासंगिक नहीं रहा है। उन्होंने कहा है कि इसे खत्म किए जाने की जरूरत है। उन्होंने व्यवस्था के केंद्रीकरण की भी वकालत की है। यह टिप्पणियाँ उन्होंने केरल सरकार के बनाए कानून को लेकर याचिकाओं की सुनवाई करते हुए की हैं।

केरल हाई कोर्ट के जस्टिस ए मुहम्मद मुश्ताक ने सोमवार (17 फरवरी 2025) को कह़ा, “मेरा निजी विचार है कि गाँधी जी ने जिस तरह के गाँव की कल्पना की थी, जिसे अब संवैधानिक रूप दे दिया गया है। उसे खत्म कर देना चाहिए क्योंकि शासन में अब ज्यादा कठिनाइयाँ हैं।”

जस्टिस मुश्ताक ने कहा, “उस समय, केवल छोटी-छोटी चीजें किए जाने की जरूरत थी। लेकिन स्थानीय अधिकारियों के लिए चुनौती अब बहुत बड़ी है। शहरों की प्लानिंग एक बड़ी चुनौती है… कचरे का प्रबन्धन एक और बड़ी चुनौती है। इसे स्थानीय स्तर पर नहीं किया जा सकता। हमारे पास वह कानून है लेकिन इन सब मामलों के लिए एक केंद्रीकृत प्राधिकरण होना चाहिए।”

जस्टिस मुश्ताक ने कहा कि छोटी छोटी ग्राम पंचायतें सब काम करने में सक्षम नहीं हैं, ऐसे में केंद्रीकृत व्यवस्थाओं की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अब चुनौतियों को देखते हुए एक संस्था बननी चाहिए, जो पूरे जिले का प्रबन्धन करें। उन्होंने कहा कि अत्यधिक विकेंद्रीकरण से अब नुकसान हो रहा है।

जस्टिस मुश्ताक ने कहा, “उस समय गांधीजी ने ग्राम स्वराज के माध्यम से छोटे-छोटे मुद्दों को सुलझाने की परिकल्पना की थी। अब यह बदल चुका है, हमें इन चीजों को बदलने की जरूरत है। प्रशासन एक बड़ी चुनौती बन चुका है और देश के बाकी हिस्सों में भी सुधारों की जरूरत है।”

उन्होंने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि 1950 में जैसी चीजों की कल्पना की गई थी, उसे 2025 में भी वैसे ही किया जाए। जस्टिस मुश्ताक ने कहा कि इस पंचायती व्यवस्था के चलते राजस्व का संग्रह भी प्रभावित हो रहा है। यह सारी टिप्पणियाँ उन्होंने केरल सरकार की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की।

केरल की सरकार ने नगर निकायों और पंचायतों को लेकर दो कानून बनाए थे, जिन्हें केरल हाई कोर्ट की एक बेंच ने 2024 में असंवैधानिक बता दिया था। इसके अलावा कोर्ट ने नगर निकायों के विस्तारीकरण को भी रद्द कर दिया था। इसके खिलाफ ही राज्य सरकार दोबारा हाई कोर्ट पहुँची थी।

रोहिंग्या के बच्चों को सरकारी स्कूल में मिले एडमिशन… इनकार करने पर हाई कोर्ट जाइए: सुप्रीम कोर्ट, घुसपैठियों के बच्चों के समर्थन में याचिका

रोहिंग्या घुसपैठियों के बच्चों को अगर दिल्ली के सरकारी स्कूल एडमिशन नहीं देते हैं, तो वह हाई कोर्ट जा सकते हैं। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया है। रोहिंग्या घुसपैठियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में एडमिशन दिलाने की माँग करने वाली याचिका पर यह आदेश दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सोमवार (17 फरवरी, 2025) को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस कोटीश्वर सिंह की बेंच ने की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “इन बच्चों के लिए सही रास्ता यह होगा कि वह उन सरकारी स्कूलों में एडमिशन के लिए आवेदन करें, जिनके लिए वह स्वयं को पात्र समझते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, “एडमिशन के हकदार होने पर और इसे ना दिए जाने की स्थिति में यह बच्चे दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।” सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थति में इन बच्चों की मदद वह लीगल संस्थान करेगा, जिसने इनके लिए याचिका डाली है।

क्या था मामला?

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका सोशल जूरिस्ट अ सिविल राइट्स ग्रुप नाम के संगठन ने डाली थी। इस संगठन ने दावा किया था कि दिल्ली में सरकारी स्कूल आधार कार्ड ना होने के चलते इन रोहिंग्या बच्चों को एडमिशन नहीं दे रहे हैं। उसने एडमिशन दिए जाने के आदेश की माँग की थी।

पहले यह संगठन दिल्ली हाई कोर्ट पहुँचा था। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा था रोहिंग्या कोई शरणार्थी नहीं हैं और ना ही उन्हें सरकार ने यह दर्जा दिया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में याचिकाकर्ताओं से कहा था कि वह गृह मंत्रालय के पास अपनी माँग लेकर जाएँ ताकि इस पर कार्रवाई हो सके।

हाई कोर्ट ने कहा था कि यह मामलादेश की सुरक्षा और नागरिकता के प्रश्न से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने इसी के साथ यह याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद यह संगठन सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी, 2025 को इस मामले की सुनवाई करते हुए इस संगठन से उन बच्चों की जानकारी माँगी थी, जिन्हें एडमिशन से इनकार किया गया है।

संगठन ने 18 ऐसे बच्चों की सूची सुप्रीम कोर्ट सौंपी थी, जिस पर 17 फरवरी को उसने यह फैसला दिया और याचिका का निपटारा कर दिया। रोहिंग्या घुसपैठियों के इए नागरिकों जैसी माँग करने वाली यह अकेली याचिका नहीं है।

रोहिंग्या के समर्थन में बराबर पड़ रही याचिकाएँ

हाल ही में एक NGO ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा था कि कोर्ट केंद्र और दिल्ली सरकार को निर्देश दे कि दिल्ली में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्याओं को स्कूलों और अस्पतालों तक पहुँच दी जाए। याचिका में इन रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए सरकारी अस्पतालों में मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ वाला वाले खाद्यान्न देने की माँग की गई थी। 

NGO द्वारा दायर याचिका में केंद्र और दिल्ली सरकारों को निर्देश देने की माँग की गई है कि वे रोहिंग्या बच्चों को आधार कार्ड या भारतीय नागरिकता न होने के बावजूद मुफ्त शिक्षा दें। जनहित याचिका में आगे माँग की गई थी कि इन रोहिंग्या ‘शरणार्थियों’ को सरकार द्वारा पहचान पत्र माँगे बिना कक्षा 10, 12 और स्नातक सहित सभी परीक्षाओं में भाग लेने की अनुमति दी जाए।