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TikTok वीडियो बनाने के लिए मंदिर में प्रतिमा को मारी लात, 2 युवकों को राजकोट पुलिस ने किया गिरफ्तार

गुजरात के राजकोट में 2 युवकों को TikTok वीडियो बनाने के लिए हिन्दू आस्थाओं का अपमान करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि एक युवक टोपी पहने हुए है और मंदिर के अंदर स्थित प्रतिमा को लात मार कर उसे न सिर्फ अपमानित कर रहा है बल्कि उसे गिरा कर क्षतिग्रस्त भी कर देता है। कई हिन्दुओं ने उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

उक्त युवक यही पर नहीं रुका बल्कि उसने मंदिर के द्वार पर भी जोर की लात मारी। साथ ही एक अन्य आरोपित युवक ने भी TikTok वीडियो बनाते हुए मंदिर की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया और उसका अपमान किया। मंदिर की प्रतिमा को अपमानित कर ‘स्टाइलिश पोज’ देने वाले इन युवकों पर शिकंजा कसते हुए राजकोट पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्हें धर-दबोचा।

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ऑपइंडिया ने जब राजकोट पुलिस को कॉल किया तो उन्होंने भी इस ख़बर की पुष्टि करते हुए कहा कि दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया है। दोनों युवकों का नाम जयश और दिनेश है, जिनके खिलाफ आगे की कार्रवाई की जा रही है।

बता दें कि हाल ही में लद्दाख में जारी सीमा विवाद के बीच देशभर में चाइनीज उत्पादों के बहिष्कार की आवाज उठनी शुरू हुई हैं। ऐसे में भारत सरकार ने 59 चायनीज ऐप को प्रतिबंधित करने का बड़ा फैसला लिया।

महिला कॉन्स्टेबल ने बताया पुलिस की बर्बरता से कैसे हुई जयराज और बेनिक्स की मौत, रजनीकांत ने कहा- दोषियों को सज़ा दो

तमिलनाडु के सथानकुलम पुलिस स्टेशन में पुलिस की बर्बर पिटाई पिता-पुत्र जयराज और बेनिक्स (फेनिक्स) की मौत के मामले में थाने की एक महिला कॉन्स्टेल ने उस क्रूर रात की दास्ताँ सुनाई है। मद्रास मदुरई बेंच के समक्ष इस मामले की जाँच कर रहे जुडिशल मजिस्ट्रेट ने कहा कि रेवती को डर था कि उसके बयान के बाद उसे धमकियाँ मिल सकती हैं। उधर सुपरस्टार रजनीकांत ने भी इस घटना की निंदा करते हुए दोषियों पर कार्रवाई की माँग की है।

जयराज और बेनिक्स की मौत का मामला मद्रास हाईकोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के बाद सुनवाई चल रही है। उसने मंगलवार (जून 30, 2020) को सीडी-सीआईडी को इस केस की जाँच सौंप दी थी। डीएसपी अनिल कुमार इसकी जाँच कर रहे हैं। कोर्ट ने महिला कॉन्स्टेबल रेवती और उनके परिवार को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया है। रेवती ने बताया कि पुलिस वाले जयराज और बेनिक्स पिता-पुत्र को रात भर लाठियों से पीटते रहे।

रेवती ने बताया कि पीटने के कारण लाठी से लेकर टेबल तक पर खून के धब्बे ही धब्बे नज़र आ रहे थे। उन्होंने कहा कि खून के उन धब्बों का सैम्पल जाँच के लिए जल्द से जल्द लिया जाना चाहिए क्योंकि पुलिस वाले उसे मिटाने की पूरी कोशिश करेंगे। पुलिसकर्मियों ने जुडिशल मजिस्ट्रेट की भी जाँच में सहायता नहीं की और तब तक इस मामले में प्रयोग की गई लाठी वगैरह सबमिट नहीं की, जब तक उन्हें मजबूर नहीं किया गया।

लाठी सबमिट की जाने कि बात सुनते ही एक पुलिसकर्मी तो दीवाल फाँद कर भाग खड़ा हुआ। रेवती तो अपने बयान पर हस्ताक्षर करने तक से भी डर रही थी लेकिन पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिए जाने के बाद ही उन्होंने साइन किया। रविवार (जून 28, 2020) को जेएम थाने में जाँच के लिए रुके लेकिन उन्हें एक भी पुलिसकर्मी ने सहयोग नहीं किया। उन्होंने बताया कि एक ने तो धमकी भरा व्यवहार भी प्रदर्शित किया।

वहीं सुपरस्टार रजनीकांत ने जेराज और बेनिक्स कि हत्या मामले में दोषी पुलिसकर्मियों की निंदा करते हुए कहा कि इस घटना से जुड़े एक-एक दोषी को सजा मिलनी ही मिलनी चाहिए। रजनीकान्त ने कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। उन्होंने जूडिशल मजिस्ट्रेट के समक्ष पुलिस के व्यवहार पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वो शॉक्ड हैं। उन्होंने इसे ‘हिंसक जानवरों वाली हरकत’ बताते हुए सजा की माँग की।

उधर लोगों ने तमिलनाडु में पटाखे फोड़ कर इस मामले में हुई 5 गिरफ्तारियों के बाद खुशी जताई। तूतीकोरिन की इस घटना के मामले मे बुधवार को सब इन्स्पेक्टर रघु गणेश को बुधवार को धर-दबोचा गया, जिसके बाद इस मामले में न्याय की माँग कर रहे लोग अपनी खुशी का इजहार करने सड़कों पर उतर आए। बता दें कि न सिर्फ़ तमिलनाडु बल्कि पूरे देश में लोग इस हत्याकांड से व्यथित हैं।

मृतक जे बेनिक्स के एक दोस्त राजकुमार ने बताया था– “20 जून को सुबह 7 से 12 बजे के बीच, पिता और पुत्र ने कम से कम सात लुंगियाँ (शरीर के निचले भाग में पहना जाने वाला कपड़ा) बदली थीं, क्योंकि वे अपने मलाशय से खून बहने के कारण गीले हो गए थे।” यह भी दावा किया गया है कि पुलिस हिरासत में उनकी बेरहमी से पिटाई की गई जिससे पिता-पुत्र के जननांग भी क्षतिग्रस्त हो गए थे।

सिर्फ रोटी-कपड़ा-मकान नहीं… रोगजार भी: ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की जिंदगी में ऐसे आया बदलाव

वर्तमान सरकार अनेक कारणों के चलते आलोचना का सामना करती है, भले उन कारणों में तथ्य और तर्क हों या न हों। ऐसा ही एक कारण है ‘ट्रांसजेंडर समुदाय’ के लिए सरकार का रवैया। ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए 2014 से PM मोदी की सरकार ने क्या-क्या किया है, लोग शायद भूल गए हैं। लेकिन पिछले 6 वर्षों का काम अब धरातल पर दिखने लगा है।

तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के लिए यह बात स्वीकार करना मुश्किल है कि सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। चाहे परोक्ष रूप से या अपरोक्ष रूप से, गुज़रे कुछ सालों में वर्तमान सरकार ने ऐसे तमाम फैसले लिए हैं, जिनके चलते ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकार बड़े पैमाने पर सुनिश्चित होते हैं। अधिकार ही नहीं इस समुदाय के लोगों के लिए शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य जैसी अहम फायदे भी तय होते हैं।

ट्रांसजेंडर समुदाय समाज का असल वंचित वर्ग है। अब तक जितनी सरकारें भी सत्ता में आई हैं, उनमें वर्तमान सरकार के अलावा किसी दूसरी सरकार की कार्यप्रणाली इनके उत्थान के लिए उल्लेखनीय नहीं रही है। शिक्षा-सुरक्षा-रोजगार हर स्तर पर केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए काम किया है। इनके रोजगार के लिए ही गृह मंत्रालय की ओर से ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए CAPF (Central Armed Police Force) में भर्ती की बात की गई। विभाग अब इस पर मंत्रालय को जवाब देगा।

24 जून 2020 को नोएडा मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने एक आदेश जारी किया। आदेश के मुताबिक़ सेक्टर 50 मेट्रो स्टेशन ट्रांसजेंडर समुदाय को समर्पित होगा। मेट्रो स्टेशन पर टिकट काउंटर और हाउस कीपिंग सर्विस में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की भर्ती की जाएगी। इस मेट्रो स्टेशन का नाम ‘रेनबो स्टेशन रखा जाएगा। ठीक ऐसे ही पिछले कुछ समय में वैश्विक समूहों से लेकर सरकारी नीतियों तक ट्रांसजेंडरों को काफी प्राथमिकता मिली है। 

ट्रांसजेंडर के लिए विधेयक

सरकार साल 2016 में एक विधेयक लेकर आई थी – ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) विधेयक! इस क़ानून का उद्देश्य स्पष्ट था – ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के अधिकारों को सुनिश्चित करना। इसके बाद रोज़गार मिलने के दौरान उनके साथ होने वाले भेदभाव को रोकना और उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी सुविधाएँ दिलाना।

भले ‘ट्रांसजेंडर’ शब्द की नींव 90 के दशक में ही पड़ गई थी लेकिन सरकारों ने इस शब्द के इर्द-गिर्द उतना काम नहीं किया। जहाँ एक ओर दुनिया के तमाम प्रगतिशील देशों में समलैंगिक अधिकारों को मान्यता नहीं मिली है, वहीं हमारे देश की सबसे बड़ी अदालत ने 2018 में धारा 377 को जो पहले आपराधिक था, उसे गैर-आपराधिक बनाया और सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने को अपराध नहीं माना।     

हालाँकि केवल इतने से देश में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों का विकास सुनिश्चित नहीं होता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्ययन के मुताबिक़ देश के 92 फीसदी ट्रांसजेंडर किसी भी तरह के रोज़गार या आर्थिक गतिविधि में शामिल नहीं हैं। इससे भी ज़्यादा हैरान कर देने वाली बात यह है कि जितने गिने-चुने लोग योग्य होते हैं, उन्हें नकार दिया जाता है।

यहाँ समस्या योजनाओं से हट कर आम लोगों के रवैये पर आ जाती है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ देश भर में कुल 4,90,000 ट्रांसजेंडर हैं। सरकारी प्रोत्साहन व न्यायालयों की सख्ती के बाद समय के साथ तमाम बड़े व्यावसायिक समूहों ने ट्रांसजेंडरों के लिए काफी सकारात्मक रुख अपनाया है।

ट्रांसजेंडर व रोजगार

कुछ साल पहले चेन्नई के एक उद्यमी समूह ने 14 महीनों के भीतर कुल 42 ट्रांसजेंडर को प्रशिक्षण पर रखा था। इसके अलावा साल 2017 में कोच्चि मेट्रो रेल लिमिटेड ने 23 ट्रांसजेंडर लोगों को रोज़गार दिया था। साल 2017 में ही पश्चिम बंगाल की जोइता मंडल को लोक अदालत में न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

रोजगार सृजन जैसे कामों के अलावा वर्तमान सरकार ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र में बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। इन फैसलों के चलते कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की स्वीकार्यता काफी बढ़ी है। 

साल 2018 में गोदरेज समूह ने एक मैनिफेस्टो जारी किया था, जिसमें इस मुद्दे पर तमाम तथ्य मौजूद थे कि भारतीय कार्य स्थलों पर ट्रांसजेंडर समुदाय की स्वीकार्यता कैसे बढ़ेगी। इसी साल की शुरुआत में VLCC ने ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए ‘असिस्टेंट ब्यूटी थेरेपिस्ट’ प्रक्षिक्षण कोर्स तैयार किया थाl। VLCC हैदराबाद शाखा में इस कोर्स के तहत कुल 24 लोगों ने प्रशिक्षण लिया था।

साल 2018 के ही जुलाई महीने में ऊबर इट्स ने चेन्नई में कई ट्रांसजेंडर को डिलीवरी एजेंट के तौर पर रखा था। इसी तरह कुछ साल पहले FICCI और CII ने एक कॉन्क्लेव का आयोजन कराया था। इसमें एक पैनल में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग भी शामिल थे।

वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की अर्थव्यवस्था में भागीदारी न होने से भारत को हर साल करोड़ों डॉलर का नुकसान झेलना पड़ता है। सरकार इस खाई को भरने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है। पहले उन्हें उनके अधिकार मिले और उसके बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी मिले। ऐसे में यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि आम लोग इस तरह के नीति-निर्देशों में सरकार का पूरा साथ दें।     

इस तरह की नीतियों और आँकड़ों से हट कर ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों के नज़रिए में इस समुदाय के प्रति सकारात्मकता बनी रहे। क्योंकि एक सभ्य समाज और लोकतांत्रिक देश में सभी लोगों को बराबरी से जीने का अधिकार है। ऐसे में जब तक आम लोग ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को सामान नज़रिए से नहीं देखेंगे तब तक सामाजिक खाई बनी रहेगी।

इस मामले में सरकारी ढाँचा और क़ानून व्यवस्था एक हद तक ही अपनी भूमिका निभा सकती है। अंतिम ज़िम्मेदारी आम लोगों के कन्धों पर ही आती है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने ‘थर्ड जेंडर’ शब्द देकर ही अपना मत स्पष्ट कर दिया था। बचा हुआ काम हमारा है कि हम इस आदेश को किस हद तक बढ़ावा देते हैं।  

स्वरा भास्कर की एडल्ट कॉमेडी ‘रसभरी’ IMDb पर भी फुस्स, लेकिन जीरो नहीं हो पाएगी रेटिंग

अमेज़न प्राइम वीडियो पर स्वरा भास्कर की हाल ही में रिलीज़ हुए एडल्ट कॉमेडी वेब सीरीज़ ‘रसभरी’ की IMD रेटिंग बुरी तरह से गिरकर 2.6 पर आ गई है। हालाँकि, स्वरा भास्कर के लिए अच्छी खबर यह है कि IMD पर किसी भी फिल्म को ‘जीरो’ रेटिंग नहीं दी जा सकती है, चाहे वह कितनी ही वाहियात और घटिया क्यों ना हो।

IMD पर दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से गिर रही ‘रसभरी’ की रेटिंग

यह खबर इस कारण चर्चा का विषय है क्योंकि इस वेब सीरीज में इन्टरनेट पर ऊल-जुलूल ट्वीट कर चर्चा में बनी रहने वाली ‘इंटरनेट वोक-लिबरल’ स्वरा भास्कर मुख्य भूमिका में हैं। आठ एपिसोड की यह वेब सीरीज़ एक तरह की एडल्ट कॉमेडी है। स्वरा भास्कर ने रसभरी में एक ‘हॉट’ अंग्रेजी शिक्षक की भूमिका निभाई है।

गत बृहस्पतिवार को ही अमेज़ॅन प्राइम वीडियो पर ‘रसभरी’ की स्ट्रीमिंग शुरू हुई है। इसमें मेरठ की रहने वाली एक इंग्लिश टीचर शानू (स्वरा) की कहानी बताई गई है, जिसके सपने उसके छात्र, उनके माता-पिता और शहर का लगभग हर आदमी देखता है। इस वेब सीरीज को शांतनु श्रीवास्तव ने लिखा है और निखिल नागेश भट्ट द्वारा निर्देशित किया गया है।

स्वरा भास्कर अपनी हरकतों के कारण ट्विटर पर लगभग हर रोज ही लोगों के निशाने पर रहती हैं और अब मानो उन्होंने यह विवाद ही अपनी पहचान बना डाली है। यही कारण है कि उनकी इस वेब सीरीज के चर्चा में आते ही लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया और इसकी IMD रेटिंग गिरा दी। नतीजा यह हुआ कि इस वेब सीरिज के कथानक पर चर्चा की जगह स्वरा भास्कर पर मीम (MEME) बनाए जाने लगे।

हालाँकि, कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने स्वरा भास्कर की यह वेब सीरीज देखी और कहा कि वेब सीरीज पर बनाया जाने वाले ऐसे वाहियात कूड़े को रेटिंग घटाकर बताने की जरूरत नहीं होती कि वह कितनी वाहियात है।

IMDb एक तरह का फिल्म और सिनेमा का डाटाबेस उपलब्ध कराने वाला प्लेटफॉर्म है। IMD पर लोग अक्सर फिल्मों की क्वालिटी देखने के लिए आते हैं जहाँ पर IMDb पर एक से दस के बीच एक रेटिंग प्रणाली है। यहाँ पर किसी फिल्म को 10 स्टार मिलने का मतलब बेहतरीन या सर्वश्रेष्ठ और 1 स्टार का मतलब घटिया होता है।

स्वरा भास्कर की ‘रसभरी’ वेब सीरीज की रेटिंग फिलहाल 2.6 है, जिसका मतलब है कि यह किसी भी समय 1 हो सकती है। यह घटिया साबित होने से अब बस कुछ ही दूर है। यहाँ पर स्वरा भास्कर के लिए अच्छी खबर यह है कि IMDb पर किसी भी फिल्म को जीरो रेटिंग नहीं दी जा सकती है, चाहे वह कितनी ही वाहियात और घटिया क्यों ना हो। इसलिए यह हर हाल में स्वरा भास्कर की ही जीत मानी जा सकती है।

शिवराज सरकार के सौवें दिन हुआ मंत्रिमंडल का विस्तार, 28 विधायकों ने ली मंत्री पद की शपथ, सिंधिया भी रहे मौजूद

कोरोना काल में मध्य प्रदेश के सीएम पद की शपथ लेने वाले शिवराज सिंह चौहान की सरकार के 100 दिन पूरे होने पर एक बार फिर मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया। इस बार शिवराज के मंत्रिमंडल में 28 विधायकों को मंत्री बनने का अवसर मिला है।

गुरुवार (2 जुलाई, 2020) को मध्य प्रदेश की राज्यपाल (अतिरिक्त प्रभार) आनंदी बेन पटेल ने राजभवन में कुल 28 नए मंत्रियों को शपथ दिलाई, जिसमें 20 कैबिनेट मंत्री, 8 राज्य मंत्री शामिल हैं। इन मंत्रियों में गोपाल भार्गव, विजय शाह, यशोधरा राजे सिंधिया समेत कई बड़े नेताओं का नाम प्रमुख रूप से शामिल है। शपथ ग्रहण के दौरान कॉन्ग्रेस से बीजेपी में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मौजूद रहे।

दरअसल, कॉन्ग्रेस की कमलनाथ सरकार गिरने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने 23 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, इसके कुछ दिनों के बाद ही 5 मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सदस्य हैं। इस लिहाज से अधिकतम 35 विधायकों को मंत्री बनाया जा सकता है। वहीं गुरुवार को 28 मंत्रियों के शपथ ग्रहण के साथ अब शिवराज के मंत्रिमंडल में 34 मंत्री हो गए हैं।

मंत्री बनाए गए विधायकों के नाम और उनके बारे में जानकारी:

  • 1.गोपाल भार्गव (कैबिनेट), पिछली शिवराज सरकार में सामाजिक न्याय पंचायत और ग्रामीण विकास मंत्री थे।
  • 2. विजय शाह (कैबिनेट) बीजेपी सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री थे।
  • 3. जगदीश देवड़ा (कैबिनेट) दो बार देवड़ा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में शामिल रहे हैं।
  • 4. प्रेम सिंह पटेल (कैबिनेट) प्रेम सिंह पटेल भी शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में शामिल रहे हैं।
  • 5. यशोधरा राजे (कैबिनेट) मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री रही है। जीवाजी राव सिंधिया और स्वर्गीय राजमाता राजे सिंधिया की बेटी है।
  • 6.भूपेन्द्र सिंह (कैबिनेट) भूपेन्द्र आईटी और परिवहन विभाग के लिए मध्य प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं।
  • 7.अरविंद सिंह भदोरिया (कैबिनेट)
  • 8. एदल सिंह कसाना (कैबिनेट)
  • 9.ओपी सकलेचा (कैबिनेट मंत्री)
  • 10:बृजेंद्र प्रताप सिंह (राज्य मंत्री) प्रताप सिंह को अक्टूबर 2009 में शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल में किसान कल्याण एवं कृषि विकास राज्यमंत्री के रूप में शमिल किया गया था।
  • 11.विश्वास सारंग (कैबिनेट मंत्री) मध्य प्रदेश की पिछली भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री थे।
  • 12.ऊषा ठाकुर (राज्य मंत्री)
  • 13.मोहन यादव (कैबिनेट मंत्री)
  • 14.भारत सिंह कुशवाह (राज्य मंत्री)
  • 15.इंदर सिंह परमार (राज्य मंत्री)
  • 16.रामखिलावन पटेल (राज्य मंत्री)
  • 17.हरदीप सिंह डांग (राज्य मंत्री)
  • 18.रामकिशोर कांवरे (राज्य मंत्री)
  • 19.राज्यावर्धन दत्तीगांव (राज्य मंत्री)
  • 20.प्रभुराम चौधरी (कैबिनेट) प्रभु राम चौधरी पिछली कॉन्ग्रेस सरकार की कमलनाथ में शिक्षा मंत्री थे।
  • 21.इमरती देवी (कैबिनेट) कॉन्ग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुई इमरती देवी पिछली कॉन्ग्रेस सरकार में भी मंत्री रही हैं।
  • 22.प्रद्युमन सिंह तोमर (कैबिनेट) तोमर ने कमलनाथ सरकार में 25 दिसंबर 2018 को मंत्री पद की शपथ ली थी।
  • 23.महेंद्र सिसोदिया (कैबिनेट) सिसोदिया पिछली मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार में श्रम मंत्री रह चुके हैं।
  • 24..बृजेन्द्र यादव (राज्य मंत्री)
  • 25.सुरेश धाकड़ (राज्य मंत्री)
  • 26. ओपी भदौरिया (राज्य मंत्री)
  • 27.बिसाहू लाल सिंह (कैबिनेट)
  • 28. गिर्राज दंडोतिया

वामपंथी मीडिया गिरोह आतंकियों को क्लीन चिट देने के लिए 3 साल के बच्चे का इस्तेमाल कर रहा है

कश्मीर घाटी में इस्लामी कट्टरपंथी और आतंकवादियों को निर्दोष और मजबूर साबित करने का जो काम इतने वर्षों तक बॉलीवुड की फिल्में किया करती थीं, वही जिम्मेदारी अब वामपंथी मीडिया गिरोहों ने सम्भाल ली है।

इनका पहला कर्तव्य यह साबित करना तो है ही कि कश्मीर घाटी में सुरक्षबलों द्वारा मारे जाने वाले आतंकवादी निर्दोष होते हैं। साथ ही आतंकवादियों के ‘मानवीय’ चेहरे के नैरेटिव को दिशा देने का काम भी वामपंथी मीडिया संगठनों द्वारा किया जा रहा है।

इसका सबसे ताजा उदाहरण कल ही कश्मीर के सोपोर में आतंकवादियों की गोली से मारे गए 65 वर्षीय बशीर अहमद का मामला है। बुधवार (जुलाई 01, 2020) की सुबह सोपोर में आतंकवादियों द्वारा घात लगाकर CRPF के एक गश्ती दल पर हमला कर दिया गया। इस हमले में दोनों ओर से गोलियाँ चलीं, जिसमें सीआरपीएफ के एक जवान की मौत हो गई और दो घायल हो गए। 

सीआरपीएफ के एडीजी जुल्फिकार हसन ने बशीर अहमद को गोली लगने को लेकर कहा कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। उन्होंने कहा – “मुझे लगता है कि कुछ लोगों ने यह कहकर एक स्पिन देने की कोशिश की है कि सीआरपीएफ ने एक नागरिक को वाहन से बाहर निकाला और गोली मार दी। यह पूरी तरह से असत्य है।”

दरअसल, आतंकियों की गोली से 65 वर्षीय बुजुर्ग की भी मौत हुई है। जब यह हादसा हुआ, उस समय 65 वर्षीय बशीर अहमद खान अपने 3 साल के नाती के साथ बाजार जा रहे थे।

गोलियों की आवाज से इलाके में अफरा-तफरी मच गई। मुस्तफाबाद एचएमटी श्रीनगर निवासी ठेकेदार बशीर अहमद खान भी अपने नाती को लेकर कार से बाहर निकले और भागने लगे, लेकिन आतंकियों द्वारा की जा रही फायरिंग की चपेट में आ गए और उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

बशीर अहमद का लहूलुहान शरीर गोली लगने के बाद वहीं सड़क पर गिर पड़ा और उनका 3 साल का नाती उनके शव के ऊपर बैठा रहा। यह तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत शेयर की जा रही है।

CRPF के जवानों ने तीन साल के बच्चे को आतंकवादियों की गोलियों से बचाया और सुरक्षित घर ले आए। यहाँ से वामपंथी मीडिया गिरोहों ने अपनी पोजिशन संभाली और इसका नतीजा हम देख रहे हैं कि बशीर अहमद की मौत के लिए CRPF को ही दोषी ठहराने का कारनामा किया जा रहा है।

जब वामपंथी मीडिया समेत तमाम उदारवादी विचारकों को इस्लामी आतंकवादियों द्वारा भरे बाजार में नागरिकों की हत्या पर चर्चा कर उसे धिक्कारने का काम करना था, तब मीडिया ने वास्तविक समस्या को नजरअंदाज कर, उसे आवरण देते हुए एक बेहद फर्जी नैरेटिव को उछालना जरूरी समझा।

मीडिया गिरोह प्रमुख ‘द वायर’ का कहना है कि तीन साल के बच्चे ने कहा कि उसने देखा कि पुलिस ने उनके नाना को गोली मारी। यहाँ पर सबसे पहली और बेहद अमानवीय बात तो यही है कि द वायर ने तीन साल के एक बच्चे से यह उम्मीद की है कि वो पुलिस और आतंकवादियों में स्पष्ट रूप से फर्क कर सकता है।

वह भी तब, जब कि ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब कश्मीर घाटी में आतंकियों को पुलिस की यूनिफॉर्म में ही कई बार पकड़ा जा चुका है। ऐसे में भारतीय सुरक्षाबलों और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बयानों को दरकिनार कर तीन साल के एक बच्चे के बयान को आधार बनाना स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वामपंथी मीडिया का पहला मकसद क्या है।

सत्ता विरोध के लिए वामपंथ ने आतंकवादियों को सुरक्षाकवच देना और षड्यंत्रों के माध्यम से उन्हें क्लीन चिट देने के अपने अभियान को कई समय से जर्नलिज़्म का नाम दिया है। जबकि वास्तविकता सिर्फ यह है कि उन्हें न ही आतंकियों की गोली से मारे गए बशीर अहमद की मौत से फ़र्क़ पड़ता है, न ही शव के ऊपर बैठकर रो रहे तीन साल के बच्चे की विभत्स तस्वीर से फ़र्क़ पड़ता है।

मीडिया और प्रपंचकारियों का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद है और वो यह कि सत्ता और संस्थाओं को बदनाम कर किसी तरह से प्रासंगिक बना रहा जाए।

₹45300 करोड़ रुपए का घाटा TikTok वाली कम्पनी को, सभी 59 चायनीज ऐप के लिए भारत था सबसे बड़ा मार्केट

लद्दाख स्थित गलवान घाटी में चीन के सैनिकों की करतूतों के कारण भारतीय सेना से हिंसक झड़प के बाद भारत-चीन के बीच तनाव चरम पर पहुँच गया। भारत ने हाल ही में चीन के 59 एप को बैन करने का निर्णय किया, जिससे चीनी कंपनियों को तगड़ा झटका लगा है।

भारत के इस फ़ैसले के बाद से ही चीन की परेशानी साफ़ झलक रही है। चीन के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अब माना है कि भारत में प्रतिबंधित किए जाने के बाद TikTok की पैरेंट कंपनी Bytedance को 600 करोड़ डॉलर (मतलब आज की करेंसी एक्सचेंज के अनुसार लगभग 45300 करोड़ रुपए) का नुकसान हो सकता है। 

चीन सरकार के अनाधिकारिक प्रवक्ता के रूप में काम करने वाले और भारत को समय-समय पर झूठी गीदड़ भभकी देने वाले अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने ट्वीट कर के बताया है कि पिछले महीने लद्दाख में लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर हिंसक संघर्ष के बाद भारत सरकार की तरफ से चीन के 59 एप पर प्रतिबन्ध लगाने से TikTok की पैरंट कंपनी बाइटडांस को 6 अरब डॉलर (45,300 करोड़ रुपए) का बड़ा नुकसान हो सकता है। 

बता दें कि प्रतिबंधित किए जाने से पहले टिकटॉक भारत में काफी मशहूर वीडियो एप्लिकेशन था, जिसकी पहुँच सुदूर गाँवों तक थी। इस एप के लगभग 20 करोड़ यूजर्स अकेले भारत में थे, जो इस एप पर शॉर्ट वीडियोज अपलोड कर के मनोरंजन करते थे।

टिकटॉक के अलावा अन्य प्रतिबंधित चायनीज एप की बात करें तो डॉक्यूमेंट स्कैनर ‘कैमस्कैनर’ के भी भारत में 10 करोड़ यूजर थे। हालिया जून में ही 40 लाख लोगों ने इसे इनस्टॉल किया था। इसने अब तक 19.49 लाख डॉलर सिर्फ यूजरों द्वारा एप पर खर्च की गई राशि से बनाए थे। इसमें एडवरटाइजमेंट और अन्य राजस्व शामिल नहीं है। इससे आप इसकी कमाई का अंदाज़ लगा सकते हैं।

जहाँ तक यूसी ब्राउज़र की बात है, पूरी दुनिया में इसके 43 करोड़ यूजर हैं और उनमें से 13 करोड़ तो अकेले भारत में हैं। इसे भी सरकार ने बैन किया है। भारत में ये इतना हावी है कि गूगल क्रोम के बाद सबसे बड़ा बाज़ार इसका ही है। 14.5% मार्किट शेयर के साथ ये भारतीय बाजार पर कब्जा किए बैठा था। अकेले जून 2020 में 61 लाख लोगों ने इसे इनस्टॉल किया था।

बिंगो लाइव भी एक वीडियो स्ट्रीमिंग एप है, जिसने सलमान खान फिल्म्स के साथ मिल कर ‘दबंग 3’ का प्रमोशन किया था। Likee को जून में 61 लाख नए इनस्टॉल मिले थे और बिंगो लाइव को 21 लाख नए इनस्टॉल मिले थे। इसी तरह Helo एप के भी भारत में 5 करोड़ यूजर थे।

केंद्र सरकार ने बीते दिनों इस एप पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके बाद लिबरल गिरोह आग-बबूला हो उठा। इसके अलावा हेलो, यूसी न्यूज, यूसी ब्राउजर समेत 58 और चीनी ऐप को प्रतिबंधित कर दिया था। 

इधर वरिष्ठ वकील और कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने बुधवार (जुलाई 1, 2020) को कहा कि वो चीनी ऐप टिकटॉक की तरफ से कोर्ट में पैरवी नहीं करेंगे। सिंघवी ने बताया कि टिकटॉक के लिए उन्होंने एक साल पहले सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की थी और वे जीते भी थे। हालाँकि, इस बार वो कोर्ट में चीनी ऐप के लिए खड़े नहीं होंगे।

इससे पहले देश के शीर्ष वरिष्ठ अधिवक्ताओं में शुमार पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने भी चीनी ऐप टिकटॉक का मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया। रोहतगी ने बुधवार को कहा कि वह एक चीनी ऐप के लिए भारत सरकार के खिलाफ अदालत में खड़े नहीं होंगे। 

जहाँ एक तरफ भारत में कुछ प्रपंची वामपंथी और विपक्षी नेता ये कह रहे थे कि मोदी सरकार द्वारा 59 चीनी एप्लिकेशंस को बैन करने से चीन का क्या बिगड़ जाएगा, वहीं दूसरी तरफ चीन भारत के इस क़दम से बौखला गया है और उसने अपने बयान में कहा है कि वो जल्द ही इसकी पूरी समीक्षा कर के आगे क़दम उठाएगा। चीन ने कहा है कि वो भारत सरकार के इस क़दम से ख़ासा चिंतित है।

जिनके प्रभारी रहते राहुल गाँधी ने गँवाई अमेठी की सीट, अब वो करेंगी लखनऊ से राजनीति

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा को मिले आदेश के मुताबिक़, उन्हें सरकारी घर खाली करना है। लगभग साल भर पहले उनकी एसपीजी सुरक्षा भी वापस ली गई थी, इन दो घटनाओं के बाद राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा हो रही है।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अब वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की ओर रुख कर सकती हैं। साल 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं और यहाँ कॉन्ग्रेस पहले ही बहुत बेहतर स्थिति में नहीं है। 

साल 2019 के दौरान हुए आम चुनावों में प्रियंका गाँधी वाड्रा को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था। प्रदेश में प्रचार से लेकर पार्टी की नींव मज़बूत करने तक सारी ज़िम्मेदारी प्रियंका गाँधी की थी। लेकिन नतीजा यह निकला कि राहुल गाँधी परिवार की सुरक्षित सीट अमेठी तक गँवा बैठे।

प्रियंका गाँधी के उत्तर प्रदेश प्रभारी रहते हुए अमेठी की तुलना में केरल का वायनाड ज़्यादा बेहतर विकल्प साबित हुआ। वायनाड के सहारे राहुल गाँधी कम से कम संसद तक पहुँच गए, नहीं तो वहाँ भी अपनी मौजूदगी नहीं दर्ज करा पाते।

2019 के आम चुनावों में कॉन्ग्रेस कुछ इस हद तक बैकफुट पर आ गई कि उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में केवल 2 सीटें ही जीत पाई। एक सीट रायबरेली से सोनिया गाँधी ने जीती थी और वह भी कॉन्ग्रेस की सुरक्षित सीट ही मानी जाती है।

कॉन्ग्रेस का नेतृत्व ऐसा मानता है कि प्रियंका गाँधी वाड्रा में तमाम गुण उनकी दादी इंदिरा गाँधी जैसे हैं। कॉन्ग्रेस से जुड़े लोगों के मुताबिक़ अगर पार्टी को कोई मज़बूत कर सकता है तो वह प्रियंका ही हैं, जबकि बुनियादी स्तर पर उनकी रणनीतियों का असर कम ही देखने को मिलता है।

उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की हालत सुधारने की कोशिश में अक्सर वह आम लोगों के सामने झूठे तथ्य, गलत ख़बरें और गलत जानकारियाँ रखती हैं। कोरोना वायरस का प्रभाव बढ़ने के बाद प्रियंका ने योगी सरकार को मज़दूरों के मुद्दे पर घेरने का पूरा प्रयास किया था।

इस मुद्दे पर प्रियंका ने वादा किया था कि वह मज़दूरों को घर वापस भेजने के लिए बस की व्यवस्था कराएँगी लेकिन उनका यह वादा बहुत भरोसेमंद साबित नहीं हुआ। उनके द्वारा दी गई तमाम गाड़ियों का पंजीयन तक ख़त्म हो चुका था। इतना ही नहीं, कुछ गाड़ियाँ तो दो पहिया और तीन पहिया वाहन थे। काफी विवाद होने के बाद उन्हें अपने वाहन वापस बुलाने पड़े थे।

प्रियंका गाँधी वाड्रा साल 1997 से सरकारी बंगले में रह रही थीं। इसके अलावा उन्हें एसपीजी की विशेष सुरक्षा भी मिली हुई थीl यह भी उल्लेखनीय है कि उन्हें इस तरह की तमाम सुविधाएँ तब मिली हुई थीं, जबकि वह किसी सरकारी या प्रशासनिक पद पर भी नहीं थीं।

कुछ समय पहले कॉन्ग्रेस के एक नेता ने सुझाव दिया था कि वह राज्यसभा की सदस्य बन कर सरकारी सुविधाओं का लाभ ले सकती हैं। हालाँकि फिलहाल जिस तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं उनके हिसाब से प्रियंका गाँधी अब उत्तर प्रदेश में ही रहने वाली हैं। ज़्यादा संभावनाएँ हैं कि वह कौल आवास में रह सकती हैं, जो कि इंदिरा गाँधी की मामी शीला कॉल का हैl वह भी कॉन्ग्रेस की सदस्य थीं। अभी यह तय नहीं है कि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा और बच्चे उनके साथ जाएँगे या नहीं।    

दिल्ली दंगों के लिए सऊदी अरब से फंडिंग: स्पेशल सेल की जाँच रिपोर्ट में खुलासा, भारत के भी कई हिस्सों से आए थे पैसे

दिल्ली पुलिस ने अदालत में पेश जाँच रिपोर्ट में कहा है कि पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों के लिए सउदी अरब और देश के अलग-अलग हिस्सों से भी फंडिंग आई थी। पुलिस का कहना है कि दिल्ली में दंगे सुनियोजित साजिश और योजना के परिणामस्वरूप भड़के थे और यह अचानक नहीं था।

इससे पहले ही दिल्ली पुलिस ने एक स्थानीय अदालत को बताया था कि गवाहों से पूछताछ से यह पता चला कि दिल्ली दंगों की साजिश में आरोपित शिफा उर रहमान को मध्य पूर्व के देशों में स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया के पूर्व छात्र संघ के सदस्यों से फंड मिला था। इसके बाद पटियाला हाउस कोर्ट ने गिरफ्तार किए गए जामिया के पूर्व प्रेजिडेंट शिफा उर रहमान को 10 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया था।

पुलिस ने कहा कि रहमान का नाम इशरत जहाँ, खालिद सैफी, मीरान हैदर, सफूरा जरगर, गुल्फ़ीशा खातून, ताहिर हुसैन और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के तीन सदस्यों से पूछताछ के दौरान सामने आया था।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने अदालत से दिल्ली हिंसा की तह तक पहुँचने के लिए और आरोप पत्र दाखिल करने के लिए समय माँगा है। पुलिस ने कहा कि कोरोना वायरस के कारण जारी देशव्यापी लॉकडाउन के कारण जाँच में देरी हुई है।

‘लाइव हिन्दुस्तान’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पटियाला हाउस स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायधीश धर्मेंद्र राणा की अदालत में पुलिस की तरफ से इन दंगों के तीन अहम चेहरों को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दी गई थी।

इनमें आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र नेता मीरान हैदर और गुल्फ़ीशा खातून (Gulfisha Khatoon) के नाम शामिल हैं। पुलिस ने कहा है कि इन तीनों को दिल्ली में दंगे भड़काने के लिए तैयार किया गया था।

मीर हैदर (35) कथित तौर पर पीएचडी छात्र है और दिल्ली में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की युवा इकाई का अध्यक्ष भी है। वहीं, सफूरा जरगर जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एमफिल कर रही हैं। हाल ही में उनकी प्रेगनेंसी को लेकर उन्हें जमानत मिलने की चर्चा जोरों पर रही।

दिल्ली पुलिस द्वारा अदालत में सौंपी गई शुरूआती जाँच रिपोर्ट के अनुसार गुल्फ़ीशा खातून ने सोशल मीडिया साइट जैसे – फेसबुक, ट्विटर, मेसेंजर ऐप व्हाट्सएप पर देश के खिलाफ मुस्लिम समुदाय को जुटाने की तैयारियाँ की थीं।

दिल्ली में नागरिकता कानून के विरोध के नाम पर बड़े स्तर पर हिन्दू-विरोधी दंगों को अंजाम दिया गया था। यह सिलसिला शाहीन बाग़ से शुरू हुआ था जो गत दिसम्बर माह से ही अपनी गतिविधियों के कारण चर्चा का विषय बना रहा।

पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार बहुत पहले से ही अलग-अलग 21 जगहों पर धरना-प्रदर्शन की तैयारी कर ली गई थी। गौरतलब है कि इसी साल की शुरुआत में 24 फरवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दो दिवसीय दौरे पर भारत आए थे। उनके दौरे के दौरान ही उत्तरी-पूर्व दिल्ली में दंगे भड़क गए थे। दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल, आईबी अफसर अंकित शर्मा की दंगाइयों ने जान ले ली थी।

इन समेत दिल्ली में हुए दंगों में 53 लोगों की मौत हुई और 200 से ज्यादा लोग घायल हुए है। पुलिस अलग-अलग मुकदमा दर्ज कर मामले की जाँच कर रही है। अब तक दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के सिलसिले में 1300 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

AAP के चायनीज CCTV रखते हैं दिल्ली पर नजर, कई देशों में सुरक्षा कारणों से ब्लैकलिस्टेड है यह कम्पनी

AAP सरकार द्वारा लगाए गए लगभग 1.4 लाख चीनी CCTV कैमरों पर राजधानी में विवाद छिड़ गया है। यह विवाद हाल ही में गलवान घाटी में जारी गतिरोध के बीच सामने आया है।

इस गतिरोध के बाद केंद्र सरकार ने चीनी परियोजनाओं और संसाधनों के प्रयोग को भारतीय परियोजनाओं से दूर रखने के लिए कई अहम फैसले लिए हैं। सोमवार (जून 29, 2020) को, भारत ने 59, ज्यादातर चीनी, मोबाइल एप्स पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसमें टिकटॉक और वी-चैट भी शामिल है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा सीसीटीवी कैमरे स्थापित किए गए हैं, जो चीनी कंपनी हिकविजन (Hikvision) द्वारा बनाए गए हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस कम्पनी के मोबाइल एप्लिकेशन को हजारों लोगों ने अपने फोन पर डाउनलोड किया है और इससे उनकी निजता और सुरक्षा को बड़ा खतरा है। बीजेपी ने इस मुद्दे पर AAP सरकार पर निशाना साधा और तत्काल इसे सुधारने की बात की है।

गौरतलब है कि अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन ने भी हाल ही में कहा है कि चीनी कंपनियों, जिसमें टेलीकॉम उपकरण दिग्गज हुवाई टेक्नोलॉजिज और CCTV कंपनी हिकविजन शामिल हैं, चीनी सेना के नियंत्रण और स्वामित्व में है। वॉशिंगटन ने हुवाई और हिकविजन को राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से पिछले साल ही ब्लैकलिस्ट में रखा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अनुज अग्रवाल ने कहा कि अकेले सीसीटीवी कैमरों से कोई खतरा नहीं है, लेकिन जब लोग अपने मोबाइल फोन पर लाइव फीड देखने के लिए हिकविजन के iVMS-4500 ऐप को डाउनलोड करते हैं, तो यह एक खतरा बन जाता है।

अग्रवाल ने कहा – “ऐप को किसी भी कंपनी के अधिकारी या सरकार या चीन में सेना द्वारा आसानी से एक्सेस किया जा सकता है। वर्तमान में चल रहे तनाव की स्थिति में, वे यह भी देख सकते हैं कि दिल्ली की सड़कों पर क्या हो रहा है। इन कैमरों में ऐसे सेंध को रोकने के लिए कोई सुरक्षा फीचर नहीं हैं। वे काफी कमजोर हैं।”

विशेषज्ञों का कहना है कि हिकविजन के सीसीटीवी कैमरे विभिन्न सरकारी और सरकारी परिसरों में लगाए गए हैं। ऐसे में एक ओर जहाँ लोग यह देखकर खुश हैं कि वे अपने मोबाइल फोन पर ही लाइव फ़ीड प्राप्त कर रहे हैं तो दूसरी ओर वास्तविकता यह है कि अब चिंता का एक कारण यह लाइव फ़ीड ही हैं, जो कि तकनीकी खामियों की वजह से चीन तक पहुँच जाता है।

दरअसल चुनावों से पहले दिल्ली सरकार ने दिल्ली में सुरक्षा को लेकर शुरुआती चरण में 1 लाख 40 हजार सीसीटीवी कैमरे दिल्ली में लगवाने का ठेका दिया था। दूसरे चरण में भी 1 लाख 40 हजार कैमरे लगाने का ठेका दिया गया था।

दिल्ली सरकार ने बीईएल कंपनी को 320 करोड़ रुपये में दिल्ली में 1 लाख 40 हजार सीसीटीवी कैमरे लगाने का ठेका दिया था, जिसमें कैमरे की मेंटेनेंस भी शामिल थी।

पिछले साल जुलाई में, AAP ने लोक निर्माण विभाग (PWD) को निर्देश दिया कि वह अपना चुनावी वादा निभाने के लिए दिल्ली और आसपास के आवासीय और व्यावसायिक परिसरों में स्थापना के लिए 1.5 लाख सीसीटीवी कैमरे शीघ्रता से खरीदें। यह 1.4 लाख ‘Eyes in the sky’ के अलावा था जिसे दिल्ली सरकार ने राजधानी में स्थापित किया था।

571 करोड़ रुपये की इस परियोजना का लक्ष्य दिल्ली के 70 विधानसभा क्षेत्रों में से प्रत्येक में कम से कम 4,000 कैमरे हैं। इसके अतिरिक्त, दिल्ली के 1,000 सरकारी स्कूलों में ऐसे कैमरे लगाने पर 400 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इससे पहले, दिल्ली पुलिस द्वारा निगरानी किए गए 4,388 सीसीटीवी कैमरे पुलिस थानों, कोर्ट परिसर, बाजारों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में लगाए गए थे।

हिकविजन (Hikvision) ने दिल्ली सरकार से 2018 में 1.5 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए एक टेंडर जीता। इसे भारत इलेक्ट्रॉनिक्स (BEL) द्वारा एक वेंडर (विक्रेता) के रूप में भी लिस्टेड किया गया है, जो भारत सरकार के लिए अत्यधिक संवेदनशील और वर्गीकृत रक्षा परियोजनाओं पर काम करता है।