महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब भी पूरी तरह साफ नहीं हुई है। शिवसेना अब भी 2.5 साल के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अड़ी हुई है, तो दूसरी ओर भाजपा उससे मोलभाव करने को तैयार नहीं दिख रही। इस बीच, भाजपा के समर्थन का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। निर्दलीय विनोद अग्रवाल और महेश बालदी ने अपना समर्थन बीजेपी को देने की घोषणा की है।
निर्दलीय राजेंद्र राउत, बीजेपी की बागी गीता जैन और युवा स्वाभिमान पार्टी के रवि राणा ने भाजपा को समर्थन देने का ऐलान पहले ही कर रखा है। राणा को छोड़ सभी ये सभी नवनिर्वाचित विधायक मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलकर उन्हें समर्थन पत्र सौंप चुके है। राणा ने फडणवीस को पत्र लिखकर बीजेपी को समर्थन देने की बात कही थी।
बुधवार को भाजपा विधायक दल के नेता का चुनाव करने वाली है। इसके लिए पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री अमित शाह मुंबई जाने वाले हैं। सूत्रों के अनुसार, यदि शिवसेना राजी नहीं हुई तो बीजेपी अल्पमत की सरकार भी बना सकती है, जैसा उसने 2014 के विधानसभा चुनावों के बाद किया था। कयास कॉन्ग्रेस में टूट के भी लगाए जा रहे हैं। विधानसभा चुनाव से पहले भी कॉन्ग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने की नेताओं में होड़ लगी थी। जिस तरह पिछले दिनों कर्नाटक और गोवा में कॉन्ग्रेस में विधायक दल में टूट देखने को मिली थी, उससे ऐसी किसी भी संभावना को सिरे से नकारा नहीं जा सकता।
अपक्ष आमदार श्री महेश बालदी यांनी मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस यांच्या नेतृत्वावर विश्वास व्यक्त करीत भाजपा सरकारला आपला पाठिंबा जाहीर केला. pic.twitter.com/fjJeZCk17D
हालॉंकि, कॉन्ग्रेस भी अपनी ओर से शिवसेना को साधने की कोशिश कर रही है। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष बाला साहेब थोराट और राज्य के पूर्व मंत्री विजय वडेट्टीवार कह चुके हैं कि यदि शिवसेना की ओर से प्रस्ताव आता है तो वे हाई कमान के साथ इसकी चर्चा करेंगे। वडेट्टीवार तो इशारों-इशारों में पॉंच साल के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी शिवसेना को सौंपने की बात कह चुके हैं। लेकिन, शिवसेना की ओर से कॉन्ग्रेस को अभी तक कोई भाव नहीं मिला है।
वैसे, कॉन्ग्रेस की इस कोशिश में आड़े उसकी सहयोगी एनसीपी का रुख भी है। एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने नतीजों के बाद कहा था कि सरकार गठन का जनादेश भाजपा शिवसेना को मिला है और वे विपक्ष में बैठेंगे। लेकिन सियासत में कोई भी बात अंतिम नहीं होती। पर्दे के पीछे से सारे समीकरण बिठाने की कोशिश होती रहती है। 2014 में बीजेपी की अल्पमत सरकार के गठन में एनसीपी की अहम भूमिका भी रही थी। बाद में शिवसेना उस सरकार में शामिल हुई थी।
288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी को 105 सीटें मिली है। बहुमत का नंबर है 145। शिवसेना को 56, कॉन्ग्रेस को 44 और एनसीपी को 54 सीटों पर सफलता मिली है। शेष सीटें निर्दलीयों और छोटे दलों के खाते में गई है। निर्दलीय में ज्यादातर भाजपा के ही बागी हैं।
बिहार के नवादा जिला स्थित ककोलत के एक आश्रम में रहने वाली एक साध्वी के साथ बलात्कार की ख़बर आई है। वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बस्ती की रहने वाली है। गैंगरेप करने वाले उनके परिचित ही थे। साध्वी ने महिला थाना में बताया कि कुछ लोगों ने उन्हें उनके माँ के बीमार होने की सूचना दी। बाद में गाड़ी में जब वह उन्हीं लोगों के साथ अपने पैतृक घर जा रही थी, तो एक सुनसान जगह पर ले कर उनके साथ रेप किया गया। अरियरी थाना क्षेत्र के फूलचोढ़ गाँव में ये घटना हुई।
आरोपितों ने 25 वर्षीय साध्वी को अपने साथ ले जाने के लिए उनके माँ के बीमार होने की झूठी ख़बर दी थी। पुलिस ने बताया है कि मामले की जाँच की जा रही है। मंगलवार (अक्टूबर 29, 2019) को साध्वी की मेडिकल जाँच कराई जाएगी। इस घटना में जीवन पटेल नाम के एक युवक का नाम सामने आया है। उसे 2017 में आश्रम से चोरी के आरोप में निकाल दिया गया था। पीड़िता ने उसके अलावा कमलनाथ चौधरी का आरोपित के रूप में नाम लिया है।
ककोलत के जिस आश्रम में ये घटना हुई है, उसमें स्त्री-पुरुष दोनों ही रहते हैं। जहाँ ये घटना हुई, वो क्षेत्र ककोलत और शेखपुरा के बीच में पड़ता है। सामूहिक बलात्कार करने के बाद आरोपित साध्वी को वहीं छोड़ फरार हो गए। थाने में शिकायत दर्ज कराने के लिए उन्हें 2 किलोमीटर पैदल चल कर जाना पड़ा। बाद में ग्रामीणों के सहयोग से वह थाने पहुँची और वहाँ शिकायत दर्ज कराई गई।
2 वर्ष पूर्व इसी आश्रम की 3 साध्वियों के साथ बलात्कार की घटना सामने आई थी। उस मामले को पुलिस ज़मीन पर कब्जे करने वाले एंगल से भी देख रही थी। महिला थाना ने जानकारी दी है कि आरोपितों की गिरफ़्तारी के लिए यूपी पुलिस से संपर्क साधा गया है। साध्वी ने बताया कि बलात्कार के बाद वे काफ़ी देर तक बेहोश रहीं और उन्हें सुबह होश आया। आरोपितों में 2 उनके परिचित हैं। दो ओरिपियों को वे जानती नहीं हैं। वे रास्ते में बारी-बारी से गाड़ी में सवार हुए थे।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश बनने से कई ऐसे नेताओं को निराशा हाथ लगी है, जो राज्य में किसी पद पर रहने के कारण मलाई मार रहे थे। इसमें एक नाम जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद का भी है, जिन्हें श्रीनगर के वीवीआईपी इलाक़े में बंगला मिला हुआ था। उन्हें ये बंगला मुफ्त में दिया गया था और उन्हें इसका किराया भी नहीं देना होता था। अगर जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा नहीं हटाया जाता तो ये सुविधाएँ सभी पूर्व-मुख्यमंत्रियों को आजीवन मिलतीं। अब गुलाम नबी आज़ाद को ये बंगला खाली करना पड़ा है।
गुलाम नबी आज़ाद नवंबर 2005 से लेकर जुलाई 2008 तक जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे थे। हालाँकि, वह श्रीनगर में नहीं रहते थे, लेकिन तब भी उन्होंने गुपकार रोड के जीठयार स्थित जम्मू-कश्मीर बैंक गेस्टहाउस को सालों तक अपने कब्जे में रखा। जम्मू-कश्मीर बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री ने गेस्ट हाउस खाली कर दिया है। लेकिन अभी तक प्रशासन की तरफ से ये संपत्ति बैंक को सुपुर्द नहीं की गई है। गुपकार रोड पर महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्ला के भी वीवीआईपी बंगले हैं। आज़ाद ‘अस्थायी निवास’ के नाम पर गेस्ट हाउस को ही अपना स्थायी बंगला बना कर रह रहे थे।
अब जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बन जाने और इसका विशेषाधिकार चले जाने के कारण महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्ला को भी अपने वीवीआईपी बंगले खली करने पड़ेंगे, जो उन्हें सरकार की तरफ से मिले थे। उन्हें इसके लिए 1 नवम्बर तक की समय-सीमा दी गई है। फ़िलहाल ये दोनों ही कश्मीरी नेता हिरासत में रखा गए हैं। ‘जम्मू कश्मीर स्टेट लेजिस्लेशन पेंशन एक्ट 1984’ के तहत इन नेताओं को ज़िंदगी भर सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने की छूट थी। इस एक्ट को 1996 में संशोधित कर कई और सुविधाएँ जोड़ी गई थीं, जिससे इन नेताओं पर और सरकारी रुपए ख़र्च होने लगे।
1 नवंबर को जम्मू-कश्मीर रीआर्गेनाईजेशन बिल के लागू होते ही इन कश्मीरी नेताओं को मिल रही सारी सरकारी सुख-सुविधाएँ अपने-आप हट जाएँगी। फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने किसी सरकारी संपत्ति पर आधिकारिक कब्ज़ा नहीं कर रखा है, लेकिन उनके बेटे उमर अब्दुल्ला के मामले में ऐसा नहीं है। हालाँकि, फ़ारूक़ अब्दुल्ला ट्रांसपोर्ट और मेडिकल जैसी कई अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाते रहे हैं। उमर अब्दुल्ला के बंगले में तो अत्याधुनिक जिम सहित कई अन्य सुविधाओं पर करोड़ों ख़र्च किए गए हैं। इन सरकारी बंगलों की सजावट और अन्य निर्माण कार्यों में भी करोड़ों रुपए फूँके गए। इन ख़र्चों को राज्य सरकार ने वहन किया।
फ़िलहाल उमर अब्दुल्ला को श्रीनगर के हरि निवास में रखा गया है। मीडिया सूत्रों के अनुसार, वहाँ भी वो अपने मनपसंद पिज़्ज़ा, सलाद और घर के बने खाने की डिमांड करते हैं। उनके मनोरंजन के लिए हॉलीवुड फ़िल्मों की कई सीडी भी उपलब्ध कराई गई है।
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की हालत बिगड़ने की खबरों के बीच प्रधानमंत्री इमरान खान की एक बड़ी टिप्पणी सामने आई है। इमरान ने कहा है कि वे किसी की जिंदगी की गारंटी नहीं ले सकते। उन्होंने यह बात इस्लामाबाद हाई कोर्ट के निर्देश के आलोक में कही। बीते हफ्ते हाई कोर्ट ने कहा था कि जेल की सजा भुगत रहे शरीफ के स्वास्थ्य की ‘जिम्मेदारी’ सरकार ले।
डॉन न्यूज के अनुसार सोमवार को ननकाना साहिब में बाबा गुरु नानक यूनिवर्सिटी का शिलान्यास करते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने यह बात कही। उन्होंने कहा,
“आज मैंने खबर पढ़ी कि कोर्ट ने संघीय और प्रांतीय सरकारों से पूछा है कि क्या वे कल नवाज शरीफ की जिंदगी की गारंटी ले सकते हैं। मैं तो कल तक के लिए अपनी ही जिंदगी की गारंटी नहीं ले सकता, तो मैं किसी अन्य की जिंदगी की गारंटी कैसे दे सकता हूॅं?”
शरीफ के परिजनों का कहना है कि यदि उन्हें कुछ हुआ तो इसके जिम्मेदार इमरान खान होंगे। पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) नेता शरीफ की तबीयत स्वास्थ्य और मानवीय आधार पर दो अदालतों से जमानत मिलने के एक दिन बाद रविवार को और खराब हो गई। प्लेटलेट्स काफी घट जाने के कारण डॉक्टरों को उनकी हृदय संबंधी दवाइयॉं बंद करनी पड़ी है।
Our religion says that life and death is in Allah’s power. Humans can only make an effort. Federal and provincial government has inserted all their efforts. @ImranKhanPTI; inauguration ceremony of Guru Nankana University #ImranKhan
रविवार को आई रिपोर्ट के अनुसार 69 वर्षीय शरीफ के प्लेटलेट्स एक ही दिन में 45,000 से घटकर 25,000 हो गए। सोमवार रात प्लेटलेट्स घटकर 2000 हो गया। इसके बाद उन्हें भ्रष्टाचार निरोधक निकाय (एनएबी) की हिरासत से सर्विसेज अस्तपाल ले जाया गया। तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके शरीफ को शनिवार को लाहौर के एक अस्पताल में इलाज के दौरान एंजाइना एटैक (हृदय में जकड़न) आया था। एंजाइना में हृदय में रक्त का प्रवाह घट जाने के कारण छाती में दर्द होता है।
दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग में आतंकियों ने फिर से राज्य में सामान्य हो रहे व्यापार को रोकने के लिए घिनौनी कोशिश की है। सोमवार (अक्टूबर 28, 2019) को आतंकियों ने एक ट्रक ड्राइवर को मार दिया। पिछले कुछ दिनों से आतंकी लगातार ट्रक ड्राइवर्स को निशाना बना रहे हैं, क्योंकि घाटी व शेष भारत के बीच व्यापार का अहम जरिया ट्रक ही है। सेब का व्यापार भी ट्रक द्वारा ही किया जाता है। उधमपुर स्थित कटरा के निवासी नारायण दत्त छठे ट्रक ड्राइवर हैं, जिन्हें अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद जान गँवानी पड़ी है।
नारायण दत्त पर ये हमला बिजबेहरा के कनिलवान इलाक़े में हुआ। आतंकियों ने उन पर गोली चलाई, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। वहाँ 2 अन्य ट्रक ड्राइवर भी थे, जिनकी जान को ख़तरा था। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकरी ने तुरंत घटनास्थल पर पहुँच कर अन्य ट्रक ड्राइवरों की जान बचाई। हालाँकि, अन्य घटनाओं की तरह आतंकियों ने ट्रक में आग नहीं लगाई। इलाक़े में घेराबंदी कर के सुरक्षा बल तलाशी अभियान चला रहे हैं, ताकि हमलावरों को पकड़ा जा सके। ये हमला यूरोपियन पार्लियामेंट के 28 सदस्यीय पैनल के दौरे से एक दिन पहले हुआ।
जम्मू-कश्मीर में आतंकी ऐसे ट्रक ड्राइवरों को निशाना बना रहे हैं, जो बाहर से आते हैं। 24 अक्टूबर को सेब लेकर जा रहे ट्रक ड्राइवर की शोपियाँ में हत्या कर दी गई थी। उससे पहले 14 अक्टूबर को शरीफ ख़ान नामक ट्रक ड्राइवर की हत्या कर दी थी। उसकी गाड़ी पर राजस्थान का नंबर था। इसके ठीक 2 दिनों बाद शोपियाँ में ही चरणजीत नामक पंजाबी व्यापारी की हत्या कर दी गई थी, जबकि एक अन्य इस हमले में बाल-बाल बच गया था। उसी दिन पुलवामा में छत्तीसगढ़ के ईंट-भट्ठा मजदूर की हत्या कर दी गई थी।
मंगलवार को यूरोपियन पार्लियामेंट का प्रतिनिधिमंडल भी जम्मू-कश्मीर के दौरे पर पहुँचेगा। ये लोग वहाँ रात भी गुजारेंगे और आम नागरिकों से बातचीत कर स्थिति का अवलोकन करेंगे। यूरोपियन पैनल जम्मू-कश्मीर में अधिकारियों से भी बातचीत करेगा। इससे एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने यूरोपियन डेलीगेशन को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को लेकर जानकारी दी। घाटी के हालात को लेकर भारत सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों का भी विवरण दिया गया।
वाशिंगटन पोस्ट ने जिस तरह से खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस के प्रमुख सरगना अबू-बकर अल-बगदादी के मारे जाने के बाद उसे इस्लामिक विद्वान बताते हुए उसका गुणगान किया, बीबीसी उससे भी कई क़दम आगे निकल गया। बीबीसी ने बगदादी को ऐसे प्रस्तुत किया, जैसे वो मानव-सेवा के लिए बलिदान हुआ कोई सामाजिक कार्यकर्ता हो। लेकिन नहीं, वो तो कई नृशंस कत्लों का गुनहगार आतंकी था। यह भी कह सकते हैं कि बीबीसी ने बगदादी के मौत के बाद एक तरह से शोक मनाया और उसे ऐसे सम्मान दिया, जैसे वो कोई ऋषि-मुनि रहा हो। बीबीसी ने बार-बार उसके लिए सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग किया।
अमेरिका के राष्ट्रपति कहते हैं कि बगदादी कुत्ते की मौत मारा गया। ट्रम्प ने बताया कि रोते-चीखते बगदादी की मौत सुरंग में गिरने के बाद हुई। उससे पहले अमेरिकी सेना ने उसका पीछा किया। ट्रम्प ने उसे कायर, अनैतिक, बीमार, क्रूर और हिंसक आतंकी करार दिया। लेकिन, उससे पहले जरा बगदादी के बारे में बीबीसी की भाषा देखिए:
बगदादी ‘छिपे हुए थे।’
‘उन‘ पर निगरानी रखी जा रही थी।
‘उनके‘ बार-बार जगह बदलने के कारण इससे पहले रेड नहीं हो सका।
बगदादी ‘कथित‘ इस्लामिक स्टेट के ‘मुखिया थे‘।
अप्रैल के एक वीडियो में आईएस ने बताया था कि बगदादी ज़िंदा ‘हैं।’
2014 में बगदादी पहली बार ‘दिखे थे।’
बगदादी अंतर्मुखी ‘थे।’
मई 2017 में वह ज़ख़्मी ‘हो गए थे।’
बगदादी 2010 में आईएसआईएस के ‘नेता बने थे।’
दुनिया ‘उन्हें‘ अल-बगदादी के नाम से जानती थी।
बगदादी का परिवार ‘धर्मनिष्ठ‘ था।
बगदादी कंठस्थ करने के लिए ‘जाने जाते थे।’
वह रिश्तेदारों को सतर्क नज़र से ‘देखते थे‘ कि इस्लामिक क़ानून का पालन हो रहा है या नहीं।
वह 2004 में दो पत्नियों व छह बच्चों के साथ ‘रहे।’
वह बच्चों को क़ुरान ‘पढ़ाते थे।’
बगदादी फुटबॉल क्लब ‘के स्टार थे।’
बगदादी हिंसक इस्लामिक मूवमेंट की तरफ़ ‘आकर्षित हो गए।’
वो क़ैदियों को इस्लाम की शिक्षा ‘देते थे।’
‘उन्हें‘ शूरा काउंसिल में शामिल किया गया।
बीबीसी की उपर्युक्त भाषा से लगता है कि उसका कोई अपना मर गया है और वो उसे श्रद्धांजलि दे रहा है। श्रद्धांजलि देते समय जैसे किसी व्यक्ति के अच्छे कार्य गिनाए जाते हैं, वैसे ही लगभग 4 लाख मौतों के लिए जिम्मेदार आतंकी संगठन के सबसे बड़े सरगना की मौत पर बीबीसी ने गिनाया। क्या हजार लाशें गिरा कर कोई एकाध बार फुटबॉल खेल ले तो उसे आतंकी कहा जाएगा या फिर दुनिया को बताया जाएगा कि ‘एक फुटबॉल स्टार नहीं रहा’? हो सकता है बीबीसी को हिंसक इस्लामिक आतंक ‘आकर्षित’ लगता हो लेकिन लाखों जान लेने वाला ये आतंकवाद डरावना है, भयावह है- आकर्षक नहीं।
जम्मू कश्मीर में आम नागरिकों और सुरक्षा बलों को मार रहे आतंकी ‘विद्रोही’ हो जाते हैं, बगदादी ‘एक्टिविस्ट’ अर्थात कार्यकर्ता हो जाता है, लादेन एक अच्छा ‘पिता’ हो जाता है और दाऊद इब्राहिम तो मीडिया के इस वर्ग के लिए बॉलीवुड हीरो से कम है नहीं। आख़िर क्या कारण है कि जब भी किसी आतंकी की मौत हो जाती है तो उसके घर-परिवार को ढूँढ कर यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि उसके पिता एक शिक्षाविद हैं या फिर उसकी माँ कितनी अच्छी हैं या फिर उसका परिवार कितना सरल, शांत और शौम्य है? क्या इन चीजों से कोई फ़र्क़ पड़ता भी है क्या?
बगदादी कैदियों को इस्लाम की शिक्षा ‘देते थे’
हाल ही में कमलेश तिवारी की मौत के बाद लल्लनटॉप जैसे मीडिया पोर्टल ने लिखा कि आरोपितों के पिता के बयान को सुना जाना चाहिए। क्या इससे कमलेश तिवारी वापस आ जाएँगे या फिर उनके पीड़ित परिजनों को न्याय मिल जाएगा? क्या हत्यारोपित का पिता कुछ बोल दे तो उसे पत्थर की लकीर मान लेनी चाहिए? ठीक इसी तरह, बीबीसी आईएसआईएस के सरगना की मौत पर शोक मनाता दिख रहा है और उसे ऐसे सम्मान दे रहा है, जैसे कोई अपने मृत पिता को देता है।
लगे हाथ बीबीसी को मोसुल के उसी ‘पवित्र मस्जिद’ में जाकर बगदादी की आत्मा की शांति के लिए नमाज भी अदा करनी चाहिए, जिसमें वह पहली बार दिखा था। अरे सॉरी, ‘दिखे थे।’ बगदादी की रूह की शांति के लिए बीबीसी को कुछ चील-कौवों को खाना खिलाना चाहिए और हो सके तो गयाजी जाकर तर्पण-अर्पण भी करना चाहिए। लेकिन हाँ, लाखों मृतकों के परिजन दुनिया के सबसे बड़े न्यूज़ नेटवर्क्स में से एक से यह सवाल ज़रूर पूछेंगे कि उनकी बदहाली के जिम्मेदार व्यक्ति का गुणगान कर के उनके जले पर नमक क्यों छिड़का जा रहा है?
बगदादी पवित्र मस्जिद से भाषण देने के बाद पहली बार ‘दिखे थे’
यही स्थिति रही तो आश्चर्य नहीं होगा अगर कल को बीबीसी का होमपेज खोलते ही ज़ाकिर नाइक के वीडियो मिलें, जिसमें वह ‘जिहाद’ के लिए मुस्लिम युवकों को भड़काता दिखे। जब आईएसआईएस के सबसे बड़े आतंकी का गुणगान किया जा सकता है, फिर ज़ाकिर नाइक तो बहुत छोटी बात है। सबसे बड़ी बात कि बीबीसी ने इस लेख में ‘कथित इस्लामिक स्टेट’ का प्रयोग किया है। अर्थात, बीबीसी यह मानता ही नहीं है कि इस्लामिक स्टेट नामक कोई आतंकी संगठन इस दुनिया में है भी। बीबीसी का कहना है कि 4-6 लाख लोग यूँ ही हवा में मर गए, उन्हें किसी ने नहीं मारा।
जब आईएसआईएस है ही नहीं तो फिर अमेरिका की सेना सीरिया में पूरी-भाजी तलने गई थी? बीबीसी ने क्षण भर में उन सैनिकों के बलिदानों को भी नकार दिया, जिनकी मौत आईएसआईएस से लड़ते हुए हुई। साथ ही बीबीसी ने भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियों को भी नकार दिया, जिन्होंने पता लगाया था कि केरल सहित भारत के कई हिस्सों से मुस्लिम युवकों ने आईएसआईएस ज्वाइन किया है। आईएसआईएस तो था ही नहीं, है ही नहीं, वो तो ‘कथित आईएसआईएस’ है। हिंसक इस्लामिक क़ानून और हिंसक विचारधारा को बीबीसी ने ऐसे प्रस्तुत किया है, जैसे ये किसी धर्मग्रन्थ का हिस्सा हो।
आप भी जान लीजिए कि ‘फुटबाल स्टार बगदादी’ कौन ‘थे’?
बीबीसी के लिए यह सब नया नहीं है। यह मीडिया के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जो आतंकियों से सहानुभूति रखता है। यहाँ हमने उसके इस कारनामे को हूबहू आपने सामने रख कर यह दिखाने की कोशिश की है कि कैसे आतंकियों के सम्मान में मीडिया संस्थान झुकते हैं और उसे ऐसे सम्मान देते हैं, जैसे वह लाखों मौतों का गुनहगार न होकर कोई समाजिक कार्यकर्ता हो। अगर भारत में आएँ तो यहाँ नक्सलियों को ऐसे ही ट्रीट किया जाता है, जैसे वो सम्पूर्ण समाज के प्रतिनिधि हों और सरकार से जनता का हक़ माँग रहे हों। भले ही वो लोगों को भड़का कर भीमा-कोरेगाँव हिंसा भड़काते हों, उन्हें महिमामंडित कर के दिखाया जाता है।
उत्तराखंड के रुड़की में पटाखे जलाने पर हिन्दुओं पर पत्थरबाजी की गई। जब दीपावली के दिन हिन्दू पटाखे फोड़ रहे थे, तभी अचानक से लगभग 60 की संख्या में मुस्लिम भीड़ पहुँची और उन्होंने हिन्दुओं पर हमला कर दिया। लिब्बरहेड़ी गाँव में हुई इस घटना में पहले तो कहासुनी हुई लेकिन बाद में मुस्लिम पत्थरबाजी पर उतर आए, जिसके बाद कई लोग घायल हो गए। इस मामले में मेहरुद्दीन, सोहेल और शाहनवाज सहित 60 लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है।
इस घटना से पहले अनुज नामक युवक अपने चाचा के यहाँ दूध देकर वापस लौट रहा था। तभी शमीम की दुकान पर खड़े मुस्लिमों ने उस पर हमला कर दिया। अनुज बाइक पर था। उसे जान से मारने की कोशिश की गई। इसके बाद किसी तरह से जान बचा कर निकले अनुज ने इसकी सूचना अपने घर पर दी। इसके बाद दूसरे पक्ष के लोग भी आ गए।
कहा जा रहा है कि इस घटना की शुरुआत पटाखे फोड़ने के विरोध से हुई। मुस्लिमों की उग्र भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठियाँ भी चलानी पड़ी। जब मुस्लिमों ने पत्थरबाजी की तो कई लोगों ने इसका वीडियो भी बना लिया। पुलिस के आने के बाद भी पत्थरबाजी चालू रही।
रात में भी गाँव में पुलिस तैनात कर दी गई और दोनों समुदायों के प्रबुद्ध जनों से बातचीत कर पुलिस ने शांति बरतने की अपील की। पत्थरबाजी के दौरान घटनास्थल पर लोग अपने-अपने छतों पर जा चढ़े, जहाँ से उन्होंने वीडियो बनाए। सोशल मीडिया पर भी इस घटना के कई वीडियो सर्कुलेट हो रहे हैं। पुलिस के पास भी ये वीडियो पहुँचे हैं, जिस आधार बना कर गिरफ्तारियाँ की जा रही हैं। इस घटना के बाद कई मुस्लिम आरोपित अपने घरों से फरार हो गए, जिनमें से 3 को अगले दिन दोपहर में गिरफ़्तार किया जा सका। फरार चल रहे सुहैल को गिरफ़्तार करने के लिए पुलिस लगी हुई है।
वहीं इस मामले में जहाँ हिन्दू पक्ष ने थाने में शिकायत दर्ज कराई है, मुस्लिम पक्ष की तरफ से पुलिस को कोई तहरीर नहीं मिली है। पुलिस ने वीडियो के आधार पर अन्य आरोपितों की पहचान की है। गाँव में तनाव की स्थिति को देखते हुए पीएसी अभी भी तैनात है।
पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सऊदी अरब की यात्रा के लिए विमान को अपने हवाई क्षेत्र उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया है। इस बार भारत ने अंतरराष्ट्रीय सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन (ICAO) के समक्ष यह मुद्दा उठाया है। संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली में जाने के लिए भी पाकिस्तान ने पीएम नरेंद्र मोदी के विमान को हवाई क्षेत्र देने से मना कर दिया था।
दरअसल, ICAO के तय दिशा-निर्देशों के अनुसार अन्य देशों द्वारा ओवरफ्लाइट की मँजूरी माँगी जाती है और दी जाती है। भारत ने ICAO के समक्ष यह मामला उठाते हुए कहा कि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय नियमों पर न चलने के अपने फ़ैसले पर विचार करना चाहिए। साथ ही साथ एकतरफा कार्रवाई करने के कारणों को ग़लत तरीके से पेश करने की पुरानी आदत पर भी विचार करना चाहिए।
सरकारी सूत्रों ने बताया कि हमें पाकिस्तान सरकार की ओर से वीवीआईपी विशेष उड़ान के लिए ओवरफ्लाइट क्लीयरेंस से इनकार करने के फ़ैसले पर अफ़सोस है। यह तो किसी भी सामान्य देश द्वारा नियमित रूप से प्रदान किया जाता है। प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार (29 अक्टूबर) को सऊदी अरब जाएँगे, जहाँ वो अंतरराष्ट्रीय व्यापार शिखर सम्मेलन को संबोधित करेंगे और खाड़ी देश के नेतृत्व से बातचीत करेंगे।
ख़बर के अनुसार, पाकिस्तानी रेडियो ने विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के हवाले से कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी के विमान को पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। कुरैशी ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार के कथित उल्लंघन के मद्देनज़र यह फैसला लिया गया है।
जम्मू और कश्मीर में कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन की उसी पुरानी बयानबाज़ी का हवाला देते हुए, पाकिस्तान ने रविवार (27 अक्टूबर) को पीएम मोदी के विमान को सऊदी अरब की यात्रा के लिए अपने हवाई क्षेत्र देने के भारत को इनकार कर दिया।
इससे पहले, पाकिस्तान ने सितंबर में पीएम मोदी की अमेरिका की उड़ान के लिए अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति से इनकार कर दिया था। तब भी, भारत ने पाकिस्तान से एकतरफ़ा कार्रवाई करने के कारणों को ग़लत बताने की अपनी पुरानी आदत पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया था, लेकिन वो व्यर्थ था। कमज़ोर दिमाग वाले देश ने तब भी टस से मस होने से मना कर दिया था।
इसी तरह, पाकिस्तानी अधिकारियों ने 7 सितंबर को भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को अपनी निर्धारित विदेश यात्रा के लिए हवाई क्षेत्र से उड़ान भरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
केरल की एक विशेष अदालत द्वारा दो साल पहले पलक्कड़ में दो नाबालिग लड़कियों से कथित बलात्कार और आत्महत्या के मामले में तीन आरोपितों को बरी कर दिया गया। इसके बाद पीड़ित लड़कियों की माँ ने पुलिस और प्रदेश की वामपंथी सरकार पर आरोपितों को सुरक्षा देने का आरोप लगाया।
बता दें कि आरोपित वी मधु, शिबू और एम मधु ने कथित तौर पर पलक्कड़ में एक 9 वर्षीय और एक 13 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार किया था। 13 वर्षीय लड़की ने साल 2017 में आत्महत्या कर ली थी, जबकि इसके लगभग दो महीने बाद 9 वर्षीय लड़की मृत पाई गई थी। पोस्टमॉर्टम में स्पष्ट हुआ था कि दोनों लड़कियों का यौन उत्पीड़न किया गया था।
Kerala: Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Court acquitted 3 accused in alleged suicide case of 2 minors in Palakkad,citing lack of evidence. In Jan 2017,a 13-year-old was found hanging in her house&2 months later her 9-year-old sister allegedly committed suicide
पुलिस ने तब मामले में तीनों आरोपितों को गिरफ्तार किया और उन पर पॉक्सो (POCSO) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत कई आरोप लगाए थे। चार्जशीट में आरोपियों के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के अलावा दुष्कर्म और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप भी लगाए गए थे। मगर शनिवार (अक्टूबर 26, 2019) को पॉक्सो कोर्ट ने सबूत के अभाव में इन आरोपितों को बरी कर दिया।
जिसके बाद पीड़िता की माँ ने रविवार (अक्टूबर 27, 2019) को कहा कि पुलिस ने मामले की जाँच ठीक से नहीं की और आरोपितों को वामपंथी सरकार (LDF) का समर्थन प्राप्त है, क्योंकि वे स्थानीय स्तर पर वामपंथी दलों के लिए काम करते थे। और इसी वजह से वो छूट गए। उन्होंने कहा, “मेरी बेटियों को न्याय नहीं मिला। जिन लोगों ने उनकी हत्या की, वह खुले में घूम रहे हैं। मैंने अदालत को विस्तार से बताया था कि मेरी बेटियों के साथ क्या हुआ था।”
पीड़िता की माँ ने कहा कि उन्होंने आरोपित मधु को उनकी बड़ी बेटी के साथ दुर्व्यवहार करते देखा था। उन्होंने उसे चेतावनी भी दी थी कि वो उसके घर के आसपास नजर नहीं आना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि जिस दिन उनकी लड़की मृत पाई गई थी, उस दिन उसकी बहन ने दो लोगों को घर से बाहर भागते हुए देखा था।
उनका कहना है कि उनके चेहरे कपड़े से ढके हुए थे, इसलिए उसे पहचान नहीं पाए। उन्होंने कहा, “हम इस मामले में नए सिरे से जाँच की माँग करते हैं। अपराधियों को दंडित किया जाना चाहिए।”
ये किसी से छुपा नहीं है कि रवीश कुमार पिछले पाँच सालों में स्वयं को पत्रकारिता का एकमात्र सत्यापनकर्ता मान चुके हैं। ‘धंधे’ को लेकर आलोचना करना एक बात है, लेकिन आलोचना के चक्कर में ये बताने लगना कि धंधा अगर कोई कर रहा है, तो वो स्वयं ही कर रहे हैं, बाकी तो बस ऐसे ही हैं, बताता है कि आपके दिमाग में टार भर चुका है और आप बीमार, बहुत बीमार हो चुके हैं।
आज सुबह ही मेरे बगल के गाँव रजौड़ा से आए एक मित्र ने मुझे रवीश कुमार और बिहार के एक कद्दावर जद(यू) नेता के बीच हुई बातचीत का आँखों देखा हाल सुनाया। लोकसभा चुनावों के दौरान रवीश जी उनके दरवाजे पर भी पहुँचे, नेताजी का राजनैतिक अनुभव दशकों का है, तो बातचीत हुई। अंत में नेता जी ने पूछा कि रवीश जी क्या चुनाव कवर करने आए हैं? तो रवीश जी ने हँसते हुए कहा कि वो तो ‘चुनाव प्रचार’ में आए हैं। नेता जी ने एक लाइन आगे कही, और संवाद उत्तर की कमी के कारण खत्म हो गया, “अगर देश के पत्रकार और बुद्धिजीवी भी चुनाव प्रचार करने लगें तो देश का क्या होगा?”
रवीश कुमार के पास उत्तर नहीं था क्योंकि कैमरे के सामने हर दिन पत्रकारिता की अग्नि में ‘जल रही है चंद्रकांता’ टाइप का भाव लिए रवीश कुमार देश के आदर्श पत्रकार बने फिरते हैं, लेकिन उनके लेखों से एक अलग स्तर का नैतिक पतन दिखता है। आज उन्होंने हिन्दुस्तान के एक पत्रकार की अयोध्या दीपोत्सव की रिपोर्टिंग का उपहास करते हुए, व्यंग्यात्मक लहजे में उसे एक बेकार पत्रकार कहा है।
रवीश के पास मोदी की दूसरी पारी शुरू होने और भाजपा को लगातार मजबूत होते देखने के इस दौर में अब कोने पर बैठे उस बुजुर्ग की तरह व्यवहार करने के अलावा कोई काम नहीं बचा, जो हर आते-जाते व्यक्ति पर दो लाइन बोल कर गरिया देता है कि उसका बाप भी ऐसा ही था, लेकिन उसका कोई मतलब नहीं होता। ऐसे ही गालीबाज बुजुर्गों की धोती में उद्दंड बालक दीवाली में पटाखे बाँध कर भाग जाते हैं और वो बचने के चक्कर में धोती उतार कर बगल की नाली में कूद जाता है।
रवीश कुमार अपनी ही पोस्ट के कमेंट में ऐसे ही अपने धोती में हर दिन पटाखे पा रहे हैं, और नंगे हो कर नाली में भी कूद रहे हैं, लेकिन सुधरना नहीं है। अब नाम ले कर बताने में लगे हुए हैं कि पत्रकारिता कैसे होनी चाहिए, और ये कि किसकी पत्रकारिता को पुलित्जर मिलना चाहिए। रवीश कुमार को इन्हीं मौकों पर अपना ही चलाया हैशटैग याद करना चाहिए और सोचना चाहिए कि ‘रवीश जी आपसे उम्मीद है’ कहने वालों की उम्मीद पर उन्होंने कैसे पानी फेरा है।
यह रिपोर्ट तीन पैराग्राफ की है जिसमें बताया गया है कि अयोध्या के दीपोत्सव में कैसे राम, सीता और लक्ष्मण के रूपों को हेलिकॉप्टर से उतारा गया और वहाँ कौन-कौन थे। साथ ही, रिपोर्टर ने लिखा है कि यह दृश्य ऐसा था जिसे महसूस किया जा सकता है, बयाँ करना मुश्किल है। इसी लाइन से रवीश जी की सबसे ज़्यादा सुलग गई। ‘सुलग गई’ का प्रयोग बस इस कारण कर रहा हूँ क्योंकि अयोध्या में लाखों दीपक जल रहे थे और उसके ताप को रवीश ने ऐसा महसूस किया कि इस अपमानजनक तरीके से बयाँ करने से रह नहीं पाए!
‘हिंदी का पत्रकार मजबूरी में नौकरी करता है’ – अरबी के विद्वान रवीश कुमार का यही मानना है
रिपोर्टर ने एक सपाट-से रिपोर्ट को अपनी भाषाई क्षमता से रुचिकर बनाने की कोशिश की है। पत्रकारिता में यह भी पढ़ाया जाता है कि शब्दों को कैसे पिरोएँ, कैसे उन्हें पर्याय और उपमानों की मदद से पठनीय बनाएँ। जब कोई इस तरह का भव्य आयोजन होता है तो आलंकारिक भाषा का प्रयोग आम है। ये ठीक वैसे ही है जैसे कि रवीश कुमार जब टीवी पर गोरखपुर आपदा पर आपसे कहते हैं कि उस माँ के दर्द को महसूस कीजिए जिसके हाथ में उसका मरा हुआ बच्चा है, तो आप एक लेख लिख कर रवीश का मजाक नहीं उड़ाते कि महसूस कैसे करें।
आप यह तब भी नहीं लिखते जबकि आपको पता है रवीश जैसे मीडिया गिरोह के गिरहकट पत्रकारों की संवेदना उस माँ के साथ नहीं, वो उस पार्टी और व्यक्ति के खिलाफ अपना अजेंडा चला रहा है जिसे वो सत्ता में आने से, स्टूडियो से हर रात रैली करने के बाद भी, रोक नहीं पाया। इसलिए रवीश मुख्यमंत्री के वहाँ होने को ‘मुख्यमंत्री के स्तर’ का आदमी लिख देता है। इससे मुख्यमंत्री या उस रिपोर्टर के स्तर से ज्यादा रवीश के स्तर का पता चलता है।
रवीश प्रोपेगेंडा गिरोह का सबसे बड़ा चेहरा है। इसलिए वो प्राइम टाइम से परे अब नींद में अपनी घृणा प्रसारित करता रहता है। रवीश आज भी 33 कोटि का मतलब मूर्खों की तरह 33 करोड़ ही मानता है, प्रकार नहीं। रवीश आज भी यही मानता है कि सरकारों के पास धर्म और संस्कृति के लिए अलग बजट नहीं होता इसलिए वो ऐसे लिखता है जैसे कि भारत की सारी गरीबी दीये के तेल से ही मिट जाएगी।
इसी बीच रवीश कुमार जो भूल जाता है वो यह बात है कि पाँच करोड़ दीयों और उसमें डाली गई घी न तो खुदाई से निकलते हैं, न ही बारिश में बरसती है। वो दीये किसी गरीब कुम्हार ने बनाए होंगे और वो घी किसी किसान के गाय के दूध से बनी होगी। लेकिन जब आग स्थान विशेष में लगी हो तो सामान्य ज्ञान और बुद्धि अक्सर चितरा नछत्तर के झाँट (फुहारों) में गायब हो जाती है।
रवीश को उन तस्वीरों से दिक्कत नहीं होती जहाँ हिन्दू नेता रेगुलर ‘नमाजी’ से ज्यादा ‘नमाजी’ बनने की कोशिश में बस नकली दाढ़ी ही नहीं लगाते, बाकी टोपी से ले कर कंधों पर विशेष तरह की गमछी और दुआ में बुदबुदाते होंठ तक इफ्तार पार्टियों में दिख जाते थे, और हैं। उसका बजट रवीश चाहें तो आरटीआई के माध्यम से पता कर सकते हैं।
कुल मिला कर रवीश कुमार के लिए भारत में बस एक खाद्य मंत्रालय ही होना चाहिए जो कि लोगों को भोजन बाँटता रहे। जब तक कोई भी भूखा है, तब तक न तो इसरो का रॉकेट छोड़ा जाए, न ही किसी को कार खरीदने की अनुमति होनी चाहिए। क्यों? क्योंकि देश में इतने लोग गरीब हैं और आप हैं कि कार से चल रहे हैं। रवीश का कटाक्ष इतनी ही सड़ाँध फैलाती लॉजिक पर आधारित है।
रवीश ने अपने ही व्यवसाय के एक रिपोर्टर का उपहास किया है क्योंकि वो ऐसा कर सकता है। वो ऐसा इसलिए कर सकता है क्योंकि उसे लगता है कि पत्रकारिता के अंतिम बचे घराने का अंतिम तबलची बस वही है और बाकी लोग तो फ़्यूज़न बजा कर संगीत का नाश कर रहे हैं। रवीश का यह लेख उसके द्वारा अपनी घटिया मनोवृत्ति के प्रदर्शन से उस गड्ढे में एक और सीढ़ी बनाने जैसा है, जहाँ से रवीश जब ऊपर देखेगा तो वहाँ अंधेरा दिखेगा क्योंकि खोदते-खोदते रवीश बहुत नीचे जा चुका होगा, जहाँ से उसके सुधार के उम्मीद की किरण प्रकाश के तरंग प्रकृति के सिद्धांत के बावजूद नहीं दिखेगी।
रवीश ने मजाक उड़ाते हुए लिखा है कि किस-किस कॉलेज के पाठ्यक्रम में इस रिपोर्ट को शामिल करना चाहिए। ये स्वयं को सर्वज्ञ मानने जैसा है। रवीश को लगता है कि स्कूल-कॉलेजों में उसका प्राइम टाइम चलाया जाए, और उसके फेसबुक पोस्ट पर ग्रुप डिस्कशन के कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ। ऐसा संभव नहीं दिखता क्योंकि रवीश कुमार बहुत कुछ हैं, लेकिन अब पत्रकारिता उनसे उतर नहीं रही।
इसके लिए अब रवीश खैनी खाएँ या बैठ कर कुथते रहें, ये कब्जियत नहीं मिटेगी। रवीश जी के दिमाग में कब्ज हो गया है। उनको कमोड में माथा घुसा कर हर रोज तीन बार फ्लश करना चाहिए। इससे होगा कुछ नहीं लेकिन ऐसा सोचने में बहुत आनंद मिलता है।