Home Blog Page 4822

मिलेनियम पार्क को कब्रिस्तान बनाने की फिराक में दिल्ली वक्फ बोर्ड: ​उपराज्यपाल को VHP का खत

कोरोना संक्रमितों को दफनाने के नाम पर इंद्रप्रस्थ के मिलेनियम पार्क की जमीन हड़पने की साजिश रची जा रही है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अनुसार इसके पीछे दिल्ली वक्फ बोर्ड है। बोर्ड को दिल्ली सरकार के कुछ लोगों का भी समर्थन हासिल है।

VHP ने इस संबंध में दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल को पत्र लिखा है। पत्र में आरोप लगाया है कि दिल्ली वक्फ बोर्ड मिलेनियम पार्क की जमीन पर अवैध अतिक्रमण कर रहा है। इसलिए ‘जदीद कब्रिस्तान अहाले इस्लाम’ का बोर्ड पार्क के गेट से हटवाया जाए।

शिकायत के अनुसार, दिल्ली वक्फ बोर्ड ने कोरोना के नाम पर पार्क की जमीन पर अतिक्रमण करने की कोशिश की है। वे इस पार्क में कोरोना संदिग्धों को दफनाकर इसे कब्रिस्तान बनाने का प्रयास रहे हैं।

VHP का कहना है कि इस मामले के संबंध में स्थानीय नागरिक भी वक्फ बोर्ड की मंशा पर आपत्ति जता रहे हैं। विहिप ने बताया कि स्थानीय गाँव नंगली रजापुर के नागरिकों की सजगता से इंद्रप्रस्थ मिलेनियम पार्क में अतिक्रमण रुक गया है। लेकिन, इसे कब्जाने के प्रयास अब भी जारी है और लगातार पार्क में कोरोना संक्रमितों के शवों को दफनाने की कोशिश हो रही है, साथ ही पार्क के ताले भी तोड़े जा रहे हैं।

VHP के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने इस संबंध में ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया है। साथ ही लिखा है, “इसे जमीन जिहाद कहते हैं और दिल्ली वक्फ बोर्ड इसमें माहिर हैं।”

गौरतलब है कि पिछले माह एक आदेश मे दिल्ली वक्फ बोर्ड ने मिलेनियम पार्क के पास कोरोना वायरस संक्रमितों को दफनाने के लिए जदीद कब्रिस्तान नाम से एक जगह निर्धारित कर शहर के मुस्लिमों को वहाँ शव को दफनाने से पहले क्रिया करने की इजाजत दी।

इस बारे में सूचना पाते ही नगली राजापुर के स्थानीय लोगों ने अतिक्रमण का विरोध किया और VHP के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया कि कोई मृतक शरीर वहाँ न दफनाया जाए।

लोगों का मत है कि वक्फ बोर्ड के यहाँ अतिक्रमण करने और यहाँ कोरोना शवों को दफनाने की अनुमति देने से बीमारी के फैलने का खतरा बढ़ सकता है। अपने पत्र में विहिप ने वक्फ बोर्ड पर आरोप लगाया है कि उन्होंने जहाँ जदीद कब्रिस्तान का बोर्ड लगाया है वह जगह पार्क की है।

संगठन का ये भी कहना है कि कब्रिस्तान पार्क के मुख्य गेट से जुड़ा हुआ है और बुद्धा स्तूपा भी उससे केवल 100 मीटर की दूरी पर है, जहाँ आवाजाही रहती है। वीएचपी ने पत्र में इस बात का भी उल्लेख किया है कि 17 और 18 मई को बोर्ड ने यहाँ जेसीबी मशीन लगातार पार्क का गेट तोड़ने का प्रयास किया।

पत्र में विश्व हिंदू परिषद ने माँग की है कि पार्क में अनाधिकृत कब्जा करने वालों तथा उनका साथ देने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही हो तथा पार्क के गेट पर जड़े कब्रिस्तान के बोर्ड को अबिलम्ब हटाया जाए।

मुस्लिम पक्ष ने बताया रामजन्मभूमि में निकले अवशेषों को प्रोपेगेंडा, TheWire ने कहा था – बाबरी के नीचे मंदिर नहीं

मुस्लिम पक्ष ने अयोध्या रामजन्मभूमि के समतलीकरण के दौरान मिले अवशेषों जैसे- शिवलिंग और अन्य कलाकृतियों को लेकर बयान दिया है कि ये साक्ष्य मंदिर के नहीं हैं। मुस्लिम पक्ष ने यह भी कहा है कि ये अवशेष प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं।

अयोध्या रामजन्मभूमि की सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board) के वकील और ऑल इंडिया बाबरी मस्जिद कमिटी के कन्वेनर जफरयाब जिलानी (Zafaryab Jilani) ने कहा कि शिवलिंग और जो भी प्राचीन कलाकृतियाँ वहाँ निकलने की बात कह रहे हैं, ये सब प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं, जिन्हें ये लोग बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दूसरे चुनावों में फायदा उठाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

यासूब अब्बास का कहना है कि ऐसे लोगों पर रोक लगानी चाहिए, जो कोरोना वायरस की महामारी के दौरान इन ख़बरों पर बात कर रहे हैं कि अयोध्या, काशी में क्या हो रहा है क्या नहीं।

उल्लेखनीय है कि रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण कार्य के दौरान आज ही भूमि समतलीकरण के दौरान वहाँ से कुछ प्राचीन अवशेष मिलने की खबर सामने आई थी, जिसके बाद यह चर्चा का विषय बन गई।

दिलचस्प बात यह है कि ‘द वायर’ जैसे प्रोपेगेंडा पोर्टल्स ने कुछ साल पहले ही अपनी रिपोर्ट में कहा था कि अर्कियोलोजिस्ट्स को खुदाई के दौरान ‘बाबरी मस्जिद के नीचे’ मंदिर होने के किसी भी तरह के कोई साक्ष्य नहीं मिले थे।

जबकि टाइम्स नाउ चैनल पर जफरयाब जिलानी का कहना है कि जो आकृतियाँ और अवशेष आज दिखाए जा रहे हैं, उन पर सुप्रीम कोर्ट में भी बात हो चुकी है और वो पहले से ही वहाँ मौजूद थे।

गौरतलब है कि राम मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है, जहाँ खुदाई में प्राचीन अवशेष मिल रहे हैं। इस दौरान कई पुरातात्विक मूर्तियाँ, खंभे और शिवलिंग मिल रहे हैं। श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महामंत्री चम्पत राय ने कहा कि मलबा हटाने के दौरान कई मूर्तियाँ और एक बड़ा शिवलिंग भी मिला है।

निर्माण कार्य के बार फिर शुरू होते ही 67 एकड़ के श्रीराम जन्मभूमि परिसर में समतलीकरण और बैरिकेडिंग के एंगल आदि को हटाने का काम तेजी से जारी है। इसी समतलीकरण और खुदाई के काम के दौरान कई सारी प्राचीन मूर्तियों और मंदिर के पुरावशेष मिल रहे हैं। इसके चलते ही एक बार फिर मुस्लिम पक्ष के इस बयान से इस मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई है।

‘पति कोरोना संक्रमित था, हॉस्पिटल से गायब है’: अस्पताल का दावा- परिवार को बता दाह-संस्कार किया

हैदराबाद में कोरोना संक्रमित व्यक्ति के अस्पताल में भर्ती होने के बाद लापता होने की घटना सामने आई है। मरीज की पत्नी ने आरोप लगाया है कि संक्रमण का शिकार होने के कारण उसके पति को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन अब वो वहाँ से गायब है।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, वनसथल्लीपुरम कॉलोनी की निवासी अलमपल्ली माधवी ने अपने पति की गुमशुदगी की सूचना ट्विटर पर राज्य के आईटी मंत्री केटी रमा राव को दी है।

दुखड़ा व्यक्त करते हुए महिला ने बताया कि उसका 42 वर्षीय पति, जो एक चावल की मिल में काम करता था, वो अस्पताल में भर्ती होने के बाद से लापता है।

उसने बताया कि उसके पति को 27 अप्रैल को किंग कोठी अस्पताल में भर्ती करवाया था। बाद में उसे 30 अप्रैल को गाँधी अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया। महिला के अनुसार, उसे और उसकी दो बेटियों को भी कोरोना वायरस के कारण अस्पताल में भर्ती किया गया था, पर 16 मई को ये तीनों डिस्चार्ज हो गईं। मगर, उसके पति का कुछ नहीं मालूम चल पाया।

अस्पताल प्रशासन का कहना है कि 1 मई को महिला का पति कोरोना संक्रमित पाया गया था। उसे साँस लेने में दिक्कत व निमोनिया की परेशानी थी। इसके कारण उसकी मौत हो गई। घर वालों को सूचित करके उसका दाह-संस्कार करवा दिया गया था।

वहीं, माधवी का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन ने उससे किसी प्रकार की अनुमति नहीं माँगी और न ही अपने दावे से जुड़े कोई सबूत पेश किया।

माधवी ने कहा, “16 मई को, जब हम डिस्चार्ज हुए, मैंने पति के बारे में पूछा, मगर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने पहले कहा कि वे वेंटिलेटर पर हैं लेकिन बाद में बोलने लगे कि वे जिंदा नहीं हैं। हम आपने निवेदन करते हैं कि मेरे पति के लापता होने की जाँच में हमारी मदद करें।”

माधवी ने संवाददाताओं से भी बातचीत में कहा कि उसे पूरा यकीन है कि उसका पति जिंदा हैं। उसने चुनौती देते हुए कहा, “उन्हें सबूत दिखाने दीजिए कि उन्होंने जानकारी दी और किससे उन्होंने सहमति या अनापत्ति पत्र प्राप्त किया।”

अस्पताल प्रशासन ने जारी किया बयान

गाँधी अस्पताल के सुप्रीटेंडेंट डॉ. एम राजा राव ने इस संबंध में दिए अपने बयान में महिला के प्रति सहानुभूति व्यक्त की और अस्ताल के डॉक्टरों पर इल्जाम लगाने को गलत बताया।

उन्होंने कहा, “प्रक्रिया के अनुसार, परिवार के सदस्यों को सूचित किया गया था और प्रोटोकॉल का पालन करते हुए, शव को पुलिस को सौंप दिया गया। जाँच करने पर ज्ञात हुआ कि जीएचएमसी द्वारा शव का अंतिम संस्कार किया गया था। जहाँ सभी नियत प्रक्रियाओं का पालन किया गया।”

अयोध्या: स्मृतियों को सहेजने की जरूरत ताकि दुनिया भूल न सके हिंदुओं का दमन

अयोध्या की पुण्यभूमि की खुदाई शुरू हो गई है। भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए इसे तैयार किया जा रहा है। 500 सालों तक ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ में दफन रहने वाला भारत का वास्तविक इतिहास प्रस्फुटित होने लगा है।

खुदाई के दौरान राम जन्मभूमि स्थल से मिले मंदिर के अवशेष और मूर्तियाँ

आजादी के 70 साल बाद तक वामपंथी इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के ताकतवर गठजोड़ ने इन आवाजों को दबाने की कोशिश की। लेकिन वे असफल रहे। न्याय और सत्य में विश्वास रखने वाले सभी लोगों के लिए यह विजय का क्षण है।

हालाँकि यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के साथ यह जीत पूरी नहीं हुई है। अयोध्या में महज भव्य राम मंदिर का निर्माण ही वास्तविक जीत नहीं है।

वास्तविक जीत वह है, जब भारत के दबे-कुचले हिंदू पीढ़ियों की व्यथा को इतिहास के पन्नों में दर्ज किया जाएगा। इसके लिए इससे जुड़े साक्ष्यों को संरक्षित और सुरक्षित रखे जाने की आवश्यकता है, जिससे इसे पूरी दुनिया देख सके और याद रख सके।

वामपंथी इतिहासकारों की लॉबी 70 साल बाद भले ही बिखर गई हो, लेकिन अभी खत्म नहीं हुई है। दरअसल वामपंथी इतिहासकारों की बहुत बड़ी साजिश थी, जिसके तहत सैकड़ों वर्षों तक हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों को इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया गया। यह साजिश आज भी लगातार चल रही है।

यही कारण है कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तथ्यों के बजाय भावनाओं पर निर्णय लेने का आरोप लगाते हैं। इतना ही नहीं ये लोग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को भाजपा की राजनीतिक सफलता और ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ के एजेंडे से जोड़ने के साथ अफवाह फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।

वामपंथी इतिहासकार चाहते हैं कि दुनिया को यह लगे कि हिंदुओं पर अत्याचार कभी हुआ ही नहीं। हम यहूदी लोगों से सीख सकते हैं कि इस तरह के प्रोपेगेंडा को कैसे धराशायी किया जाए।

इसी तरह के अत्याचार झेलने वाली यहूदी लोगों की पीढ़ी ने दो संकल्प लिए। पहला, उन्हें एक महान यहूदी राष्ट्र बनाना है। दूसरा, दुनिया यह कभी नहीं भूले कि उनके साथ क्या हुआ था।

अपने साथ हुए अत्याचारों से संबंधित साक्ष्यों को इकट्ठा करना, उनका दस्तावेजीकरण कर उन्हें सहेजना सुनिश्चित किया। अत्याचारों की निशानियों से संबंधित संग्रहालय पूरे यूरोप के अंदर खोले गए। इनमें स्कूली बच्चों को ले जाया जाता, जिससे वे खुद जान सकें कि अतीत में उनके साथ क्या हुआ था। यहूदी लोगों के खिलाफ हुए भीषण अत्याचारों की गाथाएँ मानवता की अंतरात्मा को चुभती रहे।

उनका मानना था कि अत्याचारों की हकीकत आखिर में लोगों के सामने आएगी। सार्वजनिक स्मृतियाँ कभी भी विशेष रूप से अच्छी नहीं होती। समय के साथ नैरेटिव के युद्ध में वास्तविक इतिहास के खो जाने का भी खतरा है। इसके लिए आपको जनता के सामने वास्तविक इतिहास रखना होगा।

भारत में हम हिंदुओं के सामने भी इसी प्रकार का खतरा है। वामपंथियों की एक लॉबी इस देश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों से संबंधित सभी ऐतिहासिक दस्तावेजों को नकारने में लगातार लगी हुई है। वे हमारे ऊपर कथित गंगा-जमुनी तहज़ीब थोपते का प्रयास करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि वे झूठ बोल रहे हैं। वे नहीं चाहते कि अयोध्या में जमीन की खुदाई हो और हकीकत सामने आए।

ऐतिहासिक साक्ष्य हर जगह है। लेकिन वे हमें इसके बारे में बात नहीं करने देंगे और इसके लिए सही शब्दों का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

मैं आपको बताता हूँ कि यह कैसे काम करता है। यदि साक्ष्य जमीन के अंदर मिलते हैं तो वे कहेंगे कि मंदिर की जगह इस स्थान पर मंदिर होने की कहानियाँ महज किंवदंतियाँ हैं। अगर किसी दस्तावजों में साफ तौर पर लिखा हुआ मिलता है कि एक मंदिर को नष्ट किया गया था, तो वे कहते हैं कि वास्तविक उद्देश्य लूट था न कि किसी धर्म को थोपना। यदि दस्तावेज कहते हैं कि उनका उद्देश्य मूर्ति पूजा करने वालों को कुचलना था, तो वे पूछते हैं कि उन हिंदुओं के बारे में क्या कहोगे जिन्हें उस समय अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया गया था?

यदि आप वास्तव में पुराने मंदिर के अवशेषों को देखते हैं, तो वे कहेंगे कि यह इंडो-इस्लामिक वास्तुकला की एक अनूठी शैली है, जो गंगा-जमुनी तहज़ीब का हिस्सा है! तो सवाल उठता है कि हम इस प्रोपेगेंडा को कैसे धराशायी कर सकते हैं?

हमें बिल्कुल वही करना है जो यहूदियों ने खुद पर हुए अत्याचारों को लेकर किया था। हमें साक्ष्यों को एकत्रित करना, दस्तावेजीकरण करना और उन्हें संरक्षित करना शुरू करना होगा। हमें अयोध्या में राम मंदिर के साथ ही एक संग्रहालय स्थापित करना होगा, जहाँ दुनिया उन साक्ष्यों को देख सके, जो आज तक लोगों के सामने आए ही नहीं।

इसके बाद हमें इसे वैश्विक स्तर पर लाना होगा। हमें हिंदुओं के साथ हुए अत्याचारों के बारे में लोगों को बताने के लिए संग्रहालय बनाने, प्रदर्शनियाँ लगाने और स्कूली बच्चों के भ्रमण की शुरुआत करने की आवश्यता है। हमें यह याद रखने के लिए एक वैश्विक दिवस की आवश्यकता है कि हिंदुओं को अपनी ही भूमि पर क्या-क्या झेलना पड़ा।

आज भी जर्मनी में ऐसे रेल कोच हैं जो एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं और लोगों को याद दिलाते हैं कि उनके साथ क्या अत्याचार हुए थे। दुनिया यह कभी नहीं भूलती, क्योंकि यहूदी लोगों ने ये सुनिश्चित किया कि इसे लोग भूल नहीं पाए।

भारत में हिंदुओं ने इस तरह की समस्याओं को झेला। मैं कहता हूँ कि अधिकांश हिंदू यह भूल गए हैं। पहले हमें हिंदुओं को बताना पड़ेगा कि उनके पूर्वजों ने क्या झेला। फिर हमें यह पूरी दुनिया को बताना होगा।

हिन्दूघृणा की फैक्ट्री है पाताल लोक: अजीत भारती का रिव्यू | Ajeet Bharti on PaatalLok and Hinduphobia in Bollywood

पाताल लोक वेबसीरीज की पटकथा लिखने वाले ने पहले ही सोच लिया था कि किस तरह का प्रोपेगेंडा फैलाना है और फिर इसी के इर्द-गिर्द कहानी रच दी गई। इसमें कुतिया का नाम सती सावित्री होता है। ब्राह्मण कान पर जनेऊ रखकर पराई स्त्री के साथ सेक्स करता है। सभी सवर्णों को नकारात्मक दिखाया गया है। साधु को मंदिर में माँस खाते हुए दिखाया गया। एक स्त्री इसलिए पानी लेने से मना कर देती है, क्योंकि उसे समुदाय विशेष के व्यक्ति ने छुआ होता है।

एक दृश्य में भगवान नरसिंह को गिरते हुए दिखाया जाता है। इससे पहले भी कई फिल्मों में भगवान का अपमान किया गया। आखिर हिन्दू के भगवानों के साथ ही ऐसा क्यों होता है? वो इसलिए होता है क्योंकि हिन्दू बहुत ज्यादा सहिष्णु है। उसे इन सब चीजों से फर्क नहीं पड़ता है कि उनके भगवान को गिरा दिया गया है। वहीं किसी भी वेबसीरीज में मजहब विशेष या ईसाई के प्रतीक को गिरते हुए नहीं दिखाया जा सकता। आखिर क्यों?

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें।

पाकिस्तानी अधिकारियों ने जकार्ता और टोक्यो में बेच दिया दूतावास का हिस्सा

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा अपने ही देश के दूतावासों का हिस्सा बेच देने का मामला सामने आया है। इतना ही नहीं देश के एक मंत्री पर अपने मंत्रालय का एक भवन बिजनेस पार्टनर को किराए पर देने का आरोप लगा है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इंडो​नेशिया की राजधानी जकार्ता में पाकिस्तानी दूतावास के एक भवन को बेचने के मामले में राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (नैब) ने विदेश मंत्रालय के कुछ अफसरों के खिलाफ मामला दर्ज करने की मॅंजूरी दी है।

डॉन के अनुसार नैब को जानकारी मिली है कि जकार्ता में दूतावास भवन की गैर कानूनी बिक्री को लेकर विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को जानकारी थी। बावजूद इसके घपलेबाजी को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर राष्ट्रीय खजाने को भारी नुकसान पहुँचाया।

नैब को इसी तरह की शिकायत जापान की राजधानी टोक्यो से भी मिली है। बताया जाता है कि वहॉं भी पाकिस्तानी दूतावास का एक हिस्सा अवैध तरीके से बेच दिया गया है।

इसके अलावा नैब ने धार्मिक मामलों के संघीय मंत्री नूर-उल-हक कादरी के खिलाफ दर्ज शिकायत की सत्यापन प्रक्रिया शुरू कर दी है। उन पर इस्लामाबाद स्थित अपने मंत्रालय का एक भवन बिजनेस साझेदार को देने का आरोप है। इसकी शिकायत उनके ही मंत्रालय के एक व्यक्ति ने की है।

डॉन ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि कादरी के खिलाफ जॉंच का फैसला नैब की बैठक में लिया गया। नैब मुख्यालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह हितों के टकराव का मामला है। कई अधिकारियों के खिलाफ पूछताछ को मॅंजूरी दी गई है। इनमें पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के राजनीतिक सचिव और पूर्व गृह मंत्री अकरम खान दुर्रानी के राजनीतिक सचिव रुखसाना बंगश का बेटा शामिल है।

राजीव गाँधी की छतरी सँभाले अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन: वीडियो का भोपाल गैस हादसे से क्या है कनेक्शन

जब कभी भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दुनियाभर में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ने की बात होती है, कॉन्ग्रेस समर्थक अक्सर एक वीडियो शेयर करते हैं। इस वीडियो में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गॉंधी और अमेरिका के राष्ट्रपति रहे रोनाल्ड रीगन नजर आते हैं।

वीडियो में रेगन छतरी सॅंभाले राजीव को उनकी गाड़ी तक छोड़ने आते हैं। इसे दिखाकर कॉन्ग्रेसी यह जताने की कोशिश करते हैं कि राजीव गॉंधी का अमेरिका में कैसा जलवा-जलाल था।

यह वीडियो कई बार कॉन्ग्रेस शेयर कर चुकी है। पिछले साल जब नरेंद्र मोदी ने अपनी स्पीच के दौरान राजीव गाँधी को भ्रष्टाचारी बोला था, उस समय भी इस वीडियो को शेयर किया गया था। हालाँकि तब एक नया कोण इस वीडियो के पीछे का निकलकर सामने आया था।

दरअसल, पिछले साल जब वीडियो धड़ल्ले से शेयर की जा रही थी, तब मोनिका नाम की सोशल मीडिया यूजर ने इस पूरे वाकए के पीछे छिपे राज का पर्दाफाश किया था। मोनिका ने दावा किया था तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन पूर्व प्रधानमंत्री को वीडियो में जो इज्जत देते नजर आ रहे हैं, उसके पीछे गहरा राज है। इसके तार भोपाल गैस त्रासदी और उसके आरोपित वॉरेन एंडरसेन से जुड़े हैं।

मोनिका ने अपने ट्वीट में बताया कि यह वीडियो 1985 का है जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ने आदिल शहरयार को क्षमादान दिया था। उनका दावा था कि वीडियो में पूर्व पीएम को मिलने वाली इज्जत एक आपसी लेन-देन का नतीजा थी।

एक ऐसा लेन-देन जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने राजीव गाँधी से भोपाल गैस त्रासदी के मुख्य आरोपित वॉरेन एंडरसन को माँगा था और बदले में उन्हें वीडियो में नजर आने वाली इज्जत व उनका दोस्त आदिर शहरयार लौटाया था। बता दें आदिल शहरयार वही शख्स है, जिसे फ्लोरिडा की अदालत ने कई बार धोखाधड़ी का दोषी करार दिया था।

मोनिका ने अपने ट्वीट में लिखा, “अमेरिकी नागरिक वॉरेन एंडरसन के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति रेगन ने स्वयं राजीव गाँधी को फोन किया था और उनसे बात करके सुनिश्चित किया था कि एंडरसन को वे सुरक्षित अमेरिका भिजवाएँ। इसलिए राजीव गाँधी को मिलने वाली ये इज्जत देश को कॉरपोरेट के लालच में बेचने का बदला था।”

गौरतलब हो कि 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी के बाद एंडरसन के अमेरिका जाने के पीछे राजीव गाँधी का हाथ बताया जाता है। कहा जाता है तात्कालीन पीएम राजीव गाँधी के इशारे पर राज्य के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उनकी देश छोड़कर जाने में मदद की थी। एंडरसन को सरकारी प्लेन से कड़ी सुरक्षा के बीच भोपाल से दिल्ली पहुँचाया गया था, जिसके बाद वो अमेरिका वापस चला गया और कभी भारत लौट कर नहीं आया।

आधिकारिक तौर पर इस हादसे में 3,787 लोगों के मरने की बात कही गई। लेकिन कई मीडिया रिपोर्टों में यह संख्या 20-25 हजार बताई जाती है। पीड़ितों के संगठन की याचिका पर सुनवाई करते हुए 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 15,274 लोगों की मौत हुई और 5,74,000 लोग बीमार हुए थे।

इसके अलावा इंडियन एक्सप्रेस में प्रणब ढल सामंता भी इस बात का दावा करते हैं कि एंडरसन को सुरक्षित वापस अमेरिका भेजने के लिए अमेरिका का भारत पर दबाव था। ये तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि एंडरसन के अमेरिका पहुँचते ही कुछ दिन में आदिल को क्षमा दान मिल गया था।

वुहान में 5 साल के लिए जंगली जानवरों को खाने पर प्रतिबंध, यहीं से शुरू हुआ था कोरोना वायरस का संक्रमण

दुनियाभर को कोरोना महामारी देने वाले चीन ने आखिरकार वुहान शहर में जंगली जानवरों के खाने पर बैन लगा दिया है। वुहान वही शहर है जहाँ से कोरोना संक्रमण शुरू हुआ था। जंगली जानवरों को खाने पर पाँच साल का प्रतिबंध लगाया गया है। इसे 13 मई को लागू किया गया।

हुआनान सीफूड होलसेल मार्केट से ही कोरोना वायरस जन्म हुआ था। इसे 1 जनवरी को बंद तो कर दिया गया मगर उसके बाद भी इस वायरस ने दुनियाभर में तहलका मचा दिया। लोमड़ी, मगरमच्छ, भेड़िये, सांप, चूहे, मोर समेत कई जंगली जानवरों को खाने पर 5 साल का बैन लगाया गया है।

इस आदेश के साथ ही किसी भी संगठन या व्यक्ति को वाइल्डलाइफ या उससे जुड़े उत्पादों के प्रोडक्शन, जमीन के जानवरों और पानी के प्रोटेक्टेड जंगली जानवरों को खाए जाने के लिए आर्टिफिशल ब्रीडिंग की भी इजाजत नहीं होगी। मेडिकल संगठनों को रिसर्च के लिए जानवरों को हासिल करने के लिए लाइसेंस लेना होगा। ह्यूमन सोसायटी इंटरनेशनल (एचएसआई) के अनुसार, चीन में वन्यजीव की खपत का व्यापार 125 बिलियन युआन का है।

माँस खाने की परंपरा

चीन की परंपरा में कई तरह के जानवरों के माँस खाने का चलन रहा है। चीन के शहर वुहान में जंगली जानवरों के माँस का बड़ा मार्केट है। चीन में कई तरह के जानवरों का माँस खाया जाता है। वुहान में सांप-बिच्छू, मगरमच्छ, कुत्ते, चमगादड़ से लेकर घोड़े- गधे और ऊँट तक के माँस मिलते हैं। यहाँ इन जानवरों के माँस का इस्तेमाल सिर्फ खाने के लिए नहीं बल्कि मेडिसीन, कपड़े और गहने बनाने मे भी इस्तेमाल होता है।

पहले भी किया जा चुका है, कुछ जानवरों को बैन

2003 में चीन में सार्स नाम की बीमारी फैली थी। इसके चलते बिलाव (सीविट) और नेवले का माँस बेचने पर प्रतिबंध लगाया गया था। इस बीमारी का वायरस बिलाव या नेवले के माँस से इंसान के शरीर में आया था। सार्स के महामारी की तरह फैलने पर सांप के मांस की बिक्री पर भी रोक लगा दी गई थी। मगर फिर भी वहाँ के लोगों ने इनका माँस खाना नहीं छोड़ा। चूंकि चीन की प्राचीन परंपरा में कई तरह के जानवरों के मांस खाने का चलन रहा है, इसलिए इन्हें बैन करना आसान नहीं है।

चीन के लोग बताते हैं कि कोरोना वायरस की वजह से अभी लोगों ने जंगली जानवरों का माँस खाना बंद किया है। लेकिन जैसे ही वायरस का असर खत्म होगा। जानवरों का माँस लोग फिर से खाने लगेंगे।

‘अम्फान’ ने बंगाल, ओडिशा और बांग्लादेश में बरपाया कहर, 24 की मौत, राहत कार्य जारी

बंगाल की खाड़ी से उठे चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ ने 190 किलोमीटर की रफ्तार से पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बांग्लादेश में जमकर कहर बरपाया। इसकी चपेट में आने से 24 लोगों के मारे जाने की खबर है। इनमें 12 लोग बांग्लादेश, 10 पश्चिम बंगाल और 2 ओडिशा के हैं।

जानकारी के मुताबिक ज्यादातर मौतें दीवारों के गिरने, पानी में डूबने और पेड़ों के गिरने और उनकी चपेट में आने से हुई है। इसका असर पश्चिम बंगाल के कोलकाता और हावड़ा में चारों ओर तबाही के रूप में देखा जा रहा है। हावड़ा में एक स्कूल भवन की छत उड़ गई और नारियल के पेड़ व बिजली के खंभे बड़ी संख्या में तूफान की चपेट में आ गए।

राहत की बात यह है कि चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ फिलहाल पूरी तरह से शांत हो गया है। अम्फान के शांत होते ही एनडीआरआफ की टीमें राहत कार्य में जुट गई हैं। पश्चिम बंगाल में पाँच और ओडिशा से करीब डेढ़ लाख लोगों को एनडीआरआफ की टीमों ने सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दिए गए एक बयान के मुताबिक फिलहाल तूफान से राज्य को हुए नुकसान का आकलन करना मुश्किल है। उन्होंने बताया कि संचार पूरी तरह से बाधित हो गया है। क्षति की सीमा का पूरी तरह से आकलन करने में तीन-चार दिन लग सकते हैं।

पड़ोसी देश बांग्लादेश की बात करें तो अम्फान ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया है। विद्युत मंत्रालय द्वारा जारी बयान के मुताबिक कम से कम एक लाख लोग बिजली की समस्या से जूझ रहे हैं। तटीय इलाकों के सैकड़ों गाँव पानी में डूब गए हैं। यहाँ तक कि करीब एक दर्जन से अधिक बाढ़ सुरक्षा के बाँध टूट गए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (21 मई 2020) को आश्वासन दिया कि उनकी सरकार प्रभावित लोगों की मदद के लिए हरसंभव प्रयास करेगी। चक्रवात अम्फान की तबाही के दृश्य पश्चिम बंगाल में देखे जा रहे हैं। इस चुनौतीपूर्ण समय में पूरा देश पश्चिम बंगाल के साथ एकजुटता के साथ खड़ा है। प्रभावित लोगों की मदद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।

आपकों बता दें कि बुधवार (20 मई 2020) की रात 2:30 बजे आया चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ पश्चिम बंगाल के दीघा और बांग्लादेश के हटिया द्वीप के बीच जमीन से टकराया था। 18 मई को गृह मंत्रालय ने अम्फान तूफ़ान (Amphan Cyclone) को लेकर चेतावनी जारी की थी।

सिक्किम… जो कभी नेपाल जैसा ही था एक स्वतंत्र देश, ऐसे बना था भारत का अभिन्न अंग

खड्ग प्रसाद ओली (KP Oli) नेपाल के प्रधानमंत्री हैं। और यही केपी ओली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (NCP) के अध्यक्ष भी हैं। कल की ही बात है, जब नेपाल की सरकार ने नया नक्शा जारी किया। इस नक्शे में भारत के कुछ हिस्सों को नेपाल का दिखाया गया है। मतलब कम्युनिस्ट पार्टी की नेपाली सरकार ने अपने वामपंथी पड़ोसी देश चीन की ओर आँखें नहीं उठाईं बल्कि लोकतांत्रिक देश भारत की मैत्री के साथ धोखा किया।

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली को विश्व राजनीतिक इतिहास से हालाँकि कुछ सीखना चाहिए। सीखना यह चाहिए कि अंततः किसी देश या क्षेत्र की जनता ही वहाँ का भविष्य लिखती है, ना कि कोई सत्ताधारी। इसके लिए पड़ोसी राज्य सिक्किम के इतिहास से बेहतर सीख और कहाँ मिलेगी! कभी वहाँ के राजा ने भी प्रजा के हाथ में सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया था, लेकिन उसी प्रजा ने उनकी राजगद्दी खींच ली और भारत की नागरिकता स्वीकार ली।

सिक्किम की कहानी और इतिहास के लिए प्रधानमंत्री केपी ओली को बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं। वो अप्रैल 14, 1975 का दिन था, जब सिक्किम ने एकमत से राजतन्त्र को हटाने के लिए मतदान किया। रिफ़रेंडम हुआ और सिक्किम की 97.55% जनता ने मिल कर इसे भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनाने के लिए वोट दिया। कुल 97,000 लोगों ने इस मतदान की प्रक्रिया में हिस्सा लिया था, जो कुल 63% वोटर टर्नआउट था। उस समय चोग्याल वंश का सिक्किम पर शासन था और चीन हिमालय पर बसे इस राज्य को हथियाने की फ़िराक़ में था। पाल्डेन थोंडुप नामग्याल तब सिक्किम का राजा था। वो गंगटोक स्थित महल में ही भारतीय सेना से घिरा हुआ था। उसकी पत्नी तब 2 बच्चों के साथ न्यूयॉर्क में रहती थी।

51 वर्षीय नामग्याल की पत्नी होप कुक अमेरिकन थी और और उन्होंने उस वक़्त इस मतसंग्रह को अवैध और असंवैधानिक करार दिया था। लेकिन, वही हुआ जो सिक्किम की जनता की इच्छा थी। काजी लेन्डुप दोरजी तक सिक्किम के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने भारतीय गणराज्य का पक्ष लिया था। उन्होंने केबलग्राम से वोटिंग का परिणाम तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी तक भिजवाया। उन्होंने गाँधी से आग्रह किया कि वो तुरंत जनता की इच्छानुसार निर्णय लें और जनमत को स्वीकार करें।

हालाँकि, तब चीन ने ज़रूर ये आरोप लगाए थे कि भारत जबरदस्ती सिक्किम पर कब्जा कर रहा है। लेकिन, इंदिरा गाँधी ने ये याद दिलाने में देरी नहीं की कि चीन ने किस तरह तिब्बत पर जबरदस्ती कब्ज़ा किया था और साथ ही ये भी बता दिया कि भारत सरकार वही कर रही है, जैसा सिक्किम की जनता ने निर्णय दिया है। इस मतसंग्रह से 2 साल पहले ही नामग्याल के ख़िलाफ़ लोगों ने आंदोलन चलाया था, जिसके बाद वो नाम का राजा रह गया था। उसकी 400 सदस्यीय फ़ौज को भारतीय सेना ने निःशस्त्र कर दिया था, ताकि कोई हिंसा नहीं हो। हालाँकि, ये आरोप ग़लत हैं कि नामग्याल को सेना ने नज़रबंद किया था।

तब स्थिति ही ऐसी बन गई थी कि वहाँ हिंसा भी हो सकती थी और नामग्याल की सुरक्षा के लिए ही भारतीय सेना ने उसके महल के चारों ओर डेरा डाला था। उसका कहना था कि अगर रेफेरेंडम होता भी है तो किसी ‘स्वतंत्र एजेंसी’ द्वारा होना चाहिए, सिक्किम के प्रशासन अथवा भारतीय चुनाव आयोग द्वारा नहीं। चीन आरोप लगाता रहा है कि भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने 2 साल तक चले गुप्त अभियान में सिक्किम की जनता में राजा के प्रति आक्रोश भरा। नामग्याल सिक्किम को भारत से लगातार दूर कर रहा था और अपनी अमेरिकन पत्नी के कहने अनुसार भारत के लिए लगातार समस्याएँ खड़ा कर रहा था।

भौगोलिक स्थिति को समझें तो भारत का उत्तर उत्तर-पूर्वी हिस्सा सामरिक और रणनीतिक रूप से देश का एक महत्वपूर्ण अंग है। यहाँ अभी भारत के आठ राज्य स्थित हैं- अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, असम, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय व सिक्किम। सिक्किम के उत्तर और उत्तर-पूर्व में तिब्बत स्थित है, जिस पर चीन अपना कब्ज़ा जताता रहा है। राज्य के पूर्व में भूटान है, जो भारत का मित्र राष्ट्र है लेकिन चीन उसे लुभाने की पूरी कोशिश करता रहा है। सिक्किम के पश्चिम में नेपाल है, जहाँ के सत्ताधारियों का झुकाव समय के हिसाब से कभी भारत तो कभी चीन की तरफ रहता है।

सिक्किम के इतिहास को देखें तो 1642 में फुंत्सोग नामग्याल यहाँ के पहले राजा थे। जब सिक्किम देश का 22वाँ राज्य बना, उससे पहले इस राजवंश ने 333 सालों तक वहाँ राज किया। ब्रिटिश और सिक्किम राजवंश के हित भी एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। नेपाल और भूटान जैसे पड़ोसी राज्यों के ख़िलाफ़ दबदबा बढ़ाने के लिए चोग्याल राजाओं ने अंग्रेजों का उपयोग किया। ब्रिटिश के लिए गोरखाओं के ख़िलाफ़ सिक्किम एक दोस्त के रूप में मिला। 1814-15 के अंग्रेज-गोरखा युद्ध में गोरखाओं द्वारा हारे गए कई इलाक़े सिक्किम को मिले। अंग्रेजों ने भी सिक्किम के रूट का उपयोग नॉर्थ-ईस्ट राज्यों तक व्यापार के लिए किया।

1817 में सिक्किम ने ब्रिटिश के साथ ‘ट्रीटी ऑफ तितलिया’ पर हस्ताक्षर किया, जिससे अंग्रेजों को सिक्किम में कई राजनीतिक और व्यापारिक फायदे मिले। इससे एक फायदा ये भी हुआ कि सिक्किम ब्रिटिश की सीधी कॉलनी नहीं बना। लेकिन, ब्रिटिश के जाते ही कहीं-कहीं जनता में सिक्किम राजवंश के ख़िलाफ़ आक्रोश के स्वर उठने शुरू हो गए थे। 70 का दशक आते-आते राजवंश के ख़िलाफ़ आंदोलन और उग्र हो गया। आज भी चीन सिक्किम के एक बड़े हिस्से पर अपना दावा ठोकता रहता है और रह-रह कर अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करता है।

बता दें कि 15 अगस्त 1947 को जब भारत आज़ाद हुआ, तब सिक्किम भारतीय गणराज्य का हिस्सा नहीं था। सिक्किम को भारत के आज़ाद होने के 28 सालों बाद भारतीय गणराज्य में शामिल किया गया था। इसे भारतीय गणराज्य में मिलाने की प्रक्रिया पर विचार-विमर्श 1962 में हुए युद्ध के बाद शुरू किया गया। भारत-चीन युद्ध के दौरान भारत को मिली हार का एक कारण उत्तर-पूर्व में भारतीय सेना के पहुँचने में हो रही कठिनाइयों को भी माना गया। सिक्किम के राजा चोग्याल का चीन की तरफ ज्यादा झुकाव था और अपने विस्तारवादी चरित्र के कारण जाना जाने वाला ड्रैगन अपनी सीमा से सटे भारत के हर एक राज्य को हथियाना चाहता था।

आज भी चीन की वही नीति है, जिसके कारण अक्सर डोकलाम जैसे विवाद खड़े हो जाते हैं। इसे पंडित नेहरू की अदूरदर्शिता कहें या फिर उनके निर्णय लेने की क्षमता को सवालों के घेड़े में खड़ा किया जाए, उन्होंने अपनी उत्तर-पूर्व नीति अस्पष्ट रखी। भारत में स्थित अमेरिकी राजनयिकों ने USA के स्टेट डिपार्टमेंट को भेजी गई एक जानकारी में कहा था कि अगर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सरदार पटेल की बात मान ली होती तो सिक्किम 25 साल पहले ही भारत का अंग बन चुका होता। अमेरिका का ये भी मानना था कि भारत ने सिक्किम के विलय (annexation) के लिए कुछ ख़ास नहीं किया बल्कि वो तो सिक्किम की जनता थी जिसने उचित निर्णय लिया और भारत ने सिर्फ ‘परिस्थिति’ का फायदा उठाया। ये सूचनाएँ भारत में स्थित अमेरिकी राजनयिकों द्वारा अपने देश में तब भेजी गई थी जब इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में भारत सरकार ने ये फ़ैसला ले लिया था कि सिक्किम में सेना भेजी जाएगी। ये पूरा घटनाक्रम भी काफ़ी रोचक है और इसमें कई ट्विस्ट्स और टर्न्स हैं।