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इंडिया में इंग्लिश पढ़ाने वाली कायला के कारण मारा गया बगदादी: लगातार रेप के बाद कर दी थी हत्या

सीरिया के इदलिब में खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस का सरगना अबु बकर-अल बगदादी को अमेरिकी सैनिकों ने एक ऑपरेशन के तहत वीभत्स मौत दी। रिपोर्ट्स के अनुसार, 15 मिनट तक चले इस ऑपरेशन को अमेरिका ने बहुत ही गोपनीय तरीके से रात के अंधेरे में अंजाम दिया। गौरतलब है कि अमेरिकी सेना ने इस ऑपरेशन का नाम देश की एक महिला मानवाधिकार कार्यकर्ता ‘कायला म्यूलर’ के नाम पर रखा। बता दें कि कायला का बगदादी ने रेप किया था। सीरिया में बगदादी के लड़ाकों ने कायला मूलर को पकड़ लिया था और बगदादी के हवश का शिकार होने के बाद 2015 में उसकी हत्या कर दी थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी मानवाधिकार कार्यकर्ता कायला मुलर जो अपनी ग्रैजुएशन पूरी करने 2012 में तुर्की गई थीं और फिर वहाँ से सीरिया चली गई थीं। मुलर गृह युद्ध का शिकार हुए लोगों को सहायता देने के लिए सीरिया गई थीं। वह डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की सहायता से चलने वाले एक चैरिटी अस्पताल से निकलकर जा रही थीं, तभी अगस्त, 2013 में उन्हें ISIS के लड़ाकों ने अलेप्पो से उन्हें अगवा कर लिया। बाद में कायला को लेकर इस्लामिक स्टेट ने 30 दिन के समय के साथ अमेरिका पर कई शर्तें थोपी थीं, जिसमें 6 मिलियन अमेरिकी डॉलर की डिमांड भी थी।

गौरतलब है कि कायला मुलर का भारत से जुड़ाव भी रहा है, वह यहाँ तिब्बती शरणार्थियों को अंग्रेजी पढ़ा चुकी थीं। यह सीरिया जाने से पहले की बात है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, IS की कैद में रहने के दौरान मुलर ने अपने परिजनों ने एक पत्र भी लिखा था, जिसमें उन्होंने लिखा था, “मैं नहीं चाहती कि मुझे छुड़ाने के लिए आप लोग कोई समझौता करें।” म्यूलर ने लिखा था, “मैं जानती हूँ कि आप चाहेंगे की मैं स्ट्रॉन्ग बनू। मैं एकदम वही कर रही हूँ।”

हालाँकि, IS ने दावा किया था कि जॉर्डन के हवाई हमले में कायला की मौत हो गई। लेकिन, जॉर्डन ने इससे इनकार कर दिया था। जॉर्डन के प्रवक्ता ने कहा कि इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने कायला की हत्या की। कायला मुलर के परिजनों ने भी 2015 में एक बयान जारी कर कहा था, “हमें बेहद दुख के साथ यह बताना पड़ रहा है कि कायला मुलर अब इस दुनिया में नहीं रहीं।”

इस वीडियो में कायला मुलर का आखिरी सन्देश है, आप देख सकते हैं:

अब जब अमेरिका ने कायला मुलर के नाम से चलाए गए ऑपरेशन में बगदादी को कुत्ते की मौत मारकर, उसके मौत की पुष्टि कर दी है तो यह कहा जा रहा है कि अमेरिका ने लाखों बेगुनाहों के साथ कायला के मौत का भी हिसाब चुकता कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा जा रहा है कि इस पूरे ऑपरेशन की तस्वीरें और वीडियो भी जल्दी ही देखने को मिल सकते हैं।

बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्र्ंप ने सोमवार को कहा कि शनिवार तक बगदादी को ढेर करने के ऑपरेशन की वीडियो और तस्वीरें साझा की जा सकती हैं। इसमें एयर फुटेज, जवानों की लैंडिंग और बगदादी की गुफा में घुसने का वीडियो और तस्वीरें हो सकती हैं।

‘हम दो, हमारे दो’ कहने से मजहब विशेष और लिबरलों को अपने ऊपर हमला होता क्यों दिखता है?

सुहागरात की रात। फूल-मालाओं से सजा बिस्तर। चन्दन-टीका लगाया एक शख्स अपनी नई-नवेली दुल्हन के साथ आता है। दुल्हन भी सोलह श्रृंगार किए और सिंदूर से मॉंग भरे हुए। कुछ पल में दूल्हा तकिया सरकाता है तो कंडोम का एक पैकेट नजर आता है।

चलिए अब पर्दा हटाते हैं। यह वीडियो अप्रैल 2006 में आया था। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने परिवार नियोजन यानी फैमिली प्लानिंग के प्रति जागरुकता बढ़ाने के मकसद से इसे तैयार किया था। आपने कभी किसी हिंदू की भावना इस वीडियो से आहत होते सुनी? किसी साधु-संत को इसे धर्म पर हमला बताते हुए सुना? या फिर किसी नेता को गरजते देखा-सुना कि यह वीडियो हिंदुओं के खिलाफ साजिश है?

असल में, किसी ने इस बात पर गौर भी नहीं किया होगा कि इस प्रचार में हिंदू वेशभूषा में ही नवविवाहित जोड़े को क्यों दिखाया गया होगा। यह गौर करने की चीज भी नहीं है। असल चीज है इसके पीछे छिपा संदेश और वह है जनसंख्या नियंत्रण। यह समझना कि छोटा परिवार सुख का आधार होता है।

ऐसे एड वीडियो में हिन्दू परिवार आज से नहीं बल्कि वर्षों से दिखाए जाते रहे हैं

अब सिक्के के दूसरे पहलू को देखते हैं। असम सरकार ने निर्णय लिया है कि दो से अधिक बच्चों वाले व्यक्ति को सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी। इसका विरोध होना शुरू हुआ। एक तो समुदाय विशेष के ठेकेदारों को लगा कि इससे उनके मजहब पर निशाना साधा जा रहा है। दूसरा बड़ा कारण यह कि असम में भाजपा की सरकार है। ‘ऑल इंडिया इस्लामिक डेमोक्रेटिक फ्रंट’ के सुप्रीमो और सांसद बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि केवल दो बच्चे पैदा करना इस्लाम के ख़िलाफ़ है। उन्होंने पूछा कि भला इस दुनिया में आने वाले को कौन रोक सकता है?

इस विवादित बयान के जवाब में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने पूछा कि क्या बदरुद्दीन जैसे लोग इस्लाम को बच्चे पैदा करने की फैक्ट्री समझते हैं? उन्होंने ईरान और इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक मुल्क़ों का उदाहरण दिया,जहाँ जनसंख्या नियंत्रण के लिए कारगर उपाय किए गए हैं। अगर असम की ही बात करें तो वहाँ 60% से भी अधिक जनसंख्या हिन्दू है। नया नियम पूरे राज्य की जनता पर लागू होता है। फिर बदरुद्दीन जैसों को ही दिक्कत क्यों हो रही है? अगर एचआईवी एड्स के ख़िलाफ़ अभियान में बनाए गए वीडियो में किसी हिन्दू को दिखाया जाता है तो इसका अर्थ ये थोड़े है कि एचआईवी एड्स केवल हिन्दुओं को होता है, मुस्लिमों को नहीं?

‘छोटा परिवार-सुखी परिवार’, ‘हम दो-हमारे दो’ को लेकर न जाने कितने ही एड बने होंगे। कुछ सरकारी तो कुछ गैर सरकारी संगठनों की ओर से। पाठ्यक्रम में बच्चों को चित्र के माध्यम से छोटे परिवार की महत्ता समझाई जाती रही है। अमूमन ऐसे तमाम वीडियो, चित्रों में दर्शाए गए लोगों की वेशभूषा हिंदुओं जैसी होती है। लेकिन, कभी कोई बवाल नहीं हुआ। ऐसा भी नहीं है कि परिवार नियोजन की बात बीजेपी या मोदी के सरकार के आने से शुरू हुई है। आजादी के बाद ही जनसंख्या विस्फोट से होने वाली समस्या को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। 1952 में पहला परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू भी हो गया था। साल दर साल इसमें बदलाव भी होते रहे। लेकिन, जब भी जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कानून बनाने की बात होती है या परिवार नियोजन को लेकर कोई बात कही जाए और उसमें भूल से भी समुदाय विशेष के लोगों की तस्वीर हो, तो उसे धर्म विशेष के खिलाफ साजिश मान ली जाती है।

आज तक किसी ने ये तो नहीं पूछा कि ‘दो बूँद ज़िंदगी की’ वाले एड में साड़ी पहने हिन्दू महिलाओं को ही क्यों दिखाया जाता है, बुर्का पहनी महिलाओं को क्यों नहीं? किसी ने ये भी नहीं पूछा कि क्या सिर्फ़ हिन्दू बच्चों को ही पोलियो होता है, या फिर हिन्दू ही पोलियो मिटाने प्रति जागरूक नहीं हैं? ऐसा इसीलिए, क्योंकि ऐसे एड किसी बीमारी अथवा सामाजिक बुराई के प्रति लोगों को जागरूक बनाते हैं और उसके ख़िलाफ़ अभियान में सहायक सिद्ध होते हैं। ख़ास बात यह कि ये बीमारियाँ मजहब देख कर नहीं आतीं।

इसका सीधा अर्थ है कि कुछ लोग सभी चीजों को अपने फायदे के लिए मजहबी चश्मे से देखते हैं और लोगों को उकसाते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि देश के हित में क्या है। यही कारण है कि असम सरकार के एक फैसले को समुदाय विशेष के विरोध के तौर पर पेश करने की कोशिश हो रही है।

यही कारण है कि असम सरकार के ​फैसले का विरोध करने वाले लोगों की मंश को लेकर भाजपा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि बदरुद्दीन जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, क्या मुस्लिम महिलाएँ भी उससे इत्तेफ़ाक़ रखती हैं? स्वामी ने पूछा कि क्या मुस्लिम महिलाएँ, जिनमें बदरुद्दीन की पत्नी भी शामिल है, 7-8 बच्चे 9 महीने कोख में रख कर पैदा करने की इच्छुक हैं? या फिर उनका मत मायने नहीं रखता? उन्हें भी तो इसके लिए काफ़ी दर्द और परेशानी से गुजरना पड़ता है। 13 विधायकों वाली पार्टी के अध्यक्ष बदरुद्दीन का साफ़ मानना है कि सरकार कुछ भी नियम-क़ानून बनाए, इससे मुस्लिमों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला।

वैसे, फैमिली प्लानिंग लिबरलों के लिए कल तक एक प्रोग्रेसिव सोच थी। लेकिन, इस बार स्वतंत्रता दिवस पर मोदी ने लाल किले से देश को संबोधित करते हुए जनसंख्या नियंत्रण की बात क्या कर दी, अब यह लिबरलों के लिए अछूत टॉपिक हो गया। पीएम मोदी ने जनसंख्या विस्फोट को लेकर लोगों को चेताया था। उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण को देशभक्ति से जोड़ते हए कहा था कि इस संकट को समझते हुए जो लोग अपने परिवार को सीमित रखते हैं, वो अभिनन्दन के पात्र हैं। उनका सीधा कहना था कि घर में आने वाले बच्चे को लेकर लोगों को पहले यह सोचना चाहिए कि क्या वो इसके लिए तैयार हैं?

बस तभी से ये प्रोग्रेसिव सोच अचानक से ‘मुस्लिमों पर हमला’ हो गया और पीएम द्वारा इसकी चर्चा करते ही इसका महत्व जाता रहा। ये हमारे देश के इलीट गिरोह की सोच है। खैर, हिन्दू आज तक आहत नहीं हुए तभी पोलियों से लेकर कई बीमारियाँ या तो लगभग ख़त्म हो चुकी हैं या फिर ख़त्म होने की ओर हैं। जो लोग इन चीजों से आहत होकर इसे अपने मजहब पर हमला बता रहे हैं, उनके समाज और समुदाय में ‘तीन तलाक़’ जैसी कई मजहबी कुरीतियाँ पल रही थीं, जिसे हटाने के लिए भी सरकार को ही आगे आना पड़ा। अगर हर सरकारी योजना, पहल और फ़ैसले को मजहब के आधार पर तौला जाएगा और फिर शरिया क़ानून के मुताबिक़ परखा जाएगा तो फिर हो गया विकास!

बंगाल: बम बनाते वक्त टीएमसी के तीन कार्यकर्ताओं के परखच्चे उड़े

राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस के तीन कार्यकर्ता बम बनाते वक्त मारे गए। धमाका सोमवार को मुर्शिदाबाद जिले के तलताली इलाके स्थित एक जर्जर मकान में हुआ। मारे गए लोगों की पहचान मिंटू मंडल, ननटू मोला और छवि शेख के तौर पर की गई है।

तलताली में नदी तट पर कब्जे को लेकर टीएमसी के दो गुटों के बीच हिंसक झड़पें होती रहती है। इसी महीने की 12 तारीख को दोनों गुटों के बीच बमबाजी हुई थी। सोमवार के धमाके में मारे गए तीनों लोग उस घटना में भी शामिल थे।

स्थानीय लोगों के मुताबिक तीनों एक जर्जर घर में बम बना रहे थे। लेकिन, गलती से विस्फोट हो गया। धमाका इतना जबर्दस्त था कि तीनों के शरीर के परखच्चे उड़ गए और कई अन्य जख्मी हो गए। भारी संख्या में जलांगी थाने से पहुॅंची पुलिस ने पीड़ितों के शव इकट्ठे किए। पुलिस ने बताया है कि प्राथमिक जॉंच से पता चला है कि बम बनाते वक्त विस्फोट हुआ।

जालांगी ब्लॉक के टीएमसी नेता रकीबुल ने मृतकों के पार्टी से जुड़े होने से इनकार किया है। लेकिन, जालांगी के टीएमसी विधायक अब्दुर रज्जाक मंडल ने तीनों को पार्टी कार्यकर्ता बताया है। हालॉंकि घटना क्यों हुई इसके बारे में किसी तरह​ की जानकारी से उन्होंने इनकार किया है। उन्होंने बताया कि पार्टी ने घटना की जॉंच शुरू कर दी है।

सूत्रों के अनुसार नदी तट पर कब्जे को लेकर हिंसा नई नहीं है। पहले कॉन्ग्रेस और वाम दलों के बीच इसको लेकर संघर्ष होता रहता था। अब टीएमसी के कार्यकर्ता उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। पुलिस ने इस मसले पर टीएमसी के दो गुटों के बीच संघर्ष होते रहने और इसके लिए ही बम बनाए जाने की पुष्टि की है। स्थानीय लोगों की माने तो बम प्रतिद्वंद्वी गुट पर हमले की लिए ही बनाया जा रहा था और लोगों से शाम के समय नदी की ओर नहीं जाने को कहा गया था।

ननटू मोला की पत्नी ने प्रतिद्वंद्वी गुट पर अपने पति और अन्य लोगों को बम से उड़ाने का आरोप लगाया है। उसके मुताबिक गुटीय हिंसा के कारण ननटू छिप कर पिछले कुछ दिनों से नदी किनारे जर्जर इमारत में रह रहा था। प्रतिद्वंद्वी गुट के लोगों को यह बात पता चल गई और उन्होंने उस घर को बम से उड़ा दिया। पुलिस मामले की जॉंच कर रही है। बम निरोधक दस्ता भी मंगलवार को मौके पर पहुॅंचा। भारी मात्रा में जिंदा बम बरामद किए गए हैं।

पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथियों ने दीवाली पर उगला ज़हर: मोदी के पुतले पर निकाली भड़ास

27 अक्टूबर को कई पाकिस्तानी मुस्लिम भारत और भारत सरकार के खिलाफ अनुच्छेद 370 को हटाने को लेकर विरोध करने जुटे मगर विरोध के लिए जुटी इस भीड़ के प्रदर्शन का रुख ही बदल गया। उन्होंने जैसे इस प्रदर्शन को हिन्दुओं के प्रति अपनी नफरत की कट्टरता और नीयत दर्शाने का मौका बना दिया। पाकिस्तानी मुसलामानों की उस भीड़ ने जैसे भारत के प्रधानमंत्री मोदी के पुतले को अपनी नफरत का इज़हार करने का एक जरिया ही बना लिया था। पाकिस्तानी मुस्लिमों की इस भीड़ ने भारतीय प्रधानमंत्री की तस्वीर वाले पुतले को घसीटकर कुचलना शुरू कर दिया। यह पाक समर्थित मुस्लिम यहीं नहीं रुके बल्कि इस हरकत के दौरान उन्होंने एक-दूसरे को उकसाना शुरू कर दिया जिससे वहाँ मौजूद सारे मुस्लिम अपनी कुंठा इसके ज़रिए प्रकट करने लगे।

बता दें कि इस विरोध प्रदर्शन के बहाने भारत और हिन्दुओं के प्रति नफरत फैलाने की इस हरकत के पीछे लंदन के कई पाकिस्तानी समर्थन वाले ग्रुप और जेकेेएलएफ यानि जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की युनाइटेड किंगडम वाली ब्रांच का हाथ है। यह खूंखार संगठन इतने आक्रामक और असहिष्णु हैं कि पिछले कुछ महीनों के अंदर हुए इन संगठनों द्वारा प्रायोजित विरोध प्रदर्शनों में पाकिस्तानी कट्टरपंथियों ने कई बार लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग की इमारत को निशाना बनाया है।

हालाँकि, दिवाली को लेकर हुए इस विरोध प्रदर्शन को लेकर लंदन के मेयर सहित ब्रिटेन के कई अन्य राजनेताओं ने आपत्ति जताई है, प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भी इस प्रदर्शन की निंदा की है। भारतीय मूल के ब्रितानी सांसद नवीन शाह और अन्य भारतीय उच्चाधिकारियों से इस घटना के सन्दर्भ में इलाके की पुलिस और ब्रितानी गृहसचिव प्रीती पटेल को भी इसकी सूचना दी है। बता दें कि ब्रिटेन में रहने वाले हिन्दू समुदाय के लोगों ने दिवाली  के मौके पर त्यौहार के उमंग को भंग करने के उद्देश्य से पाकिस्तानी मुस्लिमों की ऐसी हरकत की कड़ी निंदा की है। इस घटना को हिन्दूफोबिया तथा नस्लभेदी बताया, हिन्दुओ के पवित्र त्यौहार दीपावली पर इस तरीके से नफरत फैलाने की हरकत को ब्रिटेन के नागरिकों के समुदाय ने भी गलत ठहराया ।

विरोध प्रदर्शन के लिए निकाला जाने वाला यह मार्च दरअसल भारतीय उच्चायोग के सामने से होकर गुजरने वाला था मगर पुरानी घटनाओं के चलते स्थानीय पुलिस ने एहतियातन इसे पब्लिक ऑर्डर एक्ट 1986 की धारा 12 के तहत रोक दिया। अपने इस विरोध प्रदर्शन में पाकिस्तानियों ने एक वैन इस्तेमाल की जिसपर तमाम भारत-विरोधी नारे लिखे थे, इसी के प्रति-उत्तर में भारतीयों ने एक वैन लेकर शहर भर में प्रचार किया जिसमें दिवाली की शुभकामनाएँ लिखी थीं। ऐसे ही प्रदर्शनों के लिए लन्दन और यूएस में पाकिस्तानी संगठनों ने प्रदर्शन में जाने के लिए बसों का इंतज़ाम किया था।

ब्रितानी मीडिया का एक चर्चित चेहरा केटी हॉपकिंस को तब शर्मसार होना पड़ा जब उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे कई पाकिस्तानी का विरोध किया था। केटी ने प्रदर्शन करने वालों की हरकतों के लिए उनकी हरकत को सीधे शब्दों में इसे हिन्दूफोबिया कहा था।

केरल नन रेप मामला: सिस्टर लूसी ने चर्चों की महासभा को लिखा पत्र, पोप फ्रांसिस से लगाई गुहार

केरल में सिस्टर लूसी कलपूरा को रोमन कैथोलिक चर्च के अंतर्गत आने वाले ‘द फ्रांसिस्कन क्लारिस्ट धर्मसभा’ (एफसीसी) से निष्कासित कर दिया गया है। जिसे लेकर उन्होंने चर्चों की महासभा को एक पत्र लिखा है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पत्र में सिस्टर लूसी ने लिखा है कि उन्हें पोप फ्रांसिस के सामने अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए।

बता दें कि इससे पहले वेटिकन ने उनकी उस अपील को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने फ्रांसिस्कन क्लारिस्ट धर्मसभा से निष्कासित किए जाने के खिलाफ अपील की थी। लूसी उन ननों में शामिल हैं जिन्होंने दुष्कर्म के आरोपित पूर्व बिशप फ्रांको मुलक्कल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।

गौरतलब है कि केरल नन रेप मामले में बिशप फ्रैंको मुलक्कल को बचाने की कोशिश करने के आरोप राज्य की वामपं​थी सरकार और प्रशासन पर पहले भी लगते रहे हैं। मीडिया की खबरों के मुताबिक आरोपित बिशप को नोटिस जारी करने के बाद केरल पुलिस के एक अधिकारी का तत्काल तबादला कर दिया गया था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सिसटर लूसी के खिलाफ कार्रवाई कविता प्रकाशित करने, कार खरीदने और दुष्कर्म के आरोपित पूर्व बिशप के खिलाफ प्रदर्शन में भाग लेने की वजह से की गई है। बता दें कि अलुवा आधारित धर्मसभा की प्रमुख एन जोसफ की ओर से पाँच अगस्त को नन लूसी कलाप्पुरा को पत्र जारी कर जवाब माँगा गया था। पत्र में उठाए गए सवालों ‘द फ्रांसिस्कन क्लारिस्ट धर्मसभा’ के नियमों का उल्लंघन करने वाली जीवनशैली अपनाने के मामले में संतोषजनक जवाब देने में असफल रही थीं। लिहाजा उन्हें धर्मसभा से बर्खास्त करने का फरमान सुनाया गया है।

पत्र में लिखा गया था कि उन्हें उचित समय पर चेतावनी दी गई थी, लेकिन उन्होंने कोई अफ़सोस व्यक्त नहीं किया। लिहाजा 11 मई को धर्मसभा की आम परिषद की बैठक में कलाप्पुरा को ‘सर्वसम्मति’ से बर्खास्त करने का फैसला किया गया। कलपूरा को जनवरी में जारी नोटिस में एफसीसी ने ड्राइविंग लाइसेंस लेने, कार खरीदने, ऋण लेने, किताब प्रकाशित करने और वरिष्ठों की जानकारी के बिना धन व्यय करने के नियमों का उल्लंघन करार दिया था।

बता दें कि इससे पहले आरोपित बिशप पर एक नन ने मानसिक तौर पर उत्पीड़ित करने का आरोप लगाया था। जिस मामले में अदालत ने मुलक्कल को 11 नवंबर को तलब किया है। मानसिक उत्पीड़न को लेकर नन ने मंगलवार (23 अक्टूबर 2019) को केरल महिला आयोग के पास एक शिकायत दर्ज कराई थी। इसके मुताबिक नन को मुलक्कल और उसके लोग सोशल मीडिया के जरिए बदनाम कर रहे हैं।

’45 शिवसेना विधायकों का समर्थन है’ – BJP सांसद का दावा, फडणवीस ने कहा- ’50-50 पर बात नहीं हुई’

महाराष्ट्र में शिवसेना लगातार भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है। इसी कोशिश में पार्टी ने 5 विधायकों के समर्थन का दावा किया है। शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने कहा था कि लोकसभा चुनाव के दौरान ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से 50-50 फॉर्मूले पर बात हुई थी। शिवसेना का कहना है कि ये फॉर्मूला भाजपा की तरफ़ से ही आया था। अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा है कि भाजपा-शिवसेना में किसी 50-50 फॉर्मूले को लेकर बात नहीं हुई थी। उन्होंने कहा कि शिवसेना को ढाई वर्ष के लिए मुख्यमंत्री का पद देने जैसी कोई बातचीत नहीं हुई थी।

देवेंद्र फडणवीस ने साफ़ कर दिया कि वो अगले 5 साल के लिए मुख्यमंत्री के पद पर बने रहेंगे। फडणवीस ने अपने निवास ‘वर्षा’ पर पत्रकारों को बताया कि उद्धव और शाह के बीच 50-50 फॉर्मूले की बात ही नहीं हुई थी। बुधवार को भाजपा विधायक दल की बैठक बुलाई गई है, जिसमें नेता चुनने की औपचारिक प्रक्रिया होगी। फडणवीस ने कहा कि चूँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ख़ुद सार्वजनिक रूप से उनके नाम का ऐलान कर चुके हैं, ऐसे में ये बैठक बस औपचारिकता पूरी करने के लिए होगी।

बता दें कि जीत के बाद पीएम मोदी ने कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए फडणवीस का नाम लिया था। फडणवीस ने कहा कि शिवसेना को काबिलियत के हिसाब से ही सीटें दी जाएँगी। फडणवीस ने कहा कि अब तक 10 निर्दलीय विधायक भाजपा को समर्थन दे चुके हैं और 5 अन्य का समर्थन मिलने की उम्मीद है। इस तरह भाजपा के पास राज्य में 15 निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल हो जाएगा।

उधर भाजपा सांसद संजय काकडे ने कहा कि 45 शिवसेना विधायक भाजपा के सम्पर्क में हैं और भाजपा के नेतृत्व में सरकार गठन को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। राज्यसभा सांसद ने कहा कि 56 में से 45 शिवसेना विधायक भाजपा के संपर्क में हैं। बता दें कि हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा को 105 सीटें आई हैं और शिवसेना ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री का पद चाहती है। लेकिन सांसद काकडे ने कहा कि 45 शिवसेना विधायक भाजपा नेताओं को कॉल कर के सरकार में शामिल होने के इच्छुक हैं।

रियल स्टेट कारोबारी और भाजपा नेता संजय काकडे ने कहा कि शिवसेना के विधायक भाजपा नेताओं को फोन कर के कह रहे हैं कि कुछ भी कीजिए लेकिन हमें सरकार में शामिल होना है। हालिया चुनाव में भाजपा की सीटें पिछली बार से कम हुई हैं, जिसने शिवसेना को और ज्यादा मुखर होने का मौक़ा दे दिया है। पार्टी भाजपा पर हमलावर है और मोलभाव का कोई मौक़ा हाथ से जाने नहीं देना चाहती। हालाँकि, जहाँ पिछली बार भाजपा ने 250 से भी अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा था, इस बार पार्टी ने उससे 100 कम सीटों पर चुनाव लड़ा। 14 सीटें भाजपा-शिवसेना से इतर अन्य गठबंधन पार्टियों को दी गई थीं।

17 मुस्लिमों को बचाया, फिर भी अब्दुल और शबाना ने फँसाया: 15 साल जेल में रहे शशिकांत, परिवार तबाह

साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में सवार कारसेवकों को जलाए जाने की वीभत्स घटना के लगभग 18 वर्ष हो चुके हैं। यही वो वारदात थी, जिसके बाद गुजरात में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए थे। इस मामले में कई ऐसे लोगों को भी फँसा दिया गया, जो बिलकुल निर्दोष थे। व्यक्तिगत दुश्मनी का बदला दंगों की आड़ में लेने की कोशिश की गई। ऐसा ही एक मामला शशिकांत का है। अब शशिकांत की पत्नी मंगलाबेन ने गुजरात सरकार से मुआवजे की माँग की है। उन्होंने कहा है कि दुर्भावना के कारण फँसाए गए उनके पति पर चले अभियोजन के बदले उन्हें मुआवजा दिया जाए।

ग़लत पहचान के कारण शशिकांत को बिना किसी अपराध के 15 वर्ष जेल में गुजारने पड़े थे। शशिकांत ने दंगे के दौरान 17 मुस्लिमों को बचाया था। लेकिन, अब्दुल सत्तार नामक ऑटो रिक्शा ड्राइवर ने निजी खुन्नस की वजह से उन्हें झूठे आरोपों में फँसा दिया। उस समय शशिकांत के ख़िलाफ़ शबाना बानो नाम की एक महिला ने भी बयान दिया था। शबाना ने बाद में स्वीकार किया कि उसने 10,000 रुपए लेकर झूठा बयान दिया था। सत्तार की कुछ साल पहले हार्ट अटैक से मौत हो गई, जबकि शबाना गुजरात छोड़ कर जा चुकी है।

एक पुलिस कॉन्स्टेबल के बेटे शशिकांत को दंगों के ठीक बाद गिरफ़्तार किया गया था। उनकी पहचान के लिए उन्हें 3 बार ‘आइडेंटिफिकेशन परेड’ में शामिल किया गया। अब्दुल सत्तार ने तीसरी बार में शशिकांत के दंगों में शामिल होने की बात कही। लेकिन शशिकांत को तब गिरफ़्तार नहीं किया गया था। उनके पिता ने बताया कि अब्दुल अपनी बीवी की पिटाई करता था, जिसके कारण शशिकांत ने उसे कई बार फटकार भी लगाई थी। अब्दुल इसे पारिवारिक मामलों में हस्तक्षेप मानता था और शशिकांत से बदला लेना चाहता था।

शशिकांत के पिता ने भी आरोप लगाया था कि उनके बेटे को व्यक्तिगत खुन्नस का बदला निकालने के लिए झूठे आरोपों में फँसाया जा रहा है। शशिकांत की पत्नी का कहना है कि उन्होंने बिहार और बंगाल के करीब डेढ़ दर्जन मुस्लिमों को दंगे की चपेट में आने से बचाया था। बावजूद इसके, उनकी दुकान को जला दिया गया और सारे सामान लूट लिए गए। इसके बाद पूरा परिवार कुछ दिनों के लिए भोपाल चला गया, लेकिन मीडिया ने फैलाया कि वो लोग गुजरात छोड़ कर भाग गए हैं। शशिकांत को 2005 में जमानत भी मिली थी, लेकिन अब्दुल सत्तार ने दावा किया कि उसे शशिकांत की तरफ से लगातार धमकियाँ मिल रही है। इस कारण उन्हें फिर जेल में डाल दिया गया।

शशिकांत के एक पड़ोसी ने जब ये अन्याय देखा तो उसने आवाज़ उठाने की कोशिश की। बाद में अब्दुल सत्तार ने उस परिवार को भी धमकी दी और उसके ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज करा दिया। इस बीच शशिकांत के पिता की भी मृत्यु हो गई। ख़ुद शशिकांत जेल से बाहर आने के बाद ख़ुद को अपमानित महसूस करते और ‘ट्विन हीट अटैक्स’ के कारण उनकी मृत्य हो गई।

इसी तरह का एक और मामला है। हुसैननगर निवासी ज़रीना शेख ने दावा किया कि वो गर्भवती कौसर बानो हत्याकांड की प्रत्यक्षदर्शी है। उसने बताया था कि भीड़ ने कौशर का पेट फाड़ के तलवार से भ्रूण को निकाल लिया और उसे आग में फेंक दिया। इसके बाद कौसर को भी आग में जला डाला। ज़रीना के इस बयान को सच माना जाता रहा। 2010 के एक रिपोर्ट से पता चलता है कि डॉक्टर ने जब कौसर का पोस्टमॉर्टम किया तो पाया कि भ्रूण को नुकसान नहीं पहुँचाया गया था।

कौसर की हत्या निंदनीय थी, लेकिन इसे लेकर जिस तरह का झूठ फैलाया गया, वो भी निंदनीय था। इसी तरह गुजरात दंगों के मामले में कई ऐसे लोगों को फँसाया गया, जो बाद में निर्दोष साबित हुए लेकिन तब तक उनकी ज़िंदगी, उनका परिवार और करियर- सब तबाह हो चुका था।

जस्टिस बोबडे होंगे अगले CJI: अयोध्या विवाद की सुनवाई करने वाली पीठ में हैं शामिल

जस्टिस शरद अरविंद बोबडे देश के अगले मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) होंगे। मंगलवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उनकी नियुक्ति पर मुहर लगा दी है। 63 वर्षीय बोबडे 18 नवंबर को सीजेआई पद की शपथ लेंगे। मौजूदा सीजेआई रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं।

अयोध्या विवाद की सुनवाई करने वाली संवैधानिक पीठ में शामिल जस्टिस बोबडे 17 महीने के लिए 23 अप्रैल 2021 तक सीजेआई के पद पर बने रहेंगे। वे देश के 47वें मुख्य न्यायाधीश होंगे। अयोध्या मामले में गोगोई के रिटायर होने से पहले फैसला आने की उम्मीद है।

18 अक्टूबर को सीजेआई गोगोई ने केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को पत्र लिख कर जस्टिस बोबडे को अगला चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की थी। वर्तमान में वे देश के दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश हैं। मुंबई और नागपुर दोनों परिसरों में महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के चांसलर भी हैं।

लाइव लॉ के अनुसार जस्टिस बोबडे ने 1978 में नागपुर विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री हासिल करने के बाद बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र में रजिस्ट्रेशन करवाया था। 21 साल तक बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में प्रैक्टिस की। 1998 में वरिष्ठ वकील के रूप में नामित किया गया। मार्च 2000 में वे बॉम्बे हाई कोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश बने। अप्रैल 2013 में वे सुप्रीम कोर्ट पहुॅंचे।

सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण बेंच में जस्टिस बोबडे शामिल रहे हैं। 2018 में कर्नाटक के राजनीतिक विवाद को लेकर जिस बेंच ने रात भर सुनवाई की थी, उसमें भी वे शामिल थे। उन्होंने जस्टिस आर बानुमति और जस्टिस इंदिरा बनर्जी के साथ मिलकर मुख्य न्यायाधीश गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की जॉंच भी की थी।

योगी के गोरखपुर में कॉन्ग्रेस के पास एक अदद दफ़्तर भी नहीं, विवाह भवन में होती है बैठकें

कॉन्ग्रेस पार्टी उत्तर प्रदेश में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। महाराष्ट्र में 5 सालों में नंबर एक से चौथे नंबर की पार्टी बन कर ख़ुशी मना रही कॉन्ग्रेस का यूपी के कई जिलों से गायब ही होती दिख रही है। गुरु गोरक्षनाथ की धरती पर कॉन्ग्रेस के पास एक अदद दफ्तर भी नहीं है। दूसरी तरफ पार्टी दावा करती है कि उत्तर प्रदेश में वो 2022 तक अपनी खोई हुई ज़मीन वापस ले लेगी। फ़िलहाल तो ऐसा लग रहा है कि ज़मीन वापस पाना तो दूर, ज़मीन पर उतरने के लिए ही कॉन्ग्रेस को वर्षों इंतजार करना पड़ेगा।

गोरखपुर जिले में कॉन्ग्रेस के पास दफ़्तर नहीं है। पार्टी वहाँ सिर्फ़ व्हाट्सएप्प से ही चल रही है। पार्टी के सारे कामकाज व्हाट्सएप्प के माध्यम से ही हो रहे हैं। इससे कहा जा सकता है कि कॉन्ग्रेस के नेता गोरखपुर जिले में ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे हैं। गोरखपुर राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ है। वह यहाँ से 5 बार सांसद चुने जा चुके हैं। इससे पहले उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ भी 4 बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। महंत दिग्विजयनाथ भी इस क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं।

गोरखपुर में कॉन्ग्रेस का एक दफ़्तर तक न होने की बात पर पार्टी नेता कहते हैं कि राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी को इससे अवगत करा दिया गया है। हालाँकि, अभी तक प्रियंका गाँधी की तरफ से उन्हें कोई आश्वासन नहीं मिला है। गोरखपुर कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष निर्मला पासवान कहती हैं कि पार्टी को जल्द ही जिले में एक नया दफ्तर मिलेगा। वरिष्ठ नेता सैयद जमाल ने बताया कि जिला कॉन्ग्रेस कमिटी के अध्यक्ष रहे भृगुनाथ चतुर्वेदी 2017 तक पुर्दिलपुर स्थित दफ्तर में बैठते थे, लेकिन उनके दिवंगत होने के बाद कॉन्ग्रेस के पास से ये दफ्तर भी चला गया।

कॉन्ग्रेस नेता अनाधिकारिक रूप से चारुचंद्रापुरी में स्थित एक घर को कभी-कभार दफ्तर के रूप में प्रयोग करते हैं। गोरखपुर में कॉन्ग्रेस की बैठकें विवाह भवनों में होती हैं। लेकिन अधिकतर पार्टी व्हाट्सएप्प पर ही कार्य करती है और बड़ी बैठकों के लिए ही मैरिज हॉल बुक किए जाते हैं।

1991 से लेकर 2014 तक गोरखपुर में हुए हर लोकसभा चुनाव में भाजपा की ही जीत होती रही। इसके बाद हुए उपचुनाव में सपा के प्रवीण निषाद जीते, लेकिन बाद में वो भी भाजपा में शामिल हो गए और 2019 के लोकसभा चुनाव में भोजपुरी अभिनेता रवि किशन ने जीत दर्ज की। रवि किशन ने ख़ुद को गोरखनाथ मंदिर का उम्मीदवार बता कर वोट माँगा था। इस तरह से भाजपा ने 2019 में अपना खोया हुआ गढ़ फिर से हासिल कर लिया।

दीगर यह है कि कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गॉंधी के पास उत्तर प्रदेश का प्रभार है। लोकसभा चुनावों से पहले उन्हें विशेष रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई थी। इस इलाके का गोरखपुर महत्वपूर्ण केंद्र है। आम चुनावों में कॉन्ग्रेस के लिए प्रियंका कोई कमाल तो नहीं कर पाईं, लेकिन गोरखपुर जैसे जगह पर पार्टी के लिए अब तक एक दफ्तर भी नहीं शुरू करवा पाना उनकी सांगठनिक क्षमता का एक और नायाब नमूना है।

सुतली बम के साथ 2 धरे : दिल्ली में 10000 Kg पटाखे जब्त, 261 गिरफ्तारियाँ और 433 केस

दिल्ली पुलिस ने इस वर्ष 261 लोगों को पटाखे फोड़ने व बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली में दिवाली पर एक निश्चित समय तक ही पटाखे फोड़ने की अनुमति थी। साथ ही पटाखे बेचने पर भी बंदिश है। दिल्ली पुलिस ने दीपावली के दिन लगातार गश्त जारी रखा और इस दौरान महिला दस्ते को भी पेट्रोलिंग पर लगाया गया था। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस दीपावली कुल 261 लोगों को पटाखों का प्रयोग करने के कारण गिरफ़्तार किया गया।

इनमें से 166 लोगों को पटाखे फोड़ने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया। दीपावली के दिन ही 44 लोगों को पटाखे बेचने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया। उन पर इंडियन एक्सप्लोसिव एक्ट के तहत कार्रवाई की जा रही है। 51 अन्य लोगों को भी पटाखों का प्रयोग करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया। इन सभी के ख़िलाफ़ कुल 433 केस दर्ज किए गए। हालाँकि, ये सभी आँकड़े 2018 से काफ़ी कम रहे। अधिकारियों ने इसका श्रेय दिल्ली पुलिस की लगातार गश्ती को दिया है।

पुलिस के कण्ट्रोल रूम में 940 लोगों ने कॉल कर अपने इलाक़े में पटाखे फोड़े जाने की शिकायत की। दीपावली के दिन तक कुल 10,000 किलो पटाखे जब्त किए जा चुके थे। दीपावली के दिन ही अकेले 3,765 किलो प्रतिबंधित पटाखे जब्त किए गए। इनमें से 1,320 किलो पटाखे पूर्वी दिल्ली के ज्योति नगर स्थित एक जनरल स्टोर से जब्त किए गए। पिछले वर्ष इन्हीं मामलों में पुलिस ने 310 लोगों को गिरफ़्तार किया था और कुल 562 केस दर्ज किए थे।

आँकड़ों में देखें दीपवली पर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई

पिछले वर्ष जिन लोगों को पटाखे बेचने व फोड़ने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था, उनमें से कई अभी भी अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं। इस बार सबसे ज्यादा 52 लोगों को नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से गिरफ़्तार किया गया। इन लोगों पर 2,000 रुपए जुर्माना और 2 वर्ष की जेल हो सकती है। कुछ मामलों में दोनों ही सज़ाएँ दी जा सकती हैं। वहीं दिल्ली पुलिस प्रमुख ने रात में तैनात पुलिसकर्मियों के बीच मिठाइयाँ वितरित की। दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता ने उक्त जानकारियाँ दी।