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पूर्व कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री के आवास पर CBI की छापेमारी, ₹332 करोड़ के घोटाले का आरोप

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने शुक्रवार (22 नवंबर) की सुबह राज्य के इंफाल और थौबल में मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के आधिकारिक और निजी आवासों पर एक साथ छापे मारे।

CBI ने मणिपुर सरकार के अनुरोध पर पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह और मणिपुर डेवलपमेंट सोसाइटी (MDS) के तत्कालीन अध्यक्ष वाई निंग्थम सिंह, रिटायर्ड IAS अधिकारी एवं MDS के पूर्व परियोजना निदेशक डी एस पूनिया, रिटायर्ड IAS अधिकारी एवं MDS के तत्कालीन अध्यक्ष पीसी लॉमुकंगा, रिटायर्ड IAS अधिकारी एवं MDS के तत्कालीन अध्यक्ष ओ. नबाकिशोर सिंह, MDS के प्रशासनिक अधिकारी एवं तत्कालीन अध्यक्ष एस रंजीत सिंह और अन्य के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया है।

ख़बर के अनुसार, इन सभी पर यह आरोप लगाया गया कि 30 जून 2009 से 06 जुलाई 2017 तक मणिपुर डेवलपमेंट सोसाइटी के अध्यक्ष के रूप में काम करते हुए अभियुक्तों ने अन्य लोगों के साथ षड्यंत्र रचते हुए सरकारी धन क़रीब 518 करोड़ रुपए की कुल राशि में से लगभग 332 करोड़ रुपए का गबन किया है। यह रकम इन्हें विकास कार्य पूरे कराने के लिए दी गई थी।

बता दें कि बाबूपारा में कॉन्ग्रेस विधायक के आधिकारिक आवास और थौबल अथोकपम माचा लईकाई में CBI के ठिकानों पर छापेमारी सुबह करीब 7.30 बजे शुरू हुई थी। पिछले विधानसभा चुनावों से पहले, भाजपा, जो अब राज्य के सत्तारूढ़ गठबंधन का नेतृत्व करती है, उसने घोटाले की जाँच कराने का वादा किया था।

CBI की इस छापेमारी पर कॉन्ग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दर्ज की। पार्टी के मणिपुर के प्रवक्ता निंगोबम बूपेंडा मेइती ने बताया कि CBI ने मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री श्री ओकराम इबोबी सिंह के इंफाल और मणिपुर के थाउबल के आधिकारिक और निजी आवासों पर छापा मारा, क्योंकि इससे पहले हमने नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 और नागा समझौते पर दिल्ली के जंतर-मंतर में मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन किया था। इबोबी सिंह और कॉन्ग्रेस के विरोध को डराने के लिए यह छापेमारी स्पष्ट तौर पर एक राजनीतिक प्रतिशोध है।

उन्होंने कहा,

“हमारी लोकतांत्रिक आवाज़ को दबाने की कोई भी कार्रवाई सफल नहीं रहेगी क्योंकि हम मणिपुर के लोगों के साथ मणिपुर की रक्षा और सुरक्षा के लिए संघर्ष करते हैं।”

नवंबर 2006 में, मणिपुर के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के निवास स्थान पर पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ़ कंगलिपक (PREPAK) द्वारा हमला किया गया था।

2 सितंबर 2008 को मणिपुर राज्य में विद्रोहियों ने सोते समय इंफाल के बाबूपारा में श्री इबोबी के आधिकारिक निवास पर हमला किया। हमले में एक सुरक्षाकर्मी घायल हो गया था, लेकिन सिंह स्वस्थ थे। PREPAK के एक सदस्य ने फोन के माध्यम से हमले की ज़िम्मेदारी ली थी, और संकेत दिया कि यह हमला सिंह को मणिपुर में उग्रवाद को विफल करने के लिए नीतियों को रोकने की चेतावनी के रूप में था।

सितंबर 2006 में, विकीलीक्स द्वारा जारी गोपनीय केबल में, हेनरी वी जार्डिन, प्रधान अधिकारी, अमेरिकी वाणिज्य दूतावास जनरल, कोलकाता ने मुख्यमंत्री को “मिस्टर टेन पर्सेंट” के रूप में संदर्भित किया गया जो सरकारी परियोजनाओं और कॉन्ट्रैक्ट का पैसा लेता है।

गो तस्करी के आरोप में बबलू मिलन और प्रकाश दास की लिंचिंग, पश्चिम बंगाल पुलिस कर रही जाँच

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में गो तस्करी करने के शक में भीड़ ने दो युवकों की हत्या कर दी। मृतकों की पहचान बबलू मिलन और प्रकाश दास के रूप में हुई। घटना पुतिमारी फुलेसवरी गाँव में घटी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार दोनों स्थानीय निवासियों को गाँव के लोगों ने गाड़ी में पशु भरकर ले जाते देखा। जिसके बाद उन्होंने उन्हें रोका और उनसे सवाल-जवाब किए। मगर जब, दोनों युवक ग्रामीणों को अपनी बात पर विश्वास नहीं दिलवा पाए तो वहाँ मौजूद लोगों ने उन्हें मारना शुरू कर दिया और उनकी गाड़ी में आग भी लगा दी। दोनों युवकों को इस दौरान इतना मारा गया कि अस्पताल में उनकी मौत हो गई।

हालाँकि, घटना की सूचना मिलने के बाद कोतवाली पुलिस थाने की पुलिस मौक़े पर पहुँची। उन्होंने गंभीर हालत में बबलू और प्रकाश को अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन चोटें इतनी गहरी थीं कि उन्हें बचाया नहीं जा सका। अब पुलिस इस मामले में आगे की जाँच कर रही है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से देश में गो तस्करी की समस्या बहुत बढ़ी है और इन पर लगाम लगा पाना भी असंभव होता जा रहा है। अधिकतर भीड़ हत्या के केस इसी संबंध में आते हैं, लेकिन कुछ मीडिया गिरोह के लोग इसे मजहबी एंगल देकर पेश करने लगते हैं। पहलू खान की हत्या का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

राजस्थान के अलवर और भरतपुर के पास सीमावर्ती जिले सभी गो तस्करी के मामलों में एक तिहाई जिम्मेदार माने जाते हैं। जहाँ कुछ भ्रष्टाचारी अधिकारी और तस्करों की मदद से राज्य में लगातार इस अपराध को अंजाम दिया जाता हैं। इसी की तरह पश्चिम बंगाल में भी कई तादाद में पशुओं को बांग्लादेश की सीमा में भेजा जाता रहा है। लेकिन धीरे-धीरे अब सीमा पर तैनात बीएसएफ जवानों की सख्ती से इन आँकड़ों में कमी आई है। जिसका खुलासा खुद बांग्लादेशी मंत्री अशरफ अली ने एक बैठक में पिछले महीने किया। जहाँ उन्होंने बताया कि 4096 किमी के भारत-बांग्लादेशी बॉर्डर पर पशु तस्करी के आँकड़ों में 96% की कमी आई है।

केजरीवाल ने दी नई सौगात- पानी,सीवर कनेक्शन के लिए अब नहीं लगेंगे ₹1,14,000, देने होंगे सिर्फ ₹2310

दिल्ली में पानी की स्वच्छता को लेकर इन दिनों अरविंद केजरीवाल सवालों को घेरे में हैं। जिसके कारण उन्होंने केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के ट्वीट के बाद पानी पर राजनीति न करने की बात दोहराई हैं। साथ ही, कबूल किया है कि राजधानी में अभी भी 125 जगहों पर गंदे पानी की समस्या है। उन्होंने इसके अलावा दिल्ली वालों को पानी और सीवर कनेक्शन पर बड़ी राहत देने का ऐलान किया है।

दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए शुक्रवार को अरविंद केजरीवाल ने कहा, “आज दिल्ली जल बोर्ड ने बहुत महत्तवपूर्ण फैसले लिए हैं। जिससे पानी के सेक्टर में और सीवर के सेक्टर में बहुत बड़ी क्रांति आएगी।”

उन्होंने कहा कि जब उनकी सरकार बनी थी तब पानी और सीवर का कनेक्शन लेने के लिए 500 रुपए/मीटर के हिसाब से डेवलपमेंट चार्ज लिए जाते थे। लेकिन उन्होंने सत्ता संभालने के बाद इसे 100 रुपए किया। जिसके बाद भी सारा चार्ज बहुत ज्यादा बन रहा था। इसलिए उन्होंने तय किया है कि अब लोगों से डेवलपमेंट और इन्फ्रास्ट्रक्चर चार्ज नहीं लिए जाएँगे। इसके अलावा नए पानी और सीवर के कनेक्शन के लिए अब सिर्फ 2310 रुपए ही लगेंगे। पहले इसके लिए 1,14,000 रुपए तक खर्च करना पड़ता था। दिल्ली सीएम के अनुसार उनके इस कदम से लोग बड़े स्तर पर पानी और सीवर का कनेक्शन लेंगे, जिससे सब लोग नेटवर्क में आएँगे, नॉन रेवेन्यू वॉटर बहुत बड़े स्तर पर कम होगा और पूरा सिस्टम सुधरेगा।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जब उनकी सरकार बनी थी तब दिल्ली में पानी की 58% लाइन थी, लेकिन अब 93% है। इसके बाद उन्होंने पानी पर राजनीति न करने की बात करते हुए कहा कि किसी को दिल्ली के पानी से सरोकार नहीं है, केवल दिल्ली के पानी को लेकर राजनीति हो रही है। उनका उद्देश्य केवल दिल्ली के लोगों को साफ पानी पहुँचाने का है। उनके अनुसार उनके सरकार संभालने से पहले 2300 से अधिक इलाकों में पीने के लिए गंदा पानी आता था। अब वह संख्या कम होकर 125 हो गई है। उन्होंने कहा है कि अगर दिल्ली में कहीं पर भी गंदा पानी दिखता है तो उन्हें बताया जाए, वे वहाँ उस समस्या का समाधान करेंगे।

मुख्यमंत्री केजरीवाल ने आगे सवालों का जवाब देते हुए कहा कि उनकी सरकार के कार्यकाल में कई इलाकों की पाइपलाइन बदली गई हैं। उन्होंने कहा, ‘संत नगर में 2018 में पानी की पाइपलाइन बदली। 2019 में बुराड़ी में पाइपलाइन बदली, महावीर विहार में सीवर के साथ पानी आता था, वहाँ भी पाइपलाइन बदली। 2018 में करावल नगर में पाइपलाइन बदली। ऐसे कई कॉलोनिया हैं जहाँ हमने पाइपलाइन बदली और अब स्वच्छ पानी आता है। जहाँ भी पानी की पाइपलाइन खराब है आप हमें सूचना दें दिल्ली सरकार पाइपलाइन बदल देगी।”

इसके बाद पानी पर राजनीति न करने की बात कहने वाले सीएम केजरीवाल ने खुद ही बिना किसी पूर्ववर्ती सरकार का नाम लिए उनपर निशाना साधा और कई इलाकों के नाम बताए जहाँ इस मामले में कार्य प्रगति पर है। उन्होंने कहा कि इस पर राजनीति बंद कर देते हैं। इसका डेटा वे दे देंगे कि उन्होंने कितनी पाइपलाइन बदली है।

JNU के छात्रों पर है ₹3 करोड़ का बकाया, फ़ीस बढ़ाने को लेकर चलाया जा रहा है झूठा अभियान

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी शिक्षक संघ (JNUTA) ने गुरुवार (21 नवंबर) को मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा नियुक्त पैनल से मुलाक़ात की और विश्वविद्यालय के कुलपति को हटाने के अलावा बढ़ाए गए हॉस्टल शुल्क को वापस लेने माँग की। प्रदर्शनकारियों द्वारा अपने सहयोगियों पर कथित हमले के प्रति उनकी “उदासीनता” के कारण कुछ शिक्षकों ने इस समूह से ख़ुद को अलग कर लिया।

विश्वविद्यालय ने हॉस्टल शुल्क वृद्धि के पीछे तर्क देते हुए एक बयान जारी किया और कहा कि विश्वविद्यालय 45 करोड़ रुपए से अधिक घाटे में है, इसलिए शुल्क बढ़ाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। साथ ही इस मामले पर आंदोलन कर रहे छात्रों पर झूठ फैलाने का आरोप भी लगाया।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रशासन ने हॉस्टल में रह रहे छात्रों से लंबित मेस फ़ीस की एक सूची भी जारी की है, जो जुलाई से अक्टूबर तक 2.79 करोड़ रुपए से अधिक है। इसे JNUSU के उपाध्यक्ष साकेत मून ने “छात्रों को धमकी देने का प्रयास” करार दिया। 

विवाद को सुलझाने के लिए जारी बातचीत के बीच राष्ट्रीय स्वयं संघ (RSS) से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने समिति को भंग करने की माँग को लेकर गुरुवार को शास्त्री भवन तक मार्च करने की कोशिश की, जहाँ पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय है। ABVP से संबद्ध छात्रों को हालाँकि संसद मार्ग पर ही पुलिस ने रोक दिया और 160 लोगों को हिरासत में ले लिया। बाद में इन छात्रों को रिहा कर दिया गया।

वहीं, विश्वविद्यालय ने अपने बयान में कहा कि वो बिजली, पानी के बिल और निविदा कर्मियों के वेतन की वजह से घाटे में है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने छात्रावास में कार्यरत निविदा कर्मियों का वेतन बजट से देने की अनुमति नहीं देता। ऐसे कर्मियों की संख्या क़रीब 450 है। JNU ने कहा, “यूजीसी ने विश्वविद्यालय को साफ़ निर्देश दिया है कि ग़ैर वेतन खर्चे की व्यवस्था आंतरिक स्रोतों से की जाए। ऐसे में छात्रों से सुविधा शुल्क वसूलने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।”

बयान में इस बात का भी उल्लेख किया गया कि संशोधित छात्रावास शुल्क के मुताबिक़ सामान्य वर्ग के छात्रों को क़रीब 4,500 रुपए महीने का भुगतान करना होगा। इसमें से 2,300 रुपए खाने का है। शेष 2,200 रुपए का 50 फ़ीसदी भुगतान गरीबी रेखा से नीचे के छात्रों को करना होगा। इस प्रकार गरीबी रेखा से नीचे के छात्रों को प्रति माह करीब 3,400 रुपए देना होगा। इस प्रकार छात्रावास शुल्क में कथित बेतहाशा वृद्धि को लेकर झूठा प्रचार किया जा रहा है।

विश्वविद्यालय ने इस बात को स्पष्ट किया कि वास्तविकता है कि सेवा शुल्क लगाया गया है जो अब तक शून्य था। विश्वविद्यालय बजट बरक़रार रहे इसलिए छात्रावास में सेवा शुल्क लगाया गया है। फ़िलहाल, विश्वविद्यालय भारी घाटे में है। बयान में इस बात पर ग़ौर करने के लिए कहा गया कि छात्रावास में रहने वाले करीब 6,000 छात्रों में से 5,371 को फैलोशिप या छात्रवृत्ति के रूप में आर्थिक मदद मिलती है। विश्वविद्यालय ने उस रिपोर्ट को भी ख़ारिज कर दिया कि इस वृद्धि से JNU में देश के अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों के मुक़ाबले सबसे अधिक छात्रावास शुल्क है।

इस बीच, इंटर हॉल प्रशासन के सहायक रजिस्ट्रार ने बुधवार को छात्रावास में रहने वाले छात्रों पर मेस बकाए की सूची जारी की। इसके मुताबिक़ जुलाई से अक्टूबर के बीच 17 छात्रावासों में रह रहे छात्रों पर 2,79,33,874 रुपए का बकाया है। इस परिपत्र के बारे में पूछने पर डीन ऑफ स्टुडेंट्स उमेश कदम ने कहा कि छात्रावास मेस न हानि न लाभ के सिद्धांत पर चलते हैं। लेकिन जब तीन करोड़ रुपए बकाया हो तो इनका संचालन कैसे और कब तक होगा?

ग़ौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सामान्य कामकाज को बहाल करने और हॉस्टल शुल्क वृद्धि पर तीन सप्ताह से अधिक समय से विरोध कर रहे छात्रों और प्रशासन के बीच मध्यस्थता बनाने के लिए सोमवार (18 नवंबर) को तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय पैनल का गठन किया गया था।

दो घंटे से अधिक चली लंबी बैठक में, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (JNUTA) की कार्यकारी समिति ने पैनल को बताया कि जिस तरह से JNU को संचालित किया जा रहा है, उससे आने वाली समस्याओं का पता लगाना असंभव है, जबकि वर्तमान कुलपति अभी भी कार्यरत हैं।

यह पैनल, छात्रों के साथ दूसरी बैठक करने के लिए शुक्रवार को JNU परिसर का दौरा करेगा। HRD मंत्रालय में बुधवार को JNU छात्र संघ (JNUSU) के पदाधिकारियों, छात्र परामर्शदाताओं और छात्रावास अध्यक्षों के साथ पहली बैठक हुई थी।

हालाँकि, विश्वविद्यालय के शिक्षकों के एक वर्ग ने पैनल के गठन पर ख़ुशी नहीं जताई और कहा कि इससे मौजूदा स्थिति जटिल हो सकती है। JNUTA से अलग हुए शिक्षकों ने आरोप लगाया कि JNU शिक्षक संघ प्रदर्शनकारियों के साथ मिला हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलनकारी छात्रों ने फ़ीस वृद्धि के विरोध के दौरान 24 घंटे से अधिक समय तक प्रोफ़ेसर को बंधक बना रखा था।

इस बीच, छात्रों के आंदोलन को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू का समर्थन मिला है। JNU छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष एन साई बालाजी ने एक वीडियो शेयर किया, जिसमें JNU के पूर्व छात्र बारू ने कहा, “ऐसे समय में जब लगभग हर साल हम विदेशों में पढ़ रहे भारतीयों पर लगभग छह बिलियन डॉलर खर्च कर रहे हैं, सार्वजनिक विश्वविद्यालयों को बचाना बेहद ज़रूरी है।”

उन्होंने कहा,

“जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की रैंकिंग के अनुसार सर्वश्रेष्ठ सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में से एक है और यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि अच्छे छात्र सस्ती लागत पर अध्ययन कर सकें।”

बता दें कि हॉस्टल शुल्क में वृद्धि 11 नवंबर को की गई थी, जिसके विरोध में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हज़ारों छात्र पुलिस के साथ भिड़ गए। इससे मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में छह घंटे से अधिक समय तक फँसे रहे।

शिवसेना MLA अब्दुल सत्तार ने दी धमकी: कहा- विधायक फोड़ने वालों का सिर फोड़ देंगे

महाराष्ट्र में सरकार गठन पर पेंच अभी तक बरकरार है। मुख्यमंत्री पद को लेकर एनसीपी और शिवसेना में बात अटकी हुई है। एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने सरकार पर ‘अभी कुछ भी बताने लायक नहीं’ कह कर सस्पेंस और बढ़ा दिया है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने शिवसेना के साथ सरकार गठन के लिए आगे बढ़ने को लेकर सहमति प्रदान कर दी है। लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर अभी तक शिवसेना और एनसीपी में बात नहीं बन पाई है।

इस बीच शिवसेना के एकमात्र मुस्लिम विधायक अब्दुल सत्तार ने धमकी और चेतावनी देते हुए कहा, “कोई भी अगर शिवसेना के विधायक को फोड़ने की कोशिश करेगा तो हम उनका सिर फोड़ देंगे। इसके साथ-साथ उसका हाथ-पाँव भी तोड़ देंगे। लेकिन दवाखाने के लिए भी शिवसेना इंतजाम करेगी और उनके लिए एंबुलेंस भी तैयार रहेगी।” 

वहीं एक इंटरव्यू के दौरान जब उनसे पूछा गया कि ये चेतावनी है या फिर धमकी, तो उन्होंने कहा कि ये चेतावनी भी है और धमकी भी, क्योंकि शिवसेना के विधायकों को अगर कोई फोड़ना चाहता हो तो उसको चेतावनी देना शिवसेना का स्टाइल है। और शिवसेना सिर्फ चेतावनी नहीं देती है, वक्त आने पर शिवसेना ये सारी चीजे करने में कहीं पर कम नहीं पड़ती है।

इससे पहले आज कॉन्ग्रेस कार्यकारिणी की बैठक हुई, जिसमें शिवसेना के साथ महाराष्ट्र में गठबंधन के मुद्दे पर चर्चा की गई। बताया जा रहा है कि सीडब्ल्यूसी ने शिवसेना संग गठबंधन को हरी झंडी दे दी है। कार्यकारिणी की बैठक के बाद कॉन्ग्रेस महासचिव के सी वेणुगोपाल ने कहा कि उन्होंने सीडब्ल्यूसी को महाराष्ट्र की हालिया राजनीतिक स्थिति से अवगत कराया है। उन्होंने कहा कि एनसीपी से फिलहाल बात चल रही है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले शिवसेना के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने भी बीजेपी पर हमला बोला था। राउत ने ट्वीट करते हुए कहा था, “हम बुरे ही ठीक हैं, जब अच्छे थे तब कौन सा मेडल मिल गया था।”

इसके अलावा एक अन्य ट्वीट में संजय राउत ने लिखा, “कभी-कभी कुछ रिश्तों से बाहर आ जाना ही अच्छा होता है। अहंकार के लिए नहीं… स्वाभिमान के लिए।”

पाकिस्तानी महिला ने सरेआम छेड़ा एक मर्द को, किसी ने वीडियो बना करवाया गिरफ़्तार: Video Viral

सऊदी अधिकारियों ने मंगलवार (19 नवंबर) को जेद्दा के कॉर्निश में एक पुरुष को “मौखिक रूप से परेशान करने वाली” पाकिस्तानी मूल की महिला को गिरफ़्तार किया है।

दरअसल, महिला एक कार की पिछली सीट पर बैठी हुई थी और शायद इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट पी रही थी। तभी किसी ने कार की खिड़की से पुरुषों को हूटिंग करने का वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया। घटना का यह वीडियो ट्विटर पर तेज़ी से वायरल हो रहा है।

सऊदी अरब की Okaz न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक़, प्रतिवादी और उसके साथ जो लोग सऊदी भाषा में संवाद करते दिखाई दिए। वहीं, पुलिस का कहना है कि महिला पाकिस्तानी मूल की है और ब्यूटीशियन के रूप में काम करती है।

वायरल हुए वीडियो में, महिला को अरबी भाषा में बोलते हुए सुना और देखा जा सकता है। इसमें वो यह कहती हुई नज़र आती है, “अगर उसका अबाया सुंदर होता, तो मैं उसके साथ छेड़खानी करती।”

Okaz न्यूज़ एजेंसी से बात करने वाले सूत्रो ने कहा कि वीडियो वायरल होने की वजह से महिला और उसके साथी मदीना भाग गए। लेकिन, उन्हें वहाँ पर गिरफ़्तार कर जेद्दाह में क़ानूनी अधिकारियों को रेफ़र कर दिया गया। जानकारी के अनुसार, गिरफ़्तारी से पहले ट्विटर पर एक और वीडियो वायरल हो गया। इसमें महिला ने रोते हुए माफ़ी माँगी और कहा कि उसका इरादा किसी को आहत करने का नहीं था।

सऊदी में इस वीडियो पर लोगों ने तमाम नाराज़गी भरी प्रतिक्रिया दी। लोगों ने इस बात को लेकर संतोष जताया कि महिला के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई क्योंकि उसने सऊदी शासन के नियमों का उल्लंघन किया था।

शंकराचार्य की चिट्ठी के बाद फिरोज काण्ड पर हरकत में आया PMO: छात्रों ने किया VC का पुतला दहन

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में छात्रों ने वाईस चांसलर का पुतला दहन किया। जेएनयू के प्रोफेसर रहे राकेश भटनागर फ़िलहाल बीएचयू के वीसी हैं। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के ‘धर्म विज्ञान संकाय (SVDV)’ में फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति को लेकर छात्र नाराज़ हैं और लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी क्रम में कई छात्रों ने वीसी का पुतला-दहन किया। इन छात्रों में मृत्युंजय तिवारी आजाद, अभिषेक सिंह, अभिषेक त्रिपाठी, अवनींद्र राय, दिलीप मोरिया, आलोक सिंह, प्रवीण सिंह और अंशुमान द्विवेदी सहित सैकड़ों छात्र सम्मिलित हुए।

मामला अब सिर्फ़ फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति को ग़लत बताने का नहीं है बल्कि इसकी आँच अब अन्य विभागों में हुई नियुक्तियों में भी पहुँच गई है। वीसी का पुतला-दहन करने वाले छात्रों ने आरोप लगाया कि कई अन्य विभायों में भी इसी तरह अयोग्य नियुक्तियाँ की गई हैं, जिनकी जाँच होनी चाहिए। उनका आरोप था कि फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति की आड़ में वीसी अन्य अयोग्य नियुक्तियों को दबाने का प्रयास कर रहे हैं। पुतला-दहन यूनिवर्सिटी के सिंहद्वार पर किया गया।

अब इस मामले की गूँज प्रधानमंत्री तक पहुँच गई है क्योंकि प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस सम्बन्ध में रिपोर्ट तलब की है। पीएमओ ने इस पूरे बवाल को लेकर प्रशासन से रिपोर्ट माँगी। आनन-फानन में मंडलाधिकारी दीपक अग्रवाल ने विदेश दौरे पर होने के बावजूद पीएमओ को रिपोर्ट भेजी। अब प्रशासन एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है, जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा जाएगा। छात्रों ने आरोप लगाया है कि कई विभागों में अयोग्य नियुक्तियों के जरिए विश्वविद्यालय को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।

उधर गुरुवार (नवंबर 21, 2019) को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने छात्रों को अपना समर्थन दिया। VC राकेश भटनागर के आवास के बाहर जारी धरने के दौरान वहाँ पहुँच कर उन्होंने छात्रों को सम्बोधित भी किया। उन्होंने कहा कि मालवीय जी ने जिस विभाग की स्थापना हिन्दुओं के लिए की थी, उसमे ग़ैर-हिन्दुओं की नियुक्ति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि शब्दों को पढ़ लेना और उसे अनुभव करना, ये दो अलग-अलग चीजें हैं। शंकराचार्य ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर फ़िरोज़ ख़ान की नियुक्ति को धर्म के मान-बिंदुओं के विपरीत करार दिया।

शंकराचार्य ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख छात्रों का समर्थन किया

छात्रों ने कल प्रशासन को अपना माँग पत्र सौंपते हुए कई सवालों का विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब माँगा है। जिसे लेकर देर रात SVDV के संकाय प्रमुख, अन्य विभागाध्यक्षों और VC के बीच मीटिंग चली लेकिन किसी भी नतीजे पर नहीं पहुँचा गया। इस बीच खबर ये भी है SVDV के छात्रों पर दबाव बनाने के लिए विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे शशिकांत मिश्रा, शुभम और कृष्णा को प्रशासन ने धरनास्थल से हटाने का प्रयास किया। इसके बावजूद छात्रों का प्रदर्शन जारी है।

नाबालिग लड़की के साथ ज़ीशान ने रेप भी किया, केरोसिन डाल जलाया भी: बचाने के लिए लाया गया दिल्ली

उत्तर प्रदेश के संभल से दिल दहला देने वाली ख़बर आई है। एक नाबालिग लड़की के साथ उसके पड़ोसी ने ही बलात्कार किया। इसके बाद उसने पीड़िता को जला कर मार डालने की कोशिश की। गुरुवार (नवंबर 21, 2019) को रात में हुई इस घटना के बाद पीड़िता का शरीर बुरी तरह झुलस गया है। उसे दिल्ली स्थित सफदरगंज अस्पताल रेफर कर दिया गया है। नखासा पुलिस थानांतर्गत आने वाले क्षेत्र में ये घटना तब हुई, जब नाबालिग लड़की अपने घर में अकेले थी।

एएसपी आलोक जायसवाल ने बताया कि लड़की को घर में अकेला पाकर ज़ीशान उसके घर में घुस गया और उसके साथ बलात्कार किया। इसके बाद उसने केरोसिन तेल डाल कर लड़की को जला कर मार डालने की कोशिश की। इसके बाद लड़की को आनन-फानन में जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उसे दिल्ली रेफर कर दिया गया। पुलिस ने आरोपित ज़ीशान को गिरफ़्तार कर लिया है।

पीड़िता के परिवार वालों ने आरोपित के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया। इसके बाद पुलिस ने ज़ीशान को गिरफ़्तार कर लिया। पुलिस मामले की जाँच कर रही है। डॉक्टरों ने बताया कि पीड़िता के शरीर का 70% हिस्सा जल गया है। आरोपित के ख़िलाफ़ रासुका के तहत कार्रवाई की जाएगी।

छात्रों का अधिकार और दोमुँहापन: FTII और JNU के वाम मजहब के छात्र Vs BHU के विद्यार्थी

“अगर किसी व्यक्ति की तनख्वाह बात को ना समझने पर निर्भर हो तो उसे वही बात समझा पाना कठिन होगा!” ऐसा मैं नहीं कहता, ये किसी सिनक्लैर साहब ने कहा था। अब सोचिए कि जिस न्यूज़ एंकर (पत्रकार या संवाददाता नहीं) की पूरी टीआरपी अगर किसी समुदाय पर धौंस जमाने, किसी “ब्राह्मणवाद” को कोसने, और किसी ख़ास आयातित विचारधारा को प्रचारित करने पर टिकी हो, तो समझना छोड़िए, वो भला सुने भी क्यों? बता दें कि यहाँ पर सवाल संस्कृत की शिक्षा का है ही नहीं, बल्कि सवाल धर्म विज्ञान पढ़ाने का है, मगर इससे उसे क्या लेना देना? उसे तो बस अपना खुद का एक कथानक गढ़ना है, जिसमें वैसे भी प्रथम दृष्टया ही कई छेद नजर आ जाते हैं।

बात अगर सिर्फ छात्रों के विरोध पर किसी शिक्षण संस्थान से जुड़े व्यक्ति को हटाने या ना हटाने की हो, तो हाल में ही जेएनयू की दीवारों और दफ्तरों के दरवाजे इत्यादि पर लिखा “वीसी गो बैक” (कई असंसदीय शब्दों के साथ) याद आ जाता है। कुछ वर्षों से टीवी पर विवादों को देखा-सुना हो तो संभवतः हाल का ही एफटीआईआई विवाद भी याद आ जाएगा। जून 2015 में जब गजेन्द्र चौहान की वहाँ चेयरमैन के तौर पर नियुक्ति हुई, तो वाम मजहब के युवा मोर्चे एआईएसए के (तथाकथित) छात्रों ने लंबा विरोध किया। कई फ़िल्मी अभिनेता और नेता भी उस वक्त समर्थन और विरोध में उतरे थे। आखिर गजेन्द्र चौहान को बदला गया था। क्या ये पूछा जाए कि अगर गजेन्द्र चौहान के मामले में ये तय किया जा सकता है, तो आखिर बीएचयू में छात्रों को ये अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?

अगर मामला सिर्फ विचारधारा के आधार पर किसी के समर्थन और किसी के विरोध का है, और जेएनयू एवं एफटीआईआई जैसे संस्थानों के वाम मजहब के छात्र “शिक्षा का भगवाकरण” कहकर किसी नियुक्ति का विरोध कर सकते हैं, तो वही अधिकार आखिर बीएचयू के छात्रों को क्यों नहीं मिलना चाहिए? समस्या की जड़ में यही दोमुँहापन है। ये मान लिया जाता है कि एक ख़ास आयातित विचारधारा का विरोध तो अधिकार है, मगर कोई और विरोध करे तो उसे “गुंडागर्दी” कहकर सिरे से ख़ारिज किया जा सकता है। ये वो जहरीली विचारधारा है जिसने दशकों की मेहनत से विश्वविद्यालयों और पत्रकारिता के संस्थानों पर कब्जा जमाया है।

ये रणनीति कभी दशकों पहले पूर्णचंद जोशी (पीसी जोशी) ने बनाई थी। किसी दौर में वो कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया थे। बाद के दौर में स्थितियाँ बदली। जब दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो युद्ध का विरोध करने के कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। बाद में जब स्टालिन और हिटलर दोस्त नहीं रहे, यानी जर्मनी ने सोवियत रूस पर हमला कर दिया तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को आदेश आया कि ये युद्ध तो फासीवाद के खिलाफ है! फिर क्या था भारतीय कम्युनिस्ट भी “हम लड़ेंगे साथी” कहते हुए कूद पड़े! इस दौर में भी पीसी जोशी ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया थे और उस समय भी ये कॉन्ग्रेस के समर्थक और नेहरु के करीबी थे।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने 1942 के भारतीय स्वतंत्रता के प्रयासों से तो दूरी बनाई, मगर अब तक पीसी जोशी को समझ में आने लगा था कि आगे के लिए अपने पास समर्थक बनाए रखने और नए समर्थक जुटाने के लिए प्रचार तंत्र यानी अख़बारों, और नई फसल यानी विश्वविद्यालयों पर कब्जा ज़माना जरूरी है। कम्युनिस्ट पार्टी के 1938 में “नेशनल फ्रंट” शुरू करने पर वो इसके एडिटर भी थे और आजादी के बाद उन्हें पार्टी के साप्ताहिक “न्यू ऐज” का संपादक भी बनाया गया था। खुद पत्रिकाओं और अख़बारों से जुड़े होने के अलावा कम्युनिस्टों के नाजियों से शुरुआती रिश्तों की वजह से भी उन्हें प्रचार के तरीकों पर कब्जा जमाने के फायदों की अच्छी समझ थी।

बाद में जब मोस्को के आदेशों की वजह से भारतीय कम्युनिस्टों ने हथियार उठाकर भारत के खिलाफ बगावत का फैसला किया तो पीसी जोशी से मुखिया का पद छिन गया। पार्टी प्रमुख के पद से 1948 में हटाए जाने के बाद उन्हें जनवरी 1949 में पार्टी से भी निष्कासित कर दिया गया। कम्युनिस्टों के लिए ये उनके बड़े नारों में से एक “ये आजादी झूठी है” का दौर रहा। बाद में पीसी जोशी को वापस पार्टी में लिया तो गया मगर वो फिर नेतृत्व के पदों पर कभी नहीं आए। उन्हें “न्यू ऐज” के संपादक का काम दिया गया था। अपने दौर में ही पीसी जोशी प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसए) जैसे संगठन बना चुके थे।

उनका दौर बीतने पर भी कभी इनका काम रुका नहीं। ये एक स्थापित तथ्य है कि ग्राम्सकी की हेगेमोनी के सिद्धांतों का पीसी जोशी ने बखूबी इस्तेमाल किया था। उनके शुरू किए काम को आयातित विचारधारा को मानने वालों ने सात दशकों से जारी रखा है। इसका नतीजा ये है जो हम आज अपने सामने देखते हैं। सीधे तौर पर बौद्धिक कहे जा सकने वाले (लेखन आदि) या उससे जुड़े व्यवसायों में ये पैठ ऊँचे स्तर पर काफी ज्यादा है। ऊँचे पद ऐसे लोगों के हाथ में होने के कारण निचले पदों पर काम करने वाला अगर जानता भी हो कि उसे जो करने कहा जा रहा वो नैतिक रूप से गलत है, तब भी कई बार उसे चुप्पी साधनी पड़ती है।

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि संपादक के आदेश पर पत्रकार को लेख बदलना पड़ता है। ये हमें वापस अपने शुरुआती वाक्य “अगर किसी व्यक्ति की तनख्वाह बात को ना समझने पर निर्भर हो तो उसे वही बात समझा पाना कठिन होगा!” पर ले आता है। युद्ध में किसी सेना का एक जगह से किसी दूसरी जगह जाना देखें तो भी संवाद और संचार का महत्व समझ में आ जाएगा। सबसे पहले कम्युनिकेशन यानी संचार का विभाग जाकर काम करना शुरू करता है, बाकी की सेना, तोपों से लेकर रसद और दूसरे विभाग, धीरे-धीरे आते रहते हैं।

बाकी हमारे संचार के माध्यमों पर नाजियों के पोलैंड पर हमले वाले, पुराने (1930 के दशक वाले) दौर के दोस्तों यानी कॉमरेडों के अवैध कब्जे का नुकसान कैसे हुआ है, इस पर भी सोचिएगा। फ़िलहाल सोचने पर जीएसटी नहीं लगता!

कश्मीर में हिज्बुल-लश्कर के धमकी भरे पोस्टर्स से लोगों में डर का माहौल: नहीं खोल रहे दुकानें

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के निरस्त हो जाने और सामान्य जिंदगी बहाल होने के बाद आतंकी बौखला गए हैं। लोगों द्वारा अपने हुक्म का पालन न होने से बौखलाए आतंकियों ने एक बार फिर से धमकी भरे पोस्टर चिपकाकर लोगों को डराने की कोशिश की। आतंकियों ने बुधवार (नवंबर 20, 2019) देर रात श्रीनगर सहित कई जगहों पर धमकी भरे पोस्टर लगा दिए। इन पोस्टरों में आतंकियों ने बंद का फरमान न मानने वालों को कौम व इस्लाम का दुश्मन करार देते हुए उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी।

जिसके बाद घाटी में भय का माहौल है। गुरुवार (नवंबर 21, 2019) को पूरे दिन दुकानें बंद रहीं, यातायात भी ठप रहा। राज्य परिवहन की बसें भी सड़कों पर नहीं दिखाई दीं। बताया जा रहा है कि आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन और लश्कर-ए-तैयबा द्वारा जारी पोस्टर श्रीनगर के डाउन-टाउन, जकूरा और गांदरबल व अनंतनाग जिले में कई जगह दीवारों-खंभों पर चिपका दिए हैं। इससे इन इलाकों में बुधवार को दुकानें और व्यापारिक प्रतिष्ठान दिन भर बंद रहे और वाहनों की आवाजाही भी नाममात्र रही। इसके साथ ही बुधवार रात को असामाजिक तत्वों ने चार दुकानों, एक गाड़ी के अलावा कई ठेलों में आग भी लगा दी थी।

अधिकारियों ने बताया कि पिछले कुछ हफ्ते से दुकानदार सुबह के वक्त अपनी दुकानें खोल रहे थे, लेकिन चेतावनी के बाद उन्होंने सुबह दुकानें नहीं खोलीं। अधिकारियों का कहना है कि मध्य कश्मीर में श्रीनगर और गंदेरबल जिलों, दक्षिण कश्मीर में अनंतनाग, कुलगाम, पुलवामा और शोपियां जिलों और उत्तर में कुछ जिलों में बंद बुलाया गया है, जिसकी वजह से सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा।

पुलिस ने बताया है कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है और जल्द ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। श्रीनगर जिला मजिस्ट्रेट शाहिद इकबाल चौधरी ने असामाजिक तत्वों को गुरुवार को कड़ी चेतावनी जारी की और लोगों से अपील की कि वे इस तरह की कोई भी घटना होने पर फौरन पुलिस को सूचित करें। 

श्रीनगर स्थित पुलिस नियंत्रण कक्ष में मौजूद एक अधिकारी ने बताया कि बुधवार को डाउन-टाउन और गांदरबल के अलावा अनंतनाग में कुछ हद तक बंद का असर रहा। उन्होंने बताया कि शरारती तत्वों द्वारा गड़बड़ी किए जाने की आशंका को देखते हुए पूरी वादी में सुरक्षा का कड़ा बंदोबस्त किया था। देर शाम तक किसी भी जगह पर अप्रिय घटना की सूचना नहीं है।